वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय १३३-१३४ ] भगवान्की पूजा करते समय होनेवाले अपराधोंके प्रायश्चित्त २३१
बन जानेपर भी उपासक पुरुषका उद्धार हो सकता है। ऐसे व्यक्तिको तीन दिन और तीन रातोंतक यवके आहारपर रहना चाहिये। इस प्रकार प्रायश्चित्त करनेके पश्चात् वह मेरी दृष्टिमें निरपराध है और सम्पूर्ण आसक्तियोंका त्यागकर वह मेरे लोकमें पहुँच जाता है। भद्रे! तुमने जो पूछा था कि — 'पूजाके समय बने हुए कलुषित (निन्दित) कर्म-अपराधोंसे पुरुषकी क्या गति होती है?' इसके विषयमें मैंने तुम्हें बता दिया। अब मेरे उपासना-कर्मके बीचमें ही जो मलत्याग करने जाता है, अनघे ! उसके विषयमें मैं अपना निर्णय कहता हूँ, सुनो। वह व्यक्ति भी बहुत वर्षोंतक नारकीय यातनाओंको भोगता है। उसका प्रायश्चित्त यह है कि वह व्यक्ति एक रात जलमें पड़ा रहे तथा एक रात खुले आकाशके नीचे शयन करे। इस प्रकार विधान करनेसे वह इस अपराधसे छूट जाता है। पृथ्वि ! पूजाके अवसरपर मेरे भक्तोंद्वारा होनेवाले अपराधोंके प्रायश्चित्त मैंने तुम्हें बतला दिये हैं। अब देवि! मेरी भक्तिमें रहनेवाला जो व्यक्ति मेरे कर्मोंका त्याग करके दूसरे कर्मोंमें लग जाता है, उसका फल बतलाता हूँ। वह व्यक्ति दूसरे जन्ममें मूर्ख होता है। अब उसके लिये प्रायश्चित्तकी विधि बतलाता हूँ। उसे पंद्रह दिनोंतक खुले आकाशमें सोना चाहिये। इससे वह पापसे निश्चय ही मुक्त हो जाता है।
भगवान् वराह कहते हैं— देवि! जो व्यक्ति नीला वस्त्र पहनकर मेरी उपासना करता है, वह पाँच सौ वर्षोंतक कीड़ा बनकर रहता है। अब उसके अपराधका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ। उसे विधिपूर्वक 'चान्द्रायणव्रत' का अनुष्ठान करना चाहिये। इससे वह पापसे मुक्त हो जाता है। जो व्यक्ति अविधिपूर्वक मेरा स्पर्श करता है और मेरी उपासनामें लगता है, उसे भी दोष लगता है और वह मेरा प्रियपात्र नहीं बन सकता। उसके द्वारा दिये गये गन्ध, माल्य, सुगन्धित पदार्थ तथा मोदक आदिको मैं कभी ग्रहण नहीं करता।
पृथ्वी बोली— प्रभो! आप जो मुझे आचारके व्यतिक्रमकी बात सुना रहे हैं तो कृपाकर इनके प्रायश्चित्तोंको तथा सदाचारके नियमोंको भी बतानेकी कृपा कीजिये। भगवन्! किस कर्मके विधानसे सम्पन्न होकर आपके कर्म-परायण रहनेवाले भागवत-पुरुष आपके श्रीविग्रहके पास पहुँचकर स्पर्श तथा उपासना करनेके योग्य होते हैं? यह भी बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह कहते हैं— सुश्रोणि! जो सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करके मेरी शरणमें आकर उपासना करता है, उसका कर्तव्य सुनो। मेरे उपासकको चाहिये कि वह पूर्वमुख बैठकर जलसे अपने दोनों पैरोंको धोकर फिर तीन बार हाथसे पवित्र मृत्तिकाका स्पर्शकर जलसे हाथ धो डाले। इसके उपरान्त मुख, नासिकाके दोनों छिद्र, दोनों आँख और दोनों कानोंको भी धोये। दोनों पैरोंको पाँच-पाँच बार धोये। फिर दोनों हाथोंसे मुख पोंछकर सारे संसारको भूलकर एकमात्र मेरा स्मरण करते हुए प्राणायाम करे। उपासकको चाहिये कि वह परब्रह्मका ध्यान करते हुए, जलसिक्त अंगुलियोंसे तीन बार अपने सिरका, तीन बार दोनों कानोंका और तीन बार नासिकाके छिद्रोंका स्पर्श करे, फिर तीन बार जल ऊपर फेंकना चाहिये।
यदि उसे मुझे प्रसन्न करनेकी इच्छा है तो फिर मेरे श्रीविग्रहके वामभागका स्पर्श करे। मेरे कर्ममें स्थित पुरुष यदि इस प्रकारका कर्म करता है तो उसे कोई दोष स्पर्श नहीं कर सकता।
पृथ्वी बोली— भगवन्! जो दम्भी या व्यभिचारी पुरुष अविधिपूर्वक स्पर्शकर आपकी पूजा करने लगता है, उसके लिये तापन और शोधनकी
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भी क्रिया होती होगी? अतः उसे आप बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! मेरे कर्मका अनादर करनेवाले व्यक्तियोंको जो गति प्राप्त होती है, इस विषयमें मैं विचारपूर्वक कहता हूँ, सुनो। मुझसे सम्बन्धित नियमोंका ठीक रूपसे पालन न कर जो अपवित्र व्यक्ति मेरी उपासनामें लग जाता है, उसे नियमानुसार ग्यारह हजार वर्षोंतक कीड़ा होकर रहना पड़ता है, इसमें कोई संशय नहीं है। उसकी शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त यह है—उसे महासांतपन अथवा तप्तकृच्छ्रव्रत करना चाहिये। यशस्विनि! ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य—इनमें जो भी मेरे मतके समर्थक हैं, उन्हें इस विधिके अनुसार यह प्रायश्चित्त करना आवश्यक है। इसके फलस्वरूप पापसे छूटकर वे परम गति प्राप्त कर लेते हैं। मेरी भक्तिमें तत्पर रहनेवाला जो व्यक्ति क्रोधमें भरकर मेरे गात्रोंका स्पर्श करता है और जिसका चित्त एकाग्र नहीं रहता, उसपर मैं प्रसन्न नहीं होता, बल्कि उसपर मुझे क्रोध ही होता है। जो सदा इन्द्रियोंको वशमें रखता है, जिसके मनमें मेरे प्रति श्रद्धा है, पाँचों इन्द्रियाँ नियमानुसार कार्य करती हैं तथा जो लाभ और हानिसे कोई प्रयोजन नहीं रखता, ऐसा पवित्र व्यक्ति मुझे प्रिय है। जिसमें अहंकार लेशमात्र भी नहीं रहता तथा मेरी सेवामें जिसकी विशेष रुचि रहती है, वह मुझे प्रिय है। अब इनके अतिरिक्त दूसरे व्यक्तियोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। जो मुझमें श्रद्धा-भक्ति रखता है, जो शुद्ध एवं पवित्र भी है, फिर भी यदि क्रोधके आवेशमें मेरा स्पर्श करता या मेरी परिक्रमा करता है, वह उस क्रोधके फलस्वरूप सौ वर्षोंतक चील पक्षीकी योनिमें जन्म पाता है, फिर सौ वर्षोंतक उसे बाज बनकर रहना पड़ता है और तीन सौ वर्षोंतक वह मेढकका जीवन व्यतीतकर दस वर्षोंतक राक्षसका शरीर पाता है। फिर वह इक्कीस वर्षोंतक अंधा रहकर बत्तीस वर्षोंतक गीध तथा दस वर्षोंतक चक्रवाककी योनिमें रहता है। इसमें वह शैवाल भक्षण करता तथा आकाशमें उड़ता रहता है। इस प्रकार क्रोधी उपासकोंकी दुर्गति होती है और उन्हें संसारचक्रमें भटकना पड़ता है।
पृथ्वीने कहा— जगत्प्रभो! आपने जो बात बतलायी उसे सुनकर मेरा हृदय विषाद एवं आतङ्कसे भर गया है। देवेश्वर! मैं प्रार्थना करती हूँ कि मेरी प्रसन्नताके लिये आप अखिल जगत्को सुखी बनानेवाला ऐसा कोई प्रायश्चित्त बतानेकी कृपा करें, जिसका पालन करके कर्मशील विवेकी पुरुष इस पापसे मुक्त होकर शुद्ध हो सके? भगवन्! वह प्रायश्चित्त ऐसा होना चाहिये, जिसे थोड़ी शक्तिवाले तथा लोभ एवं मोहसे ग्रस्त व्यक्ति भी निर्भीकतापूर्वक सरलतासे सम्पादन कर सकें और कठिन यातनाओंसे उनका उद्धार हो जाय।
पृथ्वीके इस प्रकार प्रार्थना करनेके समय ही कमलनयन भगवान् वराहके सम्मुख योगीश्वर सनत्कुमार भी पहुँच गये। वे ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं। उन मुनिने पृथ्वीकी बात सुनकर भगवान् वराहकी प्रेरणासे पृथ्वीसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया।
सनत्कुमारजी बोले— देवि! तुम धन्य हो जो भगवान्से इस प्रकार प्रश्न करती हो। इस समय साक्षात् भगवान् नारायण ही वराहका रूप धारणकर यहाँ विराजमान हैं। सम्पूर्ण मायाकी रचना इन्हींके द्वारा हुई है। इनसे तुम्हारा क्या वार्तालाप हुआ है, उसका सारांश बतलाओ। उस समय सनत्कुमारकी बात सुनकर पृथ्वीने उनसे कहा—'ब्रह्मन्! मैंने इनसे क्रियायोग एवं अध्यात्मका रहस्य पूछा था।
अध्याय १३५-१३६ ] सेवापराध और प्रायश्चित्त-कर्मसूत्र २३३
ब्रह्मन्! मेरे पूछनेपर इन भगवान् नारायणने मुझे ज्ञानयोगके साथ उपासनाकी बातें बतलायीं। साथ ही क्रोधके आवेशमें आकर उपासना करनेके दोषका भी वर्णन किया। फिर इसके प्रायश्चित्तमें उन्होंने बताया कि गृहस्थके घरसे शुद्ध भिक्षा माँगकर मनुष्य उस पापसे मुक्त हो जाता है। भगवान् जनार्दनका यह मेरे प्रति उपदेश था। फिर उन्होंने ऐसी विधि बतलायी, जिसे करनेसे भक्तको सभी प्रकारके सुख-सम्पत्तिकी प्राप्ति हो।' यह सुनकर सनत्कुमारजी भी पृथ्वीके साथ ही पुनः भगवान्के उपदेशोंको सुनने लगे।
भगवान् वराह बोले—जगत्में जो प्राणी पूजाके अयोग्य पुष्पसे मेरी अर्चना करता है, उसकी पूजाको न तो मैं स्वीकार करता हूँ और न वैसा व्यक्ति ही मुझे प्रिय है। देवि! जिनकी मुझमें तो भक्ति है, किंतु जो अज्ञानसे भरे हैं, वे मुझे प्रसन्न नहीं कर पाते, उन्हें तो रौरव नामक भयंकर नरकमें गिरना पड़ता है। अज्ञानके दोषके कारण वे अनेक दुःखोंका अनुभव करते हैं। ऐसा व्यक्ति दस वर्षोंतक वानर, तेरह वर्षोंतक बिल्ली, पाँच वर्षोंतक वक, बारह वर्षोंतक बैल, आठ वर्षोंतक बकरा, एक महीने ग्राममें रहनेवाला मुर्गा तथा तीन वर्षोंतक भैंसके रूपमें जीवन व्यतीत करता है, इसमें कोई संशय नहीं। भद्रे! जो पुष्प मुझे अप्रिय है, इसके प्रसङ्गमें मैं इतनी बातें बता चुका। साथ ही जो गन्धहीन, कुरूप पुष्प मुझे अर्पण करते हैं, उनकी दुर्गति भी बतला दी।
पृथ्विने पूछा—भगवन्! जिसका अन्तःकरण परम शुद्ध है, उसीके व्यवहारसे यदि आप प्रसन्न होते हैं तो कोई ऐसा साधन बतलाइये, जिसका प्रयोग करके आपके कर्ममें परायण रहनेवाले भक्त अन्तर्हृदयसे शुद्ध हो जायें।
भगवान् वराह कहते हैं—देवि! जिसके विषयमें तुम मुझसे पूछ रही हो, उसका विचार-पूर्वक वर्णन करता हूँ, सुनो। प्रायश्चित्तके सहारे मानव शुद्ध हो जाते हैं। ऐसे व्यक्तिको एक महीनेतक एक समय भोजन करना चाहिये। दिनमें वह सात बार वीरासनका अभ्यास करे, एक महीनेतक दिनके चौथे पहरमें (केवल) घृत अथवा पायस (खीर)-का आहार करे। तीन दिनोंतक यवान्न (जौ) खाकर रहे और तीन दिनोंतक वह केवल वायुके आधारपर ही रह जाय। जो व्यक्ति इस विधिका पालनकर मेरे कर्मोंमें उद्यत रहता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।
[ अध्याय १३३-१३४ ]
सेवापराध और प्रायश्चित्त-कर्मसूत्र
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्विदेवि! जो लाल वस्त्र पहनकर मेरी उपासना करता है, वह भी दोषी माना जाता है। अब उसके लिये दोषमुक्त करनेवाला प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, सुनो। प्रायश्चित्तका प्रकार यह है—ऐसे पुरुषको चाहिये कि सतरह दिनोंतक वह एक समय भोजन करे, तीन दिनोंतक वायु पीकर रहे और एक दिन केवल जलके आहारपर बिताये। यह प्रायश्चित्त सम्पूर्ण संसारकी आसक्तियोंसे मुक्त करानेवाला है। जो पुरुष अँधेरी रातमें बिना दीपक जलाये मेरा स्पर्श करता है तथा जल्दीके कारण अथवा मूर्खतावश शास्त्रकी आज्ञाका पालन न कर मेरा स्पर्श करता है, उसका भी पतन होता है। वह अधम मानव उस दोषसे क्लेश भोगता है। वह एक जन्मतक अन्धा होकर अज्ञानमय जीवन बिताता है और अभक्ष्य-अपेय पदार्थोंको खाता-पीता रहता है।
२३४ संक्षिप्त श्रीवराहपुराण [ अध्याय १३५-१३६ ]
अब मैं रात्रिके अन्धकारमें दीपरहित स्थितिमें अपने स्पर्शदोषका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जिससे दोष-मुक्त होकर वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति अनन्य भक्तिभावसे पंद्रह दिनोंतक आँखें ढककर रहे और बीस दिनोंतक सावधान होकर एक समय भोजन करे और फिर जिस किसी भी महीनेकी द्वादशी तिथिको एक समय भोजन करके और जल पीकर रह जाय। इसके पश्चात् गोमूत्रमें सिद्ध किया हुआ यवान्न भक्षण करे। इस प्रायश्चित्तके प्रभावसे वह इस दोषसे मुक्त हो जाता है।
देवि! जो व्यक्ति काला वस्त्र पहनकर मेरी उपासना करता है, उसका भी पतन होता है। वह अगले जन्ममें पाँच वर्षोंतक लाक्षा (लाह) आदि वस्तुओंमें रहनेवाला घुन होता है, फिर पाँच वर्षोंतक नेवला और दस वर्षोंतक कछुआ होकर रहता है। फिर कबूतरकी योनिमें जन्म लेकर वह चौदह वर्षोंतक मेरे मन्दिरके पार्श्वभागमें रहता है। अब उसका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ। उसे चाहिये कि सात दिनोंतक यवके आटेकी लपसी और तीन दिनोंतक यवके सत्तूकी एक पिण्डी तथा तीन रातोंतक तीन-तीन पिण्डियाँ खाय। इससे वह पापसे मुक्त हो जाता है। जो बिना धोये वस्त्र पहनकर मेरी उपासनामें लग जाता है, वह भी इस अपराधसे संसारमें गिर जाता है। जिसके फलस्वरूप वह एक जन्मतक मतवाला हाथी, एक जन्मतक ऊँट, एक जन्ममें भेड़िया, एक जन्ममें सियार और फिर एक जन्ममें घोड़ा होता है। इसके बाद वह एक जन्ममें मोर और पुनः एक जन्ममें मृग भी होता है। इस प्रकार सात जन्म व्यतीत होनेपर उसे मनुष्यकी योनि मिलती है। उस जन्ममें वह मेरा भक्त, गुणज्ञ-पुरुष और कार्यकुशल होकर मेरी उपासनामें परायण होता है तथा निरपराधी और अहंकार-शून्य जीवन व्यतीत करता है। अब उसके शुद्ध होनेका उपाय बतलाता हूँ, उसे सुनो, जिससे उसे हीन योनियोंमें नहीं जाना पड़ता। वह क्रमशः तीन दिनोंतक यव, तीन दिन तिलकी खली और फिर तीन दिनोंतक वह पत्ते, जल, खीर एवं वायुके आहारपर रह जाय। इस प्रकारके नियमका पालन करनेसे अशुद्ध वस्त्र पहननेवाले उपासकका दोष मिट जाता है और उसे कई जन्मोंतक संसारमें भटकना नहीं पड़ता।
देवि! जो मानव बत्तख आदि पक्षियों या किसी भी प्रकारका मांस खाकर मेरी पूजामें लगता है, वह पंद्रह वर्षोंतक बत्तखकी योनिमें रहता है। फिर वह दस वर्षोंतक तेंदुआ नामक हिंसक वन्य जन्तु होता है और पाँच वर्षोंतक उसे सूअर बनना पड़ता है। मेरे प्रति किये गये उस अपराधसे उसे इतने वर्षोंतक संसारमें भटकना पड़ता है। इस प्रकारके मांस खानेवाले व्यक्तिके लिये प्रायश्चित्त यह है कि वह क्रमशः तीन-तीन दिनोंतक यव, वायु, फल, तिल, बिना नमकके अन्नके आहारपर रहे। इस प्रकारका पंद्रह दिनोंमें प्रायश्चित्त पूराकर एक बारके मांसभक्षणदोषसे शुद्ध होता है। बार-बारके ऐसे अपराधोंका कोई प्रायश्चित्त नहीं है।
भगवान् वराह कहते हैं—देवि! दीपकका स्पर्श करके हाथ धो लेना चाहिये, अन्यथा इससे भी दोषका भागी बनना पड़ता है। महाभागे! इसके प्रायश्चित्तका यह रूप है कि जिस किसी भी महीनेके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके शुभ अवसरपर दिनके चौथे भागमें भोजन करके ठंडी ऋतुमें रात्रिके अवसरपर खुले आकाशमें सोये, फिर दीपदानकर इस दोषसे वह मुक्त हो जाता है। भद्रे! न्यायके अनुसार इस कर्मके प्रभावसे पुरुषमें पवित्रता आ जाती है और वह मेरे कर्म-पथपर आरूढ़ हो जाता है। दीपक-स्पर्श करके बिना हाथ धोये हुए मेरे कर्ममें लगनेका यह प्रसङ्ग तुम्हें बतला दिया। यह प्रायश्चित्त संसारमें शुद्ध करनेके लिये परम
अध्याय १३५-१३६] सेवापराध और प्रायश्चित्त-कर्मसूत्र २३५
साधन है, जिसका पालन करके पुरुष कल्याण प्राप्त कर लेता है।
देवि! जो मनुष्य श्मशानभूमिमें जाकर बिना स्नान किये ही मुझे स्पर्श करता है, उसे भी सेवापराधका दोष लगता है, फलस्वरूप वह चौदह वर्षोंतक पृथ्वीपर शृगाल होकर रहता है। फिर सात वर्षोंतक आकाशमें उड़नेवाला गीध होता है। इसके पश्चात् चौदह वर्षोंतक उसे पिशाचयोनिमें जाना पड़ता है।
पृथ्वी बोली—जगत्प्रभो! भक्तोंकी याचना पूर्ण करना आपका स्वभाव है। आपने यह जो परम गोपनीय विषय कहा है, इससे मुझे अत्यन्त आश्चर्य हो रहा है, अतः प्रभो! आपसे मेरी प्रार्थना है कि वह सम्पूर्ण विषय मुझे स्पष्टरूपसे बतानेकी कृपा करें। कमललोचन भगवान् शंकरने तो श्मशानकी बड़ी प्रशंसा की है और उसे पवित्र बतलाया है, फिर वहाँ दोष क्या है? रुद्र तो परम बुद्धिमान् हैं, उनमें किसी ऐश्वर्यकी भी कमी नहीं है, तब भी वे दीप्तिमान् कपालको लिये सदा श्मशानभूमिमें विराजते हैं, फिर आप उसकी निन्दा कैसे करते हैं?
भगवान् वराह कहते हैं—देवि! पवित्र व्रत करनेवाले पुरुष भी आजतक इस रहस्यसे अनभिज्ञ हैं। अखिल भूतोंके अध्यक्ष भगवान् शंकरको कोई नहीं जानता। उन्होंने त्रिपुरवधके समय बहुतेरे बालक-वृद्धों तथा बहुत-सी स्त्रियोंको भी मार डाला था, अतएव उस पापसे वे बड़े दुःखी थे। उस समय मैंने उन नष्टैश्वर्य भगवान् शंकरका स्मरण किया और वे मेरे पास पहुँचे। उस समय ज्यों ही मैंने उनपर अपनी दिव्य दृष्टि डाली कि वे पुनः सम्पूर्ण भूतोंके शासक महान् रुद्र बन गये। उस समय उनकी इच्छा मेरे यजनकी हुई, पर सहसा उनका ज्ञान और योगका बल नष्ट-सा हो गया। तब मैंने उनसे कहा—'प्रभो! आप ऐसे मुग्ध-से क्यों बैठे हैं? (आप मोहसे कैसे घिरे हैं?) बनाना, बिगाड़ना और बिगड़े हुएको पुनः बनाना—यह सब तो आपके हाथकी बात है। मृत्यु आपके अधीन रहती है, आप सबके मूल कारण और परमाश्रय हैं, आपको देवताओंका भी देवता कहा जाता है, आप साम और ऋक्स्वरूप हैं। देवेश्वर! आपकी इस म्लानताका कारण क्या है? आप कृपया इन्हें स्पष्टरूपसे बतलाइये। आप अपने योग और मायाको भी सँभालें। देखें, यह परब्रह्म परमेश्वरकी लीला है। मेरे मनमें आपको प्रसन्न करनेकी इच्छा हुई है, अतएव मैं यहाँ आया हूँ।'
वसुंधरे! फिर तो मेरी बात सुनकर शंकरजीको पूर्ण ज्ञान हो गया। उन्होंने मधुर वाणीमें मुझसे कहा—'नारायण! आप ध्यान देकर मेरी वाणी सुननेकी कृपा कीजिये। आप सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र शासक हैं। विष्णो! अब आपकी कृपासे मुझमें पुनः देवत्व जाग्रत् हो गया। माधव! मुझे योगकी उपलब्धि हो गयी और सांख्यका ज्ञान भी सुलभ हो गया, मेरी चिन्ताएँ शान्त हो गयीं, यही नहीं, आपकी कृपासे पूर्णमासीके अवसरपर उमड़नेवाले समुद्रकी भाँति मैं आनन्दमय बन गया हूँ। भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेवाले भगवन्! मैं आपको तत्त्वतः जानता हूँ और आप मुझे। हम दोनोंकी अभिन्नताको दूसरा कोई भी नहीं देख सकता है। आप महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न हैं। सम्पूर्ण मायाकी रचना आपके द्वारा हुई है।'
माधवि! भूतगणोंके महान् अधिष्ठाता रुद्रने इस प्रकार मुझसे कहा और एक मुहूर्त्ततक वे ध्यानमें बैठे रहे। इसके बाद पुनः मुझसे कहा—'विष्णो! आपकी कृपासे ही मैंने त्रिपुरासुरका वध किया था, उस समय मैंने बहुत-से दानवों और गर्भिणी स्त्रियोंका भी संहार कर दिया था। दसों दिशाओंमें भागते हुए बालक एवं वृद्धोंको भी मैंने मार डाला था। उस पापके कारण मैं योगमाया और ऐश्वर्योंसे शून्य हो गया हूँ। आपसे
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मेरी प्रार्थना है कि आप मुझे कोई ऐसा साधन बतलाइये, जिसके आचरणसे मेरे पाप नष्ट हो जायँ और मैं शुद्ध हो जाऊँ।
भगवान् रुद्रको इस प्रकार चिन्तित देखकर मैंने उनसे कहा—'शंकरजी! आप कपालकी माला धारण करें और 'समल'-स्थानमें चले जायँ।' उस समय मेरी ऐसी बात सुनकर उन भूतभावन भगवान् भवने मुझसे पुनः कहा—'जगत्प्रभो! वह 'समल'-स्थान कहाँ है? आप मुझे बोध देकर पूर्णरूपसे समझानेकी कृपा करें।' इसपर मैंने उनसे कहा—'शंकरजी! श्मशान ही रक्त-पीबके गन्धसे युक्त 'समल'-स्थान है, जहाँ कोई भी मनुष्य जाना नहीं चाहता। वहाँ मनुष्य जाकर स्पृहारहित हो जाता है। शिवजी! आप कपालोंको लेकर वहीं रमण करें। अपने व्रतमें अटल रहकर देवताओंके वर्षसे आप एक हजार वर्षतक वहाँ रहें और पापोंको नष्ट करनेके लिये आप वहाँ रहकर मौनव्रतका पालन करें। पूरे एक हजार वर्षतक उस श्मशान-भूमिमें रहनेके पश्चात् आप मुनिवर गौतम मुनिके आश्रमपर जायँ। वहाँ आपको पूर्ण आत्मज्ञानकी उपलब्धि हो जायगी और उस समय आप इस कपालसे भी मुक्त हो जायँगे।'
वसुंधरे! इस प्रकार रुद्रको वर देकर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया और रुद्र भी गजचर्मसे आच्छन्न होकर श्मशान-भूमिमें भ्रमण करते हुए निवास करने लगे। इसीलिये श्मशान-भूमि मुझे पसंद नहीं है और मैंने श्मशान-भूमिको निन्दित बताया है। वहाँ जाकर बिना संस्कार किये हुए प्राणीको मेरी पूजा-अर्चामें उपस्थित नहीं होना चाहिये। अब वह प्रायश्चित्त बताता हूँ, जिसका पालन करनेसे साधक इस पापसे छूट जाता है। वह पंद्रह दिनोंतक दिनके चौथे भागमें एक बार भोजन करे। रातमें एक वस्त्र पहनकर कुशके बिस्तरपर आकाश-शयन करे, अर्थात् शीतकालकी रात्रिमें खुले आकाशके नीचे शयन करे और प्रातःकाल उठकर वह पञ्चगव्यका प्राशन करे। ऐसा करनेसे उसके पापकर्मका परिमार्जन हो जाता है और वह पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।
सुश्रोणि! इसी प्रकार जो व्यक्ति हींग खाकर मेरी उपासना करता है, उसे भी दोष लगता है, अब उसके पापका परिणाम तथा शोधन करनेवाला प्रायश्चित्त सुनो। वह जन्मान्तरमें दस वर्षोंतक उल्लू और तीन वर्षोंतक कछुआ होकर निवास करता है। तदनन्तर उसे फिरसे मनुष्यकी योनि मिलती है और मेरी उपासनामें उसकी रुचि होती है। वसुंधरे! इन प्रमादियोंके लिये तथा जिन्हें इस संसारमें केवल दूसरोंके दोष ही दिखायी पड़ते हैं, उनके मुक्त होनेके लिये मैं एक महान् ओजस्वी प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जिसका पालन-कर वह पवित्र होकर संसार-सागरको पार कर जाता है। इस पापसे छूटनेके लिये मनुष्यको एक दिन यवकी लपसी खाकर तथा एक दिन गोमूत्रके आहारपर रहना चाहिये। रातमें वह वीरासनसे बैठकर तथा आकाश-शयनद्वारा कालक्षेप करे। इस विधिका पालन करनेसे वह पुरुष संसारमें न जाकर मेरे लोकमें पहुँच जाता है।
सुशोभने! जो दम्भी मनुष्य मदिरा-पानकर मेरी उपासनामें सम्मिलित होता है, उसका दोष बताता हूँ, तुम मनको एकाग्र करके सुनो। इस अपराधके कारण वह व्यक्ति दस हजार वर्षोंतक दरिद्र होता है। जो मेरा भक्त है और जिसने वैष्णव दीक्षा भी ग्रहण कर ली है, वह यदि कोई कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे मोहित होकर मद्य पी लेता है तो उसके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं
अध्याय १३५-१३६ ] सेवापराध और प्रायश्चित्त-कर्मसूत्र २३७
है। वसुंधरे! अब अदीक्षित उपासकके लिये प्रायश्चित्तके उपाय बतलाता हूँ, वह सुनो। यदि यह अग्निवर्ण-प्रतप्त सुराका पान करे तो उक्त पापसे छूट सकता है। जो पुरुष इस विधिके अनुसार प्रायश्चित्त करता है, वह न तो पापसे लिप्त होता है और न संसारमें उसकी उत्पत्ति ही होती है।
पृथ्वि! मेरी उपासना करनेवाला जो पुरुष वनकुसुमका, जिसे लोक-व्यवहारमें 'बरे' कहते हैं, शाक खाता है, वह पंद्रह वर्षोंतक घोर नरकमें पड़ता है। इसके बाद उसको भूलोकमें सूअरकी योनि प्राप्त होती है। फिर तीन वर्षोंतक वह कुत्ता और एक वर्षतक शृगाल होकर जीवन व्यतीत करता है।
भगवान् वराहकी बात सुनकर देवी पृथ्वीने श्रीहरिसे पुनः पूछा कि—'कुसुमके शाकका नैवेद्य अर्पण करनेसे जो पाप बन जाता है, प्रभो! उससे कैसे उद्धार हो सकता है—इसके लिये प्रायश्चित्त बतानेकी कृपा कीजिये।'
भगवान् वराह कहते हैं—देवि! जो मानव 'वन-कुसुम' के शाकको मुझे अर्पितकर स्वयं भी खा लेता है, वह दस हजार वर्षोंतक नरकमें क्लेश पाता है। उसका प्रायश्चित्त 'चान्द्रायण-व्रत' ही है। परंतु यदि वह केवल उसका प्रसाद भोग बनाकर ही रह जाता है, खाता नहीं है तो वह बारह दिनोंतक पयोव्रत करे। जो इस प्रकार प्रायश्चित्त कर लेता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता और मेरे लोकको ही प्राप्त होता है।
माधवि! मेरे कर्ममें परायण जो मन्द बुद्धिका व्यक्ति दूसरेके वस्त्रको बिना धोये ही पहन लेते हैं तथा मेरी उपासनामें लग जाते हैं तो उन्हें भी प्रायश्चित्ती बनना पड़ता है। देवि! यदि वह मेरा स्पर्श करता है तथा परिचर्या करता है तो वह दस वर्षोंतक हरिण बनकर रहता है, फिर एक जन्ममें वह लँगड़ा होता है और बादमें वह मूर्ख, क्रोधी और अन्तमें पुनः मेरा भक्त होता है। सुश्रोणि! अब मैं उसका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जिससे पाप-मुक्त होकर उसकी मेरी भक्तिमें रुचि उत्पन्न होती है। वह मेरी भक्तिमें संलग्न होकर दिनके आठवें भागमें आहार ग्रहण करे। जिस दिन माघमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथि हो, उस दिन जलाशयपर जाकर शान्त-दान्त और दृढ़व्रती होकर अनन्यभावसे मेरा चिन्तन करे। इस प्रकार जब दिन-रात समाप्त हो जायँ तो प्रातःकाल सूर्योदय हो जानेपर पञ्चगव्यका प्राशनकर मेरे कार्यमें उद्यत हो जाय। जो इस विधानसे प्रायश्चित्त करता है, वह अखिल पापोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।
जो व्यक्ति नये अन्न उत्पन्न होनेपर नवान्नविधिका पालन न करके उसे अपने उपयोगमें लेता है, उसके पितरोंको पंद्रह वर्षोंतक कुछ भी प्राप्त नहीं होता। और जो मेरा भक्त होकर भी नये अन्नोंको दूसरोंको न देकर स्वयं अपने ही खा लेता है वह तो निश्चय ही धर्मसे च्युत हो जाता है। महाभागे! इसके लिये प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जो मेरे भक्तोंके लिये सुखदायी है। वह तीन रात उपवासकर चौथे दिन आकाश-शयनकर सूर्यके उदय होनेके पश्चात् पञ्चगव्यका प्राशनकर सद्यः पापसे मुक्त हो जाता है। जो व्यक्ति इस विधिके अनुसार प्रायश्चित्त कर लेता है, वह अखिल आसक्तियोंका भलीभाँति त्यागकर मेरे लोकमें चला जाता है।
इसी प्रकार भूमे! जो मानव मुझे बिना चन्दन और माला अर्पण किये ही धूप देता है, वह इस दोषके कारण दूसरे जन्ममें राक्षस होता है और उसके शरीरसे मुर्दे-सी दुर्गन्ध निकलती रहती है
२३८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १३७
और इक्कीस वर्षोंतक वह लौहशालामें निवास करता है। अब उसके लिये भी प्रायश्चित्त बताता हूँ, सुनो। उसकी विधि यह है—जिस-किसी मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन वह व्रत करके दिनके आठवें भागमें सायंकाल यथालब्ध आहार ग्रहण करे। फिर प्रातःकाल जब सूर्यमण्डल दिखायी पड़ने लगे, उस समय वह पञ्चगव्यका प्राशन करे। इसके प्रभावसे वह पुरुष पापसे सद्यः छूट जाता है। इस विधिके अनुसार जो प्रायश्चित्तका पालन करता है, उसके पिता-पितामह आदि पितर भी तर जाते हैं।
भूमे! जो मनुष्य पहले भेरी आदिद्वारा शब्द किये बिना ही मुझे जगाता है, वह निश्चय ही एक जन्ममें बहरा होता है। अब! मैं उसका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जिससे वह पापसे छूट जाता है। वह किसी शीत-ऋतुके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिकी रातमें आकाश-शयन करे। इस नियमका पालन करनेसे मानव पापसे शीघ्र छूट जाता है।
वसुंधरे! जो मानव बहुत अधिक भोजन करके अजीर्णयुक्त बिना स्नान किये ही मेरी उपासनामें आ जाता है, वह इस अपराधके कारण क्रमशः कुत्ता, वानर, बकरा और शृगालकी योनियोंमें एक-एक बार जन्म लेकर फिर अन्धा और बहरा होता है। बादमें इस क्लेशमय संसारको पारकर वह किसी अच्छे कुलमें उत्पन्न होता है। उस समय अपराधसे छूट जानेके कारण वह पुरुष परम शुद्ध और श्रेष्ठ भगवद्भक्त होता है। मैं अब उसके लिये प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जिसके पालन करनेसे वह पापसे छूट जाय। प्रायश्चित्तका स्वरूप यह है कि उसे क्रमशः तीन-तीन दिनोंतक यावक, मूलक, पायस (खीर), सत्तू तथा वायुके आहारके आधारपर रहकर फिर तीन रात आकाश-शयन करना चाहिये। फिर ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर दन्तधावनकर शरीरको परम शुद्ध करनेके लिये उसे पञ्चगव्यका प्राशन करना चाहिये। जो मानव इस विधानके अनुसार प्रायश्चित्त करता है, उसपर पापका प्रभाव नहीं पड़ सकता और वह मेरे लोकको प्राप्त होता है।
महेश्वरि! यह प्रसङ्ग आख्यानोंमें महाख्यान और तपस्याओंमें परम तप है। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, वह व्यक्ति मेरे लोकको प्राप्त होता है। साथ ही वह अपने दस पूर्व और दस पीछेकी पीढ़ियोंको तार देता है। यह प्रसङ्ग परम मङ्गलकारी तथा सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला है। अपने व्रतमें अटल रहनेवाला जो भागवत पुरुष इसका सदा पाठ करता है, वह सम्पूर्ण अपराधोंका आचरण करके भी उससे लिप्त नहीं होता। यह जप करने योग्य तथा परम प्रमाणभूत शास्त्र है। इसे मूर्खोंके समाजमें अथवा निन्दित व्यक्तियोंके सामने नहीं पढ़ना चाहिये। देवि! तुमने मुझसे जो पूछा था, वह आचारका निर्णीत विषय मैंने तुम्हें बतला दिया, अब तुम दूसरा कौन-सा प्रसङ्ग सुनना चाहती हो, यह बतलाओ। [अध्याय १३५-१३६]
वराहक्षेत्रकी* महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृगालका वृत्तान्त तथा आदित्यको वरदान
पृथ्वी बोली— भगवन्! आपने मुझे तथा अपने भक्तोंको प्रिय लगनेवाली बड़ी सुन्दर बात सुनायी। महाबाहो! अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि ‘कुब्जाम्रक’क्षेत्रमें सबसे श्रेष्ठ एवं पवित्र आचरणीय व्रत क्या है? तथा भक्तोंको सुख देनेवाला इसके अतिरिक्त अन्य तीर्थ कौन-सा है?
* नन्दलाल दे आदिके अनुसार यह एटाके पासका सोरोंनामक स्थान है और अन्योंके मतसे पटनाके पासका हरिहर क्षेत्र।
११६- वराहक्षेत्रान्तर्वर्ती 'आदित्यतीर्थ' का प्रभाव (खञ्जरीटकी कथा)
अध्याय १३७ ] वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृगालका वृत्तान्त २३९
भगवान् वराह बोले—देवि! ऐसे तो मेरे सभी क्षेत्र परम शुद्ध हैं; फिर भी 'कोकामुख', 'कुब्जाम्रक' तथा 'सौकरव'-स्थान (वराहक्षेत्र) क्रमशः उत्तरोत्तर उत्तम माने जाते हैं; क्योंकि इनमें सम्पूर्ण प्राणियोंको संसारसे मुक्त करनेके लिये अपार शक्ति है। देवि! भागीरथी गङ्गाके समीप यह वही स्थान है, जहाँ मैंने तुम्हें समुद्रसे निकालकर स्थापित किया है।
पृथ्वी बोली—प्रभो ! 'सौकरव'में मरनेवाले प्राणी किन लोकोंको प्राप्त होते हैं तथा वहाँ स्नान करने एवं उस तीर्थके जलके पान करनेवालेको कौन-सा पुण्य प्राप्त होता है? कमलनयन ! आपके उस वराहक्षेत्रमें कितने क्षेत्र हैं? आप यह सब मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् वराह कहते हैं—महाभागे ! वराहक्षेत्रके दर्शन-अभिगमन आदिसे श्रेष्ठ पुण्य तो प्राप्त ही होता है, साथ ही उस तीर्थमें जिनकी मृत्यु होती है, उनके पूर्वके दस तथा आगे आनेवाली पीढ़ीके दस तथा (मातुल आदि कुलके) अन्य बारह पुरुष स्वर्गमें चले जाते हैं। सुश्रोणि! वहाँ जाने तथा मेरे (श्रीविग्रहके) मुखका दर्शन करनेमात्रसे सात जन्मोंतक वह पुरुष विशाल धन-धान्यसे परिपूर्ण श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न होता है, साथ ही वह रूपवान्, गुणवान् तथा मेरा भक्त होता है। जो मनुष्य वराहक्षेत्रमें अपने प्राणोंका त्याग करते हैं वे उस तीर्थके प्रभावसे शरीर त्यागनेके पश्चात् शङ्ख, चक्र और गदा आदि आयुधोंसे विभूषित चतुर्भुजरूप धारणकर श्वेतद्वीपको प्राप्त होते हैं। वसुंधरे! इसके अन्तर्गत 'चक्रतीर्थ' नामका एक प्रतिष्ठित क्षेत्र है, जिसमें व्यक्ति इन्द्रियोंपर संयम रखते हुए नियमानुकूल भोजन और वैशाखमासकी द्वादशी तिथिको विधिपूर्वक स्नानकर ग्यारह हजार वर्षोंतक विख्यात कुलमें जन्म पाकर प्रभूत धन-धान्यसे सम्पन्न रहकर मेरी परिचर्यामें परायण रहता है।
पृथ्वी बोली—भगवन्! सुना जाता है कि इस वराहतीर्थमें चन्द्रमाने भी आपकी उपासना की थी, जो बड़े कौतूहलका विषय है। अतः आप इसे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह बोले—देवि! चन्द्रमा मुझे स्वभावतया ही प्रिय हैं; अतः तप करनेके बाद मैंने उन्हें अपना देवदुर्लभ दर्शन दिया। पर मेरे उस स्वरूपको देखकर वे अपनेको सँभाल न सके और अचेत हो गये। मेरे तेजसे वे ऐसे मोहित हो गये कि मुझे देखनेकी भी उनमें शक्ति न रही। उन्होंने आँखें बंद कर लीं और घबराहटके कारण त्रस्त-नेत्र होकर कुछ भी बोल न पाये। इसपर मैंने उनसे धीरेसे कहा—'परम तपस्वी सोम! तुम किस उद्देश्यसे तप कर रहे हो? तुम्हारे मनमें जो बात हो, वह मुझसे बताओ। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, अतः तुम्हें सब कुछ प्राप्त हो जायगा—इसमें कोई संशय नहीं।'
इसपर 'सोमतीर्थ' में स्थित होकर चन्द्रमाने कहा—'भगवन्! आप योगियोंके स्वामी हैं और संसारमें सबसे श्रेष्ठ हैं। आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो यहाँ निवास करनेकी कृपा कीजिये, साथ ही मैं यह भी चाहता हूँ कि जबतक ये लोक रहें, तबतक आपमें मेरी निश्चलरूपसे अतुल श्रद्धा और भक्ति सदा बनी रहे। मेरा जो रूप है, वह कभी आपसे रिक्त न हो और वह सातों द्वीपोंमें सर्वत्र दिखायी पड़े। यज्ञोंमें ब्राह्मण-समुदाय मेरे नामसे प्रसिद्ध सोमरसका पान करें। प्रभो! इसके प्रभावसे उन्हें परम एवं दिव्य गति प्राप्त हो जाय। अमावास्याको मुझमें क्षीणता आ जायगी, उसमें पितरोंके लिये पिण्डकी क्रियाएँ लाभकर होंगी, पर पूर्णिमाको मैं पुनः नियमानुसार सुन्दर दर्शनीय
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बन जाऊँ। अधर्ममें मेरी बुद्धि कभी न जाय और मैं ओषधियोंका भी स्वामी बन जाऊँ। महादेव! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे आनन्दित करनेके लिये यह वर देनेकी कृपा कीजिये।'
वसुंधरे! चन्द्रमाकी इन बातोंको सुनकर और उन्हें वैसा वरदान देकर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया। महाभागे! चन्द्रमाने जहाँ एक पैरपर खड़े रहकर पाँच हजार वर्षोंतक महान् तपस्या की थी, वह 'सोमतीर्थ' नामसे विख्यात हुआ तथा उन्हें दुर्लभ सिद्धि एवं कान्ति प्राप्त हुई। जो मेरा भक्त इस सोमतीर्थमें श्रद्धासे स्नानकर प्रतिदिन दिनके आठवें भागमें भोजन करके मेरी उपासनामें लगा रहता है, अब उसके फलका वर्णन करता हूँ। वह पैंतीस हजार वर्षोंतक ब्राह्मणका शरीर पाता है और वेद-वेदाङ्गका पारगामी विद्वान्, धनवान्, गुणवान्, दानी एवं मेरा निर्दोष भक्त होता है और संसारसागरको पार कर जाता है। यशस्विनि! यह ऐसा महत्त्वपूर्ण तीर्थ है, जहाँ महात्मा चन्द्रमाने दीर्घकालतक तपस्या की थी।
अब उस 'सोमतीर्थ' का लक्षण बतलाता हूँ, सुनो। वैशाख शुक्ल द्वादशीको चन्द्रमाके अस्त होने एवं अन्धकारके प्रवृत्त होनेपर जहाँ बिना चन्द्रमाके ही पृथ्वीपर चन्द्रिका चमकती दीखे, उसे ही सोमतीर्थ समझना चाहिये। वास्तवमें यह महान् आश्चर्यका विषय है कि चन्द्रमाका आलोक (प्रकाश) तो दीखता है, पर स्वयं चन्द्रमा वहाँ नहीं दीखते। महाभागे! ये परम पवित्र सौकरवतीर्थ तथा सोमतीर्थ—मुझसे सम्बन्ध रखते हैं।
वसुंधरे! अब मैं एक दूसरी बात बतलाता हूँ, उसे सुनो; जिससे इस क्षेत्रकी अद्भुत महिमा प्रख्यायित होती है। यहाँ एक शृगाली रहती थी, जो बिना श्रद्धाके ही पूर्वकर्मवश दैवयोगसे मरकर इस क्षेत्रके प्रभावसे अगले जन्ममें गुणवती, रूपवती और चौंसठ कलाओंसे सम्पन्न श्यामा* सर्वाङ्गसुन्दरी राजाकी पुत्री हुई थी। उसी सोमतीर्थके पूर्वी भागमें 'गृध्रवट' नामका भी एक प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ एक गीधकी अनायास मृत्यु हुई, जिसकी कोई कामना न थी, पर उसे मनुष्यकी योनि प्राप्त हुई थी।
पृथ्वी बोली— प्रभो! इस तीर्थके प्रभावसे तिर्यक्-योनिमें पड़े हुए गीध और शृगाली मनुष्य-शरीरको कैसे प्राप्त हुए? यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है! साथ ही उस तीर्थमें स्नान करनेसे अथवा प्राणत्याग करनेसे मनुष्य किस गतिको प्राप्त करते हैं तथा उनके शरीरपर कौनसे विशेष चिह्न होते हैं? केशव! आप मुझे यह भी बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् वराह बोले— देवि! धर्मप्रधान सत्ययुगके बाद त्रेतायुगका प्रवेश ही हुआ था। उस समय काम्पिल्य† नगरमें ब्रह्मदत्त‡ नामक एक धर्मनिष्ठ राजा रहते थे। उनका सभी लक्षणोंसे सम्पन्न एक सोमदत्त नामक पुत्र था। एक बार वह
* शास्त्रोंमें 'श्यामा' स्त्रीके अनेक रूप निर्दिष्ट हैं। (द्रष्टव्य—'वाचस्पत्य' एवं 'शब्दकल्पद्रुम' कोश अथवा 'मोनियर विलियम' का संस्कृत-अंग्रेजी कोश)। यह मुख्यतः सुवर्णके रंगकी अत्यन्त दीप्तिमती गौरवर्णकी स्त्री होती है। यथा—
श्यामा गुणवती गौरी दिव्यालंकारभूषिता। चतुरा शीलसम्पन्ना चित्तेनारुन्धती समा॥ (पुरुषोत्तममासमाहा० ३। ४५)
अथवा—'तप्तकाञ्चनवर्णाभा सा स्त्री श्यामेति कथ्यते।'
† काम्पिल्य-फर्रूखाबाद जिलेमें कायमगंजसे ६ मील, फतेहगढ़से २८ मील पूर्वोत्तर गङ्गानदीके तटपर है। यह राजा द्रुपदकी राजधानी थी। द्रौपदीका स्वयंवर यहीं हुआ था।
‡ ब्रह्मदत्तका यह चरित्र वाल्मी०रामा०बालकाण्ड, मत्स्यपुराण अध्याय १९—२१, हरिवंश १।२२—२५, शिवपुराण उमासंहिता ४१ तथा अन्यान्य पुराणोंमें भी प्राप्त होता है।
अध्याय १३७] वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृगालका वृत्तान्त २४१
पितरोंके उद्देश्यसे मृगोंके अन्वेषणमें आखेटके लिये बाघ और सिंहोंसे भरे वनमें गया; किंतु राजकुमारको पितृकार्यके उपयुक्त कोई वस्तु न दिखी। इस प्रकार वह इधर-उधर घूम ही रहा था कि उसकी दाहिनी ओरसे एक सियारिन निकली, जो (अनायास एक मृगपर छोड़े हुए) उसके बाणोंसे बिंध गयी और व्यथासे तड़पने लगी। फिर वह इस तीर्थमें जल पीकर एक शाखोट-वृक्षके नीचे गिर पड़ी। धूपसे व्याकुल तथा बाणसे बिंधी होनेके कारण न चाहनेपर भी उसके प्राण इस सोमतीर्थमें ही निकल गये। भद्रे! उसी समय सोमदत्त भी भूख-प्याससे पीड़ित होकर इस 'गृध्रवट' नामक तीर्थमें पहुँचा और विश्राम करनेके लिये ठहर गया। इतनेमें ही उस वटकी शाखापर उसे एक गीध बैठा दिखायी दिया। यशस्विनि! उसने उसे भी एक ही बाणसे मार गिराया, जो उसी वृक्षकी जड़पर गिरा। हृदयमें बाण लगनेसे उसे मूर्च्छा आ गयी और उसके प्राणपखेरू उड़ गये। उस गीधको देखकर राजकुमारके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। अतः उसने बाणोंके पर बनानेके लिये उस गीधके पंख काट लिये और उन्हें लेकर घर आया। इस प्रकार गीधके न चाहनेपर भी उस तीर्थमें मृत्यु होनेपर उसकी सद्गति हो गयी और कालान्तरमें वह कलिङ्गदेशके नरेशके घर रूपवान्, विद्वान् एवं गुणसम्पन्न राजपुत्र हुआ।
वसुंधरे! उधर जो शृगाली मरी थी, वह काञ्चीनरेशके यहाँ राजपुत्रीके रूपमें उत्पन्न हुई जो सर्वाङ्गसुन्दरी, श्यामा, अत्यन्त रूप-गुणसे सम्पन्न, कार्य-कुशल और चौंसठ कलाओंसे सम्पन्न थी। उसका स्वर कोयलके समान मधुर एवं सुखदायी था। इधर अनायास काञ्चीनरेश और कलिङ्ग-नरेशकी प्रीति बढ़ गयी और परिणामतः काञ्ची-नरेशकी कन्याका कलिङ्गराजके पुत्रके साथ विधिपूर्वक विवाह हो गया। काञ्चीनरेशने वर-वधूको दहेजमें अनेक प्रकारके रत्न, आभूषण, हाथी, घोड़े, भैंस और दास-दासियाँ दीं। फिर विवाहोपरान्त कलिङ्गराज वधूसहित अपने पुत्रको लेकर अपनी राजधानीको वापस लौट आये।
देवि! विवाहके बाद दम्पतीको प्रेमपूर्वक रहते कुछ वर्ष व्यतीत हो गये। उनकी प्रीति रोहिणी और चन्द्रमाकी तरह निरन्तर बढ़ती गयी। वे नन्दनवनकी उपमावाले वन-उपवन-उद्यानादि एवं क्रीडाके अन्य दिव्यस्थलोंमें आनन्दपूर्वक विहार करते। इधर कलिङ्ग-राजकुमार अपनी बुद्धि, सुशीलता और श्रेष्ठ कर्मोंसे नगरकी जनताको भी परम संतुष्ट रखता। उधर अन्तःपुर एवं नगरकी स्त्रियोंको राजकुमारीने संतुष्ट कर रखा था। इस प्रकार उन दोनोंके सौम्य गुणों एवं शीलयुक्त व्यवहारसे सभी राज्यवासी संतुष्ट थे।
एक बार उस राजकुमारीने उस राजकुमारसे वार्तालापके प्रसङ्गमें कहा कि मैं आपसे एक रहस्यकी बात पूछती हूँ। यदि मुझपर आपका स्नेह हो तो आप मुझे उसे बतानेकी कृपा करें। पत्नीकी बात सुनकर राजकुमारने कहा—'भद्रे! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारे मनकी अभिलाषा पूरी करनेके लिये अवश्य प्रयत्न करूँगा। देवि! सत्यके आधारपर ही विश्व ठहरा है। सत्य भगवान्का ही स्वरूप है और तपस्याका मूल भी सत्य ही है तथा सत्यके आधारपर ही हमारा राज्य टिका हुआ है। मैं कभी भी मिथ्या नहीं बोलता। इसके पहले भी मेरे मुँहसे कभी झूठी बात नहीं निकली है। अतः तुम कहो, मैं तुम्हारे लिये कौन-सा कार्य करूँ? हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, सवारी, धन अथवा परम श्रेष्ठ अपना पट्टबन्ध, शिरोमुकुटतक मैं तुम्हें समर्पण करनेको तैयार हूँ।
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इसपर काञ्चीनरेशकी उस कन्याने अपने पतिदेवके चरणोंको पकड़कर यह बात कही— 'पतिदेव ! मैं रत्न, हाथी, घोड़े एवं रथ कुछ भी नहीं चाहती। आपके पट्टबन्धसे मेरा क्या प्रयोजन ? मैं तो केवल यही चाहती हूँ कि मध्याह्नकालमें एकान्तमें निश्चिन्त सो सकूँ। प्राणनाथ ! आप ऐसी व्यवस्था कर दें कि मैं उस समय जितनी देरतक सोयी रहूँ, उस समय मुझे मेरे श्वशुर, सास अथवा दूसरा कोई भी देख न सके—यही मेरा व्रत है। यही नहीं अपने सगे-सम्बन्धी अथवा घरके अन्य स्वजन भी सोयी हुई अवस्थामें मुझपर कभी दृष्टि न डालें।'
वसुंधरे ! इसपर कलिङ्गदेशके उस राजकुमारने उसका समर्थन कर दिया और कहा—'तुम विश्वास करो, सोते समय तुम्हें कोई भी न देखेगा।' कुछ समयके बाद कलिङ्गनरेशने उस राजकुमारको राज्यपदपर अभिषिक्त कर दिया। फिर कुछ दिनोंके पश्चात् उनकी मृत्यु हो गयी। अब राजकुमार राज्यका विधिपूर्वक समुचित ढंगसे संचालन करने लगा। राजकुमारी जिस स्थानपर अकेली सोती, वहाँ उसे कोई देख नहीं पाता था। फिर यथासमय उस राजकुमारके कलिङ्ग-कुलको आनन्दित करनेवाले सूर्यके समान तेजस्वी पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। इस प्रकार उस राजकुमारके निष्कण्टक राज्य करते हुए सतहत्तर वर्ष बीत गये। अठहत्तरवें वर्ष एक दिन जब सूर्य मध्य आकाशमें स्थित थे, तब वह एकान्तमें बैठकर इन बातोंको प्रारम्भसे सोचने लगा। उस दिन माघमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथि थी, अतः उसके मनमें आया कि 'मैं अपनी पत्नीको देखूँ कि वह एकान्तमें किसकी अर्चना करती है अथवा उसका व्रत कौन-सा है? निर्जनस्थानमें सोती रहकर क्या करती है? कोई स्त्री सोकर व्रत करे, ऐसा तो कोई धर्म-संग्रह नहीं दीखता है। मनुने भी किसी ऐसे धर्मका उल्लेख नहीं किया। बृहस्पति अथवा धर्मराजके बनाये हुए धर्मशास्त्रमें भी कहीं इस प्रकारका उल्लेख नहीं पाया जाता है। ऐसा तो कहीं देखा-सुना नहीं गया कि कोई स्त्री सोयी रहकर किसी व्रतका आचरण करे। यह तो इच्छानुसार भोगोंका उपभोग करती—बना-बनाया भोजन-पान करती और अत्यन्त महीन रेशमी वस्त्र धारणकर श्रेष्ठ गन्धोंसे विभूषित तथा सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत रहती है। पर सम्भव है, इस प्रकार देखनेपर वह प्रकुपित हो जाय, जो कुछ हो उसे एक बार देखना अवश्य चाहिये कि वह किस प्रकार कौन-सा व्रत करती है? किंनरोंने बतलाया है कि वशीकरण मन्त्रको सिद्ध कर लेनेपर स्त्री योगीश्वरी बनकर जहाँ उसकी इच्छा हो, जा सकती है। इस प्रकार इसमें वह शक्ति आ जायगी, जो कामरागसे दूसरेका भी स्पर्श कर सकती है तथा दूसरोंसे इसका भाव भी हो सकता है।'
पृथ्वि ! इस प्रकार राजकुमारके सोचते-विचारते सूर्य अस्त हो गये और सबको विश्राम देनेवाली भगवती रात्रिका आगमन हुआ। फिर रात्रि बीतनेपर मङ्गलमय प्रभातका भी उदय हुआ। मागध, वन्दीगण, सूत और वैतालिक राजाकी स्तुति करने लगे। शङ्ख और दुन्दुभिकी ध्वनियोंसे उसकी निद्रा भङ्ग हुई। इधर अखिललोकनायक भगवान् भास्कर भी उदित हो गये। उस समय पहलेकी बातोंका स्मरण करते हुए राजकुमारके मनमें अन्य कोई चिन्ता नहीं रह गयी थी, केवल वही चिन्ता उसके हृदयमें व्याप्त थी। उसने विधिपूर्वक स्नानकर दो रेशमी वस्त्र पहन लिये। इस प्रकार भलीभाँति तैयार होकर उसने सबको दूर हटा दिया और कहा कि 'मैं किसी व्रतमें
११७- भगवान्के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य
अध्याय १३७ ] वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृगालका वृत्तान्त २४३
दीक्षित हो गया हूँ, अतः कोई भी स्त्री अथवा पुरुष मेरा स्पर्श न करे; अन्यथा वह दण्ड-विधानके अनुसार मेरा वध्य हो सकता है?'
वसुंधरे! कलिङ्गनरेश इस प्रकारकी आज्ञा देकर शीघ्रतापूर्वक चलकर जहाँ राजकुमारी रहती थी, वहाँ पहुँचा और अपनी स्त्रीको देखा। वह चारपाईके पास नीचे आसन लगाकर बैठी थी और अपने मनमें इष्टदेवका चिन्तन कर रही थी, साथ ही सिरके दर्दसे पीड़ित होकर रो रही थी। राजकुमारी कह रही थी—'मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा ऐसा दुष्कर कर्म किया है, जिससे मैं इस दयनीय दशाको प्राप्त हो गयी हूँ। मैं अनाथकी भाँति क्लेश सहती हूँ, किंतु मेरे पतिदेवको भी इसका पता नहीं है। मेरा व्रत सब तरहसे विकृत ही कहा जा सकता है। मेरा बड़ा सौभाग्य होता यदि मैं कभी सौकरवक्षेत्रमें जा सकती और मेरे हृदयमें जो बात बसी है, उसे अपने पतिसे कह पाती।'
कलिङ्गनरेश अपनी स्त्रीकी बात सुन रहा था। उसने उठकर दोनों हाथोंसे अपनी पत्नीको पकड़कर कहा—'भद्रे! तुम यह क्या कह रही हो? अपनेको तुम इस प्रकार बार-बार कोसती क्यों हो? तुम प्रारब्धकी बातोंको क्यों सोचती हो और अपनेको क्यों कोसती हो? तुम्हें तो यह एक महान् शिरोरोग है। इसे दूर करनेके लिये अष्टाङ्ग-कुशल वैद्य क्या तुम्हें नहीं मिलते, जो तुम्हारे सिरकी कठिन पीड़ाको दूर कर सकें? वायु, कफ, पित्त आदि रोगोंसे तुम्हें संनिपात हो गया है, अथवा असमयपर तुममें पित्तका प्रकोप हो गया है। तुम व्रतके बहाने व्यर्थमें इतना क्लेश क्यों पाती हो? तुम कहती हो कि 'सौकरवक्षेत्रमें चलनेपर कहूँगी', इस विषयमें ऐसा क्या गोपनीय है, जिसे तुम कहना नहीं चाहती हो?'
अब राजकुमारी बड़े संकोचमें पड़ गयी। वह दुःखसे पीड़ित तो थी ही, उसने स्वामीके चरण पकड़ लिये और कहने लगी—'महाराज! आप मुझपर प्रसन्न हों, यह बात आप इस समय पूछ रहे हैं, यह ठीक नहीं। वीरवर! मेरा यह वृत्त जन्मान्तरीय कर्मोंसे सम्बद्ध है।' पत्नीकी बात सुनकर कलिङ्गदेशके उस नरेशने परम हित करनेके विचारसे उसके प्रति मधुर वचन कहा—'देवि! मेरे सामने यह कौन-सी गोपनीय बात है? तुम ठीक-ठीक बात बतला दो।' पतिकी बात सुनकर राजकुमारीकी आँखें आश्चर्यसे भर गयीं। वह मधुर वाणीमें बोली—'प्राणनाथ! शास्त्रोंके अनुसार स्त्रीके लिये स्वामी ही धर्म, अर्थ और सर्वस्व है। उसका पति ही परमात्मा है। अतएव आप जो मुझसे पूछ रहे हैं, वह मुझे अवश्य कहना चाहिये। फिर भी जो बात मेरे हृदयमें बैठ गयी है उसे कहनेमें मैं असमर्थ हूँ। पीड़ा पहुँचानेवाली मेरी यह बात आप मुझसे पूछें, यह उचित नहीं जान पड़ता। महाभाग! इस दुःखका मेरे शरीरसे दूर होना असम्भव-सा दीखता है। आप सुखमें सदा समय बिताते हैं, यह बड़ी अच्छी बात है। स्वामिन्! मेरे समान बहुत-सी स्त्रियाँ आपके अन्तःकरणमें हैं। जिन्हें आप विविध प्रकारके अन्न और उत्तम भूषण दिया करते हैं और वे आपकी सेवा करती हैं, फिर मुझसे आपका क्या तात्पर्य? राजन्! आप हाथी, रथ और घोड़ेपर यात्रा किया करते हैं, यह सब ठीक है। पर राजन्! इस विषयमें मुझसे आपको कुछ नहीं पूछना चाहिये। आप मेरे इष्ट देवता, गुरु एवं साक्षात् सनातन यज्ञपुरुष हैं। मानद! मेरे लिये आप धर्म, अर्थ, काम, यश और स्वर्ग सब कुछ हैं। आपके पूछनेपर मुझको चाहिये कि सदा सभी बातें सत्य एवं प्रिय कहूँ। क्योंकि सभी
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पतिव्रताओंके लिये यह सनातन धर्म है। तथापि मेरी बातोंपर निश्चित विचार करके मेरी पीड़ाके विषयमें आपको नहीं पूछना चाहिये।'
उस समय कलिङ्ग-नरेशको अपनी पत्नीकी पीड़ासे भीषण मानसिक संताप हो रहा था, अतएव उसने मधुर वाणीमें कहा—'देवि! मैं तुम्हारा पति हूँ, ऐसी स्थितिमें मेरे पूछनेपर तुम्हें शुभ हो या अशुभ उसे अवश्य बताना चाहिये। धर्मके मार्गपर चलनेवाली स्त्रीका कर्तव्य है कि वह गुप्त बात भी पतिके सामने प्रकट कर दे। जो स्त्री किसी राग या लोभसे मोहित होकर अपकर्म-कर उसे पतिसे छिपाती है तो विद्वत्समाज उसे सती नहीं कहता। यशस्विनि! ऐसा विचार करके तुम्हें मुझसे अपनी गुप्त बात भी अवश्य कहनी चाहिये। यदि इस गोपनीय बातको तुम मुझे बता देती हो तो तुम्हें अधर्मका भागी नहीं होना पड़ेगा।'
राजकुमारी बोली—'प्राणनाथ! राजा देवता, गुरु एवं ईश्वरके समान पूज्य हैं—आप मेरे पति भी हैं। महाराज! सुनिये! यद्यपि मेरा कार्य बहुत गुह्य नहीं है, तब भी मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ, स्वामिन्! अपने राज्यपर बड़े राजकुमारका अभिषेक कर दीजिये, यह नियम कुलके अनुसार है और आप मेरे साथ 'सौकरव (वराह)-क्षेत्र' में चलनेकी कृपा करें।'
पत्नीकी यह बात सुनकर कलिङ्ग-नरेशने सहर्ष उसका अनुमोदन कर दिया। अपने वाक्योंसे पत्नीको प्रसन्नकर उसने कहा—'सुन्दरि! तुम्हारे कथनानुसार मैं पुत्रको राज्यपर बैठा दूँगा। फिर वे दोनों रनिवाससे बाहर निकले। राजकुमारने कञ्चुकीको देखकर कहा—'द्वारपाल! तुम यहाँके सब लोगोंको सूचित कर दो। वे आकर यहाँ उपस्थित हों।
इसके बाद कलिङ्ग-नरेशने अपनी रुचिके अनुसार उस समय कुछ खाने योग्य अन्न-जल ग्रहण किया और आचमन करके कुछ समयतक विश्राम किया। फिर उन्होंने अपने पुत्रका अभिषेक करनेके लिये मन्त्रिमण्डलको बुलाया और आज्ञा दी—'सब लोग आचारके अनुसार माङ्गलिक कृत्य करके राजधानीका संस्कार करनेमें जुट जायें।' फिर कलिङ्ग-नरेशने अपने वृद्ध मन्त्रीसे कहा—'तात! कल मैं राज्यपर अपने पुत्रका विधिके अनुसार अभिषेक करना चाहता हूँ। उसकी आप शीघ्र तैयारी करें।' नरेशकी बात सुनकर मन्त्रियोंने कहा—'राजन्! सभी वस्तुएँ तैयार ही हैं। आप जो कह रहे हैं, वह हम सभीको पसंद है। महाराज! आपके ये राजकुमार सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें सदा संलग्न रहते हैं। प्रजापर प्रेम रखनेवाले, नीतिके पूर्ण जानकार, विचारशील और शूरवीर भी हैं। प्रभो! आपके मनमें जो अभिलाषा है, वह हमलोगोंको सम्यक् प्रकारसे प्रिय लगती है।' ऐसी बात कहकर मन्त्रीलोग अपने स्थानपर चले गये और भगवान् सूर्य अस्त हो गये। राजा और रानीने सुखपूर्वक शयन किया। रात आनन्दपूर्वक बीत गयी।
प्रातःकाल गन्धर्वों, वन्दीजनों, सूतों एवं मागधोंने अपने समुचित स्तुति-पाठसे राजाको जगाया। राजाने शुभ मुहूर्तका अवसर पाकर उस परम योग्य अपने कुमारका अभिषेक कर दिया। कलिङ्गनरेश धर्मका पूर्ण ज्ञाता था। राजगद्दीपर बैठानेके पश्चात् उसने राजकुमारका मस्तक सूंघा। साथ ही उससे यह मधुर वचन कहा—'बेटा! तुम पुत्रोंमें श्रेष्ठ हो। मैं तुम्हें राजधर्म बताता हूँ, वह सुनो—तात! यदि तुम चाहते हो कि मुझे परम धर्म प्राप्त हो जाय तथा मेरे पितर तर जायें तो तुम्हें धर्मात्मा पुरुषोंको किसी प्रकार क्लेश नहीं देना चाहिये। जो दूसरोंकी स्त्रियोंपर बुरी दृष्टि
अध्याय १३७ ] वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृगालका वृत्तान्त २४५
डालते हैं, बालकोंका वध करते हैं तथा स्त्रीकी हत्या करनेमें नहीं हिचकते, ऐसे व्यक्ति दण्डके पात्र हैं। कोई भी सुन्दर स्त्री सामने आ जाय तो तुम्हें आँखें मूँद लेनी (कुदृष्टि नहीं डालनी) चाहिये। दूसरोंके अर्जित धनके प्रति तुम्हें लोभ नहीं करना चाहिये और न अन्यायसे ही धन कमाना चाहिये। तुम्हें न्यायपूर्वक पूरी तैयारी तथा दक्षतासे अपने देशकी रक्षा करनी चाहिये। तुम सदा उद्योगशील होकर तत्पर रहना और मन्त्रियोंकी मन्त्रणाका पालन करना, वे जो बात बतायें, उन्हें विचारपूर्वक करना। अपने शरीरकी रक्षापर पूरा ध्यान देना है। बेटा! यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो तुम्हारे जिस व्यवहारसे प्रजा आनन्दसे रहे एवं ब्राह्मण जिससे संतुष्ट रहें, तुम्हें वही कर्म करना चाहिये। राजाओंके लिये सात प्रकारके महान् व्यसन कहे गये हैं—उनसे तुम्हें सदा दूर रहना चाहिये। तुम्हारी सम्पत्तिमें किसी प्रकार दोष आ जाय, ऐसा काम तुम्हें कभी भी नहीं करना चाहिये। राज्यकर्मके सम्बन्धमें अपने मन्त्रीसे तुम्हें किसी प्रकार अप्रिय वचन नहीं कहना चाहिये। मैं इस समय तीर्थमें जानेके लिये प्रस्तुत हूँ, तुमको मुझे रोकना नहीं चाहिये। पुत्र! यदि मुझे प्रसन्न करना चाहते हो तो इतना काम करनेके लिये शीघ्र उद्यत हो जाओ।'
पृथ्वीदेवि! उस समय पिताकी बात सुनकर राजकुमारने उनके पैर पकड़ लिये और उनसे करुणापूर्वक वचन कहना आरम्भ किया। राजकुमारने कहा—'पिताजी! आप यदि यहाँ नहीं रहेंगे तो राज्य, खजाना और सेनासे मुझे कोई प्रयोजन नहीं है। आपके बिना मैं जीवित नहीं रह सकता। भले ही आपने अभिषेक करके मुझे राजा बना दिया। पर पिताजी! मैं तो केवल बालकोंके खेल ही जानता हूँ। राजालोग जिस प्रकार राज्यकी व्यवस्था करते हैं, उन सभीसे तो मैं सर्वथा अनभिज्ञ हूँ।'
अपने पुत्रकी बात सुनकर राजाने उससे सामपूर्वक कहा—'पुत्र! तुम जो कहते हो कि 'मैं कुछ नहीं जानता' तो इस विषयमें तुम्हारे मन्त्री एवं नगरके रहनेवाले सत्पुरुष सब कुछ बता देंगे।' देवि! उस समय अपने पुत्रको इस प्रकारका उपदेश देकर कलिङ्गनरेश धर्मशास्त्रकी विधिके अनुसार 'सौकरव (वराह) क्षेत्र' में जानेके लिये तैयार हो गया। उसे वहाँ जाते देखकर वहाँके रहनेवाले लोग भी अपनी स्त्री तथा पुत्रोंके सहित सब-के-सब पीछे चल पड़े। इतना ही नहीं, अन्तःपुरकी स्त्रियाँ भी बड़ी प्रसन्नतासे हाथी, घोड़े, रथ आदि सवारियोंपर चढ़कर उसके पीछे-पीछे चल पड़ीं।
इस प्रकार वह कलिङ्गराज बहुत समयके पश्चात् 'सौकरव' तीर्थमें पहुँचा और वहाँ पहुँचकर धन-धान्यका यथोचित दान किया और इस प्रकार धर्म करते हुए धीरे-धीरे समय बीतता गया। इस प्रकार कुछ दिन बीत जानेके पश्चात् राजाने अपनी पत्नीसे यह मधुर वचन कहा—'सुन्दरि! आज मेरे जीवनके हजार वर्ष पूरे हो गये। अब मैंने तुमसे जो पूछा था, उस परम गोपनीय विषयको मुझे बताओ।' इसपर वह राजकुमारी राजाके दोनों चरणोंको पकड़कर बोली—'मानद! महाभाग! आप मुझसे जो बात पूछ रहे हैं, उसे तीन रातोंतक उपवास करनेके बाद आप सुननेकी कृपा करें।' उसने पत्नीकी बातका अनुमोदन किया और कहा—'कमलनयनि! तुम जैसी बात कहती हो, वह मुझे पसंद है। फिर स्नानकर तीन राततक नियमपूर्वक रहनेके लिये संकल्प किया। तदनन्तर तीन राततक नियमपूर्वक रहकर दम्पतीने स्नान किया और पवित्र रेशमी
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वस्त्र धारणकर अलंकारोंसे अपने शरीरको आभूषित किया तथा भगवान् विष्णुको प्रणाम किया। फिर राजकुमारीने अपने अलंकारोंको उतारकर मुझे (विष्णु-वराहको) अर्पण कर दिया तथा उस नरेशसे बोली—'नाथ! आइये! हम दोनों एकान्त स्थानपर चलें। आपके मनमें जिस गोपनीय बातको जाननेकी इच्छा है, उसे समझें।'
तत्पश्चात् कलिङ्गनरेश और काञ्ची-राजकुमारी एकान्त स्थानमें गये। फिर राजकुमारीने कहा—'राजन्! मैं पूर्वजन्ममें एक शृगाली थी, मेरा जन्म तिर्यक्-योनिमें हुआ था। मृगके भ्रमसे सोमदत्त नामक एक राजकुमारने बाण चलाया और मैं उससे बिंध गयी। मेरे सिरमें अब भी उस तीखे बाणके चिह्न (संस्कार) अवशेष हैं, आप इसे देखनेकी कृपा कीजिये। उसीके दोषसे मेरे सिरमें यह रोग सदा बना रहता है। काशीनरेशके कुलमें मेरा जन्म हुआ। फिर संयोग तथा अपने पिताजीकी कृपासे मैं आपकी पत्नी बन गयी हूँ। सौकरक्षेत्रके प्रभावसे मेरा ऐसा जन्म हुआ है और सिद्धि सुलभ हुई है। प्राणनाथ! आपको मेरा प्रणाम है।' यह कहकर फिर वह चुप हो गयी।
अब राजकुमारको भी अपने पूर्वजन्मकी स्मृति हो आयी। वह कहने लगा—'महाभागे! देखो, मैं भी पूर्वजन्ममें एक गीध था। उसी सोमदत्तने एक बाणद्वारा मुझे भी मार डाला था। इस तीर्थके परिणामस्वरूप मैं कलिङ्गदेशका राजा बना हूँ। मुझे बहुत कष्टका सामना करना पड़ता था। पर वही आज मैं महान् राज्यका अधिकारी बन गया था। सुशोभने! आज सिद्धि भी मेरे हाथमें आ गयी है। देखो, मेरे मनमें कोई भी संकल्प नहीं था, फिर भी सूकरक्षेत्रकी ऐसी महिमा है।'
वसुंधरे! इसके बाद वे दोनों दम्पती तथा वहाँ जो भी नगर-ग्रामनिवासी मेरे भक्त एवं प्रेमी उपस्थित थे, वे सभी यह प्रसङ्ग सुनकर हानि-लाभका विचार छोड़कर सर्वथा शुभ ध्यानमें संलग्न हो गये और वहीं प्राण त्यागकर आसक्तियोंसे शून्य होकर चतुर्भुज-रूप धारणकर शङ्ख, चक्रादि आयुधोंसे सज्जित होकर श्वेतद्वीप पहुँचे।
जो व्यक्ति इस प्रकार नियमके अनुसार इस तीर्थमें निवास करता है और उसकी वहाँ मृत्यु हो जाती है तो वह श्वेतद्वीपको अवश्य प्राप्त कर लेता है। वसुंधरे! यहीं एक आखेटक तीर्थ है। उसमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वह सुनो। यहाँ स्नान करनेवाले प्राणी नन्दनवनमें पहुँचकर ग्यारह हजार वर्षोंतक निरन्तर परमानन्दका उपभोग करते हैं। फिर जब वे स्वर्गसे च्युत होते हैं तो विशाल कुलमें उत्पन्न होकर मेरे भक्त होते हैं—इसमें कोई संशय नहीं। एक बात और, जो कोई मनुष्य यहाँके 'गृध्रवटनामक' तीर्थमें स्नान करता और संध्या, तर्पण आदि कर्म करता है, वह जो फल प्राप्त करता है, वह बतलाता हूँ। वह इस पुण्यके प्रभावसे नौ हजार नौ सौ वर्षोंतक इन्द्रलोकमें पहुँचकर देवताओंके साथ आनन्दका उपभोग करता है। फिर जब वह इन्द्रलोकसे च्युत होता है तो मेरे इस तीर्थके प्रभावसे वह मेरा भक्त बन जाता है और उसकी सारी आसक्तियाँ दूर हो जाती हैं।
भगवान् नारायणसे ऐसा सुनकर उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली देवी पृथ्वी समस्त लोकोंके स्वामी भगवान् जनार्दनसे मधुर वचनोंमें बोली—'देव! किस कर्मके फलस्वरूप प्राणीको यह तीर्थ प्राप्त होता है अथवा वहाँ स्नान करने और मरनेका कैसे संयोग प्राप्त होता है, इसे यथार्थरूपसे कहनेकी कृपा कीजिये।
भगवान् वराह कहते हैं—देवि! तुम महान्
अध्याय १३८ ] वराहक्षेत्रान्तर्वर्ती 'आदित्यतीर्थ' का प्रभाव [ २४७
भाग्यशालिनी हो। सुनो! जिन मनुष्योंने पूर्वजन्ममें सद्धर्मोंका पालन किया है, पर किसी बुरे कर्मके दोषसे पशुकी योनिमें जन्म पा जाते हैं, वे किन्हीं अन्य जन्मोंके उपार्जित पुण्यों तथा तीर्थ-स्नान, जप एवं महान् दान तथा देवार्चनोंके प्रभावसे ही भले तीर्थमें मरनेका संयोग प्राप्त करते हैं।
तीर्थोंके दर्शन एवं अवगाहन करनेके प्रभावसे पाप नष्ट हो जाते हैं। वस्तुतः धर्मानुमोदित इस वराहक्षेत्र-कर्मकी गति बड़ी गहन है। उसके प्रभावसे जो बहुत छोटा-सा दीखता है, वह बहुत बड़ा बननेकी शक्ति प्राप्त कर लेता है और उसे अद्भुत पुण्यकी प्राप्ति होती है। इसीसे उस शृगाली एवं गीधको मनुष्ययोनि एवं साम्राज्यकी प्राप्ति हुई थी और उन्हें जन्मान्तरकी भी स्मृति बनी रही। यह सब इस तीर्थका ही प्रभाव है और अन्तमें वे श्वेतद्वीपको प्राप्त हुए।
देवि! अब अन्य तीर्थकी बात बतलाता हूँ, उसे सुनो। यहाँ एक 'वैवस्वत' नामका तीर्थ है, जहाँ पुत्रकी कामनासे कभी सूर्यदेवने कठोर तपस्या की थी और बादमें उन्होंने वहाँ दस हजार वर्षोंतक निरन्तर चान्द्रायण-व्रत भी किया था, फिर सात हजार वर्षोंतक वे मात्र वायुके आहारपर रहे। भद्रे! तब मैं उनपर संतुष्ट हुआ और उनसे वर माँगनेके लिये कहा। इसपर उन्होंने कहा—'भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे एक पुत्र प्रदान करनेकी कृपा कीजिये।
फिर मेरे वरदानसे 'यम' और 'यमुना' नामकी उन्हें दो जुड़वीं संतानें हुईं। तबसे 'सौकरव' क्षेत्रके अन्तर्गतका यह तीर्थ 'वैवस्वततीर्थ' नामसे प्रसिद्ध हुआ। वसुंधरे! जो मनुष्य वहाँ जाकर दिनके आठवें भागमें अर्थात् सूर्यास्तके कुछ पूर्व स्नानकर भोजन करता है, वह दस हजार वर्षोंतक सूर्यके लोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। यदि किसी प्राणीकी वहाँ अनायास मृत्यु हो जाती है तो वह इस तीर्थके प्रभावसे यमपुरीमें नहीं जाता। भद्रे! इस 'सौकरव' तीर्थ (वराहक्षेत्र)-में स्नान करने और मरनेका फल तथा वहाँकी घटनाएँ मैंने तुम्हें बतला दीं। यह आख्यान भी आख्यानोंमें महान् तथा पवित्रोंमें परम पवित्र 'आख्यान' है तथा यह सौकरव-तीर्थोंमें परम श्रेष्ठ तीर्थ है। यहाँ संध्योपासन तथा जप-तप-अनुष्ठानके फल परम उत्तम हैं। यह परम तेज एवं सभी भागवत पुरुषोंका परम प्रिय रहस्य है। जिसे दूसरोंकी निन्दा करनेका स्वभाव है एवं जो अज्ञानी हैं, उनके सामने इसका उपदेश नहीं करना चाहिये। जिनकी भगवान्में श्रद्धा है, जो वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं, जिन्होंने दीक्षा ले रखी है, जो सम्पूर्ण शास्त्रोंको जानते हैं, उन्हीं लोगोंके सामने यह दिव्य प्रसङ्ग सुनाना चाहिये। यह सौकरव-क्षेत्रमें प्राप्त होनेवाला महान् पुण्य तुमसे बतला दिया। पृथ्वि! जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, उसने मानो बारह वर्षोंतक मेरा ध्यान कर लिया, इसमें कोई संदेह नहीं है, उसे शाश्वत मुक्ति सुलभ हो जाती है। जो इसके केवल एक अध्यायका भी पाठ कर लेता है, वह अपने दस कुलोंको तार देता है। [अध्याय १३७]
वराहक्षेत्रान्तर्वर्ती 'आदित्यतीर्थ' का प्रभाव (खञ्जरीटकी कथा)
सूतजी कहते हैं—भगवान् वराहके मुखारविन्दसे वराहक्षेत्रकी महिमा, गुणस्तुति और जात्यन्तर-परिवर्तनकी शक्ति सुनकर पृथ्वीदेवीका हृदय आश्चर्यसे भर गया, अतः उन्होंने भगवान् नारायणसे कहा—प्रभो! 'वराहक्षेत्र' में मरा हुआ प्राणी न चाहनेपर भी मनुष्य-जन्म पानेका अधिकारी
११८- कोकामुख-बदरी-क्षेत्रका माहात्म्य
| २४८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १३८ |
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हो जाता है; अतः निःसंदेह यह क्षेत्र बहुत पवित्र है। प्रभो! अब आप वहाँका कोई दूसरा प्रसङ्ग बतानेकी कृपा कीजिये। देवेश्वर! मैं यह जानना चाहती हूँ कि शास्त्रोंमें वहाँ गायन-वादन करने, नृत्य एवं जागरण करने, गोदान, अन्नदान और जलदान करने, सम्यक् प्रकारसे स्नान करने अथवा गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदिसे आपकी पूजा करनेका क्या फल होता है? जप और यज्ञ आदि अन्य कर्म करनेसे शुद्ध मनवाले प्राणी वहाँ किस गतिको प्राप्त करते हैं? भगवन्! आप अपने भक्तको सुख पहुँचानेके विचारसे यह सब प्रसङ्ग बतलानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् वराह बोले—देवि! यह कथा अत्यन्त पुण्यप्रद एवं सुख देनेवाली है। पहले इसी सौकरव-क्षेत्रमें एक खञ्जरीट* (खञ्जन, खंडरिच, wagtail) पक्षी रहता था। उसने एक बार बहुत-से कीड़ोंको खा लिया, फलतः वह अजीर्णसे अत्यन्त पीड़ित होकर मरणासन्न हो गया और इस 'सूकरक्षेत्र' में ही गिर पड़ा। इतनेमें ही बहुत-से बालक इधर-उधरसे दौड़ते एवं खेलते हुए वहाँ पहुँचे और उस शिथिलगात्र पक्षीको देखकर कहने लगे—'हमलोग इसे पकड़ेंगे।' फिर उनमें परस्पर विवाद छिड़ गया, कोई कहता 'यह मेरा है' और कोई कहता कि 'मेरा।' इस प्रकार खेल-खेलमें ही उनमें झगड़ा होने लग गया और महान् कलह-कोलाहल मच गया। तबतक एक बालकने उसे उठाकर गङ्गाके जलमें फेंक दिया, साथ ही कहा—'भाई! यह तुम्हीं लोगोंका है, इससे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है।'
वसुंधरे! इस प्रकार वह मृत खञ्जरीट (खंडरिच) पक्षी गङ्गाके जलसे भलीभाँति भीग गया। जहाँ वह गङ्गामें पड़ा था, वह 'आदित्यतीर्थ' था। फिर तो वह उस तीर्थके प्रभावसे अनेक उत्तम यज्ञ करनेवाले धन एवं रत्नसे परिपूर्ण किसी वैश्यके घरमें उत्पन्न हुआ। वसुंधरे! वह रूपवान्, गुणवान्, विवेकी, पवित्र तथा मुझमें भक्ति रखनेवाला पुरुष हुआ।
सुव्रते! इस प्रकार उस बालकके बारह वर्ष बीत गये। एक बार जब माता और पिता सुखसे बैठे हुए थे, उनपर उस गुणी बालककी दृष्टि पड़ी। उसने पृथ्वीपर सिर रखकर उन्हें प्रणाम करके कहा—'पिताजी! यदि आपलोग मेरा प्रिय करना चाहते हों तो मुझे एक वर देनेकी कृपा करें। मेरी प्रार्थना यह है कि आप दोनों मेरे मनोरथमें किसी प्रकारकी बाधा न डालें। पिताजी! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, आप मेरे गुरु हैं, जैसा आप कहेंगे वही होगा।'
देवि! अपने पुत्रकी यह बात सुनकर दम्पती हर्षसे भर गये और उन्होंने सुन्दर नेत्रोंवाले बालकसे यह बात कही—'पुत्र! तुम जो-जो कहोगे और जो कुछ तुम्हारे हृदयमें बात हो, हमलोग वह सब कर देंगे। बस, अब तुम विश्वासपूर्वक बोलो। पुत्र! हमारी तीन हजार गायें हैं, जो सभी खूब दूध देती हैं। तुम जिसे चाहो, उसे इन्हें दे सकते हो, इसमें लेशमात्र विचारनेकी आवश्यकता नहीं है। यदि तुम चाहो तो हमारा व्यापारका काम बहुत विख्यात है, उसका भी सारा अधिकार तुम्हें सौंप दूँ। तुम न्यायपूर्वक उसकी व्यवस्था करो अथवा मित्रोंको धन बाँट दो। पुत्र! तुम धन-धान्य, रत्न आदि जिसे जो भी चाहो, उसे दे सकते हो, इसमें कोई भी प्रतिबन्ध नहीं है। हम अच्छे कुल तथा जातिमें उत्पन्न
* इसे 'ममोला' या 'धोबिन'-चिड़िया भी कहते हैं। गोस्वामीजीने 'कृष्णगीतावली' २२।२ के 'मनहुँ इन्दुपर 'खंजरीट' दोऊ कछुक करुन विधि रचे सँवारी'—पदम 'खञ्जरीट' का तथा मानस २।१९६।७, ३।२९।१० और ४।१५।६ तथा 'विनयपत्रिका' १५।२ आदिमें 'खंजन' शब्दका प्रयोग किया है।
अध्याय १३८ ] वराहक्षेत्रान्तर्वर्ती 'आदित्यतीर्थ' का प्रभाव २४९
बहुत-सी सुन्दरी भली कन्याओंको भी विवाह-विधिके द्वारा तुम्हें प्राप्त करा सकते हैं। सौम्य! यदि तुम्हारे मनमें जैसे पूर्वके वैश्यलोग वेदमें कहे हुए विधानके अनुसार यज्ञ करते थे—वैसे यज्ञकी इच्छा हो तो तुम उसे भी कर सकते हो। वैश्यका कर्म खेती है। इसके लिये आठ-आठ बलवान् बैलोंद्वारा चलनेवाले एक सौ हल भी हमारे पास हैं। फिर तुम और क्या पाना चाहते हो? जितने ब्राह्मणोंको भोजन कराकर तुम तृप्त करना चाहते हो, यह कार्य तथा अन्य कुछ कार्य भी जैसे चाहो, वह सब स्वेच्छानुसार सम्पन्न कर सकते हो।'
वसुंधरे! अपने माता-पिताकी बात सुनकर उस धर्मात्मा बालकने उनके चरण पकड़ लिये और उनसे कहने लगा—गोदानसे इस समय मेरा कोई प्रयोजन नहीं है, न मित्रोंके विषयमें ही मुझे कोई चिन्ता है। मुझे विवाह या यज्ञके फल भी अभीष्ट नहीं हैं। मैं व्यापारका काम करूँ, खेती और गोरक्षामें मेरा समय व्यतीत हो अथवा सम्पूर्ण अतिथियोंका सत्कार करूँ—इन बातोंके लिये भी मेरे हृदयमें कोई आसक्ति नहीं। पिताजी! मेरे मनमें तो बस, भगवान् नारायणके क्षेत्र 'सौकरव' (वराहक्षेत्र)-की ही एक प्रगाढ़ चिन्ता है।
देवि! बालकके माता-पिता दोनों ही मेरे उपासक थे, उन्होंने पुत्रकी यह बात सुनी तो वे दोनों ही दुःखमें भरकर करुण विलाप करने लग गये और कहने लगे (माता कहती है)—'बेटा! अभी तुम्हें जनमे केवल बारह वर्ष ही बीते हैं, वत्स! भगवान् नारायणकी शरणमें जानेकी चिन्ता तुम्हें अभीसे कैसे हो गयी? जिस समय तुम्हें उसके योग्य आयु प्राप्त होगी, तब उस विषयमें विचार करना। अभी तो मैं भोजन लेकर तुम्हारे पीछे-पीछे दौड़ती चलती हूँ। पुत्र! तुम 'सौकरव' (वराहक्षेत्र)-में जानेकी बात अभी क्यों सोचते हो? तुम तो अभी दुधमुँहे बच्चे हो। मेरे स्तन धन्य हैं, जिससे सदा दूध स्रवित होता है (और तुम उसे पीते हो)। बेटा! तुमने अपने स्पर्शसुखकी आशा लगानेवाली मुझ माँके प्रति यह क्या सोचा? जब तुम रातमें सोकर करवटें बदलते हो तो उस समय अब भी मुझे 'माँ-माँ' कहकर पुकारते हो। फिर (वराहक्षेत्र जाने तथा नारायणके आश्रमकी) इस प्रकारकी बातें क्यों सोचते हो? तुम जब खेलते हो तो अन्य स्त्रियाँ भी बड़े स्नेहसे तुम्हारा स्पर्श करती हैं। वत्स! किसीने भी कहीं खेलमें, घरपर अथवा अपने परिजनमें तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया, नौकरोंने तुम्हें कोई कटु वचन नहीं कहे। तुम्हें डरवानेके लिये भी मैंने कभी अपने हाथमें छड़ी नहीं ली। फिर पुत्र! तुम्हारे इस निर्वेद (वैराग्य)-का कारण क्या है?'
वसुंधे! माताकी यह बात सुनकर उस बालकने उससे मधुर वचनोंमें कहा—'माँ! मैं तुम्हारे गर्भमें रह चुका हूँ, तुम्हारे उदरसे ही मेरा जन्म हुआ है, तुम्हारी गोदमें खेला हूँ, प्रेमसे मैंने तुम्हारे स्तनोंका पान किया है। धूल लगे हुए शरीरसे तुम्हारी गोदमें बैठा हूँ। मातः! तुम मुझपर जो इतनी करुणा करती हो, यह तुम्हारे लिये उचित ही है, किंतु मेरी पूजनीया माँ! तुम अब पुत्र-सम्बन्धी मोहका परित्याग करो। यह संसार एक घोर महा-सागरके समान है। यहाँ प्राणी आते हैं और चले जाते हैं, कुछ लोग तो चले गये और कुछ लोग जा रहे हैं। कोई जीव दीखता है, फिर वह नष्ट हो जाता है और आगे कभी दिखायी नहीं पड़ता। इस प्रकार कौन किससे जनमा, कहाँ उसका सम्बन्ध हुआ, किसकी कौन माता हुई और कौन किसका पिता हुआ, इसका कोई ठिकाना नहीं।
२५० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १३८
हजारों माता-पिता, सैकड़ों पुत्र और स्त्रियाँ प्रत्येक जन्ममें आते-जाते रहते हैं। फिर वे किस-किसके हुए या हम ही किसके रहे? अतः माँ! इस प्रकारकी चिन्तामें पड़कर तुम्हें कभी भी सोच नहीं करना चाहिये।' पुत्रकी इस प्रकारकी बातें सुनकर माता और पिताको बड़ा आश्चर्य हुआ, अतः वे फिर बोले—'बेटा! अहो! यह तो बड़ी मार्मिक बात है। पुत्र! इसका रहस्य बतलाओ।' उनकी यह बात सुनकर वह वैश्यकुमार मधुर वाणीमें अपने माता-पितासे कहने लगा—'पूज्यवरो! यदि इस गुह्य बातको सुनकर और विचारकर आप कुछ कहना चाहते हैं तो आपको 'वराहक्षेत्र' का रहस्य पूछना चाहिये और उसे सुननेके लिये 'सौकरवक्षेत्र' में ही पधारनेकी कृपा कीजिये और वहीं यह गुह्य विषय आपलोगोंको पूछना समुचित होगा। वहीं मैं अपनी भी एक आश्चर्यकारी बात बतलाऊँगा। पिताजी! 'सौकरवक्षेत्र'में एक 'सूर्य' तीर्थ है। वहाँ पहुँच जानेपर यह बात बतलाऊँगा।' इसपर दम्पतीने पुत्रसे कहा—'बहुत अच्छा।'
फिर उस बालकके माता-पिता दोनोंने सौकरवतीर्थमें जानेका संकल्प किया। उन्होंने सब प्रकारके द्रव्य साथमें लिये और 'सौकरवतीर्थ'के लिये चल पड़े। कमलपत्रके समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाले उस वैश्योंके नेताने अपने जानेके पहले बीस हजार गायोंको ही सबसे आगे हँकवाया, फिर उसके सभी परिजन द्रव्योंसहित प्रस्थित हुए। उनके घरमें जो कुछ था, सब कुछ उन्होंने भगवान् नारायणको समर्पित कर दिया। फिर माघमासकी त्रयोदशी तिथिके दिन पूर्वाह्न-कालमें अपने सभी स्वजनों और सम्बन्धियोंको बुलाकर विधिपूर्वक शुभ मुहूर्तमें उसने स्वयं भी यात्रा कर दी। 'भगवान् नारायणका दर्शन होगा' इससे उनके मनमें बड़ा हर्ष था। श्रीहरिके प्रेममें प्रवाहित वे सभी लोग बहुत समयके पश्चात् वैशाखमासकी द्वादशी तिथिके दिन मेरे क्षेत्रमें आ गये। वहाँ पहुँचनेपर सभीने विधिपूर्वक स्नानकर पितरोंका तर्पण किया। उस वैश्यने दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित बीस हजार गौओंको साथ ले लिया था और उन्हें भाङ्गुरस नामक व्यक्तिको सौंपकर आगे प्रस्तुत कर रखा था। उनमेंसे बीस गायोंको वहीं दान कर दिया। इसी प्रकार वह प्रतिदिन बहुत-से धन और रत्न दानमें बाँटने लगा।
इस प्रकार अपने स्त्री-पुत्र और स्वजनोंके साथ उसके वहाँ रहते-रहते सभी (सस्य—) धान्य-पौधोंको संवर्धन और पालन करनेवाली 'वर्षा-ऋतु' आ गयी, जिससे कदम्ब, कुटज (कौरैया) और अर्जुन नामके वृक्ष पुष्पित हो गये। नदियोंके गर्जन, मोरोंके मधुर स्वर, कौरैया, अर्जुन और कदम्ब आदि वृक्षोंकी सुखद गन्ध और भौरोंका गुञ्जन, पवनका प्रवाह—यह सब उस ऋतुकी विशेषता थी। फिर शरद् ऋतुका प्रवेश हुआ और अगस्त्य-नक्षत्रका उदय हुआ। तड़ागोंके जलमें स्वच्छता आ गयी और उनमें कमल, कुमुद आदि पुष्प खिल गये। अन्य सुरम्य कमल-फूलोंसे भी सर्वत्र शोभाकी वृद्धि होने लगी। अब शीतल, सुगन्ध एवं परम सुखदायी वायु बहने लगी। फिर धीरे-धीरे यह ऋतु भी समास हो चली और कार्तिक महीनेके शुक्ल-पक्षकी एकादशी तिथि आयी। सुभ्रु! उस समय उस वैश्य दम्पतीने स्नानकर, रेशमी वस्त्र धारण किया और अपने पुत्रसे कहा—'पुत्र! हमलोग यहाँ छः महीने सुखपूर्वक रह चुके। आज द्वादशी तिथि आ गयी है, अब वह गोपनीय बात हमलोगोंको तुम क्यों नहीं बताते, जिसे तुमने यहाँ आकर बतानेको कहा था?'
देवि! अपने माता-पिताकी बात सुनकर उस धर्मात्मा पुत्रने उनसे मधुर वचनोंमें कहा—'महाभाग! आपने जो बात पूछी है, वह प्रसङ्ग