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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४११

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ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४११


| तथा विद्युति त्वचि हृदये चैका देवता। तेजस्वीति विशेषणम्, तस्यास्तत्फलम्—तेजस्वी ह भवति तेजस्विनी हास्य प्रजा भवति। विद्युतां बहुत्वस्याङ्गीकरणादात्मनि प्रजायां च फलबाहुल्यम् ॥ ४ ॥ | इसी प्रकार विद्युत्, त्वचा और हृदयमें भी एक ही देवता है। 'तेजस्वी' यह उसका विशेषण है। उसका यह फल है—वह तेजस्वी होता है और उसकी प्रजा भी तेजस्विनी होती है। विद्युतोंका बाहुल्य अङ्गीकार किया गया है, इसलिये अपने और प्रजाके लिये फलकी बहुलता भी सम्भव है ॥४॥ |


गार्ग्यद्वारा आकाश-ब्रह्मका उपदेश और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

स होवाच गार्ग्यो य एवायमाकाशे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादिष्ठाः पूर्णमप्रवर्तीति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिर्नास्यास्माल्लोकात्प्रजोद्वर्तते ॥ ५ ॥

वह गार्ग्य बोला, 'यह जो आकाशमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। मैं उसकी पूर्ण और अप्रवर्तीरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह प्रजा और पशुओंसे पूर्ण होता है और इस लोकमें उसकी प्रजाका उच्छेद नहीं होता' ॥ ५ ॥

| तथा आकाशे हृद्याकाशे हृदये चैका देवता। पूर्णमप्रवर्ति चेति | इसी प्रकार आकाश, हृदयाकाश और हृदयमें भी एक ही देवता है। उसके 'पूर्ण' और 'अप्रवर्ति' ये दो |

४१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

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४१२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| विशेषणद्वयम् । पूर्णत्वविशेषण-फलमिदम्—पूर्यते प्रजया पशुभिः; अप्रवर्तिविशेषणफलम्—नास्यास्माल्लोकात्प्रजोद्वर्तत इति, प्रजासन्तानाविच्छित्तिः ॥ ५ ॥ | विशेषण हैं। पूर्णत्व-विशेषणका यह फल है कि वह प्रजा और पशुओंसे पूर्ण होता है तथा 'अप्रवर्ति' विशेषणका यह फल है कि इस लोकमें उसकी प्रजाका उद्वर्तन नहीं होता—प्रजासंतानका विच्छेद नहीं होता ॥ ५ ॥ |

गार्ग्यद्वारा वायु-ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

स होवाच गार्ग्यो य एवायं वायौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते जिष्णुर्हापराजिष्णुर्भवत्यन्यतस्त्यजायी ॥ ६ ॥

वह गार्ग्य बोला, 'यह जो वायुमें पुरुष है इसकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। इसकी तो मैं इन्द्र, वैकुण्ठ और अपराजिता सेना—इस रूपसे उपासना करता हूँ।' जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह विजयी, कभी न हारनेवाला और शत्रुविजेता होता है' ॥ ६ ॥

| तथा वायौ प्राणे हृदि चैका देवता । तस्या विशेषणम्—इन्द्रः परमेश्वरः वैकुण्ठोऽप्रसह्यः, न परैर्जितपूर्वा पराजिता सेना—मरुतां गणत्व- | इसी प्रकार वायु, प्राण और हृदयमें भी एक ही देवता है। उसके विशेषण हैं-इन्द्र—परमेश्वर, वैकुण्ठ-जो विशेषरूपसे सहन न किया जा सके और अपराजिता सेना-जो सेना पहले दूसरोंके द्वारा पराजित न हुई हो। मरुत्नामक देवताओंका गणत्व (एक समूहरूप होना) |

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४१३

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ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४१३


| प्रसिद्धेः । उपासनफलमपि—<br><br>जिष्णुर्ह जयनशीलोऽपराजिष्णुर्न च परैर्जितस्वभावो भवति, अन्यतस्त्यजायी अन्यतस्त्यानां सपत्नानां जयनशीलो भवति ॥६॥ | प्रसिद्ध है [ इसलिये उन्हें 'सेना' कहा है ]। उपासनाका फल भी इस प्रकार है—जिष्णु-जयनशील, अपराजिष्णु—दूसरोंसे पराजित न होनेके स्वभाववाला और अन्यतस्त्यजायी—अन्यतस्त्य अर्थात् शत्रुओंको जीतनेवाला होता है ॥ ६ ॥ |


गार्ग्यद्वारा अग्निब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

स होवाच गार्ग्यो य एवायमग्नौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते विषासहिर्ह भवति विषासहिर्हास्य प्रजा भवति ॥ ७ ॥

वह गार्ग्य बोला, 'यह जो अग्निमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। इसकी तो मैं विषासहिरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह निश्चय ही विषासहि होता है और उसकी प्रजा भी विषासहि होती है' ॥ ७ ॥


| अग्नौ वाचि हृदि चैका देवता ।<br><br>तस्या विशेषणम्—विषासहिर्मर्षयिता परेषाम् । अग्निबाहुल्यात् फलबाहुल्यं पूर्ववत् ॥ ७ ॥ | अग्नि, वाक् और हृदय एक ही देवता है । उसका विशेषण है 'विषासहि' अर्थात् दूसरोंको सहन करनेवाला। पूर्ववत् अग्निकी बहुलता होनेके कारण उसके फलकी भी बहुलता है ॥ ७ ॥ |


१. अग्निमें जो हविष्य डाला जाता है उसे वह भस्म करके सहन कर लेता है, इसलिये अग्नि विषासहि—सहन करनेवाला है।

४१४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २

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४१४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २


गार्ग्यद्वारा जलान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

स होवाच गार्ग्यो य एवायमप्सु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते प्रतिरूपꣳहैवैनमुपगच्छति नाप्रतिरूपमथो प्रतिरूपोऽस्माजायते ॥ ८ ॥

वह गार्ग्य बोला, 'यह जो जलमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। इसकी मैं 'प्रतिरूप' रूपसे उपासना करता हूँ।' जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है उसके पास प्रतिरूप ही आता है, अप्रतिरूप नहीं आता और उससे प्रतिरूप [ पुत्र ] उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥

अप्सु रेतसि हृदि चैका देवता। तस्या विशेषणम्—प्रतिरूपोऽनुरूपः श्रुतिस्मृत्यप्रतिकूल इत्यर्थः। फलम्—प्रतिरूपं श्रुतिस्मृतिशासनानुरूपमेव एनमुपगच्छति प्राप्नोति, न विपरीतम्, अन्यच्च—अस्मात्तथाविध एवोपजायते ॥ ८ ॥जल, वीर्य और हृदयमें एक ही देवता है। उसका विशेषण है-प्रतिरूप-अनुरूप अर्थात् श्रुति और स्मृतिके अनुकूल। उसकी उपासनाका फल-उसके पास प्रतिरूप अर्थात् श्रुतिस्मृतिकी आज्ञाके अनुरूप पदार्थ ही जाता-प्राप्त होता है, उससे विपरीत नहीं। इसके सिवा, उससे वैसा ही [ पुत्र ] उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥

गार्ग्यद्वारा आदर्शान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

स होवाच गार्ग्यो य एवायमादर्शे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१५

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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१५


रोचिष्णुरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेव मुपास्ते रोचिष्णुर्ह भवति रोचिष्णुर्हास्य प्रजा भवत्यथो यैः सन्निगच्छति सर्वाँ स्तानतिरोचते ॥ ६ ॥

वह गार्ग्य बोला, 'यह जो दर्पणमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। इसकी तो मैं रोचिष्णु (देदीप्यमान) रूपसे उपासना करता हूँ।' जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह निश्चय रोचिष्णु होता है, उसकी प्रजा भी रोचिष्णु होती है और उसका जिनसे सङ्गम होता है, उन सबसे बढ़कर वह दीप्तिमान् होता है ॥ ६ ॥

| आदर्श प्रसादस्वभावे चान्यत्र खड्गादौ हार्दे च सत्त्वशुद्धिस्वाभाव्ये चैका देवता; तस्या विशेषणम्—रोचिष्णुर्दीप्तिस्वभावः; फलं च तदेव । रोचनाधारबाहुल्यात्फलबाहुल्यम् ॥ ९ ॥ | स्वभावतः स्वच्छ दर्पण और ऐसे ही खड्गादि अन्य पदार्थोंमें तथा स्वभावतः शुद्ध सत्त्वयुक्त हृदयमें एक ही देवता है। उसका विशेषण रोचिष्णु अर्थात् दीप्तिशाली है तथा वही फल भी है। दीप्तिके आधारोंकी बहुलता होनेके कारण फलकी भी बहुलता है ॥ ६ ॥ |

गार्ग्यद्वारा प्राणब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

स होवाच गार्ग्यो य एवायं यन्तं पश्चाच्छब्दोऽनूदेत्येतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा असुरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते सर्वँहैवास्मिँल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालात्प्राणो जहाति ॥ १० ॥

वह गार्ग्य बोला, 'जानेवालेके पीछे जो यह शब्द उत्पन्न होता है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं,

४१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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४१६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। इसकी तो मैं प्राणरूपसे उपासना करता हूँ।' जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है वह इस लोकमें पूर्ण आयु प्राप्त करता है, इसे प्राण समयसे पहले नहीं छोड़ता ॥१०॥

| यन्तं गच्छन्तं य एवायं शब्दः पश्चात्पृष्ठतोऽनूदेत्यध्यात्मं च जीवनहेतुः प्राणः, तमेकीकृत्याह; असुः प्राणो जीवनहेतुरिति गुणस्तस्य फलम्—सर्वमायुरस्मिँल्लोक एतीति—यथोपात्तं कर्मणा आयुः, कर्मफलपरिच्छिन्नकालात्पुरा पूर्वं रोगादिभिः पीड्यमानमप्येनं प्राणो न जहाति ॥ १० ॥ | ‘यन्तम्’—जाते हुए [ वायु ] के पीछे जो यह शब्द उदित होता है और जो अध्यात्मपक्षमें जीवनका हेतुभूत प्राण है, उनको यहाँ एक करके कहा है। ‘असु-प्राण अर्थात् जीवनका हेतु’—यह उसका गुण है। उसका फल यह है कि वह इस लोकमें पूर्ण आयु प्राप्त करता है—उसे कर्मवश जितनी आयु प्राप्त होती है [ उसका वह भोग करता है ] । उसके कर्मफलसे मर्यादित समयसे पूर्व, रोगादिसे पीड़ित होनेपर भी, प्राण उसे नहीं छोड़ता ॥ १० ॥ |

गार्ग्यद्वारा दिग्ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

स होवाच गार्ग्यो य एवायं दिक्षु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते द्वितीयवान्ह भवति नास्माद्गणश्छिद्यते ॥ ११॥

वह गार्ग्य बोला, 'यह जो दिशाओंमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो; मैं इसकी द्वितीय और अनपगरूपसे उपासना करता हूँ।'

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१७

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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१७

जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह द्वितीयवान् होता है और उससे गणका विच्छेद नहीं होता ॥ ११ ॥

| दिक्षु कर्णयोर्हृदि चैका देवता अश्विनौ देवाववियुक्तस्वभावौ। गुणस्तस्य द्वितीयवत्त्वमनपगतत्वमवियुक्तता चान्योन्यं दिशामश्विनोश्चैवं धर्मित्वात्। तदेव च फलमुपासकस्य—गणाविच्छेदो द्वितीयवत्त्वं च ॥ ११ ॥ | दिशा, कर्ण और हृदयमें एक ही देवता अश्विनीकुमार हैं जो कभी वियुक्त होनेवाले नहीं हैं। अतः उस देवताका गुण द्वितीयवत्त्व और अनपगत्व—अवियुक्तता है; क्योंकि दिशा और अश्विनीकुमार ये परस्पर ऐसे ही धर्मवाले हैं। तथा इस उपासकको मिलनेवाला फल भी वही है—गणसे विच्छेद न होना और द्वितीयवान् (दूसरेसे युक्त) होना ॥ ११ ॥ |


गार्ग्यद्वारा छायाब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

स होवाच गार्ग्यो य एवायँ छायामयः पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा मृत्युरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते सर्वँहैवास्मिँल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालान्मृत्युरागच्छति ॥ १२ ॥

वह गार्ग्य बोला, 'यह जो छायामय पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। इसको तो मैं मृत्युरूपसे उपासना करता हूँ।' जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह इस लोकमें सारी आयु प्राप्त करता है और इसके पास समयसे पहले मृत्यु नहीं आता ॥ १२ ॥

| छायायां बाह्ये तमस्यध्यात्मं च आवरणात्मकेऽज्ञाने हृदि चैका | छायामें—बाह्य अन्धकारमें और शरीरान्तर्गत आवरणरूप अज्ञानमें तथा हृदयमें भी एक ही देवता है। |

बृ० उ० २७—

४१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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४१८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| देवता । तस्या विशेषणं मृत्युः । फलं सर्वं पूर्ववत्, मृत्योरनागमनेन रोगादिपीडाभावो विशेषः॥१२॥ | उसका विशेषण मृत्यु है । फल सारा पहलेही¹के समान है, मृत्युके न आने-से रोगादि पीडाका अभाव रहना—इतना विशेष है ॥ १२ ॥ |


गार्ग्यद्वारा देहान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

स होवाच गार्ग्यो य एवायमात्मनि पुरुष एत-
मेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मि-
न्संवदिष्ठा आत्मन्वीति वा अहमेतमुपास इति स य
एतमेवमुपास्त आत्मन्वी ह भवत्यात्मन्विनी हास्य
प्रजा भवति स ह तूष्णीमास गार्ग्यः ॥ १३ ॥

वह गार्ग्य बोला 'यह जो आत्मामें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो; इसकी तो मैं आत्मन्वीरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह निश्चय आत्मन्वी होता है और उसकी प्रजा भी आत्मन्विनी होती है।' तब वह गार्ग्य चुप हो गया ॥१३॥

| आत्मनि प्रजापतौ बुद्धौ च हृदि चैका देवता । तस्या आत्मन्वी—आत्मवानिति विशेषणम् । फलम्—आत्मन्वी ह भवत्यात्मवान्भवति, आत्मन्विनी हास्य प्रजा भवति । बुद्धिबहुलत्वात्प्रजायां | आत्मामें अर्थात् प्रजापति, बुद्धि और हृदयमें भी एक ही देवता है । उसका 'आत्मन्वी' अर्थात् 'आत्मवान्' यह विशेषण है । फल—आत्मन्वी अर्थात् आत्मवान् होता है' तथा उसकी प्रजा भी आत्मन्विनी होती है । बुद्धियोंकी बहुलता |


१. दशम मन्त्रोक्त फलके समान ।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१९

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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१९


| सम्पादनमिति विशेषः। स्वयं परिज्ञातत्वेनैव क्रमेण प्रत्याख्यातेषु ब्रह्मसु स गार्ग्यः क्षीणब्रह्मविज्ञानोऽप्रतिभासमानोत्तरस्तूष्णीमवाक्शिरा आस ॥ १३ ॥ | होनेके कारण प्रजामें भी उस फलका सम्पादन होता है—यह विशेष बात है। अपनेको ज्ञात होनेके कारण अजातशत्रुद्वारा गार्ग्यके बतलाये हुए ब्रह्मोंका इस प्रकार क्रमशः प्रत्याख्यान होनेपर जिसका ब्रह्मज्ञान क्षीण हो गया है, वह गार्ग्य कोई उत्तर न सूझनेके कारण चुप और नतमस्तक हो गया ॥ १३ ॥ |

गार्ग्यका पराभव और अजातशत्रुके प्रति उसकी उपसत्ति

| तं तथाभूतमालक्ष्य गार्ग्यम्— | उस गार्ग्यको ऐसी स्थितिमें देखकर— |

स होवाचाजातशत्रुरेतावन्नू ३ इत्येतावद्धीति नैतावता विदितं भवतीति स होवाच गार्ग्य उप त्वा यानीति ॥ १४ ॥

वह अजातशत्रु बोला, 'बस, क्या इतना ही है?' [गार्ग्य—] 'हाँ, इतना ही है।' [अजातशत्रु—] 'इतनेसे तो ब्रह्म विदित नहीं होता।' वह गार्ग्य बोला, 'मैं तुम्हारे प्रति उपसन्न होऊँ' ॥ १४ ॥

| स होवाचाजातशत्रुः—एतावन्नू३ इति। किमेतावद्ब्रह्म निर्ज्ञातम्, आहोस्विदधिकमप्यस्तीति ? इतर आहैतावद्धीति । नैतावता विदितेन ब्रह्म विदितं भवतीत्याहाजातशत्रुः, किमर्थं गर्वितोऽसि ब्रह्म ते ब्रवाणीति । | वह अजातशत्रु बोला, 'क्या इतना ही है?' अर्थात् 'क्या तुम्हें इतना ही ब्रह्म विदित है या इससे कुछ अधिक भी जानते हो?' गार्ग्यने कहा, 'बस इतना ही जानता हूँ।' अजातशत्रुने कहा, 'इतना जाननेसे तो ब्रह्म नहीं जाना जाता। फिर तुम ऐसा गर्व क्यों करते थे कि मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूँगा।' |

४२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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४२०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
SanskritHindi
किमेतावद्विदितं विदितमेव न भवति ? इत्युच्यते—न, फलवद्विज्ञानश्रवणात् । न चार्थवादत्वमेव वाक्यानामवगन्तुं शक्यम्; अपूर्वविधानपराणि हि वाक्यानि प्रत्युपासनोपदेशं लक्ष्यन्ते—'अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानाम्' इत्यादीनि । तदनुरूपाणि च फलानि सर्वत्र श्रूयन्ते विभक्तानि । अर्थवादत्वे एतदसमञ्जसम् ।तो क्या इतना जानना जानना ही नहीं होता ? इसपर कहते हैं—ऐसी बात नहीं है, यहाँ तो फलयुक्त विज्ञान (उपासना) का श्रवण है। इन वाक्योंको अर्थवाद भी नहीं माना जा सकता; क्योंकि ये 'अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानाम्' इत्यादि वाक्य प्रत्येक उपासनाके उपदेशमें अपूर्व विधि करनेवाले दिखायी देते हैं। और उनके अनुसार ही सर्वत्र अलग-अलग फल सुने जाते हैं। अर्थवाद होनेपर इन सबका सामञ्जस्य नहीं हो सकता।
कथं तर्हि नैतावता विदितं भवतीति ? नैष दोषः, अधिकृतापेक्षत्वात् । ब्रह्मोपदेशार्थं हि शुश्रूषवेऽजातशत्रवेऽमुख्यब्रह्मविद्गार्ग्यः प्रवृत्तः, स युक्त एव मुख्यब्रह्मविदाजातशत्रुणामुख्यब्रह्मविद्गार्ग्यो वक्तुम्—यन्मुख्यं ब्रह्म वक्तुं प्रवृत्तस्त्वं तन्न जानीष इति । यद्यमुख्यब्रह्मविज्ञानमपि प्रत्याख्यायेत, तदैतावतेति नतो फिर ऐसा क्यों कहा कि इतनेसे ही ब्रह्म ज्ञात नहीं होता ? यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यह कथन अधिकारी पुरुषोंकी अपेक्षासे है। अमुख्य ब्रह्मको [परब्रह्मरूपसे] जाननेवाला गार्ग्य ब्रह्मोपदेश सुननेके इच्छुक अजातशत्रुको ब्रह्मका उपदेश करनेके लिये प्रवृत्त हुआ था। अतः मुख्य ब्रह्मवेत्ता अजातशत्रुद्वारा अमुख्य ब्रह्मज्ञ गार्ग्यके प्रति ऐसा कहा जाना उचित ही है कि जिस मुख्य ब्रह्मका उपदेश करनेके लिये तुम प्रवृत्त हुए थे, उसे तुम नहीं जानते हो। यदि यहाँ अमुख्य ब्रह्मके विज्ञानका भी निषेध किया गया होता तो 'इतनेही-

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४२१

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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४२१

| ब्रूयात्, न किञ्चिज्ज्ञातं त्वयेत्येवं ब्रूयात्। तस्माद्भवन्त्येतावन्त्यविद्याविषये ब्रह्माणि। एतावद्विज्ञानद्वारत्वाच्च परब्रह्मविज्ञानस्य, युक्तमेव वक्तुम्—नैतावता विदितं भवतीति। अविद्याविषये विज्ञेयत्वं नामरूपकर्मात्मकत्वं चैषां तृतीयेऽध्याये प्रदर्शितम्। तस्मात् 'नैतावता विदितं भवति' इति ब्रुवता अधिकं ब्रह्म ज्ञातव्यमस्तीति दर्शितं भवति।<br><br>तच्चानुपसन्नाय न वक्तव्यम् इत्याचारविधिज्ञो गार्ग्यः स्वयमेवाह—उप त्वा यानीति—उपगच्छानीति त्वाम्, यथान्यः शिष्यो गुरुम् ॥ १४ ॥ | से [ब्रह्मका ज्ञान नहीं होता]' ऐसा नहीं कहा जाता, अपितु यही कहा जाता कि 'तुम कुछ भी नहीं जानते।' अतः इतने ब्रह्म अविद्याके अन्तर्गत हैं। इतना विज्ञान परब्रह्मविज्ञानका द्वार है, इसलिये यह कहना उचित ही है कि 'इतनेसे ब्रह्मका ज्ञान नहीं होता।' ये ब्रह्म अविद्याके क्षेत्रमें विज्ञेय (उपास्य) और नामरूप कर्मात्मक हैं, यह बात तृतीय¹ अध्यायमें दिखायी गयी है। अतः 'इतनेसे ब्रह्मका ज्ञान नहीं होता' ऐसा कहकर यह दिखाया गया है कि अभी इससे अधिक ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करना है।<br><br>उस ब्रह्मका उपदेश अनुपसन्नको (जो शिष्यभावसे शरणमें न आया हो उसको) नहीं करना चाहिये। अतः आचारविधिको जाननेवाला गार्ग्य स्वयं ही कहता है; 'मैं तुम्हारे प्रति उपसन्न होऊँ, जैसे कि कोई दूसरा शिष्य अपने गुरुके प्रति होता है' ॥ १४ ॥ |


गार्ग्यका हाथ पकड़कर अजातशत्रुका एक सोये हुए पुरुषके पास जाना और प्राणोंके नामसे न उठनेपर उसे हाथ दबाकर जगाना

स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं चैतद्यद्ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयाद्ब्रह्म मे वक्ष्यतीति व्येव त्वा ज्ञपयिष्या-


१. उपनिषद्के प्रथम अध्यायमें।

४२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

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४२२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

मीति तं पाणावादायोत्तस्थौ तौ ह पुरुषं सुप्तमाजग्मतुस्तमेतैर्नामभिरामन्त्रयाञ्चक्रे बृहन् पाण्डरवासः सोम राजन्निति स नोत्तस्थौ तं पाणिनापेषं बोधयाञ्चकार स होत्तस्थौ ॥ १५ ॥

उस अजातशत्रुने कहा, 'ब्राह्मण क्षत्रियकी शरणमें इस आशासे जाय कि यह मुझे ब्रह्मका उपदेश करेगा, यह तो विपरीत है। तो भी मैं तुम्हें उसका ज्ञान कराऊँगा ही।' तब वह उसका हाथ पकड़कर उठा और वे दोनों एक सोये हुए पुरुषके पास गये। अजातशत्रुने उसे 'हे बृहन्! हे पाण्डरवास! हे सोम राजन्!' इन नामोंसे पुकारा। परंतु वह न उठा। तब उसे हाथसे दबा-दबाकर जगाया तो वह उठ बैठा ॥ १५ ॥

स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं विपरीतं चैतत् किं तत्? यद्ब्राह्मण उत्तमवर्णे आचार्यत्वेऽधिकृतःसन् क्षत्रियमनाचार्यस्वभावमुपेयात्— उपगच्छेच्छिष्यवृत्त्या ब्रह्म मे वक्ष्यतीति। एतदाचारविधि-शास्त्रेषु निषिद्धम्; तस्मात्तिष्ठ त्वमाचार्य एव सन्। विज्ञापयिष्याम्येव त्वामहं यस्मिन्विदिते ब्रह्म विदितं भवति यत्तन्मुख्यं ब्रह्म वेद्यम्।उस अजातशत्रुने कहा—'यह तो प्रतिलोम—विपरीत है। क्या? यह कि उत्तम वर्ण ब्राह्मण आचार्यत्वका अधिकारी होकर भी, इस उद्देश्यसे कि यह मुझे ब्रह्मका उपदेश करेगा, जिसका आचार्यत्वका स्वभाव नहीं है, उस क्षत्रियके प्रति उपसन्न यानी शिष्यभावसे प्राप्त हो। यह आचारविधिका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंमें निषिद्ध माना गया है; अतः तुम आचार्यरूपसे ही स्थित रहो। फिर भी, जिसका ज्ञान होनेपर ब्रह्मका ज्ञान हो जाता है और जो मुख्य ब्रह्म वेद्य है, उसका ज्ञान मैं तुम्हें कराऊँगा ही।'

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४२३ |

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| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४२३ | | :--- | :--- |


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तं गार्ग्यं सलज्जमालक्ष्य विश्रम्भजननाय पाणौ हस्त आदाय गृहीत्वोत्तस्थावुत्थितवान्। तौ ह गार्ग्याजातशत्रू पुरुषं सुप्तं राजगृहप्रदेशे क्वचिदाजग्मतुरागत्तौ। तं च पुरुषं सुप्तं प्राप्य एतैर्नामभिः ‘बृहन् पाण्डरवासः सोम राजन्’ इत्येतैरामन्त्रयाञ्चक्रे। एवमामन्त्र्यमाणोऽपि स सुप्तो नोत्तस्थौ, तमप्रतिबुध्यमानं पाणिना आपेषमापिष्यापिष्य बोधयाञ्चकार प्रतिबोधितवान्; तेन स होत्तस्थौ। तस्माद्यो गार्ग्येणाभिप्रेतः, नासावस्मिञ्छरीरे कर्त्ता भोक्ता ब्रह्मेति।फिर उस गार्ग्यको लज्जायुक्त देख उसे विश्वास उत्पन्न करनेके लिये वह उसका हाथ पकड़कर खड़ा हुआ। और वे गार्ग्य तथा अजातशत्रु राजभवनके भीतर कहीं सोये हुए पुरुषके पास आये। उस सोये हुए पुरुषके पास पहुँचकर अजातशत्रुने उसे ‘हे बृहन् ! हे पाण्डरवास ! हे सोम राजन् !’ इन नामोंसे पुकारा। इस प्रकार पुकारनेपर भी वह सोया हुआ पुरुष न उठा, तब उस न जागनेवाले पुरुषको हाथसे दबा-दबाकर जगाने लगा, इससे वह उठ बैठा। अतः जिसे गार्ग्य ब्रह्मरूपसे मानता था, वह इस शरीरमें कर्ता-भोक्ता ब्रह्म नहीं है।
कथं पुनरिदमवगम्यते सुप्तपुरुषगमनतत्सम्ब्बोधनानुत्थानैर्गार्ग्याभिमत्तस्य ब्रह्मणोऽब्रह्मत्वं ज्ञापितमिति ?<br>(पार्श्वटिप्पणी: सुप्तपुरुषाभिसरणहेतुः परामृश्यते)**शङ्का—**किंतु यह कैसे जाना जाता है कि सुषुप्त पुरुषके पास जाने, उसे पुकारने और उसके न उठनेसे गार्ग्यके अभिमत ब्रह्मका अब्रह्मत्व सूचित किया गया है ?
जागरितकाले यो गार्ग्याभिप्रेतः पुरुषः कर्त्ता भोक्ता ब्रह्म संनिहितः करणेषु यथा, तथाजातशत्र्वभिप्रेतोऽपि तत्स्वामी भृत्ये-**समाधान—**गार्ग्यका अभिप्रेत जो पुरुष है, वह जिस प्रकार जाग्रत्-अवस्थामें कर्त्ता—भोक्ता ब्रह्म है और वह इन्द्रियोंमें सन्निहित है, उसी प्रकार अजातशत्रुका अभिप्रेत उसका स्वामी भी भृत्योंमें राजाके समान उनमें

४२४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २

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४२४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
ष्विव राजा संनिहित एव । किं तु भृत्यस्वामिनोर्गार्ग्याजातशत्र्वभिप्रेतयोर्विवेकावधारणकारणं तत्सङ्कीर्णत्वादनवधारितविशेषम् । यद्द्रष्टृत्वमेव भोक्तुर्न दृश्यत्वम्, यच्चाभोक्तुर्द्दश्यत्वमेव न तु द्रष्टृत्वम्, तच्चोभयमिह सङ्कीर्णत्वाद्विविच्य दर्शयितुमशक्यमिति सुप्तपुरुषगमनम् ।सन्निहित ही है। किंतु गार्ग्यके माने हुए भृत्यस्थानीय ब्रह्म और अजातशत्रुके अभिमत स्वामिस्थानीय ब्रह्मके पार्थक्यनिश्चयका जो कारण है, वह संकीर्ण (मिला हुआ) है, इसलिये उनके भेदका निश्चय नहीं होता। भोक्तामें द्रष्टृत्व (साक्षित्व) ही है; दृश्यत्व नहीं है, इस प्रकारके विवेक-निश्चयका जो कारण है तथा अभोक्तामें दृश्यत्व ही है, द्रष्टृत्व नहीं है—ऐसे विवेकके निश्चयका जो कारण है, वे दोनों ही यहाँ जागरित अवस्थामें मिले होनेके कारण अलग-अलग करके नहीं दिखाये जा सकते; इसीसे उन दोनोंको सोये हुए पुरुषके पास जाना पड़ा।
[प्राणस्य भोक्तृत्वाभोक्तृत्वविवेचनम्]<br><br>ननु सुप्तेऽपि पुरुषे विशिष्टैर्नामभिरामन्त्रितो भोक्तैव प्रतिपत्स्यते नाभोक्तेति नैष निर्णयः स्यादिति ।पूर्व०—किंतु सुषुप्त पुरुषमें भी विशिष्ट नामोंसे पुकारे जानेपर [चेतन] भोक्ता ही समझेगा, [अचेतन] अभोक्ता नहीं। इसलिये तब भी निर्णय नहीं होगा।
न, निर्धारितविशेषत्वाद्गार्ग्याभिप्रेतस्य; यो हि सत्येनच्छन्नः प्राण आत्मामृतो वागादिष्वनस्तमितो निम्लोचत्सु, यस्यापःसिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि गार्ग्यके अभिमत ब्रह्मका विशेषरूप निश्चित कर दिया गया है। जो सत्यसे आच्छादित प्राण आत्मा अर्थात् अमृत वागादिके अस्त हो जानेपर भी अस्त नहीं होता, जिसका जल

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४२५

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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४२५

| शरीरं पाण्डरवासाः, यथासपत्नत्वाद् बृहन्, यश्च सोमो राजा षोडशकलः, स स्वव्यापारारूढो यथानिर्ज्ञात एवानस्तमितस्वभाव आस्ते। न चान्यस्य कस्यचिद्व्यापारस्तस्मिन्काले गार्ग्येणाभिप्रेयते तद्विरोधिनः। तस्मात्स्वनामभिरमन्त्रितेन प्रतिबोद्धव्यम्, न च प्रत्यबुध्यत। तस्मात्पारिशेष्याद्गार्ग्याभिप्रेतस्याभोक्तृत्वं ब्रह्मणः। | शरीर है, इसलिये जो पाण्डरवासा है तथा जो शत्रुहीन होनेके कारण बृहन् है और जो सोलह कलाओंवाला सोम राजा है, वह अपने व्यापारमें तत्पर हुआ पहले जैसा जाना गया है, उसीके अनुसार अनस्तमितस्वभाव रहता है। इसके सिवा इसके विरोधी किसी अन्यका व्यापार गार्ग्यको उस कालमें अभिमत नहीं है। इसलिये अपने नामोंसे पुकारे जानेपर उसे जागना चाहिये, किंतु वह जागा नहीं। अतः परिशेषरूपसे गार्ग्यके अभिमत ब्रह्मका अभोक्तृत्व ही सिद्ध होता है। | | भोक्तृस्वभावश्चेद् भुञ्जीतैव स्वं विषयं प्राप्तम्। न हि दग्धृस्वभावःप्रकाशयितृस्वभावः सन्वह्निस्तृणोलपादि दाह्यं स्वविषयं प्राप्तं न दहति, प्रकाश्यं वा न प्रकाशयति। न चेद्दहति प्रकाशयति वा प्राप्तं स्वं विषयम्, नासौ वह्निर्दग्धा प्रकाशयिता वेति निश्चीयते। | यदि वह भोक्तृस्वभाव होता तो अपनेको प्राप्त हुए विषयका भोग करता ही। अग्नि जलाने और प्रकाश करनेके स्वभाववाला होकर भी अपनी पहुँचके भीतर आये हुए तृण और उलप (बालतृण) आदि दाह्य पदार्थोंको न जलावे तथा प्रकाश्य वस्तुओंको प्रकाशित न करे—यह नहीं हो सकता। यदि वह अपनी पहुँचके भीतर आये हुए पदार्थोंको भी दग्ध और प्रकाशित नहीं करता तो वह अग्नि जलाने या प्रकाशित करनेवाला है—ऐसा निश्चय नहीं किया |


१. जो स्वभावतः कभी अस्त नहीं होता।

४२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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४२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २


| तथासौ प्राप्तशब्दादिविषयोपलब्धृस्वभावश्चेद् गार्ग्याभिप्रेतः प्राणो बृहन् पाण्डरवास इत्येवमादिशब्दं स्वं विषयमुपलभेत यथा प्राप्तं तृणोलपादि वह्निर्दहेत्प्रकाशयेच्चाव्यभिचारेण तद्वत्। तस्मात्प्राप्तानां शब्दादीनामप्रतिबोधादभोक्तृस्वभाव इति निश्चीयते। न हि यस्य यः स्वभावो निश्चितः, स तं व्यभिचरति कदाचिदपि। अतः सिद्धं प्राणस्याभोक्तृत्वम्। | जा सकता। इसी प्रकार यदि गार्ग्यका अभिमत प्राण अपनेको प्राप्त हुए शब्दोंको ग्रहण करनेके स्वभाववाला है तो अपने विषयभूत बृहन्, पाण्डरवास आदि शब्दको ग्रहण कर लेता, जिस प्रकार कि अपनेको प्राप्त हुए तृण-उलप आदिको अग्नि बिना अपवादके दग्ध और प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार [ यहाँ भी समझना चाहिये ]। अतः अपनेको प्राप्त हुए शब्दादिका ज्ञान न होनेसे यह निश्चय होता है कि प्राण भोक्तृस्वभाव नहीं है; क्योंकि जिसका जो निश्चित स्वभाव होता है वह उसको कभी नहीं त्यागता। इससे प्राणका अभोक्तृत्व ही सिद्ध होता है। | | सम्बोधनार्थनामविशेषेण सम्बन्धाग्रहणादप्रतिबोध इति चेत्? | पूर्वं०-सम्बोधनके लिये प्रयोग किये हुए नामविशेषसे अपना सम्बन्ध ग्रहण न करनेके कारण प्राणका अप्रतिबोध रहा हो तो ? अर्थात् यदि | | स्यादेतत्—यथा बहुष्वासीनेषु<br><br>स्वनामविशेषेण सम्बन्धाग्रहणा-<br><br>न्मायं सम्बोधयतीति, शृण्वन्नपि<br><br>सम्बोधयमानो विशेषतो न प्रति- | ऐसी बात हो कि जिस प्रकार बहुत-से बैठे हुए पुरुषोंमें अपने नामविशेषसे सम्बन्ध ग्रहण न करनेके कारण अर्थात् यह मुझे ही पुकारता है, ऐसा न समझ सकनेके कारण कोई पुरुष पुकारे जानेपर सुनते हुए भी विशेषरूपसे नहीं समझता, |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२७

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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२७


संस्कृतहिन्दी
पद्यते, तथेमानि बृहन्नित्येवमादीनि मम नामानीत्यगृहीतसम्बन्धत्वात्प्राणो न गृह्णाति सम्बोधनार्थं शब्दम्, न त्वविज्ञातृत्वादेवेति चेत् ?उसी प्रकार 'ये बृहत् इत्यादि मेरे ही नाम हैं'—ऐसा सम्बन्ध ग्रहण न करनेके कारण प्राण अपनेको सम्बोधन करनेके लिये प्रयोग किये हुए शब्दोंको ग्रहण नहीं करता, अविज्ञाता होनेके कारण ही नहीं; तो ?
न; देवताभ्युपगमेऽग्रहणानुपपत्तेः। यस्य हि चन्द्राद्यभिमानिनी देवता अध्यात्मं प्राणो भोक्ता अभ्युपगम्यते, तस्य तथा संव्यवहाराय विशेषनाम्ना सम्बन्धोऽवश्यं ग्रहीतव्यः, अन्यथा आह्वानादिविषये संव्यवहारोऽनुपपन्नः स्यात् ।सिद्धान्ती—यह बात नहीं है, क्योंकि देवता माना जानेके कारण उसका नामसे सम्बन्ध ग्रहण न करना सम्भव नहीं है।^१ जिसके मतमें चन्द्र आदिका अभिमानी देवता अध्यात्म प्राण भोक्ता माना जाता है, उसके सिद्धान्तानुसार उस प्रकारके सम्यग् व्यवहारके लिये उसे अपने विशेष नामसे अवश्य सम्बन्ध ग्रहण करना चाहिये; नहीं तो आवाहन आदिके विषयमें ठीक-ठीक व्यवहार होना असम्भव होगा।^२
व्यतिरिक्तपक्षेऽप्यप्रतिपत्तेरयुक्तमिति चेत् ? यस्य च प्राणव्यतिरिक्तो भोक्ता, तस्यापि बृहन्नित्यादिनामभिः सम्बोधने बृहत्त्वादिनाम्नां तदा तद्विषयत्वा-पूर्व०—[ भोक्ताको प्राणादिसे ] व्यतिरिक्त माना जाय तब भी तो वह [ पुकारनेपर ] नहीं समझता, इसलिये तुम्हारा कथन ठीक नहीं है। अर्थात् जिसके मतमें भोक्ता प्राणसे भिन्न है, उसके सिद्धान्तानुसार भी जब उसे बृहन् इत्यादि नामोंसे पुकारा जाय तो

१. क्योंकि देवता सर्वज्ञ होता है।
२. तात्पर्य यह है कि यदि चन्द्राभिमानी देवताको अपने अभिधायक नामके साथ अपने सम्बन्धका ज्ञान न होगा तो उसके उद्देश्यसे किये हुए आवाहन, स्तुति, याग एवं प्रणामादिकी सफलता नहीं होगी।

४२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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४२८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| त्प्रतिपत्तिर्युक्ता । न च कदाचिदपि बृहत्त्वादिशब्दैः सम्बोधितः प्रतिपद्यमानो दृश्यते । तस्मादकारणमभोक्तृत्वे सम्बोधनाप्रतिपत्तिरिति चेत् ? <br><br> न; तद्वतस्तावन्मात्राभिमानानुपपत्तेः । यस्य प्राणव्यतिरिक्तो भोक्ता स प्राणादिकरणवान्प्राणी । तस्य न प्राणदेवतामात्रेऽभिमानो यथा हस्ते । तस्मात्प्राणनामसम्बोधने कृत्स्नाभिमानिनो युक्तैवाप्रतिपत्तिः; न तु प्राणस्यासाधारणनामसंयोगे, देवतात्म- | उसे उसका ज्ञान होना चाहिये; क्योंकि उस समय बृहत्त्वादि नाम उसीको विषय करनेवाले होते हैं । किंतु उसे भी बृहत्त्वादि शब्दोंसे पुकारे जानेपर कभी उनका ज्ञान होता दिखायी नहीं देता । अतः सम्बोधनको न समझना यह अभोक्तृत्वमें कारण नहीं हो सकता—ऐसा कहें तो ? <br><br> सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि प्राणादिमान्‌को केवल प्राणादिमात्रका अभिमान होना सम्भव नहीं है । जिसके मतमें भोक्ता प्राणादिसे भिन्न है [उसके सिद्धान्तानुसार ] वह प्राणादि इन्द्रियोंवाला प्राणी होना चाहिये । उसे प्राणदेवतामात्रमें [आत्मत्वका] अभिमान नहीं हो सकता, जैसे हाथमें [ हाथवालेका अभिमान नहीं होता]। अतः सम्पूर्ण शरीरके अभिमानीको, केवल प्राणका नाम लेकर पुकारे जानेपर उसमें अप्रतिपत्ति होना उचित ही है; किंतु प्राणका, उसके किसी असाधारण नामसे संयोग होनेपर न समझना युक्त नहीं है । १ आत्माको |


१. अभिप्राय यह है कि यदि कोई कहे 'बृहन्' 'पाण्डरवास' आदि नाम साधारण प्राणके वाचक नहीं हैं; अपितु प्राणाभिमानी देवताके वाचक हैं, इसलिये यदि उनके द्वारा किये हुए सम्बोधनको प्राणने ग्रहण नहीं किया तो कोई आपत्ति नहीं हो सकती—तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि जिस प्रकार जातिवाचक गौ

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२९

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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२९


त्वानभिमानाच्चात्मनः।तो देवतात्मत्वका अभिमान न होनेके कारण [ इस प्रकारकी अप्रतिपत्ति हो सकती है ] ।
स्वनामप्रयोगेऽप्यप्रतिपत्तिदर्श-पूर्व०— अपने नामका प्रयोग
नाद्युक्तमिति चेत् ? सुषुप्तस्यकरनेपर भी अप्रतिपत्ति होती देखी
यल्लौकिकं देवदत्तादि नाम तेनापिजाती है, इसलिये ऐसा कहना उचित नहीं। अर्थात् सोये हुए पुरुषका
सम्बोध्यमानः कदाचिन्न प्रति-जो देवदत्तादि लौकिक नाम होता है उसके द्वारा पुकारे जानेपर भी कभी-
पद्यते सुषुप्तः । तथा भोक्तापिकभी सुषुप्त पुरुषको उसका ज्ञान नहीं होता, इसी प्रकार भोक्ता होते
सन्प्राणो न प्रतिपद्यत इति चेत् ?हुए भी प्राणको उसका ज्ञान नहीं होता—यदि ऐसी बात हो तो ?
न, आत्मप्राणयोः सुप्तासुप्तत्व-सिद्धान्ती— नहीं, क्योंकि शरीर और प्राणमें सुप्त और असुप्त रहने-
विशेषोपपत्तेः । सुषुप्तत्वात्प्राण-का भेद उपपन्न है। शरीर सोया रहता है, उसकी इन्द्रियाँ प्राणग्रस्त-
ग्रस्ततयोपरतकरण आत्मा स्वंरहनेके कारण निवृत्त हो जाती हैं; इसलिये उसे अपने नामका प्रयोग
नाम प्रयुज्यमानमपि न प्रति-किये जानेपर भी उसका ज्ञान नहीं होता। किंतु प्राण [ उस समय भी ]
पद्यते । न तु तदसुप्तस्य प्राणस्यनहीं सोता, इसलिये उसका भोक्तृत्व

शब्द प्रत्येक व्यक्तिका भी बोधन करता है, उसी प्रकार व्यापक प्राणको भी प्राणा- भिमानी वायु, चन्द्र इत्यादि देवताओंसे अभिन्न होनेका अभिमान होना ही चाहिये और उनके नामद्वारा पुकारे जानेपर उसकी प्रतिपत्ति भी होनी ही चाहिये । इस- पर यदि कोई कहे कि प्राणव्यतिरिक्त आत्मा भी तो व्यापक है, फिर प्राणाभिमानी देवताओंके नामोंसे उसे ही बोध क्यों नहीं होता ? तो इसके उत्तरमें आगेकी बात कही गयी है ।

४३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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४३०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
भोक्तृत्व उपरतकरणत्वं सम्बोधनाग्रहणं वा युक्तम् ।माननेपर उनमें उपरतकरणत्व और सम्बोधनके अग्रहणकी उपपत्ति नहीं हो सकती ।
अप्रसिद्धनामभिः सम्बोधनमयुक्तमिति चेत्—सन्ति हि प्राणविषयाणि प्रसिद्धानि प्राणादिनामानि, तान्यपोह्य अप्रसिद्धैर्बृहत्त्वादिनामभिः सम्बोधनमयुक्तम्, लौकिकन्यायापोहात् । तस्माद्भोक्तुरेव सतः प्राणस्याप्रतिपत्तिरिति चेत् ?पूर्व०—किंतु अप्रसिद्ध नामोंसे सम्बोधन करना तो उचित नहीं है। प्राणसम्बन्धी प्राण आदि प्रसिद्ध नाम भी हैं ही; उन्हें छोड़कर बृहत्त्वादि अप्रसिद्ध नामोंसे पुकारना तो उचित नहीं है, क्योंकि इससे लौकिक न्याय भी भंग होता है। इसीसे भोक्ता होनेपर भी प्राणको उसकी अप्रतिपत्ति हुई—ऐसा कहें तो ?
न देवताप्रत्याख्यानार्थत्वात् । केवलसम्बोधनमात्राप्रतिपत्त्यैव असुप्तस्याध्यात्मिकस्य प्राणस्याभोक्तृत्वे सिद्धे यच्चन्द्रदेवताविषयैर्नामभिःसम्बोधनम्, तच्चन्द्रदेवता प्राणोऽस्मिञ्शरीरे भोक्तेति गार्ग्यस्य विशेषप्रतिपत्तिनिराकरणार्थम् । न हि तल्लौकिकनाम्ना सम्बोधने शक्यं कर्तुम् । प्राणप्रत्याख्याने-सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वह सम्बोधन देवताका प्रत्याख्यान (निषेध) करनेके लिये था। केवल सम्बोधनमात्रकी अप्रतिपत्तिसे ही असुप्त आध्यात्मिक प्राणका अभोक्तृत्व सिद्ध हो सकनेपर भी जो उसे चन्द्रदेवतासम्बन्धी नामोंसे सम्बोधन किया गया है, वह गार्ग्यकी इस विशेष प्रतिपत्तिका निराकरण करनेके लिये है कि इस शरीरमें चन्द्रदेवता ही भोक्ता प्राण है। यह निराकरण [प्राणादि] लौकिक नाम-से सम्बोधन करनेपर नहीं किया जा सकता था। प्राणके प्रत्याख्यानसे