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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

बाईसवाँ प्रकरण

वेद तब और अब

सृष्टिकी उत्पत्तिके पूर्व ये चारों वेद प्रगट हुए, उस समय लिखना पढ़ना प्रचलित नहीं था । यह कुछ कहा नहीं जा सकता कि, जब ये वेद प्रगट हुए तब इनका क्या और कैसा स्वरूप था ? कारण यह कि जितने ग्रंथ स्वसम्बेदके इस दासने देखे उनमें केवल इतनाही लिखा, देखा कि, कैलके श्वास से ये चारों वेद उत्पन्न हुए और ज्योतिस्वरूप निरञ्जनकी स्तुति करते रहे । वहाँ पर वेदोंके रूपका कोई विवरण नहीं देखा । ये वेद उत्पत्तिके दिवससे लेकर आज दिन पर्यन्त संसारमें प्रचलित हैं । पर यह संभव नहीं है कि, वेदोंकी वैसीही सूरत रही हो । 'पूर्वकालमें मनुष्यकी स्मरणशक्ति ऐसी प्रबल तथा तीक्ष्ण होती थी कि, एक वेर जो बात गुरुसे चेला सुनलेता था उसी समय उसको कंठस्थ कर लेता था और कदापि भूलता नहीं था और यदि, कहीं किसी शब्द या अक्षरका भ्रम हो तो गुरु अथवा आपसमें पूछ लेता था और शुद्धकरके याद कर लेता था । इन वेदपाठियों को जीवन भरमें वेद भूलता नहीं था और इन वेदोंको लोग जबानी पढ़ा पढ़ाया करते थे । वेदका नाम श्रुति है और संस्कृतमें श्रुति नाम कानका तथा कानसे सुननेका है अर्थात् श्रुति वह है जो सुनी गयी वेद को उत्पत्तिकालके आरंभसे उस समय तक कि, जब तक याद मनुष्योंकी स्मरण शक्तिमें पूर्णतया निर्बलता न आगयी, वे मुखस्थ करते तथा पढ़ते पढ़ाते चले आये । जिनको समस्त वेद कंठस्थ रहता था, वह श्रुतिकेवली अथवा श्रुतिकैवल्यज्ञानी कहलाता था । और वेद द्वारा लोग तीनों कालकी बातोंको जान सकते थे तथा श्रुति केवली सब कुछ बतला सकता था और श्रुतिज्ञान द्वारा कुल बातोंका उत्तर देकर लोगोंको सन्तुष्ट करता था ।

तदुपरान्त क्रमशः मनुष्यकी स्मरण शक्तिमें निर्बलता आतीगयी, और इस बातका भय हुआ कि, स्मरणशक्तिकी निर्बलताके कारण वेद कहीं एकबारही विलोपित न हो जावें । तब वेदव्यासजीने कृपा करके, उनको लिखा और अपने ढंग तथा अपनी विचारानुसार उसको निर्माण करके चार वेदोंके नामसे संसारमें प्रसिद्ध किया । उस समयसे आजपर्यन्त व्यासजीकी कृपासे काम चलता है । जब तक हिन्दुओंका राज्य तथा तब तक वेदोंका बड़ा प्रचार था, पर म्लेच्छों (मुसल मानों) के शासनकालमें इनकी कुछभी मर्यादा नहीं रही और वेदका बड़ा भाग जाता रहा अब बहुत थोड़ा रह गया है । अब जितना बचा खुचा रह गया है उतनेही से कार्य चलता है ।

इसके आरंभ कालसे अर्थात् जब ये वेद कंठस्थ रहते थे, स्मरण शक्तिकी निर्बलतावश उनमें थोड़ी बहुत अशुद्धियाँ रही जाती थीं, तदुपरान्त लिखावटमें भूल तथा त्रुटियाँ होती रहीं । अब वर्तमानकालके मनुष्योंको तनिकभी मालूम नहीं है कि, प्रथम वेद कितना था और अब कितना है । कहीं तो न्यून दृष्टिगोचर होता है तथा लोग जानते हैं कि, वेद इतनाही है । यदि कहीं विशेष प्रगट होजाता है तो लोक कहते हैं कि, वेदका यह भाग छिपा हुआ था अब प्रगट हो गया है । इस प्रकार इस विषयका उचितरूपसे पता नहीं चलता कि, वेद कहाँ २ तथा कितना छिप रहे हैं । पहले ये वेद गद्यमें थे परन्तु अब पद्यमें हो गये हैं । और लेखकोंकी अशुद्धियोंके कारण अब वेदोंकी सूरतमें विभिन्नता आगयी है इन वेदोंमें इनके अत्यंत प्राचीन होनेके कारण अनेक स्थानोंमें गडबड है और अत्यंत गडबड तथा संदेहमय होनेके कारण वेदविज्ञोंको इसकी प्राचीनतामें संदेह होता है और वर्तमानके वेदज्ञ लोग इसको नवीन समझते हैं ।

चीनी तथा योरोपियन लोगोंका विश्वास है कि, वेदको बने केवल ढाई सहस्र वर्ष बीते । किसीका कथन है कि, वेद तीन सहस्र वर्षसे बने हैं, कोई कहता है कि, ये वेद साठे तीन सहस्र वर्षसे आगेके ठहर नहीं सकते हैं । कारण यह कि, ऋषियों तथा इसके लेखकोंने वर्तमान कालके वेदोंमें ऐसी संदेह युक्त वात्ताओंको संयुक्त कर दिया है, जिससे उनकी प्राचीनतामें संदेह होता है । इसके अतिरिक्त लोग कुछ बातें अपनी ओरसे मिलाते और कुछ वेदोंसे निकालते चले आये हैं कि, जिससे वेदके प्राचीनकालमें अनेक शंकायें उपस्थित होती हैं । इसमें बड़ी मिलावट हो गयी और ब्राह्मणों, ऋषियों ने इसको ऐसा अंधकारमें डाला कि, वेद मन्त्र तनिक भी शुद्ध न रहे तथा सम्यकरूपसे अशुद्ध होगये और वेदमंत्रोंका प्रभाव उनमेंसे निकल गया ।

वेद वक्ताओंने बड़ा झगडा मचाया और यथार्थ वेदके विरुद्ध उन नासमझों ने वेदका ऐसा अर्थ लगाया कि, मनुष्य जाति और भी अंधकारमें पड़ गयी, जिससे उनका निकलना, भागना तथा छुटकारा असंभव हो गया । ये वेदपाठीगण जिन्होंने न तो तप किया न स्वसंवेदको देखा, वे क्या जाने कि, वेदका तत्त्व क्या है ? उनकी मूर्खता जिस ओरको खींचती है उसी ओर वे उसका तात्पर्य तथा अर्थ लगाते हैं तथा कुछ मूर्ख उनसे मिलकर उनको इस बात पर और भी उभारते हैं और कहते हैं, कि हां महाराज ! हां स्वामी जी ! जो अर्थ आपने किया वही उचित तथा यथेष्ट है दूसरा अर्थ नहीं, इस कारण इस वेदमें बहुत कुछ इधर उधर हो

गया और वेदके मतलबको सब अपनी अपनी ओर खींचते हैं यह भी मालूम नहीं होता है कि, वर्तमान कालके वेद प्राचीन कालके वेदोंके कौनसे भाग हैं ? और कौनसी शाखासे हैं ? कितने लोग कितनोंको खंडन करते तथा कितनोंको स्वीकार करते हैं । सो यह सब मन मानेकी बात है । जिसका चाहो खंडन करो जिसको चाहो स्वीकार करलो, अपनी इच्छापर बात रही । कोई किसीका स्वामी तथा किसीका कोई अधीन नहीं है । इन वेदोंके अदल बदल जानेके कारण इनके मन्त्रोंमें अब तनिकभी शक्ति नहीं रह गयी है ।

तेईसवाँ प्रकरण

वेदमंत्रोंकी शक्तिका वर्णन ।

पहले वेदके मन्त्रोंमें ऐसा प्रभाव था कि, उनके बलसे लोग देवताओंको अपने पास बुलाते और वेतमंत्र पढ़कर लकड़ी पर पानी छिड़कनेसे आग धधक उठती तथा कुएँका जल ऊपर चढ़ आता था । मोहन, मारण, उच्चचाटन आकर्षण और स्तंभन इत्यादि सब बल वेद मंत्रोंमें थे । ऋषि मुनिगण जब यज्ञ करते थे तो वेदमंत्रों द्वारा सब देवताओंको यज्ञस्थानमें बुलातेथे । इन वेदमंत्रोंका वर्णन मैं क्या करूँ ? इन्हीं द्वारा ऋषि मुनिगण साक्षात् परमेश्वर होनेका दावा करते थे तथा इन्हींकी सहायता द्वारा सब पापोंका नाश करते थे, और राजा इन्द्रको भी अपना चेरा बनातेथे । यदि चार वेदके मंत्र शुद्धतासे किसी को याद हों, तो उसका कौतुक लोगोंको दिखाई दे सकता है ।

वेद मंत्रकी शक्तिपर दृष्टान्त कुन्ती और दुर्वासा ।

एक बार राजा कुन्तके गृहमें दुर्वासा ऋषि पधारे । राजा कुन्तने अपनी पुत्री कुन्तीका उनकी सेवाके निमित्त नियुक्त किया । कुन्तीने दुर्वासाजीकी अत्यंत सेवा तथा सत्कार किया । तब दुर्वासाऋषिका चित्त अत्यंत हर्षित हुआ और उन्होंने कुमारी कुन्तीको एक मंत्र सिखला दिया और समझा दिया कि, जब उसपर कोई विपत्ति उपस्थित हो तब वह उस मंत्र द्वारा जिस देवताको चाहे बुलाले और उनके द्वारा अपना कार्य करालेवे । इतनी बात कहकर दुर्वासाजी तो चले गये और कुमारी कुन्तीने उस मंत्रको कंठस्थ करलिया और जब २ उसको आवश्यकता हुई तब २ सूर्य, धर्म, इन्द्र, पवन, अश्विनीकुमार इत्यादि देवताओंको अपने समीप बुलाकर अपना काम किया ।

जब अश्वमेध गोमेधयज्ञ इत्यादि होतेथे इन्हीं वेदमन्त्रों द्वारा सब देवता यज्ञमें उपस्थित होते थे । अब वे वेद मंत्र कहाँ गये ? हाँ इस समयभी वे मंत्र किसी

ऋषि मुनिके हृदयमें अवश्य होंगे—पर वे ऋषि मुनि कलियुगके मनुष्योंको अब दर्शन नहीं देते। यदि दर्शन देवें तो उनको कोई पहचान नहीं सकता है। वे उन लोगोंको कुछ बतलाते भी नहीं हैं, जो उसके अधिकारी नहीं हैं। वे ऋषि मुनि अबभी पृथ्वी पर हैं कहीं दूर नहीं गये हैं, पर कलियुगके मनुष्य ही उहूँड तथा पापिष्ठी हैं; इस कारण वे उनसे दूर भागते हैं, और अपनेको उन लोगोंपर कदापि प्रगट नहीं करते हैं, यही कारण है कि वर्तमान कालके मनुष्योंसे वे घृणा करते हैं और उनको सुशिक्षित नहीं समझते (मैं यह बात नहीं कह सकता कि, ये प्रचलित वेद—वेद नहीं, अथवा आद्योपान्त अशुद्ध हैं। मेरा कहना केवल यह है कि, इनमें कुछ बातें हैं तथा कुछ नहीं हैं। इस बातके प्रमाणमें एक उदाहरण देता हूँ, और वह यह है—

वेदकी श्रेष्ठतामें दूसरा दृष्टान्त।

“मैंने अपने बाल्यावस्थामें अपने पितासे सुना था कि, राज्य बेतिया में, जो नेपाल राज्यके समीप है, राजाके कुछ मजदूर भूमि खोद रहे थे। जब वे खोदते २ भूभागके विशेष नीचे गये तब उन्हें एक द्वार दिखलायी दिया। उसका समाचार राजाको दिया गया। राजा स्वयम् उस स्थान पर आये और द्वारके खोलनेकी आज्ञा दी। लोगोंने द्वार खोला तो देखाकि, एक कोठरीमें एक मनुष्य आसनमारे बैठा है। उसकी ऊँचाई चौड़ाई मोटाई इतनी अधिक थी कि वह वर्तमान कालका मनुष्य बोध नहीं होता था। उसके शिरके बाल भूमिके चारों ओर चक्रबांधकर छतरीके समान गिरे हुए थे और उसके सामने कपडेसे ढँका हुआ एक कमंडल धरा था। यह दृश्य देखकर राजाको जान पड़ा कि यह कोई ऋषि है, जो अखंड समाधि लगाकर बैठा हुआ है। तब राजाने वेदपाठी पण्डितों को बुलवाया और उनको वेदध्वनि करनेकी आज्ञादी। जब पण्डितोंने वेद पढ़ना आरंभ किया तब, उनकी समाधि खुल गयी और उन्होंने कहा “कौन देदको अशुद्ध पढ़ता है? क्या कलिकाल तो नहीं आ गया कि, वेद अशुद्ध होगये?” तब लोगोंने उत्तर दिया कि, हाँ महाराज! अब कलियुग है इस पर उस ऋषिने कहा कि, यहाँसे गङ्गाजी कितने अन्तर पर हैं। लोगोंने उत्तर दिया कि। साठ कोसके अन्तरपर हैं। फिर उस ऋषिने पूछा कि, गंगा जल कैसा है? लोगोंने कहा कि, जैसे सब जलहैं। तब उसने अपना कमण्डल लोगोंको दिखलाया और कहा कि, जब गंगा इस स्थानपरथी, तबमें ठीक गंगाके किनारे पर बैठाथा और उस समय गंगाजल ऐसा था। इसपर लोगोंने ऋषिजीके कमण्डलका जल देखा, तो वह स्वच्छ दुग्धके भाँति श्वेत था। तब उस ऋषिने कहा कि, अब तुम लोग मेरे पाससे

चले जाओ और मेरे द्वारको पूर्ववत् बूढता पूर्वक बंद करदो, मैं कलियुगके मनुष्योंका दर्शन नहीं करूँगा । तब राजाने आज्ञा दिया कि, इस द्वारको पहलेही की तरह बंदकर दो, तथा कोईभी किसी प्रकारकी बाधा न देवे । यह राजाज्ञा तुरन्तही मानी जाकर कार्यमें परिणत कर दीगयी । इस प्रकार वेदमें बड़ा गडबड हुआ ।

इसी प्रकार जो किताब जितने प्राचीन हैं—उनमें उतनीही गडबडीभी हैं । तौरत तथा इज्जीलमें मुसलमान लोग विशेष गडबड बतलाते—और भली भाँति साबित करते हैं स्वर्गवासी मास्टर रामचन्द्र देहलवी सितारे हिन्दने तथा अन्यान्य पादरियोंने कुरानमें गडबडके बारेमें बहुत कुछ लिखा है और एजाज कुरान नामक पुस्तकमें पूर्वोक्त सितारे हिन्द महोदयने बूढ़ प्रमाणों द्वारा प्रमाणित किया है और सियानतुलइनसान नामक किताबमें हाफिजने इज्जलिके गडबडके बारेमें बहुत कुछ लिखा है । डाक्टर वजीरख़ाँनेभी लिखा है—इन सब किताबोंमें गडबड होते २ उनकी असली अवस्था नहीं रही सबसे गडबड तथा अशुद्धियाँ हैं ।

स्वसंवेदकी शुद्धता ।

पर स्वसंवेदमें यह बात हो नहीं सकती. कारण यह कि, कबीर साहब स्वसंवेदके रचयिता प्रत्येक समय, प्रत्येक काल तथा प्रत्येक स्थानमें उपस्थित रहते हैं । जो कोई किसी प्रकारका परिवर्तन करे, तो उसको काटकर पुनः ग्रंथोंको शुद्ध करके मनुष्य जातिको सत्यपथ पर लगाते हैं । किन्तु और समस्त सम्प्रदायिक ग्रंथोंमें गडबड हुआ करता है ।

चौवीसवाँ प्रकरण

संसारके लौकिक पारलौकिक सब धर्मोंका मूल वेद ।

यद्यपि लौकिक पारलौकिक मर्यादाको बना रखनेके समस्त ज्ञान देनेवाले उपर्युक्त चार वेदही हैं । जो देशकालानुसार किसी न किसी रूपमें सर्वत्र प्रचलित रहकर, संसारकी स्थितिको संभाले रहते है । यही अविनाशी वेद संसारके समस्त ज्ञान विज्ञानके मूल भंडार हैं । संसारके समस्त धर्म और नीति इसीसे निकलते हैं । सदासे सबका यही आधार है, वही संसारका सर्वस्व है । किन्तु संसार के अज्ञानी अल्पज्ञ जीव इस बातको न जाननेके कारण, परस्पर विभिन्नताको देखते और एक एक पक्षको पकड़कर लड़ते झगड़ते रहते हैं । यदि वे यह जान जाते और विचार करके निश्चय करलेते कि, देशकालके अनुसार वेदके एक-एक अंश अथवा फरमानको लेले कर संसारके सर्व धर्म, पंथ मजहब इसीसे निकले हैं तो, वे परस्पर वैमनस्यके शिकार कदापि नहीं होते ।

वास्तवमें वेदका कोई अंश किसीने लिया कोई अंश किसीने; जैसे यज्ञ इत्यादिका अंश ब्राह्मणोंको मिला, जिसके द्वारा वे अश्वमेध गोमेध इत्यादि यज्ञ करते हैं। वेदका दूसरा अंश जैनियोंको मिला जिसके द्वारा वे दया पालते हैं और सब जीवों की रक्षा करते हैं। वेदका तीसरा अंश मीमांसकोंको मिला जिसके द्वारा वे कर्म कांडको ठीक मानते हैं। वेदका चौथा अंश योगियोंको मिला, जिससे वे लोग योग समाधिको ठीक मानकर उसीसे अपनी मुक्ति जानते हैं। वेदका पाँचवाँ अंश वैरागियोंको मिला, जिससे वे ठाकुरकी उपासनामें लगे। छठे अंशको पाकर वेदान्ती एक अद्वैत ब्रह्मसे लगे। सातवें वेदका एक अंश बौद्धोंको मिला जिससे वे बुद्धके धर्मको ठीक मानते हैं। आठवें वेदकाही एक अंश मूसाइयोंको मिला, जिससे वे अपने धर्ममें लगे। नवें वेदकाही एक अंश ईसाइयोंको मिला कि जिससे वे अपने पथ पर हैं। दसवें वेदका एक अंश मोहम्मदियोंको मिला जिससे वे अपने मजहब पर आरूढ़ हुए।

इस प्रकार जितने ग्रंथ किताब, जो वेदके अनुकूल या प्रतिकूल दिखाई देते हैं अथवा जिसको लोग अबतक जानतेभी नहीं, सो सब वेदकेही अनुसार हैं कारण यह कि वेदके मंत्रोंके अर्थ सब अपने २ बुद्धियानुसार करते हैं और उनसे अपना तात्पर्य निकालकर अपना काम करते हैं। सो यह समस्तधर्म वेदके अनुसार हैं। इन्हीं वेदकी सहायतासे सब मनुष्य अपना २ काम करते हैं। किन्तु काल पुरुषने धोखे तथा दुष्टतासे सबको ऐसा भुला रखा है कि, सबके सब घोर निद्रामें अचेत पड़े हुए हैं, वेदमंत्रोंमें ऐसा रहस्य है कि, उनके यथार्थ तात्पर्यको कोई जान नहीं सकता। सब अपने ढङ्ग पर अर्थ लगाते हैं। एक २ अक्षरके सौसी अर्थ हैं भी; जिससे एक २ मंत्रोंके अनेक अर्थ किये जा सकते हैं। इसी कारण कुछ ठीक अर्थ जान नहीं पड़ता। इसी धोखेमें डालकर कालपुरुषने मनुष्योंको अपने जालमें फँसा मारा।

चौवीसवें प्रकरणसे अनुसन्धान

अनुवादकका भ्रमविमोचनी विवेचन।

कबीरमन्शूरका यह चौवीसवाँ प्रकरण अथवा यों कहिये कि, कबीरमन्शूर के पहले भागका यह पहला अध्याय, साधारण पढ़े लिखे कबीरपंथी और अन्य सम्प्रदायवालोंको बहुत खटकता है। उनका कहना है, इसमें वेदकी निन्दा की गयी है; किन्तु उनका यह विचार केवल भ्रममात्र है। यदि वे इसे विचारपूर्वक पढ़ें और ध्यानपूर्वक इसपर सोचें तो, उन्हें ज्ञात होजायगा कि, स्वामी परमा-

नन्दजीने वेदकी कहीं भी निन्दा नहीं की है । उलटा वह वेदको लौकिक पार-लौकिक सुखोंका मार्गदर्शक बतलाते हैं । वेदमंत्रोंकी सिद्धिशक्तिको बड़े जोरोंके साथ प्रामाणित करते हैं । समयके फेरसे वेदोंमें गडबड होनेपर शोक प्रगट करते हैं । संसारके सबसे पुराना धर्मग्रन्थ वेदोंकोही मानते हैं । निराकार निरञ्जन परमात्मा परमेश्वरसे उनका प्राकट्य मानते हैं; इतना करनेपरभी अनसमझ लोग उन्हें वेदनिंदक कहते हैं ।

इसके आगे पीछेके प्रकरणोंको अवलोकन करनेसे पाठकोंको स्वतः ज्ञात हो जायगा । फिर इतना होते हुए भी लोगोंको यह लेख खटकते क्यों हैं ?

इसका उत्तर इसके अतिरिक्त दूसरा क्या हो सकता है कि, प्रथम वेदकी इतनी प्रशंसा करके भी स्वामीपरमानन्दजीका लेख दूसरोंको इसलिये खटकता है कि, स्वामी परमानन्दजी जिस मासिक भूमिकापर बैठकर ग्रन्थ लिख रहे हैं. वह साम्प्रदायिक भूमिका है । आप पक्के कबीरपंथी हैं और जिस प्रकार और पंथवाले साम्प्रदायिक दृष्टिसे अपने मतोंको सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करना चाहते हैं, उसी प्रकार आपभी अपने पंथ और ग्रन्थोंकी श्रेष्ठता प्रमाणित कर, अपने ग्रन्थोंके पाठकोंकी, कबीर और कबीरपंथकी यथार्थ श्रेष्ठता स्वीकार कराना चाहते हैं । इसलिये जो यथार्थ भी आपके कलमसे निकलता है, वह दूसरे साम्प्रदायिक रंगमें डूबे हुएओंको निन्दासा भासता है । दूसरे जो लोग इसे निन्दा समझते हैं वे भी स्वतः विचार शून्य, सुनी सुनाई बातोंके आधारसे मिथ्या पक्षपात पूर्ण होते हैं । जिन्होंने कभी वेद शास्त्रोंका अवलोकन नहीं किया; बरन अधूरे विद्या और ज्ञानवालोंकी लिखी साम्प्रदायिक पुस्तकोंको पढकर अपना विचार बांध लिया है, जिनमें उदारता और दीर्घ दृष्टिका अभाव और मत मतांतरके मिथ्या विश्वासकाही जमाव है, वे विचारें यदि स्वामी परमानन्दजीके लेखोंपर अविचारी दृष्टि डालकर, उन्हें निन्दक समझ लें तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ।

यदि यह ग्रन्थसाम्प्रदायिक ढंगपर न लिखकर साधारण रीति पर लिखा गया होता, तो मेरे विचारसे कभीभी किसीको इसके विषयमें मुँह खोलनेकी हिम्मतही नहीं होती । क्योंकि, वेदके विषयमें स्वामी परमानन्दजीने जो कुछ कबीरमन्शूरमें लिखा है, वह एक प्रकारसे उपनिषद् और गीताके आशयको अपनी भाषामें लिख कर; उसे कबीरपंथी रंगसे रंग दिया है ।

पाठक ! आइये मैं आपको बतलाऊँ कि, किसप्रकारसे स्वामी परमानन्दजीने वेदके विषयमें उपनिषद् और गीताका अनुकरण किया है । पहले स्वामीजीके वाक्योंको देखिये । आप कहते हैं —

“चारों वेद लौकिक पारलौकिक (स्वर्ग आदि) ज्ञानोंके भंडार हैं, इनके उपदेशोंको सुनकर उनके ऊपर चलनेवाला मनुष्य लोकमें सुखी रहता और लोकमें स्वर्गीयोंको सुखोंको पाता है, फिर कर्मके क्षीण होने पर संसारमें जन्म लेता है। यह परसम्बेद अर्थात् संसारकी मर्यादा बना रखने और उसकी बृद्धिका सच्चा कानून है। फिर आप इसी चौवीसवेंही प्रकरणमें लिखते हैं। यही अविनाशी वेद संसारके समस्त ज्ञानके मूल भंडार हैं” इत्यादि। देखो २४ वां प्रकरण पृष्ठ. ४३।

अब मैं आपके सिद्धान्तको उपनिषत् गीताके प्रमाणसे मिलाकर पाठकोंको बतलाता हूँ—

पहले उपनिषत्को लीजिये देखिये वह क्या कहती है—

मुंडक उपनिषत् प्रथम मुंडक.

मंत्र ३ शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिबहुपसन्नः पप्रच्छ । कस्मिन् भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ ३ ॥

शब्दार्थ—प्रसिद्ध महागृहस्थ शौनकने विधिपूर्वक अङ्गिराके निकट आकरके प्रश्न किया “हे भगवन् ! किसको जान लेनेसे सर्वका ज्ञान हो जाता है ॥ ३ ॥

विवेचन—शुकने ऋषिके पुत्र शौनकने भारद्वाज ऋषिके शिष्य महर्षि अङ्गिराकी सेवामें विधिपूर्वक अर्थात् भेंटादि लेकर प्राप्त हुआ और समय देखकर उनसे प्रश्न किया कि, हे भगवन् ! वह क्या है ? जिसके जानलेनेसे सब कुछ जानने में आता है।

शौनकके उपर्युक्त प्रश्नको सुनकर अङ्गिरा ऋषिने उत्तर दिया—मुंडक उपनिषत् मुंडक प्रथमका मंत्र ४ ॥—

तस्मै स होवाच । द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥ ४ ॥

उसपर शौनक ऋषि बोले—दो विद्या जानने योग्य है, उसे ब्रह्मविद् ज्ञानी परा और अपरा कहते हैं अर्थात् जब शौनकने प्रश्न किया तब अङ्गिरा ऋषिने कहा—हे शौनक ! ब्रह्म (वेद) के जाननेवाले तत्वदर्शी महात्मा लोग दो प्रकारकी विद्या बतलाते हैं—उनमें एक परा कहलाती है और दूसरी अपरा। उसमेंसे अङ्गिरा ऋषि पहिले अपरा विद्याको बतलाते फिर पराको ॥ ४ ॥

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥

उसमें—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण,

निरुक्त, छन्द और ज्योतिष अपरा विद्या है—और जिसके द्वारा अक्षर (ब्रह्म) की प्राप्ति होती है वह पराविद्या है ॥ ५ ॥

विवेचन—इन दोनों प्रकारकी विद्या बतलाकर अङ्गिराऋषिने शौनकको बतलाया कि—अपने अंगो सहित चारों वेद अपरा अर्थात् इस पार अर्थात् संसारकी विद्या है—इससे अङ्गिराऋषिने साफ २ कहदिया कि, अपने अंगों—शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष सहित ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद अपरा विद्या है, तो उससे निकले हुए अथवा उसके आधारसे बने हुए जितने शास्त्र पोथी और ग्रन्थ संसारमें हैं और होंगे वे सब अपरा विद्याकेही अन्तर्गत हैं और होंगे ।

परा विद्या तो केवल उसी नामका है जिससे अक्षर अर्थात् कभी न नाश होनेवाला जाना जाता है। इसका आशय यह है कि, उपर्युक्त वेदादिकों द्वारा अक्षर अविनाशी वस्तुकी प्राप्ति नहीं होसकती बरन क्षर और नाशमान् जो लोक परलोक आदि रूप संसार है, उसी की प्राप्ति वृद्धि आदि होसकती है । इसीसे इसे अपरा अर्थात् इसपारकी, नीचेकी अथवा प्राकृतिक, मायिक, संसारिकविद्या कहा । संसारमें रहनेवालोंको, सांसारिक उन्नति चाहने और परलोक जो स्वर्गीदि लोक हैं उनकी कामनावालोंको वेदों द्वारा अवश्य लौकिक पारलौकिक सर्व सुखोंकी प्राप्ति होती है । इसमें कोई सन्देह नहीं है । ऐसे इच्छानुसार सर्व सिद्धि देनेवाले वेदों और उनके मूल प्रणव (ओंकार) की प्रशंसा और बड़ाईमें परमानन्दजीने—कबीर भानुप्रकाश, कबीरमन्शूर, कबीरकौमुदी, तालीम कबीरकलियुग आदि सर्व ग्रन्थोंमें, पत्रोंके पत्र, अध्यायोंके अध्याय लिखा है हाँ । जहाँ परा विद्या की बात आती है, उसे आप स्वसम्बेदका नाम देते हैं और इन वेदादिकोंको परसम्बेदका नाम देकर, आप उपनिषत्के समानही साफ शब्दोंमें बतलाते हैं कि पराविद्या (स्वसम्बेद) की प्राप्ति सच्चे सद्गुरुकी कृपा बिना कदापि नहीं हो सकती चाहे कोई कितनाभी वेद शास्त्रादि पारंगत हो जावे किन्तु, सद्गुरुकी कृपा द्वारा स्वसम्बेदको जाने बिना काल (मन) के जालोंसे छुटकारा कदापि नहीं पा सकता ॥

इसी प्रकार उपनिषत्में बहुत स्थानोंमें इस विषयपर प्रकाश डाला गया है अब गीतामें क्या कहते हैं पाठक उसेभी देखलें —

देखो श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय—३

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।

निर्द्वन्दो नित्यसत्त्वस्थो नियोगक्षेम आत्मवान् ॥ ४५ ॥

अर्थ-तीन गुणोंके विषयवाले वेद हैं, हे अर्जुन ! तू इन तीन गुणोंसे परे हो निर्द्वन्द सदा सत्त्वमें स्थित, योग क्षेमसे रहित और आत्मवान् हो।

इसके ऊपर बहुतोंने व्याख्या किये हैं, दो तीन मतोंका यहाँ दिग्दर्शन कराया-जाता है ।

१ पहिली व्याख्या-हे अर्जुन ! वेद तो तीन गुणोंकी बातोंकोही कहनेवाले हैं अर्थात् तीन प्रकारके गुण सत्त्व, रज, तममें तो लोग फँसे हुए हैं उन्हींको सत्तोगुणी रजोगुणी और तमोगुणी कामनाओंकी पूर्तिके मार्ग वह बतलाते हैं । इन कामनाओं और गुणोंके बन्धनमें जकड़ा हुआ कभी मुक्त नहीं हो सकता । इसलिये हे अर्जुन ! तू इन तीन गुणोंसे परे हो जा अर्थात् वेदोंके घेरेसे बाहर होजा ; नहीं तो, इन्हीं तीनों गुणोंके बनाये हुए स्वर्गादि लोकोंमें भ्रमण करता हुआ, आवागमनके चक्रसे कभी बाहर नहीं निकल सकेगा । क्योंकि, सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणोंकी कामनाओंसे स्वर्ग नरकादि आवागमनके अतिरिक्त विशेष कोई लाभ नहीं होता ।

सुख दुःख लाभ अलाभ, पुण्य, पाप, जीत, हार और शीतोष्णदि द्वन्द्वोंसे रहित सदा सत्यमें स्थित हो अर्थात् इन तीन गुणोंसे परे जो सत्य वस्तु है उसे गुणातीतमें निश्चय रख । शरा बन, कायर और अज्ञानी मत बन । सत्यमें जो स्थित होता अर्थात् सत्यमें जो निवास करता अथवा सत्यमें अद्वार रखता है, सो कभी कायर हो मायिक नाशमान गुणोंमें नहीं फँसता । वह योग क्षेमसे रहित होता है अर्थात् मायिक वस्तुओंकी न तो वह प्राप्त चाहता है न उनकी रक्षाके लिये अपना समय नष्ट करता है । क्योंकि, सत्यका आश्रय लेनेवाला जानता है कि, वे मिथ्या मृगतृष्णाके जलके समान ठगनेवाले और क्षणिक हैं, इस लिये सत्यका आश्रय लेकर तू सावधान हो जा, कभी भी, इन त्रिगुण्यक विषयोंकी कामनाकर उनके वशमें मत आजा । वरन उनके विषयोंसे चित्तकी वृत्तिको हटाकर अपने सत्यात्मामें स्थिति कर । इसीलिये हे अर्जुन ! इन त्रिगुणात्मक मिथ्या संहारमें फँसानेवाले वेदोंसे सदा अलग रह, नहीं तो आवागमनसे कदापि नहीं छूट सकेगा । हे अर्जुन ! इसी प्रकार तू कर्मोंके बन्धनको तोड़कर मोक्षको प्राप्त होगा ।

भगवान्के कहनेका अभिप्राय यह है कि, वेद संसारको वृद्धि करनेवाले और उसीमें रहकर सुख माननेका मार्ग बतलाता है क्योंकि, संसारमें सत्यकी खोज करनेवाले-“लाखनमेंको गने क्रोडन मध्ये एक” के कहावत अनुसार, कोई एक संस्कारी जीवही होते हैं, जो सत्तगुरुकी शरण होकर, सत्यको प्राप्तकर

अक्षय सुखको पाते हैं । नहीं तो संसारमें अधिकांश मनुष्योंकी रुचि सत्तोगुणी तेजोगुणी और तमोगुणी होती है, इससे वे यथार्थ सत्यकी चाहना न करके गुणोंकी प्रेरणासे स्वर्गादिसे लेकर सांसारिक नाशमान सुखोंकीही कामना करते हैं । यह नहीं कि, वे इन्हें नाशमान न जानते हों ? नहीं वे उसे नाशमान भी जानते हैं, क्योंकि, जिन वेद और शास्त्रोंका वे आश्रय लेते हैं, वेही स्वर्गादिक तथा उनके अभिमानी विष्णु ब्रह्मा इंद्रादि देवोंको समय पाकर नाशमान बतलाते हैं । किन्तु गुणोंके प्रभावमें दबी हुई उनकी बुद्धि, उस सत्यको ग्रहण नहीं कर सकती । जिस प्रकार लोभी पुरुष ठगके हाथमें आजाता है और उसीकी लोभ दिलानीवाली बातों से, सत्य मानकर उसी पर भरोसा करता है, उसी प्रकार त्रिगुण कामनाओंमें फँसे हुए जीव सत्यका अनादर कर, लोभ दिलाने वाली, वेदवादकी मिथ्या बातोंकोही सत्य मानते और सत्य कहनेवालोंको नास्तिक निंदक आदि विशेषणोंसे स्मरण करते हैं । इसी बातको भगवान् कृष्ण इसी तीसरे अध्यायके श्लोक ४२, ४३ और ४४ में इस प्रकार वर्णन करते हैं ।

“यामिमां पुष्पितां वाचं प्रबदन्त्यविपश्चितः ।

वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।

क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥ ”

भगवान् कृष्ण कहते हैं—हे पृथापुत्र पार्थ अर्थात् अर्जुन ! जो अविवेकी अर्थात् मूढ़ पुरुष हैं, जो वेदवादमें रत हैं जो वेदवाक्यके अर्थवादमेंही परम प्रीतिवाले हैं वे वेद या उसमें वर्णित नाना कर्मकाण्ड और उनके फलकोही सर्वस्व सर्वोत्तम मानते और कहते हैं कि, इनसे परे कुछभी नहीं हैं । उनकी दृष्टिमें स्वर्गही सब कुछ है । ऐसे मूढ़ पुरुष वेदके उन पुष्पित वाणियों के जालमें पड़े हुए हैं, जो ऊपरसे तो सुन्दर खिले हुए पुष्पके समान परम सुहावना देख पड़ता है, किन्तु उसमें कोई उत्तम गन्ध नहीं होती, केवल देखनेवालेको मोह लेता है । इसी प्रकार वेदकी नाना कामना स्वर्ग आदिकी आशा दिलाने और संसारमें भी नाना सुख ऐश्वर्यको देनेकी आशा दिलानेवाली वेदवाणी पर मोहित होकर अपनी व्यवसायिक अर्थात् उससे परेकी बातको निश्चय करनेवाली बुद्धिको ऐसी कुंठित करलेते हैं कि, उनके सामने सत्य प्रत्यक्ष रूप धारण करके भी खड़ा हो तब भी उसपर उनका विश्वास नहीं होता ।

प्रारंभिक उपोद्घात

ऐसे लोग वेदके त्रिगुणजालमें फँसकर, लोक परलोककी प्राप्तिके नाना आडम्बर युक्त साधनोंमें, फँसे रहकर अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं। और देवादिसे लेकर कीट पतङ्ग तककी नाना योनियोंमें भटकते हुए आवागमनसे छूटने नहीं पाते। ऐसे वेद पशु वेदके उन सुहावने बचन पर मोहित रहते हैं। जिनमें अनेक प्रकारकी कर्म विधि, अग्नि होत्र, दशं, पूर्णिमा ज्योतिष्ठोम इत्यादि सकाम कर्मों तथा लौकिक फल बनाये गये हैं। वे इन वैदिक कर्मोंसे परे अपना कुछ भी कर्तव्य नहीं समझते।

इसी कारणसे उनकी व्यवसायात्मिका अर्थात् सत्यासत्यको निश्चय करनेवाली बुद्धि ऐसी कुंठित और अविश्वासी हो जाती है कि, वह यथार्थको नहीं समझ सकती।

पैतालौसवैश्लोकमें भगवान् कृष्ण इसी लिये अर्जुनसे कहते हैं; ह अर्जुन ! वेद संसारी है। संसारमें बहुत पुरुषोंकी रुचि सत्व रज और तमकी प्रधानतासे निज निज अधिकारानुसार, सांसारिक भोगों ें लिप्सावाली होती है, इस लिये स्वभावतः लोग उसी उसी प्रकारके भोगोंके पानकी कामना करते हैं; इसी लिये वेदोंमें धन, पुत्र, अश्वादि प्राप्तिके उपाय आदि लोक परलोक स्वर्गादिक कामनाकी पूर्ति ें लिये, नाना प्रकारके अनन्त साधनोंका वर्णन किया गया है, जिनके अनुष्ठानसे पुरुषकी सांसारिक कामनाएँ शीघ्र पूरी होती हैं।

इस प्रकार सब वेदोंमें सांसारिक कामनाओं और विषयोंकी पुष्टीकी बहुलता दिखाकर, भगवान् कृष्ण अर्जुनको यह उपदेश देते हैं कि, हे अर्जुन ! तुझे ऐसी श्रांतिमें नहीं पड़ना चाहिये कि, "जब वेद इसी प्रकारके उपदेश देते और उपाय बतलाते हैं तो हमें वही करना चाहिये, यही मनुष्यका कर्तव्य है" नहीं ! नहीं ! मनुष्य जन्मकी सफलता इसीमें नहीं हैं इसका तो इनसे बहुत ऊंचा पद परमानन्द प्राप्तिके लिये यथार्थ पदको प्राप्त करना इसका असली कर्तव्य है।

इसी लिये तू गुणातीत हो। इन त्रिगुणात्मक वेदोंके झगड़ोंसे अलग होकर इन फँसानेवाली कामनाओंका त्याग करदे। इन कामनाओंसे परे होनेके लिये तुझे उत्साह और धीरज रखकर शीतोष्णादि नाना प्रकारके सांसारिक क्लेशोंके सहनेकेलिये तत्पर रहना पड़ेगा। तुझे लोक परलोक सबको ठुकराकर, सत्यकी ओर जाना पड़ेगा, फिर काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि आपही आप तुझसे डर कर अलग हो जायेंगे।

ग्रन्थकर्ताकी विज्ञप्ति

दूसरी व्याख्या इस प्रकार है—

वेदोंका विषय तीन गुणोंका कार्य है अथवा तीन गुण और उनके कार्योंके प्रकाशक वेद हैं। अभिप्राय यह है कि, तीन गुणोंके अन्दर ही अन्दर वेदोंका कथन है। जितना उपदेश संसारमें होता है, वह सब इन्हीं तीन गुणोंके भीतरही भीतर हो सकता है। क्योंकि जो वाणीकी आज्ञा है सो सब तीन गुणोंका ही कार्य हो जाता है। वाणीकाही क्या ? मनकाभी विषय मायाकेही अन्तर्गत है। “गो गोचर जहँ लग मन जाई । तहँ लगि माया जानहु भाई ॥” गुणातीत वस्तु अकथनीय अचिन्तनीय और निरूपदेश है, इसके लिये श्रुति स्वयम् कहती है “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” जहांसे वाचा सहित मन उसे न पाकर पीछे लौट आती है। इसी लिये मुण्डक उपनिषत्में वेद और वेदाङ्गको अपराविद्या कहा है।

जिस विद्यासे यथार्थ ब्रह्म न जाना जाय, न ठीक दर्शाया जासके, उसे अपरा विद्या कहते हैं और वेदोंमें प्रायः सांसारिक कामना युक्त, सकाम कर्मों और अपरब्रह्म (हिरण्यगर्भादि) की ही पूजा वर्णित है। अपराविद्याकी हद्द यहाँही तक है। जो इस अपरा विद्या तकही ठहर जाते हैं वे परा विद्याको कैसे प्राप्त कर सकते हैं ? और पराविद्याको पाये बिना त्रिगुणके जालसे कैसे छूट सकते हैं ? इसलिये हे अर्जुन ! तू ऐसी पुष्पित त्रिगुणात्मक वाणीवाले वेदोंसे सावधान हो, उनमें आसक्त मत हो। इत्यादि ॥

इसी प्रकारसे गीताके अनेक भाष्यकारोंने अपनी अपनी युक्ति प्रयुक्त द्वारा अनेक प्रकारसे इसका अर्थ किया है किन्तु, वेदके त्रिगुणात्मक होनेमें सब एक मत हैं। कइयोंने तो आत्मतत्वकी प्राप्तिके लिये त्रिगुणात्मक वेदोंका सर्वथा-ही त्याग बतलाया है।

आधुनिक प्रसिद्ध टीकाकारोंमें लोकमान्य तिलक अपनी टीकामें क्या लिखते हैं, यह भी दिखाता हूँ ॥

देखो लोकमान्य तिलककी टीका गीताके श्लोक ४३-४४-४५ तीसरा अध्याय ॥

(४२) हे पार्थ ! (कर्मकाण्डात्मक) वेदोंके (फलश्रुति फल) वाक्योंमें भूले हुए और यह कहनेवाले मूढ़ लोग कि, इसके अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है बढाकर कहा करते हैं कि, (४३) “अनेक प्रकारके (यज्ञ-याग आदि) कर्मों-, सेही (फिर) जन्म रूप फल मिलता है और (जन्म जन्मान्तरमें) भोग तथा ऐश्वर्य मिलता है” स्वर्गके पीछे पड़े हुए वे काम्य बुद्धिवाले (लोग) (४४) में

कबीर मन्शूर (छोटा)

उल्लिखित भाषणकी ओरही उनके मन आकर्षित हो जानेसे, भोग और ऐश्वर्य-मैंही गर्क रहते हैं, इस कारण, उनकी व्यवसायात्मिका अर्थात् कार्य्य अकार्य्यका निश्चय करनेवाली बुद्धि कभीभी समाधिस्थ अर्थात् एक स्थानमें स्थिर नहीं रह सकती ।

(४५) हे अर्जुन ! वेद उस रीतिसे त्रैगुण्यकी बातोंसे भरे पड़े हैं इसलिये तू निस्त्रैगुण्य अर्थात् त्रिगुणोंसे अतीत, नित्य, सत्त्वस्थ और सुख दुःख आदि द्वन्द्वोंसे अलिप्त हो, एवं योग क्षेत्र आदि स्वार्थोंमें न पड़कर आत्मनिष्ठ हो ।

इसी प्रकार सनातन धर्मावलम्बी और वेदान्ती आदि सभी टीकाकारोंने वेदको त्रिगुणात्मक बतलाकर उसके जालमें न पड़नेकी ताकीद की है । तो फिर इस कबीरमन्शूरमें स्वामी परमानन्दजीने जो वेदोंको सांसारिक अथवा प्राकृतिक कहा तो कौनसा अपराध किया । वेद जब स्वतः अपनेको अपरा विद्या कहते हैं तब उसी बातको दूसरा कहे तो बुरा माननेकी कोई बात नहीं है ।

स्वामी परमानन्दजीने अपने "कबीर कौमुदी" नामक ग्रन्थमें वेदकी बहुत बड़ाई की है । आपने साफ लिखा है जो संसारमें रहकर वेदको नहीं मानता वह संसारके सब कष्ट अपने ऊपर बुलालेता है हाँ ! मुक्तिके लिये संसार बन्धनसे छूटनेके लिये, सद्गुरुसे स्वसम्बेदको जानकर उसका अनुकरण करना आवश्यक बतलाया है । गुरुबोधमें राम रहस्य साहबभी कहते हैं—

"गृहधर्म बड खटपट, तामें रहू हुशियार ।

लोक वेदकी रीति सब, करू सहित विचार ॥"

आगे चलकर इसी कबीरमन्शूर ग्रन्थमें स्वामी परमानन्दजीने वेद और हिंदू धर्मकी इतनी स्तुति की है कि, आप साफ शब्दोंमें कहते हैं "हिंदू धर्मही एक ऐसा धर्म है कि, जो मनुष्यको सद्गुरुकी शरण प्राप्त करानेका अधिकारी बनाता है ।" कहाँतक कहें, यदि कोई पूर्वापरका विचार किये बिनाही किसी बातके अर्थ और भावको न समझे और अपनी अनसमझीसे दुःखी होवे तो कोई क्या कर सकता है ।

इसलिये कबीरमन्शूरके पाठकोंसे मेरा निवेदन है कि, वह पूर्वापर विचारें बिनाही, इस ग्रन्थके विषयमें, अपना विचार न बाँध बैठे इसे आद्योपान्त पढ़-जायें फिर उनको पता लगेगा कि, स्वामी परमानन्दजी वेदके प्रशंसक हैं या निन्दक ।

प्रायः कई लोगोंने स्वतः कबीर साहबको भी वेदका निन्दक लिखमारा

तालीम कबीर कलियुग

है किन्तु, कबीरकी वाणी और सिद्धान्तको समझे बिनाही उनका यह मिथ्या प्रलाप है ।

कबीर साहबका स्वतः बीजक में ही वचन है—

“ वेद इसस्मृति कहै किन झूठा जो न विचारे ” साखीमें आप कहते हैं—
जाको मुनिवर तप करें, वेद थके गुण गाय ।
सोई देउँ सिखापना, कोइ नहीं पतियाय ॥

इस साखीको लेकर कई लोग शंका कर बैठते हैं कि, बाह कबीर साहब भी तो वही कहते हैं कि, जिसको वेद और ऋषि मुनि कहते हैं । किन्तु, ऐसी शंका करनेवाले बड़ी भूल करते हैं, वे इस साखीके अर्थ पर ठीक ठीक ध्यान नहीं देते— इस साखीमें साफ साफ कहा है “ वेद थके गुण गाय ” अर्थात् जिसका गुण गाते २ अर्थात् जिसको ढूंढते ढूंढते वेद भी थककर “ नेति नेति ” “ न इति न इति ” “ यह नहीं ? यह नहीं ” कहकर मौन धारण कर लेता है । और मुनि ऋषि तप द्वारा जिसको खोजते खोजते हार जाते हैं, विद्वान् पण्डित सर्व विद्या-सम्पन्न होकर भी जिसको नहीं पासकते, उसीके पहचानकी मैं सिखावन देता हूँ किन्तु, वेद और तपादिकों के जालमें पड़े हुए विद्वान् ऋषि मुनि लोग विद्या और तप आदिके अभिमानमें मेरी बात नहीं मानते ।

इस बातका प्रमाण छान्दोग्य उपनिषत्के सातवें ब्राह्मणमें नारद और सनत्कुमारकी गाथासे मिलता है । अवसर पाकर वहभी किसी स्थानमेंदिखानेका प्रयत्न करूँगा ।

अनुवादक—

श्रीयुगलानन्द बिहारी ।

पचीसवाँ प्रकरण

वेदके प्राकट्यपर मतभेद ।

बहुतलोग ऐसा अनुमान करते हैं कि ये वेद ईश्वरकी वाणी हैं तथा उसीने आदित्य, अग्नि, वायु, अङ्गिरा इन चार ऋषियोंद्वारा इनको प्रगट और प्रचलित किया है । मैं पहिले लिख आया हूँ कि, निरञ्जनने कूर्मजीसे रचनाका सामान लिया कूर्मजीका तीन शिर जब निरञ्जनने अपने नखोंद्वारा काट दिया तब उनके पेटके भीतर सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रादि निकल पड़े और अग्नि, आदित्य, वायु, अङ्गिरा, उसी समय प्रकट हो गये । उस समय ब्रह्मा प्रकट नहीं हुए थे

बड़ा कबीर मन्शूर

इस कारण वेदका ज्ञान तथा प्रकाश उन ऋषियोंमें पहलेसे होता है। अग्नि देवता स्वयं निरञ्जनजी हैं। आदित्य नाम सूर्यका है, उस सूर्यको भी वेदका ज्ञान होता है, उसके मध्य प्रकाश होता है, सुतरां गीतामें कृष्णने अर्जुनसे कहा है कि, अर्जुन ! जिस ज्ञानको आज तुझसे मैंने कहा है, उसको पूर्वमें मैंने सूर्यसे कहा था। तब अर्जुनने कहा कि, हे महाराज ! आप तो अब उत्पन्न हुए हैं और सूर्य तो पुराना देवता है। तब कृष्णने कहा कि हे अर्जुन ! मेरे और तेरे जन्म अनन्तबार हुए हैं, तू अपने पूर्वजन्मोंके वृत्तान्तको नहीं जानता, मैं जानता हूँ, इस प्रकार प्रमाणित होता है कि, ब्रह्मासे पूर्व सूर्य था। अग्नि देवता स्वयम् निरंजन हैं और जो निरंजन हैं वही कृष्ण हैं, निरंजन तथा कृष्णमें तनिक भी विभिन्नता नहीं है सो वास्तवमें कृष्णने पहले सूर्यसे कहा था। वेद तथा गीतामें कुछभी विभिन्नता नहीं, इस कारण ये ऋषि मनुष्योंकी उत्पत्तिसे पहले ठहरे और ब्रह्मा पीछे उत्पन्न हुआ, इसी कारण कहा जाता है कि, ब्रह्माने आदित्य और अग्निसे ज्ञान सीखा। अग्नि तथा सूर्य दोनों एकही रूप हैं—परन्तु ये ऋषि-गणभी वेद प्रचारक ठहर नहीं सकते, कारण यह कि, जगत् ब्रह्माके संकल्पसे हुआ है।।

कबीरसाहबने ग्रंथ अनुरागसागरमें प्रगट कहा है—देखो गायत्री तथा अच्छाके वात्सलापमें—हे गायत्री ! तू ब्रह्माको ले आ। कारण यह कि, बिना ब्रह्माके इस जगत्की रचना नहीं हो सकती ? इस कारण इस जगत्को ब्रह्माने बनाया। ब्रह्मा द्वारा मनुष्योंको वेद मिले। सब ऋषि मुनि तथा राजा प्रजा ब्रह्मा द्वारा वेद पाते हैं और उसीकी आज्ञाओं पर चलते हैं।

वेदोपनिषद् प्रजापतिके उत्पत्तिपर्वमें देखो—लिखा है कि, सबसे पहले प्रजापति उत्पन्न हुए तब सूर्यको देखा और उसको खानेके लिये हाथ पसारा। जब प्रजापतिने सूर्यको पकड़कर खानाना चाहा, तब सूर्यने भयभीत होकर अपने मुंहसे “यहाँ” का शब्द किया। तब प्रजापतिने सूर्यको भोजनकी वस्तु न समझ कर नहीं खाया छोड दिया और अन्य प्रकारकी सहस्रों वस्तुएँ अपने भोजन योग्य बनायी।

फिर योगवासिष्ठमें लिखा है कि, पहाडपर बसिष्ठ नामक एक ब्राह्मण था, उसके दश बेटे थे। इन दशों पुत्रोंने बड़ी तपस्या की और उन्होंने अपनी उस तपस्याका वर यह माँगा कि, हम दशों भाई ब्रह्मा हो जावें और वे सब ब्रह्मा हो गये। इन दशों ब्रह्माके निमित्त, दश ब्रह्माण्ड प्रकट हुवा उन्हीं दश ब्रह्माण्डोंमें यह एक ब्रह्माण्ड हमारा है। जब हमारे ब्रह्माण्डका ब्रह्मा प्रकट हुआ, तब जगत्को

देखकर आश्चर्यान्वित हुआ और अपने मनमें सोचने लगा कि, इस सृष्टिका कर्ता कौन है ? यह बात किससे पूछूं ? तब सूर्यको सामने देखकर उसने पूछा कि, हे सूर्य ! तू मुझको बतला कि, इस सृष्टिका उत्पन्नकर्ता कौन है ? तब सूर्यने उत्तर दिया कि, हे ब्रह्मा ! मुझको अत्यंत आश्चर्य है कि, तू अपने कार्योंसे स्वयम् अनभिज्ञ है पर तूने जो पूछा सो मैं तुझसे कहता हूँ । तब सूर्यने ब्रह्माको पूर्वजन्मकी सब कहानी कह सुनायी और कहा कि, हे ब्रह्मा ! यह जगत् तेरेही संकल्पसे बना है और इसका कर्ता तूही है । यह ब्रह्माण्ड तेरा है । ऐसी ही अपनी अज्ञानावस्थामें ब्रह्माने सूर्य तथा अग्नि देवतासे विद्याध्ययन किया । इससे प्रमाणित है कि, ब्रह्मासे पूर्व अग्नि और आदित्य इत्यादि थे, इसी कारण ब्रह्माने अग्नि और सूर्य इत्यादिसे ज्ञान लाभ किया और विद्या सीखी ।

छब्बीसवाँ प्रकरण

ब्रह्मासे ऋषिमुनियोंकी श्रेष्ठता ।

ब्रह्मा तो सांसारिक मनुष्य है इस कारण उसकी आयुकी सीमा है, समय पाकर मर जाता है और फिर जन्म पाता है । पर ऋषिमुनिकी आयु तथा उनके अधिकार प्रभुत्व अनन्त हैं । वे ऋषि मुनि जो हंस कबीर कहलाते हैं उनका जन्म मरण तो कभी होताही नहीं, वे आवागमनसे रहितही हैं, पर वे ऋषि जो योग समाधि साधन प्राणायाम इत्यादि करते हैं वेभी योग तथा कायाकल्प इत्यादिके प्रभावसे, मार्कण्डेय, गुप्तमुनि तथा धनुषमुनि इत्यादिके समान अनेक युगों पर्यन्त जीवित रहते हैं, जब मृत्यु आती है तब प्राणायाम द्वारा बचते हैं और जब वृद्ध हो जातेहैं तब कायाकल्प द्वारा, फिर युवक हो जाते हैं, इस प्रकार ब्रह्माकी आयुसे ऋषियोंकी आयु विशेष है, वे महाप्रलयसे बच सकते हैं, इस प्रकार ऋषियोंकी आयु तथा विद्या ब्रह्मासे बढ़कर है । जैसे अग्नि देवता अथवा अग्नि ऋषि अथवा आदित्य ऋषि वायु देवता अथवा वायु ऋषि और अङ्गिरा ऋषि इत्यादि बड़े विद्वान् तथा सामर्थ्यी हैं ।

यह जगत् अनेकबार उत्पन्न हुआ और मिटजावेगा और अनगिनती ब्रह्मा विष्णु महेशादि हुए और अभी होंगे तथा इस समयभी वर्त्तमानहैं, भिन्न २ ब्रह्माण्डोंमें राज्य कर रहे हैं और प्रभुत्व भोग रहे हैं । इस रचनाकी कोई सीमा तथा अवधि नहीं है, अनगिनती ढंगपर रचना हुई और होती है, उन्हीं अनगिनती ब्रह्माण्डोंमेंसे एक ब्रह्माण्ड हमारा है, जिसके प्रबंधकर्त्ता तथा शासक

ब्रह्मा, विष्णु, महेश ठहराये गये और इन चारों वेदोंके कर्ता धर्ता येही नियुक्त हुए संसारी जीवोंके निमित्त तो यही चारों परमसंवेद है और जो इन ज्ज्जालोंसे छूटा चाहें और मुक्ति पाना चाहें, उनके निमित्त स्वसंवेद है ।

ये दोनों वेद उसी साहबके हैं, जबतक जीव सांसारिक कामनाओंमें बद्ध है और उसीमें सुखी और प्रसन्न है, तबतक परसम्वेदके अधीन रहे और जब इन ज्ज्जालोंसे उसका मन उचट जावे तब, स्वसम्वेदकी शिक्षाओंका अनुसरण करे । छोटा बच्चा जबतक अनजान रहता है तबतक उसके माता पिता उसको धूल मिट्टी और खेल कूदमें संलग्न रहनेसे वर्जित नहीं करते । पर जब बच्चा समझदार होता है, तब उसको मना करते हैं कि, अब खेल कौतुकका समय नहीं है, अब बुद्धि ठिकाने करके विद्योपार्जन करो और अपनी जड़को समझो और मुक्ति प्राप्त करो ।

सत्ताईसवाँ प्रकरण

वेद और किताबोंके मूलका वर्णन ।

जैसे वेदके माननेवाले इस बातका दावा करते हैं कि, वेद ईश्वरकी वाणी है—वैसे ही मुसलमानोंकाभी कथन है कि, उनका कुरान खुदाका कलाम है (बचन है) ऐसे ही यहूदी तौरीतको अल्लाहकी वाणी समझते हैं, सबोंके पास तो परमेश्वरकी वाणी आयी और उसको पढ पढकर सभी आनन्दित हो रहे हैं । पर यह बडे आश्चर्यकी बात है कि, परमेश्वरको न किसीने जाना और न पहचाना, उन्हें जरा भी खबर नहीं हुई कि, वह कहाँ रहता है तथा क्या वस्तु है ? देखो स्वयम् कुरानही कहती है कि, मैं चुनी गयी, एक बडे कुरानसे । यह बात स्पष्ट प्रमाणित है कि, कुरान नकल की गयी है, एक बडी साफ और शानवाली कुरानसे । किन्तु मुसलमानोंको इस बातकी तनिक भी सुध नहीं है कि वह शानवाला कुरान कहाँ है और वह कुरान किसी दूसरी जातीके पास है अथवा नहीं ? बहुतेरे मुसलमानोंका कहना है कि, वह बडा कुरान किसी लौहमहफूज पर है । जब इतनी सुधभी मुसलमानोंको नहीं है कि, यह कुरान किस शानवाले कुरानकी नकल है तो फिर कुरानके परमेश्वरकी वाणी होनेका क्या प्रमाण है, न उसपर खुदाकी मुहर है और न उसपर उसका हस्ताक्षर है । जब न परमेश्वरके वाक्यको पहचाना और न खुदाको जाना, फिर बंधन तथा मुक्ति कैसे हो सकती है ? और नर्क बैकुण्ठ और दुःख सुखका क्या परिणाम है ?

तारीख खातमा

अन्तमें सब भ्रमही भ्रमकी बातें ठहरेंगी । जबतक मनुष्यमें निर्मल विचार नहीं आता, जबतक मिथ्याको सत्य तथा सत्यको मिथ्या मान रहा है और यथार्थतासे वंचित है ।

अष्टाईसवाँ प्रकरण

वेदोंकी आज्ञाका पालन कहाँ और कबतक अवश्यमेव माननीय है ? उनचास करोड योजन निरञ्जनका शरीर है । सो हमारा यह ब्रह्माण्ड है और इस ब्रह्माण्डके रहनेवालोंके निमित्त इस वेदका अनुसरण करना उचित ठहराया गया जबतक मनुष्य इस ब्रह्माण्डके भीतरके पदार्थोंमें आसक्त रहेगा तबतक इसके भीतर बन्द रहेगा और वेदोंकी आज्ञाओंका अनुसरण करनाही पड़ेगा, जैसे यह ब्रह्माण्ड उनचास करोड योजनका है वैसे ही इस ब्रह्माण्डसे दूना कूर्मजीका शरीर है । इस कारण वह इससे बड़ा ब्रह्माण्ड है । इस प्रकार कोई बड़ा कोई छोटा अगणित ब्रह्माण्ड हैं उन अगणित ब्रह्माण्डोंमें अनन्त प्रकारकी रचनायें हैं, जिनका विवरण हो नहीं सकता । प्रत्येक ब्रह्माण्डके निमित्त एक एक शासक तथा राजा हैं जो, उनके ईश्वर कहलाते हैं और उन ब्रह्माण्डोंके रहनेवाले उसीको अपना कर्त्ता तथा स्वामी जानते हैं । जैसे भेड बकरियाँ अपने चरवाहेके अतिरिक्त दूसरेको नहीं जानतीं; यही अवस्था अल्पज्ञोंकी है, वे क्या जानें कि, असली परमेश्वर क्या है ?

उनतीसवाँ प्रकरण

समुद्रमंथन तथा तीन कन्याओंका वृत्तान्त ।

*अब पहला विवरण पुनः आया । देखो ग्रन्थ स्वासगुञ्जार और अनुरागसागरमें लिखा है कि, जब इस प्रकार वेद प्रकट हो गये, तब, निरञ्जनने यह काम किया कि, चारों वेदोंको आज्ञा दी कि, तुम जाकर समुद्रमें छिप रहो । उधर आदि भवानोंने अपने शरीरसे तीन कन्याएँ प्रकट कीं और उनको आदेश दिया कि, तुम समुद्रमें जाकर छिप रहो । अपनी माताकी आज्ञा पातेही वह तीनों कन्याएँ जाकर रत्नाकरमें छिप गईं । यह कौतुक जो अध्याने किया इसे ब्रह्मा विष्णु महेश तीनोंने नहीं जाना । इसके उपरान्त निरञ्जनने अध्याको कहा कि, वह अपने तीनों पुत्रोंको समुद्र मथनेकी आज्ञा देवे । तब अध्याने तीनों पुत्रोंसे कहा कि, तुम जाकर समुद्र मथो और तीनोंने ऐसाही किया । समुद्रमेंसे

बहुतेरी वस्तुएँ निकलीं, जिन्हें लोग चौदह रत्न कहते हैं। फिर उन सब वस्तुओंको तीनों भाइयोंने ज्योंका त्यों लाकर अपनी माताके समक्ष रख दिया। तब उनकी माताने उन वस्तुओंको उन तीनोंमें बाट दिया। सरस्वती तथा चार वेद ब्रह्माके भागमें आये, लक्ष्मी विष्णुके बखरोंमें पड़ गयी और सती शिवको मिलीं। तीनों भाई पत्नियोंको पाकर अत्यंत हर्षित हुए इन्हीं तीनोंके वंशसे समस्त संसार है।

तीसवाँ प्रकरण

ब्रह्माका वेदपाठ और पिताकी जिज्ञासा।

जब ब्रह्माने वेद पाया और उसको पढ़ा तब उसमें देखा कि, एक विराट पुरुष है जिसका शिर आकाशमें और पावें पातालमें, चारों दिशा उसके कान और सूर्य चन्द्र उसके नेत्र हैं—

ब्रह्मा वेद पठन तब लाग। पठत वेद तब भा अनुरागा।

कहे वेद पुरुष इक आही। है निरंकार रूप नहीं ताही ॥

शून्य माहि वह जोत दिखावे। चितवत देह दृष्टि न आवे ॥

स्वर्ग सीस पग आहि पताला। तेहि मत ब्रह्मा भौ मतवाला ॥

चतुरानन कहि विष्णु बुझाया। आहि पुरुष मोहि वेद लखाया ॥

पुनि ब्रह्मा शिवको अस कहई। वेद मथत पुरुष इक अहई ॥

(अनुराग सागर)

तब ब्रह्माने विष्णुसे कहा कि, देखो भाई विष्णु ! वेद इसी विराट पुरुषको बतलाता है और भाई शिव आप भी सुनो और देखो; वेद बतलाता है कि, एक पुरुष ऐसा है जिसकी मूर्ति शून्यमें दिखाई देती है। तब ब्रह्मा अपनी माताके समीप जाकर कहने लगे कि, हे माता ! वेद बतलाता है और उसमें स्पष्ट लिखा है कि, एक पुरुष है और तू कहती है कि कोई नहीं; यह बात सुनकर अध्याने कहा कि बेटा, ! यदि तुझको अपने पिताके दर्शनोंकी अभिलाषा है, तो तू अक्षत तथा पुष्पादि लेकर जा और उसका दर्शन तथा पूजाकर आ। माताकी आज्ञा पातेही ब्रह्मा अक्षतादि लेकर उत्तरकी ओर चल पड़े और जाते जाते उस स्थान तक पहुँचे जहाँ तनिकभी सूर्यकी ज्योति नहीं थी, और पूर्णतया अंधकार था—वहाँ पर जाकर ब्रह्मा अपने पिताके दर्शनकी कामनासे समाधि लगाकर बैठ गये ॥