चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७७
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७७
( मन्दाग्नि ) हो तो लाख का सुरा के साथ पीवे । यदि रोगी को अतीसार
हो तो लाख को मांथा, अतीस, पाठा और इन्द्रजौ के काथ ( काढे )
के साथ पीवे ॥ १६ ॥
लाक्षा सर्पिर्मधूच्छिष्ट जीवनीयगण सिताम् ।
त्वक्क्षीरीसंमितं क्षीरे पक्त्वा दीप्तानलः पिबेत् ॥ १७ ॥
( ३ ) दीप्ताग्नि रोगी लाख, घी, मोम, जीवनीय गण की औषधिया, मिश्री
त्वक्क्षीरी ( वंशलोचन ) और समिता ( गोधूम, गेहूँ का चूर्ण ) को दूध से
पका कर पीये ॥ १७ ॥
इक्ष्वालिकविसग्रन्थिपद्मकेशरचन्दनैः ।
श्रुतं पयो मधुयुतं सन्धानार्थं पिबेत्क्षती ॥ १८ ॥
( ४ ) उरःक्षत रोगी सन्धान के लिये इक्षुवालिका, बिस (मृणाल की जड)
ग्रन्थि ( पिप्पली मूल ), पद्मकेसर ओर चन्दन इनसे पकाये दूध मे मधु मिला
कर पिये ॥ १८ ॥
यवानां चूर्णमादाय क्षीरसिद्धं घृतप्लुतम् ।
ज्वरे दाहे सिताक्षौद्रसक्तून् वा पयसा पिबेत् ॥ १६ ॥
( ५ ) उरःक्षत मे ज्वर और दाह होने पर आम (अग्नि पर न भुने,
कच्चे ) जौ के चूर्ण को चौगुने दूध मे पका कर घी मे मिला कर शर्करा
( शक्कर ) और मधु के साथ खावे । अथवा शक्कर और मधु से मिले जौ के
सत्तूओ को दूध मे मिला कर खावे ॥ १६ ॥
कासी पर्वास्थिशूली च लिह्यात्सघृतमाक्षिकाः ।
मधूकमधुकद्राक्षात्वक्क्षीरीपिप्पलीबलाः ॥ २० ॥
( ६ ) कास, पार्श्वशूल, पोरुओ मे पीडा और अस्थिशूल होने पर महुए के
फूल, मुलहठी, द्राक्षा, वसलोचन, पिप्पली और बला इनके चूर्ण को घी और
शहद मे मिला कर चाटे ॥ २० ॥
एलापत्रत्वचोऽर्धांशाः पिपल्यर्धपलं तथा ।
सितामधुकखर्जूरमृद्वीकाश्च पलोन्मिताः ॥ २१ ॥
संचूर्ण्य मधुना युक्ता गुलिकाः संप्रकल्पयेत् ।
अक्षमात्रा ततश्चैका भक्षयेन्ना दिने दिने ॥ २२ ॥
कासं श्वास ज्वर हिक्का छर्दिमूर्च्छा मदं भ्रमम् ।
रक्तनिष्ठीवनं तृष्णां पार्श्वशूलमरोचकम् ॥ २३ ॥
शोषप्लीहाढ्यवातांश्च स्वरभेदं क्षतं क्षयम् ।
४७८ चरकसंहिता [ अ० ११
गुलिका तर्पणी वृष्या रक्तपित्तं च नाशयेत् ॥ २४ ॥
इत्येलादिगुटिका ।
(७) एलादि गुटिका—छोटी इलायची, पत्र (तेजपात), त्वच (दाल-
चीनी) ये प्रत्येक आधा कर्ष, पिप्पली आधा पल, शर्करा, मुलहठी, खजूर,
द्राक्षा (दाख) प्रत्येक एक-एक पल इन सब का चूर्ण करके मधु के साथ
गोलिया बनावे । रोगी को चाहिये कि प्रतिदिन एक कर्ष परिमित गुटिका खाये।
ये गुटिकाये तर्पणी (वृष्य) है। कास, श्वास, ज्वर, हिचकी, वमन, मूर्च्छा, मद
श्रम, रक्तवमन, प्यास, पार्श्वशूल, अरोचक, शोष, प्लीहा, आढ्यवात, स्वरभेद,
क्षत, क्षय और रक्तपित्त को नष्ट करती है ॥ २१-२४ ॥
रक्तेऽतिवृत्ते दक्षाण्डं यूषेस्तोयेन वा पिबेत् ।
चटकाण्डरसं वाऽपि रक्तं वा छागजाङ्गलम् ॥ २५ ॥
(८) रक्त के अधिक आने पर कुक्कुट के अण्डों को मूग आदि के यूष
(रस) के साथ अथवा जल के साथ पीवे । अथवा चटक (चिडिया) के
अण्डे के रस को यूष के साथ पीवे, बकरी या हरिण आदि जंगली पशुओ के
रक्त को पीवे ॥ २५ ॥
चूर्णं पौनर्नवं रक्तशालितण्डुलशर्करम् ।
रक्तष्ठीवी पिबेत्सिद्धं द्राक्षारसपयोघृतैः ॥ २६ ॥
मधूकमधुकक्षीरसिद्धं वा तण्डुलीयकम् ।
(६) रक्त मिश्रित थूक आने पर—शर्करा, पुनर्नवा और लाल चावलो
का चूर्ण मिला कर खावे । द्राक्षा रस, दूध, घी इनके साथ सिद्ध करके पीवे ।
अथवा महुवे का फूल, गुलहठी, इनका क्वाथ, क्वाथ के समान दूध, इनमे तण्डु-
लीयक (चौलाई) सिद्ध करके पीवे ॥ २६ ॥
मूढवातस्त्वजामेदः सुराभृष्टं ससैन्धवम् ॥ २७ ॥
क्षामः क्षीणः क्षतोरस्कस्त्वनिद्रः सबलेऽनले ।
श्रुतक्षीरसरेणाद्यात्सक्षाौद्रघृतशर्करम् ॥ २८ ॥
(१०) उर क्षत रोगी मे यदि वायु अनुलोम-मार्ग से प्रवृत्त न हो
तो सुरा मे भुनी अजा की वसा (चर्बी) को सैन्धे नमक के साथ सेवन करे ।
यदि उरःक्षत-रोगी क्षाम (क्लान्त) और क्षीण शरीर हो, अग्नि प्रबल हो और
नींद न आती हो तो अजा-मेद (बकरे की चर्बी) को पके हुए दूध के सर
भाग (मलाई) के साथ मिला कर घी, मधु, शर्करा के साथ खावे ॥२७-२८॥
शर्करा च यवक्षौद्रजीवकर्षभकौ मधु ।
अ० ११] चिकित्सितस्थानम् ४७६
शृतक्षीरानुपानं वा लिह्यात्क्षीणः क्षतः कृशः ॥ २९ ॥
क्रव्यादामासनिर्यूहं घृतभृष्टं पिवेच्च सः ।
पिप्पलीक्षौद्रसंयुक्तं मासशोणितवर्धनम् ॥ ३० ॥
(११) कृश और क्षीण उरःक्षत-रोगी जो, गेहूँ, जीवक, ऋषभक इनके
चूर्ण को शर्करा के समान भाग लेकर मधु के साथ चाटे। ऊपर से गरम दूध
पीवे, मांस और रक्त बढ़ाने वाले मांसभक्षी पशु-पक्षियो के मांस के रस को
म भून कर पिप्पली-चूर्ण और मधु के साथ मिला कर खावे ॥२९-३०॥
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्षशालप्रियङ्गुभिः ।
तालमस्तकजम्बूत्वक्प्रियालैश्च सपद्मकैः ॥ ३१ ॥
साश्वकर्णैः शृतात्क्षीराद्दध्नाज्जातेन सर्पिषा ।
शाल्योदनं क्षतोरस्कः क्षीणशुक्रश्च मानवः ॥ ३२ ॥
(१२) उरःक्षत और क्षीणशुक्र पुरुष वट, गूलर, पीपल, पिलखन, साल
प्रियङ्गु, ताड का मस्तक, जामुन की छाल, पियाल, पद्माख, अश्वकर्ण (पीतशाल)
इनका समान भाग लेकर उनके कल्क के साथ पके दूध मे से निकले घी के
साथ चावल खाये ॥३१-३२॥
यष्ट्याह्वानागबलयोः क्वाथे क्षीरसमं घृतम् ।
पयस्यापिप्पलीवाशीकल्कसिद्धं क्षते शुभम् ॥ ३३ ॥
(१३) मुलहठी और नागबला का क्वाथ (एक तृतीयांश रहने पर),
दूध, घी के समान, कल्क Callback, पयस्या (क्षीरकाकोली), पिप्पली, वंशलोचन
इनके कल्क से दूध के समान घृत (एक भाग) सिद्ध करे। यह घृत उरःक्षत
में उपयोगी है ॥ ३३ ॥
कोललाक्षारसे तद्वत्क्षीराष्टगुणसाधितम् ।
कल्कैः कट्वङ्गदार्बीत्वग्वत्सकत्वक्फलैर्घृतम् ॥ ३४ ॥
(१४) कोल (सूखे बेर) और लाक्षा रस (अथवा क्वाथ) और घी से
आठ गुणे दूध मे, कट्वङ्ग (श्यानाक), दारुहल्दी की छाल, कूडे की छाल, इन्द्रजौ
इनके कल्क से घृत सिद्ध करे। यह घृत उरःक्षत मे हितकारी है १॥ ३४ ॥
जीवकर्षभकौ वीरां जीवन्तीं नागरं शटीम् ।
चतस्रः पर्णिनीर्मेदे काकोल्यौ द्वे निदिग्धिके ॥ ३५ ॥
पुनर्नवे द्वे मधुकमात्मगुप्ता शतावरीम् ।
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१ अष्टांगसंग्रह मे अष्टगुण दूध का ही विधान है। यथा—
घृतं वाष्टगुणे क्षीरे कोललाक्षारसान्वितम् ॥
४८० चरकसंहिता [ अ० ११
ऋद्धिं परूषकं भार्गी मृद्वीकां बृहतीं तथा ॥ ३६ ॥
शृङ्गाटकं तामलकीं पयस्यां पिप्पलीं बलाम् ।
बदराक्षोटखर्जूरवातामाभिषुकाण्यपि ॥ ३७ ॥
फलानि चैवमादीनि कल्कान् कुर्वीत कार्षिकान् ।
धात्रीरसविदारीक्षुच्छागमांसरसं पयः ॥ ३८ ॥
एषां प्रस्थोन्मितान् भागान् घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
प्रस्थार्धं मधुनः शीते शर्कराऽर्धतुला तथा ॥ ३९ ॥
द्विकार्षिकाणि पत्रैलाहेमत्वङ्मरिचानि च ।
चूर्णितानि विनीयास्माल्लिह्यान्मात्रां सदा नरः ॥ ४० ॥
अमृतप्राशमित्येतन्नराणाममृतं घृतम् ।
सुधामृतरसं प्राश्य क्षीरमांसरसाशिना ॥ ४१ ॥
नष्टशुक्रक्षतक्षीणदुर्बलव्याधिकंपितान् ।
स्त्रीप्रसक्तान्कृशान्वर्णस्वरहीनांश्च बृंहयेत् ॥ ४२ ॥
कासहिक्काज्वरश्वासदाहतृष्णास्रपित्तनुत् ।
पुत्रदं वमिमूर्च्छाहृद्योनिमूत्रामयापहम् ॥ ४३ ॥
इत्यमृतप्राशघृतम् ।
( १५ ) अमृतप्राश-घृत—कल्कार्थ—जीवक, ऋषभक, शतावरी, जीवन्ती,
सोंठ, कचूर, मूगपर्णी, माषपर्णी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मेदा, महामेदा, का-
काली, क्षीरकाकाली, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, श्वेत और लाल दोनो पुनर्नवा,
मुलहठी, कौंच, शतावरी, ऋद्धि, फालसा, भार्गी, मुनक्का, बड़ी कटेरी, सिंघाढ़ा,
तामलकी ( भूई आवला ), पयस्या ( विदारी ), पिप्पली, खरैटी, बदर ( बेर ),
अक्षोट ( अखराट ), खजूर, बाताम ( बादाम ), अभिषुक ( पिस्ता ) इसी
प्रकार के अन्य मधुर, स्निग्ध और बृंहण फल प्रत्येक एक-एक कर्ष, आवले
का स्वरस, विदारी का रस, गन्ने का रस, बकरे के मास का रस और गाय का
दूध प्रत्येक एक प्रस्थ लेकर इनके साथ घी का एक प्रस्थ सिद्ध करे । सिद्ध होकर
शीतल हो जाने पर मधु आधा प्रस्थ ( आठ पल ), शर्करा पचास पल, मरिच,
दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेसर प्रत्येक आधा पल लेकर इनका चूर्ण
इसमे मिला देवे ।
यह घृत क्षतक्षीण व्यक्तियों के लिये अमृत के समान है । सुधा और अमृत
के समान है१, इस घी को खाकर पीछे से दूध और मास रस के साथ अन्न खावे ।
१ सुधा और अमृत दोनो पर्याय है तथापि इतना विवेक है कि नागों ने-
अ० ११] ३१ चिकित्सितस्थानम् ४८१
अ० ११] ३१ चिकित्सितस्थानम् ४८१
यह अमृतप्राश घृत नष्टशुक्र, क्षतक्षीण, दुर्बल, रोगों से कृश हुए, अति-
मैथुनशील, हीनमांस, वर्ण, स्वर से हीन व्यक्तियों को पुष्ट करता है। यह घृत
कास, हिक्का, ज्वर, श्वास, दाह, प्यास, रक्तपित्त, वमि, मूर्च्छा, हृदय
रोग, योनिरोग और मूत्ररोग को नष्ट करता है, यह घृत पुत्रदायक अर्थात्
वीर्यवर्धक है ॥३५-४३ ॥
श्वदंष्ट्रोशीरमञ्जिष्ठाबलाकाश्मर्यकत्तृणम् ।
दर्भमूलं पृथक्पर्णीं पलाशर्षभकौ स्थिराम् ॥ ४४ ॥
पलिकान् साधयेत्तेषां रसे क्षीरचतुर्गुणे ।
कल्कैः स्वगुप्ताजीवन्तीमेदर्षभकजीवकैः ॥ ४५ ॥
शतावर्या द्विमृद्वीकाशर्कराश्रावणीबिसैः ।
प्रस्थः सिद्धो घृताद्वातपित्तहृद्द्रव'शूलनुत् ॥ ४६ ॥
मूत्रकृच्छ्रप्रमेहार्शः कास'शोपक्षयापहः ।
धनुःस्त्रीमद्यभाराध्वखिन्नानां बलमांसदः ॥ ४७ ॥
इति श्वदंष्ट्रादिघृतम् ।
(१६( श्वदंष्ट्रादि घृत-गोखरू, खस, मजीठ, खरेंटी, गम्भारी, रोहिषतृण,
दर्भमूल, पृश्निपर्णी, ढाक, ऋषभक, शालपर्णी प्रत्येक एक एक पल लेकर आठ
गुणे जल में पकावे । चतुर्थांश रहने पर इसमे घी से चौगुना दूध मिलावे ।
कल्कार्थ—कोंच, जीवन्ती, मेदा, ऋषभक, जीवक, शतावरी, ऋद्धि, द्राक्षा,
शर्करा, श्रावणी (गोरखमुण्डी), बिस (मृणाल) इनका घी से एक चतुर्थांश
कल्क लेकर उसके द्वारा घी का एक प्रस्थ सिद्ध करे ।
यह घृत वातजन्य और पित्तजन्य हृदयशूल, मूत्रकृच्छ्र, प्रमेह, अर्श, कास,
शोष और क्षय का नष्ट करता है, धनुष, भार, स्त्री, मद्य, यात्रा से क्षीण
व्यक्तियों का बल और मांस देता है ॥ ४४-४७ ॥
मधुकाष्टपलं द्राक्षाप्रस्थक्वाथे घृतं पचेत् ।
पिप्पल्यष्टपले कल्के प्रस्थं सिद्धे च शीतले ॥ ४८ ॥
पृथगष्टपलं क्षौद्रशर्कराभ्यां विमिश्रयेत् ।
समं शक्तु क्षतक्षीणे रक्तगुल्मे च तद्धितम् ॥ ४६ ॥
इति शक्तुप्रयोगः ।
जिसको खाया था वह सुधा और देवों ने जिसका पान किया था वह अमृत
कहाया था । नाग और देव दोनो उनको सेवन कर दीर्घजीवी और अमर हुए
ऐसी प्रसिद्धि है। इन दोनों के ही तुल्य यह अमृतप्राश घृत समझना चाहिये। चक्र०
१ 'हृद्द्रव' इति । २ 'काम' इति च पाठ.।
४८२ चरकसंहिता [ अ० ११
( १७ ) सक्तु प्रयोग—मुलहठी आठ पल, सूखी दाख एक प्रस्थ इनके
क्वाथ मे पिप्पली का कल्क आठ पल मिला कर घी का एक प्रस्थ ( १६ पल )
सिद्ध करे । सिद्ध होने पर जब ठण्डा हो जाये तब मधु आठ पल, शर्करा
( खाण्ड ) आठ पल मिलावे । इस घी को सत्तू के समान भाग मे मिला कर
खांवे । यह घृत क्षतक्षीण और रक्तगुल्म रोगो मे हितकारी है ॥ ४८-४६ ॥
धात्रीफलविदारीक्षुजीवनीयरसाद् घृतात् ।
अजागोपयसोश्चैव सप्त प्रस्थान्पचेद्भिषग् ॥ ५० ॥
सिद्धशीते सिताक्षौद्र द्विप्रस्थं विनयेत्ततः ।
यक्ष्मापस्मारपित्तासृक्कासमेहक्षयापहम् ॥ ५१ ॥
वयःस्थापनमायुष्यं मांसशुक्रबलप्रदम् ।
( १८ ) आवले का रस एक प्रस्थ, विदारी का रस एक प्रस्थ, गन्ने का
रस एक प्रस्थ, जीवनीय गण का रस एक प्रस्थ, बकरी का दूध एक प्रस्थ,
गाय का दूध एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, इन सात वस्तुओ को पकावे । इस घृत
के शीतल होने पर शर्करा एक प्रस्थ ( १६ पल ) और मधु एक प्रस्थ मिलावे ।
यह घृत यक्ष्मा, अपस्मार, रक्तपित्त, कास, प्रमेह और क्षय को नष्ट करता है,
यौवन को बनाये रखन और बुढापे को दूर करने वाला, आयुर्वर्धक और मास
शुक्र तथा बल को बढाता है ॥ ५०-५१-॥
घृतं तु पित्तेऽभ्यधिके लिह्याद्वातेऽधिके पिबेत् ॥ ५२ ॥
लीढं निर्वापयेत्पित्तमल्पत्वाद्वन्ति नानलम् ।
आक्रामत्यनिलं पीतमूष्माणं निरुणद्धि च ॥ ५३ ॥
( १६ ) पित्त के प्रबल होने पर घी चाटे, वायु के अधिक होने पर घृतका
पान करे । पित्त के अधिक होने पर चाटा हुआ घृत पित्त को तो शान्त करता
है और मात्रा में थोड़ा होने से जाठर-अग्नि का नाश नही करता । वायु के
अधिकता मे पिया हुआ घृत स्निग्ध और गुरु होने से वायु को शमन करता है
वायु रूक्ष और लघु होता है । बलवान् वायु पक्वाशय से जिस उष्णिमा को ले
जा रहा हो, उसको शान्त करता है ॥ ५२-५३ ॥
क्षामक्षीणकृशाङ्गानामेतान्येव घृतानि च ।
त्वक्क्षीरीशर्करालाजचूर्णैः स्यानानि१ योजयेत् ॥ ५४ ॥
क्षाम (क्रान्त शरीर), क्षीण और कृश अगो-वाले व्यक्तियों मे उपरोक्त घृत
१ 'पानानि' च पाठः ।
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४८३
वशलोचन, पिप्पला, लाजा इनके चूर्णो से गाढा ( घन ) पान बना कर
सेवन करावे ॥ ५४ ॥
सर्पिर्गुडान् समध्वक्षाञ्जग्ध्वा चानु पयः पिवेत् ।
रेतो वीर्य बलं पुष्टिं तैराशुतरमाप्नुयात् ॥ ५५ ॥
( २० ) सर्पिर्गुड— ( १ ) वशलोचन, पिप्पली और लाजा चूर्ण से बने
बनाये घृतो को मधु के साथ सेवन करे पीछे से दूध पीवे । इस प्रकार करने से
शुक्र, सामर्थ्य, बल और पुष्टि शीघ्र प्राप्त होती है ॥ ५५ ॥
बला विदारी ह्रस्वा च पञ्चमूली पुनर्नवा ।
पञ्चानां क्षीरिवृक्षाणा शुङ्गा मुष्ट्यशका अपि ॥ ५६ ॥
एषा कषाये द्विक्षीरे विदार्याजरसांशिके ।
जीवनीयैः पचेत्कल्केैरक्षमात्रैर्घृताढकम् ॥ ५७ ॥
सितापलानि पूतेऽस्मिन् शीते द्वात्रिंशदावपेत् ।
गोधूमपिप्पलीवाशीचूर्ण शृङ्गाटकस्य च ॥ ५८ ॥
सक्षौद्रं कुडवाशेन तत्सं खजमूर्च्छितम् ।
स्त्यानं सर्पिर्गुडान् कृत्वा भूर्जपत्रेण वेष्टयेत् ॥ ५९ ॥
ताञ्जग्ध्वा पलिकान् क्षीरं मद्य चानुपिवेत्कफे ।
शोषे कासे क्षते क्षीणे श्रमस्त्रीभारकर्पिते ॥ ६० ॥
रक्तनिष्ठीवने तापे पीनसे चोरसि स्थिते ।
शस्ताः पार्श्वशिरःशूले विभेदे स्वरवर्णयोः ॥ ६१ ॥
इति द्वितीयसर्पिर्गुडाः ।
( २१ ) सर्पिर्गुड़ ( २ )—क्वाथ के लिये खरैटी, विदारीकन्द, लघुपञ्च
मूल ( शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, छोटी कटेरी और गोखरू ) पाचो क्षीरी
वृक्षो ( बड़, पीपल, पिलखन, गूलर, अश्वत्थ ) के नवीन कोमल पत्ते प्रत्येक
एक मुष्टि ( पल ) लेकर आठ गुणे जल मे क्वाथ करे । चतुर्थाश रहने पर उतार
ले । कषाय से दुगुना दूध, विदारी का स्वरस तथा बकरे का मास रस प्रत्येक
कषाय के समान, अथवा एक एक आढक, कल्कअर्थ-जीवक, ऋषभक आदि
जीवनीय गण की दस ओषधिया प्रत्येक एक एक कर्ष, घृत एक आढक ( चार
प्रस्थ ) लेकर यथाविधि घृतपाक करे । सिद्ध होने पर छान कर इस घृत मे
मिश्री बत्तीस पल, गेहूँ, पिप्पली, वशलोचन, सिंघाड़ा इनमे से प्रत्येक का चूर्ण
और शहद प्रत्येक एक एक कुडव ( चार पल ) मिला कर खौचे से भली
प्रकार चलावे, जिससे गाढा हो जाये । फिर इनकी एक एक पल की गुटिकाये
४८४ चरकसंहिता [ अ० ११
बाध कर शक्ति बढाने के लिये भूर्जपत्र ( भोजपत्र ) से लपेट दे । इन गुटि-
काओ का एक पल परिमित मात्रा मे खाकर, यदि वायु और पित्त की अविकता
हो तो ऊपर से दूध पीवे, कफ की प्रबलता हो तो मद्य का अनुपान करे । ये
सर्पिर्गुड़ शोष, क्षत, कास क्षीण, श्रम, भार और स्त्री-प्रसग से कृश हुए व्यक्तियो
के लिये, रक्तवमन, पीनस, उरोदाह, पार्श्वशूल, शिर शूल स्वरभेद और विवर्णता
मे हितकारी हे ॥ ५६-६१ ॥
त्वक्क्षीरीश्रावणीद्राक्षामूर्वर्षभकजीवकैः ।
वीरर्द्धिक्षीरकाकोलीबृहतीकपिकच्छुभिः ॥ ६२ ॥
खर्जूरफलमेदाभिः क्षीरपिष्टैः पलोन्मितैः ।
धात्रीविदारीक्षुरसप्रस्थः प्रस्थं घृतात्पचेत् ॥ ६३ ॥
शर्करार्धतुला शीते क्षौद्रार्धप्रस्थमेव च ।
क्षिप्व्रा सर्पिर्गुडान्कुर्यात्कासहिक्काज्वरापहान् ॥ ६४ ॥
यक्ष्माणं तमकं श्वासं रक्तपित्त हलीमकम् ।
शुक्रनिद्राक्षयं तृष्णा हन्युः कार्श्यं सकामलम् ॥ ६५ ॥
इति तृतीयसर्पिर्गुडकाः ।
सर्पिर्गुड ( ३ )—वंशलोचन, श्रावणी (गोरखमुण्डी), द्राक्षा, मूर्वा, जीवक,
ऋषभक, वीरा ( पृश्निपर्णी या शतावरी ), ऋद्धि, क्षीरकाकोली, बड़ी कटेरी,
कोंच, खजूर, मेदा प्रत्येक द्रव्य एक एक पल लेकर दूध के साथ खूब बारीक
पीस ले । आवले का रस एक प्रस्थ, विदारी का रस एक प्रस्थ, गन्ने का रस
एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ लेकर उपराक्त कल्क के साथ घृत सिद्ध करे । घी
के शीतल होने पर शर्करा पचास पल, मधु आठ पल मिला कर घृतपिण्ड बना
लेवे । ये घृतपिण्ड कास, हिचकी, ज्वर, यक्ष्मा, तमक श्वास, रक्तपित्त, हलीमक,
शुक्रक्षय, निद्राक्षय, तृष्णा, कृशता और कामला का नष्ट करते है ॥६२-६५॥
नवमामलकं द्राक्षा १मात्मगुप्ता पुनर्नवाम् ।
शतावरी विदारी च समागा पिप्पली तथा ॥ ६६ ॥
पृथग्दशपलान् भागान् पलान्यष्टौ च नागरात् ।
यष्ट्याह्वासौवर्चलयोर्द्विपलं मरिचस्य च ॥ ६७ ॥
क्षीरतैलघृताना च त्र्याढकं शर्कराश्रृते ।
कथिते तानि चूर्णानि दत्त्वा बिल्वसमान् गुडान् ॥६८॥
कुर्यात्तानभक्षयेत्क्षीणः क्षतशुष्कश्च मानवः ।
१ 'द्राक्षा नवामामलकी' इति वा पाठः ।
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४८५
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४८५
तेन सद्यो रसादीना वृद्ध्या पुष्टि स विन्दति ॥ ६६ ॥
इति चतुर्थसर्पिर्गुडकाः।
सर्पिर्गुड (४)—नूतन आमले, द्राक्षा, कोच, पुनर्नवा, शतावरी, विदारी-
कन्द, मजीठ, पिप्पली प्रत्येक द्रव्य दस पल, साठ आठ पल, मुलहठी, सुवर्चल
(सञ्चल नमक) प्रत्येक दो पल, मरिच दो पल इन सब को मिला कर चूर्ण
कर ले। फिर दूध, घी और तैल प्रत्येक को एक एक आढक लेकर शर्करा के
साथ पकावे। जब गाढा हो जावे तब इसमे आमले आदि सब वस्तुओ का
चूर्ण मिला कर विल्व अर्थात् एक एक पल के गुड (गोले) बाध ले। यह
गुड क्षीण, उर क्षत तथा कृश रोगी को खाने चाहिये। इससे रसादि की वृद्धि
होकर शीघ्र पुष्टि प्राप्त होती है। ॥६६-६६॥
गोक्षीराद्द्वाढकं सर्पिः प्रस्थमिक्षुरसाढकम् ।
विदार्याः स्वरसात्प्रस्थं रसात्प्रस्थं च तैत्तिरात् ॥ ७० ॥
दद्यात्सिद्ध्यति तस्मिंस्तु पिष्टानिक्षुरसैरिमान् ।
मधूकपुष्पं कुडवं प्रियालकुडवं तथा ॥ ७१ ॥
कुडवार्थं तुगाक्षीर्या २ खर्जूराणा च विंशतिम् ।
पृथग्विभीतकानां च पिप्पल्याश्च चतुर्थिकाम् ॥ ७२ ॥
त्रिंशत्पलानि खण्डाच्च मधूकात्कर्षमेव च ।
तथाऽर्धपलिकान्यत्र जीवनीयानि दापयेत् ॥ ७३ ॥
सिद्धेऽस्मिन्कुडवं क्षौद्रं शीते क्षिप्त्वाऽथ मोदकान् ।
कारयेन्मरिचाजाजीपलचूर्णावचूर्णितान् ॥ ७४ ॥
वातासृक्पित्तरोगेषु क्षतकासक्षयेषु च ।
शुष्यतां क्षीणशुक्राणां रक्ते चोरसि संस्थिते ॥ ७५ ॥
कृशदुर्बलवृद्धानां पुष्टिवर्णबलार्थिनाम् ।
( १) अष्टागसग्रह मे थोडा पाठभेद है। यथा—
'सशर्कराशृते क्षीरघृततैलाढकत्रये ।
चूर्णीकृत्य क्षिपेत् पक्वसान्द्रे दशपलाः पृथक् ॥
द्राक्षात्मगुप्ता वषोभूसमगाभीरुपिप्पली ।
तद्वद् विदार्यामलके प्रस्थार्धं विश्वभेषजम् ॥
( क ) 'जल्पकल्पतरु' मे 'समगा' के स्थान पर 'समाशा' और 'शर्कराशृते'
के स्थान पर 'शर्कराशते' पाठ है । २ 'तुगाक्षीर्यार्धकुडवा खर्जूराणिच
विशतिम्' इति । ३ पृथग् बिभीतकानक्षं च पाठः ।
४८६ चरकसंहिता [अ० ११
योनिदोषक्षतस्रावहतानां चापि योषिताम् ॥ ७६ ॥
गर्भार्थिनीनां गर्भश्च स्रवेद् यासां म्रियेत वा ।
धन्या बल्या हितास्ताभ्यः शुक्रशोणितवर्धनाः ॥ ७७ ॥
इति सर्पिर्मोदकः ।
सर्पिर्मोदक—गाय का दूध आधा आढक, घी एक प्रस्थ, गन्ने का रस एक
आढक, विदारी का स्वरस एक प्रस्थ, तीतर का मांस रस एक प्रस्थ इन सब
को मिला कर पकावे । जब यह सिद्धहो जाय तब इसमें महुए का फूल चारपल,
पियाल चार पल, वंशलोचन दो पल, खजूर बीस पल, बिभीतक की मज्जा बीस
पल, पिप्पली चार पल, खाण्ड (गुड) बीस पल, मुलहठी एक कर्ष जीवनीय
गण की प्रत्येक औषधि आधा पल लेकर इन सब को गन्ने के रस में बारीक
पीस कर सिद्ध किये घृत में मिला देवे । [ अथवा महुए के फूल आदि वस्तुओ
को गन्ने के रस में पीस कर इनका कल्क बनाले, फिर गाय का दूध आदि व-
स्तुओ में इसको मिला कर घृतपाक विधि से घृत बनाले ]। इस प्रकार से घृत
के सिद्धहोने पर मधु एक कुडव, मरिच, अजाजी (कृष्ण जीरा) प्रत्येक एक
एक पल मिला कर मोदक (लड्डू) बनवावे । ये मोदक वात रक्त, रक्तपित्त,
उरःक्षत, कास, क्षय, छाती में स्थित रक्त में, शोषरोगी, क्षीणशुक्र, कृश, दुर्बल,
वृद्ध, पुष्टि, बल, वर्ण का चाहने वालो के लिये, योनि दोष और रक्तस्राव से
पीड़ित स्त्रियो और बन्ध्या स्त्रियो वा जिनका गर्भ गिर जाता या मर जाता हो
उनके लिये हितकारी है । ये मोदक धन्य, बलवर्धक, वीर्य और रक्त को
बढ़ाते है ॥ ७०-७७ ॥
बस्तिदेशे विकुर्वाणे स्त्रीप्रसक्तस्य मारुते ।
वातघ्नान् बृंहणान् वृष्यान् योगांस्तस्य प्रयोजयेत् ॥ ७८ ॥
स्त्रीसेवी अति कामी पुरुष के बस्ति प्रदेश से यदि वायु शूलादि विकार
उत्पन्न करे, तब वातनाशक, बृंहण वृष्य योगों का प्रयोग करे ॥ ७८ ॥
शर्करापिप्पलीचूर्णैः सर्पिषा माक्षिकेण वा ।
संयुक्तं वा शृतं क्षीरं पिबेत्कासज्वरापहम् ॥ ७९ ॥
(१) गरम दूध के साथ शर्करा और पिप्पली के चूर्ण को अथवा
(२) शर्करा और पिप्पली के चूर्ण को घी वा मधु के साथ लेने से कासज्वर
नष्ट होता है ॥ ७९ ॥
फलाम्लं सर्पिषा भृष्टं विदारीक्षुरसे शृतम् ।
स्त्रीषु क्षीणः पिबेद्यूषं जीवनं बृंहणं परम् ॥ ८० ॥
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४८७
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४८७
(२) अति मैथुन से क्षीण पुरुष विदारी और गन्ने के रस मे पका कर,
घी मे भून कर (घी का बघार देकर), अनार या आवले से खट्टा करके मुद्गादि
यूष पीवे, यह यूष अतिशय बृं हण (वृष्य) है ॥ ८० ॥
शक्तूनां वस्त्रपूताना मन्थं क्षौद्रघृतान्वितम् ।
यवान्नसात्म्यो१ दिप्ताग्निः क्षतक्षीणः पिबेन्नरः ॥ ८१ ॥
(३) क्षीण व्यक्ति जिसको जौ अनुकूल हो और जिसकी जाठर अग्नि
प्रदीप्त हा वह जौ के सत्तू को पानी मे घोलकर मन्थ बना लेवे । इस मन्थ को
कपड़े से छान कर इसमे घी और मधु मिला कर पीवे ॥ ८१ ॥
जीवनीयोपसिद्धं वा घृतभृष्टं तु जाङ्गलम् ।
रसं प्रयोजयेत् क्षीणे व्यञ्जनार्थे सशर्करम् ॥ ८२ ॥
(४) क्षतक्षीण व्यक्ति के व्यजन के लिये जीवक, ऋषभक आदि जीव-
नीय गण की ओषधिया के साथ घी मे भूने जागल पशुओ के मास रस को शर्करा
मिला कर देव । [ उसके साथ वे चावल, रोटी आदि खावे ] ॥८२॥
गोमहिषाश्वनागाजः२ क्षीरमांसरसस्तथा ।
यथाग्नि भोजयेद्युषैः फलाम्लैर्घृतसंस्कृतैः ८३ ॥
(५) बैल, भैस, घोड़ा, हाथी और बकरा इनके मास-रस तथा दूधों के
साथ अनार, आवले आदि फलो से खट्टा बना कर घी से सस्कृत कर मुद्गादि
यूषो के साथ यवान्न खिलावे ॥ ८३ ॥
दीप्तेऽग्नौ विधिरेषः स्यान्मन्दे दीपनपाचनः ।
यक्ष्मिणा विहितो ग्राही भिन्ने शकृति चेष्यते ॥ ८४ ॥
क्षतक्षीण व्यक्ति को यदि अग्नि दीप्त हो तो उपराक्त विधि बरते । अग्निमन्द
हा ता दीपन पाचन विधि बरते । यदि अतीसार हो तो यक्ष्मा रोग मे वर्णित
मलसग्राही विधि का प्रयोग करे । जैसे—॥ ८४ ॥
पलिकं सैन्धवं शुण्ठी द्वे च सावचेलात्पले ।
कुडवांशानि वृक्षाम्लं दाडिम पत्रमर्जकात् ॥ ८५ ॥
एकैक मरिचाजाज्योर्धान्यकाद् द्वे चतुर्थिके ।
शर्करायाः पलान्यत्र दश द्वे च प्रदापयेत् ॥ ८६ ॥
कृत्वा चूर्णमतो मात्रामन्नपाने प्रयोजयेत् ।
रोचनं दीपनं बल्य पार्श्वार्त्तिश्वासकासनुत् ॥ ८७ ॥
इति सैन्धवादिचूर्णम् ।
१ 'यावन्नसात्म्यो' इति । २ 'गोमहिष्यविनागाजैर्गिति च पाठः ।
४८८ चरकसंहिता [ अ० ११
(१) सैन्धवादि चूर्ण—सैन्धव एक पल, सोंठ दो पल, सचल नमक दो
पल, वृक्षाम्ल (समगदाना या पकी इमली) चार पल, अनारदाना चार पल,
अर्जक (तुलसी) पत्र चार पल, मरिच एक पल, अजाजी (जीरा) १ पल,
धनिया दो पल, शर्करा बारह पल इन सबका चूर्ण करले। फिर अग्नि के अनु-
सार इसकी मात्रा खान-पान मे बरते। यह चूर्ण रोचक, अग्निदीपक, बलकारक
पार्श्वशूल, कास ओर श्वास रोगो का नाशक है ॥ ८५ ८७ ॥
एका षोडशिका धान्याद् द्वे द्वेऽजाज्यजमोदयोः ।
ताभ्या दाडिमवृक्षाम्लाद् द्विर्द्विः सौवर्चलात्पलम् ॥ ८८ ॥
शुण्ठ्याः कर्षं दधित्थस्य मध्यात्पञ्च पलानि च ।
तच्चूर्णं षोडशपले शर्कराया विमिश्रयेत् ॥ ८९ ॥
मन्दानले शकृद्भेदे यक्ष्मिणामग्निवर्धनः ।
षाडवोऽयं प्रदेयः स्यादन्नपानेषु पूर्ववत् ॥ ९० ॥
इति षाडवः ।
(२) षाडव—धनिया, एक षोडशिका (पल¹), अजाजी (जीरा)
दो पल, अजवायन दो पल, अनारदाना चार पल, वृक्षाम्ल चार पल, सौवर्चल
(सचल नमक) एक पल, सोठ एक कर्ष, कपित्थ (कैथ) की मज्जा पाच
पल, इन सब को चूर्ण करके सोलह पल शर्करा मे मिलावे। यह षाडव अग्नि-
वर्धक है, मन्दाग्नि और अतिसार मे पूर्व की भाति मात्रानुसार देवे। यह रोचक,
दीपक, बलवर्धक और कासनाशक है ॥८८-६०॥
पिबेन्नागबलामूलमर्धकर्षविवर्धनम् ।
पलं क्षीरयुतं मास क्षीरवृत्तिरनन्नभुक् ॥ ९१ ॥
एष प्रयोगः पुष्ट्यायुर्बलारोग्यकरः परः ।
मण्डूकपर्ण्याः कल्पोऽयं शुण्ठीमधुकयोस्तथा ॥ ९२ ॥
नागबला मूल की छाल का चूर्ण आधा कर्ष लेकर प्रतिदिन आधा कर्ष
बढाते हुए एक पल की मात्रा तक बढा कर सेवन करावे। प्रथम दिन आधा
कर्ष, दूसरे दिन एक कर्ष, तीसरे दिन डेढ कर्ष, चौथे दिन दो कर्ष इसी प्रकार
से आठवे दिन चार कर्ष या एक पल खावे। चूर्ण को दूध के साथ सेवन
करावे। आठ दिन के पीछे एक पल, मात्रा मे चूर्ण खावे। एक मास तक अन्न
न खाकर केवल दूध ही पीना चाहिये, यह प्रयोग श्रेष्ठ है। यह योग पुष्टि,
आयु, बल और आरोग्य को देता है। इसी प्रकार से मण्डूकपर्णी, सोठ और
मुलहठी की भी नागबला चूर्ण के समान प्रयोगविधि है ॥९१-९२॥
१ पल मुष्टि. प्रकुञ्चोऽथ चतुर्थिका बिल्व षोडशिका चाम्रमिति (च०क०१२)
अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४८६
अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४८६
यद्यत्सन्तर्पणं शीतमविदाहि हितं लघु ।
अन्नपानं निषेव्यं तत्क्षतक्षीणैः सुखार्थिभिः ॥ ९३ ॥
यच्चोक्तं यक्ष्मिणां पथ्यं कासिनां रक्तपित्तिनाम् ।
तच्च कुर्यादवेक्ष्याग्निं व्याधिं सात्म्यबलं तथा ॥ ९४ ॥
जो जो अन्न सन्तर्पण करने वाला, शीत परन्तु विदाही नही, हितकारी लघु
हे वह सब सुखार्थी क्षतक्षीण रोगियों को सेवन करना चाहिये ।
राजयक्ष्मा के रोगी, कास-रोगी और रक्तपित्त रोगी के लिये जो पथ्य कहा
है, वह सब क्षतक्षीण-रोगी के लिये अग्निबल, रोगबल ओर सात्म्य तथा शरीर का
बल देख कर प्रयोग करना चाहिये ॥९३-९४॥
उपेक्षिते¹ भवेत्तस्मिन्ननुबन्धो हि यक्ष्मणः ।
प्रागेवाऽऽगमनात्तस्य तस्मात् त्वरया जयेत् ॥ ९५ ॥
क्षतक्षय रोग की उपेक्षा करने से यह यक्ष्मा-रोग का कारण हो जाता है ।
इसलिये यक्ष्मा रोग के होने से पूर्व ही क्षतक्षीण रोग की चिकित्सा शीघ्र करनी
चाहिये ॥ ९५ ॥
तत्र श्लोकौ—क्षतक्षयसमुत्थानं सामान्यपृथगाकृतिम् ।
असाध्ययाप्यसाध्यत्वं साध्यानां सिद्धिमेव च ॥ ९६ ॥
उक्तवान् ज्येष्ठशिष्याय क्षतक्षीणचिकित्सिते ।
तत्त्वार्थविद्धीतरजस्तमोमोहः² पुनर्वसुः ॥ ९७ ॥
उपसहार—क्षतक्षीण रोग का कारण, सामान्य लक्षण, विशेष लक्षण, साध्य,
याप्य, असाध्य, साध्य रोग की चिकित्सा ये सब विषय क्षतक्षीण चिकित्सा मे
तत्त्वज्ञानी, रज, तम और मोह से रहित भगवान् आत्रेय ने अपने ज्येष्ठ शिष्य
अग्निवेश को उपदेश किया ॥९६-९७॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थाने क्षतक्षीणचिकित्सितं
नामैकादशोऽध्याय ॥ ११ ॥
—-o-o-—
द्वादशोऽध्यायः
अथातः श्वयथुचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे श्वयथु ( शोथ ) रोग की चिकित्सा की व्याख्या करते है, ऐसा
भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
१. ‘उपेक्षितो’ इति । २ ‘तमोदोषः’ इति च पाठः ।
४६० चरकसंहिता [ अ० १२
भिषग्वरिष्ठं सुरसिद्धजुष्टं मुनीन्द्रमत्र्यात्मजमग्निवेशः ।
महागदस्य श्वयथोर्यथावत्प्रकोपरूपप्रशमानपृच्छत् ॥ ३ ॥
वैद्यों मे श्रेष्ठ, देवा और सिद्धजनो से मेवित, अत्रि के पुत्र मुनि श्रेष्ठ
पुनर्वसु से अग्निवेश ने शोथ नामक महारोग के यथावत् प्रकोपके कारण,
लक्षण और चिकित्सा विषयक प्रश्न किया ॥ ३ ॥
तस्मै जगादागदवेदसिन्धुप्रवतनाद्रिप्रवरोऽत्रिजस्तान् ।
वातादिभेदान्त्रिविधस्य सम्यङ् निजानिजेकाङ्गजसर्वजेस्य ॥४॥
अगद ( आरोग्य ) का बतलाने वाले आयुर्वेद रूप महानदी बहाने वाले
श्रेष्ठ पर्वतरूप भगवान् आत्रेय ने अग्निवेश को निज ( शारीरिक ) और आग-
न्तुज, एकाङ्गज तथा सर्वाङ्गज शोथ तथा वातादि भेद से भिन्न तीन प्रकार के
शारीरिक शोथा का उपदेश किया ॥ ४ ॥
शुद्धस्य मियाम्यक्षतदौर्बल्यानां क्षाराम्लतीक्ष्णोष्णगुरुपसेवा ।
दध्याममृच्छाफांश्चावदुष्टगरा सृष्टाहारनिषेवणं च ॥ ५ ॥
अशर्शन्चेष्टा न च दुष्टशुद्धिर्ममोपघातो १ विषमा प्रसूतिः ।
मिथ्योपचारः प्रतिकमणां च निजस्य हेतुः श्वयथाः २ प्रदिष्टः॥६॥
कारण—शोधन ( वमन आदि कर्म ), आमय ( रोगज्वर आदि ), अभक्त
( उपवास ) स कृश हुए और बलसहित पुरुषा का क्षार, अम्ल, तीक्ष्ण, उष्ण,
भारी पदार्थो का सेवन, दही, आम ( कच्च फल आदि ), मिट्टी, शाक, विरोधी
और दूषित अन्न ( जैसे-मन्दक दही ) ओर गर अर्थात् विषयुक्त भोजन का
सेवन, अर्श रोग, अचष्टा अर्थात् शारीरिक व्यायाम आदि क्रिया का न करना,
आलस्य मे पडे रहना, शोधन योग्य शरीर का शोधन न करना, गर्भ का निष्पा-
डन, विषम प्रसव ( आम-गर्भपात आदि ) और वमन आदि कार्यों का मिथ्या
आचरण ये सब शरीरजन्य शोथ के कारण है ॥ ५-६ ॥
बाह्यत्वचो दूषयिताऽभिघातः काष्ठाश्मशस्त्राग्न्यशनीविषाद्यैः ।
आगन्तुहेतुः ।
बाह्य त्वचा को दूषित करने वाले, काष्ठ, आग, शल्य ( काटा आदि ), पत्थर,
विष, लोह आदि से अभिघात ( चोट ) लगने से उत्पन्न शोथ आगन्तुज होते है ।
त्रिविधो निजश्च सर्वाधं गात्रावयवाश्रितवान् ॥ ७॥
निज शोथके भेदः—निज शोथ तीन प्रकार का होता है । ( १ ) सम्पूर्ण
शरीर मे व्याप्त,( २ ) आधे शरीर मे व्याप्त और ( ३ ) एक अवयव मे व्याप्त ॥७॥
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१ 'मर्मोपघातो' इति च पाठः । वहा पर मर्मस्थान पर चोट लगना अर्थ
करना चाहिये । २ 'श्वयथौ' इति च पाठः ।
अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४९१
बाह्याः सिराः प्राप्य यदा कफासृक्पित्तानि संदूषयतीह वायुः ।
तैर्बद्धमार्गः स तदा विसर्पन्नुत्सेधलिङ्गं श्वयथुं करोति ॥ ८ ॥
सम्प्राप्ति—उपरोक्त कारणो से कुपित वायु जिस समय इस शरीर मे बाह्य
सिराओ मे पहुच कर कफ, रक्त और पित्तको दूषित कर देता है, तब दूषित
कफ, रक्त और पित्त से मार्गो के रुक जाने पर वायु इधर-उधर न जाकर,
वही पर फैल कर सूजन रूप मे शोथ को उत्पन्न कर देता है ॥ ८ ॥
उरःस्थितैरूर्ध्वमधश्च वायोः स्थानस्थितैर्मध्यगतैश्च मध्ये ।
सर्वाङ्गगैः सर्वगतैः क्वचित्स्थदोषैः क्वचित्स्याच्छ्वयथुस्तदाख्यः ॥९॥
शोथारम्भक दोष जब श्लेष्मा क स्थान आमाशय मे स्थित होते है, तब
शरीर के ऊपर के भाग म शोथ होता है । आर जब वायु का स्थान पक्वाशय मे
दोष स्थित होते ह, तब शरीर के निचले भाग मे शोथ होता है । जब पित्त के
स्थान मे मध्य भाग मे दोष स्थित होते हैं, तब मध्य मे शोथ होता है ।
समस्त शरीर मे व्याप्त दोष समस्त शरीर मे शोथ उत्पन्न करते हैं
और शरीर के एक देश (कण्ठ, तालु आदि) मे स्थित दोष एक अग
मे शोथ करते हैं ॥ ९ ॥
ऊष्मा तथा स्याद्दवथुः सिराणामायाम इत्येव च पूर्वरूपम् ।
सर्वस्त्रिदोषोऽधिकदोषलिङ्गेस्तत्तत्संज्ञमभ्येति भिषग्जितं च ॥१०॥
पूर्वरूप—अंगों मे उष्णता, दवथु (दाह, उपताप), सिराओं का विस्तार
(तनाव), ये शोथ रोग के पूर्वरूप हैं । सम्पूर्ण शरीर मे व्याप्त शोथ सन्निपात-
जन्य होता है । उस शोथ मे जो दोष अधिक होता है उसी के नाम से वह कहा
जाता है और उसी दोष के अनुसार चिकित्सा होती है । [वात दोष की अधि-
कता होने पर वातिक और पित्त और कफ की अधिकता से पैत्तिक और
श्लैष्मिक कहा जाता है] ॥ १० ॥
१ सुश्रुत मे कहा है--
“दोषा. श्वयथुमूर्ध्वं हि कुर्वन्त्यामाशयस्थिता ।
पक्वाशयस्था म ये च वर्च स्थानगतारत्वधः ।
कृत्स्नदेहमनुप्राप्ता. कुर्यु. सर्वसरं तथा ॥
आमाशयगत दोष ऊपर की ओर शोथ पैदा करते है, पक्वाशयगत दोष
मध्य मे और मलस्थान मे स्थित दोष नीचे के अगो मे शोथ उत्पन्न करते हैं ।
सारे देह मे व्याप्त दोष समस्त देह में शोथ पैदा कर देते हैं ।
४९२ चरकसंहिता [ अ० १२
सगौरवं स्यादनवस्थितत्वं सोत्सेधमुष्माऽथ सिरातनुत्वम् ।
सलोमहर्षाङ्गविवर्णता च सामान्यलिङ्गं श्वयथोः प्रदिष्टम् ॥ ११ ॥
सामान्य लक्षण—अंगों में भारीपन, सूजन, शोथ की चंचलता, अस्थिरता
(वायु के कारण), सूजन, उष्णिमा और शिराओं का पतलापन, रोमहर्ष, अंग
की विवर्णता ये शोथ के सामान्य लक्षण हैं ॥ ११ ॥
चलस्तनुस्त्वक्परुषोऽरुणोऽनितः प्रसुप्तिहर्षार्तियुतोऽनिमित्ततः ।
प्रशाम्यति प्रोन्नमति प्रपीडितो दिवा बली च श्वयथुः समीरणान् ॥१२॥
वातिक शोथ—वह शोथ अस्थिर इधर-उधर चलता रहता है, त्वचा
पतली हो जाती है, कर्कश, लाल काला वर्ण, प्रसुप्ति (स्पर्श की अज्ञता), हर्ष
(चिन्चिन् वेदना या रोमहर्ष), बिना कारण के ही पीड़ा होना (कभी दर्द
होना और कभी रुक जाना), दबाने से शोथ शान्त हो जाता है, परन्तु दबाव
हटा लेने पर फिर उठ जाता है, शोथ का जोर दिन के समय अधिक रहता है।
यह शोथ जल्दी उठता और जल्दी शान्त हो जाता है ॥ १२ ॥
मृदुः सगन्धोऽसितपीतरागवान्भ्रमज्वरस्वेदतृषामदान्वितः ।
य उच्यते स्पर्शरुग १क्षिरागकृत्सपित्तशोथो भृशदाहपाकवान् ॥१३॥
पैत्तिक शोथ—कोमल, गन्धयुक्त, इसका रंग काला, पीला या लाल होता
है। इसके साथ रोगी में भ्रम (चक्कर आना), ज्वर, पसीना, प्यास और मूर्च्छा
रहती है। इसमें तीव्र दाह रहता है, छूने मात्र से दर्द होता है, आँखों में भी
लाली दौड़ जाती है, इस पित्तजन्य शोथ में अतिशय दाह (जलन) और
पाक होता है ॥ १३ ॥
गुरुः स्थिरः पाण्डुररोचकान्वितः प्रसेकनिद्रावमिवह्निमान्द्यकृत् ।
स कृच्छ्रजन्मप्रशमो निपीडितो न चोन्नमेद्रात्रिबली कफात्मकः ॥१४॥
कफजन्य शोथ—भारी और स्थिर होता है, इस शोथ का रंग भूरा, धूसर
रहता है। रोगी को अरोचकता, मुख से लाल स्राव, निद्रा, वमन और अग्नि-
मान्द्य होता है। यह सूजन देर में उत्पन्न होता है और देर में ही शान्त होता
है। दबाने से दब जाता है और फिर ऊपर नहीं उठता, इसका रात्रि में बल
अधिक होता है ॥ १४ ॥
कृशस्य रोगैरबलस्य यो भवेदुपद्रवैर्वा वमिपूर्वकैर्युतः ।
स हन्ति मर्मा२नुगतोऽथ राजिमान्परिस्रवेद्दीनबलस्य सर्वगः ३ ॥१५॥
१ 'स्पर्शसहो' इति पाठान्तरम् । २ 'महात्तिंममो' इति पाठान्तरम् ।
३ 'परिस्रवन् भीमबलश्च सर्वशः' इति च पाठः ॥
अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४९३
अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४९३
असाध्य-शोथ—रोगों से कृश हुए, निर्बल व्यक्ति का, वमन, श्वास आदि
उपद्रवों से युक्त शोथ और मर्म स्थान का शोथ, जिस शोथ में रेखायें पड गई
हों, निर्बल व्यक्ति मे जिस शोथ से स्राव बहता हो और जो शोथ सर्वांग में
व्याप्त हो वह असाध्य है ।
शोथ के उपद्रव—वमन, श्वास, अरुचि, तृष्णा, ज्वर, अतीसार शोथ के
ये सात उपद्रव है ॥ १५ ॥
अहीनमांसस्य य एकदोषजो नवोऽबलस्तस्य सुखः स साधने ।
निदानदोषर्तुविपर्ययक्रमैरूपाचरेन् त बलदोषकालवित् ॥१६॥
साध्य शोथ—जिसका मास हीन न हो, कृश न हो ऐसे बलवान् व्यक्ति का,
शरीर के एक भाग मे उत्पन्न, नवीन शोथ ( जो देर का उत्पन्न न हुआ हो ),
सुखसाध्य हैं । रोगी और रोग के बल, दोष तथा काल को समझने वाले वैद्य को
चाहिये कि वह कारण, दोष, ऋतु (काल) के विपरीत क्रम से चिकित्सा करे॥१६॥
अथामजं लङ्घनपाचनक्रमैर्विशोधनैरुल्बणदोषमादितः ।
शिरोगतं शीर्षविरेचनैरथोविरेचनैरूर्ध्वहरैस्तथोर्ध्वजम् २ ॥ १७ ॥
उपाचरेत् स्नेहकृतं विरूक्षणः प्रकल्पयेत्स्नेहविधि च रूक्षजे ।
विबद्धविट्केऽनिलजे निरूहणं घृतं तु पित्तानिलजे सतिक्तकम् ॥ १८ ॥
पयश्च मूर्च्छार्तिदाहतर्षिते विशोधनीये तु समृत्रमिष्यते ।
कफोत्थितं क्षारकटूष्णसंयुतैः समूत्रतक्रासवयुक्तिभिर्जयेत् ॥ १६ ॥
आमजन्य सर्व शरीर मे व्याप्त शोथ मे यदि दोष अल्प हो तो लङ्घन और
पाचन क्रम से चिकित्सा करे । यदि दोषो की प्रबलता हो तो शोधन द्वारा दोषों
को निकाल दे । शिरोगत शोथ मे शीर्ष विरेचन, अधोभाग मे स्थित शोथ मे
विरेचन, ऊर्ध्व भाग मे स्थित शोथ मे वमन देवे, स्नेहजन्य शोथ मे विरूक्षण
क्रिया और रूक्षजन्य शोथ मे स्नेहन क्रिया करे । वातजन्य शोथ मे मलावरोध
हो तो निरूहण-बस्ति दे पित्तजन्य और वातजन्य शोथो मे तिक्तक घृत दे ।
पित्तजन्य शोथ मे यदि मूर्च्छा, बेचैनी, दाह और प्यास हो तो दूध पीवे । यदि
रोगी शोधन के योग्य हो तो दूध को मूत्र के साथ देवे । कफजन्य शोथ मे क्षार,
कटु, उष्ण वस्तुओ से मिला कर मूत्र, तक्र ( छाछ ) और आसवो का उप-
योग करे ॥ १७-१६ ॥
१ उपद्रवो के लिये देखिये ( चरक० सू० अ० १८ ) ।
२ 'रूध्वमधस्तथोर्ध्वगम्' इति च पाठ ।
४६४ चरकसंहिता [ अ० १२
ग्राम्यानूपं पिशितलवणं १ शुष्कशाकं नवान्नं
गौडं पिष्टं दधि तिलकृतं विज्जल मद्यमम्लम् ।
धाना वल्लूरमशनमथो गुर्वसात्म्यं विदाहि
स्वप्नं रात्रौ श्वयथुगदवान् वर्जयेन्मैथुनं च ॥ २० ॥
अपथ्य—शोथ रोगी को चाहिये कि ग्राम्य पशुओ (बकरी, गाय आदि)
का मास जलचर प्राणियो ओर अनूप स्थान मे रहने वाले भैस, सूअर आदि
का मास, नमक, शुष्क शाक, नूतन अन्न, गुड से बनी वस्तुएँ, पिष्टान्न, दधि,
कृशरा (तिल-तण्डुल), पिच्छिल द्रव्य, मद्य, अम्ल, धान (खिले भूने जा ),
शुष्क मास, गुरु, असात्म्य भोजन, विदाहकारक खानपान, दिन म सोना और
मैथुन इन सब का परित्याग करे ॥ २० ॥
चिकित्सा —
व्योषं त्रिवृत्तिक्तकरोहिणी च लायोरजस्का त्रिफलारसेन ।
पीता कफोत्थं शमयेत्तु शोफं मूत्रेण गव्येन हरीतकी वा ॥ २१ ॥
(१) त्रिकटु (सोठ, मरिच, पिप्पली), निशोथ, कुटकी इनके चूर्ण का
लोह-भस्म और त्रिफला क्वाथ के साथ पीवे, अथवा गोमूत्र के साथ हरड लेने
से कफजन्य शोथ शान्त होता है ॥ २१ ॥
हरीतकीनागरदेवदारुसुखाम्बुयुक्तं सपुनर्नवं वा ।
सर्वं पिबेत् त्रिष्वपि मूत्रयुक्तं स्नातश्च जीर्णे पयसाऽन्नमद्यात् ॥ २२ ॥
(२) हरड, सोंठ, देवदारु और पुनर्नवा इनके चूर्ण को गरम पानी से
पीवे । यह योग वात आदि तोनो शाथो मे उपयुक्त है । अथवा इन सब चूर्ण
को गोमूत्र के साथ पीवे । औषध के जीर्ण होने पर गरम पानी से स्नान करके
दूध के साथ अन्न खावे ॥ २२ ॥
पुनर्नवानागरमुस्तकल्कन्प्रन्थेन धीरः पयसोऽक्षमात्रान् ।
मयूरकं मागधिका समूलां सनागरा वा प्रपिबेत्सवाते ॥ २३ ॥
(३) धीर अर्थात् निवृत्त आम दोष वाला शोथ-रोगी वातजन्य शोथ मे
पुनर्नवा, सोठ, मोथा इनके चूर्ण की एक कर्ष मात्रा दूध के साथ लेवे । अथवा
मयूरक (अपामार्ग ), मागधिका (पिप्पली), पिप्पलीमूल और सोठ इनके
चूर्ण की एक कर्ष-मात्रा को दूध के साथ पीवे ॥ २३ ॥
१ लवण के स्थान पर 'अबलम्' पाठ भी है। वहाँ पर निर्बल प्राणि का
मास त्याज्य समझना चाहिये ।
अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४६५
अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४६५
दन्तीतृवृत्त्र्यूषणचित्रकैर्वा पयः शृतं दोषहरं पिबेन्ना ।
द्विप्रस्थमात्रं च पलार्धिकैस्तैरर्धावशिष्टं पवने सपित्ते ॥ २४ ॥
(४) वातजन्य और पित्तजन्य शोथ मे-दन्ती, निशोथ, सोठ, मरिच,
पिप्पली और चीता इनके चूर्ण के साथ दूध पका कर पीवे । दन्ती आदि
प्रत्येक का आधा २ पल लेकर दूध दो प्रस्थ पकावे । जब आधा रह जाये
तब इस दूध को पिये यह दूध दोषनाशक है ॥ २४ ॥
सशुण्ठि पीतद्रुरसं प्रयोज्यं श्यामोरुबूकोपषणसाधितं वा ।
त्वग्दारुवर्षाभूमहौषधैर्वा गुडूचिकानागरदन्तिभिर्वा ॥ २५ ॥
(५) चार योग—(१) साठ, पीतद्रु (हल्दू) इनके क्वाथ से साधित
दूध । (२) श्यामा (निशोथ), एरण्ड इनको मूल और ऊषण (मरिच)
इनसे साधित । (३) दालचीनी, देवदार (या दारुहल्दी), पुनर्नवा और
सोठ इनसे साधित दूध । (४) गिलोय, सोठ और दन्ती इनसे साधित दूध
वातजन्य और पित्तजन्य शोथ मे पीना चाहिये । प्रत्येक द्रव्य आधा पल, दूध
दो प्रस्थ जब आधा रह जाये तब प्रयोग करे ॥ २५ ॥
सप्ताहमौष्ट्रं त्वथवाऽपि मासं पयः पिबेद्भोजनवारिवर्जी ।
गव्यं समूत्रं महिषीपयो वा क्षीराशनं मूत्रमथो गवा वा ॥२६॥
(६) भोजन और पानी छोड़ कर सात दिन तक अथवा एक मास तक
केवल ऊटनी का दूध पीवे । अथवा गाय का मूत्र और भैंस का दूध पीवे
अथवा केवल गाय या भैंस के दूध वा मूत्र पर ही गुजारा करे ॥ २६ ॥
तक्रं पिबेद्वा गुरुभिन्नवर्चाः सव्योषसौवर्चलमाक्षिकं वा ।
गुडामया वा गुडनागरां वा सदोपभिन्नामविबद्धवर्चाः ॥ २७ ॥
(७) शोथ रोगी को अतिसार और भारीपन हो तो सोठ, मरिच, पिप्पली,
संचल नमक और शहद के साथ तक्र (मठा) पीवे । यदि रोगी का दोष के
कारण या आम से युक्त मल आता हो तो हरड़ और गुड को समान मात्रा मे
अथवा सोठ और गुड को समान भाग मे लेकर खावे ॥ २७ ॥
विड्वातसङ्गे पयसा रसैर्वा प्राग्भुक्तमद्यादुरुबूकतैलम् ।
स्रोतोविबन्धेऽग्निरुचिप्रणाशे मद्यान्यरिष्टांश्च पिबेत्सुजातान् ॥२८॥
(८) यदि वायु और मल का अवरोध हो तो भोजन से पूर्व मास रस या
दूध के साथ एरण्ड तैल पीवे । स्रोतो के रुकने पर, जाठराग्नि मन्द और भोजन
की इच्छा न हो तो अच्छी प्रकार बने अरिष्टो का पान करे ॥ २८ ॥
गण्डीरभल्लातकचित्रकाश्च व्योषं विडङ्गं बृहतीद्वयं च ।
द्विप्रस्थिकं गोमयपावकेन द्रोणे पचेत्कूर्चिकमस्तुनस्तु ॥ २९ ॥
४६६ चरकसंहिता [ अ० १२
त्रिभागशेषं तु सुपूतशीतं द्रोणेन तत्राकृतमस्तुना च।
सितोपलायाश्च शतेन युक्तं लिप्ते घटे चित्रकपिप्पलीभ्याम् ॥३०॥
वैहायसे स्थापितमादशाहात्प्रयोजयस्तद्विनिहन्ति शोफान् ।
भगन्दराशः क्रिमिकुष्ठमेहान्वैवर्ण्यकार्श्यानिलहिक्कनं च ॥ ३१ ॥
इति गण्डीराद्यरिष्टः ।
(६) गण्डीराद्यरिष्ट—गण्डीर (रामठ), भलावा, चित्रक, सोंठ, मरिच,
पिप्पली, बडी आर छोटी कटेरी के फल प्रत्येक दो प्रस्थ काटकर छोटे २ टुकड़े
कर लेवे। कांजी और मस्तु का एक द्रोण लेकर उपलो की आग पर पकावे।
जब एक तृतीयांश रह जाय तब वस्त्र से छान कर शीतल कर ले। उसमे प्राकृत
मस्तु (दधि मस्तु) का एक द्रोण और मिश्री १०० पल मिला देवे। फिर
चित्रक और पिप्पली का बडे से लेप करके उस घट मे इसको रख दे। फिर
इस घडे को दस दिन तक खुले आकाश मे लटकते हुए छिके पर रख देवे।
पीछे से जब इसमे गन्ध आ जाये तब इसको बरते। इस अरिष्ट के प्रयोग से
भगन्दर, शाफ अर्श, कमि, कुष्ठ, प्रमेह, विवर्णता, कृशता ओर वातज हिचकी
नष्ट होती है१ ॥ २६-३१ ॥
काश्मर्यधात्रीमरिचाभयाना द्राक्षाफलाना च सपिप्पलीनाम् ।
शत शतं क्षौद्रगुडात्पुराणात्तुला तु२ कुम्भे मधुना प्रलिप्ते ॥ ३२ ॥
सप्ताहमुष्णे द्विगुणं तु शीते स्थितं जलद्रोणयुतं पिबेन्न। ।
शोफान्विबन्धन्कफवातजांश्च स हन्त्यरिष्टोऽष्टशतोऽग्निकृच्च ॥ ३३ ॥
इत्यष्टशतोऽरिष्टः ।
(१०) अष्टशतारिष्ट—गम्भारी, आवला, मरिच, हरड़, बहेड़ा, द्राक्षा
इनके फल और पिपली प्रत्येक सो, पुराना क्षुद्रगुड़ (राब) १ तुला (१००
पल) इनको एक द्रोण पानी मे मिलाकर मधु से लिपे हुए घडे मे डाल कर
ग्रीष्म-ऋतु मे सात दिनों तक और शीत ऋतु मे १५ दिन तक रख देवे३।
१ अष्टागसंग्रह मे यही योग भल्लातकारिष्ट के नाम से दिया है उसमे
गण्डीर का योग नही है —
'भल्लातकचित्रकविडङ्गबृहतीफलानि पृथग् द्विप्रस्थाशान्यच्छधान्याम्व्ळद्रोणे
गोमयाग्निना पक्वमित्यादि । २ 'जीर्णगुडात्तुलाच सक्षुद्र' इति पाठः ।
३ वाग्भट में—त्रिफलामरिचद्राक्षापिप्पलीकाश्मर्यफलानां प्रत्येक शतं गुड-
तुलामूदकद्रोण च मधुलिप्तभाजनस्थ सप्ताहमुष्णे काले धारयेत् ॥ (अष्टागसग्रह,
चिकि० १६) ।