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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

क्री०ख०-अ०६८ ] विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन ४३३

क्री०ख०-अ०६८ ] * विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन * ४३३ बाण निकालकर उन्हें घण्टास्त्र और खगास्त्रके मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके धनुषको कानतक खींचकर छोड़ दिया। अत्यन्त वेगवाले और सुनहरे पंखोंवाले वे दोनों बाण मेघके समान गर्जना करते हुए वायुवेगसे चले और उन्होंने सहसा सूर्यमण्डलको आच्छादित कर दिया ॥ २३-२६ ॥ [उस समय] घण्टास्त्रसे महान् घण्टानाद होने लगा, जो सबको विमोहित कर देनेवाला था। तब उस घण्टा- नादको सुनकर सभी सैनिक उठकर खड़े हो गये ॥ २७॥ तब [निद्रास्त्रके प्रभावसे मुक्त] सिद्धियाँ और सभी वीर हाथोंमें शस्त्र धारणकर युद्ध करने लगे। भगवान् विनायकने दूसरा बाण देवान्तककी सेनाको लक्ष्य करके छोड़ा। तब उस खगास्त्र [नामक बाण]-से महान् बलसम्पन्न अनेक प्रकारके रूपोंवाले पक्षी प्रकट हो गये। हे मुने ! उनके पंखोंकी वायुके वेगसे वह गन्धर्वास्त्र वैसे ही नष्ट हो गया, जैसे सूर्यके सारथी अरुणके उदय (अरुणोदय) होनेपर अन्धकार नष्ट हो जाता है। तदनन्तर उन पक्षियोंने सभी दैत्य सैनिकोंका भक्षण कर लिया ॥ २८-३०॥ कुछ दैत्य उन पक्षियोंके पंखोंके आघातसे मर गये, तो कुछ उनकी चोंचोंके अग्रभागसे क्षत-विक्षत हो गये तथा कुछ दैत्य भयसे प्राण त्यागकर गिर गये ॥ ३१ ॥ उस समय दैत्यसेनाओंमें सब ओर महान् हाहाकार होने लगा। तब देवान्तकने क्रोधित होकर खड्गास्त्रका प्रयोग किया ॥ ३२ ॥ उसकी ध्वनि सुनकर सागर-जैसी विशाल सेना और दिशाओंको धारण करनेवाले हाथी क्षुब्ध हो उठे। उस अस्त्रसे असंख्य खड्ग निकल आये ॥ ३३ ॥ उस समय दोनों सेनाओंके टकरानेसे वे खड्ग अग्निके समान दाहक हो उठे। तब उस अग्निसे जलकर देवता धरतीपर गिर पड़े ॥ ३४ ॥ [उस अस्त्रके प्रभावसे] कुछ पक्षी मारे गये और कुछ अग्निदग्ध हो गये तथा अन्य पक्षी अन्तर्धान हो गये। उस समय उन असंख्य खड्गोंकी प्रभासे दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं, और उस (प्रभा)-ने सैनिकोंके नेत्रोंकी ज्योतिका हरण कर लिया। [उस समय] खड्गोंकी वृष्टिसे मारे गये देवता पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३५-३६ ॥ उनमेंसे कुछ देवताओंकी भुजाएँ कट गयी थीं, तो कुछके मस्तक और कुछके हाथ कट गये थे। अन्य देवता पेट, घुटने और पीठपर खड्गके प्रहारसे आहत होकर मर गये और देवताओंके मृत शरीरोंपर गिर पड़े। इस प्रकार अष्टसिद्धियोंद्वारा निर्मित सम्पूर्ण सेना [उस अस्त्रद्वारा] विनष्ट हो गयी ॥ ३७-३८ ॥ उस समय दसों दिशाओंमें रक्तकी नदियाँ बहने लगीं और उनमें शव बहने लगे। तब विनायकने उस दैत्यके अद्भुत पराक्रमको देखकर [अपने तरकससे] एक सुदृढ़ बाणको निकालकर उसे वज्रास्त्रसे अभिमन्त्रित किया और महान् गर्जना करते हुए उसे दैत्यसेनामें छोड़ दिया ॥ ३९-४० ॥ उस बाणके शब्दसे पर्वत और वृक्ष [टूटकर] पृथ्वीपर गिर पड़े। उस अस्त्रसे निकली अग्निके संयोगसे दिशाएँ जलने लगीं। उस अस्त्रने अपने तेजसे सूर्यमण्डलको आच्छादित कर लिया। उसके तेजसे कुछ पक्षी दग्ध होकर मर गये ॥ ४१-४२ ॥ उस वज्रास्त्रसे खड्गास्त्र सहसा हजारों टुकड़ोंमें टूट गया। तदनन्तर उस वज्रास्त्रने अनेक वज्रोंके द्वारा दैत्यसेनाको जला डाला ॥ ४३ ॥ वज्रकी धार [-के स्पर्शमात्र]-से हजारों दैत्य मर जा रहे थे। दैत्यगण जहाँ-जहाँ [भागकर] जाते थे, वहाँ-वहाँ वह वज्रास्त्र जाकर उनपर गिरता था ॥ ४४ ॥ उसने दैत्योंके मस्तकों, पैरों, हाथों, कन्धों और जंघाओंको चूर-चूर कर डाला। पृथ्वीका भेदनकर जो दैत्य [पातालमें] चले गये थे, उनको भी उस वज्रास्त्रने मार डाला। इस प्रकार तीक्ष्ण [धारवाले] सहस्रों वज्रोंद्वारा सभी दैत्य मार डाले गये। तदनन्तर वे सभी वज्र सब ओरसे देवान्तककी ओर चले ॥ ४५-४६ ॥ तब उसने भी एक बाण लेकर उसे प्रयत्नपूर्वक रौद्रास्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उसे धनुषपर चढ़ाकर तथा [कानतक] खींचकर शत्रुसेनापर छोड़ दिया। [भगवान्] शिवके मंगलमय नामसे अंकित उस बाणने आकाश और दिशाओं-विदिशाओंको भी निनादित कर दिया। प्रलयकालीन अग्निके सदृश वह बाण अग्निकणोंका

४३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[पूर्वार्द्ध - बायाँ स्तम्भ] वमन कर रहा था। उसके भयसे भूलोक और देवलोकके प्राणी दसों दिशाओंमें पलायन कर गये ॥ ४७-४९ ॥ उस समय विनायककी सेनामें महान् कोलाहल होने लगा। उस बाणके गिरनेपर उसमेंसे एक पुरुष प्रकट हुआ, जो देखनेमें अत्यन्त भयंकर था। ऐसा लगता था, मानो वह अपने भयंकर मुखसे तीनों लोकोंको अपना ग्रास बना लेगा। वह [सिरपर] जटा धारण किये बड़े-बड़े हाथ-पैरोंवाला और विशाल पेटवाला था ॥ ५०-५१ ॥ उसका नीचेका ओष्ठ पृथ्वीको और ऊपरका ओष्ठ आकाशको स्पर्श कर रहा था, उसकी जिह्वा पर्वत-जैसी थी। उस भयंकर पुरुषने क्षणभरमें वज्रास्त्रका भक्षण कर लिया। तदनन्तर विशाल शरीरवाला वह पुरुष क्षणभरमें विनायकके वधकी इच्छासे उनके समीप पहुँच गया। तब [भगवान्] विनायकने तत्क्षण ही ब्रह्मास्त्रका

[पूर्वार्द्ध - दायाँ स्तम्भ] सन्धान किया ॥ ५२-५३ ॥ उन देवाधिदेव विनायकने शताक्षरी मन्त्रसे एक तीव्रगामी बाणको अभिमन्त्रितकर उसे [धनुषपर चढ़ाकर और] कानतक खींचकर सहसा छोड़ दिया ॥ ५४ ॥ उस बाणसे उत्पन्न कर्कश ध्वनिसे तीनों लोक काँप उठे। उससे निकले अग्निकणोंसे सभी दिशाएँ दग्ध हो उठीं। उस समय कुछ भी समझमें नहीं आ रहा था। उस ब्रह्मास्त्रसे भी वैसा ही एक पुरुष उत्पन्न हुआ, जो अत्यन्त भयंकर था। वे दोनों पुरुष एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे युद्ध करते हुए आकाशमें चले गये ॥ ५५-५६ ॥ उन दोनों महाबलशालियोंने [वहाँ] अनेक प्रकारसे मल्लयुद्ध किया, तदुपरान्त क्षणभरमें वे दोनों अन्तर्धान हो गये और फिर कहीं भी नहीं दिखायी दिये ॥ ५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'अस्त्रयुद्ध' नामक अड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥


उनहत्तरवाँ अध्याय विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन


[उत्तरार्द्ध - बायाँ स्तम्भ] ब्रह्माजी कहते हैं—तब देवान्तक अत्यन्त विस्मित होकर अपने मनमें विचार करने लगा कि इस विनायकका निवारण करनेके लिये मैं जैसे-जैसे मायाका प्रयोग कर रहा हूँ, वैसे-वैसे ही यह बालक भी अपने पुरुषार्थका प्रदर्शन कर रहा है। कब यह मृत्युको प्राप्त होगा और कब मैं विगतश्रम होकर सो सकूँगा ? ॥ १-२ ॥ इस प्रकार चिन्तित उस देवान्तकने अपने धनुषको प्रत्यंचायुक्त किया और एक भयंकर बाणको अभिमन्त्रित करके विनायकपर छोड़ दिया ॥ ३ ॥ उस अभिमन्त्रित बाणने सर्वव्यापक [परमात्मा] विनायकपर असंख्य बाणोंकी वर्षा की। [तदनन्तर] देवान्तकने एक भयंकर शक्तिका निर्माण किया, जो त्रिलोकीको ग्रास बनानेके लिये उद्यत थी ॥ ४ ॥ विघ्नराज विनायकने उस शक्तिको और उसकी गोदमें बैठे दैत्यश्रेष्ठ देवान्तकको देखा, जो बहुत-से तीक्ष्ण बाणसमूहोंकी वर्षा कर रहा था ॥ ५ ॥ तब अष्ट सिद्धियाँ शीघ्र उड़कर गयीं और उस

[उत्तरार्द्ध - दायाँ स्तम्भ] शक्तिको बलपूर्वक पकड़कर उसे विनायकके पास लाने लगीं। जब वे उसे ला रही थीं, तभी वह उनके हाथसे निकलकर भाग गयी। तब वे सब क्रुद्ध होकर दैत्यपति देवान्तकको ही उसके सिरके बाल पकड़कर विनायकके पास ले आयीं ॥ ६-७ ॥ तब उस दैत्यने अणिमापर दृढ़तापूर्वक मुष्टिका- प्रहार किया, उस मुष्टिकाघातसे वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ी। तब लघिमा, गरिमा और वशिमाने उसपर तबतक लातोंसे प्रहार किया, जबतक कि उसने शीघ्रतापूर्वक उन सबके चरणोंको पृथक्-पृथक् पकड़ नहीं लिया। तदनन्तर वह दैत्य जबतक उन्हें पृथ्वीपर पटकता, उससे पहले ही वे निकल गयीं ॥ ८-१० ॥ तब प्राकाम्य और भूतिने उसे बलपूर्वक मारा तो वह दैत्य मुखसे अग्निवमन करता हुआ भूतलपर गिर पड़ा। तदनन्तर क्षणभरमें चेतना प्राप्त करके वह एक शक्तिशाली घोड़ेपर सवार हो गया। उसने शस्त्र हाथमें लेकर वायुवेगसे विनायकपर प्रहार किया ॥ ११-१२ ॥

क्री०ख०-अ०६९] विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन ४३५

क्री०ख०-अ०६९] * विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन * ४३५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] तलवारके दृढ़ आघातसे देव विनायक कुछ मूर्च्छित- से हो गये, परंतु पलक झपकनेमात्रमें सावधान होकर वे उस दैत्यराजके प्रति इस प्रकार दौड़े, जैसे हिरण्य- कशिपुका वध करनेके लिये विष्णु और वृत्रासुरका वध करनेके लिये शचीपति इन्द्र दौड़े थे ॥ १३ १/२ ॥ वे अपने चारों हाथोंमें बाण, कमल, पाश और अंकुश धारण किये थे और वीरोचित शोभासे अत्यन्त प्रकाशमान होकर सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने मेघसदृश गर्जना करके अपने चारों आयुधोंसे उस दैत्यश्रेष्ठ देवान्तकपर वेगपूर्वक प्रहार किया, परंतु फिर भी वह विचलित नहीं हुआ। तब अपने शस्त्रोंको व्यर्थ हुआ देखकर विनायक अत्यन्त आश्चर्यको प्राप्त हुए और माना कि इस दैत्यका शरीर वज्रके सारभागसे बना हुआ है ॥ १४-१६ १/२ ॥ तदनन्तर देवाधिदेव विनायकने उस महान् अस्त्रको ग्रहण किया, जो वज्रको भी चूर्ण कर सकता था और जिसे [विनायकके द्वारा पूर्वमें मारे गये] धूम्राक्षने [सूर्योपासनाके फलस्वरूप] सूर्यमण्डलसे प्राप्त किया था। उन्होंने दैत्य देवान्तकपर उसी अस्त्रसे प्रहार किया, किंतु [देवान्तककी शारीरिक दृढ़ताके कारण] उसके सैकड़ों टुकड़े हो गये ॥ १७-१८ ॥ उससे उसका एक रोम भी विचलित नहीं हुआ— यह एक महान् आश्चर्यकी बात थी ! तदनन्तर उन दोनोंने अनेक शस्त्रोंसे एक-दूसरेके सिर, पीठ, हृदय और भुजाओंपर प्रहार किया। तब उन शस्त्रोंके प्रहारसे उत्पन्न अग्नि पृथ्वीको जलाने लगी, परंतु वे दोनों [उससे] भयभीत नहीं हुए और युद्ध करते रहे। आधी रात हो जाने और अँधेरा फैल जानेपर भी उन्होंने युद्ध बन्द नहीं किया ॥ १९-२१ ॥ तदनन्तर वे दोनों कृत्रिम प्रकाशमें परस्पर युद्ध करने लगे। तब रौद्रकेतुने देवताओंको विमोहित करनेवाली मायाका प्रयोग किया ॥ २२ ॥ उसने सुन्दर स्वरूपवाली अदितिकी रचनाकर उसे दैत्य देवान्तकके हाथमें दे दिया। वह कमलनयनी पीन पयोधरोंवाली और भालदेशपर रक्तवर्णके कुंकुमका आलेप किये हुए थी। उसके गलेमें मुक्ताहार, हाथोंमें सुन्दर

[दायाँ स्तम्भ] कंगन और शरीरपर दिव्य वस्त्र शोभायमान थे। स्वर्णाभूषणोंसे विभूषित और दिव्य कंचुकी धारण किये वह सौन्दर्यलहरीके समान थी ॥ २३-२४ ॥ दैत्यके हाथमें पड़ी वह विनायकको देखकर रुदन करने लगी और उनसे बोली—'दौड़ो-दौड़ो, मैं संकटमें हूँ, तुम देख क्या रहे हो?' ॥ २५ ॥ वह ऐसा कह ही रही थी कि उस दैत्यने बलात् उसकी कंचुकी फाड़ डाली तथा उस मदोन्मत्त चित्तवाले दैत्यने उसके वस्त्रोंको भी खींच लिया। तब उस [मायारचित] अदितिने उच्च स्वरमें विनायकदेवसे कहा— 'तुम्हारा पुरुषार्थ कहाँ चला गया? अरे निष्ठुर ! लोकलब्जाके भयसे तुम शीघ्र मुझे [इस दैत्यसे] छुड़ाओ' ॥ २६-२७ ॥ अदितिको ऐसी अवस्थामें देखकर आँसुओंसे विनायकका कण्ठ भर आया, वे क्रोधित हो उठे, उन्हें कुछ भी स्मरण नहीं रहा और न वे कुछ विचार ही कर सके, शस्त्र उनके हाथोंसे गिर गये ॥ २८ ॥ वे सोचने लगे कि यह मेरी माता इसके हाथमें कैसे आ गयी ? उस पुत्रके जन्मको धिक्कार है, जिसकी जननी इस प्रकारकी दुरावस्थाको प्राप्त हो ॥ २९ ॥ देवताओंकी जननी होते हुए भी वह कैसे इस दुष्टके चंगुलमें पड़ गयी ? गणनायकको इस प्रकार शोक करते देखकर स्वयं काशिराज भी अत्यन्त शोकाकुल हो उठे और साथ ही नगरमें स्थित लोग भी। तब उस देवान्तकने विनायकदेवकी बहुत प्रकारसे निन्दा की— 'अरे ! तेरे जन्मको धिक्कार है, आज तेरा पौरुष कहाँ गया ? तू प्राण क्यों नहीं त्याग देता ? तू तो निर्लज्ज है, जो इस समय भी संसारमें अपना मुख दिखा रहा है। अरे दुष्ट ! मैं तेरे समक्ष ही इसके शरीरसे इसका सिर काटकर इसे मार डालता हूँ' ॥ ३०-३२ १/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं— देवान्तकके इस प्रकारके निष्ठुर वचनोंको सुनकर [विनायकदेवने] मनमें विचार किया कि यह सत्य ही कह रहा है, अब मुझे प्राणत्यागके लिये क्या करना चाहिये—'विषपान या पाशबन्धन ? अथवा मृत्युकी प्राप्तिके लिये मुझे उदरमें शस्त्राघात कर लेना चाहिये ?' जब वे दुःख और

४३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 शोकसे समन्वित होकर इस प्रकार विचार कर ही रहे | विनायक प्रातःकाल होनेपर युद्धके लिये गये ॥ ३८-३९॥ थे, तभी विनायकने आकाशवाणी सुनी ॥ ३३-३५१/२ ॥ | उस दैत्यने भी [रात्रिकालीन] युद्धकी समाप्तिपर आकाशवाणीने कहा— हे देव! यह जान लो | [उषाकालमें] लाल-लाल आँखोंवाले, मुकुटसे सुशोभित कि यह [अदिति] दुष्टबुद्धि दैत्यद्वारा मायासे रची गयी | और उज्ज्वल कुण्डल धारण किये विनायकको अपने है। अतः संयतचित्त होकर अपने शत्रु का वध करो। तब | सम्मुख देखा ॥ ४० ॥ उस अदितिको मायामयी जानकर वे विनायक सावधान | दाँतोंकी कान्तिसे वे अत्यन्त सुन्दर लग रहे थे, हो गये ॥ ३६-३७ ॥ | मोतियोंकी मालासे विभूषित थे। वे दिव्य वस्त्र धारण किये महाबुद्धिमान् विनायक हर्षित हो गये और दैत्य | हुए थे और अत्यन्त कान्तिमान् थे। उन सर्वव्यापक प्रभुकी देवान्तकको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये। उन्होंने | सूँड़ आकाशका स्पर्श कर रही थी। विनायकके [ऐसे] उस वरदानका स्मरण किया, जो भगवान् शंकरने उस | रूपको देखकर देवान्तक भयभीत और अत्यन्त विस्मित दुरात्माको दिया था कि उषाकालके बिना सभी शस्त्रास्त्र | होकर [बोल पड़ा] —अरे! यह आधा मनुष्यका और तुमपर व्यर्थ हो जायँगे। इस प्रकार उसको प्राप्त वरको जानकर | आधा हाथीके जैसे शरीरवाला कौन है? ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन' नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६९ ॥ सत्तरवाँ अध्याय देवान्तक-वध ब्रह्माजी बोले—भयसे भ्रमित बुद्धिवाला वह | लोगोंने इसे [दैवीय] उत्पात माना ॥ ६-७ ॥ देवान्तक जब ऐसा कह रहा था, तभी विनायकदेवने उसे | उस समय युद्ध देख रहे सभी देवताओंके देखते- छोटे बालकके समान उठाकर अपनी गोदमें ले लिया ॥ १ ॥ | देखते दैत्य [देवान्तक]-के शरीरसे निकलकर एक तदनन्तर गणोंके स्वामी विनायकने अपने प्रभावसे | ज्योति विनायकमें प्रवेश कर गयी ॥ ८ ॥ सुन्दर पद्मासनमें बैठकर दैत्यराजसे कहा—'अपने सुन्दर | उसका शरीर तीन योजनके वृक्षसमूहों, पर्वतों और वरदानका स्मरण करो' ॥ २॥ | पौधोंको चूर-चूर करता हुआ भूतलपर गिर पड़ा ॥ ९ ॥ तब वह दैत्य उनके दाँतको दोनों हाथोंसे पकड़कर | उसकी ऐसी गति देखकर उसके सैनिक दसों अपने शरीरको अन्तरिक्षमें बार-बार झुलाने लगा ॥ ३॥ | दिशाओंमें भाग गये। उसके शरीरके गिरनेसे कितने ही तब जैसे ही वह देवान्तक दाँतको तोड़कर भूतलपर | सैनिक मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ १० ॥ गिरा, वैसे ही उन सर्वव्यापक देव विनायकने शीघ्रतासे | अपने-अपने स्थानसे आये हुए देवता [विनायकपर] अपने उस दाँतको पकड़ लिया ॥ ४ ॥ | पुष्पवर्षा करने लगे। राजा (काशिराज)-के नगाड़ोंकी उन्होंने उसी दाँतसे देवान्तकके मस्तकपर प्रहार | ध्वनिके साथ देव-दुन्दुभियोंकी भी ध्वनि होने लगी ॥ ११॥ किया और अत्यन्त उच्च स्वरसे गर्जना की, जिससे | दिशाएँ निर्मल हो गयीं और सुखदायक हवा चलने दिशाएँ-विदिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठीं ॥ ५ ॥ | लगी, अग्नि तेजयुक्त हो गयी और लोग प्रसन्न हो गये। सम्पूर्ण पृथ्वी और सभी पाताल विचलित हो गये। | प्रतिकूल बह रही नदियाँ सन्मार्गगामिनी हो गयीं। तब इन्द्रादि उस दन्ताघातसे देवान्तकके शरीरके तत्क्षण सैकड़ों | देवताओं और मुनियोंने उनका पूजन किया ॥ १२-१३॥ टुकड़े हो गये। आकाशसे मेघवृष्टिकी भाँति शीघ्र ही | उन्होंने परम भक्तिभावसे देवाधिदेव विनायकका रक्तकी वर्षा होने लगी। पृथ्वीपर निवास करनेवाले सभी | स्तवन किया और कहा—'हे विभो! आपने हमें देवान्तकके

क्री०ख०-अ०७१ ] * काशिराजका अपने सभासदोंसे वार्तालाप * ४३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बन्धनसे मुक्त किया। हे देवेश ! आपने उपेन्द्र* (विष्णु)- के समान कार्य किया है, अतः लोकमें आपकी ख्याति 'उपेन्द्र' नामसे होगी' ॥ १४-१५॥ अब हम लोग अपने-अपने पदोंपर भयरहित होकर रहेंगे। स्वाहा, स्वधा और वषट्कार घर-घरमें होंगे ॥ १६॥ ऐसा कहकर उन सबने विनायकदेवको नमस्कारकर उनकी प्रदक्षिणा की और आज्ञा लेकर प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानोंको वापस लौट आये ॥ १७॥ देवताओं और मुनियोंने उनका 'हृषीकेश' ऐसा नामकरण किया और उन्हें प्रणामकर हर्षित मनसे अपने-अपने आश्रमोंको चले गये ॥ १८ ॥ तदनन्तर सभी राजाओंने विनायकका सम्यक् रूपसे पूजनकर और प्रणामकर उनसे कहा- 'हे देव ! आपने दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका उद्धार किया, इसलिये आप 'धरणीधर' कहे जायँगे।' ऐसा कहकर वे सब उनकी आज्ञा लेकर अपने-अपने नगरोंको चले गये। तत्पश्चात् काशिराजने विनायकको देखा, वे बालरूप धारण किये थे और सिंहपर आरूढ़ होकर बालकोंके साथ खेल रहे थे ॥ १९-२१ ॥ बालक [-रूपधारी] विनायकने भी उन राजा (काशिराज)-को देखकर परम आदरसे उनका आलिंगन किया। वे दोनों आनन्दसे परिपूर्ण थे और आँखोंसे आँसुओंकी वर्षा कर रहे थे॥ २२॥ तदनन्तर राजाने विनायकदेवसे कहा- 'मेरा महान् भाग्योदय हुआ है, जो कि ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी अगम्य सनातन परब्रह्म हैं, उनका मैं नित्य दर्शन कर रहा हूँ। यह मेरे पूर्वजन्मके पुण्योंके फलका उदय है कि जो विश्वके कारणोंके भी कारण हैं, और स्वयं कारणरहित हैं, जो वेदान्तवेद्य, नित्य, ग्रह-नक्षत्रोंके प्रकाशक और स्वयं प्रकाशरूप हैं, जो अनेक रूपवाले और निराकार हैं, पृथ्वीके भारका हरण करनेवाले और मनोहर स्वरूपवाले हैं, वे ही बालरूपसे मेरे घरमें स्वेच्छानुसार खेल रहे हैं'॥ २३-२५१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं- काशिराजद्वारा की गयी इस प्रकारकी स्तुति सुनकर विघ्नराजने आँसुओंको पोंछकर कहा- 'मैं आपसे क्षणभरके लिये भी कभी दूर नहीं जाऊँगा।' ॥ २६१/२ ॥ तब देवान्तकके वधसे हर्षित राजाने उनका अनेक प्रकारसे उपचारोंसे पूजन किया और अनेक प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि तथा वन्दिजनोंद्वारा गायी गयी स्तुतियोंके साथ सैनिकोंसहित बालरूप विनायककी स्तुति करते हुए अपने नगरको गये ॥ २७-२८१/२ ॥ वहाँ सभी लोगोंको अनेक प्रकारके वस्त्र देकर तथा कुछको पान देकर [राजाने] विदा किया। तत्पश्चात् विनायकको आगे करके हर्षित मनसे उन्होंने अपने रमणीय भवनमें प्रवेश किया ॥ २९-३० ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'पुरप्रवेश' नामक सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७० ॥

इकहत्तरवाँ अध्याय काशिराजका अपने सभासदोंसे वार्तालाप, मगधराजकी कन्याके साथ काशिराजके पुत्रका विवाह, विनायकको साथ लेकर काशिराजका महर्षि कश्यपके आश्रममें गमन, पुरवासियोंका वियोगमें व्यथित होना तथा विनायकद्वारा उन्हें पुनः आनेका आश्वासन देना

ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! दूसरे दिन जब राजा काशिराज भद्रासनमें बैठे थे, तब उन्होंने अमात्यों, प्रधान वीरों, वृद्धजनों, मित्रों तथा ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें नमस्कार करके अपने मनकी बात बतलायी ॥ १ १/२ ॥ राजा बोले- मैंने अपने पुत्रके विवाहको सम्पन्न करानेके लिये विनायकको बुलवाया था। उनके यहाँ आनेपर अनेक उत्पात भी उत्पन्न हो गये, जिनका निराकरण उन्होंने कर दिया। विनायककी माता अदितिसे

* भगवान् विष्णु वामनावतारमें इन्द्रके छोटे भाईके रूपमें अदितिसे प्रकट हुए थे, अतः उन्हें 'उपेन्द्र' कहा गया था; वैसे ही विनायक भी अदितिपुत्र और इन्द्रके अनुज हैं, अतः उन्हें भी उपेन्द्र कहते हैं।

४३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मैंने कहा था कि शीघ्र ही मैं आपके पुत्रको वापस ले | आरूढ़ होकर वाद्योंकी ध्वनिके साथ महर्षि कश्यपजीके आऊँगा, किंतु बहुत-से दिन जल्दी ही बीत गये। अब | श्रेष्ठ आश्रमके लिये प्रस्थान किया ॥ १३-१४ १/२ ॥ सारा लोक स्वस्थ हो गया है, अतः पुत्रके विवाहके | उस समय नगरके सभी लोग अपने-अपने कार्योंको विषयमें आपको विचार करना चाहिये ॥ २-४ ॥ | छोड़कर बाहर निकल आये। उन्होंने भोजन करना, अमात्य बोले— हे महाराज ! आपने ठीक ही कहा | पढ़ना, निद्रा, व्यासंग (नानाविध कर्मोंमें आसक्ति) आदिका है, विघ्नोंके द्वारा विवाह-कार्यमें विलम्ब हो गया है, अब | परित्याग कर दिया और अपनी वेष-भूषाको पहने बिना सब विघ्न दूर हो गये हैं, अतः विवाह-कार्य प्रारम्भ करना | ही वे शीघ्रतासे पुरीसे बाहर निकल आये ॥ १५-१६ ॥ चाहिये। विनायकके कृपा-प्रसादसे सम्पूर्ण जगत् स्वस्थ | उस समय हजारों बालकोंने उन विनायकको जाकर एवं निर्भय हो गया है, अतः अब दूर देशोंमें स्थित | रोक दिया और वे कहने लगे—'आप हमको छोड़कर मित्रजनोंको विवाहकी लग्नपत्रिका भेजनी चाहिये और | क्यों जा रहे हैं, क्यों आप इतने निष्ठुर हो गये हैं ? आपने विवाहकी सभी सामग्री एकत्रित करनेके लिये दूतोंको | किसी बातचीतके प्रसंगमें पहले हमें कभी नहीं बताया था गाँव-गाँवमें नियुक्त कर देना चाहिये ॥ ५-६ १/२ ॥ | कि 'मैं वापस जाऊँगा', हमारे घरमें भोजन किये बिना ब्रह्माजी बोले— मन्त्रियोंद्वारा कही गयी इस | आप अपने आश्रमको क्यों जा रहे हैं?' ॥ १७-१८ ॥ प्रकारकी बातोंको सुनकर सभी लोग तथा सभामें बैठे | किसी बालकने रोते-रोते उनके चरणकमलको हुए सभासद् कहने लगे—आप लोगोंने बहुत अच्छी बात | पकड़ लिया तो किसीने प्रेमपूर्वक उनका आलिंगन करके कही है। यह सुनकर राजाको अत्यन्त हर्ष हुआ। उसी | उनके करकमलोंको पकड़ लिया ॥ १९ ॥ दिन उन्होंने ज्योतिषियोंसे विवाहका लग्न दिन निश्चित | नगरीकी स्त्रियाँ, बालिकाएँ तथा युवावस्थाको करवा लिया ॥ ७-८ ॥ | प्राप्त सभी मुग्धा युवतियाँ अस्त-व्यस्त वेषमें ही उन्हें तदनन्तर राजाने मित्रजनोंको बुलवानेके लिये | देखनेके लिये वैसे ही आ पड़ीं, जैसे कि वर्षार्ऋतुमें मांगलिक दूतोंको भेजा और उचित रीतिसे विश्वस्त | समुद्रकी ओर जानेवाली सभी नदियाँ समुद्रकी ओर दूतोंके द्वारा विवाह-सामग्रीको एकत्रित करवाया। तदनन्तर | प्रवाहित होने लगती हैं, जैसे हंस मोतियोंकी राशिकी मगध देशके राजा भी अपनी पुत्रीको लेकर उस नगरीमें | ओर दौड़ पड़ते हैं, और जैसे मरुद्गण देवराज इन्द्रकी आये और सभी मित्र तथा सम्बन्धी भी नाना दिशाओंसे | ओर चल पड़ते हैं ॥ २०-२१ ॥ वहाँ उपस्थित हुए ॥ ९-१० ॥ | वे स्त्रियाँ अत्यन्त प्रीतिसे समन्वित होकर कहने उन्होंने परस्पर एक-दूसरेको अनेकों उपहार प्रदान | लगीं—'हे विनायक ! आप अकस्मात् स्नेहका परित्यागकर किये। काशिराज तथा मगधके राजाने देवताओंकी स्थापना | क्यों जा रहे हैं? आज आप इतने निष्ठुर कैसे हो गये की और बड़े-बड़े महोत्संवोंका आयोजन किया। उन्होंने | हैं?' ॥ २२ ॥ बड़े ही प्रयत्नपूर्वक विवाहकी समस्त विधियोंका सांगोपांग | ब्रह्माजी बोले—थके हुए, दौड़ते हुए, फिसलते सम्पादन किया और धन आदिके प्रदानके द्वारा ब्राह्मणों | हुए तथा गिरते हुए उन सभी जनोंको देखकर राजासहित तथा अन्य लोगोंको सन्तुष्ट किया ॥ ११-१२ ॥ | विनायक रथसे उतर पड़े ॥ २३ ॥ तदनन्तर काशिराजने सभी मित्रगणोंको विदा करके | राजाके साथ नगरसे शीघ्र ही बाहर आये वे उबटनका अनुलेपन एवं स्नान कराकर विविध प्रकारके | विनायक एक मुहूर्त वहीं ठहरकर उन सभीसे बोले— श्रेष्ठ आभूषणों तथा वस्त्रोंसे विनायकको सुसज्जित किया | 'इस समय मैं आप सबसे प्रार्थना करता हूँ कि मेरे ऊपर और अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ उन्हें भोजन कराया। | कृपा करना न छोड़ें, आप लोगोंके घर आकर वहाँ जो इसके पश्चात् नृपश्रेष्ठ काशिराजने विनायकके साथ रथमें | अपराध मुझसे हुए हैं, उन्हें आप क्षमा कर दें। यदि आप

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य रूप (Transcription) नीचे दिया गया है:

क्री०ख०-अ०७२ ] * विनायकका पिता कश्यपके आश्रममें आगमन * ४३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ - ऊपरी भाग] लोगोंका पुनः दर्शन होगा, तो आप मुझे पहचाननेमें भूल न करें।' उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर शोकमें निमग्न समस्त पुरवासियोंके शरीरमें रोमांच हो आया और वे गद्गद वाणीमें कहने लगे ॥ २४-२६१/२ ॥ लोग बोले—'आप समस्त जगत्के पिता हैं, सबपर दया दिखानेवाले हैं, किंतु हमपर आपकी कुछ भी ममता नहीं है। बालक कितने भी अपराध करनेवाले क्यों न हों, पिता कभी भी उनका परित्याग नहीं करते। चन्द्रमा कभी उष्ण नहीं होता और सुवर्ण कभी नीला नहीं हो जाता, फिर क्यों आप इतने निष्ठुर हो गये हैं और क्यों जानेके लिये इतनी उतावली कर रहे हैं? यदि पहले आप यहाँ आये ही नहीं होते तो आज हमें जो विरहजन्य शोक हो रहा है, वह नहीं होता ॥ २७-२९ ॥ हम सभीके मनको चुराकर आप चले क्यों जा रहे हैं, हमारे मनको [आपके द्वारा] ले लिये जानेपर हम सब मनके बिना कैसे कार्य करेंगे? जलके विनष्ट हो जानेपर जलचर जीव कैसे जीयेंगे, यह आप हमें बताइये, प्राण चले जानेपर हमारे शरीरका क्या प्रयोजन है? यदि ईखसे विष निकलने लगे तो फिर उसका क्या प्रतिकार है? इसलिये आप हम किंकरोंको भी अपने साथ वहीं ले चलें, जहाँ आप जा रहे हैं' ॥ ३०-३२ ॥ उनके वचनोंको सुनकर वे विनायक अपने नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए उन सभी स्त्रियों, वृद्धों एवं बालकोंसे गद्गद वाणीमें बोले— ॥ ३३ ॥

[दायाँ स्तम्भ - ऊपरी भाग] **विनायकदेव बोले—**आपको कभी भी दुखी नहीं होना चाहिये। आपलोगोंको मेरा वियोग कभी नहीं होगा; क्योंकि मैं सबकी अन्तर्आत्मामें निवास करनेवाला हूँ, विनाशरहित हूँ और आनन्दस्वरूप हूँ। मुझ निराकारका केवल चिन्तनमात्र करनेसे आपके मनका समाधान नहीं होगा, अतः आप लोग अपने-अपने घरमें मेरी मिट्टीकी मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करें। हे सज्जनो! आप लोग जब संकटमें पड़ें, तब आप मेरा स्मरण करें, मैं आप लोगोंको प्रत्यक्ष दर्शन दूँगा और आप लोगोंके संकटका विनाश करूँगा ॥ ३४-३६ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**उनका वचन सुनकर सभी नगरनिवासी अत्यन्त आनन्दित हो गये। उन्होंने देव विनायकको प्रणाम किया, उनकी प्रदक्षिणा करके जय- जयकार करते हुए उनकी स्तुति करने लगे ॥ ३७ ॥ तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्तकर सभी पुरवासी जन अपने-अपने घरोंको चले गये, देव विनायक भी माताके दर्शनकी लालसासे शीघ्र ही रथपर आरूढ़ होकर काशिराजके साथ आगे चल पड़े ॥ ३८१/२ ॥ विनायकने मुँह घुमाकर पीछे नगरनिवासी बालकोंकी ओर देखा, वे रो रहे थे। उनसे विनायकने कहा—'मैं पुनः आऊँगा, तुम लोग जाओ, तुम्हें कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मैं सत्य बोल रहा हूँ, कभी भी मैं झूठ नहीं बोलता।' इस प्रकार समझा-बुझाकर उन्हें लौटाकर वे क्षणभरमें ही अपने आश्रममें जा पहुँचे ॥ ३९-४० ॥

[अध्याय समाप्ति पुष्पिका] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विनायकका आश्रमकी ओर प्रस्थान' नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७१ ॥


बहत्तरवाँ अध्याय विनायकका पिता कश्यपके आश्रममें आगमन, काशिराजद्वारा विनायककी महिमाका कथन, काशिराजका काशीमें प्रत्यागमन तथा ढुण्ढिविनायककी स्थापना, माता अदिति तथा पिता कश्यपको आश्वासन देकर विनायकका निजलोकगमन

[बायाँ स्तम्भ - निचला भाग] **ब्रह्माजी बोले—**काशिराजके दूतने विनायककी माता देवी अदितिसे यह पहले ही बता दिया था कि वे विनायक काशिराजके साथ रथमें बैठकर यहाँ आ रहे हैं। तदनन्तर वियोगसे व्यथित हुई वे अदिति शीघ्र ही

[दायाँ स्तम्भ - निचला भाग] दौड़ती हुई आगेको गयीं। उत्सुकतावश शीघ्रतामें दौड़ते हुए वे यह भी नहीं जान पायीं कि उनका उत्तरीय वस्त्र गिर पड़ा है ॥ १-२ ॥ माताको देखकर मुनि कश्यपके पुत्र वे विनायक

४४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

शीघ्र ही रथसे उतर पड़े और माताके समीप चले आये, माताने अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उनका आलिंगन किया॥ ३॥ देवी अदितिके आनन्दाश्रु निकल पड़े। बहुत समय बाद आनेके कारण विनायक भी आँसू बहाने लगे। मुहूर्तभरके लिये वे दोनों उसी प्रकार एकीभावको प्राप्त हो गये, जैसे जलमें जल मिलकर एक हो जाता है॥ ४॥ तदनन्तर स्नेहसे स्वच्छचित्त हुई माता अदितिने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्तनपान कराया। उनके आँसू पोंछकर वे बोलीं—'तुम बहुत दिनोंसे थके हुए हो।' तदनन्तर काशिराजने अदितिको प्रणाम किया और वे गद्गद वाणीमें कहने लगे॥ ५॥ राजा बोले—देव विनायकको [मेरे साथ] यहाँसे गये हुए बहुत दिन व्यतीत हो चुके हैं, इसके निमित्त हे मातः! आप मुझपर क्रोध न करें। हे कश्यपप्रिया! मैं इन विनायकका वियोग सहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ॥ ६-७॥ अमृतसे कभी तृप्ति नहीं होती और खजानेके प्रति कोई उदासीन नहीं होता। ये विनायक हमारे घरमें दिन- प्रतिदिन नित्य नया-नया प्रेम बढ़ाते रहे हैं॥ ८॥ हमारे नगरमें होनेवाले बहुत-से उत्पातोंका इन्होंने निवारण कर दिया है। असंख्य दैत्योंका वध कर डाला है। इससे देवताओंको भी अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त हुई। इन्होंने महान् यश अर्जित किया है और धर्मसेतुकी स्थापना की है। इन्होंने इस प्रकारका पौरुष दिखलाया है, जैसा कि इन्द्र आदि देवता भी नहीं दिखला पाये॥ ९-१०॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार काशिराजने सारा वृत्तान्त उन्हें बतलाया। तदनन्तर माता अदितिने दुष्ट जनोंकी दृष्टि (नजर) लगनेसे होनेवाले उत्पातकी शान्तिके लिये बालक विनायकके सिरके ऊपर दही और अन्न (सरसों आदि)-को घुमाकर घरके बाहर फेंका। तदनन्तर वे बालक विनायकको काशिराजसहित अपने आश्रममण्डलमें ले गयीं॥ ११-१२॥ अपने पुत्र विनायकको काशिराजके साथ आया देखकर मुनि कश्यप बाहर चले आये, उन दोनोंने हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक मुनिको प्रणाम किया॥ १३॥ तदनन्तर मुनि कश्यपने उन दोनोंका आलिंगन किया

और पुत्र विनायकके सिरको सूँघकर तथा उसे गोदमें बैठाकर रुँधे हुए कण्ठसे वे कहने लगे—हे काशिराज! आपने बालकको ले जाकर वापस लानेमें विलम्ब किया, यह ठीक नहीं किया। आप 'शीघ्र ही वापस ले आऊँगा' कहकर, इसे क्यों ले गये थे? हे राजन्! इसके वियोगमें संतप्त मेरे अंगोंको बड़े ही पुण्यसे अभी इसका दर्शनकर शीतलता प्राप्त हो रही है॥ १४-१६॥ ब्रह्माजी बोले—तब काशिराजने मुनि कश्यपके वचनामृतका पान करके तथा उनकी आज्ञा प्राप्तकर सुन्दर आसनपर बैठकर कहना प्रारम्भ किया॥ १७॥ राजा बोले—हे मुनीश्वर! इन विनायककी ही माया अर्थात् सामर्थ्यके कारण मुझे [स्व-स्वरूपकी] सत्यताका बोध हुआ। इन देवदेवने मेरे घरको निश्चित रूपसे अपना घर बना लिया। हे मुने! ये विनायकदेव सम्पूर्ण कामनाओंसे परिपूर्ण हैं और ये अपनी इच्छाओंके वशीभूत हैं अर्थात् नित्य स्वतन्त्र हैं। मेरे पुत्रका विवाह सम्पादित कराकर ये यहाँ आये हैं॥ १८-१९॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर काशिराजने उन विनायकद्वारा किये गये दैत्योंके वध आदि समस्त कर्मोंको उन्हें बतलाया। यह सुनकर वे मुनि कश्यप तथा उनकी पत्नी देवी अदिति अपने पुत्र विनायकका पराक्रम तथा उनके बहुतसे गुणोंके विषयमें जानकर बहुत प्रसन्न हुए। इसके पश्चात् उन सभीने बड़े ही आदरपूर्वक छः रसोंसे सम्पन्न व्यंजनोंका भोजन किया॥ २०-२१॥ इसके बाद मुनि कश्यपने उन काशिराजको आशीर्वाद प्रदानकर उन्हें विदा किया। राजाने भी उन सभीको प्रणाम किया और उनकी प्रदक्षिणा करते हुए उनकी अनुमति प्राप्तकर दोनों नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए बड़े दुखी मनसे उन्होंने वहाँसे प्रस्थान किया॥ २२१/२॥ उन विनायकके गुणगणोंका स्मरण करते हुए स्नेहसे परिपूर्ण काशिराजने वाद्योंकी ध्वनिके साथ शीघ्र ही नगरमें प्रवेश किया। विनायकदेवको देखनेकी इच्छावाले नगरके सभी लोग तथा बालक वहाँ आये, किंतु उन्होंने वहाँ उन्हें नहीं देखा, तो वे अत्यन्त दुखी मनवाले हो गये। वे उन काशिराजको अकेला देखकर अपने-अपने

क्री०ख०-अ०७२ ]
* विनायकका पिता कश्यपके आश्रममें आगमन *
४४१


[बायाँ स्तम्भ]

घरोंको चले गये ॥ २३-२५ ॥ दूसरे दिन सभी नागरिकोंने राजासे अत्यन्त प्रीतिपूर्वक पूछा—'हे राजन्! उन विनायकदेवने 'पुनः आऊँगा'— ऐसा कहा था, तो फिर वे क्यों नहीं आये? आप भी बड़े ही निष्ठुर बनकर उन्हें छोड़कर यहाँ कैसे चले आये' ॥ २६१/२ ॥ राजा बोले—मेरे द्वारा बार-बार प्रार्थना किये जानेपर मुनि कश्यपके पुत्र वे विनायक मुझसे कहने लगे—'आप सभी लोग मेरी मूर्तिकी प्रतिष्ठापूर्वक स्थापना करके उसकी सेवा-पूजा करें। सबके हृदयमें स्थित रहनेवाले मुझे अन्तर्यामीका आप लोगोंसे वियोग किसी प्रकार भी नहीं हो सकता' ॥ २७-२८ ॥ तदनन्तर नगरवासियोंने विनायककी धातुनिर्मित अत्यन्त शुभ मूर्तिका निर्माण करवाया। वह प्रतिमा चार भुजावाली थी। उसके तीन नेत्र थे। वह सभी प्रकारके आभूषणोंसे सुसज्जित थी। उसके कान शूर्पके समान थे। मुख हाथीके समान था। उसके शरीरके सभी अंग अत्यन्त मनोहर थे। पुरवासियोंने उसका 'ढुण्डिराज' यह नाम रखा और बड़े ही आदरभावसे ऋत्विजों, ब्राह्मणों तथा अन्य वेदशास्त्रमें पारंगत विद्वानोंद्वारा उसकी स्थापना करवायी ॥ २९-३०१/२ ॥ उन्होंने एक उत्तम मन्दिर बनवाया और उसमें उन विनायककी प्रतिदिन वे पूजा करने लगे ॥ ३१ ॥ जिस-जिसके द्वारा भी जिस-जिस कामनासे विनायककी पूजा की जाती, भक्तिपूर्वक पूजित हुए वे प्रभु विनायक उस-उस व्यक्तिकी उन-उन कामनाओंको उन्हें प्रदान करते ॥ ३२ ॥ इस प्रकार विविध स्वरूपोंको धारण करनेवाले वे विनायक वहाँ सुशोभित हुए। जब सभी देवताओंके साथ भगवान् विश्वनाथ अपनी नगरी काशीपुरीमें चले आये और काशिराज दिवोदास अविमुक्तक्षेत्रमें सुखपूर्वक निवास करने लगे, तब वे विनायक अपने पिता मुनि कश्यप तथा माता अदितिसे कहने लगे ॥ ३३-३४ ॥


[दायाँ स्तम्भ]

प्राचीन कालमें तपस्याके द्वारा आराधित होनेपर मैं आपके पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुआ था। मैंने पृथ्वीके भारको भलीभाँति दूर कर दिया है तथा तीनों लोकोंको पीड़ित करनेवाले महाबली दुष्ट दैत्यों देवान्तक तथा नरान्तकका वध कर डाला है। मैंने देवताओं तथा साधु- सन्तोंकी रक्षा की है और देवताओंको उनके पदोंपर स्थापित कर दिया है, अब इस समय मैं अपने शाश्वत लोकको जाऊँगा ॥ ३५-३६१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—विनायकके ऐसे वचनोंको सुनकर अदिति तथा कश्यपको बड़ा दुःख हुआ। वे गद्गद कण्ठसे उनसे कहने लगे—'हे देव! हम दोनोंको पुनः आपका दर्शन कब प्राप्त होगा?' तब वे माता अदितिसे बोले—'हे मातः! भवानीके मन्दिरमें शीघ्र ही मेरा दर्शन आपको होगा। यह मेरा सत्य एवं प्रिय वचन है' ॥ ३७-३८१/२ ॥ विनायककी यह बात सुनकर जबतक वे कुछ बोलतीं, उससे पहले ही वे अन्तर्धान हो गये। तब वे दोनों खिन्न मनवाले हो गये। भक्तिपरायण उन्होंने एक अत्यन्त सुन्दर मन्दिर बनवाया और एक मूर्ति बनवायी। उस मूर्तिका 'विनायक' यह नाम रखा। उस मूर्तिका ध्यान करनेमात्रसे वे सर्वव्यापक एवं विविध रूपधारी विनायक प्रभु नित्य ही साक्षात् दर्शन देते हैं ॥ ३९-४११/२ ॥ इस प्रकारसे मैंने भगवान् विनायकका अत्यन्त मंगलकारी चरित्र आपको बतलाया। यह आख्यान सुननेमात्रसे सब प्रकारकी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला है। कृतार्थ करनेवाला है। यश प्रदान करनेवाला है। आयुष्य प्रदान करनेवाला और सभी प्रकारके उपद्रवोंको विनष्ट करनेवाला है। यह सभी प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और सभी प्रकारके संचित पापोंका नाश करनेवाला है ॥ ४२-४३१/२ ॥ अब मैं आपको सिन्धु दैत्यके वधके लिये शिवके घरमें मयूरेश्वर नामसे अवतरित हुए देव विनायकके विषयमें बतलाऊँगा। जिन्होंने कि बाल्यकालसे ही अत्यन्त अद्भुत नाना कर्मोंको किया था ॥ ४४-४५ ॥


॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विनायकके चरित्रोंका वर्णन' नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥

तिहत्तरवाँ अध्याय

Here is the text transcription in Devanagari from the provided image:

४४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तिहत्तरवाँ अध्याय गण्डकीनगराधिपति राजा चक्रपाणिका आख्यान, निःसंतान राजाको महर्षि शौनकद्वारा पुत्रप्राप्तिके लिये सौरव्रतके अनुष्ठानका उपदेश करना, राजा-रानीद्वारा सम्यग् रूपसे सौरव्रतके नियमोंका पालन, भगवान् सूर्यद्वारा स्वप्नमें रानीको पुत्रकी प्राप्ति, रानीद्वारा गर्भके तापको सहन न कर सकनेके कारण समुद्रमें उसका त्याग व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन् ! हे पितः ! भगवान् शिवके घरमें विनायकदेव मयूरेश्वर नामसे कैसे अवतीर्ण हुए? उनके अवतीर्ण होनेका प्रयोजन क्या था और उन्होंने कौन-कौन-सी लीलाएँ कीं? उन विनायकका 'मयूरेश्वर' यह नाम क्यों पड़ा? यह सब आप मुझे बतलाइये। सुननेपर भी मुझे कभी तृप्ति प्राप्त नहीं हो रही है॥ १-२॥ ब्रह्माजी बोले- प्राचीन कालमें त्रेतायुगकी बात है, सिन्धु नामक एक महान् दैत्य उत्पन्न हुआ था। उसे भगवान् शिवके घरमें अवतरित हुए उन बलिष्ठ विनायकने मारा था। इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जो शौनक मुनि तथा राजा चक्रपाणिके मध्य हुए संवादके रूपमें है॥ ३-४॥ मैथिलदेशके गण्डकी नामक शुभ नगरमें एक राजा हुए थे, जो चक्रपाणि इस नामसे विख्यात थे और साक्षात् दूसरे विष्णुभगवान्‌के समान ही थे॥ ५॥ इनके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन करनेमें शेषनाग भी समर्थ नहीं हैं। उन्होंने अपने तेजके द्वारा भगवान् सूर्यको भी निस्तेज बना दिया था तथा अपने लावण्यके द्वारा कामदेवको भी तुच्छ बना दिया था। अपनी बुद्धिके द्वारा बृहस्पतिको भी जीत लिया था और अपने बल एवं पराक्रमके द्वारा कार्तिकेयको भी पराजित कर दिया था। इन्होंने इस सम्पूर्ण पृथ्वीको क्षणभरमें अपने अधीन कर लिया था। सभी राजा इनकी सेवामें उपस्थित रहते थे॥ ६-७१/२॥ इस पृथ्वीमें विद्यमान, विजयकी इच्छा रखनेवाले उनके अश्वारोहियों, गजारोहियों, पैदल सैनिकों तथा रथारोही सैनिकोंकी गणना नहीं की जा सकती थी। उनके भवनमें साक्षात् लक्ष्मी स्थित होकर दर्शन देती थीं ॥ ८-९ ॥ उन नरेशका भद्र (राजसिंहासन) रत्न, सुवर्ण तथा मोतियोंके द्वारा दिशाओंको उद्भासित करनेवाला और लोकका कल्याण करनेवाला था एवं [उस राजसिंहासनसे समन्वित वहाँका सभाभवन] अलकापुरीके समान [शोभामय] था॥ १०॥ उन राजाके दो महाबुद्धिमान् अमात्य थे, एकका नाम था साम्ब तथा दूसरेका नाम था सुबोधन। वे अपने स्वामीकी सेवा किया करते थे और उनके कार्यकी सिद्धिके लिये अपने प्राणोंको तृणके समान समझते थे। उस राजाकी उग्रा नामवाली एक रानी थी, जो अत्यन्त रमणीय तथा सुन्दर मुसकानवाली थी। उसके मुखचन्द्रकी कान्तिसे दिनमें ही कुमुद खिल उठते थे ॥ ११-१२॥ वह धारण किये हुए अपने अनेक आभूषणोंकी दीप्तिसे समस्त तमोराशिको विनष्ट कर देती थी। उसके पातिव्रत्यके अनुकरणीय गुणोंको देखनेके लिये सभी पतिव्रता स्त्रियाँ उसके समीप आती थीं ॥ १३ ॥ इस प्रकारके अत्यन्त बुद्धिमान् वे राजा चक्रपाणि सबके लिये मान्य तथा सर्वदा भगवान् विष्णुकी भक्तिमें परायण रहते थे। पुराणोंके कथाश्रवणमें उनका अत्यन्त अनुराग था और वे धर्मशास्त्रपरायण थे ॥ १४ ॥ सन्तानसे रहित होनेके कारण वे रात-दिन अत्यन्त दुखी रहते थे। यद्यपि उन्होंने सन्तानकी प्राप्ति तथा उसके जीवित रहनेके लिये अनेक व्रतोंका पालन किया, विविध दान दिये और बहुतसे यज्ञोंका अनुष्ठान किया, किंतु उनके जो-जो सन्तति होती, वह तत्क्षण ही मृत्युको प्राप्त हो जाती थी ॥ १५१/२॥ तदुपरान्त एक दिनकी बात है, राजा अपनी राज्यसम्पदासे जब अत्यन्त विरक्त हो गये तो उन्होंने अपनी भार्यासहित दोनों साम्ब तथा सुबोधन नामक

क्री०ख०-अ०७३ ] * गण्डकीनगराधिपति राजा चक्रपाणिका आख्यान * ४४३

अमात्यों और पुरवासियोंको बुलाया तथा उन सबसे कहा—'इस समय मैं अब अपने दण्ड (सैन्यदल), राजकोश तथा राज्यका परित्याग कर रहा हूँ। पुत्रसे हीन होनेसे स्वर्गसे हीन हुए मेरा अब राज्यसे क्या प्रयोजन ? पुत्रप्राप्तिके लिये मैंने जो-जो भी कर्म किये थे, यदि वे कर्म ईश्वरार्पणबुद्धिसे किये होते, तो हम दोनोंको मोक्ष भी प्राप्त होता और पूर्वजन्मोंमें किये कर्मोंके बन्धन भी विनष्ट हो जाते ॥ १६—१९॥

हे जनो ! मेरा जीवन व्यर्थ ही चला गया। अब मैं इसी समय [राज्यसम्बन्धी] सभी दायित्व मन्त्रियोंको सौंपकर प्रसन्नतापूर्वक वन जाऊँगा। आप लोग भी उन मन्त्रियोंकी आज्ञाका पालन करें ॥ २० ॥

हे सज्जनो ! मैं अपने आत्मकल्याणकी दृष्टिसे तपस्या करनेके लिये वनमें जाऊँगा। यदि मुझे अपने अभीष्टकी प्राप्ति हो जाती है, तो पुनः मैं अपनी नगरीमें चला आऊँगा। हे लोगो ! इस समय अब आप लोग मुझे निश्चित ही आज्ञा प्रदान करें' ॥ २११/२ ॥

राजाके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर सभी दुखी मनवाले हो गये। आँसुओंकी धारा बहाते हुए वे लोग उन नृपश्रेष्ठसे बोले— ॥ २२१/२ ॥

पुरवासीजन बोले— हे प्रभो ! आप ही हमारी माता हैं और आप ही पिता भी हैं। फिर आज ऐसी निष्ठुरता क्यों दिखा रहे हैं ? बिना अपराधके आप हमारा परित्याग क्यों कर रहे हैं ? आपके बिना हमारा जीवन वैसे ही व्यर्थ है, जैसे कि माताके बिना शिशुका जन्म व्यर्थ होता है। हे प्रभो ! आप जहाँ जा रहे हैं, हम सब भी वहीं चलेंगे ॥ २३-२४॥

ब्रह्माजी बोले— इस प्रकारसे जब नगरनिवासी लोग राजासे वार्तालाप कर ही रहे थे कि उसी समय मुनिश्रेष्ठ शौनकजी वहाँ आ पहुँचे। वे साक्षात् दूसरी अग्निके समान थे ॥ २५ ॥

वे सभी वेदों, शिक्षा-कल्प आदि वेदांगों एवं सभी शास्त्रोंके प्रवक्ता, तीनों लोकोंमें विख्यात, देवराज इन्द्र आदि सभी देवताओंद्वारा वन्दनीय तथा भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंके ज्ञाता थे ॥ २६॥

उनको अपने समक्ष देखकर राजा अपने आसनसे उठ खड़े हुए और उन्होंने उन्हें प्रणाम किया। राजाने अपने राजसिंहासनपर उन्हें बैठाया और परम प्रसन्नताके साथ उनकी पूजा की ॥ २७ ॥

भोजन ग्रहण कर चुके हुए तथा संवाहन (दबाने) आदिके द्वारा पैरोंकी सेवा हो जानेपर विश्रामको प्राप्त हुए उन मुनिश्रेष्ठ शौनकजीसे राजा चक्रपाणिने कहा— 'मेरा कौन-सा पुण्य फलीभूत हुआ है, जो आज मुझे आपका वह दर्शन प्राप्त हुआ है, जो सभी पापोंका हरण करनेवाला, अत्यन्त मंगलदायक, मनुष्योंकी सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला तथा पापीजनोंके लिये सर्वथा दुर्लभ है ?' ॥ २८-२९ ॥

तदनन्तर मुनि शौनक नृपश्रेष्ठ चक्रपाणिसे बोले— मैं आपकी परम भक्ति, सेवा-शुश्रूषा तथा आत्मसंयमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ ॥ ३० ॥

शौनक बोले— हे राजेन्द्र ! आप कोई चिन्ता न करें और न राज्यका ही परित्याग करें। आपको मेरे वचनके अनुसार निश्चित ही पुत्रकी प्राप्ति होगी, इसमें कोई संशय नहीं है। मैंने आजतक कभी भी परिहासतकमें मिथ्या वाणी नहीं बोली ॥ ३११/२ ॥

ब्रह्माजी बोले— मुनिका यह वचन सुनकर राजश्रेष्ठ चक्रपाणि अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। उन्होंने उन्हें रत्नों तथा सुवर्णसे बने हुए अनेकों आभूषण और अत्यन्त मूल्यवान् वस्त्रोंको समर्पित किया, किंतु मुनि शौनकने कुछ भी ग्रहण नहीं किया ॥ ३२-३३॥

तदनन्तर वे मुनि शौनक राजासे बोले— हम लोग वल्कल वस्त्रोंको धारण करनेवाले हैं। सभी प्रकारके सुख-भोगोंमें किसी भी प्रकारकी आसक्ति नहीं रखते। सभी प्राणियोंके कल्याणमें निरत रहते हैं। सृष्टि तथा संहार करनेमें समर्थ हैं। दयाके सागर हैं। साधुपुरुषोंके दर्शनकी अभिलाषा करते रहते हैं। मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा सुवर्णमें समान दृष्टि रखनेवाले हैं। विद्वानोंके पास लक्ष्मी कभी भी नहीं रहती। इसी कारण मैं आपके द्वारा प्रदत्त इस सुवर्ण तथा सुन्दर वस्त्रको ग्रहण नहीं करूँगा ॥ ३४-३६॥

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४४४ [थ्रीगणेशपुराण- [५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५ तीर्थयात्राके प्रसंगमें मैं आपके पास आया था। आपके दर्शन किये हुए मेरे बहुत दिन व्यतीत हो गये थे ॥ ३७ ॥ ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर पुनः उन दम्पती-राजा तथा रानीने भलीभाँति उन मुनि शौनकको प्रणाम किया और सन्तानकी प्राप्तिके विषयमें समर्थ उपाय पूछा ॥ ३८॥ तब शौनकमुनिने सभी प्रकारके व्रत, तप, यज्ञ तथा दानोंको वृथा जानकर उनसे उस सौर व्रतको करनेके लिये कहा, जो मनुष्योंको सब प्रकारके पदार्थोंको प्रदान करनेवाला, अनेकों जन्मोंके संचित पापोंका शमन करनेवाला तथा पुत्र एवं पौत्रको देनेवाला है ॥ ३९१/२॥ शौनकमुनि बोले-सूर्यसप्तमीसे आरम्भ करके एक मासतक यह व्रत करना चाहिये। [उसमें सर्वप्रथम] मातृकापूजन करके आभ्युदयिक श्राद्ध करना चाहिये। गणेशजीका पूजन करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराना चाहिये ॥ ४०-४१ ॥ सुवर्णकलशके ऊपर सुवर्णका सूर्यमण्डल बनाकर स्थापित करे और भक्तिभावसे समन्वित होकर षोडश उपचारोंद्वारा उसका पूजन करे ॥ ४२ ॥ लाल चन्दनमिश्रित तण्डुलों, लाल रंगके फूलों, विविध प्रकारके रक्त वर्णके रत्नों तथा अनेक प्रकारके फलों, बारह अर्घों, नमस्कारों तथा प्रदक्षिणाओं, स्तुतियों एवं प्रार्थनाओंके द्वारा परमेश्वर सूर्यनारायणकी प्रार्थना करे॥ ४३-४४॥ तदनन्तर भगवान् सूर्यको स्वयं एक लाख बार प्रणाम करे अथवा [ब्राह्मणोंद्वारा] करवाये। परम प्रसन्नताके साथ प्रतिदिन एक लाखकी संख्यामें ब्राह्मणोंको भोजन कराये। वेदज्ञ कुटुम्बी ब्राह्मणको प्रतिदिन एक गौका दान करे। हे नृपश्रेष्ठ ! व्रतके समापनपर्यन्त सपत्नीक ब्रह्मचर्यका पालन करे ॥ ४५-४६॥ दयाभावसे युक्त होकर दीनों, अन्धों तथा निर्धनोंको अन्न प्रदान करे। मासके अन्तमें सभी सामग्रियोंको ब्राह्मणको निवेदित कर दे॥ ४७ ॥ हे राजन् ! इस प्रकार सौरव्रतका अनुष्ठान करनेसे मेरी कृपासे आपको पुत्रकी प्राप्ति होगी, वह महान् यशस्वी, सूर्यकी भक्तिसे समन्वित तथा पुण्यात्मा होगा ॥ ४८ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार सौर व्रतके विधि- विधानका उपदेश देकर मुनि शौनक अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर राजाने उस व्रतको उसी प्रकार किया, जिस प्रकारका कि उन्हें उपदेश प्राप्त हुआ था ॥ ४९ ॥ अपनी पत्नीके साथ विनीतात्मा राजाने सूर्यभक्तिपरायण होकर वह व्रत किया और प्रतिदिन एक लाख ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार भोजन कराया ॥ ५० ॥ इस प्रकार पत्नीके साथ उपवास करते हुए राजाको एक मासका समय व्यतीत हो गया। राजाने प्रतिदिन गोदान किया और भगवान् सूर्यको एक लाख नमस्कार किया तथा ब्राह्मणोंसे भी करवाया ॥ ५१ ॥ वे प्रतिदिन भगवान् सूर्यके मन्त्रका जप करते थे और सदा ही उनके नामका जप किया करते थे। तदनन्तर एक दिनकी बात है, उनकी रानीने रात्रिमें स्वप्नमें भगवान् सूर्यको अपने पतिके सुन्दर रूपमें देखा। कामदेवके समान उनका मनोरम रूप देखकर रानीने उनके साथ रमणकी अभिलाषा की ॥ ५२-५३॥ संतप्त अंगोंवाली वे उनसे बोलीं- 'इस समय काम मुझे अत्यन्त पीड़ित कर रहा है, मैं शरीरमें विद्यमान ऋतुकालीन अग्निसे दग्ध हो रही हूँ ॥ ५४ ॥ हे स्वामिन् ! अतः मुझे सहवास प्रदान करें, अन्यथा मेरी मृत्यु निश्चित है।' तब उसके पति राजा चक्रपाणिको सन्तानोत्पादनकी शक्तिसे विहीन और रानीको सकाम जानकर उसके पतिके स्वरूपको धारण किये हुए भगवान् सवितादेवने उसे ऋतुदान किया। इसके अनन्तर जब रानी निद्रासे जागी तो उसने अपने पतिको जगाया और उनसे बोली - ॥ ५५-५६ ॥ 'हे स्वामिन् ! आपने ब्रह्मचर्य नियम-पालनमें स्थित रहते हुए भी मेरे साथ सहवास क्यों किया ?' तब राजा उनसे बोले- 'हे शुभे ! मेरा मन तो व्रतके नियमोंमें लगा हुआ है, मैं निरन्तर उपवासमें रहनेके कारण क्षीण शक्तिवाला हो गया हूँ और मैं भगवान् सूर्यकी भक्तिमें परायण हूँ। मैंने तुम्हारे साथ रमण नहीं किया' ॥ ५७१/२ ॥ तदनन्तर पतिव्रता रानी पुनः उनसे बोली- मैं तो आपके अतिरिक्त और किसी पुरुषको किसी प्रकार भी नहीं जानती हूँ। मैं आपके ही स्वरूपमें भगवान्

क्री०ख०-अ०७४] * राजा चक्रपाणिके पुत्र सिन्धुद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना * ४४५ सूर्यका ध्यानकर व्रतमें स्थित हुई हूँ। अतएव निश्चय ही आपके रूपमें आये सूर्यदेवने ही मुझे ऋतुदान दिया है। तब राजा चक्रपाणिने प्रियभाषिणी अपनी रानीसे पुनः कहा॥ ५८-५९॥ राजा बोले-हे प्रिये ! वे भगवान् सूर्य हमारे द्वारा किये गये नमस्कारों, ब्राह्मण-भोजन, गोदान, उपवास तथा जपसे अत्यन्त सन्तुष्ट प्रतीत होते हैं। लगता है उन्होंने हमें सिद्धि प्रदान की है, अब निश्चित ही तुमको पुत्रकी प्राप्ति होगी॥ ६०१/२॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर दिन-प्रतिदिन रानीका गर्भ वृद्धिको प्राप्त होने लगा और उसका शारीरिक ताप भी बढ़ने लगा। वह बार-बार मूर्च्छित-सी होने लगी। तब वह अपने शरीरमें शीतल चन्दन तथा खस लगाने लगी और समस्त अंगोंमें कपूरका लेपन करने लगी। किंतु इन उपायोंसे उसका वह ताप नष्ट नहीं हुआ ॥ ६१-६२॥ गीले वस्त्रोंद्वारा ठण्डी हवा करनेपर भी उसकी उष्णता कम नहीं हुई। तब उसने अपनी सखियोंके साथ जाकर सिन्धुके तटपर उस महान् गर्भका परित्याग कर दिया। तदुपरान्त वह स्वस्थ होकर अपनी सखियोंके साथ अपने भवनमें चली आयी। उसने अपने पतिको उस गर्भको परित्यक्त करनेकी बात बता दी और वह अपने गृहकार्यमें संलग्न हो गयी ॥ ६३-६४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुकी उत्पत्तिका वर्णन' नामक तिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७३ ॥ चौहत्तरवाँ अध्याय राजा चक्रपाणिके पुत्र सिन्धुद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना और उनसे विभिन्न वरोंकी प्राप्ति ब्रह्माजी बोले- राजा चक्रपाणिकी रानीके द्वारा समुद्रमें उस गर्भके छोड़ दिये जानेपर उस गर्भसे एक बालक उत्पन्न हुआ, जो महान् बलशाली, तेजसम्पन्न, विकराल मुखवाला, विस्तृत मस्तकवाला एवं तीन नेत्रोंवाला था। वह लाल रंगके बालोंकी जटाओंसे सम्पन्न था। उसने हाथमें चक्र तथा त्रिशूल लिया हुआ था। उस बालकके रुदनसे तीनों लोक काँप उठे ॥ १-२ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ व्यासजी ! उस बालकके हाथ घुटनोंतक लम्बे थे। उसने तीनों लोकोंपर आक्रमणकर उनपर विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषा की। उस बालकके भयसे समुद्री जीव-जन्तुओंसहित समुद्र क्षुब्ध हो उठा, समुद्रमें स्थित उस बालकने समुद्रको सुखा- सा डाला ॥ ३१/२ ॥ समुद्र बोला- यह राजपुत्र सूर्यदेवसे समुत्पन्न है, इसे मैं राजदरबारमें ले जाऊँगा ॥ ४ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वह द्विजरूपधारी समुद्र उस बालकको लेकर राजभवनमें गया और राजा तथा रानीके आगे उसे रखकर वह कहने लगा ॥ ५ ॥ [हे राजन्!] आपकी पत्नीने अपने गर्भके दुस्सह होनेके कारण मेरे अन्दर वह गर्भ छोड़ दिया था। उसी गर्भसे यह अत्यन्त उग्र बालक उत्पन्न हुआ है, जो सम्पूर्ण लोकके लिये महान् भय उत्पन्न करनेवाला है। इसने उत्पन्न होते ही मुखसे जो पहली ध्वनि की, उससे तीनों लोक काँप उठे। इसे मैं अपनी आँखोंसे देखतक नहीं सकता, अतः मैं इसे यहाँ आपके पास ले आया हूँ ॥ ६-७ ॥ ऐसा कहकर बालकको वहाँ छोड़कर वह समुद्र अन्तर्हित हो गया। तब राजभार्याने उसे दोनों हाथोंसे पकड़कर अपनी गोदमें बैठा लिया और अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उस बालकको प्रेमपूर्वक स्तनपान कराया। पुत्रके दर्शनसे वे दोनों राजा एवं रानी उसी प्रकार अत्यन्त आनन्दित हुए, जैसे कि चिरकालतक योग-साधनामें निरत रहनेवाला साधक ब्रह्मरूपी अमृतको पाकर आनन्दित होता है ॥ ८-९१/२ ॥ तदनन्तर राजाने ब्राह्मणों तथा अपने मित्रगणोंको आमन्त्रण करके बुलवाया। राजा तथा रानीने उसका यथाविधि जातकर्म-संस्कार करवाया और ज्योतिर्विदोंके साथ परामर्श करके उस बालकका 'सिन्धु' यह मंगलदायक नाम रखा। तदनन्तर हर्षसमन्वित हुए राजाने अनेकों ब्राह्मणोंको अनेकविध दान तथा विविध वस्त्र प्रदान किये ॥ १०-१२॥

४४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उस समय नगर अनेक प्रकारकी पताकाओंसे अलंकृत था और सभी प्रकारके वाद्य बज रहे थे। राजाने घर-घरमें शर्करा भिजवायी। सभी लोगोंके चले जानेपर राजा और रानीने स्नेहवश पुकारनेके लिये उसका 'रक्तांग' यह नाम रखा। तदनन्तर दोनों अमात्योंने कहा—'चूँकि यह उग्राका पुत्र है और उग्र मुद्रा धारण करनेवाला है, अतः यह 'उग्रेक्षण' इस नामसे भी प्रसिद्ध होगा' ॥ १३-१५॥ नगरनिवासियोंने उसका 'विप्रप्रसादन' यह नाम रखा और उन सभी पुरवासियोंने राजाको अनेक-अनेक प्रकारकी भेंट प्रदान की। राजाने भी उस समय उन सभीको उपहार प्रदान किये। वह बालक उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे शुक्ल पक्षमें दिन-प्रतिदिन चन्द्रमा वृद्धिको प्राप्त होता है॥ १६-१७॥ जिस प्रकार वायुके वेगसे अग्नि क्षणभरमें ही बढ़ने लगती है, वैसे ही वह बालक अपने तेजके प्रभावसे बढ़ता हुआ आकाशमण्डलका स्पर्श करने लगा ॥ १८ ॥ दिन-प्रतिदिन खेल-खेलमें वह बालक घरके समीपके बहुतसे वृक्षोंको बायें हाथकी हथेलीसे उखाड़कर गिरा देता था। जंगलमें क्रीडा करते हुए उसने पर्वतों तथा वृक्षोंको चूर-चूर कर डाला। ऐसे ही एक बार उसने चन्द्रमें दिखायी देनेवाले हिरणको उछलकर क्षणभरमें पकड़ लिया ॥ १९-२०॥ एक बार किसी हथिनीके द्वारा जलमें उतरनेके ही मार्गको अवरुद्ध कर दिये जानेपर इस बालकने मुष्टिकाके प्रहारसे उसके गण्डस्थलको भेद डाला, जिससे वह गिर पड़ी। उसके इस प्रकारके अद्भुत कर्मोंको देखकर लोग अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये। उसके अतिमानवीय बल-पराक्रमको देखकर उसके माता और पिता अत्यन्त प्रसन्न थे॥ २१-२२॥ इस प्रकारके कर्मोंको करता हुआ वह सिन्धु नामक महाबली बालक वृद्धिको प्राप्त होने लगा। तदुपरान्त [एक दिन] वह अपने पितासे बोला कि हे राजन् ! मैं तप करनेके लिये जाता हूँ। मैं तपके अनुष्ठानके द्वारा स्वर्गलोक, भूलोक तथा रसातललोकपर आक्रमण करके उन्हें अपने अधीन कर लूँगा। मेरा ऐसा मानना है कि यहाँ घरपर रहकर तो मेरी आयु व्यर्थ ही बीत जायगी ॥ २३-२४॥ उसका ऐसा वचन सुनकर उसके माता-पिता उससे बोले— [हे वत्स!] पिता अपने पुत्रके उत्कर्षके लिये नित्य ही प्रार्थना किया करते हैं और तुम्हारी माता भी व्रत, दान, उपवास-पूजा आदिके द्वारा सभी देवताओंको मनाती ही रहती हैं। इस प्रकारसे उनकी अनुमति प्राप्तकर उन्हें प्रणामकर वह वनकी ओर चल पड़ा ॥ २५-२६ ॥ वहाँ घूमते हुए उसने कमलोंसे समन्वित एक सरोवर देखा। वहाँ जनशून्य स्थान देखकर उसका मन प्रसन्न हो गया और उसने वहीं ठहरनेका निश्चय किया। वह पैरके एक अँगूठेके बलपर भूमिपर खड़े होकर दोनों हाथोंको ऊपर उठाकर भगवान् सूर्यका ध्यान करते हुए शुक्राचार्यजीद्वारा उपदिष्ट उस मन्त्रका जप करते हुए पर्वतके समान अडिग हो गया ॥ २७-२८ ॥ वह दाहिने घुटनेपर अपना बायाँ पैर रखकर हृदयदेशमें दोनों हाथोंकी अंजलिको लगाकर उसी स्थितिमें रहकर सतत भगवान् सूर्यका ध्यान करता था ॥ २९ ॥ शीत, वात, घाम एवं जलवृष्टियोंको दृढ़तापूर्वक सहन करते हुए वह केवल वायुका आहार करने लगा। उसका शरीर वल्मीकका ढेर बन गया था ॥ ३० ॥ शरीरके केवल अस्थिमात्र शेष रह जानेपर भी वह उस महामन्त्रके जपमें तल्लीन था। इसी प्रकार साधना करते हुए उसे दो हजार वर्ष व्यतीत हो गये ॥ ३१ ॥ उस समय उस सिन्धुके शरीरसे प्रकट होनेवाली आभासे सूर्यदेव सन्तप्त हो उठे। इस प्रकारका उग्र तप देखकर भगवान् सूर्य प्रकट हो गये ॥ ३२ ॥ वे बोले—इस समय मैं तुम्हारे साधनानुष्ठानसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम अपने मनमें जो भी कामना हो, उसे माँगो, मैं जीवित रहनेतक वह वरदान तुम्हें दूँगा। भगवान् सूर्यद्वारा स्फुट रूपसे कहे गये उस वचनको सुनकर सिन्धुने शारीरिक चेतनाको प्राप्तकर अपने सामने प्रभु भगवान् सूर्यको प्रत्यक्ष देखा। तब वह उनके चरणकमलोंमें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर इस प्रकार स्तुति करने लगा ॥ ३३-३४ १/२ ॥

क्री०ख०-अ०७४] * राजा चक्रपाणिके पुत्र सिन्धुद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना * ४४७ सिन्धु बोला—हे दीनोंके स्वामी! आपको नमस्कार है। सर्वसाक्षी भगवान् भास्करको नमस्कार है। देवताओंके स्वामीको नमस्कार है, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव इस प्रकार त्रिदेवस्वरूप सूर्यको नमस्कार है। समस्त विश्वके लिये वन्दनीयको नमस्कार है। विश्वके कारणस्वरूप आप भगवान् सूर्यको नमस्कार है॥ ३५-३६॥ वृष्टिके कारणरूप भगवान् सूर्यको नमस्कार है। फसलोंकी उत्पत्तिके हेतुभूत आपको नमस्कार है, परब्रह्म स्वरूपको नमस्कार है और सृष्टि, पालन तथा संहारके कारणरूप आपको नमस्कार है॥ ३७॥ आप गुणातीत हैं, आपको नमस्कार है। गुरुरूप आपको नमस्कार है। सत्त्वादि तीन गुणोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले आपको नमस्कार है। सर्वज्ञ, ज्ञान प्रदान करनेवाले और सभीके स्वामीरूप आपको नमस्कार है*। हे देव! आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरा वंश धन्य हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये और मेरी तपस्या भी धन्य हो गयी, जो कि आपका मुझे प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ है॥ ३८-३९॥ हे दिनेश! यदि आप मुझे वर प्रदान करना चाहते हैं, तो किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो—यह वरदान आप मुझे प्रदान करें। आपकी कृपासे मैं संग्राममें सभी देवताओंपर विजय प्राप्त करूँ। इस समय जो देवता हैं, उनसे मेरी मृत्यु न हो॥ ४०१/२॥ ब्रह्माजी बोले—उस सिन्धुके द्वारा इस प्रकारके माँगे गये वरदानोंको सुनकर सन्तुष्ट हुए भगवान् सूर्य तपस्यानुष्ठानसे अत्यन्त दुर्बल शरीरवाले अपने उस भक्तसे बोले॥ ४१॥ सूर्य बोले—मेरे वचनोंके अनुसार तुम्हें न तो देवयोनियोंसे, न मनुष्योंसे, न तिर्यक् योनिके पशु- पक्षियोंसे, न नागोंसे ही कोई भय होगा। न तो दिन, न रात्रि, न उषाकाल और न सन्ध्याकाल—इस प्रकार किसी भी समय तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी। हे राजपुत्र! इस अमृतके पात्रको ग्रहण करो। यह जबतक तुम्हारे कण्ठदेशसे लगा रहेगा, तबतक तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी॥ ४२-४४॥ इस अमृतपात्रको जो कोई भी तुमसे अलग कर लेगा, उसीके हाथों तुम्हारी मृत्यु होगी। ऐसा कोई देवता, जब अवतार ग्रहण करेगा, जो अपने केशोंके अग्रभागसे स्वर्गको हिला डाले और जिसके अंगुष्ठके नखके अग्रभागमें करोड़ों ब्रह्माण्ड समाये हुए हों, वे ही प्रभु तुम्हें मार सकते हैं। अन्य किसीसे कभी तुम्हें भय करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ ४५-४६॥ मेरे वरदानके प्रभावसे सब कोई तुम्हारे लिये तृणके समान हो जायँगे। मैंने तुम्हें तीनों लोकोंका राज्य प्रदान कर दिया है—इसमें कोई सन्देह करनेकी आवश्यकता नहीं ॥ ४७॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार अनेक प्रकारके वरदान देकर भगवान् सूर्य अन्तर्धान हो गये। तब वह सिन्धु भी अत्यन्त आनन्दमग्न होकर अपने भवनको चला गया ॥ ४८ ॥ तब माता एवं पिताने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उसके मस्तकको सूँघा, और वे दोनों उससे कहने लगे— 'हे पुत्र! तुम्हारे वियोगमें हमने अन्नका परित्याग कर दिया है। चिन्ताके कारण हम दोनों अत्यन्त कृश हो गये हैं। तुम हमारी इस दशाको देखो।' तदनन्तर माता- पिताके चरणोंमें प्रणाम करके अत्यन्त हर्षित होकर पुत्र सिन्धुने कहा— ॥ ४९-५० ॥ भगवान् सवितादेवने प्रसन्न होकर मुझे तीनों लोकोंका स्वामित्व प्रदान किया है। उनके वरसे मैं तीनों लोकोंको अपने वशीभूत कर लूँगा। अतः आप लोगोंको चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ ५१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'वरप्रदान' नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७४॥

  • सिन्धुरुवाच— नमस्ते दीननाथाय नमस्ते सर्वसाक्षिणे ॥ नमस्ते त्रिदशेशाय ब्रह्मविष्णुशिवात्मने । नमस्ते विश्ववन्द्याय नमस्ते विश्वहेतवे ॥ नमस्ते वृष्टिबीजाय सस्योत्पादनहेतवे । परब्रह्मस्वरूपाय सृष्टिस्थित्यन्तहेतवे ॥ गुणातीताय गुरवे गुणक्षोभविधायिने । सर्वज्ञाय ज्ञानदात्रे सर्वस्य पतये नमः ॥

पचहत्तरवाँ अध्याय

४४८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पचहत्तरवाँ अध्याय दैत्यराज सिन्धुका आख्यान, सिन्धुद्वारा दिग्विजयसे सम्पूर्ण पृथ्वीको विजित करना, अमरावतीपर आधिपत्य और स्वयं इन्द्रासनपर विराजमान होना ब्रह्माजी बोले—अपने पुत्रको बुद्धिसम्पन्न और | गजसेनाके पीछे-पीछे अश्वारोही सैनिक चल रहे भगवान् सूर्यसे प्राप्त वरदानोंके कारण गर्वित जानकर | थे। वे वीर सैनिक अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे सुसज्जित थे, उसके पिता राजा चक्रपाणिने उसे देश, कोश, सैन्यबल- | शत्रुसेनाका मर्दन करनेवाले उन सैनिकोंने देहकी रक्षा सहित सम्पूर्ण राज्य प्रदान कर दिया ॥ १ ॥ | करनेवाले कवच धारण कर रखे थे। इनके पीछे रथारूढ़ अपने आत्मकल्याणकी इच्छावाला उसका वह | सेना जा रही थी। जो नानाविध अलंकारोंसे विभूषित थी पिता वन चला गया। पिताके द्वारा अभिषिक्त होनेपर | और असंख्य तरकशों, धनुषों तथा विविध शस्त्रसमूहोंसे सिन्धु राज्यके कार्योंमें संलग्न हो गया ॥ २ ॥ | समन्वित थी ॥ ९-१० ॥ उसने व्यापारीवर्गके प्रधान-प्रधान श्रीमानों, दोनों | वह सिन्धु नामक दैत्य सेनाके मध्य भागमें घोड़े अमात्यों एवं अधिकारियोंको बुलाकर उन्हें वस्त्र- | की पीठपर आरूढ़ होकर विराजमान था। उसका आभूषणों आदिके द्वारा सम्मानित करके अपने-अपने | कण्ठदेश मोतियोंकी मालासे सुशोभित था तथा धनुष पदोंपर पूर्ववत् प्रतिष्ठित किया ॥ ३ ॥ | एवं बाणने उसके हाथकी शोभाको बढ़ा रखा था ॥ ११ ॥ उसने राज्यमें यह डिण्डिमघोष करवाया कि | हाथमें खड्ग तथा ढाल लेकर वह वृक्षों तथा उसकी आज्ञाके भंग होनेपर उसे दण्डनीय अपराध माना | पर्वतोंको विदीर्ण करता हुआ जा रहा था। जिस-जिस जायगा। तदनन्तर उसने शीघ्र ही वीरोंको दिग्विजय | नगरको उद्देश्य करके वह महाबली दैत्य वहाँ जाता था, यात्राके लिये आज्ञा प्रदान की। अत्यन्त भीषण शरीरवाले | उस-उस नगरके राजाको सिन्धुके महावीर सैनिक उस सिन्धुने अपने तेजके द्वारा सूर्यको लज्जित-सा बना | पकड़कर अपने स्वामीके पास ले आते थे। तब वह दैत्य डाला। उसके आगे-आगे वीर सैनिक चल रहे थे, जो | सिन्धु अपना चिह्न तथा मुद्रा देकर किसी अपने विकराल और लाल वर्णके मुखवाले थे ॥ ४-५ ॥ | सेनानायकको वहाँ प्रतिष्ठित कर देता था ॥ १२-१३ ॥ वे हाथोंमें विविध प्रकारके खुले शस्त्रोंको धारण | इसके अतिरिक्त जो राजा उसकी शरणमें आकर किये हुए थे। उन्होंने अपने पैरोंसे उड़नेवाली धूलराशिसे | उसकी दासताको स्वीकार कर लेते थे, उन्हें वह भगवान् सूर्यको आच्छादित कर दिया था। उनके पीछे- | बलपूर्वक कर देनेवाला बनाकर उनकी रक्षा करके उन्हें पीछे हाथी चल रहे थे। जो चार दाँतोंवाले थे, नाना | उनके पदपर स्थापित कर देता था ॥ १४ ॥ प्रकारके रंगोंकी चित्रकारीसे विभूषित थे ॥ ६ ॥ | इस प्रकार उसने सभीको अपने अधीन बना लिया। पैरोंमें बँधी हुई श्रृंखलाओंवाले वे हाथी पृथ्वीको | तदनन्तर शुम्भ, निशुम्भ, वृत्रासुर, प्रचण्ड, काल, कदम्बासुर, कम्पायमान कर रहे थे। उन हाथियोंके ऊपर महावत | शम्बर तथा कमलासुर नामक करोड़ों-करोड़ों दैत्य आरूढ़ थे। वे हाथी चलते हुए पर्वतोंके समान लग रहे | उसके समीपमें आ गये ॥ १५ १/२ ॥ थे। वे विविध वर्णोंवाली ध्वजाओंसे युक्त थे और ऐसा | उस समय कोलासुरने राजा सिन्धुसे कहा— प्रतीत होता था कि वे दिग्गजोंको विदीर्ण करनेकी इच्छा | 'पूर्वकालमें जिस प्रकारसे दैत्यराज त्रिपुरासुरने तीनों रखते हों। वे अपने महान् घण्टाघोषसे दिगन्तरालोंको | लोकोंपर विजय प्राप्त करके हमें अधिकार प्रदान किये, निनादित कर रहे थे ॥ ७-८ ॥ | वैसे ही आप भी अपने तेजके बलपर तीनों लोकोंको

क्री०ख०-अ०७५ ] * दैत्यराज सिन्धुका आख्यान * ४४९ जीतकर हमें अधिकार प्रदान करें' ॥ १६-१७ ॥ उस त्रिपुरासुरको भगवान् शिवके द्वारा मार दिये जानेपर अब आप ही एकमात्र महान् बलवान् असुर दिखायी देते हैं। आपके पराक्रमकी तुलनाको साक्षात् यमराज भी कभी प्राप्त नहीं कर सकते हैं ॥ १८ ॥ हे महान् बलसम्पन्न सिन्धु ! हम लोग आपकी आज्ञाका पालन करना चाहते हैं, हम आपकी सेवामें उपस्थित हैं। कोलासुरकी इस बातको सुनकर दैत्यराज सिन्धुको अति प्रसन्नता हुई। तब उसने उन असुरोंको अश्व, गज, वस्त्र तथा आभूषण प्रदान किये ॥ १९१/२ ॥ सिन्धु बोला—मैं महान् बलशाली तो तब होऊँगा, जब मैं देवराज इन्द्रकी अमरावती नगरी, शिवके कैलास, विष्णुके वैकुण्ठ, ब्रह्माके सत्यलोक तथा सातों पातालोंपर विजय प्राप्त कर लूँगा ॥ २०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—तब सभीके द्वारा 'बहुत ठीक- बहुत ठीक' इस प्रकार कहे जानेपर सभी दैत्याधिपति जोरकी गर्जना करने लगे और वे अत्यन्त हर्षित हो उठे। वे ब्रह्माण्डको कँपाने लगे। वे कहने लगे—'हमारी खुजली तो राजाओंसे युद्ध करनेपर शान्त नहीं हुई। अब लगता है कि देवताओंसे युद्ध करनेपर ही वह शान्त होगी।' अतः वे लोग शीघ्र ही निकल पड़े और स्वर्गलोकमें जा पहुँचे। उन्होंने इन्द्रकी पुरी अमरावतीको चारों ओरसे वैसे ही घेर लिया, जैसे ब्राह्मण धन देनेवाले दानी व्यक्तिको घेर लेते हैं ॥ २१–२३॥ कुछ दैत्य वहाँकी रत्नराशिको लूटते हुए नगरीके मध्यमें प्रविष्ट हो गये। वहाँ गर्जन करते हुए दैत्योंका महान् कोलाहल होने लगा ॥ २४ ॥ तदनन्तर सभाके मध्यमें विराजमान देवराज इन्द्रने दूतके मुखसे दैत्यराज सिन्धुके आगमन तथा दैत्योंके द्वारा अपनी पुरीको घेरे जानेका समाचार सुना। तब हाथमें वज्र धारण किये हुए देवराज इन्द्र सभी देवताओंको साथ लेकर, ऐरावत हाथीपर आरूढ़ होकर उस दैत्य सिन्धुके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ आये ॥ २५-२६॥ उस समय कुछ देवता कहने लगे—'हे इन्द्र ! इसके साथ युद्ध करनेमें हम समर्थ नहीं हैं। लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके अतिरिक्त कोई भी ऐसा कहीं नहीं दिखायी देता, जो इसके साथ युद्ध कर सके' ॥ २७ ॥ वे देवता इस प्रकार कह ही रहे थे कि उसी समय उस महाबली दैत्य सिन्धुने देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रको बाणोंकी वृष्टिसे बींध डाला ॥ २८ ॥ तभी कुछ देवता भागते हुए वहाँसे पलायन कर गये। तदनन्तर वे इन्द्र गर्जना करते हुए अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्धके लिये दौड़ पड़े ॥ २९ ॥ हाथमें वज्र उठाये हुए उन शत्रुहन्ता इन्द्रने सभी दैत्यगणोंको ग्रास बनाते हुए उस दैत्यराज सिन्धुके मस्तकपर वज्रसे भीषण प्रहार किया ॥ ३० ॥ वज्रके प्रहारसे उसे महान् मूर्च्छा आ गयी, किंतु मुहूर्तभरमें ही वह पुनः उठ खड़ा हुआ और इन्द्रसे बोला— 'यहाँसे अपने घर चले जाओ, अपनी मृत्यु न होने दो। मेरी मुष्टिकाके प्रहारसे साक्षात् काल भी मृत्युको प्राप्त हो जायगा। फिर तुम्हारी क्या गणना है!' किंतु इन्द्रने उसकी कही बातको अनसुना कर दिया ॥ ३१–३२ ॥ तब अत्यन्त रोषमें भरकर महादैत्य सिन्धुने अपनी मुष्टिकाके आघातसे इन्द्रके हाथी ऐरावतके मस्तकको विदीर्ण कर डाला, जिससे रक्तकी धारा प्रवाहित होने लगी। फिर दैत्यने उछलकर उस हाथी ऐरावतके चारों दाँतोंको कसकर पकड़कर उस गजराजको जमीनपर गिरा दिया। यह देखकर इन्द्र अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये ॥ ३३-३४॥ तदनन्तर जब वह दैत्य इन्द्रको अपने पैरसे कुचलने ही जा रहा था कि इन्द्र सूक्ष्म शरीर बनाकर उसके हाथोंकी पकड़से बाहर निकल आये और दूर चले गये तथा मन- ही-मन उसकी प्रशंसा करने लगे कि इस प्रकारका पराक्रम मैंने पहले कभी नहीं देखा। यदि मैं वहींपर ठहरा रह गया होता तो निश्चित ही मृत्युको प्राप्त होता ॥ ३५-३६ ॥ तदनन्तर इन्द्रने अपना ऐरावत हाथी वहीं छोड़ दिया और वे रूप बदलकर देवताओंके साथ उन भगवान् विष्णुकी शरणमें गये ॥ ३७ ॥ तत्पश्चात् देवराज इन्द्रसहित सभी देवताओंके वहाँसे पलायन कर जानेपर सभी दैत्योंद्वारा चारों ओरसे

४५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

घिरा हुआ दैत्यराज सिन्धु देवराज इन्द्रके आसनपर आरूढ़ हो गया। उसने देवताओंके सभी पदोंपर उन दैत्योंको नियुक्त कर दिया। तब शुम्भ आदि दैत्य उन- उन पदोंपर निःशंक होकर स्थित हो गये ॥ ३८-३९ ॥ वे सभी दैत्य उस असुराधिपति सिन्धु, जो सर्वाधिक बल-पराक्रमशाली था, उसकी प्रशंसा करने लगे और विविध प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे स्वर्गलोकको निनादित करने लगे ॥ ४० ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'देवताओंकी पराजय' नामक पचहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७५ ॥

छिहत्तरवाँ अध्याय सिन्धुसेनासे पराजित देवोंका वैकुण्ठलोकमें विष्णुकी शरणमें जाना, देवताओंको आश्वस्तकर भगवान् विष्णुका गरुड़पर आरूढ़ हो देवताओंसहित वहाँ आना, दैत्यसेना तथा देवसेनाका युद्ध

ब्रह्माजी बोले—देवताओंके साथ देवराज इन्द्रने वैकुण्ठलोकमें सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए भगवान् विष्णुके समीप आकर उन्हें प्रणाम किया और अपने आगमनका प्रयोजन बतलाया ॥ १ ॥ इन्द्र बोले—हे गोविन्द! सिन्धुदैत्यद्वारा की गयी हमारी इस दुर्दशाको क्या आप नहीं जानते हैं? हमारी अमरावतीपुरीपर दुष्टोंने आक्रमण किया है ॥ २ ॥ यद्यपि देवताओंको साथ लेकर मैंने उसके साथ यथाशक्ति युद्ध किया, किंतु जब उस दैत्य सिन्धुको जीता नहीं जा सका, तभी मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हे जगदीश्वर! आपके बिना हमारी कोई गति नहीं है। आप ही सर्वदा हमारी गति हैं। आप इस दैत्य सिन्धुका वध करें और हमें अपने-अपने स्थानोंको प्राप्त करायें ॥ ३-४॥ ब्रह्माजी बोले—इन्द्रके वचन सुनकर भगवान् विष्णु चिन्ता तथा आश्चर्यसे समन्वित हो गये और इन्द्रसे बोले—'आप लोगोंको भयभीत होनेकी आवश्यकता नहीं है, मैं क्षणभरमें ही उस असुर सिन्धुपर विजय प्राप्त कर लूँगा।' ऐसा कहकर भगवान् हृषीकेश अपने वाहन गरुड़पर आरूढ़ हुए। उस समय उस गरुड़की उड़ानसे तीनों लोक प्रकम्पित हो उठे ॥ ५-६ ॥ पक्षियोंसे समन्वित वृक्ष भूमिपर गिर पड़े। उस समय भगवान् विष्णु मुकुट तथा कुण्डल धारण किये हुए थे और वनमालासे विभूषित थे ॥ ७ ॥ कौस्तुभमणिकी आभासे उनका वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा था। उन्होंने कस्तूरीका उज्ज्वल तिलक लगाया हुआ था। वे अपने हाथोंमें शंख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण किये हुए थे। इस प्रकारसे सुसज्जित भगवान् विष्णु इन्द्रनगरी अमरावतीमें गये। गरुड़के आसनपर आरूढ़ भगवान् विष्णुसहित सभी देवगणोंको आया हुआ जानकर असुर अपने हाथोंमें विविध प्रकारके शस्त्र धारणकर युद्धके लिये आ पहुँचे ॥ ८-९ ॥ तब महापराक्रमशाली दैत्य सिन्धु भी युद्ध करनेकी इच्छासे हाथमें धनुष, तूणीर तथा चक्र लेकर घोड़ेपर सवार होकर अत्यन्त रोष करता हुआ वहाँ आया ॥ १० ॥ इसके पश्चात् कुबेर, वरुण, वायु, अग्नि, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, मंगल, दोनों अश्विनीकुमार तथा कामदेव भी युद्धस्थलमें आये। सिन्धु दैत्यके सामने ही देवताओं तथा दैत्योंमें द्वन्द्वयुद्ध चल पड़ा। उस युद्धमें दैत्य प्रचण्डका वरुणके साथ, यक्षराज कुबेरका कमल दैत्यके साथ, सौ यज्ञ करनेवाले इन्द्रका वृत्रासुरके साथ, निशुम्भका वायुके साथ और शुम्भ दैत्यका शक्तिसम्पन्न विष्णुके साथ मल्लयुद्ध हुआ ॥ ११-१३ ॥ इसी प्रकार अग्निदेवने चण्डके साथ और चन्द्रमाने मुण्डके साथ भीषण युद्ध किया। मंगलका कदम्बके साथ, शम्बरासुरका कामदेवके साथ एवं दोनों अश्विनीकुमारोंका कालदैत्यके साथ युद्ध हुआ। सभी सैनिकोंने शस्त्रों तथा अस्त्रोंके आघातसे एक-दूसरेके मर्मस्थानोंपर अनेक बार चोट पहुँचायी ॥ १४-१५ ॥ युद्धके मतवाले कुछ योद्धा मल्लयुद्ध कर रहे थे, कुछ दूसरे शस्त्रोंके आघातसे परस्पर चोट पहुँचा रहे थे।

क्री०ख०-अ०७६ ] * सिन्धुसेनासे पराजित देवोंका वैकुण्ठलोकमें विष्णुकी शरणमें जाना * ४५१ कुछ वीर मृत्युको प्राप्त हो गये, कुछ मरणासन्न अवस्थावाले हो गये और कुछ शरीरके अंगोंके कट जानेपर भी इधर- उधर गति कर रहे थे। कभी वे दूसरेको पराजित कर देते तो कभी स्वयं पराजित हो जाते थे॥ १६-१७॥ तदनन्तर वृत्रासुरने अपनी मुष्टिकाके प्रहारसे इन्द्रके ऊपर आघात किया। तदनन्तर वे दोनों बड़े वेगसे अपने- अपने मस्तकसे दूसरेके मस्तकपर चोट पहुँचाने लगे॥ १८॥ इसी प्रकार हाथसे हाथको, पैरसे पैरको मारने और वक्षःस्थलसे वक्षःस्थलपर टक्कर मारने लगे। तदनन्तर इन्द्रने वज्रसे वृत्रासुरपर प्रहार किया॥ १९॥ वज्रके आघातसे वह भूमिपर गिर पड़ा और उसे जोरकी मूर्च्छा आ गयी। थोड़ी ही देरमें चेतना प्राप्तकर वृत्रासुरने वज्रके समान कठोर मुष्टिके आघातसे इन्द्रपर प्रहार किया, उस चोटसे वे मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। उनके मुखसे रक्तकी धारा बह चली, वे जबतक भागते, उससे पहले ही सभी दिशाओंसे युद्धकी इच्छा करनेवाले दैत्य वहाँ आ पहुँचे। तब उनका वैसा बल- पराक्रम देखकर इन्द्र अन्तर्धान हो गये॥ २०-२२॥ इस प्रकार जो-जो भी देवता असुरोंसे द्वन्द्वयुद्ध कर रहे थे, उन सभीका अभिमान चूर-चूर हो गया और वे युद्धस्थलसे पलायन कर गये॥ २३॥ इस प्रकार सभी देवताओंके पलायन कर जानेपर भगवान् विष्णुने अपने वाहन गरुडको प्रेरित किया। वे अपने सुदर्शनचक्रकी दीप्तिसे तथा अपनी दीप्तिसे सभी दिशा-विदिशाओंको प्रभासित करते हुए वहाँ आये और उन्होंने अपने चक्रकी धारसे अनेकों दैत्यसमूहोंपर प्रहार किया। उस प्रहारसे कुछ दैत्योंके मुख कट गये, किसीकी गर्दन धड़से अलग हो गयी॥ २४-२५॥ कुछ दैत्योंके सौ भागोंमें टुकड़े हो गये और कोई घुटना, जंघा तथा बाहुसे रहित हो गये। कुछ उनकी शरणमें चले गये, उन्हें भगवान् विष्णुने नहीं मारा॥ २६॥ भगवान् विष्णुके हाथों मारे गये वे सभी महाबली दैत्य मुक्तिको प्राप्त हुए। वहाँ शीघ्र ही रणांगणमें मेद तथा मांस बहानेवाली नदियाँ प्रवाहित होने लगीं॥ २७॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुने शंख बजाया, जिसकी तीव्र ध्वनिने सम्पूर्ण जगत्‌को निनादित कर दिया। इस प्रकार भगवान् विष्णुद्वारा सबके ऊपर विजय प्राप्त कर लेनेपर वे शुम्भ आदि सभी दैत्य उस द्वन्द्व-युद्धको करना छोड़कर उनके साथ युद्ध करनेके लिये आ गये॥ २८१/२॥ तब भगवान् श्रीहरिने विराट्रूप धारण किया और चण्ड, मुण्ड, निशुम्भ तथा शुम्भ नामक उन चारों दैत्योंको पकड़कर और घुमाकर उसी प्रकार दूरस्थित श्रेष्ठ नदीके मध्यमें फेंक दिया, जैसे कोई मनुष्य भिन्दिपालके द्वारा पत्थर (-के गोल टुकड़े)-को फेंक देता है। वे कुछ देरके लिये मूर्च्छित हुए, किंतु फिर सचेत होकर अपनी दैत्यसेनामें आ गये॥ २९-३१॥ तदनन्तर श्रीहरिने बिना घबड़ाये दैत्य प्रचण्डके हृदयमें, वृत्रासुरकी पीठमें, काल, कमल एवं भौमासुरके सिरमें मुष्टिसे प्रहार किया। कदम्बासुरपर चक्रसे आघात किया। उन माधवने कोलासुरके हृदयमें गदासे प्रहार किया॥ ३२-३३॥ तदनन्तर वह सिन्धु नामक दैत्य भयंकर कोलाहल ध्वनिद्वारा दिशाओं एवं विदिशाओंको निनादित करते हुए शीघ्र ही दौड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा और बोला- 'हे विष्णो! मैंने तुम्हारा बलपौरुष देख लिया॥ ३४॥ अब तुम मेरा भी पौरुष देखो, अब तुम यहाँसे जा नहीं सकते हो। मेरी नजरोंके सामनेसे आजतक कभी भी कोई शत्रु जीवित रहकर नहीं गया है॥ ३५॥ तुम तो भूत, भविष्य तथा वर्तमानकालकी सब बातोंको जाननेवाले हो, तुमने पूर्वमें इस विषयमें विचार क्यों नहीं किया? जिसके शब्दमात्रसे तीनों लोक अत्यन्त प्रकम्पित हो उठते हैं, उसकी नगरीमें तुम सूर्यके आगे जुगनूके समान क्यों चले आये हो?'॥ ३६१/२॥ इस प्रकारका मिथ्या प्रलाप करते हुए उस दैत्याधिपति सिन्धुसे देवता बोले-'जो वीर होते हैं, वे डींग नहीं हाँकते, बल्कि पौरुष दिखलाते हैं। हमें भगवान् विष्णुकी आज्ञा प्राप्त नहीं है, नहीं .तो अबतक तुम्हारे सैकड़ों टुकड़े हो गये होते'॥ ३७-३८॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विष्णुका रणभूमिमें युद्धार्थ आगमन' नामक छिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥

सतहत्तरवाँ अध्याय

४५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- सतहत्तरवाँ अध्याय सिन्धुदैत्यका देवताओंको पराजित करना, विष्णुका उसके पराक्रमसे प्रसन्न हो वरदानके रूपमें देवोंसहित उसके नगर गण्डकीपुरमें रहना, विष्णुका देवताओंको आश्वस्त करना, दुष्ट सिन्धुदैत्यद्वारा किये गये अधर्माचरणका वर्णन ब्रह्माजी बोले-देवताओंके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर क्रुद्ध हुआ वह दैत्य सिन्धु आगकी चिनगारी उगलता हुआ उन देवताओंपर वैसे ही टूट पड़ा, जैसे कि सिंह हाथियोंके समूहपर टूट पड़ता है ॥ १ ॥ दैत्य सिन्धुने अपनी मुट्ठीसे बल दैत्यका वध करनेवाले इन्द्रपर प्रहार किया, जिस कारण वे पृथ्वीतलपर उसी प्रकार गिर पड़े, जैसे कि आँधीके द्वारा वृक्ष भूतलपर गिर पड़ता है। दैत्यराज सिन्धुने कुबेरके मस्तकपर, वरुणके हनुदेश (टुड्डी)-में और यमकी पीठमें चक्रके आघातसे प्रहार किया ॥ २-३ ॥ अग्निदेवके तालुदेशपर चोट पहुँचायी, कामदेवको लातसे मारा, वायुदेवको पैरसे आघात किया और शनैश्चरको कुचल डाला। उसने चन्द्रमा तथा मंगलको पकड़कर बलपूर्वक घुमाया और भूतलपर पटक दिया। सनक तथा सनन्दनके पृष्ठभागमें चोट पहुँचायी ॥ ४-५ ॥ दोनों अश्विनीकुमार तथा देवर्षि नारद कहीं अन्यत्र ही भाग चले। उस सिन्धुदैत्यका पराक्रम देखकर उस समय सभी देवता भाग गये ॥ ६ ॥ कुछ देवता गिर पड़े तथा कुछ मूर्च्छित हो गये। तदनन्तर दैत्य सिन्धुने चक्रके द्वारा भगवान् विष्णुकी मुट्ठीमें मारा तो उनका चक्र भूमिपर गिर पड़ा ॥ ७ ॥ तब भगवान् माधवने गदाके द्वारा उस दैत्यके सिरपर आघात किया। उस प्रहारसे बचकर दैत्यने अपनी गदा उनके ऊपर फेंकी ॥ ८ ॥ उसके पराक्रमको देखकर मधुसूदन भगवान् विष्णु उससे बोले-'अरे दैत्य ! जो तुम्हारे मनमें हो, वह वर माँगो। इस प्रकारका पुरुषार्थ अभीतक मैंने किसी भी असुरमें नहीं देखा है।' तब अत्यन्त आनन्दित होकर दैत्याधिपति सिन्धु बोला - ॥ ९-१० ॥ हे देवेश्वर ! यदि आप सन्तुष्ट हैं और यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो हे हरे! मेरे गण्डकी नामक नगरमें आप अपने परिवारके साथ हमेशाके लिये निवास करें। हे प्रभो ! मैं इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उत्तम वर नहीं माँगता हूँ। तदनन्तर भगवान् महाविष्णु बोले- 'मैं तुम्हारे नगरमें निवास करूँगा। चूँकि मैंने तुम्हें वर दे दिया है, इसलिये मैं तुम्हारे अधीन हो गया हूँ' ॥ ११-१२१/२ ॥ इसके पश्चात् सिन्धु नामक उस दैत्यने सत्यलोक, कैलास, तथा विष्णुलोकमें अपने दैत्यपतियोंको प्रतिष्ठित किया और स्वयं इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हो गया, फिर वहाँ भी उसने दूसरे दैत्याधिपतिको स्थापितकर लक्ष्मीपति विष्णुके साथ विविध प्रकारके वाद्यों तथा दुन्दुभियोंकी ध्वनिके साथ अपनी पुरी गण्डकीकी ओर प्रस्थान किया। बन्दीजन उसकी स्तुति करते हुए कह रहे थे कि 'ऐसा पुरुष कहीं भी नहीं हुआ, जो कि बहुतसे देवताओंको जीतकर विष्णुभगवान्‌को अपने घरमें ले आया हो' ॥ १३-१५१/२ ॥ गण्डकीनगरके निवासियोंने वरुण, हरि, कुबेर आदि प्रधान-प्रधान देवताओंको उसके समीपमें स्थित देखा। इसके बाद सभी नगरवासी अपने-अपने घरोंको चले गये। तदनन्तर दैत्य सिन्धुने भगवान् विष्णुसे कहा- 'तुम गण्डकीनगरमें देवताओंके साथ सुखोंका उपभोग करो।' तब उन्होंने भी वैसा ही किया। दैत्य सिन्धुने उस गण्डकीनगरके चारों ओर दूर-दूरतक दैत्यों तथा अन्योंको सुरक्षाहैतु नियुक्त कर दिया ॥ १६-१८ ॥ इसके पश्चात् सभी देवता भगवान् विष्णुसे कहने लगे-'हे गरुडध्वज ! आपने यह क्या किया ? आप अपने पराक्रमका परित्यागकर इस प्रकार आनन्दमें निमग्न होकर क्यों रह रहे हैं ? ॥ १९ ॥ हम लोग कैसे इस कारागारमें पड़ गये हैं। कैसे मृत्युलोकमें आ गये हैं? हे जगदीश्वर ! हमारे इस दुःखभोगका अन्त कब होगा?' ॥ २० ॥