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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

तीनों गुण समय समय पर बदलते रहते हैं—
पीछे कर कफ वात । आगे आता जब पित्त ।
होता है तब संतप्त । जिस भांति ॥ ९६ ॥
आतप वर्षाको जीतकर । प्रकट होता शीत-लहर ।
आकाश तब जिस प्रकार । होता है शीत ॥ ९७ ॥
अथवा नाना स्वप्न-जागृति । मिटके आती सुषुप्ति ।
क्षण भर चित्त-वृत्ति । होती जैसे ॥ ९८ ॥
वैसे रज-तमको पराजित । करके सत्व होता प्रकाशित ।
जीव कहता है हो प्रमुदित । सुखी हूं मैं ॥ ९९ ॥
वैसे ही जब सत्व और रज । मिटाकर होता तमका राज ।
प्रवृत्ति होती है तब सहज । प्रमादकी ॥ २०० ॥
उसी भांति पांडुकुमार । सत्व-तमको हटाकर ।
उठाता है अपना शिर । रजोगुण ॥ १ ॥
कर्मके बिन अन्य कहीं । सुंदर कुछ भी है नहीं ।
इस भांति मानता देही । शरीरस्थ ॥ २ ॥
त्रिगुण वृद्धिका निरूपण । किया हैं श्लोकोंमें यहां तीन ।
सत्वादि गुण-वृद्धि लक्षण । सुनो अब ॥ ३ ॥
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥
प्रज्ञाका इंद्रियों-द्वारा प्रकाश सब ओर जो ।
देहमें फैलता सारा जानना सत्व है बढ़ा ॥ ११ ॥
प्रवृत्ति लालसा लोभ कर्मारंभ अशांतता ।
फैलाव देहमें होता जानना तम है बढ़ा ॥ १२ ॥
५४९ गुण-निस्तारयोग

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥
सत्त्वस्थके स्वभाव-धर्म—
रज-तम पर पा विजय । सत्व करता देहपे राज्य ।
तब जो लक्षण धनंजय । दीखते वह सुन ॥ ४ ॥
प्रतिभा मानो शरीरके अंदर । न समानेसे छलकती बाहर ।
सुगंध जैसे महकती बाहर । वसंतमें कमलसे ॥ ५ ॥
जैसे सभी इन्द्रियोंके अंगनमें । खडा होता विवेक दास रूपमें ।
उगती हैं आंखें कर-चरणमें । उसके पार्थ ॥ ६ ॥
राजहंसके सम्मुख । रखनेसे क्षीरोदक ।
उसकी चोंचकी नोक । करता न्याय ॥ ७ ॥
वैसे दोषादोष विवेक । करती हैं इन्द्रियां देख ।
बनके रहता सेवक । निग्रह वहां ॥ ८ ॥
सुनते नहीं अश्रव्य कान । न देखते कु-दृश्य नयन ।
न बोलती अवाच्य वचन । वाणी जैसे ॥ ९ ॥
प्रमाद मोह अंधार आलस्य सब ओरसे ।
फैलाव देहमें होता जानना तम है बढ़ा ॥ १३ ॥
तजता देहको देही बढता सत्व है जब ।
जन्मता शुभ लोगोंमें सज्जनोंके समाजमें ॥ १४ ॥
रजमें लीन होता जो जन्मता कर्म-किसमें ।
डूबता तममें सारा जन्मता मूढ-योनिमें ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५०

दीपकके सम्मुख अंधार । भागते जाता जैसे सत्वर ।
नहीं आते निषिद्ध आचार । इन्द्रियोंके सम्मुख ॥ २१० ॥
अजी ! वर्षा-ऋतुमें जैसे । नदियां उमड़ती वैसे ।
फैल जाती है बुद्धि वैसे । सब शास्त्रोंमें ॥ ११ ॥
जैसे पूर्णमासीका दिवस । चांदनीसे भरता आकाश ।
शास्त्रमें फैलती तत्सदृश । वृत्ति सदैव ॥ १२ ॥
एकत्र होती वासना । प्रवृत्तिका संयमन ।
विषयों परसे मन । हठ जाता है ॥ १३ ॥
जब सत्व बढता । यह चिन्ह दीखता ।
यदि निधन होता । ऐसे समय ॥ १४ ॥
जैसे है घरकी संपत्ति । वैसे औदार्य धैर्य-वृत्ति ।
तब इह परमें कीर्ति । क्यों न फैलेगी ॥ १५ ॥
अथवा आया है अति सुकाल । चला संतर्पण अति-मंगल ।
अतिथि आप्त आया उसी पल । कहना क्या तब ॥ १६ ॥
इससे क्या है तब सुंदर । वैसे सत्वमें जाना शरीर ।
सत्व-स्वभावको छोड और । जायेगा कहां ॥ १७ ॥
सत्व-गुणमें जो उद्भट । तज सत्व-गुण श्रेष्ठ ।
चलता है छोडके कोपट । भोग-क्षम जो ॥ १८ ॥
अकस्मात जो ऐसा मरता । सत्वका ही नया बनता ।
या ज्ञानियोंमें जन्म लेता । यह निश्चय ॥ १९ ॥
कह तू यह धनुर्धर । राजा राजत्वमें डोंगर ।
चढता है तब अधूरा । होता है क्या ॥ २२० ॥
अथवा यहांका जो दिया । पडोसके गांवमें गया ।
वहां पर क्या धनंजय । न रहता दीप ॥ २१ ॥
वैसी यह सत्व-शुद्धि । होती ज्ञान सह वृद्धि ।
तैरने लगती बुद्धि । विवेक पर ॥ २२ ॥
५५१ गुण-निस्तारयोग

महदादिककी परंपरा । विचार कर तदनंतर ।
विलीन हो जाते स-विचार । उसके उदरमें ॥ २३ ॥
छत्तीसमें सैंतीसवां । चौबीसमें पच्चीसवां ।
तीनों पर स्वभाव । चौदह जिसका ॥ २४ ॥
ऐसा सर्व जो सर्वोत्तम । होता है जिसको सुगम ।
ऐसे कुलमें निरुपम । मिलता है देह ॥ २५ ॥
रजोगुणीका स्वभाव-धर्म-
इसी भांति हे तू देख । सत्व तम अधोमुख ।
तथा होता ऊर्ध्व-मुख । जब रजोगुण ॥ २६ ॥
तब वह अपने कार्यका पार्थ । शरीर-ग्राममें है धूम मचाता ।
देहमें तब लक्षणोंका करता । उदय ऐसा ॥ २७ ॥
अजी ! फैला हुवा बवंडर । करता है वस्तुओंका ढेर ।
वैसे होता विषयोंका ठौर । वह देह ॥ २८ ॥
प्रसंग जैसे पर-दारादिकका । न सोचता शास्त्र-विरुद्ध होनेका ।
इंद्रियोंको देता चारा विषयोंका । भेडोंके समान ॥ २९ ॥
यहां तक होता इनका लोभ । स्वैर वृत्तिका रहता सदा रोभ ।
लूटनेमें अशक्य जो अलाभ । इन लोगोंका ॥ २३० ॥
आता जब उद्यमका प्रसंग । नहीं लेता है कभी पीछे पग ।
बढाती है प्रवृत्ति पग-पग । अपनी सदैव ॥ ३१ ॥
या खडा करना कोई प्रासाद । या करना है यज्ञ-अश्वमेध ।
ऐसे होते मनमें बडे छंद । उसके सदैव ॥ ३२ ॥
नगरोंको रचाना । जलाशय बांधना ।
महावन लगाना । नानाविध ॥ ३३ ॥
ऐसे ऐसे महान कर्म । समारोहोंका उपक्रम ।
इस परके सभी काम- । भोग करना मेरे ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५२

महा-सागर भी खायेगा मात । अग्नि भी होगा पूरा पराजित ।
बढती है इतनी असीमित । अभिलाषा उसकी ॥ ३५ ॥
आशा जो बढती जाती । मनके आगे दौडती ।
विश्वको भी जो गिनती । पद्-तलमें ॥ ३६ ॥
बढता है रज जब । दीखते ये चिन्ह सब ।
शरीर पडता तब । यदि इसका ॥ ३७ ॥
यह सब होते जहां । वह जन्मता है वहां ।
किंतु होती योनि वहां । मनुष्यकी ही ॥ ३८ ॥
यदि कोई एक भिक्षुक । राज-गृहमें बैठा देख ।
उससे वह राजा एक । बनेगा क्या ॥ ३९ ॥
बैलको जोतकर गाडीमें । ले गये धनीके बारातमें ।
इससे चूकेगा क्या गोठेमें । खाना घास ॥ २४० ॥
इसीलिये व्यापारमें दिन रात । जुते रहते जो अविश्रांत ।
ऐसे कुलमें उसे निश्चित । मिलता जन्म ॥ ४१ ॥
जन्मता है कर्म-जडोंमें । अथवा ऐसे ही देहमें ।
जहां रजोत्कर्ष-गर्तमें । डूबता वह ॥ ४२ ॥
तमो-गुणीका स्वभाव-धर्म—
और अर्जुन उसी भांति । जहां रज-सत्वकी वृत्ति ।
निगलकर हो उन्नति । तमोगुणकी ॥ ४३ ॥
कहते हम लक्षण । अंतर्बाह्य तन-मन ।
कहता सुन अर्जुन । ध्यान देकर ॥ ४४ ॥
उसका होता ऐसा मन । जैसे सूर्य-चन्द्र विहीन ।
होता है रातका गगन । अमावसका ॥ ४५ ॥
ऐसा उसका अंतःकरण । सदैव स्फूर्ति-हीन विरान ।
विचारका स्पर्श भी अर्जुन । नहीं होता ॥ ४६ ॥
५५३ गुण-निस्तारयोग
(70)

पत्थरको हराती जड़ता । मृदुता वह नहीं जानता ।
स्मरण-शक्तिका अता-पता । नहीं होता उसको ॥ ४७ ॥
अविवेक उसका साज । अंतर्बाह्य मौढ्यका बाज ।
लेन-देन होता सहज । मूर्खताका ॥ ४८ ॥
आचार-हीनता अमंगल । दबोचती उसको प्रबल ।
मृत्यु-तक उसका चंगुल । कसता जाता ॥ ४९ ॥
कहता हूं और एक लक्षण । दुष्टतामें चित्त विलक्षण ।
जैसे काली रातमें सुलक्षण । देखता उल्लू ॥ २५० ॥
निषिद्ध-कर्मके नामसे । खिल जाता तन-मनसे ।
दौड़ती अनिर्बंध जैसे । इंद्रियां सारी ॥ ५१ ॥
बिन मदिराके वह झूमता । बिन सन्निपातके बकता ।
बिन प्रेमके वह भूलता । पागल जैसे ॥ ५२ ॥
रहता नहीं उसका चित्त । किंतु उन्नति नहीं निश्चित ।
भ्रम-वश हुवा है उन्मत्त । तमो-गुणी वह ॥ ५३ ॥
या इन गुणोंकी होती । जहां संपूर्ण प्रतीति ।
जानो तमकी उन्नति । हुई सांग ॥ ५४ ॥
और ऐसे ही प्रसंग । तजता है यदि अंग ।
लेके यही गुण संग । जन्मता वह ॥ ५५ ॥
राईपन अपने बीजमें । छोड़ जाती है राई अंतमें ।
अंकुरेगा राईके रूपमें । राईपन जैसे ॥ ५६ ॥
तज कर अग्नि जब दीप । बुझता यदि अपने आप ।
जैसे जहां लगा वह दीप । आग ही आग ॥ ५७ ॥
ऐसे तमो गुणके साथ । संकल्प बांधकर पार्थ ।
बुझती है जीवन जोत । जन्मती तम-रूप ॥ ५८ ॥
इससे अधिक क्या कहना । तम-वृद्धिमें देह तजना ।
पशु-पक्षी कृमि हो जन्मना । या उगना हो पेड ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५४

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥
तीनों गुणोंका परिणाम--
श्रुतिका यह निरूपण । बन जाता है सत्व-गुण ।
सुकृत-कर्मका कारण । धनुर्धर ॥ २६० ॥
इसीलिये है निर्मल । सुकृतका जो सरल ।
देता सुख ज्ञान फल । सात्विक ॥ ६१ ॥
फिर है जो रजकी प्रक्रिया । इंद्रवणिका फल पकाया ।
सुख चितार अंतमें दिया । दुःख अपार ॥ ६२ ॥
अथवा जैसे निंबोणीका फल । बाहर मृदु अंदर गरल ।
वैसे होते राजस-क्रिया-फल । यहां अर्जुन ॥ ६३ ॥
जैसे है विषका अंकुर । देता विष फल आखर ।
वैसे है रूप भयंकर । फलता तम ॥ ६४ ॥
सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥
इसीलिये हे अर्जुन । सत्वका हेतु है ज्ञान ।
जैसे मानो दिनमान । होता सूर्यका ॥ ६५ ॥
तथा वैसे ही यह जान । लोभका है रज कारण ।
जैसे स्वरूप विस्तारण । जीव-दशाका ॥ ६६ ॥
मोह अज्ञान प्रमाद । यहां है ये दोष-वृन्द ।
आगे जो बढता प्रबुद्ध । तमका मूल ॥ ६७ ॥
फल सात्विक कर्मोंका पुण्य निर्मल है कहा ।
रजका फल है दुःख तमका ज्ञान-शून्यता ॥ १६ ॥
सत्वसे फैलता ज्ञान रजसे जान लालसा ।
प्रमाद मोह अज्ञान होते हैं तमके गुण ॥ १७ ॥
५५५ गुण-निस्तारयोग

ऐसे विचारोंके नयन । तीनों गुण करके भिन्न ।
दिखाते हैं जान अर्जुन । करतलामलकसा ॥ ६८ ॥
रज-तम हैं ये दोनों गुण । होते हैं पतनके कारण ।
सत्व बिन अन्य नहीं जान । पहुंचाते ज्ञानके पास ॥ ६९ ॥
इसीलिये सात्विक-वृत्ति । स्वीकार व्रत जन्म-वृत्ति ।
सर्व त्याग करके भक्ति । करते जान ॥ २७० ॥
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥
गुण-बद्धोंके स्थान—
जिनमें होता सत्वका उत्कर्ष । जीते-मरते उसीमें सहर्ष ।
तन त्याग वे पाते सत्पुरुष । स्वर्गका राज ॥ ७१ ॥
ऐसे ही रजमें जो रहते । उसीमें जीते तथा मरते ।
वे मनुष्य होके जन्मते । मृत्यु-लोकमें ॥ ७२ ॥
सुख दुःखकी खिचडी जिसमें । खानी पड़ती एक ही थालीमें ।
फंसते हैं जो मरण-चक्रमें । कभी नहीं छूटते ॥ ७३ ॥
तथा तममें जो उसी भांति । जीते मरते हैं उसी स्थिति ।
पाते हैं नरक अधोगति । प्राप्ति-पत्र ॥ ७४ ॥
इस भांति जो वस्तु-सत्ता । त्रिगुणको कैसे प्रभावित ।
करती है कारण सहित । कहा मैंने ॥ ७५ ॥
वस्तु होती है वस्तुत्वमें । किंतु आप गुण-रूपमें ।
देख गुणके स्वभावमें । बरतती है ॥ ७६ ॥
राजा देखता जैसे स्वप्नमें । घिरा है राज-पर-चक्रमें ।
जीतता हारता अपनेमें । आप ही एक ॥ ७७ ॥
सत्वस्थ चढते ऊंच मध्यमें व्यक्ति राजस ।
अधःपतित होते हैं तामसी हीन वृत्तिके ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५६

वैसे मध्य ऊर्ध्व अध । ये जो गुण-वृत्ति भेद ।
दृष्टि तज दी तो शुद्ध । वस्तु आप ॥ ७८ ॥
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥
गुण-निस्तारका विवेचन—
रहने दे अब यह विषय । कहने दे पीछेका जो विषय ।
इसे विषयांतर धनंजय । नहीं मान तू ॥ ७९ ॥
मानो यह तीन जो गुण । अपने सामर्थ्यसे जान ।
होते जैसे देह अर्जुन । गुण ही आप ॥ ८० ॥
जैसे ईंधनका आधार । अग्नि होता है धनुर्धर ।
या उगता है तरुवर । भूमिका रस ॥ ८१ ॥
या दधि-घृतके रूपमें जैसे । होता है केवल दूध ही वैसे ।
या लेता है ईखका रस जैसे । गूडका रूप ॥ ८२ ॥
ऐसे हैं ये सांतःकरण । देह बनते तीन गुण ।
तभी होते बंध-कारण । धनंजय ॥ ८३ ॥
किंतु आश्चर्य धनुर्धर । यह बंधका जो गुब्बार ।
मुक्त दशामें संसार । कभी नहीं ॥ ८४ ॥
यदि गुण ये अपने धर्मानुसार । होते हैं शरीरके आगे पीछे स्वैर ।
आत्माके गुणातीतावस्थामें अंतर । नहीं आता ॥ ८५ ॥
ऐसी मुक्ति होती है सहज । तुझको कहता हूं मैं आज ।
स्वभावसे तू ज्ञान-पुंज । अमर अर्जुन ॥ ८६ ॥
चैतन्य होता है गुणमें । न होता गुणके पाशमें ।
कहा यह त्रयोदशमें । मैंने तुझको ॥ ८७ ॥
गुणोंको तजके कर्त्ता आत्मा जो उस पार है ।
देखता जानता ऐसा होता मेरा स्वरूप सो ॥ १९ ॥
५५७ गुण-निस्तारयोग

जिस समय अंतःकरणमें । प्रतीत हो ज्ञान बोध-रूपमें ।
तब जैसे जागृत अवस्थामें । होता स्वप्न-भंग ॥ ८८ ॥
या जब तरंग उठते । उसे तटसे हैं देखते ।
बिंबके अंग-भंग होते । उसी प्रकार ॥ ८९ ॥
नट जैसे नहीं फंसता । अपने स्वांगको जानता ।
वैसे ही गुणोंको देखता । साक्षी-रूप ॥ २९० ॥
अथवा ऋतु-त्रयमें आकाश । ऋतुओंको देकर अवकाश ।
अलिप्तता रखता अविनाश । अपनी जैसे ॥ ९१ ॥
वैसे गुणमें गुणसे पर । अपने मूल-रूपमें स्थिर ।
होता अहंतापे अहंकार । उस समय ॥ ९२ ॥
वहांसे जब वह देखता । कहता मैं हूं साक्षी अकर्ता ।
क्रियाओंका नियोजन कर्ता । केवल हैं गुण ॥ ९३ ॥
तीन गुणोंका है जो प्रकार । दीखता कर्मका हो विस्तार ।
वह है गुणोंका विकार । धनंजय ॥ ९४ ॥
इसमें रहता हूं मैं ऐसा । वनमें वसंत ऋतु जैसा ।
वन-लक्ष्मीका विलास जैसा । कारण-रूप ॥ ९५ ॥
अथवा तारागणका लोपना । सूर्यकांतका उद्दीपन होना ।
तथा कमलोंका खिलना । या जाना तनका ॥ ९६ ॥
यहां किसी भी काममें कहीं । सविता उलझता नहीं ।
वैसे अकर्ता होता है देही । सत्ता-रूप ॥ ९७ ॥
गुण-प्रकाश कर गुण-दर्शन । होता है मुझमें गुणत्वका पोषण ।
गुणत्रयका होकर जो निरसन । रहता वह मैं हूं ॥ ९८ ॥
ऐसे विवेकका जो उदय । होता है जिसका धनंजय ।
उसे मिलता पथ विजय । गुणातीतका ॥ ९९ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५८

अध्याय ११: विश्वरूपदर्शनयोग

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥
गुण-निस्तारसे मोक्ष प्राप्त होता है—
निर्गुण ऐसा और जो पार्थ । रहता है उसको निश्चित ।
जानता वह उसमें नित । बसता ज्ञान ॥ ३०० ॥
अथवा मानो पांडुसुता । पाता है वह मेरी सत्ता ।
जिस भांति पाती सरिता । सिंधुत्व जैसे ॥ १ ॥
नळिका परसे उड़कर । बसता है शुक डालपर ।
वैसे वह मूल अहंकार । ओढता है सो ॥ २ ॥
अज्ञानकी नींद जो सोया था । जोरसे खुर्राटे भरता था ।
पाकर वह स्वरूपावस्था । उठता अर्जुन ॥ ३ ॥
बुद्धि-भेदका जब दर्पण । हाथसे छूटके गिरा जान ।
तब स्व-मुखाभास दर्शन । होगा कैसे ॥ ४ ॥
देहाभिमानका पवन जब रुकता । चित्तसिंधु पर तरंग नहीं उठता ।
तरंग-सिंधुका तब जैसे ऐक्य होता । वैसे जीवेशका ॥ ५ ॥
वर्षातमें गगनमें जैसे । लय होते हैं बादल वैसे ।
पूर्ण होता वह मद्भावसे । पांडुकुमार ॥ ६ ॥
ऐसे वह मद्रूप कर प्राप्त । शरीरमें रहता है सतत ।
नहीं होता है त्रिगुणमें लिप्त । देह-संभूत जो ॥ ७ ॥
अजी ! कांचका घर जो होता । प्रकाशको रोक न सकता ।
या वडवानल न बुझता । सिंधु-जलसे ॥ ८ ॥
वैसे ही आवागमन जो गुणोंका । बोध नहीं मिटा सकता उसका ।
जैसे चंद्र होता जलमें व्योमका । वैसे देहमें रहता वह ॥ ९ ॥
देह कारण ये तीन गुण जो तरता इन्हे ।
जन्म-मृत्यु जरा दुःख तरके मोक्ष जीतता ॥ २० ॥
५५९ गुण-निस्तारयोग

शरीरमें करते हैं तीनों गुण । अपने सामर्थ्यका घोर नर्तन
न भेजता वह करने दर्शन । अपनी अहंताको ॥ ३१० ॥
हृदयमें ऐसा वह धनंजय । रहता है करके दृढ निश्चय ।
शरीरमें करते क्या गुण-त्रय । यह न जानता वह ॥ ११ ॥
तज कर अंगका खोल । सर्प घुस बैठा पाताल ।
त्वचाका करेगा संभाल । कौन बाहर ॥ १२ ॥
अथवा पक्व सौरभ जैसा । लय होता आकाशमें वैसा ।
न आता कभी कमल-कोश । लौटकर जो ॥ १३ ॥
हुवा स्व-रूप समरससे । उसकी जीव-दशा भी वैसे ।
रहा शरीर-धर्म भी कैसे । जानता नहीं ॥ १४ ॥
तभी जन्म जरा मरण । इत्यादि जो छ हैं लक्षण ।
रहे ये देहके कारण । इसकी वार्ता नहीं ॥ १५ ॥
घट ही जब टूट गया । खपरा भी है फेंका गया ।
महदाकाशमें हो लिया । घटाकाश ॥ १६ ॥
देहका भाव जब मिटता । निजका ही स्मरण रहता ।
तब कहो अन्य क्या रहता । उसके बिन ॥ १७ ॥
ऐसा जो श्रेष्ठ बोध-युक्त । देहमें रहता सतत ।
तभी मैं उसे गुणातीत । कहता अर्जुन ॥ १८ ॥
श्रीकृष्णके सुन ये बोल । तुष्ट हुवा पार्थ निर्मल ।
गरजने पर बादल । मोर होता जैसे ॥ १९ ॥
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥
अर्जुनने कहा
त्रिगुणातीतके देव कह लक्षण तू मुझे ।
आचार उसके कैसे कैसे निस्तारता गुण ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ५६०

अर्जुनकी जिज्ञासा, गुणातीत कैसे होता है ?--
उसी तोषसे पूछता अर्जुन । दीखते उसके क्या लक्षण ।
जिसमें बसता है ऐसा ज्ञान । कह तू श्रीहरि ॥ २० ॥
उसका होता कैसा आचरण । करता कैसे गुण-निस्तरण ।
कृपाका तू नैहर श्रीकृष्ण । यह कह कृपाकर ॥ २१ ॥
अर्जुनका सुन यह प्रश्न । षड्गुणैश्वर्य-युत श्रीकृष्ण ।
उत्तर देता है कृपा-पूर्ण । सुनिये अब ॥ २२ ॥
विचित्र है तेरी यह बात । पूछता तू प्रश्न विसंगत ।
यह सत्य कैसे असत् पार्थ । ऐसा यह प्रश्न ॥ २३ ॥
जिसका नाम गुणातीत । नहीं होता गुण-संयुत ।
होता भी यदि गुण-युत । मुक्त रहता वह ॥ २४ ॥
कृष्ण प्रश्नका वास्तविक रूप समझाता है --
किंतु गुणमें है उलझता । तब गुणाधीन वह होता ।
अथवा गुण-मुक्त रहता । जानना कैसे ॥ २५ ॥
ऐसा है यदि तेरा प्रश्न । पूछ तू सुखसे अर्जुन ।
करता हूं समाधान । तेरे संदेहका ॥ २६ ॥
भगवान् उवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥
गुणोंके कल्लोलमें वह निर्लिप्त रहता है-
जब रजोगुणका मद । देहमें लाता कर्म साध ।
प्रवृत्ति लेती है उसे बांध । कर्मांकुरसे ॥ २७ ॥
श्री भगवानने कहा
प्रकाश मोह उद्योग गुण-कार्य स्वभाविक ।
पानेसे न करे खेद न धरे चाह लोपसे ॥ २२ ॥
(71) ५६१ गुण-निस्तारयोग

तब कर्म-जन्य अभिमान । नहीं आता उसमें अर्जुन ।
या कर्म रह जानेसे मन । खिन्न नहीं होता ॥ २८ ॥
या सत्व होता है जब अधिक । इंद्रियां होती हैं ज्ञान प्रकाशक ।
तब न होता सु-विधाका तोष । या अविधाका खेद ॥ २९ ॥
अथवा बढ़ता है जब तम । तब न भासता मोह या भ्रम ।
या नहीं होता अज्ञानका श्रम । या न करे स्वीकार ॥ ३० ॥
आता जब मोहका अवसर । नहीं चाहता ज्ञान धनुर्धर ।
या ज्ञानसे कर्म-स्वीकार कर । न होता दुःखी ॥ ३१ ॥
प्रातः माध्यान्ह सायंकाल । गणना करके त्रिकाल ।
न तपता सूर्य निर्मल । वैसे वह रहता ॥ ३२ ॥
उसको भिन्न क्या प्रकाश । ज्ञानसे मिलाता है शेष ।
नहीं सुखाती अनावर्षा । जैसे सागरको ॥ ३३ ॥
या करनेसे कर्म-प्रवर्तन । नहीं होगा कर्मका अभिमान ।
कहो कहींसे होगा क्या कंपन । हिमालयको ॥ ३४ ॥
होनेसे मोहका आगमन । भूल जायेगा क्या वह ज्ञान ।
घामसे जलेगा क्या अर्जुन । प्रलयाग्नि कभी ॥ ३५ ॥
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३ ॥
गुणोंके जालमें निर्लिप्त और निष्कंप रहता है—
गुण और गुणका कार्य । आप है पूर्ण धनंजय ।
तभी है एकेकका कार्य । न डिगाता उसे ॥ ३६ ॥
करके ऐसी प्रतीति । देहमें मैने की वसति ।
जैसे राहमें कोई पंथी । मान लेके ॥ ३७ ॥
रहे जैसे उदासीन गुणोंसे जो न कांपता ।
जानके उनका खेल न डिगे लेश-मात्र भी ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५६२

न जिताता या न हराता । स्वयं जीतता या हारता ।
न गुण होता या कराता । जैसा रण-रंग ॥ ३८ ॥
अथवा शरीर-गत प्राण । घरमें आतिथ्यका ब्राह्मण ।
या चौराहेपे खडा जो स्थाणु । वैसा उदास ॥ ३९ ॥
तथा गुणोंका आवागमन । उसको नहीं कंपाता जान ।
मृग-जलोर्मियोंसे अर्जुन । नहीं कांपता मेरू ॥ ४० ॥
इससे अधिक क्या बोलना । वायुसे गगनका हिलना ।
तमका सूर्यको निगलना । इसी भांति ॥ ४१ ॥
स्वप्न जैसा नहीं मोहता । जगता जो उसको पार्थ ।
वैसे उसे नहीं बांधता । गुणका जाल ॥ ४२ ॥
गुणमें वह नहीं फंसता । दूरसे वह है देखता ।
गुण-दोषकी नृत्य-कथा । साक्षी जैसा ॥ ४३ ॥
सात्विक करता सत्कर्म । रज करता रजो कर्म ।
भ्रम-आलस्यादिमें तम । करता कार्य ॥ ४४ ॥
सुन तू उसकी है सत्ता । होती गुण-क्रिया समस्त ।
जैसे सम्मुख हो सविता । लौकिकका ॥ ४५ ॥
समुद्र जैसे उमड आता । सोमकांत मणि पसीजता ।
अथवा है कुमुद खिलता । चंद्रिकासे ॥ ४६ ॥
या पवन बहता रुकता । गगन जैसे निश्चल रहता ।
वैसे गुणोंका हलचल होता । वह होता निश्चल ॥ ४७ ॥
ये हैं उसके लक्षण । गुणातीतके तू जान ।
कहता हूं आचरण । उसका मैं ॥ ४८ ॥
समदुःखसुखःस्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥
शांत जो स्तुति निंदामें धीर जो सुख दुःखमें ।
प्रियाप्रिय जिसे तुल्य स्वर्ण पाषाण मृत्तिका ॥ २४ ॥
५६३ गुण-निस्तारयोग

गुणातीतकी सम-वृत्ति-
कपडेके अंदर बाहर । होता है तंतू ही धनुर्धर ।
वैसे देखता है चराचर । विश्वमें मद्रूप ॥ ४९ ॥
रिपु भक्तमें जैसे समान । रहता है परमात्मा जान ।
वैसे ही सुख दुःख अर्जुन । एकसे उसको ॥ ३५० ॥
वैसे भी स्वाभाविक । भोगना सुख दुःख ।
देह-रूप उदक । पाता मीन ॥ ५१ ॥
अब उसने वह छोड़ दिया । अपना स्व-स्वरूप जान लिया ।
जैसे भूसेसे दाना चुन लिया । खेतीहरने ॥ ५२ ॥
अथवा ओघ छोड़कर गांग । बन गया समुद्रका ही अंग ।
भूलकर अपना लगभग । कलकल ध्वनि ॥ ५३ ॥
हो गयी जब उसकी निश्चित । आत्म-रूपमें वसति सतत ।
देहमें तब उसको समस्त । एकसे सुख दुःख ॥ ५४ ॥
रात-दिवस समान । मानता स्तंभ अर्जुन ।
आत्म रत होता तन । द्वंद्व वैसे ॥ ५५ ॥
जैसे नींदमें रत शरीर । अप्सरा अथवा अजगर ।
एक मानता है धनुर्धर । वैसे देहके द्वंद्व ॥ ५६ ॥
देखता उसका मन । सुवर्ण रत्न पाषाण ।
सदैव एक समान । बिना भेदके ॥ ५७ ॥
घरमें उतर आता स्वर्ग । अथवा ऊपर आता बाघ ।
न होता आत्म-बुद्धिका भंग । उसका कभी ॥ ५८ ॥
जैसे मृत न होता जागृत । या भूना बीज न अंकुरित ।
वैसी होती है बुद्धि आत्मस्थ । सदा अभंग ॥ ५९ ॥
ब्रह्म है तू ऐसा स्तवन । या निंदा करो नीच मान ।
जलने बुझनेका ज्ञान । नहीं जानती राख ॥ ३६० ॥
ज्ञानेश्वरी ५६४

वैसे निंदा अथवा स्तवन । जानता नहीं वह अर्जुन ।
तम और प्रकाशका ज्ञान । न होता सूर्यको ॥ ६१ ॥
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥
ईश्वर-बुद्धिसे किया पूजन । या चोर मानके किया ताडन ।
वृष-गजसे किया दलन । या दिया राज ॥ ६२ ॥
जैसे पास आये आप्त-मित्र । या घिर आये शत्रु-सर्वत्र ।
किंतु न जानता सूर्य रात्र । अथवा दिवस ॥ ६३ ॥
सभी ऋतुमें जैसे गगन । निर्लिप्त रहता है अर्जुन ।
ऐसा वैषम्य रहित मन । होता उसका ॥ ६४ ॥
वैसे ही उसका एक आचार । कहता हूं तुझे पांडुकुमार ।
नहीं होता कभी कोई व्यापार । वहां प्रारंभ ॥ ६५ ॥
सर्वारंभ वहां समाप्त । प्रवृत्तिका होता है अस्त ।
जले हैं कर्म-फल पार्थ । सभी वहां ॥ ६६ ॥
दृष्ट्यादृष्ट्य भोगकी पार्थ । नहीं होती चाह जागृत ।
प्रारब्धसे होता जो प्राप्त । पाता वह सहज ॥ ६७ ॥
सुख या दुखमें जैसे । पाषाण रहता वैसे ।
त्याग-स्वीकार मनसे । मिट गया है ॥ ६८ ॥
कितना करना विस्तार । जिसका है ऐसा आचार ।
उसे मान तू धनुर्धर । गुणातीत ॥ ६९ ॥
गुणोंका अतिक्रमण । करनेका क्या साधन ।
कहता वह श्रीकृष्ण । सुनिये अब ॥ ३७० ॥
मानापमानमें जैसे समान शत्रु-मित्रमें ।
गुणातीत वही मान आरंभ जिसने तजा ॥ २५ ॥
५६५ गुण-निस्तारयोग

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥
गुण-निस्तारका साधन--
ऐसे जो अव्यभिचार चित्त । भक्ति-योग-रत हो सतत ।
मेरा सेवन करता पार्थ । लांघता गुण ॥ ७१ ॥
अव्यभिचारी भक्तिका विवेचन--
तब कौन हूं मैं कैसी भक्ति । अव्यभिचारकी अभिव्यक्ति ।
होना उसकी पूर्ण निश्चिति । अत्यावश्यक ॥ ७२ ॥
तब तू सुन अर्जुन । यहां है मेरा क्या स्थान ।
रत्नमें तेज जो रत्न । वैसा हूं मैं ॥ ७३ ॥
या द्रवणवत है नीर । या अवकाश है अंबर ।
या मिठास ही है शक्कर । नहीं भिन्न ॥ ७४ ॥
या अग्नि ही है ज्वाल । दल ही है कमल ।
वृक्ष जो वही डाल । फलादिक ॥ ७५ ॥
हिम होता जो संघटित । कहलाता वह हिमवंत ।
या जामन लगा दूध पार्थ । कहलाता दही ॥ ७६ ॥
यहां विश्व है जो अर्जुन । स्वयं मैं हूं वह संपूर्ण ।
चंद्र-बिंबका तरासना । न होता वैसे ॥ ७७ ॥
अजी ! जमा हुवा घृत । जमकर भी रहता घृत ।
या कंकण रूपमें भी पार्थ । होता सोना ही ॥ ७८ ॥
न उघड़ कर भी वस्त्र । स्पष्ट ही रहता सूत्र ।
जैसे न तोडके भी पात्र । रहती मृत्तिका ॥ ७९ ॥
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जो एक-निष्ठ भक्तीसे करता मम सेवन ।
लांघके गुणको सारे पाता ब्रह्मत्व है वह ॥ २६ ॥
ज्ञानेश्वरी ५६६

इसलिये विश्वत्वका निवारण । कर फिर करना मेरा ग्रहण ।
ऐसा नहीं जान तू यह संपूर्ण । विश्व-सह मै हूं ॥ ३८० ॥
इस प्रकार जो मुझको जानना । उसको अव्यभिचारी भक्ति कहना ।
विश्वमें औ' मुझमें भेद देखना । व्यभिचारी भक्ति ॥ ८१ ॥
इसलिये भेद तज पार्थ । तथा करके अभेद-चित्त ।
जानना है अपने सहित । मुझको सदैव ॥ ८२ ॥
सोनेपे जैसे सुवर्ण । जडा जाता है अर्जुन ।
वैसे अपनेसे भिन्न । न मानना मुझे ॥ ८३ ॥
तेजसे जो होता उत्पन्न । तेजोमय होता किरण ।
तेजसे होता है अभिन्न । ऐसा होना बोध ॥ ८४ ॥
भूतलमें जैसे परमाणु । हिमाचलमें है हिम-कण ।
वैसे मुझमें कर अर्पण । अपनेको तू ॥ ८५ ॥
तरंग होता छोटा अर्जुन । किंतु न होता सिंधुसे भिन्न ।
वैसे ईश्वरसे नहीं भिन्न । कुछ भी यहां ॥ ८६ ॥
इसी भांति समरस । दृष्टि रख स-उल्लास ।
भक्तिका वह निवास । कहते हम ॥ ८७ ॥
ज्ञान और योगका समन्वय, अद्वय-दृष्टि—
तथा ज्ञानकी भी अर्जुन । सही दृष्टि यह है जान ।
तथा योगका है संपूर्ण । सार भी यही ॥ ८८ ॥
सिंधुसे जैसे जल-धर । लेते हैं अखंड जो धार ।
वैसी वृत्ति पांडुकुमार । बनती तन्मय ॥ ८९ ॥
जैसे कूप मुखका आकाश । सांधा न जाता महाकाश ।
होता है वैसे परम-रस । ऐक्य-रूप ॥ ३९० ॥
प्रति-बिंब तक बिंबसे । प्रभा-ज्योति होती है जैसे ।
सोऽहम् वृत्ति होती है वैसे । धनंजय ॥ ९१ ॥
५६७ : गुण-निस्तारयोग

ऐसे ही फिर परस्पर । सोऽहम् वृत्तिका अवतार ।
वह भी मिटती फिर । अपने आप ॥ ९२ ॥
जैसे नूनका एक कण । समुद्रमें पिघला जान ।
गलना भी फिर अर्जुन । भूलता जैसे ॥ ९३ ॥
अथवा जलकर तृण । बुझ जाता है अग्नि-कण ।
भेद-नाशका वैसे ज्ञान । मिटता आप ॥ ९४ ॥
रहता हूं मैं उस पार । भक्त रहता इस पार ।
यह दोनों ही मिटकर । रहता अनादि ऐक्य ॥ ९५ ॥
गुणोंको है वह लांघता । यह भी अब न रहता ।
न रहती एक वाक्यता । एकत्वकी भी ॥ ९६ ॥
इसीको ब्रह्मत्व कहते हैं जो मेरी एक-निष्ठ भक्तिसे मिलता है—
यह जो है ऐसी स्थिति । ब्रह्मत्व है कहलाती ।
मेरी अव्यभिचारी भक्ति । देती है यह ॥ ९७ ॥
तथा ऐसे लक्षण-युक्त । जगतमें मेरा जो भक्त ।
ब्रह्मत्व उससे संयुक्त । पतिव्रता जैसे ॥ ९८ ॥
पानी जो गंगामें बहता । सिंधुसे निश्चित मिलता ।
इसमें नहीं है अन्यथा । उसी भांति ॥ ९९ ॥
ज्ञान-दृष्टिसे जो अर्जुन । करता है मेरा सेवन ।
होता है वह जुडा रत्न । ब्रह्म-पदका ॥ ४०० ॥
ऐसे ब्रह्म-पदका पार्थ । सायुज्य ऐसी व्यवस्था ।
उसीका नाम है चौथा । पुरुषार्थ जो ॥ १ ॥
किंतु मेरा यह आराधन । होता है ब्रह्मत्वका सोपान ।
इससे मैं इसका साधन । मानेगा तू ॥ २ ॥
यदि एसा है तेरा मन । करता कल्पना अर्जुन ।
नहीं है अन्य मेरे बिन । कोई ब्रह्म ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५६८