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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥
सबका मूल आधार मैं हूं--
ब्रह्म नामका आधार । मैं हूं यहां धनुर्धर ।
औ' अन्य शब्दका सार । वह भी मैं हूं ॥ ४ ॥
जैसा मंडल औ' चंद्रमा । अभेद होते हैं जान मर्म ।
वैसे ही मैं और हे ब्रह्म । एक-रूप ॥ ५ ॥
तथा नित्य जो निष्कंप । अनावृत्त धर्मरूप ।
सुख-रूप जो अमाप । अद्वितीय ॥ ६ ॥
विवेक अपना काम । करके मिलता धाम ।
निष्कर्षका है निःसीम । वह भी मैं हूं ॥ ७ ॥
विजय गया अब दूर-
अजी ! कीजिये यह श्रवण । अनन्य भक्त-प्रिय श्रीकृष्ण ।
करता है पार्थसे कथन । कहता संजय ॥ ८ ॥
धृतराष्ट्र कहता यह सुन । तुझसे यह पूछता है कौन ।
बिन पूछे ही व्यर्थका भाषण । करता क्यों तू ? ॥ ९ ॥
विजयकी वार्ता तू कहकर । हमारी व्यग्रता .दूर कर ।
कहता है "विजय गया दूर" । संजय मनमें ॥ ४१० ॥
संजय है मनमें विस्मित । वैसे ही है अतिशय त्रस्त ।
किस भांति यह द्वेश-रस । श्रीकृष्णसे है ॥ ११ ॥
फिर भी वह कृपालु हो तुष्ट । इन्हें करें आत्म-विवेक पुष्ट ।
जिससे हो इनका रोग नष्ट । महा-मोहका ॥ १२ ॥
आधार ब्रह्मका मैं हूं वैसे ही अमृतत्वका ।
शाश्वत धर्मका भी मैं तथा निस्सीम सुखका ॥ २७ ॥
(72) ५६९ गुण-निस्तारयोग

करता है संजय ऐसा चिंतन । तथा करता संवादका श्रवण ।
जिससे उमडकर आता मन । हर्षातिरेकसे ॥ १३ ॥
ऐसा हो वह उत्साहित । अब श्रीकृष्णार्जुनकी बात ।
कहेगा तो देकर चित्त । सुनियेगा ॥ १४ ॥
उन अक्षरोंका जो है भाव । पहुंचाऊंगा आपके ठांव ।
कहता सुनिये ज्ञानदेव । निवृत्तिका दास ॥ १५ ॥
गीता श्लोक २७
ज्ञानेश्वरी ओवी ४१५.

१५
पुरुषोत्तम-दर्शनयोग
श्रीसद्गुरुकी मानस-पूजा—
अपना यह अंतःकरण । बना करके श्रीसिंहासन ।
उस पर रखेंगे चरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥
ऐक्य भावकी अंजली । इंद्रिय-कमल-कली ।
भरकर पुष्पांजली । देंगे अर्घ्य ॥ २ ॥
अनन्यता-उदक शुद्ध । संस्कार निष्ठाका सु-सिद्ध ।
लगावें अनामिका गंध । चंदन-तिलक ॥ ३ ॥
स्वर्णिम प्रेमके नूपुर । श्रीचरणमें सुकुमार
चढायें समर्पित कर । विशुद्धतासे ॥ ४ ॥
अनन्यतासे जो है दृढ । अव्यभिचारका निचोड़ ।
बनाके चरणोंके जोड़ । चढ़ायेंगे ॥ ५ ॥
आनंद-मोद बहुल । सात्विकताके मुकुल ।
खिले हुए अष्ट-दल । चढायें पदपे ॥ ६ ॥
जलायें अहंका धूप । उतारें नाहंका दीप ।
समरस होके आप । मिले निरंतर ॥ ७ ॥
बनाके मेरे तन औ' प्राण । चढाऊं पादुका श्रीचरण ।
करूं भोग-मोक्षका निंब-लोण । उन चरणों पर ॥ ८ ॥
इन गुरु-चरणोंकी सेवा । देती सकल पुरुषार्थ मेवा ।
प्राप्त हो हम वह सुदैव । ऐसा करें हम ॥ ९ ॥

देता अंतिम-विश्रांति-स्थान । वहां तक खिलता जो ज्ञान ।
बनाता सुधा-सिंधु महान । वाचाका वह ॥ १० ॥
असंख्य पूर्ण-सुधाकर । करें जिसपे न्योच्छावर ।
होता है वक्तृत्व मधुर । जिस दैवसे ॥ ११ ॥
सूर्य उदय जो पूर्व-दिशा । देती है जगतको प्रकाश ।
करती दीवाली ज्ञान-दशा । वैसे श्रोताओंकी ॥ १२ ॥
जिससे स्फुरता है व्याख्यान । लगता नाद-ब्रह्म भी बौना ।
मोक्ष-धाम भी है शोभा-हीन । उसके सम्मुख ॥ १३ ॥
मंडपमें श्रवण सुखके । जगतको वसंत ऋतुके ।
सुख मिले व्याख्यान-वल्लीके । ऐसा बहार आता ॥ १४ ॥
नहीं लगनेसे जिसकी थाह । लौटती है वाचा मनके सह ।
उसके शब्दमें आता है वह । कितना आश्चर्य ॥ १५ ॥
ज्ञान जिसे नहीं जानता । ध्यानमें भी जो नहीं आता ।
वह है अगोचर रमता । उसकी गोष्ठियोंमें ॥ १६ ॥
इतना बड़ा जो सौभग । बनता है वाचाका अंग ।
गुरु-पद-पद्म-पराग । प्राप्त होता ॥ १७ ॥
ऐसा यह भाग्य है नहीं । मेरे बिन अन्यको कहीं ।
कहता है आपसे यहीं । ज्ञानदेव ॥ १८ ॥
रहा हूं अबोध बालक । श्रीगुरुका इकलौता एक ।
इसी लिए कृपा स्वाभाविक । मिली मुझको मात्र ॥ १९ ॥
मेघमाला जैसे संपूर्ण । देती है चातकको प्राण ।
मेरे लिए गुरु-चरण । बने वैसे ॥ २० ॥
तभी मेरा रीता ही मुख । करने लगा बकबक ।
किंतु निकला स्वाभाविक । गीता तत्व मधुर ॥ २१ ॥
होता है जब दैव अनुकूल । रेती बनते मोति अनमोल ।
शत्रु भी बन जाते हैं सकल । ऐश्वर्य सह मित्र ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५७२

चुल्हेपे चढाये हुए हरल । पक जाते अमृतसे चावल ।
भूखेका रखना यदि काल । जगन्नाथको ॥ २३ ॥
ऐसे ही जिसे श्रीगुरुवर । करते हैं जब अंगीकार ।
बन जाता है सारा संसार । मोक्षधाम ॥ २४ ॥
देखो कैसे नारायण । पांडवोंके अवगुण ।
बना देते हैं पुराण । विश्व-वंद्य ॥ २५ ॥
ऐसे श्री निवृत्तिराज । मुझ अज्ञानिमें आज ।
लाते हैं ज्ञानका ओज । स्व-कृपासे ॥ २६ ॥
रहने दे यह गुरु-गुण वर्णन । वर्णनसे होती है महिमा मलीन ।
गुरुवर्णनका मुझमें कहां ज्ञान । इसीलिए ॥ २७ ॥
उनकी कृपासे सदय । कहते गीता साभिप्राय ।
धोता हूं मैं आपके पूज्य । अब श्री चरण ॥ २८ ॥
करता चौदहका अंत । कह कर यह सिद्धांत ।
अर्जुनसे श्री भगवंत । कैवल्य पति जो ॥ २९ ॥
ज्ञानी ज्ञानसे मोक्ष पाता है—
करता जो ज्ञान हस्तगत । मोक्ष पाता है वही समर्थ ।
होता इंद्रपद हस्तगत । जैसे शत-मखसे ॥ ३० ॥
अथवा लेकर शत जन्म । करता सतत ब्रह्म-कर्म ।
वही बनता अंतमें ब्रह्म । अन्य नहीं कोई ॥ ३१ ॥
या करता है सूर्य दर्शन । केवल मात्र एक नयन ।
वैसे केवल ज्ञानसे मान । मोक्ष प्राप्त ॥ ३२ ॥
ऐसे ज्ञान के लिए कौन । होता यहां सामर्थ्यवान ।
खो जानेसे हुवा दर्शन । अकेलेका ॥ ३३ ॥
पातालमें भी जो है निधान । दिखाएगा लगाके अंजन ।
इसके लिए होना लोचन । पाव्जके ही ॥ ३४ ॥
वैसे ही मोक्ष देगा ज्ञान । यहां बात नहीं भिन्न ।
इसके लिए होना मन । परम-शुद्ध ॥ ३५ ॥
५७३ पुरुषोत्तमयोग

ज्ञानके लिए वैराग्य आवश्यक—
तब विरक्तिके बिन । टिकता नहीं ज्ञान ।
निर्णय है यह जान । हरि चित्तका ॥ ३६ ॥
विरक्तिका कौनसा प्रकार । करेगा मनका अंगीकार ।
कर रखा यह भी विचार । सर्वज्ञ हरिने ॥ ३७ ॥
यह है विष मिश्रित अन्न । अतिथिको हो इसका ज्ञान ।
छोड़ उठता वह भोजन । इसी भांति ॥ ३८ ॥
अनित्य यह सब संसार । जानता है जो इसका सार ।
वह करता विरक्ति दूर । तो भी वह चिपकती ॥ ३९ ॥
पंद्रहवे अध्यायकी भूमिका—
अनिश्चितताका रूप निश्चित । वृक्ष-रूपकसे है जगन्नाथ ।
सुनायेंगे सुने सब यथार्थ । पंद्रहवेंमें ॥ ४० ॥
सहज पडा जो हो उन्मूलन । डाली जड़ उलट कर जान ।
सूखेगा वह जैसे क्षण क्षण । वैसे नहीं यह ॥ ४१ ॥
मिटाते हैं ऐसा दिखाकर । रूपकका भला चमत्कार ।
जन्म-मरणका जो चक्कर । संसारका ॥ ४२ ॥
दिखाके संसारका अनित्यत्व । स्वरूपमें अहंताका लयत्व ।
कहा जायेगा अब सार-तत्व । पंद्रहवेंमें ॥ ४३ ॥
अब यहीं ग्रंथ हृद्गत । कहेंगे सिद्धांत विस्तृत ।
सुने आप देकर चित्त । श्रोतृ-वृंद ॥ ४४ ॥
वह ब्रह्मानंद समुद्र । जो पूर्ण-पूर्णिमाका चंद्र ।
तथा द्वारकाका नरेंद्र । कहता ऐसा ॥ ४५ ॥
अजी ! सुन तू पांडुकुमार । आते हुए स्वरूपके घर ।
रुकावट करता समीर । विश्वाभासका ॥ ४६ ॥
वह जो जगडंबर । नहीं है यहां संसार ।
जान महा तरुवर । पड़ा है यहां ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी : ५७४

किंतु अन्य वृक्ष सरीखा । नीचे मूल ऊपर शाखा ।
ऐसा नहीं जान इसका । अंत न लगता ॥ ४८ ॥
आग अथवा यदि कुठार । पड़ती जिसके मूल पर ।
वह पड़ता है टूटकर । कितना ही बड़ा हो ॥ ४९ ॥
मूल सब जब वृक्ष टूटता । शाखाओं सह वह है गिरता ।
किंतु इसका ऐसा नहीं होता । यह न है सहज ॥ ५० ॥
संसार वृक्षकी कल्पना--
इसका है अर्जुन ! कौतुक । कहनेमें यह अलौकिक ।
बढ़ता जाता है अधोमुख । यह वृक्ष ॥ ५१ ॥
जैसे सूर्यकी ऊंची नहीं जानता । उसका रश्मि-जाल नीचे फैलता ।
वैसे ही यह है आश्चर्य दिखाता । संसार-वृक्ष ॥ ५२ ॥
जैसे कल्पांतका उदक । फैलता है आकाश तक ।
वैसे यह संसार रुख । घेरता सर्वस्व ॥ ५३ ॥
अथवा होता रविका अस्त । तमसे घिरती सारी रात ।
यह वृक्ष ऐसा होता व्याप्त । आकाश सारा ॥ ५४ ॥
खाना चाहे तो नहीं फलता । सूंघना चाहे तो नहीं फूलता ।
जैसे हो यह वृक्ष रहता । केवल वृक्ष ॥ ५५ ॥
मूल जमा है इसका ऊपर । शाखयें फैली हैं नीचेकी ओर ।
किंतु नहीं पड़ा टूटकर । रहता खिला हुवा ॥ ५६ ॥
तथा ऊर्ध्व-मूल ऐसे । कहा है स्पष्ट रूपसे ।
किंतु फैलते नीचेसे । इसकी जड़ ॥ ५७ ॥
बढनेमें है जैसे शेवाल । ऊपर वट हो या पीपल ।
अंकुरमें फूटते हैं डाल । इसके सब ॥ ५८ ॥
इस भांति सुनो पार्थ । संसार-वृक्षके साथ ।
नीचे ही है डाल पात । ऐसे भी नहीं ॥ ५९ ॥
५७५ पुरुषोत्तमयोग

वैसे ही ऊर्ध्वकी ओर । शाखाओंके ढेर ढेर ।
दिखाई देते अपार । फैले हुए ॥ ६० ॥
या फैला हो वृक्ष रूपसे गगन । या वृक्ष रूपसे वायु-प्रसरण ।
या अवस्था-त्रयका विस्तार मान । हुवा वृक्ष रूपसे ॥ ६१ ॥
ऐसा है यह ऊर्ध्व-मूल । फैला है सर्वत्र बहुल ।
विश्वाकार लेके सकल । जान तू यह ॥ ६२ ॥
अब है इसका ऊर्ध्व-भाग कौन । इसके ऊर्ध्व-मूलके क्या कारण ।
इसके अधो-वृद्धिके क्या लक्षण । औ' डालियां हैं कैसी ॥ ६३ ॥
अथवा इस वृक्षकी । जड कैसी है नीचेकी ।
डालियाँ कैसी ऊर्ध्वकी । सुनो आब ॥ ६४ ॥
तथा यह अश्वत्थ है ऐसे । प्रसिद्धिके कारण क्या कैसे ।
आत्म-विद्या-विदोंने है ऐसे । किया क्यों निर्णय ॥ ६५ ॥
यह सब तू अर्जुन । अनुभवेगा जो ज्ञान ।
ऐसे करूंगा कथन । सुन तू अब ॥ ६६ ॥
तेरा ही यह है सौभाग्य । इसके लिए है तू योग्य ।
आया है सुन यह भाग्य । सर्वांगके कान कर ॥ ६७ ॥
प्रेम-रसका ऐसे हो स्फुरण । यदु-पति बोला जब श्रीकृष्ण ।
प्रकट हुवा तब अवधान । अर्जुनके रूपमें ॥ ६८ ॥
अति व्यापक जो कृष्ण-कथन । किंतु फैला पार्थका अवधान ।
जैसे घेरती दिशायें महान । आकाशको जैसे ॥ ६९ ॥
अजी ! श्रीकृष्ण वचन सागर । प्राशन करता है धनुर्धर ।
मानो है अगस्ति ऋषि दूसरा । एक घोंटमें ॥ ७० ॥
फूट पडी ऐसी श्रवणाशा निर्मळ । पार्थमें प्रतीत कर कृष्ण सरळ ।
करता है देव वह सुख सकल । न्योच्छावर पार्थपै ॥ ७१ ॥
ज्ञानेश्वरी ५७६

भगवान उवाच
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥
ऊर्ध्व-मूल ब्रह्मका वर्णन—
फिर कहता है पांडव । इस तरुका है जो ऊर्ध्व ।
वृक्षके कारण सदैव । दीखता सहज ॥ ७२ ॥
वैसे मध्य ऊर्ध्व अध । ऐसा नहीं जहां भेद ।
कहते हो एकवद् । उस अद्वयका ॥ ७३ ॥
वह है अश्रवणीय नाद । तथा असौरभ्य मकरंद ।
तथा जो निरालंब आनंद । बिना रतिका ॥ ७४ ॥
जिसको जो आर-पार । तथा आगे-पीछेकी ओर ।
दृश्यादृश्यसे अगोचर । देखना है ॥ ७५ ॥
उपाधिका जो दूसरा । फैलानेसे है पसारा ।
नाम-रूपका संसार । होता जहां ॥ ७६ ॥
ज्ञाता ज्ञेयसे विहीन । केवल मात्र जो ज्ञान ।
सुखसे भरे गगन- । से चूता है ॥ ७७ ॥
नहीं है जो कार्य अथवा कारण । या अन्यसे आया जो अकेलापन ।
जिसको अपनेमें ही आप जान । भली भांति ॥ ७८ ॥
संसार-वृक्षका बीज और जड़—
ऐसी सत्य-वस्तु जिसकी । जड़ है ऊपर इसकी ।
वहांसे निकली इसकी । कोंपल ऐसे ॥ ७९ ॥
श्री भगवानने कहा
ऊंचे मूल तले शाख नित्य अश्वत्थ है कहा ।
उसके दलमें वेद पढे जो वेद जानता ॥ १ ॥
(73) ५७७ पुरुषोत्तमयोग

अजी ! माया ऐसी ख्याति । चलती है जो है नास्ति ।
जैसे वंध्याकी संतति । बातोंमें ही ॥ ८० ॥
वह होती अथवा नहीं होती । विचारका नाम नहीं सहती ।
यहां वह अनादि कहलाती । इस प्रकारकी ॥ ८१ ॥
यह है भव-द्रुम बीजिका । या प्रपंचकी भूमिका ।
औ, विपरीतज्ञान-दीपिका । प्रज्वलित है जो ॥ ८२ ॥
अनेक शक्तियोंकी पेटिका । आकाश मानो विश्वदभ्रका ।
वस्त्र है जो आकार मात्रका । तह किया हुवा ॥ ८३ ॥
माया साथ ही है ब्रह्मके । होकर भी जैसे नहींके ।
प्रकट होती है वस्तुके । प्रकाश रूप जो ॥ ८४ ॥
अपनेको आती है जब नींद । करती तब अपनेको मुग्ध ।
कजली करती प्रकाश मंद । दीपकका जैसे ॥ ८५ ॥
प्रियके साथ तरुणांगी स्वप्नमें । सोई हुई उठकर शीघ्रातमें ।
आलिंगनके बिना आलिंगनमें । करती सकाम ॥ ८६ ॥
ऐसे स्वरूपमें हुई जो माया । स्वाश्रयमें अज्ञान धनंजय ।
वही इस भव-तरुका भया । पहला मूल ॥ ८७ ॥
वस्तुका अपना जो अबोध । ऊपर वह बांधता कंद ।
वेदांतमें भी यही प्रसिद्ध । कहा बीज-भाव ॥ ८८ ॥
घना अज्ञान भाव जो सुषुप्ति । बीजांकुर-भाव सुभद्रापति ।
अन्य दो जो स्वप्न और जागृति । उसका फल भाव ॥ ८९ ॥
ऐसा वेदांत प्रतिपादन । संज्ञा है ये प्रसिद्ध तू जान ।
रहने दो यहां है अर्जुन । अज्ञान मूल ॥ ९० ॥
उस अतीत आत्माको निर्मळ । अधोर्ध्व सूचित करके मूल ।
तथा चारों ओर बना वर्तुळ । माया-योगका ॥ ९१ ॥
फिर हो अनेक देहांतर । छूटते हैं उसके अपार ।
सभी ओरसे बना अंकुर । गहरे उतरते ॥ ९२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५७८

ऐसा भव-द्रुमका मूल । ऊपर पाकरके बल ।
उसके हैं दलके दल । उतरते नीचे ॥ ९३॥
संसार-वृक्षका पहला पल्लव—
वहां चिद्वृत्तिके पहला । महतत्व कोंपल खिला ।
पल्लव जो हरा निकला । कोंपल एक ॥ ९४ ॥
फिर सत्व-रज-तमात्मक । त्रिविध अहंकार जो एक ।
वह तिगुना हो अधोमुख । फूटी डाल ॥ ९५ ॥
बुद्धिका लेकर अंकुर । बढ़ाता भेदको अपार ।
तन मनकी डाल सुंदर । बढ़ने लगती ॥ ९६ ॥
ऐसे ले कर मूलकी दृढता । विकल्प रसकी जो कोमलता ।
चित्त-चतुष्टयकी विविधता । फूटते पल्लव ॥ ९७ ॥
भवद्रुमका विस्तार—
आकाश वायु द्योतक । और है पृथ्वी उदक ।
फूटती ये पांच शाख । उसमें जोरसे ॥ ९८ ॥
वैसे ही श्रोत्रादि तन्मात्रा । उसके अंगभूत पत्र ।
जो हैं अति चित्र विचित्र । फूटते रहते ॥ ९९ ॥
तब शब्दांकुर पर्यंत । होते हैं श्रोत्र विकसित ।
आकांक्षाके नूतन पार्थ । चढती डालियां ॥ १०० ॥
अंग-त्वचाका जो लता पल्लव । स्पर्शांकुर तक होते फैलाव ।
वहां बढते हैं नित नव । विकार विविध ॥ १ ॥
तब रूप-पत्रके दलके दल । दूर तक फैलाती हैं आंखें सरल ।
फैलता है तब बड़ा भ्रम-जाल । सविस्तृत ॥ २ ॥
और रसनाका शाखा खंड । वेगसे बढता है उदंड ।
जिव्हा चापल्यके जो प्रचंड । फूटते शाख ॥ ३ ॥
वैसे ही गंधकी जो कोंपल । घ्राणेंद्रियको करती प्रबल ।
तब गंध-लोभ फैलाता विपुल । आनंद पल्लव ॥ ४ ॥
५७९ पुरुषोत्तमयोग

ऐसी जो महदहं-बुद्धि । मन महाभूत संसृष्टि ।
इस संसारकी अवधि । बना लेते हैं ॥ ५ ॥
भव-द्रुमका स्वरूप —
अजी ! यह इन्ही आठ अंगसे । फैलता जाता है अति वेगसे ।
किंतु है रजत-रूपसे जैसे । दीखती सीप ॥ ६ ॥
या सागरका जितना विस्तार । उतना ही तरंगत्व संचार ।
वैसे है ब्रह्म ही वृक्ष-आकार । अज्ञान मूल ॥ ७ ॥
यही अब इसका विस्तार । और इसका है यही प्रसार ।
स्वप्नमें अपना परिवार । होता जैसे एकका ही ॥ ८ ॥
रहने दो अब यह वर्णन । इस भांति यह बढ़ता जान ।
महदादि बोझसे है अर्जुन । अधोशाख ॥ ९ ॥
इसको अश्वत्थ क्यों कहते हैं—
इसको अश्वत्थ ऐसे । कहते हैं जो क्यों कैसे ।
वह भी सुन तू इसे । कहता हूं मैं ॥ ११० ॥
अजी ! श्वः कहा तो कल । तब तक प्रति पल ।
रहना नहीं निश्चल । इसका कभी ॥ ११ ॥
जैसे है बीतता है क्षण । मेघ बदलता नाना वर्ण ।
या बिजली न होती संपूर्ण । निमिष एक ॥ १२ ॥
या कांपता हुआ पद्म-दलं । उस पर पड़ा हुआ जल ।
या चित्त जैसे होता व्याकुल । मनुष्यका ॥ १३ ॥
वैसे ही है इसकी स्थिति । नासता जाता क्षण प्रति ।
इसीलिये हे शुद्ध-मति । कहते अश्वत्थ ॥ १४ ॥
तथा अश्वत्थ ऐसी संज्ञा । पीपलको पड़ी सुविज्ञा ।
नहीं वह भाव सर्वज्ञ - । श्रीहरिका यहां ॥ १५ ॥
वैसे पीपल कहा तो एक । मैंने मान लिया होता देख ।
किंतु रहने दे जो लौकिक । इसमें क्या अर्थ ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८०

इसीलिये यहां प्रस्तुत । यह है अलौकिक ग्रंथ ।
यहां क्षणिकत्वको अश्वत्थ । कहा गया है ॥ १७ ॥
यह और ही है एक विध । अव्ययत्वमें अति प्रसिद्ध ।
इसका प्रकार अंतर्सिद्ध । है इस भांति ॥ १८ ॥
जैसे मेघ-मुख एक ओर । सुखाते रहते हैं सागर ।
तथा नदियां दूसरी ओर । भरती रहतीं ॥ १९ ॥
जिससे न चढता न उतरता । सदा एकसा भरा पूरा रहता ।
किंतु जब तक सम योग होता । मेघ-नदियोंका ॥ १२० ॥
वैसे इस वृक्षका होता जान । उस गतिका तर्क नहीं होना ।
तभी लोगोंका अव्यय कहना । इसको यथार्थ ॥ २१ ॥
जैसे दान-शील मनुष्य । करता दानसे संचय ।
वैसे व्ययसे है अव्यय । यह वृक्ष ॥ २२ ॥
अथवा रथका चक्र जैसे । चलता अतिशय वेगसे ।
दीखता भूमिमें धंसा ऐसे । उसी प्रकार ॥ २३ ॥
वैसे ही तीव्र गतिसे कालकी । गिरती भूत शाखामें जिसकी ।
वहां फूटती असंख्य इसकी । कोंपल नित्य ॥ २४ ॥
ऐसे गलते जाते कितने । नये फूटते जाते कितने ।
न जाने आते जाते कितने । सावनके बादलसे ॥ २५ ॥
कल्पांतमें होते नष्ट भ्रष्ट । कल्पारंभमें होते हैं जो सृष्ट ।
और होते हैं अनेक विश्व-दृष्ट । धनंजय ॥ २६ ॥
प्रचंड संहार-वातसे प्रलयके । झड़ते छिलके जब इस वृक्षके ।
फूटते नव-अंकुर कर्मांरंभके । करोडोंमें ॥ २७ ॥
मन्वंतर सरकता मनुके नंतर । बढ़ते जाते अनेक वंश वंश पर ।
मानो बढता है ईख कांड कांड कर । वैसे ही यह वृक्ष ॥ २८ ॥
कलियुगांतमें सूखा छिलका । चार युगोंका झड़ता इसका ।
तब बढ़ता है कृत-युगका । नूतन मोटा ॥ २९ ॥
५८१ पुरुषोत्तमयोग

जैसे वर्ष पर वर्ष बीतता । एक दूसरेका मूल बनता ।
वैसे दिवस आता और जाता । जानते नहीं ॥ १३० ॥
जैसे वायुकी लहर आना । उसका जोड़ नहीं समझना ।
वैसे डालोंका झड़ना बढ़ना । समझता नहीं ॥ ३१ ॥
गिरता जब एक देहांकुर । फूटते सहस्र शरीरांकुर ।
तब दीखता भव तरुवर । अव्यय ऐसा ॥ ३२ ॥
पानी बहता जब तीव्र गतिसे । वैसे ही आता है अधिक पीछेसे ।
तभी उस स्रोतको अनंत ऐसे । मानते लोग ॥ ३३ ॥
या जितनेमें पलक झपकती । करोड़ों लहरें उठ गिरती ।
जिससे है दृष्टि अनुभवती । तरंग है नित्य ॥ ३४ ॥
या एक ही दृष्टि काग दोनों ओर । फिराता चातुर्यसे स अवसर ।
जिससे होता है भ्रम धनुर्धर । कागकी हैं दो आंखें ॥ ३५ ॥
लट्टू घूमता है तीव्र गतिसे । लगता है चिपक बैठा भूमिसे ।
इसका वेगातिशय होता वैसे । भ्रमका कारण ॥ ३६ ॥
अंधारमें अति वेगसे । अग्नि-काष्ठको घुमानेसे ।
सहज ही दीखता जैसे । चक्राकार ॥ ३७ ॥
यह संसार-वृक्ष ऐसा । नासता बढता सहसा ।
न देख लोक पागल-सा । मानता अव्यय ॥ ३८ ॥
किंतु जो इसका वेग देखता । इसके क्षणिकत्वको देखता ।
करोड़ों बार यह होता जाता । क्षण भरमें जो ॥ ३९ ॥
अज्ञानके बिन नहीं मूल । इसका अस्तित्व नकल ।
यह वृक्ष अति क्षीण-छाल । देखा जिसने ॥ १४० ॥
उसे मानता मैं सर्वज्ञ । वह है वंदनीय प्राज्ञ ।
ब्रह्म-सिद्धांतका है सूज्ञ । धनुर्धर ॥ ४१ ॥
योग-मात्र जो सकल । मिला है उसको ही फल ।
उसके बलसे केवल । जीता ज्ञान ॥ ४२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८२

कौन करें उसका वर्णन । भव-द्रुमको अनित्य मान ।
चलता है पुरुष अर्जुन । इस भांति ॥ ४३ ॥
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसंततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥
इस भव-द्रुमका फैलाव --
फिर यह प्रपंच रूप । अधः शाखा जो पादप ।
बढता जाता परंतप । ऊर्ध्वशाख हो ॥ ४४ ॥
तथा नीचे फैले जो डाल । उसमें फूटते हैं मूल ।
उस मूलमें फूटे वेल । पल्लवादिक ॥ ४५ ॥
अजी ! हमने पीछे ऐसे । उपक्रममें कहा जैसे ।
उसीको सहज रूपसे । कहते अब ॥ ४६ ॥
बद्धमूल है जो अज्ञानसे । महदादिकके शासनसे ।
बडे वेद-पर्ण फूटनेसे । फैला है अपार ॥ ४७ ॥
पहले इससे स्वेदज । जारज उद्भिज मणिज ।
मूळसे ही जो महाभुज । उठते चार ॥ ४८ ॥
इस एकेकसे अंकुर । फूटके अनेक प्रकार ।
जीवोंकी शाख बढ़ाकर । होते चौरासी लाख ॥ ४९ ॥
बढ़ते हैं खंड सरल । नाना सृष्टिकी डाल डाल ।
टेढी मेढी फूटती डाल । अनेक जातिकी ॥ १५० ॥
ऊंचे तले शाख विस्तार होता
औ' भोग पत्ते गुण-पुष्ठ होते ।
नये नये मूल फूले तले जो
नृलोकमें कर्म-निबन्ध कारी ॥ २ ॥
५८३ पुरुषोत्तमयोग

स्त्री पुरुष नपुंसक । आकारसे भेदात्मक ।
टकराते हैं आंगिक । विकार भारसे ॥ ५१ ॥
वर्षाकाल है जैसे गगनमें । फैलता नव मेघके रूपमें ।
वैसे आकार-मात्र अज्ञानमें । फैलता जाता ॥ ५२ ॥
शाखाओंका है फिर अंगभार । झुकके उलझता परस्पर ।
और-गुण क्षोभका है समीर । छूटता तब ॥ ५३ ॥
ऊर्ध्वमूलका फट जाना—
आता है तब भयंकर । गुण क्षोभका बवंडर ।
जिससे तीन स्थान पर । फटता ऊर्ध्वमूल ॥ ५४ ॥
जब ऐसा रजका समीर । बहता है जब धनुर्धर ।
मनुष्य जाति शाखा अपार । बढती हैं ॥ ५५ ॥
न ऊर्ध्व या अधमें उसके । मध्यमें लगती हैं तनेके ।
टेडी शाख फूटते उसके । वर्णकी चार ॥ ५६ ॥
विधि-निषेधके सपल्लव । वेद-वाक्यके जो अभिनव ।
डुलकर उसके पल्लव । करते शोभा ॥ ५७ ॥
ऐहिक भोगके नामवंत । अर्थ-काम कर प्रसारित ।
बढ़ते हैं तीव्र विकसित । नव अंकुरोंसे ॥ ५८ ॥
संसारका जो वृद्धि लोभ । खडा करता शुभाशुभ ।
अनेकानेक कर्म-स्तंब । न जाने कितने ॥ ५९ ॥
पहलेका भोग-क्षय जब होता । साथ ही शुष्क देह जब गिरता ।
तथा विस्तारका प्रारंभ होता । नव देहका तब ॥ १६० ॥
तथा सुशोभित शब्दादिक । सहज रंगके आकर्षक ।
फूटते नित नये मोहक । विषय पल्लव ॥ ६१ ॥
वैसे रजो-वातसे प्रचंड । मनुष्य शाखाओंके झुंड ।
बढते, कहते जिसे रूढ । मानव लोक ॥ ६२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८४

वैसे रजका समीर । रुकते ही बहता घोर ।
तमोगुणका बवंडर । उसी समय ॥ ६३ ॥
तभी यही मनुष्य शाख । नीचे नीचे वासना देख ।
फैलती है शाखोपशाख । कुकर्मकी जो ॥ ६४ ॥
अप्रवृत्तिसे जो चिन्हित । निकलते डंटल पार्थ ।
उसमें लगते हैं सार्थ । प्रमादके ॥ ६५ ॥
बोलते निषेध-नियम । मंत्र जो हैं ऋक्-यजु-साम ।
गाते वही पात अकर्म । सम्मुख आके ॥ ६६ ॥
प्रतिपादन अभिचार । मंत्र-तंत्र जो पर-भार ।
करते उसका प्रसार । वासना लता ॥ ६७ ॥
तब तब होते बलिष्ठ । अकर्मादि जड़ अनिष्ट ।
तथा बढ़ते शाख पुष्ट । जन्मकी आगे ॥ ६८ ॥
चांडालादि वहां निकृष्ट । दोष-योनिके दंड पुष्ट ।
फैलाता जन कर्म-भ्रष्ट । जाल भ्रमका ॥ ६९ ॥
उसे पशु-पक्षी सूकर । व्याघ्र वृश्चिकादि विषार ।
टेडे शाखाओंका विस्तार । होता है जैसे ॥ १७० ॥
ऐसी जो शाखायें पांडव । सर्वांगमें नित्य ही नव नव ।
देती हैं नरकानुभव । फलका तो ॥ ७१ ॥
हिंसा रति वहां प्रमुख । कुकर्म-संघ ही है सुख ।
निषिद्ध कर्मांकुर चोख । बढ़ते जन्मोंसे ॥ ७२ ॥
ऐसे होते हैं तरु-तृण । लोह लोष्ट औ' पाषाण ।
इस शाखके ऐसे जान । लगते फल ॥ ७३ ॥
अर्जुन ! यह तू सुन । मनुष्यसे जो है निम्न ।
वृद्धि स्थिर तक जान । शाखाओंकी ॥ ७४ ॥
तभी मनुष्य-रूपी डाल । तलेकी शाखाओंका मूल ।
आगे फैलता वही मूल । संसार-तरुका ॥ ७५ ॥
(74) ५८५ पुरुषोत्तमयोग

वैसे ऊर्ध्वका जो पार्थ । आदि मूल देखा जाता ।
आदिसे ये हैं मध्यस्थ । शाखायें सब ॥ ७६ ॥
किंतु तामस सात्विक । सुकृत दुष्कृतात्मक ।
फैल जाती हैं जो शाख । अध-ऊर्ध्वकी ॥ ७७ ॥
तथा वेद-त्रयके हैं पान । अन्यत्र न लगते अर्जुन ।
मनुष्य बिन अन्य विधान । नहीं उसका ॥ ७८ ॥
इसलिये मनुष्यका तन । ऊर्ध्व-मूलकी शाखा है मान ।
इस कर्म-वृद्धिके कारण । वही मूल ॥ ७९ ॥
फैलती शाखायें जब वृक्षोंमें । जड़ जाती हैं गहरी पृथ्वीमें ।
जड़ गड़ी जाती हैं जैसे पृथ्वीमें । वृक्ष फैलता ऊपर ॥ १८० ॥
उसी भांति है यह शरीर । कर्मके साथ देह संसार ।
देह है तब तक व्यापर । चलता रहता ॥ ८१ ॥
तब है मनुष्य देह पार्थ । इसकी जड़ कहना सार्थ ।
यहां यह बोलना यथार्थ । श्रीकृष्णका जो ॥ ८२ ॥
फिर है तमका दारुण । रुक जाता जब तूफान ।
सत्वका छूटता सत्राण । चंड मारुत ॥ ८३ ॥
उस समय यह मनुष्याकार । जड़में छूटता सुगंध अंकुर ।
उसमें फूटते मुकुल अपार । नव नव कोंपल ॥ ८४ ॥
विकसित ज्ञानके कारण । प्रज्ञा-कुशलताके जो तीक्ष्ण ।
अंकुर फूटते प्रति-क्षण । फैलते हुए ॥ ८५ ॥
बुध्दिके शाखोपशाख । स्फूर्तिंसे बलसे नेक ।
प्रकाशसे सविवेक । खिलते हैं ॥ ८६ ॥
मेधा-रससे वहां भरपूर । आस्था-पल्लवसे खिले सुंदर ।
सरल निकलते हैं अंकुर । सद्वृत्तिके ॥ ८७ ॥
सदाचारके तब अनेक । कोमल कोंपल सुवासिक ।
गूंजते हैं सदा वेद घोष । उन पल्लवोंसे ॥ ८८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८६

शिष्ट आगम विधान । विविध याग वितान ।
ऐसे पल्लव अर्जुन । बढ़ते जाते ॥ ८९ ॥
अनेक गुच्छ ऐसे यम-दमके । लगते हैं जब तप टहनीके ।
तथा आलिंगन करते उसके । वैराग्यकी टहनियां ॥ ९० ॥
विशिष्ट व्रतोंकी जो शाख । तीक्ष्ण धैर्यांकुरमें देख ।
जन्म-वेगसे ऊर्ध्वमुख । उठते जाते ॥ ९१ ॥
करते पल्लव वेद-गर्जन । सद्विद्याओंका घोष महान ।
जब बहता है वायु अर्जुन । सात्विकताका ॥ ९२ ॥
अन्य अनेक ऊर्ध्व शाखाओंका विवेचन-
वहां धर्म-शाखाओंमें विस्तृत । जन्म-शाखा जो सरल दर्शित ।
उसमें स्वर्गादिक फलयुक्त । शाखा फैलती अनेक ॥ ९३ ॥
फिर उपरति रक्त-वर्ण । उसमें शाखा नित नवीन ।
बढती लहराके अर्जुन । धर्म-मोक्षकी ॥ ९४ ॥
फिर रवि-चंद्रादि ग्रह-वर । पितर ऋषि आदि विद्याधर ।
फूटती नाना शाखा चहूं ओर । विस्तार पूर्वक ॥ ९५ ॥
इससे भी ऊंचाई पर । इंद्रादि शाख श्रेष्ठतर ।
फलादिसे जो भर कर । बढती अनेक ॥ ९६ ॥
इसके ऊपर भी है शाख । तप-ज्ञानसे बढी है देख ।
अत्रि मरीचि कश्यपादिक । ऊर्ध्व हैं अति ॥ ९७ ॥
उत्तरोत्तर उस प्रकार । ऊर्ध्व-शाखाओंका है प्रसार ।
छोटे मूलमें बड़ा अपार । फळता जाता ॥ ९८ ॥
ऊर्ध्व-शाखाओंके अग्रपर । आता फल भार धनुर्धर ।
ब्रह्मेश जैसे महा अंकुर । फूटते नुकीले ॥ ९९ ॥
फूलोंके अति भारसे । झुकता है ऊपरसे ।
तथा लगता मूलसे । जैसे हो मूलमें ॥ २०० ॥
वैसे भी प्रकृत जो रुख । फल-भारसे लदी शाख ।
झुककर आती है देख । जडके पास ॥ १ ॥
५८७ पुरुषोत्तमयोग

जहांसे इसका विस्तार । प्रारंभ हुवा धनुर्धर ।
मिलता है वही आकार । ज्ञान-योगसे ॥ २ ॥
इसीलिये सुन ब्रह्मेशके । बाद बढ़ना नहीं जीवके ।
वहांसे ऊपर है जिसके । ब्रह्मही केवल ॥ ३ ॥
इस भांति धनंजया । ब्रह्मादिक टहनियां ।
ऊर्ध्व-मूल जो है माया । उससे नहीं तुलती ॥ ४ ॥
और भी ऊपर जो शाख । जिसके नाम सनकादिक ।
फल-मूलमें न आती देख । भरी है ब्रह्ममें ॥ ५ ॥
ऐसे मनुष्यसे जानना पार्थ । ऊर्ध्वमें हैं जो ब्रह्मादिक पात ।
बढ़ जाती इसकी शाखा-जात । सविस्तर ऊंची ॥ ६ ॥
ऊर्ध्वके हैं जो ब्रह्मादि । मनुष्य उसके आदि ।
इसीलिये कहा आदि । मूल इसके ॥ ७ ॥
ऐसा तुझे अलौकिक । दिखाया है ऊर्ध्व शाख ।
कह यह भव रूख । ऊर्ध्वमूल ॥ ८ ॥
संसार वृक्ष उन्मूलन कैसे करना—
तथा आदिका भी है जो मूल । उत्पत्ति सह कहा सकल ।
अब सुनो करना उन्मूल । कैसे यह ॥ ९ ॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम्
असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥
न रूप इसका दीखे किसीको
न मूल है या न तना न शाखा ।
विरक्तिका ले कर तीव्र शस्त्र
काटें इसे जो दृढ-मूल वृक्ष ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८८