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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११९१

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११९१

प्नोति किमु वक्तव्यं हृदयस्वरूपो-<br><br>पासनादिति हृदयस्तुतये नामा-<br><br>क्षरोपन्यासः ॥ १ ॥प्राप्त कर लेता है तो हृदयस्वरूप ब्रह्मकी उपासनासे जो फल मिलेगा उसके विषयमें तो कहना ही क्या है ? इस प्रकार हृदयकी स्तुतिके लिये उस नामके अक्षरोंका उपन्यास किया गया है ॥ १ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये तृतीयं हृदयब्राह्मणम् ॥ ३ ॥


चतुर्थ ब्राह्मण

सत्य-ब्रह्मकी उपासना

तस्यैव हृदयाख्यस्य ब्रह्मणः सत्यमित्युपासनं विधित्सन्नाह—उस हृदयसंज्ञक ब्रह्मकी ही 'सत्य' ऐसी उपासनाका विधान करनेकी इच्छासे श्रुति कहती है—

तद् वै तदेतदेव तदास सत्यमेव स यो हैतं महद् यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति जयतीमाँल्लोका-ञ्जित इन्न्वसावसद्य एवमेतन्महद् यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति सत्यँ ह्येव ब्रह्म ॥ १ ॥

वही—वह हृदय-ब्रह्म ही वह था जो कि सत्य ही है। जो भी इस महत्, यक्ष (पूज्य) प्रथम उत्पन्न हुएको 'यह सत्य ब्रह्म है' ऐसा जानता है, वह इन लोकोंको जीत लेता है। [उसका शत्रु] उसके अधीन हो जाता है—असत् (अभावभूत) हो जाता है। जो इस प्रकार इस महत्, यक्ष (पूजनीय) प्रथम उत्पन्न हुएको 'सत्य ब्रह्म'—इस प्रकार जानता है [उसे उपर्युक्त फल मिलता है], क्योंकि ब्रह्म सत्य ही है ॥ १ ॥

११९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

११९२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
तद् वैदिति हृदयं ब्रह्म परामृष्टम्, इति स्मरणार्थम्, तद् यद् हृदयं ब्रह्म स्मर्यत इत्येकस्तच्छब्दः, तदेतदुच्यते प्रकारान्तरेणेति द्वितीयस्तच्छब्दः, किं पुनस्तत् प्रकारान्तरम् ? एतदेव तदित्येतच्छब्देन संबद्धयते तृतीयस्तच्छब्दः। एतदिति वक्ष्यमाणं बुद्धौ सन्निधीकृत्याह—तत्—'तत्' ऐसा कहकर हृदय-ब्रह्मका परामर्श किया गया है। 'वै' यह अव्यय स्मरणके लिये है। तत्--वह अर्थात् जो हृदय-ब्रह्म स्मरणका विषय हो रहा है, वह—इस भावको व्यक्त करनेके लिये प्रथम तत् शब्दका प्रयोग हुआ है। उसीका यह प्रकारान्तरसे वर्णन किया जाता है, इसलिये [ अर्थात् जिसका स्मरण होता है उसीका यह वर्णन है-इस सम्बन्धको व्यक्त करनेके लिये ] दूसरा 'तत्' शब्द दिया है। किंतु वह प्रकारान्तर क्या है ? इसी बातका [ तीसरे ] 'तत्' शब्दसे सम्बन्ध दिखाया गया है, इसीसे तीसरा 'तत्' शब्द प्रयुक्त हुआ है। फिर 'एतत्' इस शब्दसे श्रुति कही जानेवाली बातको बुद्धिमें रखकर कहती है--
आस बभूव। किं पुनरेतदेवास यदुक्तं हृदयं ब्रह्मेति तदिति तृतीयस्तच्छब्दो विनियुक्तः।'आस'--था। किंतु वह कौन था ? यही, जिसका कि हृदय-ब्रह्म ऐसा कहकर वर्णन किया है--यह बतानेके लिये तीसरे 'तत्' शब्दका प्रयोग किया गया है।
किं तदिति विशेषतो निर्दिशति—‘सत्यमेव सच त्यच्च मूर्तं चामूर्तं च सत्यं ब्रह्म पञ्चभूतात्मकमित्येतत्।’ स यः कश्चित् सत्यात्मानमेतं महन्महत्त्वाद् यक्षंवह क्या है? इसपर श्रुति उसका विशेष रूपसे निर्देश करती है--'सत्यमेव'। सत् और त्यत्--मूर्त और अमूर्त सत्य ब्रह्म ही है, अर्थात् पञ्चभूतात्मक है, जो कोई इस सत्यात्मा, महान् होनेके कारण महत्, यक्ष

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ११९३

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ११९३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
पूज्यं प्रथमजं प्रथमजातं सर्वस्मात् संसारिण एतदेवाग्रे जातं ब्रह्म, अतः प्रथमजम्, वेद विजानाति सत्यं ब्रह्मेति । तस्येदं फलमुच्यते—पूज्य, प्रथमज अर्थात् समस्त संसारियोंसे पहले उत्पन्न हुए—यह ब्रह्म ही सबसे पहले उत्पन्न हुआ था, इसलिये यह प्रथमज है—'यह सत्य ब्रह्म है, इस प्रकार जानता है, उसके लिये यह फल बतलाया जाता है—
यथा सत्येन ब्रह्मणेमे लोका आत्मसात्कृता जिताः, एवं सत्यात्मानं ब्रह्म महद् यक्षं प्रथमजं वेद स जयतीमाँल्लोकान् । किं च जितो वशीकृतः, इन्न्वित्थम्, यथा ब्रह्मणा । असौ शत्रुरिति वाक्यशेषः असञ्च्वासद्- भवेदसौ शत्रुर्जितो भवेदित्यर्थः ।जिस प्रकार सत्य-ब्रह्मके द्वारा ये लोक आत्मसात् किये हुए अर्थात् जीते हुए हैं, इसी प्रकार जो सत्यात्मा प्रथमोत्पन्न, महत्, पूज्य ब्रह्मको जानता है, वह इन लोकोंको जीत लेता है। तथा उसके द्वारा उसका यह शत्रु जित होता—वशीभूत कर लिया जाता है, जिस प्रकार ब्रह्मके द्वारा सब वशीभूत किये हुए हैं। मूलमें 'असौ'के आगे 'शत्रुः' यह वाक्यशेष है। तथा असत् अर्थात् यह शत्रु अभावरूप यानी पराजित हो जाता है।
कस्यैतत् फलमिति पुनर्निगमयति—य एवमेतन्महद् यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति, अतो विद्यानुरूपं फलं युक्तम्, सत्यं ह्येव यस्माद् ब्रह्म ॥ १ ॥यह किसका फल है—यह बतलानेके लिये श्रुति पुनः निगमन करती है--जो इस प्रकार इस महत् पूज्य प्रथमजको 'सत्य-ब्रह्म' ऐसा जानता है। अतः उपासनाके अनुरूप फल मिलना उचित ही है, क्योंकि ब्रह्म भी सत्य ही है ॥१॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये चतुर्थं सत्यब्राह्मणम् ॥ ४ ॥


पञ्चम ब्राह्मण

पञ्चम ब्राह्मण


प्रथमज सत्य-ब्रह्म और 'सत्य' नामके अक्षरोंकी उपासना

सत्यस्य ब्रह्मणः स्तुत्यर्थमिदमाह, महद् यक्षं प्रथमजमित्युक्तम्, तत् कथं प्रथमजत्वम् ? इत्युच्यते—सत्य-ब्रह्मकी स्तुतिके लिये यह ब्राह्मण उसे 'महत्, यक्ष, प्रथमज' इस प्रकार कहता है, सो पहले बतला दिया। उसका प्रथमजत्व किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है—

आप एवेदमग्र आसुरता आपः सत्यमसृजन्त सत्यं ब्रह्म प्रजापतिं प्रजापतिर्देवाँस्ते देवाः सत्यमेवोपासते तदेतत् त्र्यक्षरँसत्यमिति स इत्येकमक्षरं तीत्येकमक्षरं यमित्येकमक्षरं प्रथमोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्यतोऽनृतं तदेतदनृतमुभयतः सत्येन परिगृहीतँ सत्यभूयमेव भवति नैवं विद्वाँसमनृतँहिनस्ति ॥१॥

यह [ व्यक्त जगत् ] पहले आप (जल) ही था। उस आपने सत्यकी रचना की। अतः सत्य ब्रह्म है। ब्रह्मने प्रजापति (विराट्) को और प्रजापतिने देवताओंको उत्पन्न किया। वे देवगण सत्यकी ही उपासना करते हैं। वह यह 'सत्य' तीन अक्षरवाला नाम है। 'स' यह एक अक्षर है, 'ती' यह एक अक्षर है और 'यम्' यह एक अक्षर है। इनमें प्रथम और अन्तिम अक्षर सत्य है और मध्यका अनृत है। वह यह अनृत दोनों ओरसे सत्यसे परिगृहीत है। इसलिये यह सत्यबहुल ही है। इस प्रकार जाननेवालेको अनृत नहीं मारता ॥ १ ॥

आप एवेदमग्र आसुः । आप इति कर्मसमवायिन्योऽग्निहोत्राद्या-आरम्भमें यह आप (जल) ही था। 'आप' शब्दसे कर्मसम्बन्धी अग्निहोत्र आदिकीआहुतियां कही गयी

ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११९५

ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ११९५
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
हुतयः, अग्निहोत्राद्याहुतेर्द्रवात्मकत्वादप्त्वम्, ताश्चापोऽग्निहोत्रादिकर्मापवर्गोत्तरकालं केनचिददृष्टेन सूक्ष्मेणात्मना कर्मसमवायित्वमपरित्यजन्त्य इतरभूतसहिता एव न केवलाः। कर्मसमवायित्वात्तु प्राधान्यमपामिति।हैं। अग्निहोत्रादिकी आहुति द्रवरूप होनेके कारण आप (जल) है। अग्निहोत्र-कर्मकी समाप्तिके पश्चात् वह आप किसी अदृष्ट सूक्ष्मरूपसे अपने कर्म-सम्बन्धको न छोड़ते हुए अन्य भूतोंके साथ ही रहता है, अकेला नहीं रहता। कर्मसम्बन्धित्व रहनेके कारण प्रधानता आप (जल) की ही है [इसलिये यहाँ उसे 'आप' शब्दसे ही कहा है।]
सर्वाण्येव भूतानि प्रागुत्पत्तेरव्याकृतावस्थानि कर्तृसहितानि निर्दिश्यन्त आप इति। ता आपो बीजभूता जगतोऽव्याकृतात्मनावस्थितास्ता एवेदं सर्वं नामरूपविकृतं जगदग्र आसुर्नान्यत् किञ्चिद् विकारजातमासीत्।यहाँ 'आप' ऐसा कहकर उत्पत्तिसे पहले अव्याकृत (अव्यक्त) रूपमें स्थित कर्तासहित सभी भूतोंका निर्देश किया जाता है। जगत्का बीजभूत वह आप अव्याकृतरूपसे स्थित था। यह नाम-रूप विकारको प्राप्त हुआ जगत् आरम्भमें वही था, उससे भिन्न कोई और विकारसमुदाय नहीं था।
ताः पुनरापः सत्यमसृजन्त; तस्मात् सत्यं ब्रह्म प्रथमजम्, तदेतद् हिरण्यगर्भस्य सूत्रात्मनो जन्म, यदव्याकृतस्य जगतो व्याकरणम्। तत् सत्यं ब्रह्म, कुतः? महत्त्वात्। कथं महत्त्वम्? इत्याह—यस्मात् सर्वस्य स्रष्टृ। कथम्? यत् सत्यं ब्रह्म तत्फिर उस आपने सत्यकी रचना की। इसीसे सत्य ब्रह्म प्रथमज है। वही यह सूत्रात्मा हिरण्यगर्भकी उत्पत्ति है; जो कि अव्याकृत जगत्का व्यक्त होना है। वह सत्य ब्रह्म है, क्यों ब्रह्म है? महत्ताके कारण। उसकी महत्ता किस प्रकार है? सो श्रुति बतलाती है—क्योंकि वह सबका स्रष्टा है। किस प्रकार? जो सत्य

११९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५

११९६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ५

| प्रजापतिं प्रजानां पतिं विराजं सूर्यादिकरणमसृजतेत्यनुषङ्गः । प्रजापतिर्देवान् स विराट्प्रजापतिर्देवानसृजत । यस्मात् सर्वमेवं क्रमेण सत्याद् ब्रह्मणो जातं तस्मान्महत् सत्यं ब्रह्म । | ब्रह्म था, उसने प्रजापतिको—सूर्यादि जिसकी इन्द्रियां हैं, उस प्रजाओंके स्वामी विराट्को उत्पन्न किया--ऐसा इसका सम्बन्ध है । 'प्रजापतिर्देवान्'—उस विराट् प्रजापतिने देवताओंको उत्पन्न किया । चूँकि इस क्रमसे सब कुछ सत्य ब्रह्मसे ही उत्पन्न हुआ है, इसलिये सत्य ब्रह्म महत् है । | | कथं पुनर्यक्षम् ? इत्युच्यते—<br><br>त एवं सृष्टा देवाः पितरमपि विराजमतीत्य तदेव सत्यं ब्रह्मोपासते । अत एतत् प्रथमजं महत् यक्षम् । तस्मात् सर्वात्मनोपास्यं तत्, तस्यापि सत्यस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति । | किंतु वह यक्ष (पूज्य) क्यों है, सो बतलाया जाता है—वे इस प्रकार रचे हुए देवगण अपने पिता विराट्का भी अतिक्रमण करके उस सत्य-ब्रह्मकी ही उपासना करते हैं, इसलिये यह प्रथमोत्पन्न सत्य-ब्रह्म महत् यक्ष है । अतः वह सब प्रकार उपासनीय है, उस सत्य-ब्रह्मका भी 'सत्य' यह नाम है । | | तदेतत् त्र्यक्षरम् । कानि तान्यक्षराणि ? इत्याह—स इत्येकमक्षरम्, तीत्येकमक्षरम्—तीतीकारानुबन्धो निर्देशार्थः—यमित्येकमक्षरम्; तत्र तेषां प्रथमोत्तमे अक्षरे सकारयकारौ सत्यम्; मृत्युरूपाभावात् । मध्यतो | वह यह नाम तीन अक्षरोंवाला है । वे अक्षर कौन-से हैं, सो श्रुति बतलाती है--'स' यह एक अक्षर है । 'ती' यह एक अक्षर है—'ती' इसमें ईकारानुबन्ध निर्देश (स्पष्ट उच्चारण) के लिये है--'यम्' यह एक अक्षर है । इनमें सकार और यकार—ये पहले और अन्तिम अक्षर सत्य हैं, क्योंकि उनके मृत्युरूपका अभाव है । मध्यतः |

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११९७ |

ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ११९७
मध्येऽनृतम्, अनृतं हि मृत्युः; <br><br>मृत्य्वनृतयोस्तकारसामान्यात् । <br><br>तदेतदनृतं तकाराक्षरं मृत्युरूपमुभयतः सत्येन सकारयकारलक्षणेन परिगृहीतं व्याप्तमन्तर्भावितं सत्यरूपाभ्यामतोऽकिञ्चित्करं तत्, सत्यभूयमेव सत्यबाहुल्यमेव भवति । एवं सत्यबाहुल्यं सर्वस्य मृत्योरनृतस्याकिञ्चित्करत्वं च यो विद्वान्, तमेवं विद्वांसमनृतं कदाचित् प्रमादोक्तं न हिनस्ति ॥ १ ॥अर्थात् बीचमें अनृत है, अनृत मृत्यु है; क्योंकि मृत्यु और अनृत इनकी तकारमें समानता है। <br><br>वह यह मृत्युरूप अनृत तकार अक्षर दोनों ओरसे सकार-यकार-रूप सत्यसे परिगृहीत—व्याप्त है, अर्थात् इन सत्यरूप अक्षरोंसे अन्तर्भावित है, अतः वह अकिञ्चित्कर है; इसलिये 'सत्य' यह नाम सत्यभूय—सत्यप्राय ही है। इस प्रकार इस सम्पूर्ण अक्षरके सत्यबाहुल्य और मृत्युरूप अनृतके अकिञ्चित्करत्वको जो जानता है, उस इस प्रकार जाननेवालेको कभी प्रमादसे बोला हुआ अनृत (असत्य) नहीं मारता ॥ १ ॥
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एक-दूसरेमें प्रतिष्ठित सत्यसंज्ञक आदित्यमण्डलस्थ और चाक्षुष पुरुष

अस्याधुना सत्यस्य ब्रह्मणः संस्थानविशेष उपासनमुच्यते--अब उस सत्य-ब्रह्मकी संस्थान-विशेषमें उपासना बतलायी जाती है-

तद् यत्तत् सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तावेतावन्योन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः प्राणैरयममुष्मिन् स यदोत्क्रमिष्यन् भवति शुद्धमेवैतन्मण्डलं पश्यति नैनमेते रश्मयः प्रत्यायन्ति ॥ २ ॥

वह जो सत्य है, सो यह आदित्य है। जो इस आदित्यमण्डलमें पुरुष है और जो भी यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, वे ये दोनों पुरुष एक-दूसरेमें

११९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

११९८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

प्रतिष्ठित हैं। आदित्य रश्मियोंके द्वारा चाक्षुष पुरुषमें प्रतिष्ठित है और चाक्षुष पुरुष प्राणोंके द्वारा उसमें प्रतिष्ठित है। जिस समय यह (चाक्षुष पुरुष) उत्क्रमण करने लगता है, उस समय यह इस मण्डलको शुद्ध ही देखता है। फिर ये रश्मियां इसके पास नहीं आतीं ॥ २ ॥

| तद् यत्, किं तत् ? सत्यं ब्रह्म प्रथमजम्, किम् ? असौ सः। कोऽसौ ? आदित्यः, कः पुनरसावादित्यः ? य एषः, क एषः ? य एतस्मिन्नादित्यमण्डले पुरुषोऽभिमानी सोऽसौ सत्यं ब्रह्म; यश्चायमध्यात्मं योऽयं दक्षिणेऽक्षन्नक्षणि पुरुषः; चशब्दात् स च सत्यं ब्रह्मेति संबन्धः। | वह जो, वह कौन ? प्रथम उत्पन्न हुआ सत्य-ब्रह्म, क्या है ? यह वह है। कौन है ? आदित्य; किंतु यह आदित्य कौन है ? जो यह है, यह कौन ? जो इस आदित्यमण्डलमें इसका अभिमानी पुरुष है, वह यह सत्य-ब्रह्म है; जो कि यह अध्यात्म है, अर्थात् जो यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, वह भी ब्रह्म है—ऐसा 'च' शब्दसे सम्बन्ध लगाना चाहिये। | | तावेतावादित्याक्षिस्थौ पुरुषावेकस्य सत्यस्य ब्रह्मणः संस्थानविशेषौ यस्मात् तस्मादन्योन्यस्मिन्नितरेतरस्मिन्नादित्यश्चाक्षुषे चाक्षुषश्चादित्ये प्रतिष्ठितौ; अध्यात्माधिदैवतयोरन्योन्योपकार्योपकारकत्वात्। | क्योंकि वे ये आदित्यस्थ और नेत्रस्थ पुरुष एक सत्य-ब्रह्मके ही संस्थान (आकार) विशेष हैं, इसलिये एक-दूसरेमें अर्थात् आदित्य-पुरुष चाक्षुषमें और चाक्षुष पुरुष आदित्यमें प्रतिष्ठित हैं, क्योंकि अध्यात्म और अधिदैव पुरुष एक-दूसरेके उपकार्य और उपकारक होते हैं। | | कथं प्रतिष्ठितौ ? इत्युच्यते<br><br>रश्मिभिःप्रकाशेनानुग्रहं कुर्वन्नेष आदित्योऽस्मिंश्चाक्षुषेऽध्यात्मे प्रतिष्ठितः। अयं च चाक्षुषः प्राणै- | वे किस प्रकार प्रतिष्ठित हैं, सो बतलाया जाता है-रश्मियों अर्थात् प्रकाशके द्वारा अनुग्रह करता हुआ यह आदित्य-पुरुष इस अध्यात्म चाक्षुष पुरुषमें प्रतिष्ठित हे तथा यह चाक्षुष पुरुष प्राणोंके द्वारा इस |

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११९९ |

ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ११९९

रादित्यमनुगृह्णन्नमुष्मिन्नादित्येऽधिदैवे प्रतिष्ठितः ।<br><br>सोऽस्मिञ्छरीरे विज्ञानमयो भोक्ता यदा यस्मिन् काल उत्क्रमिष्यन् भवति तदासौ चाक्षुष आदित्यपुरुषो रश्मीनुपसंहृत्य केवलेनौदासीन्येन रूपेण व्यवतिष्ठते । तदायं विज्ञानमयः पश्यति शुद्धमेव केवलं विरश्म्येतन्मण्डलं चन्द्रमण्डलमिव । तदेतदरिष्टदर्शनं प्रासङ्गिकं प्रदर्श्यते । कथं नाम पुरुषः करणीये यत्नवान् स्यादिति ।<br><br>नैनं चाक्षुषं पुरुषमुररीकृत्य तं प्रत्यनुग्रहायेते रश्मयः स्वामिकर्त्तव्यवशात् पूर्वमागच्छन्तोऽपि पुनस्तत्कर्मक्षयमनुरुध्यमाना इव नोपयन्ति न प्रत्यागच्छन्त्येनम्। अतोऽवगम्यते परस्परोपकार्योपकारकभावात् सत्यस्यैकस्यात्मनोंऽशावेताविति ॥ २ ॥आदित्य-पुरुषका उपकार करता हुआ इस अधिदैव आदित्य-पुरुषमें प्रतिष्ठित है।<br><br>इस शरीरमें जो यह विज्ञानमय (जीव) भोक्ता है, यह जिस कालमें उत्क्रमण करने लगता है, उस समय यह चाक्षुष आदित्य-पुरुष रश्मियोंका उपसंहार कर अपने शुद्ध औदासीन्यरूपसे स्थित हो जाता है। तब यह विज्ञानमय इस आदित्यमण्डलको चन्द्रमण्डलके समान शुद्ध—केवल अर्थात् रश्मिरहित देखता है। यहां यह प्रासंगिक अरिष्टदर्शन प्रदर्शित किया जाता है, जिससे कि किसी प्रकार पुरुष अपने कर्त्तव्यमें सयत्न रहे।<br><br>इस चाक्षुष पुरुषको स्वीकार कर उसके प्रति अनुग्रह करनेके लिये ये रश्मियां, जो स्वामीके कर्त्तव्यवश पहले आती थीं, अब उसके कर्मक्षयके पश्चात् अवरुद्ध हुई-सी इसके पास प्रत्यागमन नहीं करतीं—नहीं आतीं। अतः यह ज्ञात होता है कि परस्पर उपकार्य्य-उपकारकभाव रहनेके कारण ये दोनों एक सत्यात्माके ही अंश हैं ॥ २ ॥

१२०० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

१२०० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

अहःसंज्ञक आदित्यमण्डलस्थ पुरुषके व्याहृतिरूप अवयव

तत्र योऽसौ, कः ?ऐसी स्थितिमें जो यह है, कौन ?

य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकग्ँ शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहरिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ३ ॥

इस मण्डलमें जो यह पुरुष है, उसका 'भूः' यह शिर है; शिर एक है और यह अक्षर भी एक है। 'भुवः' यह भुजा है; भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं; 'स्वः' यह प्रतिष्ठा ( चरण ) है; प्रतिष्ठा ( चरण ) दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं। 'अहर्' यह उसका उपनिषद् ( गूढ़ नाम ) है; जो ऐसा जानता है, वह पापको मारता है और उसे त्याग देता है ॥३॥

य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः सत्यनामा तस्य व्याहृतयोऽवयवाः । कथम् ? भूरिति येयं व्याहृतिः, सा तस्य शिरः, प्राथम्यात् । तत्र सामान्यं स्वयमेवाह श्रुतिः—एकमेकसंख्यायुक्तं शिरस्तथैतदक्षरमेकं भूरिति । भुव इति बाहू द्वित्वसामान्याद् द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे । तथा स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एतेजो कि इस मण्डलमें सत्य नामवाला पुरुष है, उसके अवयव व्याहृतियां हैं। किस प्रकार ? [सो बतलाते हैं—] 'भूः' ऐसी जो यह व्याहृति है, वह प्रथम होनेके कारण उसका शिर है। उनकी समानता श्रुति स्वयं ही बताती है—शिर एक अर्थात् एक संख्यावाला है, इसी प्रकार 'भूः' यह भी एक अक्षर है। दो होनेमें समानता होनेके कारण 'भुवः' यह भुजा है, दो भुजाएँ हैं और दो ही ये अक्षर हैं। तथा 'स्वः' यह प्रतिष्ठा है, दो प्रतिष्ठाएँ हैं

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ १२०१

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ १२०१


अक्षरे । प्रतिष्ठे पादौ प्रतितिष्ठत्याभ्यामिति ।<br><br>तस्यास्य व्याहृत्यवयवस्य सत्यस्य ब्रह्मण उपनिषद्रहस्यमभिधानम्; येनाभिधानेनाभिधीयमानं तद् ब्रह्माभिमुखीभवति लोकवत् । कासौ ? इत्याह—अहरिति । अहरिति चैतद् रूपं हन्तेर्जहातेश्च । इति यो वेद स हन्ति जहाति च पाप्मानं य एवं वेद ॥ ३ ॥और दो ही ये अक्षर हैं । इन (चरणों) से पुरुष प्रतिष्ठित होता है—इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रतिष्ठा चरणको कहते हैं ।<br><br>उस इस व्याहृतिरूप अवयवोंवाले सत्य-ब्रह्मका उपनिषद्--रहस्य अर्थात् गूढ नाम, जिस नामसे पुकारे जानेपर वह ब्रह्म अन्य लोगोंके समान अभिमुख होता है । वह उपनिषद् क्या है, सो श्रुति बतलाती है—अहर् । 'अहर्' यह 'हन्'¹ और 'हा'² इन धातुओंका रूप है । जो ऐसा जानता है [अर्थात् अहर्संज्ञक ब्रह्मकी उपासना करता है] वह पापको मारता और त्याग देता है ॥ ३ ॥

अहंसंज्ञक चाक्षुष पुरुषके व्याहृतिरूप अवयव

एवम्—इसी प्रकार—

योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकꣳ शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहमिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ४ ॥

जो यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, उसका 'भूः' यह शिर है; शिर एक है और यह अक्षर भी एक है । 'भुवः' यह भुजा है, भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं । स्वः यह प्रतिष्ठा है, प्रतिष्ठा (चरण) दो हैं और ये


१. 'हन् हिंसागत्योः' ('हन्' धातु हिंसा और गमन अर्थमें है) ।
२. 'ओहाक् त्यागे' ('हा' धातु त्याग-अर्थमें है) ।

बृ० उ० ७६—

१२०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५

१२०२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ५

अक्षर भी दो हैं। 'अहम्' यह उसका उपनिषद् (गूढ नाम) है; जो ऐसा जानता है, वह पापको मारता और त्याग देता है ॥ ४ ॥

| योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तस्य भूरिति शिर इत्यादि सर्वं समानम्, तस्योपनिषदहमिति; प्रत्यगात्मभूतत्वात्। पूर्ववद् हन्तेर्जहातेश्चेति ॥ ४ ॥ | जो यह दक्षिणनेत्रमें पुरुष है, उसका 'भूः' यह शिर है—इत्यादि सब अर्थ पूर्ववत् है। उसका 'अहम्' यह उपनिषद् है; क्योंकि वह प्रत्यगात्मस्वरूप है। पूर्ववत् यानी 'अहर्' के समान 'अहम्' भी 'हन्' और 'हा' इन दोनों धातुओंका रूप है ॥ ४ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये पञ्चमं सत्यब्रह्मसंस्थानब्राह्मणम् ॥ ५ ॥


षष्ठ ब्राह्मण

हृदयस्थ मनोमय पुरुषकी उपासना

| उपाधीनामनेकत्वादनेकविशेषणत्वाच्च तस्यैव प्रकृतस्य ब्रह्मणो मनउपाधिविशिष्टस्योपासनं विधित्सन्नाह— | उपाधियां अनेक हैं और उनके बहुत-से विशेषण हैं, इसलिये उस मनउपाधिविशिष्ट प्रकृत ब्रह्मकी ही उपासनाका विधान करनेकी इच्छा-से श्रुति कहती है— |

मनोमयोऽयं पुरुषो भाःसत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च ॥ १ ॥

ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२०३

ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२०३


प्रकाश ही जिसका सत्य ( स्वरूप ) है, ऐसा यह पुरुष मनोमय है। वह उस अन्तर्हृदयमें जैसा व्रीहि ( धान ) या यव ( जौ ) होता है, उतने ही परिमाणवाला है। वह यह सबका स्वामी और सबका अधिपति है, तथा यह जो कुछ है, सभीका प्रकर्षतया शासन करता है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
मनोमयो मनःप्रायो मनस्युपलभ्यमानत्वात् । मनसा चोपलभत इति मनोमयोऽयं पुरुषो भाःसत्यो भा एव सत्यं सद्भावः स्वरूपं यस्य सोऽयं भाःसत्यो भास्वर इत्येतत् । मनसः सर्वार्थविभासकत्वान्मनोमयत्वाच्चास्य भास्वरत्वम् ।मनमें उपलब्ध होनेवाला होनेसे यह मनोमय–मनःप्राय है। इसे मनसे उपलब्ध करते हैं, इसलिये यह पुरुष मनोमय है; तथा भाःसत्य है—भा ही सत्य—सद्भाव अर्थात् स्वरूप है जिसका, ऐसा यह पुरुष भाःसत्य अर्थात् भास्वर है। मनके सभी विषयोंका अवभासक तथा मनोमय होनेके कारण ही इसकी भास्वरता है।
तस्मिन्नन्तर्हृदये हृदयस्यान्तस्तस्मिन्नित्येतत्, यथा व्रीहिर्वा यवो वा परिमाणत एवं परिमाणस्तस्मिन्नन्तर्हृदये योगिभिर्दृश्यत इत्यर्थः । स एष सर्वस्येशानः सर्वस्य स्वभेदजातस्येशानः स्वामी । स्वामित्वेऽपि सति कश्चिदमात्यादितन्त्रोऽयं तु न तथा किं तर्ह्यधिपतिरधिष्ठाय पालयिता ।उस अन्तर्हृदयमें अर्थात् हृदय-का जो अन्तर्भाग है उसमें, जैसा कि परिमाणतः व्रीहि या यव होता है, उतने ही परिमाणवाला यह उस अन्तर्हृदयमें योगियोंद्वारा देखा जाता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। वह यह सबका ईशान अर्थात् अपने [औपाधिक] भेदसमुदायका स्वामी है। स्वामी होनेपर भी कोई मन्त्री आदिके अधीन रहता है, किंतु यह ऐसा नहीं है। तो फिर क्या है? यह अधिपति अर्थात् अधिष्ठाता होकर पालन करनेवाला है।

१२०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

१२०४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च यत् किञ्चित् सर्वं जगत् तत् सर्वं प्रशास्ति। एवं मनोमयस्योपासनात् तथारूपापत्तिरेव फलम्। "तं यथा यथोपासते तदेव भवति" इति ब्राह्मणम् ॥ १ ॥ | [ फल—] इन सबका प्रशासन करता है—यह जो कुछ है अर्थात् जितना कुछ भी यह जगत् है, उन सबका प्रकर्षतया शासन करता है। इस प्रकार मनोमय ब्रह्मकी उपासनासे तद्रूपताकी प्राप्तिरूप ही फल मिलता है। "उसकी जो जिस प्रकार उपासना करता है वही हो जाता है"—ऐसा ब्राह्मणवाक्य है ॥ १ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये षष्ठं मनोब्राह्मणम् ॥ ६ ॥

सप्तम ब्राह्मण

विद्युद्ब्रह्मकी उपासना

तथैवोपासनान्तरं सत्यस्य ब्रह्मणो विशिष्टफलमारभ्यते—इसी प्रकार सत्य-ब्रह्मकी विशिष्ट फलवाली एक दूसरी उपासनाका आरम्भ किया जाता है—

विद्युद् ब्रह्मेत्याहुर्विदानाद् विद्युद् विद्यत्येनं पाप्मनो य एवं वेद विद्युद् ब्रह्मेति विद्युद्ध्येव ब्रह्म ॥ १ ॥

विद्युत् ब्रह्म है—ऐसा कहते हैं। विदान (खण्डन या विनाश) करनेके कारण विद्युत् है। जो 'विद्युत् ब्रह्म है' ऐसा जानता है, वह इस आत्माके प्रतिकूलभूत पापोंका नाश कर देता है, क्योंकि विद्युत् ही ब्रह्म है ॥ १ ॥

विद्युद् ब्रह्मेत्याहुः। विद्युतो ब्रह्मणो निर्वचनमुच्यते—विदानादवखण्डनात् तमसो मेघान्ध-'विद्युद् ब्रह्मेत्याहुः'—श्रुतिविद्युत्-ब्रह्मकी निरुक्ति (व्युत्पत्ति) बतलाती है—अन्धकारके विदान-खण्डनके कारण, क्योंकि यह मेघके अन्धकार-

[ ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२५५ ]

[ ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२५५ ]


| कारं विदार्य ह्यवभासतेऽतो विद्युत् । एवंगुणं विद्युद् ब्रह्मेति यो वेदासाविद्यत्यवखण्डयति विनाशयति पाप्मन एनमात्मानं प्रति प्रतिकूलभूताः पाप्मानो ये तान् सर्वान् पाप्मनोऽवखण्डयतीत्यर्थः । य एवं वेद विद्युद् ब्रह्मेति तस्यानुरूपं फलम् । विद्युद्धि यस्माद् ब्रह्म ॥ १ ॥ | को विदीर्ण करके प्रकाशित होती है, इसलिये विद्युत् है । ऐसे गुणवाले विद्युद् ब्रह्मको जो जानता है, वह पापको 'विद्यति—खण्डित अर्थात् नष्ट कर देता है । तात्पर्य यह है कि इस आत्माके प्रतिकूलभूत जितने पाप होते हैं, उन सबका यह खण्डन कर देता है। जो 'विद्युत् ब्रह्म है' ऐसा जानता है, यह उसका अनुरूप फल है। क्योंकि विद्युत् ही ब्रह्म है ॥ १ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये सप्तमं विद्युद्ब्राह्मणम् ॥ ७ ॥


अष्टम ब्राह्मण

धेनुरूपसे वाक् की उपासना

पुनरुपासनान्तरं तस्यैव ब्रह्मणो वाग् वै ब्रह्मेति—पुनः उस सत्यब्रह्मकी ही 'वाग्वै ब्रह्म' ऐसी अन्य उपासना आरम्भ की जाती है—

वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चत्वारः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः ॥ १ ॥

वाक्रूप धेनुकी उपासना करे। उसके चार स्तन हैं—स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वधाकार। उसके दो स्तन स्वाहाकार और वषट्-

१२०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

१२०६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

कारके उपजीवी देवगण हैं, हन्तकारके उपजीवी मनुष्य हैं और स्वधाकारके पितृगण। उस धेनुका प्राण वृषभ है और मन बछड़ा है ॥ १ ॥

| वागिति शब्दत्रयी तां वाचं धेनुं धेनुरिव धेनुर्यथा धेनुश्चतुर्भिः स्तनैः स्तन्यं पयः क्षरति वत्सायैवं वाग्धेनुर्वक्ष्यमाणैः स्तनैः पय इवान्नं क्षरति देवादिभ्यः। के पुनस्ते स्तनाः ? के वा ते येभ्यः क्षरति ? | वाक् यह शब्द अर्थात् त्रयी (तीन वेद—ऋक्, यजुः और साम) है; उस वाक्रूप धेनुकी जो उपासना करे, जो धेनुके सामान धेनु है। जिस प्रकार धेनु अपने चार स्तनोंसे बछड़ेके लिये स्तन्य अर्थात् दूध बहाती है, उसी प्रकार वाग्धेनु आगे बतलाये जानेवाले स्तनोंसे देवादिके लिये दूधके समान अन्न प्रकट करती है। वे स्तन कौन-से हैं ? और जिनके लिये वह दूध देती है, वे भी कौन-कौन हैं ? | | तस्या एतस्या वाचो धेन्वा द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति वत्सस्थानीयाः। कौ तौ ? स्वाहाकारं च वषट्कारं च; आभ्यां हि हविर्दीयते देवेभ्यः। हन्तकारं मनुष्याः—हन्तेति मनुष्येभ्योऽन्नं प्रयच्छन्ति। स्वधाकारं पितरः—स्वधाकारेण हि पितृभ्यः स्वधां प्रयच्छन्ति। | उस इस वाक्रूपी धेनुके दो स्तनोंके वत्सस्थानीय देवगण उपजीवी हैं। वे दो स्तन कौन-से हैं ? स्वाहाकार और वषट्कार; क्योंकि इन्हींके द्वारा देवताओंको हवि दी जाती है। हन्तकारके उपजीवी मनुष्य हैं, 'हन्त' ऐसा कहकर मनुष्योंको अन्न देते हैं। स्वधाकारके उपजीवी पितृगण हैं—स्वधाकारके द्वारा ही पितृगणको स्वधा (श्राद्धीय वस्तु) देते हैं। | | तस्या धेन्वा वाचः प्राण ऋषभः, प्राणेन हि वाक् प्रसूयते। मनो वत्सः, मनसा हि प्रस्त्राव्यते | उस धेनुरूप वाणीका प्राण वृषभ है, क्योंकि प्राणके द्वारा ही वाक् प्रसव करती है। मन उसका वत्स है, क्योंकि मनसे ही वह प्रस्त्रावित |

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ १२०७

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ १२०७


| मनसा ह्यालोचिते विषये वाक्प्रवर्तते; तस्मान्मनो वत्सस्थानीयम्। एवं वाग्धेनूपासकस्तद्भाव्यमेव प्रतिपद्यते ॥ १ ॥ | होती है [यानी पन्हाती है]। मनसे आलोचना किये हुए विषयमें ही वाणीकी प्रवृत्ति होती है, इसलिये मन वत्सस्थानीय है। इस प्रकार वाक्रूपी धेनुका उपासक तद्रूपताको (तदुपाधिक ब्रह्मभावको) ही प्राप्त होता है ॥ १ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
अष्टमं वाग्धेनुब्राह्मणम् ॥ ८ ॥


नवम ब्राह्मण

पुरुषान्तर्गत वैश्वानराग्नि, उसका घोष और मरणकालका सूचक अरिष्ट

अयमग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति यमेतत् कर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन् भवति नैनं घोषँ शृणोति ॥ १ ॥

जो यह पुरुषके भीतर है, यह अग्नि वैश्वानर है, जिससे कि यह अन्न, जो कि भक्षण किया जाता है, पकाया जाता है। उसीका यह घोष होता है, जिसे पुरुष कानोंको मूँदकर सुनता है। जिस समय पुरुष उत्क्रमण करनेवाला होता है, उस समय इस घोषको नहीं सुनता ॥ १ ॥

| अयमग्निर्वैश्वानरः-पूर्ववदुपासनान्तरम् 'अयमग्निर्वैश्वानरः।' कोऽयमग्निः ? इत्याह—योऽयमन्तः | 'अयमग्निः वैश्वानरः'-पूर्ववत् 'यह अग्नि वैश्वानर है' यह ब्रह्मकी एक अन्य उपासना है। वह अग्नि कौन-सा है? इसपर श्रुति कहती |

१२०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

१२०८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पुरुषे । किं शरीरारम्भकः ? <br><br>नेत्युच्यते येनाग्निना वैश्वानराख्येनेदमन्नं पच्यते । किं तदन्नम् ? यदिदमद्यते भुज्यतेऽन्नं प्रजाभिर्जाठरोऽग्निरित्यर्थः ।है—जो कि यह पुरुषके भीतर है, क्या शरीरका आरम्भक अग्नि ? नहीं; कौन-सा है सो बतलाया जाता है—जिस वैश्वानरसंज्ञक अग्निसे यह अन्न पकाया जाता है । वह अन्न कौन-सा है ? जो यह अन्न प्रजाओंन्द्वारा 'अद्यते' भक्षण किया जाता है; [ उस अन्नको पचानेवाला ] अर्थात् जाठराग्नि ।
तस्य साक्षादुपलक्षणार्थमिदमाह—तस्याग्नेरन्नं पचतो जाठरस्यैष घोषो भवति; कोऽसौ ? यं घोषम्, एतदिति क्रियाविशेषणम्, कर्णावपिधायाङ्गुलीभ्यामपिधानं कृत्वा शृणोति; तं प्रजापतिमुपासीत वैश्वानरमग्निम् । अत्रापि ताद्भाव्यं फलम् । तत्र प्रासङ्गिकमिदमरिष्टलक्षणमुच्यते—सोऽत्र शरीरे भोक्ता यदोत्क्रमिष्यन् भवति नैनं घोषं शृणोति ॥ १ ॥उसका साक्षात् उपलक्षण करानेके लिये श्रुति इस प्रकार कहती है—अन्न पचानेवाले उस जाठराग्निका यह घोष होता है; वह कौन-सा है ? जिस घोषको पुरुष दोनों कान मूँदकर अङ्गुलियोंसे ढक करके सुनता है; यहाँ 'एतत्' यह क्रियाविशेषण है; उस प्रजापतिरूप वैश्वानराग्निकी उपासना करे । यहाँ भी तद्रूपताकी प्राप्ति ही फल है । उसमें श्रुति यह प्रसङ्गप्राप्त अरिष्ट बतलाती है—यहाँ शरीरमें वह भोक्ता पुरुष जिस समय उत्क्रमण करनेवाला होता है, उस समय इस घोषको नहीं सुनता ॥ १ ॥

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इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
नवमं वैश्वानराग्निब्राह्मणम् ॥ ९ ॥

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दशम ब्राह्मण

दशम ब्राह्मण

प्रकरणान्तर्गत उपासनाओंसे प्राप्त होनेवाली गति

| सर्वेषामस्मिन् प्रकरण उपास-<br>नानां गतिरियं फलं चोच्यते— | इस प्रकरणमें बतलायी गयी समस्त उपासनाओंका यह गतिरूप फल बतलाया जाता है— |

यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात् प्रैति स वायुमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा रथचक्रस्य खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स आदित्यमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा लम्बरस्य खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स चन्द्रमसमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा दुन्दुभेः खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स लोकमागच्छत्यशोकमहिमं तस्मिन् वसति शाश्वतीः समाः ॥१॥

जिस समय यह पुरुष इस लोकसे मरकर जाता है, उस समय वह वायुको प्राप्त होता है। वहाँ वह वायु उसके लिये छिद्रयुक्त हो जाता—मार्ग दे देता है, जैसा कि रथके पहियेका छिद्र होता है। उसके द्वारा वह ऊर्ध्व होकर चढ़ता है। वह सूर्यलोकमें पहुँच जाता है। वहाँ सूर्य उसके लिये वैसा ही छिद्ररूप मार्ग देता है, जैसा कि लम्बर नामके बाजेका छिद्र होता है। उसमें होकर वह ऊपरको ओर चढ़ता है। वह चन्द्र-लोकमें पहुँच जाता है। वहाँ चन्द्रमा भी उसके लिये छिद्रयुक्त हो मार्ग देता है, जैसा कि दुन्दुभिका छिद्र होता है। उसके द्वारा वह ऊपरकी ओर चढ़ता है। वह अशोक (मानसिक दुःखसे रहित) और अहिम (शारीरिक दुःखशून्य) लोकमें पहुँच जाता है और उसमें सदा—अनन्त वर्षोंतक अर्थात् ब्रह्माके अनेक कल्पोंतक निवास करता है ॥१॥

| १२१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |

१२१०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ५

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
यदा वै पुरुषो विद्वानस्माल्लोकात् प्रैति शरीरं परित्यजति स तदा वायुमागच्छत्यन्तरिक्षे तिर्यग्भूतो वायुः स्तिमितोऽभेद्यस्तिष्ठति, स वायुस्तत्र स्वात्मनि तस्मै संप्राप्ताय विजिहीते स्वात्मावयवान् विगमयतिच्छिद्रीकरोत्यात्मानमित्यर्थः । किं-परिमाणं छिद्रम् ? इत्युच्यते— यथा रथचक्रस्य खं छिद्रं प्रसिद्धपरिमाणम् ।जिस समय पुरुष अर्थात् उपासक इस लोकसे मरकर जाता है, शरीर-त्याग करता है, उस समय वह वायुको प्राप्त होता है, आकाशमें तिर्यग्भूत (तिरछा होकर स्थित) वायु घनीभूत अर्थात् अभेद्यरूपसे विद्यमान है; वह वायु वहाँ अपनेमें प्राप्त हुए उस उपासकके लिये 'विजिहीते' अपने अवयवोंका विच्छेद कर देता है अर्थात् अपनेको छिद्रयुक्त कर देता है। कितना बड़ा छिद्र करता है, सो बतलाया जाता है--जैसा कि रथके पहियेका छिद्र होता है, वैसे प्रसिद्ध परिमाण-वाला छिद्र कर देता है।
तेनच्छिद्रेण स विद्वानूर्ध्व आक्रमत ऊर्ध्वः सन् गच्छति स आदित्यमागच्छति । आदित्यो ब्रह्मलोकं जिगमिषोर्मार्गनिरोधं कृत्वा स्थितः सोऽप्येवंविद उपासकाय द्वारं प्रयच्छति । तस्मै स तत्र विजिहीते, यथा लम्बरस्य खं वादित्रविशेषस्य-च्छिद्रपरिमाणं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स चन्द्रमसमागच्छति ।उस छिद्रद्वारा वह विद्वान् ऊर्ध्व होकर चढ़ता है, अर्थात् ऊर्ध्वोन्मुख होकर जाता है, वह आदित्यलोकमें पहुँच जाता है। आदित्य ब्रह्मलोकको जानेवालेका मार्ग रोककर स्थित है। वह भी इस प्रकार जाननेवाले उस उपासकको मार्ग दे देता है। उसके लिये वहाँ वह अपने [ मण्डल ] को छिद्रयुक्त कर देता है; जैसा कि लम्बर नामक एक वाद्यविशेषके छिद्रका परिमाण होता है। उसके द्वारा वह ऊपरकी ओर चढ़ता है, वह चन्द्रलोकमें पहुँच जाता है।