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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

सप्तविंशोऽध्यायः १३७

वशिष्ठ देव कहते हैं—ये मोक्षवादी ही हैं और कर्मयोग का आश्रय ग्रहण किये हैं। मनोरम फल-पुष्प से भगवान् सूर्य का ये पूजन करते हैं। इसी प्रकार अन्न, औषधि द्वारा भी पूजन करते हैं और घृत से होम करते हैं। मन्त्रों द्वारा होम करते हैं तथा होमद्रव्य का पान करते हैं। होमपान के फल से ये निष्पाप हो गये हैं। सूर्य में दिव्य तेज की बीस कलायें हैं॥६-८॥

कर्मणः साधने चैका तनुरग्नौ स्थिता तु या।
वायुमार्गे स्थिता व्योम्नि द्वितीया च प्रकाशिका ॥९॥
ततः परं तृतीया तत् स्मृतं सूर्यस्य मण्डलम्।
ऋङ्मयं मण्डलं तच्च दिव्यं ह्याम॑रमव्ययम् ॥१०॥

जो अंश अग्नि में स्थित है, कर्म-साधन में वह एक तनु है। आकाश में वायुमार्गस्थ द्वितीय तनु प्रकाशिका है। तदनन्तर तृतीय तनु को सूर्य का मण्डल कहा गया है। वह ऋक्मय मण्डल अथवा दिव्य मण्डल है, जो अमर तथा अव्यय है॥९-१०॥

स तस्य पुरुषो मध्ये योऽसौ सदसदात्मकः।
क्षराक्षरञ्च विज्ञेयो महासूक्ष्मं तथैव च ॥११॥
निष्कलः सकलश्चैव द्वैविध्यं तस्य कल्पितम्।
द्रष्टव्यः सकलश्चैव सर्वभूतव्यवस्थितः ॥१२॥

उस मण्डल में जो पुरुष अवस्थित हैं, वे सत्-असत् स्वरूप हैं, वे क्षर-अक्षररूप से ज्ञेय हैं। उनको महासूक्ष्म स्वरूप भी कहा गया है। निष्कल (कलारहित) तथा सकल (कलायुक्त)—इन दो रूपों से उनकी कल्पना की जाती है। सकलरूप ही दृष्टिगोचर, द्रष्टव्य है। वह समस्त प्राणियों में स्थित है॥११-१२॥

तृण-गुल्म-लता-वृक्ष-मृग-सिंह-गज-द्विजान्।
सुर-द्विज-मनुष्यांश्च स्थलजाञ्जलजांस्तथा ॥१३॥
व्याप्य स्थितं स सर्वत्र सर्वेषामन्तरात्मनि।
यदा कालात्मनश्चैव द्वितीयां तनुमाश्रितः ॥१४॥

तृण-गुल्म-लता-वृक्ष-हिरण-सिंह-हाथी तथा पक्षीगण, देवता, ब्राह्मण तथा मनुष्यगण, स्थलज तथा जलज समस्त प्राणीगण में तथा सबकी अन्तरात्मा में वे ही सदा व्याप्त रहते हैं॥१३-१४॥

निष्कलस्तु तदा ज्ञेयः संस्थितस्तैजसीं कलाम्।
हिमं घर्मं च वर्षं च त्रैलोक्यं कुरुते सदा ॥१५॥

जब वे कलात्मक हैं, तब द्वितीय तनु का आश्रय ग्रहण करते हैं। जब निष्कल हैं, तब तैजसी कला का आश्रय ग्रहण करते हैं। इस प्रकार शीत-ग्रीष्म तथा वर्षारूप त्रिकाल की वे सृष्टि करते हैं॥१५॥

१३८ श्रीसाम्बपुराणम्

तृतीयायां तनौ तस्य संरक्षंस्तत्परं पदम्।
देवयानं च पन्थानं कर्मयोगेन संस्थितम्॥१६॥
आदित्यसिद्धान्तविदः सांख्ययोगविदश्च ये।
तेऽपि गच्छन्ति तत्स्थानं स मोक्षः प्रकीर्त्तितः॥१७॥

उनका तृतीय तनु परमपद में संरक्षित है। कर्मयोग में देवयान पथ संस्थित है। आदित्य सिद्धान्तविद लोग तथा सांख्ययोगज्ञ जिस स्थान में जाते हैं, वह मोक्ष के नाम से कहा गया है।।१६-१७।।

निर्द्वन्द्वो निर्मलश्चैव तत्र गत्वा न शोचति।
वेदेषु च वदन्तीमं त्रयीधर्मस्तु संस्थितः॥१८॥

निर्द्वन्द्व तथा निर्मल होकर वहाँ जाकर कोई शोक नहीं करता। वेद में भी यही कहा गया है। उसमें ऋक्-यजुः-साम वेदत्रयी में वर्णित कर्मकाण्ड संस्थित है।।१८।।

गायत्र्याश्च चतुर्विंशत्यक्षरं परिकीर्त्तितम्।
पञ्चविंशतितत्त्वस्थं ध्यायन्तस्तत्त्ववेदिभिः॥१९॥
ॐकारस्थं ततश्चापि ध्यायन्ति वेदवादिनः।
अक्षरं चैव ओङ्कारं सार्द्धमात्राद्वये स्थितम्॥२०॥

गायत्री २४ अक्षरों की कही गयी हैं। सूर्य का ध्यान तत्त्ववेत्ता २५ तत्त्वस्थ करते हैं। वेदवादीगण उनका ध्यान ओंकार रूप में करते हैं। ओंकार अ + उ + म तथा सार्द्धमात्राद्वय में स्थित है।।१९-२०।।

वदन्ति चार्द्धमात्रस्थमकारं व्यञ्जनात्मकम्।
ध्यायन्ति च मकारं ये ज्ञानं तेषां मदात्मकम्॥२१॥
मकारध्यानयोगाच्च मया ह्येते प्रकीर्त्तिताः॥२२॥

अर्धमात्रस्थ मकार व्यञ्जनात्मक है। जो मकार का ध्यान करता है, उसे आत्मविषयक ज्ञान होता है। मकार ध्यानयोग में मैंने यह सब कहा है।।२१-२२।।

धूपमाल्यैर्जपैश्चापि ह्युपहारैस्तथैव च।
ये यजन्ति सहस्त्रांशुं तेन ते याजकाः स्मृताः॥२३॥

इति श्रीसाम्बपुराणे मगानां सूर्यपूजानाम सप्तविंशोऽध्यायः

जो धूप, माला, जप तथा उपहार (पूजादि द्रव्य) द्वारा सहस्त्रांशु सूर्य का यजन करते हैं, उन्हें याजक कहा गया है।।२३।।

श्रीसाम्बपुराण में मग द्वारा सूर्यपूजा नामक सप्तविंश अध्याय समाप्त

अष्टाविंशोऽध्यायः

(मोक्षज्ञानम्)

वशिष्ठ उवाच

इमां ज्ञानोपलब्धिञ्च कथ्यमानां निबोध मे।
अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांस-शोणितलेपनम् ॥१॥
चर्मावनद्धं दुर्गन्धिपूर्णं मूत्र-पुरीषयोः।
जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम् ॥२॥
रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत्।

वशिष्ठ देव कहते हैं—मैं तुमसे ज्ञानोपलब्धि की बातें कहता हूँ, सुनो। प्राणियों का निवास स्थल है—यह देह। इस देह की आसक्ति का त्याग करो। यह देह अस्थिस्थूण, स्नायुयुक्त है। मांस तथा रक्त से लिप्त है। चर्म द्वारा आवृत, मूत्र तथा पुरीषरूपी दुर्गन्ध-युक्त, जरा-शोक से युक्त, रोगगृह है। यह आतुर तथा रजयुक्त एवं अनित्य है॥१-२॥

कृपालुत्वं क्षमासत्यार्जवत्वमथ शौचता ॥३॥
क्षमता सर्वभूतेषु एतन्मुक्तस्य लक्षणम्।
तिले तैलं दधि क्षीरे काष्ठे पावकसंहतिः ॥४॥

कृपालुत्व, क्षमा, सत्य, आर्जव, शौच और क्षमता—ये हैं मुक्त के लक्षण। जैसे तिल में तेल है, जैसे दुग्ध में दधि है, जैसे काष्ठ में अग्नि है (वैसे ही समस्त प्राणियों में ये गुण रहते हैं)॥३-४॥

उपायं चिन्तयेदस्य धिया धीरः समाहितः।
प्रमाथिना चलेनापि मनसा संयतेन तु ॥५॥

धीर व्यक्ति समाहित चित्त से बुद्धि द्वारा प्रमाथी, चंचल मन को संयत करने के उपाय का चिन्तन करते हैं॥५॥

बुद्धीन्द्रियाणि संयम्य शकुन्तानिव पञ्जरे।
इन्द्रियैर्नियतैर्देही धारणाभिश्च तृप्यति ॥६॥
प्राणायामैर्दहेद्दोषं धारणाभिश्च दुष्कृतम्।
प्रत्याहारेण विषयान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान् ॥७॥

१४० श्रीसाम्बपुराणम्

प्राणायाम (पूरक, कुम्भक, रेचक) द्वारा दोषों का धारण (यमादि गुणयुक्त आत्मा में मन-समर्पण, ब्रह्मवस्तु में अन्तःकरण का अभिनिवेश) द्वारा दुष्कृत का एवं प्रत्याहार (इन्द्रिय-निवर्तन) द्वारा विषयों का परित्याग करके, ध्यान द्वारा ईश्वरीय गुणों का लाभ प्राप्त करना चाहिये॥६-७॥

यथा पर्वतधातूनां दोषा दह्यन्ति धाम्यताम्।
तथेन्द्रियकृता दोषा दह्यन्ते चित्तनिग्रहात् ॥८॥

जैसे पर्वतस्थ धातुओं का समस्त दोष अग्नि में दग्ध हो जाता है, उसी प्रकार इन्द्रियकृत दोष चित्तनिग्रह से दग्ध होता है॥८॥

चित्तं चित्तेन संशोध्य मनस्तु मनसैव तु।
भावान् भावेन संशोध्य बुद्ध्या बुद्धिं विशोधयेत् ॥९॥

चित्त द्वारा चित्त का, मन द्वारा मन का, भाव के द्वारा भाव का एवं बुद्धि के द्वारा बुद्धि का शोधन करना चाहिये॥९॥

चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम्।
शुभाशुभविनिर्मुक्ता निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ॥१०॥
निर्ममो निरहङ्कारस्ततो याति परां गतिम्।

चित्त की प्रसन्नता से शुभ और अशुभ कर्म विनष्ट हो जाता है। शुभ तथा अशुभ से विनिर्मुक्त, निर्द्वन्द्व (शीत-ग्रीष्म, लाभ-अलाभ, मान-अपमान प्रभृति विरुद्ध धर्म से निष्कृत लाभ करता है), निष्परिग्रह (कहीं भी लिप्त न होना), निर्मम (ममताशून्य) तथा निरहंकार (मैं-मेरा इत्यादि अहंकार-शून्यता) के होने के उपरान्त परम गति का लाभ प्राप्त करता है॥१०॥

पूर्वाह्ने लोहितं रूपमृङ्मयं प्रथमं स्मृतम् ॥११॥
यजुर्मयं द्वितीयन्तु शुक्लं माध्यह्निकं स्मृतम् ॥१२॥
कृष्णं तृतीयं सायाह्ने साम्नो रूपं ततः स्मृतम्।
प्रथमं राजसं रूपं द्वितीयं सत्त्वसंज्ञितम् ॥१३॥

पूर्वाह्न में सूर्य के लोहितरूप को प्रथम ऋक् मय रूप कहा गया है। द्वितीय रूप मध्याह्नकालीन शुक्लरूप यजुर्मय रूप है। तृतीय सायाह्न कालीन साममय रूप कहा गया है। प्रथम रूप राजस एवं द्वितीय रूप सात्त्विक है॥११-१३॥

तृतीयं तामसं रूपं त्रैगुण्यं तच्च संज्ञितम्।
त्रयाणां व्यतिरेकेण चतुर्थं सूर्यमण्डलम् ॥१४॥

तृतीय रूप तामसिक है। इस प्रकार से यह त्रिगुण विशिष्ट कहा जाता है। इन तीनों के संस्पर्श से रहित चतुर्थ है—सूर्यमण्डल॥१४॥

अष्टाविंशोऽध्यायः १४१

ज्योतिःप्रकाशकं सूक्ष्मं प्रोक्तं तच्च निरञ्जनम्।
त्रैविद्यसिद्धान्तरताः सूर्यसिद्धान्तवेदिनः ॥१५॥
ॐकारप्रणवैर्युक्ता ध्याननिर्धूतकल्मषाः।
स्थिताः पद्मासने धीरा नाभिसंन्यस्तपाणयः ॥१६॥

उस सूर्यमण्डल को ज्योतिःप्रकाशक, सूक्ष्म एवं निरञ्जन कहते हैं। जो त्रैविद्य सिद्धान्त (वेदार्थज्ञ) में रत हैं, जो सूर्य-सिद्धान्त को जानने वाले हैं, निरन्तर प्रणव मन्त्र के ध्यान से जिनकी पापराशि धुल गई है, वे धीरगण नाभि पर हाथ रखकर पद्मासनस्थ होते हैं॥१५-१६॥

सुषुम्नानाभिमार्गं च कुम्भरेचकपूरकैः।
त्रिभिः संशोध्य तान् पञ्च मरुतो देहमध्यगान् ॥१७॥
पादाङ्गुष्ठेन सञ्चिन्त्यमूर्ध्वमुन्नमयक्रमात्।
नाभिप्रदेशे दृष्ट्वा च देवमग्निमनिन्धनम् ॥१८॥

जो सुषुम्ना पथ में कुम्भक, रेचक तथा पूरक द्वारा नाभिमार्ग एवं पादांगुष्ठद्वय द्वारा देहमध्यस्थ पञ्चवायु का संशोधन करके क्रमशः मस्तक में उसे उठाकर नाभिदेश में काष्ठरहित अग्निरूप देवता सूर्य को देखते हैं॥१७-१८॥

सोमं च हृदये दृष्ट्वा मूर्ध्नि चाग्निशिखां पुनः।
वातराशिमिवासह्यं तं भित्त्वादित्यमण्डलम् ॥१९॥
ततः परं तु गच्छेत योगस्थः सूर्यमण्डलम्।
तत्र गत्वा न शोचन्ति तत् सौरं परमं पदम् ॥२०॥

तदनन्तर हृदय में चन्द्र तथा मस्तक में पुनः अग्निशिखा का दर्शन करके वायु तथा रश्मि के समान असह्य आदित्यमण्डल का भेद करता है, तत्पश्चात् योगस्थ होकर परम सूर्यमण्डल में गमन करता है। वह वहाँ जाकर शोकरहित हो जाता है॥१९-२०॥

प्रथमं हृदयं स्थानं द्वितीयं चाग्निसंस्थितम्।
तृतीयं तापनं स्वस्थं चतुर्थं सूर्यमण्डलम् ॥२१॥

प्रथम स्थान हृदय, द्वितीय अग्नि, तृतीय सूर्य तथा चतुर्थ है—सूर्यमण्डल॥२१॥

स्थानं चतुर्थं परमात्मनस्तनोर्भानोः सुरेशस्य वदन्ति तज्ज्ञाः।
स्थानं द्वितीयं परमात्मनस्तनोर्भानोः सुरेशस्य वदन्ति तज्ज्ञाः ॥२२॥
ज्ञेयश्च मोक्षश्च नृणां स एव संसारविच्छिन्नकरं पदं तत्।
इदं तृषीणां चरितं मया ते प्रख्यापितं याजकशास्त्रसंगात् ॥२३॥

१४२ श्रीसाम्बपुराणम्

तत्त्वविद् इस चतुर्थ स्थान को परमात्मा देवदेव सूर्य का स्थान कहते हैं। तत्त्वज्ञ द्वितीय स्थान को भानु का द्वितीय स्थान कहते हैं। उसे मनुष्यों को मोक्ष देने वाला जानना चाहिये। वह स्थान संसार को विच्छिन्न करने वाला है। याजक शास्त्र का अवलम्बन लेकर इन ऋषियों (मग ब्राह्मणों) का चरित्र तुमसे कहा। इसे जान लेने पर मोक्षविद् होना सम्भव है और सिद्धि प्राप्त करके उस स्थान को प्राप्त करना सम्भव हो जाता है।।२२-२३।।

इदममृतसमं परस्य वेद्यं किरणसहस्रभृतो हितं जनानाम्।
ऋषिचरितं वीक्ष्य तत्त्वसारं व्यपगतमोहधियः प्रयान्ति मोक्षम् ॥२४॥
महत् प्रोक्तमिदं ज्ञानं देयं श्रद्धावतां नृणाम्।
नास्तिकानामबुद्धीनां न देयं भूतिमिच्छता ॥२५॥

इति साम्बपुराणे मोक्षज्ञानं नामाष्टाविंशोऽध्यायः

यह अमृततुल्य, सहस्र किरणधारी, परतत्त्व सूर्य का ज्ञापक, जनगण का हितकारक तत्त्वसार है। जिनकी मोह बुद्धि ऋषियों का चरित्र देखकर अपगत हो गयी है, वे इसके द्वारा मोक्ष-लाभ करते हैं। इस ज्ञान को जो महत् द्वारा उक्त है, श्रद्धालु जन को ही देना चाहिये। ऐश्वर्यकामी, नास्तिक बुद्धि तथा मूढ़ को यह ज्ञान कदापि नहीं देना चाहिये।।२४-२५।।

श्री साम्बपुराण का मोक्षज्ञान नामक अष्टाविंश अध्याय समाप्त

एकोनत्रिंशोऽध्यायः

(प्रतिमालक्षणम्)

वशिष्ठ उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रतिमालक्षणं क्रमात्।
यथैवं नारदेनोक्तं साम्बानुग्रहकारिणा ॥१॥

वशिष्ठदेव कहते हैं—अब प्रतिमालक्षण कहूँगा, जिसे साम्ब के ऊपर अनुग्रह करके नारद ने जिस प्रकार कहा था॥१॥

न पुरा प्रतिमा ह्यासीः पूज्यते मण्डले रविः।
यथैतन्मण्डलं व्योम्नि स्थीयते सवितुस्तदा ॥२॥
एवमेव पुरा भक्तैः पूज्यते मण्डलाकृतिः।
यतः प्रभृति चाप्येषा निर्मिता विश्वकर्मणा ॥३॥
सर्वलोकहितार्थाय सूर्यस्य पुरुषाकृतिः।
प्रतिमास्थापनं चैव प्रमाणं च विधानतः ॥४॥
सर्वलोकहितं साम्ब कथ्यमानं निबोध मे।
गृहेषु प्रतिमायास्तु न तासां नियमः क्वचित् ॥५॥

पहले प्रतिमा नहीं थी; रवि की पूजा मण्डल में ही होती थी। जैसे आकाश में सूर्य का मण्डल है, वैसे ही सूर्य स्थापित होते थे। पूर्वकाल में भक्त मण्डलाकृति सूर्य का ही पूजन करते थे। जबसे विश्वकर्मा ने समस्त लोक के हितार्थ सूर्य की पुरुषाकृति प्रतिमा का निर्माण किया, तब से प्रतिमास्थापन तथा यथाविधान प्रमाण चलता है। हे साम्ब! समस्त संसार के हितार्थ मैंने तुमसे इसे कहता हूँ, सुनो। गृह में प्रतिमा-निर्माण का कोई नियम नहीं है॥२-५॥

मनसैवेप्सिताः कार्याः सर्वा एव शुभप्रदाः।
देवायतनविन्यासे कार्यं मूर्त्तिपरीक्षणम् ॥६॥

मन से ईप्सित कार्य सबके लिये शुभ देने वाला होता है। देवता के मन्दिर-निर्माण में मूर्ति की परीक्षा करना उचित है॥६॥

भूमेरश्च लक्षणं यत्नात् परीक्षां तत्त्वतो बुधैः।
आदौ भूमिं परीक्षेत कुर्याद्देवगृहं ततः ॥७॥

.१४४ श्रीसाम्बपुराणम्

पण्डितों द्वारा भूमि का परीक्षण करना उचित है। पहले भूमि की परीक्षा करके तब मन्दिर का निर्माण करना चाहिये।।७।।

इष्टगन्धरसोपेता स्निग्धा भूमिः प्रशस्यते।
शर्करातुषकेशास्थिक्षाराङ्गारविवर्जिता ॥८॥

इष्ट गन्ध तथा रसयुक्त भूमि प्रशंसनीय है। शर्करा (धूल, बालू प्रभृति), तुष, केश, अस्थि, क्षार तथा अंगारयुक्त भूमि वर्जित है।।८।।

मेघदुन्दुभिनिर्घोषा सर्वबीजप्ररोहिणी।
शुक्ला रक्ता तथा पीता कृष्णाभावहिता क्षितिः ॥९॥

मेघ तथा दुन्दुभि की ध्वनियुक्त तथा समस्त बीजों के उत्पत्तियोग्य शुक्ल, रक्त, पीत, कृष्ण वर्ण वाली जमीन प्रशस्त होती है।।९।।

द्विजराजन्यवैश्यानां शूद्राणां च यथाक्रमम्।
परीक्षितायां भूम्यां तु मध्ये तस्याः प्रमाणतः ॥१०॥
उपलिप्य चतुर्हस्तं चतुरस्रं समन्ततः।
हस्तमात्रमधः खात्वा मध्ये तस्य दशाङ्गुलम् ॥११॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों द्वारा यथाक्रम से परीक्षित भूमि में परिमाप के अनुसार चार हाथ साफ करके चारो ओर चतुरस्र (चार कोण, चौकोर) बनाकर नीचे एक हाथ खोदना चाहिये। उसमें पुनः १० अङ्गुल का गर्त खोदे।।१०-११।।

गर्तमुत्कीर्त्तयेत्तं वै पांसुना परिपूरयेत्।
समे समगुणा ज्ञेया हीने हीनगुणा भवेत् ॥१२॥

उस गर्त को धूल से परिपूर्ण करना चाहिये। वह समान होने से समगुण तथा हीन होने से हीनगुण वाली होती है।।१२।।

वर्द्धमाने तु भूयोऽसौ भवेद्बुद्धिकरी क्षितिः।
नित्यं प्राङ्मुखमर्कस्य कदाचित् पश्चिमामुखम् ॥१३॥

वृद्धि होने से वह वृद्धिकरी भूमि होती है। नित्य सूर्य-प्रतिमा का मुख पूर्व की ओर करना चाहिये, परिस्थितिवशात् पश्चिममुख भी हो सकती है।।१३।।

स्थापनीयं गृहे सम्यक् प्राङ्मुखे स्थानकल्पना।
भवनाद्दक्षिणे पार्श्वे रवेः स्नानगृहं स्मृतम् ॥१४॥

गृह के पूर्व में सूर्यप्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। गृह के दक्षिण पार्श्व में सूर्य का स्नानगृह बनाना चाहिये।।१४।।

एकोनत्रिंशोऽध्यायः १४५

अग्निहोत्रगृहं कार्यं रवेरुत्तरतः शुभम्।
उदङ्मुखं भवेच्छम्भोर्मातृणां च गृहोत्तमम्॥१५॥
ब्रह्मा पश्चिमतः स्थाप्यं विष्णुरुत्तरतस्तथा।
निक्षुभा दक्षिणे पार्श्वे रवेः राज्ञी तु वामतः॥१६॥

उत्तर में सूर्य का अग्निहोत्र गृह होना चाहिये, जो शुभप्रद होता है। उत्तर की ओर मुख किये शम्भु तथा मातृकाओं का गृह उत्तम होता है। पश्चिम में ब्रह्मा तथा उत्तर में विष्णु स्थापनीय हैं। रवि के दक्षिण पार्श्व में निक्षुभ तथा वाम पार्श्व में राज्ञी को स्थापित करना चाहिये॥१५-१६॥

पिङ्गलो दक्षिणे भानोर्वामतो दण्डनायकः।
श्रीमहाश्वेतयोः स्थानं पुरस्तादंशुमालिनः॥१७॥

सूर्य के दक्षिण में पिङ्गल तथा वाम पार्श्व में दण्डनायक की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। अंशुमाली सूर्य के समक्ष श्री तथा महाश्वेता का स्थान होता है॥१७॥

तत्तथो अश्विनौ द्वारि पूजाकर्मगृहाद् बहिः।
द्वितीयायां तु कक्षायां राज्ञस्तोषौ व्यवस्थितौ॥१८॥
तृतीयायां तु कक्षायां स्थितौ कल्माषपक्षिणौ।
जान्दको माठरः स्थाप्यो दक्षिणां दिशमास्थितौ॥१९॥

पूजागृह के बाहरी द्वार में अश्विनीकुमार द्वय एवं द्वितीय कक्षा में राज्ञ एवं तोष के रहने का स्थान बनाना चाहिये। तृतीय कक्षा में कल्माष नामक पक्षिद्वय रहते हैं। दक्षिण दिशा में जान्दक तथा माठर की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये॥१८-१९॥

प्राप्नुयानूक्षुतायौ तु पश्चिमां दिशमास्थितौ।
उदीच्यां स्थापनीयस्तु कुबेरः सोम एव च॥२०॥

पश्चिम दिशा में प्राप्नुयान तथा ऊक्षुता को स्थापित करना चाहिये। उत्तर दिशा में कुबेर तथा चन्द्र की स्थापना करनी चाहिये॥२०॥

उत्तरेणैव ताभ्यां तु रेवन्तः सविनायकः।
यद्रवेर्विद्यते स्थानं चतुर्दिक्षु तु तत्र वा॥२१॥

उसके उत्तर में विनायक के साथ रेवन्त की स्थापना करनी चाहिये अथवा रवि के चतुर्दिक् जो स्थान है, वहाँ उनको स्थापित करना चाहिये॥२१॥

अर्घाय मण्डले द्वे वै कार्ये सव्यापसव्ययोः।
दद्यादुदयवेलायामर्घं सूर्याय दक्षिणे॥२२॥
उत्तरे मण्डले दद्यादर्घमस्तंगते रवौ।
चतुरस्रं चतुःशृङ्गं व्योमदेवगृहाग्रतः॥२३॥

१४६ श्रीसाम्बपुराणम्

सूर्यमण्डल के बाँयें तथा दाहिने अर्घ्य देने का स्थान रखना होगा। उदय काल में दाहिनी ओर सूर्य को अर्घ्य देना चाहिये। अस्तकाल में बायीं ओर अर्घ्यदान करना चाहिये। देवगृह के समक्ष चतुरस्र तथा चतुःशृङ्ग बनाना चाहिये।।२२-२३।।

दिण्डिः स्थाप्यः पुरस्तस्मादादित्याभिमुखस्तथा।
एष स्थानविधिः प्रोक्तो देवानान्तु यथाक्रमम् ॥२४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे प्रतिमालक्षणं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः

प्रतिमापाद सूत्र द्वारा मध्य में मण्डल करे। उसके समक्ष सूर्य के अभिमुख दिण्डी की स्थापना करनी चाहिये। इस प्रकार देवगण का यथाक्रम से अवस्थान का प्रकार कहा गया।।२४।।

श्रीसाम्बपुराण में प्रतिमालक्षण नामक उनत्रिंश अध्याय समाप्त

त्रिंशोऽध्यायः

(प्रतिष्ठापनकल्पे दारुपरीक्षा)

वशिष्ठ उवाच

अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रतिमाविधिविस्तरम् ।
अर्चाः सप्तविधा प्रोक्ता भक्तानां शुभवृद्धये ॥१॥
काञ्चनी राजती ताम्री पार्थिवी शैलजा तथा ।
वार्क्षी वालेख्या गायन्ति मूर्त्तिस्थानानि सप्त वै ॥२॥

वशिष्ठदेव कहते हैं—अब प्रतिमा-निर्माण का विधान विस्तार से कहता हूँ। भक्तों की शुभ वृद्धि हेतु सात प्रकार की अर्चनीय प्रतिमा कही गयी है। स्वर्णमयी, रौप्यमयी, ताम्री, पार्थिवी (मृण्मयी), प्रस्तरमयी, वार्क्षी (काठ की), अथवा आलेख्य (पट पर अंकित चित्र)—ये सात मूर्तियाँ कही गयी हैं॥१-२॥

मधूको देवदारुश्च राजवृक्षः सचन्दनः ।
बिल्वश्चाम्रातकश्चैव खदिरश्चम्पकस्तथा ॥३॥
निम्बः श्रीपर्णवृक्षश्च त्वशनः सरलोऽर्जुनः ।
रक्तचन्दनपर्यन्ताः श्रेष्ठाः स्युः प्रतिमाद्रुमाः ॥४॥

मधूक, देवदारु, राजवृक्ष, चन्दन, बिल्व, आमडा, कत्था, चम्पक, निम्ब, शाल्मलीवृक्ष, अशन (पीतशालक वृक्ष), देवदारु वृक्ष, अर्जुन तथा रक्तचन्दन—ये प्रतिमानिर्माणार्थ श्रेष्ठ वृक्ष कहे गये हैं॥३-४॥

वर्णानामानुपूर्व्येण द्वौ द्वौ वृक्षौ प्रकीर्त्तितौ ।
निम्बाद्याः सर्ववर्णानां वृक्षाः साधारणाः स्मृताः ॥५॥

आनुपूर्वीक चार वर्णों के दो-दो वृक्ष कहे गये हैं। ब्राह्मणादि सकल वर्णों के लिये निम्ब-प्रभृति साधारण वृक्षों को कहा गया है॥५॥

क्षीरिणो वर्जिताः सर्वे दुर्बलास्ते स्वभावतः ।
चतुष्पथेषु न ग्राह्या ये ये स्युस्तत्र वृक्षकाः ॥६॥

समस्त क्षीरीवृक्ष (जिसको तोड़ने पर दूध निकले) का वर्जन करना उचित है; कारण कि वे स्वभावतः दुर्बल होते हैं। चतुष्पथ पर जो वृक्ष अवस्थित हों, उनका भी ग्रहण नहीं करना चाहिये॥६॥

१४८ श्रीसाम्बपुराणम्

देवतायतनस्थाश्च ये च वल्मीकसम्भवाः।
उत्तीर्णा देवता येषु चैत्यवृक्षाश्च ये स्मृताः ॥७॥

देवता के मन्दिर के पास जो वृक्ष है, जिन वृक्षों में वल्मीक (दीपक) उत्पन्न है, जिस वृक्ष से देवता चले गये हैं एवं चैत्यवृक्ष (रथ्या अथवा श्मशान पार्श्वस्थ बौद्धों का पूजनीय वृक्ष)—इनका वर्जन करना चाहिये॥७॥

श्मशानाश्रयजाताश्च पक्षिणां निलयाश्च ते।
सकोटराश्च ये वृक्षाः शुष्काग्रा ये च पादपाः ॥८॥
अस्तानिलानलहताः कुञ्जराशनदूषिताः।
ग्रामाभासरजोद्धस्ता बाला दुर्गन्धिनस्तथा ॥९॥
अकालफलपुष्पाश्च काले ताभ्यां विवर्जिताः।
शीर्णवज्राश्च तरयो रूक्षा ध्वांक्षनिषेविताः।
एकशाखा द्विशाखाश्च त्रिशाखा अधमा द्रुमाः ॥१०॥

श्मशानसीमा में जो वृक्ष उगा है, जिस वृक्ष पर पक्षियों का वास है, जिसमें काँटा है, जिसका अग्रभाग सूख गया है, वायु अथवा अग्नि से जो वृक्ष नष्ट है, हाथी के खाने से जो नष्ट है, जो ग्राम के मुर्गे अथवा गृद्ध की बीट से जड़ित है, जो वृक्ष छोटा है, जो दुर्गन्धयुक्त है, अकाल में जिस वृक्ष के फल तथा पुष्प नष्ट हो जाते हैं, काल में जिसमें पुष्प-फल होते ही नहीं (काल में अर्थात् ऋतु में), स्नुही वृक्ष, जो वृक्ष रूक्ष है तथा जिस पर गृद्ध रहते हैं, जिस वृक्ष की एक, दो अथवा तीन शाखायें मात्र हैं, ऐसे अधम वृक्ष का त्याग करना चाहिये॥८-१०॥

शुचौ समे विविक्ते च केशाङ्गारविवर्जिते।
प्रागुदक्प्रवणे हृद्ये देशे कण्टकवर्जिते ॥११॥
विस्तीर्णस्कन्धविटपः पुष्पवानृजुरव्रणः।
अभुग्नहीनोऽविकटः स तु ग्राह्यः शुभस्तरुः ॥१२॥

पवित्र स्थान में, निर्जन में उगे, केश-अङ्गार-रहित, जलाशय के निकट उगे, रमणीय कण्टक वर्जित जो वृक्ष विस्तीर्ण तना तथा शाखा वाला हो, पुष्पयुक्त, सीधा तथा अक्षत हो, जो टेढ़ा, खण्डित अथवा विकट न हो, ऐसे मंगलप्रद वृक्ष को प्रतिमा-निर्माणार्थ ग्रहण करना उचित है॥११-१२॥

तस्याप्यष्टसु मासेषु ग्रहणं कार्त्तिकादिषु ॥१३॥
प्रशस्ते पुष्यनक्षत्रे गुणयुक्ते शुभे दिने।
शकुने च शुभे नित्यं सोपवासोऽधिवासयेत् ॥१४॥

त्रिंशोऽध्यायः १४९

समन्तादुपलभ्याथ तस्याधस्ताद् वसुन्धराम्। गायत्र्या परिपूतेन परितः प्रोक्ष्य वारिणा ॥१५॥ शुक्ले चापरिभुक्ते च परिधाय च वाससी। पूजयेद् गन्धमाल्यैश्च धूपैः स्वबलिकर्मभिः ॥१६॥

कार्तिकादि आठ मास में ऐसा काष्ठ संग्रह करना उचित है। प्रशस्त पुष्य नक्षत्रयुक्त शुभ दिन में शुभ नक्षत्र में नित्य उपवास रहकर अधिवास करे। चतुर्दिक लक्ष्य करके अपने नीचे की मिट्टी को गायत्री से पवित्र करके चारो ओर तथा ऊर्ध्व-अधः दिशा में जल छिड़के; तत्पश्चात् शुद्ध वस्त्रयुगल धारण करके गन्ध-माल्य, धूपदान, बलिकर्म प्रभृति से पूजन करे।।१३-१६।।

ततः कुशपरिस्तीर्णे हुत्वाग्निं च तदन्तिकम्। देवदारुसमिद्भिश्च मन्त्रेणानेन तत्त्ववित् ॥१७॥

तत्पश्चात् तत्त्वज्ञ पूजक कुश बिछाकर देवदारु की समिधा से इस मन्त्र द्वारा अग्नि में आहुति प्रदान करे।।१७।।

ॐ प्रजापतये सत्यसन्धाय नित्यं स्रष्ट्रे विधात्रे च चरात्मने नमः। सान्निध्यमस्मिन्कुरु देववृक्षे सूर्यावृतं मण्डलमाविशस्व स्वाहा ॥१८॥

'ॐ प्रजापति, नित्य सत्यप्रतिज्ञ, स्रष्टा, विधाता, चराचरात्मक को नमस्कार है। आप इस देवदारु वृक्ष में उपस्थित होकर (समिधा में उपस्थित होकर) सूर्यावृत मण्डल में प्रवेश करें—स्वाहा' ।।१८।।

एवं सम्पूजयित्वा तु वाक्यैस्तं परिशान्तये। वृक्षलोकस्य शान्त्यर्थं गच्छ देवालयं शुभम् ॥१९॥ देव त्वं यास्यसे तत्र छेददाहविवर्जितः। काले धूपप्रदानेन सपुष्पैर्बलिकर्मभिः ॥२०॥ लोकास्त्वां पूजयिष्यन्ति ततो यास्यसि निर्वृतिम्। वृक्षमूलं कुठारं च धूपैः पुष्पैश्च पूजयेत् ॥२१॥

इस प्रकार से पूजन कर शान्ति-कामना से नीचे लिखे वाक्यों को बोलकर वृक्षों की शान्ति हेतु शुभ देवालय में जाना चाहिये। 'छेदन तथा दाह-विवर्जित होकर तुम देवत्व का लाभ करो; यथाकाल धूप-पुष्प तथा बलिकर्म से लोग तुम्हारी पूजा करेंगे (अर्थात् मूर्ति बन जाने पर पूजन करेंगे), जिससे तुमको शान्ति मिलेगी।' यह कहकर वृक्ष की जड़ के पास वृक्ष के मूल की तथा कुठार (कुल्हाड़ी, जिससे वृक्ष काटा जायेगा) की पुष्प, धूप से पूजा करनी चाहिये।।१९-२१।।

१५०श्रीसाम्बपुराणम्

प्रयातायां तु शर्वर्यां पुनः सम्पूज्य तं नगम्।
ब्राह्मणेभ्यस्ततो दत्वा याजकेभ्यश्च दक्षिणाम्॥२२॥

रात्रि व्यतीत हो जाने पर पुनः उस वृक्ष का पूजन करके ब्राह्मण एवं पुरोहित गण को दक्षिण देनी चाहिये॥२२॥

छिन्द्याद्वनस्पतिं तज्ज्ञैस्तैः कृते स्वस्तिवाचने।
पूर्वस्यां दिशि पातोऽस्य ह्यैशान्यां चापि यद्भवेत्॥२३॥
अथवा चोत्तरस्यां तु तथा छिंद्यास्तु नान्यथा।
पूर्वैशान्यामुदक्पातो दिक्षु तिसृषु चोत्तमः॥२४॥
नैर्ऋत्याग्नेययाम्यासु दिक्षु पातस्त्वशोभनः।
वायवीवारुणीभ्यां तु दिग्भ्यां पातस्तु मध्यमः॥२५॥

ब्राह्मण तथा याजकगण स्वस्ति-वाचन करके निपुण लकड़हारे से वृक्ष को इस प्रकार कटवायें, जिससे कि वृक्ष पूर्व तथा उत्तर के मध्य के कोण (ईशानकोण) में गिरे अथवा उत्तर दिशा की ओर गिरे। अन्य ओर न गिरे, इस प्रकार काटना चाहिये। पूर्व, ईशान तथा उत्तर दिशा की ओर वृक्ष का गिरना उत्तम है। नैर्ऋत्य कोण, अग्नि कोण तथा दक्षिण दिशा में वृक्ष का गिरना अशुभ है। वायुकोण (उत्तर पश्चिम कोण) तथा पश्चिम दिशा में गिरना मध्यम है॥२३-२५॥

यस्य वश्या स्थिताः शाखा विनिर्दिष्टाः सुशाखिनः।
तासु पूर्वं ततश्छित्वा ततः पश्चादधोऽच्छिनत् ॥२६॥

जिस वृक्ष की शाखायें मजबूत हैं, उसकी सुशाखी (शोभन शाखा को) से पहले ऊपर की शाखाओं को काटकर तब निम्न (नीचे की ओर) तने से काटना चाहिये॥२६॥

अविलग्नमशब्दं च पतनं तु प्रशस्यते।
उत्पतेद् द्विदलं यस्य आपश्च मधुरक्तयोः॥२७॥
सर्पिस्तैलं क्षरेद् यस्तु पादपं तं विवर्जयेत्।
छेदनं तत्क्षणे वापि मण्डलं यस्य दृश्यते॥२८॥

वृक्ष का असंलग्न (कहीं भी युक्त न होना) तथा निःशब्द पतन (गिरना) प्रशंसनीय है। जिसका द्विदलं छिन्न हो, मधु अथवा रक्त जैसा जल, सर्पि और तेल जिस वृक्ष के कटने से क्षरित हो, उस वृक्ष का वर्जन कर देना चाहिये। जिसमें मण्डल (चक्र) देखा जाय, उस वृक्ष को तत्क्षण काट देना चाहिये॥२७-२८॥

सगर्भं तं विजानीयात् चिह्नैः समुपलक्षितम्।
पीतके मण्डले गोधा कृष्णे दीर्घभुजङ्गमः॥२९॥

त्रिंशोऽध्यायः १५१

गुड़वर्णस्तु पाषाणः कपिले गृहगोधिका।
अग्निवर्णे जलं ज्ञेयं मञ्जिष्ठाभे भवेत् कृमिः ॥३०॥
दोषैरेतैर्विनिर्मुक्तं दारुश्रेष्ठमुदाहरेत्।
प्रक्षाल्य पल्लवैः सम्यक् क्वचित् कालं विधारयेत् ॥३१॥

इति श्रीसाम्बपुराणे प्रतिष्ठापनकल्पे दारुपरीक्षा नाम त्रिंशत्तमोऽध्यायः

ऐसे चिह्न वाले वृक्ष को सगर्भ जानना चाहिये। पीतवर्ण मण्डल होने से गोधा (गोसांप), कृष्णवर्ण होने से दीर्घ सर्प, गुड़वर्ण होने से पाषाण, कपिल वर्ण होने से गृहगोधिका (छिपकिली), अग्निवर्ण होने से जल एवं रक्ताभ होने से कृमि रहते हैं। इन सब दोषों से रहित वृक्ष को ही श्रेष्ठ वृक्ष कहा गया है। पत्र के द्वारा अच्छी तरह धोकर काष्ठ को कुछ दिन रखना पड़ता है॥२९-३१॥

श्रीसाम्बपुराण में दारुपरीक्षा नामक त्रिंश अध्याय समाप्त

एकत्रिशोऽध्यायः

(प्रतिमालक्षणम्)

वशिष्ठ उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रतिमालक्षणं क्रमात्।
एकहस्ता द्विहस्ता च त्रिहस्ता वा प्रमाणतः ॥१॥

वशिष्ठ देव कहते हैं—अब प्रतिमालक्षण कहता हूँ। एक हाथ, दो हाथ तथा तीन हाथ अथवा जैसी इच्छा हो, उतने परिमाण की प्रतिमा का निर्माण करना चाहिये॥१॥

तथा सार्धत्रिहस्ता वा सवितुः प्रतिमा शुभा।
प्रासादाद् द्वारतो वापि यत्प्रमाणं प्रकीर्त्तितम् ॥२॥
तद्वा प्रमाणं कर्त्तव्यं सततं शुभमिच्छता।
एकहस्ता भवेत् सौम्या द्विहस्ता धनधान्यदा ॥३॥
त्रिहस्ता प्रतिमा भानोः सर्वकामप्रदा स्मृता।
सार्द्धतृतीयहस्ता तु सुभिक्षक्षेमकारिका ॥४॥

साढ़े तीन हाथ की सूर्यप्रतिमा शुभ होती है। प्रासाद से द्वार का जैसा प्रमाण कहा गया है, वैसा ही यह होगा (प्रासाद अर्थात् देवालय माप का—इसका तात्पर्य श्लोक ५ में है)। शुभाकांक्षी व्यक्ति सर्वदा उसी प्रकार के माप को ग्रहण करे। एक हाथ माप की प्रतिमा सौम्य होती है। दो हाथ की (प्रतिमा) धन-धान्य देती है। सूर्य की तीन हाथ की प्रतिमा सकल कामनापूरक कही जाती है। साढ़े तीन हाथ की प्रतिमा प्रचुर खाद्य तथा क्षेम (अप्राप्त वस्तु को देने वाली) प्रदात्री होती है॥२-४॥

अग्रे मध्ये च मूले च प्रतिमा सर्वतः शुभा।
गान्धर्वी सा तु विज्ञेया बहुधान्यधनावहा ॥५॥
देवागारस्य यद्द्वारं तस्मादष्टाङ्गमत्सृजेत्।
तृतीये पिण्डिका कार्या द्वौ भागौ प्रतिमा भवेत् ॥६॥

देवालय का जो द्वार है, उससे आठ भाग का परित्याग करना चाहिये। तृतीय भाग द्वारा पिण्डिका करनी चाहिये एवं दो भाग द्वारा प्रतिमा तैयार करनी चाहिये। वृक्ष के अग्रभाग, मध्यभाग तथा मूल की प्रतिमा सर्वदा शुभ होती है। इसे गान्धर्वी भी कहते हैं। यह धन-धान्य देने वाली होती है॥५-६॥

एकत्रिंशोऽध्यायः १५३

अङ्गुलैः स्वैर्भवेन्मूर्त्तिरशीतिश्चतुरङ्गुला ।
विस्तारायामतः कार्या वदनं द्वादशाङ्गुलम् ॥७॥
मुखं त्रिभागं चिबुकं ललाटं नासिका तथा ।
कर्णौ नासिकया तुल्यौ पाण्योर्वा निपतेतयोः ॥८॥
नयने द्व्यङ्गुले स्यातां तत्रिभागे तु तारके ।
तृतीयं तारकाभागं कुर्याद् दृष्टिं विचक्षणः ॥९॥

अपनी अंगुलियों से ८४ अंगुल परिमाण की मूर्त्ति होनी चाहिये। चेहरे का विस्तार १२ अंगुल होगा। उसके तीन भाग में मुख, चिबुक, ललाट तथा नासिका बनाये। नासिका के बराबर कर्णद्वय अथवा हस्तद्वय के अनुपात में कान बनाये। नेत्र २ अंगुल के होंगे, उसके तीन भाग में तारका (नेत्रतारका) होगी तथा विचक्षण व्यक्ति को तारका के तृतीय भाग में दृष्टि बनानी चाहिये।॥७-९॥

ललाटं मस्तकोत्सेधं कुर्यात्तत्सममेव तु।
परिणाहस्तु शिरसो भवेद् द्वात्रिंशदङ्गुलम् ॥१०॥
तुल्या नासिकया ग्रीवा मुखेन हृदयान्तरम्।
मुखमात्रा भवेन्नाभिस्ततो मेढ्रमन्तरा ॥११॥

ललाट में मस्तक का वेष्टन (उष्णीष) ललाट के समान होता है। ३२ अंगुल मस्तक का परिमाण होगा। मुख तथा हृदय के मध्य नासिका के तुल्य ग्रीवा होगी। मुख के सम परिणाम में नाभि तथा मेढ्र (लिंग) का निर्माण होगा॥१०-११॥

मुखविस्तारमुरसस्ततोऽर्धं तु कटिर्भवेत्।
बाहूप्रवाहतत्तुल्यावूरूजङ्घे च तत्समे ॥१२॥

मुख के विस्तार के समान वक्षःस्थल होगा। वक्ष का आधा कटिदेश होगा। उसके समान बाहुद्वय तथा प्रवाहु (केहुनी का निम्न भाग), उसके समान ऊरू तथा जंघा होगी॥१२॥

गुल्फाधस्तात्तु पादः स्यादुच्छ्रितश्चतुरङ्गुलैः ।
षडङ्गुलस्तु विस्तीर्णस्तस्याङ्गुष्ठाङ्गुलत्रयम् ॥१३॥
प्रदेशिनी च तत्तुल्या हीना शेषनखान्नखम् ।
चतुर्दशाङ्गुलः पादस्यायामः परिकीर्त्तितः ॥१४॥

गुल्फ का निम्न भाग चार अंगुल चौड़ा तथा छः अंगुल विस्तृत पैर होगा। तदनन्तर अंगुष्ठ तथा अंगुलित्रय प्रदेशिनी-व्यापी होता है, उससे कुछ छोटी कनिष्ठा अंगुलि होती है तथा शेष नख होते हैं। पाद का विस्तार चतुर्दश अंगुल कहा गया है॥१३-१४॥

१५४ श्रीसाम्बपुराणम्

एवं लक्षणयुक्ताया भवेत् पूजितलक्षणा।
अंसौ भुजौ तथैवोरू भ्रूललाटे सनासिकम्॥१५॥
गण्डं च नियतं मूर्तेः कुर्यात् तज्ज्ञः समुन्नतिम्।
विशालधवला ताम्रा पक्ष्मलायतलोचनः ॥१६॥

ऐसी लक्षणयुक्त प्रतिमा की पूजा करनी चाहिये। स्कन्धद्वय, भुजद्वय, ऊरू, भ्रू, ललाट, नासिका तथा गण्डःस्थल आदि की उच्चता आदि का निरूपण विज्ञ शिल्पी को स्वयं करना चाहिये। विग्रह विशाल, शुभ्र, ताम्र के समान पक्ष्म एवं विस्तृत नयन से युक्त होना चाहिये॥१५-१६॥

सस्मिताननपद्मास्यचारुबिम्बाधरः शुभः।
रत्नप्रोद्भासिमुकुटः कटकाङ्गदहारवान् ॥१७॥
अव्यङ्गपदबन्धादिसमायोगोपशोभितः ।
सुबाहुमण्डलश्चारुविचित्रमणिकुण्डलः ॥१८॥
कराभ्यां काञ्चनी मुद्रा प्राप्तहस्तसरोरुहम्।
एवं लक्षणसंयुक्तां कारयेदीप्सितप्रदाम् ॥१९॥

मृदु मन्द हास्ययुक्त मुखमण्डल तथा सुन्दर बिम्बाधर शुभ होता है। रत्न से उद्भासित मुकुट, कटक, अङ्गद तथा हार भी होना चाहिये। चरण नूपुरादि से शोभित हो, बाहुमण्डल सुन्दर हो, कर्णों में विचित्र मणिकुण्डल रहे एवं दोनों हाथ में काञ्चनी मुद्रा होनी चाहिये। ऐसे लक्षणों वाली प्रतिमा ईप्सित वर देने वाली होती है॥१७-१९॥

प्रजाभ्यश्च तदा भानुः शिवारोग्याभयप्रदः।
अत्यङ्गायां नृपभयं हीनाङ्गायामकल्पता ॥२०॥
ध्यातायां चक्षुषः पीड़ा कृशायां तु दरिद्रता।
सक्षतायां भयं शस्त्रात् स्फुटिता मृत्युकारिणी ॥२१॥

सूर्यदेव प्रजा का मंगल करते हैं। आरोग्य तथा अभय प्रदान करते हैं। उनके निर्मित विग्रह में अधिक अंग होने पर नृपभय एवं हीन अंग होने पर अकल्पता (विधि-बहिर्भूतता) होती है। ऐसी मूर्ति का ध्यान करने से नेत्रपीड़ा होती है। कृश मूर्त्ति से दरिद्रता होती है। मूर्ति के क्षतयुक्त होने से अस्त्रभय तथा टूटी-फूटी होने से वह मूर्ति मृत्युकारक हो जाती है॥२०-२१॥

दक्षिणावनतायां तु शश्वत् स्यादायुषः क्षयः।
उत्तरावनतायां तु वियोगो भवति ध्रुवम् ॥२२॥

मूर्ति के दाहिनी ओर झुकी होने से आयुक्षय होता है। वाम ओर झुकी होने से निश्चित मृत्यु होती है॥२२॥

एकत्रिंशोऽध्यायः १५५

तस्माद् भास्करभक्तेन लोकद्वयहितैषिणा।
नातिलोक्या न चालोक्य ऋज्वी मूर्त्तिः प्रशस्यते॥२३॥
ता मूर्त्तयः शुभा कार्यास्तदधीनास्तु सम्पदः।
शिरोरुगण्डवदनैः सर्वाङ्गावयवैस्तथा।
एवं लक्षणसम्पूर्णा सा शुभा प्रतिमा नृणाम्॥२४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे प्रतिमालक्षणं नामैकत्रिंशोऽध्यायः


जो अत्यन्त उज्ज्वल न हो, निष्प्रभ भी न हो, ऐसी सरल प्रतिमा प्रशंसनीय होती है। अतएव इस लोक के तथा परलोक के हिताकांक्षी सूर्यभक्त को शुभ मूर्ति स्थापित करनी चाहिये। उससे सम्पत्ति मिलती है। मस्तक-ऊरु-गण्ड-वदन प्रभृति सभी अवयवविशिष्ट सम्पूर्ण लक्षणयुत प्रतिमा शुभप्रद होती है॥२३-२४॥

श्रीसाम्ब पुराण का प्रतिमालक्षण नामक एकत्रिंश अध्याय समाप्त

द्वात्रिंशोऽध्यायः

(प्रतिमाकल्पः)

वशिष्ठ उवाच

अतोऽधिवासनं कार्यं विधिदृष्टेन कर्मणा।
सामुद्रं तोयमाहृत्य जाह्नव्यं यामुनं तथा ॥१॥
सारस्वतं जलं पुण्यं चान्द्रभागं ससैन्धवम्।
पौष्करं च जलं श्रेष्ठं गिरिप्रस्रवणोदकम् ॥२॥
अन्यद्वा शुचि यत्तोयं नदीनदतटाकजम्।
यथाशक्त्या तदाहृत्य कलशैः काञ्चनादिभिः ॥३॥

वशिष्ठ देव कहते हैं—तदनन्तर विधिदृष्ट कर्म द्वारा मूर्ति का अधिवास करना चाहिये। एतदर्थ समुद्र जल लाये। उसी प्रकार से चन्द्रभागा, सरस्वती, यमुना, जाह्नवी तथा सिन्धु का पुण्यजल लाना चाहिये। पुष्कर तथा प्रस्रवण गिरि का भी जल श्रेष्ठ होता है एवं अन्यान्य नद, नदी तथा जलाशय-जात जो पवित्र जल है, उसे भी यथाशक्ति स्वर्णादि के कलश में लाना चाहिये॥१-३॥

ततस्तु मणिरत्नानि सर्वबीजौषधींस्तथा।
सुगन्धीनि च माल्यानि स्थलजान्यम्बुजानि च ॥४॥
चन्दनानि च मुख्यानि गन्धांश्च विविधान् वरान्।
ब्राह्मीं सुवर्चलां मुस्तां विष्णुक्रान्तां शतावरीम् ॥५॥
दूर्वां च शङ्खपुष्पीं च प्रियङ्गूं रजनीं वचाम्।
सम्भृत्य तांस्तु सम्भारान् नानाकर्मविधानवित् ॥६॥
वटाश्वत्थशिरीषाणां पल्लवैः कुशसंयुतैः।
कलशो परिविन्यस्तैर्देयं स्नानोदकं रवेः ॥७॥

तदनन्तर मणि, रत्न, सर्वबीजौषधि, सुगन्धि, माला, स्थलज तथा जलज पद्म, मुख्य चन्दन, विविध अष्टगन्ध, ब्राह्मी, सुवर्चला (अतसी, सूर्यमुखीपुष्प), मुक्ता (एक प्रकार का जड़विशेष), विष्णुक्रान्ता (अपराजिता मूल), शतावरी, दूर्वा, शङ्खपुष्पी, प्रियंगु (श्यामलतता, फलिनीलता, पीपल), रजनी, वच—इन सब नानाविध सम्भारों का संग्रह करके नाना कर्म में विधानज्ञ व्यक्ति वट, पीपल, शिरीष प्रभृति के पल्लव तथा कुश को कलश के ऊपर स्थापित करके रवि को स्नानार्थ जल प्रदान करे॥४-७॥