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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

नफ़स अम्मार दुश्मनों कर गिर्द । सोई सामान अब वहम कीजे ॥
होके आदम न होवे चौपाया । रूह अपनेपै मतसम कीजे ॥
तू अगर वस्ले यारखाह आजिज । दूर शहबात बिलकलम कीजे ॥

शब्द ।

कहां आदम कहाँ है यह बहायम । हैं सुबहत जिनकी तू मसहूर दायम ॥
न पावैं अक्ले इन्सानी सतूरां । तू कर दे जल्द तर्क यह लूम लायम ॥
गुरु चेले पड़े दर बहर काली । हैं खाते गोता सदहा दायम दायम ॥
जो दिल घोड़ा जगह अपनेको छोड़ा । करें फिर कौन वह बर जाय कायम ॥
करे तदबीर सदहा क्यों न आजिज । यह दिल गरिन्द क्योंकर हो मुलायम ॥

तरजीय बन्द ।

गुरु क्या चीज हम उसको न जाना । नहीं कोई साधु हम उसको न माना ॥
गुरु न आदमीका आदमी है । खुदा मुरशिद हम उसकोही पहिचाना ॥
हैं सब जुहला खबरक्या है खुदाकी । हैं आकिल हमवहम सबतें सयाना ॥
हुआ हैन हिन्दसामें कोई मारूफ । कोई कहलाव फिलसिफे जमाना ॥
कोई है डाक्टर आफ बार नामी । कोई है मास्टर आफ अस्टं दाना ॥
बहुत दुनियामें लकब मौसूफ । बसफ़े और कितने हैं निशाना ॥
हमारा ज्ञान सबके सर चढ़ा है । कि हमने इल्म अंगरेजी पढ़ा है ॥
मुअज्जिज उदहोंपर जब होके आवे । हुकम खुद खादियोंपर यों लगावे ॥
नहीं कोय मुसतन्द हो भड़कते । मेरे नज़दीक आने कोई न पावैं ॥
हुआ जब मगज पुर किब्रो मनीसे । न सूझे हक नज़र क्या इसको आ ॥
नहीं रब्बो रसूलो साधु गुरु क्या । नहीं कुछ देख नबीना बनावे ॥
हुआ दोज़हर जब यकजाय दिलमें । कुलुब खवानी व दौलत जो कहावे ॥
तो फिर क्योंकर न मुरदः होवे मर्दुम । निगह तब साधुगुरु हरगिज न आवैं ॥
हमारा ज्ञान सबके सिर चढ़ा है । कि हमने इल्म अंगरेजी पढ़ा है ॥
कोई है नेचरी कोई दिहरीया । कोई मन मौज अपनेमें लहरीया ॥
हमारी रह न आवे कोई रहज़न । कि हम हैं अपने चोरोंके फेरीया ॥
कि हम हुसियार और खुद फेल मुख्तार । डुबावें अपने दुश्मनको बदरिया ॥
मेरा दिल इल्म अंगरेजीसे रोशन । हमारी बहसमें न कोई ठहरिया ॥
कोई कूचा बकूचा लेकचरी है । कोई औरों नसायह पन्द करिया ॥
जबांदानी वमन्तिक सीख आजिज । हुआ हङ्कार कंसिरमें जोभरिया ॥
हमारा ज्ञान सबके सिर चढ़ा है । कि हमने इल्म अंगरेजी पढ़ा है ॥

२२ अ० मतोंकाविशेषविचार

पढ़ लिया हिन्दू इल्म अंगरेजी । भर गया जबकि इल्म अंगरेजी ॥
औबल अल्लाह नामको भूला । आ बसा जब कि इल्म अंगरेजी ॥
जब न अदलाह रहा कहाँ गुरु पीर । आ समा जब कि इल्म अंगरेजी ॥
नहीं गुरु पीर पेशवा नहीं रब्ब । घर किया जह्य कि इल्म अंगरेजी ॥
जब न रब्ब है तो साधु कहाँ आजिज । हक भला जबकि इल्म अंगरेजी ॥

अंग्रेजी कुतुब कित्सा जो मेरे नज़र आया ।
आगाज़ अल्लाह नामसे भी सो सब हज़र आया ॥
कोई न कहै राम नहीं गाड़ न यहबाह ।
बेसमझीहीमें सारी उमरका गुज़र आया ॥
अल्लाह जो किया तर्क तो दिल साफ़ कहाँहो ।
तनपरवरीको फेर तनासुखका घर आया ॥
इन्सानी व हैवानी हालतसे गुज़र कर ।
फिर जामः नबातात जमादात दर आवा ॥
गरदाब चौरासी यही दरियामें है आजिज ।
खागोता सद आदम तन यह फिर आया ॥

बैठ जा साधु सङ्ग़तमें । सरझुका जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥
तनो मन धनको अपने कर कुरबान । धर बना जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥
साधु रहबर हैं दीन दुनिया के । बखश ला जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥
जाके तू अपने अस्ल रूपको देख । इल्म पा जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥
जगमें ऐसा न दोस्त कोई आजिज । दरदरा जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥

कर दिया खार तूने ऐ कलियुग । दूरकी यार तूने ऐ कलियुग ॥
न बफ़ाही नहीं है खुश बुलकी । घर दिया नार तूने ऐ कलियुग ॥
नेकहै कोई और सबको क्या । बद बिकिरदार तूने ऐ कलियुग ॥
नहीं गुल है कहीं नहीं बुलबुल । की है पतझाड़ तूने ऐ कलियुग ॥
अब कहाँ मौसिमे बहारी है । भर दिया खार तूने ऐ कलियुग ॥
गुल नहीं है तू उड़ गई बुलबुल । बूम बैठा ऐ ऋतूने ऐ कलियुग ॥
दी भर सारे जगमें जागो ज़मन । सिम्तहर चार लूले ऐ कलियुग ॥
इक ज़हरदार जो हवा लाया । नाग फुंकार तूने ऐ कलियुग ॥
मुरदः सारे हुये कोई ज़िन्दा । दाब दर गार तूने ऐ कलियुग ॥
है रम्क जान बाकी आजिजके । कर दिये मुरदार तूने ऐ कलियुग ॥

यथा ।

यह धन विद्या पसारा केते दिन को । यह नौबत और नकारा केते दिनको ॥
यह दौलत जाहो-शौकत शानो हशमत । हुआ तेरा अजारा केते दिनको ॥
सिकन्दर हाथ खाली हो सुधारा । वह कैंसर और वारिद केते दिनको ॥
किधर वे जो किये दावै खुदाई । यह मोम और सङ्ग खारा केते दिनको ॥
बकैद तोहमात इन्प्रा बंधा । यह दुनिया दोस्त प्यारा केते दिनको ॥
गुजर जावेगी आजिज दीदनी सब । खयालो खाब सारा केते दिनको ॥

यथा- क्यों जिल्लन निकालता है नादों । दुनियामें बात है शादों ॥
ग्राफिल न हो अस्ल अपनी याद । हर शामो सिंहूर व बइमदादों ॥
खाब और ख्याल कुल आलम । हैवानो नाबत और जमादों ॥
आनन्द तो होवे सङ्ग सुलहा । कर तरक तू मेल बदनिहादों ॥
उम्मीद उससे रख तू आजिज । यकता है जो बखश दिल मुरादों ॥

यथा- आया यहां अज्ञान है, दुनियामें रोना पीटना ।

नहीं अस्ल अपना ध्यान है दुनियामें रोना पीटना ॥
गम और अलमका बहार है, कोई न बरखुरदार है ।
हसता तू क्या नादान है, दुनियामें रोना पीटना ॥
नाच और न कीबकी बोल क्या, नौबत नकारा ढोल क्या ।
आफ़ातकी घमसान है, दुनियामें रोना पीटना ॥
सर पर जो काल कलोलता, मगरूर हो क्या बोलता ॥
जाको अपने व आमान है, दुनियामें रोना पीटना ॥
महरिम नहीं बन बी के, गुरी है दिलमें शेखके ।
पूर दरद चारो खान है, दुनियामें रोना पीटना ॥
काजी मशाय बोलते, इसरार अल्लाह ोलते ।
अन्धा यह बे पहिचान है, दुनियामें रोना पीटना ॥
बेचूँ अलख अल्लाह है, जो कुलका क़िबले गाह है ।
इसको नहीं कोई जान है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥
दायम गुनह आलूद है, आना यहां क्या सूद है ।
हर सिम्त खींचोतान है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥
होली तमाशा राग है, सो हंस नहीं कोई काग है ।
आदमके नहीं शायान है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥
शबरोज मरता बैल है, मेहनत मशक्कत मैल है ॥

खाना तुझे एक नान है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥
साधुओंकी मुहब्बत नहिं किया, गादम न सो हैवाँ जिया ।
गुरु बात रख नहिं कान है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥
हक्का कबीरा यार हो, सब मञ्जिलोंके पार हो ।
तब पाओ अपना मकान है दुनियाँमें रोना पीटना ॥
जब तक यहाँ लोवास है, तबतक नहीं वह पास है ।
कर तर्क मल वह आन है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥
सच्चेसे मिलने जाइये, तब आप सच हो जाइये ॥
दिनदोका तू मिहमान है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥
मुरशिद हकीकी रहबरी, इसकी उम्मीद आजिज करी ।
सब साहबे सुलतान है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥

मुखम्मस तर्जियाबन्द ।

है नहीं बिन्द और नहीं है नाद । सारे जिन्नो परी व आदमज़ाद ॥
आगये काबू कैल जो बेदाद । बोझने की बदी लिया शिर लाद ॥

ऐ फ़िरोतन तुम्हैं मुबारकबाद ।

नहीं कैसे सिकन्दरो बहराम । नहीं दारा रहा नहीं जिस्मजाम ॥
सब शहनशाह मर गये नाकाम । एगरीबे आजिज और दिलनाशाद ॥ऐ०
कहाँ भैरव गया कहाँ हनूमान् । कहाँ अरजुन व भीमसे बलवान् ॥
कहाँ हुकमा व दानये दौरान् । दिल शिकस्तः जिन्हैं खुदा दरयाद ॥ऐ०
कहाँ वे हैं जो परबतां तौलें । और फसाहतसे बोलियां बोलें ॥
कहाँ वे हैं जो रम्जको खोलें । कहा गढ़ लच्छू बाग है शद्वाद ॥ऐ०
नहीं जालिम रहा नहीं मजलूम । नहीं खुशबख्त और नहीं बदशूम ॥
नहीं बुलबुल रहा न ज़ाग और बूम । कहाँ हरनाकश और कहा पहलाद ॥
ऐ मेरे हिज्ज आ खबर लीजे । करम और फ़ज़ल अपना अब कीजे ॥
बखश मेरे गुनाहोंको दीजे । सुने आजिजका मेहरकर फरियाद ॥

ऐ फ़िरोतन तुम्हैं मुबारकबाद ।

मुखम्मस तर्जियाबन्द ।

आ गया यह, अजब ज़माना है । दुनियवी कुल कारखाना है ॥
अल्हे दुनिया वाहिदाना है । एक सा सबको कर दिया तूने ॥

मनुष्य मात्र के धर्म भारतीय मत

हाय कलियुग यह क्या किया तूने ॥

बापको मानता न बेटा है । माल मिलक न मुलक समेटा है ॥
सो न इन्सान् ोक घेटा है । दूरकी शरम और हया तूने ॥ हाय० ॥
गुरुको माने नहीं जो चेला है । साधु बिन फिरे अकेला है ॥
मतलब अपनेहीका ो भेला है । अपनी सूरतबना लियातूने ॥ हाय० ॥
कीचसे कीचको जो धोवैगा । साफ़ कपड़ा कभी न होवैगा ॥
करके मिहनत भी काम खोवैगा । दूरकर गुरु दिया मिया तूने ॥ हाय० ॥
गोशत खाते शराब पीते हैं । रोज़ो शब एशहीमें बीते हैं ॥
एक लमहा न हक़को चेतें हैं । भरे आबिदमें भी रेया तूने ॥ हाय० ॥
साधु गुरु सेवैगा तो पावे राह । नहीं तो जाने ऐन है चाह ॥
देख आजिज तबही तू क़िबले गाह । बदीके बीजको बोया तूने ॥

गज़ल—कुल सलातीन बन्दा इरमाँका । सब सअदात है हक़के फरमाँका ।
दिन बदिन भर गया इसीसे मगज़ । खायाकिरमानहशाहकिर माँका ॥
दायमुल्मर्ज लाहक़ आलम है । क्या खबर अपने अस्लदरमाँका ॥
जाने जिसको खुदा शफ़ी अपना । उसके पीछे खबर जोहरमाँका ॥
कौन आजिज तेरा खुदा व रसूल । किसको है भेद अस्ल उरफ़ाँका ॥

मुखम्मस तर्जियाबन्द ।

अहले दुनियाके, साधु घरजाये । भाव भक्तिकी बू नहीं पाये ॥
अकलो ईमान कालने खाये । देख यक दो ज़बान कर आये ॥

धर्म मरदा मू कान कर आये ॥

साधु जब दुनियवीके घरपर जा । उसको लाजिम है कहता बैठो आ ॥
जब नहीं खान पान खातिर पा । आक़बत उस गुमानकर आये ॥ धर्म० ॥
जब कि, साधूको देखै संसारी । उनसे नहि बोल बोलते प्यारी ॥
नहि तवाजा न इज़्ज़से यारी । गुनह इन सर अज़ान कर आये ॥ धर्म० ॥
धर्मकी बू जहाँ नहीं पाना । हरशिज इस दुनियबी न घर जाना ।
अन्न पानी न उनका फिर खाना । अमल ईमान चलान कर आये ॥ धर्म० ॥
यह हमेशा: से रस्म आया है । साधु सेवा सदा बताया है ॥
आजिज वह दङ्ग जहाँ न पाया है । देख वह दर ग़्लान कर आये ॥

धर्म मुरदा मू कान कर आये ।

झूलनासे निर्णय,

गजल ।

हुआ मगूरूर क्योंकर आन दिन चार । रहेगा तेरा शौकते शान दिन चार ॥
हुआ अन्धा ब मस्ती ऐश बइशरत । कमालो फ़ज़ल और बूहरहान दिनचार ॥
अकेला आया है जावै अकेला । मेरा और तेरा है घमसान दिनचार ॥
नहीं कोई रह फ़ना होवे गे लारेब । किसीका तो पकड़ दामान दिनचार ॥
पकड़ दामन तू साचे सद्गुरु आजिज । यह बे बीना न दस्तरखवान दिनचार ॥

गजल—जो कुछ कि, नजर आता है तेरे कुछ न रहेगा ।

महासूस ब मरगूब सगर धार बहैगा ॥

ताजो तख्त ब बख्त सो सब काल चक्करमें ।

फानी है ब मुरदार सभी कुछ चुछैगा ॥

भक्ति ब गरीबी है यही न्यामते दुनिया ।

सद्गुरुकी पनह आ नहिं तो काल आग डहैगा ॥

चौरासीकी योनिमें पडा बैठ ऊपर हो ।

यम जालिमकी इसमें बड़ी मार सहैगा ॥

आजिज होवें जो आजिज इस बहरके गरदाब ॥

बिन सद्गुरुके कौन तेरी बाँह गहैगा ॥

गजल ।

न सद्गुरु भक्ति जाना तूने अ सोस । न उसकी बात माना तूने अफ़सोस ॥

बहर जानिब वह कहता है ब आवाज़ । न अपना कान तानातूने अफ़सोस ॥

वह हर जानिब वह हर रूखसे पुकारें । न जाना मिहर बानातूने अ सोस ॥

भटक रह रास्तेसे फिरता किधरको । अमल बद मार खाना तूने अ सोस ॥

चला तू चाल है सद्गुरुके बर अक्स । किया सब कारखाना तूने अफ़सोस ॥

जो कहते २ ही आजिज थका वह । किया इस घर न थाना तूने अफ़सोस ॥

मुखम्मस तर्जिया बन्द ।

गुरुको भूलै खुदा तूझे भूले । जाके यमराज दर ऊपर झूलै ॥

गो कहूर बान तू कहूरबान वह । हा हो गये जाके आगमें पोखे ॥

गुरु मिहरबान तो मिहरबान वह । पाते न्यामत हैं लंगडे और लूले ॥

गुरुके वे मेहर दौलते ईमों गुरु । कत्ल करेको हाथियोँ होले ॥

गुरुकी पूजा बिना धर्म ईमान ॥

हो गया मुरदा इसमें शक मत जान ॥

योगियोंका मत

गुरु लखावे अलख सो हो पुर नूर । इसके दायासे पाप होये धूर ॥
गुरुकी भक्तिसे साफ़ ईमान है । सो करे मुश्किलात सारे दूर ॥
सो झुकावे कर्म जल अल्लाह । दीन दुनियांकी सख़ितयां कर चूर ॥
देने गुरु आँख होवे रोशन दिल । हेच मालूम होवे गिल्माँ हूर ॥

गुरुकी पूजा बिना धर्म ईमान ।

हो गया मुरदा इसमें शक मत जान ॥

शिष्य अपने गुरुकी पूजाकर । तनो मन धन सब उसके आगे धर ॥
और दरशन व उसकी कर ताज़ीम । गुरुकी पूजामें रखना अपना सर ॥
शिष्य पूजे हमेशः गुरु अपना । साधु सेवामें वह गुरु सर बर ॥
साधु सेवा करै दिलो जांसने । आजिज वह गुरु शिष्य पार उत्तर ॥
गुरुकी पूजा बिना धर्म ईमान । होगया मुरदा इसमें शक मत जान ॥

मुखम्मसतरजीया बन्द ।

बहर जानिब है खींच व तान किसपर । मती व तूय और खाक़ान किसपर ॥
न बाकी कुछ है फिर इरमान किसपर । लूस और जलवये सामान किसपर ॥

हुआ मगरूर ऐ नादान किसपर ॥१॥

यह जोरो शोर तेरा कब तलक है । जुल्म और जन्न घेरा कब तलक है ॥
कहो दुनियामें देरा कब तलक है । यह मन्तिक और तेरा बुरहानकि० हुआ ॥
तू आया किस लिये है इस जहां में । है सब सो झूठ जो आता बयों में ॥
वह सच तो छिप रहा परदः निहोंमें । नकारः और शौकत शानकिस० ॥ हुआ० ॥
कमाल और फ़जल तेरा सब है फ़ानी । रहे बाकी न कुछ नामें निशानी ॥
जमालो हुस्न न और हुकमरानी । कहां नाहक़ व हक़ पहिचान कि० हुआ० ॥
जिसे तू सच्च करके दिलमें जाना । सरासर झूठ सौ बुतलान माना ॥
हुआ तू किस लिये उसपर दिवाना । न अस्लन कुछ मुड़क और मानकि० हु० ॥
जिसे तू जानता है दोस्त अपना । सो दुशमन हैं तेरे न६हक़ न खपना ॥
सो दिन दस पांचमें लेजाना सुपना । न कोई तेरा है तू ग़लतान कि० हुआ० ॥
न तू रहेगा न यह पिंजरा रहैगा । मुहासिब खबरू जा क्या कहैगा ॥
यह सब सामान दरियामें बहेगा । है रैय्यत कौन तू सुलतान कि० हुआ० ॥
नहीं राजा नहीं कोई रय्यत । यह आलम कुल है यहम काल बैय्यत ॥
न बरदार सब मुरदार मैय्यत । यह दुनिया दौलतो दीवान किसपर । हु० ॥
जिसे अपना तू जाने वह बेगानः । न तू पहिचानता अपना येगानः ॥
बयां करता है आजिज शाहदानः । हुआ नाहक़ तू सरग़रदान किसपर ॥
हुआ मगरूर ऐ नादान किसपर ॥

भोगी योगीकी समता आधार चक्र भेद, स्वाधिष्ठान चक्र भेद, मणिपूरक चक्र भेद, अनाहत चक्र भेद विशुद्ध चक्र भेद,

मुरब्बा ।

जिससे यह सब बदबू हुई तू होशकर तू होशकर ।
पहिचान सो बदबू हुई तू होशकर तू होशकर ॥
शहबत व लज्जत जो हुई तू होशकर तू होशकर ।
तेरी वासना जोरू हुई तू होशकर तू होशकर ॥
दुश्मनसे अपने प्यारके तू दूर अपना यारकी ।
पुर जहर जो क्रातिल तेरा महबूब खुद वहमारकी ॥
काटै तुझे मुरदा करे राह दिखावे नारकी ।
तेरी वासना जोरू हुई तू होशकर तू होशकर ॥
सीना लगाये वासना फिर जिन्दगीकी आशना ।
गम अलम घर घेर है रोना सदा न हासना ॥
यह खालिया सांपिन तुझे मुरशिद मेहरबां पासना ।
तेरी वासना जोरू हुई तू होशकर तू होशकर ॥
लड़ता तू अपने अक्ससे बाहोश या मजनू हुआ ।
खफ़क़ान तुझको होगया दिल सर बसर पुर खूँ हुआ ॥
तू कौन था और क्या हुआ पहिले अलि फिर नूँ हुआ ।
तेरी वासना जोरू हुई तू होशकर तू होशकर ॥
जोरूको अपने छोड़दे रिश्ते मुहब्बत तोड़दे ।
शहवात जिस्मानी चुने लज्जात दरिया रोड़दे ॥
आजिज न रख माशूक हो सब भर्मभांडा फोड़दे ।
तेरी वासना जोरू हुई तू होशकर तू होशकर ॥

मुसद्दस ।

बलखका शहनशाह था बे नजीर । थे जिस ताबे सदहा अमीर और वजीर ॥
जिसे ऐशो इशरत हुई दिल पजीर । किया इब्राहीम तर्क ताजो सरीर ॥
खदम खाक सो हो गया जिन्दा पीर । उगा दिलमें जिस इल्मका आप्ताब ॥
सो देखै मुल्क माल नकश बर आब । तूही अर्श मक्का तूही है किताब ॥

जुलूसे शहाँ साजो सामान था । जोयां दब दबः शौकतो शान था ॥
वह मारूफ दिल्लीका सुलतान था । धर्म मूरत साहब ईमान था ॥
मती सांचे सद्गुरुके फर्मान था । लिया जान दुनिया खयालो खवाब ॥
चरण धोये पिये सिकन्दर शिताब । तू ही अर्श मक्का तू ही है किताब ॥

अग्निचक्र अष्टसिद्धि, नवनिधि

खजाना जिसे लशकरो फील थे । शरीयत मुहम्मद बतामील थे ॥
खुदा तरसीमें जो यह तावील थे । मुकम्मिल न इसके ब तकमील थे ॥
बईमाने इस लाम तहलील थे । मगह मुल्क था बिजलीखां वह नवाब ॥
झुका सिजदे सत्गुरु ब आली जनाब । तूही अर्श मक्का तूही है किताब ॥
कैंते राजा महाराजा शाहनशाह । हुये बे अदद क्या करूं मैं बयों ॥
बुजुरगी है जिनकी ब हरदो जहां । नमूना थे नेकी यहां और वहाँ ॥
जो मुरशिद हकीकां हुआ मेहरबाँ । दिखारया उन्हें जल्द तर घर बहाब ॥
न आजिज पड़े फेर खिलकत खलाब । तूही अर्श मक्का तूही है किताब ॥
गजल—पढ़ गया सद किताब ऐ तोता । नहीं जानै जनाब ऐ तोता ॥
शीरीं गुप्तार और बलागतसे । पढ़ गया दर खलाब ऐ तोता ॥
दाम दाना बखेर है सैयाद । आपही दर हिजाब ऐ तोता ॥
अब तू आकर फँसा किससमें तू । खावे सदपेचो ताब ऐ तोता ॥
जाने इसरार यारसे आजिज । खोल वह जब नकाब ऐ तोता ॥

तर्जीय बन्द ।

कहीं भैरव पूजे कहीं हनुमान । कोई ठाकुरकी मूर्ति धर ध्यान ॥
कोई शिव लिङ्ग प्रेमसे पूजे । कहीं दफ्तर खुला है ब्रह्म ज्ञान ॥
कहीं रोजा निमाज बाँगजनी । कहीं कालीके दर पै है बलिदान ॥
हर तरफ कालकी खुली हडी । होश कर लुट गई तेरी घड़ी ॥
कोई गिरजा हरममें जाता है । पन्दो तालीमको बताता है ॥
बेखबर और की खबर देवै । धर्मकी धूलको उडाता है ॥
अन्धकने अन्धकर दिये आलम । वेद बाणी बहुत सुनाता है ॥
हर तरफ कालकी खुली हिस्ट्री । होश कर लुट गई तेरी घड़ी ॥
कोई पैरो हुआ कोई पीर । कोई नाजी हुआ कोई है असीर ॥
कोई दाना हुआ कोई नादा । कोई दिलबर हुआ कोई दिलगीर ॥
कोई नेक और कोई बद किरदार । कोई आजिज है साधू कोई ॥
हर तरफ कालकी खुली हडी । होश कर लुट गई तेरी घड़ी ॥

गजल ।

तुझे हक क्या खबर ऐ बैल तेली । फिरो दिन रात घर ऐ बैल तेली ॥
मशककतो मिहनत कर खा खली भूस ॥
मशककतो मिहनत कर खा खली भूस । उसीसे पेट भर ऐ बैल तेली ॥
खलीभूस खाके जबहो मस्त बैठ । कहाँ दरगाह दर ऐ बैल तेली ॥

भोगियोंका चक्र भेद, समन्वय

सिरिफ तू पेटकी खातिर है जुता । हुआ जेरो जबर ऐ बैल तेली ॥
कि जिसीने पेटमें यह पेट पाला । जरा इस रुख निगर ऐ बैल तेली ॥
कि जिसने शीर मादरको बनाया । कुछ उसका ध्यान धर ऐ बैल तेली ॥
खली खाना व दायम कैद रहना । यह तुझको खूब तर ऐ बैल तेली ॥
लगा शौतान तेरे कान दिन रात । हुआ कर बैल व खर ऐ बैल तेली ॥
नसा यह साधु गुरुको तू न मानै । परे हो कर तू मर ऐ बैल तेली ॥
अगर जज्जाल दुनिया छोड़ भागै । चरागह घास चर ऐ बैल तेली ॥
जो फिरते फिरते आदम घरमें आया । हुआ शबसे सेहर ऐ बैल तेली ॥
इस आजिज वाज सुन उठ जागगा फिल । चला खाब व खमसः ऐ बैल तेली ॥

इस दुनियाके कोई काम सच्च नहीं हैं ।
मृत लोक नरक स्वर्ग धाम सच्च नहीं हैं ॥
यह तीन लोक झूठ बाजीगरका तभाशा ।
ब्रह्मा व ईश वाम सच्च नहीं हैं ॥
यह सारा संसार सब झूठ पसारा ।
यमकाल और जज्जाल दाम सच्च नहीं हैं ॥
नेकी बदी व स्वर्ग नर्क दोनों कहाते ।
और नाद बिन्द हाड चाम सच्च नहीं हैं ॥
सब खांदे ना खांदे हुकमा जमानःके ।
दुनियामें कोई पुस्ता खाम सच्च नहीं हैं ॥
यह गरदू गरदाने और चन्द सितारे ॥
दिन रात वक्त सुबह शाम सच्च नहीं हैं ॥
पैदाइशो बक्का फना सो सारे मिस्ल खाब ।
कोई आजिज माया पर नाम सच्च नहीं हैं ॥

केती जबानै सीखलीं तोता व मंना खूब है ।
लोगोंको मुतहैयर करै बोलै बोल अजूब है ॥
पिजरेमें उसको बन्दकर गुफ्तारसे आनन्द कर ।
इस कैदको दह चन्दकर दुनियाका सो महबूब है ॥
बोलै जो शीरीं बोल सो ले लोगका दिल मोलसो ।
सुननेको आवैं गोलसो हर एकके वह मरगूब है ॥
इल्मों फ़नू सब सीख लिया यमराजको खुद सिर दिया ।

कबीर पन्थका जैनमत निरूपण

नहिं रब्त् सत्सङ्गृत किबा दरियायमें सो डूब है ॥
आजिज यह सब तू छोड दे दुनियासे रिश्तः तोड दे ।
बाग अपनी इनसे मोड दे आशिकको यह मायूब है ॥

उडकर न पार होगा तीतर बटेर भरें ।
आखिर शिकार होगा तीतर बटेर भरें ॥
कुछ सोच फिक् करले तू देख पार परले ।
दिल कब क्रारर होगा तीतर बटेर भरें ॥
आकाश उडके जावे वहां से पकड गिरावे ।
फिर सर ब दार होगा तीतर बटेर भरें ॥
बदबूय सारे आवे वह गुल कहां तु पावै ।
हर जामें खार होगा तीतर बटेर भरें ॥
जहां जाय सब बेगानः नहिं दोस्त और येगानः ।
नहिं विल फिगार होगा तीतर बटेर भरें ॥
आजिजकी गुफ्तगू सुनकर सीख लेवे वह गुण ।
नहिं सङ्गसारोंका तीतर बटेर भरें ॥

जगतके जीव राम क्या जानें । करना क्या है सो काम क्या जानें ॥
घास चरना व बोल हैवानी । भेड बकरा सलाम क्या जानें ॥
दबदबः दिले दिमागो दौलतो जाह । औज शाहां गुलाम क्या जानें ॥
गंदें गुफ्तार सुन हुये गन्दे । पाक साहब कलाम क्या जानें ॥
कैल फर्जन्द आम्बिया सिद्ध साधु । सत साहब पयाम क्या जानें ॥
काल बखशिशमें सब हुये मदहोश । अकबर २ इनाम क्या जानें ॥
जिन कोसिरमें है अकल हैवानी । जिन्दगी इन्तिजाम क्या जानें ॥
जो जमीनके हैं बुजदिलो गेदी । कद्र दारुलमुहाम क्या जानें ॥
झूठमें जगत लग रहा सारा । वस्फु सो सत्य नाम क्या जानें ॥
साधुका भेद कोई जाने साधु । विष्णु ब्रह्मा व बास क्या जानें ॥
दुनियवी आदमी हैं सब अन्धे । काल जज्जाल दाम क्या जानें ॥
अकल और नकल पीरो कुल आलम । अस्लको अकलखाम क्या जानें ॥
जोहरी कोई जान जोहर जो । बे बहा अजदहाम क्या जानें ॥
जिन्दगी बखश गोश नोशिन्दः । कौन साकी व जाम क्या जानें ॥
घर बघर देखिये खोरिश हैवों । कौन इन्सों तआम क्या जानें ॥

है करोड़ोंमें कोई रहबर एक । दुनिबवी खासोआम क्या जानें ॥
कहाँ आये कहाँको है जाना । अल्हे दुनिया मुकाम क्या जानें ॥
कौनसी राह चढ़ चलें किसपर । अस्प सो तेज गाम क्या जानें ॥
सन्त बतलावें जानै आजिज्ज सो । हिन्दियां हाड़चाम क्या जानें ॥

साखी कबीर साहबकी ।

सन्त जगतमें भगत हैं सन्त रामके पूत ।

सन्त न होते जगतमें तो राम जावता ऊत ॥

गजल—तेरा शीरीं कलाम ऐ तूती । हुई सैद बदाम ऐ तूती ॥
पिजरेसे तू छूट जाये किधर । कर जो तू सद सलाम ऐ तूती ॥
उड़ जिधर जावे तो पकड़ लावें । हो गई अब गुलाम ऐ तूती ॥
मीठी बोलोंसे आ तुझे घेरें । गर्द तुझ अजदहाम ऐ तूती ॥
अब तू सैयाद के हाथ पड़े । होवै एक दिन तआम ऐ तूती ॥
कर दिया है तुझे हब्स दायम । यह तेरी अकल खाम ऐ तूती ॥
गर करे बात बावर आजिज्ज की । जाप कर सत्य नाम ऐ तूती ॥

तू बात को न माना खुद अकिल पर दिवानः ।

शैतान वरगलाना कर काम मुर्ग बिस्मिल ॥

बे रहम काजी मुल्ला तू आन इनमें भूला ।

तुझको चढावै चूलहा कर कान मुर्ग बिस्मिल ॥

हर तरफ हैं कसाई इनसे न कुछ बसाई ।

तुझे घर की न रसाई कर कान मुर्ग बिस्मिल ॥

आजिज्ज को बात मानो उसी मेहरबानको जानो ।

मत बात अपनी ठानो कर कान मुर्ग बिस्मिल ॥

तू भार से लदा है खुद यारसे जुदा है ।

तेरा न हक अदा है क्या चीखता है गदहा ॥

कूड़ा कबाड़ खावें तो भी न होश आवें ।

वेददं हो लदावें क्या चीखता हैं गदहा ॥

दिनरात मार खाना उसही गलीमें जाना ॥

यह सब तेरे बिगानः क्या चीखता हैं गदहा ॥

धोबी कुम्हार लादा कहाँ तेरा बाप दादा ।

कहाँ मान और मर्यादा क्या चीखता है गदहा ॥

कर मीत से भित्ताई तदबीर यह बताई ॥
आजिज तुझे जताई क्या चीखता है गदहा ॥

पहिचान ले कसाई फिर नहीं गला कटाई ।
पञ्जे न उसके आई कर होश भेड़ बकरी ॥
गल कट्ट है जो तेरा इस घर किया है देरा ।
सुन व आज पन्द मेरा कर होश भेड़ बकरी ॥
पहिले न कहना माना हङ्कार दिलमें आना ।
खुद अकिल पर दिवानः कर होश भेड़ बकरी ॥
अब तो गला कटैगा क्रस्साब क्यों हठैगा ।
खुद ठाठ सो ठटैगा कर होश भेड़ बकरी ॥
आजिज खड़ा पुकारा तुम में जो हो कड़ारा ।
ले जो पुनह सहारा कर होश भेड़ बकरी ॥

अपनी जमाअत जोड़ै रिश्ता न जब तोड़ै ।
हरगिज न काल छोड़ै सुन बात ढक मकोड़े ॥
लशकर हजारहा है न शुमार कुछ कहा है ।
हरगिज न कोई हटावै आफ़ात ढक मकोड़े ॥
दौलत जखीरा सब है तेरी न रख वह रब है ।
जा ऐश और तरब है सदमात ढक मकोड़े ॥
क्यों ? जोड़ता जखीरा खूब यह वतीरा ।
आकर तुझे ले तौड़ें घर लात ढक मकोड़े ॥
पांवों तले तू पिस्ता तौ भी न तुझे दिस्ता ।
आकर तुझे ले तौड़ें घर लात ढक मकोड़े ॥
पांवों तले तू पिस्ता तौ भी न तुझे दिस्ता ।
आजिज की व आज सुन ले यह घात ढक मकोड़े ॥

बकरीका ग़ज़ल ।

सौ बार सिर कटाया तौ भी न होश आया ।
इस बार चेत भाई तू राम बोल बकरी ॥
अब तेरी क्या खता है क्यों तेरा शिर कटा है ।
तू घास फूस खाये तो राम बोल बकरी ॥
तुझपर जो जुल्म कर है, हकसे न उसको डर है ।

मूसा धर्म

सुनै वह तेरी दुहाई तू राम बोल बकरी ॥
क्रातिल तुझे जो काटै और मांस तेरी बाटै ।
सब हो तेरी सुनाई तू राम बोल बकरी ॥
बदला कभी न छूटे धर २ के काल कूटै ।
वह दाद गर कहाये तू राम बोल बकरी ॥
सो सबसे है सयाना आजिज वह मिहरवाना ।
मुन्सिफ़ है बे अददाई तू राम बोल बकरी ॥

हाथीका शब्दल ।

ऊँचा जो सिर उठाया, नीचे तुझे बैठया ।
आंकुसकी मार खाया, सुन कान देके हाथी ॥
गुरुको न सिर झुकाया, ऊपरको सिर टिकाया ।
झुकना मुहाल आया, सुन कान देके हाथी ॥
गुरु संतको झुकता, ऊपर न सिर तो रकता ॥
दुख द्रन्द होय मुक्ता, सुन कान देके हाथी ॥
संधे अतर लेला, दिन रात रंग मेला ।
हौ बेकरार डोला, सुन कान देके हाथी ।
तेरी नाक सो बढ़ाया, इसके वसीले खाया ।
आजिज तुझे बनाया सुन कान देके हाथी ॥

गुरुमहात्म्यका शब्दल ।

तीरथ हजार जाओ पुष्कर गया नहाओ ।
तीरथ न ऐसी पाओ, सद गंग गुरु चरणमें ॥
तीरथ न और ऐसी, गुरु सेव जगमें जैसी ।
क्या क्या कहूँ मैं कैसी, सतसङ्ग गुरु चरणमें ॥
गुरु सेव हरिको पावे, सब युक्ति मुक्ति हाथ आवे ।
राह रास्तको दिखावे, गुण ढंग गुरु चरणमें ॥
गुरु बिन न हरिको मेला, सो पन्थ है दुहेला ।
फिर क्या करेगा चेला, सरहंग गुरु चरणमें ॥
गुरु पूजले तू अपना, जगत जात सबना ।
नाहकके मन खपना, सब रंग गुरु चरणनमें ॥

दौलत दुनियाका शब्दल ।

जीव अन्ध कर दिया है, जम बन्ध कर दिया ।
सब फन्द कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥

ईसाई धर्म

दौलत जहाँ पर जावे, अन्धा उसे बनावे ।
दुख दन्दः कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
इसको जा छोड़ भागे, तब राम रंग लागे ।
दिल गन्द कर दिया है, मह दौलत और दुनिया ॥
दौलत करे जो घेरा, वहाँ होवे तेरा मेरा ।
जम बन्द कर दिया है, मह दौलत और दुनिया ॥
इससे है देहका सुख, जाय तो हो दिगर दुख ।
दह चन्द्र कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
यह भगतीको नसावे, फिर नरकमें बसावे ।
बुद्धि मन्द कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
दुनियासे कार दुनियाङ्क आज़िज और न गहना ॥
फर फन्द कर दिया है, यह दौलतो दुनिया ॥

तरजीअ बन्द ।

सब जाय खुद खुदाय, और नहीं है ।
नहीं ढूँढ़े उसे पाय, हर पूर नहीं है ॥
तदबीर करो लाख, वहाँ दौर नहीं है ।
वह दौरमें शीशः बिल्लौर नहीं है ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ १ ॥
अन्धे बचार चश्म, साधु निन्दक चेत ।
सो दोज़खमें जाय, खाँय गीते केते ॥
जब्बार धरमराय, पकड़ लेखा लेते ॥
हैबान बशकल नर, जो फ़िक्र गौर नहीं कीते ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ २ ॥
साहबको देख बेशक, है वह साधु जंगलमें ।
इस अस्लको ढूँढ़, देख जाय नकलमें ॥
पहचानता तू नहिं, न आवे तेरी अकलमें ।
न इल्म है इनसानकी, यह तौर नहीं है ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ ३ ॥
साधु साहब हैं एक फ़र्क नहीं है ।
हर जा में वही गर्ब और शर्क नहीं है ॥
इस वृक्षमें फल फूल, कोई नूर नहीं है ।
बिन साधु गुरु ज्ञानी, ध्यान गर्क नहीं है ॥

साधुके निन्दकको कहीं ठौर नहीं है ॥ ४ ॥
साधुकी निन्दासे धरम करम नाश हो ।
साधुकी निन्दा से घोर नरक बास हो ॥
साधुकी निन्दा न मिहर रब्ब की आस हो ॥
साधुकी मिहर, आजिज, जम जौर नहीं है ॥
साधुके निन्दक को कहीं ठौर नहीं है ॥ ५ ॥

मुरब्बा भौरा ।

पिया परदेस क्या भौरा भयोरी ।
तु गाफिल होके सोई क्यों है बारी ॥
तु हरदम ताक बैठी अपनी पूरी ।
तु सतगुरुसे न क्यों करती चिरौरी ॥ १ ॥
कोई पायक पिया की खबर दे ।
विरहिनि जिसके बदले अपना सिरदे ॥
मेरी प्रीतमकी पाती आन धरदे ॥
तु सतगुरुसे क्यों न करती चिरौरी ॥ २ ॥
कोई मोहि प्राण प्यारेसे मिला दो ।
कि मुझ मुर्दा विरिहिनीको जिला दो ॥
जो गुल कुम्हालाया है सो फिर खिला दो ।
तु सतगुरुसे न करती क्यों चिरौरी ॥ ३ ॥
उसी सतगुरुकी सब कुदरत जहाँमें ।
वही हाजिरो दंरपरदः निहॉयें ॥
वही देखते जमीन् और आस्मोंमें ।
तु सतगुरुसे न क्यों करती चिरौरी ॥ ४ ॥
मेरे साहब, मैं तेरे पायलागी ।
तेरी कृपासे मेरी भाग जागी ॥
तेरेही मिहर आजिज हो सुभागी ।
तु सतगुरुसे क्यों न करती चिरौरी ॥ ५ ॥

तरजीयबन्द खम्सः कौआ ।

होके नाकारा तो पड़ते भूलौआ । दवें आराम हाड़ और चाम चौआ ॥
बनावे बात क्या वक़्ते चलौआ । अमरफल छोड़कर क्यों हो कोह कौआ ॥
तुझे हरिनामसे क्या काम कौआ ॥

पढ़ाकर वेद और काँकौ किया कर । खोरिशे नापाक खा करके जिया कर॥
कुतुब ख्वानीसे अपना दिलदिया कर । किधर आदम गया है और हौआ॥ तुझे
कि जिसने तुझको यह पोशिश दिया । न उस फर्माबरी कोशिश किया है ॥
तेरी खोरिश और आदत सब छिया है । कहेगा क्या जब आवे बुलौआ ॥ तुझे
सीखा तूने जो हुशियारी जहाँकी । खबर तुझको न इसरारे निहाँकी ॥
न परवाह तुझको आजिजके ब्यौकी । पड़े सिरके ऊपर तेरे ो पौआ॥ तुझे०

तरजिअ बन्द खम्साः (गुरुसेवा) ।

बना आदमका पुतला आवे वतीसे । खबर क्या इसको है नफते आपसीसे ॥
यह घेरा चार सू शैताने लयोसे । निगहकर अपनी इल्ममें दूरबीसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु । खिदमत यकीसे ॥

पयम्बरपीर सदहा जो गुजरते । ऋषि मुनि ओलिया सब कहते मरते ॥
न गलती अपनी पर जो ध्यान धरते । खबर जिनको न बिलकुल कालकी से ॥

हैं सब नेअमत गुरु । खिदमत यकीसे ॥

हरीसे मप्स हैं बे इल्मानी । न इनको कुछ खबर घर जावेदानी ॥
हुई उनपर न मुशिद मिहरबानी । उठाले हाथ तू दुनिया वदीसे ॥

हैं सब ने अमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

खबर नहीं जो खबर दारान आलिम । कहाँसे है नुमाँया नफत जालिम ॥
जो पैदा जग बचा कोई न सालिम । खबर तू पूछ अज्ज गोशेः गुजीसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

कोई दिलगीर दिलबरकी खबर दे । कि जिसके बदले आशिक अपना सिरदे ॥
हैं जिनसे बात होती है न परदे । खबरको पूछले खातिर हजीसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

न जाने भेद जो बातें बनाते । न भूले साधु लुच्चोंके भुलाते ॥
न आशिक कान उनके रख लगाते । तुझे क्या काम कोई नुकतः चीसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

तू अपने रङ्गमें रंगा सदा रह । जगतसे पीठरु खुदबा खुदा रह ॥
फिराके यारके गमसे लदारह । तुझे क्या काम आजिजई व आँसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

गञ्जल (चींटी) ।

ज्वलीरा क्या जमा करती है चिउँटी । तु किसके वासते धरती है चिउँटी ॥
नहीं जब तू ज्वलीरा यह कहाँ है । बिला गाहकमें क्यों मरती है चिउँटी ॥

विशेष कथन

न यह घर है तेरा घरकी न तू है । तो फिर घर किसलिये भरती है चिउँटी ॥
जब यक दिन आनकर तुझको लताडें । न तू उस रोजको डरती है चिउँटी ॥
सिखाया तूने यक दिन शह सुलेमों । आजिज बात रख रखती है चिउँटी ॥

गजल (साथ)

जर सीमसेकी जो प्यार ऐ सोंप । है तेरा वह घर वह बार ऐ सोंप ॥
आकरके खजाना पर तू बैठा । यह तेरा था दिल फ़िगार ऐ सोंप ॥

जिस दिलवरसे दिल लगाये । उस जामे तेरा क्रार ऐ सोंप ॥

जर सीम जहाविरात महबूब । उनसेही तेरा था प्यार ऐ सोंप ॥

माशूकके घर तुझे बैठाला । मिल शौकसे अपना यार ऐ सोंप ॥

कर दूर दफ़ीनः से आजिज । पावेगा तू हक्क दीदार ऐ सोंप ॥

गजल—जगतके आदमी हैं डोंगर ढोर । धरम धरधरके मारे डोंगर ढोर ॥

शमअ परवानः आदमोन कोई । हिर्स हैवान प्यारे डोंगर ढोर ॥

काल काबूमें कोई नहीं इन्साँ । मंरते खपते बिचारे डोंगर ढोर ॥

है बरी आदमी सब दुख द्रन्द । हाय तोबः पुकारे डोंगर ढोर ॥

पहन इन्सान लवास आजिज । जान घरको हमारे डोंगर ढोर ॥

तरजिय बन्द खमसः ।

यह कुल मखलूक आतशमें जले हैं । जो मरहम हाथ हसरतसे मले हैं ॥

गुनः करनेमें हरगिज नहीं टले हैं । जो रोराँ संगपर उनको तले हैं ॥

क़लम बाहेसे हलवाहे भले हैं ॥

हरीसे दुनियवी हों ग़र्क दुनिया । गुरु और साधु जो बातें न सुनिया ॥

जो बोया तूने सोई तुझको लुभिया । न दुनिया आक़बत यमजीऊ छले हैं ॥ क०

जो सीखे होशियारी कुछ जहाँकी । कहाँ जाना था सोली रह कहाँ की ॥

न जाना भेद इसरारे निहाँकी । सो हराराते जमीं मआदिन रले हैं ॥ क०

लगे इस बाग़ सद्दा बेल व बूटे । दरखतां वे अदद हर जाय फूटे ॥

जो हो फ़लदार सो मालीसे टूटे । सो काटे जायेंगे जो न फले हैं ॥ क० ॥

सदाजो साधुगुरुको सर झुकाये । भजन सुमिरनसे अपना दिल लगाये ॥

दया दान और धरमकी राहबनाये । गुरु और संत फरमांसमे चले हैं । क० ।

हुये जो खाके मोटे मस्त मग़रूर । हमेशः साधु गुरुसे सो रहे दूर ॥

ज़र्क और बर्क पोशिश ताज सुमबूर । सोहों बलिदान मोटे ो पले हैं ॥ क० ॥

नहीं दिलमें जिनके रब्ब रहमान । न उनपर होवे हरगिज रहम सुवहान ॥

सोई आजिज पड़े चौरासीकी खान । न पावें राह सो मर मर गले हैं ॥

क़लम बाहेसे हलवाहे भले हैं ।

मुसलमानी धर्म

गजल ।

लगे सब स्वान इस मुर्दार दुनिया । न कोई इनसान मुर्दार दुनियाँ ॥
है कूकरो शूकरो खर सियार पियारी । सो सब हँवान इस मुर्दार दुनिया ॥
जो मुर्दार लगे सो सब हैं मुर्दः । न उनमें जान न इस मुर्दार दुनिया ॥
न ईसमें कोई मजहब है न मिल्लत । सो चारो खानि इस मुर्दार दुनिया ॥
नहीं यह जिन्दगीकी जा है आजिज । यह सब समसान इस मुर्दार दुनिया ॥

कुत्ताका गजल ।

तू घर बघर भूंकता फिरता है कुत्ते । न तू हर्गिज सन्न करता है कुत्ते ॥
दिया था दान और किया था खैरात । जो नंग और भूख से मरता है कुत्ते ॥
जो दुर दुर सब करे और भूखा मारे । कहीं तेरा उदर भरता है न कुत्ते ॥
दिया नहीं फिर पावे तू कैसे । इसी से भूख दुख भरता है कुत्ते ॥
अगर आजिज बचन सुन सन्न करतू । तो फिर क्यायों भूखसे डरता है कुत्ते ॥

तो गाओ गीत सबमिली कहो सुहागिन । जो पाया है अमरबराय सुहागिन ॥
तुम्हें हरिनामसे है काम बरनः । तू बैठ आरामसे घर ऐ सुहागिन ॥
तेरा मालिक निगह वान है । जबरदस्त तुझे कुछ अब नहीं डर ऐ सुहागिन ॥
तुझे हरदो जहाँमें खुशनसीबी । तु पाया अपना घर ऐ सुहागिन ॥
तु है जुग ग अटल तेरी सब औलादा । जमीमें और जमाँ भर ऐ सुहागिन ॥
अगर आजिज पिया का प्यार तुझको । तो यकमूदीदः दिलधर ऐ सुहागिन ॥

खसम जो मर गया है ऐ रॉड । तुझे सब दुखने घेरा है ऐ रॉड ॥
तू चक्की पीस खा दीवार परदे । जो अपने चर्खाको फेरा है ऐ रॉड ॥
तू मिहनत व मजदूरी किया कर । तुझे दिन रात झक झरा है ऐ रॉड ॥
तुझे कहाँ पलंग और कहाँ बिछौने । तुझे गमके कुए गेरा है ऐ रॉड ॥
अब आजिज कहना सुन हरिनाम जपना । तू टूटी झोपडी धरा है ऐ रॉड ॥
खसम तेरे बहुत हरफि कसबी । न हो हरगिज कभी तू साफ कसबी ॥
लदी तू सद गुनाहो से है दिन रात । पहेन दिन चार तू जर बाफ कसबी ॥

खोरिशों पोशिश हैं यह दो चार दिनको ।
हंसी और मसखरी और लाफ कसबी ॥
तेरा देरा हो दोजख आग में जब ।
न फिर हो जूर्म तेरा मुआ कसबी ॥
न आजिज व आज रख तू कान करती ।
कहेंगे तुझको लामो काफ कसबी ॥

किया करता है तू गट गू, समझा नहीं तू मजंमूं ।
दिन चारमें कहाँ तू, हरिध्यान कर कबूतर ॥
ऐसी गिरह जो मारी, ऊपरको ले उडारी ।
वह जा नहीं तुम्हारी कुछ कानकर कबूतर ॥
आकासमें चढ़ाया हम जिन्स में बढाया ।
नहीं इल्म वह पढाया, गिरी आनकर कबूतर ॥
अपनी दिखाके बाजी लोगोंको करता राजी ।
यक दिन पकड़ ले क्राजी क्या मान कर कबूतर ॥
आजिजकी बात सुनले और मनमें अपने गुणले ।
सत्तनाम सबमें चुनलें पहचान कर कबूतर ॥
सुन सतगुरुकी वैना और समझ उनकी सैना ।
दिन चारमें तु हैना, सत्तनाम बोल मैना ॥
सीखी जबाँ केती, थी अकल तुझमें जेती ।
अबतक पकी न खेती, सत नाम बोल मैना ॥
बोली अजब बोला, सर काल कर कलोल ।
तब जाब कौन टोला, सत नाम बोल मैना ॥
पढ़ पढ़ जबाँ खपना, माने बिगानः अपना ।
दिन दो तीन होवे सपना, सत नाम बोल मैना ॥
आजिज तू छोड़ पिंजर, और रिश्तः तोंड़ पिबर ।
फिर फिर न जोड़ पिंजर, सत नाम बोल मैना ॥

तू तन मन धन लगाकर अपना गुरुपूज । क्रदमपर सिर झुकाकर अपना गुरुपूज ॥
न गुरु बिन हरिको पावे तु हरगिज । तू उस फर्मा बजाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरुको मिहर पावेगा हरिको । सो साम्ना बनाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरुको छोड़ हरिको ढूँढ अहमक । जहां पावे बुलाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरु गोविन्दसे बढकर है बेशक । यही ईमान लाकर अपना गुरु पूज ॥
वचन कबीर साहबका यह आजिज । जहां होवे तू जाकर अपना गुरु पूज ॥
तु शमसे अपने रोयाकर विरिहिनी । मुंह आँसूसे तु धोया कर विरिहिनी ॥
उठें जब दर्द भारी तेरे अन्दर । कलेजा अपना टोयाकर विरिहिनी ॥
प्यारे बिन तेरा दुख कौन मेटे । तु अपनी जान खोयाकर विरिहिनी ॥
पपीहा ज्यों रटो अपना पिया पीय । मगुफ़लत ख़्वाब सोयाकर विरिहिनी ॥