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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

( ८ ) (८) परब्रह्म परमेश्वरके परमधाममें पहुँचनेपर ज्ञानीका किसी प्रकारके प्राकृत शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, वह अपने दिव्यस्वरूपसे सम्पन्न होता है (४। ४। १)। वह उसकी सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित मुक्तावस्था है (४। ४। २)। (९) कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवाले जीवको वहाँके भोगोंका उपभोग संकल्पमात्रसे भी होता है और उसके संकल्पानुसार प्राप्त हुए शरीरके द्वारा भी (४। ४। ८ तथा ४। ४। १२)। (१०) देवयान-मार्गसे जानेवाले विद्वानोंमेंसे कोई तो परब्रह्मके परमधाममें जाकर सायुज्यमुक्ति लाभ कर लेते हैं (४। ४। ४) और कोई चैतन्यमात्र स्वरूपसे अलग भी रह सकते हैं (४। ४। ७)। (११) कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवाले उस लोकके स्वामीके साथ प्रलयकालके समय सायुज्यमुक्तिको प्राप्त हो जाते हैं (४। ३।१०)। (१२) उत्तरायण-मार्गसे ब्रह्मलोकमें जानेवालोंके लिये रात्रिकाल या दक्षिणायनकालमें मृत्यु होना बाधक नहीं है (४। २। १९-२०)। (१३) जीवका कर्तापन शरीर और इन्द्रियोंके सम्बन्धमें औपचारिक है (२। ३। ३३ से ४० तक)। (१४) जीवके कर्तापनमें परमात्मा ही कारण है (२। ३। ४१)। (१५) जीवात्मा विभु है; उसका एकदेशित्व शरीरके सम्बन्धसे ही है, वास्तवमें नहीं है (२। ३। २९)। (१६) जिन ज्ञानी महापुरुषोंके मनमें किसी प्रकारकी कामना नहीं रहती, जो सर्वथा निष्काम और आप्तकाम हैं उनको यहीं ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। उनका ब्रह्मलोकमें जाना नहीं होता (३। ३। ३०, ४२; ३। ३। ५२; ३। ४। ५२) (४। २। १२–१६)। (१७) ज्ञानी महापुरुष लोकसंग्रहके लिये सभी प्रकारके विहित कर्मोंका अनुष्ठान कर सकता है (४। १। १६-१७)। (१८) ब्रह्मज्ञान सभी आश्रमोंमें हो सकता है। सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार है (३। ४। ४९)। (१९) ब्रह्मलोकमें जानेवालेका पुनरागमन नहीं होता (४। ४।२२)।

( ९ ) (२०) ज्ञानीके पूर्वकृत संचित पुण्य-पापका नाश हो जाता है। नये कर्मोंसे उसका सम्बन्ध नहीं होता (४।१।१३-१४)। प्रारब्धकर्मका उपभोगद्वारा नाश हो जानेपर वर्तमान शरीर नष्ट हो जाता है और वह ब्रह्मलोकको या वहीं परमात्माको प्राप्त हो जाता है (४।१।१९)। (२१) ब्रह्मविद्याके साधकको यज्ञादि आश्रमकर्म भी निष्कामभावसे करने चाहिये (३।४।२६)। शम-दम आदि साधन अवश्य कर्तव्य हैं (३।४।२७)। (२२) ब्रह्मविद्या कर्मोंका अंग नहीं है (३।४।२ से २५ तक)। (२३) परमात्माकी प्राप्तिका हेतु ब्रह्मज्ञान ही है (३।३।४७ तथा ३।४।१)। (२४) यह जगत् प्रलयकालमें भी अप्रकटरूपसे वर्तमान रहता है (२।१।१६)। इन सबको ध्यानमें रखकर इस ग्रन्थका अनुशीलन करना चाहिये। इससे परमात्माका क्या स्वरूप है, उनकी प्राप्तिके कौन-से साधन हैं और साधकका परमात्माके साथ क्या सम्बन्ध है—इन बातोंकी तथा साधनोपयोगी अन्य आवश्यक विषयोंकी जानकारी प्राप्त करके एक निश्चयपर पहुँचनेमें विशेष सहायता प्राप्त हो सकती है। अतः प्रत्येक साधकको श्रद्धापूर्वक इस ग्रन्थका अध्ययन एवं मनन करना चाहिये। श्रीरामनवमी ⎫ विनीत, संवत् २००९ वि० ⎭ हरिकृष्णदास गोयन्दका

वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र)-के प्रधान विषयोंकी सूची

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥ वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र)-के प्रधान विषयोंकी सूची पहला अध्याय पहला पाद सूत्र विषय पृष्ठ १-११ ब्रह्मविषयक विचारकी प्रतिज्ञा तथा ब्रह्म ही जगत्का अभिन्न निमित्तोपादान कारण है, जडप्रकृति नहीं, इसका युक्ति एवं प्रमाणोंद्वारा प्रतिपादन................................ २३-३१ १२-१९ श्रुतिमें 'आनन्दमय' शब्द परमात्माका ही वाचक है, जीवात्मा अथवा जडप्रकृतिका नहीं, इसका समर्थन ....... ३२-३७ २०-२१ 'विज्ञानमय' तथा 'सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष' की ब्रह्मरूपताका कथन..................................... ३७-३८ २२-२७ 'आकाश', 'प्राण', ज्योति' तथा 'गायत्री' नामसे श्रुतिमें परब्रह्मका ही वर्णन है, इसका प्रतिपादन................... ३८-४३ २८-३१ कौषीतकि श्रुतिमें भी 'प्राण' नामसे ब्रह्मका ही उपदेश हुआ है, इसका समर्थन.................................... ४३-४६ दूसरा पाद १-७ वेदान्त-वाक्योंमें परब्रह्मकी ही उपास्यताका निरूपण तथा जीवात्माकी उपास्यताका निराकरण..................... ४७-५२ ८ सबके हृदयमें रहते हुए भी परमात्मा जीवोंके सुख- दुःखोंका भोग नहीं करता, इसका प्रतिपादन............... ५३ ९-१० चराचरग्राही भोक्ता परमात्मा ही हैं, इसका निरूपण....... ५३-५४ ११-१२ हृदयगुहामें स्थित दो आत्मा-जीवात्मा तथा परमात्माका प्रतिपादन................................................... ५५-५६ १३-१७ नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषकी ब्रह्मरूपता................................ ५७-६१

( ११ ) सूत्र विषय पृष्ठ १८ अधिदैव आदिमें ‘अन्तर्यामीरूप’ से ब्रह्मकी स्थिति......... ६२ १९-२० जडप्रकृति और जीवात्माकी अन्तर्यामिताका निराकरण....... ६३-६४ २१-२२ श्रुतिमें जिसे अदृश्यत्व आदि धर्मोंसे युक्त बताया है, वह ब्रह्म है, प्रकृति या जीवात्मा नहीं; इसका प्रतिपादन........ ६४-६६ २३ विराट्‌रूपके वर्णनसे ब्रह्मकारणवादका समर्थन............ ६६-६७ २४-२८ श्रुतिमें ‘वैश्वानर’ नाम ब्रह्मके लिये ही आया है, इसका युक्तियुक्त विवेचन................................................... ६७-७२ २९-३२ सर्वव्यापी परमात्माको देशविशेषसे सम्बद्ध बतानेका रहस्य.................................................................... ७२-७५ तीसरा पाद १-७ द्युलोक और पृथिवी आदिका आधार ब्रह्म ही है, जीवात्मा अथवा प्रकृति नहीं, इसका प्रतिपादन........................... ७६-८० ८-९ ब्रह्म ही भूमा है—इसका उपपादन.............................. ८०-८३ १०-१२ श्रुतिमें ब्रह्मको ‘अक्षर’ कहा गया है इसका युक्तियुक्त समर्थन... ८३-८५ १३ ‘ॐ’ इस अक्षरके द्वारा ध्येय तत्त्व भी ब्रह्म ही है, इसका निरूपण........................................................ ८५-८६ १४-२३ दहराकाशकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन.......................... ८६-९३ २४-२५ अंगुष्ठमात्र पुरुषकी परब्रह्मरूपता और उसे हृदयमें स्थित बतानेका रहस्य........................................................ ९३-९४ २६-३० ब्रह्मविद्यामें मनुष्योंके सिवा देवताओंके भी अधिकारका प्रतिपादन और इसमें सम्भावित विरोधका परिहार......... ९४-९९ ३१-३३ यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्मविद्यामें देवताओंके अधिकारका जैमिनिद्वारा विरोध और बादरायणद्वारा उसका परिहार...... ९९-१०१ ३४-३८ वेदविद्यामें शूद्रके अनधिकारका कथन......................... १०१-१०६ ३९ अंगुष्ठमात्र पुरुषके ब्रह्मरूप होनेमें दूसरी युक्ति............ १०६-१०७ ४०-४३ ‘ज्योति’ तथा ‘आकाश’ भी ब्रह्मके ही वाचक हैं, इसका समर्थन........................................................ १०७-११०

सूत्र विषय पृष्ठ

( १२ ) सूत्र विषय पृष्ठ चौथा पाद १-२ सांख्योक्त प्रकृतिकी अवैदिकताके प्रसंगमें 'अव्यक्त' शब्दपर विचार और उसके शरीरवाचक होनेका कथन...... १११-११३ ३-५ वेदोक्त प्रकृति स्वतन्त्र और जाननेयोग्य नहीं, परमेश्वरके अधीन रहनेवाली उसीकी शक्ति है, इसका प्रतिपादन....... ११३-११५ ६-७ 'अव्यक्त' शब्द प्रकृतिसे भिन्न अर्थका वाचक क्यों है? इसका युक्तिपूर्ण विवेचन........................................ ११५-११७ ८-१० श्रुतिमें 'अजा' शब्द परब्रह्मकी शक्ति विशेषका बोधक है, सांख्योक्त प्रधानका नहीं, इसका प्रतिपादन............. ११७-१२० ११-१३ 'पञ्च-पञ्चजनाः'शब्दसे सांख्योक्त प्रकृतिके पचीस तत्त्वोंका श्रुतिमें वर्णन किया गया है, इस मान्यताका खण्डन....... १२१-१२३ १४-१५ आकाश आदिकी सृष्टिमें ब्रह्म ही कारण है तथा उस प्रसंगमें आये हुए 'असत्' आदि शब्द भी उसीके वाचक हैं इसका समर्थन........................................... १२३-१२५ १६-२२ कौषीतकि श्रुतिमें सोलह पुरुषोंका कर्ता एवं ज्ञेयतत्त्व ब्रह्मको ही बताया गया है, जीव, प्राण या प्रकृतिको नहीं, इसका सयुक्तिक उपपादन........................... १२६-१३१ २३-२९ ब्रह्मकी अभिन्न निमित्तोपादान कारणताका निरूपण....... १३१-१३७ दूसरा अध्याय पहला पाद १-११ सांख्योक्त प्रधानको जगत्का कारण न माननेमें सम्भावित दोषोंका उल्लेख और उनका परिहार............ १३८-१४६ १२ अन्य वेदविरोधी मतोंका निराकरण........................... १४६ १३-१४ ब्रह्मकारणवादके विरुद्ध उठायी हुई शंकाओंका समाधान.... १४६-१४९ १५-२० युक्तियों और दृष्टान्तोंद्वारा सत्कार्यवादकी स्थापना एवं ब्रह्मसे जगत्की अनन्यता.................................... १४९-१५२

( १३ ) सूत्र विषय पृष्ठ २१—२३ उक्त अनन्यतामें सम्भावित ‘हिताकरण’ आदि दोषोंका परिहार.......................................................... १५२—१५६ २४-२५ ब्रह्मके द्वारा संकल्पमात्रसे बिना साधन-सामग्रीके ही जगत्की रचनाका कथन......................................... १५६—१५८ २६—२८ ब्रह्मकारणवादमें सम्भावित अन्यान्य दोष तथा श्रुति- विरोधका परिहार................................................ १५८—१६० २९-३० सांख्यमतमें दोष दिखाकर ग्रन्थकारद्वारा अपने सिद्धान्तकी पुष्टि................................................. १६१-१६२ ३१—३३ कारण और प्रयोजनके बिना ही परमेश्वरद्वारा संकल्प- मात्रसे होनेवाली जगत्की सृष्टि उनकी लीलामात्र है— इसका प्रतिपादन.............................................. १६३-१६४ ३४-३५ ब्रह्ममें आरोपित विषमता और निर्दयता दोषका निराकरण....................................................... १६५-१६७ ३६-३७ जीवों और उनके कर्मोंकी अनादि सत्ताका प्रतिपादन तथा ब्रह्मकारणवादमें विरोधके अभावका कथन............ १६८—१६९ दूसरा पाद १-१० अनेक प्रकारके दोष दिखाकर सांख्योक्त प्रधान कारणवादका खण्डन........................................... १७०—१७७ ११-१७ वैशेषिकोंके परमाणुकारणवादका निराकरण............... १७८-१८४ १८-३२ बौद्धमतकी असंगतियोंको दिखाते हुए उसका खण्डन..... १८४-१९६ ३३-३६ जैनमतमें पूर्वापरविरोध दिखाते हुए उसका खण्डन....... १९६-१९९ ३७-४१ पाशुपतमतका खण्डन............................................ १९९-२०२ ४२-४५ पांचरात्र आगममें उठायी हुए आंशिक अनुपपत्तियोंका परिहार........................................................... २०२-२०५ तीसरा पाद १-९ ब्रह्मसे आकाश और वायुकी उत्पत्तिका उपपादन करके ब्रह्मके सिवा, सबकी उत्पत्तिशीलताका कथन............. २०६-२११

( १४ ) सूत्र विषय पृष्ठ १०—१३ वायुसे तेजकी, तेजसे जलकी और जलसे पृथिवीकी उत्पत्तिमें भी ब्रह्म ही कारण हैं, इसका प्रतिपादन .............. २११—२१३ १४-१५ सृष्टिक्रमके विपरीत प्रलयक्रमका कथन तथा इन्द्रियोंकी उत्पत्तिमें क्रमविशेषका अभाव .................................... २१३-२१५ १६–२० जीवके जन्म-मृत्यु-वर्णनकी औपचारिकता तथा जीवात्माकी नित्यता .................................................... २१६–२२० २१-२९ जीवात्माके अणुत्वका खण्डन और विभुत्वकी स्थापना ... २२०-२२६ ३०-३२ जीव शरीरके सम्बन्धसे एकदेशी है, सत् जीवात्माका ही सृष्टिकालमें प्राकट्य होता है और वह अन्तःकरणके सम्बन्धसे विषयोंका अनुभव करता है, इसका प्रतिपादन... २२६-२३० ३३–४२ जीवात्माका कर्तापन शरीर और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे औपचारिक है तथा उसमें परमात्मा ही कारण हैं; क्योंकि वह उन्हींके अधीन है, इसका निरूपण ....................... २३०–२३८ ४३-४७ जीवात्मा ईश्वरका अंश है, किंतु ईश्वर उसके दोषोंसे लिप्त नहीं होता; इसका प्रतिपादन ............................ २३८-२४३ ४८-५० नित्य एवं विभु जीवोंके लिये देहसम्बन्धसे विधि-निषेधकी सार्थकता और उनके कर्मोंका विभाग ........................ २४३-२४५ ५१-५३ जीव और ब्रह्मके अंशांशिभावको औपाधिक माननेमें सम्भावित-दोषोंका उल्लेख .................................... २४५-२४७ चौथा पाद १-४ इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भूतोंसे नहीं परमात्मासे ही होती है, इसका प्रतिपादन और श्रुतियोंके विरोधका परिहार ....... २४८-२५० ५-७ इन्द्रियोंकी संख्या सात ही है, इस मान्यताके खण्डनपूर्वक मनसहित ग्यारह इन्द्रियोंकी सिद्धि तथा सूक्ष्मभूतोंकी भी ब्रह्मसे उत्पत्तिका कथन ............................................. २५१-२५२ ८-१३ मुख्य प्राणकी ब्रह्मसे ही उत्पत्ति बताकर उसके स्वरूपका निरूपण ................................................................. २५३-२५६

( १५ ) सूत्र विषय पृष्ठ १४-१६ ज्योतिः आदि तत्त्वोंका अधिष्ठाता ब्रह्म और शरीरका अधिष्ठाता नित्य जीवात्मा है, इसका कथन ............. २५६-२५८ १७-१९ इन्द्रियोंसे मुख्य प्राणकी भिन्नता .............................. २५८-२५९ २० ब्रह्मसे ही नाम-रूपकी रचनाका कथन .................... २६० २१-२२ सब तत्त्वोंका मिश्रण होनेपर भी पृथिवी आदिकी अधिकतासे उनसे पृथक्-पृथक् कार्यका निर्देश ........... २६०-२६१ तीसरा अध्याय पहला पाद १-६ शरीरके बीजभूत सूक्ष्म तत्त्वोंसहित जीवके देहान्तरमें गमनका कथन, 'पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुषरूप हो जाता है' श्रुतिके इस वचनपर विचार, उस जलमें सभी तत्त्वोंके सम्मिश्रणका कथन और अन्यान्य विरोधोंका परिहार .... २६२-२६८ ७-११ स्वर्गमें गये हुए पुरुषको देवताओंका अन्न बताना औपचारिक है, जीव स्वर्गसे कर्मसंस्कारोंको साथ लेकर लौटता है, श्रुतिमें 'चरण' शब्द कर्मसंस्कारोंका उपलक्षण और पाप-पुण्यका बोधक है, इसका उपपादन........... २६८-२७२ १२-१७ पापी जीव यमराजकी आज्ञासे नरकमें यातना भोगते हैं, स्वर्गमें नहीं जाते, कौषीतकिश्रुतिमें भी समस्त शुभकर्मियोंके लिये ही स्वर्गगमनकी बात आयी है; इसका वर्णन .... २७२-२७५ १८-२१ यम-यातना छान्दोग्यवर्णित तीसरी गतिसे भिन्न एवं अधम चौथी गति है, इसका वर्णन तथा स्वेदज जीवोंका उद्भिज्जमें अन्तर्भाव ........................................ २७६-२७८ २२-२७ स्वर्गसे लौटे हुए जीव किस प्रकार आकाश, वायु, धूम, मेघ, धान, जौ आदिमें स्थित होते हुए क्रमशः गर्भमें आते हैं, इसका स्पष्ट वर्णन ................................... २७८-२८१ दूसरा पाद १-६ स्वप्न मायामात्र और शुभाशुभका सूचक है, भगवान् ही

( १६ ) सूत्र विषय पृष्ठ जीवको स्वप्नमें नियुक्त करते हैं, जीवमें ईश्वरसदृश गुण तिरोहित हैं, परमात्माके ध्यानसे प्रकट होते हैं, उसके अनादि बन्धन और मोक्ष भी परमात्माके सकाशसे हैं तथा जीवके दिव्य गुणोंका तिरोभाव देहके सम्बन्धसे है ...... २८२-२८६ ७-१० सुषुप्तिकालमें जीवकी नाड़ियोंके मूलभूत हृदयमें स्थिति, उस समय उसे परमात्मामें स्थित बतानेका रहस्य, सुषुप्तिसे पुन: उसी जीवके जाग्रत् होनेका कथन तथा मूर्च्छाकालमें अधूरी सुसुप्तावस्थाका प्रतिपादन ......... २८६-२९० ११-२६ सर्वान्तर्यामी परमात्माका किसी भी स्थान-दोषसे लिप्त न होना, परमेश्वरका निर्गुण-निर्विशेष, सगुण-सविशेष दोनों लक्षणोंसे युक्त होना, इसमें सम्भावित विरोधक परिहार उक्त दोनों लक्षणोंकी मुख्यता, परमात्मामें भेदका अभाव, सगुणरूपकी औपाधिकताका निराकरण, प्रतिबिम्बके दृष्टान्तका रहस्य, परमेश्वरमें शरीरके वृद्धि-ह्रास आदि दोषोंका अभाव, निषेध श्रुतियोंद्वार इयत्तामात्रका प्रतिषेध, निर्गुण- सगुण दोनों स्वरूपोंका मन-बुद्धिसे अतीत होना तथा आराधनासे भगवान्के प्रत्यक्ष दर्शन होनेका कथन .................. २९१-३०४ २७-३३ परमात्माका अपनी शक्तियोंसे अभेद और भेद तथा अभेदोपासना और भेदोपासनाके उपदेशका अभिप्राय .... ३०४-३१० ३४-३७ शरीर आदिके सम्बन्धसे जीवोंके परस्पर भेदकी सिद्धि, प्रकृतियोंमें भेद होनेपर भी परब्रह्ममें भेद या नानात्वका अभाव.. ३११-३१३ ३८-४१ कर्मोंका फल देनेवाला परमात्मा ही है, कर्म नहीं; इसका प्रतिपादन ................................................ ३१३-३१५ तीसरा पाद १-१० वेदान्तवर्णित समस्त ब्रह्मविद्याओंकी एकता, भेद- प्रतीतिका निराकरण, शाखा-विक्षेपके लिये ही शिरोव्रत आदिका नियम, समानविद्याके प्रकरणमें एक जगह

( १७ ) सूत्र विषय पृष्ठ कही हुई बातोंके अन्यत्र अध्याहार करनेका कथन, उद्देश्यकी एकता होनेपर विद्याओंमें भेदका अभाव, ब्रह्मविद्यासे भिन्न विद्याओंकी एकता या भिन्नताके निर्णयमें संज्ञा आदि हेतुओंके उपयोगका कथन .............................. ३१६—३२४ ११—१८ ब्रह्मके 'आनन्द' आदि धर्मोंका ही अन्यत्र अध्याहार उचित, 'प्रियाशिरस्त्व' रूपकगत धर्मोंका नहीं, आनन्दमयकी ब्रह्मरूपता, विरोध-परिहार तथा अन्न-रसमय पुरुषके ब्रह्म न होनेका प्रतिपादन .................................... ३२४—३२९ १९—२५ एक शाखामें कही विद्याकी एकता, नेत्र एवं सूर्य- मण्डलवर्ती पुरुषोंके नाम और गुणका एक-दूसरेमें अध्याहारकी अनावश्यकता, उक्त पुरुषोंमें ब्रह्मके सर्वाधारता और सर्वव्यापकता आदि धर्मोंके अध्याहारका निषेध तथा पुरुष विद्यामें प्रतिपादित दिव्य गुणोंके और कठवर्णित वेध्यत्व आदि धर्मोंके अन्यत्र अध्याहारका अनौचित्य ............... ३३०—३३५ २६ ब्रह्मविद्याके फल-वर्णनमें हानि (दुःखनाश आदि) और प्राप्ति (परमपदकी प्राप्ति आदि), दोनों प्रकारके फलोंका सर्वत्र सम्बन्ध .............................................. ३३५—३३७ २७—३२ ब्रह्मलोकमें जानेवाले ज्ञानी महात्माके पुण्य और पापोंकी यहीं समाप्ति, संकल्पानुसार ब्रह्मलोक-गमन या यहीं ब्रह्म-सायुज्यकी प्राप्ति सम्भव, ब्रह्मलोक जानेवाले सभी उपासकोंके लिये देवयानमार्गसे गमनका नियम, किंतु कारकपुरुषोंके लिये इस नियमका अभाव .................. ३३८—३४२ ३३—४१ अक्षरब्रह्मके लक्षणोंका सर्वत्र ब्रह्मके वर्णनमें अध्याहार आवश्यक, मुण्डक, कठ और श्वेताश्वतर आदिमें जीव और ईश्वरको एक साथ हृदयमें स्थित बतानेवाली विद्याओंकी एकता, ब्रह्म जीवात्माका भी अन्तर्यामी आत्मा है, इसमें विरोधका परिहार, जीव और ब्रह्मके भेदकी औपाधिकताका निराकरण एवं विरोध-परिहार ... ३४२—३५१

( १८ ) सूत्र विषय पृष्ठ ४२—५२ ब्रह्मलोकमें जानेवाले सभी पुरुषोंके लिये भोग भोगनेका अनिवार्य नियम नहीं, बन्धनसे मुक्त होना ही विद्याका मुख्य फल, कर्मसे मुक्तिका प्रतिपादन करनेवाले पूर्वपक्षका उल्लेख और खण्डन, ब्रह्मविद्यासे ही मुक्तिका प्रतिपादन तथा साधकोंके भावानुसार विद्याके आनुषंगिक फलमें भेद ....... ३५२—३६१ ५३-५४ शरीरसे भिन्न आत्माकी सत्ता न माननेवाले नास्तिक- मतका खण्डन ............................................ ३६१-३६२ ५५—६० यज्ञांगसम्बन्धी उपासना प्रत्येक वेदकी शाखावालोंके लिये अनुष्ठेय है, एक-एक अंगकी अपेक्षा सब अंगोंसे पूर्ण उपासना श्रेष्ठ है, शब्दादि भेदसे विद्याओंमें भिन्नता है, फल एक होनेसे साधककी इच्छाके अनुसार उनके अनुष्ठानमें विकल्प हैं; किंतु भिन्न-भिन्न फलवाली उपासनाओंके अनुष्ठानमें कामनाके अनुसार एकाधिक उपासनाओंका समुच्चय भी हो सकता है—इन सब बातोंका वर्णन .................... ३६३—३६६ ६१—६६ यज्ञांगसम्बन्धी उपासनाओंमें समुच्चय या समाहारका खण्डन .................................................... ३६६—३६९ चौथा पाद १ ज्ञानसे ही परम पुरुषार्थकी सिद्धि .............................. ३७० २—७ ‘विद्या कर्मका अंग है’ जैमिनिके इस मतका उल्लेख .... ३७१—३७३ ८—१७ जैमिनिके उक्त मतका खण्डन तथा ‘विद्या कर्मका अंग नहीं, ब्रह्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है’ इस सिद्धान्तकी पुष्टि ...... ३७४—३८० १८—२० पूर्वपक्षके खण्डनपूर्वक संन्यास आश्रमकी सिद्धि ......... ३८०—३८३ २१-२२ अपूर्व फलदायिनी उद्गीथ आदि उपासनाओंका विधान .. ३८३-३८४ २३-२४ उपनिषद्‍वर्णित कथाएँ विद्याका ही अंग हैं, यज्ञका नहीं, इसका प्रतिपादन .................................... ३८५-३८६ २५ ब्रह्मविद्यारूप यज्ञमें अग्नि, ईंधन आदिकी अपेक्षाका अभाव ..................................................... ३८६

(१९) सूत्र विषय पृष्ठ २६-२७ विद्याकी प्राप्तिके लिये वर्णाश्रमोचित कर्मोंकी अपेक्षा तथा शम-दम आदिकी अनिवार्य आवश्यकता ......... ३८७-३८९ २८-३१ प्राणसंकटके सिवा अन्य समयमें, आहार-शुद्धिविषयक सदाचारके त्यागका निषेध ....................................... ३९०-३९२ ३२-३३ ज्ञानीके लिये लोकसंग्रहार्थ आश्रमकर्मके अनुष्ठानकी आवश्यकता .............................................................. ३९३ ३४-३९ भक्तिसम्बन्धी श्रवण-कीर्तन आदि कर्मोंके अनुष्ठानकी अनिवार्य आवश्यकता तथा भागवतधर्मकी महत्ताका प्रतिपादन ................................................................ ३९४-४०० ४०-४३ वानप्रस्थ, संन्यास आदि ऊँचे आश्रमोंसे वापस लौटनेका निषेध, लौटनेवालेका पतन और ब्रह्मविद्या आदिमें अनधिकार ............................................................... ४००-४०२ ४४-४६ उद्गीथ आदिमें की जानेवाली उपासनाका कर्ता तो ऋत्विक् है किंतु उसके फलमें यजमानका अधिकार है, इसका वर्णन ........................................................... ४०३-४०४ ४७-५० संन्यास, गृहस्थ आदि सब आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार ................................................................ ४०४-४०७ ५१-५२ मुक्तरूप फल इस जन्ममें मिलता है या जन्मान्तरमें, इसी लोकमें मिलता है या लोकान्तरमें ? इसका नियम नहीं है यह कथन ............................................................... ४०८-४०९ चौथा अध्याय पहला पाद १-२ उपदेश-ग्रहणके पश्चात् ब्रह्मविद्याके निरन्तर अभ्यासकी आवश्यकता .............................................................. ४१०-४११ ३ आत्मभावसे परब्रह्मके चिन्तनका उपदेश ....................... ४११-४१२ ४-५ प्रतीकमें आत्मभावनाका निषेध और ब्रह्मभावनाका विधान ४१२-४१३ ६ उद्गीथ आदिमें आदित्य आदिकी भावना ......................... ४१४

( २० ) सूत्र विषय पृष्ठ ७—१० आसनपर बैठकर उपासना करनेका विधान ............. ४१४—४१६ ११ जहाँ चित्त एकाग्र हो, वही स्थान उपासनाके लिये उत्तम .. ४१६-४१७ १२ आजीवन उपासनाकी विधि ........................................ ४१७-४१८ १३-१४ ब्रह्मसाक्षात्कारके पश्चात् ज्ञानीका भूत और भावी शुभाशुभ कर्मोंसे असम्बन्ध ................................. ४१८—४२० १५ शरीरके हेतुभूत प्रारब्ध कर्मका भोगके लिये नियत समयतक रहना ..................................................... ४२० १६-१७ ज्ञानीके लिये अग्निहोत्र आदि तथा अन्य विहित कर्मोंका लोकसंग्रहार्थ विधान ............................................. ४२०-४२२ १८ कर्मांग उपासनाका ही कर्मके साथ समुच्चय .............. ४२२ १९ प्रारब्धका भोगसे नाश होनेपर ज्ञानीको ब्रह्मकी प्राप्ति .... ४२३ दूसरा पाद १-४ उत्क्रमणकालमें वाणीकी अन्य इन्द्रियोंके साथ मनमें, मनकी प्राणमें और प्राणकी जीवात्मामें स्थितिका कथन .. ४२४-४२६ ५-६ जीवात्माकी सूक्ष्मभूतोंमें स्थिति ............................. ४२६-४२७ ७ ब्रह्मलोकका मार्ग आरम्भ होनेसे पूर्वतक ज्ञानी और अज्ञानीकी समान गतिका प्रतिपादन ......................... ४२७-४२८ ८ अज्ञानी जीवका परब्रह्ममें स्थित रहना प्रलयकालकी भाँति है .............................................................. ४२८-४२९ ९-११ जीवात्मा उत्क्रमणके समय जिस आकाश आदि भूतसमुदायमें स्थित होता है, वह सूक्ष्म शरीर है, इसका प्रतिपादन .......................................................... ४२९-४३० १२-१६ निष्काम ज्ञानी महात्माओंका ब्रह्मलोकमें गमन नहीं होता, वे यहीं परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं, इसका निरूपण .. ४३१-४३४ १७ सूक्ष्म शरीरमें स्थित जीव किस प्रकार ब्रह्मलोकमें जानेके लिये सुषुम्ना नाडीद्वारा शरीरसे निकलता है, इसका वर्णन.. ४३५-४३६ १८ शरीरसे निकलकर जीवात्माका सूर्यरश्मियोंमें स्थित होना ४३६

( २१ ) सूत्र विषय पृष्ठ १९-२० रात्रि और दक्षिणायनकालमें भी सूर्यरश्मियोंसे उसका बाधारहित सम्बन्ध .............................................. ४३७-४३८ २१ योगीके लिये गीतोक्त कालविशेषका नियम ................ ४३८-४३९ तीसरा पाद १ ब्रह्मलोकमें जानेके लिये 'अर्चिरादि' एक ही मार्गका कथन .............................................................. ४४०-४४१ २ संवत्सरसे ऊपर और सूर्यलोकके नीचे वायुलोककी स्थिति.. ४४१-४४२ ३ 'विद्युत्' से ऊपर वरुणलोककी स्थिति ......................... ४४२ ४ 'अर्चिः', 'अहः', 'पक्ष', 'मास', 'अयन' आदि आतिवाहिक पुरुष हैं, इसका प्रतिपादन .................................... ४४३ ५ अर्चि आदिको अचेतन माननेमें आपत्ति ..................... ४४३-४४४ ६ विद्युल्लोकसे ऊपर ब्रह्मलोकतक अमानव पुरुषके साथ जीवात्माका गमन ................................................ ४४४ ७-११ 'ब्रह्मलोकमें कार्यब्रह्मकी प्राप्ति होती है', इस बादरिके मतका वर्णन ..................................................... ४४५-४४७ १२-१४ 'ब्रह्मलोकमें परब्रह्मकी प्राप्ति होती है' इस जैमिनिमतका उपपादन ............................................................ ४४७-४४९ १५-१६ प्रतीकोपासना करनेवालोंके सिवा अन्य सभी उपासक ब्रह्मलोकमें जाकर संकल्पानुसार कार्यब्रह्म अथवा परब्रह्मको प्राप्त होते हैं, यह बादरायणका सिद्धान्त .... ४४९-४५१ चौथा पाद १-३ परब्रह्मपरायण जीवके लिये परमधाममें पहुँचकर अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न होने एवं सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो विशुद्ध आत्मरूपसे स्थित होनेका कथन ४५२-४५४ ४-६ ब्रह्मलोकमें पहुँचनेवाले उपासकोंकी तीन गति— (१) अभिन्नरूपसे ब्रह्ममें मिल जानेका, (२) पृथक् रहकर परमात्माके सदृश दिव्यस्वरूपसे सम्पन्न होनेका

सूत्र विषय पृष्ठ

( २२ ) सूत्र विषय पृष्ठ तथा (३) केवल चैतन्यमात्र स्वरूपसे स्थित होनेका वर्णन ............................................................. ४५४-४५६ ७ उपासकके भावानुसार तीनों ही स्थितियोंको माननेमें कोई विरोध नहीं है, यह बादरायणका सिद्धान्त ........... ४५६ ८-९ प्रजापति ब्रह्माके लोकमें जानेवाले उपासकोंको संकल्पसे ही वहाँके भोगोंकी प्राप्ति ........................ ४५७ १० उन उपासकोंके शरीर नहीं होते; यह बादरिका मत .... ४५७-४५८ ११ 'उन्हें शरीरकी प्राप्ति होती है' यह जैमिनिका मत ...... ४५८ १२ संकल्पानुसार उनके शरीरका होना और न होना दोनों ही बातें सम्भव हैं—यह बादरायणका सिद्धान्त ............. ४५८-४५९ १३-१४ वे बिना शरीरके स्वप्नकी भाँति और शरीर धारण करके जाग्रत्‌की भाँति भोगोंका उपभोग करते हैं, यह कथन .... ४५९ १५-१६ सुषुप्ति-प्रलय एवं ब्रह्मसायुज्यकी प्राप्तिके प्रसंगमें ही नामरूपके अभावका कथन ................................. ४६०-४६१ १७-१८ ब्रह्मलोकमें गये हुए उपासक वहाँके भोग भोगनेके उद्देश्यसे अपने लिये इच्छानुसार शरीर-निर्माण कर सकते हैं, संसारकी रचना नहीं, इसका प्रतिपादन ...... ४६१-४६२ १९-२० ब्रह्मलोकमें जानेवाले मुक्तात्माको निर्विकार ब्रह्मरूप फलकी प्राप्तिका कथन .................................... ४६३-४६४ २१ निर्लिप्तभावसे भोगमात्रमें उसे ब्रह्माकी समता प्राप्त होती है, सृष्टिरचनामें नहीं ................................. ४६४-४६५ २२ ब्रह्मलोकसे पुनरावृत्ति नहीं होती, इसका प्रतिपादन ४६५ सूत्रोंकी वर्णानुक्रम-सूची ४६६-४७८

( ब्रह्मसूत्र )

ॐ श्रीपरमात्मने नमः वेदान्त-दर्शन ( ब्रह्मसूत्र ) ( साधारण भाषा-टीकासहित ) पहला अध्याय पहला पाद अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १ । १ । १॥ अथ = अब; अतः = यहाँसे; ब्रह्मजिज्ञासा = ब्रह्मविषयक विचार (आरम्भ किया जाता है)। व्याख्या—इस सूत्रमें ब्रह्मविषयक विचार आरम्भ करनेकी बात कहकर यह सूचित किया गया है कि ब्रह्म कौन है? उसका स्वरूप क्या है? वेदान्तमें उसका वर्णन किस प्रकार हुआ है?—इत्यादि सभी ब्रह्मविषयक बातोंका इस ग्रन्थमें विवेचन किया जाता है। सम्बन्ध— पूर्व सूत्रमें जिस ब्रह्मके विषयमें विचार करनेकी प्रतिज्ञा की गयी है, उसका लक्षण बतलाते हैं— जन्माद्यस्य यतः ॥ १ । १ । २ ॥ अस्य = इस जगत्के; जन्मादि = जन्म आदि (उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय); यतः = जिससे (होते हैं, वह ब्रह्म है)। व्याख्या—यह जो जड-चेतनात्मक जगत् सर्वसाधारणके देखने, सुनने और अनुभवमें आ रहा है, जिसकी अद्भुत रचनाके किसी एक अंशपर भी विचार करनेसे बड़े-बड़े वैज्ञानिकोंको आश्चर्यचकित होना पड़ता है,

२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ इस विचित्र विश्वके जन्म आदि जिससे होते हैं अर्थात् जो सर्वशक्तिमान् परात्पर परमेश्वर अपनी अलौकिक शक्तिसे इस सम्पूर्ण जगत्की रचना करता है, इसका धारण, पोषण तथा नियमितरूपसे संचालन करता है; फिर प्रलयकाल आनेपर जो इस समस्त विश्वको अपनेमें विलीन कर लेता है, वह परमात्मा ही ब्रह्म है। भाव यह है कि देवता, दैत्य, दानव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि अनेक जीवोंसे परिपूर्ण, सूर्य, चन्द्रमा, तारा तथा नाना लोक- लोकान्तरोंसे सम्पन्न इस अनन्त ब्रह्माण्डका कर्ता-हर्ता कोई अवश्य है, यह हरेक मनुष्यकी समझमें आ सकता है; वही ब्रह्म है। उसीको परमेश्वर, परमात्मा और भगवान् आदि विविध नामोंसे कहते हैं; क्योंकि वह सबका आदि, सबसे बड़ा, सर्वाधार, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर सर्वव्यापी और सर्वरूप है। यह दृश्यमान जगत् उसकी अपार शक्तिके किसी एक अंशका दिग्दर्शनमात्र है। शंका—उपनिषदोंमें तो ब्रह्मका वर्णन करते हुए उसे अकर्ता, अभोक्ता, असंग, अव्यक्त, अगोचर, अचिन्त्य, निर्गुण, निरंजन तथा निर्विशेष बताया गया है और इस सूत्रमें उसे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलयका कर्ता बताया गया है। यह विपरीत बात कैसे? समाधान—उपनिषदोंमें वर्णित परब्रह्म परमेश्वर इस सम्पूर्ण जगत्का कर्ता होते हुए भी अकर्ता है (गीता ४। १३)। अतः उसका कर्तापन साधारण जीवोंकी भाँति नहीं है; सर्वथा अलौकिक है। वह सर्वशक्तिमान्* एवं सर्वरूप होनेमें समर्थ होकर भी सबसे सर्वथा अतीत और असंग है। सर्वगुणसम्पन्न होते हुए भी निर्गुण

  • परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥ (श्वेता० ६। ८) 'इस परमेश्वरकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक दिव्य शक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है।'

सूत्र ३ ] अध्याय १ २५

सूत्र ३ ] अध्याय १ २५ है¹ तथा समस्त विशेषणोंसे युक्त होकर भी निर्विशेष² है। इस प्रकार उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरमें विपरीत भावोंका समावेश स्वाभाविक होनेके कारण यहाँ शंकाके लिये स्थान नहीं है।³ सम्बन्ध—कर्तापन और भोक्तापनसे रहित, नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्मको इस जगत्का कारण कैसे माना जा सकता है? इसपर कहते हैं— शास्त्रयोनित्वात् ॥ १ । १ । ३ ॥ शास्त्रयोनित्वात्= शास्त्र (वेद)-में उस ब्रह्मको जगत्का कारण बताया गया है, इसलिये (उसको जगत्का कारण मानना उचित है)। १-एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥ (श्वेता० ६। ११) 'वह एक देव ही सब प्राणियोंमें छिपा हुआ, सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोंका अन्तर्यामी परमात्मा है; वही सबके कर्मोंका अधिष्ठाता, सम्पूर्ण भूतोंका निवास-स्थान, सबका साक्षी, चेतनस्वरूप, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत है।' २-एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ (मा० उ० ६) 'यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह सबका अन्तर्यामी है, यह सम्पूर्ण जगत्का कारण है; क्योंकि समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयका स्थान यही है।' नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्। अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ (मा० उ० ७) 'जो न भीतरकी ओर प्रज्ञावाला है, न बाहरकी ओर प्रज्ञावाला है, न दोनों ओर प्रज्ञावाला है, न प्रज्ञानघन है, न जाननेवाला है, न नहीं जाननेवाला है, जो देखा नहीं गया है, जो व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता, जो पकड़नेमें नहीं आ सकता, जिसका कोई लक्षण नहीं है, जो चिन्तन करनेमें नहीं आ सकता, जो बतलानेमें नहीं आ सकता, एकमात्र आत्माकी प्रतीति ही जिसका सार है, जिसमें प्रपंचका सर्वथा अभाव है, ऐसा सर्वथा शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्त्व परब्रह्म परमात्माका चतुर्थ पाद है, इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी मानते हैं। वह परमात्मा है, वह जाननेयोग्य है।' ३-इस विषयका निर्णय सूत्रकारने स्वयं किया है। देखो सूत्र ३।२।११ से ३।२।२३ तककी व्याख्या।

२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—वेदमें जिस प्रकार ब्रह्मके सत्य, ज्ञान और अनन्त (तै० उ० २।१) आदि लक्षण बताये गये हैं, उसी प्रकार उसको जगत्‌का कारण भी बताया गया है।१ इसलिये पूर्वसूत्रके कथनानुसार परब्रह्म परमेश्वरको जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण मानना सर्वथा उचित ही है। सम्बन्ध—मृत्तिका आदि उपादानोंसे घट आदि वस्तुओंकी रचना करनेवाले कुम्भकार आदिकी भाँति ब्रह्मको जगत्‌का निमित्त कारण बतलाना तो युक्तिसंगत हैं; परंतु उसे उपादान कारण कैसे माना जा सकता है? इसपर कहते हैं— तत्तु समन्वयात् ॥१।१।४॥ तु=तथा; तत्=वह ब्रह्म; समन्वयात्=समस्त जगत्‌में पूर्णरूपसे अनुगत (व्याप्त) होनेके कारण (उपादान भी हैं)। व्याख्या—जिस प्रकार अनुमान और शास्त्र-प्रमाणसे यह सिद्ध होता है कि इस विचित्र जगत्‌का निमित्त कारण परब्रह्म परमेश्वर है, उसी प्रकार यह भी सिद्ध है कि वही इसका उपादान कारण भी है; क्योंकि वह इस जगत्‌में पूर्णतया अनुगत (व्याप्त) है, इसका अणुमात्र भी परमेश्वरसे शून्य नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीतामें भी भगवान्‌ने कहा है कि 'चर या अचर, जड या चेतन, ऐसा कोई भी प्राणी या भूतसमुदाय नहीं है, जो मुझसे रहित हो।' (१०। ३९) 'यह सम्पूर्ण जगत् मुझसे व्याप्त है।' (गीता ९। ४) उपनिषदोंमें भी स्थान-स्थानपर यह बात दोहरायी गयी है कि 'उस परब्रह्म परमेश्वरसे यह समस्त जगत् व्याप्त है।'२ सम्बन्ध—सांख्यमतके अनुसार त्रिगुणात्मिका प्रकृति भी समस्त जगत्‌में १-'एष योनिः सर्वस्य' (मा० उ० ६) 'यह परमात्मा सम्पूर्ण जगत्‌का कारण है।' 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति।' (तै० उ० ३।१) 'ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं तथा अन्तमें प्रयाण करते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं, उसको जाननेकी इच्छा कर, वही ब्रह्म है।' २-ईशावास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। (ईशा० १)

सूत्र ५-६ ] अध्याय १ २७

सूत्र ५-६ ] अध्याय १ २७ व्याप्त है, फिर व्याप्तिरूप हेतुसे जगत्का उपादान कारण ब्रह्मको ही क्यों मानना चाहिये, प्रकृतिको क्यों नहीं ? इसपर कहते हैं— ईक्षतेर्नाशब्दम् ॥ १।१।५॥ ईक्षतेः=श्रुतिमें 'ईक्ष' धातुका प्रयोग होनेके कारण; अशब्दम् = शब्द-प्रमाण-शून्य प्रधान (त्रिगुणात्मिका जड प्रकृति); न = जगत्का कारण नहीं है। व्याख्या—उपनिषदोंमें जहाँ सृष्टिका प्रसंग आया है, वहाँ 'ईक्ष' धातुकी क्रियाका प्रयोग हुआ है; जैसे 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छा० उ० ६।२।१) इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय' (छा० उ० ६।२।३) अर्थात् 'उस सत्ने ईक्षण-संकल्प किया कि मैं बहुत हो जाऊँ, अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ।' ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार दूसरी जगह भी 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीत्' इस प्रकार आरम्भ करके 'स ईक्षत लोकान्नु सृजै' (ऐ० उ० १।१।१) अर्थात् 'उसने ईक्षण— विचार किया कि निश्चय ही मैं लोकोंकी रचना करूँ।' ऐसा कहा है। परंतु त्रिगुणात्मिका प्रकृति जड है, उसमें ईक्षण या संकल्प नहीं बन सकता; क्योंकि वह (ईक्षण) चेतनका धर्म है; अतः शब्दप्रमाणरहित प्रधान (जड प्रकृति)-को जगत्का उपादान कारण नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—ईक्षण या संकल्प चेतनका धर्म होनेपर भी गौणीवृत्तिसे अचेतनके लिये प्रयोगमें लाया जा सकता है, जैसे लोकमें कहते हैं 'अमुक मकान अब गिरना ही चाहता है।' इसी प्रकार यहाँ भी ईक्षण-क्रियाका सम्बन्ध गौणरूपसे त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिके साथ मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं— गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ॥१।१।६॥ चेत् =यदि कहो; गौणः = ईक्षणका प्रयोग गौणवृत्तिसे (प्रकृतिके लिये) हुआ है, न = तो यह ठीक नहीं है; आत्मशब्दात् = क्योंकि वहाँ 'आत्म' शब्दका प्रयोग है।