भारतकोश
संग्रह पर लौटें

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

एकषष्टितमोऽध्यायः ३३७

‘भ’ आदि, ओकारान्त ‘व’, दादि भ, स्वरयुक्त ‘व’, शकार, रेफान्त ‘व’ तथा द्विरकारान्त ‘त’। ऊकार युक्त ‘स’ एवं रेफान्त ‘ष’, रेफ के पश्चात् दीर्घयुक्त। दीर्घान्त इस शुक्ल बिन्दु के द्वारा दीपित है॥४८-४९॥

क च ट त प य शा इतरेतरव्योम अयमुपरिष्टात्। भ ॐ थ अदव अर अस अरव उभ अत उस अश्व अपर अद अस आरव अस षोडशत्वं भवोद्भवसर्वभूत-सुखप्रदसर्वसाध्यसिद्धः। एकोनविंशतिः प्रधिः।

क च ट त प य श इतरेतर हैं। इसके ऊपर है—व्योम। ‘भ ॐ थ’ से लेकर ‘अस आरव अस’ पर्यन्त षोडशत्व है। समस्त प्राणीगण का उद्भव, सर्व सुखप्रद तथा सकल साध्य का सिद्ध है। यह है उन्नीस प्रधि।

चरेद्व्रतं सुसिद्ध्यर्थं यथा वक्ष्यामि तन्त्रजम्।
प्राणायामसहस्रं तु बीजतत्त्वेन धारयेत् ॥५०॥

सम्यक् सिद्धि-हेतु अन्य व्रत का आचरण करे, जैसे मैं तन्त्र से कहूँगा। सहस्र प्राणायाम बीजतत्त्व के द्वारा धारण करे॥५०॥

पञ्चाग्निभिः शिवैरङ्गैः स्याद्हुतोऽनिलभक्षणः।
त्र्यहं त्र्यहं त्रिकं प्यस्तं जपेत्तापे जले क्रमात् ॥५१॥

पञ्चाग्नि (चारो ओर प्रज्ज्वलित अग्निकुण्ड हो तथा माथा के ऊपर तप्त सूर्य हो) साधन रूप मंगलमय अंग द्वारा वृत होकर वायु-भक्षण करके तीन दिन पञ्चाग्नि साधन करे तथा तीन दिन जल में जप करे॥५१॥

गुर्वाज्ञया भस्मसुप्स्यान्तर्धर्माहं पदमस्तके।
भुञ्जीताथोचितं भक्ष्यं योगस्यास्य सदा विधिः ॥५२॥

गुरुदेव के आदेश को लेकर भस्म लगाकर भस्म तथा (जल में ?) अन्तर्धर्मा होकर अहं पद मस्तक में रखकर यथोचित भोजन करे। यह इस योग की सर्वदा की विधि है॥५२॥

चरित्वैतद्व्रतं पुण्यं मुच्यते सर्वपातकैः।
पूज्यते सर्वसिद्धैश्च ज्ञानं चास्य प्रवर्तते ॥५३॥
ये भवन्ति हि वै दोषाः साधने दिव्यमानुषाः।
शरीरजास्तथा रागा नश्यन्ति तेन वै ध्रुवम् ॥५४॥
भूतव्रतान्तसिद्ध्यर्थमेकान्ते तु मनोरमे।
आत्मतुल्यसहायः स्याद्बीजनिर्दग्धकल्मषः ॥५५॥

इस पुण्य व्रत का आचरण करके सब पापों से मुक्ति मिलती है और समस्त सिद्धि के साथ पूजा होती है तथा ज्ञान भी प्रवर्तित होता है। साधन में जो दैव, मनुष्य, शरीरजात

३३८ श्रीसाम्बपुराणम्

तथा आसक्ति के कारण जो दोष उत्पन्न होता है, वह इस व्रत से निश्चित नष्ट हो जाता है। भूत व्रतान्त सिद्धि के लिये एकान्त मनोरम स्थान में अपने समान सहायक रखकर बीज मन्त्रों द्वारा पाप (कल्मष) निर्दग्ध कर दिया जा सकता है॥५३-५५॥

एकादशा निजव्याधिर्बोद्धव्याङ्गुष्ठमस्तके।
ललाटे तेन संपीड्य सर्वविघ्नान्निवारयेत्॥५६॥

एकादश व्याधि (नाश-हेतु) अंगुष्ठ को मस्तक (पर लाकर) जानकर उससे ललाट को दबाने से समस्त विघ्न शान्त हो जाते हैं॥५६॥

आहारार्थं च सर्वेषां चरेत्सम्यग्यथाक्रमम्।
वारुणे सलिलाहारं शुक्त्यजाक्षीरपोऽपि वा॥५७॥
शक्तस्य जपतस्तस्य विघ्नान्येतानि लक्षयेत्।
मेघानां स्तनितं विद्युद्वृष्टिक्षोभश्च सागरे॥५८॥
मत्स्यादयश्च दृश्यन्ते व्रते वारुणसंज्ञके।
कापिलं घृतमाग्नेये भुञ्जतो व्रतमाचरेत्॥५९॥

सबके आहारार्थ यथाक्रम से आचरण करे। जल में जल का पान करे अथवा चार तोला परिमाण बकरी के दुग्ध का पान करे। जप में समर्थ व्यक्ति इन विघ्नों को लक्ष्य करे—मेघ ध्वनि, विद्युत्, वृष्टि से सागर की क्षुब्धता (तूफान आदि)। वारुण नामक व्रत में मत्स्यादि। आग्नेय व्रत में कपिला गौ के दूध से घृत निकाल कर (उसका भोजन करके) व्रत का आचरण करे॥५७-५९॥

सर्वमादीप्यते तस्य शुक्लाद्धं च तथोदकम्।
वायव्येऽनिलभक्ष्यः स्याच्छ्वेताजाक्षीरभुग्यथा॥६०॥
विघ्नं पात्राशने पातो वातक्षोभश्च दारुणः।
आशोकं गोरसं पीत्वा व्रतमेतत्समाचरेत्॥६१॥

(अग्नि व्रत में) तदनन्तर कुछ दीप्त होकर तथा शुक्ल अर्घ्य का जल (ग्रहण करे)। वायुव्रत में वायुपान करे तथा श्वेत वर्ण की बकरी के दुग्ध का भक्षण करे। विघ्न परिलक्षित होते हैं—विद्युत्पात, दारुण वातक्षोभ। दुःख उपस्थित होने के पूर्व तक गाय का दुग्ध पान करे तथा व्रताचरण करे॥६०-६१॥

विघ्नं सर्गस्य सम्पातो ज्योतिषां पतनं तथा।
भूतानामिह सर्वेषामशक्तश्चरितुं व्रता॥६२॥
भूतयोनिव्रतं कुर्यादेषामन्यतमेन तु।
व्रतेन माससिद्धायामस्यां सिद्धा भवन्ति ते॥६३॥
हन्यादेतेन वै रोगान्दिव्यान्भौमान्स्वदेहजान्।
एतदेव व्रतङ्कुर्य्याच्छान्तिकर्मणि मन्त्रवित्॥६४॥

एकषष्टितमोऽध्यायः ३३९

सभी प्राणियों में व्रत आचरण में अशक्त व्यक्तियों को विघ्न परिलक्षित होता है—सृष्टि का विनाश, नक्षत्रादि का पतन। भूतयोनि व्रत करे। इन सबमें से किसी एक व्रत के आचरण द्वारा इसे करे। एक मास में व्रत द्वारा सिद्ध हो जाने पर सब (कामनायें) इससे सिद्ध हो जाती हैं। इस व्रत द्वारा दिव्य-भौम तथा निज देहजात रोगों का विनाश करे। मन्त्रज्ञ साधक शान्ति कर्मों में इन्हीं व्रत का पालन करे।।६२-६४।।

व्रतं वैवस्वतं कुर्वन् शाकाहारो भवेन्नरः।
साध्यादृषीन्वसूंश्चैव पश्येत्सर्वानशेषतः ।।६५।।
विघ्नप्रशमनं प्रोक्तं सर्वमन्त्रविधिस्त्वयम्।
मध्ये ध्यायञ्जपेन्मन्त्रन्तत्त्वस्य हृदयस्य च ।।६६।।

सूर्य के व्रत में शाकाहार करना चाहिये। साध्य-ऋषि वसुगण तथा सबको सर्वतोभाव से देखे। इन सब मन्त्रों का विधान विघ्ननाशार्थ कहा गया है। बीच में ध्यान करे। तत्त्व तथा हृदय मन्त्र का जप भी करे।।६५-६६।।

दृढासनः स्थिरमना जितवायुर्जितेन्द्रियः।
मुख्यां सिद्धिमवाप्नोति तत्त्ववाजप्रसूतिजाम् ।।६७।।

इति श्रीसाम्बपुराणे एकषष्टितमेऽध्याये ज्ञानोत्तरे शरीरसाधनमष्टमं पटलम्

दृढ़ासन, स्थिर मन, जितवायु तथा जितेन्द्रिय होकर तत्त्व तथा यज्ञ से मुख्य सिद्धि का लाभ करे।।६७।।

श्री साम्बपुराणोक्त इकसठवें अध्याय में ज्ञानोत्तर शरीर-साधन नामक अष्टम पटल समाप्त

द्विषष्टितमोऽध्यायः

(सर्वकार्यसिद्धिविधानम्)

सिद्धये सर्वकार्याणां विधानमभिधीयते।
सम्पुटानां यथा तत्त्वं कर्मणां सिद्धयेऽपि च ॥१॥
सकलीकृत्य देहं त्वं प्राणायामश्च योजयेत्।
शिवाख्यां परमाख्यां च योनिं हृन्नाभितस्तथा ॥२॥
वायुरग्नेरधस्ताच्च संहरन्सह पातकैः।
अन्तरे प्राणमायच्छेत्सद्यः सिध्यति योगवित् ॥३॥
ब्रह्मतत्त्वस्त्रिभिः शोध्यापद्य तेन शुभं भवेत्।
परस्यापि दहेन्मन्त्री ग्रामं नगरमेव च ॥४॥

समस्त कार्यसिद्धि-हेतु विधान तथा कर्मसिद्धि-हेतु सम्पुट के यथार्थ तत्त्व को कहा जा रहा है। अपनी देह को एकत्र (एकाग्र) करके प्राणायाम करे। शिवा एवं परमा योनि को हृदय तथा नाभि से, वायु को अग्नि के नीचे से पातक का संहार करे। अन्तर को प्राणयुक्त करने से योगी तत्काल सिद्धिलाभ करता है। ब्रह्मतत्त्व से तीन द्वारा (उपरोक्त तीन से) शोधन करने से अपना तथा अन्य का शुभ होता है। इसका मन्त्री (मननकारी साधक) ग्राम तथा नगर को भी दग्ध कर सकता है॥१-४॥

गृहं चापि दुराधर्षः भूतं चापि महाबलम्।
निहन्ति वै प्रयुक्तः सन् क्षणादग्निरिवेन्धनम् ॥५॥
व्याधिं चापि दुराबाधां तनुत्थां दैविकां तथा।
निहन्ति तत्र तूर्णं च दिवाकरव्रती नरः ॥६॥

दुर्धर्ष गृह तथा महाबलशाली भूत को (प्रयुक्त होने पर क्षणकाल में अग्नि जैसे काष्ठ को दग्ध करती है, वैसे) यह दग्ध कर देता है। सूर्यव्रतधारी नर देह के तथा दैव से दुराराध्य व्याधि का भी शीघ्र विनाश कर देता है॥५-६॥

बीजयोनिर्भवन्मध्ये पृथिव्याश्चारुणस्य च।
पूर्ववद् ध्यानयोगः स्यात्प्राणयोगस्तथैव च ॥७॥
तेषामध्ययने चैव ये पूर्वं चैव साधिताः।
शान्तिं चैतां प्रयुञ्जीत कृतकृत्यो भवेत्तदा ॥८॥

द्विषष्टितमोऽध्यायः ३४१

पृथ्वी तथा आरुण के मध्य बीजयोनि होगी एवं पूर्व के समान ध्यानयोग एवं प्राणयोग होगा। उनके अध्ययन के पूर्व जो साधित हुआ है, उसका शान्ति विधान करके वह कृतकृत्य हो जाता है॥७-८।।

द्रव्यापहरणो वापि न्यासनिर्यातनेऽपि वा।
नाशने चैव देवानां ग्रहोत्पादनकर्मणि ॥९॥
कुर्वन्नेतानि योगी स्याद्वायुरग्निमिवेन्धनम्।
परस्थानां च सर्वेषामपाहारः प्रयुज्यते ॥१०॥

द्रव्य का अपहरण, न्यास का निर्यातन, किंवा नाशन तथा देवताओं के ग्रहोत्पादन कर्म में इनका विधान करके योगी वायु के समान होता है अर्थात् प्रज्ज्वलित अग्नि के लिये जैसे वायु सहायक होती है, वैसे ही योगी इन कर्मों में सहायक हो जाता है। अन्य से इसको गोपित रखना होता है॥९-१०॥

एष संहरते सर्वं यत्किञ्चिज्जगतीगतम्।
आरूढः संशये युञ्जन्नान्यथा तु कदाचन ॥११॥
स तु होमस्तथाग्नौ तु यदा रोगेण युज्यते।
तत्क्षणाद्धन्ति तान् सर्वान् सरोगान् हन्ति योनिजान् ॥१२॥
स्थावरं जङ्गमं वापि कृत्रिमं चापि यद्विषम्।
क्षणान्नाशयति ह्येषः यदि सम्यक् प्रयुज्यते ॥१३॥

वे इस जगत् के सब कुछ का संहार कर सकते हैं। आरूढ़ योगी संशय उपस्थित होने पर ऐसा करते हैं, अन्यथा नहीं करते। रोग होने पर अग्नि में होम करे। ऐसा होने पर यह सब, विशेषकर योनिज समस्त रोग तत्काल विनष्ट हो जाते हैं। यदि सम्यक् रूप से प्रयोग किया जाय तब स्थावर, जंगम अथवा कृत्रिम विष भी तत्काल नष्ट हो जाता है॥११-१३॥

संक्रमेण तथा व्याधिर्विपरीतेन योजितः।
चिकित्सामन्त्रपूर्वेण क्रीडार्थमनुयोजयेत् ॥१४॥
ध्यायेत्तु वारुणे वायुं शांत्यर्थं शिवसम्पुटे।
वृष्टिं कारयते ह्येष भूतयोनिः सबीजकः ॥१५॥
षड्विधं च सृजत्यस्य भूतसंहारिणस्ततः।
वायुनावेष्टयेत्सर्वं स्तमितं स्याज्जगन्महत् ॥१६॥

संक्रामक व्याधि होने पर विपरीत भाव से युक्त करना होगा। मन्त्र से इसकी चिकित्सा होगी। उसे क्रीड़ार्थ युक्त करे। शान्ति-हेतु शिवसम्पुट वारुण में वायु का ध्यान करना चाहिये। ऐसा करने से वृष्टि होगी। यह है—बीज के साथ भूतयोनि॥१४-१६॥

३४२ श्रीसाम्बपुराणम्

अश्वानान्तु जपेन्मन्त्रं योगिनां च गतिं तथा।
निरुन्ध्याद्यद्यदीक्षेत व्रणव्याधिविषं च यत्॥१७॥
ध्यायँश्च होमयेन्नित्यं युक्तो मन्त्रार्चने नरः।
उद्घाटने च संहारे योज्यश्चापि दशात्मकः ॥१८॥

अश्व का मन्त्र जप करे। ऐसा करने से योगियों की गति तक का निरोध हो जाता है। यहाँ तक कि जो-जो देखा जायेगा, जो व्रण है, व्याधि अथवा विष है, सबका निरोध हो जायेगा। मन्त्र तथा अर्चन में लगा व्यक्ति ध्यान करके नित्य होम करे। उद्घाटन तथा संहार में भी ऐसे ही दशात्मक मन्त्र का प्रयोग करे।।१७-१८।।

सर्वत्र वेष्टनं कृत्वा ततः शान्तिं प्रयोजयेत्।
परमपुटमध्ये तु द्रव्यमन्त्रेण योजयेत्।
असन्देहेन सिद्ध्येत बद्ध्वा मन्त्रविभागशः ॥१९॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे द्विषष्टित्तमेऽध्याये नवमं पटलम्

सर्वत्र वेष्टन करे। तदनन्तर शान्ति प्रदान करे। परम पुट के मध्य में द्रव्य मन्त्र द्वारा युक्त करे। ऐसे मन्त्रविभाग से बन्धन करने पर निश्चय सिद्धि प्राप्त होती है।।१९।।

श्री साम्बपुराणोक्त सकल कार्यसिद्धि विधाननामक बासठवाँ अध्याय समाप्त

त्रिषष्टितमोऽध्यायः

साधकस्येह युक्तस्य व्याधिर्भवति दारुणः।
उपसर्गः समं तस्य चिकित्सास्य न दुष्यति ॥१॥
धातुरेको ग्रहो वापि कोष्ठे त्वध्यासितोऽपि वा।
स्मृत्वा यो मनसापायो मन्त्रकैर्न प्रशाम्यति ॥२॥
क्षेत्राच्चाण्डालसेनायाश्चाग्निहोत्रगृहातथा ।
तस्मादपञ्चतत्तूर्णं मासवृद्ध्यै प्रकल्पयेत् ॥३॥
क्षेत्राच्चाण्डालसेनाच्च तथा द्विजपरा अपि।
क्रमवृद्धं च तत्सर्वं बध्नीयान्मिश्रितं क्रमात् ॥४॥

साधन में प्रवृत्त साधक को दारुण व्याधि हो सकती है; साथ ही उपसर्ग भी परिलक्षित होते हैं। इनकी चिकित्सा करने में कोई दोष नहीं है। धातुज, किंवा ग्रहादि आक्रमण-जनित अथवा कोष्ठ में अध्यासित व्याधि, जो मनसा पाप (जनित) है, वह मन्त्र से भी प्रशमित नहीं होती। चण्डाल सेना के क्षेत्र से, किंवा अग्निहोत्री ब्राह्मण के घर से अपञ्च लाकर उसकी मासवृद्धि की व्यवस्था करनी चाहिये। क्षेत्र से तथा चण्डाल-सेना से द्विज-परायण व्यक्ति भी क्रमवृद्धि-हेतु जो सब मिश्रित करे, उसका क्रमश बन्धन करे।॥१-४॥

तिस्रः पोटलिकाः कार्याः सूतिकर्पटकेन च।
संमार्जनतटे चैव आरभेत चरोः क्रियाम् ॥५॥
अन्यजानां गृहस्थैश्च श्नपयेत्तण्डुलैश्च ताम्।
ध्यायन्वै पातकं घोरं सम्पुटं यदि दारुणम् ॥६॥
यावच्च श्रयते वह्नौ तावद्रागः प्रणश्यति।
खदिरेप्यतवा शूले चैकवृद्ध्या क्रमं गताः ॥७॥
बद्धाः पोटलिकाः सर्वाप्यापूर्वमवस्थिताः।
वरुणे त्वाकृतिं कृत्वा क्षुरकृत्तां तु होमयेत् ॥८॥

तीन पोटली बनाये। सूति के कर्पटक द्वारा तथा सम्मार्जन तट पर चरु की क्रिया आरम्भ करे। अन्य जाति के गृहस्थ के तण्डुल (चावल) द्वारा उस चरु का पाक करे। घोर पातक का चिन्तन करके दारुण सम्पुट करे। जब तक वह्नि में पाक होगा, उतने में रोग प्रशामित हो जायेगा। खदिर अथवा शूल में क्रमशः एक-एक की वृद्धि करे। पहले से रखी सभी पोटली को बन्द करे। वरुण की आकृति बना करके छूरे से उसको छिन्न करके होम करे।॥५-८॥

३४४ श्रीसाम्बपुराणम्

रुधिरं च विषं तैलमाहुत्यन्ते तु दीपनम्।
अन्ये पोटलिकेद्धोतुं जुहुयाच्छूललक्षिते ॥९॥
भागं बद्ध्वा तृतीयन्तु चरोः कर्म समारभेत्।
निवेद्य च बलिं तेन स्नायाद्रोगान्निहन्ति सः ॥१०॥
तत्क्षणाच्छुद्धिमाप्नोतिः चन्द्रवत्परिनिर्मलः ।
हत्वा रोगसहस्राणि ततः साध्यांश्च साधयेत् ॥११॥

रुधिर, विष तथा तैल को आहुति के अन्त में प्रदीप्त करे। अन्य दो शूलचिह्नित पुटली की आहुति प्रदान करे। तृतीय भाग बद्ध करके चरु कर्म करना चाहिये। उससे बलि (उपहार) निवेदन करके स्नान करे। ऐसा होने पर रोग विनष्ट हो जाता है॥९-११॥

शरीरान्मनसश्चैव ये तु रोगाः सुदारुणाः ।
पातकान्घातयेत्सर्वान् कृतज्ञः साधुसम्मतः ॥१२॥
राजा विप्रस्तथा वर्णाः साधनार्थं प्रतिष्ठिताः ।
आपत्सु घातयेत्तीव्रा विधिना घातकाः स तु ॥१३॥

जो सुदारुण शारीरिक तथा मानसिक रोग हैं, कृतज्ञ साधुजन-सम्मत उपाय से वह व्यक्ति समस्त पातकों का विनाश कर देता है। राजा, ब्राह्मण अथवा अन्य वर्ण के जो व्यक्ति साधनार्थ प्रतिष्ठित होते हैं, आपत् काल में उनका तीव्र भाव से विनाश करते हैं (पाप का विनाश करते हैं), विधि द्वारा वे बाधक होते हैं॥१२-१३॥

विनायका हरन्त्येते रूपैः सिद्धैश्च मन्त्रिणाम्।
न दोषघातने तेषामिति रुद्रः प्रभाषते ॥१४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे त्रिषष्टितमोऽध्याये दशमं पटलं समाप्तम्

साधक के सिद्ध रूप से विनायक गण विनाश (पापों का) करते हैं। इस घातन में उसका कोई दोष नहीं होता, यह रुद्र ने कहा है॥१४॥

श्री साम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर में रोगविनाश नामक तिरेसठवें अध्याय में दशम पटल समाप्त

चतुःषष्टितमोऽध्यायः

(मारणाभिचारः)

अभिचारविधिं श्रुत्वा मन्त्रः सर्वार्तिनाशनः।
अधःशूलान् ग्रहान् क्रूरान् भैरवांश्च महाबलान् ॥१॥
महामारी कुलोद्भूतानुत्सादयति मन्त्रवित्।
यमजिह्वां मृत्युभूतमघोरं चापि योजयेत् ॥२॥
प्राह्वनं तु महारौद्रं शत्रुपक्षभयंकरम्।
कुर्यात्तु कंटकं शालं याम्यां दिशिमुपाश्रितः ॥३॥

सबके लिये आर्तिनाशक मन्त्र अभिचार विधि को सुनकर मन्त्रवित् साधक अधःशूल, क्रूर ग्रह, महाबलशाली महामारी कुलोत्पन्न भैरव देव को उत्सारित करते हैं और यम की जिह्वारूप मृत्युस्वरूप अघोर को युक्त करते हैं। महारौद्र का आह्वान शत्रुपक्ष के लिये भयंकर है। दक्षिण दिशा का आश्रय लेकर कण्टक का शाल (चटाई) तैयार करे॥१-३॥

नैर्ऋत्यां वा श्मशाने वा त्रिकोणज्ञान्तमालिखेत्।
श्मशाने केशसंच्छन्ने कंटकैः सर्वतोवृते ॥४॥
द्वारं च कल्पयेत्तत्र कंटकैः कल्पितार्गलम्।
अन्त्रमालासमायुक्तं याम्यां दिशिमुपाश्रितम् ॥५॥
कपालैर्बहुभिश्चैव परितः परिवेष्टयेत्।
अग्न्यागारं त्रिकोणं च कल्पयेत्तत्र साधकः ॥६॥

नैर्ऋत्य कोण में अथवा श्मशान में त्रिकोण पद्म आदि का अंकन करे। केश आच्छादित श्मशान में सब दिशाओं में कण्टक द्वारा आवृत स्थान में द्वार की कल्पना करे तथा कण्टक द्वारा ही अर्गला तैयार करे। इसे दक्षिण दिशा की ओर अस्त्रमाला से युक्त होना चाहिये। नरकपाल से चारो दिशाओं को बाँधे (चारो दिशाओं में नर कपाल से वेष्टन करे)। साधक वहाँ अग्नि आगार तथा त्रिकोण की कल्पना करे॥४-६॥

रुधिराक्तेन सूत्रेण परितः परिवेष्टयेत्।
श्मशानभस्मना स्नातः कृष्णवासा जितेन्द्रियः ॥७॥
रक्तोष्णीषधरो मन्त्री रक्तयज्ञोपवीतवान्।
संक्रुद्धय भुकुटी वक्त्रो रक्तचन्दनशूलधृक् ॥८॥

३४६ श्रीसाम्बपुराणम्

रक्तलिप्त सूत्र से चतुर्दिक वेष्टन करना चाहिये श्मशान भस्म से स्नान करके कृष्ण (काला) वर्ण वस्त्र पहनकर जितेन्द्रिय साधक लाल रंग की पगड़ी तथा लाल यज्ञोपवीत धारण करके क्रुद्ध होकर भृकुटी बद्ध मुख करके रक्त चन्दन से लिप्त शूल धारण करे।।७-८।।

पुष्पं लोहमयं चापि धारयेच्छूलमुत्तमम्।
खदिरं रुधिराक्तं वा धारयेच्चाभिचारवान् ।।९।।

तदनन्तर पुष्प तथा लोहमय उत्तम शूल धारण करके अथवा अभिचारयुक्त होकर रुधिराक्त खदिर धारण करे।।९।।

अग्न्यागारस्य मध्ये तु प्रतिमाङ्कारयेद्बुधः।
शत्रोर्मूत्रपुरीषेण रुधिरेणान्त्रपांशुना ।।१०।।
पादपांशुं समालोड्य मूर्द्धस्मासानकी तथा।
बल्मीकसम्भवां चापि गृहीत्वा शत्रुमालिखेत् ।।११।।

बुद्धिमान व्यक्ति अग्निगृह के मध्य में शत्रु की प्रतिमा स्थापित करे तथा उसे शत्रु की मूत्रविष्ठा-रक्त तथा अन्त्र (आँत) पांशु से उसे लिप्त करे। ऐसे ही दीमक के बाबी की मिट्टी तथा भस्म से शत्रु को अंकित करे।।१०-११।।

खादिरैः कीलकैस्तस्य ऊर्ध्वकेशमधोमुखम्।
पाशेन वेष्टयित्वा तु शत्रोः प्राणान्निक्कृन्तयेत् ।।१२।।

खैर की लकड़ी की कील से शत्रु के ऊर्ध्वकेश तथा नीचे किया मुख पाश द्वारा वेष्टित करके शत्रु का प्राण-हरण करे।।१२।।

कुर्याच्छूलेन भिन्नं तु पादयोर्मूर्ध्नि विद्विषम्।
आयसस्रुवमादाय सोमं कुर्याद्विचक्षणः ।।१३।।

शत्रु (की प्रतिमा) का पादद्वय एवं मस्तक शूल से छिन्न करे। विचक्षण व्यक्ति लोहे के स्रुव द्वारा होम करे।।१३।।

अथ चेद्दशधा प्रोक्तमभिचारविधाविह।
कृष्णाच्छागोष्ट्रमातङ्गशलभानां च शोणितम् ।।१४।।
विषं च मलिनं तैलं चातुर्वर्णस्य शोणितम्।
वामहस्ते स्रुवं कृत्वा दक्षिणाभिमुखः स्थितः ।।१५।।
त्रिसंध्यं जुहुयात्क्रुद्धः फट्कारेणैव मन्त्रवित्।
कपालत्रयमारूढः द्वयोः पादौ निवेशयेत् ।।१६।।

तदनन्तर दश प्रकार की आभिचारिक विधि कही गयी है। कृष्णवर्ण का बकरा, ऊँट, हस्ती तथा शलभ का रक्त एवं विष, मलिन तैल तथा चार वर्ण के मनुष्य का रक्त, वाम

चतुःषष्टितमोऽध्यायः ३४७

हाथ में स्रुवा लेकर दक्षिण की ओर मुख करके खड़ा हो मन्त्रज्ञ साधक क्रुद्ध होकर 'फट्' कहते हुये त्रिसन्ध्या (प्रातः-मध्याह्न-सायं) होम करे। तीन कपालों (मनुष्य की खोपड़ी) पर आरूढ़ होकर दोनों पैरों को (शत्रु की प्रतिमा) उसके पैरों पर रखे॥१४-१६॥

ऊर्ध्वं शुक्लतरूणां च समिद्भिर्जुहुयान्नरः।
खदिरै रुधिराक्तैर्वा तथा निम्बमयैरपि ॥१७॥
अन्येन तु यथोक्तेन अव्यक्तं होमयेद् बुधः।
कुर्यात्प्रकुपितो होमं यावत्क्रोधो न नश्यति ॥१८॥
कल्पोक्तमभिचारं तु कुर्यात्सिद्धार्थमात्मनः।
सिद्धिस्त्रयो दशविधा अभिचारेण मन्त्रिणाम् ॥१९॥
शत्रोर्देशपरित्यागो व्याधिरर्थविनाशनम्।
उन्मत्ततान्धता चैव तथा चैवाङ्गहीनता ॥२०॥
वधो बन्धो नृपक्रोधोऽकस्माच्चापि धनक्षयः।
प्रयातं याचितं चापि आरण्यं च त्रयोदश ॥२१॥

ऊर्ध्व शुक्ल वृक्ष के काष्ठ से होम करना चाहिये। रक्त लिप्त खैर अथवा नीम की लकड़ी के द्वारा भी होम हो सकता है। यथाविधि अन्य काष्ठ द्वारा भी पण्डित व्यक्ति अव्याहत होम कर सकते हैं। अपनी सिद्धि के लिये कल्पोक्त अभिचार करना उचित है। मन्त्रज्ञ साधक के अभिचार द्वारा सिद्धि तेरह प्रकार की है। शत्रु देश-परित्याग, व्याधि, अर्थनाश, उन्मत्तता, अन्धता, अंगहीनता, वध, बन्धन, नृपक्रोध, अकस्मात् धनक्षय, परलोक-गमन, याच्ञा वृत्ति तथा वनगमन।।१७-२१।।

आभिर्निर्मिलितो दीप्तः प्रोक्षितो विधिना पुनः।
तत्त्वेनाप्यायितश्चैव कथं मन्त्रो न सिद्ध्यति ॥२२॥

आभिचारिक शब्द का अर्थ है—आभि = विमुक्त करना, दीप्त होना। उसमें विधिपूर्वक प्रोक्षित एवं तत्त्व द्वारा आप्यायित होने पर मन्त्र क्यों सिद्ध नहीं होगा? ।।२२।।

असिद्धौ तु पुरो दण्डः स्वमन्त्रात्ताडनं भवेत्।
अभिवार्य परं गच्छन् करं हन्यात्तथान्तकी ॥२३॥
ततो निकृन्तप्राणोऽसौ देहमुत्सृजति क्षणात्।
विधिना द्रव्यघटने क्रोधार्तः शत्रुपीड़ितः ॥२४॥
प्रतिलोमेन युञ्जीत घातके प्राणसंयुतः।
तत्क्षणाद् घातयेत्सर्वान् सेन्द्रब्रह्मपुरस्सरान् ॥२५॥

मन्त्र असिद्ध होने पर सर्वप्रथम कर्त्तव्य है उसमें स्वमन्त्र से ताड़ना। विनाशकारी अन्य को बाधा देने के लिये शत्रु (प्रतिमा) का हस्तच्छेदन करे। तदनन्तर शत्रु निष्प्राण होकर देहत्याग करेगा। यथाविधि द्रव्यसंग्रह होने पर शत्रुपीड़ित साधक क्रोधित होकर (पुरश्चरण

३४८ || श्रीसाम्बपुराणम्

को) प्रतिलोम द्वारा युक्त करे। इससे तत्क्षण ही साधक इन्द्र, ब्रह्मादि प्रमुख का भी विनाश कर सकता है॥२३-२५॥

आपत्सु योजयेन्मन्त्री यदा संशयितो भवेत्।
शरीरा मानसाश्चैव उपसर्गास्तु कीर्तिता ॥२६॥

जब संशयापन्न हो तब आपत्ति काल में साधक यह सब क्रिया करे। उपसर्ग दो प्रकार का मानसिक एवं शारीरिक कहा गया है॥२६॥

शारीरा व्याधयो ज्ञेया मानसा बहु विस्तराः।
स्त्रीकृत्वेवं त्यजैश्चैव बन्धुमित्रपुरःसरैः ॥२७॥
पीड्यते मन्त्रिणो ह्येते चोपसर्गैः सुदारुणैः।
सिद्धवाक्यमुपेतस्तु मन्त्रहोमपुरस्कृतः ॥२८॥
असंदेहात्तु सिद्ध्यन्ति बुद्ध्या योगाः सुमन्त्रिणः।
स्त्रीलोलास्तु न सिद्ध्यन्ति तथा चार्थविचिन्तकाः ॥२९॥

शारीरिक उपसर्ग व्याधियों को जानना चाहिये। मानसिक अनेक प्रकार के होते हैं। स्त्री लोगों को उपलक्ष्य करके ऐसे बन्धु-मित्र प्रभृति द्वारा किये (कर्तृक) सुदारुण उपसर्गों से साधक पीड़ित हो जाते हैं। सिद्ध वाक्य (उपदेश) प्राप्त करके मन्त्र, होम प्रभृति द्वारा मन्त्रज्ञ निःसंदेह सिद्धि प्राप्त करते हैं। जो स्त्रीलोलुप तथा स्वार्थी होते हैं, उनको सिद्धि नहीं प्राप्त होती॥२७-२९॥

स्त्रीभार्याशूद्रभार्यायां तथान्यासु च संरता।
क्रियालोपी चानुरोधी व्यसनी तृष्णया हतः ॥३०॥

स्त्रीगण, भार्या, शूद्र की भार्या अथवा अन्य स्त्री में जो आसक्त हैं, उनका क्रियालोप हो जाता है। जो अन्य से अनुरोध करते हैं, व्यसनी हैं, तृष्णा से आक्रान्त हैं—ऐसे लोग अग्राह्य हैं। विधानतः ये सभी उपसर्गयुक्त हैं॥३०॥

अग्राह्या मन्त्रिणो ह्येते विधाने ह्युपसर्गिणः।
आचार्ये चातिभक्तश्च तपस्वी च जितेन्द्रियः।
घातयेत्सर्वरोगांश्च बुद्ध्वा ज्ञानं सविस्तरम् ॥३१॥

इति श्रीसाम्बपुराणे मारणाभिचारे चतुःषष्टितमेऽध्याये एकादशं पटलम्

जो आचार्य के प्रति भक्तिमान हैं, तपस्वी तथा जितेन्द्रिय हैं, वे सविस्तार ज्ञान प्राप्त करते हैं एवं समस्त रोगों का विनाश करते हैं॥३१॥

श्री साम्बपुराणोक्त चौंसठवें अध्याय का एकादश पटल समाप्त

पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

(देहगतरोगाणां चिकित्सा)

अथ भेदान् प्रवक्ष्यामि चाङ्गप्रत्यङ्गयोगजान्।
उभयस्यार्थविन्मन्त्री योन्यां बीजेन घातयेत् ॥१॥
बीजस्य चोद्भवत्वाय व्याधयोऽन्यान्यघातिनाम्।
योनिस्थं बीजयोगेन स्थानस्तम्भं विनिर्दिशेत् ॥२॥

तदनन्तर अंग तथा प्रत्यङ्ग के योगजात भेदों को कहूँगा। अंग तथा प्रत्यङ्ग के अर्थ को जानने वाला मन्त्री योनि तथा बीज द्वारा आघात करे। बीज का उद्भव ही व्याधि का अन्तिम विनाशक अर्थात् रोग का अन्त करने वाला है। बीजयोग द्वारा योनिस्थ स्थानस्तम्भ का निर्देश करे।।१-२।।

नेत्रयोः श्रवणं पीतं मुखे सिन्दूरवर्णकम्।
बाह्वंसयोश्च हरितमुदरे कृष्णमेव च ॥३॥
गुदशिश्ने विचित्रं तु नीलचित्रं तु जङ्घयोः।
चरणे कुक्कुटं युञ्ज्याद्वलिं माल्यं च सर्वतः ॥४॥

नेत्रद्वय तथा श्रवण में पीत वर्ण, मुख में सिन्दूर वर्ण, बाहु तथा स्कन्धद्वय में हरित् वर्ण, उदर में कृष्ण वर्ण, गुदा तथा शिश्न में विचित्र वर्ण, जङ्घाओं में नील चित्र, चरणों में कुक्कुट वर्ण तथा समस्त स्थान को बलि तथा माला द्वारा युक्त करे।।३-४।।

स्वस्थाने पूजयेत् तज्ज्ञो विपरीतेन नाशयेत्।
न नश्येत यदा व्याधिः स्नेहाहारेण योजितः ॥५॥
निग्रहस्तस्य वै कार्यः शारेण मन्त्रिणा तदा।
कीलयित्वा तु वै तं च योनिस्थं वर्णजैर्दृढम् ॥६॥

तत्त्वज्ञ जन स्वस्थान में पूजन करे। विपरीत का विनाश करे। स्नेहाहार द्वारा युक्त करने पर भी यदि व्याधि का विनाश न हो, तब मन्त्री 'शार' (?अस्त्र) द्वारा उसका निग्रह करे। योनिस्थ (व्याधि का) वर्णजात द्वारा दृढ़भाव से बन्धन करना चाहिये।।५-६।।

बिल्वं शिरसि वै पुष्यात्कन्दरं वक्रनेत्रयोः।
श्रोत्रे तु यास्यकं कीलं विन्यसेदश्मकन्तु वै ॥७॥
शाकजं वक्षसि प्रोक्तं बादरं पृष्ठ एव च।
उदरे च तथा शिग्रुं चन्दनं शिश्नजानुनी ॥८॥
सुरदारुमधःकाये वैतसं चरणे स्मृतम्।
प्रतिस्थाने न्यसेत् कीलं सर्वस्थानेषु मन्त्रवित् ॥९॥

३५० || श्रीसाम्बपुराणम्

मस्तक का बिल्व से पोषण करे। मुख तथा नेत्रद्वय में कदर, कर्णों में यास्यक प्रस्तर की कील का विन्यास करे। वक्ष में शाकजात (शाक से उत्पन्न) का, पृष्ठ में कूलजात (वादर), उदर में शिग्रु (सहजन) तथा शिश्न एवं जानु में चन्दन का विन्यास करे। निम्न शरीर में देवदारु का, चरण में वैतस का तथा मन्त्रज्ञ साधक सभी स्थान में कील स्थापित करे।।७-९।।

विनाशाय विवक्ताः स्युः श्लेष्मान्तकविभीतकाः ।
तथा सहचरश्चैव कीला वै सर्वकर्मणि ॥१०॥
अथवा स्नपयेद्रक्तमावृतिश्चात्र कीलयेत् ।
ध्यायेत्तु घातकं रोगे यदिच्छेद् घातनं परम् ॥११॥
अदग्धमवतार्य्यन्तु यदा शान्तिः प्रवर्त्तते ।
हतो दावेन तेन स्याद् ब्रह्मापि यदि च स्वयम् ॥१२॥
आकृतिस्तु सदा मांसैः क्रियते विघ्नकारिणः ।
सकलस्तस्य परशुः संक्रमे नायकस्य वै ॥१३॥

विनाशार्थ श्लेष्मात्मक तथा विभीतक की लकड़ी देनी होगा। ऐसे सभी कार्य में कीलक सहचर होगा। अथवा रक्त से स्नान कराये। यहाँ आकृति कीलक होगी। रोग में घातक का ध्यान करके उसके विनाश की इच्छा करनी होगी। जब शान्ति हो जाय, तब अदग्ध अवस्था में उतर कर फेंकना होता है। उसके फल से शत्रु दावानल में पड़ जाता है, यदि ब्रह्मा भी शत्रु हों, वे भी। विघ्नकारी की मांस से आकृति बनानी होगा। नायक के संक्रम में समस्त अंश है उसका परशु (?)।।१०-१३।।

संहारं क्रमशो युञ्ज्यात्तथा मांसेन वै बुधः ।
योनिबीजविभागेन स्थानस्थानेषु सर्वतः ॥१४॥
सर्वाङ्गतरोगा हि चिकित्स्याः सर्वतोमुखाः ।
संक्रामस्तस्य वै यो हि क्रीडा संमन्त्रिणः स तु ॥१५॥

योनि तथा बीजविभाग द्वारा सभी स्थान में विज्ञ जन मांस द्वारा क्रमशः संहार करे। सर्वाङ्ग-जात रोग की सर्वतोभावेन चिकित्सा करनी चाहिये। उसका जो संक्रमण है, वह मन्त्रज्ञ साधक की क्रीड़ा है।।१४-१५।।

ये ये वै कीलकाः प्रोक्ताः समिधो पिहिता यतः ।
चतुर्माल्योपहारेण तेन तस्य चिकित्सितम् ॥१६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे देहजातरोगाणां चिकित्सा नाम पञ्चषष्टितमेऽध्याये द्वादशं पटलम्

जिन-जिन कीलक की चर्चा की गयी है, उसे काष्ठ से आबद्ध करे। चार माल्य उपहार से उसकी चिकित्सा की जाती है।।१६।।

श्रीसाम्बपुराण देहजात रोग की चिकित्सा नामक पैंसठवें अध्याय का द्वादश पटल समाप्त

षट्षष्टितमोऽध्यायः

(सर्वोपद्रवशान्तये व्रतविधिः)

सामान्यां तु यदा मन्त्री चिकित्सां सार्वलौकिकीम्।
प्रार्थितो वा नृपेन्द्रेण तथा कुर्यादिमं विधिम् ॥१॥
व्रतं पूर्वं समुद्दिष्टं नायकानान्तु शान्तये।
शान्तयेऽद्भुतहोमेन सत्वं वापि विनायकम् ॥२॥
स्वेन गात्रेण वै नश्येत् साधकः सर्वकर्मणि।
तस्माद् व्रतं तु वै कार्यं सर्वोपद्रवशान्तये ॥३॥
अन्यथा हीयते मन्त्रः स्वेन गात्रेण योजयेत्।
श्वेताम्बरधरो मन्त्री श्वेतमाल्यानुलेपनः ॥४॥

जब साधक साधारण रूप से सबकी चिकित्सा करे अथवा राजा द्वारा प्रार्थित होकर (चिकित्सा करें) तब इस विधि का पालन करे। नायक की शान्ति के लिये व्रत की कथा पहले ही कही है। भूतहोम द्वारा सत्व तथा विनायक का प्रशमन करना होगा। साधक सब कर्म में अपने गात्र द्वारा (विघ्न) नाश करे। तदनन्तर समस्त उपद्रव की शान्ति-हेतु व्रत-पालन करे। अन्यथा मन्त्र क्षयीभूत होगा। इसलिये अपनी गात्रयोजना करे। साधक श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत माला द्वारा शोभित हो जाय।।१-४।।

जितेन्द्रियः प्रशान्तात्मा काष्ठमौनी सुमन्त्रितः।
शुद्धवर्णां समादाय पत्नीं शुद्धकुलात्मजाम् ॥५॥
दशाहन्तु तया सार्धं ब्रह्मचारीव्रतं चरेत्।
दासविभ्रमयोगेन न कुर्यादात्मनः कृतम् ॥६॥

जितेन्द्रिय, प्रशामात्मा, काष्ठमौनी संयत होकर शुद्धवर्ण ब्राह्मण शुद्धकुलोत्पन्ना पत्नी लाकर उसके साथ ब्रह्मचर्य व्रत के साथ दस दिन रहे। दास-विभ्रम योग से जो स्वयं करणीय है, ऐसा कुछ न करे।।५-६।।

अतीते दशरात्रे तु द्वितीयां क्षत्रियां तनुम्।
सर्वपीतोपहारेण शृङ्गारैः कृतभूषणः ॥७॥
सुमना दृढचित्तश्च दशाहं क्षत्रियापतिः।
वैश्यो गुणसमायुक्तः पीतवस्त्रानुलेपनः ॥८॥
दृढचित्तश्चरेन् मन्त्री दशाहं वैश्यगोचरः।
कृष्णवस्त्रोपहारेण कृष्णवर्णान् तु योजयेत् ॥९॥

३५२ श्रीसाम्बपुराणम्

दश रात्रि बीतने पर द्वितीय (दूसरी) क्षत्रिय कन्या लाकर (पत्नीरूप) समस्त पीत वर्ण के उपहार के साथ श्रृङ्गार से भूषित करके शोभन मनस्क तथा दृढ़ चित्त होकर १० दिन क्षत्रियपति होकर रहे। इसी प्रकार वैश्य गुणयुक्त (वैश्यकन्या को पत्नीरूपा करके) पीत वस्त्र तथा अनुलेपनादि ग्रहण करके दृढ़ चित्त होकर उसके साथ दस दिन विचरण करे। इसी प्रकार दस दिन कृष्णवर्णा (शूद्रा) को (पत्नी बनाकर) कृष्ण वर्णात्मक वस्त्रादि से विभूषित करके दृढ़ हो, उसके साथ रहे।।७-९।।

गणिकां सर्ववर्णां वै पञ्चमं सार्ववर्णिकम्।
कृत्वा व्रतसमाप्तिं तु योनिचक्रं ततो यजेत् ॥१०॥

सर्ववर्णमयी गणिका के साथ (यह पञ्चम सार्ववर्णिक है) व्रत समापन करके योनि-चक्र का यजन करे।।१०।।

तत्राभिषिच्य चात्मानं हन्याद्रोगांस्त्वशेषतः।
यावत्कालं व्रतं युञ्ज्यात्तावत्कालं यजेन्नरः ॥११॥
अहस्तु पूजयेद् देवं निशायां तु न पूजयेत्।
एतद् व्रतं त्वया प्रोक्तं मन्त्रिणां सिद्धिदं परम् ॥१२॥

वहाँ स्वयं को अभिषिक्त करे। निःशेष रूप से रोग का विनाश करे। जब तक व्रतानुष्ठान करना है, तब तक कालयोजन करना चाहिये। दिन में देवपूजन करे, रात्रि में न करे। इस प्रकार यह जो व्रत तुमसे कहा है, वह मन्त्रज्ञ साधक के लिये परम सिद्धि देने वाला है।।११-१२।।

सर्वसिद्धिपरो मन्त्री व्रतमेतत्समाचरेत्।
न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलो भवेत् ॥१३॥
न तु वाक् चपलश्चैव लघ्वाहारो जितेन्द्रियः।
साधयेत् प्रयतो नित्यमुपसर्गान् निजोद्धरेत्।
हन्तारः सर्वविघ्नानां नरा व्रतपरास्तु ये ॥१४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे सर्वोपद्रवशान्तये व्रतविधिर्नाम षट्षष्टितमेऽध्याये त्रयोदशं पटलम्

सर्वचिकित्सा-परायण मन्त्रज्ञ इस व्रत का आचरण करे। हाथ-पैर न हिलाये, नेत्र चालित न करे तथा वाक्य की चञ्चलता भी न करे। स्वल्पाहार तथा जितेन्द्रिय होकर सयत्न नित्य साधन करे तथा उपसर्गों का विनाश करे। इससे व्रतपरायण व्यक्ति के समस्त विघ्नों का विनाश होता है।।१३-१४।।

श्री साम्बपुराणान्तर्गत ज्ञानोत्तर व्रतविधान नामक छियासठवें अध्याय का त्रयोदश पटल समाप्त

सप्तषष्टितमोऽध्यायः

(वेधयोगवर्णनम्)

एतद् व्रतं महापुण्यं चरेदुत्तरसाधने।
अर्द्धन्त्वधमयोगे तु पादमेकं तथाधमे ॥१॥
यदुक्तं साधने तस्मिन् पुराकल्पे महौजसा।
वेधयोगान् प्रवक्ष्यामि दिव्यभौमार्थसाधकान् ॥२॥
सत्त्वं रजस्तमश्चैव तिस्रो वै मन्त्रयोनयः।
ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रस्ते वै साध्यास्तु मन्त्रिणः ॥३॥

उत्तर-साधन में महापूजा तथा व्रतानुष्ठान करना चाहिये। अधम योग में अर्ध तथा अधमाधम में एकपाद। पूजाकल्प में उस साधन के विषय में महान् तेजस्वी ने जैसा कहा है, दिव्य तथा भौम प्रयोजन के साधकों के लिये वेधयोग का वर्णन मैं करता हूँ। सत्व, रज तथा तम—ये तीनों मन्त्रयोनि हैं। ब्रह्मा (रजोगुण में), विष्णु (सत्वगुण में) तथा रुद्र (तमोगुण में) साधकों के साध्य हैं॥१-३॥

अर्चायां कामसङ्कल्पश्चाग्निकार्ये यथा पुनः।
नारी दुःखप्रकृत्यां च लिङ्गे वा सार्वकामिके ॥४॥
चतुर्भुजा भवेत् सा हि नरमाक्रम्य संस्थिता।
खट्वाङ्गं दक्षिणे तस्याः कपालं वामके करे ॥५॥
चक्रं वरः क्रमाद्धस्ते अर्धा स्याद्दिव्यमानुषैः।
क्रूरा दन्तांश्च विन्यस्य तेजोराशिपुटानि षट् ॥६॥

अर्चनीय प्रतिमा में यथाभिलषित संकल्प, अग्निकार्य (होम), नारी दुःख प्रकृति में (?) अथवा सार्वकामिक लिङ्ग में साधन करे। वह नारी चतुर्भुजा, महादेव पर संस्थिता, उनके दाहिने हाथ में खट्वाङ्ग तथा बाँयें हाथ में कपाल है। अन्य हस्तद्वय में क्रमशः चक्र तथा वरमुद्रा है। दिव्य मनुष्यमाला से (कपालमाला) शोभित हैं, उससे उनका अर्द्धांग ढका है। क्रूर दन्तों को विन्यस्त करके छः तेजोराशिपुट का विस्तार हो रहा है॥४-६॥

क्रमान् मन्त्रपदं चैकं शिष्टं तस्यैव सम्पुटम्।
जपित्वा क्रमयोगेन लक्षमन्त्रान् सुसंयतः ॥७॥
व्रतं त्वनन्तरं कार्यं कामं तत्साधकेन तु।
पासं गुग्गुलुहोमः स्याच्छागमांसेन योजितः ॥८॥
त्रिसंध्यं ताडनं प्रीत्या होमश्चाथमनन्तरम्।
प्रतिसन्ध्यं सहस्रं तु यावन्मासो विनिर्गतः ॥९॥

३५४ श्रीसाम्बपुराणम्

क्रम से एक मन्त्र पद है और उसका सम्पुट है शिष्ट (?)। सुसंयत होकर क्रमयोग से एक लाख मन्त्र-जप करना चाहिये। तदनन्तर साधक यथाभिलषित व्रत करे। एक मास पर्यन्त बकरे के मांसयुक्त गुग्गुलु से होम करे। प्रीतिपूर्वक तीन सन्ध्या ताड़न, तदनन्तर यह होम करे। प्रतिसन्ध्या १००० होम करे जब तक १ मास पूर्ण न हो जाय॥७-९॥

एवं संसाधितो मन्त्रः कामदस्तु सदा भवेत्।
तन्त्रज्ञः साधयेदेवमथवा मन्त्रवित्तमः ॥१०॥

इस प्रकार का मन्त्र-साधन समस्त कामना पूर्ण करता है। तन्त्रज्ञ साधक इस प्रकार साधन करे अथवा मन्त्रज्ञों में से श्रेष्ठ व्यक्ति साधन करे॥१०॥

सुसहायः प्रसन्नात्मा नित्ययुक्तश्च सात्त्विकः।
मोहादारभते यस्तु साधनं वेधवर्जितः ॥११॥
कृत्या भवति वै सा हि देवता हीनकर्मणि।
विपिने काष्ठमौनी स्यादथवा साधकैर्वदेत् ॥१२॥
समयज्ञैस्ततो विप्रैरन्यथा हीनसाधनः।
यादृशः साधको ज्ञेयः सहायस्तस्य तादृशः ॥१३॥

उपयुक्त सहायक के साथ प्रसन्न अन्तःकरण से नित्ययुक्त सात्विक साधक साधन करे। जो वेधवर्द्धित होकर मोह के कारण साधन प्रारम्भ करते हैं, देवताहीन कर्म उसके लिये अनिष्ट-कारिणी हो जाते हैं। वन में काष्ठमौनी हो अथवा समान याज्ञिक ब्राह्मण साधकों के साथ ही वार्त्ता करे। अन्यथा वह हीन साधन होगा। उसका सहायक भी ऐसा ही होगा॥११-१३॥

तत्त्वदृष्टेन योगेन साध्यं मन्त्री समारभेत्।
तपस्वी च जितात्मा च नित्यभक्तो महेश्वरे ॥१४॥
एवंविधस्तु वै मन्त्री काले यो मृत्युमाप्नुयात्।
अनन्तास्तस्य वै लोका इति मन्त्रव्यवस्थितिः ॥१५॥

तत्त्वदृष्ट योग द्वारा साधक साधन प्रारम्भ करे। वह मननशील साधक तेजस्वी हो, जितात्मा तथा महेश्वर के प्रति भक्तियुक्त हो। ऐसा साधक पूर्ण परिणत काल में (पूर्णायु में) मृत्यु को प्राप्त होता है। उसे अनन्त लोक मिलता है। यही मन्त्र की व्यवस्था है॥१४-१५॥

पुण्यात्मा सुकृते स्थाने राजा वा सार्वभौमिकः।
विद्या सिद्धा भवन्त्येते साधकास्तु महीतले ॥१६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे वेधयोगवर्णनं नाम सप्तषष्टितमेऽध्याये चतुर्दशं पटलम्

साधक एक पृथ्वी पर (किसी एक लोक में) पुण्यवान् व्यक्ति के गृह में जन्म लेकर अथवा सार्वभौम राजा के घर में जन्म लेकर विद्यासिद्ध होता है॥१६॥

श्रीसाम्बपुराणान्तर्गत ज्ञानोत्तर वेधयोग वर्णननामक सड़सठवें अध्याय का चौदहवाँ पटल समाप्त

अष्टषष्टितमोऽध्यायः

(सर्वसामान्यसाधनम्)

साधनं संप्रवक्ष्यामि यथा सिद्ध्यन्ति साधकाः ।
वेधयोगांश्च विमलान् नानासिद्धिफलप्रदान् ॥ १॥
षाण्मासिकं तु वै योज्यं पुरश्चरणमादिशेत् ।
शाकादिना विधानेन जलैर्वापि च शोधनम् ॥ २॥
ध्यायेच्च प्रणवं पश्चात् सहस्रं शतषड्गुणम् ।
आयच्छन्न तु सम्भ्रान्तः पूर्वेणापूर्णचेतसा ॥ ३॥
शुद्धकायस्ततो मन्त्री कृत्वा वासगृहं ततः ।
तस्मिन् संस्थापयेद् देवं विधिना शास्त्रचोदितम् ॥ ४॥

जिससे साधकों को सिद्धि प्राप्त होती है, उन साधनों की कथा कहूँगा। यह निर्मल, वेधयोग्य तथा नाना सिद्धिदायिनी है। छः मास पुरश्चरण करे। शाकादि विधान द्वारा अथवा केवल जल द्वारा शोधन करे। प्रणव का ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर छः सौ हजार जप करना चाहिये। जल्दबाजी अथवा असन्तुष्ट मन से जप कभी न करे। मननशील साधक देहशुद्धि करके निवास का गृह निश्चित करे और उस गृह में यथाशास्त्र विधान से देव-स्थापना करनी चाहिये॥१-४॥

विद्याङ्गानि त्वरिष्टानि स्वमन्त्रं विधिना क्रमात् ।
सहस्रदशपर्यायमेवैकं परिवर्त्तयेत् ॥ ५॥
ततो मन्त्रं समाधाय ईप्सितं मनसः शुभम् ।
आप्यायितुं विरक्तं च दीपितैः शास्त्रतः क्रमात् ॥ ६॥

क्रमश यथाविधि विद्याङ्ग, अरिष्टसमूह तथा अपना मन्त्र पर्याय क्रम से दस हजार जपे। तदनन्तर मन में ईप्सित मन्त्र को सम्यक् रूप से धारण करे और यथाशास्त्र आप्यायित, विरक्त तथा दीपित करे॥५-६॥

जपान्ते तु व्रतं योज्यं व्रतान्तेऽपि च साधनम् ।
अतस्तान् मण्डले योगः साध्यमन्त्रस्य साधने ॥ ७॥
प्रोक्ताः क्रमेण विधयः सर्वमन्त्रानुसारिणः ।
असिध्यमेध्यमायोज्यं कृते वा व्यञ्जनादिके ॥ ८॥

३५६ श्रीसाम्बपुराणम्

जपान्त में व्रत करना चाहिये। व्रत के पश्चात् भी साधन किया जाता है। साध्य मन्त्र के साधन के अन्त में मण्डल में योग करना चाहिये। सभी मन्त्र के अनुसार क्रमशः विधि का वर्णन किया गया। व्यञ्जनादि का योग करने से मन्त्र की असिद्धि होती है। अमेध्य युक्त होता है(?)॥७-८॥

तन्त्रोक्तं वेधमादध्याद् स्वमन्त्राकारमेव च।
साधयेदथ तन्त्रज्ञो यज्ञस्य नवसः क्रियात् ॥९॥

अपने मन्त्र के अनुसार तन्त्रोक्त वेध को ग्रहण करे। तदनन्तर तन्त्रज्ञ व्यक्ति यज्ञ का साधन करे॥९॥

होमान्ते ह्यग्निकुण्डायां चोदितो विधिनोत्थितः।
नरो न सिद्धिमान् यः स्यान्मन्त्ररूपी स दृश्यते ॥१०॥
चलत्यपि तथा मन्त्रं मन्यन्ते परिचारिकाः।
उद्यताश्च महाघोरा लक्ष्यन्ते मन्त्रिणः परे ॥११॥

अब विधिवत् उठकर होमान्त में अग्निकुण्ड का चालन करने से केवल लोक में ही सिद्धि नहीं मिलती, अपितु जो मन्त्ररूपी (देवता) हैं, वे भी दृश्यमान होते हैं॥१०-११॥

लक्ष्येद्यदि रूपेण शास्त्रस्योक्तस्य लक्षितम्।
सिद्धमन्त्रं विजानीयादन्यथा तु विनाशकः ॥१२॥
उत्थाय यदि मन्त्रेण स्वेनार्थः सम्प्रदृश्यते।
साध्यः स एव विज्ञेयोऽन्यथा घातयते तु तम् ॥१३॥

यदि इसे शास्त्रलक्षण के अनुसार स्वरूप में देखा जाय तब इसे मन्त्रसिद्धि कहा जाता है, अन्यथा यह विनाशक है। यदि मन्त्र उत्थित (जाग्रत) होकर अपने अर्थ को प्रकट कर दे तब उसे साध्य कहते हैं, अन्यथा वह मन्त्र साधक का विनाश करता है॥१२-१३॥

पातालदिशि वान्तस्तु क्रमतस्तत्र साधकः।
विद्यासिद्धो तु वै मन्त्री कामाद्वै घोरकं प्रदम् ॥१४॥
सिद्धो यः स श्रिया राजा सप्तद्वीपाधिपो बली।
भुक्त्वा तु पार्थिवान् भोगान् शिवं याति तनुक्षये ॥१५॥

पाताल (?) की ओर अथवा अन्तःकरण में क्रमशः साधक विद्यासिद्धि के विषय में कामना करे। विद्यासिद्धि से वह......(कामाद्वै घोरकं प्रदम् का कोई तात्पर्य ही नहीं है। प्रतीत होता है कि यहाँ कुछ पंक्तियाँ लुप्त हैं)। जो सिद्ध हो जाते हैं, वे ऐश्वर्य के साथ ही बलवान् सप्तद्वीप के अधिपति होते हैं। सभी पार्थिव भोगों का भोग करके देह के अन्त होने के पश्चात् शिवलोक प्राप्त करते हैं॥१४-१५॥