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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

हमारी यह देह पंचभूतात्मक है वैसे ही पंचकोशोंसे बनी है। यह स्थूल देह अन्नमयकोशसे बनी है। इस देह पर अभिमान करनेवाले जीवको विश्व कहते हैं। इस शरीरकी सब ज्ञानेंद्रियां बुद्धिशक्ति और कर्मेंद्रियां क्रियाशक्तिसे चलती हैं। ये दोनो शक्तियां समान भावसे अंतःकरणमें रहती हैं। सभी इंद्रियां स्थूल देहके आश्रयसे रहती हैं ऐसा दीखनेपर भी, वास्तवमें ये स्थूल देहका अंश नहीं होती। लिंगदेह जब शरीर छोड़कर जाता है तब ये इंद्रियां स्थूलदेहमें नहीं रहतीं। स्थूलदेहको ही आत्माका भोगायतन कहते हैं। इसी शरीरके सहारे आत्मा पूर्व-कर्मको भुगतता है। बिना देह-संबंधके जीवका कर्तृत्व और भोक्तृत्व व्यर्थ है। स्थूल देहसे मुक्त आत्मा ही कर्ता अथवा भोक्ता हो सकता है। अविद्याके कारण जीवको देहाभिमान होता है। ज्ञानसे अविद्याका क्षय होनेकेबाद यह देहाभिमान नहीं रहता। पांच कर्मेंद्रिय, पांच ज्ञानेंद्रिय, पंच प्राण मन और बुद्धि इन सत्रह तत्त्वोंसे सूक्ष्म देह होता है। प्राणमय कोश, मनोमय कोश तथा विज्ञानमय कोशसे यह बनता है। इस सूक्ष्म देहको लिंग- देह भी कहते हैं। यह लिंगदेह तेजसूका अंश होता है। काष्ठोंमें जैसे अग्नि होता है वैसे यह लिंगदेह होता है। स्थूल देहमें लिंगदेहका तेज व्याप्त होता है। किसीका लिंगदेह विशुद्ध नहीं होता। यह संस्कार और वासनाओंके बोझसे दबा रहता है। मृत्युके समय जो भाव बलवत्तर होते हैं वे अपने पूर्ववर्ती भावोंको अपनेमें मिला लेते हैं। इसलिए मृत्यु समयके संस्कारके अनुसार अगले जन्मकी गति मिलती है। इस लिंगदेहाभिमानी जीवको तेजस् कहते हैं। और ऐसे सभी लिंगदेहोंपर अभिमान करनेवाले तत्त्वको हिरण्यगर्भ । इसी लिंगदेहके पीछे, उसके आश्रयरूप कारण देह होता है। कारणदेहको अनादि अविद्या कहा गया है। यही अविद्या स्थूल और सूक्ष्मदेहका कारण है। ज्ञानसे वह नष्ट होती है इसलिये उसको देह कहा गया है। इस पर अभिमान रखनेवाले जीवको प्राज्ञ कहा गया है। सभी कारण देहोंपर अभिमान रखनेवाला तत्त्व, मायोपाधिक देवता, ईश्वर कहलाता है। कारण देह पंचकोशोंमेंसे आनंदमयकोशका है। ब्रह्म विद्याके प्रभावसे जब तक यह कारणदेह नष्ट नहीं किया जाता तब तक मुक्ति नहीं मिलती। इन सभी देहोंको विकार रहित करना ही देहसिद्धि कहलाती है। भारतके प्राचीन ग्रंथोंमें इस देह सिद्धिके अनेक प्रकार कहे गये हैं। प्राचीन रसायन शास्त्रियोंने अठारह संस्कारोंसे संस्कृत पारदसे देह सिद्धिकी बात कही है तो पांतजल ऋषिने भूतजयसे देह सिद्धिकी प्रक्रिया कही है। गोरखनाथ और तांत्रिक बौद्धोंने भी देह सिद्धिकी अनेक बातें कही हैं। प्राचीन ग्रंथोंमें शुक्राचार्य, जालंदरनाथ, गोविंदभगवत्पादाचार्य आदि पुरुषोंको देहसिद्धि हुई थी ऐसा कहा गया है। मनुष्य देहसिद्धि होनेके बाद नित्य कौमार्यावस्थामें रहता है। न उन्हे वृद्धावस्था घेरती है न कोई विकार छूता है। प्राचीन ग्रंथोंमें ऐसे ही लोगोंको चिरजीवी कहा है। अश्वत्थामा, बली, व्यास, हनूमान, विभीषण, कृप, परशुराम, मार्कांडेय, इन लोगोंकों चिरजीवी कहा गया है। कल्पांतमें इन चिरजीवियोंके शरीर नष्ट होते हैं। अर्वाचीन कालके कुछ महायोगियोंने आत्माकी भांति शरीर भी अमर हो सकनेकी बात कही है। सारा विश्व सोम-कलासे उत्पन्न होता है और अग्नि उसका भक्षण करता है। सोमकला जब अग्नीसे भी प्रबल होती है तब देह कल्पांत तक टिकते हैं। सोमपानसे सोमकला प्रबल होती है ऐसी बात वेदमें भी कही गयी है। १४५ परिशिष्ट ५

अमरत्व प्राप्त होने पर भी देहतत्व पर संपूर्ण स्वामित्व प्राप्त करनेके प्रथम देहातीत जीवन्मुक्ता- वस्था पाना असंभव है । इसके लिए शरीरभावका त्याग करके सहज भावमें रहना आवश्यक है । सामान्यतया कुछ संतोंने देहकी निंदा करते हुए यह रक्त और मांसका पिंड है, अस्थियोंका पंजर है, मलमूत्रकी खान है, आदि कहा है किंतु यजुर्वेदमें कहा है । सात ऋषि रहते शरीरमें रक्षा करते हैं अप्रमाद हो । सात ऋषि हैं ये जल प्रवाह जाते निद्रिस्यके स्थान तक जो ॥ निद्रिस्यकी रक्षा करते हैं दो देव इस देह यज्ञ शालाकी ॥ इस मंत्रका अर्थ करते समय वेदाचार्योंने कहा है दो आंखें, दो कान, नाकके दो रंध्र, एक मुख ये ही सप्त ऋषि हैं। ये सदैव ज्ञानग्रहण करते हैं इसलिये ऋषि हैं । ये ही ज्ञानग्रहणके देह-यज्ञशाला-की रक्षा करते हैं। जागृतावस्थामें ये सातों बहिर्मुख होते हैं और निद्रावस्थामें अंतर्मुख होते हैं । इनकी इस अंतर्मुखताके कारण निद्रित शरीरको आनंद मिलता है । निद्रावस्थामें भी जो दो देव इसकी रक्षा करते हैं ऐसा कहा है वे दो देव हैं प्राण और अपान ! यदि वे दो निद्रित हो गये तो देह समाप्त होगा ! इसी प्रकार अथर्ववेदमें भी कहा है । आठ चक्र नव-द्वारकी यह काया देवोंकी अयोध्या नगरी । इसमें है सुवर्णमय कोष वही तेजसे भरा स्वर्ग-लोक । उस सुवर्णमय कोशका है जो तीन पर तीनका आधार । इसमें रहता है आत्मयक्ष इसे जानता वह ब्रह्म ज्ञानी ॥ आठ चक्र=(१) मूलाधारचक्र (२) विशुद्ध (३) मणिपूर (४) स्वाधिष्ठान (५) अनाहत (६) आज्ञाचक्र (७) सहस्रारचक्र (८) ब्रह्मरंध्र । नवद्वार=दो आंखे, दो कान, नाकके दो रंध्र, एक मुख, एक गुदद्वार, एक मूत्रद्वार । तथा इसके आधारभूत देवता कानके देवता दिशा, आंखका सूर्य, मुखका अग्नि, हृदयका चंद्रमा इस प्रकार शरीरके आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, एक इंद्र, एक प्रजापति ऐसे ३३ देवता हैं । इसीलिये यह स्वर्ग लोक है । इसीलिये संतोने भी इसको “अस्थिपंजर रक्तमांसका पिंड, मलमूत्रकी खान” आदि कहने पर भी “चौरासी लाख फेरे फिर कर सुंदर नरतनु पाया” कह कर इसकी महती गायी है । मानवदेह पंच भूतात्मक है, नश्वर, नाश होनेवाला है, इस पर भरोसा नहीं कर सकते फिर भी सारे साधनोंका एक मात्र यही आधार है । इहलोक अथवा परलोकके ध्येयकी प्राप्तिके एक मात्र साधन यही है । बिना इसके सारा निरर्थक है । सारे देहमें मानव देह उत्तम है । इसीमें पुरुषोत्तम बसा है । यह कह कर संत इसका सदुपयोग करनेके लिये कहते हैं । हमारे पुराने ग्रंथोंमें कहा है :— मनुष्यत्व मुमुक्षुत्व तथा सज्जन साथ जो । देवानुग्रहसे प्राप्त ये तीन सिद्धि दुर्लभ ॥ यह जो देह मिला है वह पाप पुण्य करनेके लिये नहीं किंतु पाप पुण्यका अतिक्रमण करके जैसा वह (ब्रह्म) पूर्ण है ऐसा यह भी (देह भी) पूर्ण है इसका अनुभव करने के लिये है । इस पूर्णत्वका अनुभव ही इसकी कृतार्थता है । ज्ञानेश्वरी १७६

देहभाव-देहाहंता देहतादात्म्य—देह ही मैं हूं इस भावनासे रहना। देहसे एकरूप होकर अस्वाभिक सुखदुःखादि द्वंद्वोंसे उलझे रहना। जीव इसका दृष्टा है। साक्षी है। स्वामी है। किंतु संस्कार वश वह देह ही मैं हूं ऐसे मान कर रहता है। इस भावको देहतादात्म्य कहा जाता है। यही देहाहंता है। आत्मानारम विवेकसे यह नष्ट होता है और मैं देहसे भिन्न हूँ इसका बोध होता है। यही सहजभाव है। द्वंद्व-द्वंद्वबंध—वस्तुतः जो सत्य नहीं है ऐसे भासमान परस्पर विरोधी अनुभव। इसका आधार द्वैत है। यह सारे द्वंद्व परस्पर विरुद्ध जोडी जोडीसे भासते हैं। इससे मनुष्य स्वभाव, अथवा अपनी सहजावस्था भूल जाता है। उस द्वंद्वोंमें बंध जाता है। इन द्वंद्वोंसे परे जाना ही सहजावस्थामें लीन होना है। द्वंद्वातिक्रमण चिर आनंद है। ये द्वंद्व हैं-जैसे जड, चेतन, पुरुष-प्रकृति, प्रपंच-परमार्थ, प्रकाश-अंधकार, राग-द्वेष, सुख-दुःख, शीत-उष्ण, धर्म, अधर्म, पाप पुण्य, ज्ञान अज्ञान, लाभ-हानि, निंदा-स्तुति, मान-अपमान, जय-पराजय, शत्रु, मित्र सज्जन-दुर्जन, सत्-असत् आशा-निराशा, शाप-आशीर्वाद प्रवृत्ति-निवृत्ति, त्याग-भोग, हिंसा-अहिंसा, हर्ष, शोक प्रेम-वैर, नीति, अनीति, शुभ-अशुभ, सम-विषम, विधि-निषेध नित्य-अनित्य, व्यष्टि- समष्टि, विवेक-अविवेक, विचार-विकार, जन्म-मरण, बंध-मोक्ष उत्क्रांति, अपक्रांति, पुरोगामी प्रतिगामि, मंगल-अमंगल, नया-जुना, अपेक्षा उपेक्षा, जीवन-मरण, विकास-विनाश आदि आदि। ये द्वंद्व सदैव सापेक्ष अथवा साहचर्यसे रहते हैं। यह देहभावके कारण होते हैं। आत्मभावमें ये लय हो जाते हैं। इस स्थितिको द्वंद्वातीत अवस्था कहते हैं। द्वैत—जीव, जगत तथा परमात्मानें भेद भाव है। जीव जगत यह सत्य है। दीखने- वाली सभी भिन्नताएं, विविधताएं सत्य हैं। (१) जीव- शिव भेद; (२) जीव-जीवमें भेद (३) जीव-जडमें भेद (४) जड-जडमें भेद (५) और जड तथा परमात्मानें भेद ये पांच प्रकारके भेद-द्वैत- सत्य हैं। विश्वकी इस विविधताको सत्य माननेवाला विचार द्वैत है। धर्म—जैसे आजकलके विद्वान, अंग्रेजी रिलिजन शब्दके अर्थमें भारतीय धर्म शब्दका प्रयोग करते हैं वैसे धर्म शब्दका अर्थ नहीं है। अंग्रजी रिलिजन शब्द धर्म शब्दका अर्थ नहीं दे सकता। 'धर्म शब्द संस्कृतके जिस धातुसे बना है उससे तो जो लोगोंको धारण करता है, उठाता है अथवा पुण्यारमाओंसे जो धारण किया जाता है वह धर्म है किंतु यह शब्द इतने प्राचीन कालसे चला आया है, इससे विद्वान विचारकोने इस पर इतना अधिक लिखा है कि धर्मका अर्थ और भाव एक सागरकी तरह लहरें मारता जाता है। साथ ही साथ भारतीय जनजीवनमें वह इतना ओतप्रोत हो गया है कि आधुनिक विदेशी आधार विचारोंके तज्ञ किंतु भारतीय जीवन परंपरासे बिलकुल अनभिज्ञ, तथाकथित, स्वयंभामन्य, पुरोगामी लोगोंके लाख कहने पर भी जनजीवन पर उनके कहनेका कोई गहरा और स्थायी प्रभाव नहीं पडता। भले ही प्रलोभन और धमकियोंके सम्मुख, उनका भावावेग कुछ दब जाता है और नित नये दंभको जन्म देता है। धर्म उतना उथला भाव नहीं है कि कुछ तथाकथित युग-निर्माताओंकी लेखनीके एक फटकारसे जन-जीवनसे उठ जाय। वह वैदिक कालसे भारतीय जन-जीवनमें घरकर गया है। उनके १४७ परिशिष्ट ५

श्वास निश्वास और हृदयकी धडकनके साथ समरस हो गया है। ऋग्वेदमें कमसे कम ५६ से अधिक बार यह शब्द आया है और जीवनके कई अंगोंका आधार बन गया है। एक जगह ऋग्वेदमें गाया गया है— इससे सारे दिव्य लोकोंके साथ भूलोक व्याप्त है ॥ इसके लिये देवोंने भी स्तवन रच दिये हैं ॥ इसके नियमोंसे भूम्याकाश संभले हुए हैं ॥ न कभी इसका क्षय होता है न इसकी उर्वरता घटती है। इसके बाद उपनिषदकाल तक अनेक परिवर्तन होने पर भी उपनिषद कहते हैं "धर्म चर !" और गीता "स्वधर्मे निधनं श्रेयः" कहती है। और जैमिनी अपने सूत्रमें "उपदेशसे, आज्ञासे, या विधिसे ज्ञान होनेवाला श्रेयस्कर क्रिया ही धर्म" कहता है तो महाभारतमें भगवान व्यास कहते हैं "जो विश्वको धारण करता है वह धर्म है। धर्म प्रजाको धारण करता है जो धारण सह है वह धर्म है!" उसके साथ अणुवादी वैशेषिक "जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस होता है वह धर्म" कहता है। अभ्युदय और निःश्रेयसका अर्थ लौकिक उत्कर्ष और पारलौकिक सुख है। वैशेषिक अणुवादी दर्शनकार हैं। उनके मतसे धर्म कोई बाह्य आचार नहीं है किंतु मानव पर होनेवाला शुभ संस्कार है। वैशेषिक दर्शनके अनुसार निःश्रेयस जीवनका उच्चतम सुख है। अर्थात धर्म निम्नसे-अभ्युदय-उच्चतम सुख तक जीवन पर शुभ संस्कार करनेवाला साधन है। सुख और धर्मसे संबंध जोडकर दिखानेवाले ऐसे अनेक वाक्य मिल सकते हैं। दक्ष स्मृतिमें तो— चाहते सुख सभी लोग धर्मसे उत्पन्न है सुख। इससे धर्म कर्म नित्य करना अवश्य यत्नसे ॥ वैसे ही मनुस्मृतिमें— अधर्म प्रसवता है दुःख ही देहधारिको। तथा प्रसवता धर्म सुख संयोग अक्षय ॥ कहा है। इसीलिये धर्म साधनाको ही पुरुषार्थ कहा गया है। अधर्मसे प्राप्त होनेवाले निम्न तर सुखोंको त्याज्य माना गया है। निम्नसे उच्च, उच्चसे उच्चतर और उच्चतरसे उच्चतम सुख प्राप्तिका प्रयास करना ही पुरुषार्थ है। एक व्यक्तिके अधर्मसे समाजको भी दुःख अनुभव करना पड सकता है एक मनुष्य अपने निम्न तर सुखकी अपेक्षासे समाजका अहित कर सकता है इसलिए "अधर्म प्रवृत्ति के संकोचके लिये" दंड भयकी आवश्यकता भी अनुभव की गयी है। साथ साथ उच्चतर सुखोंका विचार करते हुए "सुखका अर्थ वासनाका अभाव, जब सुखानुभव होता है तब कोई वासना नहीं होती ! ऐसा कहकर वासनाके अभावके कारण बताये हैं। (१) वासनापूर्ति (२) या वासनाका उत्पन्न ही नहीं होना (३) चित्तकाग्रतासे वासना विलोपसे वही सुख मिलेगा जो वासना पूर्तिसे । यह दार्शनिकोंका मंतव्य है। इसलिये उन्होने वासना विलोपका शास्त्र ही बना दिया है। वासनाविलोपसे जो कर्म होंगे वे परार्थ भावसे होंगे। समाजके परस्पर सहाय्यार्थ होंगे। ज्ञानेश्वरी १७८

वहां “व्यक्तिगत स्वार्थ या व्यक्तिगत वासना पूर्तिके भाव नहीं होंगे !” वासना विलोपसे होनेवाले कर्म ही निष्काम कर्म होंगे। वासना विलोपसे होनेवाले कर्म ही “सच्चे अर्थमें” समाज हितके कर्म होंगे। जो कर्म व्यक्तिके वासना पूर्तिके कर्म हैं उससे समाज हितकी गुंजाइश कमसे कम होती है। इसीलिए अभ्युदयके साथ-भौतिक वैभवके साथ-निःश्रेयस, वासना विलोपकी आवश्यकता है। निःश्रेयसके अभावमें केवल अभ्युदय, व्यक्तिगत वासना पूर्तिके सुखका साधन बननेसे, परार्थ अथवा समाजहितके सभी कार्य केवलमात्र दंभ बन कर रह जायेंगे। तभी महात्मा गांधी जैसे आधुनिक विचारकों ने “बिना धर्मकी राजनीति प्रजाके गलेमें फांसी !” कहा था। यहां धर्मका अर्थ निःश्रेयस अथवा वासना विलोपका अभाव है। भारतीय विचारकों ने, इसी दृष्टिसे जीवनमें विविध परंपराओंका जो निर्माण और प्रचलन किया वह “धर्म” नामसे प्रचलित हुआ ! इस धर्मप्रथाओंमें कहे जानेवाले मंत्र सदैव इसके पीछे जो उद्देश्य हैं उस ओर इंगित कहते हैं। उदाहरणके लिये-अथर्ववेदका यह मंत्र देख सकते हैं:— व्रत चलायें पुत्र पिताका मातासे हो वह सम चित्त । पत्नी बोले मृदु सुख वाणी गृह बने सदा शांति धाम । न करे द्वेष भाई भाईका तथा भगिनि भी कभी कहीं ॥ सहायक बनो परस्पर सम व्रत हो मंगल वाणी ॥ वर्णव्यवस्थाके उद्देश्यमें भी “परस्पर सहायता” है। परस्पर पूरक होकर समाज हित साधना धर्मका एकमेव उद्देश्य है। यज्ञ और दान राजा-प्रजा, गुरु-शिष्य, स्वामी-सेवक, पति-पत्नी, पिता-पुत्र आदिके परस्पर संबंधोंका जो सुंदर विवेचन देखनेको मिलता है वह आश्चर्य जनक है। यह सारा निःश्रेयस प्रधान है। “परस्पर पूरक भावनाका धर्म सिद्धांत” अत्यंत मौलिक और महत्वपूर्ण है। वह सामूहिक शांति समाधानका साधन है। दूसरेके सुखकी अवहेलना करके अपने सुखका विचार करना अधर्म है। दूसरेके सम्मानकी अवहेलना करके अपने सम्मानका विचार करना अधर्म है। इसीलिए “सर्वे सुखिना संतु” की प्रार्थना है। महाभारतमें एक स्थान पर धर्मका रूप समझाते हुए कहा है— सर्व हित रत जो है सबका रहता मित्र । मन कर्मवचनसे जानता है वही धर्म ॥ परस्पर हितका विचार करके महाभारतमें धर्म अधर्म जाननेकी जो उत्तम कसौटी कही है वह आज भी आदर्श कही जा सकती है- “अपने लिये जो अच्छा नहीं लगता, दुःखकारक लगता है ऐसा बर्ताव दूसरोंके साथ नहीं करना चाहिए। यही धर्मका सार-तत्व है। जो इसके विरुद्ध व्यवहार करता है वह “वासनामूलक” करता है !” इसी व्यवहारको अध्यात्मवादी “आत्मौ- पम्यबुद्धि” कहते हैं। ऋग्वेद कालसे लेकर आज तक धर्माधर्मका पर्याप्त विवेचन किया गया है। समय समय पर जो घटनायें होती हैं उससे निर्माण होनेवाली समस्याओंको सुलझाते समय भी-यह धर्म यह अधर्म ऐसा बता कर अधर्मका विरोध किया हुआ मिलता है। ऐसे प्रसंग असामान्य प्रसंग हैं। वे सबके सामने नहीं आते। इसलिये सर्व सामान्य लोगोंकी दृष्टिसे “नित्य आत्म-सुखकी चाह, अन्य सुखके विषयमें विरक्ति, भूतमात्रोंमें करुणा, करुणामय परोपकार भाव, परस्पर सहाय १४९ परिशिष्ट ५

भावनाका विकास, कमसे कम हिंसा, सुखस्वरूपका ज्ञान, सबके सुखपर दृष्टि, सत्प्रवृत्त उद्योग, तथा सिद्धि असिद्धिमें सम भावना इनको धर्मके अंग माने हैं तो किसीने-संतोष, क्षमा, मनःसंयम, अशौच, अंतर्बाह्य पावित्र्य, इंद्रिय-निग्रह, तत्वजिज्ञासू बुद्धि, आत्मज्ञान, सत्य, अक्रोध इन दस गुणोंको धर्मके लक्षण माना है। इसके साथ किसीने दान, निषिद्ध विचारोंका विस्मरण, चित्तकी स्थिरता-वासना विलोपकी साधना-आदि अन्य कुछ गुण कहे हैं। बौद्ध धर्ममें इन गुणोंके साथ अनिंदा, —जो वर्तमान युगमें युग-धर्म है-संयम, हित-मित आहार विहार, चित्तका क्षय-वासना विलोप-भी धर्मके लक्षण माने गये हैं। ये सारे गुण समाज-विकासके लिये अथवा समाजके सामूहिक हितके लिये आवश्यक हैं। बिना इन गुणोंके समाजके सामूहिक हितके लिये आवश्यक "परस्पर सहायताके भाव" की वृद्धि नहीं हो सकती। सबल, शक्तिशाली समाज संघटित नहीं हो सकता। सशक्त समाजका निर्माण नहीं हो सकता। इसलिये धर्मका अर्थ "सशक्त समाज निर्माणके लिये आवश्यक गुणोंका व्यक्तिगत और सामूहिक विकास है।" और अधर्मका अर्थ "सशक्त समाज निर्माणके लिये आवश्यक गुणोंका ह्रास अथवा हनन।" इसीलिये समय समय पर शक्तिशाली नेताओंने "डंडेसे भी" अधर्मका विरोध किया है। इसका नमूना जरासंध कृष्ण संवादमें मिलता है। कृष्ण जरासंधसे कहता है- "हे राजश्रेष्ठ ! कोई भी राजा अन्य सज्जन राजाओंकी हिंसा कैसा कर सकेगा ? तू वह करने जा रहा है। यदि समर्थ इसका विरोध नहीं करेगा तो "तुम्हारा पाप उस समर्थके सिरपर पडेगा !" हम धर्मोचरणी हैं। धर्मका रक्षण करनेमें समर्थ हैं। इसलिये तुम्हारे अधर्मका विरोध करने आये हैं!" भगवान कृष्णसे लेकर महात्मा गांधीतककी यह धर्मपरंपरा है। शस्त्र बल संपन्न भगवान श्रीकृष्णने जरासंधके अधर्म निवारणके लिये उसको युद्धका आव्हान दिया और निःशस्त्र महात्मा गांधीने "धर्महीन अंग्रेजी राज्यके विरुद्ध सामूहिक सत्याग्रहका युद्ध छेड़ा! और घोषणा की धर्म रहित राज्य प्रजाके गलेमें फांसी है !" भारतमें कईबार ऋषियोंने भी यह काम किया है। महात्मा गांधीजीने ऋषिपरंपराका सबल नेतृत्व किया ! ऋषियोंने सदाचारी राजाको प्रेरणा देकर उनसे अधर्मका विरोध किया तो महात्मा गांधीने समग्र जनताको प्रेरणा देकर अधर्मी राज्यका विरोध किया। क्यों कि धर्मानुशासन हो। धर्मानुशासनको महात्मा गांधीजीने रामराज कहा। धर्म किसीकी ओरसे किसी पर थोपी गयी वस्तु या अफीमकी गोली नहीं किंतु मानवी हृदय ही धर्मका उगमस्थान है। मानव कुलने व्यक्तिगत तथा सामूहिक उत्थानके प्रयाससे धर्म भावना, धर्मानुशासन, तथा धार्मिक आचार विचारोंका विकास किया है। धर्म "मानवी हृदयकी गहरी तथा सर्व स्पर्शी" भावना हैं। शाब्दिक कसरत करनेवाला तर्क उस भावना पर यशस्वी आघात नहीं कर सकता। समुदायप्रियता मानवी जीवनकी सहज प्रवृत्ति है। इसीसे मानवकुलका योगक्षेम चलता है। धर्म सामूहिक विचार तथा सामूहिक सामर्थ्यकी आधार शिला है। प्रत्येक मनुष्य जन्मसे मृत्यु तक समाजके "संघ-गर्भमें" जीता है और धर्मके माध्यमसे अपनेमें संघ-शक्तिका अनुभव करता है। जैसे भ्रूण माताके आहारसे जीता और बढ़ता है। प्रत्येक मनुष्य कण कण क्षण क्षणसे संघ-शक्तिका ग्रहण और अनुभव करता है क्यों कि यही उसकी सुरक्षा-भावनाकी नींव है। तथा "परस्पर सहायतासे मानवको संघबद्ध करना ही धर्म-भावनाका मूल उद्देश्य" होनेसे वह मानवी हृदयके सिंहासन पर सहज ही अधिष्ठित हो गया है। मानवी कुलके प्रतिभाशाली, स्फूर्तिसंपन्न, मनीषी, महापुरुषोंने साक्षात्कार, समाधि, निरालंब शाश्वत सुख, आदि बातोंसे जो सामान्य लोगोंके विचारकी सीमामें भी नहीं जाती धर्म-भावनाको बिना ओर छोरके अमर्याद् चैतन्यसे भर दिया है। ज्ञानेश्वरी १५०

इससे इन महापुरुषोंके अनुयायियोंको जीवनमें एक समाधान मिलता है । सांसारिक तापत्रयमें झुलसनेवाले हृदयको एक सांत्वना मिलती जो दूसरे किसीसे नहीं मिलती । इसलिये धर्म-भावनामें तथा धर्म-संस्थाको असामान्य उन्नत सामर्थ्य प्राप्त हो गया है । साथ ही साथ मानवी जीवनमें कल्याणरूप, सर्वहितकारक, इष्ट तथा मंगलमय ऐसा जो जो कुछ संभव है वह सब प्राप्त करादेनेका दायित्व भी धर्म ही लेता है ! मानवी जीवनका अभ्युदय,=प्रार्र्पचिव वैभव तथा निःश्रेयस वासना विक्षोपजन्य निरालंब सुख दोनोंका आधार धर्म ही है । मानव-मात्रके लिये यह अत्यंत महत्त्वका है । साध्य और साधनाकी एकतासे बह जितना प्रभाविन होता है उतना और किसीसे नहीं । पुरुषार्थमें, मोक्षके साथ कामार्थको भी समान स्थान देकर, धर्मने मानव मात्रको अपना अनुयायी बना लिया है साथही साथ धर्मका अविरोधी काम परमात्माकी विभूति मान कर तो उन्मुक्त कामको धर्मकी राससे बांध दिया ! इस प्रकार मानवके सर्वांगस्पर्शी विकासके लिये जिन जिन बातोंकी आवश्यकता है उन उन सबको परस्पर सहायताके लिये आवश्यक सीमामें सीमित कर, जीवन रत्नको धर्मके जड़ावमें सुशोभित कर दिया है । इसीलिये मानवी इतिहासमें जहांतक हमारा ज्ञान जाता है, पिछले दस हजार वर्षके इतिहासमें, विश्वके मानव-कुलके हृदय और मस्तिष्क पर धर्मने अमर्याद स्वामित्व प्रस्थापित किया है क्योंकि वह मानव कुलको प्रतिज्ञापूर्वक आश्वासन देता है “ संपूर्ण जीवन, तथा उसके मूलमें जो शक्ति है उस ब्रह्मका रहस्य मैं तुम्हें खोलकर कह दूंगा । साथ ही साथ सामान्य प्रापंचिक सुखसे परम कल्याणकारी निरालंब शाश्वत सुख तक मैं ही अनुभव कर दूंगा !!” धर्मकी इसी प्रतिज्ञा पर विश्वास करके विश्वके मानव कुलने अनंत कलाओंकी सुंदर सुरभित पंखुरियोंसे खिलनेवाला संस्कृति-कमल खिलाया । विश्वके प्रत्येक भागमें जिन जिन कलाओंका विकास हुवा “उन सबकी आधारशिला धर्म है ।” कला और साहित्य धर्मका सहारा लेकर जितना फला फूला और किसीके सहारे नहीं । इसलिये “धर्मकी उपेक्षा, मानव-कुलके दस हजार वर्षकी उपलब्धीकी उपेक्षा है ।” और “धर्मनिरपेक्षता मानव कुलकी इस उपलब्धिसे निरपेक्षता है ।” और यह कार्य, इन दस हजार वर्षोंमें समय समय पर “दूसरोंके खूनसे अपनी शान बढालेनेवाली, भोग ही सर्वस्व मानने वाली-आसुरी-संस्कृतिने किया है ।” भारतका इतिहास ऐसे प्रसंगोंसे भरा पड़ा है । ऐसे समय एकाकी होकर भी लोगोंसे आत्म-विश्वास पूर्वक “मैं दोनों हाथ उठाकर चीख चीख कर कहता हूँ धर्मसे अर्थ और कामभी-निम्न सुख अभ्युदयभी-जब मिलता है तब तुम धर्मसे उसे क्यों नहीं पाते हो !” कहनेवाले भगवान व्यास और महात्मा गांधी भी धर्मकी ही देन है । धर्म केवल अभ्युदय और निःश्रेयस ही नहीं देता, उसने राम, कृष्ण, कौटिल्य, चंद्रगुप्त, जैसे राजनीतिज्ञ और व्यास, महावीर, बुद्ध, तथा गांधी जैसी ऋषि परंपरा भी दी है । ऐसे धर्मकी उपेक्षा कृतघ्नताकी पराकाष्ठा है ! धर्म मानवमात्रकेहित लिये है । धर्मकी कसौटी विशिष्ट उपासना पद्धति अथवा बाह्य आडंबर नहीं । मठ, मंदिर, मसजिद, चर्च, ये सब धर्मका आधार न होकर धर्मका आधार “अपने लिये जो विरुद्ध है, दुःख दायक है, हानिकारक है, उसका आचरण दूस- रोंके लिये नहीं करना यह आचारसूत्र है ।” धर्म-शास्त्र अथवा शास्त्र—मनुष्यको क्या करना चाहिए क्या न करना चाहिए इसका विधि-निषेध कहनेवाले शास्त्रको धर्म-शास्त्र कहते हैं । धर्म-शास्त्र मानवकी आचार संहिता है । ऋग्वेदमें भी जब बार बार धर्म शब्द और कुछ धार्मिक-विधिनिषेध देखनेको मिलते हैं, तब ३५१ परिशिष्ट ५

यह कहना पड़ता है उससे पहले भी यह विद्यमान था। भारतीय-धर्ममें अधिकारसे भी कर्तव्य पर अधिक जोर है। कर्तव्य ही मनुष्यका धर्म है। प्रत्येक मनुष्यका अपना कर्तव्य करनेका अधिकार ही अधिकार है; दूसरा कोई विशेष अधिकार नहीं। वैसे ही भारतीय धर्ममें धर्म और नीति ऐसे दो विभाग नहीं है। सत्य बोलना धर्म भी है नीति भी है। किसीसे द्वेष न करना धर्म भी है नीति भी है। यह कहनेवाले नियम शास्त्र हैं। शास्त्रका अर्थ शासन करनेवाला ! नियमन करनेवाला । “मनुष्योंकी प्रवृत्ति अथवा निवृत्तिका नियम कहनेवाला जो है वह शास्त्र” है। भारतीय धर्म कोई उपासना पद्धति नहीं किंतु जीवन-पद्धति है। मनुष्यकी स्वाभाविक प्रवृत्तियोंका नियमन करके उसको वास्तविक कल्याण की ओर मोडना और पथप्रदर्शन करना शास्त्रोंका अथवा धर्मशास्त्रोंका कार्य है। ऐसे धर्म- शास्त्रके ग्रंथ निम्न है— सूत्र-ग्रंथ-(१) गौतम-धर्मसूत्र (२) वसिष्ठ-धर्मसूत्र (३) बौधायन धर्मसूत्र (४) आपस्तंब धर्म-सूत्र (५) हिरण्यकेशीय धर्म-सूत्र । मानव धर्म सूत्रोंका उल्लेख मिलता है। किंतु वह अब उपलब्ध नहीं है । धर्म सूत्रोंके विषयमें कहना हो तो वे किसी बडे ऋषिने नहीं बनाये हैं। वे सर्वसामान्य लोगोंकी रचना है, स्वयं धर्मसूत्रोंमें इसका उल्लेख है। वेदादि ग्रंथ, निर्लोभ निर्दोष सज्जनोक आचरण यही इन सूत्रोंका आधार है। ये धर्मसूत्र परंपरागत धर्माचरणका निचोड है। धर्म-सूत्रोंमें वर्णाश्रम धर्मका विचार है। साथ साथ नित्य नैमित्तिक कर्तव्योंका भी विवेचन है। क्षत्रियोंके कर्तव्य कहते समय राजा और प्रजाके परस्पर संबंध, राजाके कर्तव्य, कानून, राज्य- पद्धति, करपद्धति, राजनीति, इन सबका स्पष्ट उल्लेख है। साथ साथ राजासे जो गलतियां होती हैं उसके लिये यथा योग्य प्रायश्चित्त भी है ! विद्वानोंके मतानुसार इन सूत्रोका काल ई. पू. ८०० से ई. पू. १०० तकका है। इसके अलावा स्मृतिग्रंथ भी धर्मशास्त्रमें आते हैं। ये हैं (१) मनुस्मृति (२) याज्ञ- वल्क्य-स्मृति (३) बृहस्पति स्मृति (४) विष्णु-स्मृति (५) वसिष्ठ-स्मृति (६) गौतम- स्मृति (७) व्यास-स्मृति (८) बौधायन-स्मृति (९) शंख और लिखित-स्मृति (१०) अत्रि स्मृति (११) हारित-स्मृति (१२) उशना-स्मृति (१३) अंगिरा-स्मृति (१४) यम- स्मृति (१५) आपस्तंब-स्मृति (१६) संवर्त-स्मृति (१७) कात्यायन-स्मृति (१८) पराशर- स्मृति (१९) दक्ष-स्मृति (२०) शातातप-स्मृति । इन स्मृतिग्रंथोंके कालके विषयमें विद्वानोंका मत है कि मनुस्मृतिकी रचना ई. पू० ६०० की है। सब स्मृतियां ई. पू० १०० से ८०० तक की हैं। किंतु ई. पू० ८०० के आरण्यक ग्रंथोंमें “स्मृति” शब्द मिलता हैं। अर्थात धर्म-शास्त्रके रूपमें स्मृतिग्रंथ कमसे कम २५०० वर्षोंसे भारतमें प्रचलित हैं। भारतीय धर्मशास्त्रोंके विद्वान लोगोंने करीब १०० स्मृतियोंका पता लगाया है। अर्थात् आज वे सब उपलब्ध नहीं है। फिर भी अन्यान्य ग्रंथोंमें उनका उल्लेख मिलता है। इन स्मृतियोंमें भारतीय जीवन-पद्धतिका चित्रण हुवा है। भारतीय आचारसंहिता कही गयी है। इन स्मृति ग्रंथोंपर अनेक भाष्य भी हैं। ई. स. ८०० से इ. स. १८०० तक ये भाष्य लिखे गये हैं। इसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि धर्मशास्त्रोंके रूपमें हमारे पास ज्ञानेश्वरी ४५२

२५०० वर्षोंके भारतीय आचार संहिताका लेखा जोखा है । उसमें भारतीय-जीवन पद्धतीकां सर्वस्पर्शी दर्शन हो सकता है। यह एक बडी निधि है । इसके साथ साथ, धर्म-शास्त्रोंके भिन्न भिन्न विषयोंपर लिखे गये असंख्य प्रबंध हैं। जैसे "दत्तक" इस विषय पर ४० प्रबंध हैं। "गोत्र" इस विषय पर ३५ प्रबंध हैं। "दान" पर भी ४० हैं। ऊपर लिखे धर्म-सूत्र और स्मृतियोंपर भाष्यके अलावा काश्मीरसे कन्याकुमारी तकके सैकडो विद्वानोंने, उसके अलग अलग विषयोंको ले कर प्रबंधात्मक अनेक ग्रंथ लिखे हैं। कमलाकर भट्टने ई. स. १६१२ में लिखे हुए अपने निर्णय-सिंधु ग्रंथमें १०० स्मृति तथा ३०० प्रबंध और प्रबंध लेखकोंका उल्लेख किया है और इसके बाद भी अनेक प्रबंध लिखे गये हैं। ये सब भारतीय आचार-संहिताकी संपदा है जो हमें अब नव-निर्माणमें भी सहायता और प्रेरणा दे सकती है। धारणा—अष्टांगयोगका छठा अंग । पातंजल योगमें किसी विशिष्ट स्थान पर मनको स्थिर करनेकी क्रियाको धारणा कहा है। धारणामें चित्तको किसी विशिष्ट स्थान पर जकड कर रखना होता है । यह स्थान अपने अंतःसृष्टिका कोई स्थान हो सकता है, वैसे ही बाह्य सृष्टिका भी हो सकता है। योगीलोग अपने शरीरके भिन्न भिन्न चक्र-स्थानोंपर मनको स्थिर करनेका अभ्यास करते हैं । वैसे ही बाह्य सृष्टिकी किसी मूर्ति पर, इष्ट देवताकी मूर्ति पर, मन एकाग्र करते हैं। तंत्र मार्गमें पंचमहाभूतोंकी पांच देवताओं पर मन एकाग्र करनेका विधान कहा गया है तो भागवत पुराणमें अंतर्यामीपर केंद्रित करनेका विधान है। धारणा सिद्ध होनेके लिए हठ योगमें अनेक प्रकारकी मुद्राओंका विधान कहा गया है। धारणामें चित्तको इंद्रिय-जन्य भोगों परसे हटाकर किसी उदात्त स्थान पर स्थिर करना होता है । धारणासे ध्यान आसानीसे लगता है। धृति—निर्णायक शक्ति । धर्म, धृति, धारणा, धैर्य, धी आदि एक ही जातीके शब्द हैं जैसे नाम, नम्रता, नमस्कार हैं । जिससे किसी बातका निर्णय किया जाता है, निर्णयके बाद उस निर्णयको आचरणमें लाते समय उससे चिपका रहा जाता है, उसको धृति कहा जाता है । निर्णायक शक्ति, धारणाशक्ति, दृढतासे पकडे रहनेकी शक्ति, निर्णयको कार्यगत करते समय कार्यमें चालना देनेवाली बुद्धिका नियमन करनेवाली शक्ति, यह सब धृति शब्दके अंतर्गत आता है। ध्यान—अष्टांगयोगका सातवां अंग। ध्यानकी अंतिम स्थितिही समाधि है। ध्यानका अर्थ कहते समय पांतजल योग सूत्रमें "जहां धारणा करते हैं उस स्थानका-देवताका-अनुभव करना ही ध्यान" कहा है। साथ साथ सर्वदर्शन संग्रहमें "अन्य विषयोंकी चाह छोड कर ध्येय-वस्तुमें लीन होना ही ध्यान कहा है। केवल ध्येयबिंदुपर ही सदैव बुद्धिप्रवाह चलता रहे यह ध्यान है !" "सतत ब्रह्म चिंतन ही ध्यान है !" "राग विकारका विनाश ही ध्यान है!" भिन्न भिन्न दार्शनिकोंने ध्यानकी ऐसी व्याख्यायें की हैं जो परस्पर पूरक हैं। शरीरके जिस जिस स्थान पर धारणा करनी होती है उस स्थानकी देवता होती है। उस देवताके अनुभवमें लीन होना ध्यान है। धारणासे स्थिर बने हुए चित्तपर विशिष्ट हेतुका प्रवाह- सातत्य टिकाये रखनेकी क्रिया ध्यान है। मन जब ध्येयावेगमें लीन हो जाता है अन्य किसी विषयका स्पर्श नहीं होता, तब वह ध्यानस्थ बनता है। ध्यानमें दो प्रकारका ध्यान होता है। सगुण ध्यान तथा निर्गुण ध्यान। जैसे शरीरके षट्चक्रोंपर धारणा करते हैं वैसे षट्चक्रोंके देवताओंपर ध्यान किया जाता है। शरीरमें जो १५३ परिशिष्ट ५ (11)

मणिपूरक चक्र है इसमें शंख चक्र गदा पद्मधारी नीलवर्ण प्रसन्न वदन विष्णुका ध्यान किया जाता है । हृदयकमलमें निर्वात दीपककी भांति जो ज्योति है उसमें अग्निका ध्यान किया जाता है । वैसे ही हृदयमें सूर्यका भी ध्यान किया जाता है । भ्रूमध्यमें आत्मदेवका ध्यान किया जाता है । अथवा मूर्तिमय स्थूल ध्यान, तेजोमय ज्योतिर्ध्यान तथा बिंदुमय सूक्ष्म ध्यान किया जाता है । ऊपरके सब प्रकार सगुणध्यानके हैं तो ज्योतिर्मय, शुद्ध कूटस्थ आनंदस्वरूप पर ब्रह्मका तादात्म्य भावसे ध्यान करना निर्गुणध्यान कहलाता है । ध्यानके ऐसे अनेक प्रकार हैं । किंतु इन सबमें महत्त्व है तादात्म्य होनेका । किसका ध्यान किया जाता है इससे अधिक जिसका जैसे भी ध्यान किया जाता है उसमें कितनी लीनता आती है, कितना तादात्म्य होता है, यह महत्त्वका है । ध्यानका अर्थ हृदयस्थकी मानस पूजा है जो तादात्म्य भावसे करनी होती है । ध्यान करते समय एक सूक्ष्म वस्तु लेकर उसकी मर्यादा विश्वव्यापी कर उससे तादात्म्य होना होता है । ध्यानसे सभी वासनाएँ शांत होती हैं । इंद्रियां निरपेक्ष होती हैं । साम्य वृत्तिका विकास होता है । राग द्वेषादि द्वंद्वोंके साथ अहंकार भी नष्ट होता है ।

नवद्वार देह, नवद्वार-पुर, नवद्वार नगर—आंखोंके दो द्वार, कानके दो द्वार, नाकके दो द्वार, मुख, गुदा, लिंगद्वार, इन नौ द्वारोंसे युक्त शरीरको नवद्वार देह, आदि कहा गया है । इसके अलावा एक दसवा द्वार है जो गुप्त है । कहा जाता है उसको योग-सामर्थ्यसे खोला जाता है । वह दसवां द्वार ब्रह्मरंध्र कहा जाता है । योगी अपने शरीर छोड़ते समय योग-शक्तिसे इस दसवें द्वारको खोल कर चैतन्यको उस रास्तेसे मुक्त करते हैं। इस मान्यताके कारण आज भी कहीं कहीं मठोंमें, मठपतियोंकी मृत्युके बाद उनको दफनानेसे पूर्व, शंखसे तालूमें प्रहार किया जाता है ! यह परंपरासी हो गई है । कहा जाता है कि योगी योग-सामर्थ्यसे इस ब्रह्मरंध्रसे ब्रह्मांडके किसी ज्ञानको-विषयको स्वयं अनुभव कर सकता है ।

नवरस—साहित्यशास्त्रमें शृंगार, वीर, करुणा, अद्भुत, हास्य, भयानक, बीभत्स, रौद्र, तथा शांत ऐसे नौ रसोंको माना गया है । इसके स्थाई भाव हैं रती, उत्साह, शोक, विस्मय, आनंद, भय, जुगुप्सा, क्रोध और शम । इसके अलावा तुलसीदासजीने अकथित रस नामका एक नया रस भी माना है ।

नाथ-संप्रदाय—योगाभ्यासी शैव संप्रदाय । इसका आदि गुरु-शिव-आदिनाथ । इस लिये यह नाथ संप्रदाय कहलाता है । शिवत्व अथवा नाथत्व प्राप्ति इसकी अंतिम सिद्धि है । योग इसका साधन । आदिनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ, गहनीनाथ, निवृत्तिनाथ, ज्ञाननाथ ज्ञानदेव-यह इनकी परंपरा है । कदलीबनके तांत्रिक योगिनियोंके जालमें फंसे मत्स्येंद्रनाथको सच्छिष्य गोरखनाथसे मुक्त करालाना इस संप्रदायके विकासका प्रारंभ है । इस समय अपने गुरुबोधसे च्युत गुरुको, उसकी मूल-पतनका रूप-बता कर " गुरुका उद्धार " करनेमें गोरखनाथने-- अपनी परमोच्च आध्यात्मिक शक्ति वैभवका परिचय दिया है । इनका वर्णन करते समय ज्ञानेश्वर महाराज लिखते हैं " योगाब्जजनी सरोवर । विषय विध्वंस एकैक वीर " ज्ञानदेवके इस वर्णनमें नाथ संप्रदायकी साधना और सिद्धीका पूर्ण बोध होता है । ज्ञानेश्वर महाराजका "अनुभवामृत" इस संप्रदायका सर्वोच्च सिद्धांत ग्रंथ है । वैसे तो गोरखनाथका संस्कृतग्रंथ "सिद्धसिद्धांतपद्धति" को इस संप्रदायका सिद्धांत ग्रंथ कहा जाता है। निरुपाधिक " शिवशक्ति " इस संप्रदायका अंतिम तत्व है । नाथपंथकी शक्ति शिवसे अभिन्न है । कपूर और उसकी सुगंधसी, गुड़ और उसकी मिठाससी,

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सोना और उसके सुवर्ण-सी !! इसी शिवशक्तिका स्फुरण ही विश्व है। जैसे दो आँखें एक ही दृश्य देखती हैं, दो कान एक ही ध्वनि सुनते हैं, दो होंठ एकही शब्द बोलते हैं, दो पैर एकही गंतव्यकी ओर चलते हैं वैसे शिव-शक्ति ऐसे दो नामोंसे पहचाने जानेवाली तत्त्वकी क्रिया है ! यह विश्वचक्र शिव-शक्तिकी आत्मरति है। इसका अनुभव ही अमृतानुभव अथवा जीवन मुक्तावस्था है । इस अनुभवको अनुभवनेका साधन योग है। यह हठयोग है। राजयोग है। पूर्णयोग है। इस संप्रदायमें अपने तत्त्वज्ञानके साथ आचारधर्मका भी विचार किया है। इस संप्रदायका अपना ही नीतिशास्त्र है। यह गुरुमार्गी संप्रदाय है। गुरुवचन ही इसका शास्त्र है। गुरुको "सन्मार्ग दिखानेमें कुशल" माना गया है। इनका गुरु "न होनेकासा रहता है !" "वह पानीमें घुलेगये नमकका-सा" रहता है। वह "ज्ञानाज्ञानसे परे" रहता है! इस संप्रदायके विषयमें अनेक लोगोंने खोजपूर्ण अनेक ग्रंथ लिखे हैं किंतु ज्ञानेश्वरका "अनुभवामृत" अमृततम ग्रंथ है जिस पर अबतक ४५ लोगोंने टीका लिखी हैं! यह महान् ग्रंथ प्राचीन मराठीमें है। नास्तिक—जो, परलोक, उसका साधन, अदृष्ट, उसका साक्षीभूत ईश्वर, इन बातोंको नहीं मानता वह नास्तिक कहलाता है। पाणिनीने कहा है "जो परलोक नहीं मानता वह नास्तिक है।” मनूने “नास्तिक है वेद निंदक" ऐसा नास्तिक शब्दका अर्थ किया है। अर्थात् "जो वेदको नहीं मानता वह नास्तिक" कहनेसे "जैन बौद्ध, लोकायतमतके लोग नास्तिक" बनते हैं। "परलोक और मृत्युके बादकी व्यवस्था न माननेवाले नास्तिक" कहनेसे "चार्वाकानुयायी" नास्तिक कहलाते हैं। "ईश्वर न माननेवाले नास्तिक" कहनेसे “भौतिकवादी, संदेहवादी, प्रत्यक्षवादी आदि सब नास्तिक कहे जा सकते हैं। किंतु भारतीय दर्शनकी दृष्टिसे "वेदनिंदक ही" नास्तिक हैं। अनीश्वरवादी, सांख्य नास्तिक नहीं कहाते । वेदमें देवताओंको न माननेवालोंका उल्लेख है । देवता और ईश्वर एक होनेकी कल्पना उपनिषदमें देखनेको मिलती है। सांख्य तथा कर्मकांडी पूर्व मीमांसकोंको ईश्वरकी आवश्यकता नहीं लगती । भारतके कई दार्शनिकोंने अनेक उदाहरणोंसे यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि विश्व स्वाधिष्ठित है तथा वह अपनेमें पूर्ण है इस लिए ईश्वरकी कोई आवश्यकता नहीं है। वेदका प्रमाण न माननेवाले चार्वाक, जैन, बौद्ध आदि दार्श- निकोंको ईश्वरका अस्तित्व स्वीकार नहीं है। चार्वाक कहता है । "ईश्वरका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता इसलिये उसका अस्तित्व नहीं है।” जैन कहते हैं “यह विश्व सृष्ट न होनेसे किसी सृष्टिकर्ताकी आवश्यकता नहीं" और बुद्ध कहते हैं “ईश्वर विषयक सभी प्रकारकी जिज्ञासावें व्यर्थ है !" उपनिषदोंके एक महान ऋषि "वेद प्रमाण न मानना एक महान पातक मानते हैं। गौतम उनको पतितोंमें गिनते हैं। इन सभी बातोंको ध्यानमें रख कर यही ठीक लगता है कि मनूका “वेद निंदक नास्तिक" सिद्धांत सही है ! नित्य-नैमित्तिक कर्म—वेदके विद्वानोंने उसके दो कांड कहे हैं। (१) कर्मकांड (२) ज्ञानकांड । कर्मकांडके दो प्रकारके कर्म हैं। (१) नित्यकर्म और (२) नैमित्तिककर्म । नित्यकर्म करना ही है। वह कर्म करनेसे कोई पुण्य नहीं है किंतु न करनेसे पाप अवश्य है। नित्यकर्म करनेसे अधिकसे अधिक चित्तशुद्धि होती है। जैसे ब्राह्मणके लिये, संध्या, गायत्रीजप, ब्रह्मयज्ञ, आदि नित्यकर्म हैं। दिनके आठ प्रहरोंमें प्रत्येक प्रहरको कोई न कोई नित्य कर्म है। जैसे प्रातः स्मरण, शौचादि विधि, स्वाध्याय, पंचमहायज्ञ, भोजन, अध्ययन, लोक-सेवाकार्य ऐसे ये सब ब्राह्मणके नित्य कर्म हैं। यदि ये नित्य कर्म कोई नहीं करता है तो वह पाप-भागी बनता है। १५५ परिशिष्ट ५.

इनको छोड़ कर कुछ नैमित्तिक कर्म भी होते हैं। ये काम्य और निष्काम ऐसे दो प्रकारके होते हैं । समय समय पर यज्ञादि करना । किसी उद्देश्यसे यज्ञ, व्रत, शांति आदि करना काम्य नैमित्तिक कर्म हैं और श्राद्ध, ग्रहणमें स्नानादि निष्काम नैमित्तिक कर्म है। मनुष्यको अपने अपने अधिकारानुसार नैमित्तिक कर्म भी करना चाहिए । किंतु ये नहीं करनेसे पाप नहीं है। निद्रा—इस शब्दका अर्थ कहते समय पुराने ग्रंथोंमें मेध्या नामकी नाडी तथा मनका संबंध आनेसे निद्रावस्था आती है ऐसा लिखा है । उपनिषदोंमें स्थान स्थान पर जो निद्राकी व्याख्या की है वह आधुनिक शरीर शास्त्रके श्रमवादसे सम्मत ही है । "जैसे गीध पंख खोल कर आकाशमें उड़ते उड़ते थक जाता है तब विश्रांतिके लिये अपने घोसलेमें आता है वैसे थका हुवा जीव नींदका आश्रय करता है।" "सभी इंद्रियां मनमें जब लय होती हैं तब नींद आती है !" "मन प्रकाश सागरमें डूब जानेसे नींद आती है।" "जब मनुष्यको गहरी नींद आती है तब स्वप्न नहीं पडते तब आत्मा अपनी नाडीमें लीन होता है !" प्राचीन ऋषियोंकी मान्यताके अनुसार मनुष्यके शरीरमें पुरीतत नाडीकी ओर बहनेवाली ७२००० रक्तनलिकाएँ हैं। जीव जब इन रक्तनलिकाओंसे पुरीतत नाडीमें आता है तब मनुष्यको नींद आती है। जीव जब इस नाडीमें प्रवेश करता है तथा इस नाडीसे बाहर आने लगता है वह स्वप्नावस्था है। तथा जब जीव हृदय और पुरीतत नाडीमें भ्रमण करता रहता है वह जागृतावस्था है। छांदोग्य उपनिषदमें ऐसा भी कहा गया है कि "मन जब श्वासोच्छ्वासमें लीन होता है तब नींद आती है। इंद्रियोंको निद्रासे विश्रांति मिलती है क्यों कि निद्रामें इंद्रियोंको विषयोंका भान नहीं रहता । निद्राको मृत्युका छोटा भाई माना गया है। निद्रा लघु मृत्यु है और मृत्यु दीर्घ-निद्रा ! नियम—यह अष्टांग-योगका दूसरा अंग है । (१) शौच (२) संतोष (३) तप (४) स्वाध्याय (५) ईश्वरप्रणिधान ये नियम हैं । (१) शरीर और मन स्वच्छ रखना शौच है । शरीर अथवा मन यदि अस्वच्छ होगा तो चित्तवृत्तियोंका निरोध नहीं होगा । मन एकाग्र नहीं होगा। इसलिये साधकको स्नान आदिसे शरीर स्वच्छ रखना चाहिए । सभी मलद्वार स्वच्छ रखने चाहिए। सभी इंद्रिय स्वच्छ रखने चाहिए । मलिन स्थान मलिन व्यक्ति आदिका संपर्क छोड़ना चाहिए । यह सब देश काल परिस्थितिका विचार करके करना चाहिए । शरीर शुद्धीका ही एक रोग न हो जावे । नहीं तो उपाय अपाय होगा। वैसे ही चित्तको रजतमसे दूर रखनेका प्रयास करना चाहिए। रज तम मूलक वृत्तियां मनको उद्विग्न करती हैं। मनमें काम क्रोध लोभ आदि विकारोंको पैदा करती हैं । सत्संग, सद्ग्रंथवाचन, तथा विवेकसे मनको शुद्ध रखना भी शौच है। (२) जिस समय जो मिलता है उसीसे जो हित हो सकता है वह कुशलता पूर्वक साध कर मनको प्रसन्न रखना संतोष है । अतृप्तिसे संताप और संतापसे उद्विग्नताकी परंपरा प्रारंभ होती हैं। रजके कारण उत्पन्न होनेवाली काम क्रोधादि उद्विग्नताएं, अथवा तमके कारण उठनेवाली आलस प्रमादादि वृत्तियोंसे मन मलिन होता है । इसलिय् हित मित आहार विहार, सत्संगति, सद्ग्रंथोंका अध्ययन आदिसे मनको प्रसन्न रखना चाहिए । मनकी यह प्रसन्नता ही संतोष है । संतोषसे चित्त आसानीसे एकाग्र होता हैं । ज्ञानेश्वरी १५६

(३-४) तप और स्वाध्याय, समाधिके अभ्यासके लिये आवश्यक अभ्यासमें अवरोध करनेवाले क्लेशादि विकार तप स्वाध्यायसे दूर होते हैं। इन अवरोधोंसे जो चित्त पुनः पुनः बहिर्मुख होता है उसको अंतर्मुख करनेमें सहायता मिलती है। चित्तके पुनः पुनः बहिर्मुख होनेसे इंद्रियां विषयोंकी ओर खिंचती हैं और चित्त चंचल होता है। इससे अविद्या, क्लेश आदि बढ़ते हैं। अर्थात् चित्तको सदैव प्रसन्न रखनेके लिये, चित्तकी बहिर्मुख होनेकी प्रवृत्ति रोकनेके लिये, तप तथा स्वाध्यायकी आवश्यकता है। इसमें तपसे मनका मालिन्य नष्ट होता है और स्वाध्याय (सद्ग्रंथोंका पठन और जपादि नामस्मरण) से सत्त्व गुणकी वृद्धि होती है। और (५) इनसे भी जो शुभाशुभ संस्कार बचे रहते हैं उनको ईश्वरार्पण करनेसे अविद्यामूलक अहंता ममतादि भाव नष्ट होकर चित्तप्रसन्नताकी स्थिति सहज होती है। निर्गुण-सगुण उपासना—इस सृष्टिकी उत्पत्ति होनेके पहले एक ही एक आत्मतत्व विद्यमान था। उसको आगे अनेक होनेकी इच्छा हुई। परिणाम स्वरूप यह विविध-रूप सृष्टि हुई। यह वेदांतका प्रसिद्ध और प्रमुख सिद्धांत है। इस सृष्टिके पहले जो एक ही एक आत्म-तत्व था वह अव्यक्त था। निर्गुण था। वह एक ही एक आत्मतत्व अनादि, अनंत, सीमातीत और सर्वव्यापी है। वह निरंतर है। अखंड है। स्वतंत्र और सर्वज्ञ है। वही सृष्टिकी उत्पत्ति स्थिति और लयका कारण है। यह सारी सृष्टि उसीमेंसे निर्माण हो कर उसीमें लय होती है। जिससे यह सारी सृष्टि उत्पन्न होकर उसीमें लय होती है उसे ब्रह्म कहा गया है। उस निर्गुण ब्रह्मसे यह सगुण सृष्टि उत्पन्न हुई है। उपासनाका अर्थ पास जा बैठना। चिंतन, मनन, स्मरण, ध्यान आदिके द्वारा परमात्माके पास जाना, वहीं स्थिर रहना आदिके लिये कोई साधन लगता है। किसी रूपकी आवश्यकता होती है। कोई आधार चाहिए। बिना इसके चिंतन मननादिकी क्रिया ठीक नहीं होती। यह जानकर इस विद्याके आचार्योंने अव्यक्तकी उपासनाके लिये व्यक्त अथवा सगुणकी कल्पना की। परमारथमें कल्पित ये सब गुण उपासककी योग्यतानुसार कम अधिक प्रमाणमें सात्विक होते हैं। उपनिषदमें भी ऐसे कई सगुण वर्णन किये हैं। "वह परमात्मा उत्तम पुरुष है।" "वह सभी भूतोंका अधिपति है!" "वह विश्वकी आंखें विश्वका मुख, विश्वके बाहू और विश्वके पैर है।" ये सारे विविध रूप उपासनाके लिये विविध प्रतीक हैं। वस्तुतः वे गौण हैं। परब्रह्म सगुण नहीं है। वह दर्शन श्रवण स्पर्शादिकी सीमाओंमें आनेवाला नहीं है। वह सच्चिदानंद स्वरूप है। किंतु वह नेति नेति परब्रह्म उपासनाके लिये इति इति हुआ। उपासनाके लिये प्रथम सगुण, फिर सगुण-निर्गुण उसके बाद संपूर्ण निर्गुण ऐसी व्यवस्था है। यह गुणोंसे निर्गुणों की ओर जानेकी प्रक्रिया है। इस विश्वके अलग अलग वस्तुओंके भिन्न भिन्न रूप ही उनका दिया हुआ भिन्न भिन्न नाम है। यह सारा विश्व नामरूपात्मक है। ये सब हर क्षण बदलते रहते हैं किंतु इन सबके मूलमें कभी न बदलनेवाला तत्त्व रहता है। वही तत्त्व सत्य है। इस सत्यके अथवा परमात्माके दो रूप हैं। एक इंद्रियोंसे समझे आकलन है। इसको व्यक्त अथवा सगुण कहते हैं। दूसरा इंद्रियां ही नहीं मन और बुद्धि भी आकलन नहीं कर सकती। उसे अव्यक्त अथवा निर्गुण कहते हैं। उपासनाके लिये जो चिंतन, मनन, ध्यान आदि करना पड़ता है जिसकी भक्ति करनी पड़ती है वह अनाकलनीय होके कैसे चलेगा? इसलिये "वह बिना आंखसे सब कुछ देखनेवाला, १५७ परिशिष्ट ५

बिना कानके सब कुछ सुननेवाला, बिना पैरके सबके आगे दौड़नेवाला, खड़े खड़े दौड़नेवालोंसे भी आगे पहुंचने वाला ब्रह्म विश्वतश्चक्षु, विश्वतोमुख, विश्वतो बाहु और विश्वतो पाद् हुआ !" "यह नहीं वह नहीं" (नेति नेति) वाला परब्रह्म "यही यही" सर्वव्यापी हो गया । अणारमक परब्रह्म अनात्मक ईश्वर बनकर ध्यान धारणा चिंतन मननका साधन बना । इसलिये सगुण निर्गुण दो भेद चल पड़े । उपासनाके भी सगुणोपासना और निर्गुणोपासना ऐसे भेद हुए । उपासकके स्वभावानुसार अथवा सामर्थ्यानुसार उसके अनेक रूप बने । सगुण प्रारंभ है और निर्गुण अंतिम स्थान । इसलिये सबने सगुणका पुरस्कार किया । चलने लगे तो मंजिल पर पहुंच ही जायेंगे । जितना जल्द चालसे चले उतना जल्दी । सगुण उपासना, जहांसे चलना है वह स्थान है और निर्गुण जहां पहुंचना है वह स्थान । चलना छोड़ कर पहुंचना असंभव । इसलिये चिंतन, मनन, ध्यान भक्ति आदिका पहला कदम सगुणोपासना है जो सभी आचार्य और संतोंद्वारा इतना ही नहीं उपनिषदोंके ऋषियों द्वारा भी पुरस्कृत है । निवृत्ति—जीवनके दो अंग हैं । अभ्युदय-निःश्रेयस, प्रेय-श्रेय, प्रवृत्ति-निवृत्ति । अभ्युदय, प्रेय तथा प्रवृत्ति वासना पूर्तिजन्य सुख प्राप्तिकी साधना है । प्रापंचिक वैभवकी साधना है । और निवृत्ति श्रेय तथा निःश्रेयस वासना-विलोपजन्य सुखकी साधना । वासनाका अस्तित्व ही दुःख है और वासनाका अभाव ही सुख । दुःखके कारणीभूत वासनाका लय करना शाश्वत तथा निरालंब सुखका मूल होनेसे वासना विलयके लिये निवृत्तिमार्ग कहा गया है । निवृत्तिमार्गमें सबसे प्रथम मनसे बाह्य इंद्रियोंके व्यापार संयमित किये जाते हैं । इंद्रियोंको निरपेक्ष किया जाता है । फिर मनको संपूर्ण रूपसे बुद्धिमैं लीन करके मनोलय किया जाता है । उसके बाद बुद्धिको पूर्णरूपसे आत्मलीन किया जाता है । बुद्धिके आत्मलीन होनेके बाद आत्माकी सर्व-व्यापकताका पूर्णत्वका अनुभव होने लगता है । अपूर्णताके अनुभवसे वासनाका जो उदय होता है वह पूर्णत्वके अनुभवसे नष्ट होता है । यह वासना विलयजन्य सुख ही शाश्वत सुख है । निरालंब सुख है । अपनेमें आपनेसे आप अनुभव किया जानेवाला सुख है । इस लिये निवृत्ति जन्य सुख सर्वश्रेष्ठ सुख माना गया है । यही जीवकी जीवन्मुक्तावस्था है । निष्काम कर्म—वासना रहित कर्म । जिस कर्ममें कर्म फलकी कोई आशा नहीं वैसा कर्म । मानवी मन अनेक वासनाओंसे भरा रहता है । वासनाओंका खेल अतर्क्य होता है । बिना वासनाके कोई फल भोग नहीं होता । वैसे ही कोई भी कर्म-फल आकस्मिक नहीं होता । पूर्व जन्मकी फलवासनाओंसे पुनर्जन्म मिलता है । जैसे मनुष्य होकर भी बार बार पशुयोनिके अनु- सार कर्म करनेसे उन्हीं वासनाओंके परिणामस्वरूप मनुष्य पशु-योनिमें जाता है । इसीलिये वासना रहित कर्मका महत्व कहा गया है । गीतामें निष्काम कर्मका बड़ा महत्व गाया गया है । वासनाएं अनादि कालसे जन्मजन्मांतरसे-चली आती हैं । योग वासना विलोपकी साधना है । कर्म करते समय फलाशासे कर्म करना तथा कृष्णार्पण भावसे कर्म करना वासना विलोपकी साधना है । वासना विलोपसे-वासनाके अभावमें-शाश्वत सुखका अनुभव होता है तथा ऐसे किया हुवा कर्म पुनः वासनाको जन्म नहीं देता जैसे जला हुवा बीज नहीं फलता । पंचकोश—मनुष्य, पंचतत्त्व, पंचकोश, पंचप्राण, पांच शक्तियां, पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां आदिसे बना है । उनमेंसे पांच कोश हैं ( १ ) अन्नमयकोश ( २ ) प्राणमयकोश ( ३ ) ज्ञानेश्वरी १५८

मनोमयकोश (४) विज्ञानमयकोश (५) तथा आनंदमयकोश । कोशका अर्थ आवरण है । थैला है । जीव इस थैलेसे लिपटा गया है। इसका वर्णन करते समय कहा गया है कि माता पिताके द्वारा लाये गये अन्नसे जो रज वीर्य बनता है उससे मानवी देह बनता है और वह अन्न पर ही जीता है इसलिये वह अन्नमय कोश है । यह आत्मासे भिन्न है क्यों देहकी उत्पत्ति होनेके पूर्व और मृत्युके बाद उसका अभाव होता है। संपूर्ण देहको बल देनेवाला, इंद्रियोंको प्रेरणादेनेवाला जो व्यान- नामका प्राण है वही प्राणमयकोश है। देहको मैं कहनेवाला अहंता ममतादिसे भ्रांत होनेवाला वह मनोमयकोश है । चैतन्याभाससे युक्त जो बुद्धि है जो सुप्तावस्थामें लय होकर जागृतावस्था शरीरमें व्याप्त रहती है वह विज्ञानमयकोश कहलाती है । सुखका अनुभव लेते समय अंतःकरणकी वृत्ति अंतर्मुख होती है । इस लिये अंतःकरणमें आत्मस्वरूपका प्रतिबिंब उठता है। वही वृत्ति पुण्यकर्मका फलभोग शांत होनेसे निद्रामें लीन होती है। इस अंतर्मुख वृत्तिका आनंदमय कोश बनता है । ये सभी कोश चैतन्य पर आवरण मात्र है। ये ही चैतन्य नहीं है। मृत्युके बाद जीव इन सभी कोशोंको पार करता है । जीव अन्नमय कोशको त्याग कर प्राणमय कोशमें, प्राणमयकोशको त्याग कर मनोमय कोशसे प्रज्ञालोकमें विचरण करता है। फिर वह मनोमय कोशको भी छोड़कर अपने जीवलोकमें जाकर पुनः जन्म लेनेके लिये आवश्यक वातावरण तथा शरीरादिको एकत्र करने लगता है । इसीसे पुनर्जन्मके लिये आवश्यक परिस्थिति निर्माण होती है । अन्नमयकोश—पंचकोशमेंसे एक कोश । शरीर पंचभूतोंसे बना है । पंचभूतोंसे बने शरीरके प्रत्येक अंश शरीरपातके बाद अपने मूलरूपको पाता है । इस स्थूल शरीरको अन्नमय कोश कहा गया है । क्यों कि अन्नसे इसका पोषण होता है। जागृतावस्थामें जीव इस कोशमें रहता है । यह स्थूल शरीर चार प्रकारके होते हैं । बीज और मिट्टीसे पैदा होनेवाले-वृक्ष लतादि- उद्बीज कहलाते हैं। पसीने गर्मी ठंडीसे निकले हुए जीव मसक जूं, आदि वैसे ही अंडोंसे निकलनेवाले परिंद, साप आदि अंडज कहलाते हैं । और जारज जैसे मनुष्य पशु आदि । ये चारों प्रकारके स्थूलशरीर अन्न पर आश्रित हैं इसलिये इसे अन्नमय कोश कहा गया है । प्राणमयकोश—पांच कर्मेंद्रियोंके साथ पांच प्राणोके संयोगसे जो एक वलयसा बन जाता है वह प्राणमयकोश कहलाता है । यह कोश चैतन्यपर आवरण डालता है। इस प्राणमयकोशमें क्रियाशक्तिका प्राधान्य है । यह क्रियाशक्ति कार्यके रूपमें हमारे सम्मुख उपस्थित होती है । हमारी सारी क्रियायें अथवा कर्म इसी क्रिया शक्तिका परिणाम है । मनोमयकोश—जैसे कर्मेंद्रिय और पंचप्राणोंको मिला कर प्राणमयकोश निर्माण होता है वैसे पांच ज्ञानेंद्रिय और मनको मिला कर मनोमयकोश निर्माण होता है । यह कोश प्राणमय कोशसे अधिक सूक्ष्म होता है । अधिक चैतन्यशाली होता है । मनुष्यके सारे संकल्प विकल्प इसी कोश पर आधारित होते हैं। आकाशादि भूतोंमेंसे प्रत्येकमें तीन गुण होते हैं। उनमें जो सात्विक अंश होता है उस सात्विक अंशसे ज्ञानेंद्रिय बनती है । जैसे आकाशके सात्विक अंशसे कान बनते हैं। शब्द उसका विषय है । वायुके सात्विक अंशसे त्वक् बनती है जिसका विषय स्पर्श है । तेजसके सात्विक अंशसे चक्षु है रूप इनका विषय है । आपके सात्विक अंशसे रसना बनती है । रस इसका विषय है। और पृथ्वीके सात्विक अंशसे घ्राणेंद्रिय बनती है जिसका विषय गंध है । इन सबका मनसे संयोग होकर जो वलय बनता है वह मनोमय कोश है १५९ परिशिष्ट ५

विज्ञानमयकोश—आकाशादि पंचमहाभूतोंकी सामूहिक सात्विक अंशोंसे निश्चया- त्मक अंतःकरणकी बुद्धि शक्ति, संकल्प विकल्पात्मक मनःशक्ति, अनुसंधानात्मक अंतःकरणकी चित्तशक्ति, अभिमानात्मक अंतःकरणकी अहंशक्ति तथा पांच ज्ञानेंद्रियोंसे सम्मिलित तत्त्वसे विज्ञानमय कोश बनता है जो चैतन्यपर आवरण डालता है । विज्ञानमय कोशसे घिरा हुवा चैतन्य “जीव” कहलाता है। यही लोक परलोक भोगता है। चैतन्यके प्रतिबिंबसे विज्ञानमय कोशमें जो क्रियायें होतीं हैं इसीसे जीव कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी आदिका अनुभव करता है। यही संसारमें रहकर भोगता और जन्म मरणका अनुभव करता है। यही जीवकी बद्धावस्था है। नहीं तो चैतन्य सदैव मुक्त है। निःष्कल और निष्क्रिय है। आनंदमयकोश—ईश्वरने अपनी लीलाके लिये-खेलके लिये-बिना किसी प्रयोजनके सृष्टि- रचना की है। इस समस्त विश्वका “कारण शरीर” ईश्वर है। इस कारण अवस्थामें माया और ब्रह्मके अलावा दूसरा कोई प्रपंच नहीं रहता इसीलिये यह आनंदमय अवस्था है। आनंदमय अवस्थाका यह “कारण शरीर” व्यक्ति देहमें चैतन्यको घेरा रहता है इसको आनंदमय कोश कहते हैं। जब सारा प्रपंच लय होता है तब चैतन्य इसी कोशमें शांत रहता है। इसीलिये इसको सुषुप्ति भी कहते हैं। इस सुषुप्ति अवस्थामें केवल आनंद रहता है। मन, इंद्रियां, इंद्रियोंके विषय आदि नहीं होते। इस समय, स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरका लय होता है और केवल चैतन्य आनंदमय अवस्थामें रहता है। पंचतत्त्व-या पंचमहाभूत—पृथ्वी, आप, तेज, वायू और आकाश इनको पंचतत्त्व अथवा पंचमहाभूत कहते हैं। इसीसे सारी भौतिक सृष्टि बनी है। प्रत्येक भौतिक पदार्थमें इन पंच तत्त्वोंमेंसे प्रत्येक तत्त्वका अंश रहता है। चार्वाकदर्शन चार तत्त्व मानता है। वह आकाश तत्त्वको नहीं मानता। क्यों कि वह इंद्रियगम्य नहीं है। सांख्यमतसे अहंकारके तामसिक अंशसे शब्द तन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा तथा गंधतन्मात्राएं बनी। अहंकारका तामस इन सबमें अलग अलग समान रूपसे विद्यमान है किंतु ये आपसमें मिले हुए नहीं है। इसीलिये इनसे होनेवाली सृष्टि भी अलग अलग है। शब्द तन्मात्रासे आकाशकी सृष्टि हुई। स्पर्शसे वायू, रूपसे तेजस् रससे जल तथा गंधसे पृथ्विकी सृष्टि हुई है। ये भूतसृष्टि-रचनाके स्थूलतम पदार्थ हैं। अर्थात् शब्दादि सूक्ष्म तत्त्व या भूत हैं जिससे पृथिव्यादि स्थूल तत्त्वोंकी सृष्टि हुई है। न्याय और वैशेषिक मतके अनुसार आकाश नित्य और व्यापक है। पृथ्वी—पंच महाभूतोंमें अथवा पंचतत्त्वोंमें पहला तत्व । शब्दार्थकी दृष्टिसे “जिसका विस्तार होता जाता है” ऐसा इसका अर्थ है। इसका वर्णन करते समय कहा गया हैं “गंध इसका गुण है। इसमें छ प्रकारका रस हैं। यह नित्य और अनित्य दो प्रकारकी हैं। इसका “अणुरूप नित्य” है। अन्य रूप अनित्य । शरीर, इंद्रिय तथा उसके विषय ये पृथ्वीके तीन रूप हैं। चार प्रकारके प्राणि इसके शरीर हैं। प्राण इसके इंद्रिय रूप हैं। अणुसे ब्रह्मांड तक सब इसके विषयोंका रूप हैं। ब्राह्मण ग्रंथोंमें पृथ्वी को “सर्व-भूतोंमें प्रथम जन्म पानेवाली” ऐसा कहा गया हैं। कहा गया हैं कि पहले इसे “वायु उडा ले जाता था!” “प्रजापतिने तपसे इसके फेन, सूखी मिट्टी, पत्थर, बालू, मोटी बालू-कंकड-शिलाखंड मोठे पत्थर लोहा सोना और औषधी ऐसे नौ प्रकार बनाये। ज्ञानेश्वरी ३६०

ऋग्वेदमें पृथ्वीकी प्रार्थना करनेवाले कई सूक्त हैं। उनमें "पृथ्वी तू हमसे प्रसन्न हो । तू किसीका अहित नहीं करती । अपनी गोदमें तू सबको समा लेती है । तू हमको सुख दे !" इस प्रकारकी प्रार्थनाए हैं। शतपथ ब्राह्मणमें पृथ्वीको "अग्निगर्भा" कहा गया है । उसमें कहा गया है कि माता जैसे संतानको अपने गर्भमें धारण करती है वैसे पृथ्वीने अग्निको अपने गर्भमें धारण किया है ! पृथ्वीका वर्णन करते समय शतपथ ब्राह्मणमें "पृथ्वी परिमंडल रूप-गोल-अपने ही चारों ओर घूमने वाली वातावरण धारण करनेवाली है !" ऐसे भी कहा गया है। इस पृथ्वीकी उत्पत्तिकी अनेक कथाएं अलग अलग पुराणग्रंथोंमें तथा ब्राह्मण ग्रंथोंमें हैं। पृथ्वीके रूपका वर्णन करते समय पृथ्वी मंडलके चारों ओर बना जल है उसके चारों ओर घनी उष्णता-तेजस्-है तथा चारो ओरसे ऊपरकी ओर बहनेवाला-ऊर्ध्व-टेढा वायु है ऐसे कहा गया है। आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिसे पृथ्वी सूर्य-मंडलमें घूमनेवाला तीसरा ग्रह है। चंद्र पृथ्वीका उपग्रह है । चंद्रके प्रभावसे पृथ्वीपर समुद्रमें तूफान आता है। पृथ्वी नारंगी जैसे गोल है। पृथ्वी पर जो असमानता है-नीचे ऊपर-वह नहींके बराबर ही मानना चाहिए । पृथ्वी पर जो ऊंचा भाग है वह २९ हजार फूट ऊंचा है, वैसे ही गढ़ा-घाटी-करीब ३६।।-हजार फूट है। इसका विस्तार १९ करोड ७० लाख वर्ग मील है। इसमेंसे ७०-७१ प्रतिशत भाग पानीमें है। स्थलमंडल, जलमंडल तथा वायुमंडल इन तीन मंडलोंसे यह बनी है। वायुमंडल, स्थलमंडल और जलमंडलको घिरा हुआ है। इस वायुमंडलमें ९९ प्रतिशत नाइट्रोजन और १ प्रतिशत प्राणवायू है। पृथ्वीकी आयुके विषयमें वैज्ञानिकोंमें जो अनेक मतभेद हैं उस परसे कह सकते हैं कि इसकी आयू १८० करोड वर्षोंसे ३०० करोड वर्षकी है। पुराणोंके मतसे इसकी आयू करीब २२० करोड वर्षकी है। प्राचीन भारतीय संस्कृतिमें-सिंधुसंस्कृतिमें-पृथ्वीकी पूजा होती थी। पता नहीं कबसे पृथ्वी-पूजा रुक गयी है। अथर्ववेदमें कहा गया "ऋत, सत्य, उग्रक्षात्रतेज, दीक्षा, तप, तथा ज्ञान इस पृथ्वीको धारण करते हैं। यह भूत भविष्यका पालन करनेवाली है। पृथ्वी हमें विशाल कार्य-क्षेत्र दें।" अथर्वऋषि "पृथ्वीको माता और मानवको उसका पुत्र" मानते हैं। वे गाते हैं पृथ्वीमें अमृत भरा है। वह विश्वंभरा है। जो ज्ञानी है, जिसके पास वाक्शक्ति है, वही=पृथ्वीका हृदय जानता है। ऐसे ही मनुष्यके सम्मुख वह अपना अमररूप प्रकट करती है। पृथ्वीकी उपासना करनेसे मनुष्यको अनेक वरदान मिलेंगे। उसमेंसे अनेक प्रकारकी वीर्यवान् औषधियां उत्पन्न होती हैं जो मनुष्यको पुष्ट करती हैं। जिसका हृदय, प्रेम, सत्य और अमृतसे भरा है। वह पृथ्वी हमारे राष्ट्रको और हमको बल और तेज दें!" आप-ऋग्वेदमें "माता जैसी क्षम्य देती है वैसी उत्तम नीर देनेवाले" आपो देवताका वर्णन है। उसके बाद उपनिषदोंमें विश्वरचनाकी बात कहते समय तज्जलान् कहते हुए जलसे पृथ्वीका निर्माण हुआ ऐसा कहा गया है। सभी शास्त्र और पुराणोंमें "पृथ्वी जलसे उत्पन्न हुई" कहते हुए "यह जलमें ही डूब जायेगी !" कहा है। इसे प्रलय कहते हैं। किंतु आगे यह जल वायुसे सूख जाता है वायु आकाशमें लीन होता है ऐसा प्रलयका वर्णन आता है। न्यायदर्शनमें १६१ परिशिष्ट ५

" आप शांतिस्पर्श-शीतल होता है। वह दो प्रकारका होता है। एक नित्य दूसरा अनित्य । नित्य आप परमाणुरूप होता है । अनित्य आप कार्य रूप होता है। शीतल स्पर्श केवल जल-तत्वकाही होनेसे जहां कहीं शीतलताका बोध होता है वहां सब जल तत्वका अस्तित्व मान लेना ! भारतीय तत्त्वज्ञोंकी भांति ग्रीक तत्त्वज्ञों में भी कुछ लोग “सभी जलसे निर्माण होकर जलमें लीन होता हैं !” कहते हैं। प्राणि, वनस्पति, आदिमें जहां आर्द्रता रहती है वह जलतत्त्वके कारण है । तेज—पंच महाभूतोंमें, तीसरा, जिसका स्पर्श उष्ण है उसको तेज कहा गया है। शब्द, स्पर्श, रूप यह उसके धर्म हैं । अग्नि अथवा तेजको छांदोग्योपनिषदमें “सत्” से निर्मित प्रथम महाभूत कहा है । न्याय शास्त्रमें इसको चमकीला शुभ्रवर्णका कहा गया है तो छांदोग्योप- निषदमें तेजका रंग लाल माना गया है। लाल रंग तेजोरूप है। शुभ्र वर्ण जल रूप है। और काला वर्ण पृथ्वीरूप है ऐसा श्वेताश्वतर उपनिषदमें कहा गया है। अध्यात्मशास्त्रमें तेजको ब्रह्मका प्रतीक माना गया है। तेज, ज्ञान और सद्गुणोंका सूचक है। अनेक उपनिषदोंमें “ ब्रह्मतेजोरूप है और तेजो रूपसे उसका साक्षात्कार होता है !” ऐसा कहा गया है। वैसे ही मुंडकोपनिषदमें, अत्यंत दीप्त स्वर्ण-तेजो मंडलके मध्यमें दीखनेवा शुद्ध शुभ्र निष्कलंक ब्रह्म सर्व श्रेष्ठ तेज है !” ऐसा कहा है। तथा छांदोग्योपनिषदमें “इस संसार सेतुका अतिक्रमण करनेके बाद अंधे मनुष्यको भी अंधत्वका कोई दुःख नहीं होता। उसकी आंखोंके सामने सदैव तेजोमय ब्रह्म चमकता रहता है। रात भी उसको दिनके समान दीखती है !” ऐसा कहा गया है। अनेक संतोंने अपने साहित्यमें तेजोमय ब्रह्म-साक्षात्कारका वर्णन किया है। ज्ञानेश्वरीके ग्यारहवे अध्यायमें भी यह देख सकते हैं। वायू—न्याय और वैशेषिकमें वायुको रूपरहित स्पर्श-बोध जन्य तत्त्व कहा है। वह नित्य और अनित्य दो प्रकारका है। नित्य वायु परमाणुरूप और अनित्यवायु कार्य रूप है। त्वक् नामका वायु वायुजन्य इंद्रिय सारे शरीरभर रहता है जो वायुका अनुभव करता है। शरीरमें संचार करनेवाले वायुको प्राण कहते हैं। उपनिषदोंमें जैसे शरीरके श्वासोच्छ्वासको प्राण कहा गया है वैसे ही विश्वके जीवनतत्त्वको प्राण कहा गया है। इससे प्राण व्यक्ति अथवा विश्वका सामर्थ्य बन गया है। उपनिषदोंमें सारे वस्तु प्राणसे उत्पन्न होकर उसीमें लय होते हैं ऐसा भी कहागया है। इस प्राणको भूतोंका मध्यबिंदु माना है। छांदोग्योपनिषदमें वायुही मूलतत्त्वमाना है। कहा गया है “वायु सबको विलीन करनेवाला तत्त्व है। कोई भी पदार्थ हो उसीमें विलीन होता है। अग्नि बुझ जाता है तो वायुमें। सूर्य वायुमें अस्त होता है। पानी वायुमें सूख जाता है। वायु ही सबको पूर्णरूपसे निगल जाता है !” अंत जिसमें होता है उत्पन्न भी उसीमेंसे होता है यह मान लेना है ! इस विश्वमें सतत और संतत चलनेवाला प्राणवायुका प्रवाह ही मूलभूत जीवन तत्त्व होनेकी बात पुराने ग्रीक दार्शनिकोंने भी कही है। ईशावास्योपनिषदमें संभवतः समष्टिरूप जो वायु अनिल कहा है वही यह संतत बहनेवाला प्राणवायु है। तैत्तिरीय उपनिषदमें “जिससे ये सब भूत उत्पन्न होते हैं, और उत्पन्न होनेपर जीते हैं तथा अंतमें सब इसीमें विलीन होते हैं वही एक मूलतत्त्व है। वही ब्रह्म है !” और ग्रीक तत्त्वज्ञ यही वाक्य दुहराकर इस तत्त्वको वायु कहते हैं। इसका विवेचन करते समय ग्रीक तत्त्वज्ञ कहता है “मनुष्य या अन्य प्राणी श्वासोच्छ्वासके वायुसे ही जीते हैं। इसलिये वायु यह चिरंजीवी, शक्तिमान श्रेष्ठ ऐसा तत्त्व है।” आकाश—प्रवाहण जैबालीने आकाशको सारे जगतका उत्पत्तिकारण माना है। यह इस जगतकी अंतिम गतिके विषयमें भी कहता है। विश्वका आकाश बनेगा। इसके मतसे सभी भूत ज्ञानेश्वरी १६२

आकाशसे उत्पन्न होकर आकाशमें लीन होते हैं। आकाश सर्व श्रेष्ठ है। छांदोग्य उपनिषदमें “ आकाशको अग्निसे भी श्रेष्ठ कहा है। सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, बिजली आदि आकाशमें रहते हैं। इन सबपर आकाशका आवरण रहता है। आकाशके विषयमें ऐसा भी एक विचार है कि खोखलापन का अर्थ शून्य अथवा अभाव है। इसलिये आकाशका अस्तित्वही नहीं ! चार्वाक आकाश नहीं मानता । उपनिषद् कहते हैं आकाश वायूसे भरा है। जहां जहां आकाश है वहां वायु है । आकाशमें अनंत तत्वोंको रहनेकी गुंजाइश है। आकाशमें अनंत तत्वोंका भ्रमण एक दूसरेमें विलीन होना आदि क्रियायें चलती रहती हैं। आकाश एक अखंड महाशून्य है। उसमें नीचे ऊपर आगे पीछे ऐसा कुछ नहीं है। आकाश अनेक तरंगोंका जाल है। सारा विश्व आकाशसे उद्भित होकर आकाशमें लीन होता है । शब्द आकाश तत्वजन्य है। श्रुतिमें “ आत्मासे संभुत आकाश कहा गया है । न्याय और वैशेषिक मानते हैं कि आकाशके अपने परमाणु नहीं हैं। पंच-प्राण—भारतीय तत्व-चिंतकोंने प्राण शक्तिका गहरा अध्ययन करके अपने शरीरमें चलनेवाली कौनसी क्रियायें प्राण-तत्वकी किस प्रकारकी शक्तिसे चलती हैं यह देख कर प्राण तत्वके पांच विभाग किये हैं। इनको पंचप्राण कहा जाता है। उनका नाम हैं (१) प्राण (२) अपान (३) व्यान (४) उदान (५) समान । निम्न छंदोंमें शरीरमें इन पांच प्राणोंका क्या काम है इसको समझाया गया है। जीता है प्राणसे प्राणी उठाता बोझ व्यानसे । मल-मूत्र सदा नीचे उतारता अपानसे ॥ उदानसे चलती वाक् हत्क्रिया है समानसे । चलती जो क्रियां ऐसी देहधारी मनुष्यकी ॥ पंचाग्नि—(१) प्रलयानल, (२) विद्युदनल (३) वडवानल (४) शिवनेत्रानल (५) द्वादशादित्यानल ये पंचाग्नि हैं । प्रलयानल पृथ्वी पर रहता है । विद्युदनल आकाशमें बिजलियोंमें-रहता है। बडवानल समुद्रमें होता है। शिवनेत्रानल रुद्रके क्रोधमें रहता है। द्वादशादित्यानल सूर्यका तेजस है। परमार्थ—परमार्थका अर्थ श्रेष्ठ प्रकारका लाभ । व्यावहारिक लाभ जिसे हम लाभ कहते हैं वे क्षणिक हैं। वे सब लाभ नष्ट हो सकते हैं। किंतु आत्मज्ञान-अपने आपको जाननेका ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता । इसलिये “मैं” क्या है यह जानना, अपने आपको जानना, श्रेष्ठ प्रकारका लाभ है। तभी इसे परमार्थ कहा है। इस ज्ञानसे सुख मिलता है और वह सुख निरालंब सुख होता है। वह किसी बाह्य वस्तु पर आधारित नहीं होता। आपसे अपनेमें अनुभव करनेका होता है । इसलिये वह शाश्वत सुख होता है। कभी नष्ट न होनेवाले शाश्वत सुखका लाभ परमार्थ है। इस प्रकारके सुखको प्राप्त करनेके लिये जो जो कुछ किया जाता है उसको परमार्थ साधना कहते हैं। पाप—पाप एक मल है। जो अंतःकरणको चिपकता है। पश्चात्तापसे उसको दूर किया जाता है। पतितता उत्पन्न करनेवाला, अमंगल, अशुभ, अनिष्टको जन्म देनेवाला क्रियाविशेष ही पाप है । सामान्यतः निसर्ग नियमोंके विरुद्ध चलना पाप है। पाप मनुष्यको गिराता है। प्रत्येक मनुष्य अनेक प्रकारसे-पाप पुण्य न माननेवाला भी-अपनी दृष्टिसे गिरता उठता है। अपनी १६३ परिशिष्ट ५

दृष्टिसे गिरनेका भाव पाप है। ऋग्वेद कालमें भी यह कल्पना थी। वहां पापको बंधन माना है ! वहां एक प्रार्थना है "जैसे बछड़ेसे रस्सी दूर करते हैं वैसे तू मुझे पापसे दूर कर ! क्यों कि बिना तेरे सामर्थ्यके आंख भी नहीं झपकती !" वहां पानीसे पापको धोनेकी प्रार्थना की है और अग्निसे पापको जलानेकी ! आगे शास्त्रज्ञोंने किन किन बातोंसे मनुष्य अपनी दृष्टिसे आप गिरता है उसका विचार करके उन सब बातोंको पापमें गिना और मनुष्यको उन उन बातोंसे दूर रहनेका आदेश दिया। जैसे माता शिशुको जहां जहां धोखा है वहांसे दूर रहना सिखाती है। इस शिक्षा पद्धति कारण पापके (१) प्रकीर्ण (२) अपाङ्क्तेय (३) मलिनीकरण (४) जातिभ्रंशकर (५) उपपातक (६) अतिपातक (७) महापातक ऐसे सात प्रकार बने। भिन्न भिन्न शास्त्र- कारोंने इसको भिन्न भिन्न नाम दिये हैं। धर्म शास्त्रोंमें अपनी तथा समाजकी निगाहोंसे गिरने या गिरानेके अनेक कारणोंकी लंबी सूची दी है। यह पापवृत्ति एक प्रकारसे मानसिक अनारोग्य है। जैसे कोई रोग पीढ़ी दर पीढ़ी आनुवंशिक चलता है वैसे पापवृत्ति भी आनुवंशिक चलती है। इसलिये कहीं कहीं एकके पापमें दूसरेकी जिम्मेदारी भी बतायी गयी है। जैसे सेवकके पापमें स्वामी, प्रजाके पापमें राजा, शिष्यके पापमें गुरु, पुत्रके पापमें पिता, यजमानके पापके पुरोहित आदि। जैसे पाप आनुवंशिक वैसे ही आनुषंगिक भी होता है। जैसे छूतकी बीमारी। गुरूका अनुकरणरूप, अथवा राजाके अनुकरणरूप अथवा समाज धुरीणोंके अनुकरणरूपमें, पाप समाजमें फैलता है ! ऐसे समय ये महाजन कठोर दंडके भागीदार माने गये हैं। पाप, मनुष्यके, पर्या- यसे समाजके नैतिक तथा आत्मिक अधःपतनका कारण होता है। खास करके कोई तत्वज्ञान जब मनुष्यके पाप छिपाने अथवा पापके समर्थनका साधन बनता है तब तो दंभ बढ़ जाता है और वह समाजके पतनका-सर्वतोमुखी पतनका साधन बनता है। विश्वके सभी धर्म-शास्त्रोंमें पापका विचार किया गया है। आधुनिक बुद्धिवादियोंने इस पर अनेक प्रकारसे विचार किया है। कुछ लोगोंने इसकी अवहेलना भी की है। सामान्य जनताको नीतिमार्ग पर स्थिर रखने के लिये इस कल्पनाकी अत्यंत आवश्यकता है। तथा गुप्तपापोंको रोकनेके लिये ईश्वरीय शासनकी भी। बिना इसके दूसरा चारा नहीं। पुण्य—जैसे पाप वैसे पुण्य। जो भिन्न प्रकारका इष्टफल देता है वह पुण्य है। ऐसी पुण्य शब्दकी व्याख्या की है। साथ साथ "विहित कर्मसे उत्पन्न होनेवाला" ऐसा भी कहा गया है। जैसे पाप अपनी निगाहोंसे गिराता है और क्लेश देता है वैसे पुण्य अपनी निगाहोंमें उठाता है और मनको समाधान देता है। धर्मशास्त्रोंने जैसे अपनी निगाहोंसे गिरानेवाले कार्योंकी सूचि दी है वैसे उठानेवाले कार्योंकी भी सूचि दी है। पुण्यसे, विहित काम करनेसे, व्यक्ति तथा पर्यायसे समाजकी शक्ति बढ़ती है। किये हुए पुण्यका प्रचार करनेसे पुण्य नष्ट होता है। इसलिये उसका प्रचार न करनेका आदेश दिया है। पुनर्जन्म—यह भारतीय दर्शनका वैशिष्ट्य है। कुछ अपवाद छोड़ कर भारतके सभी दर्शन पुनर्जन्म मानते हैं। मृत्युका अर्थ मनुष्यका शरीरपात है। मनुष्यका शरीर छूटने पर भी उसके आत्माका नाश नहीं होता। वह आत्मा-अपने कपड़े बदलनेवाले मनुष्यकी भांति दूसरा शरीर धारण करता है। इस सिद्धांतको पुनर्जन्म कहते हैं। ज्ञानेश्वरी १६५