महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
(अनुगीतापर्व)
६- नारदजीकी आज्ञासे मरुत्तका उनकी बतायी हुई युक्ति के अनुसार संवर्तसे भेंट करना ७- संवर्त और मरुत्तकी बातचीत, मरुत्तके विशेष आग्रहपर संवर्तका यज्ञ करानेकी स्वीकृति देना ८- संवर्तका मरुत्तको सुवर्णकी प्राप्तिके लिये महादेवजीकी नाममयी स्तुतिका उपदेश और धनकी प्राप्ति तथा मरुत्तकी सम्पत्तिसे बृहस्पतिका चिन्तित होना ९- बृहस्पतिका इन्द्रसे अपनी चिन्ताका कारण बताना, इन्द्रकी आज्ञासे अग्निदेवका मरुत्तके पास उनका संदेश लेकर जाना और संवर्तके भयसे पुनः लौटकर इन्द्रसे ब्रह्मबलकी श्रेष्ठता बताना १०- इन्द्रका गन्धर्वराजको भेजकर मरुत्तको भय दिखाना और संवर्तका मन्त्र-बलसे इन्द्रसहित सब देवताओंको बुलाकर मरुत्तका यज्ञ पूर्ण करना ११- श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको इन्द्रद्वारा शरीरस्थ वृत्रासुरका संहार करनेका इतिहास सुनाकर समझाना १२- भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको मनपर विजय करनेके लिये आदेश १३- श्रीकृष्णद्वारा ममताके त्यागका महत्त्व, काम-गीताका उल्लेख और युधिष्ठिरको यज्ञके लिये प्रेरणा करना १४- ऋषियोंका अन्तर्धान होना, भीष्म आदिका श्राद्ध करके युधिष्ठिर आदिका हस्तिनापुरमें जाना तथा युधिष्ठिरके धर्म-राज्यका वर्णन १५- भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनसे द्वारका जानेका प्रस्ताव करना
(अनुगीतापर्व)
१६- अर्जुनका श्रीकृष्णसे गीताका विषय पूछना और श्रीकृष्णका अर्जुनसे सिद्ध, महर्षि एवं कश्यपका संवाद सुनाना १७- कश्यपके प्रश्नोंके उत्तरमें सिद्ध महात्माद्वारा जीवकी विविध गतियोंका वर्णन १८- जीवके गर्भ-प्रवेश, आचार-धर्म, कर्म-फलकी अनिवार्यता तथा संसारसे तरनेके उपायका वर्णन १९- गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन २०- ब्राह्मणगीता—एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना २१- दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन २२- मन-बुद्धि और इन्द्रियरूप सप्त होताओंका, यज्ञ तथा मन-इन्द्रिय-संवादका वर्णन २३- प्राण, अपान आदिका संवाद और ब्रह्माजीका सबकी श्रेष्ठता बतलाना २४- देवर्षि नारद और देवमतका संवाद एवं उदानके उत्कृष्ट रूपका वर्णन
२५- चातुर्होम यज्ञका वर्णन २६- अन्तर्यामीकी प्रधानता २७- अध्यात्मविषयक महान् वनका वर्णन २८- ज्ञानी पुरुषकी स्थिति तथा अध्वर्यु और यतिका संवाद २९- परशुरामजीके द्वारा क्षत्रिय-कुलका संहार ३०- अलर्कके ध्यान-योगका उदाहरण देकर पितामहोंका परशुरामजीको समझाना और परशुरामजीका तपस्याके द्वारा सिद्धि प्राप्त करना ३१- राजा अम्बरीषकी गायी हुई आध्यात्मिक स्वराज्यविषयक गाथा ३२- ब्राह्मण-रूपधारी धर्म और जनकका ममत्वत्याग विषयक संवाद ३३- ब्राह्मणका पत्नीके प्रति अपने ज्ञाननिष्ठ स्वरूपका परिचय देना ३४- भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा ब्राह्मण, ब्राह्मणी और क्षेत्रज्ञका रहस्य बतलाते हुए ब्राह्मण-गीताका उपसंहार ३५- श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर ३६- ब्रह्माजीके द्वारा तमोगुणका, उसके कार्यका और फलका वर्णन ३७- रजोगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल ३८- सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल ३९- सत्त्व आदि गुणोंका और प्रकृतिके नामोंका वर्णन ४०- महत्तत्त्वके नाम और परमात्मतत्त्वको जाननेकी महिमा ४१- अहंकारकी उत्पत्ति और उसके स्वरूपका वर्णन ४२- अहंकारसे पंच महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश ४३- चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता ४४- सब पदार्थोंके आदि-अन्तका और ज्ञानकी नित्यताका वर्णन ४५- देहरूपी कालचक्रका तथा गृहस्थ और ब्राह्मणके धर्मका कथन ४६- ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासीके धर्मका वर्णन ४७- मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन ४८- आत्मा और परमात्माके स्वरूपका विवेचन ४९- धर्मका निर्णय जाननेके लिये ऋषियोंका प्रश्न ५०- सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान्की प्रशंसा, पंचभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन
५१- तपस्याका प्रभाव, आत्माका स्वरूप और उसके ज्ञानकी महिमा तथा अनुगीताका उपसंहार ५२- श्रीकृष्णका अर्जुनके साथ हस्तिनापुर जाना और वहाँ सबसे मिलकर युधिष्ठिरकी आज्ञा ले सुभद्राके साथ द्वारकाको प्रस्थान करना ५३- मार्गमें श्रीकृष्णसे कौरवोंके विनाशकी बात सुनकर उत्तंकमुनिका कुपित होना और श्रीकृष्णका उन्हें शान्त करना ५४- भगवान् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना ५५- श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना ५६- उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना ५७- उत्तंकका सौदाससे उनकी रानीके कुण्डल माँगना और सौदासके कहनेसे रानी मदयन्तीके पास जाना ५८- कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना ५९- भगवान् श्रीकृष्णका द्वारकामें जाकर रैवतक पर्वतपर महोत्सवमें सम्मिलित होना और सबसे मिलना ६०- वसुदेवजीके पूछनेपर श्रीकृष्णका उन्हें महाभारत-युद्धका वृत्तान्त संक्षेपसे सुनाना ६१- श्रीकृष्णका सुभद्राके कहनेसे वसुदेवजीको अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनाना ६२- वसुदेव आदि यादवोंका अभिमन्युके निमित्त श्राद्ध करना तथा व्यासजीका उत्तरा और अर्जुनको समझाकर युधिष्ठिरको अश्वमेधयज्ञ करनेकी आज्ञा देना ६३- युधिष्ठिरका अपने भाइयोंके साथ परामर्श करके सबको साथ ले धन ले आनेके लिये प्रस्थान करना ६४- पाण्डवोंका हिमालयपर पहुँचकर वहाँ पड़ाव डालना और रातमें उपवासपूर्वक निवास करना ६५- ब्राह्मणोंकी आज्ञासे भगवान् शिव और उनके पार्षद आदिकी पूजा करके युधिष्ठिरका उस धनराशिको खुदवाकर अपने साथ ले जाना ६६- श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें आगमन और उत्तराके मृत बालकको जिलानेके लिये कुन्तीकी उनसे प्रार्थना ६७- परीक्षित्को जिलानेके लिये सुभद्राकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना ६८- श्रीकृष्णका प्रसूतिकागृहमें प्रवेश, उत्तराका विलाप और अपने पुत्रको जीवित करनेके लिये प्रार्थना
६९- उत्तराका विलाप और भगवान् श्रीकृष्णका उसके मृत बालकको जीवन-दान देना ७०- श्रीकृष्णद्वारा राजा परीक्षित्का नामकरण तथा पाण्डवोंका हस्तिनापुरके समीप आगमन ७१- भगवान् श्रीकृष्ण और उनके साथियोंद्वारा पाण्डवोंका स्वागत, पाण्डवोंका नगरमें आकर सबसे मिलना और व्यासजी तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको यज्ञके लिये आज्ञा देना ७२- व्यासजीकी आज्ञासे अश्वकी रक्षाके लिये अर्जुनकी, राज्य और नगरकी रक्षाके लिये भीमसेन और नकुलकी तथा कुटुम्ब-पालनके लिये सहदेवकी नियुक्ति ७३- सेनासहित अर्जुनके द्वारा अश्वका अनुसरण ७४- अर्जुनके द्वारा त्रिगर्तोंकी पराजय ७५- अर्जुनका प्राग्ज्योतिषपुरके राजा वज्रदत्तके साथ युद्ध ७६- अर्जुनके द्वारा वज्रदत्तकी पराजय ७७- अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध ७८- अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध और दुःशलाके अनुरोधसे उसकी समाप्ति ७९- अर्जुन और बभ्रुवाहनका युद्ध एवं अर्जुनकी मृत्यु ८०- चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोद्गार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुनः जीवित होना ८१- उलूपीका अर्जुनके पूछनेपर अपने आगमनका कारण एवं अर्जुनकी पराजयका रहस्य बताना, पुत्र और पत्नीसे विदा लेकर पार्थका पुनः अश्वके पीछे जाना ८२- मगधराज मेघसन्धिकी पराजय ८३- दक्षिण और पश्चिम समुद्रके तटवर्ती देशोंमें होते हुए अश्वका द्वारका, पंचनद एवं गान्धार देशमें प्रवेश ८४- शकुनिपुत्रकी पराजय ८५- यज्ञभूमिकी तैयारी, नाना देशोंसे आये हुए राजाओंका यज्ञकी सजावट और आयोजन देखना ८६- राजा युधिष्ठिरका भीमसेनको राजाओंकी पूजा करनेका आदेश और श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे अर्जुनका संदेश कहना ८७- अर्जुनके विषयमें श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरकी बातचीत, अर्जुनका हस्तिनापुरमें जाना तथा उलूपी और चित्रांगदाके साथ बभ्रुवाहनका आगमन ८८- उलूपी और चित्रांगदाके सहित बभ्रुवाहनका रत्न-आभूषण आदिसे सत्कार तथा अश्वमेधयज्ञका आरम्भ ८९- युधिष्ठिरका ब्राह्मणोंको दक्षिणा देना और राजाओंको भेंट देकर विदा करना
(वैष्णवधर्मपर्व)
९०- युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छ-वृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना ९१- हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा ९२- महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा
(वैष्णवधर्मपर्व)
१- युधिष्ठिरका वैष्णवधर्मविषयक प्रश्न और भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन २- चारों वर्णोंके कर्म और उनके फलोंका वर्णन तथा धर्मकी वृद्धि और पापके क्षय होनेका उपाय ३- व्यर्थ जन्म, दान और जीवनका वर्णन, सात्त्विक दानोंका लक्षण, दानका योग्य पात्र और ब्राह्मणकी महिमा ४- बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन ५- यमलोकके मार्गका कष्ट और उससे बचनेके उपाय ६- जल-दान, अन्न-दान और अतिथि-सत्कारका माहात्म्य ७- भूमिदान, तिलदान और उत्तम ब्राह्मणकी महिमा ८- अनेक प्रकारके दानोंकी महिमा ९- पंचमहायज्ञ, विधिवत् स्नान और उसके अंगभूत कर्म, भगवान्के प्रिय पुष्प तथा भगवद्भक्तोंका वर्णन १०- कपिला गौका तथा उसके दानका माहात्म्य और कपिला गौके दस भेद ११- कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन १२- ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है, उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन १३- धर्म और शौचके लक्षण, संन्यासी और अतिथिके सत्कारके उपदेश, शिष्टाचार, दानपात्र ब्राह्मण तथा अन्नदानकी प्रशंसा १४- भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध १५- आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तमकाल और मानव-धर्म-सारका वर्णन १६- अग्निके स्वरूपमें अग्निहोत्रकी विधि तथा उसके माहात्म्यका वर्णन
आश्रमवासिकपर्व
१७- चान्द्रायणव्रतकी विधि, प्रायश्चित्तरूपमें उसके करनेका विधान तथा महिमाका वर्णन १८- सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशीव्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान्की स्तुति १९- विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त २०- उत्तम और अधम ब्राह्मणोंके लक्षण, भक्त, गौ और पीपलकी महिमा २१- भगवान्के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन
आश्रमवासिकपर्व
(आश्रमवासपर्व)
१- भाइयोंसहित युधिष्ठिर तथा कुन्ती आदि देवियोंके द्वारा धृतराष्ट्र और गान्धारीकी सेवा २- पाण्डवोंका धृतराष्ट्र और गान्धारीके अनुकूल बर्ताव ३- राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिरसे और कुन्ती आदिका दुःखी होना ४- व्यासजीके समझानेसे युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको वनमें जानेके लिये अनुमति देना ५- धृतराष्ट्रके द्वारा युधिष्ठिरको राजनीतिका उपदेश ६- धृतराष्ट्रद्वारा राजनीतिका उपदेश ७- युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रके द्वारा राजनीतिका उपदेश ८- धृतराष्ट्रका कुरुजांगल देशकी प्रजासे वनमें जानेके लिये आज्ञा माँगना ९- प्रजाजनोंसे धृतराष्ट्रकी क्षमा-प्रार्थना १०- प्रजाकी ओरसे साम्बनामक ब्राह्मणका धृतराष्ट्रको सान्त्वनापूर्ण उत्तर देना ११- धृतराष्ट्रका विदुरके द्वारा युधिष्ठिरसे श्राद्धके लिये धन माँगना, अर्जुनकी सहमति और भीमसेनका विरोध १२- अर्जुनका भीमको समझाना और युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको यथेष्ट धन देनेकी स्वीकृति प्रदान करना १३- विदुरका धृतराष्ट्रको युधिष्ठिरका उदारतापूर्ण उत्तर सुनाना १४- राजा धृतराष्ट्रके द्वारा मृत व्यक्तियोंके लिये श्राद्ध एवं विशाल दान-यज्ञका अनुष्ठान १५- गान्धारीसहित धृतराष्ट्रका वनको प्रस्थान
(पुत्रदर्शनपर्व)
१६- धृतराष्ट्रका पुरवासियोंको लौटाना और पाण्डवोंके अनुरोध करनेपर भी कुन्तीका वनमें जानेसे न रुकना १७- कुन्तीका पाण्डवोंको उनके अनुरोधका उत्तर १८- पाण्डवोंका स्त्रियोंसहित निराश लौटना, कुन्तीसहित गान्धारी और धृतराष्ट्र आदिका मार्गमें गंगा-तटपर निवास करना १९- धृतराष्ट्र आदिका गंगातटपर निवास करके वहाँसे कुरुक्षेत्रमें जाना और शतयूपके आश्रमपर निवास करना २०- नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तपः सिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी वर्णन करना २१- धृतराष्ट्र आदिके लिये पाण्डवों तथा पुरवासियोंकी चिन्ता २२- माताके लिये पाण्डवोंकी चिन्ता, युधिष्ठिरकी वनमें जानेकी इच्छा, सहदेव और द्रौपदीका साथ जानेका उत्साह तथा रनिवास और सेनासहित युधिष्ठिरका वनको प्रस्थान २३- सेनासहित पाण्डवोंकी यात्रा और उनका कुरुक्षेत्रमें पहुँचना २४- पाण्डवों तथा पुरवासियोंका कुन्ती, गान्धारी और धृतराष्ट्रके दर्शन करना २५- संजयका ऋषियोंसे पाण्डवों, उनकी पत्नियों तथा अन्यान्य स्त्रियोंका परिचय देना २६- धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा विदुरजीका युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश २७- युधिष्ठिर आदिका ऋषियोंके आश्रम देखना, कलश आदि बाँटना और धृतराष्ट्रके पास आकर बैठना, उन सबके पास अन्यान्य ऋषियोंसहित महर्षि व्यासका आगमन २८- महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना
(पुत्रदर्शनपर्व)
२९- धृतराष्ट्रका मृत बान्धवोंके शोकसे दुःखी होना तथा गान्धारी और कुन्तीका व्यासजीसे अपने मरे हुए पुत्रोंके दर्शन करनेका अनुरोध ३०- कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना ३१- व्यासजीके द्वारा धृतराष्ट्र आदिके पूर्वजन्मका परिचय तथा उनके कहनेसे सब लोगोंका गंगा-तटपर जाना ३२- व्यासजीके प्रभावसे कुरुक्षेत्रके युद्धमें मारे गये कौरव-पाण्डववीरोंका गंगाजीके जलसे प्रकट होना
(नारदागमनपर्व)
३३- परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गंगाजीमें गोता लगाकर अपने-अपने पतिके लोकको प्राप्त करना तथा इस पर्वके श्रवणकी महिमा ३४- मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुनः दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान ३५- व्यासजीकी कृपासे जनमेजयको अपने पिताका दर्शन प्राप्त होना ३६- व्यासजीकी आज्ञासे धृतराष्ट्र आदिका पाण्डवोंको विदा करना और पाण्डवोंका सदलबल हस्तिनापुरमें आना
(नारदागमनपर्व)
३७- नारदजीसे धृतराष्ट्र आदिके दावानलमें दग्ध हो जानेका हाल जानकर युधिष्ठिर आदिका शोक करना ३८- नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन ३९- राजा युधिष्ठिरद्वारा धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती—इन तीनोंकी हड्डियोंको गंगामें प्रवाहित कराना तथा श्राद्धकर्म करना
मौसलपर्व
१- युधिष्ठिरका अपशकुन देखना, यादवोंके विनाशका समाचार सुनना, द्वारकामें ऋषियोंके शापवश साम्बके पेटसे मूसलकी उत्पत्ति तथा मदिराके निषेधकी कठोर आज्ञा २- द्वारकामें भयंकर उत्पात देखकर भगवान् श्रीकृष्णका यदुवंशियोंको तीर्थयात्राके लिये आदेश देना ३- कृतवर्मा आदि समस्त यादवोंका परस्पर संहार ४- दारुकका अर्जुनको सूचना देनेके लिये हस्तिनापुर जाना, बभ्रुका देहावसान एवं बलराम और श्रीकृष्णका परमधाम-गमन ५- अर्जुनका द्वारकामें आना और द्वारका तथा श्रीकृष्ण-पत्नियोंकी दशा देखकर दुःखी होना ६- द्वारकामें अर्जुन और वसुदेवजीकी बातचीत
महाप्रस्थानिकपर्व
७- वसुदेवजी तथा मौसलयुद्धमें मरे हुए यादवोंका अन्त्येष्टि-संस्कार करके अर्जुनका द्वारकावासी स्त्री-पुरुषोंको अपने साथ ले जाना, समुद्रका द्वारकाको डुबो देना और मार्गमें अर्जुनपर डाकुओंका आक्रमण, अवशिष्ट यादवोंको अपनी राजधानीमें बसा देना ८- अर्जुन और व्यासजीकी बातचीत
महाप्रस्थानिकपर्व
१- वृष्णिवंशियोंका श्राद्ध करके प्रजाजनोंकी अनुमति ले द्रौपदीसहित पाण्डवोंका महाप्रस्थान २- मार्गमें द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन, और भीमसेनका गिरना तथा युधिष्ठिरद्वारा प्रत्येकके गिरनेका कारण बताया जाना ३- युधिष्ठिर इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, युधिष्ठिरका अपने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना
स्वर्गारोहणपर्व
१- स्वर्गमें नारद और युधिष्ठिरकी बातचीत २- देवदूतका युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा भाइयोंका करुणक्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निश्चय करना ३- इन्द्र और धर्मका युधिष्ठिरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना ४- युधिष्ठिरका दिव्यलोकमें श्रीकृष्ण, अर्जुन आदिका दर्शन करना ५- भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य १- महाभारत श्रवणविधि २- महाभारत-माहात्म्य
चित्र-सूची
चित्र-सूची
(सादा)
क्रमसंख्या विषय
१- [धर्मात्मा शुक और इन्द्रकी बातचीत](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/80) २- [महर्षि वसिष्ठका ब्रह्माजीके साथ प्रश्नोत्तर](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/81) ३- [भगवान् श्रीकृष्ण एवं विभिन्न महर्षियोंका युधिष्ठिरको उपदेश](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/276) ४- [भयभीत कबूतर महाराज शिबिकी गोदमें](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/404) ५- [पृथ्वी और श्रीकृष्णका संवाद](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/418) ६- [जालके साथ नदीमेंसे निकाले गये महर्षि च्यवन](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/511) ७- [महर्षि च्यवनका मूल्यांकन](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/516) ८- [इन्द्रका ब्रह्माजीके साथ गौओंके सम्बन्धमें प्रश्नोत्तर](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/654) ९- [महर्षि वसिष्ठका राजा सौदासे गौओंका माहात्म्य-कथन](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/690) १०- [भगवती लक्ष्मीकी गौओंसे आश्रयके लिये प्रार्थना](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/709) ११- [गृहस्थ-धर्मके सम्बन्धमें श्रीकृष्णका पृथ्वीके साथ संवाद](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/80) १२- [बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको उपदेश](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/81) १३- [देवलोकमें पतिव्रता शाण्डिली और सुमनाकी बातचीत](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/276) १४- [सामनीतिकी विजय](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/404) १५- [इन्द्रका भगवान् विष्णुके साथ प्रश्नोत्तर](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/418) १६- [भगवान् श्रीकृष्णकी तपस्या](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/511) १७- [भगवान् शंकर श्रीकृष्णका माहात्म्य कह रहे हैं](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/516) १८- [भगवान् दत्तात्रेयकी कार्तवीर्यपर कृपा](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/654) १९- [शर-शय्यापर पड़े भीष्मकी युधिष्ठिरसे बातचीत](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/690) २०- [श्रीकृष्ण और व्यासजीके द्वारा पुत्र-शोकाकुला गंगाजीको सान्त्वना](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/1564) २१- [महाराज मरुत्तकी देवर्षिसे भेंट](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/80) २२- [महाराज मरुत्तका संवर्त मुनिसे संवाद](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/81) २३- [ब्रह्माजीका ऋषियोंको उपदेश](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/276) २४- [उत्तंक मुनिकी श्रीकृष्णसे विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/404) २५- [महारानी मदयन्तीका उत्तंकको कुण्डल-दान](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/418) २६- [उत्तंकका गुरुपत्नीको कुण्डल अर्पण करना](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/511) २७- [भगवान् श्रीकृष्ण अपने माता-पिता आदिको महाभारतका वृत्तान्त सुना रहे हैं](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/516) २८- [अश्वमेधयज्ञके लिये छोड़े हुए घोड़ेका अर्जुनके द्वारा अनुगमन](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/654)
२९- अर्जुन अपने पुत्र बभ्रुवाहनको छातीसे लगा रहे हैं ३०- महाराज युधिष्ठिरके अश्वमेधयज्ञमें एक नेवलेका आगमन ३१- महर्षि अगस्त्यकी यज्ञके समय प्रतिज्ञा ३२- विदुरका सूक्ष्मशरीरसे युधिष्ठिरमें प्रवेश ३३- व्यासजीके द्वारा कौरव-पाण्डवपक्षके मरे हुए सम्बन्धियोंका सेनासहित परलोकसे आवाहन ३४- साम्बके पेटसे यदुवंश-विनाशके लिये मूसल पैदा होनेका ऋषियोंद्वारा शाप ३५- वसुदेवजी अर्जुनको यादव-विनाशका वृत्तान्त और श्रीकृष्णका संदेश सुना रहे हैं ३६- अग्निकी प्रेरणासे अर्जुन अपने गाण्डीव धनुष और अक्षय तरकसको जलमें डाल रहे हैं ३७- देवदूतका युधिष्ठिरको मायामय नरकका दर्शन कराना
अनुशासनपर्व
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
श्रीमहाभारतम्
अनुशासनपर्व
दानधर्मपर्व
प्रथमोऽध्यायः
युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत) का पाठ करना चाहिये ॥
युधिष्ठिर उवाच
शमो बहुविधाकारः सूक्ष्म उक्तः पितामह ।
न च मे हृदये शान्तिरस्ति श्रुत्वेदमीदृशम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— पितामह! आपने नाना प्रकारसे शान्तिके सूक्ष्म स्वरूपका (शोकसे मुक्त होनेके विविध उपायोंका) वर्णन किया; परंतु आपका यह ऐसा उपदेश सुनकर भी मेरे हृदयमें शान्ति नहीं है ॥ १ ॥
अस्मिन्नर्थे बहुविधा शान्तिरुक्ता पितामह ।
स्वकृते का नु शान्तिः स्याच्छमाद् बहुविधादपि ॥ २ ॥
दादाजी! आपने इस विषयमें शान्तिके बहुत-से उपाय बताये, परंतु इन नाना प्रकारके शान्तिदायक उपायोंको सुनकर भी स्वयं ही किये गये अपराधसे मनको शान्ति कैसे प्राप्त हो सकती है ॥ २ ॥
शराचितशरीरं हि तीव्रव्रणमुदीक्ष्य च ।
शर्म नोपलभे वीर दुष्कृतान्येव चिन्तयन् ॥ ३ ॥ वीरवर! बाणोंसे भरे हुए आपके शरीर और इसके गहरे घावको देखकर मैं बार-बार अपने पापोंका ही चिन्तन करता हूँ; अतः मुझे तनिक भी चैन नहीं मिलता है ॥ ३ ॥ रुधिरेणावसिक्ताङ्गं प्रसवन्तं यथाचलम् । त्वां दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्र सीदे वर्षास्विवाम्बुजम् ॥ ४ ॥ पुरुषसिंह! पर्वतसे गिरनेवाले झरनेकी तरह आपके शरीरसे रक्तकी धारा बह रही है—आपके सारे अङ्ग खूनसे लथपथ हो रहे हैं। इस अवस्थामें आपको देखकर मैं वर्षाकालके कमलकी तरह गला (दुःखित होता) जाता हूँ ॥ ४ ॥ अतः कष्टतरं किं नु मत्कृते यत् पितामहः । इमामवस्थां गमितः प्रत्यमित्रै रणाजिरे ॥ ५ ॥ मेरे ही कारण समराङ्गणमें शत्रुओंने जो पितामहको इस अवस्थामें पहुँचा दिया, इससे बढ़कर कष्टकी बात और क्या हो सकती है? ॥ ५ ॥ तथा चान्ये नृपतयः सहपुत्राः सबान्धवाः । मत्कृते निधनं प्राप्ताः किं नु कष्टतरं ततः ॥ ६ ॥ आपके सिवा और भी बहुत-से नरेश मेरे ही कारण अपने पुत्रों और बान्धवोंसहित युद्धमें मारे गये हैं। इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या होगी? ॥ ६ ॥ वयं हि धार्तराष्ट्राश्च कालमन्युवशंगताः । कृत्वेदं निन्दितं कर्म प्राप्स्यामः कां गतिं नृप ॥ ७ ॥ नरेश्वर! हम पाण्डव और धृतराष्ट्रके सभी पुत्र काल और क्रोधके वशीभूत हो यह निन्दित कर्म करके न जाने किस दुर्गतिको प्राप्त होंगे! ॥ ७ ॥ इदं तु धार्तराष्ट्रस्य श्रेयो मन्ये जनाधिप । इमामवस्थां सम्प्राप्तं यदसौ त्वां न पश्यति ॥ ८ ॥ नरेश्वर! मैं राजा दुर्योधनके लिये उसकी मृत्युको श्रेष्ठ समझता हूँ, जिससे कि वह आपको इस अवस्थामें पड़ा हुआ नहीं देखता है ॥ ८ ॥ सोऽहं तव ह्यन्तकरः सुहृद्वधकरस्तथा । न शान्तिमधिगच्छामि पश्यंस्त्वां दुःखितं क्षितौ ॥ ९ ॥ मैं ही आपके जीवनका अन्त करनेवाला हूँ और मैं ही दूसरे-दूसरे सुहृदोंका भी वध करनेवाला हूँ। आपको इस दुःखमयी दुरवस्थामें भूमिपर पड़ा देख मुझे शान्ति नहीं मिलती है ॥ ९ ॥ दुर्योधनो हि समरे सहसैन्यः सहानुजः । निहतः क्षत्रधर्मेऽस्मिन् दुरात्मा कुलपांसनः ॥ १० ॥ दुरात्मा एवं कुलाङ्गार दुर्योधन सेना और बन्धुओं सहित क्षत्रियधर्मके अनुसार होनेवाले इस युद्धमें मारा गया ॥ १० ॥
न स पश्यति दुष्टात्मा त्वामद्य पतितं क्षितौ । अतः श्रेयो मृतं मन्ये नेह जीवितमात्मनः ॥ ११ ॥ वह दुष्टात्मा आज आपको इस तरह भूमिपर पड़ा हुआ नहीं देख रहा है, अतः उसकी मृत्युको ही मैं यहाँ श्रेष्ठ मानता हूँ; किन्तु अपने इस जीवनको नहीं ॥ ११ ॥
अहं हि समरे वीर गमितः शत्रुभिः क्षयम् । अभविष्यं यदि पुरा सह भ्रातृभिरच्युत ॥ १२ ॥ न त्वामेवं सुदुःखार्तमद्राक्षं सायकार्दितम् । अपनी मर्यादासे कभी नीचे न गिरनेवाले वीरवर! यदि भाइयोंसहित मैं शत्रुओंद्वारा पहले ही युद्धमें मार डाला गया होता तो आपको इस प्रकार सायकोंसे पीड़ित और अत्यन्त दुःखसे आतुर अवस्थामें नहीं देखता ॥ १२ १/२ ॥
नूनं हि पापकर्मणो धात्रा सृष्टाः स्म हे नृप ॥ १३ ॥ अन्यस्मिन्नपि लोके वै यथा मुच्येम किल्बिषात् । तथा प्रशाधि मां राजन् मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥ १४ ॥ नरेश्वर! निश्चय ही विधाताने हमें पापी ही रचा है। राजन्! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे परलोकमें भी मुझे इस पापसे छुटकारा मिल सके ॥ १३-१४ ॥
भीष्म उवाच
परतन्त्रं कथं हेतुमात्मानमनुपश्यसि । कर्मणां हि महाभाग सूक्ष्मं ह्येतदतीन्द्रियम् ॥ १५ ॥ भीष्मजी कहते हैं—महाभाग! तुम तो सदा परतन्त्र हो (काल, अदृष्ट और ईश्वरके अधीन हो), फिर अपनेको शुभाशुभ कर्मोंका कारण क्यों समझते हो? वास्तवमें कर्मोंका कारण क्या है, यह विषय अत्यन्त सूक्ष्म तथा इन्द्रियोंकी पहुँचसे बाहर है ॥ १५ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । संवादं मृत्युगौतम्योः काललुब्धकपन्नगैः ॥ १६ ॥ इस विषयमें विद्वान् पुरुष गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १६ ॥
गौतमी नाम कौन्तेय स्थविरा शमसंयुता । सर्पेण दष्टं स्वं पुत्रमपश्यद्गतचेतनम् ॥ १७ ॥ कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें गौतमी नामवाली एक बूढ़ी ब्राह्मणी थी, जो शान्तिके साधनमें संलग्न रहती थी। एक दिन उसने देखा, उसके इकलौते बेटेको साँपने डँस लिया और उसकी चेतनाशक्ति लुप्त हो गयी ॥
अथ तं स्नायुपाशेन बद्ध्वा सर्पममर्षितः ।
लुब्धकोऽर्जुनको नाम गौतम्याः समुपानयत् ।। १८ ।।
इतनेहीमें अर्जुनक नामवाले एक व्याधने उस साँपको ताँतके फाँसमें बाँध लिया और अमर्षवश वह उसे गौतमीके पास ले आया ।। १८ ।।
स चाब्रवीदयं ते स पुत्रहा पन्नगाधमः ।
ब्रूहि क्षिप्रं महाभागे वध्यतां केन हेतुना ।। १९ ।।
लाकर उसने कहा—‘महाभागे! यही वह नीच सर्प है, जिसने तुम्हारे पुत्रको मार डाला है। जल्दी बताओ, मैं किस तरह इसका वध करूँ? ।। १९ ।।
अग्नौ प्रक्षिप्यतामेष च्छिद्यतां खण्डशोऽपि वा ।
न ह्ययं बालहा पापश्चिरं जीवितुमर्हति ।। २० ।।
‘मैं इसे आगमें झोंक दूँ या इसके टुकड़े-टुकड़े कर डालूँ? बालककी हत्या करनेवाला यह पापी सर्प अब अधिक समयतक जीवित रहने योग्य नहीं है’ ।।
गौतम्युवाच
विसृजैनमबुद्धिस्त्वमवध्योऽर्जुनक त्वया ।
को ह्यात्मानं गुरुं कुर्यात् प्राप्तव्यमविचिन्तयन् ।। २१ ।।
गौतमी बोली— अर्जुनक! छोड़ दे इस सर्पको। तू अभी नादान है। तुझे इस सर्पको नहीं मारना चाहिये। होनहारको कोई टाल नहीं सकता—इस बातको जानते हुए भी इसकी उपेक्षा करके कौन अपने ऊपर पापका भारी बोझ लादेगा? ।। २१ ।।
प्लवन्ते धर्मलघवो लोकेऽम्भसि यथा प्लवाः ।
मज्जन्ति पापगुरवः शस्त्रं स्कन्नमिवोदके ।। २२ ।।
संसारमें धर्माचरण करके जो अपनेको हलके रखते हैं (अपने ऊपर पापका भारी बोझ नहीं लादते हैं), वे पानीके ऊपर चलनेवाली नौकाके समान भवसागरसे पार हो जाते हैं; परंतु जो पापके बोझसे अपनेको बोझिल बना लेते हैं, वे जलमें फेंके हुए हथियारकी भाँति नरक-समुद्रमें डूब जाते हैं ।। २२ ।।
हत्वा चैनं नामृतः स्यादयं मे
जीवत्यस्मिन् कोऽत्ययःस्यादयं ते ।
अस्योत्सर्गे प्राणयुक्तस्य जन्तो-
र्मृत्योर्लोकं को नु गच्छेदन्नन्तम् ।। २३ ।।
इसको मार डालनेसे मेरा यह पुत्र जीवित नहीं हो सकता और इस सर्पके जीवित रहनेपर भी तुम्हारी क्या हानि हो सकती है? ऐसी दशामें इस जीवित प्राणीके प्राणोंका नाश करके कौन यमराजके अनन्त लोकमें जाय? ।। २३ ।।
लुब्धक उवाच
जानाम्यहं देवि गुणागुणज्ञे
सर्वार्तियुक्ता गुरवो भवन्ति । स्वस्थस्यैते तूपदेशा भवन्ति तस्मात् क्षुद्रं सर्पमेनं हनिष्ये ॥ २४ ॥ **व्याधने कहा—**गुण और अवगुणको जाननेवाली देवि! मैं जानता हूँ कि बड़े-बूढ़े लोग किसी भी प्राणीको कष्टमें पड़ा देख इसी तरह दुःखी हो जाते हैं। परंतु ये उपदेश तो स्वस्थ पुरुषके लिये हैं (दुःखी मनुष्यके मनपर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता)। अतः मैं इस नीच सर्पको अवश्य मार डालूँगा ॥ २४ ॥ शमार्थिनः कालगतिं वदन्ति सद्यः शुचं त्वर्थविदस्त्यजन्ति । श्रेयःक्षयं शोचति नित्यमोहात् तस्माच्छुचं मुञ्च हते भुजङ्गे ॥ २५ ॥ शान्ति चाहनेवाले पुरुष कालकी गति बताते हैं (अर्थात् कालने ही इसका नाश कर दिया है, ऐसा कहते हुए शोकका त्याग करके संतोष धारण करते हैं)। परंतु जो अर्थवेत्ता हैं—बदला लेना जानते हैं, वे शत्रु का नाश करके तुरंत ही शोक छोड़ देते हैं। दूसरे लोग श्रेयका नाश होनेपर मोहवश सदा उसके लिये शोक करते रहते हैं; अतः इस शत्रुभूत सर्पके मारे जानेपर तुम भी तत्काल ही अपने पुत्र-शोकको त्याग देना ॥ २५ ॥
गौतम्युवाच
आर्तिर्नैवं विद्यतेऽस्मद्विधानां धर्मात्मानः सर्वदा सज्जना हि । नित्यायस्तो बालकोऽप्यस्य तस्मा- दीशे नाहं पन्नगस्य प्रमाथे ॥ २६ ॥ **गौतमी बोली—**अर्जुनक! हम-जैसे लोगोंको कभी किसी तरहकी हानिसे भी पीड़ा नहीं होती। धर्मात्मा सज्जन पुरुष सदा धर्ममें ही लगे रहते हैं। मेरा यह बालक सर्वथा मरनेहीवाला था; इसलिये मैं इस सर्पको मारनेमें असमर्थ हूँ ॥ २६ ॥ न ब्राह्मणानां कोपोऽस्ति कुतः कोपाच्च यातनाम् । मार्दवात् क्षम्यतां साधो मुच्यतामेष पन्नगः ॥ २७ ॥ ब्राह्मणोंको क्रोध नहीं होता; फिर वे क्रोधवश दूसरोंको पीड़ा कैसे दे सकते हैं; अतः साधो! तू भी कोमलताका आश्रय लेकर इस सर्पके अपराधको क्षमा कर और इसे छोड़ दे ॥ २७ ॥
लुब्धक उवाच
हत्वा लाभः श्रेय एवाव्ययः स्या- ल्लभ्यो लाभ्यः स्याद् बलिभ्यः प्रशस्तः ।
कालाल्लाभो यस्तु सत्यो भवेत् श्रेयोलाभः कुत्सितेऽस्मिन्न ते स्यात् ॥ २८ ॥ व्याधने कहा— देवि! इस सर्पको मार डालनेसे जो बहुतोंका भला होगा, यही अक्षय लाभ है। बलवानोंसे बलपूर्वक लाभ उठाना ही उत्तम लाभ है। कालसे जो लाभ होता है वही सच्चा लाभ है। इस नीच सर्पके जीवित रहनेसे तुम्हें कोई श्रेय नहीं मिल सकता ॥ २८ ॥
गौतम्युवाच
का नु प्राप्तिर्गृह्य शत्रुं निहत्य का कामाप्तिः प्राप्य शत्रुं न मुक्त्वा । कस्मात् सौम्याहं न क्षमे नो भुजङ्गे मोक्षार्थं वा कस्य हेतोर्न कुर्याम् ॥ २९ ॥ गौतमी बोली— अर्जुनक! शत्रुको कैद करके उसे मार डालनेसे क्या लाभ होता है; तथा शत्रुको अपने हाथमें पाकर उसे न छोड़नेसे किस अभीष्ट मनोरथकी प्राप्ति हो जाती है? सौम्य! क्या कारण है कि मैं इस सर्पके अपराधको क्षमा न करूँ? तथा किसलिये इसको छुटकारा दिलानेका प्रयत्न न करूँ? ॥ २९ ॥
लुब्धक उवाच
अस्मादेकाद् बहवो रक्षितव्या नैको बहुभ्यो गौतमि रक्षितव्यः । कृतागसं धर्मविदस्त्यजन्ति सरीसृपं पापमिमं जहि त्वम् ॥ ३० ॥ व्याधने कहा— गौतमी! इस एक सर्पसे बहुतेरे मनुष्योंके जीवनकी रक्षा करनी चाहिये। (क्योंकि यदि यह जीवित रहा तो बहुतोंको काटेगा।) अनेकोंकी जान लेकर एककी रक्षा करना कदापि उचित नहीं है। धर्मज्ञ पुरुष अपराधीको त्याग देते हैं; इसलिये तुम भी इस पापी सर्पको मार डालो ॥ ३० ॥
गौतम्युवाच
नास्मिन् हते पन्नगे पुत्रको मे सम्प्राप्स्यते लुब्धक जीवितं वै । गुणं चान्यं नास्य वधे प्रपश्ये तस्मात् सर्पं लुब्धक मुञ्च जीवम् ॥ ३१ ॥ गौतमी बोली— व्याध! इस सर्पके मारे जानेपर मेरा पुत्र पुनः जीवन प्राप्त कर लेगा, ऐसी बात नहीं है। इसका वध करनेसे दूसरा कोई लाभ भी मुझे नहीं दिखायी देता है।
इसलिये इस सर्पको तुम जीवित छोड़ दो ॥ ३१ ॥
लुब्धक उवाच
वृत्रं हत्वा देवराट् श्रेष्ठभाग् वै
यज्ञं हत्वा भागमवाप चैव ।
शूली देवो देववृत्तं चर त्वं
क्षिप्रं सर्पं जहि मा भूत् ते विशङ्का ॥ ३२ ॥
व्याधने कहा— देवि! वृत्रासुरका वध करके देवराज इन्द्र श्रेष्ठ पदके भागी हुए और त्रिशूलधारी रुद्रदेवने दक्षके यज्ञका विध्वंस करके उसमें अपने लिये भाग प्राप्त किया। तुम भी देवताओंद्वारा किये गये इस बर्तावका ही पालन करो। इस सर्पको शीघ्र ही मार डालो। इस कार्यमें तुम्हें शंका नहीं करनी चाहिये ॥ ३२ ॥
भीष्म उवाच
असकृत् प्रोच्यमानापि गौतमी भुजगं प्रति ।
लुब्धकेन महाभागा पापे नैवाकरोन्मतिम् ॥ ३३ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! व्याधके बार-बार कहने और उकसानेपर भी महाभागा गौतमीने सर्पको मारनेका विचार नहीं किया ॥ ३३ ॥
ईषदूच्छ्वसमानस्तु कृच्छ्रात् संस्तभ्य पन्नगः ।
उत्ससर्ज गिरं मन्दां मानुषीं पाशपीडितः ॥ ३४ ॥
उस समय बन्धनसे पीड़ित होकर धीरे-धीरे साँस लेता हुआ वह साँप बड़ी कठिनाईसे अपनेको सँभालकर मन्दस्वरसे मनुष्यकी वाणीमें बोला ॥ ३४ ॥
सर्प उवाच
को न्वर्जुनक दोषोऽत्र विद्यते मम बालिश ।
अस्वतन्त्रं हि मां मृत्युर्विवशं यदचूचुदत् ॥ ३५ ॥
सर्पने कहा— ओ नादान अर्जुनक! इसमें मेरा क्या दोष है? मैं तो पराधीन हूँ। मृत्युने मुझे विवश करके इस कार्यके लिये प्रेरित किया था ॥ ३५ ॥
तस्यायं वचनाद् दष्टो न कोपेन न काम्यया ।
तस्य तत्किल्बिषं लुब्ध विद्यते यदि किल्बिषम् ॥ ३६ ॥
उसके कहनेसे ही मैंने इस बालकको डँसा है, क्रोधसे और कामनासे नहीं। व्याध! यदि इसमें कुछ अपराध है तो वह मेरा नहीं, मृत्युका है ॥ ३६ ॥
लुब्धक उवाच
यद्यन्यवशगेनेदं कृतं ते पन्नगाशुभम् ।
कारणं वै त्वमप्यत्र तस्मात् त्वमपि किल्बिषी ॥ ३७ ॥
**व्याधने कहा—**ओ सर्प! यद्यपि तूने दूसरेके अधीन होकर यह पाप किया है तथापि तू भी तो इसमें कारण है ही; इसलिये तू भी अपराधी है ॥ ३७ ॥ मृत्पात्रस्य क्रियायां हि दण्डचक्रादयो यथा । कारणत्वे प्रकल्प्यन्ते तथा त्वमपि पन्नग ॥ ३८ ॥ सर्प! जैसे मिट्टीका बर्तन बनाते समय दण्ड और चाक आदिको भी उसमें कारण माना जाता है, उसी प्रकार तू भी इस बालकके वधमें कारण है ॥ ३८ ॥ किल्बिषी चापि मे वध्यः किल्बिषी चासि पन्नग । आत्मानं कारणं ह्यत्र त्वमाख्यासि भुजङ्गम ॥ ३९ ॥ भुजंगम! जो भी अपराधी हो, वह मेरे लिये वध्य है; पन्नग! तू भी अपराधी है ही; क्योंकि तू स्वयं अपने आपको इसके वधमें कारण बताता है ॥ ३९ ॥
सर्प उवाच
सर्व एते ह्यस्ववशा दण्डचक्रादयो यथा । तथाहमपि तस्मान्मे नैष दोषो मतस्तव ॥ ४० ॥ **सर्पने कहा—**व्याध! जैसे मिट्टीका बर्तन बनानेमें ये दण्ड-चक्र आदि सभी कारण पराधीन होते हैं, उसी प्रकार मैं भी मृत्युके अधीन हूँ। इसलिये तुमने जो मुझपर दोष लगाया है, वह ठीक नहीं है ॥ ४० ॥ अथवा मतमेतत्तेऽप्यन्योन्यप्रयोजकाः । कार्यकारणसंदेहो भवत्यन्योन्यचोदनात् ॥ ४१ ॥ अथवा यदि तुम्हारा यह मत हो कि ये दण्ड-चक्र आदि भी एक-दूसरेके प्रयोजक होते हैं; इसलिये कारण हैं ही। किंतु ऐसा माननेसे एक-दूसरेको प्रेरणा देनेवाला होनेके कारण कार्य-कारणभावके निर्णयमें संदेह हो जाता है ॥ ४१ ॥ एवं सति न दोषो मे नास्मि वध्यो न किल्बिषी । किल्विषं समवाये स्यान्मन्यसे यदि किल्बिषम् ॥ ४२ ॥ ऐसी दशामें न तो मेरा कोई दोष है और न मैं वध्य अथवा अपराधी ही हूँ। यदि तुम किसीका अपराध समझते हो तो वह सारे कारणोंके समूहपर ही लागू होता है ॥ ४२ ॥
लुब्धक उवाच
कारणं यदि न स्याद् वै न कर्ता स्यास्त्वमप्युत । विनाशकारणं त्वं च तस्माद् वध्योऽसि मे मतः ॥ ४३ ॥ **व्याधने कहा—**सर्प! यदि मान भी लें कि तू अपराधका न तो कारण है और न कर्ता ही है तो भी इस बालककी मृत्यु तो तेरे ही कारण हुई है, इसलिये मैं तुझे मारने योग्य समझता हूँ ॥ ४३ ॥ असत्यपि कृते कार्ये नेह पन्नग लिप्यते ।
तस्मान्नात्रैव हेतुः स्याद् वध्यः किं बहु भाषसे ॥ ४४ ॥ सर्प! तेरे मतके अनुसार यदि दुष्टतापूर्ण कार्य करके भी कर्ता उस दोषसे लिप्त नहीं होता है, तब तो चोर या हत्यारे आदि जो अपने अपराधोंके कारण राजाओंके यहाँ वध्य होते हैं, उन्हें भी वास्तवमें अपराधी या दोषका भागी नहीं होना चाहिये। (फिर तो पाप और उसका दण्ड भी व्यर्थ ही होगा) अतः तू क्यों बहुत बकवाद कर रहा है ॥
सर्प उवाच
कार्याभावे क्रिया न स्यात् सत्यसत्यपि कारणे । तस्मात् समेऽस्मिन् हेतौ मे वाच्यो हेतुर्विशेषतः ॥ ४५ ॥ यद्यहं कारणत्वेन मतो लुब्धक तत्त्वतः । अन्यः प्रयोगे स्यादत्र किल्बिषी जन्तुनाशने ॥ ४६ ॥ **सर्पने कहा—**व्याध! प्रयोजक (प्रेरक) कर्ता रहे या न रहे, प्रयोज्य कर्ताके बिना क्रिया नहीं होती; इसलिये यहाँ यद्यपि हमलोग (मैं और मृत्यु) समानरूपसे हेतु हैं; तो भी प्रयोजक होनेके कारण मृत्युपर ही विशेषरूपसे यह अपराध लगाया जा सकता है। यदि तुम मुझे इस बालककी मृत्युका वस्तुतः कारण मानते हो तो यह तुम्हारी भूल है। वास्तवमें विचार करनेपर प्रेरणा करनेके कारण दूसरा ही (मृत्यु ही) अपराधी सिद्ध होगा; क्योंकि वही प्राणियोंके विनाशनमें अपराधी है ॥ ४५-४६ ॥
लुब्धक उवाच
वध्यस्त्वं मम दुर्बुद्धे बालघाती नृशंसकृत् । भाषसे किं बहु पुनर्वध्यः सन् पन्नगाधम ॥ ४७ ॥ **व्याधने कहा—**खोटी बुद्धिवाले नीच सर्प! तू बालहत्यारा और क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाला है; अतः निश्चय ही मेरे हाथसे वधके योग्य है। तू वध्य होकर भी अपनेको निर्दोष सिद्ध करनेके लिये क्यों बहुत बातें बना रहा है? ॥ ४७ ॥
सर्प उवाच
यथा हवींषि जुह्वाना मखे वै लुब्धकर्त्विजः । न फलं प्राप्नुवन्त्यत्र फलयोगे तथा ह्यहम् ॥ ४८ ॥ **सर्पने कहा—**व्याध! जैसे यजमानके यहाँ यज्ञमें ऋत्विज् लोग अग्निमें आहुति डालते हैं; किंतु उसका फल उन्हें नहीं मिलता। इसी प्रकार इस अपराधके फल या दण्डको भोगनेमें मुझे नहीं सम्मिलित करना चाहिये (क्योंकि वास्तवमें मृत्यु ही अपराधी है) ॥ ४८ ॥
भीष्म उवाच
तथा ब्रुवति तस्मिंस्तु पन्नगे मृत्युचोदिते ।