श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| १२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| अङ्गुल्यग्रेण वै धीमांस्तर्पयेद्देवतर्पणम्।<br>ऋषींन् कनिष्ठाङ्गुलिना श्रोत्रियः सर्वसिद्धये ॥ १३<br>पितॄंस्तु तर्पयेद्विद्वान् दक्षिणाङ्गुष्ठकेन तु। | सभी सिद्धियोंकी प्राप्तिके लिये बुद्धिमान् तथा विद्वान् वेदज्ञ ब्राह्मणको चाहिये कि वह अंगुलिके अग्रभागसे देवतर्पण, कनिष्ठ अँगुलीसे ऋषितर्पण एवं दाहिने अँगूठेसे पितृतर्पण सम्पन्न करे ॥ १३<sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥ |
| तथैवं मुनिशार्दूल ब्रह्मयज्ञं यजेद् द्विजः॥ १४<br>देवयज्ञं च मानुष्यं भूतयज्ञं तथैव च।<br>पितृयज्ञं च पूतात्मा यज्ञकर्मपरायणः॥ १५ | हे मुनिश्रेष्ठ! इसी प्रकार यज्ञकर्मपरायण तथा पवित्रात्मा द्विजको ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, भूतयज्ञ एवं पितृयज्ञ करना चाहिये ॥ १४-१५ ॥ |
| स्वशाखाध्ययनं विप्रा ब्रह्मयज्ञ इति स्मृतः।<br>अग्नौ जुहोति यच्चान्नं देवयज्ञ इति स्मृतः ॥ १६<br>सर्वेषामेव भूतानां बलिदानं विधानतः।<br>भूतयज्ञ इति प्रोक्तो भूतिदः सर्वदेहिनाम् ॥ १७<br>सदारान् सर्वतत्त्वज्ञान् ब्राह्मणान् वेदपारगान्।<br>प्रणम्य तेभ्यो यद्दत्तन्नं मानुष उच्यते ॥ १८<br>पितॄनुद्दिश्य यद्दत्तं पितृयज्ञः स उच्यते।<br>एवं पञ्च महायज्ञान् कुर्यात्सर्वार्थसिद्धये ॥ १९ | हे विप्रो! अपनी शाखाका अध्ययन करना ब्रह्मयज्ञ कहा गया है तथा अग्निमें अन्न आदिका हवन देवयज्ञ कहा गया है। उसी प्रकार सभी भूतोंके लिये विधिपूर्वक बलि देना भूतयज्ञ कहा जाता है; यह भूतयज्ञ प्राणियोंको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला है। वेदवेत्ता एवं तत्त्वज्ञ ब्राह्मणोंको उनकी भार्यासहित सभीको प्रणाम करके उन्हें अन्नका दान करना मनुष्ययज्ञ कहा जाता है। पितरोंके निमित्त जो श्राद्ध आदि सम्पन्न किया जाता है, उसे पितृयज्ञ कहते हैं। इस प्रकार सभी मनोरथोंकी सिद्धिके लिये इन पाँच महायज्ञोंको करना चाहिये ॥ १६-१९ ॥ |
| सर्वेषां शृणु यज्ञानां ब्रह्मयज्ञः परः स्मृतः।<br>ब्रह्मयज्ञरतो मर्त्यो ब्रह्मलोके महीयते ॥ २०<br>ब्रह्मयज्ञेन तृप्यन्ति सर्वे देवाः सवासवाः।<br>ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः शङ्करो नीललोहितः ॥ २१<br>वेदाश्च पितरः सर्वे नात्र कार्या विचारणा। | सुनिये, ब्रह्मयज्ञ सभी यज्ञोंसे श्रेष्ठ यज्ञ कहा गया है। ब्रह्मयज्ञ करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकमें वास करते हुए आनन्दित होता है। ब्रह्मयज्ञसे इन्द्रसमेत सभी देवता, ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, नीललोहित शंकरजी, सभी वेद तथा पितृगण संतुष्ट हो जाते हैं; इसमें किसी प्रकारकी शंका नहीं करनी चाहिये ॥ २०-२१<sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥ |
| ग्रामाद् बहिर्गंतो भूत्वा ब्राह्मणो ब्रह्मयज्ञवित् ॥ २२<br>यावच्चदृष्टमभवदुटजानां छदं नरः।<br>प्राच्यामुदीच्यां च तथा प्रागुदीच्यामथापि वा ॥ २३<br>पुण्यमाचमनं कुर्याद् ब्रह्मयज्ञार्थमेव तत्। | ब्रह्मयज्ञ करनेके लिये ब्रह्मयज्ञवेत्ता ब्राह्मणको गाँवसे उतनी दूर बाहर चले जाना चाहिये, जहाँसे झोपड़ियोंकी छततक दिखायी न दे। वहाँ बैठकर पूर्व, उत्तर अथवा ईशान दिशाकी ओर मुख करके शुद्धिके लिये आचमन करना चाहिये ॥ २२-२३<sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥ |
| प्रीत्यर्थं च ऋचां विप्राः त्रिः पीत्वा प्लाव्य प्लाव्य च ॥ २४<br>यजुषां परिमृज्यैवं द्विः प्रक्षाल्य च वारिणा।<br>प्रीत्यर्थं सामवेदानामुपस्पृश्य च मूर्धनि ॥ २५<br>स्पृशेदथर्ववेदानां नेत्रे चाङ्गिरसां तथा।<br>नासिके ब्राह्मणोऽङ्गानां क्षाल्य क्षाल्य च वारिणा ॥ २६ | हे ब्राह्मणो! ऋग्वेदाधिष्ठातृ देवताकी प्रीतिकाके लिये तीन बार चुलुकभर जल पीकर, यजुर्वेदाधिष्ठातृ देवताकी प्रीतिके लिये जलद्वारा दो बार प्रक्षालन एवं परिमार्जन करके, सामवेदाधिष्ठातृ देवताकी प्रीतिके लिये आचमन करके मूर्धाका स्पर्श करे। आंगिरससम्बन्धी अथर्ववेदके अधिष्ठातृ देवताकी प्रीतिकाके लिये नेत्रोंका स्पर्श करे। ब्राह्मणग्रन्थों, शिक्षा-कल्प आदि वेदांगोंकी प्रीतिके लिये |
अध्याय २६ ] भगवती गायत्रीका आवाहन तथा जप····भस्मस्नान एवं मन्त्रस्नान १२५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अष्टादशपुराणानां ब्रह्माद्यानां तथैव च।<br>तथा चोपपुराणानां सौरादीनां यथाक्रमम्॥ २७<br><br>पुण्यानामितिहासानां शैवादीनां तथैव च।<br>श्रोत्रे स्पृशेद्धि तुष्ट्यर्थं हृद्देशं तु ततः स्पृशेत्॥ २८<br><br>कल्पादीनां तु सर्वेषां कल्पवित्कल्पवित्तमाः। | नासिकाको जलसे पवित्रकर स्पर्श करे। क्रमशः ब्रह्म आदि अठारह पुराणों, सौर आदि उपपुराणों, पवित्र इतिहासग्रन्थों तथा शैवादि आगमग्रन्थोंकी तुष्टिके लिये कानका स्पर्श करे। तदनन्तर हृदयदेशका स्पर्श करे। हे श्रेष्ठ कल्पवेत्ताओ! सभी कल्पग्रन्थोंके लिये भी पूर्वोक्त क्रिया करनी चाहिये॥ २४—२८ १/२॥ |
| एवमाचम्य चास्तीर्य दर्भपिञ्जूलमात्मनः॥ २९<br><br>कृत्वा पाणितले धीमानात्मनो दक्षिणोत्तरम्।<br>हेमाङ्गुलीयसंयुक्तो ब्रह्मबन्धुयुतोऽपि वा॥ ३०<br><br>विधिवद् ब्रह्मयज्ञं च कुर्यात्सूत्री समाहितः।<br>अकृत्वा च मुनिः पञ्च महायज्ञान् द्विजोत्तमः॥ ३१<br><br>भुक्त्वा च सूकराणां तु योनौ वै जायते नरः।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कर्तव्याः शुभमिच्छता॥ ३२ | बुद्धिमान् एवं संयमी श्रोत्रियको समाहितचित्त होकर इस प्रकार आचमन करके अपने दक्षिणसे उत्तरकी ओर कुश बिछाकर उसपर हाथ रखकर अपने हाथकी अँगुलीमें कुशाकी पवित्री अथवा सोनेकी अँगूठी धारणकर विधिपूर्वक ब्रह्मयज्ञ करना चाहिये। मुनि तथा द्विज होकर जो मनुष्य इन पाँच महायज्ञोंको किये बिना भोजन करता है, वह सूकरकी योनिमें जन्म लेता है। अतः अपने कल्याणके इच्छुक व्यक्तिको विशेष प्रयत्नके साथ इन्हें सम्पन्न करना चाहिये॥ २९—३२॥ |
| ब्रह्मयज्ञादथ स्नानं कृत्वादौ सर्वथात्मनः।<br>तीर्थं सङ्गृह्य विधिवत्प्रविशेच्छिविरं वशी॥ ३३<br><br>बहिरेव गृहात्पादौ हस्तौ प्रक्षाल्य वारिणा।<br>भस्मस्नानं ततः कुर्याद्विधिवद्देहशुद्धये॥ ३४<br><br>शोध्य भस्म यथान्यायं प्रणवेनाग्निहोत्रजम्।<br>ज्योतिः सूर्य इति प्रातर्जुहुयादुदिते यतः॥ ३५<br><br>ज्योतिर्गनिस्तथा सायं सम्यक् चानुदिते मृषा।<br>तस्मादुदितहोमस्थं भसितं पावनं शुभम्॥ ३६ | ब्रह्मयज्ञके पश्चात् डुबकी लगाकर स्नान करके इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले उस पुरुषको चाहिये कि तीर्थका जल लेकर विधिवत् शिविरमें प्रवेश करे। घरके बाहर जलसे हाथ-पैर धोकर पुनः देहकी शुद्धिके लिये विधिपूर्वक भस्मस्नान करना चाहिये। इसके लिये अग्निहोत्रका भस्म लेकर नियमानुसार प्रणवसे उसका शोधन कर लेना चाहिये। सूर्यके ज्योतिस्वरूप होनेसे सूर्योदयके पश्चात् प्रातःकाल 'ज्योतिः सूर्य०' इस मन्त्रसे और सायंकालमें 'ज्योतिराग्न०' इस मन्त्रसे हवन करना चाहिये। सूर्योदय हुए बिना किया गया अग्निहोत्र व्यर्थ होता है। इसलिये सूर्योदयके बाद किये गये हवनकी भस्म पवित्र तथा कल्याणप्रद होती है॥ ३३—३६॥ |
| नास्ति सत्यसमं यस्मादसत्यं पातकं च यत्।<br>ईशानेन शिरोदेशं मुखं तत्पुरुषेण च॥ ३७<br><br>उरोदेशमघोरेण गुह्यं वामेन सुव्रताः।<br>सद्येन पादौ सर्वाङ्गं प्रणवेनाभिषेचयेत्॥ ३८ | सत्यके समान कुछ भी नहीं है और असत्यसे बड़ा कोई पाप नहीं होता है। हे सुव्रतो! ईशानमन्त्रसे सिर, तत्पुरुषसे मुख, अघोरसे वक्षःस्थल, वामदेवसे गुह्यस्थान, सद्योजातसे दोनों पैर तथा प्रणवसे सभी अंगोंका भस्माभिषेचन करना चाहिये॥ ३७-३८॥ |
| ततः प्रक्षालयेत्पादं हस्तं ब्रह्मविदां वरः।<br>व्यपोह्य भस्म चादाय देवदेवमनुस्मरन्॥ ३९ | ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ पुरुषको इस भाँति भस्म-स्नान करके हाथ-पैर धोकर हाथमें कुश लेकर देवदेव |
२७- लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत महेश्वरस्वरूप होकर विविध उपचारोंद्वारा लिङ्गपूजाका विधान, लिङ्गा-भिषेककी महिमा तथा अभिषेकके मन्त्र
| १२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| मन्त्रस्नानं ततः कुर्यादापो हि ष्ठादिभिः क्रमात्।<br>पुण्यैश्चैव तथामन्त्रैर्ऋग्यजुःसामसम्भवैः॥ ४० ॥ | शिवका स्मरण करते हुए 'आपो हि ष्ठा'* आदि मन्त्रों तथा ऋक्, यजुः एवं सामके पवित्र मन्त्रोंसे मन्त्रस्नान करना चाहिये॥ ३९-४०॥ |
| द्विजानां तु हितायैवं कथितं स्नानमद्य ते।<br>सङ्क्षिप्य यः सकृत्कुर्यात्स याति परमं पदम्॥ ४१ ॥ | ब्राह्मणोंके हितके लिये ही मैंने इस स्नानविधिका आज आपसे संक्षेपमें वर्णन किया है। जो मनुष्य एक बार भी इस विधिसे स्नान करेगा, वह परम गतिको प्राप्त होगा॥ ४१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चयज्ञविधानं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पंचयज्ञविधान' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २६ ॥
सत्ताईसवाँ अध्याय
लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत महेश्वरस्वरूप होकर विविध उपचारोंद्वारा लिङ्गपूजाका विधान, लिङ्गाभिषेककी महिमा तथा अभिषेकके मन्त्र
| शैलादिरुवाच | शैलादि बोले— |
|---|---|
| वक्ष्यामि शृणु सङ्क्षेपाल्लिङ्गार्चनविधिक्रमम्।<br>वक्तुं वर्षशतेनापि न शक्यं विस्तरेण यत्॥ १॥ | [हे सनत्कुमार!] सुनिये, अब मैं संक्षेपमें ही क्रमसे लिङ्गार्चन-विधिका वर्णन करूँगा; क्योंकि विस्तारके साथ इसका वर्णन तो सौ वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता है॥ १॥ |
| एवं स्नात्वा यथान्यायं पूजास्थानं प्रविश्य च।<br>प्राणायामत्रयं कृत्वा ध्यायेद्देवं त्रियम्बकम्॥ २<br><br>पञ्चवक्त्रं दशभुजं शुद्धस्फटिकसन्निभम्।<br>सर्वाभरणसंयुक्तं चित्राम्बरविभूषितम्॥ ३ | इस विधिसे नियमपूर्वक (त्रिविध जल, भस्म एवं मन्त्रसे) स्नानकर पूजाके स्थानपर प्रवेश करके तीन प्राणायामकर त्रिनेत्र, पंचमुख, दश भुजाओंवाले, शुद्ध स्फटिकतुल्य वर्णवाले, सभी आभूषणोंसे अलंकृत तथा विचित्र वस्त्रसे विभूषित शिवका ध्यान करना चाहिये॥ २-३॥ |
| तस्य रूपं समाश्रित्य दाहनप्लावनादिभिः।<br>शैवीं तनुं समास्थाय पूजयेत्परमेश्वरम्॥ ४ | उनके इस रूपका ध्यानकर दाहन तथा प्लावन आदि भूतशुद्धिकी क्रियासे युक्त शैवी देहको हृदयमें स्थापित करके परमेश्वर शिवका पूजन करना चाहिये॥ ४॥ |
| देहशुद्धिं च कृत्वैव मूलमन्त्रं न्यसेत्क्रमात्।<br>सर्वत्र प्रणवेनैव ब्रह्माणि च यथाक्रमम्॥ ५ | इस प्रकार देहशुद्धि करके क्रमशः मूलमन्त्र, प्रणवयुक्त [अघोरादि पंच] ब्रह्ममन्त्रोंसे देहके सभी अंगोंमें न्यास करे॥ ५॥ |
| सूत्रे नमः शिवायेति छन्दांसि परमे शुभे।<br>मन्त्राणि सूक्ष्मरूपेण संस्थितानि यतस्ततः॥ ६ | परम कल्याणप्रद इस 'नमः शिवाय' सूत्रमें समस्त वेद तथा मन्त्र सूक्ष्मरूपमें विद्यमान रहते हैं। |
* ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः। ॐ ता न ऊर्जे दधातन। ॐ महे रणाय चक्षसे। ॐ यो वः शिवतमो रसः। ॐ तस्य भाजयतेह नः। ॐ उशतीरिव मातरः। ॐ तस्मा अरं गमाम वः। ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ। ॐ आपो जनयथा च नः।
| अध्याय २७ ] | लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत लिङ्गपूजाका विधान | १२७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न्यग्रोधबीजे न्यग्रोधस्तथा सूत्रे तु शोभने।<br>महत्यपि महद् ब्रह्म संस्थितं सूक्ष्मवत्स्वयम्॥ ७ | जिस प्रकार वटके बीजमें विशाल वटवृक्षका भाव उपस्थित रहता है, उसी प्रकार इस पवित्र एवं महतयुक्त सूत्रमें महान् ब्रह्म सूक्ष्मरूपसे साक्षात् विराजमान है॥ ६-७॥ |
| सेचयेदर्चनस्थानं गन्धचन्दनवारिणा।<br>द्रव्याणि शोधयेत्पश्चात्क्षालनप्रोक्षणादिभिः॥ ८<br>क्षालनं प्रोक्षणं चैव प्रणवेन विधीयते।<br>प्रोक्षणीं चार्र्घ्यपात्रं च पाद्यपात्रमनुक्रमात्॥ ९ | पूजाके स्थानको गन्ध तथा चन्दनसे युक्त जलके द्वारा सेचित करना चाहिये; पुनः सभी पूजनद्रव्योंको क्षालन, प्रोक्षण आदिसे शोधित कर लेना चाहिये। क्षालन तथा प्रोक्षण प्रणवसे ही किया जाता है॥ ८ १/२॥ |
| तथा ह्याचमनीयार्थं कल्पितं पात्रमेव च।<br>स्थापयेद्विधिना धीमानवगुण्ठ्य यथाविधि॥ १०<br>दर्भैराच्छादयेच्चैव प्रोक्षयेच्छुद्धवारिणा।<br>तेषु तेष्वथ सर्वेषु क्षिपेत्तोयं सुशीतलम्॥ ११ | विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह प्रोक्षणीपात्र, अर्घ्यपात्र, पाद्यपात्र तथा आचमनपात्रको भलीभाँति अनुक्रमसे स्थापित करे और फिर विधिपूर्वक अवगुंठन करे। पुनः उन सभी पात्रोंमें शुद्ध एवं शीतल जल डालकर उन्हें कुशोंसे ढककर उनपर शुद्ध जलका प्रोक्षण करना चाहिये॥ ९-११॥ |
| प्रणवेन क्षिपेत्तेषु द्रव्याण्यालोक्य बुद्धिमान्।<br>उशीरं चन्दनं चैव पाद्ये तु परिकल्पयेत्॥ १२<br>जातिकङ्कोलकर्पूरबहुमूलतमालकम् ।<br>चूर्णयित्वा यथान्यायं क्षिपेदाचमनीयके॥ १३<br>एवं सर्वेषु पात्रेषु दापयेच्चन्दनं तथा।<br>कर्पूरं च यथान्यायं पुष्पाणि विविधानि च॥ १४ | तत्पश्चात् बुद्धिमान् पुरुषको उन पात्रोंमें भलीभाँति देखकर विभिन्न द्रव्य प्रणवपूर्वक डालने चाहिये। पाद्यपात्रमें उशीर तथा चन्दन डाले और जाति, कंकोल, कपूर, शतावरी एवं तमालका चूर्ण बनाकर इन्हें उचित मात्रामें आचमनीय पात्रमें डाले। चंदन, कपूर तथा विविध प्रकारके पुष्प सभी पात्रोंमें डालने चाहिये॥ १२-१४॥ |
| कुशाग्रमक्षतांश्चैव यवव्रीहितिलानि च।<br>आज्यसिद्धार्थपुष्पाणि भसितं चार्र्घ्यपात्रके॥ १५<br>कुशपुष्पयवव्रीहिबहुमूलतमालकम् ।<br>दापयेत्प्रोक्षणीपात्रे भसितं प्रणवेन च॥ १६ | कुशका अग्रभाग, अक्षत, यव, धान, तिल, घी, सफेद सरसों, पुष्प तथा भस्म—इन्हें अर्घ्यपात्रमें डालना चाहिये। कुश, पुष्प, यव, धान, शतावरी, तमाल एवं भस्म—इन द्रव्योंको प्रणवसे प्रोक्षणीपात्रमें डालना चाहिये॥ १५-१६॥ |
| न्यसेत्पञ्चाक्षरं चैव गायत्रीं रुद्रदेवताम्।<br>केवलं प्रणवं वापि वेदसारमनुत्तमम्॥ १७ | तत्पश्चात् पञ्चाक्षर मन्त्र, रुद्रगायत्री अथवा केवल वेदसाररूप सर्वोत्तम प्रणवसे इन पात्रोंको अभिमन्त्रित करना चाहिये॥ १७॥ |
| अथ सम्प्रोक्षयेत्पश्चाद् द्रव्याणि प्रणवेन तु।<br>प्रोक्षणीपात्रसंस्थेन ईशानाद्यैश्च पञ्चभिः॥ १८ | इसके अनन्तर प्रणवयुक्त ईशान ( ॐ ईशानः सर्वविद्यानाम्० ) आदि पाँच याजुष मन्त्रोंसे प्रोक्षणीपात्रमें स्थित जलके द्वारा सभी पूजनद्रव्योंका प्रोक्षण करे॥ १८॥ |
| पार्श्वतो देवदेवस्य नन्दिनं मां समर्च्चयेत्।<br>दीप्तानलायुतप्रख्यं त्रिनेत्रं त्रिदशेश्वरम्॥ १९<br>बालेन्दुमुकुटं चैव हरिवक्त्रं चतुर्भुजम्।<br>पुष्पमालाधरं सौम्यं सर्वाभरणभूषितम्॥ २० | पुनः देवदेव शिवजीके दाहिनी ओर स्थित हजारों देदीप्यमान अग्निके सदृश वर्णवाले, बालचन्द्रमाको मुकुटरूपमें सिरपर धारण करनेवाले, वानरके तुल्य |
| १२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- | | उत्तरे चात्मनः पुण्यां भार्यां च मरुतां शुभाम्।<br>सुयशां सुव्रतां चाम्बापादमण्डनतत्पराम्॥ २१ | मुखवाले, चार भुजाओंवाले, पुष्पकी माला धारण करनेवाले, सौम्य स्वरूपवाले तथा सभी अलंकारोंसे सुशोभित मुझ त्रिनेत्र नन्दीका विधिवत् पूजन करना चाहिये। पुनः उत्तरभागमें विराजमान पुण्यमयी, स्वर्ण-सदृश आभावाली, सुन्दर, कीर्तिशालिनी, पतिव्रता एवं माता पार्वतीके चरणोंके मण्डनमें सतत तत्पर रहनेवाली देवीरूपिणी मेरी भार्याकी पूजा करनी चाहिये॥ १९-२१॥ | | एवं पूज्य प्रविश्यान्तर्भवनं परमेष्ठिनः।<br>दत्त्वा पुष्पाञ्जलिं भक्त्या पञ्चमूर्धसु पञ्चभिः॥ २२<br><br>गन्धपुष्पैस्तथा धूपैर्विविधैः पूज्य शङ्करम्।<br>स्कन्दं विनायकं देवीं लिङ्गशुद्धिं च कारयेत्॥ २३ | इस प्रकार हम दोनोंकी पूजा करके परमेष्ठी शिवके मन्दिरमें प्रवेशकर शिवजीके पाँचों मस्तकोंपर सद्योजात आदि पाँच मन्त्रोंसे भक्तिपूर्वक पुष्पाञ्जलि अर्पित करनी चाहिये। पुनः गन्ध, पुष्प, धूप तथा विविध उपचारोंसे शंकर, कार्तिकेय, गणेशजी एवं पार्वतीकी पूजा करके शिवलिङ्गका निर्माल्य (अर्पित चढ़ावेका अवशेष) दूरकर लिङ्गकी शुद्धि करनी चाहिये॥ २२-२३॥ | | जप्त्वा सर्वाणि मन्त्राणि प्रणवादिनमोऽन्तकम्।<br>कल्पयेदासनं पश्चात्पद्माख्यं प्रणवेन तत्॥ २४ | पुनः सभी मन्त्रोंके आदिमें प्रणव (ॐ) तथा अन्तमें 'नमः' लगाकर जप करनेके पश्चात् परमेश्वरको प्रणवमन्त्रके द्वारा अष्टदल-कमलरूप आसन निवेदित करना चाहिये॥ २४॥ | | तस्य पूर्वदलं साक्षादणिमामायमक्षरम्।<br>लघिमा दक्षिणं चैव महिमा पश्चिमं तथा॥ २५<br><br>प्राप्तिस्तथोत्तरं पत्रं प्राकाम्यं पावकस्य तु।<br>ईशित्वं नैर्ऋतं पत्रं वशित्वं वायुगोचरे॥ २६<br><br>सर्वज्ञत्वं तथैशान्यं कर्णिका सोम उच्यते।<br>सोमस्याधस्तथा सूर्यस्तस्याधः पावकः स्वयम्॥ २७ | उस आसनका पूर्वदल अविनाशी तथा साक्षात् अणिमासिद्धिरूप है। उसका दक्षिणदल लघिमा, पश्चिमदल महिमा, उत्तरदल प्राप्ति, अग्निकोणका दल प्राकाम्य, नैर्ऋत्यकोणका दल ईशित्व, वायव्यकोणका दल वशित्व एवं ईशानकोणका दल सर्वज्ञत्वसिद्धिरूप है। उस पद्मासनकी कर्णिका (मध्यभाग) सोममण्डल कही जाती है। सोममण्डलके नीचे सूर्यमण्डल तथा उसके भी नीचे साक्षात् अग्निमण्डल है॥ २५-२७॥ | | धर्मादयो विदिक्ष्वेते त्वनन्तं कल्पयेत्क्रमात्।<br>अव्यक्तादिचतुर्दिक्षु सोमस्यान्ते गुणत्रयम्॥ २८<br><br>आत्मत्रयं ततश्चोर्ध्वं तस्यान्ते शिवपीठिका।<br>सद्योजातं प्रपद्यामीत्यावाह्य परमेश्वरम्॥ २९ | चारों उपदिशाओं (आग्नेय, नैर्ऋत्य, वायव्य तथा ईशान)-में धर्म आदि (धर्म, ज्ञान, वैराग्य एवं ऐश्वर्य), पूर्वादि चारों दिशाओं (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर)-में अव्यक्तादि (अव्यक्त, महत्तत्त्व, अहंकार एवं चित्त), सोममण्डलके ऊपर तीन गुण (सत्त्व, रज, तम), इनके ऊपर तीन आत्माएँ (विश्व, तैजस तथा प्राज्ञ) और उसके ऊपर शिवपीठिका विराजमान है; ऐसे अनन्त- |
अध्याय २७ ] लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत लिङ्गपूजाका विधान १२१
| वामदेवेन मन्त्रेण स्थापयेदासनोपरि।<br>सान्निध्यं रुद्रगायत्र्या अघोरेण निरुद्ध्य च॥ ३०<br><br>ईशानः सर्वविद्यानामिति मन्त्रेण पूजयेत्।<br>पाद्यमाचमनीयं च विभोश्चार्घ्यं प्रदापयेत्॥ ३१<br><br>स्नापयेद्विधिना रुद्रं गन्धचन्दनवारिणा।<br>पञ्चगव्यं विधानेन गृह्य पात्रेऽभिमन्त्र्य च॥ ३२ | स्वरूप आसनकी कल्पना करनी चाहिये॥ २८१/२॥<br><br>पुनः ‘सद्योजातं प्रपद्यामि०’ इस मन्त्रसे परमेश्वर शिवका आवाहन करके वामदेवमन्त्रसे आसनके ऊपर उन्हें स्थापित करे। फिर रुद्रगायत्री मन्त्रसे सान्निध्य, अघोर मन्त्रसे निरोधन तथा ‘ईशानः सर्वविद्यानाम्०’ इस मन्त्रसे शिवकी पूजा करे। पाद्य, अर्घ्य एवं आचमन परमेश्वरको अर्पित करे। पुनः गन्ध तथा चन्दनयुक्त जलसे उन्हें विधिपूर्वक स्नान कराये॥ २९—३११/२॥ | | प्रणवेनैव गव्यैस्तु स्नापयेच्च यथाविधि।<br>आज्येन मधुना चैव तथा चेक्षुरसेन च॥ ३३<br><br>पुण्यैर्द्रव्यैर्महादेवं प्रणवेनाभिषेचयेत्।<br>जलभाण्डैः पवित्रैस्तु मन्त्रैस्तोयं क्षिपेत्ततः॥ ३४ | इसके बाद पात्रमें विधिविधानसे पंचगव्य बनाकर उसे प्रणवसे अभिमन्त्रित करके पुनः प्रणवमन्त्रसे उस पंचगव्यसे शिवको विधिवत् स्नान कराये। इसके अनन्तर प्रणव तथा वेदमन्त्रोंका पाठ करते हुए गोघृतसे, मधुसे, इक्षुरससे एवं अन्य पवित्र द्रव्योंसे महादेवका अभिषेक करना चाहिये। इसके बाद पवित्र जलपात्रोंसे जल छोड़कर साधकको भलीभाँति शिवलिंगका प्रक्षालन (शुद्ध स्नान) कर लेना चाहिये॥ ३२—३४॥ | | शुद्धिं कृत्वा यथान्यायं सितवस्त्रेण साधकः।<br>कुशापामार्गकर्पूरजातिपुष्पकचम्पकैः ॥ ३५<br><br>करवीरैः सितैश्चैव मल्लिकाकमलोत्पलैः।<br>आपूर्य पुष्पैः सुशुभैः चन्दनाद्यैश्च तज्जलम्॥ ३६<br><br>न्यसेन्मन्त्राणि तत्तोये सद्योजातादिकानि तु।<br>सुवर्णकलशेनाथ तथा वै राजतेन वा॥ ३७<br><br>ताम्रेण पद्मपत्रेण पालाशेन दलेन वा।<br>शङ्खेन मृन्मयेनाथ शोधितेन शुभेन वा॥ ३८ | इसके बाद साधकको श्वेत वस्त्रोंसे यथाविधि जलका शोधन करके स्वर्ण, चाँदी या ताम्रपात्र अथवा कमलपत्र, पलाशपत्र, शंख अथवा शोधित सुन्दर मृत्तिकापात्र लेकर उसे पूर्वोक्त शुद्ध जलसे पूर्ण कर लेना चाहिये। पुनः उसमें कुश, अपामार्ग, कर्पूर, जातिपुष्प, चम्पा, श्वेत करवीर, मल्लिका, कमल, उत्पल आदि सुन्दर पुष्प, चन्दन आदि डालकर उस जलको सद्योजात आदि मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके मन्त्रोच्चारके साथ उस जलकुम्भसे शिवजीका अभिषेक करना चाहिये॥ ३५—३८१/२॥ | | सकूर्चेन सपुष्पेण स्नापयेन्मन्त्रपूर्वकम्।<br>मन्त्राणि ते प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वार्थसिद्धये॥ ३९ | [नन्दीश्वर कहते हैं—हे सनत्कुमारजी!] अब मैं सभी मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाले उन मन्त्रोंको आपको बताऊँगा; जिनका पाठ करके एक बार भी शिवलिंगका अभिषेक करनेसे मनुष्य भवबन्धनसे छूट जाता है॥ ३९१/२॥ | | यैर्लिङ्गं सकृदप्येवं स्नाप्य मुच्येत मानवः।<br>पवमानेन मन्त्रज्ञाः तथा वामीयकेन च॥ ४०<br><br>रुद्रेण नीलरुद्रेण श्रीसूक्तेन शुभेन च।<br>रजनीसूक्तकेनैव चमकेन शुभेन च॥ ४१ | [सूतजी बोले—] हे मन्त्रवेत्ता ऋषिगण! पवमान (ऋग्वेदीय पावमानी ऋचाएँ), वामसूक्त (ऋक्० १।१६४), रुद्राध्याय (शुक्लयजुर्वेद अ० १६), अथर्ववेदीय नीलरुद्र (११।२), पवित्र श्रीसूक्त (ऋग्वेद), रात्रीसूक्त (ऋग्वेद), कल्याणप्रद चमक (यजुर्वेद अ० |
| १३० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| होतारोणाथ शिरसा अथर्वेण शुभेन च।<br>शान्त्या चाथ पुनः शान्त्या भारुण्डेनारुणेन च॥ ४२<br><br>वारुणेन च ज्येष्ठेन तथा वेदव्रतेन च।<br>तथान्तरेण पुण्येन सूक्तेन पुरुषेण च॥ ४३<br><br>त्वरितेनैव रुद्रेण कपिना च कपर्दिना।<br>आवोराजेति साम्ना तु बृहच्चन्द्रेण विष्णुना॥ ४४<br><br>विरूपाक्षेण स्कन्देन शतऋग्भिः शिवैस्तथा।<br>पञ्चब्रह्मैश्च सूत्रेण केवलप्रणवेन च॥ ४५<br><br>स्नापयेद्देवदेवेशं सर्वपापप्रशान्तये। | १८), होतार, मंगलमय अथर्वशिर, शान्ति, भारुण्ड, अरुण, वारुण, ज्येष्ठ, वेदव्रत, आन्तर, पुण्यप्रद पुरुषसूक्त (यजुर्वेद), त्वरितरुद्र, कपि, कपर्दी, सामवेदीय आ वो राज० (मन्त्र-संख्या ६९), बृहच्चन्द्र, विष्णु, विरूपाक्ष, स्कन्द, शिवकी सौ ऋचा, पंचब्रह्म (सद्योजातादि पाँच मन्त्र), नमः शिवाय तथा केवल प्रणवमन्त्रसे ही सभी पापोंके शमनहेतु देवदेवेश शिवका अभिषेक करना चाहिये॥ ४०–४५ १/२ ॥ |
| वस्त्रं शिवोपवीतं च तथा ह्याचमनीयकम्॥ ४६<br><br>गन्धं पुष्पं तथा धूपं दीपमन्नं क्रमेण तु।<br>तोयं सुगन्धितं चैव पुनराचमनीयकम्॥ ४७<br><br>मुकुटं च शुभं छत्रं तथा वै भूषणानि च।<br>दापयेत्प्रणवेनैव मुखवासादिकानि च॥ ४८ | तत्पश्चात् भगवान् शंकरको वस्त्र, यज्ञोपवीत, आचमनीय, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, सुगन्धित जल, पुनः आचमन, [रत्नजटित] मुकुट, सुन्दर छत्र, आभूषण तथा मुखवास (ताम्बूल) आदि उपचार प्रणव-मन्त्रक्रमसे अर्पित करना चाहिये॥ ४६–४८॥ |
| ततः स्फटिकसङ्काशं देवं निष्कलमक्षरम्।<br>कारणं सर्वदेवानां सर्वलोकमयं परम्॥ ४९<br><br>ब्रह्मेन्द्रविष्णुरुद्राद्यैर्ऋषिदेवैरगोचरम् ।<br>वेदविद्भिर्हि वेदान्तैस्त्वगोचरमिति श्रुतिः॥ ५०<br><br>आदिमध्यान्तरहितं भेषजं भवरोगिणाम्।<br>शिवतत्त्वमिति ख्यातं शिवलिङ्गे व्यवस्थितम्॥ ५१ | इसके बाद स्फटिकके सदृश वर्णवाले, कलारहित, अविनाशी, समस्त देवताओंके भी कारण, सभी लोकोंमें व्याप्त, परात्पर, ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र-रुद्र आदि देवताओं तथा देवर्षियोंसे अगम्य, श्रुतियोंके अनुसार वेदों एवं उपनिषदोंके ज्ञाताओंसे भी अगोचर, आदि-मध्य-अन्तसे रहित, भवरोगसे संतप्त प्राणियोंके लिये औषधरूप प्रसिद्ध शिवतत्त्व शिवलिङ्गमें प्रतिष्ठित है—इस प्रकारसे शिवलिङ्गमें महादेवका ध्यान करना चाहिये॥ ४९–५१॥ |
| प्रणवेनैव मन्त्रेण पूजयेल्लिङ्गमूर्धनि।<br>स्तोत्रं जपेच्च विधिना नमस्कारं प्रदक्षिणम्॥ ५२<br><br>अर्घ्यं दत्त्वाथ पुष्पाणि पादयोस्तु विकीर्य च।<br>प्रणिपत्य च देवेशमात्मन्यारोपयेच्छिवम्॥ ५३ | पुनः लिङ्गके शीर्षपर प्रणव मन्त्रसे पूजा करनी चाहिये और विधिपूर्वक स्तोत्रपाठ करके नमस्कार तथा प्रदक्षिणा करनी चाहिये। इसके बाद अर्घ्य प्रदान करके महादेवके चरणोंमें पुष्प अर्पितकर उन्हें साष्टांग प्रणाम करे एवं देवाधिदेव शिव मुझमें समाहित हैं—ऐसी भावना करे॥ ५२–५३॥ |
| एवं सङ्क्षिप्य कथितं लिङ्गार्चनमनुत्तमम्।<br>आभ्यन्तरं प्रवक्ष्यामि लिङ्गार्चनमिहाद्य ते॥ ५४ | [हे सनत्कुमारजी!] इस प्रकार मैंने शिवलिङ्गके उत्तम पूजन-विधानका वर्णन संक्षेपमें कर दिया और अब आपको आभ्यन्तर लिङ्गार्चनविधि बताऊँगा॥ ५४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे लिङ्गार्चनविधिर्नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'लिङ्गार्चनविधि' नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥
२८- भगवान् महेश्वरके अभ्यन्तरपूजनका स्वरूप, सकल एवं निष्कल तत्त्वकी व्याख्या, छब्बीस तत्त्वोंका परिगणन एवं सम्पूर्ण चराचर जगत्की शिवरूपता
अध्याय २८ ] भगवान् महेश्वरके आभ्यन्तरपूजनका स्वरूप... जगत्की शिवरूपता १३१.
अट्ठाईसवाँ अध्याय
भगवान् महेश्वरके आभ्यन्तरपूजनका स्वरूप, सकल तथा निष्कल तत्त्वकी व्याख्या, छब्बीस तत्त्वोंका परिगणन एवं सम्पूर्ण चराचर जगत्की शिवरूपता
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शैलादिरुवाच<br>आग्नेयं सौरममृतं बिम्बं भाव्यं ततोपरि।<br>गुणत्रयं च हृदये तथा चात्मत्रयं क्रमात्॥ १<br><br>तस्योपरि महादेवं निष्कलं सकलाकृतिम्।<br>कान्तार्धारूढदेहं च पूजयेद् ध्यानविद्यया॥ २ | शैलादि बोले— अपने हृदयमें अग्निमण्डल, सूर्यमण्डल तथा चन्द्रमण्डलका ध्यान करे। पुनः क्रमसे उसके ऊपर तीन गुण, तीन आत्मा एवं उसके ऊपर कलायुक्त स्वरूपवाले, कलारहित अर्धनारीश्वर महादेवकी भावना करके ध्यानयोगके द्वारा उनका पूजन करना चाहिये॥ १-२॥ |
| ततो बहुविधं प्रोक्तं चिन्त्यं तत्रास्ति चेद्यतः।<br>चिन्तकस्य ततश्चिन्ता अन्यथा नोपपद्यते॥ ३ | यदि चिन्तकके ध्यानावस्थित चित्तमें चिन्त्य तत्त्व [बहुविध कहे जानेके कारण] अनेक रूपोंमें प्राप्त भी हो, तब भी अभेद बुद्धिके कारण चिन्ता करना उचित नहीं है॥ ३॥ |
| तस्माद्ध्येयं तथा ध्यानं यजमानः प्रयोजनम्।<br>स्मरेत्तन्नान्यथा जातु बुध्यते पुरुषस्य ह॥ ४ | इसलिये यजमानको चाहिये कि अपने परम प्रयोजन जो ध्येयरूप सदाशिव हैं, उनका ही ध्यान-स्मरण और ज्ञान प्राप्त करे, अन्यथा पुरुष इस शरीरमें ब्रह्म (सदाशिव)-को कभी नहीं प्राप्त कर सकेगा॥ ४॥ |
| पुरे शेते पुरं देहं तस्मात्पुरुष उच्यते।<br>याज्यं यज्ञेन यजते यजमानस्तु स स्मृतः॥ ५ | देह ही पुर है। उस पुरमें शयन करनेके कारण ही जीव पुरुष कहा जाता है। जो यज्ञसे याज्यका यजन करता है, वह यजमान कहा जाता है॥ ५॥ |
| ध्येयो महेश्वरो ध्यानं चिन्तनं निर्वृतिः फलम्।<br>प्रधानपुरुषेशानं याथातथ्यं प्रपद्यते॥ ६ | महेश्वर ध्येय हैं, उनका चिन्तन ही ध्यान है, मोक्ष ही जीवनका प्रयोजन है—इन तथ्योंको भलीभाँति जाननेवाला ही वास्तविक रूपसे प्रधान पुरुष शिवको प्राप्त कर सकता है॥ ६॥ |
| इह षड्विंशको ध्येयो ध्याता वै पञ्चविंशकः।<br>चतुर्विंशकमव्यक्तं महदाद्यास्तु सप्त च॥ ७<br><br>महांस्तथा त्वहङ्कारं तन्मात्रं पञ्चकं पुनः।<br>कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव तथा बुद्धीन्द्रियाणि च॥ ८<br><br>मनश्च पञ्चभूतानि शिवः षड्विंशकस्ततः।<br>स एव भर्ता कर्ता च विधेरपि महेश्वरः॥ ९ | यहाँ कुल छब्बीस तत्त्व हैं। इनमें छब्बीसवाँ ध्येय है, पच्चीसवाँ ध्याता (जीव) है तथा चौबीसवाँ तत्त्व अव्यक्त अर्थात् प्रकृति है। महत् आदि अर्थात् महत्तत्त्व, अहंकार, पाँच तन्मात्राएँ—ये सात, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच महाभूत तथा मन—ये ही छब्बीस तत्त्व हैं। इनमें छब्बीसवाँ तत्त्व शिव है। वही ब्रह्माका तथा संसारका रचयिता और भरणकर्ता है॥ ७—९॥ |
| हिरण्यगर्भं रुद्रोऽसौ जनयामास शङ्करः।<br>विश्वाधिकश्च विश्वात्मा विश्वरूप इति स्मृतः॥ १० | उसी रुद्रने हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया। भगवान् शंकर विश्वाधिक अर्थात् जगत्के परम कारण, विश्वात्मा तथा विश्वरूप कहे गये हैं॥ १०॥ |
| १३२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| विना यथा हि पितरं मातरं तनयास्त्विह।<br>न जायन्ते तथा सोमं विना नास्ति जगत्त्रयम्॥ ११ | जिस प्रकार माता-पिताके बिना पुत्र उत्पन्न नहीं हो सकते; उसी प्रकार उमासहित शिवके बिना तीनों जगत्की उत्पत्ति सम्भव नहीं है॥ ११॥ | | सनत्कुमार उवाच<br>कर्ता यदि महादेवः परमात्मा महेश्वरः।<br>तथा कारयिता चैव कुर्वतोऽल्पात्मनस्तथा॥ १२<br><br>नित्यो विशुद्धो बुद्धश्च निष्कलः परमेश्वरः।<br>त्वयोक्तो मुक्तिदः किं वा निष्कलश्चेत्करोति किम्॥ १३ | **सनत्कुमार बोले—**यदि परमात्मा महेश्वर शिव ही सब कुछ करने तथा करानेवाले हैं, साथ ही आपने यह भी कहा है कि वे परमेश्वर शिव नित्य, विशुद्ध, चैतन्य, निष्कल तथा मुक्तिदाता हैं; तो फिर वे अल्पात्मा जीवोंको बन्ध-मोक्ष क्यों देते हैं? और फिर निष्कल अर्थात् निष्क्रिय होते हुए वे ऐसा कैसे कर सकते हैं?॥ १२-१३॥ | | शैलादिरुवाच<br>कालः करोति सकलं कालं कलयते सदा।<br>निष्कलंच मनः सर्वं मन्यते सोऽपि निष्कलः॥ १४ | **शैलादि बोले—**काल सम्पूर्ण जगत्का सृजन करता है और परमेश्वर कुछ भी करनेके लिये कालको सदा प्रेरणा प्रदान करता है अर्थात् कालके माध्यमसे परमेश्वर जीवोंको बन्ध-मोक्ष देता है। निष्क्रिय मन शिवका ध्यान करता है, इसलिये वे भी निष्क्रिय स्वरूपवाले हैं॥ १४॥ | | कर्मणा तस्य चैवेह जगत्सर्वं प्रतिष्ठितम्।<br>किमत्र देवदेवस्य मूर्त्यष्टकमिदं जगत्॥ १५<br><br>विनाकाशं जगन्नैव विना क्ष्मां वायुना विना।<br>तेजसा वारिणा चैव यजमानं तथा विना॥ १६<br><br>भानुना शशिना लोकस्तस्यैतास्तनवः प्रभोः।<br>विचारतस्तु रुद्रस्य स्थूलमेतच्चराचरम्॥ १७ | उसी परमेश्वरके कर्मसे यह समग्र जगत् प्रतिष्ठित है; क्योंकि यह जगत् उस देवदेव महेश्वरकी अष्टमूर्ति है। आकाश, पृथ्वी, वायु, तेज, जल, यजमान, सूर्य तथा चन्द्रमा—इन आठ मूर्तियोंके बिना यह जगत् नहीं हो सकता है। ये सब उसी प्रभुके स्वरूप हैं। अतएव विचार करनेसे यही ज्ञात होता है कि यह चराचर जगत् उसी परमेश्वरके स्थूल रूपमें व्यक्त हों रहा है॥ १५-१७॥ | | सूक्ष्मं वदन्ति ऋषयो यन्न वाच्यं द्विजोत्तमाः।<br>यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह॥ १८ | हे श्रेष्ठ द्विजो! ऋषिगण कहते हैं कि परमेश्वरका जो सूक्ष्म रूप है, उसका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता; क्योंकि वाणी उनके सूक्ष्म रूपका वर्णन करनेमें असमर्थ होकर मनसहित वापस लौट आती है अर्थात् वह मन तथा वाणीसे सर्वथा अगम्य है॥ १८॥ | | आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चन।<br>न भेतव्यं तथा तस्माज्ज्ञात्वानन्दं पिनाकिनः॥ १९ | ब्रह्म अर्थात् रुद्रका ही वाचक आनन्द है—ऐसा जाननेवाला विद्वान् कहीं भी भयभीत नहीं होता। अतएव पिनाकी शिवका आनन्दमय स्वरूप जानकर भयभीत नहीं होना चाहिये॥ १९॥ | | विभूतयश्च रुद्रस्य मत्वा सर्वत्र भावतः।<br>सर्वं रुद्र इति प्राहुर्मुनयस्तत्त्वदर्शिनः॥ २० | सर्वत्र रुद्रकी ही विभूतियाँ व्याप्त हैं—ऐसा विश्वासपूर्वक जानकर तत्त्वदर्शी मुनियोंने कहा है कि |
अध्याय २८ ] भगवान् महेश्वरके आभ्यन्तरपूजनका स्वरूप···जगतकी शिवरूपता [ १३३
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| नमस्कारेण सततं गौरवात्परमेष्ठिनः।<br>सर्वं तु खल्विदं ब्रह्म सर्वो वै रुद्र ईश्वरः॥ २१ | सब कुछ रुद्र ही है॥ २०॥<br>परमेष्ठी शिवकी महिमाको समझकर उन्हें सतत नमस्कार करते हुए इस सम्पूर्ण जगत्को ब्रह्म अर्थात् शिवसे व्याप्त मानना चाहिये। उन्हीं शर्व, रुद्र, ईश्वर, |
| पुरुषो वै महादेवो महेशानः परः शिवः।<br>एवं विभुर्वनिर्दिष्टो ध्यानं तत्रैव चिन्तनम्॥ २२ | पुरुष, महादेव, महेशान, परात्पर, शिव तथा विभुको सर्वत्र विराजमान समझकर उन्हींका ध्यान एवं चिन्तन करना चाहिये॥ २१-२२॥ |
| चतुर्व्यूहेन मार्गेण विचार्यालोक्य सुव्रत।<br>संसारहेतुः संसारो मोक्षहेतुश्च निर्वृतिः॥ २३ | हे सुव्रत! चतुर्व्यूहमार्गसे अर्थात् ध्येय, ध्यान, यजमान और प्रयोजनरूपसे विचार करके तथा देख करके जो परमेश्वरको जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है। संसारका हेतु ममत्व तथा मोक्षका हेतु विराग है। |
| चतुर्व्यूहः समाख्यातः चिन्तकस्येह योगिनः।<br>चिन्ता बहुविधा ख्याता सैकत्र परमेष्ठिना॥ २४ | चिन्तक योगीके लिये चतुर्व्यूहमार्ग मुक्तिका सर्वश्रेष्ठ साधन कहा गया है॥ २३ १/२॥<br>ब्रह्माजीने बुद्धिके लिये बहुत प्रकारकी चिन्ताएँ रचीं; किंतु रुद्रका चिन्तन सभी चिन्ताओंसे श्रेष्ठ कहा गया है; इसमें कोई संदेह नहीं है॥ २४ १/२॥ |
| सुनिष्ठेत्यत्र कथिता रुद्रं रौद्री न संशयः।<br>ऐन्द्री चैन्द्रे तथा सौम्या सोमे नारायणे तथा॥ २५ | इन्द्रकी ऐन्द्री चिन्ता, सोमकी सौम्या नामक चिन्ता, नारायणकी चिन्ता, सूर्यकी चिन्ता तथा अग्निकी चिन्ता—इन सबकी चिन्ता वास्तवमें रुद्रकी ही चिन्ता है। |
| सूर्ये वह्नौ च सर्वेषां सर्वत्रैवं विचारतः।<br>सैवाहं सोऽहमित्येवं द्विधा संस्थाप्य भावतः॥ २६ | इस प्रकार विचार करके वह चिन्ता मैं ही हूँ तथा वह परमेश्वर भी मैं ही हूँ—जो भक्त इन दोनों बातोंको श्रद्धापूर्वक अपने मनमें स्थापित किये रहता है, वह परमेश्वरसे भिन्न नहीं है। अतः इस प्रकारकी चिन्ता (चिन्तन) ब्राह्मी चिन्ता कही गयी है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २५-२६ १/२॥ |
| भक्तोऽसौ नास्ति यस्तस्माच्चिन्ता ब्राह्मी न संशयः।<br>एवं ब्रह्ममयं ध्यायेत्पूर्वं विप्र चराचरम्॥ २७ | हे विप्र! इस प्रकार पहले यह ध्यान करना चाहिये कि यह स्थावर-जंगमरूप जगत् ब्रह्ममय है; पुनः ब्रह्मात्मक शिवका स्मरण करते हुए चर-अचरका विभाग भी छोड़ देना चाहिये अर्थात् चराचरमें भिन्नताका भाव नहीं रखना चाहिये॥ २७ १/२॥ |
| चराचरविभागं च त्यजेदभिमतं स्मरन्।<br>त्याज्यं ग्राह्यमलभ्यं च कृत्यं चाकृत्यमेव च॥ २८ | जिस पुरुषके लिये कुछ भी त्याज्य (त्यागनेयोग्य), ग्राह्य (लेनेयोग्य), अलभ्य (प्राप्त न होनेयोग्य), कृत्य (करनेयोग्य) तथा अकृत्य (न करनेयोग्य) नहीं रह जाता; |
| यस्य नास्ति सुतृप्तस्य तस्य ब्राह्मी न चान्यथा।<br>आभ्यन्तरं समाख्यातमेवमभ्यर्चनं क्रमात्॥ २९ | उस परम संतुष्ट पुरुषकी चिन्ता ब्राह्मी चिन्ता है; इसमें संदेह नहीं है॥ २८ १/२॥ |
२९- देवदारुवनका वृत्तान्त, अतिथिमहात्म्यमें सुदर्शन-मुनिका आख्यान तथा संन्यासधर्मका वर्णन
| १३४. | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| आभ्यन्तरार्चकाः पूज्या नमस्कारादिभिस्तथा।<br>विरूपा विकृताश्चापि न निन्द्या ब्रह्मवादिनः॥ ३०<br><br>आभ्यन्तरार्चकाः सर्वे न परीक्ष्या विजानता।<br>निन्दका एव दुःखार्ता भविष्यन्त्यल्पचेतसः॥ ३१<br><br>यथा दारुवने रुद्रं विनिन्द्य मुनयः पुरा।<br>तस्मात्सेव्या नमस्कार्याः सदा ब्रह्मविदस्तथा॥ ३२<br><br>वर्णाश्रमविनिर्मुक्ता वर्णाश्रमपरायणैः॥ ३३ | इस प्रकार मैंने क्रमसे आभ्यन्तर पूजनका वर्णन कर दिया। आभ्यन्तर अर्चन करनेवाले पुरुष नमस्कार आदिके द्वारा सदा पूजनीय हैं। ऐसे ब्रह्मवादी पूजक विरूप तथा विकृत हों; तो भी उनकी निन्दा नहीं करनी चाहिये॥ २९-३०॥<br><br>विद्वान् पुरुषको जान-बूझकर किन्हीं भी आभ्यन्तर पूजककी परीक्षा नहीं लेनी चाहिये। अल्प बुद्धिवाले ऐसे निन्दक उसी प्रकार दुःखसे पीड़ित होंगे, जैसे प्राचीन कालमें दारुवनमें रुद्रकी निन्दा करके मुनियोंने कष्ट प्राप्त किया था। अतएव वर्णाश्रममें रहनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि वे वर्णाश्रमसे अतीत ब्रह्मवेत्ताओंकी सदा सेवा करें तथा उन्हें नमस्कार करें॥ ३१-३३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवार्चनतत्त्वसंख्यादिवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवार्चनतत्त्वसंख्यादिवर्णन' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २८॥
उनतीसवाँ अध्याय
देवदारुवनका वृत्तान्त, अतिथिमाहात्म्यमें सुदर्शनमुनिका आख्यान तथा संन्यासधर्मका वर्णन
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमारजी बोले— |
|---|---|
| इदानीं श्रोतुमिच्छामि पुरा दारुवने विभो।<br>प्रवृत्तं तद्वनस्थानां तपसा भावितात्मनाम्॥ १<br><br>कथं दारुवनं प्राप्तो भगवान्नीललोहितः।<br>विकृतं रूपमास्थाय चोर्ध्वरेता दिगम्बरः॥ २<br><br>किं प्रवृत्तं वने तस्मिन् रुद्रस्य परमात्मनः।<br>वक्तुमर्हसि तत्त्वेन देवदेवस्य चेष्टितम्॥ ३ | हे विभो! प्राचीनकालमें दारुवनमें तपस्यासे भावित आत्मावाले उन वनवासी मुनियोंके साथ जो भी घटित हुआ, उसे मैं इस समय सुनना चाहता हूँ॥ १॥<br><br>ऊर्ध्वरेता दिगम्बर भगवान् शिव विकृत रूप धारण करके दारुवनमें क्यों गये? उस वनमें परमात्मा रुद्रके साथ क्या हुआ? उन देवाधिदेव शिवके क्रिया-कलापोंका भी यथार्थ रूपसे वर्णन करनेकी कृपा कीजिये॥ २-३॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा श्रुतिसारविदां वरः।<br>शिलादसूनुर्भगवान् प्राह किञ्चिद्द्रवं हसन्॥ ४ | [हे ऋषिगण!] उन सनत्कुमारका यह वचन सुनकर श्रुतिसारविदोंमें वरिष्ठ शिलादपुत्र भगवान् नन्दिकेश्वर कुछ-कुछ हँसते हुए उनसे कहने लगे॥ ४॥ |
| शैलादिरुवाच | शैलादि बोले— |
| मुनयो दारुगहने तपस्तेपुः सुदारुणम्।<br>तुष्ट्यर्थं देवदेवस्य सदारतनयाग्नयः॥ ५ | एक बार घने देवदारुवनमें देवाधिदेव रुद्रकी प्रसन्नताके लिये अपने स्त्री-पुत्रादिसहित पंचाग्निका सेवन करते हुए मुनिगण कठोर तप कर रहे थे॥ ५॥ |
अध्याय २९ ] देवदारुवनका वृत्तान्त...संन्यासधर्मका वर्णन [ १३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तुष्टो रुद्रो जगन्नाथश्चेकितानो वृषध्वजः।<br>धूर्जटिः परमेशानो भगवानीललोहितः ॥ ६<br><br>प्रवृत्तिलक्षणं ज्ञानं ज्ञातुं दारुवनौकसाम्।<br>परीक्षार्थं जगन्नाथः श्रद्धया क्रीडया च सः ॥ ७<br><br>निवृत्तिलक्षणज्ञानप्रतिष्ठार्थं च शङ्करः।<br>देवदारुवनस्थानां प्रवृत्तिज्ञानचेतसाम् ॥ ८<br><br>विकृतं रूपमास्थाय दिग्वासा विषमेक्षणः।<br>मुग्धो द्विहस्तः कृष्णाङ्गो दिव्यं दारुवनं ययौ ॥ ९ | उनके तपसे प्रसन्न जगन्नाथ, चेकितान, वृषध्वज, धूर्जटि, परमेशान, नीललोहित भगवान् रुद्र दारुवनमें निवास करनेवाले उन मुनियोंके प्रवृत्ति-लक्षण तथा ज्ञानकी जानकारी करनेके लिये एवं उनमें श्रद्धाभावकी परीक्षा करनेके लिये और साथ ही प्रवृत्तिज्ञानसे युक्त चित्तवाले उन देवदारुवनवासी मुनियोंमें निवृत्ति-लक्षण तथा ज्ञान स्थापित करनेके निमित्त लीलापूर्वक विकृत रूप धारण करके अलौकिक दारुवनमें पहुँचे। उस समय शंकरजी कृष्ण वर्णवाले, दो भुजाओंवाले, तीन आँखोंवाले, दिगम्बर तथा मोहक स्वरूपवाले थे॥ ६—९॥ |
| मन्दस्मितं च भगवान् स्त्रीणां मनसिजोद्भवम्।<br>भ्रूविलासं च गानं च चकारातीव सुन्दरः ॥ १० | अत्यन्त सुन्दर रूपवाले भगवान् शिव मन्द मुसकान तथा भ्रूविलास करते हुए गीत गाकर स्त्रियोंमें कामभावना उत्पन्न कर रहे थे॥ १०॥ |
| सम्प्रेक्ष्य नारीवृन्दं वै मुहुर्मुहुरनङ्गहा।<br>अनङ्गवृद्धिमकरोदतीव मधुराकृतिः ॥ ११ | कामदेवका संहार करनेवाले तथा अत्यन्त मोहक आकृतिवाले भगवान् शिव वहाँ नारीसमूहको बार-बार देखकर उनके भीतर कामभावनाको बढ़ा रहे थे॥ ११॥ |
| वने तं पुरुषं दृष्ट्वा विकृतं नीललोहितम्।<br>स्त्रियः पतिव्रताश्चापि तमेवान्वयुरादरात् ॥ १२ | वनमें उस विकृत तथा नीललोहित वर्णवाले पुरुषको देखकर पतिव्रता स्त्रियाँ भी प्रेमपूर्वक उनके पीछे-पीछे चलने लगीं॥ १२॥ |
| वनोटजद्वारगताश्च नार्यो<br>विस्रस्तवस्त्राभरणा विचेष्टाः।<br>लब्ध्वा स्मितं तस्य मुखारविन्दाद्<br>द्रुमालयस्थास्तमथान्वयुस्ताः ॥ १३ | आरण्यक कुटीरोंके द्वारतक आयी हुई स्त्रियोंके वस्त्र एवं अलंकार शिथिल हो गये। वे मूर्च्छित-सी हो गयीं, उन लीलामय शिवके मुखारविन्दकी मोहक मुसकानको पाकर वृक्षोंके आश्रयमें रहनेवाली वे नारियाँ उनके पीछे-पीछे चल दीं॥ १३॥ |
| दृष्ट्वा काश्चिदुद्भवं नार्यो मदघूर्णितलोचनाः।<br>विलासबाह्यास्ताश्चापि भ्रूविलासं प्रचक्रिरे ॥ १४ | शिवजीको देखकर प्रौढ़ावस्थावाली होनेपर भी कुछ स्त्रियाँ मदमत्त होकर आँखें घुमाने लगीं तथा भौंहोंका संचालन करने लगीं॥ १४॥ |
| अथ दृष्ट्वा परा नार्यः किञ्चित्प्रहसिताननाः।<br>किञ्चिद्विस्रस्तवसनाः स्रस्तकाञ्चीगुणा जगुः ॥ १५ | तदनन्तर शिवको देखकर दूसरी स्त्रियाँ मुसकानयुक्त मुखवाली हो गयीं, उनके वस्त्र कुछ शिथिल-से हो गये, कांचीबन्धन भी ढीले हो गये; वे मिलकर गाने लगीं॥ १५॥ |
| काश्चित्तदा तं विपिने तु दृष्ट्वा<br>विप्राङ्गनाः स्रस्तनवांशुकं वा।<br>स्वान् स्वान् विचित्रान् वलयान् प्रविध्य<br>मदान्विता बन्धुजनांश्च जग्मुः ॥ १६ | उस समय शिवको विपिनमें देखकर कुछ ऋषिपत्नियों तो शिथिल नूतन वस्त्रों तथा अपने-अपने विचित्र वलयोंको फेंककर मदान्वित हो स्वजनोंके पास पहुँचीं॥ १६॥ |
| काचित्तदा तं न विवेद दृष्ट्वा<br>विवासना स्रस्तमहांशुका च। | उस समय शिथिल वस्त्रवाली कोई तो शिवको |
| १३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शाखाविचित्रान् विटपान् प्रसिद्धान्<br>मदान्विता बन्धुजनांस्तथान्याः ॥ १७ | देखकर विशिष्ट वासनायुक्त हो गयी तथा अन्य स्त्रियाँ मतवाली-सी होकर विचित्र शाखावाले प्रसिद्ध वृक्षोंको एवं घनिष्ठ बन्धुजनोंतकको नहीं पहचानती थीं ॥ १७ ॥ |
| काश्चिज्जगुस्तं ननृतुर्निपेतुश्च धरातले।<br>निषेदुर्गजवच्चान्या प्रोवाच द्विजपुङ्गवाः ॥ १८ | हे द्विजश्रेष्ठो ! कुछ स्त्रियाँ उनके पास जाकर नाचने लगीं और जमीनपर गिर पड़ीं। कुछ स्त्रियाँ हाथीकी भाँति बैठ गयीं। कोई दूसरी स्त्री कुछ बोलने लगी ॥ १८ ॥ |
| अन्योन्यं सस्मितं प्रेक्ष्य चालिलिङ्गुः समन्ततः।<br>निरुध्य मार्गं रुद्रस्य नैपुणानि प्रचक्रिरे ॥ १९ | मुसकराते हुए एक-दूसरेको देखकर वे परस्पर आलिंगन करने लगीं। वे सभी ओरसे शिवजीका मार्ग रोककर अनेक प्रकारके हाव-भाव दर्शाने लगीं ॥ १९ ॥ |
| को भवानिति चाहुस्तं आस्यतामिति चापराः।<br>कुत्रेत्यथ प्रसीदेति जजल्पुः प्रीतमानसाः ॥ २० | कुछ स्त्रियाँ उनसे कहने लगीं कि 'आप कौन हैं? बैठिये। अन्य स्त्रियाँ भी प्रसन्नचित्त होकर कहने लगीं—आप कहाँ जा रहे हैं? आप हम सबपर प्रसन्न होइये' ॥ २० ॥ |
| विपरीता निपेतुर्वै विस्रस्तांशुकमूर्धजाः।<br>पतिव्रताः पतीनां तु सन्निधौ भवमायया ॥ २१ | भगवान् शंकरकी मायाके प्रभावसे अपने पतियोंके सम्मुख ही पतिव्रता स्त्रियोंके वस्त्रपरिधान, केश आदि अस्त-व्यस्त हो गये और वे कामुक स्त्रियोंकी भाँति स्वेच्छाचारितापूर्ण व्यवहार प्रदर्शित करने लगीं ॥ २१ ॥ |
| दृष्ट्वा श्रुत्वा भवस्तासां चेष्टावाक्यानि चाव्ययः।<br>शुभं वाप्यशुभं वापि नोक्तवान् परमेश्वरः ॥ २२ | उन स्त्रियोंके हाव-भाव देखकर तथा उनके वचन सुनकर निर्विकार परमेश्वर शिव शुभ अथवा अशुभ कुछ भी नहीं बोले ॥ २२ ॥ |
| दृष्ट्वा नारीकुलं विप्रास्तथाभूतं च शङ्करम्।<br>अतीव परुषं वाक्यं जजल्पुस्ते मुनीश्वराः ॥ २३<br><br>तपांसि तेषां सर्वेषां प्रत्याहन्यन्त शङ्करे।<br>यथादित्यप्रकाशेन तारका नभसि स्थिताः ॥ २४ | उस प्रकारकी चेष्टावाली नारियोंके समूहको देखकर वे विप्र मुनीश्वर दिगम्बरवेशधारी शिवको उस अवस्थामें देखकर [शंकरजीके प्रति] अत्यन्त कठोर वचन कहने लगे। किंतु उनकी सभी तपस्याएँ शंकरजीके सम्मुख उसी प्रकार निष्फल सिद्ध हुईं, जिस प्रकार सूर्यके प्रकाशसे आकाश-मण्डलमें स्थित तारागण निस्तेज हो जाते हैं ॥ २३-२४ ॥ |
| श्रूयते ऋषिशापेन ब्रह्मणस्तु महात्मनः।<br>समृद्धश्रेयसां योनिर्यज्ञो वै नाशमाप्तवान् ॥ २५ | ऐसा सुना जाता है कि महात्मा ब्रह्माका सभी समृद्धियों तथा कल्याणोंका उत्पत्तिस्थलस्वरूप यज्ञ ऋषिके शापसे विनष्ट हो गया था ॥ २५ ॥ |
| भृगोरपि च शापेन विष्णुः परमवीर्यवान्।<br>प्रादुर्भावान् दश प्राप्तो दुःखितश्च सदा कृतः ॥ २६ | भृगुमुनिके शापसे परम ऐश्वर्यशाली विष्णुको भी दस अवतार लेने पड़े तथा अनेक दुःख सहने पड़े ॥ २६ ॥ |
| इन्द्रस्यापि च धर्मज्ञ छिन्नं सवृषणं पुरा।<br>ऋषिणा गौतमेनोर्व्यां क्रुद्धेन विनिपातितम् ॥ २७ | हे धर्मज्ञ सनत्कुमार ! क्रुद्ध ऋषि गौतमने शापसे इन्द्रका अण्डकोषसहित गुह्यांग काटकर पृथ्वीपर गिरा |
अध्याय २९ ] देवदारुवनका वृत्तान्त...संन्यासधर्मका वर्णन १३७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दिया था॥ २७॥ | |
| गर्भवासो वसूनां च शापेन विहितस्तथा।<br>ऋषीणां चैव शापेन नहुषः सर्पतां गतः॥ २८ | मुनि वसिष्ठके शापसे वसुओंको गर्भमें वास करना पड़ा, अगस्त्य आदि ऋषियोंके शापसे राजा नहुषको सर्प होना पड़ा था॥ २८॥ |
| क्षीरोदश्च समुद्रोऽसौ निवासः सर्वदा हरेः।<br>द्वितीयश्चामृताधारो ह्यपेयो ब्राह्मणैः कृतः॥ २९ | भगवान् विष्णुका निवासस्थान तथा अमृतका आधारस्वरूप वह क्षीरसागर ब्राह्मणोंके द्वारा सदाके लिये दूसरे अपेय जलवाले समुद्रके रूपमें कर दिया गया था॥ २९॥ |
| अविमुक्तेश्वरं प्राप्य वाराणस्यां जनार्दनः।<br>क्षीरेण चाभिषिच्येशं देवदेवं त्रियम्बकम्॥ ३०<br>श्रद्धया परया युक्तो देहाश्लेषामृतेन वै।<br>निषिक्तेन स्वयं देवः क्षीरेण मधुसूदनः॥ ३१<br>सेचयित्वाथ भगवान् ब्रह्मणा मुनिभिः समम्।<br>क्षीरोदं पूर्ववच्चक्रे निवासं चात्मनः प्रभुः॥ ३२ | जनार्दन भगवान् विष्णुने वाराणसीपुरीमें पहुँचकर अविमुक्तेश्वर देवाधिदेव त्र्यम्बकेश्वरका दूधसे अभिषेक करके परम श्रद्धासे युक्त होकर देहसंस्पर्शजन्य अमृतस्वरूप क्षीरद्वारा स्वयं उन मधुसूदनने ब्रह्माजी एवं मुनियोंके साथ भगवान् शिवको अभिषिक्त करके पूर्ववत् क्षीरसागरको अपना निवासस्थान बनाया॥ ३०—३२॥ |
| धर्मश्चैव तथा शप्तो माण्डव्येन महात्मना।<br>वृष्णयश्चैव कृष्णेन दुर्वासाद्यैर्महात्मभिः॥ ३३ | महात्मा माण्डव्यने धर्मको शापित किया तथा श्रीकृष्णकी प्रेरणासे दुर्वासा आदि महात्माओंके द्वारा वृष्णिवंशी शापित हुए थे॥ ३३॥ |
| राघवः सानुजश्चापि दुर्वासेन महात्मना।<br>श्रीवत्सश्च मुनेः पादपतनात्तस्य धीमतः॥ ३४ | महान् आत्मावाले दुर्वासामुनिने लक्ष्मणसहित श्रीरामको शाप दे दिया और श्रीवत्स (श्रीयुक्त वक्षःस्थलवाले) विष्णुको भृगुमुनिका चरण-प्रहार सहना पड़ा॥ ३४॥ |
| एते चान्ये च बहवो विप्राणां वशमागताः।<br>वर्जयित्वा विरूपाक्षं देवदेवमुमापतिम्॥ ३५ | देवाधिदेव विरूपाक्ष उमापति शिवको छोड़कर ये तथा अन्य बहुत-से लोग भी विप्रों (ब्राह्मणों)-के वशवर्ती हुए हैं॥ ३५॥ |
| एवं हि मोहितास्तेन नावबुध्यन्त शङ्करम्।<br>अत्युग्रवचनं प्रोचुश्चोग्रोऽप्यन्तरधीयत॥ ३६ | उन्हीं शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण वे मुनिगण शंकरको नहीं जान पाये और अत्यन्त कठोर वचन बोलने लगे, फिर भगवान् शिव भी अन्तर्धान हो गये॥ ३६॥ |
| तेऽपि दारुवनात्तस्मात्प्रातः संविग्नमानसाः।<br>पितामहं महात्मानमासीनं परमासने॥ ३७<br>गत्वा विज्ञापयामासुः प्रवृत्तमखिलं विभोः।<br>शुभे दारुवने तस्मिन् मुनयः क्षीणचेतसः॥ ३८ | तत्पश्चात् व्याकुल चित्तवाले वे मुनिगण प्रातःकाल होते ही उस दारुवनसे ब्रह्माजीके पास पहुँचे। वहाँ श्रेष्ठ आसनपर विराजमान महात्मा ब्रह्मासे उस सुन्दर दारुवनमें रहनेवाले क्षीण चेतनावाले मुनियोंने शंकरका सारा वृत्तान्त कह सुनाया॥ ३७-३८॥ |
| १३८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सोऽपि सञ्चिन्त्य मनसा क्षणादेव पितामहः।<br>तेषां प्रवृत्तमखिलं पुण्ये दारुवने पुरा॥ ३९ | उन ब्रह्माजीने भी क्षणभरमें ही मनमें सोचकर पवित्र दारुवनमें उनका पूर्वघटित सम्पूर्ण वृत्तान्त जान लिया॥ ३९॥ |
| उत्थाय प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रणिपत्य भवाय च।<br>उवाच सत्वरं ब्रह्मा मुनीन् दारुवनालयान्॥ ४० | अपने आसनसे तत्काल उठकर और दोनों हाथ जोड़कर ब्रह्माजीने मन-ही-मन शिवजीको प्रणाम करके दारुवनमें रहनेवाले उन मुनियोंसे कहा—हे विप्रो! |
| धिग्युष्मान् प्राप्तनिधनान् महानिधिमनुत्तमम्।<br>वृथाकृतं यतो विप्रा युष्माभिर्भाग्यवर्जितैः॥ ४१ | विनाशको प्राप्त तुम सभीको धिक्कार है; क्योंकि सर्वोत्तम निधि प्राप्त करके भी तुम अभागोंने उसे गँवा दिया॥ ४०-४१॥ |
| यस्तु दारुवने तस्मिंल्लिङ्गी दृष्टोऽप्यलिङ्गिभिः।<br>युष्माभिर्विकृताकारः स एव परमेश्वरः॥ ४२ | तुम अलिंगियोंने उस दारुवनमें जिस विकृत आकारवाले पुरुषको देखा था; वे साक्षात् परमेश्वर शिव ही थे॥ ४२॥ |
| गृहस्थैश्च न निन्द्यास्तु सदा ह्यतिथयो द्विजाः।<br>विरूपाश्च सुरूपाश्च मलिनाश्चाप्यपण्डिताः॥ ४३ | हे विप्रो! गृहस्थोंको अतिथियोंकी निन्दा कभी नहीं करनी चाहिये; वे अतिथि विकृत रूपवाले, सुन्दर रूपवाले, मलिन तथा मूर्ख—चाहे जैसे भी हों॥ ४३॥ |
| सुदर्शनेन मुनिना कालमृत्युरपि स्वयम्।<br>पुरा भूमौ द्विजाग्र्येण जितो ह्यतिथिपूजया॥ ४४ | पूर्वकालमें पृथ्वीपर द्विजोंमें अग्रणी सुदर्शनमुनिने अतिथिपूजाके प्रभावसे साक्षात् कालमृत्युको भी जीत लिया था॥ ४४॥ |
| अन्यथा नास्ति सन्तर्तुं गृहस्थैश्च द्विजोत्तमैः।<br>त्यक्त्वा चातिथिपूजां तामात्मनो भुवि शोधनम्॥ ४५ | भवसागरसे पार होने तथा आत्मशुद्धिके लिये अतिथिपूजाको छोड़कर गृहस्थों एवं श्रेष्ठ द्विजोंके लिये लोकमें अन्य कोई भी उपाय नहीं है॥ ४५॥ |
| गृहस्थोऽपि पुरा जेतुं सुदर्शन इति श्रुतः।<br>प्रतिज्ञामकरोज्जायां भार्यामाह पतिव्रताम्॥ ४६ | पूर्वकालमें सुदर्शन नामसे विख्यात गृहस्थ मुनिने मृत्युपर विजय प्राप्त करनेकी प्रतिज्ञा की और अपनी संतानयुक्त पतिव्रता पत्नीसे कहा—हे सुव्रते! हे |
| सुव्रते सुभ्रु सुभगे शृणु सर्वं प्रयत्नतः।<br>त्वया वै नावमन्तव्या गृहे ह्यतिथयः सदा॥ ४७ | सुन्दर भौंहोंवाली! हे सौभाग्यवति! सुनो, तुम पूर्ण प्रयत्नके साथ अतिथियोंका सदा सत्कार करना और कभी भी उनका निरादर न करना॥ ४६-४७॥ |
| सर्व एव स्वयं साक्षादतिथिय॑त्पिनाकधृक्।<br>तस्मादतिथये दत्त्वा आत्मानमपि पूजय॥ ४८ | अतिथि साक्षात् पिनाकधारी शिवका ही स्वरूप होता है, अतएव सब कुछ अर्पित करके भी अतिथिकी पूजा करो। सुदर्शनने पुनः कहा—हे आर्ये! अतिथि साक्षात् शिव होता है; शिवस्वरूप अतिथिको सब कुछ प्रदान करना चाहिये। अतः सभी अतिथियोंकी सदा पूजा करनी चाहिये॥ ४८-५०१/२॥ |
| एवमुक्तवाथ सन्तप्ता विवशा सा पतिव्रता।<br>पतिमाह रुदन्ती च किमुक्तं भवता प्रभो॥ ४९ | |
| तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा पुनः प्राह सुदर्शनः।<br>देयं सर्वं शिवायायें शिव एवातिथिः स्वयम्॥ ५० | |
| तस्मात्सर्वे पूजनीयाः सर्वेऽप्यतिथयः सदा।<br>एवमुक्ता तदा भर्त्रा भार्या तस्य पतिव्रता॥ ५१ | |
| शेषामिवाज्ञामादाय मूर्ध्ना सा प्राचरत्तदा।<br>परीक्षितुं तथा श्रद्धां तयोः साक्षाद् द्विजोत्तमाः॥ ५२ | पतिके ऐसा कहनेपर वह पातिव्रतपरायण मुनिभार्या पतिकी आज्ञाको देवप्रतिमाके समक्ष अर्पित किये गये |
| अध्याय २९ ] | देवदारुवनका वृत्तान्त... संन्यासधर्मका वर्णन | १३९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुष्प आदिकी भाँति शिरोधार्य करके अतिथि-सत्कारमें प्रवृत्त हो गयी॥ ५१ १/२॥ | |
| धर्मो द्विजोत्तमो भूत्वा जगामाथ मुनेर्गृहम्।<br>तं दृष्ट्वा चार्चयामास सार्घाद्यैरनघा द्विजम्॥ ५३ | हे श्रेष्ठ द्विजो! उन दोनोंकी श्रद्धाकी परीक्षा करनेके लिये एक सुन्दर ब्राह्मणका रूप धारण करके साक्षात् धर्म मुनिके घर पधारे। उस ब्राह्मणको देखकर विशुद्ध हृदयवाली उस मुनिभार्याने अर्घ्य आदिसे उस ब्राह्मणका पूजन किया॥ ५२-५३॥ |
| सम्पूजितस्तया तां तु प्राह धर्मो द्विजः स्वयम्।<br>भद्रे कुतः पतिर्धीमांस्तव भर्ता सुदर्शनः॥ ५४<br>अन्नाद्यैरलमद्यार्यै स्वं दातुमिह चार्हसि।<br>सा च लज्जावृता नारी स्मरन्ती कथितं पुरा॥ ५५<br>भर्त्रा नमील्यनयने चचाल च पतिव्रता।<br>किं चैत्याह पुनस्तं वै धर्मे चक्रे च सा मतिम्॥ ५६ | उस स्त्रीके द्वारा भलीभाँति पूजित होकर ब्राह्मण-वेषधारी साक्षात् धर्मने उससे कहा—हे कल्याणि! तुम्हारे बुद्धिसम्पन्न पति सुदर्शन कहाँ हैं? तत्पश्चात् अपने पतिद्वारा कही गयी बातका स्मरण करती हुई उस स्त्रीने पतिकी आज्ञाको ध्यानमें रखकर धर्मरूप उस ब्राह्मणके लिये आतिथ्य-सेवा करनेका मनमें निश्चय किया॥ ५४-५६ १/२॥ |
| निवेदितुं किलात्मानं तस्मै पत्युरिहाज्ञया।<br>एतस्मिन्नन्तरे भर्ता तस्या नार्याः सुदर्शनः॥ ५७<br>गृहद्वारं गतो धीमांस्तामुवाच महामुनिः।<br>एहोहि क्व गता भद्रे तमुवाचातिथिः स्वयम्॥ ५८<br>भार्यया त्वनया सार्धं मैथुनस्थोऽहमद्य वै।<br>सुदर्शन महाभाग किंकर्तव्यमिहोच्यताम्॥ ५९<br>सुरतान्तस्तु विप्रेन्द्र सन्तुष्टोऽहं द्विजोत्तम।<br>सुदर्शनस्ततः प्राह सुप्रहृष्टो द्विजोत्तमः॥ ६० | इसी बीच उस स्त्रीके पति प्रज्ञासम्पन्न सुदर्शन घरके द्वारपर आ गये। मुनिवर सुदर्शनने अपनी भार्याको आवाज दी—हे भद्रे! तुम कहाँ चली गयी हो? तब साक्षात् धर्मरूप अतिथि उनसे बोले—हे महाभाग सुदर्शन! मैं इस समय तुम्हारी इस भार्याके आतिथ्यसे परम सन्तुष्ट हूँ॥ ५७-६० १/२॥ |
| भुङ्क्ष्व चैनां यथाकामं गमिष्येऽहं द्विजोत्तम।<br>हृष्टोऽथ दर्शयामास स्वात्मानं धर्मराट् स्वयम्॥ ६१<br>प्रददौ चेप्सितं सर्वं तमाह च महाद्युतिः।<br>एषा न भुक्ता विप्रेन्द्र मनसापि सुशोभना॥ ६२<br>मया चैषा न सन्देहः श्रद्धां ज्ञातुमिहागतः।<br>जितो वै यस्त्वया मृत्युर्धर्मेणैकेन सुव्रत॥ ६३ | तदनन्तर धर्मराजने अपना वास्तविक रूप उन्हें दिखाया और मनोवांछित वर देकर महान् कान्तिवाले धर्मने उनसे कहा—हे विप्रेन्द्र! मैं यहाँ केवल तुम्हारी श्रद्धाकी परीक्षा करनेके निमित्त आया हूँ। हे सुव्रत! तुमने अपने एकमात्र अतिथिपूजारूप धर्मसे मृत्यूतकको जीत लिया है॥ ६१-६३॥ |
| अहोऽस्य तपसो वीर्यमित्युक्त्वा प्रययौ च सः।<br>तस्मात्तथा पूजनीयाः सर्वे ह्यतिथयः सदा॥ ६४<br>बहुनात्र किमुक्तेन भाग्यहीना द्विजोत्तमाः।<br>तमेव शरणं तूर्णं गन्तुमर्हथ शङ्करम्॥ ६५ | 'अहो, इस तपस्वीका ऐसा ओज'—इस प्रकार कहकर धर्म वहाँसे चले गये। [हे मुनियो!] इसलिये सभी अतिथियोंकी सदा पूजा करनी चाहिये। हे अभागे मुनीश्वरो! अब अधिक कहनेसे क्या लाभ? तुम लोग शीघ्र ही उन्हीं महादेवकी शरणमें जाओ॥ ६४-६५॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणो ब्राह्मणर्षभाः।<br>ब्रह्माणमभिवन्द्यार्ताः प्रोचुराकुलितेक्षणाः॥ ६६ | उन ब्रह्माजीका वह वचन सुनकर व्याकुल नेत्रोंवाले वे द्विजश्रेष्ठ दुःखित होकर ब्रह्माजीसे प्रार्थना करते हुए कहने लगे॥ ६६॥ |
| ब्राह्मणा ऊचुः<br>नापेक्षितं महाभाग जीवितं विकृताः स्त्रियः।<br>दृष्टोऽस्माभिर्महादेवो निन्दितो यस्त्वनिन्दितः॥ ६७ | विप्रगण बोले—हे महाभाग! स्त्रियाँ तो विकार-युक्त होती ही हैं, जिनके लिये हमलोगोंने अपना जीवन |
१४० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग ]
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| नष्ट कर डाला। जिन अनिन्द्य महादेवने कृपा करके हमलोगोंको दर्शन दिया था, उन्हींका हमलोगोंने अनादर किया ॥ ६७ ॥ | |
| शप्तश्च सर्वगः शूली पिनाकी नीललोहितः।<br>अज्ञानाच्छापजा शक्तिः कुण्ठितास्य निरीक्षणात् ॥ ६८ | हमने उन सर्वव्यापी, शूलधारी, पिनाकी तथा नीललोहित वर्णवाले शिवजीको अज्ञानतासे शाप दे दिया; किंतु उनके देखनेमात्रसे हमारे शापकी शक्ति कुण्ठित हो गयी ॥ ६८ ॥ |
| वक्तुमर्हसि देवेश संन्यासं वै क्रमेण तु।<br>द्रष्टुं वै देवदेवेशमुग्रं भीमं कपर्दिनम् ॥ ६९ | हे देवेश! अब आप कृपा करके हमें संन्यास-धर्मके विषयमें क्रमसे बताइये; जिससे हमलोग उन देवाधिदेव, उग्र, भीम तथा कपर्दी शिवका दर्शन करनेमें समर्थ हो सकें ॥ ६९ ॥ |
| पितामह उवाच<br>आदौ वेदानधीत्यैव श्रद्धया च गुरोः सदा।<br>विचार्यार्थं मुनेर्धर्मान् प्रतिज्ञाय द्विजोत्तमाः ॥ ७० | पितामह बोले—हे श्रेष्ठ मुनियो! सर्वप्रथम श्रद्धापूर्वक गुरुसे निरन्तर वेदका अध्ययन करे, उसका अर्थ समझे और धर्मोंका ज्ञान करे ॥ ७० ॥ |
| ग्रहणान्तं हि वा विद्वानथ द्वादशवार्षिकम्।<br>स्नात्वाहृत्य च दारान् वै पुत्रानुत्पाद्य सुव्रतान् ॥ ७१<br><br>वृत्तिभिश्चानुरूपाभिस्तान् विभज्य सुतान् मुनिः।<br>अग्निष्टोमादिभिश्चेष्ट्वा यज्ञैर्यज्ञेश्वरं विभुम् ॥ ७२ | इस प्रकार विद्वान्को चाहिये कि बारह वर्षोतक वेदाध्ययन करनेके अनन्तर वेदव्रत नामक स्नानसे संस्कारित होकर विवाह करके पुनः सदाचारी पुत्र उत्पन्न करके उन पुत्रोंके अनुकूल वृत्तिका उपाय करके उनमें धनादिका विभाजन कर दे। तत्पश्चात् अग्निष्टोम आदि यज्ञोंसे यज्ञेश्वर विभुका यजन करके मुनिको वनमें आकर अग्निमें परमेश्वरकी पूजा करनी चाहिये ॥ ७१-७२ १/२ ॥ |
| पूजयेत्परमात्मानं प्राप्यारण्यं विभावसौ।<br>मुनिर्द्वादशवर्षं वा वर्षमात्रमथापि वा ॥ ७३<br><br>पक्षद्वादशकं वापि दिनद्वादशकं तु वा।<br>क्षीरभुक् संयतः शान्तः सर्वान् सम्पूजयेत्सुरान् ॥ ७४ | वनमें रहते हुए मुनिको बारह वर्षतक या एक वर्ष (बारह माह)-तक या बारह पक्ष (छः माह)-तक अथवा बारह दिनतक दुग्धका सेवन करते हुए शान्ति तथा संयमपूर्वक सभी देवताओंकी पूजा करनी चाहिये ॥ ७३-७४ ॥ |
| इष्ट्वैवं जुहुयादग्नौ यज्ञपात्राणि मन्त्रतः।<br>अप्सु वै पार्थिवं न्यस्य गुरवे तैजसानि तु ॥ ७५<br><br>स्वधनं सकलं चैव ब्राह्मणेभ्यो विशङ्कया।<br>प्रणिपत्य गुरुं भूमौ विरक्तः संन्यसेद्यतिः ॥ ७६ | इस प्रकार यजन-पूजनके अनन्तर यज्ञसम्बन्धी काष्ठपात्र मन्त्रपूर्वक अग्निमें हवन कर दे, मिट्टीके पात्र जलमें छोड़ दे तथा धातुके पात्र गुरुको अर्पित कर दे और निष्कपट भावसे अपना सम्पूर्ण धन ब्राह्मणोंको देकर गुरुको दण्डवत् प्रणाम करके विरक्त यति संन्यासधर्मका आचरण करे ॥ ७५-७६ ॥ |
| निकृत्य केशान् सशिखानुपवीतं विसृज्य च।<br>पञ्चभिर्जुहुयादप्सु भूः स्वाहेति विचक्षणः ॥ ७७ | शिखासहित बालोंको कटवाकर तथा यज्ञोपवीत त्यागकर विद्वान् यतिको 'भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे जलमें |
३०- शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान
अध्याय ३० ] शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान १४१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततश्चोर्ध्वं चरेदेवं यतिः शिवविमुक्तये।<br>व्रतेनानशनेनापि तोयवृत्त्यापि वा पुनः॥ ७८<br><br>पर्णवृत्त्या पयोवृत्त्या फलवृत्त्यापि वा यतिः।<br>एवं जीवनमृतो नो चेत्षण्मासाद्द्वत्सरात्तु वा॥ ७९<br><br>प्रस्थानादिकमायासं स्वदेहस्य चरेद्यतिः।<br>शिवसायुज्यमाप्नोति कर्मणाप्येवमाचरन्॥ ८०<br><br>सद्योऽपि लभते मुक्तिं भक्तियुक्तो दृढव्रतः॥ ८१<br><br>त्यागेन वा किं विधिनाप्यनेन<br>भक्तस्य रुद्रस्य शुभैर्व्रतैश्च।<br>यज्ञैश्च दानैर्विविधैश्च होमै-<br>र्लब्धैश्च शास्त्रैर्विविधैश्च वेदैः॥ ८२<br><br>श्वेतेनैवं जितो मृत्युर्भवभक्त्या महात्मना।<br>वोऽस्तु भक्तिर्महादेवे शङ्करे परमात्मनि॥ ८३ | पाँच आहुति देनी चाहिये॥ ७७॥<br><br>इसके पश्चात् यतिको शिवसायुज्यरूपी विमुक्तिके लिये आगेकी भी साधना करनी चाहिये। इसके लिये छः माह अथवा वर्षपर्यन्त यति अनशन करे अथवा जल पीकर या पत्ते खाकर या दूध पीकर या फल खाकर जीवन-निर्वाह करे। ऐसा करनेपर यदि मृत्यु नहीं हुई और वह जीवित रहता है, तो उसे अपने देहके प्रस्थान आदि अर्थात् स्थूल शरीरके त्यागका प्रयास करना चाहिये। ऐसा आचरण करते हुए वह यति अपने कर्मसे भी शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है॥ ७८–८०॥<br><br>परंतु हे दृढव्रती मुनियो! शिवजीमें भक्ति रखनेवाला प्राणी शीघ्र ही मुक्ति प्राप्त कर लेता है। महादेवजीके भक्तको त्याग, विधि, महान् व्रतों, यज्ञों, विविध प्रकारके दानों, होमों, विविध शास्त्रों तथा वेदोंसे क्या प्रयोजन! महान् आत्मावाले श्वेतमुनिने महादेवकी भक्तिसे ही मृत्यूतकको जीत लिया था। अतएव परमेश्वर महादेव शिवजीके प्रति आपलोग भी भक्तिपरायण हों॥ ८१–८३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवदारुवनवृत्तान्तवर्णनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'देवदारुवनवृत्तान्तवर्णन' नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २९ ॥
तीसवाँ अध्याय
शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शैलादिरुवाच<br>एवमुक्तास्तदा तेन ब्रह्मणा ब्राह्मणर्षभाः।<br>श्वेतस्य च कथां पुण्यामपृच्छन् परमर्षयः॥ १<br><br>पितामह उवाच<br>श्वेतो नाम मुनिः श्रीमान् गतायुर्गिरिगह्वरे।<br>सक्तो ह्याभ्यर्च्य यद्भक्त्या तुष्टाव च महेश्वरम्॥ २<br>रुद्राध्यायेन पुण्येन नमस्तेत्यादिना द्विजाः।<br>ततः कालो महातेजाः कालप्राप्तं द्विजोत्तमम्॥ ३<br>नेतुं सञ्चिन्त्य विप्रेन्द्राः सान्निध्यमकरोन्मुनेः।<br>श्वेतोऽपि दृष्ट्वा तं कालं कालप्राप्तोऽपि शङ्करम्॥ ४ | नन्दिकेश्वर बोले— तत्पश्चात् उन ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर द्विजश्रेष्ठ महर्षियोंने उनसे श्वेतमुनिकी पुण्यप्रद कथा पूछी—॥ १॥<br><br>पितामह बोले— समाप्त आयुवाले श्वेत नामक एक श्रीयुक्त मुनि गिरिकी गुफामें शिवाराधनमें रत थे। हे द्विजो! 'नमस्ते रुद्र मन्यवे' इत्यादि रुद्राध्यायसे भक्तिपूर्वक महेश्वरकी आराधना करके श्वेतमुनिने उन्हें प्रसन्न कर लिया॥ २ ½ ॥<br><br>हे विप्रेन्द्रो! तदनन्तर द्विजोंमें श्रेष्ठ श्वेतमुनिको समाप्त आयुवाला जानकर उन्हें ले जानेके लिये महातेजस्वी काल मुनिके पास पहुँचा॥ ३ ½ ॥ |
| १४२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पूजयामास पुण्यात्मा त्रियम्बकमनुस्मरन्।<br>त्रियम्बकं यजेदेवं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्॥ ५<br><br>किं करिष्यति मे मृत्युर्मृत्योर्मृत्युरहं यतः।<br>तं दृष्ट्वा सस्मितं प्राह श्वेतं लोकभयङ्करः॥ ६ | सन्निकट मृत्युवाले पुण्यात्मा श्वेतमुनि भी उस कालको देखकर त्रिनेत्र शिवका स्मरण करते हुए उनकी आराधना करने लगे। वे ऐसा कहते हुए ध्यानपरायण थे कि जब मैं सुखकर सम्बन्धवाले तथा जगत्का पोषण करनेवाले त्रिनेत्र शिवका यजन कर रहा हूँ, तो मृत्यु मेरा क्या कर लेगी; क्योंकि मैं तो कालका भी काल हूँ॥ ४-५ १/२ ॥ |
| एह्येहि श्वेत चानेन विधिना किं फलं तव।<br>रुद्रो वा भगवान् विष्णुर्ब्रह्मा वा जगदीश्वरः॥ ७<br><br>कः समर्थः परित्रातुं मया ग्रस्तं द्विजोत्तम।<br>अनेन मम किं विप्र रौद्रेण विधिना प्रभोः॥ ८<br><br>नेतुं यस्योत्थितश्चाहं यमलोकं क्षणेन वै।<br>यस्माद् गतायुस्त्वं तस्मान्मुने नेतुमिहोद्यतः॥ ९ | उन श्वेतमुनिको देखकर लोकोंको भयभीत करनेवाला वह काल मुसकराकर उनसे बोला—हे श्वेत! अब तुम मेरी ओर आओ; इस पूजा-पाठ आदिसे तुम्हें क्या लाभ! हे द्विजवर! भगवान् विष्णु, ब्रह्मा अथवा जगदीश्वर रुद्र—इनमें भला कौन मेरे द्वारा ग्रास बनाये गये जीवको बचा सकनेमें समर्थ है? हे विप्र! यह रुद्रपूजा मुझ शक्तिमान्का क्या कर सकती है? जिस किसीको भी ले जानेके लिये मैं उठ खड़ा होता हूँ, उसे क्षणभरमें यमलोक पहुँचा देता हूँ। हे मुने! क्योंकि तुम समाप्त आयुवाले हो चुके हो, अतः तुम्हें ले जानेहेतु मैं यहाँ आया हूँ॥ ६—९॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भैरवं धर्ममिश्रितम्।<br>हा रुद्र रुद्र रुद्रेति ललाप मुनिपुङ्गवः॥ १०<br><br>तं प्राह च महादेवं कालं सम्प्रेक्ष्य वै दृशा।<br>नेत्रेण बाष्पमिश्रेण सम्भ्रान्तेन समाकुलः॥ ११ | उस कालका वह धर्ममिश्रित भयावह वचन सुनकर मुनिवर श्वेत 'हा रुद्र! हा रुद्र! हा रुद्र!' कहकर विलाप करने लगे और अश्रुपूरित तथा व्याकुल नेत्रोंसे एवं कातर दृष्टिसे शिवलिङ्गको निहारते हुए अत्यन्त व्यग्रचित्त होकर उस कालसे कहने लगे—॥ १०-११॥ |
| श्वेत उवाच<br>त्वया किं काल नो नाथश्चास्ति चेद्दि वृषध्वजः।<br>लिङ्गेऽस्मिन् शङ्करो रुद्रः सर्वदेवभवोद्भवः॥ १२ | श्वेतमुनि बोले—हे काल! तुम मेरा क्या बिगाड़ सकते हो; क्योंकि सभी देवताओंको उत्पन्न करनेवाले हमारे स्वामी वृषभध्वज शंकर रुद्र इस लिङ्गमें विराजमान हैं॥ १२॥ |
| अतीव भवभक्तानां मद्विधानां महात्मनाम्।<br>विधिना किं महाबाहो गच्छ गच्छ यथागतम्॥ १३ | विधिके विधान शिवजीके प्रति अतिशय भक्ति रखनेवाले मुझसदृश महात्माओंका क्या कर सकता है? अतएव हे महाबाहो! आप जिस प्रकार आये थे, उसी प्रकार चले जाइये॥ १३॥ |
| ततो निशम्य कुपितस्तीक्ष्णदंष्ट्रो भयङ्करः।<br>श्रुत्वा श्वेतस्य तद्वाक्यं पाशहस्तो भयावहः॥ १४<br><br>सिंहनादं महत्कृत्वा चास्फोट्य च मुहुर्मुहुः।<br>बबन्ध च मुनिं कालः कालप्राप्तं तमाह च॥ १५ | तदनन्तर श्वेतमुनिका वैसा वचन सुनकर हाथमें पाश धारण किये, तीक्ष्ण दाढ़ोंवाले भयंकर कालने कुपित होकर सिंहके सदृश घोर गर्जना करते हुए तथा |
| अध्याय ३० ] | शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान | १४३ |
|---|
| मया बद्धोऽसि विप्रर्षे श्वेतं नेतुं यमालयम्।<br>अद्य वै देवदेवेन तव रुद्रेण किं कृतम्॥ १६<br><br>क्व शर्वस्तव भक्तिश्च क्व पूजा पूजया फलम्।<br>क्व चाहं क्व च मे भीतिः श्वेत बद्धोऽसि वै मया॥ १७<br><br>लिङ्गेऽस्मिन् संस्थितः श्वेत तव रुद्रो महेश्वरः।<br>निश्चेष्टोऽसौ महादेवः कथं पूज्यो महेश्वरः॥ १८ | पाशको बार-बार फटकारते हुए काल-प्राप्त मुनिको बाँध दिया और पुनः उनसे कहा— ॥ १४-१५॥<br>हे विप्रर्षे! तुम श्वेतको यमलोक ले जानेके निमित्त मैंने बाँध दिया है; किंतु तुम्हारे देवाधिदेव रुद्रने इस समय तुम्हारी क्या सहायता की? कहाँ शिव, कहाँ तुम्हारी भक्ति तथा पूजा, कहाँ पूजाका फल और कहाँ मैं एवं मेरा भय! हे श्वेत! अब तुम मेरे द्वारा बाँध दिये गये हो। हे श्वेत! तुम्हारा महेश्वर रुद्र जो इस लिङ्गमें स्थित है, वह महादेव तो निश्चेष्ट है; तो फिर तुम उस महेश्वरकी पूजा क्यों करते हो? ॥ १६-१८॥ | | ततः सदाशिवः स्वयं द्विजं निहन्तुमागतम्।<br>निहन्तुमन्तकं स्मयन् स्मरारि यज्ञहा हरः॥ १९<br><br>त्वरन् विनिर्गतः परः शिवः स्वयं त्रिलोचनः।<br>त्रियम्बकोऽम्बया समं सनन्दिना गणेश्वरैः॥ २० | तत्पश्चात् मुनिका प्राण हरनेके निमित्त आये हुए कालका संहार करनेके लिये कामदेवके शत्रु, दक्ष-यज्ञके विध्वंसक तथा त्रिनेत्र सदाशिव महादेव शंकर अपने नन्दी, गणेश्वरों और पार्वतीसहित मुसकराते हुए शीघ्रतापूर्वक शिवलिङ्गसे साक्षात् प्रकट हुए॥ १९-२०॥ | | ससर्ज जीवितं क्षणाद्द्रवं निरीक्ष्य वै भयात्।<br>पपात चाशु वै बली मुनेस्तु सन्निधौ द्विजाः॥ २१<br><br>ननाद चोर्ध्वमुच्चधीर्निरीक्ष्य चान्तकान्तकम्।<br>निरीक्षणेन वै मृतं भवस्य विप्रपुङ्गवाः॥ २२ | हे द्विजो! शिवजीको देखते ही उसी क्षण भयके कारण वह बलवान् काल श्वेतमुनिके पास शीघ्र ही गिर पड़ा और कालका भी अन्त करनेवाले शिवजीको देखकर जोरसे चिल्लाया। हे उत्तम विप्रो! मृतप्राय उस कालको शिवजीने अपने कृपावलोकनसे जीवन प्रदान कर दिया॥ २१-२२॥ | | विनेदुरुच्चमीश्वराः सुरेश्वरा महेश्वरम्।<br>प्रणेमुरम्बिकामुमां मुनीश्वरास्तु हर्षिताः॥ २३<br><br>ससर्जुरस्य मूर्ध्नि वै मुनेर्भवस्य खेचराः।<br>सुशोभनं सुशीतलं सुपुष्पवर्षमम्बरात्॥ २४ | सभी महान् देवतागण तथा मुनिवृन्द महेश्वर एवं माता पार्वतीको प्रणाम करने लगे और हर्षित होकर उच्च स्वरमें ‘जय हो-जय हो’ ऐसा बोलने लगे। नभोमण्डलमें स्थित देवसमुदाय इन श्वेतमुनि तथा शंकरजीके सिरपर आकाशसे अत्यन्त सुन्दर, शीतल तथा सुगन्धित पुष्पोंकी वर्षा करने लगे॥ २३-२४॥ | | अहो निरीक्ष्य चान्तकं मृतं तदा सुविस्मितः।<br>शिलाशनात्मजोऽव्ययं शिवं प्रणम्य शङ्करम्॥ २५<br><br>उवाच बालधीर्मृतः प्रसीद चेति वै मुने।<br>महेश्वरं महेश्वरस्य चानुगो गणेश्वरः॥ २६ | तत्पश्चात् शिलादके पुत्र तथा शिवजीके अनुचर गणेश्वर नन्दीजी कालको मरा हुआ देखकर अत्यन्त विस्मित हुए और उन्होंने अविनाशी महेश्वर शिवको प्रणामकर उनसे कहा कि यह अल्पबुद्धि काल मर चुका है; अब आप इस काल और मुनि—दोनोंपर अनुग्रह कीजिये॥ २५-२६॥ | | ततो विवेश भगवाननुगृह्य द्विजोत्तमम्।<br>क्षणाद् गूढशरीरं हि ध्वस्तं दृष्ट्वान्तकं क्षणात्॥ २७ | तत्पश्चात् क्षणभरमें ही मृत होकर पृथ्वीपर गिरे कालको देखकर उसके तथा द्विजश्रेष्ठ श्वेत—दोनोंके |