श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३४- भगवान् शिवद्वारा भस्म, भस्मस्नान एवं शिवयोगियोंकी महिमाका प्रतिपादन
| १५२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| मेघवाहनकृष्णाय गजचर्मनिवासिने।<br>कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने ॥ १७ | तथा सांख्ययोगके प्रवर्तक शिवको नमस्कार है। मेघवाहन कृष्ण (सदाशिव), गजचर्मको अधोवस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले, कृष्णमृगके चर्मको उत्तरीयके रूपमें धारण करनेवाले एवं सर्पको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है ॥ १६-१७ ॥ | | सुरचितसुविचित्रकुण्डलाय<br>सुरचितमाल्यविभूषणाय तुभ्यम्।<br>मृगपतिवरचर्मवाससे च<br>प्रथितयशसे नमोऽस्तु शङ्कराय ॥ १८ | सुन्दर बने हुए अतिविचित्र कुण्डल धारण करनेवाले, सुन्दर रचित मालाको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, सिंहके उत्तम चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले तथा विस्तृत यशवाले आप शंकरको नमस्कार है ॥ १८ ॥ | | ततस्तान् स मुनीन् प्रीतः प्रत्युवाच महेश्वरः।<br>प्रीतोऽस्मि तपसा युष्मान् वरं वृणुत सुव्रताः ॥ १९ | तत्पश्चात् उस स्तुतिसे अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त उन महादेवने उन मुनियोंसे पुनः कहा—हे सुव्रती मुनीश्वरो! मैं तुमलोगोंकी तपस्यासे अति प्रसन्न हूँ। तुम सब वर माँगो ॥ १९ ॥ | | ततस्ते मुनयः सर्वे प्रणिपत्य महेश्वरम्।<br>भृग्वङ्गिरा वसिष्ठश्च विश्वामित्रस्तथैव च ॥ २०<br><br>गौतमोऽत्रिः सुकेशश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।<br>मरीचिः कश्यपः कण्वः संवर्तश्च महातपाः ॥ २१<br><br>ते प्रणम्य महादेवमिदं वचनमब्रुवन्।<br>भस्मस्नानं च नग्नत्वं वामत्वं प्रतिलोमता ॥ २२<br><br>सेव्यासेव्यत्वमेवं च ह्येतदिच्छाम वेदितुम्। | इसपर भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, अत्रि, सुकेश, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, कश्यप, कण्व, संवर्त आदि उन सभी महान् तपस्वी मुनियोंने शिवजीको प्रणामकर उनसे यह वचन कहा—भस्म-स्नान, नग्नता, वामता, प्रतिलोमता (काम्य कर्ममार्गमें प्रवृत्ति), सेव्य तथा असेव्य—इनके विषयमें हम जानना चाहते हैं ॥ २०—२२ १/२ ॥ | | ततस्तेषां वचः श्रुत्वा भगवान् परमेश्वरः ॥ २३<br><br>सस्मितं प्राह सम्प्रेक्ष्य सर्वान् मुनिवरांस्तदा ॥ २४ | इसपर उनकी बात सुनकर परमेश्वर भगवान् शिवने मुसकराकर सभी मुनिवरोंकी ओर देखकर उनसे कहा ॥ २३-२४ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ऋषिवाक्यं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ऋषिवाक्य' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥
चौंतीसवाँ अध्याय
भगवान् शिवद्वारा भस्म, भस्मस्नान एवं शिवयोगियोंकी महिमाका प्रतिपादन
| श्रीभगवानुवाच | भगवान् शिव बोले— |
|---|---|
| एतद्वः सम्प्रवक्ष्यामि कथासर्वस्वमद्य वै।<br>अग्निर्ह्यहं सोमकर्ता सोमश्चाग्निमुपाश्रितः ॥ १ | हे मुनीश्वर! इन सबके माहात्म्यसे युक्त कथाके सारभागका वर्णन मैं आपलोगोंसे करूँगा। सोमका कारणस्वरूप अग्नि मैं हूँ तथा अग्निसंयुक्त सोम भी मैं ही हूँ ॥ १ ॥ |
| कृतमेतद्द्बहत्यग्निर्भूयो लोकसमाश्रयात्।<br>असकृत्त्वग्निना दग्धं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २ | इस लोक (भारतवर्ष)-में रहनेके कारण सबके कर्मोंका फल अग्निके द्वारा ही धारण किया जाता है। अग्निने इस स्थावर-जंगम जगत्को अनेक बार दग्ध |
अध्याय ३४] | भगवान् शिवद्वारा भस्म, भस्मस्नान एवं शिवयोगियोंकी महिमाका प्रतिपादन | १५३
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| भस्मसादग्निहितं सर्वं पवित्रमिदमुत्तमम्।<br>भस्मना वीर्यमास्थाय भूतानि परिषिञ्चति॥ ३ | किया है। अग्निसे भस्मीभूत हो जानेसे यह सम्पूर्ण जगत् पवित्र तथा उत्तम हो जाता है। उसी भस्मसे ओज प्राप्त करके यह सोम प्राणियोंको जीवित करता है॥ २-३॥ |
| अग्निकार्यं च यः कृत्वा करिष्यति त्र्यायुषम्।<br>भस्मना मम वीर्येण मुच्यते सर्वकिल्बिषैः॥ ४ | जो मनुष्य अग्निहोत्र-कार्य सम्पन्न करके भस्मसे त्र्यायुष करता है, वह मेरे ओजसे समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४॥ |
| भासतेत्येव यद्भस्म शुभं भावयते च यत्।<br>भक्षणात्सर्वपापानां भस्मेति परिकीर्तितम्॥ ५ | यह भस्म प्रकाशित करता है, कल्याण सम्पादित करता है तथा समस्त पापोंका नाश करता है, अतएव इसे भस्म कहा जाता है॥ ५॥ |
| ऊष्मपाः पितरो ज्ञेया देवा वै सोमसम्भवाः।<br>अग्नीषोमात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ ६ | ऊष्मपसंज्ञक पितर तथा देवतागण चन्द्रमासे उत्पन्न कहे गये हैं। स्थावर-जंगममय यह समस्त जगत् अग्नि-सोमात्मक है॥ ६॥ |
| अहमग्निर्महातेजाः सोमश्चैषा महाम्बिका।<br>अहमग्निश्च सोमश्च प्रकृत्या पुरुषः स्वयम्॥ ७ | मैं महान् तेजसे युक्त अग्नि हूँ तथा ये महिमामयी अम्बा पार्वती सोमस्वरूपा हैं। प्रकृतिके साथ पुरुषरूप मैं अग्नि सोम दोनों ही हूँ॥ ७॥ |
| तस्माद्भस्म महाभागा मद्वीर्यमिति चोच्यते।<br>स्ववीर्यं वपुषा चैव धारयामीति वै स्थितिः॥ ८ | अतएव हे महाभाग मुनियो! यह भस्म मेरा वीर्य है—ऐसा कहा जाता है। मैं अपने शरीरमें अपने वीर्य (भस्म)-को धारण करके अधिष्ठित हूँ और उसी |
| तदाप्रभृति लोकेषु रक्षार्थमशुभेषु च।<br>भस्मना क्रियते रक्षा सूतिकानां गृहेषु च॥ ९ | समयसे यह भस्म सभी अमंगलोंसे लोकोंकी रक्षा करता है तथा इसी भस्मसे सूतिकागृहोंकी भी रक्षा की जाती है॥ ८-९॥ |
| भस्मस्नानविशुद्धात्मा जितक्रोधो जितेन्द्रियः।<br>मत्समीपं समागम्य न भूयो विनिवर्तते॥ १० | जो मनुष्य क्रोध तथा इन्द्रियोंको जीतकर भस्मस्नान करके पवित्र अन्तःकरणवाला हो जाता है, वह मेरा सांनिध्य प्राप्त कर लेता है एवं पुनर्जन्मसे मुक्त हो जाता है॥ १०॥ |
| व्रतं पाशुपतं योगं कापिलं चैव निर्मितम्।<br>पूर्वं पाशुपतं ह्येतन्निर्मितं तदनुत्तमम्॥ ११ | पाशुपतव्रत, योगशास्त्र तथा कापिल (सांख्यशास्त्र)-की रचना मैंने ही की। इनमें पाशुपतयोगकी रचना पहले हुई है, इसलिये यह उत्तम है॥ ११॥ |
| शेषाश्चाश्रमिणः सर्वे पश्चात्सृष्टाः स्वयम्भुवा।<br>सृष्टिरेषा मया सृष्टा लज्जामोहभयात्मिका॥ १२ | आश्रम-सम्बन्धी शेष सभी शास्त्र स्वयंभू ब्रह्माजीके द्वारा बादमें रचे गये और लज्जा, मोह तथा भयसे युक्त इस सृष्टिकी रचना मैंने ही की है॥ १२॥ |
| नग्ना एव हि जायन्ते देवता मुनयस्तथा।<br>ये चान्ये मानवा लोके सर्वे जायन्त्यवाससः॥ १३ | देवता तथा मुनिगण नग्न ही उत्पन्न होते हैं। लोकमें अन्य जो मनुष्य हैं, वे भी वस्त्रविहीन-अवस्थामें उत्पन्न होते हैं। |
| इन्द्रियैरजितैर्नग्नो दुकूलेनापि संवृतः।<br>तैरेव संवृतैर्गुप्तो न वस्त्रं कारणं स्मृतम्॥ १४ | इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त न किये हुए लोग सुन्दर वस्त्र धारण करके भी नग्न हैं और |
| १५४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- | | | इन्द्रियजित् लोग नग्न रहते हुए भी वस्त्रसे ढँके हुए हैं, इसमें वस्त्र हेतु नहीं माना गया है॥ १३-१४॥ | | क्षमा धृतिरहिंसा च वैराग्यं चैव सर्वशः।<br>तुल्यौ मानावमानौ च तदावरणमुत्तमम्॥ १५ | क्षमा, धैर्य, अहिंसा, वैराग्य तथा हर तरहसे मान-अपमानमें समानता उत्तम आवरण कहे गये हैं॥ १५॥ | | भस्मस्नानेन दिग्धाङ्गो ध्यायते मनसा भवम्।<br>यद्यकार्यसहस्राणि कृत्वा यः स्नाति भस्मना॥ १६ | भस्म-स्नानके द्वारा पूरे शरीरमें भस्मका अनुलेपनकर मनसे शिवजीका ध्यान करना चाहिये। हजारों प्रकारके कुकृत्य करके भी यदि जो कोई मनुष्य भस्मसे स्नान करे, तो उसके सभी पापोंको भस्म उसी प्रकार जला डालता है, जिस प्रकार अग्नि अपने तेजसे वनको दग्ध कर देता है॥ १६ १/२॥ | | तत्सर्वं दहते भस्म यथाग्निस्तेजसा वनम्।<br>तस्माद्यत्नपरो भूत्वा त्रिकालमपि यः सदा॥ १७ | अतएव जो मनुष्य प्रयत्नशील होकर त्रिकाल भस्म-स्नान करता है, वह मेरे गणोंमें श्रेष्ठताको प्राप्त होता है॥ १७ १/२॥ | | भस्मना कुरुते स्नानं गाणपत्यं स गच्छति।<br>समाहृत्य क्रतून् सर्वान् गृहीत्वा व्रतमुत्तमम्॥ १८<br><br>ध्यायन्ति ये महादेवं लीलासद्भावभाविताः।<br>उत्तरेणार्यपन्थानं तेऽमृतत्वमवाप्नुयुः॥ १९ | जो लोग उत्तम व्रत धारण करके समस्त यज्ञ सम्पन्न करके महादेवके लीला-विग्रहका चिन्तन करते हुए उनकी आराधना करते हैं; वे अमृतत्व (मोक्ष)-को प्राप्त होते हैं। इसे श्रेष्ठ उत्तरमार्ग कहा गया है॥ १८-१९॥ | | दक्षिणेन च पन्थानं ये श्मशानानि भेजिरे।<br>अणिमा गरिमा चैव लघिमा प्राप्तिरेव च॥ २०<br><br>इच्छाकामावसायित्वं तथा प्राकाम्यमेव च।<br>ईशित्वं च वशित्वं च अमरत्वं च ते गताः॥ २१ | जो लोग दक्षिण-मार्गके द्वारा नाशवान् काम्यकर्मोंके लिये परमेश्वरकी आराधना करते हैं, वे अणिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, इच्छाकामावसायित्व, प्राकाम्य, ईशित्व तथा वशित्व सिद्धियाँ प्राप्तकर अमर हो जाते हैं॥ २०-२१॥ | | इन्द्रादयस्तथा देवाः कामिकव्रतमास्थिताः।<br>ऐश्वर्यं परमं प्राप्य सर्वे प्रथिततेजसः॥ २२ | इन्द्र आदि सभी देवता भी काम्य व्रतका आश्रयणकर परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति करके अपरिमित तेजस्वी हो गये॥ २२॥ | | व्यपगतमदमोहमुक्तराग-<br>स्तमरजदोषविवर्जितस्वभावः।<br>परिभवमिदमुत्तमं विदित्वा<br>पशुपतियोगपरो भवेत्सदैव॥ २३ | मद-मोहसे शून्य, रागोंसे मुक्त तथा तम-रज आदि विकारोंसे रहित स्वभाववाला होकर संसारको परिभूत करनेवाले पाशुपतयोगको उत्तम जानकर सदा इस पशुपतियोगमें स्थित रहना चाहिये॥ २३॥ | | इमं पाशुपतं ध्यायन् सर्वपापप्रणाशनम्।<br>यः पठेच्च शुचिर्भूत्वा श्रद्दधानो जितेन्द्रियः॥ २४ | सभी इन्द्रियोंको जीतकर जो मनुष्य पवित्र मनसे सभी पापोंका नाश करनेवाले इस पाशुपतयोगका ध्यानपूर्वक श्रद्धाभावसे पाठ करता है, सभी पातकोंसे रहित विशुद्ध आत्मावाला वह प्राणी रुद्रलोकको प्राप्त होता है॥ २४ १/२॥ | | सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति।<br>ते सर्वे मुनयः श्रुत्वा वसिष्ठाद्या द्विजोत्तमाः॥ २५ | महादेवजीका यह वचन सुनकर द्विजोंने श्रेष्ठ |
३५- महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महा-मृत्युंजय मन्त्रकी स्वरूपमीमांसा
अध्याय ३५ ] महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महामृत्युंजयमन्त्रकी स्वरूपमीमांसा १५५
| भस्मपाण्डुरदिग्धाङ्गा बभूवुर्विगतस्पृहाः।<br>रुद्रलोकाय कल्पान्ते संस्थिताः शिवतेजसा॥ २६ | वसिष्ठ आदि वे सभी मुनि अपने अंगोंमें पीताभ-श्वेत भस्म लगाने लगे और इच्छारहित वे मुनिगण कल्पके अन्तमें शिवजीके तेजके प्रभावसे रुद्रलोकके लिये प्रस्थित हुए॥ २५-२६॥ |
| तस्मान्न निन्द्याः पूज्याश्च विकृता मलिना अपि।<br>रूपान्विताश्च विप्रेन्द्राः सदा योगीन्द्रशङ्कया॥ २७ | [नन्दी कहते हैं—हे सनत्कुमारजी!] अतः मलिन, विकृत, रूपसम्पन्न चाहे जिस रूपमें हों, महान् योगीकी शंका करके उनकी निन्दा नहीं करनी चाहिये, अपितु उनकी सदा पूजा करनी चाहिये॥ २७॥ |
| बहुना किं प्रलापेन भवभक्ता द्विजोत्तमाः।<br>सम्पूज्याः सर्वयत्नेन शिववन्नात्र संशयः॥ २८ | अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता; दृढ़ व्रतवाले भगवान् शिवके द्विजश्रेष्ठ भक्त चाहे वे मलिन ही क्यों न हों, पूरे प्रयत्नसे शिवकी ही भाँति उनकी पूजा करनी चाहिये, इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ २८^{१}/_{२}॥ |
| मलिनाश्चैव विप्रेन्द्रा भवभक्ता दृढव्रताः।<br>दधीचस्तु यथा देवदेवं जित्वा व्यवस्थितः॥ २९ | इसी भाँति मुनि दधीच शिवकी भक्तिसे देवदेव नारायणको जीतकर लोकमें प्रतिष्ठित हो गये थे; इसमें सन्देह नहीं है॥ २९^{१}/_{२}॥ |
| नारायणं तथा लोके रुद्रभक्त्या न संशयः।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भस्मदिग्धतनूरुहाः॥ ३० | अतएव भस्मसे लिप्त शरीरवाले, जटाधारी, मुण्डित सिरवाले तथा दिगम्बर वेशवाले अनेक प्रकारके महात्माओंकी मन, वचन एवं कर्मसे पूर्ण प्रयत्नके साथ महादेवकी भाँति विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥ ३०-३१॥ |
| जटिनो मुण्डिनश्चैव नग्ना नानाप्रकारिणः।<br>सम्पूज्याः शिववन्नित्यं मनसा कर्मणा गिरा॥ ३१ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे योगिप्रशंसा नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'योगिप्रशंसा' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३४॥
पैंतीसवाँ अध्याय
महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महामृत्युंजयमन्त्रकी स्वरूपमीमांसा
| सनत्कुमार उवाच<br>कथं जघान राजानं क्षुपं पादेन सुव्रत।<br>दधीचः समरे जित्वा देवदेवं जनार्दनम्॥ १<br><br>वज्रास्थित्वं कथं लेभे महादेवान् महातपाः।<br>वक्तुमर्हसि शैलादे जितो मृत्युस्त्वया यथा॥ २ | सनत्कुमार बोले— हे सुव्रत! मुनि दधीचने समरमें देवदेव नारायणको जीतकर राजा क्षुपके ऊपर अपने पैरसे प्रहार क्यों किया? और उन महातपस्वीने महादेवजीसे अपनी हड्डियाँ वज्रतुल्य होनेका वरदान किस प्रकार प्राप्त किया और हे नन्दीश्वर! जिस प्रकार आपने मृत्युपर विजय प्राप्त की, वह भी आप कृपा करके बताइये॥ १-२॥ |
| शैलादिरुवाच<br>ब्रह्मपुत्रो महातेजा राजा क्षुप इति स्मृतः।<br>अभून्मित्रो दधीचस्य मुनीन्द्रस्य जनेश्वरः॥ ३ | नन्दी कहते हैं— ब्रह्माजीके पुत्र महान् तेजवाले क्षुप नामक एक राजा हुए हैं। उन लोकपति क्षुपकी मुनीश्वर दधीचसे मित्रता थी॥ ३॥ |
| १५६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| चिरात्तयोः प्रसङ्गाद्वै वादः क्षुपदधीचयोः।<br>अभवत् क्षत्रियश्रेष्ठो विप्र एवेति विश्रुतः॥ ४ | कालान्तरमें उन क्षुप तथा दधीचके मध्य किसी बातके सन्दर्भमें विवाद हो गया। क्षुपका कथन था कि क्षत्रिय श्रेष्ठ होता है और दधीचका कथन था कि ब्राह्मण ही श्रेष्ठ होता है॥ ४॥ | | अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः।<br>तस्मादिन्द्रो ह्यहं वह्निर्यमश्च निर्ऋतिस्तथा॥ ५<br><br>वरुणश्चैव वायुश्च सोमो धनद एव च।<br>ईश्वरोऽहं न सन्देहो नावमन्तव्य एव च॥ ६ | राजा आठ लोकपालोंका विग्रहस्वरूप होता है। इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, चन्द्र, कुबेर तथा ईश्वर मैं ही हूँ; इसमें कोई सन्देह नहीं है, अतः तुम्हें मेरी अवज्ञा नहीं करनी चाहिये॥ ५-६॥ | | महती देवता या सा महतश्चापि सुव्रत।<br>तस्मात्त्वया महाभाग च्यावनेय सदा ह्यहम्॥ ७<br><br>नावमन्तव्य एवेह पूजनीयश्च सर्वथा।<br>श्रुत्वा तथा मतं तस्य क्षुपस्य मुनिसत्तमः॥ ८ | हे सुव्रत! वह राजा महान् देवता होता है। अतः हे च्यवनपुत्र! हे महाभाग! तुम्हें मेरा अपमान कभी नहीं करना चाहिये, अपितु सर्वथा मेरी पूजा करनी चाहिये॥ ७ १/२॥<br><br>उन क्षुपका वह वचन सुनकर च्यवनपुत्र मुनिश्रेष्ठ द्विज दधीचने आत्मगौरवसे प्रेरित होकर अपने बाँयें हाथसे क्षुपके सिरपर तेज मुष्टिका-प्रहार किया॥ ८ १/२॥ | | दधीचश्च्यावनिश्चोग्रो गौरवादात्मनो द्विजः।<br>अताडयत्क्षुपं मूर्ध्नि दधीचो वाममुष्टिना।<br>चिच्छेद वज्रेण च तं दधीचं बलवान् क्षुपः॥ ९<br><br>ब्रह्मलोके पुरासौ हि ब्रह्मणः क्षुतसम्भवः।<br>लब्धं वज्रं च कार्यार्थं वज्रिणा चोदितः प्रभुः॥ १० | बलशाली क्षुपने भी वज्रसे उन दधीचपर प्रहार किया। पूर्वकालमें राजा क्षुप ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीकी छींकसे उत्पन्न हुए थे। भगवान्की प्रेरणासे असुरोंके पराजयरूप कार्यके निमित्त इन्द्रसे उन्होंने वज्र प्राप्त किया था॥ ९-१०॥ | | स्वेच्छयैव नरो भूत्वा नरपालो बभूव सः।<br>तस्माद्राजा स विप्रेन्द्रमजयद्वै महाबलः॥ ११ | अपनी इच्छासे ही नर होकर वे राजा बने थे। श्रीयुक्त, बलवान् तथा तमोगुणयुक्त इन्द्रकी भाँति राजा क्षुप भी बलशाली थे, इसीलिये वे विप्रेन्द्र दधीचको जीतनेमें समर्थ हो गये॥ ११ १/२॥ | | यथा वज्रधरः श्रीमान् बलवांस्तमसान्वितः।<br>पपात भूमौ निहतो वज्रेण द्विजपुङ्गवः॥ १२ | राजा क्षुपके वज्र-प्रहारसे निहत द्विजश्रेष्ठ दधीच भूमिपर गिर पड़े। फिर अत्यन्त दुःखी होकर उन्होंने भृगु-पुत्र मुनि शुक्राचार्यका स्मरण किया॥ १२ १/२॥ | | सस्मार च तदा तत्र दुःखार्तो भार्गवं मुनिम्।<br>शुक्रोऽपि सन्धयामास ताडितं कुलिशेन तम्॥ १३ | देहधारियोंमें श्रेष्ठ शुक्राचार्यने भी वहाँ पहुँचकर दधीचमुनिके वज्र-ताड़ित शरीरको अपने योगबलसे यथावत् जोड़ दिया॥ १३ १/२॥ | | योगादेत्य दधीचस्य देहं देहभृतांवरः।<br>सन्धाय पूर्ववद्देहं दधीचस्याह भार्गवः॥ १४<br><br>भो दधीच महाभाग देवदेवमुमापतिम्।<br>सम्पूज्य पूज्यं ब्रह्माद्यैर्देवदेवं निरञ्जनम्॥ १५ | दधीचके शरीरको पूर्वकी भाँति ठीककर भार्गव शुक्राचार्यने कहा—हे महाभाग दधीच! हे विप्रवर! ब्रह्मा आदि देवताओंसे पूजित निरंजन देवाधिदेव उमापति शिवकी सम्यक् पूजा करके उन त्र्यम्बक महादेवके अनुग्रहसे अवध्य हो जाओ॥ १४-१५ १/२॥ | | अवध्यो भव विप्रर्षे प्रसादात्त्र्यम्बकस्य तु।<br>मृतसञ्जीवनं तस्माल्लब्धमेतन्मया द्विज॥ १६ | हे द्विज! उन्हीं महादेवजीसे मैंने भी मृतसंजीवनी |
अध्याय ३५] महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महामृत्युंजय मन्त्रकी स्वरूपमीमांसा १५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नास्ति मृत्युभयं शम्भोर्भक्तानामिह सर्वतः।<br>मृतसञ्जीवनं चापि शैवमद्य वदामि ते॥ १७ | विद्या प्राप्त की है। शिवजीके भक्तोंको मृत्युसे किसी प्रकारका भय नहीं होता है। उसी शैवी मृतसंजीवनी विद्याको अब मैं तुम्हें बता रहा हूँ॥ १६-१७॥ |
| त्रियम्बकं यजामहे त्रैलोक्यपितरं प्रभुम्।<br>त्रिमण्डलस्य पितरं त्रिगुणस्य महेश्वरम्॥ १८<br><br>त्रितत्त्वस्य त्रिवह्नेश्च त्रिधाभूतस्य सर्वतः।<br>त्रिदेवस्य महादेवं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्॥ १९ | तीनों लोकोंके पिता; सोम-चन्द्र-अग्नि-इन तीनों मण्डलोंके जनक; सत-रज-तम-तीनों गुणोंके महेश्वर; तीन तत्त्वों (बुद्धि-अहंकार-मन), तीन अग्नियों (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि), तीन देवों (ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र) तथा जगत्के सभी तीन प्रकारके पदार्थोंके स्वामी, सुगन्धिरूप पुष्टिवर्धन परमेश्वर महादेवका यजन करना चाहिये॥ १८-१९॥ |
| सर्वभूतेषु सर्वत्र त्रिगुणे प्रकृतौ तथा।<br>इन्द्रियेषु तथान्येषु देवेषु च गणेषु च॥ २० | सुगन्धिरूप वह सूक्ष्म परमेश्वर सभी जगह, समस्त जीवधारियोंमें, त्रिगुणात्मिका प्रकृतिमें, इन्द्रियोंमें, अन्य देवताओं तथा गणोंमें उसी प्रकार अधिष्ठित है, जैसे पुष्पोंमें गन्ध विद्यमान रहती है॥ २० १/२॥ |
| पुष्पेषु गन्धवत्सूक्ष्मः सुगन्धिः परमेश्वरः।<br>पुष्टिश्च प्रकृतिर्यस्मात्पुरुषस्य द्विजोत्तम॥ २१<br><br>महदादिविशेषान्तविकल्पस्यापि सुव्रत।<br>विष्णोः पितामहस्यापि मुनीनां च महामुने॥ २२ | हे द्विजश्रेष्ठ! चूँकि पुरुषरूप परमेश्वरकी पुष्टि प्रकृतिरूप है। हे सुव्रत! हे महामुने! अतएव वही परमेश्वर महत् आदिसे लेकर विशेषपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच, विष्णु, ब्रह्मा, मुनियों तथा इन्द्र आदि सभी देवताओंका पुष्टिवर्धन करता है॥ २१-२२ १/२॥ |
| इन्द्रस्यापि च देवानां तस्माद्वै पुष्टिवर्धनः।<br>तं देवममृतं रुद्रं कर्मणा तपसा तथा॥ २३ | कर्म, तपस्या, स्वाध्याय, योग तथा ध्यानके द्वारा उन अमृतरूप महादेवका यजन करना चाहिये॥ २३ १/२॥ |
| स्वाध्यायेन च योगेन ध्यानेन च यजामहे।<br>सत्येनानेन मुक्षीयान्मृत्युपाशाद्भवः स्वयम्॥ २४<br><br>बन्धमोक्षकरो यस्मादुर्वारुकमिव प्रभुः।<br>मृतसञ्जीवनो मन्त्रो मया लब्धस्तु शङ्करात्॥ २५ | जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्ति प्रदान करनेवाले प्रभु शिव इस सत्यके द्वारा जीवको मृत्युके पाशसे छुटकारा प्रदान करते हैं। सूर्यकी किरणोंसे पककर अपने मूलबन्धसे स्वयं मुक्त हुए उर्वारुक (ककड़ी)-की भाँति वह जीव शिवाराधनके द्वारा सांसारिक बन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ २४ १/२॥ |
| जप्त्वा हुत्वाभिमन्त्र्यैवं जलं पीत्वा दिवानिशम्।<br>लिङ्गस्य सन्निधौ ध्यात्वा नास्ति मृत्युभयं द्विज॥ २६ | मैंने भी शिवजीसे ही मृतसंजीवनी मन्त्र प्राप्त किया है। हे द्विज! जप करने, हवन करने, अभिमन्त्रित जलका पान करने तथा दिन-रात शिवलिङ्गके सांनिध्यमें बैठकर उनका ध्यान करनेसे मृत्युका भय नहीं रह जाता॥ २५-२६॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तपसाराध्य शङ्करम्।<br>वज्रास्थित्वमवध्यत्वमदीनत्वं च लब्धवान्॥ २७ | उन शुक्राचार्यका वह वचन सुनकर मुनि दधीचने घोर तपस्या करके शिवकी आराधना की, जिसके |
३६- राजा क्षुपद्वारा विष्णुकी आराधना, विष्णुद्वारा शिव-भक्तोंकी महिमाका कथन
| १५८ | ·श्रीलिङ्गमहापुराण | [·पूर्वभाग |
|---|
| एवमाराध्य देवेशं दधीचो मुनिसत्तमः।<br>प्राप्यावध्यत्वमन्यैश्च वज्रास्थित्वं प्रयत्नतः॥ २८<br><br>अताडयच्च राजेन्द्रं पादमूलेन मूर्धनि।<br>क्षुपो दधीचं वज्रेण जघानोरसि च प्रभुः॥ २९ | परिणामस्वरूप उनकी हड्डियाँ वज्र-तुल्य हो गयीं, वे अवध्य हो गये तथा उनकी सारी दीनता दूर हो गयी॥ २७॥<br><br>इस प्रकार देवेश्वर शिवकी आराधना करके मुनिश्रेष्ठ दधीचने वज्रके समान हड्डियाँ हो जाने तथा दूसरोंसे मारे न जा सकनेका वरदान प्राप्तकर चेष्टापूर्वक राजा क्षुपके सिरपर अपने चरण-मूलसे प्रहार किया। इसपर राजा क्षुपने भी अपने वज्रसे उनकी छातीपर आघात किया॥ २८-२९॥ |
| नाभून्नाशाय तद्वज्रं दधीचस्य महात्मनः।<br>प्रभावात्परमेशस्य वज्रबद्धशरीरिणः॥ ३० | किंतु भगवान् शिवके अनुग्रहसे वज्र-तुल्य शरीरवाले महात्मा दधीचको वह वज्र विनष्ट करनेमें समर्थ नहीं हो सका॥ ३०॥ |
| दृष्ट्वाप्यवध्यत्वमदीनतां च<br>क्षुपो दधीचस्य तदा प्रभावम्।<br>आराधयामास हरिं मुकुन्द-<br>मिन्द्रानुजं प्रेक्ष्य तदाम्बुजाक्षम्॥ ३१ | दधीचका अवध्यत्व, उनकी अदीनता तथा उनके तपोबलका प्रभाव देखकर राजा क्षुप कमलके सदृश नेत्रवाले उपेन्द्र मुकुन्द श्रीविष्णुकी आराधना करने लगे॥ ३१॥ |
इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे क्षुपाभिधन्नृपपराभववर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५॥
इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'क्षुपाभिधन्नृपपराभववर्णन' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३५॥
छत्तीसवाँ अध्याय
राजा क्षुपद्वारा विष्णुकी आराधना, विष्णुद्वारा शिवभक्तोंकी महिमाका कथन
| नन्द्युवाच<br>पूजया तस्य सन्तुष्टो भगवान् पुरुषोत्तमः।<br>श्रीभूमिसहितः श्रीमान् शङ्खचक्रगदाधरः॥ १<br><br>किरीटी पद्महस्तश्च सर्वाभरणभूषितः।<br>पीताम्बरश्च भगवान् देवैर्दैत्यैश्च संवृतः॥ २<br><br>प्रददौ दर्शनं तस्मै दिव्यं वै गरुडध्वजः। | नन्दीश्वर बोले—[हे सनत्कुमारजी!] उन राजा क्षुपकी आराधनासे प्रसन्न होकर देवताओं तथा दैत्योंसे पूजित, हाथोंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किये हुए, पीत वस्त्र पहने हुए, सभी आभूषणोंसे सुशोभित एवं मुकुट धारण किये हुए लक्ष्मी तथा भूमिसहित गरुड़ध्वज श्रीमान् भगवान् पुरुषोत्तमने उन क्षुपको दिव्य दर्शन दिया॥ १-२ ½॥ |
| दिव्येन दर्शनेनैव दृष्ट्वा देवं जनार्दनम्॥ ३<br><br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः प्रणम्य गरुडध्वजम्। | दिव्य दर्शनके अनन्तर उन गरुड़ध्वज भगवान् विष्णु देवको प्रणाम करके राजा क्षुप अत्यन्त प्रिय वाणीमें उनकी स्तुति करने लगे॥ ३ ½॥ |
| त्वमादिस्त्वमनादिश्च प्रकृतिस्त्वं जनार्दनः॥ ४<br><br>पुरुषस्त्वं जगन्नाथो विष्णुर्विश्वेश्वरो भवान्।<br>योऽयं ब्रह्मासि पुरुषो विश्वमूर्तिः पितामहः॥ ५ | आप आदि हैं तथा आप आदिरहित भी हैं। आप ही प्रकृति हैं, आप ही जनार्दन हैं, आप ही पुरुष हैं, आप ही जगन्नाथ, आप ही विष्णु तथा आप ही |
अध्याय ३६ ] राजा क्षुपद्वारा विष्णुकी आराधना, विष्णुद्वारा शिवभक्तोंकी महिमाका कथन १५९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| विश्वेश्वर हैं। जो ये पुरुषरूप विश्वमूर्ति पितामह हैं, वे भी आप ही हैं॥ ४-५॥ | |
| तत्त्वमाद्यं भवानेव परं ज्योतिर्जनार्दन।<br>परमात्मा परं धाम श्रीपते भूपते प्रभो॥ ६ | हे जनार्दन! जो आदि ज्योति है, वह आप ही हैं। हे लक्ष्मीकान्त! हे भूपते! आप ही परमात्मा तथा आप ही परमधाम हैं॥ ६॥ |
| त्वत्क्रोधसम्भवो रुद्रस्तमसा च समावृतः।<br>त्वत्प्रसादाज्जगद्धाता रजसा च पितामहः॥ ७<br><br>त्वत्प्रसादात्स्वयं विष्णुः सत्त्वेन पुरुषोत्तमः।<br>कालमूर्ते हरे विष्णो नारायण जगन्मय॥ ८ | तमोगुणसे संलिप्त भगवान् रुद्र आपके क्रोधसे आविर्भूत हैं तथा आपके ही अनुग्रहसे रजोगुणसे सम्पन्न जगत्के सृजनकर्ता पितामह ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई है। हे कालमूर्ते! हे हरे! हे विष्णो! हे नारायण! हे जगन्मय! सत्त्वगुणयुक्त साक्षात् पुरुषोत्तम विष्णु भी आपके ही अनुग्रहसे अधिष्ठित हैं॥ ७-८॥ |
| महांस्तथा च भूतादिस्तन्मात्राणीन्द्रियाणि च।<br>त्वयैवाधिष्ठितान्येव विश्वमूर्ते महेश्वर॥ ९ | हे विश्वमूर्ते! हे महेश्वर! महत्, पंचमहाभूतादि, पाँच तन्मात्राएँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन—ये सब आपके ही द्वारा अधिष्ठित हैं॥ ९॥ |
| महादेव जगन्नाथ पितामह जगद्गुरो।<br>प्रसीद देवदेवेश प्रसीद परमेश्वर॥ १० | हे महादेव! हे जगन्नाथ! हे पितामह! हे जगद्गुरो! हे देवदेवेश! हे परमेश्वर! आप प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये॥ १०॥ |
| प्रसीद त्वं जगन्नाथ शरण्यं शरणं गतः।<br>वैकुण्ठ शौरे सर्वज्ञ वासुदेव महाभुज॥ ११ | हे शरणागतको शरण प्रदान करनेवाले जगन्नाथ! हे वैकुण्ठ! हे शौरे! हे सर्वज्ञ! हे वासुदेव! हे महाभुज! आप प्रसन्न होइये॥ ११॥ |
| सङ्कर्षण महाभाग प्रद्युम्न पुरुषोत्तम।<br>अनिरुद्ध महाविष्णो सदा विष्णो नमोऽस्तु ते॥ १२ | हे संकर्षण! हे महाभाग! हे प्रद्युम्न! हे पुरुषोत्तम! हे अनिरुद्ध! हे महाविष्णो! हे विष्णो! आपको सदा नमस्कार है॥ १२॥ |
| विष्णो तवासनं दिव्यमव्यक्तं मध्यतो विभुः।<br>सहस्रफणसंयुक्तस्तमोमूर्तिर्धराधरः ॥ १३ | हे विष्णो! हजार फणोंसे युक्त, तमोमूर्तिस्वरूप, पृथ्वीको धारण करनेवाले, ऐश्वर्यसम्पन्न शेषनाग आपके दिव्य तथा अव्यक्त आसनके रूपमें अधिष्ठित हैं॥ १३॥ |
| अधश्च धर्मो देवेश ज्ञानं वैराग्यमेव च।<br>ऐश्वर्यमासनस्यास्य पादरूपेण सुव्रत॥ १४ | हे देवेश! हे सुव्रत! इस आसनके नीचे पादके रूपमें साक्षात् धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य विराजमान हैं॥ १४॥ |
| सप्तपातालपादस्त्वं धराजघनमेव च।<br>वासांसि सागराः सप्त दिशश्चैव महाभुजाः॥ १५<br><br>द्यौर्मूर्धा ते विभो नाभिः खं वायुर्नासिकां गतः।<br>नेत्रे सोमश्च सूर्य्यश्च केशा वै पुष्करादयः॥ १६<br><br>नक्षत्रतारका द्यौश्च ग्रैवेयकविभूषणम्।<br>कथं स्तोष्यामि देवेशं पूज्यश्च पुरुषोत्तमः॥ १७ | हे विभो! सातों पाताल आपके चरणरूपमें, पृथ्वी जाँघके रूपमें, सातों समुद्र वस्त्रके रूपमें, दिशाएँ विशाल भुजाओंके रूपमें, अन्तरिक्ष मस्तकके रूपमें, आकाश नाभिके रूपमें, वायु नासिकाके रूपमें, दोनों नेत्र सूर्य-चन्द्रके रूपमें, बाल मेघोंके रूपमें तथा नक्षत्र-तारे और सम्पूर्ण गगनमण्डल आपके गलेके आभूषणके |
| १६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रद्धया च कृतं दिव्यं यच्छ्रुतं यच्च कीर्तितम्।<br>यदिष्टं तत्क्षमस्वेश नारायण नमोऽस्तु ते॥ १८ | रूपमें अधिष्ठित हैं। आप पुरुषोत्तम हैं और परम पूज्य हैं। आप देवेश्वरकी स्तुति मैं किस प्रकार करूँ? आपके विषयमें जैसा सुना तथा कहा गया है, उसी दिव्य भावको मैंने श्रद्धापूर्वक स्तुतिरूपमें कह दिया। हे ईश! हे नारायण! मेरी अभिलाषाके लिये मुझे क्षमा कीजिये। आपको नमस्कार है॥ १५-१८॥ |
| शैलादिरुवाच<br>इदं तु वैष्णवं स्तोत्रं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि क्षुपेण परिकीर्तितम्॥ १९<br><br>श्रावयेद्वा द्विजान् भक्त्या विष्णुलोकं स गच्छति॥ २० | नन्दीश्वर बोले— जो मनुष्य क्षुपके द्वारा की गयी सर्वपापनाशिनी इस विष्णु-स्तुतिको भक्तिपूर्वक पढ़ता है या सुनता है अथवा ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह विष्णु-लोकको प्राप्त होता है॥ १९-२०॥ |
| सम्पूज्य चैवं त्रिदशेश्वराद्यैः<br>स्तुत्वा स्तुतं देवमजेयमीशम्।<br>विज्ञापयामास निरीक्ष्य भक्त्या<br>जनार्दनाय प्रणिपत्य मूर्ध्ना॥ २१ | इस प्रकार इन्द्र आदिके द्वारा स्तुत किये जानेवाले अपराजेय परमेश्वर विष्णुकी भक्तिपूर्वक स्तुति करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम करके उनकी ओर कातर दृष्टिसे देखते हुए क्षुपने कहा॥ २१॥ |
| राजोवाच<br>भगवन् ब्राह्मणः कश्चिद्दधीच इति विश्रुतः।<br>धर्मवेत्ता विनीतात्मा सखा मम पुरातवत्॥ २२<br><br>अवध्यः सर्वदा सर्वैः शङ्करार्चनतत्परः।<br>सावज्ञं वामपादेन स मां मूर्ध्नि सदस्यथ॥ २३<br><br>ताडयामास देवेश विष्णो विश्वजगत्पते।<br>उवाच च मदाविष्टो न बिभेमीति सर्वतः॥ २४ | राजा बोले— हे भगवन्! दधीच नामसे लोकप्रसिद्ध एक धर्मज्ञ तथा विनीत आत्मावाले ब्राह्मण हैं, जो पहले मेरे मित्र थे। शिवजीकी आराधनामें सदा तत्पर रहनेके कारण उनकी कृपासे वे सभीसे अवध्य हैं। हे देवेश! हे विष्णो! हे जगत्पते! उन्होंने सभामें मेरा तिरस्कार करते हुए अपने बायें पैरसे मेरे सिरपर प्रहार कर दिया और उन मदोन्मत्तने कहा कि मैं किसीसे भी नहीं डरता हूँ॥ २२-२४॥ |
| जेतुमिच्छामि तं विप्रं दधीचं जगदीश्वर।<br>यथा हि तं तथा कर्तुं त्वमर्हसि जनार्दन॥ २५ | हे जगदीश्वर! मैं उन विप्र दधीचको जीतना चाहता हूँ। हे जनार्दन! मैं उन्हें जिस भी तरहसे जीत सकूँ; आप वैसा उपाय कीजिये॥ २५॥ |
| शैलादिरुवाच<br>ज्ञात्वा सोऽपि दधीचस्य ह्यवध्यत्वं महात्मनः।<br>सस्मार च महेशस्य प्रभावमतुलं हरिः॥ २६<br><br>एवं स्मृत्वा हरिः प्राह ब्रह्मणः क्षुतसम्भवम्।<br>विप्राणां नास्ति राजेन्द्र भयमेत्य महेश्वरम्॥ २७<br><br>विशेषाद्रुद्रभक्तानामभयं सर्वदा नृप।<br>नीचानामपि सर्वत्र दधीचस्यास्य किं पुनः॥ २८ | नन्दीश्वर बोले— इस प्रकार उन विष्णुने भी महात्मा दधीचके अवध्यत्वको जानकर तथा भगवान् शिवके अतुलित प्रभावका स्मरण करके ब्रह्माकी छींकसे उत्पन्न क्षुपसे कहा—हे राजेन्द्र! महेश्वरकी भक्तिको प्राप्त विप्रोंको किसी प्रकारका भय नहीं रहता। हे राजन्! विशेषरूपसे रुद्रके भक्त सर्वदा भयसे मुक्त रहते हैं, चाहे वे परम नीच ही क्यों न हों; फिर इन दधीचमुनिकी तो बात ही क्या?॥ २६-२८॥ |
| तस्मात्तव महाभाग विजयो नास्ति भूपते।<br>दुःखं करोमि विप्रस्य शापार्थं ससुरास्य मे॥ २९ | हे महाभाग! हे भूपते! अतः अब आपके विजयकी आशा नहीं है। देवताओंसहित अपनेको शापित होनेके |
अध्याय ३६] राजा क्षुपद्वारा विष्णुकी आराधना, विष्णुद्वारा शिवभक्तोंकी महिमाका कथन १६१
| लिये मैं अब विप्र दधीचको क्रोधित करूँगा॥ २९॥ | |
|---|---|
| भविता तस्य शापेन दक्षयज्ञे सुरैः समम्।<br>विनाशो मम राजेन्द्र पुनरुत्थानमेव च॥ ३० | हे राजेन्द्र! उनके शापसे दक्षके यज्ञमें सभी देवताओंसहित मेरा विनाश होगा और पुनः उत्थान होगा॥ ३०॥ |
| तस्मात्समेत्य विप्रेन्द्र सर्वयत्नेन भूपते।<br>करोमि यत्नं राजेन्द्र दधीचविजयाय ते॥ ३१ | हे भूपते! हे राजेन्द्र! समस्त देवताओंसहित मैं विप्रेन्द्र दधीचमुनिसे आपकी विजयके लिये पूरे मनसे प्रयास करूँगा॥ ३१॥ |
| शैलादिरुवाच<br>श्रुत्वा वाक्यं क्षुपः प्राह तथास्त्विति जनार्दनम्।<br>भगवानपि विप्रस्य दधीचस्याश्रमं ययौ॥ ३२ | नन्दीश्वर बोले— भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर क्षुपने उनसे कहा—आप वैसा ही कीजिये। इधर भक्तवत्सल भगवान् विष्णु ब्राह्मणका रूप धारणकर दधीचमुनिके आश्रम पहुँचे। जगद्गुरु विष्णुने ब्रह्मर्षि दधीचको प्रणामकर उनसे कहा॥ ३२-३३॥ |
| आस्थाय रूपं विप्रस्य भगवान् भक्तवत्सलः।<br>दधीचमाह ब्रह्मर्षिमभिवन्द्य जगद्गुरुः॥ ३३ | |
| श्रीभगवानुवाच<br>भो भो दधीच ब्रह्मर्षे भवार्चनरताव्यय।<br>वरमेकं वृणे त्वत्तस्तं भवान् दातुमर्हति॥ ३४ | श्रीभगवान् बोले— हे शिवाराधनमें तत्पर निर्विकार ब्रह्मर्षि दधीच! मैं आपसे एक वरकी याचना करता हूँ। आप मुझे वह वर देनेकी कृपा कीजिये॥ ३४॥ |
| याचितो देवदेवेन दधीचः प्राह विष्णुना।<br>ज्ञातं तवेप्सितं सर्वं न बिभेमि तवाप्यहम्॥ ३५ | देवदेव विष्णुके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दधीचने कहा—मैं आपके सभी भावों तथा मनोरथोंको समझ गया हूँ। मुझे आपसे भी कोई भय नहीं है॥ ३५॥ |
| भवान् विप्रस्य रूपेण आगतोऽसि जनार्दन।<br>भूतं भविष्यं देवेश वर्तमानं जनार्दन॥ ३६ | हे जनार्दन! आप यहाँ ब्राह्मणका रूप धारणकर आये हुए हैं। हे देवेश! हे जनार्दन! भगवान् शिवकी कृपासे मैं भूत, भविष्य तथा वर्तमान सब कुछ जानता हूँ। हे सुव्रत! आप यह विप्ररूप छोड़ दीजिये। हे देवेश! हे मधुसूदन! क्षुपने अपनी कार्य-सिद्धिके लिये आपकी आराधना की है॥ ३६-३७॥ |
| ज्ञातं प्रसादाद् रुद्रस्य द्विजत्वं त्यज सुव्रत।<br>आराधितोऽसि देवेश क्षुपेण मधुसूदन॥ ३७ | |
| जाने तवैनां भगवन् भक्तवत्सलतां हरे।<br>स्थाने तवैषा भगवन् भक्तवात्सल्यता हरे॥ ३८ | हे भगवन्! हे हरे! आपकी यह भक्तवत्सलता मुझे पूर्ण रूपसे विदित है। हे भगवन्! हे हरे! आज यहाँ भी आपकी वही भक्तवत्सलता विद्यमान है॥ ३८॥ |
| अस्ति चेद्भगवन् भीतिर्भवार्चनरतस्य मे।<br>वक्तुमर्हसि यत्नेन वरदाम्बुजलोचन॥ ३९ | हे भगवन्! हे वरदाता! हे कमलनयन! यदि आपका ऐसा भक्तवात्सल्य है तो आप सोच-समझकर यह बताइये कि मुझ शिवाराधनतत्पर व्यक्तिको आपसे क्या भय हो सकता है?॥ ३९॥ |
| वदामि न मृषा तस्मान्न बिभेमि जनार्दन।<br>न बिभेमि जगत्यस्मिन् देवदैत्यद्विजादपि॥ ४० | हे जनार्दन! मैं मिथ्या-भाषण नहीं करता; इसीलिये इस जगत्में देवता, दैत्य तथा ब्राह्मण किसीसे भी मैं भयभीत नहीं रहता हूँ॥ ४०॥ |
| नन्द्युवाच<br>श्रुत्वा वाक्यं दधीचस्य तदास्थाय जनार्दनः।<br>स्वरूपं सस्मितं प्राह सन्त्यज्य द्विजतां क्षणात्॥ ४१ | नन्दी कहते हैं— [हे सनत्कुमार!] दधीचका वह |
| १६२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वचन सुनकर उसी क्षण ब्राह्मणरूप छोड़कर विष्णुने अपना रूप धारण कर लिया और हँसकर दधीचसे कहा॥ ४१॥ | |
| श्रीभगवानुवाच<br>भयं दधीच सर्वत्र नास्त्येव तव सुव्रत।<br>भवार्चनरतो यस्माद्भवान् सर्वज्ञ एव च॥ ४२ | श्रीभगवान् बोले— हे सुव्रत ! हे दधीच ! क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं तथा शिवार्चनमें रत रहनेवाले हैं, इसलिये आपको सभी स्थानोंपर किसी भी प्रकारका भय व्याप्त नहीं कर सकता॥ ४२॥ |
| बिभेमीति सकृद्वक्तुं त्वमर्हसि नमस्तव।<br>नियोगान्मम विप्रेन्द्र क्षुपं प्रति सदस्यथ॥ ४३ | हे विप्रवर ! आपको नमस्कार है। मेरा आग्रह है कि आप एक बार सभामें क्षुपसे बोल दीजिये कि 'मैं आपसे डरता हूँ'॥ ४३॥ |
| एवं श्रुत्वापि तद्वाक्यं सान्त्वं विष्णोर्महामुनिः।<br>न बिभेमीति तं प्राह दधीचो देवसत्तमम्॥ ४४<br><br>प्रभावाद्देवदेवस्य शम्भोः साक्षात्पिनाकिनः।<br>शर्वस्य शङ्करस्यास्य सर्वज्ञस्य महामुनिः॥ ४५ | इस प्रकार विष्णुभगवान्का वह विनय तथा प्रीतियुक्त वचन सुनकर महामुनि दधीचने देवोंमें श्रेष्ठ उन विष्णुसे कहा—मैं साक्षात् पिनाकधारी सर्वज्ञ शर्व देवदेव महादेव शिवके अनुग्रहसे किसीसे भी नहीं डरता॥ ४४-४५॥ |
| ततस्तस्य मुनेः श्रुत्वा वचनं कुपितो हरिः।<br>चक्रमुद्यम्य भगवान् दिधक्षुर्मुनिसत्तमम्॥ ४६ | तत्पश्चात् उन मुनि दधीचका वचन सुनकर भगवान् विष्णु क्रोधित हो उठे और उन्होंने मुनिश्रेष्ठ दधीचको दग्ध करनेकी इच्छासे अपना चक्र उठाया॥ ४६॥ |
| अभवत्कुण्ठिताग्रं हि विष्णोश्चक्रं सुदर्शनम्।<br>प्रभावाद्धि दधीचस्य क्षुपस्यैव हि सन्निधौ॥ ४७ | क्षुपके सामने ही मुनि दधीचके प्रभावसे विष्णुका सुदर्शन चक्र कुण्ठित हो गया॥ ४७॥ |
| दृष्ट्वा तत्कुण्ठिताग्रं हि चक्रं चक्रिणमाह सः।<br>दधीचः सस्मितं साक्षात्सदसद्व्यक्तिकारणम्॥ ४८ | कुण्ठित अग्रभागवाले सुदर्शन चक्रको देखकर वे दधीच मुसकराकर सत्-असत्के अवभासक चक्रधारी [विष्णु]-से कहने लगे॥ ४८॥ |
| भगवन् भवता लब्धं पुरातीव सुदारुणम्।<br>सुदर्शनमिति ख्यातं चक्रं विष्णो प्रयत्नतः॥ ४९<br><br>भवस्यैतच्छुभं चक्रं न जिघांसति मामिह।<br>ब्रह्मास्त्राद्यैस्तथान्यैर्हि प्रयत्नं कर्तुमर्हसि॥ ५० | हे भगवन्! हे विष्णो! पूर्वकालमें आपको भी अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक शिवकृपासे ही यह अति भयावह सुदर्शन नामक शुभ चक्र प्राप्त हुआ है। अतः यह चक्र मुझ शिवभक्तको नहीं मार सकता। अब आप ब्रह्मास्त्र आदि अन्य अस्त्रोंसे मुझे मारनेका प्रयास कीजिये॥ ४९-५०॥ |
| शैलादिरुवाच<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दृष्ट्वा निर्वीर्यमायुधम्।<br>ससर्ज च पुनस्तस्मै सर्वास्त्राणि समन्ततः॥ ५१ | नन्दीश्वर बोले— [हे सनत्कुमार !] दधीचका वह वचन सुनकर तथा अपने अस्त्रको निस्तेज देखकर विष्णुजीने समस्त प्रकारके अस्त्र उत्पन्न किये और वे चारों ओरसे उनके ऊपर प्रहार करने लगे॥ ५१॥ |
| चक्रुर्देवास्ततस्तस्य विष्णोः साहाय्यमव्ययाः।।<br>द्विजेनैकेन योद्धुं हि प्रवृत्तस्य महाबलाः॥ ५२ | महान् बलशाली शाश्वत देवता लोग भी उस एकमात्र ब्राह्मणसे युद्ध करनेमें प्रवृत्त उन विष्णुकी सहायता करनेमें तत्पर हो गये॥ ५२॥ |
अध्याय ३६ ] राजा क्षुपद्वारा विष्णुकी आराधना, विष्णुद्वारा शिवभक्तोंकी महिमाका कथन १६३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुशमुष्टिं तदादाय दधीचः संस्मरन् भवम्।<br>ससर्ज सर्वदेवेभ्यो वज्रास्थिः सर्वतो वशी॥ ५३ | तब वज्रतुल्य हड्डियोंवाले इन्द्रियजित् दधीचने एक मुट्ठी कुश लेकर भगवान् शिवका स्मरण करते हुए सभी देवताओंके ऊपर फेंक दिया॥ ५३॥ |
| दिव्यं त्रिशूलमभवत्कालाग्निसदृशप्रभम्।<br>दग्धुं देवान् मतिं चक्रे युगान्ताग्निरिवापरः॥ ५४ | वह कुश कालाग्निके तेजके समान दिव्य त्रिशूल बन गया। उस समय दूसरी प्रलयाग्निके तुल्य प्रतीत होनेवाले दधीचने सभी देवताओंको भस्म कर देनेका निश्चय कर लिया॥ ५४॥ |
| इन्द्रनारायणाद्यैश्च देवैस्त्यक्तानि यानि तु।<br>आयुधानि समस्तानि प्रणेमुस्त्रिशिखं मुने॥ ५५ | हे मुने! इन्द्र तथा विष्णु आदि देवताओंने जो-जो अस्त्र दधीचके ऊपर छोड़े थे, वे सब उस त्रिशूलको प्रणाम करने लगे॥ ५५॥ |
| देवाश्च दुद्रुवुः सर्वे ध्वस्तवीर्या द्विजोत्तम।<br>ससर्ज भगवान् विष्णुः स्वदेहात्पुरुषोत्तमः॥ ५६<br><br>आत्मनः सदृशान् दिव्यान् लक्षलक्षायुतान् गणान्।<br>तानि सर्वाणि सहसा ददाह मुनिसत्तमः॥ ५७ | हे द्विजश्रेष्ठ! यह देखकर सभी देवता पराक्रमशून्य हो गये तथा व्याकुल होकर पलायन करने लगे। तब पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने अपने शरीरसे अपने ही तुल्य करोड़ों दिव्य गण उत्पन्न किये। मुनिवर दधीचने क्षण-भरमें उन सभीको भस्मसात् कर दिया॥ ५६-५७॥ |
| ततो विस्मयनार्थाय विश्वमूर्तिरभूद्धरिः।<br>तस्य देहे हरेः साक्षादपश्यद् द्विजसत्तमः॥ ५८<br><br>दधीचो भगवान् विप्रः देवतानां गणान् पृथक्।<br>रुद्राणां कोटयश्चैव गणानां कोटयस्तदा॥ ५९ | तदनन्तर दधीचको विस्मित करनेके निमित्त भगवान् विष्णुने विश्वरूप धारण किया। विप्रेन्द्र दधीचने उन विष्णुके शरीरमें साक्षात् देवताओंके पृथक्-पृथक् गणोंको देखा। उस समय विश्वमूर्ति विष्णुके शरीरमें करोड़ों रुद्र, करोड़ों रुद्रगण तथा करोड़ों ब्रह्माण्ड विद्यमान थे॥ ५८-५९१/२॥ |
| अण्डानां कोटयश्चैव विश्वमूर्तेस्तनौ तदा।<br>दृष्टैतदखिलं तत्र च्यावनिर्विस्मितं तदा॥ ६०<br><br>विष्णुमाह जगन्नाथं जगन्मयमजं विभुम्।<br>अम्भसाभ्युक्ष्य तं विष्णुं विश्वरूपं महामुनिः॥ ६१ | तब च्यवन-पुत्र महामुनि दधीच वह सब कुछ देखकर विस्मित हो गये और वे विश्वरूप धारण किये हुए उन जगत्पति, लोकव्याप्त, ऐश्वर्यसम्पन्न विष्णुके ऊपर जलका छींटा मारकर उनसे कहने लगे—॥ ६०-६१॥ |
| मायां त्यज महाबाहो प्रतिभासा विचारतः।<br>विज्ञानानां सहस्राणि दुर्विज्ञेयानि माधव॥ ६२ | हे महाबाहो! मायाका परित्याग कीजिये। हे माधव! पदार्थोंकी भ्रमात्मक सत्तापर विचार करनेसे प्रतीत होता है कि इस मायाके हजारों प्रकारके दुर्विज्ञेय क्रिया-कलाप हुआ करते हैं॥ ६२॥ |
| मयि पश्य जगत्सर्वं त्वया सार्धमनिन्दित।<br>ब्रह्माणं च तथा रुद्रं दिव्यां दृष्टिं ददामि ते॥ ६३ | हे अनिन्द्य! अब आप अपने सहित ब्रह्मा, रुद्र तथा सम्पूर्ण जगत्को मुझमें देखिये। इसके लिये मैं आपको दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूँ॥ ६३॥ |
| इत्युक्त्वा दर्शयामास स्वतनौ निखिलं मुनिः।<br>तं प्राह च हरिं देवं सर्वदेवभवोद्भवम्॥ ६४ | ऐसा कहकर मुनि दधीचने अपने शरीरमें उन्हें सम्पूर्ण जगत् दिखा दिया और फिर सभी देवताओं तथा विश्वके रचयिता भगवान् विष्णुसे उन्होंने कहा॥ ६४॥ |
| १६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मायया ह्यनया किं वा मन्त्रशक्त्याथ वा प्रभो।<br>वस्तुशक्त्याथ वा विष्णो ध्यानशक्त्याथ वा पुनः॥ ६५<br><br>त्यक्त्वा मायामिमां तस्माद्योद्धुमर्हसि यत्नतः। | हे प्रभो! हे विष्णो! इस मायासे अथवा मन्त्रशक्तिसे अथवा पदार्थशक्तिसे अथवा ध्यानशक्तिसे क्या लाभ? अतएव इस मायाको छोड़कर आप मेरे साथ यत्नपूर्वक युद्ध कीजिये॥ ६५ १/२॥ |
| एवं तस्य वचः श्रुत्वा दृष्ट्वा माहात्म्यमद्भुतम्॥ ६६<br><br>देवाश्च दुद्रुवुर्भूयो देवं नारायणं च तम्।<br>वारयामास निश्चेष्टं पद्मयोनिर्जगद्गुरुः॥ ६७ | उन दधीचका यह वचन सुनकर तथा उनका अद्भुत प्रभाव देखकर देवगण व्याकुल होकर पुनः भागने लगे। तदनन्तर जगद्गुरु ब्रह्माजीने उन निश्चेष्ट भगवान् विष्णुको युद्ध करनेसे रोका॥ ६६-६७॥ |
| निशम्य वचनं तस्य ब्रह्मणस्तेन निर्जितः।<br>जगाम भगवान् विष्णुः प्रणिपत्य महामुनिम्॥ ६८ | इसके बाद उन ब्रह्माजीका वचन सुनकर दधीचसे पराजित हुए भगवान् विष्णु उन महामुनिको प्रणाम करके अपने लोकको चले गये॥ ६८॥ |
| क्षुपो दुःखातुरो भूत्वा सम्पूज्य च मुनीश्वरम्।<br>दधीचमभिवन्द्याशु प्रार्थयामास विह्वलः॥ ६९ | इधर अत्यन्त दुःखित तथा व्याकुलचित्त राजा क्षुप मुनीश्वर दधीचकी विधिवत् पूजा करके उन्हें बार-बार प्रणाम करते हुए उनसे प्रार्थना करने लगे॥ ६९॥ |
| दधीच क्षम्यतां देव मयाज्ञानात्कृतं सखे।<br>विष्णुना हि सुरैर्वापि रुद्रभक्तस्य किं तव॥ ७० | हे दधीच! हे देव! मेरे द्वारा अज्ञानवश किये गये अपराधको आप क्षमा करें। हे सखे! आप-सदृश रुद्रभक्तका विष्णु तथा अन्य देवता भला क्या कर सकते हैं?॥ ७०॥ |
| प्रसीद परमेशाने दुर्लभा दुर्जनैर्द्विज।<br>भक्तिर्भक्तिमतां श्रेष्ठ मद्विधैः क्षत्रियाधमैः॥ ७१ | हे द्विज! आप प्रसन्न हो जाइये। हे भक्तोंमें श्रेष्ठ! मुझ-सदृश दुर्जन तथा अधम क्षत्रियोंके लिये परमेश्वर महादेवकी भक्ति अत्यन्त दुर्लभ है॥ ७१॥ |
| श्रुत्वानुगृह्य तं विप्रो दधीचस्तपतां वरः।<br>राजानं मुनिशार्दूलः शशाप च सुरोत्तमान्॥ ७२<br><br>रुद्रकोपाग्निना देवाः सदेवेन्द्रा मुनीश्वरैः।<br>ध्वस्ता भवन्तु देवेन विष्णुना च समन्विताः॥ ७३<br><br>प्रजापतेर्मखे पुण्ये दक्षस्य सुमहात्मनः। | तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मुनीश्वर दधीचने राजा क्षुपकी वाणी सुनकर उसके ऊपर अनुग्रह कर दिया तथा श्रेष्ठ देवताओंको शाप दे दिया कि विष्णुदेव, इन्द्र एवं मुनीश्वरोंसहित सभी देवता महान् आत्मावाले दक्षप्रजापतिके पवित्र यज्ञमें रुद्रकी कोपाग्निमें दग्ध हो जायँ॥ ७२-७३ १/२॥ |
| एवं शप्त्वा क्षुपं प्रेक्ष्य पुनराह द्विजोत्तमः॥ ७४<br><br>देवैश्च पूज्या राजेन्द्र नृपैश्च विविधैर्गणैः।<br>ब्राह्मणा एव राजेन्द्र बलिनः प्रभविष्णवः॥ ७५ | इस प्रकार देवताओंको शाप देकर द्विजश्रेष्ठ दधीचने क्षुपकी ओर देखते हुए कहा—हे राजेन्द्र! ब्राह्मण सभी देवताओं, राजाओं तथा विविध गणोंके पूज्य हैं। अतः हे नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मण ही सबसे अधिक बलशाली एवं परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न होते हैं॥ ७४-७५॥ |
| इत्युक्त्वा स्वोटजं विप्रः प्रविवेश महाद्युतिः।<br>दधीचमभिवन्द्यैव जगाम स्वं नृपः क्षयम्॥ ७६ | ऐसा कहकर महातेजस्वी मुनि दधीच अपनी कुटीमें चले गये तथा राजा क्षुप दधीचको प्रणामकर अपने घरको प्रस्थित हुए॥ ७६॥ |
३७- नन्दीके जन्मका वृत्तान्त, ब्रह्मा तथा विष्णुका परस्पर संवाद और शिवद्वारा दोनोंपर अनुग्रह करना
| अध्याय ३७] | नन्दीके जन्मका वृत्तान्त... शिवद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुपर अनुग्रह करना | १६५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तदेव तीर्थमभवत्स्थानेश्वरमिति स्मृतम्।<br>स्थानेश्वरमनुप्राप्य शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ७७ | वह युद्धस्थान एक तीर्थ बन गया, जो स्थानेश्वर नामसे जाना जाता है। स्थानेश्वर तीर्थका सेवन करनेसे मनुष्य शिव-सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ७७ ॥ |
| कथितस्तव सङ्क्षेपाद्विवादः क्षुब्दधीचयोः।<br>प्रभावश्च दधीचस्य भवस्य च महामुने॥ ७८ | [नन्दीश्वर बोले—] हे महामुने सनत्कुमार ! यह मैंने आपसे संक्षेपमें क्षुप-दधीचके विवाद और दधीच तथा भगवान् शिवके प्रभावका वर्णन किया है ॥ ७८ ॥ |
| य इदं कीर्तयेद्दिव्यं विवादं क्षुब्दधीचयोः।<br>जित्वापमृत्युं देहान्ते ब्रह्मलोकं प्रयाति सः॥ ७९ | जो मनुष्य क्षुप तथा दधीचके इस दिव्य विवादका पठन करता है, वह अपमृत्युको जीतकर देहका अन्त होनेके अनन्तर ब्रह्मलोकको प्रस्थान करता है ॥ ७९ ॥ |
| य इदं कीर्त्य सङ्ग्रामं प्रविशेत्तस्य सर्वदा।<br>नास्ति मृत्युभयं चैव विजयी च भविष्यति ॥ ८० | जो कोई भी इसका पाठ करके युद्ध-स्थलमें प्रवेश करता है, उसे मृत्युसे किसी प्रकारका भय नहीं रहता है और वह संग्राममें सदा विजेता सिद्ध होता है ॥ ८० ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे क्षुपदधीचसंवादो नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'क्षुप-दधीच-संवाद' नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥
सैंतीसवाँ अध्याय
नन्दीके जन्मका वृत्तान्त, ब्रह्मा तथा विष्णुका परस्पर संवाद और शिवद्वारा दोनोंपर अनुग्रह करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>भवान् कथमनुप्राप्तो महादेवमुमापतिम्।<br>श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं वक्तुमर्हसि मे प्रभो॥ १ | सनत्कुमार बोले— [हे नन्दीश्वर !] आपको पार्वतीपति महादेवका सान्निध्य कैसे प्राप्त हुआ? हे प्रभो! मैं इससे सम्बन्धित सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ; आप उसे बतायें ॥ १ ॥ |
| शैलादिरुवाच<br>प्रजाकामः शिलादोऽभूत्पिता मम महामुने।<br>सोऽप्यन्धः सुचिरं कालं तपस्तेपे सुदुश्चरम्॥ २ | नन्दी कहते हैं— हे महामुने ! मेरे पिता शिलादको एक बार संतानकी कामना उत्पन्न हुई और उन्होंने अन्धे होनेपर भी दीर्घकालतक कठोर तपस्या की ॥ २ ॥ |
| तपतस्तस्य तपसा सन्तुष्टो वज्रधृक् प्रभुः।<br>शिलादमाह तुष्टोऽस्मि वरयस्व वरानिति ॥ ३ | तपस्यामें रत उन मेरे पिताके तपसे प्रसन्न होकर वज्रधारी इन्द्रने शिलादसे कहा—मैं तुमपर अति प्रसन्न हूँ; अतएव वर माँगो ॥ ३ ॥ |
| ततः प्रणम्य देवेशं सहस्राक्षं सहामरैः।<br>प्रोवाच मुनिशार्दूल कृताञ्जलिपुटो हरिम्॥ ४ | तब देवताओंसमेत सहस्रनेत्र देवेन्द्रको प्रणाम करके मुनिश्रेष्ठ शिलादने दोनों हाथ जोड़कर उनसे कहा ॥ ४ ॥ |
| शिलाद उवाच<br>भगवन् देवतारिघ्न सहस्राक्ष वरप्रद।<br>अयोनिजं मृत्युहीनं पुत्रमिच्छामि सुव्रत॥ ५ | शिलाद बोले— हे भगवन् ! हे असुर-दलन ! हे सहस्रनयन ! हे वरप्रद ! हे सुव्रत ! मैं अयोनिज तथा अमर पुत्र चाहता हूँ ॥ ५ ॥ |
| शक्र उवाच<br>पुत्रं दास्यामि विप्रर्षे योनिजं मृत्युसंयुतम्।<br>अन्यथा ते न दास्यामि मृत्युहीना न सन्ति वै॥ ६ | इन्द्र बोले— हे विप्रवर ! मैं तुम्हें योनिज तथा मरणधर्मा पुत्रका वर दे सकता हूँ; क्योंकि मरणहीन तो |
| १६६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न दास्यति सुतं तेऽत्र मृत्युहीनमयोनिजम्।<br>पितामहोऽपि भगवान् किमुतान्ये महामुने॥ ७ | कोई भी नहीं है॥ ६॥<br>हे महामुने! अयोनिज तथा मृत्युसे हीन पुत्र तो तुम्हें भगवान् ब्रह्मा भी नहीं दे सकते; अन्य लोगोंकी तो बात ही क्या?॥ ७॥ |
| सोऽपि देवः स्वयं ब्रह्मा मृत्युहीनो न चेश्वरः।<br>योनिजश्च महातेजाश्चाण्डजः पद्मसम्भवः॥ ८<br><br>महेश्वराङ्गजश्चैव भवान्यास्तनयः प्रभुः।<br>तस्याप्यायुः समाख्यातं परार्धद्वयसम्मितम्॥ ९<br><br>कोटिकोटिसहस्राणि अहर्भूतानि यानि वै।<br>समतीतानि कल्पानां तावच्छेषाः परत्र ये॥ १० | साक्षात् वे परमेश्वर ब्रह्मदेव भी मृत्युहीन नहीं हैं। महान् तेजस्वी ब्रह्मा भी योनिज है; क्योंकि उनकी भी उत्पत्ति अण्ड तथा कमलसे हुई है। वे प्रभु ब्रह्मा महेश्वर एवं भवानीके पुत्र हैं। उनकी भी आयु दो परार्धके बराबर कही गयी है। प्रथम परार्धमें हजारों करोड़ कल्प भी ब्रह्माके दिनके रूपमें व्यतीत हो चुके हैं और द्वितीय परार्धमें उतने ही कल्प शेष हैं॥ ८-१०॥ |
| तस्मादयोनिजे पुत्रे मृत्युहीने प्रयत्नतः।<br>परित्यजाशां विप्रेन्द्र गृहाणात्मसमं सुतम्॥ ११ | अतएव हे विप्रेन्द्र! अयोनिज तथा मृत्युहीन पुत्रकी आशा प्रयत्नपूर्वक छोड़ दीजिये और अपने तुल्य पुत्र ग्रहण कीजिये॥ ११॥ |
| शैलादिरुवाच<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पिता मे लोकविश्रुतः।<br>शिलाद इति पुण्यात्मा पुनः प्राह शचीपतिम्॥ १२ | नन्दीश्वर बोले—उनका वह वचन सुनकर शिलाद नामसे लोक-विख्यात मेरे पुण्यात्मा पिताने शचीपति इन्द्रसे पुनः कहा॥ १२॥ |
| शिलाद उवाच<br>भगवन्नण्डयोनित्वं पद्मयोनित्वमेव च।<br>महेश्वराङ्गयोनित्वं श्रुतं वै ब्रह्मणो मया॥ १३<br><br>पुरा महेन्द्र दायादाद् गदतश्चास्य पूर्वजात्।<br>नारदाद्वै महाबाहो कथमत्राशु नो वद॥ १४<br><br>दाक्षायणी सा दक्षोऽपि देवः पद्मोद्भवत्मजः।<br>पौत्री कनकगर्भस्य कथं तस्याः सुतो विभुः॥ १५ | शिलाद बोले—हे भगवन्! हे महेन्द्र! मैंने पूर्वकालमें इन ब्रह्माके पूर्वोत्पन्न नारद नामक पुत्रद्वारा ऐसा कहते हुए सुन रखा है कि ये ब्रह्मा अण्ड, कमल और शिवजीके अंगसे उत्पन्न हैं; तो हे महाबाहो! मुझे आप शीघ्र बताइये कि ऐसा कैसे है? दक्षप्रजापति तो पद्मयोनि ब्रह्माजीके पुत्र हैं। इस प्रकार दक्षकी पुत्री हिरण्यगर्भ ब्रह्माकी पौत्री हुई; तो फिर वे प्रभु ब्रह्मा उन दाक्षायणीके पुत्र कैसे हुए?॥ १३-१५॥ |
| शक्र उवाच<br>स्थाने संशयितुं विप्र तव वक्ष्यामि कारणम्।<br>कल्पे तत्पुरुषे वृत्तं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ १६<br><br>ससर्ज सकलं ध्यात्वा ब्रह्माणं परमेश्वरः।<br>जनार्दनो जगन्नाथः कल्पे वै मेघवाहने॥ १७<br><br>दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु मेघो भूत्वावहद्धरम्।<br>नारायणो महादेवं बहुमानेन सादरम्॥ १८ | इन्द्र बोले—हे विप्र! इस स्थितिमें आपका संदेह करना युक्तिपूर्ण है; किंतु मैं आपको इसका कारण बता रहा हूँ। तत्पुरुष नामक कल्पमें परमेष्ठी शिवकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई और उन परमेश्वरने ध्यान करके कलायुक्त ब्रह्माजीको उत्पन्न किया। जनार्दन जगत्पति नारायण विष्णुभगवान् मेघवाहन कल्पमें हजार दिव्य वर्षोंतक मेघ बनकर अत्यन्त सम्मान तथा आदरके साथ महादेव शिवके वाहन बने रहे॥ १६-१८॥ |
| दृष्ट्वा भावं महादेवो हरेः स्वात्मनि शङ्करः।<br>प्रददौ तस्य सकलं स्रष्टुं वै ब्रह्मणा सह॥ १९ | महादेव शिवने अपनेमें भगवान् विष्णुकी भक्ति देखकर उन्हें ब्रह्माजीसहित सम्पूर्ण जगत् रचनेकी आज्ञा दी॥ १९॥ |
| अध्याय ३७ ] | नन्दीके जन्मका वृत्तान्त···शिवद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुपर अनुग्रह करना | १६७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तदा तं कल्पमाहुर्वै मेघवाहनसंज्ञया।<br>हिरण्यगर्भस्तं दृष्ट्वा तस्य देहोद्भवस्तदा॥ २०<br>जनार्दनसुतः प्राह तपसा प्राप्य शङ्करम्।<br>तव वामाङ्गजो विष्णुर्र्दक्षिणाङ्गभवो ह्यहम्॥ २१ | तभीसे उस कल्पको 'मेघवाहन' नामसे कहा जाता है। उन विष्णुको देखकर उन्हींके देहसे उत्पन्न जनार्दनपुत्र हिरण्यगर्भ ब्रह्माने अपनी तपस्यासे शंकरजीको प्राप्तकर उनसे कहा- ॥ २०^{१}/_२ ॥<br>विष्णु आपके वाम अंगसे उत्पन्न हैं तथा मैं आपके दायें अंगसे उत्पन्न हूँ; फिर भी उन विष्णुने मेरे साथ सम्पूर्ण जगत्की रचना की॥ २१^{१}/_२ ॥ |
| मया सह जगत्सर्वं तथाप्यसृजदच्युतः।<br>जगन्मयोऽवहद्यस्मान्मेघो भूत्वा दिवानिशम्॥ २२<br>भवन्तमवहद्विष्णुर्देवदेवं जगद्गुरुम्।<br>नारायणादपि विभो भक्तोऽहं तव शङ्कर॥ २३<br>प्रसीद देहि मे सर्वं सर्वात्मत्वं तव प्रभो।<br>तदाथ लब्ध्वा भगवान् भवात्सर्वात्मतां क्षणात्॥ २४ | यद्यपि जगन्मय विष्णुने मेघ बनकर आप देवदेव जगद्गुरु महेश्वरका दिन-रात वहन किया है; फिर भी हे विभो! हे शंकर! मैं उन नारायणसे भी बढ़कर आपका भक्त हूँ। अतएव हे प्रभो! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये और मुझे अपना सर्वात्मत्व प्रदान कीजिये॥ २२-२३^{१}/_२ ॥<br>तत्पश्चात् महादेवजीसे सर्वात्मत्वकी प्राप्ति करके ब्रह्माजीने शीघ्रतापूर्वक क्षीरसागर पहुँचकर वहाँ एकार्णवमें पुरुषोत्तम विष्णुको भीषण अन्धकारमें मानसनिर्मित, स्वर्णरत्न-खचित, दुर्जनोंद्वारा दुष्प्राप्य तथा सनक आदि पुण्यात्माओंद्वारा अगोचर शुभ्र एवं दिव्य भवनमें देखा॥ २४-२६॥ |
| त्वरमाणोऽथ सङ्गम्य ददर्श पुरुषोत्तमम्।<br>एकार्णवालये शुभ्रे त्वन्धकारे सुदारुणे॥ २५<br>हेमरत्नचिते दिव्ये मनसा च विनिर्मिते।<br>दुष्प्राप्ये दुर्जनैः पुण्यैः सनकाद्यैरगोचरे॥ २६<br>जगदावासहृदयं ददर्श पुरुषं त्वजः।<br>अनन्तभोगशय्यायां शायिनं पङ्कजेक्षणम्॥ २७ | |
| शङ्खचक्रगदापद्मं धारयन्तं चतुर्भुजम्।<br>सर्वाभरणसंयुक्तं शशिमण्डलसन्निभम्॥ २८<br>श्रीवत्सलक्षणं देवं प्रसन्नास्यं जनार्दनम्।<br>रमामृदुकराम्भोजस्पर्शरक्तपदाम्बुजम् ॥ २९<br>परमात्मानमीशानं तमसा कालरूपिणम्।<br>रजसा सर्वलोकानां सर्गलीलाप्रवर्तकम्॥ ३०<br>सत्त्वेन सर्वभूतानां स्थापकं परमेश्वरम्।<br>सर्वात्मानं महात्मानं परमात्मानमीश्वरम्॥ ३१<br>क्षीरार्णवेऽमृतमये शायिनं योगनिद्रया।<br>तं दृष्ट्वा प्राह वै ब्रह्मा भगवन्तं जनार्दनम्॥ ३२ | ब्रह्माजीने जगत्को अपने हृदयमें धारण करनेवाले, चारों भुजाओंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करनेवाले, सभी आभूषणोंसे युक्त, चन्द्र-मण्डलतुल्य आभावाले, अपने वक्षःस्थलपर 'श्री' चिह्न धारण करनेवाले, तमोगुणसे युक्त होनेपर कालरूप, रजोगुणसे युक्त होनेपर सभी लोकोंकी सृजन-लीलाके प्रवर्तक, सत्त्वगुणसे युक्त होनेपर सभी प्राणियोंके स्थापक, कमलनयन, प्रसन्नमुख, जनार्दन, परमपुरुष, परमात्मा, ईशान, सर्वात्मा, महात्मा, देवरूप ईश्वर विष्णुको उस अमृतमय क्षीरसागरमें अनन्त शेषनागकी शय्यापर योगनिद्रामें सोये हुए देखा; उस समय उनके रक्त-कमल-सदृश चरणोंको लक्ष्मीजी अपने अरविन्द-तुल्य कोमल हाथोंसे दबा रही थीं॥ २७-३१^{१}/_२ ॥ |
| ग्रसामि त्वां प्रसादेन यथापूर्वं भवानहम्।<br>स्मयमानस्तु भगवान् प्रतिबुध्य पितामहम्॥ ३३ | भगवान् जनार्दनको देखकर ब्रह्माजीने उनसे कहा कि जिस प्रकार पहले आपने मुझे ग्रस लिया था, उसी प्रकार शिवजीकी कृपासे अब मैं आपको ग्रसूँगा॥ ३२^{१}/_२ ॥ |
| उदैक्षत महाबाहुः स्मितमीषच्चकार सः।<br>विवेश चाण्डजं तं तु ग्रस्तस्तेन महात्मना॥ ३४ | भगवान् विष्णुने उठकर विस्मयपूर्ण भावसे ऊपर दृष्टि करके ब्रह्माजीको देखा और उन महाबाहुने थोड़ा |
३८- विष्णुद्वारा महेश्वरके माहात्म्यका कथन तथा नारायण-द्वारा सृष्टिका वर्णन
| १६८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| ततस्तं चासृजद् ब्रह्मा भ्रुवोर्मध्येन चाच्युतम्।<br>सृष्टस्तेन हरिः प्रेक्ष्य स्थितस्तस्त्याथ सन्निधौ ॥ ३५ | हँसकर ब्रह्माजीके भीतर प्रवेश किया। उन महात्मा ब्रह्माने भी उन्हें ग्रस लिया॥ ३३-३४॥<br>तत्पश्चात् ब्रह्माजीने अपने भ्रूमध्यसे उन विष्णुजीको पुनः उत्पन्न कर दिया और इस प्रकार उनके द्वारा सृजित होकर भगवान् विष्णु उन्हें देखकर उनके पास खड़े हो गये॥ ३५॥ | | एतस्मिन्नन्तरे रुद्रः सर्वदेवभवोद्भवः।<br>विकृतं रूपमास्थाय पुरा दत्तवरस्तयोः॥ ३६<br>आगच्छद्यत्र वै विष्णुर्विश्वात्मा परमेश्वरः।<br>प्रसादममुलं कर्तुं ब्रह्मणश्च हरेः प्रभुः॥ ३७ | इसी बीच पूर्वकालमें उन दोनों [ब्रह्मा, विष्णु]-को वर देनेवाले सभी देवताओं तथा जगत्की उत्पत्ति करनेवाले विश्वात्मा प्रभु परमेश्वर शिव विकृत रूप धारण करके ब्रह्मा एवं विष्णुपर महान् अनुग्रह करनेके लिये जहाँ विष्णुजी थे, वहींपर आ गये॥ ३६-३७॥ | | ततः समेत्य तौ देवौ सर्वदेवभवोद्भवम्।<br>अपश्यतां भवं देवं कालाग्निसदृशं प्रभुम्॥ ३८ | इसके बाद उन दोनों देवोंने शिवजीके पास पहुँचकर कालाग्नितुल्य उन सभी देवताओं तथा जगत्की उत्पत्ति करनेवाले महादेवका दर्शन किया॥ ३८॥ | | तौ तं तुष्टुवतुश्चैव शर्वमुग्रं कपर्दिनम्।<br>प्रणेमतुश्च वरदं बहुमानेन दूरतः॥ ३९ | उन दोनों (ब्रह्मा, विष्णु)-ने दूरसे ही सम्मानपूर्वक उन शर्व (भक्तोंके पापोंका नाश करनेवाले), कपर्दी (जटाजूटधारी), उग्र तथा वर देनेवाले शिवजीको प्रणाम किया और पुनः वे उनकी स्तुति करने लगे॥ ३९॥ | | भवोऽपि भगवान् देवमनुगृह्य पितामहम्।<br>जनार्दनं जगन्नाथस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ४० | जगत्के स्वामी भगवान् शिव पितामह ब्रह्मदेव तथा जनार्दन विष्णुपर अनुग्रह करके वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ ४०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ब्रह्मणो वरप्रदानं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ब्रह्माको वरप्रदान' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३७॥
अड़तीसवाँ अध्याय
विष्णुद्वारा महेश्वरके माहात्म्यका कथन तथा नारायणद्वारा सृष्टिका वर्णन
| शैलादिरुवाच<br>गते महेश्वरे देवे तमुद्दिश्य जनार्दनः।<br>प्रणम्य भगवान् प्राह पद्मयोनिमजोद्भवः॥ १ | **नन्दीश्वर बोले—**तदनन्तर महेश्वर महादेवके चले जानेपर ब्रह्माजीसे उत्पन्न भगवान् विष्णु पद्मयोनि पितामहको उद्देश्य करके प्रणामकर उनसे कहने लगे॥ १॥ | | श्रीविष्णुरुवाच<br>परमेशो जगन्नाथः शङ्करस्त्वेष सर्वगः।<br>आवयोरखिलस्येशः शरणं च महेश्वरः॥ २ | **श्रीविष्णु बोले—**सर्वत्र गमनका सामर्थ्य रखनेवाले ये परमेश्वर ईश्वर जगन्नाथ महेश्वर शिव सम्पूर्ण जगत्के तथा हमदोनोंके शरण हैं॥ २॥ | | अहं वामाङ्गजो ब्रह्मन् शङ्करस्य महात्मनः।<br>भवान् भवस्य देवस्य दक्षिणाङ्गभवः स्वयम्॥ ३<br>मामाहुर्ऋषयः प्रेक्ष्य प्रधानं प्रकृतिं तथा।<br>अव्यक्तमजममित्येवं भवन्तं पुरुषस्त्विति॥ ४ | हे ब्रह्मन्! मैं महात्मा शिवके वाम अंगसे जायमान हूँ तथा स्वयं आप महादेव रुद्रके दाहिने अंगसे उत्पन्न हुए हैं। अतएव इस विषयमें सम्यक् विचारकर ऋषियोंने मुझे प्रधान तथा प्रकृति एवं आपको अव्यक्त, अज तथा पुरुष कहा है॥ ३-४॥ |
अध्याय ३८ ] विष्णुद्वारा महेश्वरके माहात्म्यका कथन तथा नारायणद्वारा सृष्टिका वर्णन १६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवमाहुर्महादेवमावयोरपि कारणम्।<br>ईशं सर्वस्य जगतः प्रभुमव्ययमीश्वरम्॥ ५ | इस प्रकार अविनाशी ईश्वर महादेवको हम दोनोंका भी कारण तथा सम्पूर्ण जगत्का स्वामी कहा गया है॥ ५॥ |
| सोऽपि तस्यामरेशस्य वचनाद्वारिजोद्भवः।<br>वरेण्यं वरदं रुद्रमस्तुवत्प्रणनाम च॥ ६ | उन देवेश विष्णुका वचन सुनकर उन पद्मयोनि ब्रह्माने भी वर प्रदान करनेवाले पूज्य महादेवको बार-बार प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की॥ ६॥ |
| अथाम्भसा प्लुतां भूमिं समादाय जनार्दनः।<br>पूर्ववत्स्थापयामास वाराहं रूपमास्थितः॥ ७ | इसके अनन्तर वाराहरूप धारणकर जनार्दन विष्णुने जलसे व्याप्त भूमिको लाकर पुनः पूर्वकी भाँति स्थापित किया॥ ७॥ |
| नदीनदसमुद्रांश्च पूर्ववच्चाकरोत्प्रभुः।<br>कृत्वा चोर्वीं प्रयत्नेन निम्नोन्नतविवर्जिताम्॥ ८<br>धरायां सोऽचिनोत्सर्वान् भूधरान् भूधराकृतिः।<br>भूराद्यांश्चतुरो लोकान् कल्पयामास पूर्ववत्॥ ९ | तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने नदियों, नदों तथा समुद्रोंको पहलेकी भाँति कर दिया। पुनः पृथ्वीको ऊँचाई एवं निचाईसे रहितकर भूधरकी आकृतिवाले उन भगवान्ने उस समतल धरापर समस्त पर्वत स्थापित किये, भूलोक आदि चार लोक पूर्वकी भाँति रचे॥ ८-९॥ |
| स्रष्टुं च भगवान् चक्रे मतिं मतिमतां वरः।<br>मुख्यं च तैर्यग्योन्यं च दैविकं मानुषं तथा॥ १०<br>विभुश्चानुग्रहं तत्र कौमारकमदीनधीः।<br>पुरस्तादसृजद्देवः सनन्दं सनकं तथा॥ ११ | पुनः बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ, प्रखर प्रतिभावाले तथा ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान् विष्णुने मुख्य सर्ग, तिर्यक् सर्ग (पशुसर्ग), देवसर्ग, मनुष्यसर्ग, अनुग्रहसर्ग एवं कौमारसर्ग रचनेका विचार किया॥ १० १/२॥ |
| सनातनं सतां श्रेष्ठं नैष्कर्म्येण गताः परम्।<br>मरीचिभृग्वङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्॥ १२<br>दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजद्योगविद्यया।<br>सङ्कल्पं चैव धर्मं च ह्यधर्मं भगवान् प्रभुः॥ १३<br>द्वादशैव प्रजास्त्वेता ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः। | उन विष्णुने आरम्भमें सनन्द, सनक तथा महात्माओंमें श्रेष्ठ सनातनका सृजन किया, जो निष्काम ज्ञानयोगमें प्रवृत्त होकर ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हुए॥ ११ १/२॥<br>इसके बाद सबके स्वामी भगवान् विष्णुने मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि, वसिष्ठ, संकल्प, धर्म तथा अधर्मको योगविद्यासे रचा। अव्यक्तजन्मा ब्रह्माकी ये ही बारह संतानें हैं॥ १२-१३ १/२॥ |
| ऋभुं सनत्कुमारं च ससर्जादौ सनातनः॥ १४<br>तौ चोर्ध्वरेतसौ दिव्यौ चाग्रजौ ब्रह्मवादिनौ।<br>कुमारौ ब्रह्मणस्तुल्यौ सर्वज्ञौ सर्वभाविनौ॥ १५ | शाश्वत विष्णुने आरम्भमें ऋभु तथा सनत्कुमारका सृजन किया। पूर्वमें उत्पन्न वे दोनों कुमार ऊर्ध्वरेता, दिव्य, ब्रह्मवादी, सर्वज्ञ, सभी प्रकारके भावोंसे सम्पन्न तथा ब्रह्माजीके ही सदृश थे॥ १४-१५॥ |
| एवं मुख्यादिकान् सृष्ट्वा पद्मयोनिः शिलाशन।<br>युगधर्मानशेषांश्च कल्पयामास विश्वसृक्॥ १६ | हे शिलाद! इस प्रकार मुख्य आदि सर्गोंकी सृष्टि करके विश्वकी रचना करनेवाले पद्मयोनि (विष्णु)-ने समस्त युगधर्मोंको प्रतिष्ठित किया॥ १६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वैष्णवकथनं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वैष्णवकथन' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३८॥
३९- सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन, द्वापरमें वेदसंहिताके विभाजनका एवं कल्पभेदसे विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन
| १७० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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उनतालीसवाँ अध्याय
सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन, द्वापरमें वेदसंहिताके विभाजनका एवं कल्पभेदसे विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शैलादिरुवाच<br>श्रुत्वा शक्रेण कथितं पिता मम महामुनिः।<br>पुनः पप्रच्छ देवेशं प्रणम्य रचिताञ्जलिः॥ १ | नन्दीश्वर बोले— [हे सनत्कुमार!] इन्द्रका कथन सुनकर मेरे पिता महामुनि शिलादने दोनों हाथ जोड़कर देवेश इन्द्रको प्रणाम करके उनसे पुनः पूछा॥ १॥ |
| शिलाद उवाच<br>भगवन् शक्र सर्वज्ञ देवदेवनमस्कृत।<br>शचीपते जगन्नाथ सहस्त्राक्ष महेश्वर॥ २<br>युगधर्मान् कथं चक्रे भगवान् पद्मसम्भवः।<br>वक्तुमर्हसि मे सर्वं साम्प्रतं प्रणताय मे॥ ३ | शिलाद बोले— हे भगवन्! हे शक्र! हे सर्वज्ञ! हे सर्वदेवनमस्कृत! हे शचीपते! हे जगन्नाथ! हे सहस्राक्ष! हे महेश्वर! भगवान् पद्मयोनिने युगधर्म किस प्रकार कल्पित किये? आप इस विषयमें सब कुछ मुझ शरणागतको बतानेकी कृपा करें॥ २-३॥ |
| शैलादिरुवाच<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शिलादस्य महात्मनः।<br>व्याजहार यथादृष्टं युगधर्मं सुविस्तरम्॥ ४ | शैलादि बोले— [हे सनत्कुमार!] महात्मा शिलादका वह वचन सुनकर इन्द्रने जैसा देखा था, उन युगधर्मोंका विस्तारसे वर्णन करना प्रारम्भ किया॥ ४॥ |
| शक्र उवाच<br>आद्यं कृतयुगं विद्धि ततस्त्रेतायुगं मुने।<br>द्वापरं तिष्यमित्येते चत्वारस्तु समासतः॥ ५ | इन्द्र बोले— हे मुने! आदिमें सत्ययुग, फिर त्रेतायुग, द्वापर तथा कलियुग—ये ही चार युग होते हैं; ऐसा आप संक्षेपमें जान लीजिये॥ ५॥ |
| सत्त्वं कृतं रजस्त्रेता द्वापरं च रजस्तमः।<br>कलिस्तमश्च विज्ञेयं युगवृत्तिर्युगेषु च॥ ६ | सत्ययुगको सत्त्वगुणरूप, त्रेतायुगको रजोगुणरूप, द्वापरयुगको रज-तमगुणरूप और कलियुगको तमोगुणरूप जानना चाहिये। इस प्रकार विभिन्न युगोंमें अलग-अलग युग-वृत्ति होती है॥ ६॥ |
| ध्यानं परं कृतयुगे त्रेतायां यज्ञ उच्यते।<br>भजनं द्वापरे शुद्धं दानमेव कलौ युगे॥ ७ | सत्ययुगमें ध्यान, त्रेतायुगमें यज्ञ, द्वापरमें भजन तथा कलियुगमें विशुद्ध दानको श्रेष्ठ कहा गया है॥ ७॥ |
| चत्वारि च सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।<br>तस्य तावच्छती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः॥ ८ | वह सत्ययुग चार हजार दिव्य वर्षोंके प्रमाणवाला है। उसकी सन्ध्या चार सौ दिव्य वर्षोंकी होती है तथा उसका सन्ध्यांश भी उसी प्रकार चार सौ दिव्य वर्षोंका होता है॥ ८॥ |
| चत्वारि च सहस्राणि मानुषाणि शिलाशन।<br>आयुः कृतयुगे विद्धि प्रजानामिह सुव्रत॥ ९ | हे शिलाद! हे सुव्रत! इस सत्ययुगमें प्रजाओंकी आयु चार हजार मनुष्य वर्षके बराबर जानिये॥ ९॥ |
| ततः कृतयुगे तस्मिन् सन्ध्यांशे च गते तु वै।<br>पादावशिष्टो भवति युगधर्मस्तु सर्वतः॥ १० | सत्ययुग तथा इसके सन्ध्यांश बीत जानेपर समग्र युग-धर्मका एक चरण घट जाता है। पुनः उत्तम त्रेतायुग प्रवृत्त होता है, जो तीन हजार दिव्य वर्षोंका होता है। |
| चतुर्भागैकहीनं तु त्रेतायुगमनुत्तमम्।<br>कृतार्धं द्वापरं विद्धि तदर्धं तिष्यमुच्यते॥ ११ | सत्ययुगके आधे प्रमाणके बराबर द्वापरको जानिये तथा उसके (द्वापरके) आधेके बराबर कलियुगका प्रमाण |
अध्याय ३९] सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन...विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन [१७१
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| त्रिंशती द्विशती सन्ध्या तथा चैकशती मुने।<br>सन्ध्यांशकं तथाप्येवं कल्पेष्वेवं युगे युगे॥ १२ | कहा जाता है। हे मुने! उसी तरह त्रेतायुगकी सन्ध्या तीन सौ दिव्य वर्ष, द्वापरकी सन्ध्या दो सौ दिव्य वर्ष तथा कलियुगकी सन्ध्या एक सौ दिव्य वर्षकी होती है। सभीका सन्ध्यांश भी सन्ध्याकालके समान ही जानना चाहिये। प्रत्येक कल्पमें आनेवाले युगोंमें यही स्थिति होती है॥ १०-१२॥ |
| आद्ये कृतयुगे धर्मश्चतुष्पादः सनातनः।<br>त्रेतायुगे त्रिपादस्तु द्विपादो द्वापरे स्थितः॥ १३<br><br>त्रिपादहीनस्तिष्ये तु सत्तामात्रेण धिष्ठितः। | सनातन धर्म आरम्भके सत्ययुगमें चार चरणोंवाला, त्रेतामें तीन चरणोंवाला, द्वापरमें दो चरणोंवाला तथा कलियुगमें मात्र एक चरणवाला होकर अधिष्ठित रहता है॥ १३ १/२॥ |
| कृते तु मिथुनोत्पत्तिः वृत्तिः साक्षाद्रसोल्लसा॥ १४<br><br>प्रजास्तृप्ताः सदा सर्वाः सर्वानन्दाश्च भोगिनः।<br>अधमोत्तमता तासां न विशेषाः प्रजाः शुभाः॥ १५ | सत्ययुगमें स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पत्ति होती है तथा उनकी वृत्ति मधुर रसोंसे सम्पन्न होती है। उस युगमें समस्त प्रजाएँ सभी प्रकारके आनन्दों एवं भोगोंसे पूर्ण तृप्त रहती हैं। उनमें अधमता तथा उत्तमताका कोई भेद नहीं रहता है और सभी प्रजाएँ शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न रहती हैं॥ १४-१५॥ |
| तुल्यमायुः सुखं रूपं तासां तस्मिन् कृते युगे।<br>तासां प्रीतिर्न च द्वन्द्वं न द्वेषो नास्ति च क्लमः॥ १६ | उस सत्ययुगमें वे प्रजाएँ समान आयु, सुख तथा रूपवाली होती हैं। उनमें परस्पर द्वेष, द्वन्द्व एवं अवसाद नहीं रहता है, अपितु वे एक-दूसरेसे प्रेम करती हैं॥ १६॥ |
| पर्वतोदधिवासिन्यो ह्यनिकेताश्रयास्तु ताः।<br>विशोकाः सत्त्वबहुला एकान्तबहुलास्तथा॥ १७ | सत्ययुगमें वे प्रजाएँ घरका आश्रय न लेकर पर्वतों तथा समुद्रोंके सान्निध्यमें निवास करती हैं। सभी लोग शोकरहित, पराक्रमसम्पन्न एवं एकान्तप्रिय होते हैं॥ १७॥ |
| ता वै निष्कामचारिण्यो नित्यं मुदितमानसाः।<br>अप्रवृत्तिः कृतयुगे कर्मणोः शुभपापयोः॥ १८<br><br>वर्णाश्रमव्यवस्था च तदासीन्न च सङ्करः। | कृतयुगमें वे प्रजाएँ निष्काम कर्मोंमें प्रवृत्त रहनेवाली तथा सदा प्रसन्न मनवाली होती हैं। वे कर्मोंके पाप और पुण्यकी भावनासे रहित होती हैं। उस समय वर्णाश्रम-व्यवस्था रहती है, किंतु वर्णसंकर दोष विद्यमान नहीं रहता है॥ १८ १/२॥ |
| रसोल्लासः कालयोगात् त्रेताख्ये नश्यते द्विज॥ १९<br><br>तस्यां सिद्धौ प्रनष्टायामन्या सिद्धिः प्रजायते। | हे द्विज! कालयोगसे त्रेतायुगमें रसोंका प्रादुर्भाव समाप्त होने लगता है। उस युगमें सिद्धिके नष्ट हो जानेपर अन्य सिद्धि उत्पन्न होती है॥ १९ १/२॥ |
| अपां सौक्ष्म्ये प्रतिगते तदा मेघात्मना तु वै॥ २०<br><br>मेघेभ्यः स्तनयित्नुभ्यः प्रवृत्तं वृष्टिसर्जनम्।<br>सकृदेव तया वृष्ट्या संयुक्ते पृथिवीतले॥ २१<br><br>प्रादुरासंस्तदा तासां वृक्षास्ते गृहसंज्ञिताः।<br>सर्ववृत्त्युपभोगस्तु तासां तेभ्यः प्रजायते॥ २२ | जलकी अल्पता हो जानेपर भगवान् मेघात्मा गर्जनयुक्त मेघोंके माध्यमसे जल बरसाते हैं और एक बारमें ही उस वृष्टिसे पृथ्वीतलके संयुक्त हो जानेपर वृक्ष उत्पन्न हो जाते हैं; इस प्रकार वे वृक्ष ही प्रजाओंके |