ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
किंतु यहां अर्जुन । सोचेगा तेरा मन ।
काटनेका साधन । क्या है इसका ॥ २१० ॥
अंत तक है ब्रह्मका । ऊर्ध्व शाखायें उसका ।
औ' अरूपमें जिसका । ऊर्ध्व-मूल ॥ ११ ॥
स्थावरादिसे इसका तल । फैलाता जाता अनेक डाल ।
फिर दौड़ते दूसरे मूल । मनुष्य रूपमें ॥ १२ ॥
ऐसा गहरा और विस्तृत । कौन करेगा इसका अंत ।
ऐसा नहीं लाना क्षुद्र बात । अपने मनमें ॥ १३ ॥
इसको उखाडना कौनसी बात । इसमें आयास नहीं किंचित ।
बच्चोंको करने क्या भय-मुक्त । दूर भगाना क्या हौवेको ॥ १४ ॥
गंधर्व नगरोंको क्या गिराना । खरहेके सींगोंको क्या तोडनां ।
यदि होता है उसे तोड़ना । आकाश पुष्प ॥ १५ ॥
ऐसे है यह रूख । सत्य नहीं है देख ।
रहा क्या है जो निःशेष । करना उसे ॥ १६ ॥
हमने कहा जो इसका प्रकार । करते समय मूलका विस्तार ।
वंध्या संतति खेलती घरभर । वैसे ही है यह ॥ १७ ॥
होते ही जब जागृत । क्या रही स्वप्नकी बात ।
वैसे ही है वह पार्थ । पोला वृक्ष ॥ १८ ॥
अजी ! जैसे अब मैंने कहा था । इसका दृढ मूल यदि होता ।
तथा वैसा ही यदि यह होता । वास्तविक वृक्ष ॥ १९ ॥
तथा किस मायका संतान । कर सकते हैं उन्मूलन ।
अजी ! फूंकनेसे क्या गगन । उड़जायेगा ॥ २२० ॥
इसीलिये यहां धनंजया । यहां जिसका बखान किया ।
जैसे कूर्मिके घृतसे किया । आथित्य राजाका ॥ २१ ॥
अजी ! मृगजलका सरोवर । दूरसे ही दीखता सुन्दर ।
होता क्या मृग-जल सींचकर । फलोंका बाग ॥ २२ ॥
५८९ पुरुषोत्तमयोग
मूल अज्ञान ही अस्तित्व हीन । उसका कार्य हो कैसे महान ।
तब संसार-वृक्षकी अर्जुन । कथा कैसी ॥ २३ ॥
इसका नहीं है अंत । यह कहना भी पार्थ ।
यह है यहां यथार्थ । एक रूपसे ॥ २४ ॥
जब तक नहीं जगता । निद्राका अंत नहीं होता ।
तब तक नहीं प्रकाशता । अंत न हो रातका ॥ २५ ॥
इसी प्रकार जान तू पार्थ । विवेक उठाता माथ ।
तब रहता अश्वत्थ । भव रूप ॥ २६ ॥
जब तक वायु शांत । रहता नहीं निश्चित ।
तब तक है अनंत । कहाता तरंग ॥ २७ ॥
जैसे होता सूर्यका अस्त । मृग-जल भास समाप्त ।
या बुझती है दीप-ज्योत । मिटता प्रकाश ॥ २८ ॥
वैसे मूल अविद्याको निगलता । ज्ञान जब है वह प्रकट होता ।
तभी संसार-वृक्षका अंत होता । अन्यथा नहीं ॥ २९ ॥
अनादि है इसका अर्थ । केवल शाब्दिक नहीं पार्थ ।
उपरोक्त दृष्टिसे यथार्थ । जानना यहां ॥ ३०• ॥
संसार-वृक्षका नहीं । स्वरूपका पता कहीं ।
तब आरंभ भी कहीं । होगा कैसे ॥ ३१ ॥
होता जो जहांसे उत्पन्न । वहां उसका आदि जान ।
नहीं जिसका जन्म-स्थान । कहां मूल ॥ ३२ ॥
अजी ! जिसका जन्म है नहीं । अस्तित्वका कहीं पता नहीं ।
तभी यह अनित्यत्वसे ही । है अनादि ॥ ३३ ॥
अजी ! जो है बांझिनीका पुत्र । उसका कहां है जन्म-पत्र ।
नभमें नीली माटी सर्वत्र । कहना कैसे ॥ ३४ ॥
आकाश-कुसुमका अर्जुन । डंटल तोडेगा कहो कौन ।
तभी यह भवद्रुम जान । कहना अनादि ॥ ३५ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९०
जैसे घटका अनास्तित्व । किये बिना ही अस्तित्व ।
जैसे जान तू अनादित्व । इस वृक्षका ॥ ३६ ॥
अर्जुन देख तू यही । इसका आद्यंत नहीं ।
मध्यका भास जो वही । मात्र है भास ॥ ३७ ॥
ब्रह्म-गिरिसे निकलता । तथा समुद्रसे न मिलता ।
किंतु मध्यमें है भास होता । मृगांबुका जैसा ॥ ३८ ॥
अजी ! आद्यंतकी नहीं बात । तथा कहो नहीं होता पार्थ ।
किंतु अनस्तित्वसे प्रतीत । होते है यह ॥ ३९ ॥
जैसे अनेक रंगोंसे युक्त । इंद्र-धनुष होता दर्शित ।
वैसे होता है यह प्रतीत । अज्ञानीको ॥ २४० ॥
स्थितिकालमें यह फंसाता । ज्ञानीकी आंखोंमें भरता ।
कफनी पहन कर आता । बहुरूपी जैसे ॥ ४१ ॥
नहीं होते हुए अर्जुन । नीलिमा दिखाता गगन ।
वह भी क्षणभर मान । वैसे ही ॥ ४२ ॥
स्वप्नके वस्तु अनसक्त । यदि मान लिये वे सत्त ।
वैसे आभास यहां पार्थ । मिलता क्षणिक ॥ ४३ ॥
देखनेमें दीखता है सुंदर । पकडने जाता जब वानर ।
नहीं मिलता जैसे धनुर्धर । जलका बिंब ॥ ४४ ॥
तरंग-भंग होता न्यून । विद्युद्गति अल्प अर्जुन ।
इससे तीव्र-गति जान । इसके भासकी ॥ ४५ ॥
मारुत जैसे ग्रीष्मांतका । न जानते आगे पीछेका ।
इसी भांति इस वृक्षका । नहीं स्थैर्य ॥ ४६ ॥
नहीं इसका सृष्टि स्थिति लय । वैसे ही रूप नहीं धनंजय ।
तब इसका उन्मूलन कार्य । कठिन कैसे ॥ ४७ ॥
५९१ पुरुषोत्तमयोग
आत्म-ज्ञानका ले करवाळ—
अपना ही अज्ञानका बल । लेके हुवा यह दृढ-मूल ।
आत्म-ज्ञानका ले करवाळ । तोडना इसे ॥ ४८ ॥
ज्ञान छोड करके एक । करनेसे उपाय देख ।
उलझेगा तू अधिक । इसी वृक्षमें ॥ ४९ ॥
फिर कितने शाखसे शाखको । उछलेगा अध और ऊर्ध्वको ।
तभी काट तू अज्ञान मूलको । सम्यक्-ज्ञानसे ॥ २५० ॥
वैसे ही डोरका विषधर । मारने किया लठियोंका ढेर ।
उससे होगा केवल भार । व्यर्थका जो ॥ ५१ ॥
तैरने गंगा मृग-जलकी । दौड-धूप की नांव लानेकी ।
औ' लगाई नालेमें डुबकी । जो था यथार्थ ॥ ५२ ॥
अस्तित्व हीन जो संसार । नाशने किये श्रम घोर ।
तथा उसीमें धनुर्धर । गया आप ॥ ५३ ॥
जैसे नाशने स्वप्नका भय । जगना उपाय धनंजय ।
अज्ञान मूलका है उपाय । ज्ञान खड्ग ॥ ५४ ॥
लीलासे यदि उसको चलाना । तब वैराग्यका नित्य-नूतन ।
करना अभंग बल-साधना । बुद्धिको पार्थ ॥ ५५ ॥
होता वैराग्यका उत्थान । तब त्रिवर्ग है जान ।
मानो श्वानका वमन । लगता वह ॥ ५६ ॥
यहां तक है अर्जुन । वस्तु-जातमें संपूर्ण ।
अरुचि उभार मान । वैराग्यका हो ॥ ५७ ॥
फिर देहाहंताका म्यान । उतार करके तत्क्षण ।
प्रत्यग्बुद्धि करमें जान । धरना वह ॥ ५८ ॥
फिर वह विवेक सानपे धरना । 'ब्रह्म हूं' यह बोध तीव्र करना ।
फिर उसी एक बोधसे है घिसना । पूर्ण रूपसे ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९२
फिर निश्चयका मुष्टि-बल । देखना एक दो बार तौल ।
तब उसे धरना निश्चल । मनन तक ॥ २६० ॥
अपनेसे जब हथियार । निज-ध्याससे एक होकर ।
न रहेगा दौडने दूसरा । अपनेसे आगे ॥ ६१ ॥
आत्म-ज्ञानकी जो तलवार । अद्वयानुभव फैलाकर ।
न रहेगा भव-तरुवर । कहीं भी कभी ॥ ६२ ॥
शरदागमनका समीर । करता जैसे स्वच्छ अंबर ।
या उदित हो रवि अंधार । निगलता जैसे ॥ ६३ ॥
अथवा होते ही जागृत । होता जैसे स्वप्नका अंत ।
स्वबोध धारसे अश्वत्थ । कहीं रहता नहीं ॥ ६४ ॥
तब ऊर्ध्व या अधका मूल । नीचेका भी तब शाखा-जाल ।
न दीखता जैसे मृगजल । चांदनीमें वैसे ॥ ६५ ॥
इस प्रकार तू धनुधर । आत्म-ज्ञानकी ले तलवार ।
तोडकर यह तरुवर । ऊर्ध्वमूलका ॥ ६६ ॥
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥
फिर अपनेमें अपना रूप आप देखना-
फिर "इदं"का संबंध नहीं होता । "अहंत्व"के बिन जो प्रसिद्ध होता ।
यह अपना ही रूप है देखता । आप ही आप ॥ ६७ ॥
ढूंढे वही जो पद है महान
पीछे जहांसे मुडना न होता ।
विलीन होना उस रूपमें ही
प्रवृत्ति निकली जहां अनादि ॥ ४ ॥
५९३ पुरुषोत्तमयोग
(75)
किंतु दर्पणका ले आधार । तथा एकका दूसरा कर ।
रूप देखते हैं जो गंवार । वैसा नहीं यह ॥ ६८ ॥
यह ऐसे देखना है अर्जुन । कूंआ खोदनेसे पूर्व झरना ।
रहता है आप भरा हो पूर्ण । अपनेमें जैसे ॥ ६९ ॥
अथवा सूखने पर अंभ । निज-बिंबमें ही प्रतिबिंब ।
अथवा मिल जाता है नभ । घटाभावमें ॥ २७० ॥
अग्निका इंधनांश समाप्त होत । अग्नि जैसेमूल रूपमें लौटता ।
वैसे ही अपनेको देखना होता । आप ही स्वयं ॥ ७१ ॥
जिह्वाको अपना ही रस चखना । दृष्टिको अपना ही रूप देखना ।
वैसे उसका निरीक्षण करना । अपनेको ही ॥ ७२ ॥
या प्रकाशसे प्रकाशका मिलना । गगनमें गगनका है चढ़ना ।
अथवा पानीसे पानीकी भरना । अपनी गोद ॥ ७३ ॥
अपनेको आप लक्षित । करता है जब अद्वैत ।
वह ऐसे होता है पार्थ । कहता हूं मैं ॥ ७४ ॥
न देखते ही जो देखना । कुछ न जानते ही जानना ।
महापद जो है अर्जुन । आदि पुरुषका ॥ ७५ ॥
वहां भी उपाधिका ले आधार । होती वर्णनमें श्रुति तैयार ।
नाम रूपका गडबड फिर । करती है व्यर्थकी ॥ ७६ ॥
संसार स्वर्गसे जो उकता कर । मुमुक्षुके ज्ञान योगका आधार ।
जहां जाने निकले पांडुकुमार । प्रतिज्ञा-पूर्वक ॥ ७७ ॥
करते हैं संसारके आगे दौड़ । वे वीत-राग पुरुष कर होड ।
पीछे डालते ब्रह्म-लोकको गाड । अतिक्रमण कर ॥ ७८ ॥
अहंकार आदि जो भाव । तज कर अपना सर्व ।
आज्ञा-पत्र लेते पांडव । मूल गृहका ॥ ७९ ॥
आत्म विषयमें जो अज्ञान । लाया बड़ा संसारका ज्ञान ।
न था जो उसने दिया स्थान । मैं तू पनको ॥ २८० ॥
ज्ञानेश्वरी ५९४
अहांसे इतना धनुर्धर । होता विश्व-क्रमका विस्तार ।
व्यर्थ अभिष्ठ जिस प्रकार । होता निर्दैवीका ॥ ८१ ॥
कैसे वह रूप देखना । अपनेमें आप अपना ।
हिमसे है हिम जमना । हिम-रूपमें ॥ ८२ ॥
और एक जो उसका । लक्षण है जाननेका ।
उससे पुनर्जन्मका । होता है अंत ॥ ८३ ॥
किंतु उससे मिलते जैसे । भरकर सर्वत्र ज्ञानसे ।
महा-प्रलयमें नीर जैसे । भरा रहता है ॥ ८४ ॥
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै-
र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥
वही प्राज्ञ इस परमात्म-पदको प्राप्त करते हैं—
जिस पुरुषका मन । छोड़ गये मोह मान ।
वर्षांतमें जैसे घन । आकाशको ॥ ८५ ॥
जो है अकिंचन निष्ठुर । उससे ऊबता है घर ।
वैसे ही उसको विकार । तज जाते हैं ॥ ८६ ॥
उखडता फला हुवा केल । वैसे आत्म-लाभसे प्रबल ।
क्रिया कलाप होते उन्मूल । अपने आप ॥ ८७ ॥
वृक्ष है जब जलता । पक्षी-गण उड़ जाता ।
वैसे उसको तजता । विकल्प सारा ॥ ८८ ॥
जो मान मोहासह संग-दोष
उखाड निष्काम अध्यात्म निष्ठ ।
निर्द्वन्द्व जो हो सुख दुःख मुक्त
वे प्राज्ञ पाते वह नित्य धाम ॥ ५ ॥
५९५ पुरुषोत्तमयोग
जैसे सकल दोष ऋण । अंकुरती पृथ्वी अर्जुन ।
उस भेद बुद्धिका भान । नहीं होता उसे ॥ ८९ ॥
जब सूर्यका उदय होता । रातका अस्तित्व न रहता।
वैसे देहाहंकार भागता । अविद्या सह ॥ २९० ॥
जैसे जीवको आयुष्य हीन । छोडता शरीर उसी क्षण ।
वैसे तजता द्वैत अर्जुन । उस पुरुषको ॥ ९१ ॥
पारसको लोहेका अकाल होता । रविसे कभी अंधार न मिलता ।
द्वैत-बुद्धिका दर्शन नहीं होता । उसको कभी ॥ ९२ ॥
अजी ! सुख दुःखका आकार । द्वंद्व होते देहमें गोचर ।
उसके सन्मुख धनुर्धर । नहीं होते कभी ॥ ९३ ॥
स्वप्नका राज्य या मरण । हर्ष या शोकका कारण ।
न होता जागृतिमें जान । उसी भांति ॥ ९४ ॥
वैसे सुख दुःख रूप । द्वंद्व जो पुण्य औ' पाप ।
न घेरते उसे साप । गरुड़को जैसे ॥ ९५ ॥
तथा अनात्म-वर्ग नीर । छोड़ आत्म-रसका क्षीर ।
करता है जो स-विचार । राज हंस-सा ॥ ९६ ॥
वर्षा कर जैसे पृथ्वीपर । अपने ही रसको भास्कर ।
खींचता रश्मियां फैलाकर । अपने ही बिंबमें ॥ ९७ ॥
आत्म-भ्रांतिके लिये ही वैसे । बिखुरे वस्तु सभी ओरसे ।
एकत्र किये ज्ञान दृष्टिसे । अखंड जो ॥ ९८ ॥
तथा निर्णयमें आत्माका । विवेक डूबता उनका ।
प्रवाह डूबता गंगाका । सिंधुमें जैसे ॥ ९९ ॥
या होनेसे आप संपूर्ण । न रहा आशाका कारण ।
न करता इच्छा गगन । परे जानेकी ॥ ३०० ॥
जैसे हैं अग्निका डोंगर । न लेता बीज अंकुर ।
उसके मनमें विकार । न आते वैसे ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९६
निकलते ही मंदराचल । हुवा क्षीर-सागर निश्चल ।
उसमें कामोर्मियोंका उबाल । नहीं होता ॥ २ ॥
षोडश कलायुत चंद्र-पूर्ण । न दीखे किसी ओरसे अपूर्ण ।
वैसे अपेक्षाका न्यून उत्पन्न । न होता उसमें ॥ ३ ॥
निरूपका कैसे करूं वर्णन । आंधीमें नहीं टिकता रजकण ।
वैसे नहीं आते विषय अर्जुन । उसके सम्मुख ॥ ४ ॥
एवं जिन्होंने किये ऐसे । यज्ञ ज्ञानाख्य हुताशसे ।
यहां वे मिलते हैं वैसे । मानो स्वर्णमें स्वर्ण ॥ ५ ॥
मेरा वह परम पद—
वहां कहा तो कहां । पूछेगा यदि यहां ।
न पहुंचता जहां । नाशका नाम ॥ ६ ॥
दृश्यत्वसे जो देखा जाता । या ज्ञेयत्वसे जाना जाता ।
अमुक ऐसे कहा जाता । ऐसा नहीं जो ॥ ७ ॥
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६ ॥
किंतु जो दीपके प्रकाशसे । या चन्द्राग्निके प्रकाशनेसे ।
अधिक क्या कहूं मैं इससे । न प्रकाशता सूर्यसे भी ॥ ८ ॥
ऐसे प्रकाशसे जो दीखता । उससे वह नहीं दीखता ।
जिससे विश्व दर्शित होता । उससे वह लोप ॥ ९ ॥
खोता जब शुक्तिापन । भासता रजतपन ।
या लोपसे सर्पपन । दीखता डोरा ॥ ३१० ॥
श्रेष्ठ जो चंद्र-सूर्यादिक । बडे हैं प्रकाश दायक ।
उसके अंधारमें देख । प्रकाशते हैं ॥ ११ ॥
प्रकाशता नहीं सूर्य उसको अग्नि चंद्र भी ।
न लौटता वहां जाके मेरा उत्तम धाम जो ॥ ६ ॥
५९७ पुरुषोत्तमयोग
तेजकी वह महा-रास । सर्व-भूतात्मक निवास ।
चंद्र-सूर्यका भी मानस । उजलाता है ॥ १२॥
तभी चंद्र सूर्य हैं स्फुलिंग । उस प्रकाशके हैं अंग ।
सभी तेज हैं उसके भाग । जो है तेजस्वी ॥ १३ ॥
तथा होते ही जिसका उदय । लोपता विश्व सह चंद्र-सूर्य ।
जैसे होते ही सूर्यका उदय । लोपते चंद्र तारा ॥ १४ ॥
अथवा आते ही जागृति काल । मिटता है स्वप्न-राज्य विशाल ।
तथा नहीं रहता मृग-जल । सूर्यास्तमें जैसे ॥ १५ ॥
उस तत्वके पास । नहीं कोई आभास ।
परम धाम खास । मेरा वह ॥ १६ ॥
जो जो कोई वहां गये । लौट कर नहीं आये ।
सागरमें मिल गये । स्रोत जैसे ॥ १७ ॥
अथवा नमकका कुंजर । डूब गया लवण सागर ।
कभी न आयेगा लौटकर । उसी भांति ॥ १८ ॥
या पहुंची जो अंतराल । नहीं लौटती अग्नि-ज्वाल ।
तप्त लोहेपे पड़ा जल । न लौटता जैसे ॥ १९ ॥
वैसे मुझसे हुवा मिलन । ज्ञानाग्निमें शुध्द जो अर्जुन ।
नहीं होगा पुनरागमन । उसका कभी ॥ ३२० ॥
ब्रह्म लीन हो कर जो नहीं लौटते वे मूलतः अभिन्न है या भिन्न ?--
कहता प्रज्ञा-भूमि-पति पार्थ । जी जी प्रसाद किंतु एक बात ।
विनय करता हूं देना चित्त । कृपा पूर्वक ॥ २१ ॥
प्रभुसे जो स्वयं एक होते । तथा लौटकर नहीं आते ।
वे प्रभुसे हैं अभिन्न होते । अथवा भिन्न ॥ २२ ॥
यदि भिन्न ही है अनादि सिध्द । तो नहीं आते यह असंबध्द ।
सुमनमें जाकर ही षट्पद । सुमन होगा कैसे ? ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९८
अजी ! लक्ष्यसे जो भिन्न ऐसे । बाण लक्ष्य स्पर्श कर जैसे ।
लौटकर आते ही हैं जैसे । आयेंगे ही ॥ २४ ॥
या वे तू ही है स्वभावसे । किसको मिलना किससे ।
अपनेको आप शस्त्रोंसे । कैसे चितेरें ॥ २५ ॥
यदि हैं तुझसे अभिन्न जीव । तेरा ही संयोग वियोग देव ।
नहीं कहा जाता है अवयव । शरीरसे जैसे ॥ २६ ॥
तथा जो सदा भिन्न हैं तुझसे । नहीं मिल सकते कभी वैसे ।
फिर लौटते हैं या नहीं वहांसे । यह बात है व्यर्थ ॥ २७ ॥
तब तेरा रूप देख कर । नहीं आते हैं जो लौट कर ।
वह कौन कह कृपा कर । विश्वतोमुख देव ॥ २८ ॥
वह संदेह जो अर्जुनका । सुन शिरोमणि सर्वज्ञका ।
तुष्ट हुवा अपने शिष्यका । बोध देख कर ॥ २९ ॥
कहते हैं तब महामते । मुझे पाकर जो न लौटते ।
उनमें दोनों भांतिके होते । भिन्न औ' अभिन्न ॥ ३० ॥
जीव मुझसे अभिन्न भिन्न हैं-
देखा तो यदि गहराईसे । मैं हूं वे समरसैक्यसे ।
तथा देखे तो ऐसे या वैसे । मुझसे भिन्न ॥ ३१ ॥
जैसे पानीसे भिन्न सकल । दीखते हैं उठते कलोल ।
नहीं तो तरंग केवल । पानी ही पानी ॥ ३२ ॥
अथवा स्वर्णसे हैं भिन्न । दीखते हैं सब भूषण ।
किंतु वह स्वर्ण ही स्वर्ण । संपूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥
वैसे ही ज्ञानकी दृष्टिसे । अभिन्न सदा हैं मुझसे ।
भिन्नता दीखती जिससे । वह है अज्ञान ॥ ३४ ॥
देखें यदि आत्म-दृष्टिसे । मुझे छोड़ दूसरा कैसे ।
भिन्नाभिन्न व्यवहारसे । जानेगा जो ॥ ३५ ॥
५९९ पुरुषोत्तमयोग
सारा ही आकाश निगलकर । व्याप्त होता ब्रह्मांड भास्कर ।
तब कहां प्रति-बिंब और । कहां रश्मि-जाल ॥ ३६ ॥
अथवा कल्पांतमें भरा नीर । उसमें कैसे ओघ धनुर्धर ।
कैसे होंगे मुझमें अविकार । अंशादि तब ॥ ३७ ॥
किंतु जैसे ओघके कारण । ऋजु नीर दीखे वक्र बन ।
रविको भिन्न पन अर्जुन । आता नीरमें ॥ ३८ ॥
गगन वर्तुल या चौकोर । कैसे मिलेगा पांडुकुमार ।
घट मठसे घिर आकार । दीखेगा वैसे ॥ ३९ ॥
अजी ! निद्राका ले आधार । स्वप्नमें राजा बनकर ।
अकेलेसे ही जग भर । होता राज्य ॥ ४० ॥
या मिलनेसे कस हीन । शुध्द स्वर्ण जैसे अर्जुन ।
कसमें उतरता निम्न । वैसे मैं स्वमायामें ॥ ४१ ॥
उससे फैलता है अज्ञान । कोऽहं भावका उठता प्रश्न ।
विचारके कहता मन । मैं देह हूं ऐसे ॥ ४२ ॥
ममैकांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥
शरीर है जितना आत्मज्ञान भी है अपना—
ऐसे शरीर है जितना । आत्म-ज्ञान भी आपना ।
जिससे है अनुभवना । मेरा अल्पांश ॥ ४३ ॥
वायु संयोगसे है सागर । उमडता ले तरंगाकार ।
वह समुद्रांश धनुर्धर । दीखता अल्प ॥ ४४ ॥
वैसे जडको चेतना देता । देहाहंता प्रकट करता ।
मैं जीव हूं ऐसा भास होता । जीव लोकका ॥ ४५ ॥
जगमें अंश मेरा ही हुआ जीव सनातन ।
खींचता है प्रकृतीसे मन औ' पांच इंद्रियां ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ६००
किंतु जो जीवका बोध देता । हलनल प्रकट करता ।
तभी वह शब्द अर्थ देता । लोकमें जीव ॥ ४६ ॥
जन्मना तथा मरना । इसको सच मानना ।
मेरा संसार कहना । यह जीवलोक ॥ ४७ ॥
ऐसे जीवलोकमें अर्जुन । करता मेरा अवलोकन ।
जैसे चन्द्रमा नीरमें जान । जो उदकातीत ॥ ४८ ॥
जैसे कभी कोई स्फटिक । केशर पर पड देख ।
प्रकट होता लाल देख । किंतु न होता लाल ॥ ४९ ॥
वैसे अनादिपन नहीं टूटता । अकर्तापन मेरा नहीं भंगता ।
किंतु कर्ता भोक्ता ऐसा भासता । यह भ्रम है जान ॥ ३५० ॥
या आत्मा है जो निर्विकार । प्रकृतिसे हो एकाकार ।
प्रकृतिके धर्मानुसार । देखता अपनेमें ॥ ५१ ॥
मन सह सभी इंद्रिय । करते प्रकृतिका कार्य ।
उन्हें अपना धनंजय । होना प्रवृत्त ॥ ५२ ॥
स्वप्नमें जैसे कोई परिव्राजक । आप अपना कुटुंब होके देख ।
भागदौड़ करता मोह मूलक । जैसे वैसे भी ॥ ५३ ॥
वैसे है अपनी ही विस्मृति । आत्मा आप ही होता प्रकृति ।
उसीको मान सुभद्रापति । भजता उसीको ॥ ५४ ॥
मन रथ पर चढ़कर । श्रवण द्वारसे हो बाहर ।
शब्द-काननमें भयंकर । घुसता है वह ॥ ५५ ॥
वैसे ही प्रकृतिकी रास । त्वचाके हाथमें दे खास ।
स्पर्श-द्वारसे है प्रवास । करता वनमें ॥ ५६ ॥
अजी ! कभी किसी अवसर । नेत्र-द्वारसे पड़ बाहर ।
चढ़ता है रूपका डोंगर । स्वैर-भावसे ॥ ५७ ॥
वैसे ही रसनाका पथ । चलकरके वह पार्थ ।
रस भरने उदरार्थ । लगता वह ॥ ५८ ॥
६०१ पुरुषोत्तमयोग
(76)
अथवा पथ कर घ्राण । देहेश करता गमन ।
फिर जो गंधके दारुण । अरण्य लांघता ॥ ५९ ॥
ऐसे वह इंद्रिय नायक । करके मनको सहायक ।
शोधते जाता है शब्दादिक । विषय सारे ॥ ३६० ॥
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८ ॥
जाते समय जीव इंद्रियोंके साथ जाता है—
किंतु ऐसे कर्ता भोक्ता । जिवन-रूप दीखता ।
जैसे तनमें करता । यह प्रवेश ॥ ६१ ॥
अजी! कोई विलासी तथा धनिक । जाना जाता है उसी समय देख ।
बसता है जब वह हो स्थाइक । राजधानीमें ॥ ६२ ॥
वैसे बढ़ता कर्तृत्व अहंकार । विषयेंद्रिय-तांडव धनुर्धर ।
जाना जाता है तभी पाता शरीर । जब यह जीव ॥ ६३ ॥
अथवा छोड़ता है शरीर । तब इंद्रियां निकाल कर ।
अपने ही साथ धनुर्धर । ले जाता है ॥ ६४ ॥
जैसे अपमानित अथिति । ले जाता है सुकृत-संपत्ति ।
या ले जाता है गुड्डेकी गति । सूत्र-तंतू ॥ ६५ ॥
अथवा प्रकाश अस्तमान । ले जाता है सबका दर्शन ।
अथवा है सुगंध पवन । ले जाता जैसे ॥ ६६ ॥
वैसे मन सह इंद्रियां । देह-राज है धनंजय ।
शरीर तजते समय । ले जाता है ॥ ६७ ॥
जैसे पुष्पादिसे वायु ले जाता गंध खींचके ।
वैसे लेकर ये ईश छोड़ता धरता तन ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०२
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९ ॥
यहां अथवा स्वर्गमें फिर । लेता जिस देहका आधार ।
करता है वैसा ही विस्तार । मन-इंद्रियोंका ॥ ६८ ॥
जैसे बुझते ही ज्योति । ले जाती अपनी दीप्ति ।
फिर जब है जलती । वैसा ही प्रकाश ॥ ६९ ॥
किंतु ऐसे है जो परिवर्तन । करते अविवेकीके नयन ।
जानते इतना तो अर्जुन । सामान्य बात ॥ ३७० ॥
आत्मा है जो शरीरमें आया । उसीने विषय भोग किया ।
या वही शरीर छोड़ गया । इतना जानते ॥ ७१ ॥
वैसे आना तथा जाना । करना है या भोगना ।
देहका कार्य है माना । उसने आत्माका ॥ ७२ ॥
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्तिज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥
योगी आत्म-धर्म आत्मामें तथा देह-धर्म देहमें देखता है—
किंतु छोटासा देह उत्पन्न । तथा देख उसमें चेतन ।
या उसमें देख आंदोलन । कहते वह आया ॥ ७३ ॥
श्रोत्र जिह्वा त्वचा चक्षु घ्राण औ' साथ हो मन ।
आधार इनका लेके सारे विषय भोगता ॥ ९ ॥
तजता धरता देह भोगता गुण-युक्त जो ।
न देखते इसे मूढ देखते ज्ञान चक्षु ही ॥ १० ॥
यत्नसे देखते योगी इसको हियमें बसे ।
चित्त-हीन अशुद्धात्मा यत्नसे भी न देखते ॥ ११ ॥
६०३ पुरुषोत्तमयोग
वैसे ही इंद्रियां उसके साथ । करती अपना व्यापार पार्थ ।
उसको कहते लोग यथार्थ । मोगना ऐसे ॥ ७४ ॥
भोग-क्षीणसे पीछे स्वाभाविक । शरीर गिरता है यह देख ।
वह गयारे गया ऐसे चीख-। कहते हैं बंसे ॥ ७५ ॥
जैसे देखके वृक्ष हिलता । कहते हैं पवन बहता ।
किंतु जहां वृक्ष नहीं होता । नहीं क्या पवन ॥ ७६ ॥
या रखकर सम्मुख दर्पण । उसमें कर अपना दर्शन ।
भासता आप हुवा है उत्पन्न । उससे पूर्व नहीं क्या ॥ ७७ ॥
या परे हटाके दर्पण । अपना लोप हुवा मान ।
आप नहीं ऐसे अर्जुन । ऐसा मानना क्या ॥ ७८ ॥
शब्द है जैसे आकाशका । किंतु माना जाता मेघका ।
या चंद्रके वेग अभ्रका । करता आरोप ॥ ७९ ॥
वैसे शरीरका आवगमन । निर्विकार आत्मापे आरोपण ।
करते हैं वे भ्रमसे अर्जुन । निश्चय-पूर्वक ॥ ३८० ॥
आत्मामें यहां आत्म-धर्म । तथा देहमें देह-धर्म ।
जानते जो इसका मर्म । वे हैं दूसरे ही ॥ ८१ ॥
ज्ञानसे हैं जिसके नयन । देखते हैं आत्म भेदके तन ।
मेघ-भेदमैं सूर्य-कीरण । ग्रीष्ममें जैसे ॥ ८२ ॥
वैसे ही कर विवेक विस्तार । ज्ञानियोंकी बुद्धि होती है स्थिर ।
देखते आत्माको वैसे ही धीर । इस भांतिसे ॥ ८३ ॥
जैसे तारागणसे भरा गगन । जलमें पडा है दीखता अर्जुन ।
किंतु नहीं पडा टूटके गगन । यह जानते वैसे ॥ ८४ ॥
गगनके स्थानपे है गगन । यह केवळ है आभास जान ।
वैसे हैं आत्म-शरीर भिन्न । मानते हैं वे ॥ ८५ ॥
कलकल बहते पानीमें चंचल । दिखती है चांदनीकी जो हलचल ।
चांदनी होती चंद्रके साथ निश्चल । जानके देखते हैं ॥ ८६ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०४
या डबरा ही भरता सूखता । सूर्य जैसेका वैसा है रहता ।
वैसे ही शरीर आता औ' जाता । देखते हैं ऐसे ॥ ८७ ॥
घट मठ बनाये । वैसे ही तोड़ दिये ।
आकाश रह गये । सदा अखंड ॥ ८८ ॥
वैसे अखंड आत्म-सत्ता । तन है जो आता जाता ।
अज्ञान-दृष्टिसे कल्पित । जानते हैं ज्ञानी ॥ ८९ ॥
चैतन्य न बढ़ता न घटता । वह कर्म न करता कराता ।
ऐसे आत्म-ज्ञानसे है जानता । शुद्ध-रूपसे ॥ ३९० ॥
तथा स्वाधीन होगा संपूर्ण ज्ञान । प्रज्ञा परमाणुका अंतदर्शन ।
सकल शास्त्रोंका रहस्य अर्जुन । किसी समय ॥ ९१ ॥
किंतु है ऐसी इसकी उत्पत्ति । मनमें न रही यदि विरक्ति ।
होती कभी सर्वात्मकी प्राप्ति । विद्वत्तासे ॥ ९२ ॥
मुखमें भरा है सदैव ज्ञान । अंतःकरणमें विषयोंका स्थान ।
इससे न होगी प्राप्ति अर्जुन । मेरी कभी ॥ ९३ ॥
करनेसे ग्रंथ पठन । टूटेगा भव-बंधन ।
करनेसे ग्रंथ स्पर्शन । होगा क्या पाठ ? ॥ ९४ ॥
आंखमें पट्टी बांधकर । नाकसे मोति सूंघकर ।
समझेगा क्या धनुर्धर । उसका मूल्य ॥ ९५ ॥
वैसे चित्तमें अहंताका स्थान । जिह्वा पर शास्त्र संपूर्ण ।
इससे नहीं होगा मेरा ज्ञान । करोड़ों जन्मोंमें ॥ ९६ ॥
मैं अकेला सबमें भरा हुवा हूं—
एक हूं मैं सबमें व्याप्त । भूतमात्रमें हूं समस्त ।
कहता हूं मैं यही बात । स्पष्ट रूपसे ॥ ९७ ॥
६०५ पुरुषोत्तमयोग
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥
वैसे सूर्य सह जो संपूर्ण । विश्वकी रचना है अर्जुन ।
प्रकाश वह मेरा ही जान । आद्यंत है जो ॥ ९८ ॥
जल सोखकर लेता सविता । जलांश जो बादमें है रहता ।
चंद्रमें रहती है जो पांडुसुता । जोस्ना वह मेरी ॥ ९९ ॥
तथा दहन पचन सिद्धि । करता रहता निरवधि ।
हुताग्नै वह तेजोवृद्धि । जान मेरी ही ॥ ४०० ॥
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥
प्रवेश किया मैंने भूतलमें । तभी यह महासिंधु जलमें ।
नहीं पिघला है युग-युगमें । मृत्तिका पिंड ॥ १ ॥
तथा भूत ही स-चराचर । धरा है धरतीने अपार ।
पृथ्वी-तलमें प्रवेश कर । उसको धरा मैंने ॥ २ ॥
गगनमें मैं पांडुसुत । चंद्रके रूपसे अमृत ।
भरा हुवा मैं स्वचलित । बना सरोवर ॥ ३ ॥
वहांसे निकलते रश्मिकर । उनको धरकर मैं अपार ।
सभी वनस्पतियोंका आगर । भरता रहता मैं ॥ ४ ॥
इससे सस्यादिक सकल । करते धान्यादिका सुकाल ।
तथा अन्नादिसे प्रतिपाल । करता सबका ॥ ५ ॥
सकल जन जीवनका जीवन 'वैश्वानर' मैं हूं—
ऐसे उत्पन्न किया हुवा अन्न । जिस भांति करके मैं दीपन ।
जिससे जीवका हो समाधान । करता हूं ऐसे ॥ ६ ॥
सूर्यमें जलता तेज विश्वको है प्रकाशता ।
चंद्रमें अग्निमें वैसे मेरा ही तेज जान तू ॥ १२ ॥
धृतिके बलसे भूत धरता मैं धरा बना ।
पोसता वनस्पतीको रससे भर सोम मैं ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०६
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥
प्राणिमात्रके नाभि-कंदपर । अंगीठी बनके पांडुकुमार ।
जलता हूं मैं दीप्ति बनकर । जठरमें सदैव ॥ ७ ॥
धौंकनी बनाकर प्राणापान । फूंकता रहता हूं रात दिन ।
पचा डालता मैं कितना अन्न । इसी उदरमें ॥ ८ ॥
शुष्क अथवा स्निग्ध । सुपक्व या विदग्ध ।
किंतु मैं चतुर्विध । पचाता अन्न ॥ ९ ॥
ऐसे मैं ही हूं सकल जन । जीवनका हूं सार-जीवन ।
औ' जीवनका मुख्य-साधन । वैश्वानर मैं हूं ॥ ४१० ॥
कहूं क्या इससे अधिक पार्था । मेरी सर्व-व्यापककी कथा ।
विश्वमें दूसरा नहीं सर्वथा । मेरे बिन कुछ भी ॥ ११ ॥
संसारमें कुछ सुखी और कुछ दुखी क्यों ? -
किंतु इसका कारण । सदा सुखी हैं कुछ जन ।
तथा कुछ दुःख मगन । दीखते यहां ॥ १२ ॥
अजी ! संपूर्ण नगरमें जैसे । दीप जलते एक ही दीपसे ।
किंतु कुछ जलते उसमेंसे । कुछ बुझते क्यों ? ॥ १३ ॥
यहां करता ऐसा संशय । तेरा मन यदि धनंजय !
अबका है उत्तम समय । संदेह निवृत्तिका ॥ १४ ॥
मैं भर रहा यहां संपूर्ण । इसमें अन्यथा नहीं जान ।
जिसका जैसा अंतःकरण । दीखता वैसे ॥ १५ ॥
जैसे आकाशध्वनि है जो एक । गूंजता नाद बन अनेक ।
भिन्न भिन्न वाद्योंमेंसे तू देख । धनंजय ॥ १६ ॥
वैश्वानर बना मैं ही जीवोंके तन में बसा ।
पचाता अन्न चारो ही प्राण अपान फूंकके ॥ १४ ॥
५०७ पुरुषोत्तमयोग
या एक सूर्य जैसे अर्जुन । लोक चेष्टासे होकर भिन्न ।
उपयोग होता अनुदिन । देखता है तू ॥ १७ ॥
नाना बीज धर्मानुरूप । वृक्ष-रस बनता आप ।
वैसे बदलता स्वरूप । जीवमें मेरा ॥ १८ ॥
जैसे नीलमणिका हार । सर्पत्व लेता भयंकर ।
सुखद होता निरंतर । जब दूसरेको ॥ १९ ॥
अथवा जैसे स्वातीका उदक । सीपमें मोति औ, व्यालमें विष ।
वैसे सु ज्ञानियोंको मैं हूं सुख । दुख अज्ञानियोंको ॥ ४२० ॥
सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥
सबके हृदयमें जो आत्म-स्फुरण है वह मैं हूं—
वैसे ही होती हृदय मध्यमें । अमुक हूं ऐसी उर्मी सभमें ।
वह स्फुरण जो दिन रातमें । होता मैं हूँ ॥ २१ ॥
किंतु संत संगमें होता । या योग-ज्ञानमें बैठता ।
गुरु-चरण उपासता । वैराग्यसे ॥ २२ ॥
ऐसे ही सत्कर्ममें नित । अज्ञान नष्ट होता पार्थ ।
उसका होता अहं स्थित । आत्म-रूपमें ॥ २३ ॥
वे अपने आपको देख । पाते मुझ आत्मामें सुख ।
मेरे बिन भिन्न न देख । कभी कहीं ॥ २४ ॥
सर्वान्तरोंमें करता निवास
देता स्मृति ज्ञान विवेक मैं ही ।
मैं ही अकेला चिर वेद-वेद्य
वेदज्ञ मैं वेद रहस्य कर्ता ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०८