बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| १३२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
| १३२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ | | :--- | :--- |
| रियम्; श्रौतत्वे हि प्रकृतिविकारभावस्ततश्च प्राकृतधर्मग्राहित्वं विकारकर्मणो न त्विह श्रौतत्वम्; अत एव चावसथ्याग्नावेतत् कर्म विधीयते; सर्वा चावृत् स्मार्तैवेति । | श्रौत माना जायगा तो ज्योतिष्टोमकर्मके साथ इसका 'प्रकृतिविकारभाव सम्बन्ध होगा, ऐसी स्थितिमें विकारभूत कर्ममें प्राकृत [ज्योतिष्टोम] कर्मके इतिकर्तव्यतारूप धर्मोंका ग्रहण करना आवश्यक होगा; किंतु [ यहाँ परिसमूहन-परिलेपनादिका सम्बन्ध रहनेके कारण ] यह श्रौतकर्म नहीं है; अतः इस कर्मका विधान आवसथ्याग्निमें ही है। तथा इसमें समस्त आवृत् (इतिकर्तव्यता) स्मार्त ही है। | | उपसद्व्रती भूत्वा पयोव्रती सन्नित्यर्थः । औदुम्बर उदुम्बरवृक्षमये कंसे चमसे वा तस्यैव विशेषणं कंसाकारे चमसाकारे वौदुम्बर एव । आकारे तु विकल्पो नौदुम्बरत्वे । अत्र सर्वौषधं सर्वांसामोषधीनां समूहं यथासम्भवं यथाशक्ति च सर्वा ओषधीः समाहृत्य तत्र ग्राम्याणां तु दश नियमेन ग्राह्या व्रीहियवाद्या वक्ष्यमाणाः । अधिकग्रहणे तु न दोषः । ग्राम्याणां | उपसद्व्रती होकर अर्थात् पयोव्रती होकर 'औदुम्बरे'--उदुम्बरवृक्षमय कंस या चमसमें; उस प्रकृत पात्रका ही यह विशेषण है--कंसाकार अथवा चमसाकार औदुम्बरपात्रमें ही। अर्थात् विकल्प केवल आकारमें ही है औदुम्बर (गूलरका) होनेमें नहीं। उसमें सर्वौषध--सम्पूर्ण ओषधियोंके समूहको अर्थात् यथासम्भव और यथाशक्ति सभी ओषधियोंको लाकर उनमें ग्राम्य ओषधियोंमेंसे तो आगे बतायी जानेवाली व्रीहि-यवादि दश ओषधियां तो अवश्य लेनी चाहिये; अधिक लेनेमें तो कोई दोष है ही नहीं; तथा यथासम्भव |
१. प्रकृतभूत कर्म समग्र अङ्गोंसे युक्त होता है और विकारभूत कर्म अङ्गहीन होता है। श्रौत माननेसे यह ज्योतिष्टोमरूप प्रकृतिका विकार होगा।
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२३
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२३
| शाङ्करभाष्यम् | भाषार्थ |
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| फलानि च यथासम्भवं यथाशक्ति च। इतिशब्दः समस्तसम्भारोपचयप्रदर्शनार्थः, अन्यदपि यत् सम्भरणीयं तत् सर्वं सम्भृत्येत्यर्थः। क्रमस्तत्र गृह्योक्तो द्रष्टव्यः। | और यथाशक्ति ग्राम्य फल भी लाकर। मूलमें 'इति' शब्द समस्त सामग्रीका संग्रह प्रदर्शित करनेके लिये है; तात्पर्य यह कि और भी जो संग्रह करने योग्य वस्तु हो, उसका संग्रह करके। इसका क्रम गृह्यसूत्रोंमें देखना चाहिये। |
| परिसमूहनपरिलेपने भूमिसंस्कारः। अग्निमुपसमाधायेति वचनादावसथ्येऽग्नाविति गम्यते; एकवचनादुपसमाधानश्रवणाच्च। विद्यमानस्यैवोपसमाधानम्। परिस्तीर्य दर्भानावृता, स्मार्तत्वात् कर्मणः स्थालीपाकावृत् परिगृह्यते तयाज्यं संस्कृत्य, पुंसा नक्षत्रेण पुंनाम्ना नक्षत्रेण पुण्याहसंयुक्तेन मन्थं सर्वौषधफलपिष्टं तत्रौदुम्बरे चमसे दधनि मधुनि घृते चोपसिच्यैकयोपमन्थन्योपसम्मध्य संनीय मध्ये संस्थाप्यौदुम्बरेण स्रुवेणा- | परिसमूहन और परिलेपन¹—ये भूमिके संस्कार हैं। 'अग्निमुपसमाधाय' अग्निका उपसमाधान--स्थापन कर—इस वचनसे ज्ञात होता है कि गृह्य-अग्निमें होम करे; क्योंकि यहाँ 'अग्निम्' ऐसा एकवचन है और उपसमाधान श्रुत है। विद्यमान अग्निका ही उपसमाधान होता है। दर्भोंको बिछाकर, 'आवृता'—विधिसे, यह कर्म स्मार्त है, इसलिये यहाँ स्थालीपाकरूप विधि गृहीत होती है। उससे घीका संस्कार कर, 'पुंसा नक्षत्रेण'--पुँल्लिङ्ग नामवाले नक्षत्रमें जो पुण्यतिथिसे युक्त हो मन्थको—सम्पूर्ण ओषधियोंके पिष्ट-पिण्डको उस औदुम्बर चमसमें दही, मधु और घृतमें डालकर एक मथानीसे मथकर फिर अपने और अग्निके मध्यमें स्थापित करे। फिर गूलरके स्रुवासे 'यावन्तो |
१. बुहारना और लीपना।
| १३२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
| १३२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| वापस्थान आज्यस्य जुहोत्येतैर्मन्त्रैर्यावन्तो देवा इत्यादिभिः ॥ १ ॥ | देवाः' इत्यादि मन्त्रोंसे आवापस्थानमें घृतसे हवन करे ॥ १ ॥ |
हवनके मन्त्र
ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति प्राणाय स्वाहा वसिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति चक्षुषे स्वाहा सम्पदे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति श्रोत्राय स्वाहायतनाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति मनसे स्वाहा प्रजात्यै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति रेतसे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति ॥ २ ॥
'ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको (स्रुवामें बचे हुए घृतको) मन्थमें डाल देता है। 'प्राणाय स्वाहा, वसिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'चक्षुषे स्वाहा सम्पदे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'श्रोत्राय स्वाहा आयतनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'मनसे स्वाहा प्रजात्यै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'रेतसे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है ॥ २ ॥
अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२५
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२५
मन्थे सँस्रवमवनयति भुवः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति विश्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति ॥ ३ ॥
'अग्नये स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'सोमाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भुवः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'स्वः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भूर्भुवःस्वः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'ब्रह्मणे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करक संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'क्षत्राय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भूताय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भविष्यते स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'विश्वाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'सर्वाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'प्रजापतये स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है ॥ ३ ॥
१३२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहे-<br>त्यारभ्य द्वे द्वे आहुती हुत्वा<br>मन्थे संस्रवमवनयति। स्रुगाव-<br>लेपनमाज्यं मन्थे संस्रावयति।<br>एतस्मादेव ज्येष्ठाय श्रेष्ठायेत्यादि-<br>प्राणलिङ्गाज्ज्येष्ठश्रेष्ठादिप्राणविद<br>एवास्मिन् कर्मण्यधिकारः। रेतस<br>इत्यारभ्यैकैकामाहुतिं हुत्वा मन्थे<br>संस्रवमवनयत्यपरयोपमन्थन्या-<br>पुनर्मथ्नाति ॥ २-३ ॥ | 'ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहा'<br>यहाँसे लेकर दो-दो आहुतियाँ हवन<br>करके संस्रवको मन्थमें डाल देता<br>है। अर्थात् स्रुवासे लगे हुए घृतको<br>मन्थमें गिरा देता है। इस 'ज्येष्ठाय<br>श्रेष्ठाय' इत्यादि प्राणके लिङ्गसे ही<br>यह निश्चय होता है कि इस कर्ममें<br>ज्येष्ठ-श्रेष्ठादिरूप प्राणोपासकका ही<br>अधिकार है। 'रेतसे स्वाहा' यहाँ-<br>से लेकर एक-एक आहुति हवन<br>करके मन्थमें संस्रव डालता है।<br>फिर दूसरी उपमथानीसे उसका<br>मन्थन करता है ॥ २-३ ॥ |
मन्थाभिमर्शका मन्त्र
अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकसभमसि हिङ्कृतमसि हिङ्क्रियमाणमस्युद्गीथमस्युद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्द्रे संदीप्तमसि विभूरसि प्रभूरस्यन्नमसि ज्योतिरासि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥ ४ ॥
इसके पश्चात् उस मन्थको 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रद्वारा स्पर्श करता है। [मन्थद्रव्यका अधिष्ठातृदेव प्राण है, इसलिये प्राणसे एकरूप होनेके कारण वह सर्वात्मक है 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है—] तू [प्राणरूपसे सम्पूर्ण देहोंमें] भ्रमनेवाला है, [अग्निरूपसे सर्वत्र] प्रचलित होनेवाला है, [ब्रह्मरूपसे] पूर्ण है, [आकाशरूपसे] अत्यन्त
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२७
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२७
स्तब्ध (निष्कम्प) है, [सबसे अविरोधी होनेके कारण] तू यह जगद्रूप एक सभाके समान है, तू ही [यज्ञके आरम्भमें प्रस्तोताके द्वारा] हिङ्कृत है, तथा [उसी प्रस्तोताद्वारा यज्ञमें] तू ही हिङ्क्रियमाण है, [यज्ञारम्भमें उद्गाताद्वारा] तू ही उच्च स्वरसे गाया जानेवाला उद्गीथ है और [यज्ञके मध्यमें उसके द्वारा] तू ही उद्गीयमान है। तू ही [अध्वर्युद्वारा] श्रावित और [आग्नीध्रद्वारा] प्रत्याश्रावित है; आर्द्र [अर्थात् मेघ] में सम्यक् प्रकारसे दीप्त है, तू विभु (विविध रूप होनेवाला) हे और प्रभु (समर्थ) है, तू [भोक्ता अग्निरूपसे] ज्योति है, [कारणरूपसे] सबका प्रलयस्थान है तथा [सबका संहार करनेवाला होनेसे] संवर्ग है ॥ ४ ॥
| अथैनमभिमृशति भ्रमदसीत्यनेन मन्त्रेण ॥ ४ ॥ | इसके पश्चात् 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रसे इसे स्पर्श करता है ॥ ४ ॥ |
मन्थको उठानेका मन्त्र
अथैनमुद्यच्छत्यामँ॒स्यामँ॒हि ते महि स हि राँजे-
शा॒नोऽधिपतिः समाँ॒ राजेशानो॑ऽधिप॑तिं करोत्विति । ५ ।
फिर 'आमंसि आमंहि' इत्यादि मन्त्रसे इसे ऊपर उठाता है। [इस मन्त्रका अर्थ—] 'आमंसि' तू सब जानता है, 'आमंहि ते महि'—मैं तेरी महिमाको अच्छी तरह जानता हूँ। वह प्राण राजा, ईशान और अधिपति है। वह मुझे राजा, ईशान और अधिपति करे ॥ ५ ॥
| अथैनमुद्यच्छति सह पात्रेण हस्ते गृह्णात्यामंस्यामंहि ते महीत्यनेन ॥ ५ ॥ | इसके पश्चात् 'आमंस्यामहि ते महि' इत्यादि मन्त्रसे उसे पात्रके सहित हाथपर ऊपर उठाता है ॥ ५ ॥ |
मन्थभक्षणकी विधि
अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरे॑ण्यम् । मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः।
१३२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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भूः स्वाहा। भर्गो देवस्य धीमहि। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिवँ॒ रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता। भुवः स्वाहा। धियो यो नः प्रचोदयात्। मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ॒ अस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु नः। स्वः स्वाहेति। सर्वां च सावित्रीमन्वाह सर्वांश्च मधुमतीरहमेवेदँ॒ सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यन्तत आचम्य पाणी प्रक्षाल्य जघनेनाग्निं प्राक्शिराः संविशति प्रातरादित्यमुपतिष्ठते दिशामेकपुण्डरीकमस्यहं मनुष्याणामेकपुण्डरीकं भूयासमिति यथेतमेत्य जघनेनाग्निमासीनो वँ॒ शं जपति ॥ ६ ॥
इसके पश्चात् ‘तत्सवितुर्वरेण्यम्’ इत्यादि मन्त्रसे इस मन्थको भक्षण करता है। [‘तत्सवितुः’ इत्यादि मन्त्रका अर्थ—] ‘तत्सवितुर्वरेण्यम्’—सूर्यके उस वरेण्य-श्रेष्ठ पदका मैं ध्यान करता हूँ। ‘वातामधु ऋतायते’—हवा मधुर मन्द गतिसे बह रही है। ‘सिन्धवः मधु क्षरन्ति’—नदियां मधुरसका स्राव कर रही हैं। ‘नः ओषधीः माध्वीः सन्तु’—हमारे लिये ओषधियाँ मधुर हों। ‘भूः स्वाहाः’ [इतने अर्थवाले मन्त्रसे मन्थका पहला ग्रास भक्षण करे।] ‘देवस्य भर्गः धीमहि’—हम सवितादेवके तेजका ध्यान करते हैं। ‘खनक्तमुत उषसः मधु’—रात और दिन सुखकर हों। ‘पार्थिवं रजः मधुमत्’—पृथिवीके धूलिकण उद्वेग न करनेवाले हों। ‘द्यौः पिता नः मधु अस्तु’—पिता द्युलोक हमारे लिये सुखकर हो। ‘भुवः स्वाहा’ [इतने अर्थवाले मन्त्रसे दूसरा ग्रास भक्षण करे]। ‘यः नः धियः प्रचोदयात्’—जो सवितादेव हमारी बुद्धियोंको प्रेरित करता है। ‘नः वनस्पतिः मधुमान्’--हमारे लिये वनस्पति (सोम) मधुर रसमय हो। ‘सूर्यः मधुमान् अस्तु’--सूर्य हमारे लिये मधुमान् हो। ‘गावः नः माध्वीः
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२९
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२९
भवन्तु'--किरणें अथवा दिशाएँ हमारे लिये सुखकर हों। 'स्वः स्वाहा' [ इतने अर्थवाले मन्त्रसे तृतीय ग्रास भक्षण करे ]। इसके पश्चात् सम्पूर्ण सावित्री (गायत्रीमन्त्र), 'मधु वाता ऋतायते' इत्यादि समस्त मधुमती ऋचा और 'अहमेवेदं सर्वं भूयासम्' (यह सब मैं ही हो जाऊँ) 'भूर्भुवः स्वाहा' इस प्रकार कहकर अन्तमें समस्त मन्थको भक्षण कर दोनों हाथ धो अग्निके पश्चिम भागमें पूर्वकी ओर सिर करके बैठता है। प्रातःकालमें 'दिशामेकपुण्डरीकमस्यहं...........भूयासम्'¹ इस मन्त्रद्वारा आदित्यका उपस्थान (नमस्कार) करता है। फिर जिस मार्गसे गया होता है, उसीसे लौटकर अग्निके पश्चिम भागमें बैठकर [ आगे कहे जानेवाले ] वंशको जपता है॥ ६॥
| अथैनमाचामति भक्षयति । गायत्र्याः प्रथमपादेन मधुमत्यैकया व्याहृत्या च प्रथमया प्रथमग्रासमाचामति; तथा गायत्रीद्वितीयपादेन मधुमत्या द्वितीयया द्वितीयया च व्याहृत्या द्वितीयं ग्रासम्; तथा तृतीयेन गायत्रीपादेन तृतीयया मधुमत्या तृतीयया च व्याहृत्या तृतीयं ग्रासम्। सर्वां सावित्रीं सर्वाश्च मधुमतीरुक्त्वाहमेवेदं सर्वं भूयासमिति चान्ते भूर्भुवः स्वः स्वाहेति समस्तं भक्षयति ।<br><br>यथा चतुर्भिर्ग्रासैस्तद् द्रव्यं सर्वं परिसमाप्यते तथा पूर्वमेव | इसके पश्चात् वह मन्थको भक्षण करता है। गायत्रीके प्रथम पाद, एक मधुमती ऋचा और एक व्याहृतिसे प्रथम ग्रास खाता है तथा गायत्रीके द्वितीय पाद, द्वितीय मधुमती ऋचा और द्वितीय व्याहृतिसे दूसरा ग्रास खाता है और गायत्रीके तृतीय पाद, तृतीय मधुमती ऋचा और तृतीय व्याहृतिसे अन्तमें तीसरा ग्रास भक्षण करता है। फिर समस्त गायत्री, सम्पूर्ण मधुमती ऋचा और 'मैं ही यह सब हो जाऊँ' ऐसा कहते हुए 'भूर्भुवः स्वः स्वाहा' ऐसा कहकर समस्त मन्थको भक्षण कर जाता है।<br><br>वह सारा द्रव्य जिस प्रकार चार ग्रासोंमें समाप्त हो जाय इसका पहले |
१. तू दिशाओंका एक पुण्डरीक [अर्थात् अखण्ड श्रेष्ठ] है, मैं मनुष्योंमें एक पुण्डरीक होऊँ।
बृ० उ०—८४
१३३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| निरूपयेत् । यत्पात्रावलिप्तं तत् पात्रं सर्वं निर्णिज्य तूष्णीं पिबेत् । पाणी प्रक्षाल्याप आचम्य जघनेनाग्निं पश्चादग्नेः प्राक्शिराः संविशति । प्रातःसंध्यामुपास्यादित्यमुपतिष्ठते दिशामेकपुण्डरीकमित्यनेन मन्त्रेण । यथेतं यथागतमेत्यागत्य जघनेनाग्निमासीनो वंशं जपति ॥ ६ ॥ | ही विभाग कर ले । जो कुछ पात्रमें लगा रह जाय उस पात्रको धोकर उस सबको चुपचाप पी जाय । फिर दोनों हाथ धोकर जलसे आचमन कर 'जघनेन अग्निम्' अर्थात् अग्निके पश्चिम भागमें पूर्वकी ओर शिर करके बैठता है । प्रातःकालिक संध्योपासन कर 'दिशामेकपुण्डरीकमसि' इस मन्त्रसे आदित्यका उपस्थान करता है । फिर जिस मार्गसे गया था उसीसे लौटकर अग्निके पश्चिम भागमें बैठकर [ इस ] वंशको जपता है ॥ ६ ॥ |
मन्थकर्मका वंश
तँहैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनँशुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ७ ॥
उस इस मन्थका उद्दालक आरुणिने अपने शिष्य वाजसनेय याज्ञवल्क्यको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इस मन्थको सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उससे शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे' ॥ ७ ॥
एतमु हैव वाजसनेयो याज्ञवल्क्यो मधुकाय पैङ्ग्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनँशुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ८ ॥
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १३३१
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १३३१
उस इस मन्थका वाजसनेय याज्ञवल्क्यने अपने शिष्य मधुक पैङ्ग्यको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे' ॥ ८ ॥
एतमु हैव मधुकः पैङ्ग्यश्चूलाय भागवित्तयेऽन्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एन ँशुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ६ ॥
उस इस मन्थका मधुक पैङ्ग्यने अपने शिष्य चूल भागवित्तिको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे' ॥ ६ ॥
एतमु हैव चूलो भागवित्तिर्जानकय आयस्थूणायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एन ँशुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ १० ॥
उस इस मन्थका चूल भागवित्तिने अपने शिष्य जानकि आयस्थूणको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे' ॥ १० ॥
एतमु हैव जानकिरायस्थूणः सत्यकामाय जाबालायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एन ँशुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ११ ॥
उस इस मन्थका जानकि आयस्थूणने अपने शिष्य सत्यकाम जाबालको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे ॥ ११ ॥
एतमु हैव सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि य एन ँशुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्शाखाः
१३३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १३३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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प्ररोहेयुः पलाशानीति तमेतं नापुत्राय वानन्तेवासिने वा ब्रूयात् ॥ १२ ॥
उस इस मन्थका सत्यकाम जाबालने अपने शिष्योंको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे।' उस इस मन्थका जो पुत्र या शिष्य न हो, उसे उपदेश न करे ॥ १२ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| तं हैतमुद्दालक इत्यादि सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेञ्जायेरन्नेवास्मिञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीत्येवमन्तमेनं मन्थमुद्दालकात् प्रभृत्येकैकाचार्यक्रमागतं सत्यकाम आचार्यो बहुभ्योऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाच । किमन्यदुवाचेत्युच्यते—अपि य एनं शुष्के स्थाणौ गतप्राणेऽप्येनं मन्थं भक्षणाय संस्कृतं निषिञ्चेत् प्रक्षिपेज्जायेरन्नुत्पद्येरन्नेवास्मिन् स्थाणौ शाखा अवयवा वृक्षस्य प्ररोहेयुश्च पलाशानि पर्णानि यथा जीवितः स्थाणोः; किमुतानेन कर्मणा कामः सिद्ध्येदिति । ध्रुवफलमिदं कर्मेति कर्मस्तुत्यर्थमेतत् । | 'तं हेतमुद्दालकः' यहाँसे आरम्भ करके 'सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि······प्ररोहेयुः पलाशानि' यहाँतक उद्दालकसे लेकर एक-एक आचार्यके क्रमसे प्राप्त हुए इस मन्थका सत्यकाम जाबालने बहुत-से शिष्योंको उपदेश करके कहा । और क्या कहा, सो बतलाया जाता है—'यदि कोई भक्षणके लिये संस्कार किये गये इस मन्थको किसी शुष्क—गतप्राण स्थाणु (ठूँठ) पर भी डाल दे तो इस ठूँठमें शाखाएँ—वृक्षके अवयव उत्पन्न हो जायँगे और पत्ते भी निकल आयेंगे, जैसे कि जीवित स्थाणु (हरे ठूँठ) में होत हैं; फिर इस कर्मसे यदि कामनाकी सिद्धि हो जाय तो कौन बड़ी बात है ? तात्पर्य यह है कि यह कर्म निश्चित फल देनेवाला है—इस प्रकार यह उक्ति कर्मकी स्तुतिके लिये है। |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३३
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३३
| विद्याधिगमे षट्तीर्थानि तेषामिह सप्राणदर्शनस्य मन्थविज्ञानस्याधिगमे द्वे एव तीर्थे अनुज्ञायेते पुत्रश्चान्तेवासी च ॥ ७-१२ ॥ | विद्याप्राप्तिके छः^१ तीर्थ (अधिकारी) हैं, उनमेंसे इस प्राणदर्शनयुक्त मन्थविज्ञानकी प्राप्तिकी अनुज्ञा पुत्र और शिष्य दो ही तीर्थोंके लिये है ॥ ७-१२ ॥ |
मन्थकर्मकी सामग्रीका विवरण
चतुरौदुम्बरो भवत्यौदुम्बरः स्रुव औदुम्बरश्चमस औदुम्बर इध्म औदुम्बर्या उपमन्थन्यौ दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियङ्गवो गोधूमाश्च मसूराश्च खल्वाश्च खलकुलाश्च तान् पिष्टान् दधनि मधुनि घृत उपसिञ्चत्याज्यस्य जुहोति ॥ १३ ॥
यह मन्थकर्म चतुरौदुम्बर (चार औदुम्बर काष्ठके पदार्थोंवाला) है। इसमें औदुम्बरकाष्ठ (गूलरकी लकड़ी) का स्रुव, औदुम्बरकाष्ठका चमस, औदुम्बरकाष्ठका इध्म और औदुम्बरकाष्ठकी दो उपमन्थनी होती हैं। इसमें व्रीहि (धान), यव (जौ), तिल, माष (उड़द), अणु (साँवा), प्रियङ्गु (काँगनी), गोधूम (गेहूँ), मसूर, खल्व (बाल) और खलकुल (कुलथी)—दश ग्रामीण अन्न उपयुक्त होते हैं। उन्हें पीसकर दही, मधु और घृतमें मिलाकर घृतसे हवन करता है ॥ १३ ॥
| चतुरौदुम्बरो भवतीति व्याख्यातम् । दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति ग्राम्याणां | 'चतुरौदुम्बरो भवति' इस वाक्यकी व्याख्या श्रुतिने स्वयं की है। दश ग्राम्य धान्य होते हैं। हम पहले कह चुके हैं कि ग्राम्य धान्योंमेंसे |
१. शिष्य, वेदाध्यायी श्रोत्रिय, धारणाशक्तिसम्पन्न पुरुष, धन देनेवाला, प्रिय पुत्र और जो एक विद्या सीखकर दूसरी सिखानेवाला हो—ये छः विद्यादानके अधिकारी हैं।
१३३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| तु धान्यानां दश नियमेन ग्राह्या इत्यवोचाम । के त इति निर्दिश्यन्ते—व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियङ्गवोऽणवश्चाणुशब्दवाच्याः। क्वचिद्देशे प्रियङ्गवः प्रसिद्धाः कङ्गुशब्देन। खल्वा निष्पावा वल्लशब्दवाच्या लोके खलकुलाः कुलत्थाः । एतद्व्यतिरेकेण यथाशक्ति सर्वौषधयोग्राह्याः फलानि चेत्यवोचामायाज्ञिकानि वर्जयित्वा ॥ १३ ॥ | दश तो अवश्य ग्रहण करने चाहिये। वे कौन-से हैं, सो बतलाये जाते हैं—व्रीहि, यव, तिल, माष, अणु, प्रियङ्गु, ‘अणु’ शब्दके वाच्य अणु (चावलोंका एक भेद) हे तथा प्रियङ्गु किसी-किसी देशमें कङ्गु (काँगनी) शब्दसे प्रसिद्ध हैं। खल्व या निष्पाव लोकमें वल्ल (बाल) शब्दसे कहे जाते हैं। खलकुल कुलत्थों (कुलथी) को कहते हैं। इनके अतिरिक्त जो यज्ञसम्बन्धी नहीं हैं, उन्हें छोड़कर यथाशक्ति सभी ओषधियां और फल लेने चाहिये—यह हम कह चुके हैं ॥ १३ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये तृतीयं श्रीमन्थब्राह्मणम् ॥ ३ ॥
चतुर्थ ब्राह्मण
सन्तानोत्पत्ति-विज्ञान अथवा पुत्रमन्थ कर्म¹
| यादृग्जन्मा यथोत्पादितो यैर्वा गुणैर्विशिष्टः पुत्र आत्मनः | जिस प्रकार जन्म लेनेवाला, जिस विधिसे उत्पन्न किया हुआ अथवा जिन गुणोंसे विशिष्टताको प्राप्त हुआ पुत्र |
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¹ १. पूर्वोक्त तीसरे ब्राह्मणमें धनार्थी प्राणोपासकके लिये ‘श्रीमन्थ’ कर्मका विधिपूर्वक वर्णन किया गया है; अब इच्छानुसार सद्गुणयुक्त संतान उत्पन्न करनेकी युक्ति बतानेके लिये ‘पुत्रमन्थ’ कर्मका वर्णन आरम्भ करते हैं ।
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १३३५
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १३३५
| पितुश्च लोक्यो भवतीति तत्सम्पादनाय ब्राह्मणमारभ्यते। प्राणदर्शिनः श्रीमन्थं कर्म कृतवतः पुत्रमन्थेऽधिकारः। यदा पुत्रमन्थं चिकीर्षति तदा श्रीमन्थं कृत्वर्तुकालं पत्न्याः प्रतीक्षत इत्येतद्रेतस ओषध्यादिरसतमत्वस्तुत्यावगम्यते— | अपने तथा पिताके लिये लोक-परलोकमें हितकारी होता है; वैसे पुत्रकी उत्पत्ति कैसे हो ? यह बतानेके लिये अथवा ऐसे पुत्रकी प्राप्तिके उपायका सम्पादन करनेके लिये यह चतुर्थ ब्राह्मण प्रारम्भ किया जाता है। जिस प्राणोपासक पुरुषने श्रीमन्थ कर्मका सम्पादन कर लिया है, उसीका पुत्रमन्थ-कर्ममें अधिकार है। साधक जब पुत्रमन्थ करना चाहता है, तब वह श्रीमन्थ-कर्मका अनुष्ठान करके पत्नीके ऋतुकालकी प्रतीक्षा करता है; यह बात रेतस् (शुक्र) को ओषधि आदिका रसतम (सारतम) बताकर उसकी प्रशंसा करनेसे जानी जाती है— |
एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधय ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः पुरुषस्य रेतः ॥ १ ॥
इन भूतोंका रस पृथिवी है, पृथिवीका रस जल है, जलका रस-ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस पुष्प है, पुष्पोंका रस फल है, फलोंका रस (आधार) पुरुष है तथा पुरुषका रस (सार) शुक्र है ॥ १ ॥
| एषां वै चराचराणां भूतानां पृथिवी रसः सारभूतः, सर्वभूतानां मध्विति ह्युक्तम् । पृथिव्या आपो रसः; अप्सु हि पृथिव्योता च | इन चर-अचर समस्त भूतोंका रस-सारभूत तत्त्व पृथिवी है; क्योंकि 'पृथिवी सब भूतोंका मधु (सार) है', यह बात मधु ब्राह्मणमें कह आये हैं। पृथिवी- |
१३३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १३३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| प्रोता च। अपामोषधयो रसः कार्यत्वाद् रसत्वमोषध्यादीनाम्। ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि; फलानां पुरुषः; पुरुषस्य रेतः। "सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतम्" (ऐतरेय० २।१।१) इति श्रुत्यन्तरात् ॥ १ ॥ | का रस जल है; क्योंकि पृथिवी जलमें ओतप्रोत है। जलका रस ओषधियाँ (अन्न) है। जलका कार्य होनेके कारण ओषधियोंको उसका रस बताया गया है। ओषधियोंका रस फूल, फूलोंका रस फल, फलोंका रस पुरुष और पुरुषका रस रेतस् (शुक्र) है। यह बात 'यह वीर्य पुरुषके सम्पूर्ण अङ्गोंसे उत्पन्न हुआ तेज हे' इस दूसरी श्रुतिसे भी प्रमाणित होती है ॥ १ ॥ | | यत्त एवं सर्वभूतानां सारतममेतद् रेतोऽतः का नु खल्वस्य योग्या प्रतिष्ठेति— | यदि इस प्रकार यह रेतस् (वीर्य) सम्पूर्ण भूतोंका सारतम तत्त्व है, तो इसके आधानके योग्य प्रतिष्ठा (आधारभूमि) क्या है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— |
स ह प्रजापतिरीक्षांचक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्त्रियँ ससृजे ताँ सृष्ट्वाध उपास्त तस्मात् स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत्तैनेनामभ्यसृजत ॥ २ ॥
सुप्रसिद्ध प्रजापतिने विचार किया कि मैं इस वीर्यकी स्थापनाके लिये किसी योग्य प्रतिष्ठा (आधार-भूमि) का निर्माण करूँ, अतः उन्होंने स्त्रीकी सृष्टि की। उसकी सृष्टि करके उन्होंने उसके अधोभागकी उपासना की (मैथुनकर्मका विधान किया); अतः स्त्रीके अधोभागकी उपासना (सेवन) करे। प्रजापतिने इस उत्कृष्ट गतिशील प्रस्तरखण्ड-सदृश शिश्नेन्द्रियको (उत्पन्न करके उसे) स्त्रीकी (योनिकी) ओर प्रेरित किया, उससे इस स्त्रीका संसर्ग किया ॥ २ ॥
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३७
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३७
| स ह स्रष्टा प्रजापतिरीक्षाञ्चक्रे।<br><br>ईक्षां कृत्वा स स्त्रियं ससृजे।<br><br>तां च सृष्ट्वाध उपास्त मैथुनाख्यं<br><br>कर्माधउपासनं नाम कृतवान्।<br><br>तस्मात् स्त्रियमध उपासीत।<br><br>श्रेष्ठानुश्रयणा हि प्रजाः।<br><br>अत्र वाजपेयसामान्य-<br>क्लृप्तिमाह—स एतं प्राञ्चं प्रकृष्टगतियुक्तमात्मनो ग्रावाणं सोमाभिषवोपलस्थानीयं काठिन्यसामान्यात् प्रजननेन्द्रियमुदपारयदुत्पूरितवान् स्त्रीव्यञ्जनं प्रति तेनैनां स्त्रियमभ्यसृजदभिसंसर्गं कृतवान् ॥ २ ॥ | उस सुप्रसिद्ध सृष्टिकर्ता प्रजापतिने विचार किया। विचार करके उन्होंने स्त्रीकी सृष्टि की। उसकी सृष्टि करके अधोभागकी उपासना की। मैथुन नामक कर्मका ही नाम अधोभागको उपासना है; उसीको सम्पन्न किया। इसलिये स्त्रीके अधोभागकी उपासना (सेवन) करे; क्योंकि सारी प्रजा श्रेष्ठ पुरुषके आचार-व्यवहारका अनुकरण करनेवाली होती है।<br><br>इस मैथुन-कर्ममें वाजपेय यज्ञकी समानताकी कल्पना करते हैं—उन प्रजापतिने इस प्रकृष्ट गतियुक्त लोढ़ेको, सोमरस निकालनेके लिये उपयोगमें लाये जानेवाले प्रस्तर-खण्डके समान अपने शिश्न—जननेन्द्रियको, जो मैथुनकालमें कठोर हो जाता है, उत्पूरित किया—स्त्री-योनिकी ओर प्रेरित किया। उस जननेन्द्रियसे इस स्त्री का संसर्ग किया¹ ॥ २ ॥ |
१. सृष्टि-कार्यमें इस क्रियाकी अत्यन्त आवश्यकता है। भोगबुद्धिसे न होकर यदि केवल उत्तम संतानोत्पादनके लिये यह क्रिया हो तो वह धर्मसम्मत है और आवश्यक है। इस क्रियामें प्राणिमात्रकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है। यह प्रवृत्ति संयमित हो, भोगार्थ न होकर केवल संतानोत्पादनार्थ हो, पुरुषोंकी स्वेच्छाचारिता और असंयमका निरोध हो, शुभ एवं श्रेष्ठ संतानोत्पादनके विज्ञानसे लोग परिचित हों; यह मनुष्यका पतन करनेवाली पाशविक क्रियामात्र न रहकर लोक-कल्याणकारी नर-रत्नोंके उत्पादन तथा निर्माणमें सफल साधन हो, इसीके लिये शास्त्रमें इस विषयका स्पष्ट विधान किया गया है। जगत्के प्रातःस्मरणीय महान् पुरुषोंका
१३३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणे समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासाँ स्त्रीणाँ सुकृतं वृङ्क्तेऽथ य इदमविद्वानधोपहासं चरत्यास्य स्त्रियः सुकृतं वृञ्जते ॥ ३ ॥
स्त्रीकी उपस्थेन्द्रिय वेदी है, वहाँके रोएँ कुशा हैं, योनिका मध्यभाग प्रज्वलित अग्नि है, योनिके पार्श्वभागमें जो दो कठोर मांसखण्ड हैं उनको मुष्क कहते हैं, वे दोनों मुष्क ही 'अधिषवण' नामसे प्रसिद्ध चर्ममय सोम-फलक हैं। वाजपेय यज्ञ करनेसे यजमानको जितना पुण्यलोक प्राप्त होता है, उतना ही उसे भी प्राप्त होता है। जो कि इस प्रकार जानकर मैथुनका आचरण करता है, वह इन स्त्रियोंके पुण्यको अवरुद्ध कर लेता है और जो इसे नहीं जानता है, वह यदि मैथुन करता है तो स्त्रियाँ ही उसके पुण्यको अवरुद्ध कर लेती हैं ॥ ३ ॥
| तस्या वेदिरित्यादि सर्वं सामान्यं प्रसिद्धम् । समिद्धोऽग्निर्मध्यतः स्त्रीव्यञ्जनस्य तौ मुष्कावधिषवणफलके इति व्यव- | 'तस्या वेदिः' इत्यादि सभी समानताएँ प्रसिद्ध हैं। स्त्री-योनिका मध्यभाग प्रज्वलित अग्नि है। वे दोनों मुष्क (योनिके पार्श्वभागके युगल मांसखण्ड) 'अधिषवण' नामसे प्रसिद्ध सोमफलक हैं; इस प्रकार 'चर्माधिषवणे' पदका दूरस्थित |
उत्पत्तिमें यही विज्ञान साधन-स्वरूप रहा है। अतएव इसको जानकर ही प्रत्येक पुरुष इसके द्वारा विश्व-कल्याणमें सहायक हो सकता है। अवश्य ही यह विज्ञान उन्हीं लोगोंके लिये है, जो प्रजोत्पादनके योग्य गृहस्थ-आश्रममें तथा तरुण-अवस्थामें हैं। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, यति एवं बालक-वृद्धोंके लिये अथवा संसारसे सर्वथा विरक्त पुरुषोंके लिये यह विषय त्याज्य है। इस विज्ञानके प्रतिपादनमें उन वाक्यों या शब्दोंका आना अनिवार्य है, जो अश्लील समझे जाते हैं; क्योंकि उसी विषयको समझाना है; अतएव इस प्रसंगके पाठक इसी दृष्टिसे इसको पढ़ें और सोचें।
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | १३३९ |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | १३३९ |
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| हितेन सम्बध्यते। वाजपेययाजिनो यावाँल्लोकः प्रसिद्धस्तावन् विदुषो मैथुनकर्मणो लोकः फलमिति स्तूयते। तस्माद् बीभत्सा नो कार्येति। <br><br> य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासां स्त्रीणां सुकृतं वृङ्क्त आवर्जयति। अथ पुनर्येा वाजपेयसम्पत्तिं न जानात्यविद्वान् रेतसो रसतमत्वं चाधोपहासं चरति; अस्य स्त्रियः सुकृतमावृञ्जतेऽविदुषः ॥ ३ ॥ | 'तौ मुष्कौ' इन पदोंके साथ सम्बन्ध है। वाजपेय यज्ञद्वारा यजन करनेवालेको जितना लोक प्राप्त होता है, उतना ही लोक विद्वान्के मैथुन कर्मका फल है, ऐसा कहकर यहाँ मैथुनकर्मकी स्तुति की जाती है; अतः इससे घृणा नहीं करनी चाहिये। <br><br> जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष मैथुनकर्म करता है, वह इन स्त्रियोंके पुण्यको अवरुद्ध कर लेता है और जो वाजपेय यज्ञ-सम्पादनकी प्रणालीको नहीं जानता है, रेतस्को रसतम रूपमें नहीं अनुभव करता है, वह यदि मैथुनका सेवन करता है तो उस अज्ञानीके पुण्यको स्त्रियाँ ही अवरुद्ध कर लेती हैं ॥ ३ ॥ |
एतद्ध स्म वै तद् विद्वानुद्दालक आरुणिराहौतद्ध स्म वै तद्विद्वानाको मौद्गल्य आहौतद्ध स्म वै तद्विद्वान् कुमारहारित आह बहवो मर्या ब्राह्मणायाना निरिन्द्रिया विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रयन्ति य इदमविद्वाँसोऽधोपहासं चरन्तीति बहु वा इदँ सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दति ॥ ४ ॥
निश्चय ही इस मैथुनकर्मको वाजपेयसम्पन्न जाननेवाले अरुणनन्दन उद्दालक कहते हैं, इसे उस रूपमें जाननेवाले मुद्गलपुत्र नाक कहते हैं तथा इसे उक्त रूपमें जाननेवाले कुमारहारित मुनि भी कहते हैं कि
१३४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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'बहुत-से ऐसे मरणधर्मा नाममात्रके ब्राह्मण हैं, जो निरिन्द्रिय, सुकृतहीन और मैथुन-विज्ञानसे अपरिचित होकर भी मैथुनकर्ममें आसक्तिपूर्वक प्रवृत्त होते हैं, वे परलोकसे भ्रष्ट हो जाते हैं। यदि पत्नीका ऋतुकाल प्राप्त होने-से पूर्व इस प्राणोपासकका वीर्य अधिक या कम सोते समय अथवा जागते समय गिर जाता है (तो उसे निम्नाङ्कित प्रायश्चित्त करना चाहिये) ॥ ४॥
| एतद्ध स्म वै तद् विद्वानुद्दालक आरुणिराहाधोपहासाख्यं मैथुनकर्म वाजपेयसम्पन्नं विद्वानित्यर्थः; तथा नाको मौद्गल्यः कुमारहारितश्च किं त आहुः ? इत्युच्यते—बहवो मर्या मरणधर्मिणो मनुष्या ब्राह्मणा अयनं येषां ते ब्राह्मणायना ब्रह्मबन्धवो जातिमात्रोपजीविन इत्येतत् । निरिन्द्रिया विश्लिष्टेन्द्रिया विसुकृतो विगतसुकृतकर्माणोऽविद्वांसो मैथुनकर्मासक्ता इत्यर्थः। ते किमस्माल्लोकात् प्रयन्ति परलोकात् परिभ्रष्टा इति । मैथुनकर्मणोऽत्यन्तपापहेतुत्वं दर्शयति—य इदमविद्वांसोऽधोपहासं चरन्तीति । | अरुणनन्दन उद्दालक निश्चय ही इसको पूर्वोक्त रूपसे जानकर अर्थात् 'अधोपहास' नामक मैथुनकर्म वाजपेय यज्ञके महत्त्वसे सम्पन्न है, ऐसा जानकर तथा मुद्गलपुत्र नाक और कुमारहारित भी इसे उक्त रूपमें जानकर कहते हैं; वे क्या कहते हैं? यह बता रहे हैं—बहुत-से ऐसे मर्य—मरणधर्मी मनुष्य ब्राह्मणायन—ब्राह्मण हैं अयन जिनके वे ब्रह्मबन्धु अर्थात् ब्राह्मण जातिका नाम लेकर जीनेवाले, निरिन्द्रिय—जिनकी इन्द्रियाँ संयुक्त न रहकर बिलग-बिलग बिखरी रहती हैं तथा विसुकृत्—पुण्यकर्मरहित अर्थात् मैथुन-विज्ञानसे अपरिचित होते हुए भी मैथुनकर्ममें आसक्त पुरुष हैं, वे क्या होते हैं? वे परलोकभ्रष्ट हो जाते हैं। मैथुनकर्म अत्यन्त पापका हेतु है—यह दिखाते हैं—'जो अविद्वान् इसे न जानते हुए भी मैथुनका सेवन करते हैं' इत्यादि। |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३४१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३४१
| श्रीमन्थं कृत्वा पत्न्या ऋतु- | श्रीमन्थ करके जो ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक पत्नीके ऋतुकालकी |
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| कालं ब्रह्मचर्येण प्रतीक्षते यदीदं | प्रतीक्षा करता हे, उसका यह वीर्य |
| रेतः स्कन्दति बहु वाल्पं वा | यदि रागकी प्रबलताके कारण थोड़ा या अधिक, सोते समय |
| सुप्तस्य वा जाग्रतो वा राग- | अथवा जागते समय गिर जाय, |
| प्राबल्यात् ॥ ४ ॥ | (तो वह निम्नाङ्कित प्रायश्चित्त करे) ॥ ४ ॥ |
तदभिमृशेदनु वा मन्त्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कान्त्सीद् यदोषधीरप्यसरद् यदपः। इदमहं तद्रेत आददे पुनर्मामैत्विन्द्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः। पुनरग्नर्धिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकाङ्गुष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात् ॥५॥
उस वीर्यको हाथसे छूए तथा अभिमन्त्रित करे—स्पर्श करते समय इस प्रकार कहे—'आज जो मेरा वीर्य स्खलित होकर पृथिवीपर गिरा है, जो पहले कभी अन्नमें भी गिरा है तथा जो जलमें पड़ा है उस इस वीर्यको मैं ग्रहण करता हूँ।' ऐसा कहकर अनामिका और अङ्गुष्ठसे उस वीर्यको ग्रहण करके दोनों स्तनों अथवा भौंहोंके बीचमें लगावे। लगाते समय इस प्रकार कहे—'(जो स्खलित वीर्यरूपसे बाहर निकल गयी थी, वह मेरी) इन्द्रिय पुनः मेरे पास लौट आवे। मुझे पुनः तेज और पुनः सौभाग्यकी प्राप्ति हो। अग्नि ही जिनके स्थान हैं, वे देवगण पुनः मेरे शरीरमें उस वीर्यको यथास्थान स्थापित कर दें' ॥ ५ ॥
| तदभिमृशेदतुमन्त्रयेत वानुज- | उसका स्पर्श एवं अनुमन्त्रण (अभिमन्त्रण) अर्थात् बार-बार जप |
|---|---|
| पेदित्यर्थः। यदाभिमृशति तदा- | करे। जब स्पर्श करे तब 'यन्मे... ......से लेकर आददे' तक मन्त्र पढ़ |
| नामिकाङ्गुष्ठाभ्यां तद्रेत आदत्त | कर अनामिका और अङ्गुष्ठसे उस |