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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

३८२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

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३८२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


| नाभूत् । यौवने च तत्काले त्वामलभे लब्धवत्यस्मि । तदैव ते पितोपरतः । अतोऽनाथां साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि । जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स त्वं सत्यकाम एवाहं जाबालोऽस्मीत्याचार्याय ब्रूवीथाः, यद्याचार्येण पृष्ट इत्यभिप्रायः ॥ २ ॥ | मन नहीं था । तथा उस समय युवावस्थामें ही मैंने तुझे प्राप्त किया था । उसी समय तेरे पिताका देहान्त हो गया । इसलिये मैं अनाथा हो गयी और इसीसे मुझे इसका कुछ पता नहीं कि तू किस गोत्रवाला है । मैं तो जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है; अतः तात्पर्य यह है कि यदि आचार्य तुझसे पूछें तो तू यही कह देना कि 'मैं सत्यकाम जाबाल हूँ' ॥२॥ |

स ह हारिद्रुमतं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्यं भगवति वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति ॥ ३ ॥

उसने हारिद्रुमत गौतमके पास जाकर कहा—'मैं पूज्य श्रीमान्‌के यहाँ ब्रह्मचर्यपूर्वक वास करूँगा; इसीसे आपकी सन्निधिमें आया हूँ' ॥ ३ ॥

| स ह सत्यकामो हारिद्रुमतं हरिद्रुमतोऽपत्यं हारिद्रुमतं गौतमं गोत्रत एत्य गत्वोवाच ब्रह्मचर्यं भगवति पूजावति त्वयि वत्स्याम्यत्र उपेयामुपगच्छेयं शिष्यतया भगवन्तम् ॥ ३ ॥ | उस सत्यकामने, जो गोत्रतः गौतम थे, उन हारिद्रुमत-हरिद्रुमान्‌के पुत्रके पास जाकर कहा—'आप भगवान्--पूज्यवरके यहाँ मैं ब्रह्मचर्यपूर्वक वास करूँगा; इसीसे मैं आपकी सन्निधिमें उपसत्ति--शिष्यभावसे गमन करता हूँ' ॥ ३ ॥ |


| इत्युक्तवन्तम्— | इस प्रकार कहनेवाले— |

तँहोवाच किंगोत्रो नु सोम्यासीति स होवाच नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्म्यपृच्छं मातरँसा मा प्रत्यब्रवीद्बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे

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खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८१


साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसीति सोऽहꣳसत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥ ४ ॥

उससे [गौतमने] कहा—'हे सोम्य ! तू किस गोत्रवाला है ?' उसने कहा—'भगवन् ! मैं जिस गोत्रवाला हूँ उसे नहीं जानता । मैंने मातासे पूछा था । उसने मुझे यह उत्तर दिया कि 'पहले मैं पतिके घर आये हुए बहुतसे अतिथियोंकी सेवा-टहल करनेवाली परिचारिका थी [ परिचर्यामें संलग्न होनेसे ही गोत्र आदिकी ओर मेरा ध्यान नहीं रहा ] । उन्हीं दिनों युवावस्थामें जब मैंने तुझे प्राप्त किया [ तुम्हारे पिता परलोकवासी हो गये, अतः उनसे भी न पूछ सकी], इसलिये मैं यह नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है ? मैं जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है ।' अतः हे गुरो ! मैं सत्यकाम जाबाल हूँ ॥ ४ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
तं होवाच गौतमः—किंगोत्रो नु सोम्यासि ? इति, विज्ञातकुलगोत्रः शिष्य उपनेतव्यः, इति पृष्टः प्रत्याह सत्यकामः । स होवाच नाहमेतद्वेद भोः, यद्गोत्रोऽहमस्मि, किं त्वपृच्छं पृष्टवानस्मि, मातरम्; सा मया पृष्टा मां प्रत्यब्रवीन्माता—बह्वहं चरन्तीत्यादि पूर्ववत् । तस्या अहं वचः स्मरामि, सोऽहं सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥४॥उससे गौतमने कहा---'हे सोम्य ! तू किस गोत्रवाला है ? क्योंकि जिसके कुल और गोत्रका पता हो उसी शिष्यका उपनयन करना चाहिये ।' इस प्रकार पूछे जानेपर सत्यकामने उत्तर दिया । वह बोला—'भगवन् ! मैं जिस गोत्रवाला हूँ, उसे नहीं जानता किंतु मैंने मातासे पूछा था, मेरेद्वारा पूछे जानेपर माताने मुझे यही उत्तर दिया कि 'मैं बहुत-से अतिथियोंकी सेवा-टहल करनेवाली' इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । मुझे उसके वे वचन याद हैं; अतः हे गुरो ! मैं सत्यकाम जाबाल हूँ' ॥ ४ ॥

३८४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

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३८४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


तं होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधꣳ सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानामबलानां चतुःशता गा निराकृत्योवाचेमाःसोम block-ान्वनुसंव्रजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणावर्तेयेति स ह वर्षगणं प्रोवास ता यदा सहस्रꣳ संपदुः ॥५॥

उससे गौतमने कहा—'ऐसा स्पष्ट भाषण कोई ब्राह्मणेतर नहीं कर सकता। अतः हे सोम्य ! तू समिधा ले आ, मैं तेरा उपनयन कर दूँगा; क्योंकि तूने सत्यका त्याग नहीं किया।' तब उसका उपनयन कर चार सौ कृश और दुर्बल गौएँ अलग निकालकर उससे कहा—'सोम्य ! तू इन गौओंके पीछे जा।' उन्हें ले जाते समय उसने कहा—'इनकी एक सहस्र गायें हुए बिना मैं नहीं लौटूँगा' जब तक कि वे एक सहस्र हुईं वह बहुत वर्षोंतक वनमें ही रहा ॥ ५ ॥

| तं होवाच गौतमो नैतदृचोऽब्राह्मणो विशेषेण वक्तुमर्हत्यार्जवार्थसंयुक्तम्। ऋजवो हि ब्राह्मणा नेतरे स्वभावतः। यस्मान्न सत्याद्ब्राह्मणजातिधर्मादगा नापेतवानसि, अतो ब्राह्मणं त्वामुपनेष्येऽतः संस्कारार्थं होमाय समिधं सोम्याहरेत्युक्त्वा तमुपनीय कृशानामबलानां गो- | उससे गौतमने कहा—'ऐसा सरलार्थयुक्त वचन विशेषतः कोई अब्राह्मण नहीं बोल सकता, क्योंकि ब्राह्मण तो स्वभावतः ही सरल होते हैं, और लोग नहीं। क्योंकि तू ब्राह्मणजातिके धर्म सत्यसे विचलित अर्थात् भ्रष्ट नहीं हुआ, अतः मैं तुझ ब्राह्मणका उपनयन-संस्कार करूँगा। इसलिये हे सोम्य ! संस्कारार्थ होम करनेके लिये तू समिध ले आ।' ऐसा कह उसका उपनयन करनेके अनन्तर उसने गौओंके यूथमेंसे |

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खण्ड ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ
संस्कृत-भाष्यभाष्यार्थ
यूथान्निराकृत्यापकृष्य चतुः-शता चत्वारि शतानि गवा-मुवाचेमा गाः सोम्यानुसंव्रजा-नुगच्छ ।<br><br>इत्युक्तस्ता अरण्यं प्रत्यभि-प्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणा-पूर्णेन सहस्रेण नावर्तेय न प्रत्यागच्छेयम् । स एवमुक्त्वा गा अरण्यं तृणोदकबहुलं द्वन्द्व-रहितं प्रवेश्य स ह वर्षगणं दीर्घं प्रोवास प्रोषितवान् । ताः सम्यग्गावो रक्षिता यदा यस्मि-न्काले सहस्रं संपेदुः संपन्ना बभूवुः ॥ ५ ॥चार सौ कृश और निर्बल गौएँ अलग निकालकर उससे कहा—'हे सोम्य ! तू इन गौओंका अनुगमन कर—इनके पीछे-पीछे जा ।'<br><br>इस प्रकार कहे जानेपर उन्हें वनकी ओर हाँकते हुए सत्यकामने कहा—'बिना एक सहस्र हुए अर्थात् इनकी एक सहस्र संख्या पूरी हुए बिना मैं नहीं लौटूंगा ।' ऐसा कह वह उन गौओंको एक वनमें, जिसमें कि तृण और जलकी अधिकता थी तथा जो सर्वथा द्वन्द्व-रहित था, ले गया और वर्षोंतक—बहुत कालपर्यन्त, जबतक कि सम्यक् प्रकारसे रक्षा की हुई वे गौएँ एक सहस्र हुईं, वहीं रहा ॥ ५ ॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥

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पञ्चम खण्ड

—: o :—

वृषभद्वारा सत्यकामको ब्रह्मके प्रथम पादका उपदेश

| तमेतं श्रद्धातपोभ्यां सिद्धं वायुदेवता दिक्सम्बन्धिनी तुष्टा सत्यृषभमनुप्रविश्यर्षभभावमापन्नानुग्रहाय । | श्रद्धा और तपसे सिद्ध हुए उस इस सत्यकामसे दिक्सम्बन्धिनी वायुदेवता संतुष्ट होकर ऋषभ ( साँड ) में अनुप्रविष्ट हुई अर्थात् उसपर कृपा करनेके लिये ऋषभभावको प्राप्त हुई । |

अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्राप्ताः सोम्य सहस्रꣳ स्मः प्रापय न आचार्यकुलम् ॥ १ ॥

तब उससे साँडने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया । [ वह बोला— ] 'हे सोम्य ! हम एक सहस्र हो गये हैं, अब तू हमें आचार्यकुलमें पहुँचा दे' ॥ १ ॥

| अथ हैनमृषभोऽभ्युवादा- <br> भ्युक्तवान्सत्यकाम ३ इति <br> संबोध्य, तमंसौ सत्यकामो <br> भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्रति- <br> वचनं ददौ । प्राप्ताः सोम्य <br> सहस्रं स्मः, पूर्णा तव प्रतिज्ञा, <br> अतः प्रापय नोऽस्मानाचार्य- <br> कुलम् ॥ १ ॥ | तब उससे साँडने 'सत्यकाम !' <br> इस प्रकार सम्बोधन करते हुए <br> कहा । उसे सत्यकामने 'भगवन् !' <br> ऐसा कहकर प्रतिवचन—प्रत्युत्तर <br> दिया । [साँडने कहा—] 'हे सोम्य ! <br> हम एक सहस्र हो गये हैं, तेरी <br> प्रतिज्ञा पूरी हो गयी; अतः अब तू <br> हमें आचार्यकुलमें पहुँचा दे' ॥१॥ |

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खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८७


किं च—तथा—

ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवा- निति तस्मै होवाच प्राची दिक्कला प्रतीची दिक्कला दक्षिणा दिक्कलोदीची दिक्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम ॥ २ ॥

‘[ क्या ] मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ ?’ तब [ सत्यकामने ] कहा—‘भगवान् मुझे [ अवश्य ] बतलावें ।’ साँड उससे बोला—‘पूर्व दिक्कला, पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिक्कला और उत्तर दिक्कला, हे सोम्य ! यह ब्रह्मका ‘प्रकाशवान्’ नामक चार कलाओंवाला पाद है’ ॥ २ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
अहं ब्रह्मणः परस्य ते तुभ्यं पादं ब्रवाणि कथयानि ? इत्युक्तः प्रत्युवाच—ब्रवीतु कथयतु मे मह्यं भगवान् । इत्युक्त ऋषभस्तस्मै सत्यकामाय होवाच—प्राची दिक्कला ब्रह्मणः पादस्य चतुर्थो भागः तथा प्रतीची दिक्कला दक्षिणा दिक्कलोदीची दिक्कलैष वै सोम्य ब्रह्मणः पादश्चतुष्कलश्चतस्रः कला अवयवा यस्य सोऽयं चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम प्रकाशवानित्येव नामाभिधानं यस्य । तथोत्तरेऽपि पादास्त्रयश्चतुष्कला ब्रह्मणः ॥२॥‘[ क्या ] मैं तुझसे परब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ—कहूँ ?’ ऐसा कहे जानेपर सत्यकामने उत्तर दिया—‘भगवान् मुझे [ अवश्य ] बतलावें ।’ इस प्रकार कहे जानेपर साँडने उस सत्यकामसे कहा—‘पूर्व दिक्कला उस ब्रह्मके पादका चौथा भाग है । इसी प्रकार पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिक्कला और उत्तर दिक्कला है—हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कलपाद है—जिसमें चार कलाएँ अवयव हैं ऐसा यह ब्रह्मका प्रकाशवान् नामका अर्थात् ‘प्रकाशवान्’ यही जिसका नाम है [ ऐसा एक पाद है ] । इसी प्रकार ब्रह्मके आगेके तीन पाद भी चार कलाओंवाले ही हैं’ ॥ २ ॥

छा० उ० १३—

३८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

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३८८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते प्रकाशवानस्मिँल्लोके भवति प्रकाशवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते ॥ ३ ॥

वह, जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'प्रकाशवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है, इस लोकमें प्रकाशवान् होता है और प्रकाशवान् लोकोंको जीत लेता है, जो कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'प्रकाशवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ३ ॥

| स यः कश्चिदेवं यथोक्तमेतं ब्रह्मणश्चतुष्कलं पादं विद्वान्प्रकाशवानित्यनेन गुणेन विशिष्टमुपास्ते तस्येदं फलं प्रकाशवानस्मिँल्लोके भवति प्रख्यातो भवतीत्यर्थः । तथादृष्टं फलं प्रकाशवतो ह लोकान्देवादि सम्बन्धिनो मृतः सञ्जयति प्राप्नोति । य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते ॥ ३ ॥ | वह, जो कोई विद्वान् ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी इस प्रकार 'प्रकाशवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है उसे यह फल मिलता है कि वह इस लोकमें प्रकाशवान् अर्थात् विख्यात होता है । तथा अदृष्टफल यह होता है कि वह मरनेपर देवतादिसे सम्बद्ध प्रकाशवान् लोकोंको जीत लेता है, जो विद्वान् कि इस प्रकार ब्रह्मके इस चतुष्कलपादकी 'प्रकाशवान्' इस रूपसे उपासना करता है ॥ ३ ॥ |

—: ० : —

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥

—: ०० :—

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षष्ठ खण्ड

अग्निद्वारा ब्रह्मके द्वितीय पादका उपदेश

अग्निष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्था-
पयाञ्चकार । ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमा-
धाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ्-
पोपविवेश ॥ १ ॥

‘अग्नि तुझे [ दूसरा ] पाद बतलावेगा’—ऐसा [कहकर वृषभ मौन हो गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको [ गुरुकुलकी ओर ] हाँक दिया। वे सायंकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं अग्नि प्रज्वलित कर गौओंको रोक समिधाधान कर अग्निके पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया ॥ १ ॥

| सोऽग्निस्ते पादं वक्तेत्युपररामर्षभः । स सत्यकामो ह श्वोभूते परेद्युर्नैत्यकं नित्यं कर्म कृत्वा गा अभिप्रस्थापयाञ्चकाराचार्यकुलं प्रति । ताः शनैश्चरन्त्य आचार्यकुलाभिमुख्यः प्रस्थिता यत्र यस्मिन्काले देशेऽभि सायं निशायामभिसंबभूवुरेकत्राभिमुख्यः संभूताः । तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ऋषभवचो ध्यायन् ॥ १ ॥ | वह साँड 'अग्नि तुझे [दूसरा] पाद बतलावेगा'—ऐसा कहकर मौन हो गया । दूसरे दिन सत्यकामने नैत्यक—नित्यकर्म करनेके अनन्तर गौओंको गुरुकुलकी ओर चला दिया । वे गुरुकुलकी ओर धीरे-धीरे चलती हुई जिस समय और जिस स्थानमें अभि सायम्—रातमें एकत्रित हुईं वहीं अग्नि स्थापित कर गौओंको रोक समिधाधान कर साँडके वचनोंको याद करता हुआ अग्निके पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया ॥ १ ॥ |


तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति
ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥

३१० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

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३१० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


उससे अग्निने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । तब उसने 'भगवन् !' ऐसा प्रत्युत्तर दिया ॥ २ ॥

| तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम ३ इति संबोध्य, तमसो सत्यकामो भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्रतिवचनं ददौ ॥ २ ॥ | उससे अग्निने 'सत्यकाम !' इस प्रकार सम्बोधन करते हुए कहा । उसे सत्यकामने 'भगवन् !' ऐसा प्रत्युत्तर दिया ॥ २ ॥ |

—: ☸ :—

ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच पृथिवी कलान्तरिक्षं कला द्यौः कला समुद्रः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ॥ ३ ॥

'हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ ?' [ सत्यकामने कहा— ] 'भगवान् मुझे [ अवश्य ] बतलावें।' तब उसने उससे कहा— 'पृथिवी कला है, अन्तरिक्ष कला है, द्युलोक कला है और समुद्र कला है। हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'अनन्तवान्' नामवाला है' ॥३॥

| ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच— पृथिवी कलान्तरिक्षं कला द्यौः कला समुद्रः कलेत्यात्मगोचरमेव दर्शनमग्निरब्रवीत् । एष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ॥ ३ ॥ | 'हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ?' [सत्यकामने कहा—] 'भगवान् मुझे बतलावें।' तब उसने उससे कहा—'पृथिवी कला है, अन्तरिक्ष कला है, द्युलोक कला है और समुद्र कला है'—इस प्रकार अग्निने अपनेसे सम्बद्ध दर्शनका निरूपण किया—'हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चार कलाओंवाला पाद 'अनन्तवान्' नामवाला है' ॥ ३ ॥ |

—: ० :—

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खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यं ३९१


स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽ- नन्तवानित्युपास्तेऽनन्तवानस्मिँल्लोके भवत्यनन्तवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥

वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'अनन्तवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें अनन्तवान् होता है और अनन्तवान् लोकोंको जीत लेता है, जो कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'अनन्तवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ४ ॥

| स यः कश्चिद्यथोक्तं पादम- <br><br> नन्तवत्त्वेन गुणेनोपास्ते स <br><br> तथैव तद्गुणो भवत्यस्मिँल्लोके <br><br> मृतश्चानन्तवतो ह लोकान्स <br><br> जयति य एतमेवमित्यादि <br><br> पूर्ववत् ॥ ४ ॥ | वह, जो कोई पुरुष उपर्युक्त पाद-की अनन्तवत्त्वगुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें उसी प्रकार—उसी गुणवाला हो जाता है, तथा मरनेपर अनन्तवान् लोकोंको जीत लेता है, जो कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष—इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत है ॥ ४ ॥ |


इति च्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥

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सप्तम खण्ड

—: ० :—

हंसद्वारा ब्रह्मके तृतीय पादका उपदेश

हꣳसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते सा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ्ङोपविवेश ॥ १ ॥ तꣳहꣳस उपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥२॥

'हंस तुझे [तीसरा] पाद बतलावेगा' ऐसा [कहकर अग्नि निवृत्त हो गया]। दूसरे दिन उसने गौओंको आचार्यकुलकी ओर हाँक दिया। वे सायङ्कालमें जहाँ एकत्रित हुईं वह उसी जगह अग्नि प्रज्वलित कर, गौओंको रोक और समिधाधान कर अग्निके पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठा ॥ १ ॥ तब हंसने उसके समीप उतरकर कहा—'सत्यकाम !' उसने उत्तर दिया—'भगवन् !' ॥ २ ॥

| सोऽग्निर्हंसस्ते पादं वक्तेत्युक्त्वोपरराम । हंस आदित्यः, शौक्ल्यात्पतनसामान्याच्च । स ह श्वोभूत इत्यादि समानम् ॥ १-२ ॥ | वह अग्नि 'हंस तुझे तीसरा पाद बतलावेगा' ऐसा कहकर उपरत हो गया। शुक्लता तथा उड़नेमें समानता होनेके कारण यहाँ आदित्यको हंस कहा गया है। 'स ह श्वोभूते' आदि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है ॥१-२॥ |


ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ॥ ३ ॥

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खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९३


[ हंसने कहा— ] हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' [ सत्यकाम बोला— ] 'भगवान् मुझे बतलावें।' तब वह उससे बोला— 'अग्नि कला है, सूर्य कला है, चन्द्रमा कला है और विद्युत कला है। हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'ज्योतिष्मान्' नामवाला है' ॥३॥

स च एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिँल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥

जो कोई इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'ज्योतिष्मान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें ज्योतिष्मान् होता है तथा ज्योतिष्मान् लोकोंको जीत लेता है, जो कोई कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको ज्योतिष्मान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ४ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
अग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युतकलैष वै सोम्येति ज्योतिर्विषयमेव च दर्शनं प्रोवाचातो हंसस्यादित्यत्वं प्रतीयते। विद्वत्फलम्—ज्योतिष्मान्दीप्तियुक्तोऽस्मिँल्लोके भवति । चन्द्रादित्यादीनां ज्योतिष्मत एव च मृत्वा लोकाञ्जयति; समानमुत्तरम् ॥ ३-४ ॥'अग्नि कला है, सूर्य कला है, चन्द्र कला है, विद्युत कला है, हे सोम्य यह' इत्यादि वाक्यसे उसने ज्योतिर्विषयक दर्शनका ही निरूपण किया है; इससे हंसका आदित्यत्व प्रतीत होता है । इस प्रकारके विद्वान्को प्राप्त होनेवाला फल—वह इस लोकमें ज्योतिष्मान्—दीप्तियुक्त होता है तथा मरनेपर चन्द्र एवं आदित्यादिके ज्योतिष्मान् लोकोंको ही जीत लेता है। आगेका अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३-४ ॥

—: ० :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥

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अष्टम खण्ड


मद्गुद्वारा ब्रह्मके चतुर्थ पादका उपदेश

मद्गुष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ॥ १ ॥

'मद्गु तुझे [ चौथा ] पाद बतलावेगा' ऐसा [ कहकर हंस चला गया ]। दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुलकी ओर हाँक दिया। वे सायंकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं अग्नि प्रज्वलित कर गायोंको रोक समिधाधान कर अग्निके पीछे पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया ॥ १ ॥

| हंसोऽपि मद्गुष्टे पादं वक्ते-<br><br>त्युपरराम । मद्गुरुदकचरः पक्षी<br><br>स चाप्सम्बन्धात्प्राणः । स ह<br><br>श्वोभूत इत्यादि पूर्ववत् ॥ १ ॥ | हंस भी 'मद्गु तुझे [ चौथा ] पाद बतलावेगा' ऐसा कहकर चला गया। 'मद्गु' जलचर पक्षीको कहते हैं; जलसे सम्बन्ध होनेके कारण वह प्राण ही है। 'स ह श्वोभूते' इत्यादि वाक्यका तात्पर्य पूर्ववत् है ॥ १ ॥ |

—: ० :—

तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥

मद्गुने उसके पास उतरकर कहा—'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया 'भगवन् !' ॥ २ ॥

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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९५


ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राणः कला चक्षुः कला श्रोत्रं कला मनः कलैष वै सोम्य चतुष्कलाः पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम ॥ ३ ॥

[ मद्गु बोला—] 'हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' [ सत्यकाम बोला—] 'भगवान् मुझे बतलावें ।' तब वह उससे बोला— 'प्राण कला है, चक्षु कला है, श्रोत्र कला है और मन कला है । हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'आयतनवान्' नामवाला है' ॥ ३ ॥

| स च मद्गुः प्राणः स्वविषयमेव च दर्शनमुवाच प्राणः कलेत्याद्यायतनवानित्येवं नाम । आयतनं नाम मनः सर्वकरणोपहृतानां भोगानां तद्यस्मिन्पादे विद्यत इत्यायतनवान्नाम पादः ॥ २-३ ॥ | उस मद्गु यानी प्राणने भी 'प्राण कला है' इत्यादि 'आयतनवान्' इस नामवाला पाद है, ऐसा कहकर अपनेसे सम्बद्ध दर्शनका ही निरूपण किया । समस्त इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण किये हुए भोगोंका आयतन मन ही है, वह जिस पादमें विद्यमान है वह पाद 'आयतनवान्' नामवाला है ॥ २–३ ॥ |

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स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्त आयतनवानस्मिँल्लोके भवत्यायतनवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥

३९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

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३९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४


वह जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'आयतनवान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें 'आयतनवान्' होता है और आयतनवान् लोकोंको जीत लेता है, जो कोई कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'आयतनवान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ४ ॥

| तं पादं तथैवोपास्ते यः स आयतनवानाश्रयवानस्मिँल्लोके भवति । तथायतनवत एव सावकाशाँल्लोकान्मृतो जयति । य एतमेवमित्यादि पूर्ववत् ॥ ४ ॥ | उस पादकी जो उसी प्रकार उपासना करता है वह इस लोकमें 'आयतनवान्'—आश्रयवाला होता है तथा मरनेपर आयतनवान्—अवकाशयुक्त लोकोंको ही जीतता है । 'य एतमेवम्' इत्यादि वाक्य का अर्थ पूर्ववत् है ॥ ४ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्यायेऽष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥

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नवम खण्ड

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सत्यकामका आचार्यकुलमें पहुँचकर आचार्यद्वारा पुनः उपदेश ग्रहण करना

स एवं ब्रह्मवित्सन्—इस प्रकार वह ब्रह्मवेत्ता होकर—

प्राप हाचार्यकुलं तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ १ ॥

आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने कहा—'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया—'भगवन् !' ॥ १ ॥


आप ह प्राप्तवानाचार्यकुलम् । तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति । भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ १ ॥आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । तब उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया ॥ १ ॥

ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वानुशशासेत्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे भगवांस्त्वेव मे कामे ब्रूयात् ॥ २ ॥

'हे सोम्य ! तू ब्रह्मवेत्ता-सा भासित हो रहा है; तुझे किसने उपदेश दिया है ?' ऐसा [आचार्यने पूछा] तब उसने उत्तर दिया 'मनुष्योंसे भिन्न [देवताओं] ने मुझे उपदेश दिया है, अब मेरी इच्छाके अनुसार आप पूज्यपाद ही मुझे विद्याका उपदेश करें' ॥ २ ॥

ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि । <br><br> प्रसन्नेन्द्रियः प्रहसितवदनश्च'हे सोम्य ! तू ब्रह्मवेत्ता-सा भासित हो रहा है।' कृतार्थ ब्रह्मवेत्ता ही प्रसन्नेन्द्रिय, हास्ययुक्त मुख-

३९८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

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३९८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| निश्चिन्तः कृतार्थो ब्रह्मविद्भवति अत आचार्यों ब्रह्मविदिव भासीति को न्विति वितर्कयन्नुवाच कस्त्वामनुशशासेति ।<br><br>स चाह सत्यकामोऽन्ये मनुष्येभ्यो देवता मामनुशिष्टवत्यः, कोऽन्यो भगवच्छिष्यं मां मनुष्यः सन्ननुशासितुमुत्सहेतेत्यभिप्रायः । अतोऽन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे प्रतिज्ञातवान् । भगवांस्त्वेव मे कामे ममेच्छायां ब्रूयात्किमन्यैरुक्तेन नाहं तद्गणयामीत्यभिप्रायः॥२॥ | वाला और चिन्तारहित हुआ करता है इसीसे आचार्यने कहा कि 'तू ब्रह्मवेत्ता-सा प्रतीत होता है, और 'को नु' इस प्रकार वितर्क करते हुए पूछा 'तुझे किसने उपदेश दिया है?'<br><br>उस सत्यकामने कहा—'मनुष्योंसे अन्य देवताओंने मुझे उपदेश दिया है।' तात्पर्य यह है कि 'मनुष्य होनेपर तो मुझ श्रीमान्‌के शिष्यको उपदेश करनेका साहस ही कौन कर सकता है?' अतः उसने यही प्रतिज्ञा की कि 'मुझे मनुष्योंसे अन्यने उपदेश किया है।' 'अब मेरी इच्छाके अनुसार भगवान् ही मुझे उपदेश करें, औरोंके कहे हुएसे मुझे क्या लेना है?' अभिप्राय यह है कि 'मैं उसे कुछ भी नहीं समझता' ॥ २ ॥ |

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किं च—। यही नहीं—

श्रुतँह्येव मे भगवद्दृशेभ्य आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापतीति तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किञ्चन वीयायेति वोयायेति ॥ ३ ॥

'मैंने श्रीमान्-जैसे ऋषियोंसे सुना है कि आचार्यसे जानी गयी विद्या ही अतिशय साधुताको प्राप्त होती है।' तब आचार्यने उसे उसी विद्याका उपदेश किया। उसमें कुछ भी न्यून नहीं हुआ, न्यून नहीं हुआ [ अर्थात् उसकी विद्या पूर्ण ही रही ] ॥ ३ ॥

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खण्ड ९ ]शाङ्करभाष्यम्३१९

| श्रुतं हि यस्मान्मम विद्यत एवास्मिन्नर्थे भगवद्दृशेभ्यो भगवत्समेभ्य ऋषिभ्यः, आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं साधुतमत्वं प्रापति प्राप्नोतीत्यतो भगवानेव ब्रूयादित्युक्त आचार्योऽब्रवीत्तस्मै तामेव दैवतैरुक्तां विद्याम् । अत्र ह न किञ्चन षोडशकलविद्यायाः किञ्चिदेकदेशमात्रमपि न वीयाय न विगतमित्यर्थः । द्विरभ्यासो विद्यापरिसमाप्त्यर्थः ॥ ३ ॥ | ‘क्योंकि इस विषयमें भगवान्—श्रीमन्‌के सदृश ऋषियोंसे मेरा यही सुना हुआ है कि आचार्यसे जानी गयी विद्या ही अतिशय साधुताको प्राप्त होती है। अतः अब श्रीमान् ही मुझे उपदेश करें।’ ऐसा कहे जानेपर आचार्यने उसे देवताओंद्धारा कही हुई उसी विद्याका उपदेश किया। उसमें अर्थात् उस षोडश कलाओंवाली विद्यामें कुछ भी—उसका एकदेश भी व्यययुक्त यानी विगत नहीं हुआ अर्थात् उसकी विद्या पूर्ण ही रही। ‘वीया५ वीयाय’ यह द्विरुक्ति विद्याकी समाप्तिके लिये है ॥ ३ ॥ |


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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥

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दशम खण्ड

उपकोसलके प्रति अग्निद्वारा ब्रह्मविद्याका उपदेश

| पुनर्ब्रह्मविद्यां प्रकारान्तरेण वक्ष्यामीत्यारभते गतिं च तद्विदोऽग्निविद्यां च। आख्यायिका पूर्ववच्छ्रद्धातपसोर्ब्रह्मविद्यासाधनत्वप्रदर्शनार्था। | पुनः अन्य प्रकारसे ब्रह्मविद्याका निरूपण करना है, इसलिये तथा ब्रह्मवेत्ताकी गति और अग्निविद्या भी बतलानी है, इसलिये श्रुति आरम्भ करती है। यहाँ जो आख्यायिका है वह पूर्ववत् श्रद्धा और तपका ब्रह्मविद्यामें साधनत्व प्रदर्शित करनेके लिये है। |

उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास तस्य ह द्वादशवर्षाण्यग्नीन्परिचचार स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयंस्तꣳह स्मैव न समावर्तयति ॥ १ ॥

उपकोसलनामसे प्रसिद्ध कमलका पुत्र सत्यकाम जाबालके यहाँ ब्रह्मचर्य ग्रहण करके रहता था। उसने बारह वर्षतक उस आचार्यके अग्नियोंकी सेवा की; किंतु आचार्यने अन्य ब्रह्मचारियोंका तो समावर्तन संस्कार कर दिया, किंतु केवल इसीका नहीं किया ॥ १ ॥

| उपकोसलो ह वै नामतः कमलस्यापत्यं कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास। तस्य ह ऐतिह्यार्थः। तस्याचार्यस्य द्वादशवर्षाण्यग्नीन्परिचचाराग्नी- | कमलके पुत्र कामलायनने, जिसका नाम उपकोसल था, सत्यकाम जाबालके यहाँ ब्रह्मचर्यपूर्वक वास किया। 'तस्य ह' इसमें ह ऐतिह्यके लिये है। उसने बारह वर्षोंतक उस आचार्यके अग्नियोंकी |

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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ४०१


नां परिचरणं कृतवान् । स ह स्माचार्योऽन्यान्ब्रह्मचारिणः स्वाध्यायं ग्राहयित्वा समावर्तयंस्तमेवोपकोसलमेकं न समावर्तयति स्म ह ॥ १ ॥परिचर्या—सेवा की । किन्तु उस आचार्यने अन्य ब्रह्मचारियोंका तो स्वाध्याय ग्रहण कराकर समावर्तन कर दिया, किन्तु उस उपकोसलका ही समावर्तन नहीं किया ॥ १ ॥

तं जायोवाच तप्तो ब्रह्मचारी कुशलमग्नीन्परिचचारीन्मा त्वाग्नयः परिप्रवोचन्प्रब्रूह्यस्मा इति तस्मै हाप्रोच्यैव प्रवासाञ्चक्रे ॥ २ ॥

उस ( आचार्य ) से उसकी भार्याने कहा—'यह ब्रह्मचारी खूब तपस्या कर चुका है, इसने अच्छी तरह अग्नियोंकी सेवा की है। [ देखिये ] अग्नियाँ आपकी निन्दा न करें। अतः इसे विद्याका उपदेश कर दीजिये।' किन्तु वह उसे उपदेश किये बिना ही बाहर चला गया ॥ २ ॥


तमाचार्यं जायोवाच [उपकोसलाय विद्यां ब्रूहीति पतिं प्रत्याचार्यपत्न्या अनुरोधः] तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं सम्यगग्नीन्परिचचारीत्परिचरितवान् । भगवांश्चाग्निषु भक्तं न समावर्तयति । अतोऽस्मद्भक्तं न समावर्तयतीति ज्ञात्वा त्वामग्नयो मा परिप्रवोचन्गर्हां तव मा कुर्युः । अतः प्रब्रूह्यस्मै विद्यामि-उस आचार्यसे उसकी भार्याने कहा—'इस ब्रह्मचारीने खूब तपस्या की है; इसने अग्नियोंकी अच्छी तरह सेवा की है ! किन्तु श्रीमान् तो अग्नियोंमें भक्ति रखनेवाले इसका समावर्तन ही नहीं करते । अतः 'यह हमारे भक्तका समावर्तन नहीं करता'—ऐसा जानकर अग्नियाँ आपका परिवाद—आपकी निन्दा न करें; इसलिये इस उपकोसलको इसकी अभीष्ट विद्याका उपदेश कर दीजिये।'