भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

दानवोंके मायामय युद्धका वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

दानवोंके मायामय युद्धका वर्णन

अर्जुन उवाच

ततोऽश्मवर्षं सुमहत् प्रादुरासीत् समन्ततः ।
नगमात्रैः शिलाखण्डैस्तन्मां दृढमपीडयत् ॥ १ ॥
**अर्जुन बोले—**महाराज! तदनन्तर चारों ओरसे पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा आरम्भ हो गयी। वृक्षोंके बराबर ऊँचे शिलाखण्ड रणभूमिमें गिरने लगे, इससे मुझे बड़ी पीड़ा हुई ॥ १ ॥

तदहं वज्रसंकाशैर्महेन्द्रास्त्रप्रचोदितैः ।
अचूर्यणं वेगवद्भिः शरजालैर्महाहवे ॥ २ ॥
तब मैंने महेन्द्रास्त्रसे अभिमन्त्रित वज्रतुल्य वेगवान् बाणोंद्वारा उस महासमरमें गिरनेवाले समस्त शिला-खण्डोंको चूर-चूर कर दिया ॥ २ ॥

चूर्ण्यमानेऽश्मवर्षे तु पावकः समजायत ।
तत्राश्मचूर्णान्यपतन् पावकप्रकरा इव ॥ ३ ॥
पत्थरोंकी वर्षाके चूर्ण होते ही सब ओर आग प्रकट हो गयी। फिर तो वहाँ आगकी चिनगारियोंके समूहकी भाँति पत्थरका चूर्ण पड़ने लगा ॥ ३ ॥

ततोऽश्मवर्षे विहते जलवर्षं महत्तरम् ।
धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीन्ममान्तिके ॥ ४ ॥
तदनन्तर मेरे बाणोंसे वह पत्थरोंकी वर्षा शान्त होनेपर महत्‍तर जल-वृष्टि आरम्भ हो गयी। मेरे पासही सर्पोंके* समान मोटी जलधाराएँ गिरने लगीं ॥ ४ ॥

नभसः प्रच्युता धारास्तिग्मवीर्याः सहस्रशः ।
आवृण्वन् सर्वतो व्योम दिशश्चोपविशस्तथा ॥ ५ ॥
आकाशसे प्रचण्ड शक्तिशालिनी सहस्रों धाराएँ बरसने लगीं, जिन्होंने न केवल आकाशको ही, अपितु सम्पूर्ण दिशाओं और उपदिशाओंको भी सब ओरसे ढक लिया ॥ ५ ॥

धाराणां च निपातेन वायौर्विस्फूर्जितेन च ।
गर्जितेन च दैत्यानां न प्राज्ञायत किंचन ॥ ६ ॥
धाराओंकी वर्षा, हवाके झकोरों और दैत्योंकी गर्जनासे कुछ भी जान नहीं पड़ता था ॥ ६ ॥

धारा दिवि च सम्बद्धा वसुधायां च सर्वशः ।
व्यामोहयन्त मां तत्र निपतन्त्योऽनिशं भुवि ॥ ७ ॥

स्वर्गसे लेकर पृथ्वीतक एक सूत्रमें आबद्ध-सी होकर पृथ्वीपर सब ओर जलकी धाराएँ लगातार गिर रही थीं, जिन्होंने वहाँ मुझे मोहमें डाल दिया था ॥ ७ ॥ तत्रोपदिष्टमिन्द्रेण दिव्यमस्त्रं विशोषणम् । दीप्तं प्राहिणवं घोरमशुष्यत् तेन तज्जलम् ॥ ८ ॥ तब मैंने वहाँ देवराज इन्द्रके द्वारा प्राप्त हुए दिव्य विशोषणास्त्रका प्रयोग किया, जो अत्यन्त तेजस्वी और भयंकर था। उससे वर्षाका वह सारा जल सूख गया ॥ ८ ॥ हतेऽश्मवर्षे च मया जलवर्षे च शोषिते । मुमुचुर्दानवा मायामग्निं वायुं च भारत ॥ ९ ॥ भारत! जब मैंने पत्थरोंकी वर्षा शान्त कर दी और पानीकी वर्षाको भी सोख लिया, तब दानवलोग मुझपर मायामय अग्नि और वायुका प्रयोग करने लगे ॥ ९ ॥ ततोऽहमग्निं व्यधमं सलिलास्त्रेण सर्वशः । शैलेन च महास्त्रेण वायोर्वेगमधारयम् ॥ १० ॥ फिर तो मैंने वारुणास्त्रसे वह सारी आग बुझा दी और महान् शैलास्त्रका प्रयोग करके मायामय वायुका वेग कुण्ठित कर दिया ॥ १० ॥ तस्यां प्रतिहतायां ते दानवा युद्धदुर्मदाः । प्राकुर्वन् विविधां मायां यौगपद्येन भारत ॥ ११ ॥ भारत! उस मायाका निवारण हो जानेपर वे रणोन्मत्त दानव एक ही समय अनेक प्रकारकी मायाका प्रयोग करने लगे ॥ ११ ॥ ततो वर्षं प्रादुरभूत् सुमहल्लोमहर्षणम् । अस्त्राणां घोररूपाणामग्नेर्वायोस्तथाश्मनाम् ॥ १२ ॥ फिर तो भयानक अस्त्रोंकी तथा अग्नि, वायु और पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी जो रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी ॥ १२ ॥ सा तु मायामयी वृष्टिः पीडयामास मां युधि । अथ घोरं तमस्तीव्रं प्रादुरासीत् समन्ततः ॥ १३ ॥ उस मायामयी वर्षाने युद्धमें मुझे बड़ी पीड़ा दी। तदनन्तर चारों ओर महाभयानक अन्धकार छा गया ॥ १३ ॥ तमसा संवृते लोके घोरेण परुषेण च । हरयो विमुखाश्चासन् प्रास्खलच्चापि मातलिः ॥ १४ ॥ घोर एवं दुःसह तिमिरराशिसे सम्पूर्ण लोकोंके आच्छादित हो जानेपर मेरे रथके घोड़े युद्धसे विमुख हो गये और मातलि भी लड़खड़ाने लगे ॥ १४ ॥ हस्ताद्धि रश्मयश्चास्य प्रतोदः प्रापतद् भुवि । असकृच्चाह मां भीतः क्वासीति भरतर्षभ ॥ १५ ॥

उनके हाथसे घोड़ोंके लगाम और चाबुक पृथ्वीपर गिर पड़े और वे भयभीत होकर बार-बार मुझसे पूछने लगे— 'भरतश्रेष्ठ अर्जुन! तुम कहाँ हो?' ॥ १५ ॥ मां च भीराविशत् तीव्रा तस्मिन् विगतचेतसि । स च मां विगतज्ञानः संत्रस्तमिदमब्रवीत् ॥ १६ ॥ मातलिके बेसुध होनेपर मेरे मनमें भी अत्यन्त भय समा गया। तब सुध-बुध खोये हुए मातलिने मुझ भयभीत योद्धासे इस प्रकार कहा— ॥ १६ ॥ सुराणामसुराणां च संग्रामः सुमहानभूत् । अमृतार्थं पुरा पार्थ स च दृष्टो मयानघ ॥ १७ ॥ 'निष्पाप कुन्तीकुमार! प्राचीन कालमें अमृतकी प्राप्तिके लिये देवताओं और दैत्योंमें अत्यन्त घोर संग्राम हुआ था, जिसे मैंने अपनी आँखों देखा है ॥ १७ ॥ शम्बरस्य वधे घोरः संग्रामः सुमहानभूत् । सारथ्यं देवराजस्य तत्रापि कृतवानहम् ॥ १८ ॥ 'शम्बरासुरके वधके समय भी अत्यन्त भयानक युद्ध हुआ था। उसमें भी मैंने देवराज इन्द्रके सारथिका कार्य सँभाला था ॥ १८ ॥ तथैव वृत्रस्य वधे संगृहीता हया मया । वैरोचनेर्महायुद्धं दृष्टं चापि सुदारुणम् ॥ १९ ॥ 'इसी प्रकार वृत्रासुरके वधके समय भी मैंने ही घोड़ोंकी बागडोर हाथमें ली थी। विरोचनकुमार बलिका अत्यन्त भयंकर महासंग्राम भी मेरा देखा हुआ है ॥ १९ ॥ एते मया महाघोराः संग्रामाः पर्युपासिताः । न चापि विगतज्ञानोऽभूतपूर्वोऽस्मि पाण्डव ॥ २० ॥ 'ये बड़े-बड़े भयानक युद्ध मैंने देखे हैं, उनमें भाग लिया है, परंतु पाण्डुनन्दन! आजसे पहले कभी भी मैं इस प्रकार अचेत नहीं हुआ था ॥ २० ॥ पितामहेन संहारः प्रजानां विहितो ध्रुवम् । न हि युद्धमिदं युक्तमन्यत्र जगतः क्षयात् ॥ २१ ॥ 'जान पड़ता है, विधाताने आज समस्त प्रजाका संहार निश्चित किया है, अवश्य ऐसी ही बात है। जगत्के संहारके अतिरिक्त अन्य समयमें ऐसे भयानक युद्धका होना सम्भव नहीं है' ॥ २१ ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । मोहयिष्यन् दानवानामहं मायाबलं महत् ॥ २२ ॥ अब्रुवं मातलिं भीतं पश्य मे भुजयोर्बलम् । अस्त्राणां च प्रभावं वै धनुषो गाण्डिवस्य च ॥ २३ ॥ अद्यास्त्रमाययैतेषां मायामेतां सुदारुणाम् । विनिहन्मि तमश्चोग्रं मा भैः सूत स्थिरो भव ॥ २४ ॥

मातलिका यह वचन सुनकर मैंने स्वयं ही अपने-आपको सँभाला और दानवोंके उस महान् मायाबलका निवारण करते हुए भयभीत मातलिसे कहा—‘सूत! आप डरें मत। स्थिरतापूर्वक रथपर बैठे रहें और देखें, मेरी इन भुजाओंमें कितना बल है? मेरे गाण्डीव धनुष तथा अस्त्रोंका कैसा प्रभाव है? आज मैं अपने अस्त्रोंकी मायासे इन दानवोंकी इस भयंकर माया तथा घोर अन्धकारका विनाश किये देता हूँ’ ॥ २२—२४ ॥ एवमुक्त्वाहमसृजमस्त्रमायां नराधिप ।
मोहिनीं सर्वभूतानां हिताय त्रिदिवौकसाम् ॥ २५ ॥
नरेश्वर! ऐसा कहकर मैंने देवताओंके हितके लिये अस्त्रसम्बन्धिनी मायाकी सृष्टि की, जो समस्त प्राणियोंको मोहमें डालनेवाली थी ॥ २५ ॥
पीड्यमानासु मायासु तासु तास्वसुरोत्तमाः ।
पुनर्बहुविधा मायाः प्राकुर्वन्नमितौजसः ॥ २६ ॥
उससे असुरोंकी वे सारी मायाएँ नष्ट हो गयीं। तब उन अमित तेजस्वी दानवराजाओंने पुनः नाना प्रकारकी मायाएँ प्रकट कीं ॥ २६ ॥
पुनः प्रकाशमभवत् तमसा ग्रस्यते पुनः ।
भवत्यदर्शनो लोकः पुनरप्सु निमज्जति ॥ २७ ॥
इससे कभी तो प्रकाश छा जाता था और कभी सब कुछ अन्धकारमें विलीन हो जाता था। कभी सम्पूर्ण जगत् अदृश्य हो जाता और कभी जलमें डूब जाता था ॥ २७ ॥
सुसंगृहीतैर्हरिभिः प्रकाशे सति मातलिः ।
व्यचरत् स्यन्दनाग्र्येण संग्रामे लोमहर्षणे ॥ २८ ॥
तदनन्तर प्रकाश होनेपर मातलिने घोड़ोंको काबूमें करके अपने श्रेष्ठ रथके द्वारा उस रोमांचकारी संग्राममें विचरना प्रारम्भ किया ॥ २८ ॥
ततः पर्यपतन्नुग्रा निवातकवचा मयि ।
तानहं विवरं दृष्ट्वा प्राहिण्वं यमसादनम् ॥ २९ ॥
तब भयानक निवातकवच चारों ओरसे मेरे ऊपर टूट पड़े। उस समय मैंने अवसर देख-देखकर उन सबको यमलोक भेज दिया ॥ २९ ॥
वर्तमाने तथा युद्धे निवातकवचान्तके ।
नापश्यं सहसा सर्वान् दानवान् माययाऽऽवृतान् ॥ ३० ॥
वह युद्ध निवातकवचोंके लिये विनाशकारी था। अभी युद्ध हो ही रहा था कि सहसा सारे दानव अन्तर्धानी मायासे छिप गये। अतः मैं किसीको भी देख न सका ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि मायायुद्धे एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें मायायुद्धविषयक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७१ ।।


* कोशोंमें 'अक्ष' शब्दका अर्थ 'सर्प' भी मिलता है।

१७२-

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

निवातकवचोंका संहार

अर्जुन उवाच

अदृश्यमानास्ते दैत्या योधयन्ति स्म मायया ।
अदृश्येनास्त्रवीर्येण तानप्यहमयोधयम् ॥ १ ॥
अर्जुन बोले— राजन्! इस प्रकार अदृश्य रहकर ही वे दैत्य मायाद्वारा युद्ध करने लगे तथा मैं भी अपने अस्त्रोंकी अदृश्य शक्तिके द्वारा ही उनका सामना करने लगा ॥ १ ॥
गाण्डीवमुक्ता विशिखाः सम्यगस्त्रप्रचोदिताः ।
अच्छिन्दन्नुत्तमाङ्गानि यत्र यत्र स्म तेऽभवन् ॥ २ ॥
मेरे गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाण विधिवत् प्रयुक्त दिव्यास्त्रोंसे प्रेरित हो जहाँ-जहाँ वे दैत्य थे, वहीं जाकर उनके सिर काटने लगे ॥ २ ॥
ततो निवातकवचा वध्यमाना मया युधि ।
संहृत्य मायां सहसा प्राविशन् पुरमात्मनः ॥ ३ ॥
जब मैं इस प्रकार युद्धक्षेत्रमें उनका संहार करने लगा, तब वे निवातकवच दानव अपनी मायाको समेटकर सहसा नगरमें घुस गये ॥ ३ ॥
व्यपयातेषु दैत्येषु प्रादुर्भूते च दर्शने ।
अपश्यं दानवांस्तत्र हतान् शतसहस्रशः ॥ ४ ॥
दैत्योंके भाग जानेसे जब वहाँ सब कुछ स्पष्ट दिखायी देने लगा, तब मैंने देखा, लाखों दानव वहाँ मरे पड़े थे ॥ ४ ॥
विनिष्पिष्टानि तत्रैषां शस्त्राण्याभरणानि च ।
शतशः स्म प्रदृश्यन्ते गात्राणि कवचानि च ॥ ५ ॥
हयानां नान्तरं ह्यासीत् पदाद् विचलितुं पदम् ।
उत्पत्य सहसा तस्थुरन्तरिक्षगमास्ततः ॥ ६ ॥
उनके अस्त्र-शस्त्र और आभूषण भी पिसकर चूर्ण हो गये थे। दानवोंके शरीरों और कवचोंके सौ-सौ टुकड़े दिखायी देते थे। वहाँ दैत्योंकी इतनी लाशें पड़ी थी कि घोड़ोंके लिये एकके बाद दूसरा पैर रखनेके लिये कोई स्थान नहीं रह गया था। अतः वे अन्तरिक्षचारी अश्व वहाँसे सहसा उछलकर आकाशमें खड़े हो गये ॥ ५-६ ॥
ततो निवातकवचा व्योम संछाद्य केवलम् ।
अदृश्या ह्यत्यवर्तन्त विसृजन्तः शिलोच्चयान् ॥ ७ ॥
तदनन्तर निवातकवचोंने अदृश्यरूपसे ही आक्रमण किया और केवल आकाशको आच्छादित करके पत्थरोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ७ ॥

अन्तर्भूमिगताश्चान्ये हयानां चरणान्यथ । व्यगृह्णन् दानवा घोरा रथचक्रे च भारत ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! कुछ भयंकर दानवोंने, जो पृथ्वीके भीतर घुसे हुए थे, मेरे घोड़ोंके पैर तथा रथके पहिये पकड़ लिये ॥ ८ ॥

विनिगृह्य हरीनश्वान् रथं च मम युध्यतः । सर्वतो मामविध्यन्त सरथं धरणीधरैः ॥ ९ ॥ इस प्रकार युद्ध करते समय मेरे हरे रंगके घोड़ों तथा रथको पकड़कर उन दानवोंने रथसहित मेरे ऊपर सब ओरसे शिलाखण्डोंद्वारा प्रहार आरम्भ किया ॥ ९ ॥

पर्वतैरुपचीयद्भिः पतमानैस्तथापरैः । स देशो यत्र वर्ताम गुहेव समपद्यत ॥ १० ॥ नीचे पर्वतोंके ढेर लग रहे थे और ऊपरसे नयी-नयी चट्टानें पड़ रही थीं। इससे वह प्रदेश जहाँ हमलोग मौजूद थे, एक गुफाके समान बन गया ॥ १० ॥

पर्वतैश्छाद्यमानोऽहं निगृहीतैश्च वाजिभिः । अगच्छं परमामार्ति मातलिस्तदलक्षयत् ॥ ११ ॥ एक ओर तो मैं शिलाखण्डोंसे आच्छादित हो रहा था, दूसरी ओर मेरे घोड़े पकड़ लिये जानेसे रथकी गति कुण्ठित हो गयी थी। इस विवशताकी दशामें मुझे बड़ी पीड़ा होने लगी, जिसे मातलिने जान लिया ॥ ११ ॥

लक्षयित्वा च मां भीतमिदं वचनमब्रवीत् । अर्जुनार्जुन मा भैस्त्वं वज्रमस्त्रमुदीरय ॥ १२ ॥ इस प्रकार मुझे भयभीत हुआ देख मातलिने कहा—'अर्जुन! अर्जुन! तुम डरो मत। इस समय वज्रास्त्रका प्रयोग करो' ॥ १२ ॥

ततोऽहं तस्य तद् वाक्यं श्रुत्वा वज्रमुदीरयम् । देवराजस्य दयितं भीममस्त्रं नराधिप ॥ १३ ॥ महाराज! मातलिका वह वचन सुनकर मैंने देवराजके परम प्रिय तथा भयंकर अस्त्र वज्रका प्रयोग किया ॥ १३ ॥

अचलं स्थानमासाद्य गाण्डीवमनुमन्त्र्य च । अमुञ्चं वज्रसंस्पर्शान्यायसान् निशितान् शरान् ॥ १४ ॥ अविचल स्थानका आश्रय ले गाण्डीव धनुषको वज्रास्त्रसे अभिमन्त्रित करके मैंने लोहेके तीखे बाण छोड़े, जिनका स्पर्श वज्रके समान कठोर था ॥ १४ ॥

ततो मायाश्च ताः सर्वा निवातकवचांश्च तान् । ते वज्रचोदिता बाणा वज्रभूताः समाविशन् ॥ १५ ॥ तदनन्तर वज्रास्त्रसे प्रेरित हुए वे वज्रस्वरूप बाण पूर्वोक्त सारी मायाओं तथा निवातकवच दानवोंके भीतर घुस गये ॥ १५ ॥

ते वज्रवेगविहता दानवाः पर्वतोपमाः । इतरेतरमाश्लिष्य न्यपतन् पृथिवीतले ॥ १६ ॥ फिर तो वज्रके वेगसे मारे गये वे पर्वताकार दानव एक-दूसरेका आलिंगन करते हुए धराशायी हो गये ॥ १६ ॥

अन्तर्भूमौ च येऽगृह्णन् दानवा रथवाजिनः । अनुप्रविश्य तान् बाणाः प्राहिण्वन् यमसादनम् ॥ १७ ॥ पृथ्वीके भीतर घुसकर जिन दानवोंने मेरे रथके घोड़ोंको पकड़ रखा था, उनके शरीरमें भी घुसकर मेरे बाणोंने उन सबको यमलोक भेज दिया ॥ १७ ॥

हतैर्निवातकवचैर्निरस्तैः पर्वतोपमैः । समाच्छाद्यत देशः स विकीर्णैरिव पर्वतः ॥ १८ ॥ वहाँ मरकर गिरे हुए पर्वताकार निवातकवच इधर-उधर बिखरे हुए पर्वतोंके समान जान पड़ते थे। वहाँका सारा प्रदेश उनकी लाशोंसे पट गया था ॥ १८ ॥

न हयानां क्षतिः काचिन्न रथस्य न मातलेः । मम चादृश्यत तदा तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १९ ॥ उस समयके युद्धमें न तो घोड़ोंको कोई हानि पहुँची, न रथका ही कोई सामान टूटा, न मातलिको ही चोट लगी और न मेरे ही शरीरमें कोई आघात दिखायी दिया, यह एक अद्भुत-सी बात थी ॥ १९ ॥

ततो मां प्रहसन् राजन् मातलिः प्रत्यभाषत । नैतदर्जुन देवेषु त्वयि वीर्यं यदीक्ष्यते ॥ २० ॥ तब मातलिने हँसते हुए मुझसे कहा—‘अर्जुन! तुममें जो पराक्रम दिखायी देता है, वह देवताओंमें भी नहीं है’ ॥ २० ॥

हतेष्वसुरसंघेषु दारास्तेषां तु सर्वशः । प्राक्रोशन् नगरे तस्मिन् यथा शरदि सारसाः ॥ २१ ॥ उन असुरसमूहोंके मारे जानेपर उनकी सारी स्त्रियाँ उस नगरमें जोर-जोरसे करुण क्रन्दन करने लगीं, मानो शरत्कालमें सारस पक्षी बोल रहे हों ॥ २१ ॥

ततो मातलिना सार्धमहं तत् पुरमभ्ययाम् । त्रासयन् रथघोषेण निवातकवचस्त्रियः ॥ २२ ॥ तब मैं मातलिके साथ रथकी घर्घरहाटसे निवातकवचोंकी स्त्रियोंको भयभीत करता हुआ उस दैत्य-नगरमें गया ॥ २२ ॥

तान् दृष्ट्वा दशसाहस्रान् मयूरसदृशान् हयान् । रथं च रविसंकाशं प्राद्रवन् गणशः स्त्रियः ॥ २३ ॥ मोरके समान सुन्दर उन दस हजार घोड़ोंको तथा सूर्यके समान तेजस्वी उस दिव्य रथको देखते ही झुंड-की-झुंड दानवस्त्रियाँ इधर-उधर भाग चलीं ॥ २३ ॥

ताभिराभरणैः शब्दस्त्रासिताभिः समीरितः ।
शिलानामिव शैलेषु पतन्तीनामभूत् तदा ॥ २४ ॥
उन डरी हुई निशाचरियोंके आभूषणोंके द्वारा उत्पन्न हुआ शब्द पर्वतोंपर पड़ती हुई शिलाओंके समान जान पड़ता था ॥ २४ ॥
वित्रस्ता दैत्यनार्यस्ताः स्वानि वेश्मान्यथाविशन् ।
बहुरत्नविचित्राणि शातकुम्भमयानि च ॥ २५ ॥
तत्पश्चात् वे भयभीत हुई दैत्यनारियाँ अपने-अपने घरोंमें घुस गयीं। उनके महल सोनेके बने हुए थे और अनेक प्रकारके रत्नोंसे उनकी विचित्र शोभा होती थी ॥ २५ ॥
तदद्भुताकारमहं दृष्ट्वा नगरमुत्तमम् ।
विशिष्टं देवनगरादपृच्छं मातलिं ततः ॥ २६ ॥
वह उत्तम एवं अद्भुत नगर देवपुरीसे भी श्रेष्ठ दिखायी देता था। तब उसे देखकर मैंने मातलिसे पूछा— ॥ २६ ॥
इदमेवंविधं कस्माद् देवा नावासयन्त्युत ।
पुरंदरपुराद्धीदं विशिष्टमिति लक्षये ॥ २७ ॥
‘सारथे! देवतालोग ऐसा नगर क्यों नहीं बसाते हैं? यह नगर तो मुझे इन्द्रपुरीसे भी बढ़कर दिखायी देता है’ ॥ २७ ॥

मातलिरुवाच

आसीदिदं पुरा पार्थ देवराजस्य नः पुरम्
ततो निवातकवचैरितः प्रच्याविताः सुराः ॥ २८ ॥
**मातलि बोले—**पार्थ! पूर्वकालमें यह नगर हमारे देवराजके ही अधिकारमें था। फिर निवातकवचोंने आकर देवताओंको यहाँसे निकाल दिया ॥ २८ ॥
तपस्तप्त्वा महत् तीव्रं प्रसाद्य च पितामहम्
इदं वृतं निवासाय देवेभ्यश्चाभयं युधि ॥ २९ ॥
उन्होंने अत्यन्त तीव्र तपस्या करके पितामह ब्रह्माजीको प्रसन्न किया और उनसे अपने रहनेके लिये यही नगर माँग लिया। साथ ही यह भी माँगा कि ‘हमें युद्धमें देवताओंसे भय न हो’ ॥ २९ ॥
ततः शक्रेण भगवान् स्वयम्भूरिति चोदितः
विधत्तां भगवानन्तमात्मनो हितकाम्यया ॥ ३० ॥
तब इन्द्रने भगवान् ब्रह्माजीसे इस प्रकार निवेदन किया—‘प्रभो! अपने (और हमारे) हितके लिये आप ही इन दानवोंका अन्त कीजिये’ ॥ ३० ॥
तत उक्तो भगवता दिष्टमत्रेति भारत
भवितान्तस्त्वमप्येषां देहेनान्येन शत्रुहन् ॥ ३१ ॥

भरतनन्दन! उनके ऐसा कहनेपर भगवान् ब्रह्माने कहा—'शत्रुदमन देवराज! इसमें दैवका यही विधान है कि तुम्हीं दूसरा शरीर धारण करके इन दानवोंका अन्त कर सकोगे' ॥ ३१ ॥
तत एषां वधार्थाय शक्रोऽस्त्राणि ददौ तव
न हि शक्याः सुरैर्हन्तुं य एते निहतास्त्वया ॥ ३२ ॥
(अर्जुन! तुम्हीं इन्द्रके दूसरे स्वरूप हो।) इन दैत्योंके वधके लिये ही इन्द्रने तुम्हें दिव्यास्त्र प्रदान किये हैं। आज जो ये दानव तुम्हारे हाथों मारे गये हैं, इन्हें देवता नहीं मार सकते थे ॥ ३२ ॥
कालस्य परिणामेन ततस्त्वमिह भारत
एषामन्तकः प्राप्तस्तत् त्वया च कृतं तथा ॥ ३३ ॥
भारत! समयके फेरसे ही तुम इनका विनाश करनेके लिये यहाँ आ पहुँचे हो और तुमने जैसा दैवका विधान था, उसके अनुसार इनका संहार कर डाला है ॥ ३३ ॥
दानवानां विनाशाय अस्त्राणां परमं बलम्
ग्राहितस्त्वं महेन्द्रेण पुरुषेन्द्र तदुत्तमम् ॥ ३४ ॥
पुरुषोत्तम! देवराज इन्द्रने इन दानवोंके विनाशके उद्देश्यसे ही तुम्हें परम उत्तम अस्त्रबलकी प्राप्ति करायी है ॥ ३४ ॥

अर्जुन उवाच
ततः प्रशाम्य नगरं दानवांश्च निहत्य तान्
पुनर्मातलिना सार्धमगच्छं देवसद्म तत् ॥ ३५ ॥
अर्जुन कहते हैं— महाराज! इस प्रकार उन दानवोंका संहार करके नगरमें शान्ति स्थापित करनेके पश्चात् मैं मातलिके साथ पुनः उस देवलोकको लौट आया ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि निवातकवचयुद्धे
द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें निवातकवचयुद्धविषयक एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७२ ॥

१७३-

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनद्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोम तथा कालकेयोंका वध और इन्द्रद्वारा अर्जुनका अभिनन्दन

अर्जुन उवाच

निवर्तमानेन मया महद् दृष्टं ततोऽपरम्।
पुरं कामचरं दिव्यं पावकार्कसमप्रभम् ॥ १ ॥
**अर्जुन बोले—**राजन्! तत्पश्चात् लौटते समय मार्गमें मैंने एक दूसरा दिव्य एवं विशाल नगर देखा, जो अग्नि और सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था। वह अपने निवासियोंकी इच्छाके अनुसार सर्वत्र आ-जा सकता था ॥ १ ॥

रत्नद्रुममयैश्चित्रैः सुस्वरैश्च पतत्त्रिभिः।
पौलोमैः कालकञ्जैश्च नित्यहृष्टै रधिष्ठितम् ॥ २ ॥
विचित्र रत्नमय वृक्ष और मधुर स्वरमें बोलनेवाले पक्षी उस नगरकी शोभा बढ़ाते थे। पौलोम और कालकञ्ज नामक दानव सदा प्रसन्नतापूर्वक वहाँ निवास करते थे ॥ २ ॥

गोपुराट्टालकोपेतं चतुर्द्वारं दुरासदम्।
सर्वरत्नमयं दिव्यमद्भुतोपमदर्शनम् ॥ ३ ॥
उस नगरमें ऊँचे-ऊँचे गोपुरोंसहित सुन्दर अट्टालिकायें सुशोभित थीं। उसमें चारों दिशाओंमें एक-एक करके चार फाटक लगे थे। शत्रुओंके लिये उस नगरमें प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन था। सब प्रकारके रत्नोंसे निर्मित वह दिव्य नगर अद्भुत दिखायी देता था ॥ ३ ॥

द्रुमैः पुष्पफलोपेतैः सर्वरत्नमयैर्वृतम्।
तथा पतत्त्रिभिर्दिव्यैरुपेतं सुमनोहरैः ॥ ४ ॥
फल और फूलोंसे भरे हुए सर्वरत्नमय वृक्ष नगरको सब ओरसे घेरे हुए थे तथा वह नगर दिव्य एवं अत्यन्त मनोहर पक्षियोंसे युक्त था ॥ ४ ॥

असुरैर्नित्यमुदितैः शूलर्ष्टिमुसलायुधैः।
चापमुद्गरहस्तैश्च स्रग्विभिः सर्वतो वृतम् ॥ ५ ॥
सदा प्रसन्न रहनेवाले बहुत-से असुर गलेमें सुन्दर माला धारण किये और हाथोंमें शूल, ऋष्टि, मुसल, धनुष तथा मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्र लिये सब ओरसे घेरकर उस नगरकी रक्षा करते थे ॥ ५ ॥

तदहं प्रेक्ष्य दैत्यानां पुरमद्भुतदर्शनम्।
अपृच्छं मातलिं राजन् किमिदं वर्ततेऽद्भुतम् ॥ ६ ॥

राजन्! दैत्योंके उस अद्भुत दिखायी देनेवाले नगरको देखकर मैंने मातलिसे पूछा—‘सारथे! यह कौन-सा अद्भुत नगर है?’ ।। ६ ।।

मातलिरुवाच

पुलोमा नाम दैतेयी कालका च महासुरी
दिव्यं वर्षसहस्रं ते चेरतुः परमं तपः ।। ७ ।।
तपसोऽन्ते ततस्ताभ्यां स्वयम्भूरदद् वरम्
अगृह्णीतां वरं ते तु सुतानामल्पदुःखताम् ।। ८ ।।

मातलिने कहा—पार्थ! दैत्यकुलकी कन्या पुलोमा तथा महान् असुरवंशकी कन्या कालका—उन दोनोंने एक हजार दिव्य वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। तदनन्तर तपस्या पूर्ण होनेपर भगवान् ब्रह्माजीने उन दोनोंको वर दिया। उन्होंने यही वर माँगा कि ‘हमारे पुत्रोंका दुःख दूर हो जाय’ ।। ७-८ ।।

अवध्यतां च राजेन्द्र सुरराक्षसपन्नगैः
पुरं सुरमणीयं च खचरं सुमहाप्रभम् ।। ९ ।।
सर्वरत्नैः समुदितं दुर्धर्षममरैरपि
महर्षियक्षगन्धर्वपन्नगासुरराक्षसैः ।। १० ।।
सर्वकामगुणोपेतं वीतशोकमनामयम्
ब्रह्मणा भरतश्रेष्ठ कालकेयकृते कृतम् ।। ११ ।।
तदेतत् खपुरं दिव्यं चरत्यमरवर्जितम्
पौलोमाध्युषितं वीर कालकञ्जैश्च दानवैः ।। १२ ।।

राजेन्द्र! उन दोनोंने यह भी प्रार्थना की कि ‘हमारे पुत्र देवता, राक्षस तथा नागोंके लिये भी अवध्य हों। इनके रहनेके लिये एक सुन्दर नगर होना चाहिये, जो अपने महान् प्रभा-पुञ्जसे जगमगा रहा हो। वह नगर विमानकी भाँति आकाशमें विचरनेवाला होना चाहिये, उसमें सब प्रकारके रत्नोंका संचय रहना चाहिये, देवता, महर्षि, यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर तथा राक्षस कोई भी उसका विध्वंस न कर सके। वह नगर समस्त मनोवाञ्छित गुणोंसे सम्पन्न, शोक शून्य तथा रोग आदिसे रहित होना चाहिये।’ भरतश्रेष्ठ! ब्रह्माजीने कालकेयोंके लिये वैसे ही नगरका निर्माण किया था। यह वही आकाशचारी दिव्य नगर है, जो सर्वत्र विचरता है। इसमें देवताओंका प्रवेश नहीं है। वीरवर! इसमें पौलोम और कालकंज नामक दानव ही निवास करते हैं ।। ९—१२ ।।

हिरण्यपुरमित्येवं ख्यायते नगरं महत्
रक्षितं कालकेयैश्च पौलोमैश्च महासुरैः ।। १३ ।।

यह विशाल नगर हिरण्यपुरके नामसे विख्यात है। कालकेय तथा पौलोम नामक महान् असुर इसकी रक्षा करते हैं ।। १३ ।।

त एते मुदिता राजन्नवध्याः सर्वदैवतैः निवसन्त्यत्र राजेन्द्र गतोद्वेगा निरुत्सुकाः ॥ १४ ॥ राजन्! ये वे ही दानव हैं, जो सम्पूर्ण देवताओंसे अवध्य रहकर उद्वेग तथा उत्कण्ठासे रहित हो यहाँ प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं॥ १४॥ मानुषान्मृत्युरेतेषां निर्दिष्टो ब्रह्मणा पुरा एतानपि रणे पार्थ कालकञ्जान् दुरासदान् वज्रास्त्रेण नयस्वाशु विनाशं सुमहाबलान् ॥ १५ ॥ पूर्वकालमें ब्रह्माजीने मनुष्यके हाथसे इनकी मृत्यु निश्चित की थी। कुन्तीकुमार! ये कालकंज और पौलोम अत्यन्त बलवान् तथा दुर्धर्ष हैं। तुम युद्धमें वज्रास्त्रके द्वारा इनका भी शीघ्र ही संहार कर डालो ॥ १५ ॥

अर्जुन उवाच सुरासुरैरवध्यं तदहं ज्ञात्वा विशाम्पते अब्रुवं मातलिं हृष्टो याह्येतत् पुरमञ्जसा ॥ १६ ॥ अर्जुन बोले—राजन्! उस हिरण्यपुरको देवताओं और असुरोंके लिये अवध्य जानकर मैंने मातलिसे प्रसन्नतापूर्वक कहा—'आप यथाशीघ्र इस नगरमें अपना रथ ले चलिये' ॥ १६ ॥ त्रिदशेशद्विषो यावत् क्षयमस्त्रैर्नयाम्यहम् न कथञ्चिद्धि मे पापा न वध्या ये सुरद्विषः ॥ १७ ॥ 'जिससे देवराजके द्रोहियोंको मैं अपने अस्त्रोंद्वारा नष्ट कर डालूँ। जो देवताओंसे द्वेष रखते हैं, उन पापियोंको मैं किसी प्रकार मारे बिना नहीं छोड़ सकता' ॥ १७ ॥ उवाह मां ततः शीघ्रं हिरण्यपुरमन्तिकात् रथेन तेन दिव्येन हरियुक्तेन मातलिः ॥ १८ ॥ मेरे ऐसा कहनेपर मातलिने घोड़ोंसे युक्त उस दिव्य रथके द्वारा मुझे शीघ्र ही हिरण्यपुरके निकट पहुँचा दिया ॥ १८ ॥ ते मामालक्ष्य दैतेया विचित्राभरणाम्बराः समुत्पेतुर्महावेगा रथानास्थाय दंशिताः ॥ १९ ॥ मुझे देखते ही विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित वे दैत्य कवच पहनकर अपने रथोंपर जा बैठे और बड़े वेगसे मेरे ऊपर टूट पड़े ॥ १९ ॥ ततो नालीकनाराचैर्भल्लैः शक्त्यृष्टितोमरैः प्रत्यघ्नन् दानवेन्द्रा मां क्रुद्धास्तीव्रपराक्रमाः ॥ २० ॥ तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए उन प्रचण्ड पराक्रमी दानवेन्द्रोंने नालीक, नाराच, भल्ल, शक्ति, ऋष्टि तथा तोमर आदि अस्त्रोंद्वारा मुझे मारना आरम्भ किया ॥ २० ॥

तदहं शरवर्षेण महता प्रत्यवारयम् शस्त्रवर्षं महत् राजन् विद्याबलमुपाश्रितः ॥ २१ ॥ व्यामोहयं च तान् सर्वान् रथमार्गैश्चरन् रणे तेऽन्योन्यमभिसम्मूढाः पातयन्ति स्म दानवान् ॥ २२ ॥ राजन्! उस समय मैंने विद्या-बलका आश्रय लेकर महती बाण-वर्षाके द्वारा उनके अस्त्र-शस्त्रोंकी भारी बौछारको रोका और युद्ध-भूमिमें रथके विभिन्न पैंतरे बदलकर विचरते हुए उन सबको मोहमें डाल दिया। वे ऐसे किंकर्तव्यविमूढ हो रहे थे कि आपसमें ही लड़कर एक-दूसरे दानवोंको धराशायी करने लगे ॥ २१-२२ ॥

तेषामेवं विमूढानामन्योन्यमभिधावताम् शिरांसि विशिखैर्दीप्तैर्न्यहनं शतसङ्घशः ॥ २३ ॥ इस प्रकार मूढ़चित्त हो आपसमें ही एक-दूसरेपर धावा करनेवाले उन दानवोंके सौ-सौ मस्तकोंको मैं अपने प्रज्वलित बाणोंद्वारा काट-काटकर गिराने लगा ॥ २३ ॥

ते वध्यमाना दैतेयाः पुरमास्थाय तत् पुनः खमुत्पेतुः सनगरा मायामास्थाय दानवीम् ॥ २४ ॥ वे दैत्य जब इस प्रकार मारे जाने लगे, तब पुनः अपने उस नगरमें ही घुस गये और दानवी मायाका सहारा ले नगर सहित आकाशमें ऊँचे उड़ गये ॥ २४ ॥

ततोऽहं शरवर्षेण महता कुरुनन्दन मार्गमावृत्य दैत्यानां गतिं चैषामवारयम् ॥ २५ ॥ कुरुनन्दन! तब मैं बाणोंकी भारी बौछार करके दैत्योंका मार्ग रोक लिया और उनकी गति कुण्ठित कर दी ॥ २५ ॥

तत् पुरं खचरं दिव्यं कामगं सूर्यसप्रभम् दैतेयैर्वरदानेन धार्यते स्म यथासुखम् ॥ २६ ॥ सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाला दैत्योंका वह आकाशचारी दिव्य नगर उनकी इच्छाके अनुसार चलनेवाला था और दैत्यलोग वरदानके प्रभावसे उसे सुखपूर्वक आकाशमें धारण करते थे ॥ २६ ॥

अन्तर्भूभौ निपतति पुनरूर्ध्वं प्रतिष्ठते पुनस्तिर्यक् प्रयात्याशु पुनरप्सु निमज्जति ॥ २७ ॥ वह दिव्य पुर कभी पृथ्वीपर अथवा पातालमें चला जाता, कभी ऊपर उड़ जाता, कभी तिरछी दिशाओंमें चलता और कभी शीघ्र ही जलमें डूब जाता था ॥ २७ ॥

अमरावतीसंकाशं तत् पुरं कामगं महत् अहमस्त्रैर्बहुविधैः प्रत्यगृह्णं परंतप ॥ २८ ॥ परंतप! इच्छानुसार विचरनेवाला वह विशाल नगर अमरावतीके ही तुल्य था; परंतु मैंने नाना प्रकारके अस्त्रों द्वारा उसे सब ओरसे रोक लिया ॥ २८ ॥

ततोऽहं शरजालेन दिव्यास्त्रनुदितेन च
व्यगृह्णां सह दैत्यैस्तत् पुरं पुरुषर्षभ ॥ २९ ॥
नरश्रेष्ठ! फिर दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणसमूहोंकी वृष्टि करते हुए मैंने दैत्योंसहित उस नगरको क्षत-विक्षत करना आरम्भ किया ॥ २९ ॥
विक्षतं चायसैर्बाणैर्मत्प्रयुक्तैरजिह्मगैः
महीमभ्यपतद् राजन् प्रभग्नं पुरमासुरम् ॥ ३० ॥
राजन्! मेरे चलाये हुए लोहनिर्मित बाण सीधे लक्ष्यतक पहुँचनेवाले थे। उनसे क्षतिग्रस्त हुआ वह दैत्य-नगर तहस-नहस होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३० ॥
ते वध्यमाना मद्बाणैर्वज्रवेगैरयस्मयैः
पर्यभ्रमन्त वै राजन्नसुराः कालचोदिताः ॥ ३१ ॥
महाराज! लोहेके बने हुए मेरे बाणोंका वेग वज्रके समान था। उनकी मार खाकर वे कालप्रेरित असुर चारों ओर चक्कर काटने लगते थे ॥ ३१ ॥
**ततो मातलिरा Copied... -> ततो मातलिरा Copied -> ततो मातलिरा Copied... -> ततो मातलिरा Copied... -> ततो मातलिरा Copied... -> ततो मातलि

प्रत्यदृश्यन्त संग्रामे शतशोऽथ सहस्रशः
वे महान् बलवान् तो थे ही, रथके विचित्र पैंतरे बदलकर रणभूमिमें विचर रहे थे। उस युद्धके मैदानमें उनके सौ-सौ और हजार-हजारके झुंड दिखायी देते थे॥ ३६१/२॥

विचित्रमुकुटापीडा विचित्रकवचध्वजाः ।। ३७ ।।
विचित्राभरणाश्चैव नन्दयन्तीव मे मनः
उनके मस्तकोंपर विचित्र मुकुट और पगड़ी देखी जाती थी। उनके कवच और ध्वज भी विचित्र ही थे। वे अद्भुत आभूषणोंसे विभूषित हो मेरे लिये मनोरंजनकी-सी वस्तु बन गये थे॥ ३७१/२॥

अहं तु शरवर्षैस्तानस्त्रप्रचोदितै रणे ।। ३८ ।।
नाशक्नुवं पीडयितुं ते तु मां प्रत्यपीडयन्
उस युद्धमें दिव्यास्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित बाणोंकी वर्षा करके भी मैं उन्हें पीड़ित न कर सका; परंतु वे मुझे बहुत पीड़ा देने लगे॥ ३८१/२॥

तैः पीड्यमानो बहुभिः कृतास्त्रैः कुशलैर्युधि ।। ३९ ।।
व्यथितोऽस्मि महायुद्धे भयं चागान्महन्मम
वे अस्त्रोंके ज्ञाता तथा युद्धकुशल थे, उनकी संख्या भी बहुत थी। उस महान् संग्राममें उन दानवोंसे पीड़ित होनेपर मेरे मनमें महान् भय समा गया॥ ३९१/२॥

ततोऽहं देवदेवाय रुद्राय प्रयतो रणे ।। ४० ।।
(प्रयतः प्रणतो भूत्वा नमस्कृत्य महात्मने ।)
स्वस्ति भूतेभ्य इत्युक्त्वा महास्त्रं समचोदयम्
तब मैंने एकाग्रचित्त हो मस्तक झुकाकर देवाधिदेव महात्मा रुद्रको प्रणाम किया और ‘समस्त भूतोंका कल्याण हो’ ऐसा कहकर उनके महान् पाशुपतास्त्रका प्रयोग किया॥ ४०१/२॥

यत् तद् रौद्रमिति ख्यातं सर्वामित्रविनाशनम् ।। ४१ ।।
(महत् पाशुपतं दिव्यं सर्वलोकनमस्कृतम् ।)
ततोऽपश्यं त्रिशिरसं पुरुषं नवलोचनम्
त्रिमुखं षड्भुजं दीप्तमर्कज्वलनमूर्धजम् ।। ४२ ।।
उसीको ‘रौद्रास्त्र’ भी कहते हैं। वह समस्त शत्रुओंका विनाश करनेवाला है। वह महान् एवं दिव्य पाशुपतास्त्र सम्पूर्ण विश्वके लिये वन्दनीय है। उसका प्रयोग करते ही मुझे एक दिव्य पुरुषका दर्शन हुआ, जिनके तीन मस्तक, तीन मुख, नौ नेत्र तथा छः भुजाएँ थीं। उनका स्वरूप बड़ा तेजस्वी था। उनके मस्तकके बाल सूर्यके समान प्रज्वलित हो रहे थे॥ ४१-४२॥

लेलिहानैर्महानागैः कृतचीरममित्रहन्

(भक्तानुकम्पिनं देवं नागयज्ञोपवीतिनम् ।) विभीस्ततस्तदस्त्रं तु घोरं रौद्रं सनातनम् ॥ ४३ ॥ दृष्ट्वा गाण्डीवसंयोगमानीय भरतर्षभ नमस्कृत्य त्रिनेत्राय शर्वायामिततेजसे ॥ ४४ ॥ मुक्तवान् दानवेन्द्राणां पराभावाय भारत मुक्तमात्रे ततस्तस्मिन् रूपाण्यासन् सहस्रशः ॥ ४५ ॥ शत्रुदमन नरेश! लपलपाती जीभवाले बड़े-बड़े नाग उन दिव्य पुरुषके लिये चीर (वस्त्र) बने हुए थे। भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले उन महादेवजीने सर्पोंका ही यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। उनके दर्शनसे मेरा सारा भय जाता रहा। भरतश्रेष्ठ! फिर तो मैंने उस भयंकर एवं सनातन पाशुपतास्त्रको गाण्डीव धनुषपर संयोजित करके अमित तेजस्वी त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरको नमस्कार किया और उन दानवेन्द्रोंके विनाशके लिये उनपर चला दिया। उस अस्त्रके छूटते ही उससे सहस्रों रूप प्रकट हो गये ॥ ४३—४५ ॥ मृगाणामथ सिंहानां व्याघ्राणां च विशाम्पते ऋक्षाणां महिषाणां च पन्नगानां तथा गवाम् ॥ ४६ ॥ शरभाणां गजानां च वानराणां च सङ्घशः ऋषभाणां वराहाणां मार्जाराणां तथैव च ॥ ४७ ॥ शालावृकाणां प्रेतानां भुरुण्डानां च सर्वशः गृध्राणां गरुडानां च चमराणां तथैव च ॥ ४८ ॥ देवानां च ऋषीणां च गन्धर्वाणां च सर्वशः पिशाचानां सयक्षाणां तथैव च सुरद्विषाम् ॥ ४९ ॥ गुह्यकानां च संग्रामे नैर्ऋतानां तथैव च झषाणां गजवक्त्राणामुलूकानां तथैव च ॥ ५० ॥ मीनवाजिसरूपाणां नानाशस्त्रासिपाणिनाम् तथैव यातुधानानां गदामुद्गरधारिणाम् ॥ ५१ ॥ महाराज! मृग, सिंह, व्याघ्र, रीछ, भैंस, नाग, गौ, शरभ, हाथी, वानर, बैल, सूअर, बिलाव, भेड़िये, प्रेत, मुरुण्ड, गिद्ध, गरुड, चमरी गाय, देवता, ऋषि, गन्धर्व, पिशाच, यक्ष, देवद्रोही राक्षस, गुह्यक, निशाचर, मत्स्य, गजमुख, उल्लू, मीन तथा अश्व-जैसे रूपवाले नाना प्रकारके जीवोंका प्रादुर्भाव हुआ। उन सबके हाथमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र एवं खड्ग थे। इसी प्रकार गदा और मुद्गर धारण किये बहुत-से यातुधान भी प्रकट हुए ॥ ४६—५१ ॥ एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्नानारूपधरैस्तथा सर्वमासीज्जगद् व्याप्तं तस्मिन्नस्त्रे विसर्जिते ॥ ५२ ॥ त्रिशिरोभिश्चतुर्दंष्ट्रैश्चतुरास्यैश्चतुर्भुजैः

अनेकरूपसंयुक्तैर्मांसमेदोवसास्थिभिः ।। ५३ ।।
इन सबके साथ दूसरे भी बहुत-से जीवोंका प्राकट्य हुआ, जिन्होंने नाना प्रकारके रूप धारण कर रखे थे। उन सबके द्वारा यह सारा जगत् व्याप्त-सा हो गया था। पाशुपतास्त्रका प्रयोग होते ही कोई तीन मस्तक, कोई चार दाढ़ें, कोई चार मुख और कोई चार भुजावाले अनेक रूपधारी प्राणी प्रकट हुए, जो मांस, मेदा, वसा और हड्डियोंसे संयुक्त थे ।। ५२-५३ ।।
अभीक्ष्णं वध्यमानास्ते दानवा नाशमागताः
अर्कज्वलनतेजोभिर्वज्राशनिसमप्रभैः ।। ५४ ।।
अद्रिसारमयैश्चान्यैर्बाणैरपि निबर्हणैः
न्यहनं दानवान् सर्वान् मुहूर्तेनैव भारत ।। ५५ ।।
उन सबके द्वारा गहरी मार पड़नेसे वे सारे दानव नष्ट हो गये। भारत! उस समय सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी तथा वज्र और अशनिके समान प्रकाशित होनेवाले शत्रुविनाशक लोहमय बाणोंद्वारा भी मैंने दो ही घड़ीमें सम्पूर्ण दानवोंका संहार कर डाला ।। ५४-५५ ।।
गाण्डीवास्त्रप्रणुन्नांस्तान् गतासून् नभसश्च्युतान्
दृष्ट्वाहं प्रणमं भूयस्त्रिपुरघ्नाय वेधसे ।। ५६ ।।
गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए अस्त्रोंद्वारा क्षत-विक्षत हो समस्त दानव प्राण त्यागकर आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़े हैं। यह देखकर मैंने पुनः त्रिपुरनाशक भगवान् शंकरको प्रणाम किया ।। ५६ ।।
तथा रौद्रास्त्रनिष्पिष्टान् दिव्याभरणभूषितान्
निशम्य परमं हर्षमगमद् देवसारथिः ।। ५७ ।।
दिव्य आभूषणोंसे विभूषित दानव पाशुपतास्त्रसे पिस गये हैं, यह देखकर देवसारथि मातलिको बड़ा हर्ष हुआ ।। ५७ ।।
तदसह्यं कृतं कर्म देवैरपि दुरासदम्
दृष्ट्वा मां पूजयामास मातलिः शक्रसारथिः ।। ५८ ।।
जो कार्य देवताओंके लिये भी दुष्कर और असह्य था, वह मेरेद्वारा पूरा हुआ देख इन्द्रसारथि मातलिने मेरा बड़ा सम्मान किया ।। ५८ ।।
उवाच वचनं चेदं प्रीयमाणः कृताञ्जलिः
सुरासुरैरसह्यं हि कर्म यत् साधितं त्वया ।। ५९ ।।
और अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़कर कहा—'अर्जुन! आज तुमने वह कार्य कर दिखाया है जो देवताओं और असुरोंके लिये भी असाध्य था ।। ५९ ।।
न ह्येतत् संयुगे कर्तुमपि शक्तः सुरेश्वरः
(ध्रुवं धनंजय प्रीतस्त्वयि शक्रः पुरार्दन ।)

सुरासुरैरवध्यं हि पुरमेतत् खगं महत् ।। ६० ।।

त्वया विमथितं वीर स्ववीर्यतपसो बलात्

‘साक्षात् देवराज इन्द्र भी युद्धमें यह सब कार्य करनेकी शक्ति नहीं रखते हैं।

हिरण्यपुरका विनाश करनेवाले वीरवर धनंजय! निश्चय ही देवराज इन्द्र आज तुम्हारे ऊपर

बहुत प्रसन्न होंगे। वीर! तुमने अपने पराक्रम और तपस्याके बलसे इस आकाशचारी विशाल

नगरको तहस-नहस कर डाला, जिसे सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी नष्ट नहीं कर

सकते थे' ।। ६० ।।

विध्वस्ते खपुरे तस्मिन् दानवेषु हतेषु च ।। ६१ ।।

विनदन्त्यः स्त्रियः सर्वा निष्पेतुर्नगराद् बहिः

प्रकीर्णकेश्यो व्यथिताः कुरर्य इव दुखिताः ।। ६२ ।।

उस आकाशवर्ती नगरका विध्वंस और दानवोंका संहार हो जानेपर वहाँकी सारी

स्त्रियाँ विलाप करती हुई नगरसे बाहर निकल आयीं। उनके केश बिखरे हुए थे। वे दुःख

और व्यथामें डूबी हुई कुररीकी भाँति करुण-क्रन्दन करती थीं ।। ६१-६२ ।।

पेतुः पुत्रान् पितॄन् भ्रातृन् शोचमाना महीतले

रुदत्यो दीनकण्ठ्यस्तु निनदन्त्यो हतेश्वराः ।। ६३ ।।

उरांसि परिनिघ्नन्त्यो विस्रस्तस्रग्विभूषणाः

अपने पुत्र, पिता और भाइयोंके लिये शोक करती हुई वे सब-की-सब पृथ्वीपर गिर

पड़ीं। जिनके पति मारे गये थे, वे अनाथ अबलाएँ दीनतापूर्ण कष्टसे रोती-चिल्लाती हुई

छाती पीट रही थीं। उनके हार और आभूषण इधर-उधर गिर पड़े थे ।। ६३ ।।

तच्छोकयुक्तमश्रीकं दुःखदैन्यसमाहतम् ।। ६४ ।।

न बभौ दानवपुरं हतत्त्विट्कं हतेश्वरम्

गन्धर्वनगराकारं हतनागमिव ह्रदम् ।। ६५ ।।

शुष्कवृक्षमिवारण्यमदृश्यमभवत् पुरम्

दानवोंका वह नगर शोकमग्न हो अपनी सारी शोभा खो चुका था। वहाँ दुःख और

दीनता व्याप्त हो रही थी। अपने प्रभुओंके मारे जानेसे वह दानव-नगर निष्प्रभ और

अशोभनीय हो गया था। गन्धर्व-नगरकी भाँति उसका अस्तित्व अयथार्थ जान पड़ता था।

जिसका हाथी मर गया हो, उस सरोवर और जहाँके वृक्ष सूख गये हों, उस वनके समान वह

नगर अदर्शनीय हो गया था ।। ६४-६५ ।।

मां तु संहृष्टमनसं क्षिप्रं मातलिरा नयत् ।। ६६ ।।

देवराजस्य भवनं कृतकर्माणमाहवात्

मेरे मनमें तो हर्ष और उत्साह भरा हुआ था। मैंने देवताओंका कार्य पूरा कर दिया था।

अतः मातलि उस रणभूमिसे मुझे शीघ्र ही देवराज इन्द्रके भवनमें ले आये ।। ६६ ।।

हिरण्यपुरमुत्सृज्य निहत्य च महासुरान् ।। ६७ ।।

निवातकवचांश्चैव ततोऽहं शक्रमागमम्

इस प्रकार मैं निवातकवच नामक महादानवोंको (तथा पौलोम और कालकेयोंको)

मारकर तथा उजड़े हुए हिरण्यपुरको उसी अवस्थामें छोड़कर वहाँसे इन्द्रके पास

आया ।। ६७ १/२ ।।

मम कर्म च देवेन्द्रं मातलिर्विस्तरेण तत् ।। ६८ ।।

सर्वं विश्रावयामास यथाभूतं महाद्युते

महाद्युते! मातलिने मेरा सारा कार्य, जो कुछ जैसे हुआ था, देवराज इन्द्रसे

विस्तारपूर्वक कह सुनाया ।।

हिरण्यपुरघातं च मायानां च निवारणम् ।। ६९ ।।

निवातकवचानां च वधं संख्ये महौजसाम्

तच्छ्रुत्वा भगवान् प्रीतः सहस्राक्षः पुरंदरः ।। ७० ।।

मरुद्भिः सहितः श्रीमान् साधु साध्वित्यथाब्रवीत्

(परिष्वज्य च मां प्रेम्णा मूर्ध्नि चाघ्राय सस्मितम् ।)

ततो मां देवराजो वै समाश्वास्य पुनः पुनः ।। ७१ ।।

अब्रवीद् विबुधैः सार्धमिदं स मधुरं वचः

अतिदेवासुरं कर्म कृतमेव त्वया रणे ।। ७२ ।।

हिरण्यपुरका विध्वंस, दानवी मायाका निवारण तथा महाबलवान् निवातकवचोंका

युद्धमें वध सुनकर मरुत् आदि देवताओंसहित भगवान् सहस्रलोचन इन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हो

मुझे साधुवाद देने लगे और मुझे प्रेम पूर्वक हृदयसे लगाकर मुसकराते हुए मेरा मस्तक

सूँघा। तत्पश्चात् देवराजने बार-बार मुझे सान्त्वना देते हुए देवताओंके साथ यह मधुर वचन

कहा—'पार्थ! तुमने युद्धमें वह कार्य किया है, जो देवताओं और असुरोंके लिये भी

असम्भव है ।। ६९–७२ ।।

गुर्वर्थश्च कृतः पार्थ महाशत्रून् घ्नता मम

एवमेव सदा भाव्यं स्थिरेणाजौ धनंजय ।। ७३ ।।

असंमूढेन चास्त्राणां कर्तव्यं प्रतिपादनम्

अविषह्यो रणे हि त्वं देवदानवराक्षसैः ।। ७४ ।।

‘आज तुमने मेरे महान् शत्रुओंका संहार करके गुरुदक्षिणा चुका दी है। धनंजय! इसी

प्रकार तुम्हें सदा युद्धभूमिमें अविचल रहना चाहिये और मोहशून्य होकर अस्त्रोंका प्रयोग

करना चाहिये। देवता, दानव तथा राक्षस कोई भी युद्धमें तुम्हारा सामना नहीं कर

सकता ।। ७३-७४ ।।

सयक्षासुरगन्धर्वैः सपक्षिगणपन्नगैः

वसुधां चापि कौन्तेय त्वद्बाहुबलनिर्जिताम्

पालयिष्यति धर्मात्मा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।। ७५ ।।