श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
३५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (८) ज्ञानप्राप्तिके अनंतर अपना निजी कर्तव्य कुछ शेष नहीं रहता; और लोकसंग्रह करनेकी कुछ आवश्यकता नहीं। (८) ज्ञानप्राप्ति करनेके अनंतर अपने लिये भलेही कुछ प्राप्त करनेको न रहे; परंतु कर्म नहीं छूटते। इसलिये जो कुछ शास्त्रसे प्राप्त हो, उसे 'मुझे नहीं चाहिये' ऐसी निर्मम बुद्धिसे लोक- संग्रहकी ओर दृष्टि रखकर करते जाओ। लोकसंग्रह किसीसेभी नहीं छूटता। उदाहरणार्थ, भगवान्का चरित देखो। (९) परंतु यदि अपवादस्वरूप कोई अधिकारी पुरुष ज्ञानके पश्चात्भी अपने व्यावहारिक अधिकार जनक आदिके समान जीवनपर्यंत जारी रखे, तो कोई हानि नहीं। (९) गुणविभागरूप चातुर्वर्ण्य- व्यवस्थाके अनुसार छोटे-बड़े अधिकार सभीको जन्मसेही प्राप्त होते हैं; और स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले इन अधि- कारोंको लोकसंग्रहार्थ निःस्वार्थ-बुद्धिसे सभीको निरपवादरूपसे जीवनपर्यंत जारी रखना चाहिये। क्योंकि यह चक्र जगतको धारण करनेके लिये परमेश्वर- नेही बनाया है। (१०) इतना होने परभी कर्म- त्यागरूपी संन्यासही श्रेष्ठ है। अन्य आश्रमोंके कर्म चित्तशुद्धिके साधनमात्र हैं और ज्ञान और कर्मका तो स्वभावसेही विरोध है। इसलिये पूर्व आश्रममें, जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी चित्तशुद्धि करके ज्ञानप्राप्तिके पश्चात् अंतमें कर्मत्यागरूपी संन्यास लेना चाहिये। चित्तशुद्धि जन्मतेही या पूर्व आयुमें हो जावे, तो गृहस्थाश्रमके कर्म करते रहने- कीभी आवश्यकता नहीं है। कर्मका स्वरूपतः त्याग करनाही सच्चा संन्यास- आश्रम है। (१०) यह सच है, कि शास्त्रोक्त रीतिसे सांसारिक कर्म करनेपर चित्त- शुद्धि होती है, परंतु केवल चित्तकी शुद्धिही कर्मका उपयोग नहीं है। जगत्का व्यवहार चलता रखनेके लियेभी कर्मकी आवश्यकता है। इसी प्रकार काम्यकर्म और ज्ञानका विरोध भलेही हो; पर निष्काम कर्म और ज्ञानके बीच बिलकुल विरोध नहीं है। इसलिये चित्तकी शुद्धिके पश्चात्भी फलाशाका त्याग कर निष्काम बुद्धिसे जगतके संग्रहार्थ चातुर्वर्ण्यके सब कर्म आमरण जारी रखनाही सच्चा संन्यास है। कर्मका स्वरूपतः त्याग करना कभीभी उचित नहीं; और शक्यभी नहीं है।
संन्यास और कर्मयोग ३५७ (११) कर्म-संन्यास ले चुकने परभी (११) ज्ञानप्राप्तिके पश्चात् फलाशा- शम-दम आदिक धर्म पालते जाना त्यागरूप संन्यास ले कर शम-दम आदिक चाहिये । धर्मोंके सिवा आत्मौपम्यदृष्टिसे प्राप्त होनेवाले सभी धर्मोंका पालन किया करो; और इस शम अर्थात शांतवृत्ति- सेही शास्त्रसे प्राप्त समस्त कर्म लोकसंग्रहके निमित्त मरणपर्यंत करते जाओ । निष्काम कर्म न छोड़ो । (१२) यह मार्ग अनादि और (१२) यह मार्ग अनादि और श्रुति- श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित है । स्मृति-प्रतिपादित है । (१३) शुक-याज्ञवल्क्य आदि इस (१३) व्यास-वसिष्ठ-जैगीषव्य इ. मार्गसे गये हैं । और जनक-श्रीकृष्ण प्रभृति इस मार्गसे गये हैं । अंतमें मोक्ष ये दोनों मार्ग अथवा निष्ठाएँ ब्रह्मविद्यामूलक हैं और दोनों ओर मनकी निष्काम अवस्था और शांति एकही प्रकारकी है । इस कारण दोनों मार्गोंसे अंतमें एकही मोक्ष प्राप्त हुआ करता है (गीता ५. ५) । ज्ञानके पश्चात् कर्मको छोड़ बैठना और काम्य कर्म छोड़कर नित्य निष्काम कर्म करते रहना, यही इन दोनोंमें मुख्य भेद है । ऊपर बतलाये हुए कर्म छोड़ने और कर्म करनेके दोनों मार्ग ज्ञानमूलक हैं अर्थात् ज्ञानके पश्चात् ज्ञानी पुरुषोंके द्वारा स्वीकृत और आचरित हैं । परंतु कर्म छोड़ना और कर्म करना, दोनों बातें ज्ञान न होने परभी हो सकती हैं । इसलिये इस अज्ञानमूलक कर्मका और कर्मके त्यागकाभी यहाँ थोड़ासा विवेचन करना आवश्यक है । गीताके अठारहवें अध्यायमें त्यागके जो तीन भेद बतलाये गये हैं, उनका रहस्य यही है । ज्ञान न रहने परभी कुछ लोग निरे काय-क्लेश-भयसे कर्म छोड़ दिया करते हैं-इसे गीतामें 'राजस त्याग' कहा है (गीता १८. ८) । इसी प्रकार ज्ञान न रहनेपरभी कुछ लोग कोरी श्रद्धासेही यज्ञ-याग प्रभृति कर्म किया करते हैं । परंतु गीताका कथन है, कि कर्म करनेका यह मार्ग मोक्षप्रद नहीं है-केवल स्वर्गप्रद है (गीता ९. २०) । कई लोगोंकी समझ है, कि आजकल यज्ञ-याग प्रभृति श्रौत धर्मका प्रचार न रहनेके कारण, मीमांसकोंके इस निरे कर्म-मार्गके संबंधमें गीताका सिद्धान्त इन दिनों विशेष उपयोगी नहीं; परंतु वह ठीक नहीं है । क्योंकि श्रौत यज्ञ-
३५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र याग भलेही डूब गये हों; पर स्मार्त-यज्ञ अर्थात् चातुर्वर्ण्यके कर्म अबभी जारीही हैं! इसलिये अज्ञान से, परंतु श्रद्धापूर्वक, यज्ञ-याग आदि काम्य कर्म करनेवाले लोगोंके विषयमें गीताका जो सिद्धान्त है, वह ज्ञानविरहित किंतु श्रद्धासहित चातुर्वर्ण्य आदि कर्म करनेवालोंकोभी वर्तमान स्थितिमें पूर्णतया उपयुक्त है। जगतके व्यवहारकी ओर दृष्टि देनेपर ज्ञात होगा, कि समाजमें इसी प्रकारके लोगोंकी अर्थात् शास्त्रों- पर श्रद्धा रखकर नीतिसे अपने कर्म करनेवालोंकीही विशेष अधिकता रहती है। परंतु उन्हें परमेश्वरका स्वरूप पूर्णतया ज्ञात नहीं रहता, इसलिये गणितशास्त्रकी पूरी उपपत्ति समझे बिनाही केवल मौलिक हिसाब करनेकी रीतिसे गणित करनेवाले लोगोंके समान इन श्रद्धालु और कर्मठ मनुष्योंकी अवस्था हुआ करती है। इसमें कोई संदेह नहीं, कि सभी कर्म शास्त्रोक्त विधिसे और श्रद्धापूर्वक करनेके कारण वे निर्दोष (शुद्ध) हो जाते हैं, एवं इसीसे पुण्यप्रद अर्थात् स्वर्गप्रद हो जाते हैं। परंतु शास्त्रकाही सिद्धान्त है, कि बिना ज्ञानके मोक्ष नहीं मिलता, इसलिये स्वर्ग- प्राप्तिकी अपेक्षा अधिक महत्त्वका कोईभी फल इन कर्मठ लोगोंको मिल नहीं सकता। अतएव स्वर्गसुखसेभी जो परे है, उस अमृतत्व प्राप्ति जिसे कर लेनी हो - और यहो तो एक परम पुरुषार्थ है - उसे उचित है, कि वह पहले साधन समझकर और आगे सिद्धावस्थामें लोकसंग्रहके लिये, अर्थात् जीवनपर्यन्त "समस्त प्राणिमात्रमें एकही आत्मा है" इस ज्ञानयुक्त बुद्धिसे, निष्काम कर्म करनेके मार्गकाही स्वीकार करे। आयु बितानेके सब मार्गोंमेंसे यही मार्ग उत्तम है। गीताका अनुकरण कर ऊपर दिये गये नक्शोंमें इस मार्गको कर्मयोग कहा है और इसेही कुछ लोग कर्म-मार्ग या प्रवृत्ति- मार्गभी कहते हैं। परंतु कर्म-मार्ग या प्रवृत्ति-मार्ग, इन दोनों शब्दोंसे ज्ञानविरहित, किंतु श्रद्धासहित कर्म करनेके स्वर्गप्रद मार्गकाभी सामान्यतः बोध हुआ करता है। इसलिये ज्ञानविरहित, किंतु श्रद्धायुक्त कर्म और ज्ञानयुक्त निष्काम कर्म, इन दोनोंका भेद दिखलानेके लिये दो भिन्न भिन्न शब्दोंकी योजना करनेकी आवश्यकता होती है; और इसी कारणसे मनुस्मृति तथा भागवतमेंभी पहले प्रकारके कर्म अर्थात् ज्ञानविरहित कर्मको 'प्रवृत्त कर्म', और दूसरे प्रकारके अर्थात् ज्ञानयुक्त निष्काम कर्मको 'निवृत्त कर्म' कहा है (मनु. १२. ८९.; भाग. ७. १५. ४७)। परंतु हमारी रायमें ये शब्दभी जितने होने चाहिये, उतने निस्संदिग्ध नहीं हैं! क्योंकि 'निवृत्ति' शब्दका सामान्य अर्थ 'कर्म से परावृत्त होना' है। अतः इस शंकाको दूर करनेके लिये 'निवृत्त' शब्दके आगे 'कर्म' विशेषण जोड़ते हैं, और ऐसा करनेसे 'निवृत्त' विशेषणका अर्थ 'कर्मसे परावृत्त' नहीं होता; और निवृत्त कर्म = निष्काम कर्म, यह अर्थ निष्पन्न हो जाता है। कुछभी हो; जब तक 'निवृत्त' शब्द उसमें है, तब तक कर्मत्यागकी कल्पना मनमें आये बिना नहीं रहती। इसीलिये ज्ञानयुक्त निष्काम कर्म करनेके मार्गको "निवृत्ति या निवृत्त कर्म" न कहकर 'कर्मयोग' नाम देना हमारे मतमें उत्तम है। क्योंकि कर्मके आगे योग शब्द जुड़ा रहनेसे स्वभावतः उसका अर्थ "मोक्षमें
संन्यास और कर्मयोग ३५९ बाधा न देकर कर्म करनेकी युक्ति" होता है; और अज्ञानयुक्त कर्मका तो आपही-से निरसन हो जाता है। फिरभी यह न भूल जाना चाहिये, कि गीताका कर्मयोग ज्ञानमूलक है। और यदि इसेही कर्म-मार्ग या प्रवृत्ति-मार्ग कहना किसीको अभीष्ट जँचता हो, तो ऐसा करनेमें कोई हानि नहीं। स्थल-विशेषमें भाषावैचित्र्यके लिये गीताके कर्मयोगको लक्ष्यकर हमनेभी इन शब्दोंकी योजना की है। अस्तु, इस प्रकार कर्म करने या कर्म छोड़नेके ज्ञानमूलक और अज्ञानमूलक जो भेद हैं, उनमेंसे प्रत्येकके संबंधमें गीताशास्त्रका अभिप्राय इस प्रकार है :-
आयु बितानेका मार्ग | श्रेणी | गति
१. कामोपभोगकोही पुरुषार्थ मान- | अधम | नरक कर अहंकारसे, आसुरी बुद्धिसे, दंभसे | | या लोभसे केवल आत्मसुखके लिये कर्म | | करना (गीता १६. १६) - आसुर | | अथवा राक्षसी मार्ग है। | |
१. प्राणिमात्रमें एकही आत्मा है | मध्यम | स्वर्ग
- इस प्रकार परमेश्वरके स्वरूपका | (मीमांस- | (मीमांसकोंके यथार्थ ज्ञान न होनेपरभी वेदोंकी आज्ञा | कोंके मतमें | मतमें मोक्ष) या शास्त्रोंकी आज्ञाके अनुसार श्रद्धा | उत्तम) | और नीतिसे अपने अपने काम्य कर्म | | करना (गीता २. ४१-४४; ९-२०) - | | केवल कर्म, त्रयी धर्म अथवा मीमांसक | | मार्ग है। | |
१. शास्त्रोक्त निष्काम कर्मोंसे परमे- | उत्तम | मोक्ष श्वरका ज्ञान हो जानेपर अंतमें वैराग्यसे | | समस्त कर्म छोड़ केवल ज्ञानमेंही तृप्त | | हो रहना (गीता ५. २) - केवल ज्ञान, | | सांख्य अथवा स्मार्त मार्ग है। | |
१. पहले चित्तकी शुद्धिके निमित्त, | सर्वोत्तम | मोक्ष और उससे परमेश्वरका ज्ञान प्राप्त हो | | जानेपर; फिर केवल लोकसंग्रहार्थ, | | मरणपर्यंत भगवानके समान निष्काम कर्म | | करते रहना (गीता ५. २) - ज्ञानकर्म- | | समुच्चय, कर्मयोग या भागवत मार्ग है। | |
[मध्य-दाहिनी ओर कोष्ठक-टिप्पणी: पंक्ति १९ से ३९ तक — 'जनक-वर्णित तीन निष्ठाएँ'] [सुदूर-दाहिनी ओर कोष्ठक-टिप्पणी: पंक्ति २८ से ३९ तक — 'गीताकी दो निष्ठाएँ']
३६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सारांश, यही पक्ष गीतामें सर्वोत्तम ठहराया गया है, कि मोक्ष-प्राप्तिके लिये यद्यपि कर्मकी आवश्यकता नहीं है, तथापि उसके साथही साथ दूसरे कारणोंके लिये - अर्थात् एक तो अपरिहार्य समझकर और इसके सिवा जगत्के धारणपोषणके लिये आवश्यक मानकर - निष्काम बुद्धिसे सदैव समस्त कर्मोंको करते रहना चाहिये । अथवा गीताका अंतिम सिद्धान्त है, कि "कृतबुद्धिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवादिनः ।" (मनु. १. ९७), मनुके इस वचनके अनुसार कर्तृत्व और ब्रह्मज्ञानका योग या मेलही सबसे उत्तम है; और निरा कर्तृत्व या कोरा ब्रह्मज्ञान, प्रत्येक एकदेशीय है। वास्तवमें यह प्रकरण यहीं समाप्त हो गया। परंतु यह दिखलानेके लिये - कि गीताका सिद्धान्त श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित है - ऊपर भिन्न भिन्न स्थानोंपर जो वचन उद्धृत किये हैं, उनके संबंधमें कुछ कहना आवश्यक है। क्योंकि उप- निषदोंके सांप्रदायिक भाष्योंसे बहुतेरोंकी यह समझ हो गई है, कि समस्त उप- निषद संन्यास-प्रधान या निवृत्ति-प्रधान हैं। हमारा यह कथन नहीं, कि उपनिषदोंमें संन्यास-मार्ग प्रतिपादित हैही नहीं। बृहदारण्यकोपनिषदमें कहा है - यह अनुभव हो जानेपर, कि परब्रह्मके सिवा और कोई वस्तु सत्य नहीं है, "कुछ ज्ञानी पुरुष पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा की" - चिंता न कर, "हमें संततिसे क्या काम ? संसारही हमारा आत्मा है", यह कहकर आनंदसे भिक्षा माँगते हुए घूमते हैं। (४. ४. २२) । परंतु बृहदारण्यकमें यह नियम कहीं नहीं मिलता, कि समस्त ब्रह्मज्ञानियोंको यही पक्ष स्वीकार करना चाहिये। और क्या कहें ? जिसे यह उपदेश किया गया, उसका इसी उपनिषदमें वर्णन है, कि वह जनक राजा ब्रह्म- ज्ञानके शिखरपर पहुँचकर अमृत हो गया था। परंतु यह कहीं नहीं बतलाया है, कि उसने याज्ञवल्क्यके समान जगत्को छोड़ कर संन्यास ले लिया। इससे स्पष्ट होता है, कि जनकका निष्काम कर्मयोग और याज्ञवल्क्यका कर्मसंन्यास मार्ग - दोनों
- बृहदारण्यकोपनिषदको विकल्प-रूपसे संमत हैं; और वेदान्तसूत्र-कर्तानेभी यही अनुमान किया है (वे. सू. ३. ४. १५)। कठोपनिषद् इससेभी आगे बढ़ गया है। पाँचवें प्रकरणमें हम यह दिखला चुके हैं, कि हमारे मतमें कठोपनिषदमें निष्काम कर्मयोगही प्रतिपाद्य है। छान्दोग्योपनिषदमें (छां. ८. १५. १) यही अर्थ प्रतिपाद्य है और यह स्पष्ट कह दिया है, कि "गुरुसे अध्ययन कर, फिर कुटुंबमें रहकर धर्मसे बर्तनेवाला ज्ञानी पुरुष ब्रह्मलोकको जाता है, वहाँसे फिर नहीं लौटता।" तैत्तिरीय तथा श्वेताश्वतर उपनिषदोंके इसी अर्थके वाक्य ऊपर दिये गये हैं; (तै. १. ९; श्वे. ६. ४)। इसके सिवा यहभी ध्यान देनेयोग्य बात है, कि उपनिषदोंमें जिन्होंने दूसरोंको ब्रह्मज्ञानका उपदेश किया है, उनमें या उनके ब्रह्मज्ञानी शिष्योंमें, याज्ञ- वल्क्यके समान एक-आध पुरुषके अतिरिक्त, कोई ऐसा नहीं मिलता, जिसने कर्म- त्यागरूप संन्यास लिया हो। इसके विपरीत, उनके वर्णनोंसे दीख पड़ता है, कि वे गृहस्थाश्रमीही थे। अतएव कहना पड़ता है, कि समस्त उपनिषद् संन्यास-प्रधान
संन्यास और कर्मयोग ३६१ नहीं हैं; इनमेंसे कुछमें तो संन्यास और कर्मयोगका विकल्प है और कुछमें सिर्फ ज्ञानकर्म-समुच्चयकाही प्रतिपादन है। परंतु उपनिषदोंके सांप्रदायिक भाष्योंमें ये भेद नहीं दिखलाये गये हैं; किंतु यही कहा गया है, कि समस्त उपनिषद् केवल एकही अर्थ - विशेषतः संन्यास - प्रतिपादन करते हैं। सारांश, सांप्रदायिक टीकाकारोंके हाथों गीताकी और उपनिषदोंकीभी एकही दशा हो गई है, अर्थात् गीताके कुछ श्लोकोंके समान उपनिषदोंके कुछ मंत्रोंकीभी इन भाष्यकारोंको खींचातानी करनी पड़ी है। उदाहरणार्थ, ईशावास्य उपनिषदको लीजिये। यद्यपि उपनिषद् छोटा अर्थात् सिर्फ अठारह श्लोकोंका है, तथापि इसकी योग्यता अन्य उपनिषदोंकी अपेक्षा अधिक समझी जाती है। क्योंकि यह उपनिषद् स्वयं वाजसनेयी संहितामेंही कहा गया है; और अन्यान्य उपनिषद् आरण्यक ग्रंथमें कहे गये हैं। यह बात सर्वमान्य है, कि संहिताकी अपेक्षा ब्राह्मण और ब्राह्मणोंकी अपेक्षा आरण्यक ग्रंथ उत्तरोत्तर कम प्रमाणके हैं। यह संपूर्ण ईशावास्योपनिषद् - अथसे इतिपर्यंत - ज्ञान-कर्म- समुच्चयात्मक है। उसके पहले मंत्रमें (श्लोक) यह कहकर, कि "जगतमें जो कुछ है, उसे ईशावास्य अर्थात् परमेश्वराधिष्ठित समझना चाहिये; " दूसरेही मंत्रमें स्पष्ट कह दिया है, कि "जीवनभर सौ वर्ष निष्काम कर्म करते रहकरही जीते रहनेकी इच्छा रखो।" वेदान्तसूत्रमें कर्मयोगका विवेचन करनेका जब समय आया, तब और अन्यान्य ग्रंथोंमेंभी ईशावास्यका यही वचन ज्ञान-कर्म-समुच्चयपक्षका समर्थकके नाते दिया हुआ मिलता है। परंतु ईशावास्योपनिषद् इतनेसेही पूरा नहीं हो जाता। दूसरे मंत्रमें कही गई बातका समर्थन करनेके लिये आगे 'अविद्या' (कर्म) और 'विद्या'के (ज्ञान) विवेचनका आरंभकर नवें मंत्रमें कहा है, कि "निरी अविद्याका (कर्म) करनेवाले पुरुष अंधकारमें घुसते हैं; और कोरी विद्यामें (ब्रह्मज्ञान) मग्न रहनेवाले पुरुष गहरे अँधेरेमें जा पड़ते हैं।" केवल अविद्या (कर्म) और केवल विद्याकी (ज्ञान) प्रत्येककी इस प्रकार अलग अलग लघुता दिखलाकर ग्यारहवें मंत्रमें नीचे लिखे अनुसार 'विद्या' और 'अविद्या', दोनों समुच्चयकी आवश्यकता इस उपनिषद्में वर्णनकी गई है :- विद्यां चाऽविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ "जिसने विद्या (ज्ञान) और अविद्या (कर्म) इन दोनोंको एक दूसरीके साथ जान लिया, वह अविद्यासे (कर्मों) मृत्युको अर्थात् नाशवंत मायासृष्टिके प्रपंचको (भली भाँति) पार कर, विद्यासे (ब्रह्मज्ञानसे) अमृतत्वको प्राप्तकर लेता है।" - यही इस मंत्रका स्पष्ट और सरल अर्थ है। और यही अर्थ, विद्याको 'संभूति' अर्थात् जगत्का आदि कारण, एवं उससे भिन्न अविद्याको 'असंभूति' या 'विनाश' अर्थात् ये दूसरे नाम देकर इसके आगेके तीन मंत्रोंमें फिरसे दोहराया गया है (ईश. १२-१४) । इससे व्यक्त होता है, कि संपूर्ण ईशावास्योपनिषद् विद्या
३६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और अविद्याका एककालीन (उभयं सह) समुच्चय प्रतिपादन करता है। उल्लि- खित मंत्रमें 'विद्या' और 'अविद्या' शब्दोंके समानही मृत्यु और अमृत शब्द परस्पर- प्रतियोगी हैं। इनमेंसे अमृत शब्दसे 'अविनाशी ब्रह्म' अर्थ प्रकट है; और इसके विपरीत मृत्यु शब्दमे “नाशवंत मृत्युलोक या ऐहिक संसार” यह अर्थ निष्पन्न होता है; और ये दोनों शब्द इसी अर्थमें ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमेंभी आये हैं (ऋ. १०. १२९. २)। विद्या आदि शब्दोंके ये सरल अर्थ लेकर – अर्थात् विद्या = ज्ञान, अविद्या = कर्म, अमृत = ब्रह्म और मृत्यु = मृत्युलोक, ऐसा समझकर – यदि ईशावास्यके उल्लिखित ग्यारहवें मंत्रका अर्थ करें, तो प्रथम दीख पड़ेगा, कि इस मंत्रके पहले चरणमें विद्या और अविद्याका एककालीन समुच्चय वर्णित है; और उसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरे चरणमें इन दोनोंमेंसे प्रत्येकका भिन्न भिन्न फल बतलाया है। ईशावास्योपनिषदको ये दोनों फल इष्ट हैं; और इसीलिये इस उपनिषदमें ज्ञान और कर्म, दोनोंका एककालीन समुच्चय प्रतिपादित हुआ है। मृत्युलोकके प्रपंचको अच्छी रीतिसे चलाने या उससे भली भाँति पार पड़नेकोही गीतामें 'लोकसंग्रह' नाम दिया गया है। यह सच है, कि मोक्ष प्राप्त करना मनुष्य- का कर्तव्य है; परंतु उसके साथही उसे लोकसंग्रह करनाभी आवश्यक है; इसीसे गीताका सिद्धान्त है, कि ज्ञानी पुरुष यह लोकसंग्रहकारक कर्म न छोड़े; और यही सिद्धान्त शब्दभेदसे “अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते” इस उल्लिखित मंत्रमें आ गया है। इससे प्रकट होगा, कि गीता उपनिषदोंको केवल पकड़ेही नहीं है; प्रत्युत ईशावास्योपनिषदमें स्पष्टतया वर्णित अर्थही गीतामें विस्तारसहित प्रतिपादित हुआ है। ईशावास्योपनिषद् जिस वाजसनेयी संहितामें है, उसी वाजसनेयी संहिताका भाग शतपथ ब्राह्मण है। इस शतपथ ब्राह्मणके आरण्यकमें बृहदारण्यकोपनिषद् आया है, जिसमें ईशावास्यका यह नवाँ मंत्र अक्षरशः ले लिया है, कि “कोरी विद्यामें (ब्रह्मज्ञान) मग्न रहनेवाले पुरुष गहरे अँधेरेमें जा पड़ते हैं” (बृ. ४. ४. १०)। इस बृहदारण्यकोपनिषदमेंही जनक राजाकी कथा है; और उसी जनकका दृष्टान्त कर्मयोगके समर्थनके लिये भगवान्ने गीतामें लिया है (गीता ३. २०)। इससे ईशावास्यका और भगवद्गीताके कर्मयोगका जो संबंध हमने ऊपर दिखलाया है, वही अधिक दृढ़ और निःसंशय सिद्ध होता है। परंतु जिनका सांप्रदायिक सिद्धान्त ऐसा है, कि सभी उपनिषदोंमें मोक्षप्राप्तिका एकही मार्ग प्रतिपाद्य है और वहभी वैराग्यका या संन्यासकाही है; उपनिषदोंमें दो-दो मार्गोंका प्रतिपादन होना शक्य नहीं; उन्हें ईशावास्योपनिषदके स्पष्टार्थक मंत्रोंकाभी, खींचातानी कर, किसी प्रकार निराला अर्थ लगाना पड़ता है। ऐसा न करें, तो ये मंत्र उनके संप्रदायके प्रतिकूल हो जाते हैं; और ऐसा होने देना उन्हें इष्ट नहीं; इसीलिये ग्यारहवें मंत्रपर व्याख्यान करते समय शांकरभाष्यमें 'विद्या' शब्दका अर्थ 'ज्ञान' न कर 'उपासना' किया गया है। यह नहीं, कि विद्या शब्दका
अर्थ उपासना न होता हो। शांडिल्यविद्या प्रभृति स्थानोंमें उसका अर्थ उपासनाही होता है; पर वह मुख्य अर्थ नहीं है ! यहभी नहीं, कि श्रीशंकराचार्यके ध्यानमें यह बात आई न होगी या आई न थी। और तो क्या, उसका ध्यानमें न आना शक्यही न था। दूसरे उपनिषदोंमेंभी ऐसे वचन हैं - “ विद्यया विन्दतेऽमृतम् ” ( केन. २. १२ ), अथवा “ प्राणस्याध्यात्मं विज्ञायामृतमश्नुते ” ( प्रश्न. ३. १२ ) । मैत्र्यु- पनिषदके सातवें प्रपाठकमें “ विद्यां चाविद्यां च ” इत्यादि ईशावास्यका उल्लिखित ग्यारहवाँ मंत्रही अक्षरशः ले लिया है; और उससे सट करही, उसके पूर्व कठ. २. ४ और आगे कठ. २. ५ ये मंत्र दिये हैं। अर्थात् ये तीनों मंत्र एकही स्थानपर एकके पश्चात् एक दिये गये हैं; और बिचला मंत्र ईशावास्यका है; और तीनोंमेंभी 'विद्या' शब्द वर्तमान है। इसलिये कठोपनिषदमें विद्या शब्दका जो अर्थ है, वही ( ज्ञान ) अर्थ ईशावास्यमेंभी लेना चाहिये - मैत्र्युपनिषदका ऐसाही अभिप्राय प्रकट होता है। परंतु ईशावास्यके शांकरभाष्यमें कहा है, कि “ यदि विद्या = आत्म- ज्ञान और अमृत = मोक्ष, ऐसे अर्थही ईशावास्यके ग्यारहवें मंत्रमें लें, तो कहना होगा, कि ज्ञान ( विद्या ) और कर्म ( अविद्या ) का समुच्चय इस उपनिषदमें वर्णित है; परंतु जब कि यह समुच्चय न्यायसे युक्त नहीं है, तब विद्या = देवतोपासना और अमृत = देवलोक, ये गौण अर्थही इस स्थान पर लेने चाहिये । ” सारांश, प्रकट है, कि “ ज्ञान होने पर संन्यास ले लेना चाहिये, कर्म नहीं करने चाहिये; क्योंकि ज्ञान और कर्मका समुच्चय कभीभी न्याय्य नहीं। ” - शांकर-संप्रदायके इस मुख्य सिद्धान्तके विरुद्ध ईशावास्यका मंत्र न होने पावे; इसलिये विद्या शब्दका गौण अर्थ स्वीकारकर, समस्त श्रुति-वचनोंकी अपने संप्रदायके अनुरूप एकवाक्यता करनेके लिये, शांकरभाष्यमें ईशावास्यके ग्यारहवें मंत्रका ऊपर लिखे अनुसार अर्थ किया गया है। सांप्रदायिक दृष्टिसे देखें तो ये अर्थ महत्त्वकेही नहीं; प्रत्युत आवश्यकभी हैं। परंतु जिन्हें यह मूल सिद्धान्तही मान्य नहीं, कि समस्त उपनिषदोंमें एकही अर्थ प्रतिपादित रहना चाहिये, - दो मार्गोंका श्रुतिप्रतिपादित होना शक्य नहीं, - उन्हें उल्लिखित मंत्रमें विद्या और अमृत शब्दके अर्थ बदलनेके लिये कोईभी आवश्यकता नहीं रहती। यह तत्त्व मान लेनेसेभी, कि परब्रह्म 'एकमेवाद्वितीय' है, यह सिद्ध नहीं होता, कि उसके ज्ञानका उपाय एकसे अधिक न रहें। एकही अटारीपर चढ़नेके लिये दो जीने, वा एकही गाँव जानेके लिये जिस प्रकार दो मार्ग 'हो सकते हैं, उसी प्रकार मोक्षप्राप्तिके उपायोंकी या निष्ठाओंकी बात है; और इसी अभिप्रायसे भगवद्गीतामें स्पष्ट कह दिया है - “ लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा । ” दो निष्ठाओंका होना संभवनीय कहने पर, कुछ उपनिषदोंमें केवल ज्ञाननिष्ठाका, तो कुछमें ज्ञान- कर्म-समुच्चय-निष्ठाका वर्णन आना कुछ अशक्य नहीं है। अर्थात् ज्ञाननिष्ठाका विरोध होता है, इसीसे ईशावास्योपनिषदके शब्दका सरल, स्वाभाविक और स्पष्ट अर्थ छोड़नेके लियेभी कोई कारण नहीं रह जाता। यह कहनेके लिये, कि श्रीमत्-
३६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र शंकराचार्यका आक्षेप सरल अर्थकी अपेक्षा संन्यासनिष्ठा-प्रधान एकवाक्यताकी ओर विशेष था, एक और दूसरा कारणभी है। तैत्तिरीय उपनिषदके शांकरभाष्यमें (तै. २. ११) ईशावास्य. मंत्रका इतनाही भाग दिया है कि “अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते”; और उसके साथही यह मनुवचन भी दे दिया है, कि “तपसा कल्मषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते” (मनु. १२. १०४); और इन दोनोंही वचनोंमें 'विद्या' शब्दका एकही मुख्यार्थ अर्थात् ब्रह्मज्ञान आचार्यने स्वीकार किया है। परंतु यहाँ आचार्यका कथन है, कि “तीर्त्वा = तैरकर या पारकर”, इस पदसे मृत्युलोकको तैर जानेकी क्रिया पहले पूरी हो जानेपर फिर (एक-साथही नहीं) विद्यासे अमृतत्व प्राप्त होनेकी क्रिया संघटित होती है। किंतु कहना नहीं होगा, कि यह अर्थ पूर्वार्धके 'उभयं सह' शब्दोंके विरुद्ध हो जाता है और प्रायः इसी कारणसे ईशावास्यके शांकरभाष्यमें यह अर्थ छोड़ दिया गया हो। कुछभी हो; ईशावास्यके ग्यारहवें मंत्रका शांकरभाष्यमें निराला व्याख्यान करनेका जो कारण है, वह इससे व्यक्त हो जाता है। यह कारण सांप्रदायिक है; और भाष्य-कर्ताकी सांप्रदायिक दृष्टि स्वीकार न करनेवालोंको प्रस्तुत भाष्यका यह व्याख्यान मान्य न होगा। यह बात हमेंभी मंजूर है, कि श्रीमच्छंकराचार्य जैसे अलौकिक ज्ञानी पुरुषके प्रतिपादन किये हुए अर्थको छोड़ देनेका प्रसंग यदि टले, तो अच्छा है! परंतु सांप्रदायिक दृष्टि त्यागनेसे ये प्रसंग तो आयेंगेही; और इसी कारण हमसे पहलेभी ईशावास्यके मंत्र - अर्थ शांकर- भाष्यसे विभिन्न प्रकारसे अर्थात् जैसे हम कहते हैं, वैसेही अन्य भाष्यकारोंने लगाये हैं। उदाहरणार्थ, वाजसनेयी संहितापर अर्थात् ईशावास्योपनिषदपरभी उवटाचार्यका जो भाष्य है, उसमें “विद्यां चाविद्यां च” इस मंत्रका व्याख्यान करते हुए ऐसा अर्थ दिया है, कि “विद्या = आत्मज्ञान और अविद्या = कर्म; इन दोनोंके एकीकरणसेही अमृत अर्थात् मोक्ष मिलता है।” अनंताचार्यने इस उपनिषदके अपने भाष्यमें इसी ज्ञान-कर्म-समुच्चयात्मक अर्थको स्वीकार कर अंतमें साफ लिख दिया है, कि “इस मंत्रका सिद्धान्त और “यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते” (गीता ५. ५), गीताके इस वचनका अर्थ एकही है, एवं गीताके इस श्लोकमें जो 'सांख्य' और 'योग' शब्द हैं, वे क्रमसे 'ज्ञान' और 'कर्म'के द्योतक हैं।”* इसी प्रकार अपरार्कदेवनेभी
- पुणेके आनंदाश्रममें ईशावास्योपनिषदकी जो पुस्तक छपी है, उसमें ये सभी भाष्य हैं; और याज्ञवल्क्य-स्मृतिकी अपरार्ककी टीकाभी आनंदाश्रममेंही पृथक् छपी है। प्रो. मेक्समुलरने उपनिषदोंका जो अनुवाद किये हैं, उनमें ईशावास्यका भाषांतर शांकरभाष्यके अनुसार नहीं है। उन्होंने भाषांतरके अंतमें इसके कारण बतलाये हैं (Sacred Books of the East Series, Vol. I. pp. 314-320)। अनंताचार्यका भाष्य मेक्समुलर साहबको उपलब्ध नहीं हुआ था; और उनके ध्यानमें यह बातभी आई हुई दीख नहीं पड़ती, कि शांकरभाष्यमें निराले अर्थ क्यों किये गये हैं?
संन्यास और कर्मयोग ३६५ याज्ञवल्क्य-स्मृतिकी ( याज्ञ. ३. ५७; २०५ ) अपनी टीकामें ईशावास्यका ग्यारहवाँ मंत्र देकर, अनंताचार्यके समानही, उसका ज्ञान-कर्म-समुच्चयात्मक अर्थ किया है। इससे पाठकोंके ध्यानमें आ जायेगा, कि आज हम नये सिरेसेही ईशावास्योपनिषदके मंत्रका शांकरभाष्यसे भिन्न अर्थ नहीं करते हैं। यह तो हुआ स्वयं ईशावास्योपनिषदके मंत्रके संबंधका विचार। अब शांकर- भाष्यमें "तपसा कल्मषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते" यह जो मनुका वचन दिया है, उसकाभी थोड़ा-सा विचार करते हैं। मनुस्मृतिके बारहवें अध्यायमें यह १०४ क्रमांका श्लोक है; और मनु. १२. ८६ से विदित होगा, कि वह प्रकरण वैदिक कर्मयोगका है। कर्मयोगके इस विवेचनमें :- तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयस्करं परम् । तपसा कल्मषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ पहले चरणमें यह बतलाकर, कि "तप और (च) विद्या, ये (अर्थात् दोनों) ब्राह्मणको उत्तम मोक्षदायक हैं," फिर उनमेंसे प्रत्येकका उपयोग दिखलानेके लिये दूसरे चरणमें कहा है, कि "तपसे दोष नष्ट हो जाते हैं और विद्यासे अमृत अर्थात् मोक्ष मिलता है।" इससे प्रकट होता है, कि इस स्थानपर ज्ञान-कर्म-समुच्चयही मनुको अभिप्रेत है; और ईशावास्यके ग्यारहवें मंत्रकाही अर्थ मनुने इस श्लोकमें वर्णन कर दिया है। हारीत-स्मृतिके वचनसेभी यही अर्थ अधिक दृढ़ होता है। यह हारीत-स्मृति स्वतंत्र तो उपलब्ध हैही; इसके सिवा नृसिंहपुराणमेंभी (नृ. पु. ५७-६१) आई है। इस नृसिंहपुराणमें (६१. ९-११) और हारीत- स्मृतिमें (हा. स्मृ. ७. ९-११) ज्ञान-कर्म-समुच्चयके संबंधमें ये श्लोक हैं:- यथाश्वा रथहीनाश्च रथाश्चाश्वैर्विना यथा । एवं तपश्च विद्या च उभावपि तपस्विनः ॥ यथाऽन्नं मधुसंयुक्तं मधु चान्नेन संयुतम् । एवं तपश्च विद्या च संयुक्तं भेषजं महत् ॥ द्वाभ्यामेव हि पक्षाभ्यां यथा वै पक्षिणां गतिः । तथैव ज्ञानकर्माभ्यां प्राप्यते ब्रह्म शाश्वतम् ॥ "जिस प्रकार रथके बिना घोड़े और घोड़ोंके बिना रथ (नहीं चलते), उसी प्रकार तपस्वीके तप और विद्याकीभी स्थिति है। जिस प्रकार अन्न शहदसे संयुक्त हो; और शहद अन्नसे संयुक्त हो, उसी प्रकार तप और विद्याके (दोनोंके) संयुक्त होनेसे एक महौषधि बनती है। जैसे पक्षियोंकी गति दोनों पंखोंके योगसेही होती है, वैसेही ज्ञान और कर्मसे (दोनों) शाश्वत ब्रह्म प्राप्त होता है।" हारीत-स्मृतिके उपरोक्त वचन वृद्धात्रेय-स्मृतिके दूसरे अध्यायमेंभी पाये जाते हैं। इन वचनोंसे, और विशेषकर उनमें दिये गये दृष्टान्तोंसे, प्रकट हो जाता है, कि मनुस्मृतिके
३६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वचनोंका क्या अर्थ लगाना चाहिये ? यह तो पहलेही कह चुके हैं, कि मनु तप शब्दमेंही चातुर्वर्ण्यके कर्मोंका समावेश करते हैं ( मनु. ११. २३६ ) ; और अब दीख पड़ेगा, कि तैत्तिरीयोपनिषदमें ' तप और स्वाध्याय-प्रवचन ' इत्यादिका जो आचरण करनेके लिये कहा गया है (तै. १. ९), वहभी ज्ञान-कर्म-समुच्चय-पक्षको स्वीकार करही कहा गया है । संपूर्ण योगवासिष्ठ ग्रंथका तात्पर्यभी यही है । क्योंकि इस ग्रंथके आरंभमें सुतीक्ष्णने प्रश्न किया है, कि मुझे बतलाइये, कि मोक्ष कैसे मिलता है ? केवल ज्ञानसे, केवल कर्मसे, या दोनोंके समुच्चयसे ? और उसे उत्तर देते हुए हारीत-स्मृतिके पक्षीके पंखोंवाला, दृष्टान्त लेकर, पहले यह बतलाया है, कि “ जिस प्रकार आकाशमें पक्षीकी गति दोनों पंखोंसेही होती है, उसी प्रकार ज्ञान और कर्म, इन्हीं दोनोंसे मोक्ष मिलता है। केवल एकसेही यह सिद्धि मिल नहीं जाती ।” और आगे इसी अर्थको विस्तारसहित सिद्धकर दिखलानेके लिये संपूर्ण योगवासिष्ठ ग्रंथ कहा गया है (यो. १. १. ६-९) । इसी प्रकार वसिष्ठने रामको मुख्य कथामें स्थान-स्थानपर बार-बार यही उपदेश किया है, कि “ जीवन्मुक्तके समान बुद्धिको शुद्ध रखकर तुम समस्त व्यवहार करो” (यो. ५. १८. १७-२६) ; या मरण- पर्यंत कर्मोंका छोड़ना उचित न होनेके कारण ( यो. ६. उ. २. ४२ ), स्वधर्मके अनुसार प्राप्त राज्यको पालनेका काम करते रहो” ( यो. ५. ५. ५४; ६. उ. २१३. ५० ) । इस ग्रंथका उपसंहार और आगे श्रीरामचंद्रके किये हुए कामभी इसी उपदेशके अनुसार हैं। परंतु योगवासिष्ठके टीकाकार थे संन्यास-मार्गीय, इसलिये पक्षीके दो पंखोंवाली उपमाके स्पष्ट होने परभी, उन्होंने अंतमें अपनी ओर- से यह तुर्रा लगाही दिया, कि ज्ञान और कर्म, दोनों युगपत् अर्थात् एकही समयमें विहित नहीं हैं। परंतु बिना टीकाके मूल ग्रंथ पढ़नेसे किसीकेभी ध्यानमें सहजही आ जावेगा, कि टीकाकारोंका यह अर्थ खींचातानीका है; एवं क्लिष्ट और सांप्रदायिक है। मद्रास प्रांतमें योगवासिष्ठ-सरीखाही 'गुरुज्ञान-वासिष्ठ-तत्त्वसारायण' नामक एक ग्रंथ प्रसिद्ध है और उसके ज्ञानकांड, उपासनाकांड और कर्मकांड - ये तीन भाग हैं। हम पहले कह चुके हैं, कि यह ग्रंथ जितना पुराना बतलाया जाता है, उतना पुराना नहीं दिखता है। वह प्राचीन भलेही न हो; पर जब कि ज्ञान-कर्म-समुच्चय-पक्षही उसमें प्रतिपाद्य है, तब इस स्थानपर उसका उल्लेख करना आवश्यक है। इसमें अद्वैत वेदान्त है और निष्काम कर्मपरही बहुत जोर दिया गया है, इसलिये यह कहनेमें कोई हानि नहीं, कि उसका संप्रदायभी शंकराचार्यके संप्रदायसे भिन्न और स्वतंत्र है। मद्रासकी ओर इस संप्रदायका नाम 'अनुभवाद्वैत' है और वास्तविक देखनेसे ज्ञात होगा, कि गीताके कर्मयोगकी यह एक नकलही है। परंतु केवल भगवद्गीताकेही आधारसे इस संप्रदायको सिद्ध न कर, इस ग्रंथमें कहा है, कि कुल १०८ उपनिषदोंसेभी वही अर्थ सिद्ध होता है। इसमें रामगीता और सूर्यगीता, ये दो नई गीताएँभी दी हैं। कुछ लोगोंकी जो यह समझ है, कि अद्वैत मतको अंगीकार करना मानो
संन्यास और कर्मयोग ३६७ कर्म-संन्यास-पक्षको स्वीकार करनाही है, वह इस ग्रंथसे दूर हो जायगी। ऊपर दिये गये प्रमाणोंसे अब स्पष्ट हो जायगा, कि संहिता, ब्राह्मण, उपनिषद्, धर्मसूत्र, मनु- याज्ञवल्क्य-स्मृति, महाभारत, भगवद्गीता, योगवासिष्ठ और अंतमें तत्त्वसारायण प्रभृति ग्रंथोंमें जो निष्काम कर्मयोग प्रतिपादित है, उसको श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित न मान केवल संन्यास-मार्गकोही श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित कहना सर्वथा निर्मूल है। इस मृत्युलोकके व्यवहार चलनेके लिये या लोकसंग्रहार्थ यथाधिकार निष्काम कर्म और मोक्षकी प्राप्तिके लिये ज्ञान, इन दोनोंका एककालीन समुच्चयही, अथवा महाराष्ट्र कवि शिवदिन-केसरीके वर्णनानुसार - प्रपंच साधुनि परमार्थाचा लाहो ज्याने केला। तो नर भला भला रे भला भला ॥ * यही अर्थ गीतामें प्रतिपाद्य है। कर्मयोगका यह मार्ग प्राचीन कालसे चला आ रहा है; जनक प्रभृतिने इसी का आचरण किया है; और स्वयं भगवानके द्वारा इसका प्रसार और पुनरुज्जीवन होनेके कारण इसेही भागवत-धर्म कहते है। ये सब बाते अच्छी तरह सिद्ध हो चुकीं। अब लोकसंग्रहकी दृष्टिसे यह देखनाभी आवश्यक है, कि इस मार्गके ज्ञानी पुरुष परमार्थयुक्त अपना प्रपंच - जगतके व्यवहार - किस रीतिसे चलाते हैं? परंतु यह प्रकरण बहुत बढ़ गया है, इसलिये इस विषयका स्पष्टीकरण अगले प्रकरणमें करेंगे।
- "वही नर भला है, जिसने प्रपंच साध कर ( संसारके सब कर्तव्योंका यथोचित पालन कर ) परमार्थ याने मोक्षकी प्राप्तिभी कर ली हो।"
बारहवाँ प्रकरण सिद्धावस्था और व्यवहार सर्वेषां यः सुहृन्नित्यं सर्वेषां च हिते रतः । कर्मणा मनसा वाचा स धर्मं वेद जाजले ॥ * – महाभारत, शांति. २६१. ९ जिस मार्गका यह मत है, कि ब्रह्मज्ञान हो जानेसे जब बुद्धि अत्यंत सम और निष्काम हो जावे, तब शेष मनुष्यको आगे कुछभी कर्तव्य नहीं रह जाता; और इसी- लिये ज्ञानी पुरुषको क्षणभंगुर संसारके दुःखमय और शुष्क व्यवहार विरक्त-बुद्धिसे सर्वथा छोड़ देने चाहिये, उस मार्गके पंडित इस बातको कदापि नहीं जान सकते, कि कर्मयोग अथवा गृहस्थाश्रमके बर्तावकाभी कोई विचार करने योग्य शास्त्र है। संन्यास लेनेभी पहले चित्तकी शुद्धि होकर ज्ञानप्राप्ति हो जानी चाहिये, इसीलिये उन्हें मंजूर है, कि संसार गृहस्थीके काम उस धर्मसेही करने चाहिये, कि जिससे चित्तवृत्ति शुद्ध होवे; अर्थात् वह सात्विक बने। इसीलिये वे समझते हैं, कि संसारमेंही सदैव बने रहना पागलपन है और जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी प्रत्येक मनुष्य संन्यास ले ले – यही इस जगतमें उसका परम कर्तव्य है। ऐसा मान लेनेसे कर्मयोगका स्वतंत्र महत्त्व कुछभी नहीं रह जाता; और इसीलिये संन्यासमार्गके पंडित गृहस्थीके कर्तव्योंके विषयमें कुछ थोड़ा-सा प्रासंगिक विचार करके, गार्हस्थ्य- धर्मके, कर्म-अकर्मके विवेचनका इससे अधिक विचार कभी नहीं करते, कि मनु आदि शास्त्रकारोंके बतलाये हुए चार आश्रमरूपी जीनेसे चढ़कर संन्यास आश्रमकी अंतिम सीढ़ी पर जल्दी पहुँच जाओ। इसीलिये कलियुगके संन्यासमार्गके पुरस्कर्ता श्रीशंकराचार्यने अपने गीता-भाष्यमें गीताके कर्मप्रधान वचनोंकी उपेक्षा की है, अथवा उन्हें केवल प्रशंसात्मक (अर्थवाद-प्रधान) कल्पित किया है; और अंतमें गीताका यह फलितार्थ निकाला है, कि कर्म-संन्यास-धर्म ही गीताधर्ममें प्रतिपाद्य है। और यही कारण है, कि दूसरे कितनेही टीकाकारोंने अपने अपने संप्रदायके अनुसार गीताके इस रहस्यका वर्णन किया है, कि भगवानने रणभूमिपर अर्जुनको निवृत्ति-प्रधान अर्थात् निरी भक्ति, या पातंजलयोग अथवा मोक्ष-मार्गकाही उपदेश किया है। इसमें कोई संदेह नहीं, कि संन्यास-मार्गका अध्यात्मज्ञान निर्दोष है। और इसके द्वारा प्राप्त होनेवाली साम्य-बुद्धि अथवा निष्काम अवस्थाभी गीताको
- "हे जाजले ! (कहना चाहियेकी) उसीने धर्मको जाना, कि जो कर्मसे, मनसे और वाणीसे सबका हित करनेमें लगा हुआ है; और जो सभीका नित्य स्नेही है।"
मान्य है। तथापि गीताको संन्यासमार्गका यह कर्म-विरोधी मत ग्राह्य नहीं है, कि मोक्ष- प्राप्तिके लिये अंतमें कर्मोंका सर्वथा छोड़ही बैठना चाहिये । पिछले प्रकरणमें हमने विस्तारसहित गीताका यह विशेष सिद्धान्त दिखलाया है, कि ब्रह्मज्ञानसे प्राप्त होनेवाले वैराग्य अथवा समतासेही ज्ञानी पुरुषको ज्ञान-प्राप्ति हो चुकने परभी सारे व्यवहार करते रहना चाहिये । जगतसे ज्ञानयुक्त कर्मको निकाल डालनेसे तो दुनिया अंधी हुई जाती है; और इससे उसका नाश हो जाता है; जब कि भगवानकीही इच्छा है, कि इस रीतिसे उसका नाश न हो, वह भली भाँति चलती रहे; तब ज्ञानी पुरुष- कोभी जगतके सभी कर्म निष्काम बुद्धिसे करते हुए सामान्य लोगोंको अच्छे बर्तावका प्रत्यक्ष नमूना दिखला देना चाहिये । इसी मार्गको अधिक श्रेयस्कर और ग्राह्य कहें, तो यह देखनेकी जरूरत पड़ती है, कि इस प्रकारका ज्ञानी पुरुष जगतके व्यवहार किस प्रकार करता है ? क्योंकि ऐसे ज्ञानी पुरुषका बर्तावही लोगोंके लिये आदर्श है। उसके कर्म करनेकी रीतिको परख लेनेसे धर्म-अधर्म, कार्य-अकार्य अथवा कर्तव्य-अकर्तव्यका निर्णय कर देनेवाला साधन या युक्ति - जिसे हम खोज रहे थे - आप-ही-आप हमारे हाथ लग जाती है। संन्यास-मार्गकी अपेक्षा कर्म-योगमार्गकी यही तो विशेषता है। इंद्रियोंका निग्रह करनेसे जिस पुरुषकी व्यवसायात्मक बुद्धि स्थिर हो कर " सब भूतोंमें एक आत्मा " इस साम्यको परख लेनेमें समर्थ हो जाय, उसकी वासनाभी शुद्धही होनी चाहिये । इस प्रकार वासनात्मक बुद्धिके शुद्ध, सम, निर्मम और पवित्र हो जानेसे फिर वह कोईभी पाप या मोक्षके लिये प्रतिबंधक कर्म करही नहीं सकता, क्योंकि पहले वासना है; फिर तदनुकूल कर्म, जब कि क्रम ऐसा है, तब शुद्ध वासनासे होनेवाला कर्म शुद्धही होना चाहिये; और जो शुद्ध है, वही मोक्षके लिये अनुकूल है। अर्थात् हमारे आगे जो 'कर्म-अकर्म-विचिकित्सा' या 'कार्य-अकार्य- व्यवस्थिति'का बिकट प्रश्न था, कि पारलौकिक कल्याणके मार्गमें आड़े न आकर इस संसारमें मनुष्यमात्रको कैसा बर्ताव करना चाहिये, उसका अपनी करनीसे प्रत्यक्ष उत्तर देनेवाला गुरु अब हमें मिल गया ( तै. १. ११.४; गीता ३. २१) । अर्जुनके आगे ऐसा गुरु श्रीकृष्णके रूपमें प्रत्यक्ष खड़ा था और जब अर्जुनको यह शंका हुई कि " क्या, ज्ञानी पुरुष युद्ध आदि कर्मोंको बंधनकारक समझकर छोड़ दे ? " तब उसको इस गुरुने दूर बहा दिया और अध्यात्मशास्त्रके सहारे अर्जुनको भली भाँति समझा दिया, कि किस युक्तिसे जगतके व्यवहार करते रहनेपर पाप नहीं लगता; और उसे युद्धके लिये प्रवृत्त किया । किंतु ऐसा चोखा ज्ञान देनेवाले गुरु प्रत्येक मनुष्यको जब चाहे तब नहीं मिल सकते और तीसरे प्रकरणके अंतमें, " महाजनो येन गतः स पन्थाः " इस वचनका विचार करते हुए हम बतला चुके हैं, कि ऐसे महापुरुषोंके निरे ऊपरी बर्तावपर सर्वथा अवलंबित रहभी नहीं सकते । अतएव जगतको अपने आचरणसे शिक्षा देनेवाले इन ज्ञानी पुरुषोंके बर्तावकी बड़ी बारीकीसे जाँचकर विचार करना चाहिये, कि इनके बर्तावका यथार्थ रहस्य या गी. र. २४
३७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मूल तत्त्व क्या है ? इसेही कर्मयोगशास्त्र कहते हैं; और ऊपर जो ज्ञानी पुरुष बतलाये गये हैं, उनकी स्थिति और कृतिही इस शास्त्रका आधार है । इस जगतके सभी पुरुष यदि इस प्रकारके आत्मज्ञानी और कर्मयोगी हों, तो कर्मयोगशास्त्रकी जरूरतही न पड़ेगी । नारायणीय धर्ममें एक स्थानपर कहा है :- एकान्तिनो हि पुरुषा दुर्लभा बहवो नृप । यद्येकान्तिभिराकीर्णं जगत् स्यात्कुरुनन्दन ॥ अहिंसकैरात्मविद्भिः सर्वभूतहिते रतै । भवेत् कृतयुगप्राप्तिः आशीः कर्मविवर्जिता ॥ “ एकांतिक अर्थात् प्रवृत्ति-प्रधान भागवत धर्मका पूर्णतया आचरण करनेवाले अनेक पुरुषोंका मिलना कठिन है । आत्मज्ञानी, अहिंसक और प्राणिमात्रकी भलाईके लिये कर्म करनेवाले एकान्तधर्मके ज्ञानी पुरुषोंसे यदि यह जगतभर जावे, तो आशी : कर्म – अर्थात् काम्य अथवा स्वार्थ-बुद्धिसे किये हुए सारे कर्म – इस जगतसे दूर होकर फिर कृतयुग प्राप्त हो जावेगा ” ( शां. ३४८. ६२, ६३ ) ! क्योंकि ऐसी स्थितिमें सभी पुरुषोंके ज्ञानवान् रहनेसे कोई किसीका नुकसान तो करेगाही नहीं; प्रत्युत प्रत्येक मनुष्य सबके कल्याणपर ध्यान देकर तदनुसारही शुद्ध अंतःकरण और निष्काम बुद्धिसे अपना बर्ताव करेगा । हमारे शास्त्रकारोंका मत है, कि बहुत पुराने समयमें एक वार समाजकी ऐसीही स्थिति थी; और वह फिर कभी-न-कभी प्राप्त होगीही ( मभा. शां. ५९. १४ ) । परंतु पश्चिमी पंडित अर्वाचीन इतिहासके आधारसे कहते हैं, कि पहले कभी ऐसी स्थिति नहीं थी, किंतु भविष्यमें मानव जातिके सुधारोंके सहारे कभी- न-कभी ऐसी स्थिति प्राप्त होनेकी संभावना है । जो हो; यहाँ इतिहासका विचार इस समय कर्तव्य नहीं है । हाँ, यह कहनेमें कोई हानि नहीं, कि समाजकी इस अत्युत्कृष्ट स्थिति अथवा पूर्णावस्थामें प्रत्येक मनुष्य परम ज्ञानी होगा; और वह जो व्यवहार करेगा, उसीको शुद्ध, पुण्यकारक, धम्र्य अथवा कर्तव्यकी पराकाष्ठा मानना चाहिये, इस मतको दोनोंही मानते हैं । प्रसिद्ध अंग्रेज सृष्टिशास्त्र-ज्ञाता स्पेन्सरने इसी मतका अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथके अंतमें प्रतिपादन किया है, और कहा है, कि प्राचीन कालमें ग्रीस देशके तत्त्वज्ञानी पुरुषोंने यही सिद्धान्त किया था ! * उदाहरणार्थ, यूनानी तत्त्ववेत्ता प्लेटो अपने ग्रंथमें लिखता है, कि तत्त्वज्ञानी पुरुषको जो कर्म प्रशस्त जँचे, वही शुभकारक और न्याय्य है; साधारण मनुष्योंको ये धर्म विदित नहीं होते, इसलिये उन्हें तत्त्वज्ञ पुरुषकेही निर्णयको प्रमाण मान लेना चाहिये । आरिस्टॉटल नामक दूसरा ग्रीक तत्त्वज्ञ अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथमें ( ३. ४ ) कहता है, कि ज्ञानी पुरुषका निर्णय सदैव अचूक रहता है, कि वह सच्चे तत्त्वको जाने रहता है; और ज्ञानी
- Spencer's Data of Ethics, Chap. XV, pp. 275-278. स्पेन्सरने इसको Absolute Ethics नाम दिया है ।
सिद्धावस्था और व्यवहार ३७१ पुरुषका यह निर्णय या व्यवहारही औरोंको प्रमाणभूत है। एपिक्यूररस नामके एक और ग्रीक तत्त्वशास्त्रवेत्ताने इस प्रकारके प्रामाणिक परम ज्ञानी पुरुषके वर्णनमें कहा है, कि वह "शांत, सम-बुद्धिवाला और परमेश्वरके समान सदा आनंदमय रहता है; तथा उसको लोगोंसे अथवा उससे लोगोंको जरासाभी कष्ट नहीं होता"।* पाठकोंके ध्यानमें आही जावेगा, कि भगवद्गीतामें वर्णित स्थितप्रज्ञ, त्रिगुणातीत अथवा परम भक्त या ब्रह्मभूत पुरुषके वर्णनमें इस वर्णनकी कितनी समता है। "यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः" (गीता १२. १५) - जिससे लोक उद्विग्न नहीं होते अथवा जो लोगोंसे उद्विग्न नहीं होता, ऐसेही जो नित्य संतुष्ट है, जो हर्ष-खेद, भय-विषाद, सुख-दुःख आदि द्वंद्वोंसे मुक्त है, सदा अपने आपमेंही संतुष्ट है ("आत्मन्येवात्मना तुष्टः" गीता २.५५) त्रिगुणोंसे जिसका अंतःकरण चंचल नहीं होता ("गुणैर्यो न विचाल्यते" गीता १४. २३), स्तुति या निंदा और मान या अपमान जिसे एक-से हैं; तथा प्राणिमात्रके अंतर्गत आत्माकी एकताको परखकर (गीता १८. ५४), साम्य-बुद्धिसे आसक्ति छोड़कर, धैर्य और उत्साहसे अपना कर्तव्य-कर्म करनेवाला अथवा सम-लोष्ट-अश्म-कांचन (गीता १४. २४) - इत्यादि प्रकारसे भगवद्गीतामेंभी स्थितप्रज्ञके लक्षण तीन-चार बार विस्तारपूर्वक बतलाये गये हैं और इसी अवस्थाको सिद्धावस्था या ब्राह्मी स्थिति कहा गया है। योगवासिष्ठ आदिके प्रणेता इसी स्थितिको जीवन्मुक्तावस्था कहते हैं। इस स्थितिका प्राप्त हो जाना अत्यंत दुर्घट है, अतएव जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटका कथन है, कि ग्रीक पंडितोंने इस स्थितिका जो वर्णन किया है, वह किसीएक वास्तविक पुरुषका वर्णन नहीं है; बल्कि शुद्ध नीतिके तत्त्वोंको लोगोंके मनमें भर देनेके लिये समस्त नीतिको मूलभूत शुद्ध वासनाकोही मनुष्य-देह देकर उन्होंने परले सिरेके ज्ञानी और नीतिमान् पुरुषका चित्र अपनी कल्पनासे तैयार किया है। लेकिन हमारे शास्त्रकारोंका सिद्धान्त है, कि यह स्थिति काल्पनिक नहीं, बिलकुल सच्ची है; और मनका निग्रह तथा प्रयत्न करनेसे इसी लोकमें प्राप्त हो जाती है और इस बातका प्रत्यक्ष अनुभवभी हमारे देशवालोंको प्राप्त है। तथापि यह बात साधारण नहीं है। गीतामें (गीता ७. ३) स्पष्टही कहा है, कि हजारों मनुष्योंमें कोई एक-आध मनुष्य इसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करता है; और प्रयत्न करनेवालों इन हजारोंमेंसे किसी विरलेकोही अनेक जन्मोंके अनंतर यह परमावधिकी स्थिति अंतमें प्राप्त होती है।
- Epicurus held the virtuous state to be "a tranquil, un- disturbed, innocuous, non-competitive fruition, which approached most nearly to the perfect happiness of the Gods, who "neither suffered vexation in themselves, nor caused vaxation to others." Spencer's Data of Ethics, p. 278, Bain's Mental and Moral Science, Ed. 1875, p. 530 इसीको Ideal Wise Man कहा है।
३७२ . गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र स्थितप्रज्ञ अवस्था या जीवनमुक्त अवस्था कितनीही दुष्प्राप्य क्यों न हो, पर जिस पुरुषको यह परमावधिकी सिद्धि एक बार प्राप्त हो गयी, उसे कार्य-अकार्यके अथवा नीतिशास्त्रके नियम बतलानेकी कभी आवश्यकता नहीं रहती – ऊपर इसके जो लक्षण बतला दिये हैं, उन्हींसे आगे यह बात वस्तुतः निष्पन्न हो जाती है। क्योंकि परमावधिकी शुद्ध, सम और पवित्र बुद्धिही नीतिका सर्वस्व है, इस कारण ऐसे स्थितप्रज्ञ पुरुषके लिये नीति-नियमोंका उपयोग करना मानो स्वयंप्रकाश सूर्यके समीप अंधकार होनेकी कल्पना करके उसे मशाल दिखलानेके समान असमंजसमें पड़ना है। किसी एक-आध पुरुषके इस पूर्णावस्थामें पहुँचने या न पहुँचनेके संबंधमें शंका हो सकेगी । परंतु जब एकबार निश्चय हो जाय, कि किसीभी रीतिसे क्यों न हो, कोई पुरुष इस पूर्णावस्थामें पहुँच गया है, तब उसके पापपुण्यके संबंधमें, अध्यात्म- शास्त्रके उल्लिखित सिद्धान्तको छोड़ और कोई कल्पनाही नहीं की जा सकती । कितॆक पश्चिमी राजधर्म-शास्त्रियोंके मतानुसार, जिस प्रकार एक स्वतंत्र पुरुषमें या पुरुषसमूहमें राजसत्ता अधिष्ठित रहती है और राजनियमोंसे प्रजाके बँधे रहनेपरभी, राजा उन नियमोंसे मुक्त रहता है, ठीक उसी प्रकार नीतिके राज्यमें स्थितप्रज्ञ पुरुषोंका अधिकार रहता है। उनके मनमें कोईभी काम्य बुद्धि नहीं रहती, अतः केवल शास्त्रसे प्राप्त कर्तव्योंको छोड़ और किसीभी हेतुसे कर्म करनेके लिये वे प्रवृत्त नहीं हुआ करते; अतएव अत्यंत निर्मल और शुद्ध वासनावाले इन पुरुषोंके व्यव- हारको पाप या पुण्य, नीति या अनीति शब्द कदापि लागू नहीं होते । वे तो पाप और पुण्यसे परे, बहुत दूर, पहुँच जाते हैं। श्रीशंकराचार्यने कहा है :- निस्त्रैगुण्ये पथि विचरतां को विधिः को निषेधः । “जो पुरुष त्रिगुणातीत हो गये, उनको विधिनिषेधरूपी नियम बाँध नहीं सकते ।” और बौद्ध ग्रंथकारोंनेभी लिखा है, कि “जिस प्रकार उत्तम हीरेको घिसना नहीं पड़ता, उसी प्रकार जो निर्वाणपदका अधिकारी हो गया, उसके कर्मको विधिनियमोंका अडंगा लगाना नहीं पड़ता” (मिलिंदप्रश्न ४. ५. ७)। कौषीतकी उपनिषद (कौषी. ३. १) में इंद्रने प्रतर्दनसे जो यह कहा है कि आत्मज्ञानी पुरुषोंको “मातृहत्या, पितृ- हत्या अथवा भ्रूणहत्या आदि पापभी नहीं लगते ।” अथवा गीता (गी. १८. १७) में जो यह वर्णन है, कि अहंकार-बुद्धिसे सर्वथा विमुक्त पुरुष यदि लोगोंको मारभी डाले, तोभी वह पाप-पुण्यसे सर्वदा अलिप्तही रहता है, उसका तात्पर्यभी यही है (पंचदशी १४. १६, १७) । ‘धम्मपद’ नामक बौद्ध ग्रंथमें इसी तत्त्वका अनुवाद किया गया है (धम्मपद, श्लोक २९४, २९५) ।* नई बाइबलमें ईसाके शिष्य
- कौषीतकी उपनिषद्का वाक्य यह है-“यो मां विजानीयान्नास्य केनचित् कर्मणा लोको मीयते न मातृवधेन न पितृवधेन न स्तेयेन न भ्रूणहत्यया ।” और धम्मपदका श्लोक इस प्रकार है -
सिद्धावस्था और व्यवहार ३७३ पौलने जो यह कहा है, कि "मुझे सभी बातें (एकही-सी) धर्म्य हैं (१ कारिं. ६. १२; रोम. ८. २), उसका आशय जानके या इस वाक्यका - कि "जो भगवानके पुत्र (पूर्ण भक्त) हो गये, उनके हाथसे कभी पाप हो नहीं सकता" (जा. १. ३. ९)- आशयभी हमारे मतमें ऐसाही है। जो शुद्ध बुद्धिको प्रधानता न देकर केवल ऊपरी कर्मोमेही नीतिका निर्णय करना सीखे हुए हैं, उन्हें यह सिद्धान्त अद्भुत-सा मालूम होता है; और "विधिनियमोसे परेका", "मनमाना भलाबुरा करनेवाला", ऐसा अपनेही मनका कुतर्कपूर्ण अर्थ करके कुछ लोग उल्लिखित सिद्धान्तका इस प्रकार विपर्यास करते हैं, कि "स्थितप्रज्ञको सभी बुरे कर्म करनेकी स्वतंत्रता है।" पर अंधे- को खंभा न दीख पड़े, तो जिस प्रकार खंभा दोषी नहीं है, उसी प्रकार पक्षाभिमानके अंधे इन आक्षेप-कर्ताओंको उल्लिखित सिद्धान्तका ठीक ठीक अर्थ अवगत न हो, तो उसका दोषभी इस सिद्धान्तके मत्थे नहीं थोपा जा सकता। इसे गीताभी मानती है, कि किसीकी शुद्ध बुद्धिकी परीक्षा पहले पहल उसके बाहरी आचरणसेही करनी पड़ती है और जो इस कसौटीपर चौकस सिद्ध होनेमें अभी कुछ कम हैं, उन अपूर्णावस्थाके लोगोंको उक्त सिद्धान्त लागू करनेकी इच्छा अध्यात्मवादीभी नहीं करते। पर जब किसीकी बुद्धिके पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ और निःसीम निष्काम होनेमें तिलभरभी संदेह न रहे, तब उस पूर्णावस्थामें पहुँचे हुए सत्पुरुषकी बात निराली हो जाती है। उसका एक-आध काम यदि लौकिक दृष्टिसे विपरीत दीख पड़े तोभी तत्त्वतः यही कहना पड़ता है, कि वह काम दीखनेमें कैसाभी क्यों न हो, उसका बीज निर्दोषही होना चाहिये। अथवा वह शास्त्रकी दृष्टिसे किसी योग्य कारणसे ही हुआ होगा, साधारण मनुष्योंके कामोंके समान उसका लोभमूलक या अनीतिका होना संभव नहीं है; क्योंकि उस सत्पुरुषकी बुद्धिकी पूरी शुद्धता और समता पहलेसेही निश्चित रहती है। बाइबलमे लिखा है, कि मातरं पितरं हंत्वा राजानो द्वे च खत्तिये । रट्ठं सानुचरं हंत्वा अनीघो याति ब्राह्मणो ॥ मातरं पितरं हंत्वा राजानो द्वे च सोत्थिये । वेय्यग्घपञ्चमं हंत्वा अनीघो याति ब्राह्मणो ॥ प्रकट है, कि धम्मपदमें यह कल्पना कौषीतकी उपनिषदसे ली गई है। किंतु बौद्ध ग्रंथकार प्रत्यक्ष मातृवध या पितृवध अर्थ न करके 'माता'का तृष्णा और 'पिता'का अभिमान अर्थ करते हैं। लेकिन हमारे मतमें इस श्लोकका नीतितत्त्व बौद्ध ग्रंथ कारोंको भली भाँति ज्ञात नहीं हो पाया, इसीसे उन्होंने यह औपचारिक अर्थ लगाया है। कौषीतकी उपनिषदमें 'मातृवधेन पितृवधेन' इत्यादि मंत्रके पहले इंद्रने कहा है, कि "यद्यपि मैने वृत्त अर्थात् ब्राह्मणका वध किया है, तोभी मुझे उससे पाप नही लगता।" इससे स्पष्ट होता है, कि यहाँपर प्रत्यक्ष वधही विवक्षित है। धम्मपदके अंग्रेजी अनुवादमें (S. B. E. Vol. X. pp. 70, 71) मेक्समूलर साहबने श्लोकोंकी जो टीका की है, हमारे मतमें वहभी ठीक नहीं है।
३७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अब्राहम अपने पुत्रका बलिदान देना चाहता था; तोभी उसे पुत्रहत्या कर डालनेके प्रयत्नका पाप नहीं लगा; या बुद्धके शापसे उसका ससुर मर गया, तोभी उसे मनुष्य- हत्याका पातक छू तक नहीं गया; अथवा माताको मार डालनेपरभी परशुरामके हाथसे मातृहत्या नहीं हुई; उसका कारणभी यही (तत्त्व) है (जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है)। गीतामें अर्जुनको जो यह उपदेश किया है, कि "तेरी बुद्धि यदि पवित्र और निर्मल हो, तो फलाशा छोड़कर केवल क्षात्रधर्मके अनुसार युद्धमें भीष्म और द्रोणको मार डालनेसेभी न तो तुझे पितामहके वधका पातक लगेगा और न गुरुहत्याका दोषभी। क्योंकि ऐसे समय ईश्वरी संकेतकी सिद्धिके लिये तू तो केवल निमित्त हो गया है" (गीता ११. ३३) उसमेंभी यही तत्त्व भरा है। व्यवहारमेंभी हम यही देखते हैं, कि यदि किसी लखपतीने किसी भीखमंगेसे दो पैसे छीन लिये हों, तो उस लखपतिको तो कोई चोर कहता नहीं, उलटे यही समझ लिया जाता है, कि भिखारीनेही कुछ अपराध किया होगा, कि जिसका लखपतीने उसको दंड दिया हो। यही न्याय इससेभी अधिक समर्पक रीतिसे या पूर्णतासे स्थितप्रज्ञ, अर्हत और भगवद्भक्तके बर्तावको उपयोगी होता है। क्योंकि लखपतिकी बुद्धि एक बार भलेही डिग जाय; परंतु यह जानीबूझी बात है, कि स्थितप्रज्ञकी बुद्धिको ये विकार कभी स्पर्श तक नहीं कर सकते। सृष्टिकर्ता परमेश्वर सब कर्म करनेपरभी जिस प्रकार पापपुण्यसे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार इन ब्रह्मभूत साधु-पुरुषोंकी स्थिति सदैव पवित्र और निष्पाप रहती है। और तो क्या, समय समय पर ऐसे पुरुष स्वेच्छा अर्थात् अपनी मर्जीसे जो व्यवहार करते हैं, उन्हींसे आगे चलकर विधि-नियमोंके निबंध बन जाते हैं, और इसीसे कहते हैं, कि ये सत्पुरुष इन विधि नियमोंके जनक (उपजानेवाले) हैं--वे इनके दास कभी नहीं हो सकते। न केवल वैदिक धर्ममें, प्रत्युत बौद्ध और इसाई धर्ममेंभी यही सिद्धान्त पाया जाता है; तथा प्राचीन ग्रीक तत्त्वज्ञानियोंकोभी यह तत्त्व मान्य हो गया था; और अर्वाचीन कालमें कांटने* अपने नीतिशास्त्रके ग्रंथमें उपपत्तिसहित यही सिद्ध कर दिखलाया है। इस प्रकार नितनियमोंके कभीभी गंदले न होनेवाले मूल झरने या निर्दोष पाठेका (आदर्श) निश्चय हो चुकनेपर आपही सिद्ध हो जाता है, कि नीतिशास्त्र या कर्मयोगशास्त्रके मूल तत्त्व देखनेकी जिसे अभिलाषा
- "A perfectly good will would therefore be equally subject to objective laws (viz. laws of good), but could not be conceived as obliged thereby to act lawfully, because of itself from its subjective constitution it can only be determined by the conception of good. Therefore no imperatives hold for the Divine will, or in general for a holy will; ought is here out of place, because the volition is already of itself necessarily in unison with the law. Kant's Meta- physic of Morals p. 31. (Abbott's trans. in Kant's Theory of Ethics, 6th Ed.) नित्शे किसीभी आध्यात्मिक उपपत्तिको स्वीकार नहीं करता,
सिद्धावस्था और व्यवहार ३७५ हो, उसे इन उदार और निष्कलंक सिद्ध पुरुषोंके चरित्रोंकाही सूक्ष्म अवलोकन करना चाहिये। इसी अभिप्रायसे भगवद्गीतामें अर्जुनने श्रीकृष्णसे ये प्रश्न पूछे हैं, कि “ स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्” ( गीता २. ५४ ) – स्थितप्रज्ञ पुरुषका बोलना, बैठना और चलना कैसे होता है ? अथवा चौदहवें अध्यायमें, “ कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणान् एतान् अतीतो भवति प्रभो, किमाचारः” (गीता १४. २१ ) – पुरुष त्रिगुणातीत कैसे होता है ? उसका आचार क्या है ? और उसको किस प्रकार पहचानना चाहिये ? किसी सराफ़के पास सोनेका जेवर जँचवानेके लिये ले जानेपर अपनी दूकानमें रखी कसौटीपर उसको परख कर, फिर वह जिस प्रकार उसका खरा-खोटापन बतलाता है, उसी प्रकार कार्य-अकार्य या धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये स्थितप्रज्ञका बर्ताव एक कसौटी है। अतः गीताके उक्त प्रश्नोंमें यही अर्थ गर्भित है, कि मुझे उस कसौटीका ज्ञान करा दीजिये। अर्जुनके उपरोक्त प्रश्नोंका उत्तर देते हुए भगवानने स्थितप्रज्ञ अथवा त्रिगुणातीतकी स्थितिके जो वर्णन किये हैं, उन्हें कुछ लोग संन्यास-मार्गवाले ज्ञानी पुरुषोंके बतलाते हैं, उन्हें वे कर्मयोगियोंके नहीं मानते। क्योंकि संन्यासियोंको उद्देश्यकरही 'निराश्रयः' (गीता ४. २०) विशेषणका गीतामें प्रयोग हुआ है, और बारहवें अध्यायमें स्थितप्रज्ञ भगवद्भक्तोंका वर्णन करते समय 'सर्वारंभपरित्यागी' (गीता १२. १६) एवं 'अनिकेतः' (गीता १२. १९), इन स्पष्ट पदोंका प्रयोग किया गया है। परंतु निराश्रय अथवा अनिकेत पदोंका अर्थ “ घरबार छोड़कर जंगलोंमें भटकनेवाला” विवक्षित नहीं है, किंतु इसका अर्थ “ अनाश्रितः कर्मफलं”के ( गीता ६. १) समानार्थकही करना चाहिये – अर्थात् “कर्मफलका आश्रय न करनेवाला” अथवा “जिसके मनमें फलके लिये ठौर नहीं” इस ढंगका हो जायगा। गीताके अनुवादमें इन श्लोकोंके नीचे जो टिप्पणियाँ दी हैं, उनसे यह बात स्पष्ट दीख पड़ेगी। इसके अतिरिक्त स्थितप्रज्ञके वर्णनमेंही कहा है, कि “ इंद्रियोंको अपने वशमें रख कर व्यवहार करनेवाला” अर्थात् वह निष्काम कर्म करनेवाला होता है (गीता २. ६४)। और जिस श्लोकमें उक्त 'निराश्रय' पद आया है, वहाँ यह वर्णन है, कि “कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः” अर्थात् समस्त कर्म करकेभी वह अलिप्त रहता है। बारहवें अध्यायके अनिकेत आदि पदोंके लिये इसी न्यायका उपयोग करना चाहिये। क्योंकि इस अध्यायमें पहले कर्मफलके त्यागकी (कर्मत्यागकी नहीं) प्रशंसा कर चुकनेपर (गीता १२. १२) फलाशा त्यागकर कर्म करनेसे मिलनेवाली शांतिका दिग्दर्शन करनेके लिये आगे भगवद्भक्तके लक्षण बतलाये ह; और ऐसेही अठारहवें अध्यायमेंभी यह दिखलानेके तथापि उसने अपने ग्रंथमें उत्तम पुरुषका ( Superman ) जो वर्णन किया है, उसमें कहा है, कि उल्लिखित पुरुष भले और बुरेसे परे रहता है। उसके एक ग्रंथका नामभी Beyond Good and Evil है।