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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

४३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

४३६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| स एतां पुनरभ्यतपत्तत्रयीं विद्याम्। तस्यास्तप्यमानाया रसं भूरिति व्याहृतिमृग्भ्यो जग्राह, भुवरिति व्याहृतिं यजुर्भ्यः, स्वरिति व्याहृतिं सामभ्यः। अतएव लोकदेववेदरसा महाव्याहृतयः अतस्तत्तत्र यज्ञे यद्युक्त ऋक्संबन्धादृङ्निमित्तं रिष्येद्यज्ञः क्षतं प्राप्नुयाद्भूःस्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयात्, सा तत्र प्रायश्चित्तिः। कथम् ? ऋचामेव, तदिति क्रियाविशेषणम्, रसेनर्चां वीर्येणौजसर्च्चां यज्ञस्य ऋक्संवन्धिनो यज्ञस्य विरिष्टं विच्छिन्नं क्षतरूपमुत्पन्नं संदधाति प्रतिसंधत्ते ॥ ३-४ ॥ | फिर उसने इस त्रयीविद्याको लक्ष्य करके तप किया । उस तप की जाती हुई विद्याके रस 'भूः' इस व्याहृतिको ऋक्श्रुतियोंसे ग्रहण किया । तथा 'भुवः' इस व्याहृतिको यजुःश्रुतियोंसे और 'स्वः' इस व्याहृतिको सामश्रुतियोंसे ग्रहण किया । इसीसे ये महाव्याहृतियाँ लोक, देव और वेदकी सारभूत हैं। इसलिये यदि उस यज्ञमें ऋक्से—ऋक् के सम्बन्धसे—ऋक् के कारण क्षत प्राप्त हो तो 'भूः स्वाहा' ऐसा कहकर गार्हपत्याग्निमें हवन करे। उस अवस्था में वही प्रायश्चित्त है। किस प्रकार ? ऋचाओंके ही रससे ऋचाओंके वीर्य-ओजद्वारा वह यज्ञके ऋक्-सम्बन्धी विरिष्ट—विच्छेद अर्थात् उत्पन्न हुए क्षतकी पूर्ति करता है। 'ऋचामेव तत्' इसमें 'तत्' यह क्रियाविशेषण है ॥ ३-४ ॥ |


अथ यदि यजुष्टो रिष्येद्भुवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ जुहुयाद्यजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषां यज्ञस्य विरिष्टꣳसंदधाति ॥ ५ ॥

खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३७


और यदि यजुःश्रुतियोंके कारण क्षत हो तो 'भुवः स्वाहा' ऐसा कहकर दक्षिणाग्निमें हवन करे। इस प्रकार वह यजुओंके रससे यजुओंके वीर्यद्वारा यज्ञके यजुःसम्बन्धी क्षतकी पूर्ति करता है ॥ ५ ॥

अथ यदि सामतो रिष्येत्स्वः स्वाहेत्याहवनीये जुहुयात्साम्नामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां यज्ञस्य विरिष्टंसंदधाति ॥ ६ ॥

और यदि सामश्रुतियोंके कारण क्षत हो तो 'स्वः स्वाहा' ऐसा कहकर आहवनीयाग्निमें हवन करे। इस प्रकार वह सामके रससे सामके वीर्य द्वारा यज्ञके सामसम्बन्धी क्षतकी पूर्ति करता है ॥ ६ ॥

भाष्यम्भाष्यार्थ
अथ यदि यजुष्टो यजुर्निमित्तं रिष्येद्भूवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ जुहुयात्। तथा सामनिमित्ते रेषे स्वः स्वाहेत्याहवनीये जुहुयात् । तथा पूर्ववद्यज्ञं संदधाति । ब्रह्मनिमित्ते तु रेषे त्रिष्वग्निषु तिसृभिर्व्याहृतिभिर्जुहुयात् । त्रय्या हि विद्यायाः स रेषः । "अथ केनऔर यदि यजुर्निमित्तक क्षत हो तो 'भुवः स्वाहा' ऐसा कहकर दक्षिणाग्निमें हवन करे, तथा सामसम्बन्धी क्षत होनेपर 'स्वः स्वाहा' ऐसा कहकर आहवनीयाग्निमें हवन करे। इस प्रकार वह पूर्ववत् ( ऋक्सम्बन्धी क्षतमें किये हुएके अनुसार ) यज्ञक्षतकी पूर्ति कर लेता है। [ ये सब प्रायश्चित्त होता, उद्गाता और अध्वर्युद्वारा होनेवाले क्षतोंकी पूर्तिके लिये हैं । ] ब्रह्माके कारण यज्ञक्षत होनेपर तो तीनों अग्नियोंमें तीनों व्याहृतियोंद्वारा हवन करे; क्योंकि [उसके द्वारा होनेवाला] वह यज्ञक्षत तो त्रयीविद्याका ही क्षत

४३८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

४३८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

| ब्रह्मत्वमित्यनयैव त्रय्या विद्य- | है। जैसा कि "ब्रह्मत्व किसके द्वारा | | या" इति श्रुतेः। न्यायान्तरं वा | सिद्ध होता है? इस त्रयीविद्यासे | | | ही" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। | | | अथवा ब्रह्मत्वके कारण होनेवाले | | | यज्ञक्षतके लिये कोई और न्याय | | मृग्यं ब्रह्मत्वनिमित्ते रेषे ॥५-६॥ | ढूँढना चाहिये ॥ ५-६ ॥ |

—:००:—

विद्वान् ब्रह्माकी विशिष्टता

तद्यथा लवणेन सुवर्णꣳसंदध्यात्सुवर्णेन रजतꣳ रजतेन त्रपु त्रपुणा सीसꣳसीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा ॥७॥ एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्टꣳसंदधाति भेषजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवति॥८॥

इस विषयमें [ऐसा समझना चाहिये कि] जिस प्रकार लवण (क्षार) से सुवर्णको, सुवर्णसे चाँदीको, चाँदीसे त्रपुको, त्रपुसे सीसेको, सीसेसे लोहेको, और लोहेसे काष्ठको अथवा चमड़ेसे काष्ठको जोड़ा जाता है। उसी प्रकार इन लोक, देवता और त्रयीविद्याके वीर्यसे यज्ञके क्षतका प्रतिसंधान किया जाता है। जिसमें इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ निश्चय ही मानो ओषधियोंद्वारा संस्कृत होता है ॥७-८॥

| तद्यथा लवणेन सुवर्णं संद- | उस सम्बन्धमें [ऐसा समझना | | ध्यात् क्षारेण टङ्कणादिना। | चाहिये कि] जिस प्रकार लवण- | | | टङ्कणादि क्षारसे सुवर्णको जोड़ा | | खरे मृदुत्वकरं हि तत्। सुवर्णेन | जाता है, क्योंकि वह कठिन | | | सुवर्णको मृदु करनेवाला है, सुवर्ण- | | रजतमशक्यसंधानं संदध्यात्। | से चाँदीको—जिसका जुड़ना | | | अत्यन्त कठिन है—जोड़ते हैं, | | रजतेन तथा त्रपु, त्रपुणा सीसं | इसी प्रकार चाँदीसे त्रपु (राँगा), |

खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थे ४३९


| सीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा चर्मबन्धनेन । एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण रसाख्येनौजसा यज्ञस्य विरिष्टं संदधाति । भेषजकृतो ह वा एष यज्ञः, रोगार्त इव पुमांश्चिकित्सकेन सुशिक्षितेनैष यज्ञो भवति । कोऽसौ ? यज्ञ यस्मिन्यज्ञ एवविद्यथोक्तव्याहृतिहोमप्रायश्चित्तविद्ब्रह्मात्विग्भवति स यज्ञ इत्यर्थः ॥ ७-८ ॥ | त्रपुसे सीसा, सीसेसे लोहा और लोहेसे काष्ठ अथवा चर्म—चमड़ेके बन्धनसे काष्ठको जोड़ा जाता है, उसी प्रकार इन लोक, देवता और त्रयीविद्याके वीर्य—रससंज्ञक ओजसे यज्ञक्षतकी पूर्ति करते हैं । सुशिक्षित चिकित्सकके द्वारा [नीरोग किये हुए] रोगार्त पुरुषके समान यह यज्ञ निश्चय ही मानो ओषधियोंद्वारा सुसंस्कृत होता है— कौन यज्ञ ? जहाँ अर्थात् जिस यज्ञमें इस प्रकार जाननेवाला यानी पूर्वोक्त व्याहृतिहोमरूप प्रायश्चित्त जाननेवाला ब्रह्मा ऋत्विक् होता है वह यज्ञ—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ७-८ ॥ |

—: o :—

| किं च— | तथा— |

एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवत्येवंविदग्ँह वा एषा ब्रह्माणमनुगाथा यतो यत आवर्तते तत्तद्गच्छति ॥ ९ ॥

जहाँ इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक्प्रवण होता है । इस प्रकार जाननेवाले ब्रह्माके उद्देश्यसे ही यह गाथा प्रसिद्ध है कि "जहाँ-जहाँ कर्म आवृत्त होता है वहीं वह पहुँच जाता है" ॥९॥

| एष ह वा उदक्प्रवण उदङ्निम्नो दक्षिणोच्छ्रायो यज्ञो | जहाँ इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक्प्रवण- उत्तरकी ओर झुका हुआ और |

४४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

४४०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| भवति, उत्तरमार्गप्रतिपत्तिहेतुरि-<br>त्यर्थः, यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवति । एवं-<br>विदं ह वै ब्रह्माणमृत्विजं प्रत्ये-<br>षानुगाथा ब्रह्मणः स्तुतिपरा—<br>यतो यत आवर्तते कर्म प्रदेषादृ-<br>त्विजां यज्ञः क्षतीभवंस्तत्तद्यज्ञस्य<br>क्षतरूपं प्रतिसंदधत्प्रायश्चित्तेन<br>गच्छति परिपालयतीत्येतत् ॥९॥ | दक्षिण ओर उठा हुआ—अर्थात्<br>उत्तरमार्गकी प्राप्तिका हेतु होता है।<br>इस प्रकार जाननेवाले ब्रह्मा<br>ऋत्विक्‌के विषयमें ही ब्रह्माकी<br>स्तुति करनेवाली यह अनुगाथा है-<br>जिस-जिस प्रदेशसे कर्म आवृत्त होता<br>है अर्थात् होता आदि ऋत्विजोंका<br>यज्ञ क्षतयुक्त होता है उस-उस<br>यज्ञके क्षतकी प्रायश्चित्तसे पूर्ति करता<br>हुआ ब्रह्मा जाता है अर्थात् यज्ञकर्त्ता-<br>की सब प्रकार रक्षा करता है ॥ ९ ॥ |


मानवो ब्रह्मैवैक ऋत्विक्कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानँसर्वाँश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविद्मेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥१०॥

एक मानव ब्रह्मा ही ऋत्विक्‌ है। जिस प्रकार युद्धमें घोड़ी योद्धाओंकी रक्षा करती है उसी प्रकार ऐसा जाननेवाला ब्रह्मा यज्ञ, यजमान और अन्य समस्त ऋत्विजोंकी भी सब ओरसे रक्षा करता है। अतः इस प्रकार जाननेवालेको ही ब्रह्मा बनावे, ऐसा न जाननेवालेको नहीं, ऐसा न जाननेवालेको नहीं ॥ १० ॥

| मान वो ब्रह्मा मौनाचरणान्म-<br>ननाद्वा ज्ञानवत्त्वात्ततो ब्रह्मैवैक-<br>र्त्विक्कु रून्र्कतॄ न् योद्धनारूढानश्वा | मौनाचरण करनेसे अथवा मनन<br>करनेके कारण ब्रह्मा मानव है;<br>अतः ज्ञानवान् होनेके कारण<br>ब्रह्मा ही एक ऋत्विक्‌ है। जिस<br>प्रकार युद्धमें घोड़ी ‘कुरून्’-- |

खण्ड १७] शाङ्करभाष्यार्थ ४५१


| वडवा यथाभिरक्षत्येवंविद् ह वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तत्कृतदोषायनयनात् । यत एवं विशिष्टो ब्रह्मा विद्वान्, तस्मादेवंविदम् एव यथोक्तव्याहृत्यादिविदं ब्रह्माणं कुर्वीत, नानेवंविदं कदाचनेति । द्विरभ्यासोऽध्यायपरिसमाप्त्यर्थः ॥ १० ॥ | कर्ताओंकी यानी अपनी पीठपर चढ़े हुए योद्धाओंकी सब प्रकारसे रक्षा करती है उसी प्रकार ऐसा जाननेवाला ब्रह्मा भी यज्ञ, यजमान और समस्त ऋत्विजोंकी, उनके किये हुए दोषोंकी निवृत्ति करके, सब ओरसे रक्षा करता है। क्योंकि विद्वान् ब्रह्मा ऐसा विशिष्टगुणसम्पन्न होता है इसलिये इस प्रकार—उपर्युक्त व्याहृति आदिका ज्ञान रखनेवालेको ही ब्रह्मा बनावे; इस प्रकार न जाननेवालेको कभी न बनावे। 'नानेवंविदं नानेवंविदम्' यह द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्तिके लिये है ॥ १० ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥


इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्विवरणे चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ॥ ४ ॥

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पञ्चम अध्याय

पञ्चम अध्याय

—: ० :—

प्रथम खण्ड


उपक्रमः
सगुणब्रह्मविद्याया उत्तरा गतिरुक्ता। अथेदानीं पञ्चमेऽध्याये पञ्चाग्निविदो गृहस्थस्योर्ध्वरेतसां च श्रद्धालूनां विद्यान्तरशीलिनां तामेव गतिमनूद्यान्या दक्षिणदिक्संबन्धिनी केवलकर्मिणां धूमादिलक्षणा पुनरावृत्तिरूपा, तृतीया च ततः कष्टतरा संसारगतिः, वैराग्यहेतोर्वक्तव्या इत्यारभ्यते। प्राणः श्रेष्ठो वागादिभ्यः प्राणो वाव संवर्ग इत्यादि च बहुशोऽतीते ग्रन्थे प्राणग्रहणं कृतम्, स कथं श्रेष्ठो वागादिषु सर्वैः संहत्यकारित्वाविशेषे, कथं[ गत अध्यायमें ] सगुण ब्रह्मविद्याकी उत्तर ( उत्तरायण मार्गरूपा ) गति कह दी गयी। अब इसके अनन्तर पञ्चम अध्यायमें पञ्चाग्निवेत्ता गृहस्थ तथा अन्य विद्याओंमें निष्ठा रखनेवाले श्रद्धालु ऊर्ध्वरेताओंकी उसी गतिका अनुवाद कर केवल कर्मपरायण पुरुषोंकी उससे भिन्न दक्षिण दिशासे सम्बन्ध रखनेवाली धूमादिलक्षणा पुनरावृत्तिरूपा गति और तीसरी उससे भी क्लिष्टतर संसारगतिका वैराग्यके लिये वर्णन करना है—इसीसे आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। वागादिकी अपेक्षा प्राण श्रेष्ठ है; क्योंकि गत ग्रन्थमें ‘प्राण ही संवर्ग है’ इत्यादि अनेकों प्रकारसे प्राणका ग्रहण किया गया है। ‘सबके साथ मिलकर कार्य करनेमें समानता होनेपर भी वह वागादि इन्द्रियोंमें श्रेष्ठ क्यों है ? और क्यों उसकी उपासना करनी चाहिये ?’—

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४३


च तस्योपासनमिति तस्य श्रेष्ठत्वादिगुणविधित्सयेदमनन्तरमारभ्यते—। इस शङ्काकी निवृत्तिके लिये उसके श्रेष्ठत्व आदि गुणोंका विधान करनेकी इच्छासे यह आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है—

ज्येष्ठश्रेष्ठादिगुणोपासना

यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥

जो ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है। निश्चय ही प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है ॥ १ ॥

यो ह वै कश्चिज्ज्येष्ठं च प्रथमं वयसा श्रेष्ठं च गुणैरभ्यधिकं वेद, स ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति । फलेन पुरुषं प्रलोभ्याभिमुखीकृत्याह — प्राणो वाव ज्येष्ठश्च वयसा वागादिभ्यः । गर्भस्थे हि पुरुषे प्राणस्य वृत्तिर्वागादिभ्यः पूर्वं लब्धात्मिका भवति, यया गर्भो विवर्धते । चक्षुरादिस्थानावयवनिष्पत्तौ सत्यां पश्चाद्वागादीनां वृत्तिलाभ इति प्राणो ज्येष्ठो वयसा भवति । श्रेष्ठत्वं तु प्रति-जो कोई ज्येष्ठ—आयुमें प्रथम और श्रेष्ठ—गुणोंमें अधिकको जानता है वह निश्चय ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है। इस प्रकार फलके द्वारा पुरुषको प्रलोभित कर उसे प्राणोपासनाके अभिमुख कर श्रुति कहती है—वागादिकी अपेक्षा प्राण ही आयुमें ज्येष्ठ है, क्योंकि पुरुषके गर्भस्थ होनेपर वागादिकी अपेक्षा प्राणकी वृत्ति पहले लब्ध-स्वरूप होती है, जिससे कि गर्भ बढ़ता है । वागादिकी वृत्तियोंका लाभ तो चक्षुरादि गोलक और अवयवोंके निष्पन्न हो जानेके अनन्तर होता है; इसलिये आयुकी दृष्टिसे प्राण ज्येष्ठ है । तथा उसकी

४४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

४४४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| पादयिष्यति सुहय इत्यादिभि- | श्रेष्ठताका तो 'सुहयः' इत्यादि | | दर्शनेन । अतः प्राण एव | दृष्टान्तद्वारा [ बारहवें मन्त्रमें ] | | ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्चास्मिन्कार्यकरण- | प्रतिपादन किया जायगा । अतः | | संघाते ॥ १ ॥ | इस कार्यकारणसंघातमें प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है ॥ १ ॥ |

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यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग्वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥

जो कोई वसिष्ठको जानता है वह स्वजातियोंमें वसिष्ठ होता है; निश्चय ही वाक् वसिष्ठ है ॥ २ ॥

| यो ह वै वसिष्ठं वसितृ तम- | जो कोई वसिष्ठ—अत्यन्त | | माच्छादयितृतमं वसुत्तमं वा | बसनेवाले अर्थात् आच्छादन करने- | | यो वेद स तथैव वसिष्ठो ह | वालेको अथवा अत्यन्त वसुमान् | | भवति स्वानां ज्ञातीनाम् । | (धनवान्) को जानता है वह | | कस्तर्हि वसिष्ठः ? इत्याह— | उसी प्रकार अपने सजातियोंमें | | वाग्वाव वसिष्ठः, वाग्मिनो हि | वसिष्ठ होता है। अच्छा तो वसिष्ठ | | पुरुषा वसन्त्यभिभवन्त्यन्यान्य- | कौन है ? इसपर श्रुति कहती है— | | सुमत्त्तमाश्च, अतो वाग्वसिष्ठः | निश्चय ही वाक् वसिष्ठ है; क्योंकि | | ॥ २ ॥ | वाग्मी (श्रेष्ठ वक्ता) लोग ही बसते | | | अर्थात् दूसरोंका पराभव करते हैं; | | | और अधिक धनवान् भी होते हैं; | | | अतः वाक् ही वसिष्ठ है ॥ २ ॥ |

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यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिँश्च लोकेऽमुष्मिँश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥

जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है वह इस लोक और परलोकमें प्रतिष्ठित होता है; चक्षु ही प्रतिष्ठा है ॥ ३ ॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४५


| यो ह वै प्रतिष्ठां वेद स अस्मिँल्लोकेऽमुष्मिंश्च परे प्रतितिष्ठति ह । का तर्हि प्रतिष्ठा ? इत्याह—चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा । चक्षुषा हि पश्यन्समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति यस्मात्, अतः प्रतिष्ठा चक्षुः ॥ ३ ॥ | जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है वह इस लोक और परलोकमें प्रतिष्ठित होता है । अच्छा तो प्रतिष्ठा क्या है ? इसपर श्रुति कहती है—चक्षु ही प्रतिष्ठा है, क्योंकि चक्षुसे देखकर ही पुरुष सम और विषम प्रदेशमें स्थित होता है; इसलिये चक्षु ही प्रतिष्ठा है ॥३॥ |

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यो ह वै संपदं वेद सँहास्मै कामाः पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव संपत् ॥ ४ ॥

जो कोई सम्पद्को जानता है उसे दैव और मानुष काम ( भोग ) सम्यक् प्रकारसे प्राप्त होते हैं । श्रोत ही सम्पद् है ॥ ४ ॥

| यो ह वै संपदं वेद तस्मा अस्मै दैवाश्च मानुषाश्च कामाः संपद्यन्ते ह । का तर्हि संपद् ? इत्याह—श्रोत्रं वाव संपत् । यस्माच्छ्रोत्रेण वेदा गृह्यन्ते तदर्थविज्ञानं च, ततः कर्माणि क्रियन्ते, ततः कामसंपत् । इत्येवं कामसंपद्धेतुत्वाच्छ्रोत्रं वा संपत् ॥ ४ ॥ | जो कोई सम्पद्को जानता है उसे दैव और मानुष भोग सम्यक् प्रकारसे प्राप्त होते हैं । अच्छा तो सम्पद् क्या है ? इसपर श्रुति कहती है—श्रोत्र ही सम्पद् है, क्योंकि श्रोत्रसे वेद और उनके अथका विशेष ज्ञान ग्रहण किये जाते हैं, फिर कर्म किये जाते हैं और तदनन्तर भोगोंकी प्राप्ति होती है । इस प्रकार भोगोंकी प्राप्तिके हेतु होनेके कारण श्रोत्र ही सम्पद् हैं ॥ ४ ॥ |

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यो ह वा आयतनं वेदायतनँह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥

४४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

४४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

जो आयतनको जानता है वह स्वजातियोंका आयतन (आश्रय) होता है। निश्चय ही मन आयतन है ॥ ५ ॥

| यो ह वा आयतनं वेदायतनं ह स्वानां भवत्याश्रयो भवतीत्यर्थः। किं तदायतनम्? इत्याह मनो ह वा आयतनम्। इन्द्रियोपहृतानां विषयाणां भोक्त्रर्थानां प्रत्ययरूपाणां मन आयतनमाश्रयः; अतो मनो ह वा आयतनमित्युक्तम् ॥ ५ ॥ | जो आयतनको जानता है वह स्वजनोंका आयतन होता है अर्थात् उनका आश्रय बन जाता है। वह आयतन क्या है? इसपर श्रुति कहती है—मन ही आयतन है। इन्द्रियोंद्वारा लाये हुए एवं भोक्ताके प्रत्ययरूप विषयोंका मन ही आयतन यानी आश्रय है; इसलिये मन ही आयतन है—ऐसा कहा गया है ॥५॥ |


इन्द्रियोंका विवाद

अथ ह प्राणा अहꣳश्रेयसि व्यूदिरेऽहꣳ श्रेयानस्म्यहꣳ श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥

एक बार प्राण (इन्द्रियाँ) 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रकार अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करने लगे ॥ ६ ॥

| अथ ह प्राणा एवं यथोक्तगुणाः सन्तः अहंश्रेयसि 'अहं श्रेयानस्मि अहं श्रेयानस्मि' इत्येतस्मिन्प्रयोजने व्यूदिरे नाना विरुद्धं चोदिर उक्तवन्तः ॥६॥ | एक बार इस प्रकार पूर्वोक्त गुणोंसे युक्त प्राण अपनी श्रेष्ठताके लिये 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रयोजनसे विवाद करने लगे; अर्थात् बहुत-सी विरुद्ध बातें कहने लगे ॥ ६ ॥ |

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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४७


प्रजापतिका निर्णय

ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन्को नः श्रेष्ठ इति तान्होवाच यस्मिन्व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥

उन प्राणोंने अपने पिता प्रजापतिके पास जाकर कहा—'भगवन् ! हममें कौन श्रेष्ठ है ?' प्रजापतिने उनसे कहा—'तुममेंसे जिसके निकल जानेपर शरीर अत्यन्त पापिष्ठ-सा दिखायी देने लगे वही तुममें श्रेष्ठ है' ॥ ७ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
ते ह ते हैवं विवदमाना आत्मनः श्रेष्ठत्वविज्ञानाय प्रजापतिं पितरं जनयितारं कञ्चिदेत्योचुरक्तवन्तः—हे भगवन्को नोऽस्माकं मध्ये श्रेष्ठोऽभ्यधिको गुणैः ? इत्येवं पृष्टवन्तः ।<br><br>तान्पितोवाच ह—यस्मिन्वो युष्माकं मध्य उत्क्रान्ते शरीरमिदं पापिष्ठमिवातिशयेन जीवतोऽपि समुत्क्रान्तप्राणं ततोऽपि पापिष्ठतरमिवातिशयेन दृश्येत कुणपमस्पृश्यमशुचि दृश्येत, स वो युष्माकं श्रेष्ठः, इत्यवोचत्काक्वा तद्दुःखं परिजिहीर्षुः ॥ ७ ॥इस प्रकार विवाद करते हुए वे अपनी श्रेष्ठताको विशेषरूपसे जाननेके लिये प्रजापति—अपने पिता यानी किसी उत्पत्तिकर्ताके पास जाकर बोले—'हे भगवन् ! हम सबमें कौन श्रेष्ठ है ?' अर्थात् गुणोंकेकारण कौन सबसे बढ़ा-चढ़ा है—ऐसा पूछा ।<br><br>उनसे पिताने कहा—'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर यह शरीर अतिशय पापिष्ठ-सा अर्थात् जीवित रहते हुए भी प्राणहीन तथा उससे भी अत्यन्त निकृष्ट-सा दिखायी दे और शवके समान अस्पृश्य एवं अपवित्र जान पड़े वही तुममें श्रेष्ठ है ।' इस प्रकार उनके दुःखकी निवृत्ति चाहते हुए प्रजापतिने काकुसे [अर्थात् स्वरभङ्ग-रूप उपायविशेषसे] उत्तर दिया ॥७॥

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४४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

४४८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

वागिन्द्रियकी परीक्षा

तथोक्तेषु पित्रा प्राणेषु—प्राणोंके प्रति पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर—

सा ह वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति ? यथा कला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥

उस वाक् इन्द्रियने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा 'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके?' [उन्होंने कहा--] 'जिस प्रकार गूँगे लोग बिना बोले प्राणसे प्राणन-क्रिया करते, नेत्रसे देखते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं उसी प्रकार [हम भी जीवित रहे]।' ऐसा सुनकर वाक् इन्द्रियने शरीरमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥

सा ह वागुच्चक्रामोत्क्रान्तवती । सा चोत्क्रम्य संवत्सरमात्रं प्रोष्य स्वव्यापारान्निवृत्ता सती पुनः पर्येत्येतरान्प्राणानुवाच—कथं केन प्रकारेणाशकत शक्तवन्तो यूयं मद्ऋते मां विना जीवितुं धारयितुमात्मानमिति, ते होचुर्यथा कला इत्यादि । कला मूका यथा लोकेऽवदन्तो वाचा जीवन्ति । कथम् ?उस वाक् इन्द्रियने उत्क्रमण किया। तथा उसने उत्क्रमण कर केवल एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर--अपने व्यापारसे निवृत्त रहकर फिर लौटकर अन्य प्राणोंसे कहा--'तुमलोग मेरे बिना कैसे किस प्रकारसे जीवित रह सके?' तब उन्होंने 'जिस प्रकार गूँगे' इत्यादि उत्तर दिया । जिस प्रकार 'कला:'-गूँगेलोग संसारमें वाणीसे बिना बोले भी जीवित रहते हैं—किस प्रकार ?—प्राणसे प्राणन

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४९


| प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवं सर्वकरणचेष्टां कुर्वन्त इत्यर्थः, एवं वयमजीविष्वेत्यर्थः । आत्मनोऽश्रेष्ठतां प्राणेषु बुद्ध्वा प्रविवेश ह वाक्पुनः स्वव्यापारे प्रवृत्ता बभूवेत्यर्थः ॥ ८ ॥ | करते हुए, नेत्रसे देखते हुए, कानसे सुनते हुए और मनसे चिन्तन करते हुए, तात्पर्य यह है कि इस प्रकार समस्त इन्द्रियोंकी चेष्टाएँ करते हुए जीवित रहते हैं उसी प्रकार हम भी जीवित रहे। तब प्राणोंमें अपनी अश्रेष्ठता समझकर वाक् इन्द्रियने प्रवेश किया; अर्थात् वह पुनः अपने व्यापारमें प्रवृत्त हो गयी ॥ ८ ॥ |


चक्षुकी परीक्षा

चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति ? यथान्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥

[ फिर ] चक्षुने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा— ] 'जिस प्रकार अन्धे लोग बिना देखे प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं उसी प्रकार [ हम भी जीवित रहे ] । ऐसा सुनकर चक्षुने प्रवेश किया ॥ ९ ॥

श्रोत्रकी परीक्षा

श्रोत्र꣫ होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति ? यथा बधिरा अशृण्वन्त

४५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

४५०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥

[ तदनन्तर ] श्रोत्रने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा— ] जिस प्रकार बहरे मनुष्य बिना सुने प्राणसे प्राण करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार [ हम भी जीवित रहे ] ।' यह सुनकर श्रोत्रने शरीरमें प्रवेश किया ॥ १० ॥

मनकी परीक्षा

मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति ? यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥

[ तत्पश्चात् ] मनने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास कर फिर लौटकर कहा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा— ] 'जिस प्रकार बच्चे, जिनका कि मन विकसित नहीं होता, प्राणसे प्राणनक्रिया करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और कानसे सुनते हुए जीवित रहते हैं उसी प्रकार [ हम भी जीवित रहे ] ।' यह सुनकर मनने भी प्रवेश किया ॥ ११ ॥

समानमन्यत्, चक्षुर्होच्चक्राम श्रोत्रं होच्चक्राम मनो होच्चक्रामेत्यादि । यथाचक्षुने उत्क्रमण किया, श्रोत्रने उत्क्रमण किया एवं मनने उत्क्रमण किया इत्यादि शेष समस्त श्रुतियोंका तात्पर्य समान है । जिस प्रकार बालक 'अमना'—अप्ररूढमना
खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४५१

| बाला अमनसोऽप्ररूढमनस इत्यर्थः ॥ ९-११ ॥ | अर्थात् जिनका मन विकसित नहीं हुआ है ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ९-११ ॥ |

प्राणकी परीक्षा और विजय

| एवं परीक्षितेषु वागादिषु— | इस प्रकार वागादिकी परीक्षा हो चुकनेपर— |

अथ ह प्राण उच्चिक्रमिषन्स यथा सुहयः पड्वीशशङ्कून्संखिदेदेवमितरान्प्राणान्समखिदत्तंहाभिसमेत्योचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२॥

फिर प्राणने उत्क्रमण करनेकी इच्छा की। उसने, जिस प्रकार अच्छा घोड़ा अपने पैर बाँधनेकी कीलोंको उखाड़ डालता है उसी प्रकार अन्य प्राणोंको भी उखाड़ दिया। तब उन सबने उसके सामने जाकर कहा 'भगवन् ! आप [हमारे स्वामी] रहें, आप ही हम सबमें श्रेष्ठ हैं, आप उत्क्रमण न करें' ॥ १२ ॥

| अथानन्तरं ह स मुख्यः प्राण उच्चिक्रमिषन्नुत्क्रमितुमिच्छन्किमकरोत् ? इत्युच्यते—यथा लोके सुहयः शोभनोऽश्वः पड्वीशशङ्कन्पादबन्धनकीलान् परीक्षणायारूढेन कशया हतः सन्संखिदेत्समुत्खनेत्समुत्पाटयेत, एवमितरान्वागादीन्प्राणान्समखिदत्समुद्धृतवान् ।<br><br>ते प्राणाः संचालिताः सन्तः स्वस्थाने स्थातुमनुत्सहमाना | अथ—इसके पश्चात् उस मुख्य प्राणने उत्क्रमण करनेकी इच्छा करते हुए क्या किया ? सो बतलाया जाता है—लोकमें जिस प्रकार अच्छा घोड़ा अपनी परीक्षाके लिये चढ़े हुए मनुष्यद्वारा चाबुकसे मारे जानेपर पैर बाँधनेकी कीलोंको उखाड़ डालता है उसी प्रकार उसने वाक् आदि अन्य प्राणोंको उखाड़ दिया अर्थात् [शरीरसे] बाहर निकाल लिया।<br><br>[इसी प्रकार] विचलित कर दिये जानेपर वे प्राण अपने गोलकोंमें स्थित रहनेमें असमर्थ होनेके कारण |


छा० उ० १५—

४५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

४५२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| अभिसमेत्य मुख्यं प्राणं तमूचुः--हे भगवन्नेधि भव नः स्वामी, तस्मात्त्वं नोऽस्माकं श्रेष्ठोऽसि; मा चास्माद्देहादुत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥ | मुख्यप्राणके सम्मुख जा उससे बोले--'हे भगवन् ! एधि'--'आप हमारे स्वामी हों, क्योंकि हम सबमें आप श्रेष्ठ हैं । तथा इस शरीरसे आप उत्क्रमण न करें' ॥ १२ ॥ |


इन्द्रियोंद्वारा प्राणकी स्तुति

अथ हैनँ वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैनँ चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति ॥१३॥ अथ हैनꣳ श्रोत्रमुवाच यदहꣳसंपदस्मि त्वं तत्संपदसीत्यथ हैनँ मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४ ॥

फिर उससे वाक् इन्द्रियने कहा--'मैं जो वसिष्ठ हूँ सो तुम्हीं वसिष्ठ हो ।' तदनन्तर उससे चक्षुने कहा—'मैं जो प्रतिष्ठा हूँ सो तुम्हीं प्रतिष्ठा हो' ॥१३॥ फिर उससे श्रोत्रने कहा—'मैं जो सम्पद् हूँ सो तुम्हीं सम्पद् हो ।' तत्पश्चात् उससे मन बोला—'मैं जो आयतन हूँ सो तुम्हीं आयतन हो' ॥ १४ ॥

अथ हैनँ वागादयः प्राणस्य श्रेष्ठत्वं कार्येणापादयन्त आहुर्बलिमिव हरन्तो राज्ञे विशः । कथम् ? वाक् तावदुवाच-यदहं वसिष्ठोऽस्मि, यदिति क्रियाविशेषणम्, यद्वसिष्ठत्वगुणास्मीत्य-तदनन्तर वैश्यलोग जिस प्रकार राजाको भेंट समर्पण करते हैं उसी प्रकार वागादि इन्द्रियोंने अपने कार्यसे प्राणकी श्रेष्ठता सम्पादन करते हुए कहा । किस प्रकार कहा ?--पहले वाणी बोली--मैं जो वसिष्ठ हूँ, यहाँ मूलमें 'यत' शब्द क्रिया-विशेषण है, अर्थात् 'मैं जो वसिष्ठत्व

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५३


र्थः; त्वं तद्वसिष्ठस्तेन वसिष्ठत्वगुणेन त्वं तद्वसिष्ठोऽसि तद्गुणस्त्वमित्यर्थः । अथवा तच्छब्दोऽपि क्रियाविशेषणमेव । त्वत्कृतस्त्वदीयोऽसौ वसिष्ठत्वगुणोऽज्ञानान्ममेति मयाभिमत इत्येतत् । तथोत्तरेषु योज्यं चक्षुःश्रोत्रमनःसु ॥१३-१४॥गुणवाली हूँ सो तुम वसिष्ठ हो—उस वसिष्ठत्व गुणसे तद्वसिष्ठ हो अर्थात् तुम्हीं उस गुणवाले हो।' अथवा 'सत्' शब्द भी क्रियाविशेषण ही है। तब इसका यह तात्पर्य होगा कि 'तुम्हारा किया हुआ अर्थात् तुम्हारा जो यह वसिष्ठत्व गुण है वह अज्ञानसे 'मेरा है' ऐसा मैंने समझ लिया है।' इसी प्रकार आगेके चक्षु, श्रोत्र और मनके विषयमें योजना कर लेनी चाहिये ॥ १३-१४ ॥

श्रुतेरिदं वचो युक्तमिदं वागादिभिर्मुख्यं प्राणं प्रत्यभिहितं यस्मात्—वाक् आदि इन्द्रियोंद्वारा मुख्य प्राणके प्रति कहा हुआ जो यह श्रुतिका वाक्य है सो ठीक ही है, क्योंकि—

न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥

[ लोकमें समस्त इन्द्रियोंको ] न वाक्, न चक्षु, न श्रोत्र और न मन ही कहते हैं; परंतु 'प्राण' ऐसा कहते हैं, क्योंकि ये सब प्राण ही हैं ॥ १५ ॥

न वै लोके वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीति वागादीनि करणान्याचक्षते लौकिकालोकमें इन वाक् आदि [समस्त] इन्द्रियोंको लौकिक अथवा शास्त्रज्ञ पुरुष न तो वाक् कहते हैं और न

| ४५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |

४५४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| आगमज्ञा वा; किं तर्हि ? प्राणा इत्येवाचक्षते कथयन्ति । यस्मात् प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि वागादीनि करणजातानि भवत्यतो मुख्यं प्राणं प्रत्यनुरूपमेव वागादिभिरुक्तमिति प्रकरणार्थमुपसंहिहीर्षति ।<br><br>ननु कथमिदं युक्तं चेतनावन्त इव पुरुषा अहंश्रेष्ठतायै विवदन्तोऽन्योन्यं स्पर्धेरन् ? इति । न हि चक्षुरादीनां वाचं प्रत्याख्याय प्रत्येकं वदनं संभवति; तथापगमो देहात्पुनः प्रवेशो ब्रह्मगमनं प्राणस्तुतिर्वोपपद्यते ।<br><br>तत्राग्न्यादिचेतनावद्देवताधिष्ठितत्वाद्वागादीनां चेतनावत्त्वं तावत्सिद्धमागमतः । तार्किकसमयविरोध इति चेद्देह एकस्मिन्ननेकचेतनावत्त्वे, न, ईश्वरस्य | चक्षु, न श्रोत्र और न मन ही कहते हैं ! तो फिर क्या कहते हैं ? बस 'प्राण' ऐसा ही कहते हैं । क्योंकि प्राण ही यह समस्त वागादि इन्द्रियसमुदाय हो जाता है, अतः मुख्य प्राणके प्रति वागादि इन्द्रियोंद्वारा ठीक ही कहा गया है—इस प्रकार श्रुति इस प्रकरणके अर्थका उपसंहार करना चाहती है ।<br><br>शङ्का—किंतु यह किस प्रकार सम्भव है कि वागादि प्राणोंने चेतनायुक्त पुरुषोंके समान अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करते हुए एकदूसरेसे स्पर्धा की ? क्योंकि वाक्-के सिवा अन्य चक्षु आदि इन्द्रियोंमेंसे किसीका भी बोलना सम्भव नहीं है और न उनका देहसे चला जाना, उसमें पुनः प्रवेश करना, ब्रह्माके पास जाना अथवा प्राणकी स्तुति करना ही सम्भव है ।<br><br>समाधान—उसमें हमारा यह कथन है कि अग्नि आदि चेतन देवताओंसे अधिष्ठित होनेके कारण वागादि इन्द्रियोंकी चेतनता तो शास्त्रसे ही सिद्ध है । यदि कहो कि इस प्रकार एक ही देहमें अनेक चेतनावालोंके रहनेसे तार्किकोंके मतसे विरोध होगा—तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि |

खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४५५

| निमित्तकारणत्वाभ्युपगमात् । ये तावदीश्वरमभ्युपगच्छन्ति तार्किकास्ते मनआदिकार्यकरणानामाध्यात्मिकानां बाह्यानां च पृथिव्यादीनामीश्वराधिष्ठितानामेव नियमेन प्रवृत्तिमिच्छन्ति रथादिवत् । न चास्माभिरग्न्याद्याश्चेतनावत्योऽपि देवता अध्यात्मं भोक्तृत्वेऽभ्युपगम्यन्ते; किं तर्हि ? कार्यकरणवतीनां हि तासां प्राणैकदेवताभेदानामध्यात्माधिभूताधिदैवभेदकोटिविकल्पानामध्यक्षतामात्रेण नियन्तेश्वरोऽभ्युपगम्यते, स ह्यकरणः । "अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः” ( श्वे० उ० ३ । १९ ) इत्यादिमन्त्रवर्णात् । "हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानम्” (श्वे० उ० ४।१२)। "हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वम्” (श्वे० उ० ३ । ४ ) इत्यादि च श्वेताश्वतरीयाः पठन्ति । | उन्होंने ईश्वरकी निमित्तकारणता स्वीकार की है । तार्किकलोग जो ईश्वरको स्वीकार करते हैं तो वे रथ आदिके समान ईश्वरसे अधिष्ठित हुए ही मन आदि आध्यात्मिक भूत एवं इन्द्रियोंकी तथा पृथिवी आदि बाह्य पदार्थोंकी नियत प्रवृत्ति मानते हैं । तथा हमलोग तो अग्नि आदि चेतन देवताओंको भी अध्यात्म ( शरीरान्तर्वर्ती ) भोक्ता नहीं मानते । तो क्या मानते हैं ?—हम तो अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवभेदसे करोड़ों विकल्पोंवाली एकमात्र प्राणदेवताकी भेदस्वरूप उन देहेन्द्रियवती देवताओंका ईश्वरको अध्यक्षतामात्रसे नियन्ता मानते हैं, क्योंकि वह ( ईश्वर ) अकरण ( इन्द्रियादिरहित ) है । जैसा कि “वह बिना हाथ-पाँवके ही वेगवान् और ग्रहण करनेवाला है तथा बिना नेत्रवाला होकर भी देखता है और कर्णहीन होनेपर भी सुनता है” इस मन्त्रवर्णसे प्रमाणित होता है । इसके सिवा श्वेताश्वतर शाखावालोंका यह भी पाठ है कि—“उत्पन्न होते हुए हिरण्यगर्भको देखो” तथा “पहले हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया” इत्यादि । |