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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

इसपर सूत्रकार आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं—

७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ शिलामें विष्णुकी उपासनाके सदृश यहाँ 'वैश्वानर' नामक जठराग्निमें परमेश्वरकी प्रतीकोपासना बतलानेके लिये 'वैश्वानर' नामसे उस ब्रह्मका वर्णन है, अतः इसपर सूत्रकार आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं— साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॥ १ । २ । २८ ॥ साक्षात् = 'वैश्वानर' शब्दको साक्षात् परब्रह्मका वाचक माननेमें; अपि = भी; अविरोधम् = कोई विरोध नहीं है, ऐसा; जैमिनिः (आह) = आचार्य जैमिनि कहते हैं। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कथन है कि वैश्वानर शब्दको साक्षात् विश्वरूप परमात्माका वाचक माननेमें कोई विरोध नहीं है। अतः यहाँ जठराग्निको प्रतीक मानकर उसके रूपमें परमात्माकी उपासना माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त सूत्रोंद्वारा यह बात सिद्ध हो गयी कि 'वैश्वानर' नामसे इस प्रकरणमें परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन किया गया है, परंतु निर्विकार निराकार अव्यक्त परब्रह्म परमात्माको इस प्रकार साकार विराट्रूपमें देश-विशेषसे सम्बद्ध बतलाना किस अभिप्रायसे है? निर्गुण-निराकारको सगुण-साकार बताना विरुद्ध-सा प्रतीत होता है। इसपर २९ वें सूत्रसे ३१ वें तक विभिन्न आचार्योंका मत बताते हुए अन्तमें ३२ वें सूत्रमें अपना सिद्धान्त कहकर सूत्रकार इस दूसरे पादको समाप्त करते हैं— अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः ॥ १ । २ । २९ ॥ अभिव्यक्तेः = (भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये) देश-विशेषमें ब्रह्मका प्राकट्य होता है, इसलिये; (अविरोधः =) कोई विरोध नहीं है; इति = ऐसा; आश्मरथ्यः = आश्मरथ्य आचार्य मानते हैं। व्याख्या—आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि भक्तजनोंपर अनुग्रह करके उन्हें दर्शन देनेके लिये भगवान् समय-समयपर उनकी श्रद्धाके अनुसार नाना रूपोंमें प्रकट होते हैं; तथा अपने भक्तोंको दर्शन, स्पर्श और प्रेमालाप आदिके द्वारा सुख पहुँचाने, उनका उद्धार करने और जगत्में अपनी कीर्ति

सूत्र ३० ] अध्याय १ ७३

सूत्र ३० ] अध्याय १ ७३ फैलाकर उसके कथन-मननद्वारा साधकोंको परम लाभ पहुँचानेके लिये भगवान् मनुष्य आदिके रूपमें भी समय-समयपर प्रकट होते हैं। यह बात उपनिषद् (केन० ३।२), गीता (४।६-९) और अन्यान्य सद्ग्रन्थोंसे भी प्रमाणित है। इस कारण विराट्‌रूपमें उस परब्रह्म परमात्माको सगुण-साकार तथा देश-विशेषसे सम्बन्धित माननेमें कोई विरोध नहीं है; क्योंकि वह सर्वसमर्थ भगवान् देश-कालातीत और देश-कालसे सम्बन्ध रखनेवाला भी है। वह जिस प्रकार निर्गुण-निराकार है, उसी प्रकार सगुण-साकार भी है। यह बात माण्डूक्योपनिषद्‌में परब्रह्म परमात्माके चार पादोंका वर्णन करके भलीभाँति समझायी गयी है। सम्बन्ध — अब इस विषयमें बादरि आचार्यका मत उपस्थित करते हैं— अनुस्मृतेर्बादरिः ॥ १।२।३०॥ अनुस्मृतेः = विराट्‌रूपमें परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करनेके लिये, उसको देश-विशेषसे सम्बद्ध बतानेमें; (अविरोधः = ) कोई विरोध नहीं है; (इति = ) ऐसा; बादरिः = बादरि नामक आचार्य मानते हैं। व्याख्या — परब्रह्म परमेश्वर यद्यपि देशकालातीत हैं तो भी उनका निरन्तर भजन, ध्यान और स्मरण करनेके लिये उन्हें देश-विशेषमें स्थित विराट्स्वरूप मानने, कहने और समझनेमें कोई विरोध नहीं है, क्योंकि भगवान् सर्वसमर्थ हैं। उनके भक्त उनका जिस-जिस रूपमें चिन्तन करते हैं, उनपर कृपा करनेके लिये वे उसी-उसी रूपमें उनको मिलते हैं। *

  • श्रीमद्भागवतमें भी ऐसा ही कहा गया है— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ (३।९।११) 'महान् यशस्वी परमेश्वर ! आपके भक्तजन अपने हृदयमें आपको जिस-जिस रूपमें चिन्तन करते हैं, आप उन संत-महानुभावोंपर अनुग्रह करनेके लिये वही- वही शरीर धारण कर लेते हैं।'

७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध—इसी विषयमें आचार्य जैमिनिका मत बताते हैं— सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॥ १।२।३१॥ सम्पत्तेः = परब्रह्म परमेश्वर अनन्त ऐश्वर्यसे सम्पन्न है, इसलिये (उसे देश-विशेषसे सम्बन्ध रखनेवाला माननेमें कोई विरोध नहीं है); इति = ऐसा; जैमिनिः = जैमिनि आचार्य मानते हैं; हि = क्योंकि; तथा = ऐसा ही भाव; दर्शयति = दूसरी श्रुति भी प्रकट करती है। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका यह कथन है कि परब्रह्म परमेश्वर अनन्त ऐश्वर्यसे सम्पन्न है; अतः उस निर्विकार, निराकार, देशकालातीत परमात्माको सगुण साकार और किसी देश-विशेषसे सम्बन्ध रखनेवाला माननेमें कोई विरोध नहीं है; क्योंकि दूसरी श्रुति भी ऐसा ही भाव प्रकट करती है। (मु० उ० २।१।४)१ सम्बन्ध—अब सूत्रकार अपने मतका वर्णन करते हुए इस पादका उपसंहार करते हैं— आमनन्ति चैनमस्मिन् ॥ १।२।३२॥ अस्मिन् = इस वैदिक सिद्धान्तमें; एनम् = इस परमेश्वरको; (एवम्)= ऐसा; च = ही; आमनन्ति = प्रतिपादन करते हैं। व्याख्या—इस वैदिक सिद्धान्तमें सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सबके निवासस्थान, सर्वसमर्थ परब्रह्म परमेश्वरका ज्ञानीजन ऐसा ही प्रतिपादन करते हैं२ इस विषयमें शास्त्र ही प्रमाण है। युक्ति-प्रमाण यहाँ नहीं चल १-यह मन्त्र पृष्ठ ६६ के अन्तर्गत २३ वें सूत्रकी व्याख्यामें अर्थसहित आ गया है। २-अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम्। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ (श्वेता० ५। १३) 'दुर्गम संसारके भीतर व्याप्त, आदि-अन्तसे रहित, समस्त जगत्की रचना करनेवाले,

सूत्र ३२ ] अध्याय १ ७५

सूत्र ३२ ] अध्याय १ ७५ सकता; क्योंकि परमात्मा तर्कका विषय नहीं है। वह सगुण-निर्गुण, साकार- निराकार, सविशेष-निर्विशेष आदि सब कुछ है। यह विश्वास करके साधकको उसके स्मरण और चिन्तनमें लग जाना चाहिये। वह व्यापक भगवान् सभी देशोंमें सर्वदा विद्यमान है। अतः उसको किसी भी देश-विशेषसे संयुक्त मानना विरुद्ध नहीं है तथा वह सब देशोंसे सदा ही निर्लिप्त है। इस कारण उसको देशकालातीत मानना भी उचित ही है। अतः सभी आचार्योंकी मान्यता ठीक है। दूसरा पाद सम्पूर्ण अनेक रूपधारी, समस्त जगत्‌को सब ओरसे घेरे हुए एक अद्वितीय परमेश्वरको जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है।'

तीसरा पाद

तीसरा पाद सम्बन्ध—पहले दो पादोंमें सर्वान्तर्यामी परब्रह्म परमात्माके व्यापक रूपका भलीभाँति प्रतिपादन किया गया। अब उसी परमेश्वरको सबका आधार बतलाते हुए तीसरा पाद आरम्भ करते हैं— द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॥ १ । ३ । १ ॥ द्युभ्वाद्यायतनम् = (उपनिषदोंमें) जिसको स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार बताया गया है (वह परब्रह्म परमात्मा ही है); स्वशब्दात् = क्योंकि वहाँ उस परमात्माके बोधक 'आत्मा' शब्दका प्रयोग है। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् (२।२।५)-में कहा गया है कि— 'यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥' अर्थात् 'जिसमें स्वर्ग, पृथिवी और उसके बीचका आकाश तथा समस्त प्राणोंके सहित मन गुँथा हुआ है, उसी एक सबके आत्मरूप परमेश्वरको जानो, दूसरी सब बातोंको सर्वथा छोड़ दो। यही अमृतका सेतु है।' इस मन्त्रमें जिस एक आत्माको उपर्युक्त ऊँचे-से-ऊँचे स्वर्ग और नीचे पृथिवी आदि सभी जगत्का आधार बताया है; वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, जीवात्मा या प्रकृति नहीं; क्योंकि इसमें परब्रह्मबोधक 'आत्मा' शब्दका प्रयोग है। सम्बन्ध—उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये दूसरा हेतु देते हैं— मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । २ ॥ मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् = (उस सर्वाधार परमात्माको) मुक्त पुरुषोंके लिये प्राप्तव्य बतलाया गया है, इसलिये (वह जीवात्मा नहीं हो सकता)। व्याख्या—उक्त उपनिषद्में ही आगे चलकर कहा गया है कि—

सूत्र २ ] अध्याय १ ७७

सूत्र २ ] अध्याय १ ७७ 'यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥' (मु० उ० ३।२।८) 'जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ नाम-रूपको छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महात्मा नाम-रूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परमपुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है।' इस प्रकार श्रुतिने परमपुरुष परमात्माको मुक्त (ज्ञानी) पुरुषोंके लिये प्राप्तव्य बताया है; इसलिये (मु० उ० २।२।५ में) द्युलोक और पृथिवी आदिके आधाररूपसे जिस 'आत्मा' का वर्णन आया है, वह 'जीवात्मा' नहीं, साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ही है। इसके पूर्ववर्ती चौथे मन्त्रमें भी परमात्माको जीवात्माका प्राप्य बताया गया है। वह मन्त्र इस प्रकार है— 'प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥' 'प्रणव तो धनुष है और जीवात्मा बाणके सदृश है। ब्रह्मको उसका लक्ष्य कहते हैं। प्रमादरहित (सतत सावधान) मनुष्यके द्वारा वह लक्ष्य बींधा जानेयोग्य है; इसलिये साधकको उचित है कि उस लक्ष्यको वेधकर बाणकी ही भाँति उसमें तन्मय हो जाय—सब बन्धनोंसे मुक्त हो सदा परमेश्वरके चिन्तनमें ही तत्पर रहकर तन्मय हो जाय।' इस प्रकार इस प्रसंगमें जगह-जगह परमात्माको जीवका प्राप्य बताये जानेके कारण पूर्वोक्त श्रुतिमें वर्णित द्युलोक आदिका आधारभूत आत्मा परब्रह्म ही हो सकता है; दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध—अब यहाँ यह शंका होती है कि पृथिवी आदि सम्पूर्ण भूत- प्रपंच जड प्रकृतिका कार्य है; कार्यका आधार कारण ही होता है; अतः प्रधान (जड प्रकृति-) - को ही सबका आधार माना जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं—

७८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

७८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ नानुमानमतच्छब्दात् ॥ १ । ३ । ३ ॥ अनुमानम् = अनुमान-कल्पित प्रधान; न = द्युलोक और पृथिवी आदिका आधार नहीं हो सकता; अतच्छब्दात् = क्योंकि उसका प्रतिपादक कोई शब्द (इस प्रकरणमें) नहीं है। व्याख्या—इस प्रकरणमें ऐसा कोई शब्द नहीं प्रयुक्त हुआ है, जो जड प्रकृतिको स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार बताता हो। अतः उसे इनका आधार नहीं माना जा सकता। वह जगत्का कारण नहीं है, यह बात तो पहले ही सिद्ध की जा चुकी है। अतः उसे कारण बताकर इनका आधार माननेकी तो कोई सम्भावना ही नहीं है। सम्बन्ध—प्रकृतिका वाचक शब्द उस प्रकरणमें नहीं है यह तो ठीक है। परंतु जीवात्माका वाचक 'आत्मा' शब्द तो वहाँ है ही, अतः उसीको द्युलोक आदिका आधार माना जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— प्राणभृच्च ॥ १ । ३ । ४ ॥ प्राणभृत् = प्राणधारी जीवात्मा; च = भी; ( न= ) द्युलोक आदिका आधार नहीं हो सकता (क्योंकि उसका वाचक शब्द भी इस प्रकरणमें नहीं है)। व्याख्या—जैसे प्रकृतिका वाचक शब्द इस प्रकरणमें नहीं है, वैसे ही जीवात्माका बोधक शब्द भी नहीं प्रयुक्त हुआ है। 'आत्मा' शब्द अन्यत्र जीवात्माके अर्थमें प्रयुक्त होनेपर भी इस प्रकरणमें वह जीवात्माका वाचक नहीं है; क्योंकि (मु० उ० २।२।७ में) इसके लिये 'आनन्दरूप' और 'अमृत' विशेषण दिये गये हैं; जो कि परब्रह्म परमात्माके ही अनुरूप हैं। इसलिये प्राणधारी जीवात्मा भी द्युलोक आदिका आधार नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—उपर्युक्त अभिप्रायकी सिद्धिके लिये दूसरा कारण देते हैं— भेदव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । ५ ॥ भेदव्यपदेशात् = यहाँ कहे हुए आत्माको जीवात्मासे भिन्न बताये जानेके कारण; ( प्राणभृत् न= ) प्राणधारी जीवात्मा सबका आधार नहीं है।

सूत्र ६-७ ] अध्याय १ ७९

सूत्र ६-७ ] अध्याय १ ७९ व्याख्या—इसी मन्त्र (मु० उ० २।२।५)-में यह बात कही गयी है कि ‘उस आत्माको जानो।’ अतः ज्ञातव्य आत्मासे उसको जाननेवाला भिन्न होगा ही। इसी प्रकार आगेवाले मन्त्र (मु० उ० ३।१।७)-में उक्त आत्माको द्रष्टा जीवात्माओंकी हृदय-गुफामें छिपा हुआ बताया गया है।* इससे भी ज्ञातव्य आत्माकी भिन्नता सिद्ध होती है; इसलिये इस प्रकरणमें बतलाया हुआ द्युलोक आदिका आधार परब्रह्म परमेश्वर ही है, जीवात्मा नहीं। सम्बन्ध— यहाँ जीवात्मा और जड प्रकृति दोनों ही द्युलोक आदिके आधार नहीं हैं, इसमें दूसरा कारण बताते हैं— प्रकरणात् ॥ १ । ३ । ६ ॥ प्रकरणात् = यहाँ परब्रह्म परमात्माका प्रकरण है, इसलिये; ( भी यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा और जड प्रकृति द्युलोक आदिके आधार नहीं हैं)। व्याख्या—इस प्रकरणमें आगे-पीछेके सभी मन्त्रोंमें उस परमात्माको सर्वाधार, सबका कारण, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् बताकर उसीको जीवात्माके लिये प्राप्तव्य ब्रह्म कहा है; इसलिये यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा और परमात्मा एक-दूसरेसे भिन्न हैं तथा यहाँ बतलाया हुआ स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार वह परब्रह्म ही है; जीव या जड प्रकृति नहीं। सम्बन्ध— इसके सिवा— स्थित्यदनाभ्यां च॥ १ । ३ । ७॥ स्थित्यदनाभ्याम् = एककी शरीरमें साक्षीरूपसे स्थिति और दूसरेके द्वारा सुख-दुःखप्रद विषयका उपभोग बताया गया है, इसलिये; च = भी (जीवात्मा और परमात्माका भेद सिद्ध होता है)।

  • दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम्॥ (मु० ३।१।७)

८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् (३।१।१)-में तथा श्वेताश्वतरोपनिषद् (४।६)-में कहा है— 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥' 'एक साथ रहते हुए परस्पर सख्यभाव रखनेवाले दो पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) एक ही शरीररूप वृक्षका आश्रय लेकर रहते हैं। उन दोनोंमेंसे एक (जीवात्मा) तो उस वृक्षके कर्मफलस्वरूप सुख-दुःखोंका स्वाद ले- लेकर (आसक्तिपूर्वक) उपभोग करता है, किंतु दूसरा (परमात्मा) न खाता हुआ केवल देखता रहता है।' इस वर्णनमें जीवात्माको कर्मफलका भोक्ता तथा परमात्माको केवल साक्षीरूपसे स्थित रहनेवाला बताया गया है। इससे दोनोंका भेद स्पष्ट है। अतः इस प्रकरणमें द्युलोक, पृथिवी आदि समस्त जड- चेतनात्मक जगत्का आधार परब्रह्म परमेश्वर ही सिद्ध होता है, जीवात्मा नहीं। सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें यह बात कही गयी कि जिसे द्युलोक और पृथिवी आदिका आधार बताया गया है, उसीको 'आत्मा' कहा गया है; अतः वह परब्रह्म परमात्मा ही है; जीवात्मा नहीं। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद्के सातवें अध्यायमें नारदजीके द्वारा आत्माका स्वरूप पूछे जानेपर सनत्कुमारजीने क्रमशः नाम, वाणी, मन, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान, बल, अन्न, जल, तेज, आकाश, स्मरण और आशाको उत्तरोत्तर बड़ा बताया है, फिर अन्तमें प्राणको इन सबकी अपेक्षा बड़ा बताकर उसीकी उपासना करनेके लिये कहा है। उसे सुनकर नारदजीने फिर कोई प्रश्न नहीं किया है। इस वर्णनके अनुसार यदि इस प्रकरणमें सबसे बड़ा प्राण है और उसीको 'भूमा' एवं 'आत्मा' भी कहते हैं, तब तो पूर्व प्रकरणमें भी सबका आधार प्राणशब्दवाच्य जीवात्माको ही मानना चाहिये; इसका समाधान करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है— भूमा सम्प्रसादादध्युपदेशात् ॥ १।३।८॥ भूमा = (उक्त प्रकरणमें कहा हुआ) 'भूमा' (सबसे बड़ा) ब्रह्म ही है;

सूत्र ८ ] अध्याय १ ८१ सम्प्रसादात्=क्योंकि उसे प्राणशब्दवाच्य जीवात्मासे भी; अधि=ऊपर (बड़ा); उपदेशात्=बताया गया है। व्याख्या—उक्त प्रकरणमें नाम आदिके क्रमसे एककी अपेक्षा दूसरेको बड़ा बताते हुए पंद्रहवें खण्डमें प्राणको सबसे बड़ा बताकर कहा है—'यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्वँ समर्पितम्। प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति। प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥' (छा० उ० ७।१५।१) अर्थात् 'जैसे अरे रथचक्रकी नाभिके आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार समस्त जगत् प्राणके आश्रित है, प्राण ही प्राणके द्वारा गमन करता है, प्राण ही प्राण देता है, प्राणके लिये देता है, प्राण पिता है, प्राण माता है, प्राण भ्राता है, प्राण बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है।' इससे यह मालूम होता है कि यहाँ प्राणके नामसे जीवात्माका वर्णन है; क्योंकि सूत्रकारने यहाँ उस प्राणका ही दूसरा नाम 'सम्प्रसाद' रखा है और सम्प्रसाद नाम जीवात्माका है, यह बात इसी उपनिषद् (छा० उ० ८।३।४)-में स्पष्ट कही गयी है। इस प्राणशब्दवाच्य जीवात्माके विषयमें आगे चलकर यह भी कहा है कि 'यह सब कुछ प्राण ही है; इस प्रकार जो चिन्तन करनेवाला, देखनेवाला और जाननेवाला है, वह अतिवादी होता है।' इसलिये यहाँ यह धारणा होनी स्वाभाविक है कि इस प्रकरणमें प्राणशब्दवाच्य जीवात्माको ही सबसे बड़ा बताया गया है; क्योंकि इस उपदेशको सुनकर नारदजीने पुनः अपनी ओरसे कोई प्रश्न नहीं उठाया। मानो उन्हें अपने प्रश्नका पूरा उत्तर मिल गया हो। परंतु भगवान् सनत्कुमार तो जानते थे कि इससे आगेकी बात समझाये बिना इसका ज्ञान अधूरा ही रह जायगा, अतः उन्होंने नारदजीके बिना पूछे ही सत्य शब्दसे ब्रह्मका प्रकरण उठाया अर्थात् 'तू' शब्दका प्रयोग करके यह स्पष्ट कर दिया कि 'वास्तविक अतिवादी तो वह है, जो सत्यको जानकर उसके बलपर प्रतिवाद करता है।' इस कथनसे नारदके मनमें सत्यतत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करके उसे जाननेके साधनरूप विज्ञान, मनन, श्रद्धा, निष्ठा और क्रियाको

८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ बताया। फिर सुखरूपसे भूमाको अर्थात् सबसे महान् परब्रह्म परमात्माको बतलाकर प्रकरणका उपसंहार किया। इस प्रकार प्राणशब्दवाच्य जीवात्मासे अधिक (बड़ा) भूमाको बताये जानेके कारण इस प्रकरणमें 'भूमा' शब्द सत्य ज्ञानानन्दस्वरूप सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है। प्राण, जीवात्मा अथवा प्रकृतिका वाचक नहीं। सम्बन्ध—इतना ही नहीं, अपितु— धर्मोपपत्तेश्च ॥ १। ३ । ९ ॥ धर्मोपपत्तेः = (उक्त प्रकरणमें) जो भूमाके धर्म बतलाये गये हैं, वे भी ब्रह्ममें ही सुसंगत हो सकते हैं, इसलिये; च = भी; (यहाँ 'भूमा' ब्रह्म ही है।) व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकरणमें उस भूमाके धर्मोंका इस प्रकार वर्णन किया गया है—'यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत् पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद् विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्। स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि।' (छा० उ० ७।२४।१) अर्थात् 'जहाँ पहुँचकर न अन्य किसीको देखता है, न अन्यको सुनता है, न अन्यको जानता है, वह भूमा है। जहाँ अन्यको देखता, सुनता और जानता है, वह अल्प है। जो भूमा है, वही अमृत है और जो अल्प है, वह नाशवान् है।' इसपर नारदने पूछा—'भगवन् ! वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है?' उत्तरमें सनत्कुमारने कहा—'अपनी महिमामें।' आगे चलकर फिर कहा है कि 'धन, सम्पत्ति, मकान आदि जो महिमाके नामसे प्रसिद्ध हैं, ऐसी महिमामें वह भूमा प्रतिष्ठित नहीं है, किंतु वह नीचे, ऊपर, आगे, पीछे, दायें और बायें है तथा वही यह सब कुछ है।' इसके बाद उस भूमाको ही आत्माके नामसे कहा है और यह भी बताया है कि 'आत्मा ही नीचे, ऊपर, आगे, पीछे, दायें और बायें है तथा वही सब कुछ है। जो इस प्रकार देखने, मानने तथा विशेषरूपसे जाननेवाला है, वह आत्मामें ही क्रीडा करनेवाला, आत्मामें ही रतिवाला, आत्मामें ही जुड़ा हुआ तथा आत्मामें ही आनन्दवाला है।' इत्यादि।

सूत्र १०] अध्याय १ ८३

सूत्र १०] अध्याय १ ८३ इन सब धर्मोंकी संगति परब्रह्म परमात्मामें ही लग सकती है; अतः वही इस प्रकरणमें 'भूमा' के नामसे कहा गया है। सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें भूमाके जो धर्म बताये गये हैं, वे ही बृहदारण्यकोपनिषद् (३।८।७)-में 'अक्षर' के भी धर्म कहे गये हैं। अक्षर शब्द प्रणवरूप वर्णका भी वाचक है; अतः यहाँ 'अक्षर' शब्द किसका वाचक है? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अक्षरमम्बरान्तधृतेः ॥ १। ३। १०॥ अक्षरम् = (उक्त प्रकरणमें) अक्षर शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है; अम्बरान्तधृतेः = क्योंकि उसको आकाशपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाला बताया गया है। व्याख्या—यह प्रकरण इस प्रकार है—'सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिन् तदोतं च प्रोतं चेति॥' (३।८।६) गार्गीने याज्ञवल्क्यसे पूछा—'याज्ञवल्क्य! जो द्युलोकसे भी ऊपर, पृथिवीसे भी नीचे और इन दोनोंके बीचमें भी हैं तथा जो यह पृथिवी और द्युलोक हैं, ये सब-के-सब एवं जिसको भूत, भविष्यत् और वर्तमान कहते हैं, वह काल किसमें ओत-प्रोत है?' इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने कहा— 'गार्गि ! यह सब आकाशमें ओत-प्रोत है।' इसपर गार्गीने पूछा—'वह आकाश किसमें ओत-प्रोत है?' (३।८।७) तब याज्ञवल्क्यने कहा— 'एतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहित- मस्नेहम्······ इत्यादि।' 'हे गार्गि ! उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्तालोग 'अक्षर' कहते हैं। जो कि न स्थूल है, न सूक्ष्म है, न छोटा है, न बड़ा है, न लाल है, न पीला है, इत्यादि।' (३।८।८) इस प्रकार वह अक्षर आकाशपर्यन्त सबको धारण करनेवाला बताया गया है, इसलिये यहाँ 'अक्षर' नामसे उस परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं।

८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध - कारण अपने कार्यको धारण करता है, यह सभी मानते हैं। जिनके मतमें प्रकृति ही जगत्का कारण है, वे उसे ही आकाशपर्यन्त सभी भूतोंको धारण करनेवाली मान सकते हैं। अतः उनके मतानुसार यहाँ 'अक्षर' शब्द प्रकृतिका ही वाचक हो सकता है। इस शंकाका निवारण करनेके लिये कहते हैं- सा च प्रशासनात् ॥ १ । ३ । ११ ॥ च=और; सा=वह आकाशपर्यन्त सब भूतोंको धारण करनारूप क्रिया (परमेश्वरकी ही है); प्रशासनात् =क्योंकि उस अक्षरको सबपर भलीभाँति शासन करनेवाला कहा है। व्याख्या- इस प्रकरणमें आगे चलकर कहा है कि 'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठत - इत्यादि' अर्थात् 'इसी अक्षरके प्रशासनमें सूर्य और चन्द्रमा धारण किये हुए स्थित हैं, एवं द्युलोक, पृथिवी, निमेष, मुहूर्त, दिन-रात आदि नामोंसे कहा जानेवाला काल - ये सब विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित हैं। इसीके प्रशासनमें पूर्व और पश्चिमकी ओर बहनेवाली सब नदियाँ अपने-अपने निर्गम-स्थान पर्वतोंसे निकलकर बहती हैं।' इत्यादि। (बृह० उ० ३।८।९) इस प्रकार उस अक्षरको सबपर भलीभाँति शासन करते हुए आकाशपर्यन्त सबको धारण करनेवाला बताया गया है। यह कार्य जडप्रकृतिका नहीं हो सकता। अतः वह सबको धारण करनेवाला अक्षरतत्त्व ब्रह्म ही है, अन्य कोई नहीं। सम्बन्ध - इसके सिवा- अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॥ १ । ३ । १२ ॥ अन्यभावव्यावृत्तेः = यहाँ अक्षरमें अन्य (प्रधान आदि)-के लक्षणोंका निराकरण किया गया है इसलिये; च = भी ('अक्षर' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है)।

सूत्र १३ ] अध्याय १ ८५

सूत्र १३ ] अध्याय १ ८५ व्याख्या - उक्त प्रसंगमें आगे चलकर कहा गया है— 'वह अक्षर देखनेमें न आनेवाला किंतु स्वयं सबको देखनेवाला है; सुननेमें न आनेवाला, किंतु स्वयं सुननेवाला है; मनन करनेमें न आनेवाला किंतु स्वयं मनन करनेवाला है; जाननेमें न आनेवाला, किंतु स्वयं सबको भलीभाँति जाननेवाला है' इत्यादि। (बृह० उ० ३।८।११) इस प्रकार यहाँ उस अक्षरमें देखने, सुनने और जाननेमें आनेवाले प्रधान आदिके धर्मोंका निराकरण किया गया है,* इसलिये भी 'अक्षर' शब्द विनाशशील जड प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता। अतः यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'अक्षर' नामसे परब्रह्मका ही प्रतिपादन किया गया है। सम्बन्ध - उपर्युक्त प्रकरणमें 'अक्षर' शब्दको परब्रह्मका वाचक सिद्ध किया गया; किंतु प्रश्नोपनिषद् (५। २-७)-में ॐकार अक्षरको परब्रह्म और अपरब्रह्म दोनोंका प्रतीक बताया गया है अतः वहाँ अक्षरको अपरब्रह्म भी माना जा सकता है, इस शंकाकी निवृत्तिके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः ॥ १ । ३ । १३ ॥ ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् = यहाँ परमपुरुषको 'ईक्षते' क्रियाका कर्म बताये जानेके कारण; सः = वह परब्रह्म परमेश्वर ही (त्रिमात्रासम्पन्न 'ओम्' इस अक्षरके द्वारा चिन्तन करनेयोग्य बताया गया है)। व्याख्या - इस सूत्रमें जिस मन्त्रपर विचार चल रहा है, वह इस प्रकार है— 'यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः। यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते।' (प्र० उ० ५। ५) अर्थात् 'जो तीन मात्राओंवाले 'ओम्' रूप इस अक्षरके द्वारा ही इस परम पुरुषका निरन्तर

  • उपर्युक्त श्रुतिमें अक्षरको सर्वद्रष्टा बताकर उसमें प्रकृतिके जडत्व और जीवात्माके अल्पज्ञत्व आदि धर्मोंका भी निराकरण किया गया है।

८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्यलोकमें जाता है तथा जिस प्रकार सर्प केंचुलीसे अलग हो जाता है, ठीक उसी तरह वह पापोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। इसके बाद वह सामवेदकी श्रुतियोंद्वारा ऊपर ब्रह्मलोकमें ले जाया जाता है। वह इस जीव-समुदायरूप परतत्त्वसे अत्यन्त श्रेष्ठ अन्तर्यामी परम पुरुष पुरुषोत्तमको साक्षात् कर लेता है।' इस मन्त्रमें जिसको तीनों मात्राओंसे सम्पन्न ॐकारके द्वारा ध्येय बतलाया गया है, वह पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही है, अपरब्रह्म नहीं; क्योंकि उस ध्येयको, जीव- समुदायके नामसे वर्णित हिरण्यगर्भरूप अपरब्रह्मसे अत्यन्त श्रेष्ठ बताकर ‘ईक्षते’ क्रियाका कर्म बतलाया गया है। सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकरणमें मनुष्यशरीररूप पुरमें शयन करनेवाले पुरुषको परब्रह्म परमात्मा सिद्ध किया गया है। किंतु छान्दोग्योपनिषद् (८। १।१)-में ब्रह्मपुरान्तर्गत दहर (सूक्ष्म) आकाशका वर्णन करके उसमें स्थित वस्तुको जाननेके लिये कहा है। वह एकदेशीय वर्णन होनेके कारण जीवपरक हो सकता है। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त प्रकरणमें ‘दहर’ नामसे कहा हुआ तत्त्व क्या है? इसपर कहते हैं— दहर उत्तरेभ्यः ॥ १। ३। १४॥ दहरः = उक्त प्रकरणमें ‘दहर’ शब्दसे जिस ज्ञेय तत्त्वका वर्णन किया गया है, वह ब्रह्म ही है; उत्तरेभ्यः = क्योंकि उसके पश्चात् आये हुए वचनोंसे यही सिद्ध होता है। व्याख्या—छान्दोग्य० (८।१।१)-में कहा है कि 'अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्म, पुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्त- दन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यम्।' अर्थात् 'इस ब्रह्मके नगररूप मनुष्य- शरीरमें कमलके आकारवाला एक घर (हृदय) है, उसमें सूक्ष्म आकाश है। उसके भीतर जो वस्तु है, उसको जाननेकी इच्छा करनी चाहिये।' इस वर्णनमें जिसे ज्ञातव्य बताया गया है, वह ‘दहर’ शब्दका लक्ष्य परब्रह्म परमेश्वर ही है; क्योंकि आगेके वर्णनमें इसीके भीतर समस्त ब्रह्माण्डको निहित बताया है

सूत्र १५ ] अध्याय १ ८७

सूत्र १५ ] अध्याय १ ८७ तथा उसके विषयमें यह भी कहा है कि 'यह आत्मा सब पापोंसे रहित, जरामरणवर्जित, शोकशन्य, भूख-प्याससे रहित, सत्यकाम तथा सत्यसंकल्प है' इत्यादि (८।१।५)। तदनन्तर आगे चलकर (छा० उ० ८।३।४ में) कहा है कि यही आत्मा, अमृत, अभय और ब्रह्म है। इसीका नाम सत्य है।' इससे सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर' शब्द परब्रह्मका ही बोधक है। सम्बन्ध - प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं- गतिशब्दाभ्यां तथा दृष्टं लिंगं च ॥ १ । ३ । १५ ॥ गतिशब्दाभ्याम् = ब्रह्ममें गतिका वर्णन और ब्रह्मवाचक शब्द होनेसे; तथा दृष्टम्=एवं दूसरी श्रुतियोंमें ऐसा ही वर्णन देखा गया है; च=और; लिंगम्=इस वर्णनमें आये हुए लक्षण भी ब्रह्मके हैं; इसलिये यहाँ 'दहर' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन है। व्याख्या-इस प्रसंगमें यह बात कही गयी है कि- 'इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥' (छा० उ० ८।३।२) अर्थात् 'ये जीव-समुदाय प्रतिदिन सुषुप्तिकालमें इस ब्रह्मलोकको जाते हैं परंतु असत्यसे आवृत रहनेके कारण उसे जानते नहीं हैं।' इस वाक्यमें प्रतिदिन ब्रह्मलोकमें जानेके लिये कहना तो गतिका वर्णन है और उस 'दहर' को ब्रह्मलोक कहना उसका वाचक शब्द है। इन दोनों कारणोंसे यह सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर' शब्द ब्रह्मका ही बोधक है। इसके सिवा दूसरी जगह (६।८।१ में) भी ऐसा ही वर्णन पाया जाता है—यथा- 'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति।' अर्थात् 'हे सौम्य ! उस सुषुप्त-अवस्था में जीव 'सत्' नामसे कहे जानेवाले परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होता है' इत्यादि । तथा आगे बताये गये, अमृत, अभय आदि लक्षण भी ब्रह्ममें ही सुसंगत होते हैं। इन दोनों कारणोंसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर' नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है। सम्बन्ध - उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये दूसरा कारण बताते हैं—

८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ॥ १। ३। १६ ॥ धृतेः = इस 'दहर'में समस्त लोकोंको धारण करनेकी शक्ति बतायी जानेके कारण; च = भी; (यह परब्रह्मका ही वाचक है क्योंकि) अस्य = इसकी; महिम्नः = (समस्त लोकोंको धारण करनेकी सामर्थ्यरूप) महिमाका; अस्मिन् = इस परब्रह्म परमात्मामें होना; उपलब्धेः = अन्य श्रुतियोंमें भी पाया जाता है, इसलिये ('दहर' नामसे ब्रह्मका वर्णन मानना सर्वथा उचित है)। व्याख्या—छान्दोग्य० (८। ४। १)-में कहा गया है कि 'अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानाम्।' अर्थात् 'यह जो आत्मा है, वही इन सब लोकोंको धारण करनेवाला सेतु है।' इस प्रकार यहाँ उस 'दहर' शब्दवाच्य आत्मामें समस्त लोकोंको धारण करनेकी शक्तिका वर्णन होनेके कारण 'दहर' यहाँ परमात्माका ही वाचक है; क्योंकि दूसरी श्रुतियोंमें भी परमेश्वरमें ऐसी महिमा होनेका वर्णन इस प्रकार उपलब्ध होता है—'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः' (बृह० उ० ३। ८। ९) अर्थात् 'हे गार्गि! इस अक्षर परमात्माके ही शासनमें रहकर सूर्य और चन्द्रमा भलीभाँति धारण किये हुए स्थित हैं' इत्यादि। इसके सिवा यह भी कहा है कि 'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसम्भेदाय।' (बृ० उ० ४। ४। २२) अर्थात् 'यह सबका ईश्वर है, यह सम्पूर्ण प्राणियोंका स्वामी है। यह सब भूतोंका पालन-पोषण करनेवाला है तथा यह इन समस्त लोकोंको विनाशसे बचानेके लिये उनको धारण करनेवाला सेतु है।' परब्रह्मके अतिरिक्त अन्य कोई भी इन सम्पूर्ण लोकोंको धारण करनेमें समर्थ नहीं हो सकता; इसलिये यहाँ 'दहर' नामसे परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है। सम्बन्ध—अब दूसरा हेतु देकर उसी बातकी पुष्टि करते हैं— प्रसिद्धेश्च ॥ १। ३। १७ ॥ प्रसिद्धेः = आकाश शब्द परमात्माके अर्थमें प्रसिद्ध है, इस कारण; च = भी ('दहर' नाम परब्रह्मका ही है)।

सूत्र १८ ] अध्याय १ ८९

सूत्र १८ ] अध्याय १ ८९ व्याख्या—श्रुतिमें 'दहराकाश' नाम आया है। आकाश शब्द परमात्माके अर्थमें प्रसिद्ध है। यथा—'को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।' (तै० उ० २।७।१) अर्थात् 'यदि यह आनन्दस्वरूप आकाश (सबको अवकाश देनेवाला परमात्मा) न होता तो कौन जीवित रह सकता ? कौन प्राणोंकी क्रिया कर सकता?' तथा—'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते।' (छा० उ० १। ९। १) अर्थात् 'निश्चय ही ये सब प्राणी आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं।' इसलिये भी 'दहर' शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है। सम्बन्ध—अब 'दहर' शब्दसे जीवात्माका ग्रहण क्यों न किया जाय— यह शंका उठाकर समाधान करते हैं— इतरपरामर्शात् स इति चेन्नासम्भवात्॥ १। ३। १८॥ चेत्=यदि कहो; इतरपरामर्शात्=दूसरे अर्थात् जीवात्माका संकेत होनेके कारण; सः=वही 'दहर' नामसे कहा गया है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; असम्भवात्=क्योंकि वहाँ कहे हुए लक्षण जीवात्मामें सम्भव नहीं हैं। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (८। १। ५)-में इस प्रकार वर्णन आया है—'स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति॥' अर्थात् '(शिष्योंके पूछनेपर) आचार्यने इस प्रकार कहा कि 'इस (देह)- की जरावस्थासे यह जीर्ण नहीं होता, इसके वधसे इसका नाश नहीं होता। यह ब्रह्मपुर सत्य है। इसमें सम्पूर्ण काम-विषय सम्यक् प्रकारसे स्थित है। यह आत्मा पुण्य-पापसे रहित, जरा-मृत्युसे शून्य, शोकहीन, भूख-प्याससे रहित, सत्यकाम तथा सत्यसंकल्प है। जैसे इस लोकमें प्रजा यदि राजाकी आज्ञाका अनुसरण करती है तो वह जिस-जिस वस्तुकी कामना तथा जिस-जिस जनपद

९० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

९० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ एवं क्षेत्रभागकी अभिलाषा करती है, उसी-उसीको पाकर सुखपूर्वक जीवन धारण करती है।' इस मन्त्रके अनुसार 'देहकी जरावस्थासे यह जीर्ण नहीं होता और इसके वधसे इसका नाश नहीं होता'—इस कथनसे जीवात्माको लक्ष्य करानेवाला संकेत मिलता है; क्योंकि इसके आगेवाले मन्त्रमें कर्मफलकी अनित्यता बतायी गयी है और कर्मफल-भोगका सम्बन्ध जीवात्मासे ही है। इस प्रकार जीवात्माको लक्ष्य करानेवाला संकेत होनेके कारण वहाँ 'दहर' नामसे 'जीवात्मा' का ही प्रतिपादन है, ऐसा कहा जाय तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि पूर्वोक्त मन्त्रमें ही जो 'सत्यसंकल्प' आदि लक्षण बताये गये हैं, उनका जीवात्मामें होना सम्भव नहीं है। इसलिये यहाँ 'दहर' शब्दसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन हुआ है, ऐसा मानना सर्वथा उचित है। सम्बन्ध—पूर्वोक्त मतकी ही पुष्टिके लिये पुनः शंका उठाकर उसका समाधान करते हैं— उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ॥ १ । ३ । १९ ॥ चेत्=यदि कहो; उत्तरात्=उसके बादवाले वर्णनसे भी 'दहर' शब्द जीवात्माका ही बोधक सिद्ध होता है; तु=तो यह कथन ठीक नहीं है, (क्योंकि) आविर्भूतस्वरूपः=उस मन्त्रमें जिसका वर्णन है, वह अपने शुद्धस्वरूपको प्राप्त हुआ आत्मा है। व्याख्या—''छान्दोग्योपनिषद् (८।३।४)-में कहा है कि 'अथ य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यम् ॥' अर्थात् 'यह जो सम्प्रसाद है, वह इस शरीरसे निकलकर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने शुद्धस्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है। यह आत्मा है, यह अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है—ऐसा आचार्यने कहा। उस इस ब्रह्मका नाम सत्य है।' इस मन्त्रमें 'सम्प्रसाद' के नामसे स्पष्ट ही जीवात्माका वर्णन है और उसके लिये भी वे ही अमृत, अभय आदि विशेषण दिये गये हैं,

सूत्र २०-२१ ] अध्याय १ ९१ जो अन्यत्र ब्रह्मके लिये आते हैं, इसलिये इन लक्षणोंका जीवात्मामें होना असम्भव नहीं है, अतएव 'दहर' शब्दको 'जीवात्मा' का वाचक माननेमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये।'' ऐसी शंका उठायी जाय तो ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त मन्त्रमें अपने शुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुए जीवात्माके लिये वैसे विशेषण आये हैं। इसलिये उसके आधारपर 'दहर' शब्दको जीवात्माका वाचक नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध— यदि ऐसी बात है, तो उक्त प्रकरणमें जीवात्माको लक्ष्य करानेवाले शब्दोंका प्रयोग क्यों किया गया है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— अन्यार्थश्च परामर्शः॥ १। ३। २०॥ परामर्शः= (उक्त प्रकरणमें) जीवात्माको लक्ष्य करानेवाला संकेत, च=भी; अन्यार्थः=दूसरे ही प्रयोजनके लिये है। व्याख्या— पूर्वोक्त प्रकरणमें जो जीवात्माको लक्ष्य करानेवाले शब्दोंका प्रयोग हुआ है, वह 'दहर' शब्दसे जीवात्माका ग्रहण करानेके लिये नहीं, अपितु दूसरे ही प्रयोजनसे है। अर्थात् उस दहर शब्दवाच्य परमात्माके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर जीवात्मा भी वैसे ही गुणोंवाला बन जाता है, यह भाव प्रदर्शित करनेके लिये ही वहाँ जीवात्माका उस रूपमें वर्णन है। परब्रह्मका ज्ञान हो जानेपर बहुत- से दिव्य गुण जीवात्मामें आ जाते हैं, यह बात भगवद्गीतामें भी कही गयी है (१४।२)। इसलिये उक्त प्रकरणमें जीवात्माका वर्णन आ जानेमात्रसे यह नहीं सिद्ध होता कि वहाँ 'दहर' शब्द जीवात्माका वाचक है। सम्बन्ध—इसी बातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार पुनः शंका उठाकर उसका समाधान करते हैं— अल्पश्रुतेरिति चेत्तदुक्तम् ॥ १। ३। २१ ॥ चेत्=यदि कहो; अल्पश्रुतेः = श्रुतिमें 'दहर' को बहुत छोटा बताया गया