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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

कहो है ? जब मनके वशमें पड़कर विवश हो कार्य करना पड़ता है, समस्त व्यवहार मनके अधीन रहा फिर स्वतंत्रता कहो रही । इस कारण स्वतंत्रताकी झूठी डींग मारनी मूर्खता नहीं तो और क्या है । मन पर विचार करनेसे सजीवका कार्य स्वतन्त्रताका, अभिमान तो मिथ्या हो चुका । अब तो केवल इतनी बातका उज्र रह गया कि, यदि मैं अपने कार्यमें स्वतन्त्र नहीं हूँ तो फिर मैं दोषी काहेको ठहराया जाता हूँ । इसका हेतु यह है कि, यह अपने आपको नहीं जानता इस कारण अपराधी होता है, जो अपने यथार्थ स्वरूपको जानले तब फिर कोई दोषी ठहराने वाला नहीं हो सकता । जबतक अपने यथार्थ स्वरूपको न जानले तबतक अवश्यही दोषी रहकर बन्धनमें पड़ा रहेगा । जब अपनेको पहचान लेगा तब फिर कहने सुननेका स्थान न रह जावेगा । अपने यथार्थस्वरूपके प्राप्त करनेकी यही युक्ति है कि, सच्चे साधु और सद्गुरुकी सेवा करे, बिना इसके कदापि छुटकारा न होगा । दिन दिन बन्धन अधिक होता जावेगा । सच्चे साधु गुरुकी सेवा समस्त कठिनाइयोंको सरलकर ज्ञानके कपाटको खोल देती है ।

जो मनकी गति और स्थितिसे अनभिज्ञ हैं वे अचेत कीडेमकोडेके बराबर हैं बड़े बड़े ऋषीश्वर करोड़ों वर्ष तप करके भी इस मनका दमन न कर सके किन्तु इस मनने सबके ऊपर अधिकार करके उनकी तपस्याको नष्ट कर दिया । तीनों लोकोंमें ऐसा कोई नहीं है जो इस मनपर विजय प्राप्त करसके, जब बड़े बड़े सिद्धोंकी भी वो चटनी कर गया तो दूसरे किसकी शक्ति है जो इसका सामना कर सके, मन मायाकी चक्की चल रही है सारे जीव इसीमें पीसे जाते हैं । सब देवता इसीके गुलाम हैं । यह सारे संसारका सर्व शक्तिमान् अधिकारी है, यह सारे संसारमें व्याप रहा है इसी कारण इसे कई सुयोग्य व्यक्ति महत्त्व कहकर भी स्मरण करते हैं, इसके बलका कोई ठिकाना नहीं है ॥

हृदयकी व्याख्या

सीनेके भीतर कमलकोश जैसा नीचेकी ओर मुख करके लटका हुआ हृदय कमल है मन इसीमें विराजा करता है इस कारण मनको भी हृदय कहते हैं । "हृ धातुसे कयन् प्रत्यय तथा दुक्" का आगम होकर उक्त शब्द बनता है इन्द्रियाँ, विषयसंबन्ध इसीकी प्रेरणासे करती हैं, यह इन्द्रियोंसे विषय तक भी पहुँचता है, जीव इसीमें रहता है, परमात्माका भी निवास इसीमें है, जिसके लिये कबीर साहिबने भी कहा है, कि—“खोज दिल बीच जहाँ वसत हक्का” इन कारणोंसे यह हृदय कहलाता है, इसीने सबको भुला रखा है, संसारमें यह बड़ा दुर्दन्त वैरी है, जीव अपने त्राणका उपाय करता हुआ भी इसके वशमें

आजाता है। गुरुआ लोग मिलते हैं वे भी हृदयके आधरे ही होते हैं उनसे भी यही दशा होती है कि—

साखी—जानंता पूछी नहीं, पूछि किया नहिं गौन।

अन्धेको अन्धा मिला, राह बतावे कौन ॥

गजल—पुर जह्न सर तापाय है उस सौपनीका सौप है।

खालिक है लोक और वेदका सब भेद मख्जन आप है ॥

बरतर यही शौतान है विष्णु यही भगवान है।

पीर और पैगम्बर औलिया सिद्ध साधुका यह जाप है ॥

ऋषि मुनि इसीकी बगलमें भूले सब उसकी दगलमें।

दोनों करम उसके धरम कहीं पुण्य और कहीं पाप है ॥

नेकी बदी यह कर जुदी जाँदार पर दोनों लदी।

दोजख विहिश्त एराफ़में सब तौल और सब माप है ॥

इस सौपके दो दौत हैं माया व ब्रह्म दो भाँत हैं।

काटा है सब मुरदा हुये घेरे जो तो तीनों ताप हैं ॥

आलमको यह अजदर लड़े आजिज कदम सतगुरु पड़े।

आदम बेचारा क्या करे चारा यही एक थाप हैं ॥

यह गजल भी मनकी कल्पनाओंका ही खोंका खींचता है कि, जो कुछ है सो यह है, यह भवसागर एक अगम्य समुद्र है वेग पूर्वक इसकी लहरें बह रही हैं। सब जीव उसीमें बहे जाते हैं। कोई भी जीव ठौर ठिकानेपर नहीं पहुँच सकता। सब इसीमें पड़े गीते खा रहे हैं। कोई सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि, पीर पैगम्बर, सत्यपुरुषकी सहायता बिना कदापि नहीं निकल सकता। यह मन इस समुद्रमें मस्त होकर मौज मारता फिरता है, किसीके रोकनेसे नहीं रुकता। यह मन भवसागर है और भवसागरही मन है, समस्त संसारमें इसीकी पूजा हो रही है। जिसको पूर्ण पारख प्राप्त हो वह इस मनके भेदको जाने। जितने औलिया, अम्बिया ऋषि, मुनि हो गये, तथा अब हैं और होते हैं सबमें थोड़ा बहुत ज्ञानका प्रकाश रहता है। परन्तु ऐसा प्रकाश किसीमें न हुआ कि, सब भेदको जाने। कितने ऐसे पैगम्बर हुए कि, जो केवल आकाश वाणीसे जानते और उसीके अनुसार चलते थे। इसका तो उनको तनिक भी ज्ञान नहीं था कि, यह आकाशवाणी स्वयम् जगदीश्वरकी ओरसे है अथवा भूत पिशाचकी ओरसे है। भाँति भाँतिकी कामनाओंमें फँसकर परमेश्वरसे प्रार्थना करते थे और उनकी इच्छानुसार आकाशवाणी होती थी। उस आकाशवाणीको वे परमेश्वर-

शिवनारायण दासजी

की ओरसे जानते थे । सुतरों मने एक पुस्तक “तिब्ब बनवी” में लिखा हुआ देखा था । वह उदाहरण में यहाँ लिखता हूँ कि—बलूचिस्तानका एक नबी था, वह नपुंसक हो गया था तब खुदासे प्रार्थना की कि, प्रभु मुझे पुरुषत्व प्रदान कर; जिससे मैं अपनी स्त्रीको प्रसन्न कर सकूँ । तब आकाशवाणी हुई कि, बाजीकरणके लिये खूब माँस खाया करो, वह पैगम्बर उसको खुदाका कलाम समझकर उसीके अनुसार करने लगा । जैसी हृदयकी इच्छा होती है वैसीही आकाशवाणी बोलती है । जिसको परमेश्वरकी तनिक भी पहचान नहीं हुई उसके लिये परमेश्वरी वाणी नहीं हो सकती, वो किसी ऐसे ही प्राणीकी हो सकती है इस प्रकार समस्त पीर पैगम्बरोंने धोखा खाया । सत्य और झूठको बिना बूझे योंही पापमें फँसे ।

ऊपर कहे हुए तात्पर्यको एक गजलमें कहते हैं—

बनी आदमको क्या उसकी खबर है । खुदा है याकि शेर इनसान दर है ॥
फिकिर और सोच है दिलमें न उसको । गुनहमें दिन बदिन यह तरबतर है ॥
खुदासे है सदा यह आसमानी । मालिक जिन वो परी या कोई नर है ॥
है वे गुरुज्ञान जाहिल आदमी यह । वही दाना जिसे हककी खबर है ॥
जिसे झूठ सचकी हो न पहचान । वही हैवान मुतलक सरबसर है ॥
मकहर कर दिया दिल आईन को । यह नफसानी हवस जुलमात घर है ।
तअस्सुवमें फँसे इनसान सारे । न तालीम और तलकीन कारगर है ॥
हमारा पेशवा मजहब बड़ा है । कहे सब ख्वाव गफलतका खुमर है ॥
पसन्दीदा न हो राहरास्त इसके । यह बद अमलोंका अपने सब समर है ॥
ज़हरको जिन्दगी दारूय जाने । हयाते—आब कह कातिल ज़हर है ॥
सभीको नाग मलकुलमौत काटे । तअस्सुब तार उसकी सब लहर है ॥
हकीकी यार पहचाने जो आजिज़ । वही सब आदमीमें बहरेवर है ॥

यह मन तीनलोकका परमेश्वर है । पिण्ड और ब्रह्माण्ड दोनोंपर यह अधिकृत और शासक है । यह मन काल पुरुष और विराट्रूप है । सब जीवधारी इसके आधीन हैं । यह कदापि किसीके वशमें नहीं आता, न कोई इसको अपने आधीनही कर सकता है । जो कोई इसको आधीन किया चाहता है, पहले उसीको धोका देकर यह मार लेता है । बड़े बड़े ऋषि मुनि और तपस्वियोंको इसने मार लिया पर यह कभी किसीके वशमें नहीं आया । जब यह मरता है तब ही ज्ञानका प्रकाश होता है, बिना इसके मरे नहीं होता; इसी कारण कबीर साहिबने लिखा है कि—

पापदास, राधास्वामी मतका सार,

कबीर साहबकी साखी मनको अङ्क ।
कबीर-मनके म'ते न चालिये, छोड़ि जीवकी वान^१^ ।
कत'वारीके तार ज्यों, उलट अपौठा^२^ ठान ॥
कबीर-चिन्ता चित्त बिसारिये, फिर बुझिये नहिं कोय ।
इन्द्रा^३^पसर निवारिये, सहज मिलेगा सोय ॥
कबीर-हिरदे भीतर आरसी, मुंह देखा नहिं जाय ।
मुखतो तबही देखि है, जो दिलकी दुविधा जाय ॥
कबीर-मन गोरख मन गोविन्दा, मनही औघड होय ।
जो मन राखे जतन करि, तो आपै करता सोय ॥
कबीर-जो मन गाफिल हुआ, तो सुमिरन लागे नाहिं ॥
धनी सहेगा शास^४^ना, यमके दरगह माहिं ॥
कबीर-कोट करम पल में कटे, यह मन विषया स्वाद ।
सद्गुरु शब्द माना नहीं, जन्म गँवायो बाद ॥
कबीर-कागज केरी नावरी, पानी केरी गङ्ग ।
कहैं कबीर कैसे तरे, पाँच कुसंझी सङ्ग ॥
कबीर-यह मन पंछी हो उड़ा, बहुतक चढ़ा अकाश ॥
वहाँ ही से झट गिर पड़ा, मन मायाके पास ॥
कबीर-भक्ति द्वारा सांकारा, राई दशवें भाय ।
मन तो मैगल हो रहा, क्यों कर सके समय ॥
कबीर-कर्ता था तो क्यों रहा, अब का क्यों पछताय ।
बोया पेड़ बबूलका, आम कहाँ से खाय ॥
कबीर-काया देवल मन ध्वजा, विषय लहर फहराय ।
मन चाले देवल चले, ताका सर्वस जाय ॥
कबीर-मनका मनोरथ छोड़ दे, तेरा किया नहिं होय ।
पानीमें घिब नीकसे, रूखा खाय न कोय ॥
कबीर-काया कसू कमान ज्यों, पाँच तत्व कर बान ।
मारूँ तो मन मृगाको, नहीं तो मिथ्या जान ॥

गजल ।

तु दिल है याकि तूही खुद खुदा है । बहर रख तुम्ही तौ सूरतो सदा है ॥
तुम्ही साहब तुम्ही बन्दःहुआ है । तुम्ही साफी तुही गन्दःहुआ है ॥

१ मूताबिक, २ स्वभाव, ३ कतली, ४ भिन्न, ५ विषयस्पर्श ६ दण्ड, ७ पाँच विषयोंके इच्छुक इन्द्रिय ।

इक्कीसवां हिदायत नामा

तुम्ही मसजिद-व बुत खानः में बैठा । तुही सब जीवके अन्दर है पैठा ॥
तु नफसानी हवा आलम में छोड़े । तुम्ही फिर आप अपनी बाग मोड़े ॥
अमल के दामको तूने बनाया । नहीं और अमरमें सबको फँसाया ॥
फसे जिस हालमें सब रुहे मुरगा । न पहचाने कोई कौले बजुरगों ॥
रजा और बीमकी दो मेख मारा । मुसल्लम दामको उस पर पसारा ॥
बहर किस्मे हवस लज्जात दाना । फँसे आ जिस ऊपर मुर्गं जमाना ॥
कहीं भगवा तिलक कण्ठी है माला । कहीं खुद भेष घर बैठे निराला ॥
कहीं यह दिल हुआ हिन्दू मुसलमां । कहीं जिन्नो परी और हूरोगिलमा ॥
कहीं औतार धर अल्ला कहावे । कहीं हरि भगत हो हरिगुणको गावे ॥
कहीं फासिक मुहब्बत यार खाली । कहीं आशक हुया रोडा जलाली ॥
बहरसू देखिये दिलका तमासा । जहाँ कौनेन पानीका बतासा ॥

इस गजलमें चित्तकी सर्वोत्कृष्ट महत्ता वर्णन की है कि, खुदा आदि सब कुछ तू है ।

इस चित्तके इतने नाम हैं—मन, चित्त, अहंकार, स्वातः; जब मनुष्यका मन राग द्वेषमें फँसता है तब नसोंमें विभिन्नता आजाती है । जो नसें रक्त तथा वीर्य स्थान स्थानपर पहुँचाती हैं, उनमें दोष आजाता है । जैसे बादशाहके दुःख अथवा क्रोधसे समस्त सैन्य क्रोधाग्निवत होती हैं अथवा दुःखी होती है, उसी प्रकार मनमें विभिन्नता आनेसे समस्त नसोंमें विभिन्नता आजाती है । तब दोनों प्रकारके रोग होते हैं क्योंकि, नाडियोंमें विभिन्नता पड़नेसे अन्न नहीं पचता, कच्छा रह जाता है तब शारीरिक रोग और मानसिक चिन्ता घेरती है ।

जीव, मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार यह सब अशुद्ध चित्तका नाम है । जितना दृश्य दिखाई देता है वो सब मनका रूप है । मन तथा कर्म दोनों समान स्वरूपके हैं । जब मन वशमें आता है तब समस्त कर्म भरम मिट जाते हैं । यह मन ब्रह्म शक्तिका बल है, इस कारण ब्रह्म और मनमें कुछ विभिन्नता नहीं । इस मनहीकी गतिसे देवता राक्षस हो जाते हैं और राक्षस देवता बन जाते हैं । मनुष्य नाग, नाग मनुष्य, पुरुष स्त्री, स्त्री पुरुष, पुत्र पिता और पिता पुत्र हो जाते हैं । जैसे तमाशा करनेवाला शीघ्रतापूर्वक भांति भांतिके रूप दिखाता है फिर पलट लेता है । कबूतर जिस प्रकार गिरह मारता जाता है, उसी तरह आवागमन भी होता जाता है । जब मन विषय वासनासे विरक्त होता है तब मनहीसे मन मुरदा हो जाता है जैसे ठण्डा लोहा गरम लोहेको काट डालता है ।

यह मन कालपुरुष है, समस्त संसारको इसने भटकाकर खा लिया है। पर जब यह भक्तिकी ओर ध्यान देता है तब परमपदको पहुँचा देता है, अपने यथार्थसे संयुक्त कर देता है। सुतरां दत्त, दिगम्बर, दुर्वासा, नारद, गोरखनाथ, मीराबाई इत्यादिको सत्यगुरु मिल गये जिससे उनका कार्य सिद्ध हो गया। जब मनुष्यका सुकर्म पूर्णताको पहुँचता है तब सत्यगुरु प्राप्त हो मनुष्योंको यथेष्ट स्थानपर पहुँचा देता है। ग्रन्थ कबीर वाणी तथा अन्यान्य ग्रन्थोंमें लिखा है कि, जब कबीर साहब झांझरी द्वीपको गये, तब उस समय कालपुरुषने कबीर साहबसे कहा कि, आप अपनी देह मुझको दे। कबीर साहबने कृपा करके अपनी देह उसको देदी। इस कारण कालपुरुषके पास दोनों देह हैं। जब चाहे तब अपनी देह दिखावे और जब चाहे तब सत्यगुरुकी देह धारण करे। बे शिरकी देह कालकी है और माथा सहित देह कबीर साहबकी है जो उसको प्रदानकी गयी है। परिणाम यह है कि, जो कोई भजन और तपस्याको उच्चश्रेणीपर पहुँचाता है और उसका प्रेम सच्चा होता है तो उसी कालकी मूर्तिमेंसे दयालु सत्यगुरु निकलकर जीवका कार्य सम्पूर्ण कर देते हैं। इस कलियुगमें मनुष्यसे सुकृति और भजन भक्ति पूर्ण नहीं हो सकते; इस कारण उसे सत्यगुरुकी शरण ग्रहण करना आवश्यक है। शरणका कर्तव्य पूर्ण करनाही शुभकर्मकी अवधि है। अपने शरीरकी आशा पूर्णतया छोड़ दे। दिनरात भजन तथा ध्यानमें निमग्न हो जावे, अपने शरीरको तुच्छ समझकर अपने प्यारे के मिलनेके अनुरागमें विह्वल होकर प्रार्थना करे। जब पूर्ण विरहमें निमग्न हो जावेगा तो एक न एक दिन उसे अवश्य दर्शन होगा।

शब्द- गुलतान मता जब आवेगा तब जिवड़ा सुख पावेगा,।
आचार विचार छुटे या जिवका दुर्भति दूर नसावेगा ॥
मायामोह भरमका बादल परदा खोल बहावेगा।
पाँचपचीस करो सब अपने सद्गुरु शब्द लखावेगा ॥
रहनि गहिनकी नाव सँवारो तब भव पार सिधावेगा।
हंस सुजन जन बहुरि मिलैंगे साहबके गुण गावेगा ॥
अमरलोक अमृतकी काया तहाँ बड़ा सुख पावेगा ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो यह तत् बिरला पावेगा ॥

इस प्रकार प्रेममें मग्न होनेसे सत्यगुरुका दर्शन होता है यदि कोई कहे कि, जब इस प्रकारकी निमग्नता हुई तब आपसे आप काम हो जावेगा फिर सत्यगुरुका क्या काम है। उसे जानना चाहिये कि, कितनाही भजन क्यों न करे,

पर सत्यगुरुकी कृतज्ञता न हो तो छुटकारेका ढंग न होगा, क्योंकि, सहस्रोंने बहुत प्रेम किया, सत्यगुरु उनको मिले भी पर उनके मनमें घमण्ड रहा । वे सत्य-गुरुके चरणके धूल न हुये इस कारण संसारमें ही फँसे रहे ।

शब्द—मनरे तू मनही उलट समाना ।

गुरु परताप अल्क भइ तोको नातो था अज्ञाना ॥

नियरेतं दूर दूरते नियरे जो जैसे अनुमाना ।

आलूते कोचढोमिलवेड़ा जिन रहे पियातन जाना ॥

उलटि कमल षट्चक्रहि वेधै सहज शून्य अनुरागी ॥

आवेन जाय मरे नहिं जमने ताही को कहो जो बैरागी ॥

बंकनालकी सुधिकर वौरे मेरुदण्ड कर छाजा ।

गरजे गगन मन शून्य समाना बाजे अनहृद बाजा ॥

या मनले केते अरुझाने शिव सनकादिक ब्रह्मा ।

खोजत खोजत पार न पायो अगम अपार याकी महिमा ॥

यह मन मस्त बसे बन कुञ्जर शून्य सकल बन खाया ।

जब वश पन्यो महावत केरे अङ्कुकुश दे मुरकाया ॥

जो मन कहो जो तू काहे को संशय जिन खोजा तिन पाया ।

रहे समाय अभय सागरमें बहुरि न भवजल आया ॥

अनुभव कथा कौनसे कहिये है कोई सन्त विवेकी ॥

कहैं कबीर गुरुदया है पलीता सूझल विरले देखी ॥

यथा—मन तू थकत थकत थकि जाई ।

बिन थाके तेरो काज न सरि है फिर पीछे पछताई ॥

जबलग तू सजीव रहत है तब लग परदा भाई ।

टूट जाय ओट तिनकाकी जो मन शिखर ढहाई ॥

सकल तेज तज होय नपुंसक या मत सुन तू मेरी ।

जीयत मृतक दशा विचारे पावे वस्तु घनेरी ॥

याके परे और कछु नाहीं या मत सबसे पूरा ।

कहैं कबीर मार मन मैगल होय रहो जैसे धूरा ॥

जिस मनुष्यको अपनी कामनाओंको छोड़ना कठिन है वह वासनाओंका कीड़ा है । कामनाओंके पूर्ण करनेसे मन मोटा हो जाता है स्थूल होकर ऐसा बलवान् हो जाता है कि, फिर बशमें नहीं आता । जब मनुष्य कामनाओंको छोड़ देता है जिस पदार्थ पर मन जाय उसको स्वीकार नहीं करता तब यह मन मुरदाके समान होजाता है ।

इस मनको यों मारना चाहिये कि, वाँछित पदार्थकी ओर गति न करने पावे। अन्तरही अन्तरगति करके रह जाय, बहिर्गत न होने पावे। जो इच्छा मनमें उठे उसको रोके तब मन शान्त हो जाता है, यह मन शून्य स्वरूप है। संकल्प विकल्पहीका नाम मन है और चिन्तन करनेसे यह चित्त कहलाता है। जब प्राण स्फुरता है तब मन प्रगट होते हैं उसीसे संसारकी उत्पत्ति होती है। इस चित्तके दो बीज हैं—एक तो प्राणोंकी गति और दूसरे वासनाका चलायमान होना। कुण्डलिनीके शब्दसे जो शब्द उत्पन्न होता है, वही मन है वो हृदय आकाशसे निकलता है और बाहर जाता है। बाहरसे भीतर आता है वही प्राण है जिसमें मन विराजमान है और कामनाओंके कारण देश देशमें फिरा करता है।

पाँच वृत्ति

इस मनकी पाँच वृत्ति अर्थात् अवस्थाएँ हैं—प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति इनका लक्षण योग शास्त्रमें किया है। अब उन पाँचोंका विवरण सुनो—

१ प्रमाण—प्रमाके साधनको प्रमाण कहते हैं। इसमें यथार्थ ज्ञानका नाम प्रमा है, इसके जो प्रत्यक्षादि साधन हैं वे सब प्रमाण कहलाते हैं।

२ विपर्यय—मिथ्या ज्ञानका नाम है यानी जो जिस रूपका हुआ हो वो वास्तवमें उस रूपमें प्रतिष्ठत न हो किन्तु भ्रमसे हो रहा हो।

३ विकल्प—जो पदार्थ शशशृंगकी तरह वास्तवमें न होकर भी शब्दकी शक्तिकी महिमासे प्रतीत हो रहा हो।

४ निद्रा—सब इन्द्रियोंके विषयोंके अनुभवके अभावके कारण तमका अवलंब करनेवाली वृत्तिका नाम नीन्द है क्योंकि, जब मनुष्य उठता है तो उसे सुषुप्तिकालके तमका अनुभव होता है।

५ स्मृति—अनुभव किये हुए विषयको उद्घोधकके व्यापारसे फिर हृदयमें उपस्थित हो जानेको कहते हैं।

ये पाँचों वृत्तियाँ किलष्ट और अकिलष्ट भेदसे दो दो प्रकारकी हैं। जब ये परमात्माकी तरफ दौड़ने लगती हैं तो ये अकिलष्ट कहलाने लगती हैं। निम्नलिखित शब्दमें कबीर साहिबने मनका सर्प तथा उनकी पाँचों वृत्तियोंको पाँच फन कहा है यह नीचेके दो टुकड़ोंसे झलकता है।

शब्द—बिछुवा कैसे रहे बन ठनके

बिछुवा वीर विषय रस बोरी शुद्ध हरी हरिजनके ॥

द्विज कन्या गुरु कीन्ह अरब सुत लै चौबीस मत मनके ॥

घीसाजी

काया नगर नाग एक रक्षित छापा है पाँचों फनके ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो यहिते मोर पैया झनके ॥

यह मन व्याघ्र सदृश है । इन पाँचों हथियारोंसे सभी जीवोंका शिकार करता है, कोई इसकी पकड़से छूट नहीं सकता, सबको पकड़ पकड़कर खा लेता है । कोई भी ऋषि, मुनि, सिद्ध, साधु इससे बच नहीं सकता । यही मन काल-पुरुष है इसके भेदको किसीने नहीं जाना । मनुष्यका कुछ बल नहीं चलता । जिधरको चाहता है उधरही बुद्धिको फेर देता है । यह मनुष्य विचारा वैसेही कार्य करने लगता है । भलाई बुराईकी ओर झुका देना मनके आधीन है । यह समस्त इन्द्रियोंका राजा है । सभी इन्द्रियाँ मन राजाके सिपाही हैं । केवल एकही इन्द्रिय ज्ञान और कर्म नष्ट करनेको बहुत है । जिसके साथ इतनी इन्द्रियाँ लग रही हैं फिर यह जीव कैसे बच सकता है ? जिधरको यह मन बाद-शाह झुकता है उधरही समस्त इन्द्रियाँ दौड़ पड़ती हैं । यह मन तथा सब इन्द्रियाँ शिकारी हैं कोई जीव इनसे बच नहीं सकता । यह भाव इस निम्नलिखित साखीसे स्पष्ट प्रतीत होता है —

कबीरसाहबकी साखी

काहे हिरनी दूबरी, यही हरियरे ताल ।

लाख शिकारी एक मृग, केतक टारे भाल ॥

ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनों एक प्रकारके हैं, बाल बराबर भी विभिन्नता नहीं है । एक बहुत बड़ा अण्डाकार स्वरूप तो ब्रह्माण्ड है, दूसरा छोटा अण्डाकार स्वरूप मनुष्यका शरीर है । दोनोंकी एकही बात है । कुछ विभिन्नता नहीं है । इस बनने ही आवागमनका पथ बनाया और आपही एकसे अनेक हुआ । चौरासी लाख योनिमें मारा मारा फिरता है । जिस पथसे निकलता है उसीमें बारम्बार घुसनेका उद्योग करता है । उसकी तृष्णा कभी कम नहीं होती । उस स्त्रीने पहले ब्रह्मा, विष्णु और शिवको मार लिया फिर समस्त संसारको मारने और खाने लगी । यह बड़ी बलिष्ठ डायन है । यह ज्ञानरूप बच्चोंका कलेजा खाया करती है । इस स्त्रीने अपने छः स्वरूप बनाये हैं । पद्मिनी, चित्रिनी, हस्तिनी, शंखिनी, नागिनी, डाकिनी उनके नाम हैं और इन छः प्रकारकी स्त्रियोंके छः पुरुष हैं । पद्मिनीका पुरुष खरगोश (शशा) है । चित्रिणीका पुरुष हिरन है । हस्तिनीका पुरुष बैल है । शंखिनीका पुरुष गद्दा है । नागिनीका नर घोड़ा है । डाकिनीका जोड़ा भैंसा है ।

इस प्रकार छः प्रकारकी स्त्रियाँ छः प्रकारके पुरुषोंको ढूंढ़ती हैं । जिस स्त्रीको अपनी इच्छानुसार पति मिले वह तो प्रसन्न रहती हैं और उसका कार्य

१६ अध्याय । आद्या और निरंजन पर जीत

पूरा होता है। यदि विरुद्ध मिले तो उस स्त्रीका प्रेम अपने पतिसे नहीं होता। उसमें मन नहीं लगता। अपने उपपति को ढूँढ़ती फिरती है। वह जिसके साथ विवाही जाती है वह तो उसका पति नहीं। इस कारण कामाग्नि उसके हृदयको जलाती रहती है। तब मस्त फिरती है और धूर्त तथा व्यभिचारिणी हो जाती है। जब तक उसका पति नहीं मिलता तब तक उसके कामकी अग्नि शान्त नहीं होती।

मायाने अपने तीन स्वरूप बनाया है वे जड़ चैतन्य और वाणी हैं जड़ तो चाँदी सोना रत्न आदि हैं। चैतन्य स्त्री है वाणीमें समस्त वेद पुस्तकें और वाणी विद्या इत्यादि संयुक्त हैं। इन तीनों स्वरूपसे उसने समस्त संसारको अपने वशीभूत कर लिया है। बिना तात्पर्य समझे वेद और वाणी पढ़ पढ़ सभी मस्त होकर इस बाणीमें डुबकियां खा रहे हैं। इस वेद बाणी रूप समुद्रका भेद किसीने नहीं पाया। पढ़ा तो सही पर यथार्थ भेदको नहीं जान सका। इस कारण उनका पढ़ना निरर्थक हुआ। इससे कुछ मनकी स्वच्छता नहीं हुई। क्योंकि जो सत्य तात्पर्य है उसको नहीं सूझा न मनमें विचार आया।

(कबीर साहबकी) शब्द अङ्गकी साखी

कबीर—एक शब्द गुरु देवका, तामें अनंत विचार।

पण्डित थाके मुनि जना, वेद न पावें पार ॥

कबीर—आसा बासा सन्तकी, ब्रह्मा लखे न वेद।

षट् दर्शन खटपट करें, विरला पावें भेद ॥

कबीर दीपक जोइया, देखा अपरं देव।

चार वेदकी गम नहीं, तहां कबीरा सेव ॥

कबीर—ऐसी अद्भुत मत कथो, कथो तो धरो छिपाय।

वेद कुरानों ना लिखी, कथों तो को पतियाय ॥

कबीर—माँ मूँडूँ ता गुरुकी, जाते भरम न जाय ॥

आप बूड़े चहुँ वेदमें, चेले दियो बहाय ॥

कबीर—बाणी तो पानी भरे, चारों वेद हजूर।

करनी तो गारा करे, साहबका घर दूर ॥

कबीर—बाणी तो पानी भरे, चारो वेद हजूर।

चूको सेवा बन्दगी, किया चाकरी दूर ॥

उस बाणीने सर्व मनुष्योंके मनमें अभिमान और अहंकार भर दिया। जब मनुष्य कामनाके आधीन होता है तब वस्तुको इतनी हानि होती है : तप, सत्य, शौच, लक्ष्मी, लज्जा, बुद्धि, सुकृति और आयु।

विषयियोंके निमित्त पूर्व लिखित येही तीनों पदार्थ हैं जबतक संसारमें रहते हैं तबतक तो विषयवासना और शरीरके पालन पोषणमें लगे रहते हैं। मृत्युके पीछे वैकुण्ठमें आनन्द लूटते तथा अप्सराओंसे सम्भोगकी आशा रखते हैं। विषयी पुरुषोंकी विषय भोगसे कभी निवृत्ति नहीं होती। जैसे संसारमें वैसेही परलोकमें भी इसी वासनामें फँसे रहते हैं। वासनायें इनको उसी प्रकार नचाती फिरती हैं, जैसे कि, कलन्दर बन्दरको नचाता फिरता है उसी मनकी गतिसे सब मनुष्यों की हीन दशा हो रही है।

यह मन निरञ्जन है। नेत्रोंके श्वेत स्थानमें इसका निवास है। इसी स्थानपर बैठकर समस्त विषय वासनाका आनन्द लेता है। इस कारण प्रथम नेत्र गतिमान होते हैं। पहले नेत्रोंमें गति होती है पीछे देह चलती है, तब उसकी कामना पूरी होती है। निरञ्जन आँखोंकी सफेदीमें बैठकर सब भोग भोगता है। यही कारण है कि, रुग्नावस्थामें मनुष्यका समस्त शरीर तो शुष्क हो जाता है पर उसकी आँखोंकी डलियाँ ज्यों की त्यों रह जाती हैं। वह न कभी घटती हैं और न बढ़ती हैं। यह निरञ्जनका स्थान सर्वदा समानरूपसे रहता है। सर्व शरीर सूख जाता है तथापि निरञ्जनकी ज्योति समान रूपसे रहती है। इसी कारण साधु लोग पहले अपनी दृष्टिको साधते हैं जिससे इधर उधर बहकने न पावे। आँखोंको एक स्थानपर स्थिर रखते हैं। जब आँखोंको अपने वशमें कर लेते हैं तब फिर मनको आधीन करते हैं। नेत्रोंके भटकनेसे मन सदैव अस्थिर तथा चञ्चल रहता है। जब यह मनही वशीभूत न हो तो अपने रूपका ज्ञान कैसे होगा ?

अन्धी आँखोंमें निरञ्जन मिट जाता है। जब उसका स्थानही नहीं रहता तो वह भी नहीं रहता। इस कारण जो अन्धा होता है उसकी बुद्धि अधिक होती है। अन्धा बिना देखे सब कुछ जान लेता है। अन्धेकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण होती है।

घोर निद्राको सुषुप्ति कहते हैं। वो दो प्रकारकी होती है। एक तो अज्ञान सुषुप्ति दूसरी ज्ञान सुषुप्ति। इन दोनों सुषुप्तियोंमें संसार नष्ट हुआ जान पड़ता है परन्तु संसारका बीज रहता है। यदि बीज न होता तो वही कदापि जाग्रत अवस्थामें न आता। इसी कारण जब ध्यानमें लीन होता है तब बड़ा प्रकाश उत्पन्न होता है। इस प्रकाशमें वासना तो दूर हुई जान पड़ती है पर वासनाका बीज नष्ट नहीं होता। ये मनके व्युत्थित होतेही फिर उसी रूपमें प्रगट हो जाती है। सदाकी तरह फिर संसारको उपस्थित करती है पर जब

उनकी बीज शक्तिका नाश कर दिया जाता है फिर वो जगज्जाल नहीं फैला सकती किन्तु जबतक इनकी बीज शक्ति नहीं नष्ट होती अवकाश पातेही मनकी एकाग्रताको मिटा देती हैं इस दशामें साधकको सच्चे गुरुकी आवश्यकता होती है ।

योगी योगयुक्तिसे समाधिके समयमें मनको वश कर लेते हैं पर समाधिके हरतेही मनकी वृत्तिसरूपता हो जाती है । बिना सच्चे गुरुकी कृपासे वासनाओंको नहीं मार सकता ये बड़ी प्रदल है अब हम वासनाओंकाही निरूपण करते हैं ।

मनके पाँच अहङ्कार

स्थूल, लिङ्ग, कारण, महाकारण और कौवल्य मनके ये पाँच अहंकार हैं इसीमें स्वामी सेवक देवता और पुजारी सभी बन्द हैं । इन पाँचों अहंकारोंसे बाहर निकलना कठिन है । जिसने इन अहंकारोंको बनाया है वह स्वयम् इन्हीं में ही फँसा है । सत्यगुरु बिना इसको कौन निकाले । बंधेको बँधा कैसे छुड़ावे । अन्धेको अन्धा क्या राह दिखा सकेगा । ये ही पाँचो अहंकार मनुष्यके बन्धनकी जड़ें हैं सब जीव इन्हींमें आवागमन किया करते हैं ।

१ स्थूल अहंकार—स्थूल अहंकारके अभिमानीमें यह कामना रहती है कि, पुत्र, गृह, धन, संसार, राग, रङ्ग, अच्छे अच्छे भोजन सौन्दर्य, सुगन्ध, सृंग अच्छे वस्तु, सवारी, शिकार और सम्भोग इत्यादि मिलें ये तो मिल जाय प्रसन्न होता है । नहीं तो दुःखी रहता है ।

२ लिंग अहंकार—लिङ्ग, कहो अथवा सूक्ष्म कहो । इस अहंकारवाले के मनमें यह रहता कि, स्वर्ग तथा बैकुण्ठके द्वारोंसे मिलूं । यंत्र मंत्र तंत्रादिकी योग्यता प्राप्त करूं । राजा इन्द्र इत्यादिके राज्यको प्राप्त करूं, उसकी विद्या जानूं जो यह सब मिले तो प्रसन्न रहता है न मिले तो दुःखी होता है ।

३ कारण अहंकार—कारण अहंकारवालेके मनमें यह ध्यान रहता है कि, योग समाधि वचन सिद्धि, प्राणायाम और प्रत्याहार, भूत, भविष्य, वर्तमानका हाल जाननेकी सिद्धि इत्यादि हों । दूसरोंकी देहमें समा जाना एकसे सहस्रों हो जाना, फिर सहस्रोंसे एक हो जाना, यह सब इसी अहंकारीके काम हैं । सुतरां जैसे शंकराचार्यजी संन्यासियोंके गुरु राजा अमरूकके शरीरमें समा गये और छः मास पर्यन्त रह आये वो इसीके बलसे रह आये थे ।

४ महाकारण अहंकार—महाकारण देहके अभिमानीको यह इच्छा होती है कि, योग वैराग्य, समाधि किया और उपरम, तितिक्षा, शम, दम, मुमुक्षताकी अवस्था और ज्ञान मिले । मैं ज्ञानी और मैं मुक्त हूँ । दूसरे सब बन्धनमें हूँ । केवल मैं छूटा हुआ हूँ । ऐसी अवस्था जब पूरी हो तो बड़ी प्रसन्नता हो और

न हो तो दुःख होगा । जब ज्ञान हुआ तो सर्व दुःख सुख भोगता है और समस्त सामर्थ्य रखता है ।

५ कौवल्य अहंकार—कौवल्य अहंकारवालेके देहमें यह ध्यान होता है कि, मैं अद्वैत ब्रह्म हूँ—मैं आत्मा अधिष्ठान हूँ यह जगत् जड़ तथा चैतन्य सब मेराही स्वरूप है । घड़ा और मिट्टी जल तथा लहर सुवर्ण और आभूषण सभी मैं ही हूँ । जब ऐसा भास हो तो प्रसन्न और न हो तो दुःखी हृदयके ये पाँच अहंकारोंमें नर तथा नाथ दोनों फँसे हैं । जो कोई इन पाँचों अहंकारोंसे पृथक् हुआ वो ही भवजालसे छूटा, इन पाँचों अहंकारोंमें ज्ञानी तथा ध्यानी सभी फँसे हुए हैं । इनसे बाहर निकलना असम्भव है । किसीने उन पाँचों अहंकारोंका भेद नहीं पाया । इस भवसागरमें तो यह पाँचों देह श्रेष्ठ हैं बाकी सभी निकुण्ट हैं ।

मनकी विषय वासना

अब मैं मनकी विषय वासनाके बारेमें लिखता हूँ जिसके कि, कारण सब मनुष्य कालपुरुषके जालमें फँसे हैं । इसकी पूजा कालपुरुषसे प्रगट हुई है । क्योंकि वह स्वयम् विषय वासनाको अच्छा समझता है । उसका निराकार शरीर पशुवत् वासना विशेष तृष्णासे मिला हुआ है । जितने विषयी हैं सब उसके दास हैं । जब चित्त वासनाओंकी ओर झुकता है तभी मन भी चञ्चल होता है उसी समय बाहरी भीतरी सब इंद्रियें चैतन्य हो जाती हैं, सूक्ष्मता दूर होके स्थूलता प्रगट हो जाती है । एकसे अनेक होता है । चौरासी लाख योनिके जीव उत्पन्न होते हैं । एक योनिसे दूसरीमें मारा मारा फिरता है । अधोकी तरह टटोलता फिरता है परन्तु कुछ भी हाथ नहीं आता । जैसे जल मथनेसे मक्खन नहीं निकलता, उसी प्रकार यह जीव जप तप तपस्या करके भी बिना ज्ञानके खाली ही रह जाता है । उसकी कहीं भी स्थिति नहीं होती । पाँचों देवताओंका शरीर वासनामय है इन्हींकी सन्तान समस्त संसार है । इस कारण यह समस्त संसार वासनाओंसे पूर्ण है । जो कोई वासनासे पृथक् होगा वही मनुष्यत्वको प्राप्त करेगा, वही मुक्तिका अधिकारी होगा । कितनेही ऋषि मुनियोंने कठिन तपस्या की पर जब उनपर काम क्रोधादिका प्रभाव हुआ तब वे पशुसे भी अधिक नीच हो गये । यहाँ तक कि, पशुओंकी योनिमें जाकर भी अशान्तही फिरते रहे ।

पारख गुरुके बिना समस्त धम्मोंके आचार्य काम क्रोधादिककी वासनामें फँस रहे हैं । जैसे कोई कुत्ता एक सूखा हाड़ अपने मुंहसे पकड़ लेता है । उसको

बड़े हर्षसे चबाता चाटता है वह हड़डी उसके मुंहमें घाव कर देती है उसके मुंहसे रक्त बहने लगता है। पर वह मूर्ख कुत्ता जानता है कि वह रक्त उस हड़डीसे निकल रहा है जिसे कि, वो बड़े स्वादसे चाट रहा है उसके मुंहमें हड़डी देखकर दूसरे कुत्ते दौड़ते लड़ते काटते तथा उसको छीन लेनेका उद्योग करते हुए मारते मरते हैं परन्तु उसको वह नहीं छोड़ता इसी प्रकार इस संसारके पदार्थ सूखी हड़डीके समान हैं। जो लोग इससे ग्रेम करते हैं तो सब संसारी कुत्ते हैं वे भी अपने शरीरके सारको नष्ट करते हुए अपनी आत्माके सुखको विषयका सुख समझ रहे हैं जो अप्सरा तथा गन्धर्वों तथा अमृत और कल्पवृक्ष आदिक स्वर्गीय पदार्थोंकी अभिलाषाये हैं। ये सब अत्यन्त तुच्छ एवं मायिक पदार्थोंकी ही हैं। मनुष्यका मन जबतक वासनाओंसे कलुषित है तब तक वह कालपुरुषका चेरा है। किन्तु इससे पृथक् होते ही अपने कर्तव्यको पूरा कर-लेता है।

गजल—आया जो तू बाजारमें फ़ैज आम कर फ़ैज आमकर।
सोदा करो मिल यारमें कुछ काम कर कुछ काम कर ॥
पकडा गया बेगार है तेरे सिरके ऊपर भार है।
तुझको बहुतसा कार है अज्जाम कर अज्जाम कर ॥
सरे आशकां बुरीदः है दिलवरको यह खुश ईदहै।
हरदीदनी नादीह है आराम कर आराम कर ॥
यह नफ़्त ऐन उन्नीस है आहनको मेकनातीस है।
बखुदा नहीं तकदीस है सम्सामकर सम्सामकर ॥
तेरे बरमें आजिज कोह रुवा सब खारो खस लिपटा गया।
अब छोडकर शर्मो हया सतनाम रर सतनाम रर ॥

यह वासनाही समस्त संसारका मुख्य कारण है। इससे मन उत्पन्न होता है, हृदयसे तीन लोक तथा चारों वेद बर्हिर्गत होते हैं। अब कुण्डलिनी शक्तिका भिन्न २ वर्णन किया जायगा। जो कि, वासनाओंके बीज जालकी मुख्य पोषिका है।

वासनाओंकी जननी

जिसका संक्षेपसे वृत्तांत में चक्र निरूपणमें कर चुका हूँ यही कुण्डलिनी वासनाओंकी जननी है, महामाया नाभी तले रहती है। यह समस्त संसारका कारण है इसीसे तीनों गुण हैं। उसके मुंहसे फुँफकारकी आवाज आया करती है। उसी सौपिनीकी फुँफकारसे सौहं शब्द बर्हिर्गत होता है। जिसके भीतर

प्रणव विराजा रहता है। इसी कुण्डलिनीकी फुँफकारसे यह मन चैतन्य होता है। मनके चैतन्य होतेही समस्त संसारकी उत्पत्ति होती है। कुण्डलिनी मायामाया वासनाओंसे भरी हुई है भाँति भाँतिकी सांसारिक वासनाएँही उसका विष हैं। जब उस कुण्डलिनीमें फुर्ना होती है तब मन प्रगट होता है। जब निश्चय हुआ तब बुद्धि उत्पन्न हुई और जब अहम् भाव होता है तब उससे अहंकार उत्पन्न होता है और जब चिन्तन करता है तब चित्त उत्पन्न होता है। जब स्पर्शके सन्मुख होता है तब वायु प्रगट होती है, जब देखनेकी ओर होता है तब अग्नि प्रगट होती है, जब रस लेनेकी इच्छा होती है तब जल उत्पन्न होता है। जब सृंघनेकी ओर ध्यान गया तब पृथिवी उत्पन्न होती है। पाँचों तन्मात्राएँ और चारों अन्तःकरण चौदह इन्द्रियाँ और सब नाडियाँ इसी कुण्डलिनीसे उत्पन्न होती हैं।

तीन प्रकारकी इच्छाएँ हैं। प्रथम—किसी वस्तुके मिल जाने और उसके पानेके निमित्त उद्योग करनेकी इच्छा। यह अज्ञानीकी इच्छा है।

दूसरी यह है कि दुःख और आपत्तिके पृथक् होनेकी इच्छा। यह बड़े अज्ञानीमें होती है।

तीसरी यह कि जो काम करना उसका फल चाहना। जब इच्छानुसार फल न हो तब उसके लिये चिन्ता तथा शोच होता है, यह एक साधारण है।

वासना चार प्रकारकी है। एक सुषुप्ति वासना है, दूसरी स्वप्न वासना है, तीसरी जागृत वासना है, चौथी क्षीण वासना है।

१—स्थावर अर्थात् वृक्ष पत्थर इत्यादिको सुषुप्ति वासना होती है।

२—पशुओंको स्वप्नवासना होती है। उनको वासनाका ध्यान भी नहीं होता।

३—मनुष्य तथा देवताओंको जागृत वासना होती है कि, वे वासनामें ही लगे रहते हैं। यह तो तीन वासनाएँ अज्ञानी जनोंकी हैं।

४—क्षीण वासना ज्ञानीकी है। जब वासना मर गयी किसी प्रकारकी इच्छा नहीं रही, तब संसार लय हो जाता है। संसार वृक्षका बीज वासना है। दसो दिशा संसारके पत्ते हैं। शुभ अशुभ कर्म उसके फूल हैं। मनुष्य पशु वृक्ष तथा पत्थर आदि उसके फल हैं। इस सृष्टिका बीज वासनाएँ हैं। इनके नष्ट करनेसे संसार भी नष्ट हो जाता है, वासनासे स्थिर रहता है। शारीरिक और मानसिक दो रोग हैं, दोनोंही वासनाओंसे उत्पन्न होते हैं। यही दो प्रकारके रोग हैं। शारीरिक रोगको व्याधि और मानसिक रोगको आधि कहते हैं।

शरीरकी व्याधि तो औषधी तथा पुण्य करनेसे दूर हो जाती है। जन्म मरणकी बीमारी, (आधि) मनकी स्वच्छतासे दूर होती है।

इस सौपिनीसे यह मन बड़ा बलिष्ठ तथा विबैला सर्प बना हुआ है। इसने समस्त संसारको ऐसा डंक मारा है कि, सबके सब मर गये। किसी को चेत नहीं होता। इस मन सौपके विषसे सब अचेत हो रहे हैं, इसी सर्पका विष तीनों लोकोंमें भरा हुआ है। इसी सर्पिणीके विषकी द्वारसे सर्व जीव ऐसे अचेत हो रहे हैं कि, जगानेसे भी नहीं जाग सकते। संसारमें जितने रोग शोक, दुःख, दरिद्र, कष्ट और आपत्ति हैं सब इस कुण्डलिनीसे हैं। प्राण अपान दोनों वायुको योगेश्वर लोग सुषुम्ना नाड़ीके मार्गसे ब्रह्माण्डमें पहुँचाते हैं। एक क्षणभर उस स्थानपर वायुके ठहरानेसे सिद्धोंका दर्शन हो जाता है।

नाभिके मूलमें सूर्य तथा तालुके मूलमें चन्द्रकी स्थिति है इस शरीरमें दो और कमल हैं एक नीचे और दूसरा ऊपर है। नीचेके कमलमें सूर्य रहता है। ऊपरके कमलमें चन्द्रका वास है चंद्रसे अमृत च्युता है सूर्य शोष लेता है। स्वाधिष्ठान चक्रके आगे महामाया कुण्डलिनी रहती है। जैसे मोतियोंका भण्डार हो ऐसेही कुण्डलिनी लक्ष्मी बड़ी सुन्दरताके साथ रहती है। जैसे डण्डेके साथ हिलानेसे सर्पनी शब्द करती है ऐसेही इस कुण्डलिनीसे सोहम्का शब्द वहिर्गत होता है। यही आदि शक्ति समस्त संसारका कार्य करती है। उससे आपसे आप जो वायु निकलती है वह वायु बहुत मुलायम है। वह वायु जो छूटती है फिर दो सूरतोंमें स्थिर होती है। एकका नाम प्राण तथा दूसरेका नाम अपान है। ये दोनों वायु आपसमें टक्कर खाती हैं। इसीको (हरारत गरीजी) कहते हैं। उसीसे हृदय कमलमें सूर्य समान महान् प्रकाश होता है। इस हृदय कमलमें सुवर्ण रङ्गका एक भौरा है। इस भौराके दर्शन करनेसे योगीकी दृष्टि लाख योजनाकी हो जाती है। पेटमें जो अग्नि रहती है उसको जठराग्नि कहते हैं। ऐसी ही वडवाग्नि समुद्रमें रहती है। यह दोनों अग्नि जलको शोषण करती हैं। हृदय कमलसे जो शीतल वायु निकलती है उसको चन्द्रमा कहते हैं। प्राण-वायु जो गर्म वायु है वह सूर्य है। इन दोनों अर्थात् सूर्य और चन्द्र करके यह समस्त सृष्टि स्थित हैं। कुण्डलिनीकी अचेतावस्थामें जीव वासना करके दुःखी सुखी होता रहता है। इसीसे भूख, प्यास, आलस्य, नींद, जरा, मरण आदि भीतरी और वाहरी दुःख हैं। इस कुण्डलिनीका विष समस्त संसार पर छाया हुआ है। जो इस कुण्डलिनीके भेदको जानता है वा इस सर्पके विषसे बचकर अमृत पीवे और युगयुग जीवे। इस नागिनका विष चारखानि चौरासी लाख

योनिके जीवोंमें सिरसे पाँव तक व्याप रहा है । इस सोंप तथा सोंपिनके वशमें सारा संसार है । इन्हींके विषसे सब जीव मृतक हैं । मृतकोंको जो चाहे सो करे वे क्या कर सकते हैं । यह नाग और नागिन पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों पर अधिकार किये हुए और सर्व शक्तिमान् कहलाते हैं । इन दोनोंक जालसे निकलकर कोई जीव बाहर जा नहीं सकता । इस कुण्डलिनीके विषने सबको अन्धा कर रखा है ।

शङ्खल

कहाँ मैं कहाँ दिलवर रहा यह नागिनी जब डस गयी ।
नहीं मैं नहीं वह घर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
जादू नहीं मंतर कोई अफसूँ नहीं यंतर कोई ।
उस डंक मारा मर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
यह दम्बदम लहरा गया तनमें जहर जब छा गया ।
इस जिन्दगीका खतरः रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
घेरे अँघेरी रात है और सद बला आफात है ।
शामका न सेहर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
अपना व बेगाना कहीं पहचानमें आवे नहीं ।
न बसर रहा न हजर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
इनसान सुम्-बकुम हुआ होशो हवासो गुम हुआ ।
दायम दिले मुजतर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
नहीं इल्म असर पजीर है कुछ ऐसीही तकदीर है ।
तदबीर कर बदतर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
आवे नहीं कोई काम जब आजिज जपो सतनाम तब ।
जारी न जोरो जद रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥

ये नाग नागिनी एक है समस्त संसारको इन्होंने काट खाया है । जो कोई सच्चा साधु होकर गुरुकी सेवा करेगा उसपर इस सोंपका विष असर न न करेगा । साधु सेवा अवश्यही सत्यपथपर आरूढ़ कर देगी । कभी भटकने न देगी । जहाँ साधु और गुरुकी सहायता न होगी वहाँ कदापि जीवका छुटकारा न होगा ।

जितने शब्द, नाद और वाक्य इत्यादि हुये और होते हैं सब इन्हीं दोनोंसे हैं । कोई वाक्य और शब्द इत्यादि बिना इन दोनोंके नहीं हैं । केवल इस एक सोंपिनीने अपनीही मूर्तियाँ बनाईं । इस मनको मनु अथवा स्वयम्भु मनु कहो

और माया इसकी स्त्री सतरूपा हुई जो मन है उसीको अंग्रेजी भाषामें मैन (Man) कहा हैं। जिसको मनुष्य कहते हैं सोही मन या मैन है। जबतक यह अकेला था तबतक कुछ कर न सकता था। फिर जब दूसरा स्वरूप उसके साथ हुआ तब उसका नाम स्त्री अथवा अंग्रेजी भाषामें वोमैन (Woe-man) अथवा (Woman) हुआ। इस (Man) के शब्दमें (Woe) बढ़ाया तब वोमैन हुआ। वो के अर्थ कष्ट तथा आपत्तिके हैं। जब मैनके (Man) साथ (Woe) वो मिला तब कष्ट तथा दुःखसे भर गया जब मैनके (Man) साथ वो (Woeman) मैन हो गई तब एकसे अनेक हो गया। तब संसारके जाल जञ्जालमें फँसकर बँधुआ हो गया। वही नागिनी कष्ट तथा आपत्तिका घर हुई। फारसीमें इसका नाम जन हुआ। जनका अर्थ मार—वह समस्त संसारको मारने और खाने लगी। संस्कृतमें इस औरतको अस्त्री कहते हैं। अ शब्दको विलोपित करनेसे स्त्री हुआ। यथार्थमें यह शब्द अस्त्री है। स्त्री नहीं।

अस्त्र और शस्त्र ये दो प्रकारके हथियार हैं। बन्दूक कमान इत्यादि अस्त्र कहलाते हैं क्योंकि इनमें एकमेंसे दूसरा निकलकर घाव करता है। बन्दूक नहीं मारती पर गोली मारती है। कमान नहीं मारती पर तीर मारता है। इस प्रकारके समस्त हथियार अस्त्र कहलाते हैं। तलवार, कटार, छुरा आदि शस्त्र हैं जो कोई अस्त्र बाँधता है उसे अस्त्री कहते हैं और जो शस्त्र बाँधता है उसको शस्त्री कहते हैं। अतः इस स्त्रीने अस्त्रको बाँधकर समस्त संसारको मार डाला। उसके ये पाँच अस्त्र हैं—मोहन, मारन, वशीकरण, उन्मादन, उच्चाटन, मोहन, वशीकरना-मारन, मार डालना। वशीकरण—गुलाम बना लेना। उन्मादन—पागलोंके समान बकना झकना। उच्चाटन—कुछ अच्छा न लगना। इस स्त्रीके ये पाँचों तो हथियार हैं। बेटी बेटे जितने उत्पन्न होते हैं सबके सब मोहमें फँसाकर मार लेते हैं। समस्त जन्म फँसाकर यह मार लेती है। इसी मन तथा मायाका समस्त खेल फँल रहा है। मन आकाश और निरञ्जन है। माया शक्ति और पृथिवी है। इसीसे सबकी उत्पत्ति है। इसी ब्रह्म तथा मायाकी रचनासे समस्त संसार है। इन दोनों विषयोंकी सन्तान तो सभी हैं और इन्हींका विष सबमें समा रहा है। विशेषतः यह स्त्री जो मोहिनीरूप है। इसने सबका मन मोह लिया है। जो इस मोहिनीसे बच जावेगा वह बड़ा बलिष्ठ तथा भाग्यवान है। जो स्त्रीको छातीसे लगावे वह भली भाँति याद रखे कि, उसने विषेली काली नागिनको हृदयसे लगाया है। जब यह नागिन हृदयसे

आद्या और कबीर नाम मालाका संक्षेप

लगी तो निश्चयही काट खावेगी जिससे मनुष्य मर जावेगा । जीवित रहनेकी आशा न रह जावेगी । केवल उसके विषका औषध यही है कि, तन मन धनसे साधु सेवा करे तो बचेगा नहीं तो अवश्यही मर जावेगा । अतः यह हथियारबन्द अस्त्री समस्त संसारको मारने तथा खानेके लिये बनी है ।

मनने तनको बनाया और तनने धनको बनाया । इस कारण तन और धन दोनोंका रचयिता मन है । तन और धन जब दोनोंको छोड़दे और परमेश्वरमें लीन होजावे तब वस्तुतः मन पर विजय पानेकी आशा देख पड़ती है । जबतक मनके सत्वका इच्छुक रहेगा तबतक अवश्यही मनका गुलाम बना रहेगा । कुण्डलिनी शक्ति और मनका मुंह नीचेकी ओर है । यह स्पष्ट प्रगट करता है कि, मेरे साथ प्रेम करनेवाले मनुष्य नीचेके स्थानोंको जायेंगे अर्थात् नरकको पावेगे और सदैवके लिये आवागमनके बखेड़ेमें फँसे रहेंगे मेरे विषकी औषध कदापि उनके हाथों न पड़ेगी । इस विषकी औषध तो केवल पारखगुरुकी दया है । पारखगुरु उसके विषको पृथक् कर सकता है दूसरा कोई नहीं कर सकता । पारखगुरु साधुसेवासे दयालु होता है । जब सुकृत अथवा सुकर्म पूर्णताको पहुँच जाते हैं तब उसकी कृपा प्राप्त होती है । इस नागिन तथा नागके भेदको केवल हंस कबीर जानते हैं दूसरा कोई जान नहीं सकता । इस नागिनीने सब जीवोंको डंक लगाया है सभी अचेत तथा बधिर हो रहे हैं । यह कुण्डलिनी महामाया वासनास्वरूप है । जिसका ध्यान उसकी ओर होता है वह कामनाओंसे भर जाता है ।

इसी इच्छा अथवा वासनास्वरूप स्त्रीका समस्त कारखाना है । जो वासनाओंसे भरा हुआ है वो सब इसी महामायाका खेल और कौतुक है । इसी बाजीगर और बाजीगरनीने अपना कौतुक दिखाके सब जीवोंको अन्ध कर रक्खा है । जो इस बाजीगरको पहचान सकेगा उसके बन्धनमें न आवेगा वही मन मायाके पार जानेका पथ पावेगा । जो कोई योग युक्तिसे कुण्डलिनीको जगाकर सुषुम्नाके द्वारको निरापद बना लेगा वही उत्तम योगीराज वासनाओंको जीतकर निष्कंटक हो जायगा ।

कच्चे गुरुवोंने इसको वेद तथा शास्त्रके यथार्थ अभिप्रायको तो न समझाया दूसरी रीति पर समझाकर भ्रममें डाल दिया है ।

कर्म

जब कालपुरषने सृष्टिकी उत्पत्ति की तब कर्मका जाल बनाया । वे कर्म दो प्रकारके हैं । एक शुभ दूसरा अशुभ । ये दोनों कर्म बड़ी बेड़ी हैं । इन दोनों

कर्मोंकी बेडीने समस्त सृष्टिको बाँध लिया है। जो कोई शुभ कर्म करता है वो सांसारिक धन स्वर्ग वैकुण्ठ इत्यादि सब सुखकी सामग्री पाता है उस पुण्यका अन्तिमफल अन्तःकरणकी बुद्धि है। इससे अधिक नहीं। ऋषीश्वरोंने कठिन तपस्या की और योग समाधि तथा पूजादिको उच्च श्रेणीपर पहुँचाया। दाससे स्वामी बन गये तो भी कर्मक्षय न होनेके कारण बन्धन न छूटा आवागमनमें फँसे रहे। कालपुरषने सबको इन्हीं दोनों कर्मोंमें बाँध लिया है। इस कर्मके तीन भेद हुए हैं। कर्म, अकर्म, विकर्म। कर्म तो मनुष्यको करना उचित है। अकर्मसे दूर भागना और विकर्मसे मनुष्य अपनेको मुक्त और भाग्यवान् बनाता है। जो शास्त्रानुसार कर्म ईश्वर निमित्त किया जाता है वह विधि है। दूसरा अकर्म। जिससे लोक परकलौमें कहीं सुखकी प्राप्ति नहीं होती है, उसे शास्त्रसे निषेध कहते हैं, यह अकर्म ईश्वरके विरुद्ध है। विकर्म उसको कहते हैं जिसके करनेसे कर्मसे छूटे बंधनकी पाश टूटे और ज्ञान लाभ हो पहिले स्वर्ग आदिका लालच दिखाकर कर्म करवाते हैं। इसके उपरान्त स्वर्ग इत्यादिके सुखका त्याग है। जिस प्रकार पिता रोगी लड़केको लड़डू दिखाकर औषधि देता है उसी प्रकार स्वर्ग तथा वैकुण्ठादिका लालच मनुष्योंको दिखाया गया है। फिर भी एक कर्म तीन नामोंसे प्रख्यात हुआ है। सञ्चित प्रारब्ध और क्रियमान। सञ्चित उस कर्मको कहते हैं जो रक्षा पूर्वक रखा हुआ हो। यह सहस्रों जन्मसे बराबर उसके साथ लगा चला आता है ऋण अदा करनेका समय नहीं मिला और वह ऋण माथे चढ़ा रहा। दूसरा प्रारब्ध कर्म वह है जिसे भाग्य कहते हैं। इसी प्रारब्ध कर्मके अनुसार मानुषिक शरीर प्रस्तुत हुआ है अर्थात् अपने पूर्व कर्मानुसार शरीर बना है जब यह जीव अपने पूर्व शरीरको छोड़ता है तब अहम् बोलता है। अहम्के अर्थ मैं हूँ। अहम् बोलकर दूसरे शरीरमें प्रवेश करता है। चारों खानिके जीवोंकी यही रीति है। जैसे एक प्रकारका कीड़ा होता है जो वृक्षोंके पत्तों पर रहता है। जब यह एक पत्तेको छोड़कर दूसरे पत्ते पर जाया चाहता है तब पहले वह अपने अगले पँरोंको पत्ते पर जमा लेता है। जब उसके अगले पँर दूसरे पत्ते पर भली प्रकार जम जाते हैं तब वह अपने पिछले पँरोंको भी खींचकर दूसरे पत्ते पर जमा लेता है और अगले पत्ते पर भली प्रकार जमकर बैठ जाता है। पिछले पत्तेसे सम्बन्ध छोड़ देता है। इसी प्रकार उस जीवका भी आवागमन हुआ करता है। ब्रह्मासे लेकर सर्व जीवोंमें अहंकार भरा हुआ है। जिसमें अहंकार नहीं उसका आवागमन नहीं। अहम् बोलनेसे उसके आवागमनका सम्बन्ध बराबर जारी रहता है। वह ब्रह्मा जो पहले अहम् बोला वही ब्रह्मा अनन्त स्वरूप और स्वभावों