BharatKosha
Back to the archive

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

६९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

Page 704Permalink
६९४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

पारिक्षितोंकी गतिका वर्णन

स होवाचोवाच वै सोऽगच्छन् वै ते तद्यत्राश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति क्व न्वश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति द्वात्रिँशतं वै देवरथाह्न्यान्त्ययं लोकस्तँ समन्तं पृथिवी द्विस्तावत् पर्येति ताँ समन्तं पृथिवी द्विस्तावत् समुद्रः पर्येति तद्यावती क्षुरस्य धारा यावद्वा मक्षिकायाः पत्रं तावानन्तरेणाकाशस्तानिन्द्रः सुपर्णो भूत्वा वायवे प्रायच्छत्तान् वायुरात्मनि धित्वा तत्रागमयद्यत्राश्वमेधयाजिनोऽभवन्नित्येवमिव वै स वायुमेव प्रशशँस तस्माद्वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद ततो ह भुज्युर्लाह्यायनिरुपरराम ॥ २ ॥

उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'उस गन्धर्वने निश्चय यह कहा था कि वे वहाँ चले गये, जहाँ अश्वमेध यज्ञ करनेवाले जाते हैं।' [भुज्यु] 'अच्छा तो, अश्वमेधयाजी कहाँ जाते हैं?' [ याज्ञवल्क्य-] 'यह लोक बत्तीस देवरथाह्न्य है। उसे चारों ओरसे दूनी पृथिवी घेरे हुए है। उस पृथिवीको सब ओरसे दूना समुद्र घेरे हुए है। सो जितनी पतली छुरेकी धार होती है, अथवा जितना सूक्ष्म मक्खीका पंख होता है, उतना उन अण्डकपालोंके मध्यमें आकाश है। इन्द्र (चित्य अग्नि) ने पक्षी होकर उन पारिक्षितोंको वायुको दिया। उन्हें वायु अपने स्वरूपमें स्थापित कर वहाँ ले गया, जहाँ अश्वमेधयाजी रहते हैं; इस प्रकार उस गन्धर्वने वायुकी ही प्रशंसा की थी। अतः वायु ही व्यष्टि है और वायु ही समष्टि है। जो ऐसा जानता है, वह पुनर्मृत्युको जीत लेता है।' तब लाह्यायनि भुज्यु चुप हो गया ॥ २॥

संस्कृतहिन्दी
स होवाच याज्ञवल्क्यः, उवाच<br><br>वै सः—वैशब्दः स्मरणार्थः—<br><br>उवाच वै स गन्धर्वस्तुभ्यम् ।उस याज्ञवल्क्यने कहा—'उसने निश्चय यही कहा था'—यहाँ 'वै' शब्द स्मरणके लिये है—उस गन्धर्वने निश्चय तुमसे यही कहा था कि वे

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९५

Page 705Permalink

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९५


अगच्छन् वै ते पारिक्षिताः, तत् तत्र; क्व ? यत्र यस्मिन्नश्वमेधयाजिनो गच्छन्ति, इति निर्णीते प्रश्ने आह-क्व नु कस्मिन्नश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति । तेषां गतिविवक्षया भुवनकोशपरिमाण माह—पारिक्षित वहाँ चले गये। कहाँ ?-जहाँ अर्थात् जिस लोकमें अश्वमेधयाजी जाते हैं—इस प्रकार प्रश्नका निर्णय हो जानेपर भुज्यु बोला—'कहाँ अर्थात् किस लोकमें अश्वमेधयाजी जाते हैं?' तब याज्ञवल्क्य उनकी गति बतलानेकी इच्छासे भुवनकोशका परिमाण बताते हैं—
द्वात्रिंशतं वै, द्वे अधिके त्रिंशद् द्वात्रिंशतं वै, देवरथाह्नानि—देव आदित्यस्तस्य रथो देवरथस्तस्य रथस्य गत्या अह्ना यावत् परिच्छिद्यते देशपरिमाणं तद् देवरथाह्न्यम्, तद् द्वात्रिंशद्गुणितं देवरथाह्नानि, तावत्परिमाणोऽयं लोको लोकालोकगिरिणा परिक्षिप्तः; यत्र वैराजं शरीरं यत्र च कर्मफलोपभोगः प्राणिनां स एष लोकः; एतावाँल्लोकः, अतः परम् अलोकः ।यह लोक द्वात्रिंशत्—दो अधिक तीस अर्थात् बत्तीस देवरथाह्न्य है। देव है आदित्य (सूर्य) उसका रथ ही देवरथ है, उस रथकी गतिसे एक दिनमें संसारका जितना भाग मापा जाता है, उतना देवरथाह्न्य कहलाता है, उसको बत्तीसगुना करनेपर बत्तीस देवरथाह्न्य होते हैं। लोकालोकपर्वतसे घिरा हुआ यह लोक इतने परिमाणवाला है; जहां वैराज शरीर है और जिसमें प्राणियोंके कर्मफलका उपभोग होता है, वह यही लोक है। इतना तो लोक है; इससे आगे अलोक है।
तं लोकं समन्तं समन्ततः लोकविस्ताराद् द्विगुणपरिमाणविस्तारेण परिमाणेन, तं लोकं परिक्षिप्ता पर्येति पृथिवी; तां पृथिवीं तथैव समन्तम्, द्विस्तावद्उस लोकको चारों ओरसे लोकविस्तारकी अपेक्षा दूने परिमाणके विस्तारवाले परिमाणसे पृथिवी घेरे हुए है। इसी प्रकार उस पृथिवीको उससे दूने परिमाणसे सब ओरसे

६०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

Page 706Permalink
६०६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| द्विगुणेन परिमाणेन समुद्रः पर्यति, यं घनोदमाचक्षते पौराणिकाः ।<br><br>तत्र अण्डकपालयोर्विवर-परिमाणमुच्यते, येन विवरेण मार्गेण बहिर्निर्गच्छन्तौ व्याप्नु-वन्त्यश्वमेधयाजिनः । तत्र यावती यावत्परिमाणा क्षुरस्य धारा अग्रम्, यावद्वा सौक्ष्म्येण युक्तं मक्षिकायाः पत्रम्, तावां-स्तावत्परिमाणः, अन्तरेण मध्ये अण्डकपालयोः, आकाश-श्छिद्रम्, तेनाकाशेनेत्येतत् ।<br><br>तान् पारिक्षितानश्वमेधया-जिनः प्राप्तानिन्द्रः परमेश्वरः— योऽश्वमेधेऽग्निश्चितः, सुपर्णः— यद्विषयं दर्शनमुक्तम्—'तस्य प्राची दिक्शिरः' इत्यादिना, सुपर्णः पक्षी भूत्वा पक्षपुच्छा-द्यात्मकः सुपर्णो भूत्वा, वायवे प्रायच्छत्—मूर्तत्वान्नास्त्यात्मनो गतिस्तत्रेति; तान् पारिक्षितान् वायुरात्मनि धित्वा स्थापयित्वा स्वात्मभूतान् कृत्वा तत्र तस्मिन्न-गमयत्;क्व ? यत्र पूर्वेऽतिक्रान्ताः पारिक्षिता अश्वमेधयाजिनोऽभव- | समुद्र घेरे हुए है, जिसे पौराणिक 'घनोद' कहते हैं।<br><br>अब अण्डकपालोंके छिद्रका परिमाण बतलाया जाता है, जिस छिद्ररूप मार्गसे बाहर जानेवाले अश्वमेधयाजी व्याप्त होते हैं। जितनी अर्थात् जितने परिमाणवाली छुरेकी धार होती है, यानी जितना छुरेका अग्रभाग होता है, अथवा जितनी सूक्ष्मतासे युक्त मक्खीका पंख होता है, उतने परिमाणवाला अण्डकपालोंके मध्यमें आकाश-छिद्र होता है। उस आकाशसे [वे जाते हैं]—ऐसा इसका तात्पर्य है।<br><br>उन प्राप्त हुए पारिक्षितों—अश्वमेधयाजियोंको इन्द्र—परमेश्वर-ने—जो अश्वमेधयागमें चयन किया हुआ अग्नि ही है, सुपर्ण होकर जिसके विषयमें कि 'उसका प्राची दिशा शिर है' इत्यादि मन्त्र-से दृष्टि करना बताया गया है, सुपर्ण—पक्षी होकर अर्थात् पंख और पूँछवाला पक्षी होकर वायुको दे दिया, क्योंकि मूर्त होनेके कारण उसे वहाँ अपनी गति दिखायी नहीं देती; उन पारिक्षितोंको वायुने अपनेमें स्थापित कर—उन्हें अपने स्वरूपभूत कर वहाँ पहुँचा दिया। कहाँ?—जहाँ पूर्ववर्ती अर्थात् अतीत पारिक्षित—अश्वमेधयाजी रहे। इस |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९७

Page 707Permalink

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९७


न्निति। एवमिव वै—एवमेव स गन्धर्वो वायुमेव प्रशंसंस पारिक्षितान् गतिम्।प्रकार उस गन्धर्वने पारिक्षितोंकी गतिरूप वायुकी ही प्रशंसा की थी।
समाप्ता आख्यायिका। आख्यायिकानिर्वृत्तं त्वर्थमाख्यायिकातोऽपसृत्य स्वेन श्रुतिरूपेणैव आचष्टेऽस्मभ्यम्; यस्माद्वायुः स्थावरजङ्गमानां भूतानामन्तरात्मा, बहिश्च स एव, तस्मादध्यात्मधिभूताधिदैवभावेन विविधा या अष्टिव्र्याप्तिः स वायुरेव—तथा समष्टिः केवलेन सूत्रात्मना वायुरेव। एवं वायुमात्मानं समष्टिव्यष्टिरूपात्मकत्वेनोपगच्छति यः—एवं वेद।आख्यायिका तो समाप्त हुई। आख्यायिकासे सिद्ध होनेवाला जो अर्थ है, उसे आख्यायिकासे निकाल-कर अपने श्रुतिरूपसे ही बतलाते हैं; क्योंकि वायु ही स्थावर-जङ्गम प्राणियोंका अन्तरात्मा है और वही बाहर भी है, अतः अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवभावसे जो भी विविध प्रकारकी अष्टि (व्यष्टि) यानी व्याप्ति है, वह वायु ही है तथा केवल सूत्ररूपसे वायु ही समष्टि है। इस प्रकार जो ऐसा जानता है, वह समष्टि-व्यष्टिभावसे अपने स्वरूपभूत वायुको ही प्राप्त होता है।
तस्य किं फलमित्याह—अप पुनर्मृत्युं जयति, सकृन्मृत्वा पुनर्न म्रियते। तत आत्मनः प्रश्ननिर्णयाद् भुज्युर्लाह्यायनि-रुपरराम ॥ २ ॥उसे क्या फल मिलता है सो बतलाते हैं—वह अपमृत्यु—पुन-र्मृत्युको जीत लेता है अर्थात् एक बार मरकर फिर नहीं मरता। तब अपने प्रश्नका निर्णय हो जानेसे लाह्यका पुत्र भुज्यु चुप हो गया ॥ २ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये तृतीयं भुज्युब्राह्मणम् ॥ ३ ॥

चतुर्थ ब्राह्मण

Page 708Permalink

चतुर्थ ब्राह्मण

याज्ञवल्क्य-उषस्त-संवाद

| अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ। पुण्यपापप्रयुक्तैर्ग्रहातिग्रहैर्गृहीतः पुनः पुनर्ग्रहातिग्रहांस्त्यजन् उपाददत् संसरतीत्युक्तम्। पुण्यस्य च पर उत्कर्षो व्याख्यातो व्याकृतविषयः समष्टिव्यष्टिरूपो द्वैतैकत्वात्मप्राप्तिः।<br><br>यस्तु ग्रहातिग्रहैर्ग्रस्तः संसरति, सोऽस्ति वा नास्ति ? अस्तित्त्वे च किंलक्षणः ? — इत्यात्मन एव विवेकाधिगमायोषस्तप्रश्न आरभ्यते। तस्य च निरुपाधिस्वरूपस्य क्रियाकारकविनिर्मुक्तस्वभावस्य अधिगमाद् यथोक्ताद् बन्धनाद् विमुच्यते सप्रयोजकात्; आख्यायिकासम्बन्धस्तु प्रसिद्धः॥ | 'अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ' पहले यह कहा जा चुका है कि पुण्य-पापप्रयुक्त ग्रहातिग्रहोंसे गृहीत हुआ पुरुष पुनः-पुनः ग्रहातिग्रहोंको त्यागता और ग्रहण करता हुआ संसारको प्राप्त होता है। तथा पुण्यके परम उत्कर्षकी भी व्याख्या कर दी गयी, जो व्याकृतविषयक समष्टि-व्यष्टिरूप द्वैत और एकत्वभावको प्राप्त होना है।<br><br>[ अब प्रश्न होता है कि ] जो ग्रह और अतिग्रहोंसे ग्रस्त होकर संसारको प्राप्त होता है, वह है या नहीं और यदि है तो किन लक्षणोंवाला है ? इस प्रकार आत्माका ही विवेक करनेके लिए उषस्तका प्रश्न आरम्भ किया जाता है। उस निरुपाधिस्वरूप क्रियाकारकविनिर्मुक्तस्वभाव आत्माका साक्षात्कार होनेपर ही पुरुष प्रयोजकसहित उपर्युक्त बन्धनसे मुक्त होता है। आख्यायिकाका सम्बन्ध तो प्रसिद्ध ही है। |

सर्वान्तर आत्माका निरूपण

अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ६९९

Page 709Permalink

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ६९९

व्याचक्ष्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो यः प्राणेन प्राणिति स त आत्मा सर्वान्तरो योऽपानेनापानीति स त आत्मा सर्वान्तरॊ यो व्यानेन व्यानीति स त आत्मा सर्वान्तरो य उदानेनोदानिति स त आत्मा सर्वान्तर एष त आत्मा सर्वान्तरः ॥ १ ॥

फिर उस याज्ञवल्क्यसे चाक्रायण उषस्तने पूछा। वह बोला, 'हे याज्ञवल्क्य ! जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसकी मेरे प्रति व्याख्या करो।' [ याज्ञवल्क्य-] 'यह तेरा आत्मा ही सर्वान्तर है।' [उषस्त] 'याज्ञवल्क्य ! वह सर्वान्तर कौन-सा है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'जो प्राणसे प्राणक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है; जो अपानसे अपानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है; जो व्यानसे व्यानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है; जो उदानसे उदानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है। यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है' ॥ १ ॥

| अथ हैनं प्रकृतं याज्ञवल्क्यम्, <br><br> उषस्तो नामतः; चक्रस्यापत्यं <br><br> चाक्रायणः, पप्रच्छ । यद् ब्रह्म <br><br> साक्षाद् अव्यवहितं केनचिद् द्रष्टु- <br><br> रपरोक्षाद् अगौणम् न श्रोत्र- <br><br> ब्रह्मादिवत्, किं तत् ? य आत्मा <br><br> आत्मशब्देन प्रत्यगात्मोच्यते, <br><br> तत्र आत्मशब्दस्य प्रसिद्धत्वात् , | फिर इस प्रकृत याज्ञवल्क्यसे जो नामसे उषस्त था उस चाक्रायण— <br><br> चक्रके पुत्रने पूछा, 'जो ब्रह्म साक्षात् किसी भिन्न वस्तुसे व्यवधानको न प्राप्त हुआ और द्रष्टासे अपरोक्ष— <br><br> अगौण है, ( 'श्रोत्रं ब्रह्म मनो ब्रह्म' इत्यादि वाक्यमें कहे हुए ) श्रोत्र- <br><br> ब्रह्मादिके समान नहीं है, वह क्या है ? जो आत्मा है—यहाँ 'आत्मा' <br><br> शब्दसे प्रत्यगात्मा कहा गया है, क्योंकि इसी अर्थमें 'आत्मा' शब्द |

| ७०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |

Page 710Permalink
७००बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृतहिन्दी
सर्वस्याभ्यन्तरः सर्वान्तरः; यद्यः-<br>शब्दाभ्यां प्रसिद्ध आत्मा ब्रह्मेति-<br>तमात्मानम्, मे मह्यम्, व्या-<br>चक्ष्वेति, विस्पष्टं शृङ्गे गृहीत्वा<br>यथा गां दर्शयति, तथा आचक्ष्व,<br>सोऽयमित्येवं कथयस्वेत्यर्थः ।प्रसिद्ध है—तथा जो सर्वान्तर—सबके अभ्यन्तर है—श्रुतिमें 'यत्' और 'यः' इन पदोंसे यह प्रदर्शित किया जाता है कि यह प्रसिद्ध आत्मा ब्रह्म है—उस आत्माका मेरे प्रति व्याख्यान करो—जिस प्रकार सींगोंको पकड़कर गौ दिखलाते हैं, उसी प्रकार स्पष्ट बतलाओ अर्थात् वह यह है—इस प्रकार उसका वर्णन करो।
एवमुक्तः प्रत्याह याज्ञवल्क्यः—<br>एष ते तवात्मा सर्वान्तरः सर्व-<br>स्याभ्यन्तरः; सर्वविशेषणोपल-<br>णार्थं सर्वान्तरग्रहणम्; यत्<br>साक्षाद् अव्यवहितम् अपरोक्षा-<br>दगौणं ब्रह्म बृहत्तमम् आत्मा<br>सर्वस्य सर्वस्याभ्यन्तरः, एतै-<br>र्गुणैः समस्तैर्युक्त एषः, कोऽसौ ?<br>तवात्मा; योऽयं कार्यकारणसङ्घा-<br>तस्तव, स येनात्मना आत्मवान्<br>स एष तव आत्मा—तव कार्य-<br>करणसङ्घातस्येत्यर्थः ।इस प्रकार कहे जानेपर याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया, 'तेरा यह आत्मा सर्वान्तर—सबका अन्तर्वर्ती है। 'सर्वान्तर' शब्दका ग्रहण समस्त विशेषणोंके उपलक्षणके लिये है। जो साक्षात्—अव्यवहित और अपरोक्ष—अगौण ब्रह्म—बृहत्तम आत्मा सबके अभ्यन्तर है, यह इन समस्त गुणोंसे युक्त है; वह कौन है ?—तेरा आत्मा है; यह जो तेरा कार्य-करण (देह-इन्द्रिय) संघात है, वह जिस आत्माके द्वारा आत्मवान् है, वही यह तेरा आत्मा है; तेरा अर्थात् कार्य-करणसंघातका।
तत्र पिण्डः, तस्याभ्यन्तरे<br>लिङ्गात्मा करणसङ्घातः, तृतीयो<br>यश्च सन्दिह्यमानः—तेषु कतमोअब, भुज्युके यह कहनेपर कि पहला तो पिण्ड है, उसके भीतर इन्द्रियसंघातरूप लिङ्गदेह है और तीसरा वह है, जिसके विषयमें सन्देह

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ७०१

Page 711Permalink

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ७०१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
ममात्मा सर्वान्तरस्त्वया विवक्षित इत्युक्त इतर आह—यः प्राणेन मुखनासिकासञ्चारिणा प्राणिति प्राणचेष्टां करोति, येन प्राणः प्रणीयत इत्यर्थः—स ते तव कार्यकारणसङ्घातस्य आत्मा विज्ञानमयः; समानमन्यत्; योऽपानेनापानीति यो व्यानेन व्यानीतीति—छान्दसं दैर्घ्यम्।है—इनमें तुम किसे मेरा सर्वान्तर आत्मा बतलाना चाहते हो? ऐसा प्रश्न करनेपर इतर (याज्ञवल्क्य) ने कहा—'जो मुख और नासिकाद्वारा संचार करनेवाले प्राणसे प्राणचेष्टा करता है, तात्पर्य यह है कि जिसके द्वारा प्राण प्रणीत (चेष्टायुक्त) होता है, वह विज्ञानमय कार्यकारणसंघातरूप तेरा आत्मा है। शेष वाक्यका अर्थ इसीके समान है। 'योऽपानेनापानीति यो व्यानेन व्यानीति' इस वाक्यके 'अपानीति, व्यानीति' इन पदोंमें 'नी' ऐसा जो दीर्घप्रयोग है, वह छान्दस है।
सर्वाः कार्यकारणसङ्घातगताः प्राणनादिचेष्टा दारुयन्त्रस्येव येन क्रियन्ते—न हि चेतनावदनधिष्ठितस्य दारुयन्त्रस्येव प्राणनादिचेष्टा विद्यन्ते; तस्माद् विज्ञानमयेनाधिष्ठितं विलक्षणेन दारुयन्त्रवत् प्राणनादिचेष्टां प्रतिपद्यते—[तात्पर्य यह है कि] काष्ठयन्त्रके समान देहेन्द्रियसंघातमें होनेवाली प्राणनादि समस्त चेष्टाएँ जिसके द्वारा की जाती हैं [वही तेरा सर्वान्तर आत्मा है]। जैसे किसी चेतन अधिष्ठाताकी प्रेरणाके बिना लकड़ीका यन्त्र हिल नहीं सकता, उसी प्रकार इस स्थूल शरीरकी प्राणनादि चेष्टाएँ भी चेतन आत्माके बिना नहीं हो सकतीं। अतः यह अपनेसे भिन्न विज्ञानमय आत्मासे अधिष्ठित होकर काष्ठके यन्त्रके समान प्राणनादि चेष्टा करता है; इसलिये

७०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

Page 712Permalink

७०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३


| तस्मात्सोऽस्ति कार्यकारणसङ्घात-<br>विलक्षणः, यश्चेष्टयति ॥ १ ॥ | जो इससे चेष्टा करता है, वह<br>कार्यकारणसंघातसे विलक्षण [ तेरा<br>सर्वान्तर आत्मा ] है ॥ १ ॥ |

आत्माकी अनिर्वचनीयता

स होवाचोषस्तश्चाक्रायणो यथा विब्रूयाद्सौ गौर-
सावश्व इत्येवमेवैतद् व्यपदिष्टं भवति यदेव साक्षाद-
परोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेत्येष त
आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरः । न
दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुया न मतेर्मन्तारं
मन्वीथा न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः । एष त
आत्मा सर्वान्तरोऽतोऽन्यदार्तं ततो होपस्तश्चाक्रायण
उपरराम ॥ २ ॥

उस चाक्रायण उषस्तने कहा, 'जिस प्रकार कोई [चलना और दौड़ना दिखाकर] कहे कि यह (चलनेवाला) बैल है, यह (दौड़नेवाला) घोड़ा है, उसी प्रकार तुम्हारा यह कथन है; अतः जो भी साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसे तुम स्पष्टतया बतलाओ।' [याज्ञवल्क्य—] 'यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है।' [उषस्त] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह सर्वान्तर कौन सा है?' [याज्ञवल्क्य—] 'तुम दृष्टिके द्रष्टाको नहीं देख सकते, श्रुतिके श्रोताको नहीं सुन सकते, मतिके मन्ताका मनन नहीं कर सकते, विज्ञाति-के विज्ञाताको नहीं जान सकते। तुम्हारा यह आत्मा सर्वान्तर है, इससे भिन्न आर्तं (नाशवान्) है।' इसके पश्चात् चाक्रायण उषस्त चुप हो गया ॥ २ ॥

| स होवाचोषस्तश्चाक्रायणः—<br><br>यथा कश्चिदन्यथा प्रतिज्ञाय पूर्वम्,<br><br>पुनर्विप्रतिपन्नो ब्रूयादन्यथा— | उस चाक्रायण उषस्तने कहा, 'जिस प्रकार पहले कोई अन्य प्रकारसे प्रतिज्ञा कर फिर विपरीत भाषण करे, अर्थात् पहले ऐसी |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०३

Page 713Permalink

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
असौ गौरसावश्वो यश्चलति धावतीति वा, पूर्वं प्रत्यक्षं दर्शयामीति प्रतिज्ञाय, पश्चाच्चलनादिलिङ्गैर्व्यपदिशति, एवमेवैतद् ब्रह्म प्राणनादिलिङ्गैर्व्यपदिष्टं भवति त्वया; किं बहुना। त्यक्त्वा गोतृष्णानिमित्तं व्याजम्, यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः, तं मे व्याचक्ष्वेति ।<br><br>इतर आह—यथा मया प्रथमं प्रतिज्ञातस्तवात्मा—एवंलक्षण इति—तां प्रतिज्ञामनुवर्त्त एव; तत्तथैव, यथोक्तं मया। यत् पुनरुक्तं तमात्मानं घटादिवद् विषयीकुर्विति, तद् अशक्यत्वान्न क्रियते। कस्मात् पुनस्तदशक्यम् ? इत्याह—वस्तुस्वाभाव्यात्; किं पुनस्तद् वस्तुस्वाभाव्यम् दृष्ट्यादिद्रष्टृत्वम्; दृष्टेर्द्रष्टा ह्यात्मा। दृष्टिरिति द्विविधाप्रतिज्ञा करके कि तुम्हें प्रत्यक्ष [गो और अश्व] दिखलाऊँगा फिर चलन आदि लिङ्गसे कहे कि जो चलती है, वह गौ है और जो दौड़ता है, वह घोड़ा है; इसी प्रकार इस ब्रह्मका तुम प्राणनादि लिङ्गोंद्वारा व्यपदेश कर रहे हो; अतः तुम गौओंकी तृष्णाके कारण ब्रह्मवेत्ता होनेका बहाना छोड़कर जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है और जो सर्वान्तर आत्मा है, उसका मेरे प्रति स्पष्ट उल्लेख करो।<br><br>इतर (याज्ञवल्क्य) ने कहा—'मैंने जैसी पहले प्रतिज्ञा की थी कि तुम्हारा आत्मा ऐसे लक्षणोंवाला है, उस प्रतिज्ञाका मैं अनुवर्तन कर ही रहा हूँ, मैंने जैसा कहा है, वह वैसा ही है और तुमने जो कहा कि उस आत्माको घटादिके समान हमारा विषय कर दो, सो वैसा सम्भव न होनेके कारण नहीं किया जाता। वह असम्भव क्यों है? सो बतलाते हैं—वस्तुका ऐसा ही स्वभाव होनेके कारण; वह वस्तुका स्वभाव क्या है? दृष्टि आदिका द्रष्टा होना आत्माका स्वभाव है; आत्मा दृष्टिका द्रष्टा है। दृष्टि—यह दो प्रकारकी होती है—

| ७०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |

Page 714Permalink
७०४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

भवति—लौकिकी पारमार्थिकी चेति; तत्र लौकिकी चक्षुःसंयुक्ता अन्तःकरणवृत्तिः, सा क्रियत इति जायते विनश्यति च; या त्वात्मनो दृष्टिः—अग्न्युष्णप्रकाशादिवत्, सा च द्रष्टुः स्वरूपत्वान्न जायते न विनश्यति च। सा क्रियमाणयोपाधिभूतया संसृष्टे वेति, व्यपदिश्यते—द्रष्टेति, भेदवच्च—द्रष्टा दृष्टिरिति च;लौकिकी और पारमार्थिकी; उनमें चक्षुसे संयुक्त जो अन्तःकरणकी वृत्ति है वह लौकिकी दृष्टि है; वह की जाती है, इसलिये उत्पन्न होती है और नष्ट भी होती है; किंतु जो अग्निके उष्णत्व और प्रकाशादिके समान आत्माकी दृष्टि है, वह द्रष्टाका स्वरूप होनेके कारण न उत्पन्न होती है और न नष्ट होती है। वह क्रियमाण उपाधिभूता दृष्टिसे संसर्गयुक्त-सी है, इसलिये आत्मा 'द्रष्टा' कहा जाता है। तथा द्रष्टा, दृष्टि ऐसा भेदवत् व्यवहार होता है।
याऽसौ लौकिकी दृष्टिश्चक्षुर्द्वारा रूपोपरक्ता जायमानैव नित्यया आत्मदृष्ट्या संसृष्टेव, तत्प्रतिच्छाया—तया व्याप्तैव जायते तथा विनश्यति च; तेनोपचर्यते द्रष्टा सदा पश्यन्नपि—पश्यति न पश्यति चेति; न तु पुनर्द्रष्टुर्दृष्टेः कदाचिदप्यन्यथात्वम्; तथा च वक्ष्यति षष्ठे “ध्यायतीव लेलायतीव”और यह जो लौकिकी दृष्टि है वह मानो चक्षुद्वारा रूपसे संश्लिष्ट-सी ही उत्पन्न होनेवाली है; वह नित्य आत्मदृष्टिसे संसृष्ट-सी, उसकी प्रतिच्छाया और उससे व्याप्त ही उत्पन्न होती और विनाशको प्राप्त होती है। उसीके कारण, सर्वदा देखनेवाला होनेपर भी द्रष्टाके विषयमें 'वह देखता है, नहीं देखता है' ऐसा उपचार किया जाता है; किंतु द्रष्टाकी दृष्टिमें कभी अन्यथात्व नहीं होता; ऐसा छठे (उपनिषद्के चौथे) अध्यायमें कहेंगे भी—“मानो ध्यान करता हुआ, मानो चेष्टा करता

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०५

Page 715Permalink

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०५


(४। ३। ७) 'न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते" (४। ३। २३) इति च।हुआ” तथा “द्रष्टाकी दृष्टिका विपरिलोप नहीं होता” इत्यादि।
तमिममर्थमाह—लौकिक्या दृष्टेः कर्मभूतायाः, द्रष्टारं स्वकीयया नित्यया दृष्ट्या व्याप्तारम्, न पश्येः; यासौ लौकिकी दृष्टिः कर्मभूता, सा रूपोपरक्ता रूपाभिव्यञ्जिका नात्मानं स्वात्मनो व्याप्तारं प्रत्यञ्चं व्याप्नोति; तस्मात्तं प्रत्यगात्मानं दृष्टेर्द्रष्टारं न पश्येः। तथा श्रुतेः श्रोतारं न शृणुयाः, तथा मतेर्मनोवृत्तेः केवलाया व्याप्तारं न मन्वीथाः। तथा विज्ञातेः केवलाया बुद्धिवृत्तेर्व्याप्तारं न विजानीयाः। एष वस्तुनः स्वभावः; अतो नैव दर्शयितुं शक्यते गवादिवत्।उसी बातको याज्ञवल्क्य इस प्रकार कहता है—जो अपनी कर्मभूता लौकिकी दृष्टिका द्रष्टा और उसे अपनी नित्यदृष्टिसे व्याप्त करनेवाला है, उसे तुम नहीं देख सकते। यह जो उसकी कर्मभूता लौकिकी दृष्टि है, वह रूपसे उपरक्त होकर रूपकी अभिव्यञ्जिका है, वह अपनेको व्याप्त करनेवाले प्रत्यगात्माको व्याप्त नहीं कर सकती; अतः उस दृष्टिके द्रष्टा प्रत्यगात्माको नहीं देख सकते। इसी प्रकार उस श्रुतिके श्रोताको नहीं सुन सकते तथा मति—केवल मनोवृत्तिके व्याप्त करनेवालेका मनन नहीं कर सकते। एवं विज्ञाति—केवल बुद्धिवृत्तिके व्याप्त करनेवालेको नहीं जान सकते। यह [उस] वस्तुका स्वभाव है, इसलिये उसे गो आदिके समान दिखाया नहीं जा सकता।
'न दृष्टेर्द्रष्टारम्' इत्यत्राक्षराणयन्यथा व्याचक्षते केचित्—न दृष्टेर्द्रष्टारं दृष्टेः कर्तारं दृष्टिभेदमकृत्वा दृष्टिमात्रस्य कर्तारम्, न पश्येरिति;कोई-कोई [भर्तृप्रपञ्चादि] 'न दृष्टेर्द्रष्टारम्' इत्यादि श्रुतिके अक्षरोंकी दूसरी तरह व्याख्या करते हैं। दृष्टिके द्रष्टा अर्थात् दृष्टिके कर्ताको नहीं देख सकते यानी दृष्टिभेद बिना किये तुम केवल दृष्टिमात्रके कर्ताको नहीं देख सकते; यहाँ

बृ० उ० ४५—

७०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

Page 716Permalink
७०६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृतहिन्दी
दृष्टेरिति कर्मणि षष्ठी; सा दृष्टिः क्रियमाणा घटवत् कर्म भवति; द्रष्टारमिति तृजन्तेन द्रष्टुर्दृष्टिकर्तृत्वमाचष्टे; तेनासौ दृष्टेर्द्रष्टा दृष्टेः कर्तेति व्याख्यातॄणामभिप्रायः।‘दृष्टेः’ इस पदमें कर्ममें षष्ठी है, वह दृष्टि क्रियमाण होनेसे घटके समान कर्म है और ‘द्रष्टारम्’ इस तृजन्त-पदसे द्रष्टाका दृष्टिकर्तृत्व बतलाया गया है; अतः उन व्याख्याताओंका अभिप्राय यह है कि यह दृष्टिका द्रष्टा—दृष्टिका कर्ता है।
तत्र दृष्टेरिति षष्ठ्यन्तेन दृष्टिग्रहणं निरर्थकमिति दोषं न पश्यन्ति; पश्यतां वा पुनरुक्तमसारः प्रमादपाठ इति वा न आदरः; कथं पुनराधिक्यम् ? तृजन्तेनैव दृष्टिकर्तृत्वस्य सिद्धत्वादृष्टेरिति निरर्थकम्; तदा ‘द्रष्टारं न पश्येः’ इत्येतावदेव वक्तव्यम्; यस्माद्धातोः परस्तृच् श्रूयते, तद्धातवर्थकर्तरि हि तृच् स्मर्यते; ‘गन्तारं भेत्तारं वा नयति’ऐसी व्याख्या करनेमें वे यह दोष नहीं देखते कि ‘दृष्टेः’ इस षष्ठ्यन्तरूपसे ‘दृष्टि’ पदका ग्रहण निरर्थक हो जाता है। अथवा यदि देखते होंगे तो 'यह पुनरुक्त है, असार है, प्रमादपाठ है' ऐसा समझकर उसपर ध्यान नहीं देते। यह अधिक पाठ किस प्रकार है? दृष्टिकर्तृत्वरूप अर्थ तो [ ‘द्रष्टारम्’ इस ] तृजन्त पदसे ही सिद्ध हो जाता है¹ इसलिये ‘दृष्टेः’ यह पद निरर्थक ही है; उस स्थितिमें तो ‘द्रष्टारं न पश्येः’ केवल इतना ही कहना चाहिये था; क्योंकि जिस धातुसे परे ‘तृच्’ प्रत्यय सुना जाता है, वहाँ वह ‘तृच्’ उस धात्वर्थके कर्ता-अर्थमें ही होती है; जैसे गन्ता (गमन करनेवाले) को अथवा भेत्ता (भेदन करनेवाले ) को ले जाता

१. क्योंकि ‘ण्वुल्तृचौ कर्तरि’ इस पाणिनिसूत्रके अनुसार ‘तृच्’ प्रत्यय कर्ता-अर्थमें ही होता है।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०७

Page 717Permalink

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०७


| इत्येतावानेव हि शब्दः प्रयुज्यते; न तु 'गतेर्गन्तारं भिदेर्भेत्तारम्' इति असत्यर्थविशेषे प्रयोक्तव्यः; न च अर्थवादत्वेन हातव्यं सत्यां गतौ; न च प्रमादपाठः, सर्वेषामविगानात्; तस्माद् व्याख्यातॄणामेव बुद्धिदौर्बल्यम् नाध्येतृप्रमादः। <br><br> यथा त्वस्माभिर्व्याख्यातम्— लौकिकदृष्टेर्विविच्य नित्यदृष्टिविशिष्ट आत्मा प्रदर्शयितव्यः— तथा कर्तृकर्मविशेषणत्वेन दृष्टिशब्दस्य द्विः प्रयोग उपपद्यते, आत्मस्वरूपनिर्धारणाय; "न हि द्रष्टुर्दृष्टेः" (४ । ३ । २३) इति च प्रदेशान्तरवाक्येनैव एकवाक्यतोपपन्ना भवति; तथा च "चक्षूंषि पश्यति" (के० उ० १ । ६) "श्रोत्रमिदं श्रुतम्" (के० उ० १ । ७) इति श्रुत्यन्तरेण एकवाक्यतोपपन्ना। न्यायाच्च—एव- | है—केवल इतना ही शब्द प्रयुक्त होता है, यदि कोई अन्य विशेष अभिप्राय न हो तो 'गतिके गन्ताको' या 'भेदनके भेत्ताको' ऐसा प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये। जब कि इस अधिक पदप्रयोगकी दूसरी गति है तो इसे अर्थवाद कहकर छोड़ देना भी उचित नहीं है, और न यह प्रमादपाठ ही है, क्योंकि सभी शाखाओंका इसमें मतभेद नहीं है। अतः यहाँ उन व्याख्याताओंकी ही बुद्धिकी दुर्बलता है, अध्ययनकर्ताओंका प्रमाद नहीं है। <br><br> किंतु जिस प्रकार हमने व्याख्या की है कि 'आत्माको लौकिकी दृष्टिसे अलग करके नित्यदृष्टिविशिष्ट दिखाना है' उस प्रकार आत्माके स्वरूपका निर्णय करनेके लिये कर्म और कर्ताके विशेषणरूपसे 'दृष्टि' शब्दका दो बार प्रयोग होना बन सकता है तथा "न¹ हि द्रष्टुर्दृष्टेः" इस प्रदेशान्तरके वाक्यसे भी इसकी एकवाक्यता हो जाती है एवं "चक्षूंषि पश्यति²" "श्रोत्र³मिदं श्रुतम्" इत्यादि अन्य श्रुतियोंसे भी एकवाक्यता हो जाती है। तथा युक्तिसे भी यही |


१. द्रष्टाकी दृष्टिका लोप नहीं होता। २. जिसके द्वारा चक्षु इन्द्रिय देखता है। ३. जिसके द्वारा यह श्रोत्रेन्द्रिय सुन सकता है।

७०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

Page 718Permalink

७०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३


संस्कृतहिन्दी
मेव ह्यात्मनो नित्यत्वमुपपद्यते विक्रियाभावे; विक्रियावच्च नित्यमिति च विप्रतिषिद्धम् । “ध्यायतीव लेलायतीव” (४ । ३ । ७) “न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते” (४ । ३ । २३) “एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य” (४ । ४ । २३) इति च श्रुत्यक्षराण्यन्यथा न गच्छन्ति ।<br><br>ननु द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञातेत्येवमादीन्यप्यक्षराण्यात्मनोऽविक्रियत्वे न गच्छन्तीति; न; यथाप्राप्तलौकिकवाक्यानुवादित्वात्तेषाम् । न आत्मतत्त्वनिर्धारणार्थानि तानि; ‘न दृष्टेर्द्रष्टारम्’ इत्येवमादीनामन्यार्थासम्भवाद् यथोक्तार्थपरत्वमवगम्यते । तस्मादनवबोधादेव हि विशेषणं परित्यक्तं दृष्टेरिति ।उचित जान पड़ता है; क्योंकि विकारका अभाव होनेके कारण इसी प्रकार आत्माका नित्यत्व सम्भव हो सकता है । [ किन्तु यदि आत्माको दृष्टिकर्ता माना जायगा तो वह विकारी होगा ] और जो विकारी है, वह नित्य हो—ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है । इसके सिवा “ध्यायतीव लेलायतीव” “न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते” “एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य” इत्यादि श्रुतियोंके अक्षरोंकी भी अन्य किसी प्रकार गति नहीं है ।<br><br>यदि कहो कि आत्माको विकारहीन माननेपर तो द्रष्टा, श्रोता मन्ता, विज्ञाता इत्यादि शब्दोंकी भी कोई सङ्गति नहीं लग सकती, तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वे तो यथाप्राप्त लौकिक वाक्योंका अनुवाद करनेवाले हैं । वे आत्मतत्त्वका निर्णय करनेके लिये नहीं हैं; “न दृष्टेर्द्रष्टारम्” इत्यादि श्रुतियोंका कोई अन्य अर्थ होना सम्भव न होनेके कारण उनका उपर्युक्त अर्थमें ही तात्पर्य समझा जाता है । अतः अन्य व्याख्याताओंने अज्ञानसे ही ‘दृष्टेः’ इस विशेषणका त्याग किया है ।

१. यह ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) की नित्य महिमा है ।

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०९

Page 719Permalink

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०९


| एष ते तवात्मा सर्वैरुक्तैर्विशेषणैर्विशिष्टः, अत एतस्मादात्मनोऽन्यदार्तम्—कार्यं वा शरीरम्; करणात्मकं वा लिङ्गम्; एतदेवैकमनार्तमविनाशि कूटस्थम्; ततो ह उषस्तश्चाक्रायण उपरराम ॥ २ ॥ | तुम्हारा यह आत्मा उपर्युक्त समस्त विशेषणोंसे विशिष्ट है; इसलिये इस आत्मासे भिन्न और सब कार्यभूत शरीर अथवा करणात्मक लिङ्ग देह आर्त (नाशवान्) है, एक यही अनार्त-अविनाशी अर्थात् कूटस्थ है; तब चाक्रायण उषस्त चुप हो गया ॥ २ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये चतुर्थमुषस्तब्राह्मणम् ॥ ४ ॥


पञ्चम ब्राह्मण

याज्ञवल्क्य-कहोल-संवाद

| बन्धनं सप्रयोजकमुक्तम्, यश्च बद्धस्तस्याप्यस्तित्वमधिगतम्, व्यतिरिक्तत्वं च । तस्येदानीं बन्धमोक्षसाधनं ससंन्यासमात्मज्ञानं वक्तव्यमिति कहोलप्रश्न आरभ्यते— | प्रयोजकोंके सहित बन्धनका वर्णन किया गया और जो बद्ध है उसका अस्तित्व तथा [ देहेन्द्रिय-संघातसे ] भिन्नत्व भी विदित हुआ । अब उसके बन्धनसे मुक्त होनेके साधनरूप संन्याससहित आत्मज्ञानका प्रतिपादन करना है, इसलिये कहोलका प्रश्न आरम्भ किया जाता है— |

संन्याससहित आत्मज्ञानका निरूपण

अथ हैनं कहोलः कौषीतकेयः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे

७१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

Page 720Permalink
७१०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

व्याचक्ष्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः । कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति । एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः । तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् । बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिर्मौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन स्याद् येन स्यात् तेनेदृश एवातोऽन्यदार्तं ततो ह कहोलः कौषीतकेय उपरराम ॥ १ ॥

फिर इस याज्ञवल्क्यसे कौषीतकेय कहोलने पूछा; उसने 'हे याज्ञवल्क्य!' इस प्रकार सम्बोधित करके कहा—'जो भी साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसकी तुम मेरे प्रति व्याख्या करो।' [ यह सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा ] 'यह तुम्हारा आत्मा सर्वान्तर है।' [कहोल-] 'याज्ञवल्क्य ! यह सर्वान्तर कौन-सा है?' [ याज्ञवल्क्य-] 'जो क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह, जरा और मृत्युसे परे है। उस इस आत्माको ही जानकर ब्राह्मण पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणासे अलग हटकर भिक्षाचर्यासे विचरते हैं। जो भी पुत्रैषणा है, वही वित्तैषणा है और जो वित्तैषणा है, वही लोकैषणा है। ये दोनों ही [ साध्य-साधनेच्छाएँ ] एषणाएँ ही हैं। अतः ब्राह्मण पाण्डित्य (आत्मज्ञान) का पूर्णतया सम्पादन कर आत्मज्ञानरूप बलसे स्थित रहनेकी इच्छा करे। फिर बाल्य और पाण्डित्यको पूर्णतया प्राप्त कर वह मुनि होता है। तथा अमौन और मौनका पूर्णतया सम्पादन करके ब्राह्मण (कृतकृत्य) होता है। वह किस प्रकार ब्राह्मण होता है? जिस प्रकार भी हो, ऐसा ही ब्राह्मण होता है; इससे भिन्न और सब आर्त (नाशवान्) है!' तब कौषीतकेय कहोल चुप हो गया ॥ १ ॥

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७११ |

Page 721Permalink
ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ७११

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अथ हैनं कहोलो नामतः, कुषीतकस्यापत्यं कौषीतकेयः, पप्रच्छ; याज्ञवल्क्येति होवाचेति, पूर्ववत्—यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः तं मे व्याचक्ष्वेति—यं विदित्वा बन्धनात् प्रमुच्यते । याज्ञवल्क्य आह—एष ते तवात्मा ।फिर इस याज्ञवल्क्यसे कहोल नामवाले कौषीतकेय—कुषीतकके पुत्रने पूछा, 'हे याज्ञवल्क्य !' इस प्रकार पूर्ववत् सम्बोधनद्वारा अभिमुख करके उसने कहा, 'जो भी साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है और जो सर्वान्तर आत्मा है, उसकी तुम मेरे प्रति व्याख्या करो, जिसको जानकर पुरुष बन्धनसे मुक्त हो जाता है।' याज्ञवल्क्यने कहा, 'यह तुम्हारा आत्मा है।'
[उषस्तकहोलप्रश्नयोर्विवेचनम्]<br><br>किम् उषस्तकहोलाभ्यामेक आत्मा पृष्टः, किं वा भिन्नावात्मानौ तुल्यलक्षणाविति । भिन्नाविति युक्तम्, प्रश्नयोरपुनरुक्तत्वोपपत्तेः । यदि ह्येक आत्मा उषस्तकहोलप्रश्नयोर्विवक्षितः, तत्रैकेनैव प्रश्नेनाधिगतत्वात्तद्विषयो द्वितीयः प्रश्नोऽनर्थकः स्यात् । न चार्थवादरूपत्वं वाक्यस्य; तस्माद् भिन्नावेतावात्मानौ क्षेत्रज्ञपरमात्माख्यौ इति केचिद् व्याचक्षते ।यहाँ प्रश्न होता है कि उषस्त और कहोलने एक ही आत्माके विषयमें पूछा है या समान लक्षणोंवाले भिन्न आत्माओंके विषयमें ?<br><br>[उत्तर—] विभिन्न आत्माओंके विषयमें मानना ही अच्छा है, क्योंकि प्रश्नोंमें पुनरुक्तिका दोष न आना ही उचित है । यदि उषस्त और कहोल दोनोंके प्रश्नोंसे एक ही आत्मा बतलाना अभीष्ट होता तो उसका ज्ञान तो एक ही प्रश्नसे हो जाता है, अतः उसके विषयमें दूसरा प्रश्न करना निरर्थक ही होगा; तथा इस वाक्यकी अर्थवादरूपता मानी नहीं जा सकती । अतः ये क्षेत्रज्ञ और परमात्मासंज्ञक भिन्न-भिन्न आत्मा ही हैं—इस प्रकार कोई कोई विद्वान् व्याख्या करते हैं।

| ७१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |

Page 722Permalink
७१२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
तन्न; 'ते' इति प्रतिज्ञानात्; 'एष त आत्मा' इति हि प्रतिवचने प्रतिज्ञातम् । न चैकस्य कार्यकारणसङ्घातस्य द्वावात्मानौ उपपद्येते; एको हि कार्यकारणसङ्घात एकेनात्मना आत्मवान् । न च उषस्तस्यान्यः कहोलस्यान्यो जातितो भिन्न आत्मा भवति, द्वयोः अगौणत्वात्मत्वसर्वान्तरत्वानुपपत्तेः । यद्येकमगौणं ब्रह्म द्वयोरितरेणावश्यं गौणेन भवितव्यम्, तथा आत्मत्वं सर्वान्तरत्वं च, विरुद्धत्वात् पदार्थानाम् । यद्येकं सर्वान्तरं ब्रह्म आत्मा मुख्यः, इतरेण असर्वान्तरेण अनात्मना अमुख्येनावश्यं भवितव्यम्; तस्मादेकस्यैव द्विः श्रवणं विशेषविवक्षया ।<br><br>यत्तु पूर्वोक्तेन समानं द्वितीये प्रश्नान्तर उक्तम्, तावन्मात्रं पूर्व-ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि 'तुम्हारा' ऐसी प्रतिज्ञा की गयी है, अर्थात् उत्तरमें ऐसी प्रतिज्ञा की गयी है कि 'यह तुम्हारा आत्मा है।' और एक ही देहेन्द्रियसंधातके दो आत्मा होने सम्भव नहीं हैं, क्योंकि एक देहेन्द्रियसंधात एक ही आत्मासे आत्मवान् होता है। उषस्तका आत्मा अन्य हो और कहोलका अन्य हो—ऐसा उनमें जातितः भेद नहीं हो सकता, क्योंकि दोका अगौणत्व (मुख्यत्व), आत्मत्व और सर्वान्तरत्व उपपन्न नहीं हो सकता। यदि दोमेंसे एक ब्रह्म मुख्य है तो दूसरेका गौण होना अवश्यम्भावी है; इसी प्रकार उनका आत्मत्व और सर्वान्तरत्व भी नहीं हो सकता, क्योंकि उन पदार्थोंमें विरुद्धता है। [अभिप्राय यह है कि] यदि एक सर्वान्तर ब्रह्म आत्मा मुख्य होगा तो दूसरेको अवश्य असर्वान्तर अनात्मा और अमुख्य होना चाहिये; अतः एकहीका कुछ विशेष विवक्षासे दो बार श्रवण हुआ है।<br><br>और जो बात दूसरे प्रश्नान्तरमें पूर्व प्रश्नके ही समान कही गयी है, उतना पहले ही प्रश्नका अनुवाद है,

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१३

Page 723Permalink

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
स्यैवानुवादः, तस्यैवानुक्तः कश्चिद् विशेषो वक्तव्य इति। कः पुनरसौ विशेषः ? इत्युच्यते पूर्वस्मिन् प्रश्नेऽस्ति व्यतिरिक्त आत्मा यस्यायं सप्रयोजको बन्ध उक्त इति। द्वितीये तु, तस्यैव आत्मनोऽशनायादिसंसारधर्मातीतत्वं विशेष उच्यते। यद्विशेषपरिज्ञानात् संन्याससहितात् पूर्वोक्ताद् बन्धनाद् विमुच्यते। तस्मात् प्रश्नप्रतिवचनयोः 'एष त आत्मा' इत्येवमन्तयोस्तुल्यार्थतैव।क्योंकि उसीकी कुछ विशेषता बतलानी है, जो अभी बतायी नहीं गयी है। वह विशेषता क्या है ? सो बतलाया जाता है; पूर्व प्रश्नमें जिसका यह प्रयोजकोंसहित बन्ध बतलाया गया है, वह देहादिसे व्यतिरिक्त आत्मा है। दूसरे प्रश्नमें उसी आत्माका क्षुधादि संसारधर्मोंसे परे होना यह विशेषता बतलायी जाती है, जिस विशेषताका संन्यासपूर्वक ज्ञान होनेपर पुरुष पूर्वोक्त बन्धनसे मुक्त हो जाता है। अतः 'एष त आत्मा' इस वाक्यतक इन दोनों प्रश्न और उत्तरोंकी समानार्थता ही है।
ननु कथमेकस्यैवात्मन अशनायाद्यतीतत्वं तद्वत्त्वं चेति विरुद्धधर्मसमवायित्वमिति ?**शङ्का—**किंतु एक ही आत्माका क्षुधादिसे अतीत और उनसे युक्त होना—यह विरुद्धधर्मसमवायित्व किस प्रकार सम्भव है ?
न; परिहृतत्वात्। नामरूप-<br>व्यवहारतद्भाव- विकारकार्यकरण-<br>समन्वयः लक्षणसङ्घातोपाधिभेदसम्पर्कजनितभ्रान्तिमात्रं हि संसारित्वम् इत्यसकृदवोचाम। विरुद्धश्रुतिव्याख्यानप्रसङ्गेन च;**समाधान—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इसका तो परिहार किया जा चुका है। उसका संसारित्व नाम-रूपात्मक विकाररूप जो देहेन्द्रियसंधात है, उस उपाधिभेदके सम्पर्कसे होनेवाली भ्रान्तिमात्र है—ऐसा हम अनेकों बार कह चुके हैं। तथा विरुद्धार्थवाची श्रुतियोंकी व्याख्याके प्रसङ्गमें भी यह बात कही जा