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वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ
स्नानं कृत्वा यथान्यायं कृत्याभ्यर्च्य विधानतः ।
मदीयं प्रवरं लोकमनन्तमधिगच्छति ॥ ८८ ॥
अधौताम्बरसंवीतः केशवेशं विमुच्य च ।
अकृत्वा पादशौचं च आचान्तोऽप्याचमन्त्यजेत् ॥ ८९ ॥
न स्वापयेन्न चोत्थापयेन्न च पञ्चामृतैः स्नापयेत् ।
न च मन्त्रैरुपहरेन्नोपचारैरुपाचरेत् ॥ ९० ॥
प्रणमेन्न च मां मूढः स्तवैर्वा नोपतिष्ठते ।
एवंविधस्तु मां मुक्त्वा याति घोरं यमक्षयम् ॥ ९१ ॥
यस्तु मत्कर्मनिरतो यत्नवान् वैष्णवो द्विजः ।
नित्यं कुर्याद्यथान्यायं मद्भावगतमानसः ॥ ९२ ॥
स मां प्राप्नोति तं दृष्ट्वा सर्वमङ्गलमङ्गले ।
प्रसीदामि वरारोहे ! सुदुर्लभतमो ह्यहम् ॥ ९३ ॥
अस्पृश्यस्पर्शनाच्छूद्रस्पर्शनाद्वा न संशयेत् ।
गौडं पापरसं यत्तु सुरापानसमं भवेत् ॥ ९४ ॥
यदा पतति वै भूमौ मद्रूपे भक्तितः शिवे ।
गोमूत्रेण तु तद् द्रव्य

अध्याय २११-२१२] पाप-नाशके उपायका वर्णन ३८३

मुक्ति—ये दोनों सुलभ हो जाती हैं। मुनिवर! वह भगवान् विष्णुके व्यक्त और अव्यक्त रूपकी मूर्ति है, जो मर्त्यलोकमें आयी है। इसकी उपासना करनेवालेके करोड़ों जन्मोंके अशुभ नष्ट हो जाते हैं। प्राचीन समयकी बात है—भगवान् श्रीहरि वराहके रूपमें पधारे थे। ऐसे अवसरपर सम्पूर्ण संसारके कल्याणके विचारसे पृथ्वीदेवीने एकादशीको ही हृदयमें रखकर पूछा था।

धरणीने कहा—प्रभो! यह कलियुग प्रायः सभीके लिये भयानक है। इसमें मनुष्य सदा पापमें ही संलग्न रहते हैं। गुरु, ब्राह्मणका धन हड़प लेना और उनका वधतक लोगोंके लिये साधारण-सी बात हो जाती है। भगवन्! कलियुगके लोग गुरु, मित्र और स्वामीके प्रति वैर रखनेमें तत्पर रहते हैं। परायी स्त्रीसे अनुचित सम्बन्ध करनेमें भी वे लोक-परलोकका भय नहीं करते। सुरेश्वर! दूसरेकी सम्पत्तिपर अधिकार जमाना, अभक्ष्य-भक्षण कर लेना तथा देवता एवं ब्राह्मणकी निन्दा करना उनका स्वभाव बन जाता है। प्रायः कलियुगके लोग दाम्भिक एवं मर्यादाहीन होते हैं। कुछ लोग तो अनीश्वरवादीतक बन जाते हैं। इसमें मनुष्य निन्दित दान लेने और अगम्यागमनमें रुचि रखनेवाले होते हैं। विभो! वे ये तथा इनके अतिरिक्त भी अनेक पाप करते हैं, उनका श्रेय कैसे हो?

भगवान् वराहने उत्तर दिया—भगवान् विष्णु-की सर्वोत्कृष्ट शक्तिने कलियुगके नाना प्रकारके घोर पापोंमें रत मनुष्योंके कल्याणके लिये ही एकादशीका रूप धारण किया था। इसलिये सभी मासोंके दोनों पक्षोंकी एकादशीको व्रत करना चाहिये। इससे मुक्ति सुलभ होती है। एकादशीके दिन अन्न नहीं खाना चाहिये। पूर्णरूपसे उपवासकर व्रत रहना चाहिये। यदि विशेष कारणसे पूर्ण उपवास सम्भव न हो तो नक्तव्रत करे। मनुष्यको प्रबोधिनी एकादशीका व्रत तो अवश्य ही करना चाहिये। सोम-मङ्गलवार तथा पूर्व एवं उत्तर-भाद्रपद नक्षत्रोंके योगमें इस एकादशीका महत्त्व करोड़ गुना बढ़ जाता है। उस दिन स्वर्णकी प्रतिमा बनवाकर भगवान् विष्णुकी तथा उनके दस अवतारोंकी भी विधिवत् पूजा करनेका विधान है। प्रबोधिनीकी महिमा हजारों मुखसे नहीं कही जा सकती। हजारों जन्मकी शिवोपासनासे प्राप्त होनेवाली वैष्णवता विश्वमें सर्वाधिक दुर्लभ वस्तु है, अतएव विद्वान् पुरुष प्रयत्नपूर्वक विष्णुभक्त बननेकी चेष्टा करे*। इसके पाठसे दुःस्वप्न एवं सभी भय नष्ट हो जाते हैं।

यमराजने कहा—'मुने! उत्तम व्रतके पालनमें सदा तत्पर रहनेवाली महाभागा धरणीने जब भगवान् वराहकी यह बात सुनी तो वे जगत्प्रभुकी विधिवत् आराधना करके उनमें लीन हो गयीं।'

नारदजी कहते हैं—'धर्मराज! आप सम्पूर्ण धर्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हैं। आपने जो यह दिव्य कथा कही है, यह धर्मसे ओतप्रोत है। अतः मैं भी आपद्वारा निर्दिष्ट धर्ममार्गकी व्याख्यासे संतुष्ट हो गया। अब मैं यथाशीघ्र उन लोकोंमें जाना चाहता हूँ, जहाँ मेरे मनमें आनन्दकी अनुभूति होती है। महाराज! आपका कल्याण हो।'


दक्षिणावर्तशङ्खेन कृत्वा चैव करे जलम्। शिरसा तद् गृहीत्वा तु विप्रो हृष्टमनाः शुचिः॥
तस्य जन्मकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति। प्राक्स्रोतसं नदीं गत्वा नाभिमात्रजले स्थितः॥
स्नात्वा कृष्णतिलैर्मिश्रा दद्यात् सप्ताञ्जलीन्नरः। प्राणायामत्रयं कृत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः॥
यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति। अच्छिद्रपद्मपत्रेण सर्वरत्नोदकेन तु॥
त्रिधा यस्तु नरः स्नायात् सर्वपापैः प्रमुच्यते। (२११।८—११, १३, १८)

* दुर्लभं वैष्णवत्वं हि त्रिषु लोकेषु सुन्दरि। जन्मान्तरसहस्रेषु समाराध्य वृषध्वजम्॥
वैष्णवत्वं लभेत् कश्चित् सर्वपापक्षये सति। (२११।८७-८८)

१६८- गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन

३८४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१३

नचिकेता कहते हैं—विप्रो! इस प्रकार कहकर मुनिवर नारदने यमलोकसे प्रस्थान किया। वे मुनिवर अपनी इच्छाके अनुसार सर्वत्र विचरनेमें समर्थ हैं। जाते समय आकाश उनके तेजसे प्रकाशित हो गया, मानो वे दूसरे सूर्य हों। धर्मराज धर्मपर विशेष आस्था रखते हैं। मुनिके जानेके बाद उन्होंने फिर बड़ी प्रसन्नतासे मुझे प्रणाम किया और आदर-सत्कारपूर्वक यह प्रिय वचन कहा—'सुव्रत! अब आप भी यहाँसे पधार सकते हैं।' उस समय शक्तिशाली धर्मराजकी अन्तरात्मा प्रसन्नतासे भर चुकी थी। विप्रो! मैंने भी उन धर्मराजकी उत्तम पुरीमें देखी-सुनी अपनी जानकारीकी सभी बातें आपलोगोंको सुना दी।

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! वे सभी ब्राह्मण तपको अपना धन मानते थे। नचिकेताकी इन बातोंको सुनकर उनके मनमें प्रसन्नता छा गयी और उनकी आँखें आश्चर्यसे भर गयी थीं। उनमें कुछ मुनि तथा विप्र ऐसे थे, जिनकी देशान्तर-भ्रमणमें विशेष रुचि थी। ऐसे ही अन्य ब्राह्मण वनमें निवास करनेके विचारसे आये थे। कुछ ब्राह्मण शालीन (यायावर) एवं कपोती वृत्तिके समर्थक थे। कितने ऐसे ब्राह्मण थे, जिनके मुखसे यह शुभ वाणी निकलती रहती थी कि सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करना कल्याणकर है। वे सभी बार-बार नचिकेताको धन्यवाद दे रहे थे। उनमेंसे कुछ ब्राह्मण शिल एवं उञ्छ^* वृत्तिवाले थे, कुछ महान् तेजस्वी ब्राह्मणोंने काष्ठवृत्तिको अपनाया था। सबकी विधियाँ भिन्न-भिन्न थीं। कुछ लोग सदा आत्म-चिन्तनमें व्यस्त रहते थे। कितने विप्रोंने मौनव्रत तथा जलाशय-व्रतको धारण कर लिया था। कुछ लोग ऊपर मुख करके सोते थे तथा कुछ ब्राह्मणोंका मृगके समान इधर-उधर स्वच्छन्द विचरण करनेका नियम था। कितने ब्राह्मण पञ्चाग्नि-व्रती तथा कुछ ब्राह्मण केवल पत्तेके आहारपर रहते थे। कुछ ब्राह्मणोंकी जीवन-यात्रा केवल जल अथवा कितनोंकी वायुपर अवलम्बित थी। कुछ लोग शाक खाकर रहते थे। इनके अतिरिक्त कुछ लोग घोर तपस्वी एवं ज्ञानयोगी थे। उनका यह कथन था कि जन्म लेने और मरनेके अतिरिक्त संसारमें अन्य कुछ बात नहीं है—वे ही बार-बार इसे दुहराते थे। उनके मनमें संसारसे सदा भय बना रहता था। अतः सावधान होकर उक्त नियमोंका सदा पालन करते थे। उद्दालक-कुमार नचिकेतामें भी धर्मकी प्रबलता थी। इन तपस्वी व्यक्तियोंको देखकर उनके मनमें अपार हर्ष हुआ और फिर उनके द्वारा सदा धर्मका चिन्तन होने लगा। मनका विषय अमित वेदार्थ, शुद्धस्वरूप श्रीहरि तथा चिन्मय भगवद्विग्रह रह गया। फिर तो धर्मात्मा नचिकेता सावधान होकर शुद्ध तपस्याके मार्गपर ही आरूढ़ हो गये।

राजन्! इस उत्तम उपाख्यानके प्रभावसे भगवान्‌में श्रद्धा उत्पन्न होती है। इसे जो सुनेगा अथवा सुनायेगा, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जायँगी।

[अध्याय २११-२१२]


गोकर्णेश्वरका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—ऋषियो! प्राचीन समयकी बात है, जब 'तारकामय' नामक घोर देवासुर-संग्राम हुआ था। उस उग्र युद्धमें देवता और दानव—दोनोंकी सेनामें एक-से-एक शूरवीर थे। युद्धके अन्तमें देवताओंने दानवोंकी सेनाको परास्त कर दिया था और इन्द्र फिरसे स्वर्गके सिंहासनपर प्रतिष्ठित हो गये। तीनों लोकोंके चर-अचर प्राणियोंमें सुख-शान्ति व्याप्त हो गयी। उन्हीं दिनों पर्वतराज मेरुके एक सुवर्णमय शिखरपर जिसकी विविध रत्न सब ओरसे शोभा बढ़ा रहे थे और कहीं-कहीं विद्रुममणिकी खान भी थी, एक विशाल कमल दिव्य आसनके रूपमें आस्तृत था। उस आसनपर


^* फसल कटनेके बाद पृथ्वीपरसे अन्न चुनकर जीविका चलाना 'शिल' एवं 'उच्छ' वृत्ति है।

अध्याय २१३ ] गोकर्णेश्वरका माहात्म्य [ ३८५

ब्रह्माजी चित्तको एकाग्र करके सुखपूर्वक बैठे थे। एक दिन सनत्कुमारजी वहाँ आये और आते ही उन्होंने पितामहको प्रणाम किया और 'गोकर्ण' के सम्बन्धमें इस प्रकार पूछा।

सनत्कुमारजीने पूछा—भगवन्! तत्त्वके जाननेवाले पुरुषोंमें आप शिरोमणि हैं। महाभाग! मैं आपके श्रीमुखसे ऋषियोंद्वारा कथित पुराण सुनना चाहता हूँ। विभो! उत्तर-गोकर्ण, दक्षिण-गोकर्ण* और शृङ्गेश्वर—ये तीन शिवलिङ्ग परम उत्तम बताये जाते हैं। इनकी कैसे और क्यों प्रतिष्ठा हुई है? भगवान् शंकर मृगका रूप धारण करके वहाँ क्यों विराजते हैं? प्रमुख देवता लोग वहाँ कैसे निवास करते हैं? शंकरके मृगरूप होनेका क्या कारण है? तथा उनके विग्रहकी प्रतिष्ठा किस समय हुई है?

ब्रह्माजी बोले—वत्स! यह पुराण एक रहस्यपूर्ण विषय है। मैंने जैसा सुना है, उसके अनुसार यथार्थ तुम्हें सुनाता हूँ, सुनो। गिरिराज मन्दराचलके परम पवित्र उत्तर भागमें 'मुञ्जवान्' नामसे प्रसिद्ध एक शिखर है, जिसकी शोभाको नन्दन नामक उपवन बढ़ाता रहता है। वहाँके साधारण पत्थर भी हीरा एवं स्फटिकमणिके समान हैं और कुछ (मूँगेके सदृश) लाल बालुकाओंसे सुशोभित हैं, कुछ अन्य शिलाखण्ड नीले और कुछ स्वच्छ भी हैं। वहाँ स्थान-स्थानपर श्रेष्ठ गुफाएँ तथा पानीके झरने हैं। उस पर्वतराजके सभी शिखर विचित्र फूलोंसे भरे हैं। विविध फूल-फलोंसे लदे उस शिखरकी शोभा अत्यन्त मनोमोहक है। वहाँ देवतागण अपनी स्त्रियोंके साथ विहार करते रहते हैं। डालियोंपर कूजनेवाले मतवाले पक्षी उस पर्वत-प्रवरको मुखरित एवं सुशोभित करते रहते हैं। वहाँ उपवनोंमें कहीं कचनार फूले हैं, कहीं हंस और सारस घूम रहे हैं। कहीं विकसित कमलोंवाले तालाब, जिनमें निर्मल जल भरा है, उसकी शोभा बढ़ाते रहते हैं। पशु-पक्षी-नदियोंसे सनाथ और अत्यन्त शोभाशाली उद्यानवाला वह स्थान तपस्याके लिये सर्वथा उपयुक्त है। उसे 'धर्मारण्य' कहते हैं। वहीं भगवान् 'स्थाणु महेश्वर' का स्थान है। वे प्रभु सम्पूर्ण सुरगणोंके गुरु हैं। भक्तोंपर सदा कृपा करनेवाले उन शक्तिशाली प्रभुके साथ गिरिराज-कन्या गौरी निरन्तर विराजती हैं। अपने पार्षदों और स्वामी कार्तिकेयके साथ उनका उस श्रेष्ठ पर्वतपर आसन लगा रहता है। वे देवेश्वर अजन्मा, अविनाशी और परम पूज्य हैं। उनकी सेवा करनेके विचारसे बहुतसे देवता विमानपर चढ़कर वहाँ आते हैं।

त्रेतायुगकी बात है। नन्दी नामसे विख्यात एक महान् मुनि भगवान् शंकरकी आराधना करनेकी अभिलाषासे वहाँ आकर तीव्र एवं कठिन तपस्या करने लगे। वे गरमीके दिनोंमें पञ्चाग्नि तापते और जाड़ेकी ऋतुमें पानीमें खड़ा रहकर तप करते थे। वे बिना किसी अवलम्बके खड़े होकर ऊपर हाथ उठाये तपस्या करते थे। जल, अग्नि और वायु केवल ये ही उनके सहारे थे। अनेक प्रकारके व्रतों और तपोंके नियमको वे पूर्ण करते थे। ब्राह्मणोंमें नन्दीकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। वे समय-समयपर जल, फल एवं अन्य उचित उपहारोंसे उन प्रभुकी अर्चना करते रहते थे। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन द्विजवरने उग्र तपस्यासे अपनेपर विजय प्राप्त कर ली थी। अन्ततः भगवान् शंकर उनपर परम प्रसन्न हुए और उन्होंने मुनिवर नन्दीको साक्षात् दर्शन दिया और कहा—'मुने! मैं तुम्हें दिव्य नेत्र प्रदान करता हूँ। वत्स! अबतक तो तुम्हारे लिये मेरा रूप अदृश्य था, किंतु मैं प्रसन्न हो गया हूँ, अतः मेरा यह रूप देखो। संसारमें विद्वान् पुरुष ही मेरे इस अप्रतिम एवं ओजस्वी रूपको देख सकते हैं।'

राजन्! उस समय शंकरजीके श्रीविग्रहसे हजारों


* द्रष्टव्य 'तीर्थाङ्क'-पृ० १०९ तथा पृ० ३११। उत्तर-गोकर्ण भी दो हैं:—नेपालके पशुपतिनाथ तथा 'गोला-गोकर्णनाथ', पर यहाँ 'पशुपतिनाथ' ही अभीष्ट है।

३८६ ] [ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण ] [ अध्याय २१३

किरणोंवाले सूर्यके समान प्रकाश फैल रहा था। वे प्रभाके पुञ्ज प्रतीत हो रहे थे। जटाएँ उनके सिरकी छवि बढ़ा रही थीं और चन्द्रमा ललाटको सुशोभित कर रहे थे। भगवान् शंकरके दो नेत्र परम प्रकाशमान थे तथा तीसरा नेत्र अग्निके समान धधक रहा था। कमलकी माला उनके पवित्र अङ्गपर विराजमान थी। हाथमें कमण्डलु लिये हुए थे। शरीरपर बाघाम्बर था। सर्पका यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। ऐसे भगवान् महादेवका दर्शन पाते ही महान् तपस्वी नन्दीको रोमाञ्च हो आया।

राजन्! वे प्रभु सनातन परब्रह्म परमात्माके ही रूपान्तर थे। उनका दर्शन प्राप्त होनेपर मुनिवर नन्दीने अञ्जलि बाँध ली और प्रभुकी इस प्रकार स्तुति करने लगे—'जो स्वयं प्रकट होकर जगत्‌का धारण एवं पोषण करते हैं तथा वर देना जिनका स्वभाव है, उन प्रभुके लिये मेरा नमस्कार है। जो 'त्रिनेत्र', 'शिव', 'शंकर' एवं 'भव' नामसे विख्यात हैं, संसारका संहार एवं पालन भी जिनके ऊपर निर्भर है तथा जो चर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले एवं मुनिरूप हैं, उन प्रभुके लिये नमस्कार है। जो नीलकण्ठ, भीम, भूत, भव्य, भव, प्रलम्बभुज, कराल, हरिनेत्र, कपर्दी, विशाल, मुञ्जकेश, धीमान्, शूल, पशुपति, विभु, स्थाणु,गणोंके पति, स्रष्टा, संक्षेप्ता, भीषण, सौम्य, सौम्यतर, त्र्यम्बक, श्मशाननिवास, वरद, कपालमाली एवं 'हरितश्मश्रुधर' अधिनामोंसे सम्बोधित होते हैं, उन भगवान् रुद्रके लिये नमस्कार है। जो भक्तोंको सदा प्रिय हैं, उन परमात्मा शंकरको हमारा बार-बार नमस्कार है।'

इस प्रकार विप्रवर नन्दीने भगवान् रुद्रकी स्तुति की और उनकी सम्यक् प्रकारसे आराधना कर सिर झुकाकर बार-बार नमस्कार किया तथा पुष्पाञ्जलि अर्पित की। भगवान् शंकर ब्राह्मणश्रेष्ठ नन्दीपर संतुष्ट हो गये और उन वरद प्रभुने स्वयं ऋषिसे यह वचन कहा—'विप्रवर! वर माँगो। महामुने! तुम्हारे मनमें जो भी अभिलषित हो, वह सभी मैं देनेके लिये उद्यत हूँ। अतः तुम्हारी जो अभिलाषा हो, वह मुझसे कहो।'

राजन्! जब भगवान् शंकरने उन मुनिवर नन्दीसे इस प्रकार कहा, तब उनका अन्तःकरण प्रसन्नतासे भर गया और उन्होंने भगवान् शंकरसे कहा—'प्रभो! मुझे प्रभुत्व, देवत्व, इन्द्रत्व, ब्रह्मत्व, लोकपालत्व, अपवर्ग, अणिमादि आठों सिद्धियाँ, ऐश्वर्य या गाणपत्य—इनमेंसे एक भी पदार्थ नहीं चाहिये। देवेश्वर! आप कल्याणस्वरूप हैं और अपने भक्तोंका कल्याण करनेमें सदा संलग्न रहते हैं, अतः यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो सुरेश्वर! आप कृपापूर्वक मुझे अपनी भक्ति प्रदान करें। महेश्वर! आपके अतिरिक्त अन्य किसी देवतामें मेरी भक्ति न हो और सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले आप प्रभुमें ही भक्ति सदा स्थिर रहे—यही मेरी सच्ची हार्दिक अभिलाषा है, जिसके फलस्वरूप मैं आपके लिये सदा तपमें संलग्न रह सकूँ और मेरे इस कार्यमें विघ्न न उपस्थित हो। मैं रात-दिन आपका ही नाम जपता रहूँ, मैं यही चाहता हूँ।'

राजन्! विप्रवर नन्दीकी यह बात सुनकर भगवान् शंकरके मुखपर हँसी छा गयी। वे प्रसन्न होकर मधुर वाणीमें नन्दीसे कहने लगे—'विप्रर्षे! उठो। सुव्रत! तुम्हारी इस तपस्यासे मैं परम प्रसन्न हो गया हूँ। महाभाग! तुमने बड़े शुद्ध चित्तसे भक्तिपूर्वक मेरी आराधना की है। तपोधन! तुम्हारी तपश्चर्यासे मुझे परम संतोष हुआ है। वत्स! तुम मेरी आराधनामें दत्तचित्तसे निरन्तर लगे रहे। रुद्रोंके समक्ष तुमने मेरे लिये तीन करोड़ जप किये हैं। महामुने! पूरे एक हजार वर्षोंतक तुमने तीव्र तपस्या की है। ऐसी तपस्या आजसे पहले किसी भी देवता, दानव अथवा ऋषिने नहीं की है। तुम्हारा किया हुआ यह

अध्याय २१४] गोकर्णमाहात्म्य और नन्दिकेश्वरको वर-प्रदान [३८७

अत्यन्त कठिन तप महान् आश्चर्यजनक है। इसके प्रभावसे चर और अचर प्राणियोंसे व्याप्त ये तीनों लोक अत्यन्त क्षुब्ध हो उठे हैं। तुम्हें देखनेके लिये इन्द्रके साथ सभी देवता अभी यहाँ आनेवाले हैं। सुरों और असुरोंके लिये तुम अक्षय, अव्यय तथा अतर्क्य हो। तुम्हारे शरीरसे दिव्य तेज निकल रहा है। अलौकिक आभूषणोंसे अलंकृत होकर तुम परम सुशोभित हो रहे हो। तुममें मुझ-जैसी ही शक्ति आ गयी है। देवता और दानव—ये सभी तुमको अद्वितीय पुरुष मानते हैं। अब तुम मेरे समान रूप धारण करोगे और तुम्हें मुझ-जैसा ही तेज प्राप्त होगा, तुम्हारे तीन नेत्र होंगे। सभी गुणोंकी तुममें प्रधानता रहेगी और देवता तथा दानव तुम्हारी आराधना करेंगे—इसमें कोई संदेह नहीं है। तुम इसी शरीरसे सदा अमर रहोगे। बुढ़ापा और मृत्यु तुम्हारे पास न आ सकेगी। इसको गाणेश्वरीगति कहते हैं। देवताओंके द्वारा भी यह सदाके लिये अलभ्य है। द्विजोत्तम! मेरे पार्षदोंमें तुम्हारा प्रधान स्थान होगा। तुम्हें जनता 'नन्दीश्वर' कहेगी, इसमें कोई संशय नहीं है।

'तपोधन! तुम्हें सात्त्विक ऐश्वर्य या आठों सिद्धियाँ प्राप्त होंगी और तुम मेरे ही एक दूसरे स्वरूप समझे जाओगे। देवता लोग तुम्हें नमस्कार करेंगे। मुनीश्वर! मेरी कृपासे संसारमें तुम स्वामीका पद प्राप्त करोगे। आजसे देवकार्योंमें तुम्हारी सर्वत्र प्रथम पूजा होगी और तुम मेरे पार्षदोंमें प्रधान होगे। मुझसे प्रसन्नता प्राप्त करनेवाले सभी मानव भलीभाँति तुम्हारी ही अर्चना करेंगे। तुम मेरे गण बनो, मेरे द्वारपालपदपर प्रतिष्ठित हो जाओ और विषम समयमें मेरे शरीरकी रक्षा करते रहो। तीनों लोकोंमें वज्र, दण्ड, चक्र अथवा अग्नि—इनमेंसे किसीसे भी तुम्हें कोई बाधा न होगी; देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, पन्नग, राक्षस तथा जो मेरे भक्त पुरुष हैं, वे सभी तुम्हारा आश्रय ग्रहण करेंगे। अब तुम्हारे संतुष्ट होनेपर मैं संतुष्ट हो जाऊँगा और तुम्हारे कुपित होनेपर मेरे मनमें भी क्रोधका आविर्भाव हो जायगा। द्विजवर! अधिक क्या, तुमसे बढ़कर विश्वमें मेरा दूसरा कोई प्रिय है ही नहीं।'

इस प्रकार द्विजवर नन्दीको वर देकर उमापति भगवान् शंकरने प्रसन्नतापूर्वक स्वयं आकाशको गुँजानेवाली मधुर वाणीमें स्पष्टरूपसे कहा— 'विप्रवर! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम कृतकृत्य हो गये। मरुद्गणोंके साथ समस्त देवता तुम्हारा दर्शन करनेके लिये यहाँ आ रहे हैं—ऐसा जान लो। वत्स! वह सभी सुरसमुदाय यहाँ आकर जबतक मुझे देख नहीं लेता, इसके पूर्व ही मैं यहाँसे अन्यत्र चला जाना चाहता हूँ।'

बस, इतनी बात कहकर भगवान् शंकर वहीं अन्तर्हित हो गये। [अध्याय २१३]


गोकर्णमाहात्म्य और नन्दिकेश्वरको वर-प्रदान

**ब्रह्माजी कहते हैं—**सनत्कुमार! जब इस प्रकार कहकर भूतभावन भगवान् शंकर वहाँ अन्तर्धान हो गये तो उसी क्षण गणोंके अध्यक्ष नन्दीका शरीर परम दिव्य हो गया। वे चार भुजाओं और तीन नेत्रोंसे सम्पन्न होकर एक दिव्य स्थानपर बैठ गये। उनके विग्रहका वर्ण भी दिव्य हो गया और उससे दिव्य अगुरुकी सुगन्ध फैलने लगी। त्रिशूल, परिघ, दण्ड और पिनाक उनके हाथोंमें सुशोभित होने लगे तथा मूँजकी मेखला कमरकी शोभा बढ़ाने लगी। अपने तेजसे

३८८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय २१४

वे ऐसे प्रतीत होने लगे, मानो दूसरे शंकर ही विराजमान हों। फिर भगवान् वामनकी भाँति उद्यत होकर उन्होंने अपना पैर ऐसे आगे बढ़ाया, मानो वे द्विजवर तीन डगोंसे पृथ्वीको नापनेका विचार कर रहे हों। उन्हें देखकर आकाशमें विचरनेवाले सम्पूर्ण देवताओंका मन आशङ्कित हो गया। उनके आश्चर्यकी सीमा नहीं रही। अतः इन्द्रको इसकी सूचना देनेके लिये वे स्वर्गकी ओर चल पड़े। देवताओंके द्वारा यह वृत्तान्त सुनकर इन्द्र तथा अन्य उपस्थित लोकपालोंको बड़ा विषाद हुआ। उनके मनमें चिन्ता व्याप्त हो गयी। उन सभीने सोचा, यह कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसने उमाकान्त भगवान् शंकरसे वर प्राप्त कर लिया है। अतः इसमें अपार शक्ति आ गयी है। अब यह श्रीमान् पुरुष तीनों लोकोंपर अवश्य ही विजय प्राप्त कर लेगा। इसमें जैसा उत्साह, तेज और बल प्रतीत होता है, इससे सिद्ध होता है कि यह अवश्य कोई महान् पराक्रमी पुरुष ही है। यह तो देवताओंके मुख्य स्थानको भी छीन सकता है, अतः अपने तेजके प्रभावसे जबतक यह स्वर्गलोकमें नहीं आ जाता है, इसके पूर्व ही हमलोग वर देनेमें कुशल भगवान् महेश्वरको प्रसन्न करनेमें संलग्न हो जायें।

मुने! इस प्रकार परस्पर वार्तालाप करके वे सभी श्रेष्ठ देवता मेरे साथ 'मुञ्जवान्-पर्वत' के शिखरपर आ गये। वहाँ जगत्के आश्रयदाता, अपार शक्तिवाले भगवान् श्रीहरिने अपने लिये स्थान बना रखा था। जब श्रीहरिको ज्ञात हुआ कि सुरसमुदाय आ रहा है तो वे दौड़कर आगे आ गये। कारण, सबके हृदयकी बात उन्हें विदित थी। अब उनकी कृपासे देवताओं और मुनियोंकी सभी बातें स्पष्ट हो गयीं। तब स्वयं भगवान् विष्णु, देवताओंके साथ मेरी तुलना करनेवाले नन्दीके पास पहुँच गये।

नन्दीने कहा—'ओह! आज मेरा जीवन सफल हो गया। मैंने जितना परिश्रम किया है, वह आज सब सफल हो गया; क्योंकि देवताओंके अध्यक्ष इन्द्र तथा सम्पूर्ण संसारके शासक श्रीहरिके दर्शनका आज मुझे परम श्रेष्ठ सौभाग्य प्राप्त हो गया है। आज मेरे जीवनकी साध पूरी हो गयी और मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो गये। पापोंका संहार करनेवाले भगवान् शिव शान्तस्वरूप हैं। उनकी प्रसन्नता तो मुझे प्राप्त हो ही चुकी है। उन्होंने वर देकर मुझे अपना पार्षद बना ही लिया है। मुझपर उनकी असीम कृपा है। निश्चय ही अब मेरे सारे कल्मष दूर हो गये। भगवान् शंकर बड़े महात्मा पुरुष हैं। उन्होंने देवताओंके विषयमें मेरे सामने जो बात कही है, वह परम हितकर एवं सत्य सिद्ध हो गयी। उसमें कुछ भी अन्यथा नहीं रहा। उन्होंने मुझसे स्पष्ट कहा था कि 'प्रिय नन्दिन्! देवर्षिलोग तुमपर प्रसन्न होकर तुम्हें देखने यहाँ पधार रहे हैं। आज परमेष्ठीद्वारा भी मैं आदर प्राप्त कर चुका। इससे मेरे हृदयमें अपार आनन्द भर गया है।'

देवताओंने कहा—'विप्रवर! नन्दिन्! हमलोग भी उन वरदायी भगवान् शंकरका दर्शन करना चाहते हैं। तुम्हारी तपस्यासे संतुष्ट होकर जिन प्रभुने तुम्हें साक्षात् दर्शन दिया है, उन्हींका अवलोकन हमें भी अभीष्ट है।' इतनी बात कहनेके पश्चात् देवताओंने द्विजवर नन्दीसे पुनः पूछा—'कपाल धारण करनेवाले महाभाग महेश्वरका दर्शन हमलोग किस स्थानपर प्राप्त कर सकेंगे?'

नन्दीने कहा—'वे प्रभु तो मुझपर कृपा करके वहीं अन्तर्धान हो गये। अब मैं नहीं

अध्याय २१४] गोकर्णमाहात्म्य और नन्दिकेश्वरको वर-प्रदान ३८९

जानता हूँ कि वे कहाँ विराज रहे हैं। अतः वे जहाँ हों, आप सभी देवता स्वयं ही अन्वेषण कर लें।'

सनत्कुमारजीने पूछा—'भगवान्! महाभाग शंकरने नन्दीसे क्या कहा था, जिससे उन्होंने उनका पता नहीं बताया? देवेश! आप यह बात मुझे बतानेकी कृपा करें। प्रभो! भगवान् शंकरकी तो कोई भी बात गोपनीय नहीं है?'

ब्रह्माजी कहते हैं—'वत्स! शंकरने जो बातें कही हैं, उन्हें देवताओंके सामने स्पष्ट करना मेरे लिये भी उचित नहीं है। पर उन्होंने नन्दीसे जो बात कही थी, वह मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो। भगवान् शंकरजीने कहा था—'विप्रवर! हिमालयके उस पार पृथ्वीपर संकटगिरि नामसे विख्यात एक सिद्ध स्थान है, जिसकी अनेक वन, उपवन शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ 'श्लेष्मातक' नामका एक श्रेष्ठ सर्प निवास करता है। उसने तीव्र तपस्या की है, जिससे उसके सभी पाप भस्म हो गये हैं। इस समय उसपर अनुग्रह करना मेरे लिये अत्यन्त आवश्यक है। वहाँ एक बहुत सुन्दर आश्रम है। वहीं निर्जन स्थानमें वह रहता है। उस दिव्य स्थानमें रहते हुए उसके बहुत-से वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। पवित्र पर्वतके ऊँचे शिखरपर वह स्थान है। श्लेष्मातक सर्पका निवास होनेके कारण उसीके नामसे 'श्लेष्मातकवन' उसकी संज्ञा हो गयी है। एक समयकी बात है—मैं मृगका रूप धारणकर वहाँ विचर रहा था। मैंने देखा, देवतालोग मुझे पकड़नेके लिये प्रयास कर रहे हैं। मैं झट वहीं छिप गया। वे मुझे खोजनेमें व्यस्त हो गये। वत्स! तुम्हें यह प्रसङ्ग उन देवताओं और अप्सराओंको भी नहीं बताना चाहिये। मैंने उसे अनेक वर दिये, फिर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया।'

(सनत्कुमारके प्रति ब्रह्माजीका कथन है—)

जिस समय नन्दीको वर देकर भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये, उस समय उनके तेजसे सभी दिशाएँ जगमगा उठी थीं। उनके पास अनेक देवता आ गये थे। उनका दिव्य शरीर द्वितीयाके चन्द्रमाकी भाँति पूजनीय बन गयी। मरुद्गणोंको साथ लेकर इन्द्र मनोगामी (इच्छानुसार चलनेवाले) रथपर बैठे और वहाँ आ गये। उनके वहाँ पहुँचते ही पर्वत-भाग तेजसे चमचमाने लगे। विविध जलचर जीवोंके स्वामी वरुण वर देनेके विचारसे अपने गणोंको साथ लेकर वहाँ आये। उनका अत्यन्त तेजस्वी विमान वज्र एवं स्फटिकमणिके समान चमक रहा था। उस पर्वतके शिखरपर धनके स्वामी कुबेरका भी आगमन हो गया। उनका विचित्र रथ तपाये हुए सुवर्णके द्वारा निर्मित था। धनाध्यक्षके साथ बहुत-से यक्ष एवं राक्षस भी आये थे। सूर्यके समान प्रकाशमान करोड़ों विमानोंसे वे आये थे। उन विमानोंकी शोभा अलौकिक थी। अपने उत्तम पुण्योंसे सुशोभित कुबेर ऐसे जान पड़ते थे, मानो दूसरे सूर्य हों। सूर्य-चन्द्रमा तथा समस्त ग्रहमण्डल एवं नक्षत्रसमूह अग्निके समान तेजस्वी विमानोंपर चढ़कर आकाशसे धरातलपर उतर आये। ग्यारह रुद्रों और बारह सूर्योंका भी वहाँ आगमन हो गया। दोनों अश्विनीकुमार उस महान् मुञ्जवान्पर्वतपर पधारे। विश्वेदेव, साध्यगण और तपस्वी बृहस्पति भी आये। विशाख नामसे विख्यात स्वामी कार्तिकेय तथा भगवान् विघ्नविनायक भी उस श्रेष्ठ पर्वतपर पधारे। वहाँ सैकड़ों मोर बोल रहे थे। नारद, तुम्बुरु, विश्वावसु, परावसु, हाहा-हूहू तथा अन्य भी अनेक प्रसिद्ध गन्धर्व इन्द्रकी आज्ञाके अनुसार

१६९- 'गोकर्णेश्वर' और 'शृङ्गेश्वर' आदिका माहात्म्य

३९० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २१४

विविध प्रकारके विमानोंद्वारा वहाँ आ गये। पवन-अग्नि, धर्म-सत्य, ध्रुव तथा देवर्षि, सिद्ध, यक्ष, विद्याधर एवं गुह्यकोंका समुदाय भी वहाँ पहुँच गया। कई महान् आदरणीय ऋषि भी आये। गन्धकाली, घृताची, बुद्धा, गौरी, तिलोत्तमा, उर्वशी, मेनका, रम्भा, पुञ्जिकस्थला तथा ऐसी अन्य भी बहुत-सी अप्सराएँ उस मुञ्जवान् पर्वतपर आयीं। पुलस्त्य, अत्रि, मरीचि, वसिष्ठ, भृगु, कश्यप, पुलह, विश्वामित्र, गौतम, भारद्वाज, अग्निवेश्य, वृद्ध पराशर, मार्कण्डेय, अङ्गिरा, गर्ग, संवर्त, क्रतु, जमदग्नि, भार्गव और च्यवन—ये सभी महर्षि विष्णुकी तथा स्वर्गाध्यक्ष शक्रकी आज्ञासे वहाँ सामूहिक रूपसे आये थे।

स्त्री-पुरुषका रूप धारण करके सिन्धु, महानदी सरयू, ताम्रारुणा, चारुभागा, वितस्ता, कौशिकी, पुण्या, सरस्वती, कोका, नर्मदा, बाहुदा, शतद्रू, विपाशा, गण्डकी, सरिद्वरा, गोदावरी, वेणी, तापी, करतोया, सीता, चीरवती, नन्दा, चन्दना, चर्मण्वती, पर्णाशा, देविका, प्रभास, सोम, लौहित्य तथा गङ्गासागर एवं अन्य भी जितने अनेक पुण्य तीर्थ थे, वे सब भी उस समय वहाँ पृथ्वीपर पधारे। इन्द्रकी आज्ञासे मुञ्जवान् नामक उस उत्तम पर्वतपर सबका आगमन हो गया। पर्वतोंमें उत्तम महामेरु, कैलास, गन्धमादन, हिमवान्, हेमकूट, निषध, पर्वतप्रवर विन्ध्याचल, महेन्द्र, सह्य, मलयगिरि, दर्दुर, माल्यवान्, चित्रकूट, अत्यन्त ऊँचा द्रोणाचल, श्रीपर्वत, लताओंसे परिपूर्ण पर्वतराज पारियात्र—ये सभी पर्वतोंमें उत्तम माने जाते हैं। इन सबका तथा अनेक अरण्योंका भी वहाँ आगमन हो गया। सम्पूर्ण यज्ञ, समस्त विद्याएँ, चारों वेद, धर्म, सत्य, दम, स्वर्ग, महान् ऋषि कपिल, महाभाग वासुकि, सर्पराज, अमृताशी, हजारों फणोंसे प्रकाशमान अनन्त शेषनाग, धृतराष्ट्र, सर्पोंके राजा किर्मीर, श्रीमान् अम्भोधर, महान् तेजस्वी नागराज तथा सर्पोंके अध्यक्ष, अरबों एवं खरबों सर्प वहाँ आये। विद्युज्जिह्व, द्विजिह्वेन्द्र, शङ्खवर्चा, महाद्युति, तीनों लोकोंमें विख्यात धीमान् अनिमिषेश्वर, विरोचनकुमार सत्य, स्फोटमणि, सतैचीत, पर्वतकी भाँति अचल रहनेवाले तथा सैकड़ों फणोंसे युक्त शृंग, अरिमेजयके साथ सर्पराज प्रज्ञावान् नागराज विनत, भूरि, कम्बल और अश्वतर, सर्पोंके राजा पराक्रमी एकापत्र, नागोंके अध्यक्ष कर्कोटक एवं धनंजय—इस प्रकारके महान् पराक्रमी अनेकों भुजगेन्द्र मुञ्जवान् पर्वतपर आये। दिन-रात, पक्ष-मास, संवत्सर, आकाश, पृथ्वी, दिशाएँ और विदिशाएँ वहाँ आयीं। उस समय आये हुए देवताओं, यक्षों और सिद्धोंसे उस मुञ्जवान् पर्वतका शिखर इस प्रकार भर गया, जैसे प्रलयकालमें समुद्रका किनारा जलसे परिपूर्ण हो जाता है। जब उस पर्वतराज मुञ्जवान्के सुरम्य शिखरपर देवताओंका समाज जुट गया तो वायुसे प्रेरित होकर वृक्षोंने उनपर फूलोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी। उस समय दिव्य गन्धर्वोंने उत्तम संगीत, अप्सराओंने प्रशंसनीय नृत्य और पक्षियोंने प्रसन्न होकर मधुर स्वरसे सुन्दर शब्द करना प्रारम्भ कर दिया। पवन पुण्य गन्धोंको लेकर प्रवाहित होने लगे। उसके स्पर्शसे सबका मन मुग्ध हो जाता था। इस प्रकार भगवान् विष्णुको आगे कर सभी देवता वहाँ उपस्थित हुए और देखा कि नन्दी सामने विराजमान हैं तथा दिव्य आभासे उनकी मूर्ति विद्योतित हो रही है। अब वहाँ आये हुए गन्धर्वों और अप्सराओंके गणोंपर नन्दीकी भी दृष्टि पड़ी। उन्होंने देखा कि अन्य सभी देवता तथा देवराज इन्द्र भी एक साथ ही वहाँ पधारे हैं। फिर तो नन्दी सावधान हो गये और उन्होंने हाथ जोड़ तथा मस्तक झुकाकर उन्हें

१७०- वराहपुराणकी फल-श्रुति

अध्याय २१४] गोकर्णमाहात्म्य और नन्दिकेश्वरको वर-प्रदान ३९१

प्रणाम किया। सहसा एक साथ सभी देवताओंका आगमन देखकर उन्हें महान् आश्चर्य हुआ। फिर वे सबके स्वागत करनेमें संलग्न हो गये। उपस्थित सभी देवताओंको क्रमशः नमस्कार करनेके पश्चात् उन्होंने उनके लिये यथाशीघ्र आसन, पाद्य एवं अर्घ्य आदिके लिये अपने अनुयायियोंको आदेश दिया। नन्दीके स्वागतको स्वीकारकर आदित्य, वसु, रुद्र, मरुत्, अश्विनीकुमार, साध्य, विश्वेदेव, गन्धर्व और गुह्यक आदि देवताओं तथा गण-देवताओंने नन्दीकी प्रशंसा की। विश्वावसु, हाहा-हूहू, नारद, तुम्बुरु, चित्रसेन और अन्य गन्धर्वोंने नन्दीकी भी पूजा की। वासुकिप्रभृति नाग सर्पोंके राजा कहे जाते हैं। उनमें असीम शक्ति है। सौम्य-मूर्ति नन्दीश्वरको देखकर उन सबोंने भी उनकी अर्चना की। सिद्ध, चारण, विद्याधर और अप्सराओंका उपस्थित समाज देवेश्वर इन्द्रसे सम्मानित नन्दीश्वरकी पूजा करने लगा। यक्ष, विद्याधर, ग्रह, समुद्र, पर्वत, सिद्ध, ब्रह्मर्षिगण, गङ्गा आदि नदियाँ—इन सभीमें अपार हर्ष उत्पन्न हो गया था, अतः सभीने नन्दीश्वरको आशीर्वाद देना आरम्भ किया।'

देवता बोले— 'मुने! पशुपति भगवान् शंकर तुमपर सदा प्रसन्न रहें। अनवद्य! तुम्हारी सर्वत्र अबाध गति हो जाय अथवा द्विजवर! तुम्हें ऐसी शक्ति सुलभ हो जाय कि कोई भी देवता तुमसे श्रेष्ठ न हो सके। विभो! रोग-व्याधि तुम्हारे पास न आ सके। तुम अमर होकर विचरण कर सको। अच्युत! भगवान् शंकरके साथ सातों लोकोंमें सुखसे रहनेका तुम्हें सौभाग्य प्राप्त हो।' देवताओंके इस प्रकार कहनेपर नन्दीश्वरने पुनः उनसे अपना विचार इस प्रकार व्यक्त करना आरम्भ किया।

नन्दिकेश्वर बोले— 'आप सभी प्रधान देवता हैं और मुझपर आप सभीका अगाध स्नेह है। आप महानुभावोंने जो प्रिय बात कहकर मुझे आशीर्वाद दिया है, उसके लिये मैं आपलोगोंका अत्यन्त आभारी हूँ। अब आपलोगोंके लिये मुझे क्या करना चाहिये? इसके लिये आप आज्ञा देनेकी कृपा करें। देवताओ! मैं आपका आज्ञाकारी हूँ।' नन्दीश्वरकी यह बात सुनकर इन्द्रने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया।

शक्र बोले— 'भद्र! तुम यह बतलाओ कि भगवान् शंकर कहाँ गये और इस समय वे कहाँ विराज रहे हैं? विप्रवर! देवताओंके अध्यक्ष उन शक्तिशाली शिवको हम सभी लोग देखना चाहते हैं। मुने! जिन्हें स्थाणु, उग्र, शिव, शर्व एवं महादेव कहते हैं, उन भगवान् शंकरको तुम जानते हो कि वे इस समय कहाँ हैं? महर्षे! वह स्थान यथाशीघ्र मुझे बतानेकी कृपा करो।' वज्रपाणि इन्द्रकी यह बात बुद्धिमत्तापूर्ण थी। उसे सुनकर नन्दीने भगवान् शंकरका स्मरण किया। साथ ही वे इन्द्रको उत्तर देनेके लिये भी उद्यत हो गये।

नन्दिकेश्वरने कहा— 'देवेन्द्र! आप स्वर्गके स्वामी हैं। इसके विषयमें यथार्थ बात सुनानेकी आप कृपा करें। इसी मुञ्जवान् पर्वतपर मैंने भगवान् शंकरकी पूजा की थी। वे परम शक्तिशाली पुरुष हैं। उन्होंने मुझपर प्रसन्न होकर अनेक दिव्य वर प्रदान किये। फिर वे प्रभु परम प्रसन्न होकर यहाँसे कहीं अन्यत्र चले गये। अब उनकी जानकारी करनेमें मैं भी समर्थ नहीं हूँ। वासव! मैं आपका आज्ञाकारी हूँ। यदि आप उनके विषयमें मुझे आज्ञा देते हैं तो अब हम सभी प्रयत्नपूर्वक उन प्रभुका अन्वेषण करनेका प्रयास करें।' [अध्याय २१४]

३९२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१५

गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन

ब्रह्माजी कहते हैं— इसके बाद सम्पूर्ण देवताओंके साथ परामर्शकर इन्द्रने भगवान् शंकरके पास जानेका विचार किया। सभी देवता उस ऊँचे शिखरसे उठे और नन्दीके साथ आकाशमार्गसे उन्होंने प्रस्थान कर दिया। भगवान् रुद्रके अन्वेषण करनेमें तत्पर होकर अखिल देवताओंने स्वर्गलोक, ब्रह्मलोक और नागलोक सर्वत्र छान डाला तथा वे उन्हें ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक गये, पर उनका पता न चला। अब उनके मनमें निराशा छा गयी। रुद्रका पता न देख उन्होंने चारों समुद्रोंपर्यन्त सात द्वीपोंवाली पृथ्वीपर भी ढूँढ़ना आरम्भ किया। फिर वे वनोंसे युक्त महान् पर्वतोंकी कन्दराओं और उनके ऊँचे शिखरोंपर भी गये तथा उन्हें गहन निकुञ्जों और क्रीडा-स्थलोंमें भी सब ओर खोजते रहे। उनके इस ढूँढ़नेके प्रयाससे इस पृथ्वीके तृणोंके भी टुकड़े-टुकड़े हो गये; पर इतना प्रयत्न करनेपर भी भगवान् शंकरको प्राप्त करनेमें देवताओंको सफलता न मिली और भगवान् शंकरका दर्शन उन्हें न मिल सका। अतः देवतालोग अत्यन्त उदास हो गये।

आगेके कर्तव्यके सम्बन्धमें परस्पर विचार-विमर्श और वार्तालाप करनेके पश्चात् वे सभी देवता मेरी (ब्रह्माकी) शरणमें आये। तब मैंने मनको सावधान करके संसारको कल्याण प्रदान करनेवाले उन शंकरका समाहित मनसे ध्यान किया। उनके वेश और अलंकारोंके ध्यान करनेसे मुझे एक उपाय सूझ गया। फिर मैंने देवताओंसे कहा—'हमलोगोंने निरन्तर अन्वेषण करते हुए सारी त्रिलोकी छान डाली है, किंतु भूमण्डलपर 'श्लेष्मातक' वन नामक स्थानपर नहीं गये। अतएव प्रधान देवताओ! हम सभी लोग यहाँसे उस देशमें चलें।' इस प्रकार कहकर उन सम्पूर्ण देवताओंके साथ हमलोग उस दिशाकी ओर प्रस्थित हो गये और शीघ्रगामी विमानोंपर चढ़कर तत्क्षण 'श्लेष्मातक' वनमें* पहुँच गये। वह पुण्यमय स्थान सिद्ध और चारणोंसे सेवित था। वहाँ पर्वतोंकी बहुत-सी कन्दराएँ तथा अनेक प्रकारके पवित्र एवं परम रमणीय स्थान ध्यान करनेके उपयुक्त थे। उनमें सभी गुणोंकी अधिकता थी। अनेक सुन्दर आश्रम, उद्यान और स्वच्छ जलवाली नदियाँ शोभा बढ़ा रही थीं। उस वनमें श्रेष्ठ सिंह, भैंसे, नीलगाय, भालू-बंदर, हाथी और मृगोंके झुंड शब्द कर रहे थे। सिद्ध आदि पुरुषोंसे वह स्थान भरा था।

देवताओंने इन्द्रको आगे करके उसमें प्रवेश किया। वहाँ वे रथ आदि सवारियोंको छोड़कर पैदल ही गये। फिर हम सभी कन्दराओं, झाड़ियों एवं वृक्षोंसे भरे हुए सघन वनोंमें सम्पूर्ण देवताओंके स्वरूप भगवान् रुद्रको खोजनेमें संलग्न हो गये। आगे जानेपर हमें एक अत्यन्त सुन्दर वन मिला, जो सभी वनोंका अलंकार था। वहाँ बहुत-सी पर्वतीय नदियाँ और फूले हुए अनेक वृक्ष उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। सभी देवताओंने उसमें प्रवेश किया। नदियोंके तटपर कुन्द तथा चन्द्रमाके समान स्वच्छ वर्णवाले हंस विचर रहे थे। फूलोंसे अच्छी गंध निकल रही थी, जिसके कारण वह वन सुवासित हो रहा था। वहाँ


* यह 'श्लेष्मातक'-वन उत्तर-गोकर्णका ही नामान्तर है, जो पशुपतिनाथ (नेपाल)-से केवल दो मीलकी दूरीपर है—
Sleṣmātaka Vana is Uttar (North) Gokaraṇa, two miles to the north east of Paśupatinātha in Nepal, on the Bagmati river, (Śivapurāṇa 3. 215, Varāhapuran 13. 16, Wright's History of Nepal P. 82. 10, Nandolal, Dey's Geographical Dictionary, P. 188)

अध्याय २१५ ] गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन [ ३९३

बिखरी हुई बालुकाएँ ऐसी प्रतीत होती थीं, मानो मोतियोंके चूर्ण हैं। उसी स्थानपर क्रीडा करती हुई मनको मुग्ध करनेवाली एक कन्या दिखायी पड़ी। सभी देवताओंने उसे देखकर मुझे सूचित किया; क्योंकि सम्पूर्ण देवताओंका मैं अग्रणी था। मैं सोचने लगा यह क्या बात है? फिर मैं एक मुहूर्त्ततक ध्यानस्थ हो गया। तभी मुझे उस कन्याके विषयमें सहसा ज्ञान हुआ। मैंने सोचा, संसारके शासक शंकरकी मूल शक्ति, जिन्हें गिरिराज हिमालयकी पुत्री होनेका गौरव मिल चुका है, निश्चय ही ये वही भगवती 'उमादेवी' ही हैं। इसके बाद सभी प्रधान देवता उस पर्वत-शिखरके ऊपर चढ़ गये और वहाँसे नीचेकी ओर देखने लगे। तब उन सभीको सुरसत्तम शंकरका दर्शन प्राप्त हुआ। उस समय वे प्रभु मृग-समूहके बीचमें उनके रक्षककी भाँति विराजमान थे। उनके सिरपर एक सींग और एक पैर था। वे तपाये हुए सोनेकी भाँति चमक रहे थे। उनका प्रत्येक अङ्ग गठित, उनके मुख, नेत्र सुडौल और सुन्दर थे तथा उनके दाँत बड़े सुन्दर थे।

उस समय ऐसे मृगरूपधारी भगवान् रुद्रको देखकर सभी देवता शिखरसे उतरकर उनकी ओर दौड़े। उन मृगेन्द्रको पकड़नेके लिये उनके मनमें तीव्र अभिलाषा जग गयी थी। अतः बड़े वेगसे वे सब प्रकारके उद्यममें तत्पर हो गये। फिर तो इन्द्रने सींगके अगले भागको पकड़ लिया, मैं भी वहीं था। मैंने बड़ी श्रद्धाभक्तिसे उनके सींगके मध्यभागमें अपना हाथ लगाया। यही नहीं, उन महात्माके सींगके मूलभागको श्रीहरिने भी पकड़ लिया। फिर इस प्रकार तीनोंके पकड़ लेनेपर वह सींग तीन भागोंमें विभक्त हो गया। इन्द्रके हाथमें अगला भाग, मेरे हाथमें बीचका भाग और विष्णुके हाथमें मूलभाग शोभा पाने लगा। इस भाँति उसके तीन रूप हो गये। इस प्रकार हम-लोगोंने जब सींगके तीनों भागोंको अपना लिया, तब वे प्रधान मृगरूपधारी शंकर सींगरहित होकर वहाँ ही अन्तर्धान हो गये। फिर हम-लोगोंके लिये वे अदृश्य हो गये और आकाशमें चले गये तथा उपालम्भ देते हुए कहने लगे— 'देवताओ! मैंने तुम्हें ठग लिया। तुमलोग स्वयं हमें प्राप्त नहीं कर सकोगे। मैं शरीरी होकर तुम्हारे हाथ लग गया था; किंतु छुड़ाकर यहाँ आ गया। अब तुमलोग केवल मेरे सींगसे ही संतोष करो। तुमलोग मेरे वास्तविक रूपसे वञ्चित हो गये। मैं अपने पूरे शरीरसे रह सकूँ तो धर्म भी अपने चारों पैरोंसे रहने लगे। यह मेरा सिद्धान्त है।

'देवताओ! यह 'श्लेष्मातक' वन है। यहीं मेरे शृङ्गोंको विधिपूर्वक स्थापित कर देना चाहिये। इस कार्यसे जगत्का कल्याण होगा। यह वन अत्यन्त महान् पुण्यक्षेत्र होगा। मेरे प्रभावसे प्रभावित इस स्थानपर महान् यज्ञ सम्भाव्य है। भूमण्डलपर जितने तीर्थ, समुद्र तथा नदियाँ हैं, मेरे लिये वे सब यहाँ आयेंगे। हिमवान् पर्वतोंके राजा हैं। उनके एक शुभ प्रदेशका नाम नेपाल है। मैं वहाँ पृथ्वीसे स्वयम्भूरूपसे स्वतः प्रकट होऊँगा। मेरे उस विग्रहमें चार मुख होंगे और मेरा सिर प्रचण्ड तेजसे प्रकाशित होगा। फिर तीनों लोकोंमें सब जगह शरीरेश (पशुपतिनाथ*)के नामसे मेरी ख्याति होगी। वही नागह्रद नामसे प्रसिद्ध एक विशाल ह्रद होगा। सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेके विचारसे मैं उसके जलमें तीस हजार वर्षोंतक निवास करूँगा। जिस समय वृष्णिकुलमें


* यह सारा वर्णन स्पष्ट ही नेपालके 'पशुपतिनाथ' का ही है।

३९४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१५

भगवान् श्रीकृष्णका अवतार होगा और वे इन्द्रकी प्रार्थनासे अपने चक्रद्वारा पर्वतोंको उखाड़कर दानवोंका संहार करेंगे, उस समय वह म्लेच्छोंसे भरा प्रदेश शुद्ध होगा, बहुत-से सूर्यवंशी क्षत्री उत्पन्न होंगे और उनके प्रयाससे म्लेच्छोंकी सत्ता समाप्त हो जायगी। साथ ही क्षत्रियगण उस देशमें ब्राह्मणोंको बसायेंगे और उन ब्राह्मणोंकी सहायतासे प्रचलित धर्मोंकी स्थापना करेंगे। उन्हें अविनाशी एवं अचल राज्यकी उपलब्धि हो जायगी। पहले कुछ दिनोंतक वह प्रान्त शून्य रहेगा। पश्चात् क्षत्रियवंशमें उत्पन्न वे राजा लोग मुझे उस शून्य स्थानमें प्राप्तकर मेरे अर्चा-विग्रहकी प्रतिष्ठा करेंगे। इसके बाद वह स्थान प्रसिद्ध ब्राह्मणों तथा सम्पूर्ण वर्णाश्रमोंसे सम्पन्न होकर एक महान् जनपद बन जायगा। उस जनपदके विस्तृत भागमें राजाओंका सम्यक् प्रकारसे निवास होगा और सामान्य जनता वहाँ सुखपूर्वक निवास करने लगेगी। सभी प्राणी प्रत्येक समयमें वहाँ मेरी आराधना करेंगे। जो सज्जन एक बार भी विधिके साथ मेरी वन्दना एवं दर्शन करेंगे, उनके सम्पूर्ण पाप भस्म हो जायँगे। साथ ही वे शिवपुरीमें जायँगे और वहाँ उन्हें मेरा दर्शन प्राप्त हो जायगा। मेरा यह स्थान गङ्गासे उत्तर और अश्विनीमुखसे दक्षिणमें चौदह योजन दूरीके विस्तारमें होगा, ऐसा समझना चाहिये। वागमती नामकी नदी हिमालयके ऊँचे शिखरसे निकलकर उसकी शोभा बढ़ायेगी। उस वागमती नदीका शुद्ध जल भागीरथी गङ्गासे भी सौगुना अधिक पवित्र कहा गया है। उसमें स्नान करनेके प्रभावसे मानव विष्णु और इन्द्रके लोकोंका स्पर्श करके शरीर त्यागनेके पश्चात् सीधे मेरे लोकमें पहुँच जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं। इस क्षेत्रमें निवास करनेवाले घोर पापकर्मा ही क्यों न हों, उन्हें भी यह गति सुलभ हो जाती है। इन्द्रकी नगरीमें जो नियमपूर्वक निवास करनेवाले देवता, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, उरग, मुनि, अप्सरा तथा यक्षप्रभृति हैं, वे सभी मेरी मायासे मोहित होनेके कारण मेरे उस गुह्य स्थानको जाननेमें असफल हैं।

'सुरोत्तमो ! तपस्वियोंके लिये यह तपोभूमि एवं सिद्धक्षेत्र कहा गया है। विद्वान् पुरुष प्रभास, प्रयाग, नैमिषारण्य, पुष्कर और कुरुक्षेत्रसे भी बढ़कर उस क्षेत्रकी महिमा बताते हैं। वहाँ मेरे श्वशुर पर्वतराज हिमवान् स्वयं विराजते हैं। गङ्गा, जो नदियोंमें उत्तम मानी जाती हैं। उनका तथा अन्य कई श्रेष्ठ नदियोंका वहींसे उद्गम होता है। वह उत्तम क्षेत्र परम पुण्यमय है। सभी श्रेष्ठ नद-नदियाँ तथा तीर्थ वहाँसे प्रकट होते हैं। वहाँके सभी पर्वत पुण्यस्वरूप हैं। वहीं मेरा आश्रम होगा। सिद्ध और चारण उस आश्रमकी सेवा करेंगे। वहाँ मेरा विग्रह शैलेश्वर नामसे विख्यात होगा। धारारूपसे बहनेवाली नदियोंमें श्रेष्ठ एवं पुण्यमयी वागमती नामकी नदी भी वहाँसे बहकर हिमालय आयेगी। भागीरथी और वेगवती नामकी नदियाँ परम पवित्र हैं। इनका कीर्तन करनेसे भी मनुष्योंका पाप भस्म हो जाता है और दर्शन करनेसे तो प्राणी सम्पूर्ण ऐश्वर्योंको प्राप्त कर लेता है। इन श्रेष्ठ नदियोंका जल पीने तथा अवगाहन करनेसे पुरुष अपने सात कुलोंको तार देता है। उस तीर्थकी महिमाको स्वयं लोकपाल भी गाते हैं। वहाँ जो स्नान करते हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं और जिनकी वहाँ मृत्यु होती है, उन्हें पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता। जो लोग बार-बार वहाँ नित्य स्नान और मेरी पूजा करते हैं, उनपर परम प्रसन्न होकर मैं संसार-सागरसे उनका उद्धार कर देता हूँ। जो उसके जलसे भरा हुआ एक

अध्याय २१५] गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन ३१५


घड़ा लाकर मनको पवित्र करके श्रद्धापूर्वक उससे मुझे स्नान कराता है, वह वेद एवं वेदाङ्गके ज्ञाता श्रोत्रिय ब्राह्मणकी सहायतासे मेरा अभिषेक करता है, उसे अग्निहोत्रका फल सुलभ हो जाता है। उसके तटपर जलका भेदन करके मृगशृङ्गोदक नामसे प्रसिद्ध मेरी एक प्रतिमा प्रकट हुई है, जो मुनिजनोंको अत्यन्त प्रिय है। वहाँ सावधान होकर सिरपर जल फेंकते हुए स्नान या अभिषेक करना चाहिये, इससे जीवनभरके किये हुए सभी पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं। वहीं 'पञ्चनद' नामका भी एक पवित्र तीर्थ है, जहाँ ब्रह्मर्षिगण निवास करते हैं। वहाँ केवल स्नान करनेमात्रसे प्राणी 'अग्निष्टोम' यज्ञका फल प्राप्त कर लेता है। वागमती नदी यहाँ साठ हजार दिव्य गौवोंकी रक्षा करती है, अतः उसे कृतघ्न अथवा पापी मानव प्राप्त करनेमें असमर्थ हैं। जो सदा पवित्र रहते हैं, इष्टदेवतापर जिनकी श्रद्धा रहती है तथा जो सत्यका पालन करते हैं, ऐसे मानवोंको ही वागमतीमें स्नान करनेका सौभाग्य प्राप्त होता है और वे उत्तम गतिको प्राप्त कर लेते हैं। जो दुःखी, भयभीत एवं संतप्त मनुष्य हैं अथवा जो व्याधियोंसे सतत कष्ट पाते रहते हैं, ऐसे व्यक्ति भी यदि इसमें स्नानकर मुझ 'पशुपतिनाथ'का दर्शन यहाँ करते हैं तो वे परम पवित्र हो जाते हैं और उन्हें शाश्वत शान्ति प्राप्त हो जाती है, इसमें कोई संशय नहीं है। उसमें स्नान करनेवाले पुरुषके सम्पूर्ण पाप मेरी कृपासे नष्ट हो जाते हैं, इतना ही नहीं, ईति¹ आदि सभी उग्र उपद्रव भी सर्वथा शान्त हो जाते हैं। वागमती सम्पूर्ण नदियोंमें प्रधान है। उसके जलमें जो स्नानकर मेरा दर्शन करते हैं, उनके अन्तःकरण शुद्ध एवं पवित्र हो जाते हैं। इस 'वागमती'के जलमें मानव जहाँ-जहाँ स्नान करता है, वहाँ-वहाँ उसे राजसूय और अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। यह क्षेत्र एक योजनके भीतर चारों ओर फैला हुआ है।

जिस स्थानपर मैं स्वयं नागेश्वर रुद्ररूपमें विराजमान रहता हूँ, उसको मूल क्षेत्र जानना चाहिये। उसके पूर्व और दक्षिणके भागमें नागराज वासुकि²का एक स्थान है। ये हजार अन्य नागोंके साथ मेरे दरवाजेपर सदा स्थित रहते हैं। जो लोग मेरे क्षेत्रमें प्रवेश करना चाहते हैं, वासुकिका काम उनके सामने विघ्न उपस्थित करना है। पर जो पहले उन्हें नमस्कार करके फिर मुझे प्रणाम करने आनेका कार्यक्रम बनाते हैं, उन प्रवेश करनेवाले पुरुषोंके सामने किसी प्रकारका भी विघ्न उपस्थित नहीं हो पाता। उस क्षेत्रमें जाकर जो मनुष्य परम भक्तिके साथ सदा मेरी वन्दना करता है, उसे पृथ्वीपर राजा होनेका सुयोग्य मिलता है और सभी प्राणी उसका अभिवादन करते हैं। जो मनुष्य गन्धों और मालाओंके द्वारा मेरी मूर्तिका अभ्यर्चन करता है, वह 'तुषित'संज्ञक देवताओंकी योनिमें पैदा होता है, इसमें कोई संशय नहीं। जो व्यक्ति मेरे उस पर्वतपर श्रद्धापूर्वक प्रज्वलित दीप प्रदान करता है, उसकी उत्पत्ति 'सूर्यप्रभ' नामक देवताओंकी योनिमें होती है। जो लोग संगीत-वाद्य, नृत्य-स्तुति अथवा जागरण करके मेरी सेवा, उपासना करते हैं, वे मेरे लोकमें निवासके अधिकारी हो जाते हैं। जो प्राणी दही, दूध, मधु, घृत अथवा जलसे मुझे स्नान कराते हैं, उनपर, बुढ़ापा रोग और मृत्युका वश नहीं चलता। जो मानव श्रद्धाके अवसरपर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको


¹ १. अतिवृष्टिरनावृष्टिः शलभा मूषकाः शुकाः। प्रत्यासन्नाश्च राजानः षडेता ईतयः स्मृताः॥ (कामन्दक-नीतिसार) अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी, चूहे, पक्षी और बगलके राजा—इन छहोंको 'ईति' कहते हैं।
² २. यह वासुकीनाथका वर्णन है। यह देवघर वैद्यनाथ-धामसे २८ मीलपर दुमका जानेवाली सड़कपर है। यहाँ नागेश्वर-ज्योतिर्लिङ्ग है। द्रष्टव्य 'कल्याण'का 'तीर्थाङ्क'।

३९६ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २१५

इस स्थानमें भोजन कराता है, उसे स्वर्गमें अमृत पान करनेका अवसर मिलता है और देवतालोग उसका आदर करते हैं। जो ब्राह्मण इस क्षेत्रमें अनेक प्रकारके व्रत-उपवास, भाँति-भाँतिके हवन, स्वादिष्ट नैवेद्य आदि उपचारोंके द्वारा समुचित श्रद्धासे सम्पन्न होकर मेरी आराधना करते हैं, उन्हें साठ हजार वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करनेका अवसर मिलता है। इसके पश्चात् उन्हें पुनः मृत्यु-लोकमें आना पड़ता है और उन्हें सभी ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं।

यहींके एक स्थानका नाम 'शैलेश्वर' भी है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा स्त्री ही क्यों न हो, यदि वहाँ जाकर भक्तिके साथ मेरी उपासना करते हैं, उन्हें मेरे पार्षद होनेकी सुविधा मिलती है और वे सदा मेरे गणों तथा देवताओंके साथ आनन्दका उपभोग करते हैं। यह 'शैलेश्वर' परम गुह्य स्थान है। इस भूमण्डलमें उससे श्रेष्ठ कहीं भी कोई दूसरा क्षेत्र नहीं है। ब्राह्मण, गुरु अथवा गौका जिसके द्वारा हनन हो गया है अथवा जो सम्पूर्ण पापोंसे लिप्त है, ऐसा मानव भी इस क्षेत्रमें आकर पापोंसे मुक्त हो जाता है। यहाँपर अनेक प्रकारके तीर्थ तथा बहुत-से पवित्र देवता निवास करते हैं। इस तीर्थका जल उनसे सम्बद्ध है। अतः जो मानव उन जलोंका स्पर्श करता है, वह अखिल अघोंसे छुटकारा पा जाता है।

उसके दो कोसकी दूरीपर 'कोशोदक' नामसे प्रसिद्ध एक पवित्र तीर्थ है, जो देवताओंद्वारा निर्मित है। यह मुनियोंको बहुत प्रिय है। यहाँ स्नान करनेसे मनुष्य पवित्र हो जाता है और उसका मन वशमें हो जाता है तथा उसकी सत्यमें रुचि होती है। साथ ही वह पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर सभी प्रकारके उत्तम फलका भागी बन जाता है। महात्मा शैलेश्वरके दक्षिण भागमें वह अविनाशी तीर्थ है। जो पुरुष वहाँ जाता है, उसे उत्तम गति प्राप्त होती है। वहीं 'भृगुप्रपतन' नामका स्थान है। उसके प्रभावसे मानव काम और क्रोधसे रहित होकर विमानके द्वारा स्वर्गमें सिधार जाता है। अप्सराओंके समुदायसे उसे सहायता मिलती रहती है। 'भृगुप्रपतन'के आगे एक ब्रह्मोद्भेद नामसे विख्यात तीर्थ है। इसके निर्माता स्वयं ब्रह्माजी हैं। उसका जो फल है, वह भी मैं कहता हूँ; सुनो! जो पुरुष संयमशील बनकर एक वर्षतक वहाँ स्नान करता है, वह ब्रह्माजीके 'विरज' संज्ञक लोकमें जाता है, इसमें कोई संशय नहीं। वहीं 'गो-रक्ष' नामका एक तीर्थ है। उस स्थानपर गायों और बैलोंके अनेक पदचिह्न हैं। उनका दर्शन करनेसे पुरुषको हजार गोदानका फल मिलता है। वहाँ 'गौरीशिखर' (गौरीशंकर) नामक भगवती गौरीका शिखर (चोटी) है, जहाँ सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। शिखरोंसे प्रेम रखनेवाली 'पार्वतीदेवी' वहाँ सदा विराजमान रहती हैं। वहाँ भी जाना चाहिये। संसारकी रक्षा करनेमें उद्यत जगन्माता भगवती उमा वहाँ विराजती हैं। उनके दर्शन, चरणोंके स्पर्श तथा अभिवादन करनेसे मानव उनके लोकमें जानेका अधिकारी हो जाता है। उनके स्थानसे नीचे वागमती नदी प्रवाहित होती है। उसके तटपर जो अपना प्राण त्यागता है, उसके सामने आकाशगामी विमान आता है और उसपर चढ़कर वह तुरंत ही भगवती उमाके लोकमें चला जाता है। वहीं देवी उमासे सम्बन्धित एक स्तनकुण्ड है। जो मानव उसमें स्नान करता है, वह अग्निके समान प्रकाशमान होकर स्वामिकार्तिकेयके लोकमें चला जाता है। यहीं पञ्चनद नामका एक पुण्य तीर्थ

अध्याय २१५ ] गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन [ ३९७

है। ब्रह्मर्षिगण वहाँ निवास करते हैं। वहाँ जाकर केवल स्नान करनेसे प्राणीको अग्निहोत्र-यज्ञका फल मिल जाता है।

एक बार एक नकुलके मनमें सद्बुद्धि उत्पन्न हुई। अतः उसने सावधान होकर वहाँ स्नान किया। इससे उसका मन परम पवित्र बन गया और उसे पूर्वजन्मकी बात याद आ गयी। उसके उत्तर भागमें सिद्धपुरुषोंसे सेवित एक श्रेष्ठ तीर्थ है। उस गुह्यतीर्थका नाम 'प्रान्तकपानीय' है, जिसकी गुह्यकगण निरन्तर रक्षा करते हैं। जो मनुष्य वहाँ पूरे वर्षभर सदा स्नान करता है, उसे उत्तम बुद्धि प्राप्त होती है और वह गुह्यकका शरीर प्राप्तकर भगवान् रुद्रका अनुचर बन जाता है। इस शिखरपर निवास करनेवाली भगवती उमाके पूर्व, उत्तर और दक्षिण-भागोंमें वागमतीकी धारा प्रवाहित होती है। यह पुण्य नदी हिमालयकी कन्दरासे निकली है। वहाँ ब्रह्मोद्भेद नामका एक दूसरा पवित्र तीर्थ भी है। वहाँ जाकर मानवको जलसे आचमन एवं स्नान करना चाहिये। इसके फलस्वरूप उसे मृत्युलोकका दर्शन नहीं होता। उसे किसी प्रकारकी बाधा कष्ट नहीं पहुँचा सकती। वहीं सुन्दरीकातीर्थ है। बहुत पहले ब्रह्माजीने उसका निर्माण किया है। उसके जलमें स्नान करनेसे पुरुष सुन्दर रूपवाला और तेजस्वी हो जाता है। मनुष्यको चाहिये कि तीनों संध्याओंके समयमें वहाँ जाकर संध्योपासन करे। इससे वह पापसे मुक्त हो जाता है। वागमती और मणिवती—ये दोनों पवित्र नदियाँ हिमालयका भेदन करके निकली हैं। इन दोनोंमें पापनाश करनेकी पूरी शक्ति है। जो वेदका पूर्ण विद्वान् द्विज पवित्र होकर दिन-रात वहाँ निवास करता और रुद्रका जप करता है, वह अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त करता है। राजा उसका सम्मान करते हैं। उसके इस कर्मके प्रभावसे उसका सारा कुल तर जाता है। किसी प्रकारका व्यक्ति वहाँ स्नान करके तिल और जलसे तर्पण करता है तो उसके पितर तर जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। जहाँ-जहाँ वागमती नदी प्रवाहित हुई है, वहाँ-वहाँ श्रेष्ठ पुरुषको स्नान करना चाहिये। इसके फलस्वरूप वह मानव तिर्यग्योनिमें जन्म पानेसे मुक्त हो जाता है। किसी समृद्ध कुलमें उसका जन्म होता है। वागमती और मणिवती इन दोनों नदियोंमें थोड़ा भेद है। ऋषिलोग यहाँ निवास करते हैं। बुद्धिमान् पुरुषका कर्तव्य है कि वह काम और क्रोधसे रहित होकर विधानपूर्वक गङ्गाद्वारमें स्नान करे। वहाँ स्नान करनेका जो महान् पुण्यफल बताया गया है, उससे कहीं दसगुना अधिक फल उक्त नदियोंमें स्नान करनेसे प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। इस क्षेत्रमें विद्याधर, सिद्ध, गन्धर्व, मुनि, देवता और यक्ष—इनका समुदाय आकर स्नान करता और उपासनामें सदा संलग्न रहता है। यहाँपर यदि ब्राह्मणोंको थोड़ा भी धन दानमें दिया जाय तो उस दानका पुण्य-फल अक्षय हो जाता है। अतएव देवताओ! सब प्रकारसे प्रयत्न करके यहाँ धर्म-कार्यका सम्पादन करना चाहिये। यह 'श्लेष्मातक'वन परम पुण्य क्षेत्र है। इसमें देवता निवास करते हैं। इससे बढ़कर दूसरा कोई उत्तम क्षेत्र है ही नहीं। प्रिय देववृन्द! मैंने मृगका रूप धारण करके जहाँ-जहाँ विचरण किया अथवा बैठा और सोया करता था, वहाँ-वहाँकी समूची, सब ओरकी भूमि सम्यक् प्रकारसे पुण्यक्षेत्र बन गयी है। सुरगणो! मेरे शृङ्गके ही ये तीन रूप बन गये थे, इसे भली प्रकार हृदयमें धारण कर

३९८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१६

लो। यह मेरा क्षेत्र पृथ्वीमें 'गोकर्णेश्वर'के नामसे प्रसिद्ध होगा।

इस प्रकार सनातन भगवान् रुद्रने देवताओंको आदेश देकर अपना रूप संवरण कर लिया। अब देवता उन्हें देखनेमें असमर्थ हो गये और वे उत्तर दिशाकी ओर चल पड़े। [अध्याय २१५]


'गोकर्णेश्वर' और 'शृङ्गेश्वर' आदिका माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं—मुने! मृगका रूप धारण करनेवाले भगवान् शंकर जब वहाँसे अन्यत्र चले गये तो मुझ सहित उपस्थित सभी प्रधान देवताओंने पुनः परस्पर विचार करना प्रारम्भ किया। उस समयतक भगवान् शंकरका शृङ्ग तीन भागोंमें बँट चुका था। देवसमुदायने यत्नकर वैदिक कर्मके अनुसार भलीभाँति पृथक्-पृथक् उनकी स्थापनाका प्रबन्ध किया। (भगवान् वराहका धरणीके प्रति कथन है—) देवि! वज्रपाणि इन्द्रके हाथमें सींगका अग्रभाग था। शक्तिशाली शंकरके शृङ्गका बिचला भाग (ब्रह्माजी कहते हैं—) मैंने ले रखा था। फिर देवराजने तथा मैंने उन भागोंको वहीं विधिपूर्वक स्थापित कर दिया। तब देवताओं, सिद्धों, देवर्षियों और ब्रह्मर्षियोंके प्रयाससे वह इस परम विशिष्ट मूर्तिकी 'गोकर्ण' नामसे प्रतिष्ठा हो गयी। श्रीहरिके हाथमें शृङ्गका मूलभाग पड़ा था। उन्होंने देवतीर्थसे उसकी स्थापना कर दी। वह विशाल विग्रह 'शृङ्गेश्वर'के नामसे वहाँ सुशोभित हुआ। शृङ्गमें तीन रूप धारण करके भगवान् शिव विराजते थे। वे ही उन सभी स्थानोंमें प्रतिष्ठित हो गये। वस्तुतः वे एक ही अनेक रूपोंमें अभिव्यक्त हैं। उन्होंने उस मृगके शरीरमें अपने सौ भागोंको स्थान दिया था। फिर उस शृंगमें तीन प्रकारसे विभक्त भागोंको स्थापितकर सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न भगवान् शंकर उस मृगरूपी शरीरसे पृथक् होकर हिमालय पर्वतके शिखरपर पधार गये। पर्वतोंके राजा हिमालयपर सर्वसमर्थ शिवकी सैकड़ों मूर्तियाँ सुप्रतिष्ठित हैं। ये तीन प्रकारके विग्रह प्रभुके एक सींगमें ही सर्वप्रथम सुशोभित थे।

भगवान् शंकर समस्त संसारके शासक हैं। देवता और दानव सभी उन्हें अपना गुरु मानते हैं। उस समय उन सभीने अत्यन्त कठिन तपस्याके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना की और अनेक प्रकारके वर प्राप्त किये। 'श्लेष्मातक' वनका समस्त भूभाग चारों ओरसे देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, यक्षों और महोरगोंके द्वारा भरा रहता था। तीर्थयात्राके विचारसे वे वहाँ आते और प्रदक्षिणा करनेमें संलग्न हो जाते थे। तीर्थोंके दर्शनसे फल प्राप्त होता है—यह भावना उनके मनमें भरी रहती थी तथा इस क्षेत्रका महान् फल भी उन्हें विदित था। प्रायः सभी सुरगण जहाँ-जहाँ तीर्थ हैं, वहाँ जाते और उस स्थानसे पुनः इस 'श्लेष्मातक' तीर्थमें पधारते थे। एक दिन पुलस्त्य ऋषिका पौत्र रावण भी वहाँ आया। उसके साथ उसके दोनों भाई भी वहाँ आये थे। उसने अत्यन्त उग्र तपस्या करके भगवान् शंकरकी आराधना की। वहाँ सनातन श्रीशिवजी 'गोकर्णेश्वर' नामसे प्रतिष्ठित थे। जब रावणने उनकी असीम शुश्रूषा की, तब वे वर देनेमें कुशल प्रभु स्वयं उसपर संतुष्ट हो गये। ऐसी स्थितिमें रावणने तीनों लोकोंपर विजय पानेके लिये उनसे वर माँग लिया। अन्तमें भगवान् शंकरकी कृपासे उसकी सारी मनःकामनाएँ पूरी हो गयीं। उन परम प्रभुने रावणकी बार-बार सहायता की। फिर उसी क्षण

अध्याय २१७ ] वराहपुराणकी फल-श्रुति [ ३९९

त्रिलोकीपर विजय प्राप्त करनेके विचारसे उसने अपने नगरसे प्रस्थान कर दिया। तीनों लोकोंको जीतकर उसने इन्द्रपर भी अपना अधिकार जमा लिया। इन्द्रजित् नामका उसका पुत्र उसे सहयोग दे रहा था। उस समय बहुत पहले इन्द्रने जो भगवान् शम्भुके सींगका अग्रभाग लेकर अपने यहाँ स्थापित किया था, उसे अपने पुत्रसहित रावणने उखाड़ लिया। पर जब वह राक्षस उसे लेकर अपनी पुरीको जा रहा था और सिन्धुके तटपर पहुँचा तो उस मूर्तिको जमीनपर रखकर मुहूर्तभर संध्या करने लगा। फिर संध्या समाप्त होनेपर जब उसने उसे बलपूर्वक उठानेकी चेष्टा की तो वह उसे उठा न सका और वह मूर्ति वज्रके समान कठोर बन गयी। तब रावणने उसे वहीं छोड़ दिया और लङ्काकी यात्रा की। (भगवान् वराह पृथ्वीसे कहते हैं—) महामते! तुम्हें इसी मूर्तिको ‘दक्षिणगोकर्णेश्वर’ समझना चाहिये। भूतपति भगवान् शंकर वहाँ स्वयं प्रतिष्ठित हुए हैं।'

**ब्रह्माजी कहते हैं—**मुने! मैंने तुम्हें विस्तारके साथ ये सभी बातें कह सुनायीं। इसी तरह महात्मा गोकर्णकी उत्तर दिशामें भी प्रतिष्ठा हुई है। विप्रर्षे! जैसे दक्षिणमें भगवान् ‘शृङ्गेश्वर’की प्रतिष्ठा हुई है, उसी क्रमसे उत्तरमें भगवान् ‘शैलेश्वर’ विराजते हैं। वत्स! मैं तुमसे इस क्षेत्रके तीर्थोंकी महान् उत्पत्तिका प्रसङ्ग कह चुका। अब तुम मुझसे दूसरा कौन-सा प्रसङ्ग सुनना चाहते हो। [अध्याय २१६]


वराहपुराणकी फल-श्रुति

**सनत्कुमारजी कहते हैं—**भगवन्! आपने यथावत् मेरी सभी शङ्काओंका निराकरणकर सारी बातें स्पष्ट कर दीं। मैं संशयकी बातें पूछता रहा और आप उन्हें भलीभाँति स्पष्ट करते रहे हैं। विश्वस्वरूप ‘स्थाणु’ जगदीश्वर भगवान् शंकर अप्रतिम तेजस्वी हैं। वे जंगलमें आनन्दपूर्वक विचर रहे थे। वह जंगल पुण्यक्षेत्र था। महाभाग! जगत्का कल्याण करनेके लिये उनका विग्रह एवं शृङ्ग जिस प्रकार प्रतिष्ठित हुआ तथा जैसे वे स्थान तीर्थ बन गये, मैं उसे सुनना चाहता हूँ। जगत्प्रभो! आप यथार्थरूपसे उसका वर्णन करनेकी कृपा कीजिये।

**ब्रह्माजीने कहा—**महामुने! इन सभी तीर्थोंके फलका जो निश्चित रूप बतलाया गया है, उसका शेष भाग तुमसे पुलस्त्यजी कहेंगे*। तुम इस समय मुनियोंके अग्रणी बनकर इस वनमें विराजो। तात! तुम मेरे समान ही वेद और वेदाङ्गके तत्त्वको भलीभाँति जाननेवाले पुत्र हो। जो पुरुष इस प्रसङ्गको सुनेगा, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूट जायगा। यही नहीं, वह यशस्वी, कीर्तिमान् होकर इस लोकमें और परलोकमें भी पूज्य होगा। चारों वर्णोंके व्यक्तियोंका कर्तव्य है कि वे मन और इन्द्रियोंको सावधान करके निरन्तर इस प्रसङ्गका श्रवण करें। यह कथानक परम मङ्गलस्वरूप, कल्याणमय, धर्म, अर्थ और कामका साधक, समस्त मनोरथोंका प्रदान करनेवाला, परम पवित्र, आयुवर्धक और विजय देनेमें सक्षम है। यह धन और यश देनेवाला, पापका नाशक, कल्याणकारी और शान्तिकारक है। इस पुराणको सुननेसे मनुष्यकी लोक-परलोकमें


* वह वराहपुराणका अंश खिलरूप है, जिसपर आगेके लेखोंमें पर्याप्त विचार प्राप्त होगा।

४००संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय २१७

दुर्गति नहीं होती। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इसका श्रवण-कीर्तन करता है, वह स्वर्गमें प्रतिष्ठित होता है।

सूतजी कहते हैं— विप्रवरो! परमेष्ठी प्रजापति ब्रह्माजीने सनत्कुमारजीसे ये सब बातें कहकर विराम लिया। उन सभी बातोंका मैंने भी आप लोगोंसे तत्त्वपूर्वक वर्णन किया। ऋषिवरो! भगवान् वराह और पृथ्वीदेवीके संवादका यह सारभाग है। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक सदा इसका पठन, श्रवण अथवा मनन करेगा, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर परमगति प्राप्त करेगा। प्रभासक्षेत्र, नैमिषारण्य, हरिद्वार, पुष्कर, प्रयाग, ब्रह्मतीर्थ और अमरकण्टकमें जानेसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, उससे कोटिगुणा अधिक फल इस पुराणके श्रवण एवं पठनसे होता है। श्रेष्ठ ब्राह्मणको कपिला दान करनेपर जो फल मिलता है, उतना फल इस वराहपुराणके एक अध्यायका श्रवण करनेसे हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। पवित्र होकर सावधानीके साथ इस पुराणके दस अध्यायोंका श्रवण करनेपर मनुष्य 'अग्निष्टोम' एवं 'अतिरात्र' यज्ञोंके फलका भागी हो जाता है। जो बुद्धिमान् व्यक्ति उत्तम भक्तिके साथ निरन्तर इसका श्रवण करता रहता है, उसे भगवान् वराहके वचनानुसार यज्ञों, सभी दानों तथा अखिल तीर्थोंके अभिषेकका फल प्राप्त हो जाता है, इसमें कोई संदेहकी बात नहीं। पुत्रहीन व्यक्ति इसके श्रवणसे पुत्रको और पुत्रवान् सुन्दर पौत्रको प्राप्त करता है। जिसके घरमें यह वराहपुराण लिखित रूपमें रहता है और उसकी पूजा होती है, उसपर भगवान् नारायण पूर्ण संतुष्ट हो जाते हैं।

वसुंधरे! इस पुराणका श्रवण करके सनातन भगवान् विष्णुकी भाँति चन्दन, पुष्प और वस्त्रोंसे पूजा करनी चाहिये और ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। यदि राजा हो तो उसे अपनी शक्तिके अनुसार ग्राम आदिका दान करना चाहिये। जो मानव पवित्र होकर संयतचित्तसे इस पुराणका श्रवण करके इसकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर श्रीहरिका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। (अध्याय २१७)

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श्रीवराहपुराण समाप्त

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