बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| ब्राह्मण ९] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८३९ |
| ब्राह्मण ९] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८३९ |
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| स्येति परिहृतमेतत् सर्वम् । विरुद्धश्रुतीनां च विषयमवोचाम । तस्मात् "एषोऽस्य परम आनन्दः" (बृ० उ० ४ । ३ । ३२) इतिवत् सर्वाण्यानन्दवाक्यानि द्रष्टव्यानि ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥ | परिहार किया जा चुका है। विरुद्धश्रुतियोंका विषय भी हम पहले कह चुके हैं¹। अतः आनन्दप्रतिपादक समस्त वाक्योंको "एषोऽस्य परम आनन्दः" इस वाक्यके समान ही समझना चाहिये ॥ ७ ॥ २८ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये
नवमं शाकल्यब्राह्मणम् ॥ ९ ॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
१. मधुकाण्डमें जो ब्रह्मका वेद्यत्व है, वह सोपाधिक होनेके कारण है। निरुपाधिक ब्रह्म तो अवेद्य ही है।
चतुर्थ अध्याय
चतुर्थ अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
जनक-याज्ञवल्क्य-संवाद
| संस्कृत | हिन्दी-अनुवाद |
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| जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रे ।<br><br>उपोद्घातः<br>अस्य सम्बन्धः—<br>शारीराद्यष्टौ पुरुषान्निरूह्य, प्रत्युह्य पुनर्हृदये, दिग्भेदेन च पुनः पञ्चधा व्यूह्य, हृदये प्रत्युह्य, हृदयं शरीरं च पुनरन्योन्यप्रतिष्ठं प्राणादिपञ्चवृत्त्यात्मके समानाख्ये जगदात्मनि सूत्र उपसंहृत्य, जगदात्मानं शरीरहृदयसूत्रावस्थमतिक्रान्तवान् य औपनिषदः पुरुषो नेति नेतीति व्यपदिष्टः, स साक्षाच्चोपादानकारणस्वरूपेण च निर्दिष्टः 'विज्ञानमानन्दम्' इति । तस्यैव वागादिदेवताद्वारेण पुनरधिगमः कर्तव्य इत्यधि- | ‘जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रे’ इसका पहले अध्यायसे इस प्रकार सम्बन्ध है—शारीरादि आठ पुरुषोंका निरूपण करके पुनः उनका हृदयमें उपसंहार कर तथा फिर दिशाओंके भेदसे उन्हें पाँच भागोंमें विभक्त करके पुनः उनका हृदयमें उपसंहार कर तथा एक दूसरेमें प्रतिष्ठित हृदय और शरीरका प्राणादि पाँच वृत्तियोंवाले समानसंज्ञक जगदात्मा सूत्रमें उपसंहार कर जो ‘नेति-नेति’ इस प्रकार बतलाया हुआ औपनिषद पुरुष शरीर, हृदय और सूत्रमें स्थित जगदात्माको अतिक्रमण किये हुए है, उसीका ‘ब्रह्म विज्ञान और आनन्दरूप है’ इस प्रकार साक्षात् और उपादान कारणरूपसे निर्देश किया गया है। उसीका वागादि देवतारूप द्वारसे पुनः बोध कराना है, इसीलिये इन |
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जनक-याज्ञवल्क्य-संवाद
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८४१
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८४१
| गमनोपायान्तरार्थोऽयमारम्भो ब्राह्मणद्वयस्य । आख्यायिका त्वाचारप्रदर्शनार्था— | दो ब्राह्मणोंका आरम्भ किया गया है । [ यहाँ ] आख्यायिका तो आचार प्रदर्शित करनेके लिये है। |
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जनककी सभामें याज्ञवल्क्यका आगमन, जनकका प्रश्न
ॐ जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रेऽथ ह याज्ञवल्क्य आवव्राज । तꣳ होवाच याज्ञवल्क्य किमर्थमचारीः पशूनिच्छन्नण्वन्तानिति उभयमेव सम्राडिति होवाच ॥ १ ॥
विदेह जनक आसनपर स्थित था । तभी [उसके पास] याज्ञवल्क्यजी आये । उनसे [ जनकने ] कहा, 'याज्ञवल्क्यजी ! कैसे आये ? पशुओंकी इच्छासे, अथवा सूक्ष्मान्त [ प्रश्न श्रवण करने ] के लिये ?' 'राजन् ! मैं दोनोंके लिये आया हूँ' ऐसा [ याज्ञवल्क्यने ] कहा ॥ १ ॥
| जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रे आसनं कृतवानास्थायिकां दत्तवानित्यर्थः, दर्शनकामेभ्यो राज्ञः । अथ ह तस्मिन्नवसरे याज्ञवल्क्यः आवव्राज—आगतवानात्मनो योगक्षेमार्थम्, राज्ञो वा विविदिषां दृष्ट्वानुग्रहार्थम् । तमागतं याज्ञवल्क्यं यथावत् पूजां कृत्वोवाच होक्तवाञ्जनकः—हे याज्ञवल्क्य किमर्थम् अचारीः—आगतोऽसि ? किं पशूनिच्छन् पुनरपि, आहोस्विदण्वन्तान् सूक्ष्मान्तान् सूक्ष्मवस्तुनिर्णयान्तान् प्रश्नान् मत्तः श्रोतुमिच्छन्निति । | विदेह देशका राजा जनक आसनपर स्थित था—आसन लगाये हुए था अर्थात् उसने राजाका दर्शन करनेकी इच्छावालोंके लिये अवसर दे रखा था। तब उस समय अपने-योगक्षेमके अथवा राजाकी जिज्ञासा देखकर उसपर कृपा करनेके लिये वहां याज्ञवल्क्यजी आये। उन याज्ञवल्क्यजीको आये देख उनकी यथावत् पूजा कर राजा जनकने कहा, 'हे याज्ञवल्क्य ! आप किसलिये आये हैं ? क्या पुनः पशुओंकी इच्छासे ही आये हैं, अथवा मुझसे सूक्ष्मान्त—सूक्ष्म वस्तुके निर्णयमें समाप्त होनेवाले प्रश्न सुननेकी इच्छासे ?' |
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८४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| उभयमेव पशून् प्रश्नांश्च हे सम्राट् — सम्राडिति वाजपेययाजिनो लिङ्गम्; यश्च आज्ञया राज्यं प्रशास्ति, स सम्राट्; तस्यामन्त्रणं हे सम्राडिति; समस्तस्य वा भारतस्य वर्षस्य राजा ॥१॥ | 'हे सम्राट् ! पशु और प्रश्न दोनोंहीके लिये [ आया हूँ ]।' 'सम्राट्' यह पद वाजपेय यज्ञ करनेवालेका सूचक है; जो भी अपनी आज्ञासे राज्यपर शासन करता है, वह सम्राट् होता है; 'हे सम्राट्' यह उसीका सम्बोधन है; अथवा समस्त भारतवर्षका राजा [ सम्राट् कहा गया है ] ॥ १ ॥ |
शैलिनिके बतलाये हुए वाक्-ब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन
यत्ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे जित्वा शैलिनिर्वाग्वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तच्छैलिनिरब्रवीद् वाग्वै ब्रह्मेत्यवदतो हि किँ स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य । वागेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रज्ञेत्येनदुपासीत । का प्रज्ञता याज्ञवल्क्य । वागेव सम्राडिति होवाच । वाचा वै सम्राड् बन्धुः प्रज्ञायते ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीष्टँ हुतमाशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि वाचैव सम्राट् प्रज्ञायन्ते वाग् वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं वाग् जहाति सर्वाण्वेनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं
ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ८४३
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ८४३ |
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विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः । स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ २ ॥
[ याज्ञवल्क्य- ] 'तुझसे किसी आचार्यने जो कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक- ] 'मुझसे शिलिनके पुत्र जित्वाने कहा हे कि वाक् ही ब्रह्म है।' [याज्ञवल्क्य-] 'जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस शिलिनके पुत्रने 'वाक् ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि न बोलनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?' [ जनक- ] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'राजन् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक- ] 'याज्ञवल्क्य ! वह हमें आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य- ] 'वाक् ही उसका आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है; उसकी 'प्रज्ञा' इस प्रकार उपासना करे।' [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! प्रज्ञता क्या है ?' राजन् ! वाक् ही प्रज्ञता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे सम्राट् ! वाक्से ही बन्धुका ज्ञान होता है और राजन् ! ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्वाङ्गिरसवेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान, इष्ट, हुत, आशित (भूखेको अन्न खिलानेसे होनेवाले धर्म), पायित (प्यासेको पानी पिलानेसे होनेवाले धर्म), यह लोक, परलोक और समस्त भूत वाक्से ही जाने जाते हैं। हे सम्राट् ! वाक् ही परब्रह्म है। इस प्रकार उपासना करनेवालेको वाक् नहीं त्यागता, सम्पूर्ण भूत उसको उपहार देते हैं। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' विदेहराज जनकने कहा, 'मैं आपको-जिनसे हाथीके समान बैल उत्पन्न हों ऐसी-सहस्र गौएँ देता हूँ।' उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ २ ॥
| किंतु यत्ते तुभ्यं कश्चिदब्रवी- | किंतु तुमसे जो कुछ किसी आचार्यने कहा है, वह हम सुनें, |
|---|---|
| दाचार्यः, अनेकाचार्यसेवी हि | क्योंकि तुम बहुत-से आचार्योंकी सेवा |
८४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| भवान्; तच्छृणवामेति । इतर आह—अब्रवीदुक्तवान् मे ममाचार्यः, जित्वा नामतः, शिलिनस्यापत्यं शैलिनिः—वाग् वै ब्रह्मेति वाग्देवता ब्रह्मेति ।<br><br>आहेतरः—यथा मातृमान् माता यस्य विद्यते पुत्रस्य सम्यगनुशास्त्री अनुशासनकर्त्री स मातृमान्; अत ऊर्ध्वं पिता यस्यानुशास्ता स पितृमान्; उपनयनादूर्ध्वमा समावर्तनादाचार्यो यस्यानुशास्ता स आचार्यवान्; एवं शुद्धित्रयहेतुसंयुक्तः स साक्षादाचार्यः स्वयं न कदाचिदपि प्रमाण्याद् व्यभिचरति; स यथा ब्रूयाच्छिष्याय तथासौ जित्वा शैलिनिरुक्तवान् वाग् वै ब्रह्मेति; अवदतो हि किं स्यादिति—न हि मूकस्येहार्थममुत्रार्थं वा किञ्चन स्यात् । किंतु, अब्रवीदुक्तवांस्ते तुभ्यं तस्य ब्रह्मण आयतनं प्रतिष्ठां च—आयतनं | करनेवाले हो; इतर ( जनक ) ने कहा, मुझसे जित्वा नामवाले शिलिनके पुत्र शैलिनिने कहा था कि 'वाक् ही ब्रह्म है' अर्थात् 'वाग्देवता ब्रह्म है।'<br><br>इतर ( याज्ञवल्क्यजी ) बोले, 'जिस प्रकार मातृमान्-जिस पुत्रका सम्यक् प्रकारसे अनुशासन करनेवाली माता विद्यमान है, वह मातृमान्, इसके पश्चात् जिसका अनुशासन करनेवाला पिता है, वह पितृमान् तथा उपनयनके पश्चात् समावर्तन संस्कारतक आचार्य जिसका अनुशासन करनेवाला है, वह आचार्यवान् है; इस प्रकार जो तीन प्रकारकी शुद्धिके हेतुओंसे संयुक्त है, वह साक्षात् आचार्य कभी भी प्रमाणसे व्यभिचरित नहीं हो सकता, वह जिस प्रकार अपने शिष्यको उपदेश करे, उसी प्रकार इस शिलिनके पुत्र जित्वाने तुम्हें यह उपदेश किया है कि वाक् ही ब्रह्म है; क्योंकि न बोलनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? मूकको तो लौकिक या पारलौकिक कोई भी लाभ नहीं हो सकता; किंतु क्या उसने तुम्हें उस ब्रह्मके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये |
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८४५
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८४५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| नाम शरीरम्; प्रतिष्ठा त्रिष्वपि कालेषु य आश्रयः।<br>आहेतरः—न मेऽब्रवीदिति। | थे ? आयतन शरीरको कहते हैं और जो तीनों कालोंमें आश्रय हो वह प्रतिष्ठा कहलाता है।<br>दूसरे (जनक) ने कहा, 'मुझे नहीं बतलाये।' |
| इतर आह—यद्येवमेकपाद् वै एतत्; एकः पादो यस्य ब्रह्मणस्तदिदं एकपाद् ब्रह्म त्रिभिः पादैः शून्यमुपास्यमानमपि न फलाय भवतीत्यर्थः।<br>यद्येवम्, स त्वं विद्वान् सन्बोऽस्मभ्यं ब्रूहि हे याज्ञवल्क्येति। | अन्य (याज्ञवल्क्य) बोला, 'यदि ऐसी बात है तो वह एकपाद ब्रह्म है, जिस ब्रह्मका एक पाद हो वह एकपाद ब्रह्म है, तात्पर्य यह है कि वह तीन पादोंसे शून्य ब्रह्म उपासना किये जानेपर भी फलप्रद नहीं होता।'<br>(जनक-) 'यदि ऐसी बात है तो हे याज्ञवल्क्यजी ! आप उसके ज्ञाता हैं, इसलिये हमारे प्रति उसका वर्णन कीजिये।' |
| स चाह—वागेवायतनम्, वाग्देवस्य ब्रह्मणो वागेव करणमायतनं शरीरम्, आकाशोऽव्याकृताख्यः प्रतिष्ठोत्पत्तिस्थितिलयकालेषु। प्रज्ञेत्येनदुपासीत—प्रज्ञेतीयमुपनिषद् ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः—प्रज्ञेति कृत्वैनद् ब्रह्मोपासीत। | याज्ञवल्क्यने कहा—'वाक् ही आयतन है—उस वाग्देवरूप ब्रह्मका वाक् ही करण—आयतन अर्थात् शरीर है तथा उसकी उत्पत्ति, स्थिति और लयके समय अव्याकृतसंज्ञक आकाश उसकी प्रतिष्ठा है। उसकी 'प्रज्ञा' इस रूपसे उपासना करे। 'प्रज्ञा' यह उपनिषद् उस ब्रह्मका चतुर्थ पाद है। 'प्रज्ञा' ऐसा मानकर उस ब्रह्मकी उपासना करे।' |
| का प्रज्ञता याज्ञवल्क्य ? किं | [जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! प्रज्ञता |
८४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| स्वयमेव प्रज्ञा, उत प्रज्ञानिमित्ता—यथा आयतनप्रतिष्ठे ब्रह्मणो व्यतिरिक्ते, तद्वत् किम् ? <br><br> न; कथं तर्हि ? <br><br> वागेव सम्राडिति होवाच; वागेव प्रज्ञेति होवाचोक्तवान्, न व्यतिरिक्ता प्रज्ञेति । कथं पुनर्वागेव प्रज्ञा ? इत्युच्यते— <br><br> वाचा वै सम्राड् बन्धुः प्रज्ञायते—अस्माकं बन्धुरित्युक्ते प्रज्ञायते बन्धुः; तथर्गादि, इष्टं यागनिमित्तं धर्मजातम्, हुतं-होमनिमित्तं च, आशितमन्नदाननिमित्तम्, पायितं पानदाननिमित्तम्, अयं च लोकः, इदं च जन्म, परश्च लोकः, प्रतिपत्तव्यं च जन्म, सर्वाणि च भूतानि—वाचैव सम्राट् प्रज्ञायन्ते । अतो वाग् वै सम्राट् परमं ब्रह्म । नैनं यथोक्तब्रह्मविदं वाग् जहाति; सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति बलिदानादिभिः; इह देवो | क्या है ? क्या स्वयं प्रज्ञा ही प्रज्ञता है अथवा जिसका प्रज्ञा निमित्त है, [ वह वाक् ] प्रज्ञता है ? जिस प्रकार आयतन और प्रतिष्ठा [ वाक्रूप ] ब्रह्मसे भिन्न हैं, उसी प्रकार प्रज्ञता भी है क्या ? नहीं, तो फिर किस प्रकार है ? <br><br> 'हे सम्राट् ! वह वाक् ही है' ऐसा [ याज्ञवल्क्यने ] उत्तर दिया, 'वाक् ही प्रज्ञा है, प्रज्ञा उससे भिन्न नहीं है—इस प्रकार याज्ञवल्क्यने कहा ।' किंतु वाक् ही प्रज्ञा किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है, <br><br> 'हे सम्राट् ! वाक्से ही बन्धुका ज्ञान होता है । 'यह हमारा बन्धु है' ऐसा कहनेपर ही बन्धुका ज्ञान होता है । इसी प्रकार ऋग्वेदादि, इष्ट—यागसे होनेवाले धर्म, हुत—होमसे होनेवाले धर्म, आशित—अन्नदानजनित धर्म, पायित—जलदानजनित धर्म, यह लोक, यह जन्म, परलोक, आगे प्राप्त होनेवाला जन्म और सम्पूर्ण भूत—हे सम्राट् ! इन सबका वाक्से ही ज्ञान होता है, अतः हे सम्राट् ! वाक् ही परम ब्रह्म है । इस उपर्युक्त ब्रह्मको जाननेवालेका वाक् त्याग नहीं करती । समस्त भूत उपहारादिके द्वारा इसका उपकार करते हैं । |
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८४७
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८४७
| भूत्वा पुनः शरीरपातोत्तलतका, देवानप्येति—अपि गच्छति, य एवं विद्वानेतदुपास्ते । <br><br> विद्यानिष्क्रयार्थं हस्तितुल्य ऋषभो हस्त्यृषभो यस्मिन् गोसहस्रे तद् हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः । <br><br> स होवाच याज्ञवल्क्यः—अननुशिष्य शिष्यं कृतार्थमकृत्वा शिष्याद्धनं न हरेतेति मे मम पिता—अमन्यत । ममाप्ययमेवाभिप्रायः ॥ २ ॥ | जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता हे वह इस लोकमें देव होकर फिर शरीरपातके अनन्तर देवोंको प्राप्त होता है।' <br><br> तब वैदेह जनकने कहा, 'इस विद्याके बदलेमें मैं आपको जिन सहस्र गौओंसे हाथीके समान बैल होते हैं, ऐसे सहस्र हस्त्यृषभ देता हूँ। <br><br> उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका ऐसा विचार था कि शिष्यका अनुशासन किये बिना—उसे कृतार्थ किये बिना शिष्यके यहाँसे धन नहीं ले जाना चाहिये। और मेरा भी ऐसा ही अभिप्राय है' ॥ २ ॥ |
उदङ्कोक्त प्राण-ब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्म उदङ्कः शौल्बायनः प्राणो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तच्छौल्बायनोऽब्रवीत् प्राणो वै ब्रह्मेत्यप्राणतो हि किँ स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य प्राण एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रियमित्येनदुपासीत का प्रियता याज्ञवल्क्य प्राण एव सम्राडिति होवाच प्राणस्य वै सम्राट् कामायायाज्यं याजयत्य-
८४८ . बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
८४८ . बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
प्रतिगृह्यस्य प्रतिगृह्णात्यपि तत्र वधाशङ्कं भवति यां दिशमेति प्राणस्यैव सम्राट् कामाय प्राणो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं प्राणो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ३ ॥
[ याज्ञवल्क्य- ] 'तुमसे किसी [ आचार्य ] ने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक-] 'मुझसे शुल्बके पुत्र उदङ्कने 'प्राण ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है।' [ याज्ञवल्क्य — ] 'जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस शुल्बके पुत्रने 'प्राण ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि प्राणक्रिया न करनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं?' [ जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य — ] 'राजन् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! वह हमें आप बतलाइये।' [याज्ञवल्क्य-] 'प्राण ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, उसकी 'प्रिय' इस रूपसे उपासना करे।' [ जनक—] 'याज्ञवल्क्य ! प्रियता क्या है ?" 'हे सम्राट् ! प्राण ही प्रियता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'राजन् ! प्राणके लिये ही अयाज्यसे यजन कराते हैं, प्रतिग्रह न लेनेयोग्यसे प्रतिग्रह लेते हैं तथा जिस दिशामें जाते हैं, उसमें ही वधकी आशंका करते हैं। हे सम्राट् ! यह सब प्राणके ही लिये होता है। हे राजन् ? प्राण ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसे प्राण नहीं त्यागता, उसको सब भूत उपहार देते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ३ ॥
ब्राह्मण १] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ८४९
ब्राह्मण १] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ८४९
| यदेव ते कश्चिदब्रवीत्, उदङ्को नामतः शुल्बस्यापत्यं शौल्बायनोऽब्रवीत्; प्राणो वै ब्रह्मेति, प्राणो वायुर्देवता—पूर्ववत्। प्राण एव आयतनमाकाशः प्रतिष्ठा; उपनिषत्—प्रियमित्येनदुपासीत ।<br><br>कथं पुनः प्रियत्वम् ? प्राणस्य वै हे सम्राट् कामाय प्राणस्यार्थायायाज्यं याजयति पतितादिकमपि; अप्रतिगृह्यस्याप्युग्रादेः प्रतिगृह्णात्यपि; तत्र तस्यां दिशि वधनिमित्तमाशङ्कम्—वधाशङ्केत्यर्थः, यां दिशमेति तस्कराद्याकीर्णां च तस्यां दिशि वधाशङ्का; तच्चतत् सर्वं प्राणस्य प्रियत्वे भवति, प्राणस्यैव सम्राट् कामाय । तस्मात् प्राणो वै सम्राट् परमं ब्रह्म । नैनं प्राणो जहाति; समानमन्यत् ॥ ३ ॥ | 'यदेव ते कश्चिदब्रवीत्' इत्यादि मुझ़से उदङ्क नामवाले शौल्बायन—शुल्बके पुत्रने कहा है कि प्राण ही ब्रह्म है। पूर्ववत् 'प्राण' वायुदेवता है। प्राण ही आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है। इसकी 'प्रिय' इस रूपसे उपासना करे—यह उपनिषद् है।<br><br>'किंतु इसकी प्रियता किस प्रकार है?' 'हे सम्राट् ! प्राणकी ही कामनासे-प्राणके ही लिये अयाज्यसे पतितादिकसे भी यजन कराते हैं और प्रतिग्रहके अयोग्य उग्र (उद्दण्ड) आदिसे भी प्रतिग्रह लेते हैं तथा चोर और लुटेरों आदिसे आक्रान्त जिस दिशामें जाते हैं, उस दिशामें वधके कारण होनेवाली आशङ्का रखते हैं; उस दिशामें वधकी आशङ्का रहती है; यह सब प्राणकी प्रियता होनेपर ही होता है; हे सम्राट् ! प्राणके ही लिये यह सब होता है। अतः हे राजन् ! प्राण ही परम ब्रह्म है। [जो ऐसी उपासना करता है] उसे प्राण नहीं छोड़ता।' शेष पूर्ववत् है ॥ ३ ॥ |
वर्कुके बताये हुए चक्षुर्ब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे बर्क्कुर्वाष्णर्श्नक्षुर्वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा
बृ० उ० ५४—
८५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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तद् वार्ष्णोऽब्रवीच्चक्षुर्वै ब्रह्मेत्यपश्यतो हि किँस्या-
दित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येक-
पाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य
चक्षुरेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा सत्यमित्येनदुपासीत
का सत्यता याज्ञवल्क्य चक्षुरेव सम्राडिति होवाच
चक्षुषा वै सम्राट् पश्यन्तमाहुरद्राक्षीरिति स आहाद्रा-
क्षमिति तत् सत्यं भवति चक्षुर्वै सम्राट् परमं ब्रह्म
नैनं चक्षुर्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो
भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते। हस्त्यृषभँ
सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच
याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥४॥
[ याज्ञवल्क्य– ] ‘तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।’ [ जनक– ] ‘मुझसे वृष्णके पुत्र बर्कुने कहा है कि चक्षु ही ब्रह्म है।’ [ याज्ञवल्क्य– ] ‘जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान् आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस वार्ष्णने ‘चक्षु ही ब्रह्म है’ ऐसा कहा है; क्योंकि न देखनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?’ [ जनक– ] ‘मुझे नहीं बतलाये।’ [ याज्ञवल्क्य– ] ‘हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।’ [ जनक– ] ‘याज्ञवल्क्यजी ! वह हमें आप बतलाइये।’ [ याज्ञवल्क्य– ] ‘चक्षु ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी ‘सत्य’ इस रूपसे उपासना करे।’ [ जनक– ] हे’ याज्ञवल्क्य ! सत्यता क्या है ?’ ‘हे राजन् ! चक्षु ही सत्यता है’ ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, ‘हे सम्राट् ! चक्षुसे देखनेवालेसे ही ‘क्या तूने देखा’ ऐसा जब कहा जाता है और वह कहता है कि ‘मैंने देखा’ तो वह सत्य होता है। राजन् ! चक्षु ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसका चक्षु त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते हैं और
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५१
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५१
वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ४ ॥
| यदेव ते कश्चिद् बर्कुशिति नामतो वृष्णस्यापत्यं वार्ष्णः; चक्षुर्वै ब्रह्मेति; आदित्यो देवता चक्षुषि। उपनिषत्—सत्यम्; यस्माच्छ्रोत्रेण श्रुतममृतमपि स्यात्, न तु चक्षुषा दृष्टम्; तस्माद् वै सम्राट् पश्यन्तमाहुः—अद्राक्षीस्त्वं हस्तिनमिति, स चेदद्राक्षमित्याह, तत् सत्यमेव भवति यस्त्वन्यो ब्रूयात्—अहमश्रौषमिति; तद् व्यभिचरति; यत्तु चक्षुषा दृष्टं तद्व्यभिचारित्वात् सत्यमेव भवति ॥ ४ ॥ | 'यदेव ते कश्चित्'—बर्कु इस नामवाले वार्ष्ण—वृष्णके पुत्रने 'चक्षु ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है; चक्षुमें आदित्य देवता है। उसकी 'सत्य' यह उपनिषद् है, क्योंकि कानसे सुना हुआ तो मिथ्या भी हो सकता है, किंतु नेत्रसे देखा हुआ नहीं हो सकता; हे सम्राट् ! इसीसे देखनेवालेसे कहते हैं 'तुमने हाथी देखा ?' इसपर यदि वह कहे कि देखा है तो वह सत्य ही होता है। यदि कोई अन्य कहे कि मैंने सुना है तो उसमें तो अन्तर आ सकता है। किंतु जो नेत्रसे देखा हुआ होता है, उसमें अन्तर न आनेके कारण वह सत्य ही होता है ॥ ४ ॥ |
गर्दभीविपीतके कहे हुए श्रोत्रब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे गर्दभीविपीतो भारद्वाजः श्रोत्रं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तद् भारद्वाजोऽब्रवीच्छ्रोत्रं वै ब्रह्मेत्यशृण्वतो किँ स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां
८५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य श्रोत्रमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा-नन्त इत्येनदुपासीत कानन्तता याज्ञवल्क्य दिश एव सम्राडिति होवाच तस्माद् वै सम्राडपि यां कां च दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छत्यनन्ता हि दिशो दिशो वै सम्राट् श्रोत्र ँ श्रोत्रं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैन ँ श्रोत्रं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभ ँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः । स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥५॥
[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक-] 'मुझसे भारद्वाजगोत्रोत्पन्न गर्दभीविपीतने कहा है कि श्रोत्र ही ब्रह्म है।' [ याज्ञवल्क्य-] 'जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस भारद्वाजने 'श्रोत्र ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है; क्योंकि न सुननेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं?' [ जनक ] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह हमें आप बताइये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'श्रोत्र ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है तथा इसकी 'अनन्त' इस रूपसे उपासना करे।' [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! अन-न्तता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! दिशाएँ ही अनन्तता हैं' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'इसीसे हे सम्राट् ! कोई भी जिस किसी दिशाको जाता है, वह उसका अन्त नहीं पाता; क्योंकि दिशाएँ अनन्त हैं' और हे सम्राट् ! दिशाएँ ही श्रोत्र हैं। श्रोत्र ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, श्रोत्र उसका त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५३
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५३
हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएं देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ५ ॥
| 'यदेव ते' गर्दभीविपीत इति नामतः, भारद्वाजो गोत्रतः; श्रोत्रं वै ब्रह्मेति—श्रोत्रे दिग् देवता, अनन्त इत्येनदुपासीत; कानन्तता श्रोत्रस्य ? दिश एव श्रोत्रस्यानन्त्यं यस्मात्, तस्माद् वै सम्राट् प्राचीमुदीचीं वा यां काञ्चिदपि दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छति कश्चिदपि; अतोऽनन्ता हि दिशः; दिशो वै सम्राट् श्रोत्रम्; तस्माद्दिगानन्त्यमेव श्रोत्रस्यानन्त्यम् ॥ ५ ॥ | 'यदेव ते'—गर्दभीविपीत ऐसे नामवाले गोत्रतः भारद्वाजने 'श्रोत्र ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है। श्रोत्रमें दिग् देवता है, उसकी 'अनन्त' इस रूपसे उपासना करनी चाहिये। श्रोत्रकी अनन्तता क्या है? हे सम्राट् ! चूँकि दिशाएँ ही श्रोत्रकी अनन्तता हैं, इसलिये पूर्व या उत्तर जिस किसी भी दिशाको जाय, कोई उसका अन्त नहीं पाता; इसलिये दिशाएँ अनन्त हैं। हे सम्राट् ! दिशाएँ ही श्रोत्र हैं; अतः दिशाओंकी अनन्तता ही श्रोत्रकी अनन्तता है॥ ५॥ |
जाबालोक्त मनोब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे-सत्यकामो जाबालो मनो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तज्जाबालोऽब्रवीन्मनो वै ब्रह्मेत्यमनसो हि किँ स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्या-यतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य मन एवा-यतनमाकाशः प्रतिष्ठानन्द इत्येनदुपासीत कानन्दता
८५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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याज्ञवल्क्य मन एव सम्राडिति होवाच मनसा वै सम्राट् स्त्रियमभिहार्यते तस्यां प्रतिरूपः पुत्रो जायते स आनन्दो मनो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं मनो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति । ६।
[ याज्ञवल्क्य — ] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक — ] 'मुझसे जबालाके पुत्र सत्यकामने कहा है कि मन ही ब्रह्म है।' [ याज्ञवल्क्य — ] 'जैसे मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस जबालाके पुत्रने 'मन ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है; क्योंकि मनोहीनको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा बतलाये हैं?' [ जनक — ] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य — ] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक — ] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह हमें आप बतलाइये।' [याज्ञवल्क्य — ] 'मन ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी 'आनन्द इस रूपसे उपासना करे।' [ जनक — ] 'याज्ञवल्क्य ! आनन्दता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! मन ही आनन्दता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे राजन् ! मनसे ही स्त्रीकी इच्छा करता है, उसमें अनुरूप पुत्र उत्पन्न होता है, वह आनन्द है ! हे सम्राट् ! मन ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसे मन नहीं त्यागता, सब भूत उसका उपकार करते हैं तथा वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्य को उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ६ ॥
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ८५५
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ८५५
| सत्यकाम इति नामतो जबालया अपत्यं जाबालः। चन्द्रमा मनसि देवता। आनन्द इत्युपनिषत्। यस्मान्मन एवानन्दः, तस्मान्मनसा वै सम्राट् स्त्रियमभिकामयमानोऽभिहार्यते प्रार्थयत इत्यर्थः। तस्माद् यां स्त्रियमभिकामयमानोऽभिहार्यते, तस्यां प्रतिरूपोऽनुरूपः पुत्रो जायते; स आनन्दहेतुः पुत्रः; स येन मनसा निर्वर्त्यते, तन्मन आनन्दः ॥ ६ ॥ | सत्यकाम ऐसे नामवाले जाबाल–जबालाके पुत्रने। मनमें चन्द्रमा देवता है। 'आनन्द' यह उपनिषद् है। क्योंकि मन ही आनन्द है, इसलिये हे सम्राट् ! मनसे स्त्रीकी इच्छा करते हुए उसका अभिहरण अर्थात् प्रार्थना करता है। अतः जिस स्त्रीकी कामना करते हुए प्रार्थना करता है, उसमें प्रतिरूप–अनुरूप पुत्र उत्पन्न होता है, वह पुत्र आनन्दका हेतु है। जिस मनके द्वारा वह निष्पन्न होता है, वह मन आनन्द है ॥ ६ ॥ |
शाकल्योक्त हृदयब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे विदग्धः शाकल्यो हृदयं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तच्छाकल्योऽब्रवीद्धृदयं वै ब्रह्मेत्यहृदयस्य हि किꣳ स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य हृदयमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा स्थितिरित्येनदुपासीत का स्थितता याज्ञवल्क्य हृदयमेव सम्राडिति होवाच हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानामायतनꣳ हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानां प्रतिष्ठा हृदये ह्येव सम्राट् सर्वाणि भूतानि प्रतिष्ठितानि भवन्ति हृदयं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनꣳ हृदयं जहाति
८५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
८५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ७ ॥
[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है वह हम सुनें।' [ जनक- ] 'मुझसे विदग्ध शाकल्यने कहा है कि हृदय ही ब्रह्म है।' [याज्ञवल्क्य-] 'जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् पुरुष उपदेश करे, उसी प्रकार उस शाकल्यने 'हृदय ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि हृदयहीनको क्या मिल सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?' [ जनक- ] 'मुझे नहीं बतलाये।' [याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक पादवाला ही ब्रह्म है।' [जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! वह हमें आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हृदय ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है तथा इसकी 'स्थिति' इस रूपसे उपासना करे।' [जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! स्थितती क्या है ?' 'हे सम्राट् ! हृदय ही स्थितता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'राजन् ! हृदय ही समस्त भूतोंका आयतन है, हृदय ही सब भूतोंकी प्रतिष्ठा है और हृदयमें ही समस्त भूत प्रतिष्ठित होते हैं। हे सम्राट् ! हृदय ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसका हृदय त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार समर्पण करते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' वैदेह जनकने कहा, 'मैं आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ७ ॥
| विदग्धः शाकल्यो हृदयं वै ब्रह्मेति। हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानाम् आयतनम् । नाम- | विदग्ध शाकल्यने 'हृदय ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है। हे सम्राट् ! हृदय ही समस्त भूतोंका आयतन है। |