श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ५९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कन्यां तां रममाणां वै मेघमध्ये शतह्रदाम्।<br>प्राह तां प्रेक्ष्य भगवान्नारदः सस्मितस्तदा॥ ५५<br><br>केयं राजन् महाभागा कन्या सुरसुतोपमा।<br>ब्रूहि धर्मभृतां श्रेष्ठ सर्वलक्षणशोभिता॥ ५६ | मेघमें विद्युत्के समान प्रतीत होनेवाली उस कन्याको क्रीड़ा करती हुई देखकर भगवान् नारदने मुसकराकर राजासे कहा— हे राजन्! महाभाग्यशालिनी, देवकन्याके सदृश तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न यह बाला कौन है? हे धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ! यह बताइये॥ ५५-५६॥ |
| राजोवाच<br>दुहितेयं मम विभो श्रीमती नाम नामतः।<br>प्रदानसमयं प्राप्ता वरमन्वेषते शुभा॥ ५७ | राजा बोले— हे विभो! यह मेरी पुत्री है, जो श्रीमती नामसे प्रसिद्ध है। यह विवाह-कालको प्राप्त हो चुकी है, अतः यह सौभाग्यशालिनी वरका अन्वेषण कर रही है॥ ५७॥ |
| इत्युक्तो मुनिशार्दूलस्तामैच्छन्नारदो द्विजाः।<br>पर्वतोऽपि मुनिस्तां वै चकमे मुनिसत्तमाः॥ ५८ | हे ऋषियो! राजाके ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ नारद उसे प्राप्त करनेकी इच्छा करने लगे और हे श्रेष्ठ मुनियो! इसी तरह पर्वतमुनि भी उसे पानेकी प्रबल कामना करने लगे॥ ५८॥ |
| अनुज्ञाप्य च राजानं नारदो वाक्यमब्रवीत्।<br>रहस्याहूय धर्मात्मा मम देहि सुतामिमाम्॥ ५९<br><br>पर्वतो हि तथा प्राह राजानं रहसि प्रभुः।<br>तावुभौ सह धर्मात्मा प्रणिपत्य भयार्दितः॥ ६० | राजाकी अनुमति प्राप्तकर धर्मात्मा नारदने उन्हें एकान्तमें बुलाकर यह बात कही—'अपनी इस पुत्रीको मुझे दे दीजिये।' पर्वतमुनिने भी राजासे एकान्तमें वैसा ही कहा॥ ५९ १/२॥<br><br>तब भयसे व्याकुल राजाने उन दोनोंको एक साथ प्रणाम करके कहा—आप दोनों ही मेरी कन्याकी |
| उभौ भवन्तौ कन्यां मे प्रार्थयानौ कथं त्वहम्।<br>करिष्यामि महाप्राज्ञ शृणु नारद मे वचः॥ ६१ |
| अध्याय ५ ] | विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान | ५११ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्वं च पर्वत मे वाक्यं शृणु वक्ष्यामि यत्प्रभो।<br>कन्येयं युवयोरेकं वरयिष्यति चेच्छुभा॥ ६२<br><br>तस्मै कन्यां प्रयच्छामि नान्यथा शक्तिरस्ति मे।<br>तथेत्युक्त्वा ततो भूयः श्वो यास्याव इति स्म ह॥ ६३<br><br>इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलौ जग्मतुः प्रीतिमानसौ।<br>वासुदेवपरौ नित्यमुभौ ज्ञानविदां वरौ॥ ६४ | याचना कर रहे हैं; [ऐसी स्थितिमें] मैं क्या करूँ? हे महाप्राज्ञ! हे नारद! आप मेरी बात सुनें और हे पर्वत! हे प्रभो! आप भी मेरा वचन सुनें, जिसे मैं कह रहा हूँ—'मेरी यह सौभाग्यवती पुत्री आप दोनोंमेंसे जिस एकका वरण कर लेगी, उसे मैं अपनी कन्या दे दूँगा; इसके अतिरिक्त मेरा सामर्थ्य नहीं है'॥ ६०–६२ १/२॥<br><br>'वैसा ही हो'—यह कहनेके बाद 'हम दोनों कल पुनः आयेंगे'—यह कहकर निरन्तर भगवान् विष्णुमें अनुरक्त रहनेवाले तथा ज्ञानियोंमें अग्रणी वे दोनों मुनिश्रेष्ठ प्रसन्नचित्त होकर वहाँसे चले गये॥ ६३–६४॥ |
| विष्णुलोकं ततो गत्वा नारदो मुनिसत्तमः।<br>प्रणिपत्य हृषीकेशं वाक्यमेतदुवाच ह॥ ६५<br><br>श्रोतव्यमस्ति भगवन्नाथ नारायण प्रभो।<br>रहसि त्वां प्रवक्ष्यामि नमस्ते भुवनेश्वर॥ ६६ | तत्पश्चात् मुनिश्रेष्ठ नारदने विष्णुलोक पहुँचकर भगवान् हृषीकेशको प्रणाम करके यह वचन कहा—हे भगवन्! हे नाथ! हे नारायण! हे प्रभो! आपको कुछ सुनना है; इसे मैं आपको एकान्तमें बताऊँगा। हे भुवनेश्वर! आपको नमस्कार है॥ ६५–६६॥ |
| ततः प्रहस्य गोविन्दः सर्वानुत्सार्य तं मुनिम्।<br>ब्रूहीत्याह च विश्वात्मा मुनिराह च केशवम्॥ ६७<br><br>त्वदीयो नृपतिः श्रीमानम्बरीषो महीपतिः।<br>तस्य कन्या विशालाक्षी श्रीमती नाम नामतः॥ ६८<br><br>परिणेतुमनास्तत्र गतोऽस्मि वचनं शृणु।<br>पर्वतोऽयं मुनिः श्रीमांस्तव भृत्यस्तपोनिधिः॥ ६९<br><br>तामैच्छत्सोऽपि भगवन्नावामाह जनाधिपः।<br>अम्बरीषो महातेजाः कन्येयं युवयोर्वरम्॥ ७०<br><br>लावण्ययुक्तं वृणुयाद्यदि तस्मै ददाम्यहम्।<br>इत्याहावां नृपस्तत्र तथेत्युक्त्वाह्मागतः॥ ७१<br><br>आगमिष्यामि ते राजन् श्वः प्रभाते गृहं त्विति।<br>आगतोऽहं जगन्नाथ कर्तुमर्हसि मे प्रियम्॥ ७२<br><br>वानराननवद्भाति पर्वतस्य मुखं यथा।<br>तथा कुरु जगन्नाथ मम चेदिच्छसि प्रियम्॥ ७३ | तदनन्तर परमात्मा गोविन्द सभी लोगोंको वहाँसे हटाकर हँस करके उन मुनिसे बोले—'कहिये।' तब मुनिने केशवसे कहा—'मेरी बात सुनिये; श्रीमान् राजा अम्बरीष आपके भक्त हैं। श्रीमती नामसे विख्यात उनकी विशाल नेत्रोंवाली पुत्री है। मैं उससे विवाह करनेका इच्छुक हूँ। मैं वहाँ गया था। मेरा वचन सुनिये। आपके भक्त तपोनिधि श्रीमान् ये जो पर्वतमुनि हैं, वे भी उसे चाहते हैं। हे भगवन्! महातेजस्वी राजा अम्बरीषने हम दोनोंसे कहा कि यह कन्या आप दोनोंमेंसे जिस सौन्दर्यसम्पन्नका पतिरूपमें वरण करेगी, उसे मैं कन्या अर्पण कर दूँगा।' जब राजाने हम दोनोंसे ऐसा कहा, तब 'ठीक है; हे राजन्! मैं आपके घर कल प्रातःकाल आऊँगा'—ऐसा कहकर मैं यहाँ आ गया। 'हे जगन्नाथ! अब मैं आपके पास आ गया हूँ; आप मेरा प्रिय कार्य कर दें। हे जगन्नाथ! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो जिस भी प्रकारसे पर्वतका मुख वानरके मुखके समान हो जाय, वैसा आप कर दें'॥ ६७–७३॥ |
| तथेत्युक्त्वा स गोविन्दः प्रहस्य मधुसूदनः।<br>त्वयोक्तं च करिष्यामि गच्छ सौम्य यथागतम्॥ ७४ | तब मुसकराकर भगवान् मधुसूदनने 'ठीक है'—ऐसा कहकर [मुनि नारदसे] कहा—हे सौम्य! आपने |
५९२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग
एवमुक्त्वा मुनिर्हृष्टः प्रणिपत्य जनार्दनम्।
मन्यमानः कृतात्मानं तथायोध्यां जगाम सः॥ ७५
गते मुनिवरे तस्मिन् पर्वतोऽपि महामुनिः।
प्रणम्य माधवं हृष्टो रहस्येनमुवाच ह॥ ७६
वृत्तं तस्य निवेद्याग्रे नारदस्य जगत्पतेः।
गोलाङ्गूलमुखं यद्वन्मुखं भाति तथा कुरु॥ ७७
तच्छ्रुत्वा भगवान् विष्णुस्त्वयोक्तं च करोमि वै।
गच्छ शीघ्रमयोध्यां वै मा वेदीर्नारदस्य वै॥ ७८
त्वया मे संविदं तत्र तथेत्युक्त्वा जगाम सः।
ततो राजा समाज्ञाय प्राप्तौ मुनिवरौ तदा॥ ७९
माङ्गल्यैर्विविधैः सर्वामयोध्यां ध्वजमालिनीम्।
मण्डयामास पुष्पैश्च लाजैश्चैव समन्ततः॥ ८०
अम्बुसिक्तगृहद्वारां सिक्तापपणमहापथाम्।
दिव्यगन्धरसोपेतां धूपितां दिव्यधूपकैः॥ ८१
कृत्वा च नगरीं राजा मण्डयामास तां सभाम्।
दिव्यैर्गन्धैस्तथा धूपै रत्नैश्र्च विविधैस्तथा॥ ८२
अलङ्कृतां मणिस्तम्भैर्नानामाल्यापशोभिताम्।
पराध्र्यास्तरणोपेतैर्दिव्यैर्भद्रासनैर्वृताम् ॥ ८३
कृत्वा नृपेन्द्रस्तां कन्यां ह्यादाय प्रविवेश ह।
सर्वाभरणसम्पन्नां श्रीरिवायतलोचनाम्॥ ८४
करसम्मितमध्याङ्गीं पञ्चस्निग्धां शुभाननाम्।
स्त्रीभिः परिवृतां दिव्यां श्रीमतीं संश्रितां तदा॥ ८५
जो कहा है, उसे मैं करूँगा; अब आप जैसे आये थे, वैसे ही चले जाइये॥ ७४॥
[भगवान्के] ऐसा कहनेपर वे मुनि प्रसन्नतापूर्वक जनार्दनको प्रणाम करके अपनेको धन्य मानते हुए वहाँसे अयोध्या चले गये॥ ७५॥
तत्पश्चात् उन मुनिश्रेष्ठके चले जानेपर महामुनि पर्वतने भी [वहाँ पहुँचकर] भगवान् माधवको प्रणाम करके उन [राजा अम्बरीष]-का सारा वृत्तान्त उनके सम्मुख एकान्तमें कहकर उनसे प्रसन्नतापूर्वक कहा— हे जगत्पते! नारदका मुख लंगूरके मुखकी भाँति लगने लगे, वैसा आप कर दें॥ ७६-७७॥
यह सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—'आपके द्वारा कही गयी बात मैं अवश्य करूँगा, अब आप शीघ्र ही अयोध्या जाइये; किंतु आपके साथ मेरे इस वार्तालापके विषयमें नारदसे वहाँ मत कहियेगा। तब 'ठीक है'— ऐसा कहकर वे [पर्वतमुनि] चले गये॥ ७८ १/२॥
तदनन्तर राजाने उन दोनों मुनिवरोंको आया हुआ जानकर अनेक प्रकारके मांगलिक पदार्थों, पुष्पों तथा लाजा (लावा) आदिके द्वारा एवं ध्वजा-तोरण आदि लगवाकर चारों ओरसे सम्पूर्ण अयोध्याको सजाया। भवनोंके द्वारोंको जलसे सिक्त करके, बाजारों तथा मार्गोंपर जलका छिड़काव कराकर, नगरीको दिव्य गन्ध, रस आदिसे युक्त तथा सुगन्धित धूपोंसे धूपित करके राजाने सम्पूर्ण अयोध्याको मण्डित किया। तदनन्तर राजाने उस स्वयंवर-सभाको विविध प्रकारके दिव्य गन्धों, धूपों तथा रत्नोंसे अलंकृत; मणिनिर्मित स्तम्भों तथा अनेकविध मालाओंसे सुशोभित एवं बहुमूल्य आस्तरणोंसे युक्त दिव्य सिंहासनोंसे आवृत करनेके पश्चात् सभी प्रकारके आभरणोंसे सुसज्जित, लक्ष्मीके समान विशाल नेत्रोंवाली, कृशोदरी, हाथ आदि पाँच अंगोंमें कोमलता धारण करनेवाली, मनोहर मुखमण्डलवाली और अनेक स्त्रियोंसे घिरी तथा संश्रित (सहारा देकर ले जायी जाती हुई) कन्या श्रीमतीको साथमें लेकर उस सभामें प्रवेश किया॥ ७९-८५॥
| अध्याय ५ ] | विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान | ५९३ | | :--- | :--- |
| सभा च सा भूपपतेः समृद्धा<br>मणिप्रवेकोत्तररत्नचित्रा ।<br>न्यस्तासना माल्यवती सुबद्धा<br>तामाययुस्ते नरराजवर्गाः ॥ ८६ | राजा अम्बरीषकी वह सभा वैभवमयी, अनेकविध श्रेष्ठ मणियों तथा रत्नोंसे चित्रित, उत्तम आसनोंसे सुशोभित, पुष्पमालाओंसे मण्डित और सुव्यवस्थित थी, उस सभामें वे राजागण आये ॥ ८६ ॥ | | अथापरो ब्रह्मवरात्मजो हि<br>त्रैविद्यविद्यो भगवान् महात्मा।<br>सपर्वतो ब्रह्मविदां वरिष्ठो<br>महामुनिर्नारद आजगाम ॥ ८७ | तत्पश्चात् ब्रह्माके ज्येष्ठ पुत्र, वेदत्रयी विद्याके ज्ञाता, ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, ऐश्वर्यसम्पन्न तथा महान् आत्मावाले महामुनि नारद पर्वतमुनिसहित वहाँ आ गये ॥ ८७ ॥ | | तावागतौ समीक्ष्याथ राजा सम्भ्रान्तमानसः।<br>दिव्यमासनमादाय पूजयामास तावुभौ ॥ ८८<br>उभौ देवर्षिसिद्धौ तावुभौ ज्ञानविदां वरौ।<br>समासीनौ महात्मानौ कन्यार्थं मुनिसत्तमौ ॥ ८९ | उन दोनोंको आया हुआ देखकर व्याकुल-चित्तवाले राजाने दिव्य आसन प्रदानकर उनकी पूजा की। देवर्षियोंमें विख्यात, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ तथा महान् आत्मावाले वे दोनों मुनिवर कन्याप्राप्तिके लिये सम्यक् रूपसे आसनपर विराजमान हो गये ॥ ८८-८९ ॥ | | तावुभौ प्रणिपत्याग्रे कन्यां तां श्रीमतीं शुभाम्।<br>सुतां कमलपत्राक्षीं प्राह राजा यशस्विनीम् ॥ ९०<br>अनयोर्यं वरं भद्रे मनसा त्वमिहेच्छसि।<br>तस्मै मालामिमां देहि प्रणिपत्य यथाविधि ॥ ९१ | उन दोनोंके सम्मुख दण्डवत् प्रणाम करके राजाने मनोहर, कमलके समान नेत्रोंवाली तथा यशस्विनी उस पुत्री श्रीमतीसे कहा—हे भद्रे ! इन दोनोंमेंसे जिस वरको तुम मनसे चाहती हो, उसे प्रणाम करके यह माला विधिपूर्वक उसे पहना दो ॥ ९०-९१ ॥ | | एवमुक्ता तु सा कन्यास्त्रीभिः परिवृता तदा।<br>मालां हिरण्मयीं दिव्यमादाय शुभलोचना ॥ ९२<br>यत्रासीनौ महात्मानौ तत्रागम्य स्थिता तदा।<br>वीक्ष्यमाणा मुनिश्रेष्ठौ नारदं पर्वतं तथा ॥ ९३ | राजाके ऐसा कहनेपर स्त्रियोंसे घिरी हुई सुन्दर नेत्रोंवाली वह कन्या सुवर्णमयी दिव्य माला लेकर, जहाँ वे दोनों महात्मा बैठे थे, वहीं आकर उन मुनिश्रेष्ठों नारद तथा पर्वतको देखती हुई वहीं स्थित हो गयी ॥ ९२-९३ ॥ | | शाखामृगाननं दृष्ट्वा नारदं पर्वतं तथा।<br>गोलाङ्गूलमुखं कन्या किञ्चित् त्राससमन्विता ॥ ९४<br>सम्भ्रान्तमानसा तत्र प्रवातकदली यथा।<br>तस्थौ तामाह राजासौ वत्से किं त्वं करिष्यसि ॥ ९५<br>अनयोरेकमुद्दिश्य देहि मालामिमां शुभे।<br>सा प्राह पितरं त्रस्ता इमौ तौ नरवानरौ ॥ ९६ | नारदको लंगूरके समान मुखवाला तथा पर्वतको वानरके समान मुखवाला देखकर वह कन्या कुछ डर-सी गयी। व्याकुल चित्तवाली वह कन्या वायु-प्रकम्पित कदलीकी भाँति [काँपती हुई] वहाँ स्थित रही। तब उस राजाने उससे कहा—हे वत्से ! तुम अब क्या करोगी ? हे शुभे ! इन दोनोंमेंसे किसी एकको चुनकर उसे माला पहना दो ॥ ९४-९५ १/२ ॥ | | मुनिश्रेष्ठं न पश्यामि नारदं पर्वतं तथा।<br>अनयोर्मध्यतस्त्वेकमुनषोडशवार्षिकम् ॥ ९७<br>सर्वाभरणसम्पन्नमतसीपुष्पसन्निभम् ।<br>दीर्घबाहुं विशालाक्षं तुङ्गोरस्थलमुत्तमम् ॥ ९८ | डरी हुई उस कन्याने पितासे कहा—ये दोनों तो नरवानरकी आकृतिवाले हैं; मुनिश्रेष्ठ नारद तथा पर्वत तो मुझे दिखायी ही नहीं पड़ रहे हैं। [अपितु] इन दोनोंके मध्यमें सोलह वर्षसे थोड़ी कम आयुवाले, समस्त आभरणोंसे सम्पन्न, अतसी-पुष्पके समान [नील] |
| ५९४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| रेखाङ्कितकटिग्रीवं रक्तान्तायतलोचनम्।<br>नम्रचापानुकरणपटुभ्रूयुगशोभितम् ॥ ९९<br><br>विभक्तत्रिवलीव्यक्तं नाभिव्यक्तशुभोदरम्।<br>हिरण्याम्बरसंवीतं तुङ्गरत्ननखं शुभम्।<br>पद्माकारकरं त्वेनं पद्मास्यं पद्मलोचनम्॥ १००<br><br>सुनासं पद्महृदयं पद्मनाभं श्रिया वृतम्।<br>दन्तपङ्क्तिभिरत्यर्थं कुन्दकुड्मलसन्निभैः॥ १०१<br><br>हसन्तं मां समालोक्य दक्षिणं च प्रसार्य वै।<br>पाणिं स्थितममुं तत्र पश्यामि शुभमूर्धजम् ॥ १०२ | कान्तिवाले, लम्बी भुजाओंवाले, विशाल नेत्रोंवाले, उन्नत तथा उत्तम वक्षःस्थलवाले, रेखायुक्त कटिप्रदेश तथा ग्रीवावाले, रक्त प्रान्तभागसे युक्त विशाल नेत्रोंवाले, झुके हुए धनुषके सदृश टेढ़ी भौंहोंसे सुशोभित, [उदरदेशमें] पृथक्-पृथक् तीन वलियोंसे समन्वित, स्पष्ट नाभिसे युक्त सुन्दर उदरवाले, पीताम्बर धारण किये हुए, उन्नत तथा रत्नकी आभासे युक्त नखवाले, मनोहर कमलके आकारसदृश हाथोंवाले, कमलके समान मुख तथा नेत्रोंवाले, सुन्दर नासिकावाले, पद्मसद्श हृदयदेशवाले, पद्मके समान नाभिवाले, कान्तिमान्, कुन्द-कलीके समान दन्त-पंक्तियोंसे सुशोभित, सुन्दर केशोंवाले और मुझको देखकर मेरी ओर दाहिना हाथ फैलाकर हँसते हुए वहाँपर विराजमान इस [अन्य व्यक्ति]-को देख रही हूँ॥ ९६—१०२॥ | | सम्भ्रान्तमानसां तत्र वेपतीं कदलीमिव।<br>स्थितां तामाह राजासौ वत्से किं त्वं करिष्यसि॥ १०३ | तब कदलीकी भाँति काँपते हुए वहाँपर खड़ी उस व्याकुल मनवाली कन्यासे राजाने कहा—हे वत्से! अब तुम क्या करोगी?॥ १०३॥ | | एवमुक्ते मुनिः प्राह नारदः संशयं गतः।<br>कियन्तो बाहवस्तस्य कन्ये ब्रूहि यथातथम् ॥ १०४<br><br>बाहुद्वयं च पश्यामीत्याह कन्या शुचिस्मिता।<br>प्राह तां पर्वतस्तत्र तस्य वक्षःस्थले शुभे॥ १०५<br><br>किं पश्यसि च मे ब्रूहि करे किं वास्य पश्यसि।<br>कन्या तमाह मालां वै पञ्चरूपामनुत्तमाम्॥ १०६<br><br>वक्षःस्थलेऽस्य पश्यामि करे कार्मुकसायकान्। | उसके ऐसा कहनेपर सन्देहमें पड़े नारदमुनिने कहा—हे कन्ये! उसकी कितनी भुजाएँ हैं; सही-सही बताओ। तब पवित्र मुसकानवाली उस कन्याने कहा—मैं [उसके] दो हाथ देख रही हूँ। इसके बाद पर्वतने उससे कहा—हे शुभे! तुम उसके वक्षःस्थलपर क्या देख रही हो और उसके [बायें] हाथमें क्या देख रही हो; मुझे बताओ। इसपर कन्या उनसे बोली—मैं उसके वक्षःस्थलपर सर्वश्रेष्ठ पंचरूप माला तथा हाथमें धनुष-बाण देख रही हूँ॥ १०४—१०६ १/२॥ | | एवमुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ परस्परमनुत्तमौ ॥ १०७<br><br>मनसा चिन्तयन्तौ तौ मायेयं कस्यचिद्भवेत्।<br>मायावी तस्करो नूनं स्वयमेव जनार्दनः॥ १०८<br><br>आगतो न यथा कुर्यात्कथमस्मन्मुखं त्विदम्।<br>गोलाङ्गूलत्वमित्येवं चिन्तयामास नारदः॥ १०९<br><br>पर्वतोऽपि यथान्यायं वानरत्वं कथं मम।<br>प्राप्तमित्येव मनसा चिन्तामापेदिवांस्तथा॥ ११० | उसके द्वारा इस प्रकार कहे गये वे दोनों उत्तम मुनिश्रेष्ठ मनमें सोचते हुए परस्पर कहने लगे कि यह किसीकी माया हो सकती है। लगता है मायावी तथा तस्कर स्वयं जनार्दन ही [कन्या प्राप्त करनेके लिये] निश्चितरूपसे यहाँ आया हुआ है; यदि ऐसा न होता, तो मेरा यह मुख लंगूरके मुखके समान वह क्यों करता?—ऐसा नारदजी सोचने लगे। इसी प्रकार पर्वतमुनि भी मनमें चिन्ता करने लगे कि मुझे यह वानरत्व कैसे प्राप्त हो गया?॥ १०७—११०॥ |
| अध्याय ५ ] | विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान | ५१५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततो राजा प्रणम्यासौ नारदं पर्वतं तथा।<br>भवद्भ्यां किमिदं तत्र कृतं बुद्धिविमोहजम्॥ १११<br>स्वस्थौ भवन्तौ तिष्ठेतां यथा कन्यार्थमुद्यतौ।<br>एवमुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ नृपमूचतुरुल्बणौ॥ ११२ | तदनन्तर राजाने नारद तथा पर्वतको प्रणाम करके कहा—आप दोनोंने बुद्धि-विमोह उत्पन्न करनेवाला यह क्या कर दिया ? कन्याको प्राप्त करनेके लिये तत्पर आप दोनों अब शान्तचित्त होकर बैठिये॥ १११ १/२॥ |
| त्वमेव मोहं कुरुषे नावामिह कथञ्चन।<br>आवयोरेकमेषा ते वरयत्वेव मा चिरम्॥ ११३ | राजाके ऐसा कहनेपर वे दोनों मुनिश्रेष्ठ कुपित होकर बोले—आप ही मोह कर रहे हैं; हम दोनों बिलकुल नहीं। आपकी यह पुत्री अब हम दोनोंमेंसे किसी एकका अविलम्ब वरण कर ले॥ ११२-११३॥ |
| ततः सा कन्यका भूयः प्रणिपत्येष्टदेवताम्।<br>मायामादाय तिष्ठन्तं तयोर्मध्ये समाहितम्॥ ११४<br>सर्वाभरणसंयुक्तमतसीपुष्पसन्निभम् ।<br>दीर्घबाहुं सुपुष्टाङ्गं कर्णान्तायतलोचनम्॥ ११५<br>पूर्ववत्पुरुषं दृष्ट्वा मालां तस्मै ददौ हि सा।<br>अनन्तरं हि सा कन्या न दृष्टा मनुजैः पुनः॥ ११६ | तत्पश्चात् अपने इष्ट देवताको प्रणाम करके माला लेकर वह उठी और उसने उन दोनोंके बीचमें समाहितचित्त होकर बैठे हुए, समस्त आभरणोंसे सुशोभित, अतसीपुष्पके समान श्याम वर्णवाले, लम्बी भुजाओंवाले, पुष्ट अंगोंवाले तथा कर्णपर्यन्त विशाल नेत्रोंवाले पूर्वसदृश पुरुषको देखकर उसे माला पहना दी। इसके बाद पुनः [वहाँ उपस्थित] मनुष्योंने उस कन्याको नहीं देखा॥ ११४-११६॥ |
| ततो नादः समभवत् किमेतदिति विस्मितौ।<br>तामादाय गतो विष्णुः स्वस्थानं पुरुषोत्तमः॥ ११७<br>पुरा तदर्थमनिशं तपस्तप्त्वा वराङ्गना।<br>श्रीमती सा समुत्पन्ना सा गता च तथा हरिम्॥ ११८ | तब वे दोनों मुनि आश्चर्यचकित हो गये कि यह क्या हुआ ? इसके बाद वहाँ [लोगोंके बीच] यह ध्वनि होने लगी कि उसे लेकर पुरुषोत्तम श्रीविष्णु अपने लोकको चले गये। पूर्वजन्ममें उस सुन्दर युवतीने उन भगवान्के लिये निरन्तर तप करके [इस जन्ममें] 'श्रीमती' नामवाली कन्याके रूपमें जन्म लिया और फिर वह श्रीविष्णुको प्राप्त हुई॥ ११७-११८॥ |
| तावुभौ मुनिशार्दूलौ धिक्कृतावतिदुःखितौ।<br>वासुदेवं प्रति तदा जग्मतुर्भवनं हरेः॥ ११९ | तत्पश्चात् [उस श्रीमतीके द्वारा] तिरस्कृत किये गये वे दोनों मुनिश्रेष्ठ वासुदेव श्रीविष्णुके प्रति अत्यन्त दुःखित होकर उन श्रीहरिके भवन पहुँचे॥ ११९॥ |
| तावागतौ समीक्ष्याह श्रीमतीं भगवान् हरिः।<br>मुनिश्रेष्ठौ समायातौ गूहस्वात्मानमत्र वै॥ १२० | उन दोनोंको आया हुआ देखकर भगवान् श्रीहरिने श्रीमतीसे कहा कि मुनिश्रेष्ठ [नारद तथा पर्वत] आये हैं, अतः तुम अपनेको यहाँ छिपा लो॥ १२०॥ |
| तथेत्युक्त्वा च सा देवी प्रहसन्ती चकार ह।<br>नारदः प्रणिपत्याग्रे प्राह दामोदरं हरिम्॥ १२१ | इस पर 'ठीक है'—ऐसा कहकर उस देवीने हँसते हुए वैसा कर दिया। तब सम्मुख दण्डवत् प्रणाम करके नारदने दामोदर श्रीहरिसे कहा—आपने मेरा तथा पर्वतका प्रिय कार्य तो आज कर दिया; हे गोविन्द! हे |
| प्रियं हि कृतवानद्य मम त्वं पर्वतस्य हि।<br>त्वमेव नूनं गोविन्द कन्यां तां हृतवानसि॥ १२२ | सुरश्रेष्ठ! अपनी बुद्धिसे हम दोनोंको धोखा देकर तथा विमोहित करके स्वयं आपने ही उस कन्याका हरण |
५९६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विमोहावां स्वयं बुद्ध्या प्रतार्य सुरसत्तम।<br>इत्युक्तः पुरुषो विष्णुः पिधाय श्रोत्रमच्युत।<br>पाणिभ्यां प्राह भगवान् भवद्भ्यां किमुदीरितम्॥ १२३ | किया है॥ १२१-१२२ १/२॥<br>उनके ऐसा कहनेपर परम पुरुष अच्युत भगवान् विष्णुने दोनों हाथोंसे अपने कान बन्द करके कहा—आप दोनोंने यह क्या कह दिया! अहो, यह तो वासनामय भाव है, जबकि आपलोग मुनिवृत्तिवाले हैं॥ १२३ १/२॥ |
| कामवानपि भावोऽयं मुनिवृत्तिरहो किल।<br>एवमुक्तो मुनिः प्राह वासुदेवं स नारदः॥ १२४<br><br>कर्णमूले मम कथं गोलांगूलमुखं त्विति।<br>कर्णमूले तमाहेदं वानरत्वं कृतं मया॥ १२५<br><br>पर्वतस्य मया विद्वन् गोलांगूलमुखं तव।<br>मया तव कृतं तत्र प्रियार्थं नान्यथा त्विति॥ १२६ | [भगवान्के द्वारा] इस प्रकार कहे गये उन नारद मुनिने वासुदेवसे उनके कर्णमूलमें कहा—आपने मेरा मुख लंगूरके मुखके समान क्यों कर दिया? तब भगवान् उनके कर्णमूलमें बोले—हे विद्वन्! मैंने ही पर्वतका मुख वानर-जैसा और आपका मुख लंगूर-जैसा कर दिया था; यह सब मैंने आपके हितके लिये ही किया था, इसके विपरीत नहीं॥ १२४—१२६॥ |
| पर्वतोऽपि तथा प्राह तस्याप्येवं जगाद सः।<br>शृण्वतोरुभयोस्तत्र प्राह दामोदरो वचः॥ १२७ | पर्वतने भी वही पूछा; तब उन विष्णुने उनसे भी वैसा ही कहा। इसके बाद भगवान् दामोदर श्रवण कर रहे उन दोनोंके समक्ष यह वचन बोले—मैं शपथपूर्वक सत्य कहता हूँ कि मैंने आप दोनोंका हित ही किया है॥ १२७ १/२॥ |
| प्रियं भवद्भ्यां कृतवान् सत्येनात्मानमालभे।<br>नारदः प्राह धर्मात्मा आवयोर्मध्यतः स्थितः॥ १२८ | तत्पश्चात् धर्मात्मा नारदने कहा—हम दोनोंके मध्यमें स्थित वह कौन धनुर्धारी पुरुष था, जो उस कन्याका हरण करके चला गया था?॥ १२८ १/२॥ |
| धनुष्मान् पुरुषः कोऽत्र तां हृत्वा गतवान् किल।<br>तच्छ्रुत्वा वासुदेवोऽसौ प्राह तौ मुनिसत्तमौ॥ १२९<br><br>मायाविनो महात्मनो बहवः सन्ति सत्तमाः।<br>तत्र सा श्रीमती नूनमदृष्ट्वा मुनिसत्तमौ॥ १३०<br><br>चक्रपाणिरहं नित्यं चतुर्बाहुरिति स्थितः।<br>तां तथा नाहमैच्छं वै भवद्भ्यां विदितं हि तत्॥ १३१ | यह सुनकर वासुदेवने उन मुनिवरोंसे कहा—'बहुतसे श्रेष्ठ महात्मा लोग भी मायावी हैं। वहाँ निश्चित ही श्रीमतीने आप दोनों ऋषिसत्तमोंको देखकर ही अन्यका वरण किया होगा। मैं हाथमें चक्र धारण किये चार भुजाओंसे युक्त होकर स्थित रहता हूँ, यह तो आप दोनोंको विदित ही है; मैंने उसे प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं की है'॥ १२९—१३१॥ |
| इत्युक्तौ प्रणिपत्यैनमूचतुः प्रीतिमानसौ।<br>कोऽत्र दोषस्तव विभो नारायण जगत्पते॥ १३२ | भगवान्ने जब उनसे ऐसा कहा, तब उन दोनोंने प्रसन्न-चित्त होकर उन्हें प्रणाम करके कहा—हे विभो! हे नारायण! हे जगत्पते! इसमें आपका क्या दोष है; इसमें उस राजाकी ही धृष्टता है, उसीने यह माया रची है॥ १३२ १/२॥ |
| दौरात्म्यं तन्नृपस्यैव मायां हि कृतवानसौ।<br>इत्युक्त्वा जग्मतुस्तस्मान्मुनी नारदपर्वतौ॥ १३३<br><br>अम्बरीषं समासाद्य शापेनैनमयोजयत्।<br>नारदः पर्वतश्चैव यस्मादावामिहागतौ॥ १३४ | ऐसा कहकर वे दोनों मुनि नारद तथा पर्वत वहाँसे चल पड़े। अम्बरीषके यहाँ आकर नारद तथा पर्वतने उन्हें शाप दे दिया। हम दोनों आये थे, फिर भी उसके बादमें |
| अध्याय ५ ] | विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान | ५१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आहूय पश्चादन्यस्मै कन्यां त्वं दत्तवानसि।<br>मायायोगेन तस्मात्त्वां तमो ह्यभिभविष्यति ॥ १३५<br><br>तेन चात्मानमत्यर्थं यथावत्त्वं न वेत्स्यसि।<br>एवं शापे प्रदत्ते तु तमोराशिरथोत्थितः ॥ १३६<br><br>नृपं प्रति ततश्चक्रं विष्णोः प्रादुर्भूत् क्षणात्।<br>चक्रवित्रासितं घोरं तावुभौ तम अभ्यगात् ॥ १३७ | किसी अन्यको बुलाकर आपने माया रचकर उसे अपनी कन्या दे दी है, अतः तमोगुण आपको आक्रान्त कर लेगा; इसके परिणामस्वरूप आप अपनी आत्माको यथार्थरूपमें बिलकुल नहीं जान पायेंगे॥ १३३—१३५ १/२ ॥<br><br>[मुनियोंके द्वारा] यह शाप दे दिये जानेपर एक अन्धकारपुंज उत्पन्न हुआ और राजाकी ओर बढ़ा; तब उसी क्षण भगवान् विष्णुका चक्र प्रकट हो गया। उस चक्रके द्वारा त्रस्त किया गया वह अन्धकारपुंज अब उन मुनियोंकी ओर चल पड़ा॥ १३६-१३७॥ |
| ततः सन्तप्तसर्वाङ्गौ धावमानौ महामुनी।<br>पृष्ठतश्चक्रमालोक्य तमोराशिं दुरासदम् ॥ १३८<br><br>कन्यासिद्धिर्हो प्राप्ता ह्यावयोरिति वेगतौ।<br>लोकालोकान्तमनिशं धावमानौ भयार्दितौ ॥ १३९<br><br>त्राहि त्राहीति गोविन्दं भाषमाणौ भयार्दितौ।<br>विष्णुलोकं ततो गत्वा नारायण जगत्पते ॥ १४०<br><br>वासुदेव हृषीकेश पद्मनाभ जनार्दन।<br>त्राह्वावां पुण्डरीकाक्ष नाथोऽसि पुरुषोत्तम ॥ १४१ | तत्पश्चात् सन्तप्त अंगोंवाले भागते हुए वे दोनों महामुनि अपने पीछे उस चक्र तथा भयानक अन्धकार-पुंजको देखकर कहने लगे—'अहो, हम दोनोंने शीघ्र ही कन्यासिद्धि प्राप्त कर ली।' भयभीत होकर लोकलोकान्तरमें निरन्तर दौड़ते हुए और 'त्राहि-त्राहि'—ऐसा पुकारते हुए विष्णुलोक जाकर गोविन्दसे बोले—हे नारायण ! हे जगत्पते ! हे वासुदेव ! हे हृषीकेश ! हे पद्मनाभ ! हे जनार्दन ! हे पुण्डरीकाक्ष ! हे पुरुषोत्तम ! आप [सबके] स्वामी हैं; हम दोनोंकी रक्षा कीजिये ॥ १३८-१४१॥ |
| ततो नारायणश्चिन्त्य श्रीमाञ्छ्रीवत्सलाञ्छनः।<br>निवार्य चक्रं ध्वान्तं च भक्तानुग्रहकाम्यया ॥ १४२<br><br>अम्बरीषश्च मद्भक्तस्तथैतौ मुनिसत्तमौ।<br>अनयोरस्य च तथा हितं कार्यं मयाधुना ॥ १४३<br><br>आहूय तन्तमः श्रीमान् गिरा प्रह्लादयन् हरिः।<br>प्रोवाच भगवान् विष्णुः शृणुतां मे इदं वचः ॥ १४४ | अम्बरीष मेरा भक्त है और वैसे ही ये दोनों मुनिश्रेष्ठ भी मेरे भक्त हैं, अतः इस [अम्बरीष]-का तथा इन दोनों [मुनियों]-का इस समय मुझे हित करना चाहिये—यह सोच करके भक्तोंपर कृपा करनेकी अभिलाषासे ऐश्वर्यसम्पन्न वक्षःस्थलपर श्रीवत्स चिह्न धारण करनेवाले, नारायण, श्रीहरि भगवान् विष्णुने चक्र तथा तमोराशिका निवारण करके उस अन्धकारको बुलाकर वाणीसे उसे प्रसन्न करते हुए बोले—मेरी यह बात सुनो, यह ऋषिका |
| ऋषिशापो न चैवासीदन्यथा च वरो मम।<br>दत्तो नृपाय रक्षार्थं नास्ति तस्यान्यथा पुनः ॥ १४५<br><br>अम्बरीषस्य पुत्रस्य नप्तुः पुत्रो महायशाः।<br>श्रीमान् दशरथो नाम राजा भवति धार्मिकः ॥ १४६<br><br>तस्याहमग्रजः पुत्रो रामनामा भविष्याम्यहम्।<br>तत्र मे दक्षिणो बाहुर्भरतो नाम वै भवेत् ॥ १४७<br><br>शत्रुघ्नो नाम सव्यश्च शेषोऽसौ लक्ष्मणः स्मृतः।<br>तत्र मां समुपागच्छ गच्छेदानीं नृपं विना ॥ १४८ | शाप नहीं था, अपितु मेरा वरदान ही था, जिसे राजाकी रक्षाके लिये मैंने उन्हें प्रदान किया था; इसके विपरीत और कुछ भी नहीं है। इन राजा अम्बरीषके पुत्रके नातीके पुत्र महायशस्वी तथा ऐश्वर्यशाली 'दशरथ' नामक धर्मात्मा राजा होंगे। मैं उन्हींके 'राम' नामक ज्येष्ठ पुत्रके रूपमें अवतीर्ण होऊँगा। मेरा दाहिना हाथ उस समय भरत नामसे और बायाँ हाथ शत्रुघ्न नामसे प्रकट होंगे और ये शेषनाग लक्ष्मणके रूपमें प्रसिद्ध होंगे। उस समय तुम मेरे पास |
| ५९८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| मुनिश्रेष्ठौ च हित्वा त्वं इति स्माह च माधवः।<br>एवमुक्तं तमो नाशं तत्क्षणाच्च जगाम वै॥ १४९ | आना और इस समय राजाको तथा इन मुनिवरोंको छोड़कर चले जाओ—उन माधवने [उस अन्धकारसे] ऐसा कहा। भगवान्के ऐसा कहनेपर वह अन्धकार उसी क्षण नष्ट हो गया और निवारित किया गया वह विष्णुचक्र पूर्वकी भाँति व्यवस्थित हो गया॥ १४२-१४९१/२ ॥ | | निवारितं हरेश्चक्रं यथापूर्वमतिष्ठत।<br>मुनिश्रेष्ठौ भयान्मुक्तौ प्रणिपत्य जनार्दनम्॥ १५०<br><br>निर्गतौ शोकसन्तप्तौ ऊचतुस्तौ परस्परम्।<br>अद्यप्रभृति देहान्तमावां कन्यापरिग्रहम्॥ १५१<br><br>न करिष्याव इत्युक्त्वा प्रतिज्ञाय च तावृषी।<br>योगध्यानपरौ शुद्धौ यथापूर्वं व्यवस्थितौ॥ १५२ | वे मुनिश्रेष्ठ भयसे मुक्त हो गये और जनार्दनको प्रणाम करके वहाँसे निकल गये। शोकसन्तप्त वे दोनों मुनि आपसमें कहने लगे कि आजसे मृत्युपर्यन्त हम दोनों कन्यापरिग्रह (विवाह) नहीं करेंगे। ऐसा कहकर और प्रतिज्ञा करके वे दोनों ऋषि पूर्वकी भाँति योगध्यानपरायण तथा शुद्धविचारवाले हो गये॥ १५०-१५२॥ | | अम्बरीषश्च राजासौ परिपाल्य च मेदिनीम्।<br>सभृत्यज्ञातिसम्पन्नो विष्णुलोकं जगाम वै॥ १५३ | राजा अम्बरीष भी भलीभाँति पृथ्वीका पालन करके अपने सेवकों तथा बन्धु-बान्धवोंसहित विष्णुलोक चले गये॥ १५३॥ | | मानार्थमम्बरीषस्य तथैव मुनिसिंहयोः।<br>रामो दाशरथिर्भूत्वा नात्मवेदीश्वरोऽभवत्॥ १५४ | भगवान् विष्णु भी अम्बरीषके मानके लिये तथा दोनों मुनिश्रेष्ठोंके वचनकी रक्षाके लिये दशरथ-पुत्र राम हुए और वे प्रभु अपने स्वरूपको नहीं जान सके॥ १५४॥ | | मुनयश्च तथा सर्वे भृग्वाद्या मुनिसत्तमाः।<br>माया न कार्या विद्वद्भिरित्याहुः प्रेक्ष्य तं हरिम्॥ १५५ | उन श्रीहरिको देखकर सभी मुनिगण, भृगु आदि मुनिश्रेष्ठ यह कहने लगे कि विद्वानोंको माया नहीं रचनी चाहिये॥ १५५॥ | | नारदः पर्वतश्चैव चिरं ज्ञात्वा विचेष्टितम्।<br>मायां विष्णोर्विनिन्द्यैव रुद्रभक्तौ बभूवतुः॥ १५६ | नारद तथा पर्वत भी [अपने द्वारा किये गये] मूर्खतापूर्ण कार्यको दीर्घकालतक सोचकर तथा विष्णुकी मायाकी निन्दा करके रुद्रभक्त हो गये॥ १५६॥ | | एतद्वि कथितं सर्वं मया युष्माकमद्य वै।<br>अम्बरीषस्य माहात्म्यं मायावित्वं च वै हरेः॥ १५७<br><br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वापि मानवः।<br>मायां विसृज्य पुण्यात्मा रुद्रलोकं स गच्छति॥ १५८<br><br>इदं पवित्रं परमं पुण्यं वेदैरुदीरितम्।<br>सायं प्रातः पठेन्नित्यं विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात्॥ १५९ | [हे मुनियो!] मैंने अम्बरीषका माहात्म्य तथा श्रीहरिका मायावी होना—यह सब आपलोगोंको बता दिया। जो मनुष्य इसे पढ़ता, सुनता अथवा दूसरोंको सुनाता है वह विशुद्ध आत्मावाला होकर मायाका त्याग करके रुद्रलोकको प्राप्त होता है। जो वेदोंके द्वारा कहे गये इस परम पवित्र तथा पुण्यप्रद [आख्यान]-का प्रतिदिन प्रातः तथा सायं पाठ करता है, वह विष्णुसायुज्य प्राप्त करता है॥ १५७–१५९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे श्रीमत्याख्यानं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'श्रीमती-आख्यान' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥
६- भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी (ज्येष्ठा—दरिद्रा) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव एवं लक्ष्मी तथा दरिद्राके निवासयोग्य स्थानोंका वर्णन
अध्याय ६ ] भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी (ज्येष्ठा—दरिद्रा) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव ५९९
छठा अध्याय
भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी (ज्येष्ठा—दरिद्रा) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव एवं लक्ष्मी तथा दरिद्राके निवासयोग्य स्थानोंका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>मायावित्वं श्रुतं विष्णोर्देवदेवस्य धीमतः।<br>कथं ज्येष्ठासमुत्पत्तिर्देवदेवाज्जनार्दनात्॥ १<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं लोमहर्षण तत्त्वतः।<br>सूत उवाच<br>अनादिनिधनः श्रीमान् धाता नारायणः प्रभुः॥ २<br>जगद्द्वैधमिदं चक्रे मोहनाय जगत्पतिः।<br>विष्णुर्वै ब्राह्मणान्वेदान्वेदधर्मान् सनातनान्॥ ३<br>श्रियं पद्मा तथा श्रेष्ठां भागमेकमकारयत्।<br>ज्येष्ठामलक्ष्मीमशुभां वेदबाह्यान्नराधमान्॥ ४<br>अधर्मं च महातेजा भागमेकमकल्पयत्। | ऋषिगण बोले—देवोंके भी देव धीमान् विष्णुका मायावी होना तो हमलोगोंने सुन लिया। हे लोमहर्षण! अब आप हमलोगोंको यथार्थरूपसे यह बतायें कि देवदेव जनार्दनसे ज्येष्ठा (अलक्ष्मी-) की उत्पत्ति कैसे हुई?॥ १ १/२॥<br><br>सूतजी बोले—आदि तथा अन्तसे रहित, ऐश्वर्यशाली, प्रभुतासम्पन्न तथा जगत्के स्वामी नारायण विष्णुने प्राणियोंको व्यामोहमें डालनेके लिये इस जगत्को दो प्रकारका बनाया है। उन महातेजस्वी विष्णुने ब्राह्मणों, वेदों, सनातन वैदिक धर्मों, श्री तथा श्रेष्ठ पद्माकी उत्पत्ति करके एक भाग किया और अशुभ तथा ज्येष्ठा अलक्ष्मी, वेदविरोधी अधम मनुष्यों तथा अधर्मका निर्माण करके एक दूसरा भाग किया॥ २—४ १/२॥ |
| अलक्ष्मीमग्रतः सृष्ट्वा पश्चात्पद्मां जनार्दनः॥ ५<br>ज्येष्ठा तेन समाख्याता अलक्ष्मीर्द्विजसत्तमाः।<br>अमृतोद्भववेलायां विषानन्तरमुल्बणात्॥ ६<br>अशुभा सा तथोत्पन्ना ज्येष्ठा इति च वै श्रुतम्।<br><br>ततः श्रीश्च समुत्पन्ना पद्मा विष्णुपरिग्रहः॥ ७ | हे श्रेष्ठ द्विजगण! भगवान् जनार्दनने पहले अलक्ष्मीका सृजन करके ही पद्मा (लक्ष्मी-) का सृजन किया है, इसीलिये अलक्ष्मी ज्येष्ठा कही गयी हैं। अमृतकी उत्पत्तिके समय महाभयंकर विष निकलनेके पश्चात् पहले वे ज्येष्ठा अशुभ अलक्ष्मी उत्पन्न हुई, ऐसा सुना गया है। उसके अनन्तर विष्णुभार्या लक्ष्मी पद्मा आविर्भूत हुईं॥ ५—७॥ |
| दुःसहो नाम विप्रर्षिरुपयेमेऽशुभां तदा।<br>ज्येष्ठां तां परिपूर्णोऽसौ मनसा वीक्ष्य धिष्ठिताम्॥ ८<br>लोकं चचार हृष्टात्मा तया सह मुनिस्तदा।<br>यस्मिन् घोषो हरेश्चैव हरस्य च महात्मनः॥ ९<br>वेदघोषस्तथा विप्रा होमधूमस्तथैव च।<br>भस्माङ्गिनो वा यत्रासंस्तत्र तत्र भयार्दिता॥ १०<br>पिधाय कर्णौ संयाति धावमाना इतस्ततः।<br>ज्येष्ठामेवंविधां दृष्ट्वा दुःसहो मोहमागतः॥ ११ | तब [लक्ष्मीके विवाहसे पूर्व] दुःसह नामक विप्रर्षिने उस अशुभा ज्येष्ठाके साथ विवाह किया तथा उसको परिगृहीत देख स्वयंको परिपूर्ण माना; तब वे मुनि प्रसन्नचित्त होकर उसके साथ लोकमें विचरण करने लगे। हे विप्रो! जिस स्थानपर विष्णु तथा महात्मा शिवके नामका घोष तथा वेदध्वनि होती थी, हवनका धूम दीखता था अथवा अंगोंमें भस्म धारण किये हुए लोग रहते थे, वहाँपर वह अलक्ष्मी भयातुर होकर अपने दोनों कान बन्द करके इधर-उधर भागती हुई जाती थी। उस ज्येष्ठाको इस प्रकारके स्वभाववाली देखकर मुनि दुःसह उद्विग्न हो उठे॥ ८—११॥ |
| ६०० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| तया सह वनं गत्वा चचार स महामुनिः।<br>तपो महद्घने घोरे याति कन्या प्रतिग्रहम् ॥ १२<br>न करिष्यामि चेत्युक्त्वा प्रतिज्ञाय च तामृषिः।<br>योगज्ञानपरः शुद्धो यत्र योगीश्वरो मुनिः ॥ १३<br>तत्रायान्तं महात्मानं मार्कण्डेयमपश्यत।<br>प्रणिपत्य महात्मानं दुःसहो मुनिमब्रवीत् ॥ १४<br>भार्यैयं भगवन् मह्यं न स्थास्यति कथञ्चन।<br>किं करोमीति विप्रर्षे ह्यनया सह भार्यया ॥ १५<br>प्रविशामि तथा कुत्र कुतो न प्रविशाम्यहम्। | इसके बाद वे महामुनि उसके साथ घोर वनमें जाकर कठोर तप करने लगे। वे सोचने लगे कि कन्याका प्रतिग्रह भविष्यमें नहीं करूँगा—ऐसा कहकर और प्रतिज्ञा करके वे ऋषि योगज्ञानपरायण हो गये। [किसी समय] उन विशुद्धात्मा योगीश्वर मुनिने वहाँपर आते हुए मार्कण्डेयजीको देखा। उन महात्मा मुनिको प्रणाम करके ऋषि दुःसहने कहा—हे भगवन्! मेरी यह भार्या मेरे साथ कभी नहीं रहेगी। हे विप्रर्षे! मैं क्या करूँ; अपनी इस भार्याके साथ कहाँ जाऊँ और कहाँ न जाऊँ? ॥ १२—१५१/२ ॥ | | मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु दुःसह सर्वत्र अकीर्तिरशुभान्विता ॥ १६<br>अलक्ष्मीरतुला चेयं ज्येष्ठा इत्यभिशब्दिता। | मार्कण्डेयजी बोले—हे दुःसह! सुनो, अकीर्ति सर्वत्र अशुभसे युक्त रहती है; यह अतुलनीय अलक्ष्मी ‘ज्येष्ठा’—इस नामसे पुकारी जाती है॥ १६१/२॥ | | नारायणपरा यत्र वेदमार्गानुसारिणः ॥ १७<br>रुद्रभक्ता महात्मानो भस्मोद्धूलितविग्रहाः।<br>स्थिता यत्र जना नित्यं मा विशेथाः कथञ्चन ॥ १८<br>नारायण हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव।<br>अच्युतानन्त गोविन्द वासुदेव जनार्दन ॥ १९<br>रुद्र रुद्रेति रुद्रेति शिवाय च नमो नमः।<br>नमः शिवतरायेति शङ्करायेति सर्वदा ॥ २०<br>महादेव महादेव महादेवेति कीर्तयेत्।<br>उमायाः पतये चैव हिरण्यपतये सदा ॥ २१<br>हिरण्यबाहवे तुभ्यं वृषाङ्काय नमो नमः।<br>नृसिंह वामनाचिन्त्य माधवेति च ये जनाः ॥ २२<br>वक्ष्यन्ति सततं हृष्टा ब्राह्मणाः क्षत्रियास्तथा।<br>वैश्याः शूद्राश्च ये नित्यं तेषां धनगृहादिषु।<br>आरामे चैव गोष्ठेषु न विशेथाः कथञ्चन ॥ २३<br>ज्वालामालाकरालं च सहस्त्रादित्यसन्निभम्।<br>चक्रं विष्णोरतीवोग्रं तेषां हन्ति सदाशुभम् ॥ २४ | जहाँ नारायणके भक्त, वेदमार्गका अनुसरण करनेवाले, रुद्रभक्त, महात्मागण तथा भस्मसे अनुलिप्त शरीरवाले लोग सदा रहते हों, वहाँ तुम कभी भी प्रवेश मत करना। ‘हे नारायण! हे हृषीकेश! हे पुण्डरीकाक्ष! हे माधव! हे अच्युतानन्त! हे गोविन्द! हे वासुदेव! हे जनार्दन! हे रुद्र! हे रुद्र! हे रुद्र!’ शिवको बार-बार नमस्कार है, शिवतरको नमस्कार है, शंकरको सर्वदा नमस्कार है, हे महादेव! हे महादेव! हे महादेव!—ऐसा कहते रहनेवाले; आप उमापति, हिरण्यपति, हिरण्यबाहु तथा वृषांकको सदा बार-बार नमस्कार है, हे नृसिंह! हे वामन! हे अचिन्त्य! हे माधव!—ऐसा जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र प्रसन्न होकर नित्य बोलते रहते हैं; उनके धन-आदि गृहोंमें, उद्यानमें तथा गोष्ठोंमें कभी भी प्रवेश मत करना; क्योंकि विकराल अग्नि-ज्वालाओं तथा हजारों सूर्योंके समान तेजोमय अत्यन्त उग्र विष्णुचक्र उन लोगोंके अमंगलका सदा नाश कर देता है॥ १७—२४॥ | | स्वाहाकारो वषट्कारो गृहे यस्मिन् हि वर्तते।<br>तद्धित्वा चान्यमागच्छ सामघोषोऽथ यत्र वा ॥ २५<br>वेदाभ्यासरता नित्यं नित्यकर्मपरायणाः।<br>वासुदेवार्चनरता दूरतस्तान् विसर्जयेत् ॥ २६ | जिस घरमें स्वाहाकार तथा वषट्कार होता हो तथा जहाँपर सामवेदकी ध्वनि होती हो, उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाना। जो लोग नित्य वेदाभ्यासमें संलग्न हों, नित्यकर्ममें तत्पर हों तथा वासुदेवकी पूजामें रत हों, उन्हें दूरसे ही त्याग देना॥ २५-२६॥ |
| अध्याय ६ ] | भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी (ज्येष्ठा—दरिद्रा) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव | ६०१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अग्निहोत्रं गृहे येषां लिङ्गार्चा वा गृहेषु च।<br>वासुदेवतनुर्वापि चण्डिका यत्र तिष्ठति ॥ २७<br>दूरतो व्रज तान् हित्वा सर्वपापविवर्जितान्।<br>नित्यनैमित्तिकैर्यज्ञैर्यजन्ति च महेश्वरम् ॥ २८<br>तान् हित्वा व्रज चान्यत्र दुःसह त्वं सहानया।<br>श्रोत्रिया ब्राह्मणा गावो गुरवोऽतिथयः सदा ॥ २९<br>रुद्रभक्ताश्च पूज्यन्ते यैर्नित्यं तान् विवर्जयेत्। | जिनके घरमें अग्निहोत्र तथा शिवलिङ्गका पूजन होता हो और जिनके घरोंमें वासुदेव तथा भगवती चण्डिकाकी मूर्ति विराजमान हो, समस्त पापोंसे रहित उन लोगोंको छोड़कर दूर चले जाना। हे दुःसह! जो लोग नित्य तथा नैमित्तिक यज्ञोंके द्वारा महेश्वरकी आराधना करते हैं, उन्हें छोड़कर तुम इसके साथ अन्यत्र चले जाना। जो लोग वैदिकों, ब्राह्मणों, गौओं, गुरुओं, अतिथियों तथा रुद्रभक्तोंकी नित्य पूजा करते हैं, उनके पास मत जाना॥ २७-२९ १/२ ॥ |
| दुःसह उवाच<br>यस्मिन् प्रवेशो योग्यो मे तद्ब्रूहि मुनिसत्तम ॥ ३०<br>त्वद्वाक्याद्भयनिर्मुक्तो विशान्येषां गृहे सदा। | दुःसह बोला—हे मुनिश्रेष्ठ! जिस स्थानमें मेरा प्रवेश हो सके; उसे आप मुझे बतायें, जिससे आपके वचनसे मैं भयरहित होकर इनके घरमें सदा प्रवेश करूँ॥ ३० १/२ ॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>न श्रोत्रिया द्विजा गावो गुरवोऽतिथयः सदा।<br>यत्र भर्ता च भार्या च परस्परविरोधिनी ॥ ३१<br>सभार्यस्त्वं गृहं तस्य विशेथा भयवर्जितः।<br>देवदेवो महादेवो रुद्रस्त्रिभुवनेश्वरः ॥ ३२<br>विनिन्द्यो यत्र भगवान् विशस्व भयवर्जितः।<br>वासुदेवरतिर्नास्ति यत्र नास्ति सदाशिवः ॥ ३३<br>जपहोमादिकं नास्ति भस्म नास्ति गृहे नृणाम्।<br>पर्वण्यभ्यर्चनं नास्ति चतुर्दश्यां विशेषतः ॥ ३४<br>कृष्णाष्टम्यां च रुद्रस्य सन्ध्यायां भस्मवर्जिताः।<br>चतुर्दश्यां महादेवं न यजन्ति च यत्र वै॥ ३५<br>विष्णोर्नामविहीना ये सङ्गताश्च दुरात्मभिः।<br>नमः कृष्णाय शर्वाय शिवाय परमेष्ठिने ॥ ३६<br>ब्राह्मणाश्च नरा मूढा न वदन्ति दुरात्मकाः।<br>तत्रैव सततं वत्स सभार्यस्त्वं समाविश ॥ ३७ | मार्कण्डेयजी बोले—जिसके घरमें वैदिकों, द्विजों, गौओं, गुरुओं तथा अतिथियोंकी पूजा न होती हो और जहाँ पति-पत्नी एक-दूसरेके विरोधी हों, उसके घरमें तुम निर्भय होकर अपनी भार्याके साथ प्रवेश करो। जहाँपर देवाधिदेव, महादेव तथा तीनों भुवनोंके स्वामी भगवान् रुद्रकी निन्दा होती हो, वहाँ तुम भयरहित होकर प्रवेश करो ॥ ३१-३२ १/२ ॥<br>जहाँ भगवान् वासुदेवके प्रति भक्ति न हो; जहाँ सदाशिव न स्थापित हों; जहाँ मनुष्योंके घरमें जप-होम आदि न होता हो, भस्म-धारण न किया जाता हो, पर्वपर विशेष करके चतुर्दशी तथा कृष्णाष्टमी तिथिपर रुद्रपूजन न होता हो, लोग सन्ध्योपासनके समय भस्मधारण न करते हों; जहाँपर लोग चतुर्दशीके दिन महादेवका यजन न करते हों; जहाँ लोग विष्णुके नाम-संकीर्तनसे विमुख हों; जहाँ लोग दुष्टात्मावाले पुरुषोंके साथ रहते हों; जहाँ ब्राह्मण तथा विकृत मनवाले मनुष्य ‘कृष्णको नमस्कार है, परमेष्ठी शर्वको नमस्कार है’— ऐसा नहीं कहते हों, वहींपर तुम अपनी भार्याके साथ सदा प्रवेश करो॥ ३३-३७॥ |
| वेदघोषो न यत्रास्ति गुरुपूजादयो न च।<br>पितृकर्मविहीनांस्तु सभार्यस्त्वं समाविश ॥ ३८ | जहाँ वेदध्वनि, गुरुपूजा आदि न होते हों, उन स्थानोंपर और पितृकर्म (श्राद्ध आदि)-से विमुख लोगोंके यहाँ अपनी भार्यासहित निवास करो। |
६०२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| [चित्र: असफलता]<br><br>रात्रौ रात्रौ गृहे यस्मिन् कलहो वर्तते मिथः।<br>अनया सार्धमनिशं विश त्वं भयवर्जितः॥ ३९ | जिस घरमें रात्रि-वेलामें [लोगोंके बीच] परस्पर कलह होता हो, वहाँ तुम भयमुक्त होकर इसके साथ निरन्तर निवास करो॥ ३८-३९॥ |
| लिङ्गार्चनं यस्य नास्ति यस्य नास्ति जपादिकम्।<br>रुद्रभक्तिर्विन्निन्दा च तत्रैव विश निर्भयः॥ ४०<br>अतिथिः श्रोत्रियो वापि गुरुर्वा वैष्णवोऽपि वा।<br>न सन्ति यद्गृहे गावः सभार्यस्त्वं समाविश॥ ४१ | जिसके यहाँ शिवलिङ्गका पूजन न होता हो तथा जिसके यहाँ जप आदि न होते हों, अपितु रुद्रभक्तिकी निन्दा होती हो, वहींपर तुम निर्भय होकर प्रवेश करो। जिस घरमें अतिथि, श्रोत्रिय (वैदिक), गुरु, विष्णुभक्त और गायें न हों, वहाँ तुम अपनी भार्यासहित निवास करो॥ ४०-४१॥ |
| बालानां प्रेक्षमाणानां यत्रादत्त्वा त्वभक्षयन्।<br>भक्ष्याणि तत्र संहृष्टः सभार्यस्त्वं समाविश॥ ४२<br>अनभ्यर्च्य महादेवं वासुदेवमथापि वा।<br>अहुत्वा विधिवद्यत्र तत्र नित्यं समाविश॥ ४३ | जहाँ बालकोंके देखते रहनेपर उन्हें बिना दिये ही लोग भक्ष्य पदार्थ स्वयं खा जाते हों, उस स्थानपर तुम प्रसन्न होकर सपत्नीक प्रवेश करो। महादेव अथवा भगवान् विष्णुका पूजन न करके तथा विधिपूर्वक हवन न करके जहाँ लोग रहते हों, वहाँ तुम सदा निवास करो॥ ४२-४३॥ |
| पापकर्मरता मूढा दयाहीनाः परस्परम्।<br>गृहे यस्मिन् समासन्ते देशे वा तत्र संविश॥ ४४<br>प्राकारागारविध्वंसा न चैवेड्या कुटुम्बिनी।<br>तद्गृहं तु समासाद्य वस नित्यं हि हृष्टधीः॥ ४५ | जिस घरमें या देशमें पापकृत्यमें संलग्न रहनेवाले, मूर्ख तथा दयाहीन लोग रहते हों, वहाँपर तुम प्रवेश करो। घर और घरकी चहारदीवारीको तोड़नेवाली अर्थात् घरकी मान-मर्यादाको भंग करनेवाली, दुःशीलताके कारण किसी भी प्रकार प्रसन्न न होनेवाली गृहिणी जिस घरमें हो, उस घरमें प्रसन्न मनसे सदा निवास करो॥ ४४-४५॥ |
| यत्र कण्टकिनो वृक्षा यत्र निष्पाववल्लरी।<br>ब्रह्मवृक्षश्च यत्रास्ति सभार्यस्त्वं समाविश॥ ४६<br>अगस्त्यार्कादयो वापि बन्धुजीवो गृहेषु वै।<br>करवीरो विशेषेण नन्द्यावर्तमथापि वा॥ ४७<br>मल्लिका वा गृहे येषां सभार्यस्त्वं समाविश।<br>कन्या च यत्र वै वल्ली द्रोही वा च जटी गृहे॥ ४८<br>बहुला कदली यत्र सभार्यस्त्वं समाविश।<br>तालं तमालं भल्लातं तित्तिडीखण्डमेव च॥ ४९<br>कदम्बः खादिरं वापि सभार्यस्त्वं समाविश।<br>न्यग्रोधं वा गृहे येषामश्वत्थं चूतमेव वा॥ ५० | जहाँ काँटेदार वृक्ष हों, जहाँ निष्पाव (सेम आदि)-की लता हो और जहाँ पलाशका वृक्ष हो, वहाँ तुम अपनी पत्नीसहित निवास करो। जिनके घरोंमें अगस्त्य, आक आदि दूधवाले वृक्ष, बन्धुजीव (गुलदपहरिया)-का पौधा, विशेषरूपसे करवीर, नन्द्यावर्त (तगर) और मल्लिकाके वृक्ष हों, उनके घरोंमें तुम पत्नीके साथ प्रवेश करो। जिस घरमें अपराजिता, अजमोदा, निम्ब, जटामांसी, बहुला (नीलका पौधा), केलेके वृक्ष हों, वहाँपर तुम सपत्नीक प्रवेश करो। जहाँ ताल, तमाल, भल्लात (भिलावा), इमली, कदम्ब और खैरके वृक्ष हों, वहाँ तुम अपनी भार्याके साथ प्रवेश करो। जिनके घरोंमें बरगद, पीपल, आम, गूलर तथा |
| अध्याय ६ ] | भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी ( ज्येष्ठा — दरिद्रा ) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव | ६०३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| उदुम्बरं वा पनसं सभार्यस्त्वं समाविश।<br>यस्य काकगृहं निम्बे आरामे वा गृहेऽपि वा॥ ५१<br><br>दण्डिनी मुण्डिनी वापि सभार्यस्त्वं समाविश।<br>एका दासी गृहे यत्र त्रिगवं पञ्चमाहिषम्॥ ५२ | कटहलके वृक्ष हों, उनके यहाँ तुम अपनी भार्याके साथ निवास करो। जिसके निम्बवृक्षमें, बगीचेमें अथवा घरमें कौवोंका निवास हो और जिसके घरमें दण्डधारिणी तथा कपालधारिणी स्त्री हो, उसके यहाँ तुम पत्नीसहित निवास करो॥ ४६—५१ १/२॥ |
| षडश्वं सप्तमातङ्गं सभार्यस्त्वं समाविश।<br>यस्य काली गृहे देवी प्रेतरूपा च डाकिनी॥ ५३<br><br>क्षेत्रपालोऽथ वा यत्र सभार्यस्त्वं समाविश।<br>भिक्षुबिम्बं च वै यस्य गृहे क्षपणकं तथा॥ ५४<br><br>बौद्धं वा बिम्बमासाद्य तत्र पूर्णं समाविश।<br>शयनासनकालेषु भोजनाटनवृत्तिषु॥ ५५<br><br>येषां वदति नो वाणी नामानि च हरेः सदा।<br>तद्गृहं ते समाख्यातं सभार्यस्य निवेशितुम्॥ ५६ | जिस घरमें एक दासी, तीन गायें, पाँच भैंसे, छः घोड़े और सात हाथी हों, वहाँ तुम अपनी भार्यासहित प्रवेश करो। जिस घरमें प्रेतरूपा तथा डाकिनी काली-प्रतिमा स्थापित हो और जहाँ भैरव-मूर्ति हो, वहाँ तुम अपनी पत्नीके साथ प्रवेश करो। जिस घरमें भिक्षुबिम्ब आदि हो, वहाँ तुम यथेच्छ निवास करो। सोने, बैठने, भोजन तथा भ्रमणके समयोंमें जिनकी वाणी (जिह्वा) सदा भगवान् श्रीहरिके नामोंका उच्चारण नहीं करती, उनका घर सपत्नीक तुम्हारे निवास करनेके लिये मैं बता रहा हूँ॥ ५२—५६॥ |
| पाषण्डाचारनिरताः श्रौतस्मार्तबहिष्कृताः।<br>विष्णुभक्तिविनिर्मुक्ता महादेवविनिन्दकाः॥ ५७<br><br>नास्तिकाश्च शठा यत्र सभार्यस्त्वं समाविश।<br>सर्वस्मादधिकत्वं ये न वदन्ति पिनाकिनः॥ ५८ | जहाँ दम्भपूर्ण आचारमें निरत रहनेवाले, श्रुति तथा स्मृतिसे विमुख रहनेवाले, विष्णुभक्तिसे विहीन, महादेवकी निन्दा करनेवाले, नास्तिक तथा शठ लोग हों, वहाँपर तुम पत्नीसहित निवास करो॥ ५७ १/२॥ |
| साधारणं स्मरन्त्येनं सभार्यस्त्वं समाविश।<br>ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः शक्रः सर्वसुरेश्वरः॥ ५९<br><br>रुद्रप्रसादजाश्चेति न वदन्ति दुरात्मकाः।<br>ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः शक्रश्च सम एव च॥ ६०<br><br>वदन्ति मूढाः खद्योतं भानुं वा मूढचेतसः।<br>तेषां गृहे तथा क्षेत्रे आवासे वा सदानघा॥ ६१ | जो लोग भगवान् शिवको सबसे श्रेष्ठ नहीं कहते हैं और इन्हें साधारण समझते हैं, उनके यहाँ तुम भार्यासहित निवास करो। कलुषित मनवाले जो लोग 'ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा सभी देवताओंके स्वामी इन्द्र—ये रुद्रके प्रसादसे आविर्भूत हैं'—ऐसा नहीं कहते हैं और ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा इन्द्रको इनके समान कहते हैं; साथ ही जो मूढ़ तथा अज्ञानी लोग सूर्यको खद्योत कहते हैं—उनके गृह, क्षेत्र तथा आवासमें तुम सदा इसके साथ निवास करो और पूर्ण रूपसे अनन्यबुद्धि होकर उनके घरमें भोग करो॥ ५८—६१ १/२॥ |
| विश भुङ्क्ष्व गृहं तेषां अपि पूर्णमनन्यधीः।<br>येऽश्नन्ति केवलं मूढाः पक्वमन्नं विचेतसः॥ ६२<br><br>स्नानमङ्गलहीनाश्च तेषां त्वं गृहमाविश।<br>या नारी शौचविभ्रष्टा देहसंस्कारवर्जिता॥ ६३ | जो मूर्ख तथा अज्ञानी लोग अकेले ही पका हुआ अन्न खाते हैं और स्नान आदि मंगलकार्योंसे विहीन रहते हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो। जो स्त्री |
| ६०४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्वभक्षरता नित्यं तस्याः स्थाने समाविश।<br>मलिनास्याः स्वयं मर्त्या मलिनाम्बरधारिणः॥ ६४॥ | शौचाचारसे विमुख हो, देहशुद्धिसे रहित हो तथा सभी [भक्ष्याभक्ष्य] पदार्थोंके भक्षणमें तत्पर रहती हो, उसके घरमें तुम नित्य निवास करो॥ ६२-६३ १/२॥ |
| मलदन्ता गृहस्थाश्च गृहं तेषां समाविश।<br>पादशौचविनिर्मुक्ताः सन्ध्याकाले च शायिनः॥ ६५॥ | जो गृहस्थ मानव स्वयं मलिन मुखवाले, गन्दे वस्त्र धारण करनेवाले तथा मलयुक्त दाँतोंवाले हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो। जो लोग अपना पैर नहीं धोते, सन्ध्याके समय शयन करते हैं और |
| सन्ध्यायामश्नते ये वै गृहं तेषां समाविश।<br>अत्याशनरता मर्त्या अतिपानरता नराः॥ ६६॥ | सन्ध्यावेलामें भोजन करते हैं, उनके घरमें तुम निवास करो। जो मूर्ख मनुष्य बहुत भोजन करते हैं, अत्यधिक पान करते हैं और जुआ-सम्बन्धी वार्ता करने तथा उसके खेलनेमें तत्पर रहते हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो॥ ६४-६६ १/२॥ |
| द्यूतवादक्रियामूढाः गृहं तेषां समाविश।<br>ब्रह्मस्वहारिणो ये चायोग्यांश्चैव यजन्ति वा॥ ६७॥ | जो लोग ब्राह्मणके धनका हरण करते हैं, अपात्रोंका पूजन करते हैं और शूद्रोंका अन्न खाते हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो। |
| शूद्रान्नभोजिनो वापि गृहं तेषां समाविश।<br>मद्यपानरताः पापा मांसभक्षणतत्पराः॥ ६८॥ | जो मनुष्य मद्यपानमें संलग्न रहते हैं, पापपरायण हैं, मांस-भक्षणमें तत्पर रहते हैं और परायी स्त्रियोंमें आसक्त रहते हैं, उनके घरमें तुम निवास करो॥ ६७-६८ १/२॥ |
| परदाररता मर्त्या गृहं तेषां समाविश।<br>पर्वण्यनर्चाभिरता मैथुने वा दिवा रताः॥ ६९॥ | जो लोग पर्वके अवसरपर भगवान्की पूजामें संलग्न नहीं रहते, दिनमें तथा सन्ध्याके समय मैथुन करते हैं, उनके घरमें तुम निवास करो। |
| सन्ध्यायां मैथुनं येषां गृहं तेषां समाविश।<br>पृष्ठतो मैथुनं येषां श्वानवत् मृगवच्च वा॥ ७०॥ | जो लोग कुत्ते तथा मृगकी भाँति पीछेसे मैथुन करते हैं और जलमें मैथुन करते हैं, उनके यहाँ अपनी भार्यासहित तुम निवास करो। |
| जले वा मैथुनं कुर्यात्सभार्यस्त्वं समाविश।<br>रजस्वलां स्त्रियं गच्छेच्चाण्डालीं वा नराधमः॥ ७१॥ | जो नराधम रजस्वला स्त्रीके साथ अथवा चाण्डालीके साथ अथवा कन्याके साथ अथवा गोशालामें सम्भोग करता है; उसके घरमें तुम निवास करो। |
| कन्यां वा गोगृहे वापि गृहं तेषां समाविश।<br>बहुना किं प्रलापेन नित्यकर्मबहिष्कृताः॥ ७२॥ | अधिक कहनेसे क्या लाभ! जो लोग नित्यकर्मसे विमुख तथा रुद्रभक्तिसे रहित हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो। |
| रुद्रभक्तिविहीना ये गृहं तेषां समाविश।<br>शृङ्गादिव्यौषधैः क्षुद्रैः शेफ आलिप्य गच्छति॥ ७३॥<br><br>भगद्रावं करोत्यस्मात्सभार्यस्त्वं समाविश। | कृत्रिम साधनोंसे सम्पन्न होकर जो मनुष्य स्त्रीके पास जाता है और स्त्रीसंसर्ग करता है, उसके यहाँ तुम अपनी भार्यासहित प्रवेश करो॥ ६९-७३ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा स मुनिः श्रीमान्निर्मार्ज्य नयने तदा॥ ७४॥<br><br>ब्रह्मर्षिर्ब्रह्मसङ्काशस्तत्रैवान्तर्द्धिमातनोत् ।<br>दुःसहश्च तथोक्तानि स्थानानि च समीयिवान्॥ ७५॥ | **सूतजी बोले—**ऐसा कहकर वे ऐश्वर्यशाली तथा ब्रह्मतुल्य ब्रह्मर्षि [मार्कण्डेय] मुनि अपने नेत्र धोकर वहींपर अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् [मार्कण्डेयऋषिके द्वारा] बताये गये स्थानों, विशेष |
अध्याय ६] भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी (ज्येष्ठा—दरिद्रा) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव ६०५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विशेषाद्देवदेवस्य विष्णोर्निन्दरतात्मनाम्।<br>सभार्यो मुनिशार्दूलः सैषा ज्येष्ठा इति स्मृता॥ ७६<br>दुःसहस्तामुवाचेदं तडागाश्रममन्तरे।<br>आस्व त्वमत्र चाहं वै प्रवेक्ष्यामि रसातलम्॥ ७७<br>आवयोः स्थानमालोक्य निवासार्थं ततः पुनः।<br>आगमिष्यामि ते पार्श्वमित्युक्ता तमुवाच सा॥ ७८<br>किमश्नामि महाभाग को मे दास्यति वै बलिम्।<br>इत्युक्तस्तां मुनिः प्राह याः स्त्रियस्त्वां यजन्ति वै॥ ७९ | करके देवोंके भी देव विष्णुकी निन्दामें लगे रहनेवाले लोगोंके यहाँ वे मुनिश्रेष्ठ दुःसह अपनी भार्यासहित पहुँचे। किसी समय [एक तड़ाग देखकर] दुःसहमुनिने ये जो ज्येष्ठा नामसे कही गयी हैं, उनसे यह कहा—तुम इस तड़ागके तटपर आश्रममें स्थित पीपलवृक्षमें रहो; मैं रसातलमें प्रवेश करूँगा। अपने दोनोंके निवासयोग्य स्थान देखकर मैं तुम्हारे पास पुनः आ जाऊँगा। उनके ऐसा कहनेपर उस (ज्येष्ठा)-ने उनसे कहा—हे महाभाग! मैं क्या खाऊँगी; मुझे कौन बलि प्रदान करेगा?॥ ७४—७८ १/२॥ |
| बलिभिः पुष्पधूपैश्च न तासां च गृहं विश।<br>इत्युक्त्वा त्वाविशत्तत्र पातालं बिलयोगतः॥ ८० | उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उससे कहा—जो स्त्रियाँ बलियों (भोज्यपदार्थों) तथा पुष्प-धूपसे तुम्हारा पूजन करती हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश मत करना॥ ७९ १/२॥ |
| अद्यापि च विनिर्मग्नो मुनिः स जलसंस्तरे।<br>ग्रामपर्वतबाह्येषु नित्यमास्तेऽशुभा पुनः॥ ८१ | ऐसा कहकर वे बिल-मार्गसे पातालमें प्रविष्ट हुए। वे मुनि आज भी उस जलसंस्तरमें निमग्न हैं और वह अशुभा अलक्ष्मी ग्राम, पर्वत आदि बाह्य स्थानोंमें रह रही है॥ ८०-८१॥ |
| प्रसङ्गाद्देवदेवेशो विष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः।<br>लक्ष्म्या दृष्टस्तया लक्ष्मीः सा तमाह जनार्दनम्॥ ८२<br>भर्ता गतो महाबाहो बिलं त्यक्त्वा स मां प्रभो।<br>अनाथाऽहं जगन्नाथ वृत्तिं देहि नमोऽस्तु ते॥ ८३ | संयोगवश किसी समय उस अलक्ष्मीने देवोंके भी देवेश तथा तीनों लोकोंके स्वामी विष्णुको लक्ष्मीके साथ देख लिया; तब अलक्ष्मीने उन जनार्दनसे कहा—हे प्रभो! हे महाबाहो! मेरे पति मुझे छोड़कर इस बिलमें प्रविष्ट हो गये हैं। हे जगन्नाथ! मैं अनाथ हूँ, अतः आप मुझे आजीविका प्रदान करें; आपको नमस्कार है॥ ८२-८३॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्तो भगवान् विष्णुः प्रहस्याह जनार्दनः।<br>ज्येष्ठामलक्ष्मीं देवेशो माधवो मधुसूदनः॥ ८४ | सूतजी बोले—[ज्येष्ठाके द्वारा] ऐसा कहे गये जनार्दन, देवेश्वर, माधव तथा मधुसूदन भगवान् विष्णु उस ज्येष्ठा अलक्ष्मीसे हँसकर कहने लगे॥ ८४॥ |
| श्रीविष्णुरुवाच<br>ये रुद्रमनघं शर्वं शङ्करं नीललोहितम्।<br>अम्बां हैमवतीं वापि जनित्रीं जगतामपि॥ ८५<br>मद्भक्तान्निन्दयन्त्यत्र तेषां वित्तं तवैव हि।<br>येऽपि चैव महादेवं विनिन्द्यैव यजन्ति माम्॥ ८६ | **श्रीविष्णु बोले—**जो लोग अनघ, शर्व, शंकर, नीललोहित भगवान् रुद्र तथा [समस्त] लोकोंको उत्पन्न करनेवाली माता पार्वतीकी और मेरे भक्तोंकी निन्दा करते हैं, उनका धन तुम्हारा ही है। जो लोग महादेवकी निन्दा करके मेरा पूजन करते हैं, मेरे वे भक्त निश्चय ही अज्ञानी |
| मूढा ह्यभाग्या मद्भक्ता अपि तेषां धनं तव।<br>यस्याज्ञया ह्यहं ब्रह्मा प्रसादाद्वर्तते सदा॥ ८७<br>ये यजन्ति विनिन्द्यैव मम विद्वेषकारकाः।<br>मद्भक्ता नैव ते भक्ता इव वर्तन्ति दुर्मदाः॥ ८८ | तथा अभागे हैं; उनका भी धन तुम्हारा है। जिनकी आज्ञासे तथा कृपासे मैं (विष्णु) तथा ब्रह्मा सदा क्रियाशील रहते हैं, उनका तिरस्कार करके जो लोग मेरा पूजन करते हैं, वे मेरे विद्वेषी हैं; वे मेरे भक्त बिलकुल नहीं हैं, अपितु |
७- भगवान् विष्णुके अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रजपकी महिमामें ऐतरेय ब्राह्मणकी कथा
| ६०६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| तेषां गृहं धनं क्षेत्रमिष्टापूर्तं तथैव हि। | वे मदोन्मत्त हैं और मेरा भक्त होनेका पाखण्ड करते हैं, उनका भी घर, धन, खेत तथा इष्टापूर्त (यज्ञ आदि तथा तालाब, कुआँ खुदवानेका पुण्य कार्य) सब कुछ तुम्हारा है॥ ८५-८८ १/२॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा तां परित्यज्य लक्ष्म्यालक्ष्मीं जनार्दनः ॥ ८९<br><br>जजाप भगवान् रुद्रमलक्ष्मीक्षयसिद्धये।<br>तस्मात्प्रदेयस्तस्यै च बलिर्नित्यं मुनीश्वराः ॥ ९०<br><br>विष्णुभक्तैर्न सन्देहः सर्वयत्नेन सर्वदा।<br>अङ्गनाभिः सदा पूज्या बलिभिर्विविधैर्द्विजाः ॥ ९१ | **सूतजी बोले—**ऐसा कहकर उन अलक्ष्मीको विदा करके भगवान् जनार्दन अलक्ष्मीके क्षयकी सिद्धिके लिये लक्ष्मीके साथ रुद्रका जप करने लगे। अतः हे मुनीश्वरो! सभी विष्णुभक्तोंको चाहिये कि वे पूर्ण प्रयत्नसे उस अलक्ष्मीको नित्य-निरन्तर बलि प्रदान करें; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। हे द्विजो! सभी स्त्रियोंको अनेक प्रकारके बलि-उपचारोंसे सदा [ज्येष्ठा—अलक्ष्मीकी] पूजा करनी चाहिये॥ ८९-९१॥ | | यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्।<br>अलक्ष्मीवृत्तमनघो लक्ष्मीवाँल्लभते गतिम् ॥ ९२ | जो [मनुष्य] इस अलक्ष्मी-वृत्तान्तको पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको सुनाता है, वह पापरहित तथा लक्ष्मीवान् हो जाता है और [शुभ] गति प्राप्त करता है॥ ९२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे अलक्ष्मीवृत्तं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अलक्ष्मीवृत्त' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
सातवाँ अध्याय
भगवान् विष्णुके अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रजपकी महिमामें ऐतरेय ब्राह्मणकी कथा
| ऋषय ऊचुः<br>किं जपन्मुच्यते जन्तुः सर्वलोकभयादिभिः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नोति परमां गतिम्॥ १<br>अलक्ष्मीं वाथ सन्त्यज्य गमिष्यति जपेन वै।<br>लक्ष्मीवासो भवेन्मर्त्यः सूत वक्तुमिहार्हसि॥ २ | **ऋषिगण बोले—**किस [मन्त्र] के जपसे प्राणी सम्पूर्ण सांसारिक भय आदिसे मुक्त हो जाता है और समस्त पापोंसे छूटकर परम गति प्राप्त करता है? किस जपके द्वारा मनुष्य अलक्ष्मीका त्याग करके लक्ष्मीयुक्त हो जाता है; हे सूतजी! यह सब आप बतायें॥ १-२॥ | | सूत उवाच<br>पुरा पितामहेनोक्तं वसिष्ठाय महात्मने।<br>वक्ष्ये सङ्क्षेपतः सर्वं सर्वलोकहिताय वै॥ ३<br>शृण्वन्तु वचनं सर्वे प्रणिपत्य जनार्दनम्।<br>देवदेवमजं विष्णुं कृष्णमच्युतमव्ययम्॥ ४<br>सर्वपापहरं शुद्धं मोक्षदं ब्रह्मवादिनम्।<br>मनसा कर्मणा वाचा यो विद्वान् पुण्यकर्मकृत्॥ ५ | **सूतजी बोले—**पूर्वकालमें पितामहने महात्मा वसिष्ठसे इस विषयमें जो बताया था, वह सब मैं सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये संक्षेपमें बताऊँगा। आप सभी लोग जनार्दन, देवाधिदेव, अजन्मा, कृष्ण, अच्युत, अव्यय, समस्त पापोंको दूर करनेवाले, विशुद्ध, मोक्ष प्रदान करनेवाले तथा ब्रह्मवादी विष्णुको प्रणाम करके [मेरा] वचन सुनें॥ ३-४ १/२॥ |
अध्याय ७ ] भगवान् विष्णुके अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रजपकी महिमामें ऐतरेय ब्राह्मणकी कथा ६०७
| नारायणं जपेन्नित्यं प्रणम्य पुरुषोत्तमम्।<br>स्वपन्नारायणं देवं गच्छन्नारायणं तथा॥ ६<br>भुञ्जन्नारायणं विप्रास्तिष्ठञ्जाग्रत्सनातनम्।<br>उन्मिषन्निमिषन् वापि नमो नारायणेति वै॥ ७<br>भोज्यं पेयं च लेह्यं च नमो नारायणेति च।<br>अभिमन्त्र्य स्पृशन्भुङ्क्ते स याति परमां गतिम्॥ ८<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नोति च सतां गतिम्। | जो पुण्य कर्म करनेवाला विद्वान् मन-वचन-कर्मसे पुरुषोत्तमको प्रणाम करके 'नमो नारायणाय'—इस मन्त्रका जप करता है; सोते, जागते, चलते, बैठते, भोजन करते, आँखें खोलते तथा मूँदते नारायणका स्मरण करता है; भोज्य, पेय तथा लेह्य पदार्थका स्पर्श करते हुए 'नमो नारायणाय'—इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उसे ग्रहण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है और सभी पापोंसे मुक्त होकर सद्गति प्राप्त करता है॥ ५–८ १/२॥ | | अलक्ष्मीश्च मया प्रोक्ता पत्नी या दुःसहस्य च॥ ९<br>नारायणपदं श्रुत्वा गच्छत्येव न संशयः।<br>या लक्ष्मीर्देवदेवस्य हरेः कृष्णस्य वल्लभा॥ १०<br>गृहे क्षेत्रे तथावासे तनौ वसति सुव्रताः। | मुनि दुःसहकी पत्नी जो मेरे द्वारा अलक्ष्मी कही गयी है, वह 'नारायण' नामको सुनते ही वहाँसे भाग जाती है; इसमें संशय नहीं है और हे सुव्रतो! देवोंके भी देव भगवान् श्रीकृष्णकी प्रिया जो लक्ष्मी हैं, वे [उस मनुष्यके] घर, क्षेत्र, आवास तथा शरीरमें वास करती हैं॥ ९–१० १/२॥ | | आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः॥ ११<br>इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा।<br>किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः किं तस्य बहुभिर्व्रतैः॥ १२<br>नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः।<br>तस्मात्सर्वेषु कालेषु नमो नारायणेति च॥ १३<br>जपेत् स याति विप्रेन्द्रा विष्णुलोकं सबान्धवः। | सभी शास्त्रोंका सम्यक् अनुशीलन करके और बार-बार विचार करके यही एक निश्चय किया गया है कि सदा नारायणका ही ध्यान करना चाहिये। अनेक मन्त्रों तथा व्रतोंसे उस मनुष्यको क्या प्रयोजन; क्योंकि यह 'नमो नारायणाय' मन्त्र सभी कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है। अतः हे विप्रेन्द्रो! जो सभी समय 'नमो नारायणाय' इस मन्त्रको जपता है, वह बन्धु-बान्धवोंसहित विष्णुलोकको प्राप्त होता है॥ ११–१३ १/२॥ | | अन्यच्च देवदेवस्य शृण्वन्तु मुनिसत्तमाः॥ १४<br>मन्त्रो मया पुराभ्यस्तः सर्ववेदार्थसाधकः।<br>द्वादशाक्षरसंयुक्तो द्वादशात्मा पुरातनः॥ १५<br>तस्यैवेह च माहात्म्यं सङ्क्षेपात्प्रवदामि वः। | हे मुनिश्रेष्ठो! अब आपलोग देवदेव भगवान् विष्णुके अन्य मन्त्रोंके माहात्म्यका श्रवण करें। मैंने पूर्वकालमें समस्त वेदार्थोंको सिद्ध करनेवाले, बारह वर्णोंसे युक्त, द्वादश आदित्यस्वरूप तथा सनातन मन्त्रका अभ्यास किया था; उसी मन्त्रका माहात्म्य मैं आपलोगोंको संक्षेपमें बता रहा हूँ॥ १४–१५ १/२॥ | | कश्चिद्द्विजो महाप्राज्ञस्तपस्तप्त्वा कथञ्चन॥ १६<br>पुत्रमेकं तयोत्पाद्य संस्कारैश्च यथाक्रमम्।<br>योजयित्वा यथाकालं कृतोपनयनं पुनः॥ १७<br>अध्यापयामास तदा स च नोवाच किञ्चन।<br>न जिह्वा स्पन्दते तस्य दुःखितोऽभूद् द्विजोत्तमः॥ १८ | किसी महामनीषी ब्राह्मणने तपस्या करके किसी तरह एक पुत्रको उत्पन्नकर क्रमानुसार उसके सभी संस्कार सम्पन्न किये; यथासमय उसके उपनयनके पश्चात् उस द्विजने उसे अध्ययन कराया, किन्तु वह कुछ भी नहीं |
| ६०८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| वासुदेवेति नियतमैतरेयो वदत्यसौ।<br>पिता तस्य तथा चान्यां परिणीय यथाविधि॥ १९<br>पुत्रानुत्पादयामास तथैव विधिपूर्वकम्।<br>वेदानधीत्य सम्पन्ना बभूवुः सर्वसम्मताः॥ २०<br>ऐतरेयस्य सा माता दुःखिता शोकमूर्च्छिता। | बोल पाता था। उसकी जिह्वा किसी भी शब्दका उच्चारण नहीं करती थी, वह ऐतरेय नामक बालक केवल 'वासुदेवाय'—इस मन्त्रको निरन्तर बोलता था। इससे वह द्विजश्रेष्ठ बहुत दुःखित हुआ॥ १६–१८ १/२॥<br><br>तब उसके पिताने दूसरी स्त्रीसे विधानके साथ विवाह करके उससे विधिपूर्वक पुत्र उत्पन्न किये। वे पुत्र वेदोंका अध्ययन करके सबके मान्य तथा सम्पत्तियुक्त हो गये॥ १९-२०॥<br><br>ऐतरेयकी वह माता इससे अत्यन्त दुःखित तथा शोकाकुल होकर [उससे] बोली—'मेरी सौतके पुत्र सम्पन्न हैं तथा वेदवेदांगमें पारंगत हैं; वे ब्राह्मणोंसे पूजित होते हुए अपनी माताको आनन्दित करते हैं। एक तुम हो जो मुझ अभागिनको उद्यमहीन पुत्र उत्पन्न हुए। अब तो मेरा मर जाना ही श्रेयस्कर है; जीवित रहना किसी भी तरह ठीक नहीं'॥ २१-२२ १/२॥ | | उवाच पुत्राः सम्पन्ना वेदवेदाङ्गपारगाः॥ २१<br>ब्राह्मणैः पूज्यमाना वै मोदयन्ति च मातरम्।<br>मम त्वं भाग्यहीनायाः पुत्रो जातो निराकृतिः॥ २२<br>ममात्र निधनं श्रेयो न कथञ्चन जीवितम्।<br>इत्युक्तः स च निर्गम्य यज्ञवाटं जगाम वै॥ २३<br>तस्मिन् याते द्विजानां तु न मन्त्राः प्रतिपेदिरे।<br>ऐतरेये स्थिते तत्र ब्राह्मणा मोहितास्तदा॥ २४<br>ततो वाणी समुद्भूता वासुदेवेति कीर्तनात्।<br>ऐतरेयस्य ते विप्राः प्रणिपत्य यथातथम्॥ २५<br>पूजां चक्रुस्ततो यज्ञं स्वयमेव समागतम्।<br>ततः समाप्य तं यज्ञमैतरेयो धनादिभिः॥ २६<br>सर्ववेदान् सदस्याह सषडङ्गान्स समाहितः।<br>तुष्टुवुश्च तथा विप्रा ब्रह्माद्याश्च तथा द्विजाः॥ २७<br>ससृजुः पुष्पवर्षाणि खेचराः सिद्धचारणाः। | [माताके द्वारा] ऐसा कहा गया वह ऐतरेय वहाँसे निकलकर यज्ञमण्डपमें गया। उसके पहुँचते ही [वहाँ उपस्थित] ऋत्विजोंको मन्त्र अवगत नहीं हुए। उस ऐतरेयके वहाँ स्थित रहनेपर सभी ब्राह्मण मोहित हो गये। तब वासुदेव इस नाम-मन्त्रके कीर्तनसे उसके मुखसे मन्त्रमयी वाणी निकलने लगी। [यह देखकर] उन विप्रोंने प्रणाम करके यथाविधि ऐतरेयका पूजन किया। तत्पश्चात् वहाँपर यज्ञदेव स्वयं ही उपस्थित हुए। तब उस यज्ञको पूर्ण करके उन विप्रोंके द्वारा वह ऐतरेय धन आदिसे सम्मानित किया गया। उसने एकनिष्ठ होकर छः अंगोंसहित सभी वेदोंका उस विप्रसभामें कथन किया। [तब हर्षित होकर] सभी ऋत्विज ब्राह्मण आदि तथा द्विजगण उसकी स्तुति करने लगे और सभी खेचर, सिद्ध एवं चारण उसके ऊपर पुष्प-वृष्टि करने लगे॥ २३–२७ १/२॥ | | एवं समाप्य वै यज्ञमैतरेयो द्विजोत्तमाः॥ २८<br>मातरं पूजयित्वा तु विष्णोः स्थानं जगाम ह।<br>एतद्वै कथितं सर्वं द्वादशाक्षरवैभवम्॥ २९<br>पठतां शृण्वतां नित्यं महापातकनाशनम्।<br>जपेद्यः पुरुषो नित्यं द्वादशाक्षरमव्ययम्॥ ३० | हे द्विजश्रेष्ठो! इस प्रकार यज्ञ सम्पन्न करके वह ऐतरेय अपनी माताकी पूजा करके विष्णुलोक चला गया। मैंने यह द्वादशाक्षर मन्त्रका महत्त्व आपलोगोंको बतला दिया। इसे पढ़ने तथा सुननेवालोंके महापापका नाश हो जाता है। जो मनुष्य इस अविनाशी द्वादशाक्षर |
८- शिवमन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी धुन्धुमूखका शिवकी कृपासे शिवगणत्वको प्राप्त करना
| अध्याय ८ ] | शिवमहामन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी धुन्धूमूकका शिवगणत्वको प्राप्त करना | ६०१ |
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| स याति दिव्यमतुलं विष्णोस्तत्परमं पदम्।<br>अपि पापसमाचारो द्वादशाक्षरतत्परः ॥ ३१<br><br>प्राप्नोति परमं स्थानं नात्र कार्या विचारणा।<br>किं पुनर्ये स्वधर्मस्था वासुदेवपरायणाः ॥ ३२<br><br>दिव्यं स्थानं महात्मानः प्राप्नुवन्तीति सुव्रताः ॥ ३३ | मन्त्रका नित्य जप करता है, वह भगवान् विष्णुके अनुपम, दिव्य तथा परमपदको प्राप्त होता है। पाप करनेवाला भी यदि इस द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय )-के जपमें तत्पर रहता है, तो वह परम पद प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये, तो फिर हे सुव्रतो! जो लोग अपने धर्ममें स्थित रहते हुए वासुदेवपरायण हैं, उनकी बात ही क्या; वे महात्मा तो दिव्य स्थान (विष्णुलोक) अवश्य प्राप्त करते हैं॥ २८-३३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे द्वादशाक्षरप्रशंसा नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'द्वादशाक्षरप्रशंसा' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥
आठवाँ अध्याय
शिवमहामन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी धुन्धूमूकका शिवकी कृपासे शिवगणत्वको प्राप्त करना
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| अष्टाक्षरो द्विजश्रेष्ठा नमो नारायणोति च।<br>द्वादशाक्षरमन्त्रश्च परमः परमात्मनः ॥ १<br>मन्त्रः षडक्षरो विप्राः सर्ववेदार्थसञ्चयः।<br>यश्चों नमः शिवायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥ २<br>तथा शिवतरायेति दिव्यः पञ्चाक्षरः शुभः।<br>मयस्कराय चेत्येवं नमस्ते शङ्कराय च ॥ ३<br>सप्ताक्षरोऽयं रुद्रस्य प्रधानपुरुषस्य वै।<br>ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः सर्वे देवाः सवासवाः ॥ ४ | हे द्विजश्रेष्ठो! 'ॐ नमो नारायणाय' यह अष्टाक्षर मन्त्र तथा द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय )—ये परमात्माके श्रेष्ठ मन्त्र हैं। किंतु हे विप्रो! 'ॐ नमः शिवाय'—यह जो षडक्षर मन्त्र है, वह सभी वेदार्थोंका सारभूत है, उसी प्रकार 'शिवतराय' तथा 'मयस्कराय'—ये दिव्य तथा मंगलकारक पंचाक्षरमन्त्र सभी मनोरथोंको प्राप्त करानेवाले हैं और उसी तरह प्रधानपुरुष रुद्रका 'नमस्ते शङ्कराय'—यह सप्ताक्षर मन्त्र भी सभी मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है॥ १-३^{१}/_{२}॥ |
| मन्त्रैरेतैर्द्विजश्रेष्ठा मुनयश्च यजन्ति तम्।<br>शङ्करं देवदेवेशं मयस्करमजोद्भवम् ॥ ५<br>शिवं च शङ्करं रुद्रं देवदेवमुमापतिम्।<br>प्राहुर्नमः शिवायेति नमस्ते शङ्कराय च ॥ ६<br>मयस्कराय रुद्राय तथा शिवतराय च।<br>जप्त्वा मुच्येत वै विप्रो ब्रह्महत्यादिभिः क्षणात् ॥ ७ | हे द्विजश्रेष्ठो! ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा इन्द्रसहित सभी देवता, श्रेष्ठ द्विजगण एवं मुनिलोग इन मन्त्रोंसे उन शंकर, देवदेवेश, मयस्कर तथा अजोद्भव शिवका यजन करते हैं और उन्हीं शिवको शंकर, रुद्र, देवदेव तथा उमापति कहते हैं। नमः शिवाय, नमस्ते शङ्कराय, मयस्कराय, रुद्राय, शिवतराय—इन मन्त्रोंका जप करके विप्र ब्रह्महत्या आदि [महापातकों]-से क्षणभरमें मुक्त हो जाता है॥ ४-७॥ |
| पुरा कश्चिदद्विजः शक्तो धुन्धूमूक इति श्रुतः।<br>आसीत्तृतीये त्रेतायामावर्ते च मनोः प्रभोः ॥ ८ | पूर्वकालमें प्रभु मनुके तीसरे आवर्त (चतुर्युग)- |