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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

ब्राह्मण १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२१९

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ब्राह्मण १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२१९


| पुत्र उत्तिष्ठति ह–दृष्टमेतत् फलम् ।<br><br>अदृष्टं तूक्थस्य सायुज्यं सलोकतां<br><br>जयति य एवं वेद ॥ १ ॥ | यानी पुत्र उत्पन्न होता है—यह इसका प्रत्यक्ष फल है। परोक्ष फल यह है कि जो ऐसा जानता है, वह उक्थके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ १ ॥ |


यजुर्दृष्टिसे प्राणोपासना

यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते युज्यन्ते हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय यजुषः सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ २ ॥

'यजुः' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे। प्राण ही यजु है, क्योंकि प्राणमें ही इन सब भूतोंका योग होता है। सम्पूर्ण भूत इसकी श्रेष्ठताके कारण इससे संयुक्त होते हैं। जो ऐसी उपासना करता है, वह यजुके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ २ ॥


| यजुरिति चोपासीत प्राणम्;<br><br>प्राणो वै यजुः; कथं यजुः प्राणः?<br><br>प्राणे हि यस्मात् सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते। न ह्यसति प्राणे केनचित् कस्यचिद् योगसामर्थ्यम्; अतो युनक्तीति प्राणो यजुः ।<br><br>एवंविदः फलमाह—युज्यन्त उद्यच्छन्त इत्यर्थः। हास्मा एवंविदे सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्यं श्रेष्ठ- | 'यजुः' इस प्रकार भी प्राणकी उपासना करे; प्राण ही यजु है; प्राण यजु किस प्रकार है? क्योंकि प्राणमें ही समस्त प्राणियोंका योग होता है। प्राणके न रहनेपर किसीके साथ किसीका योग होनेका सामर्थ्य नहीं है; अतः योग करता है, इसलिये प्राण यजु है।<br><br>इस प्रकार उपासना करनेवालेका श्रुति फल बतलाती है—इस प्रकार उपासना करनेवालेको सम्पूर्ण भूत |

| १२२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |

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१२२०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| भावस्तस्मै श्रैष्ठ्याय श्रेष्ठभावायायं नः श्रेष्ठो भवेदिति । यजुषः प्राणस्य सायुज्यमित्यादि सर्वं समानम् ॥ २ ॥ | श्रैष्ठ्य-श्रेष्ठभावका नाम श्रेष्ठ्य है, उस श्रैष्ठ्य यानी श्रेष्ठ-भावके लिये—यह हममें श्रेष्ठ हो, इस निमित्तसे युक्त होते अर्थात् उद्यम करते हैं। तथा वह यजुरूप प्राणका सायुज्य प्राप्त करता है—इत्यादि सब अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |

सामदृष्टिसे प्राणोपासना

साम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि सम्यञ्चि हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय कल्पन्ते साम्नः सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ३ ॥

'साम' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे। प्राण ही साम है, क्योंकि प्राणमें ही ये सब भूत सुसंगत होते हैं। समस्त भूत उसके लिये सुसंगत होते हैं तथा उसकी श्रेष्ठताके लिये समर्थ होते हैं। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह सामके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥

| सामेति चोपासीत प्राणम् । प्राणो वै साम । कथं प्राणः साम ? प्राणे हि यस्मात् सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि संगच्छन्ते; संगमनात् साम्यापात्तहेतुत्वात् साम प्राणः। सम्यञ्चि संगच्छन्ते हास्मै सर्वाणि भतानि। न केवलं संगच्छन्त एव, श्रेष्ठ भावाय चास्मै कल्पन्ते समर्थ्यन्ते साम्नः सायुज्यमित्यादि पूर्ववत् ॥ ३ ॥ | 'साम' इस प्रकार भी प्राणकी उपासना करे। प्राण ही साम है। प्राण साम किस प्रकार है ? क्यों-कि प्राणमें ही सब भूत संगत होते हैं; सङ्गमन अर्थात् साम्यप्राप्तिके कारण प्राण साम है। सम्पूर्ण भूत उसके साथ संगत हो जाते हैं; केवल संगत ही नहीं होते, इसके श्रेष्ठभावके लिये भी समर्थ होते हैं। सामके सायुज्यको प्राप्त होता है—इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३ ॥ |

ब्राह्मण १३] शाङ्करभाष्यार्थ १२२१

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ब्राह्मण १३] शाङ्करभाष्यार्थ १२२१

क्षत्रदृष्टिसे प्राणोपासना

क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रं प्राणो हि वै क्षत्रं त्रायते हैनं प्राणः क्षणितोः प्र क्षत्रमत्रमाप्नोति क्षत्रस्य सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ४ ॥

प्राण क्षत्र है—इस प्रकार प्राणकी उपासना करे। प्राण ही क्षत्र है। प्राण ही क्षत्र है—यह प्रसिद्ध है। प्राण इस देहकी शस्त्रादिजनित क्षतसे रक्षा करता है। अत्रम्—अन्य किसोसे त्राण न पानेवाले क्षत्र (प्राण) को प्राप्त होता है। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह क्षत्रके सायुज्य और सलोकताको जीत लेता है ॥ ४ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तं प्राणं क्षत्रमित्युपासीत । प्राणो वै क्षत्रं प्रसिद्धमेतत् प्राणो हि वै क्षत्रम् । कथं प्रसिद्धता ? इत्याह—त्रायते पालयत्येनं पिण्डं देहं प्राणः क्षणितोः शस्त्रादिहिंसितात् पुनर्मांसेनापूरयति यस्मात् तस्मात् क्षतत्राणात् प्रसिद्धं क्षत्रत्वं प्राणस्य ।उस प्राणकी 'क्षत्र' इस प्रकार उपासना करे। प्राण ही क्षत्र है—यह प्रसिद्ध है कि प्राण ही क्षत्र है। यह प्रसिद्ध किस कारण है, सो श्रुति बतलाती है—इस पिण्ड यानी शरीरकी प्राण क्षतसे—शस्त्रादिकी पीडासे रक्षा करता है अर्थात् उसे पुनः मांससे भर देता है, अतः क्षतसे रक्षा करनेके कारण प्राणका क्षत्रत्व प्रसिद्ध है।
विद्वत्फलमाह—प्र क्षत्रमत्रं न त्रायतेऽन्येन केनचिदित्यत्रं क्षत्रं प्राणस्तमत्रं क्षत्रं प्राणं प्राप्नोतीत्यर्थः । शाखान्तरे वा पाठात् क्षत्रमात्रं प्राप्नोति प्राणोअब श्रुति उपासकको मिलनेवाला फल बतलाती है—प्र क्षत्रम् अत्रम्—जिसका किसी दूसरेसे त्राण नहीं किया जाता, वह प्राण 'अत्र-क्षत्र' है, उस अत्र क्षत्ररूप प्राणको प्राप्त होता है। शाखान्तर (माध्यन्दिनी शाखा) में २पाठान्तर होनेके कारण क्षत्रमात्रको प्राप्त होता है अर्थात् प्राण

१. त्राणहीन।
२. वहाँ 'प्र क्षत्रमत्रमाप्नोति' के स्थानमें 'प्र क्षत्रमात्रमाप्नोति' ऐसा पाठान्तर है।

१२२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

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१२२२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| भवतीत्यर्थः। क्षत्रस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ४ ॥ | हो जाता है—ऐसा अर्थ होगा। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह क्षत्रके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये त्रयोदशमुक्थब्राह्मणम् ॥ १३ ॥

चतुर्दश ब्राह्मण

गायत्र्युपासना

| ब्रह्मणे हृदयाद्यनेकोपाधिविशिष्टस्योपासनमुक्तम्। अथेदानीं गायत्र्युपाधिविशिष्टस्योपासनं वक्तव्यम्, इत्यारभ्यते। सर्वच्छन्दसां हि गायत्रीछन्दः प्रधानभूतम्, तत्प्रयोक्तृगयत्राणाद् गायत्रीति वक्ष्यति। न चान्येषां छन्दसां प्रयोक्तृप्राणत्राणसामर्थ्यम्; प्राणात्मभूता च सा सर्वच्छन्दसां चात्मा प्राणः। प्राणश्च क्षतत्राणात् क्षत्रमित्युक्तम्; प्राणश्च गायत्री; तस्मात् तदुपासनमेव विधित्स्यते। | हृदय आदि अनेक उपाधियोंसे विशिष्ट ब्रह्मकी उपासना बतलायी गयी। अब आगे गायत्रीरूप उपाधिसे विशिष्ट ब्रह्मकी उपासना बतलानी है; इसलिये प्रकरणका आरम्भ किया जाता है। सम्पूर्ण छन्दोंमें गायत्री छन्द ही प्रधानभूत है। उसका प्रयोग करनेवालेके गयका त्राण करनेके कारण यह गायत्री है—ऐसा श्रुति बतलावेगी। अन्य छन्दोंमें अपने प्रयोक्ताके प्राणोंकी रक्षा करनेका सामर्थ्य नहीं है। किंतु वह प्राणकी स्वरूपभूता है और प्राण सम्पूर्ण छन्दोंका आत्मा है। तथा क्षतसे त्राण करनेके कारण प्राण क्षत्र है—ऐसा ऊपर कहा जा चुका है। प्राण ही गायत्री है, इसलिये उसीकी उपासनाका विधान करना अभीष्ट है। |

ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२२३

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ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२२३


| द्विजोत्तमजन्महेतुत्वाच्च—<br>“गायत्र्या ब्राह्मणमसृजत त्रिष्टुभा राजन्यं जगत्या वैश्यम्” इति द्विजोत्तमस्य द्वितीयं जन्म गायत्रीनिमित्तम्। तस्मात् प्रधाना गायत्री। ‘ब्राह्मणा व्युत्थाय’ ‘ब्राह्मणा अभिवदन्ति’ ‘स ब्राह्मणो विपापो विरजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवति’ इत्युत्तमपुरुषार्थसम्बन्धं ब्राह्मणस्य दर्शयति। तच्च ब्राह्मणत्वं गायत्रीजन्ममूलमतो वक्तव्यं गायत्र्याः सततत्त्वम्। गायत्र्या हि यः सृष्टो द्विजोत्तमो निरङ्कुश एवोत्तमपुरुषार्थसाधनेऽधिक्रियते, अतस्तन्मूलः परमपुरुषार्थसम्बन्धः। तस्मात्तदुपासनविधानायाह— | इसके सिवा ब्राह्मणोंके जन्मका हेतु होनेसे भी [इसका विधान किया जाता है]। “गायत्रीसे ब्राह्मणकी रचना की, त्रिष्टुप् से क्षत्रियकी और जगतीसे वैश्यकी” इस श्रुतिके अनुसार द्विजोत्तमका द्वितीय जन्म गायत्रीके कारण है। इसलिये गायत्री प्रधान है। ‘ब्राह्मण व्युत्थान करके [भिक्षाचर्या करते हैं]’, ‘ब्राह्मण अभिवादन करते हैं’, ‘वह ब्राह्मण निष्पाप, निर्दोष और निःशङ्क ब्राह्मण होता है’ इत्यादि श्रुतियाँ ब्राह्मणका उत्तम पुरुषार्थसे सम्बन्ध प्रदर्शित करती हैं। और वह ब्राह्मणत्व गायत्रीजन्ममूलक है; इसलिये गायत्रीका तत्त्व बतलाना आवश्यक है। जो गायत्रीद्वारा रचा हुआ निरङ्कुश द्विजश्रेष्ठ है, उसीका उत्तम पुरुषार्थसाधनमें अधिकार है। अतः परमपुरुषार्थका सम्बन्ध गायत्रीमूलक है। इसलिये उसकी उपासनाका विधान करनेके लिये श्रुति कहती है— |

गायत्रीके प्रथम लोकरूप पादकी उपासना

भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरँ ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदेषु त्रिषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥१॥

१२२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५]

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१२२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५]


भूमि, अन्तरिक्ष और द्यौ—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (प्रथम) पाद है। यह (भूमि आदि) ही इस गायत्रीका प्रथम पाद है। इस प्रकार इसके इस पदको जो जानता है, वह इस त्रिलोकीमें जितना कुछ है, उस सबको जीत लेता है॥ १॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्येतान्यष्टावक्षराणि, अष्टाक्षरमष्टावक्षराणि यस्य तदिदमष्टाक्षरम्; ह वै प्रसिद्धावद्योतकौ, एकं प्रथमं गायत्र्यै गायत्र्याः पदम्, यकारेणैवाष्टत्वपूरणम्, एतदु हैवैकदे-वास्या गायत्र्याः पदं पादः प्रथमो भूम्यादिलक्षणस्त्रैलोक्यात्मा; अष्टाक्षरत्वसामान्यात्।<br><br>एवमेतत् त्रैलोक्यात्मकं गायत्र्याः प्रथमं पदं यो वेद तस्यैतत् फलम्—स विद्वान् यावत् किञ्चिदेषु त्रिषु लोकेषु जेतव्यं तावत् सर्वं ह जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १ ॥भूमि, अन्तरिक्ष, द्यौः—इस प्रकार ये आठ अक्षर हैं। गायत्री का एक अर्थात् प्रथम पाद अष्टाक्षर—जिसमें आठ अक्षर हों, ऐसा यह अष्टाक्षर है। ह और वै—ये प्रसिद्धि-के सूचक निपात हैं। 'द्यौः' इसके यकारसे ही आठ संख्याकी पूर्ति होती है; यही इस गायत्रीका भूमि आदि लक्षणोंवाला त्रिलोकरूप प्रथम पाद है, क्योंकि आठ अक्षर होनेमें इनकी समानता है।<br><br>इस प्रकार गायत्रीके इस त्रैलोक्यात्मक प्रथम पादको जो जानता है, उसे यह फल प्राप्त होता है। वह उपासक, जो इस प्रकार इसके इस पादको जानता है, इस त्रिलोकीमें जो कुछ जय करने योग्य है, उस सभीको जीत लेता है ॥१॥

गायत्रीके द्वितीय त्रयीरूप पादकी उपासना

तथा—इसी प्रकार—

ऋचो यजूंषि सामानीत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरँ ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावतीयं त्रयी विद्या तावच्छ जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ २ ॥

ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२२५

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ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२२५


‘ऋचः, यजूंषि, सामानि’ ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (द्वितीय) पाद है। यह (ऋक् आदि) ही इस गायत्रीका द्वितीय पाद है। जो इस प्रकार इसके इस पादको जानता है, वह जितनी यह त्रयीविद्या है [अर्थात् त्रयीविद्याका जितना फल है] उस सभीको जीत लेता है ॥ २ ॥

| ऋचो यजूंषि सामानीति त्रयीविद्यानामक्षराणि, एतान्यप्यष्टावेव; तथैवाष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदं द्वितीयम् एतदु हैवास्या एतद् ऋग्यजुःसामलक्षणमष्टाक्षरत्वसामान्यादेव । स यावतीयं त्रयीविद्या त्रय्या विद्यया यावत् फलजातमाप्यते तावद्ध जयति योऽस्या एतद् गायत्र्यास्त्रैविद्यलक्षणं पदं वेद ॥ २ ॥ | ‘ऋचः, यजूंषि, सामानि’ ये त्रयीविद्याके अक्षर हैं। ये भी आठ ही हैं; इसी प्रकार गायत्रीका एक अर्थात् द्वितीय पद भी आठ अक्षरोंवाला है। अष्टाक्षरत्वमें समानता होनेके कारण ही यह ऋग्यजुःसामरूप गायत्रीका द्वितीय पाद है। जो इस गायत्रीके इस त्रैविद्य (तीनों वेद) रूप पदको जानता है, वह जितनी यह त्रयीविद्या है अर्थात् त्रयीविद्यासे जितना फल प्राप्त किया जाता है, वह सब जीत लेता है ॥ २ ॥ |


गायत्रीके तृतीय प्राणादिपाद और तुरीय दर्शत परोरजापादकी उपासना

तथा—तथा—

प्राणोऽपानो व्यान इत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरँ ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदिदं प्राणि तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेदाथास्य एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति यद् वै चतुर्थं तत् तुरीयं दर्शतं पदमिति ददृश इव ह्येष परोरजा इति

१२२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

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१२२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

सर्वमु ह्येवैष रज उपर्युपरि तपत्येवँहैव श्रिया यशसा तपति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ३ ॥

प्राण, अपान, व्यान—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (तृतीय) पाद है। यह प्राणादि ही इस गायत्रीका 'तृतीय' पाद है। जो गायत्रीके इस पदको इस प्रकार जानता है, वह जितना यह प्राणिसमुदाय है, सबको जीत लेता है। और यह जो तपता (प्रकाशित होता) है वही इसका तुरीय, दर्शत एवं परोरजा पद है। जो चतुर्थ होता है, वही 'तुरीय' कहलाता है। 'दर्शतं पदम्' इसका अर्थ है—मानों [ यह आदित्यमण्डलस्थ पुरुष ] दीखता है, 'परोरजाः' इसका अर्थ है—यह सभी रज [ यानी लोकों ] के ऊपर-ऊपर रहकर प्रकाशित होता है। जो गायत्रीके इस चतुर्थ पदको इस प्रकार जानता है, वह इसी प्रकार शोभा और कीर्तिसे प्रकाशित होता है ॥ ३ ॥

| प्राणोऽपानो व्यान एतान्यपि प्राणाद्यभिधानाक्षराण्यष्टौ। तच्च गायत्र्यास्तृतीयं पदं यावदिदं प्राणिजातं तावद्व जयति योऽस्या एतदेवं गायत्र्यास्तृतीयं पदं वेद। | प्राण, अपान, व्यान—ये प्राणादिके नाम भी आठ ही अक्षर हैं। यह गायत्रीका तृतीय पाद है। जो इस प्रकार गायत्रीके इस तृतीय पदको जानता है, वह यह जितना प्राणिसमूह है, उस सभीको जीत लेता है। | | अथानन्तरं गायत्र्यास्त्रिपदायाः शब्दात्मिकायास्तुरीयं पदमुच्यतेऽभिधेयभूतमस्याः प्रकृताया गायत्र्या एतदेव वक्ष्यमाणं तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति तुरीयमित्यादिवाक्यपदार्थं स्वयमेव व्याचष्टे श्रुतिः— | अब आगे शब्दात्मिका त्रिपदा गायत्रीका अभिधेयभूत चतुर्थ पद बतलाया जाता है। यह जो तपता है, वही इस प्रकृत गायत्रीका आगे बतलाया जानेवाला तुरीय दर्शत परोरजा पद है। 'तुरीयम्' इत्यादि वाक्यके पदोंके अर्थकी श्रुति स्वयं ही व्याख्या करती है। |

| ब्राह्मण १४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२२७ |

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ब्राह्मण १४ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२२७
संस्कृतहिन्दी
यद् वै चतुर्थं प्रसिद्धं लोके तदिदं तुरीयशब्देनाभिधीयते । दर्शतं पदमित्यस्य कोऽर्थः ? इत्युच्यते—ददृश इव दृश्यत इव ह्येष मण्डलान्तर्गतः पुरुषोऽतो दर्शतं पदमुच्यते । परोरजा इत्यस्य पदस्य कोऽर्थः ? इत्युच्यते—सर्वं समस्तमुह्येवैष मण्डलस्थः पुरुषो रजो रजोजातं समस्तं लोकमित्यर्थः, उपर्युपर्याधिपत्यभावेन सर्वं लोकं रजोजातं तपति । उपर्युपरीति वीप्सा सर्वलोकाधिपत्यख्यापनार्था ।<br><br>ननु सर्वशब्देनैव सिद्धत्वाद् वीप्सानर्थिका ।<br><br>नैष दोषः; येषामुपरिष्टात् सविता दृश्यते तद्विषय एव सर्वशब्दः स्यादित्याशङ्कानिवृत्त्यर्था वीप्सा । “ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां च” (छा० उ० १ । ६ । ८) इति श्रुत्यन्तरात् । तस्मात् सर्वावरोधार्था वीप्सा ।लोकमें जो चतुर्थ प्रसिद्ध है, वही यह 'तुरीय' शब्दसे कहा गया है । 'दर्शतं पदम्' इसका क्या अर्थ है, सो बतलाया जाता है—यह मण्डलान्तर्गत पुरुष 'ददृश इव' अर्थात् दीखता-सा है, इसलिये यह 'दर्शत पद' कहा जाता है । 'परोरजाः' इस पदका क्या अर्थ है ? सो बतलाते हैं—यह मण्डलस्थ पुरुष समस्त रजः-रजःसमूह अर्थात् सारे ही लोकको ऊपर-ऊपर आधिपत्य-भावसे सम्पूर्ण लोकरूप रजःसमूहको प्रकाशित करता है । 'उपरि-उपरि' यह द्विरुक्ति उसका समस्त लोकपर आधिपत्य प्रकट करनेके लिये है ।<br><br>**आक्षेप—**किंतु आधिपत्य तो 'सर्व' शब्दसे ही सिद्ध हो जाता है--ऐसी स्थितिमें द्विरुक्ति तो व्यर्थ ही है ।<br><br>**उत्तर—**यह दोष नहीं है, क्योंकि जिनके ऊपर सूर्य दिखायी देता है, सर्वशब्द तो उन्हींके विषयमें होगा--इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये द्विरुक्ति की गयी है । यह बात “जो कि इससे ऊपरके लोक हैं, यह आदित्यमण्डलस्थ पुरुष उनका और देवताओंके अभीष्ट फलोंका भी स्वामी है” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होती है । अतः सभी लोकोंका अवरोध करनेके लिये यह द्विरुक्ति है ।

१२२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

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१२२८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| यथासौ सविता सर्वाधिपत्य-<br>लक्षणया श्रिया यशसा च ख्या-<br>त्या तप्त्येवं हैव श्रिया यशसा<br>च तपति योऽस्या एतदेवं<br>तुरीयं दर्शतं पदं वेद ॥ ३ ॥ | जो गायत्रीके इस चतुर्थ दर्शत पदको इस प्रकार जानता है, वह इसी प्रकार श्री और कीर्तिसे प्रकाशित होता है जैसे कि यह आदित्य सर्वाधिपत्यरूपा श्री और कीर्तिसे तप रहा है ॥ ३ ॥ |


गायत्रीकी परम प्रतिष्ठा प्राण हैं, ‘गायत्री’ शब्दका निर्वचन और वटुको किये गये गायत्र्युपदेशका फल

सैषा गायत्र्येतस्मिँस्तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता तद् वै तत् सत्ये प्रतिष्ठितं चक्षुर्वै सत्यं चक्षुर्हि वै सत्यं तस्माद् यदिदानीं द्वौ विवदमानावियातामहमदर्शमहमश्रौषमिति य एवं ब्रूयादहमदर्शमिति तस्मा एव श्रद्दध्याम तद् वै तत् सत्यं बले प्रतिष्ठितं प्राणो वै बलं तत् प्राणे प्रतिष्ठितं तस्मादाहुर्बलँ सत्यादोगीय इत्येवंवैषा गायत्र्यध्यात्मं प्रतिष्ठिता सा हैषा गयाँस्तत्रे प्राणा वै गयास्तत्प्राणाँस्तत्रे तद् यद् गयाँस्तत्रे तस्माद् गायत्री नाम स यामेवामूँ सावित्रीमन्वाहैवैष सा स यस्मा अन्वाह तस्य प्राणाँस्त्रायते ॥ ४ ॥

वह यह गायत्री इस चतुर्थ दर्शत परोरजा पदमें प्रतिष्ठित है। वह पद सत्यमें प्रतिष्ठित है। चक्षु ही सत्य है, चक्षु ही सत्य है—यह प्रसिद्ध है। इसीसे यदि दो पुरुष 'मैंने देखा है' 'मैंने सुना है' इस प्रकार विवाद करते हुए आवें, तो उनमेंसे जो यह कहता होगा कि 'मैंने देखा है' उसीका हमें

ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १२२९

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ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १२२९


विश्वास होगा। वह तुरीय पादका आश्रयभूत सत्य बलमें प्रतिष्ठित है। प्राण ही बल है, वह सत्य प्राणमें प्रतिष्ठित है। इसीसे कहते हैं कि सत्यकी अपेक्षा बल ओजस्वी है। इस प्रकार यह गायत्री अध्यात्म प्राणमें प्रतिष्ठित है। उस इस गायत्रीने गयोंका त्राण किया था। प्राण ही गय हैं, उन प्राणोंका इसने त्राण किया। इसने गयोंका त्राण किया था, इसीसे इसका 'गायत्री' नाम हुआ। आचार्यने आठ वर्षके वटुके प्रति उपनयनके समय जिस सावित्रीका उपदेश किया था, वह यही है। वह जिस-जिस वटुको इसका उपदेश करता है, यह उसके-उसके प्राणोंकी रक्षा करती है ॥ ४ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
सैषा त्रिपदोक्ता या त्रैलोक्य-त्रैविद्यप्राणलक्षणा गायत्र्येतस्मिंश्चतुर्थे तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता, मूर्त्तामूर्त्तरसत्वादादित्यस्य; रसापाये हि वस्तु नीरसमप्रतिष्ठितं भवति; यथा काष्ठादि दग्धसारं तद्वत्। तथा मूर्त्तामूर्त्तात्मकं जगत् त्रिपदा गायत्र्यादित्ये प्रतिष्ठिता तद्रसत्वात् सह त्रिभिः पादैः।पूर्वोक्त तीन पदोंवाली वह यह त्रैलोक्य, त्रैविद्य और प्राणरूपा गायत्री इस चतुर्थ तुरीय दर्शत परोरजा पदमें प्रतिष्ठित है। [ यह मूर्तामूर्तरूप गायत्री चतुर्थ पदरूप आदित्यमें प्रतिष्ठित है ] क्योंकि आदित्य मूर्तामूर्तरसस्वरूप है। रस न रहनेपर तो वस्तु नीरस और अप्रतिष्ठित हो जाती है; जिस प्रकार जिसका सार दग्ध हो गया है, वह काष्ठादि नीरस हो जाता है, उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिये। इस प्रकार मूर्तामूर्तात्मक जगद्रूपा त्रिपदा गायत्री तीनों पादोंके सहित आदित्यमें प्रतिष्ठित है; क्योंकि आदित्य उस ( जगत् ) का सार है।
तद् वै तुरीयं पदं सत्ये प्रतिष्ठितम्। किं पुनस्तत् सत्यम् ? इत्युच्यते—चक्षुर्वै सत्यम्। कथंवह तुरीय पद सत्यमें प्रतिष्ठित है। वह सत्य क्या है ? सो बतलाया जाता है—चक्षु ही सत्य है। किस

| १२३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |

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| १२३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ | | :--- | :--- |

| चक्षुः सत्यमित्याह—प्रसिद्धमेतच्चक्षुर्हि वै सत्यम्। कथं प्रसिद्धता ? इत्याह—तस्मात् यद् यदीदानीमेव द्वौ विवदमानौ विरुद्धं वदमानावियातामागच्छेयातामहमदर्शं दृष्टवानस्मीत्यन्य आहाहमश्रौषं त्वया दृष्टं न तथा तद्वस्त्विति तयोर्य एवं ब्रूयादहमद्राक्षमिति तस्मै एव श्रद्दध्याम न पुनर्यो यादहमश्रौषमिति। श्रोतुर्मृषा श्रवणमपि संभवति न तु चक्षुषो मृषा दर्शनम्; तस्मान्नाश्रौषमित्युक्तवते श्रद्दध्याम। तस्मात् सत्यप्रतिपत्तिहेतुत्वात् सत्यं चक्षुस्तस्मिन् सत्ये चक्षुषि सह त्रिभिरितरैः पादैस्तुरीयं पदं प्रतिष्ठितमित्यर्थः। उक्तं च "स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति चक्षुषीति" (३।९।२०)। | प्रकार चक्षु सत्य है? सो श्रुति बतलाती है। यह बात प्रसिद्ध है कि चक्षु ही सत्य है। ऐसी प्रसिद्धि क्यों है? सो श्रुति बतलाती है— इसलिये, यदि इसी समय दो विवाद करनेवाले—परस्परविरुद्ध बोलनेवाले आवें; उनमेंसे एक कहता हो, कि 'मैंने ऐसा देखा है' और दूसरा कहे कि 'मैंने सुना है, तूने जैसी देखी है, वह वस्तु वैसी नहीं है' तो उनमेंसे जो यह कहेगा कि 'मैंने उसे देखा है' हम उसीका विश्वास करेंगे, जो ऐसा कहता है कि 'मैंने सुना है' उसका नहीं। सुननेवालेका श्रवण तो मिथ्या भी हो सकता है, किंतु नेत्रोंको मिथ्या दर्शन नहीं हो सकता। इसलिये जो कहता है कि 'मैंने सुना है' उसमें हमारा विश्वास नहीं होता। अतः सत्यज्ञानका हेतु होनेके कारण चक्षु सत्य है। उस सत्यरूप चक्षुमें अन्य तीन पादोंके सहित तुरीय पद प्रतिष्ठित है—ऐसा इसका तात्पर्य है। कहा भी है—"वह आदित्य किसमें प्रतिष्ठित है? चक्षुमें"। | | तद् वै तुरीयपदाश्रयं सत्यं बले प्रतिष्ठितम्। किं पुनस्तद्बलम् ? | वह तुरीय पदका आश्रयभूत सत्य बलमें प्रतिष्ठित है। वह बल क्या |

ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३१

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ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३१


| इत्याह—प्राणो वै बलं तस्मिन् प्राणे बले प्रतिष्ठितं सत्यम् । तथा चोक्तम् "सूत्रे तदोतं च प्रोतं च" इति । यस्माद् बले सत्यं प्रतिष्ठितं तस्मादाहुः—बलं सत्यादोगीय ओजीय ओजस्तरमित्यर्थः । लोकेऽपि यस्मिन् हि यदाश्रितं भवति तस्मादाश्रितादाश्रयस्य बलवत्त्वं प्रसिद्धम्; न हि दुर्बलं बलवतः क्वचिदाश्रयभूतं दृष्टम् । | हे ? सो श्रुति बतलाती है—प्राण ही बल है । उस प्राणरूप बलमे सत्य प्रतिष्ठित है । ऐसा ही कहा भी है कि "उस सूत्रमें [सूत्रसंज्ञक प्राणमें] यह [ सत्यसंज्ञक भूतसमुदाय ] ओतप्रोत है।" क्योंकि बलमें सत्य प्रतिष्ठित है, इसलिये कहा है कि सत्यकी अपेक्षा बल ओगीय—ओजीय अर्थात् अधिक ओजस्वी है। लोकमें भी जो वस्तु जिसमें आश्रित होती है, उसकी अपेक्षा उस आश्रयका अधिक बलवान् होना प्रसिद्ध है। कहीं भी दुर्बल बलवान्‌का आश्रयभूत नहीं देखा गया । | | एवमुक्तन्यायेन उ एषा गायत्र्यध्यात्ममध्यात्म प्राण प्रतिष्ठा । सैषा गायत्री प्राणः, अतो गायत्र्यां जगत्प्रतिष्ठितम् । यस्मिन् प्राणे सर्वे देवा एकं भवन्ति, सर्वे वेदाः कर्माणि फलं च सैवं गायत्री प्राणरूपा सती जगत आत्मा । | इस प्रकार उक्त न्यायसे यह गायत्री अध्यात्म—शरीरस्थ प्राणमें प्रतिष्ठित है । वह यह गायत्री प्राण है, इसलिये गायत्रीमें जगत् प्रतिष्ठित है । जिस प्राणमें सम्पूर्ण देव एक हो जाते हैं तथा समस्त वेद, कर्म और फल भी जिसमें एक हो जाते हैं,वह गायत्री इस प्रकार प्राणरूपा होनेके कारण जगत्की आत्मा है । | | सा हैषा गयांस्तत्रे त्रातवती; के पुनर्गयाः ? प्राणा वागादयो वै गयाः; शब्दकरणात्; तांस्तत्रे सैषा गायत्री; तत्तत्र यद्यस्माद् | उस इस गायत्रीने गयोंका त्राण किया था। वे गय कौन हैं ? वागादि प्राण ही गय हैं, क्योंकि वे शब्द करते हैं। इस गायत्रीने उनका त्राण किया था । इस प्रकार चूँकि इसने |

१२३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

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१२३२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| गयांस्तत्रे तस्माद् गायत्री नाम ।<br><br>गयत्राणाद् गायत्रीति प्रथिता ।<br><br>स आचार्य उपनीय माणवकम्<br>अष्टवर्षं यामेवामूं गायत्रीं<br>सावित्रीं सवितृदेवताकामन्वाह<br>पच्छोऽर्धर्चशः समस्तां च; एषैव<br>सा साक्षात्प्राणो जगत आत्मा<br>माणवकाय समर्पितेहेदानीं<br>व्याख्याता नान्या । स आचार्यो<br>यस्मै माणवकायान्वाहानुवक्ति<br>तस्य माणवकस्य गयान् प्राणां-<br>स्त्रायते नरकादिपतनात् ॥ ४ ॥ | गयोंका त्राण किया था; इसलिये इसका नाम गायत्री है। गयोंका त्राण करनेके कारण यह 'गायत्री' इस प्रकार प्रसिद्ध हुई।<br><br>उस आचार्यने आठ वर्षके वटुका उपनयन कर उसे जिस सविता देवतासम्बन्धिनी सावित्री-का पहले पदशः फिर आधो-आधी ऋचा करके और फिर सम्पूर्णरूप-से उपदेश किया था वह साक्षात् प्राण जगत्की आत्मा यह गायत्री ही उस वटुको समर्पण की गयी थी, जिसकी कि इस समय व्याख्या की गयी है, कोई और नहीं। वह आचार्य जिस वटुको उसका उपदेश करता है, उस वटुके गय यानी प्राणोंकी वह गायत्री नरकादिमें गिरनेसे रक्षा करती है ॥ ४ ॥ |


अनुष्टुप् सावित्रीके उपदेशका निषेध और गायत्री-सावित्रीका महत्त्व

ताँ हँतामेके सावित्रीमनुष्टुभमन्वाहुर्वागनुष्टुबेतद्वाचमनुब्रूम इति न तथा कुर्याद् गायत्रीमेव सावित्रीमनुब्रूयाद् यदि ह वा अप्येवं विद् बह्विव प्रतिगृह्णाति न हैव तद् गायत्र्या एकंचन पदं प्रति ॥ ५ ॥

कोई शाखावाले उस इस अनुष्टुप् छन्दवाली सावित्रीका उपदेश करते हैं।

ब्राह्मण १४] शाङ्करभाष्यार्थ १२३३

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ब्राह्मण १४] शाङ्करभाष्यार्थ १२३३

[गायत्री छन्दवाली सावित्रीका उपदेश न करके अनुष्टुप्छन्दकी सावित्री-का उपदेश करते हैं।] वे कहते हैं कि वाक् अनुष्टुप् है, इसलिये हम वाक्का ही उपदेश करते हैं। किंतु ऐसा नहीं करना चाहिये। गायत्री छन्दवाली सावित्रीका ही उपदेश करे। ऐसा जाननेवाला जो अधिक प्रतिग्रह भी करे, तो भी वह गायत्रीके एक पदके बराबर भी नहीं हो सकता ॥ ५ ॥

| तामेतां सावित्रीं हैके शाखिनोऽनुष्टुभमनुष्टुप्प्रभवामनुष्टुप्छन्दस्कान्वाहुरुपनीताय । तदभिप्रायमाह—वागनुष्टुप् । वाक् च शरीरे सरस्वती, तामेव हि वाचं सरस्वतीं माणवकायानुब्रूम इत्येतद् वदन्तः । | कोई शाखावाले उपनीत वटुको अनुष्टुप्-अनुष्टुप्प्रभव अर्थात् अनुष्टुप् छन्दवाली उस इस सावित्रीका उपदेश करते हैं। श्रुति उनका अभिप्राय बतलाती है—वाक् अनुष्टुप् है। वाक् ही शरीरमें सरस्वती है, उस वाग्रूपा सरस्वतीका ही हम माणवक (वटु) को उपदेश करते हैं-ऐसा कहते हुए वे उसका उपदेश करते हैं। | | न तथा कुर्यान्न तथा विद्याद् यत्त आहुर्मृषैव तत् । किं तर्हि ? गायत्रीमेव सावित्रीमनुब्रूयात् । कस्मात् ? यस्मात् प्राणो गायत्रीत्युक्तम् । प्राण उक्त वाक् च सरस्वती चान्ये च प्राणाः सर्वं माणवकाय समर्पितं भवति । | किंतु ऐसा नहीं करना चाहिये, ऐसा नहीं समझना चाहिये; वे जो कहते हैं, वह मिथ्या ही है। तो फिर क्या करना चाहिये ? गायत्रीछन्दवाली सावित्रीका ही उपदेश करे। क्यों ? क्योंकि प्राण गायत्री है—ऐसा कहा जा चुका है। प्राणका उपदेश हो जानेपर वाक् सरस्वती और अन्य सब प्राण भी वटुको समर्पित हो जाते हैं। |


१. अनुष्टुप् छन्द चार पादोंका होता है और गायत्री छन्द तीन पादोंका। दोनोंके पाद आठ-आठ अक्षरके ही होते हैं। अनुष्टुप् छन्दमें जो मन्त्र उपलब्ध होता है, उसका भी देवता सविता ही है, इसलिये कुछ लोग उसे ही सावित्री कहते हैं। अनुष्टुप् छन्दवाला मन्त्र इस प्रकार है—
तत्सविर्तुर्वृणीमहे वयं देवस्य भोजनम् । श्रेष्ठं सर्वधातमं तुरं भगस्य धीमहि ॥ इति

बृ० उ० ७८—

१२३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

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१२३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

| किञ्चेदं प्रासङ्गिकमुक्त्वा गायत्रीविदं स्तौति—यदि ह वा अप्येवंविद् बह्विव—न वि तस्य सर्वात्मनो बहु नामास्ति किंचित् सर्वात्मकत्वाद् विदुषः—प्रतिगृह्णाति, न हैव तत् प्रतिग्रहजातं गायत्र्या एकंचनैकमपि पदं प्रति पर्याप्तम् ॥ ५ ॥ | गायत्रीछन्दवाली सावित्रीके विषयमें यह प्रासङ्गिक बात कहकर अब श्रुति गायत्र्युपासककी स्तुति करती है—यदि इस प्रकार जाननेवाला अधिक प्रतिग्रह भी करे—'अधिक' इसलिये कहा कि सर्वात्मक होनेके कारण उस विद्वान्‌के लिये वास्तवमें बहुत कुछ भी नहीं है; तो भी वह प्रतिग्रह-समुदाय गायत्रीके एक पादके लिये भी पर्याप्त नहीं है ॥ ५ ॥ |

गायत्रीके प्रत्येक पदके महत्त्वका दिग्दर्शन

स य इमांँस्त्रींल्लोकान् पूर्णान् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतत् प्रथमं पदमाप्नुयादथ यावतीयं त्रयीविद्या यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतद् द्वितीयं पदमाप्नुयादथ यावदिदं प्राणि यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतत्तृतीयं पदमाप्नुयादथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति नैव केनचनाप्यं कुत उ एतावत् प्रतिगृह्णीयात् ॥ ६ ॥

जो इन तीन पूर्ण लोकोंका प्रतिग्रह करता है, उसका वह (प्रतिग्रह) इस गायत्रीके इस प्रथम पादको व्याप्त करता है और जितनी यह त्रयी-विद्या है, उसका जो प्रतिग्रह करता है, वह (प्रतिग्रह) इसके इस द्वितीय पादको व्याप्त करता है और जितने ये प्राणी हैं, उनका जो प्रतिग्रह करता है, वह (प्रतिग्रह) इसके इस तृतीय पदको व्याप्त करता है और यही इसका तुरीय दर्शत परोरजा पद है, जो कि यह तपता है, यह किसीके द्वारा प्राप्य नहीं है; क्योंकि इतना प्रतिग्रह कोई कहाँसे कर सकता है ? ॥ ६ ॥

ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३५

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ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३५


स य इमांस्त्रीन् स यो गायत्रीविदिमान् भूरादींस्त्रीन् गोऽश्वादिधनपूर्णॉल्लोकान् प्रतिगृह्णीयात् स प्रतिग्रहोऽस्या गायत्र्या एतत् प्रथमं पदं यद् व्याख्यातमाप्नुयात् । प्रथमपदविज्ञानफलं तेन भुक्तं स्यान्न त्वधिकदोषोत्पादकः स प्रतिग्रहः ।'स य इमांस्त्रीन्' जो गायत्र्युपासक इन गो-अश्वादि धनसे पूर्ण भूर्लोकादि तीन लोकोंका प्रतिग्रह (दान) स्वीकार करता है, वह प्रतिग्रह इस गायत्रीके इस प्रथम पादको, जिसकी कि व्याख्या की गयी है, व्याप्त करता है। अर्थात् उसके द्वारा केवल प्रथम पादके विज्ञानका फल भोगा जाता है, वह प्रतिग्रह इससे अधिक दोष उत्पन्न करनेवाला नहीं है।
अथ पुनर्यावतीयं त्रयीविद्या, यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतद् द्वितीयं पदमाप्नुयात् । द्वितीयपदविज्ञानफलं तेन भुक्तं स्यात् । तथा यावदिदं प्राणि यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतत् तृतीयं पदमाप्नुयात् । तेन तृतीयपदविज्ञानफलं भुक्तं स्यात् ।और फिर जितनी भी यह त्रयीविद्या है, उतना जो प्रतिग्रह करता है, उसका वह प्रतिग्रह इसके इस द्वितीय पादको ही व्याप्त करता है। उसके द्वारा द्वितीय पादके विज्ञानका फल ही भोगा जाता है। तथा जितने ये प्राणी हैं, जो उतना प्रतिग्रह करता है, वह प्रतिग्रह इसके तृतीय पादको ही व्याप्त करता है। उसके द्वारा तृतीय पादके विज्ञानका फल ही भोगा जाता है।
कल्पयित्वेदमुच्यते। पादत्रयसममपि यदि कश्चित् प्रतिगृह्णीयात् तत् पादत्रयविज्ञानफलस्यैव क्षयकारणं न त्वन्यस्य दोषस्य कर्तृत्वे क्षमम् । न चैवं दातायह बात कल्पना करके कही गयी है अर्थात् यदि कोई गायत्रीके पादत्रयके समान भी प्रतिग्रह करे तो उसका वह प्रतिग्रह पादत्रयविज्ञानके फलमात्रका क्षय करनेका कारण हो सकता है, वह कोई और दोष करनेमें समर्थ नहीं है। ऐसे दाता ओर

१२३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

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१२३६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| प्रतिग्रहीता वा गायत्रीविज्ञानस्तुतये कल्प्यते, दाता प्रतिग्रहीता च यद्यप्येवं सम्भाव्यते नासौ प्रतिग्रहोऽपराधक्षमः, कस्मात् ? यतोऽभ्यधिकमपि पुरुषार्थविज्ञानमवशिष्टमेव चतुर्थपादविषयं गायत्र्यास्तद्दर्शयति—<br><br>अथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति ।<br><br>यच्चैतन्नैव केनचन केनचिदपि प्रतिग्रहेणाप्यं नैव प्राप्यमित्यर्थः, यथा पूर्वोक्तानि त्रीणि पदानि । एतान्यपि नैवाप्यानि केनचित् कल्पयित्वैवमुक्तं परमार्थतः कुत उ एतावत् प्रतिगृह्णीयात् त्रैलोक्यादिसमम् । तस्माद् गायत्र्येवंप्रकारोपास्येत्यर्थः ॥ ६ ॥ | प्रतिग्रहीताकी केवल गायत्र्युपासनाकी स्तुतिके लिये ही कल्पना की गयी हो—ऐसी बात नहीं है; यद्यपि ऐसा दाता और प्रतिग्रह करनेवाला सम्भव हो सकता है, किंतु यह प्रतिग्रह कोई अपराध (दोष) करनेमें समर्थ नहीं है, क्यों ? क्योंकि गायत्रीके चतुर्थ पादका विषयभूत इससे भी अधिक पुरुषार्थविज्ञान अभी अवशिष्ट है ही। उसे श्रुति दिखलाती है—<br><br>और यह जो तपता है यही इसका तुरीय अर्थात् चौथा दर्शत परोरजा पद है। और यह जो है, किसी भी प्रतिग्रहके द्वारा आप्य अर्थात् प्राप्तव्य नहीं है, जिस प्रकार कि पूर्वोक्त तीन पद हैं। वास्तवमें तो ये भी किसीसे आप्य नहीं हैं, कल्पना करके ही ऐसा कहा है। वास्तवमें त्रैलोक्यादिके समान इतना कोई कहाँसे प्रतिग्रह करेगा ? अतः तात्पर्य यही है कि इस प्रकारकी गायत्रीकी ही उपासना करनी चाहिये ॥ ६ ॥ |


गायत्रीका उपस्थान और उसका फल

तस्या उपस्थानं गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपद्सि न हि पद्यसे । नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापदिति यं द्विष्यादसावस्मै

ब्राह्मण १४] शाङ्करभाष्यार्थ १२३७

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ब्राह्मण १४] शाङ्करभाष्यार्थ १२३७


कामो मा समृद्धीति वा न हैवास्मै स कामः समृध्यते यस्मा एवमुपतिष्ठतेऽहमदः प्रापमिति वा ॥ ७ ॥

उस गायत्रीका उपस्थान—हे गायत्रि ! तू [त्रैलोक्यरूप प्रथम पादसे] एकपदी है, [ तीनों वेदरूप द्वितीय पादसे ] द्विपदी है, [ प्राण, अपान और व्यानरूप तीसरे पादसे ] त्रिपदी है और [ तुरीय पादसे ] चतुष्पदी है, [ इन सबसे परे निरुपाधिक स्वरूपसे तू ] अपद है; क्योंकि तू जानी नहीं जाती। अतः व्यवहारके अविषयभूत एवं समस्त लोकोंसे ऊपर विराजमान तेरे दर्शनीय तुरीय पदको नमस्कार है। यह पापरूपी शत्रु इस [ विघ्नाचरणरूप ] कार्यमें सफलता नहीं प्राप्त करे। इस प्रकार यह (विद्वान् ) जिससे द्वेष करता हो 'उसकी कामना पूर्ण न हो' ऐसा कहकर उपस्थान करे। जिसके लिये इस प्रकार उपस्थान किया जाता है, उसकी कामना पूर्ण नहीं होती। अथवा 'मैं इस वस्तुको प्राप्त करूँ' ऐसी कामनासे उपस्थान करे ॥ ७ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
तस्या उपस्थानं तस्या गायत्र्या उपस्थानमुपेत्य स्थानं नमस्कारणमनेन मन्त्रेण । कोऽसौ मन्त्रः ? इत्याह—हे गायत्र्यसि भवसि त्रैलोक्यपादेनैकपदी। त्रयीविद्यारूपेण द्वितीयेन द्विपदी। प्राणादिना तृतीयेन त्रिपद्यसि। चतुर्थेन तुरीयेण चतुष्पद्यसि। एवं चतुर्भिः पादैरूपासकैः पद्यसे ज्ञायसे ।<br><br>अतः परं परेण निरुपाधिकेन स्वेनात्मनापदसि । अविद्यमानं पदं यस्यास्तव येन पद्यसे साउस गायत्रीका इस मन्त्रसे उपस्थान—समीप जाकर स्थित होना अर्थात् नमस्कार होता है। वह मन्त्र कौन-सा है ? सो श्रुति बतलाती है—हे गायत्रि ! तू पूर्वोक्त रूपसे तीन लोकरूपी प्रथम पादद्वारा एकपदी है; त्रयीविद्यारूप द्वितीय पादसे द्विपदी है, प्राणादि तृतीय पादसे त्रिपदी है और चतुर्थ—तुरीय पादसे चतुष्पदी है। इस प्रकार चार पादोंसे तू उपासकोंद्वारा जानी जाती है।<br><br>इसके आगे अपने सर्वोत्तम निरुपाधिक स्वरूपसे तू अपद् है। जिस तेरा कोई पद, जिससे कि तेरा ज्ञान

१२३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

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१२३८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५
संस्कृतहिन्दी
त्वमपदसि, यस्मान्न हि पद्यसे<br><br>नेति नेत्यात्मत्वात् ? अतोऽव्यव-<br><br>हारविषयाय नमस्ते तुरीयाय<br><br>दर्शताय पदाय परोरजसे ।हो, नहीं है, वह तू अपद् है; क्यों-<br>कि नेति-नेति स्वरूप होनेके कारण<br>तेरा ज्ञान नहीं होता; अतः<br>व्यवहारके अविषयभूत तेरे तुरीय<br>दर्शत ( दर्शनीय ) परोरजा (समस्त<br>लोकोंसे ऊपर विराजमान ) पदको<br>नमस्कार है ।
असौ शत्रुः पाप्मा त्वत्प्राप्ति-<br>विघ्नकरोऽदस्तदात्मनः कार्यं<br>यत् त्वत्प्राप्तिविघ्नकर्तृत्वं मा<br>प्रापन्मैव प्राप्नोतु । इतिशब्दो<br>मन्त्रपरिसमाप्त्यर्थः ।वह शत्रु पाप तेरी प्राप्तिमें<br>विघ्न करनेवाला है। वह तेरी<br>प्राप्तिमें विघ्न करनेरूप कार्यमें<br>समर्थ न हो। यहाँ 'इति' शब्द<br>मन्त्रकी समाप्तिके लिये है।
यं द्विष्याद् यं प्रति द्वेषं कुर्यात्<br><br>स्वयं विद्वांस्तं प्रत्यनेनोपस्था-<br><br>नम् । असौ शत्रुरमुकनामेति<br><br>नाम गृह्णीयादस्मै यज्ञदत्तायाभि-<br><br>प्रेतः कामो मा समृद्धि समृद्धिं<br><br>मा प्राप्नोत्विति वोपतिष्ठते । न<br><br>हैवास्मै देवदत्ताय स कामः<br><br>समृध्यते । कस्मै ? यस्मा<br><br>एवमुपतिष्ठते । अहमदो देव-<br>दत्ताभिप्रेतं प्रापमिति वोप-<br>तिष्ठते । असावदो मा प्राप-यह उपासक जिसके प्रति द्वेष<br>करता हो, उसके लिये यह<br>उपस्थान है। यह अमुक नाम-<br>वाला शत्रु-इस प्रकार यहाँ नाम<br>ले, अर्थात् इस यज्ञदत्तको इसका<br>अभिप्रेत अर्थ समृद्ध न हो अर्थात्<br>सम्पन्नताको प्राप्त न हो-ऐसा<br>कहकर उपस्थान करता है। ऐसा<br>करनेसे इस देवदत्तकी अभीष्ट<br>कामना पूर्ण नहीं ही होती है।<br>किस देवदत्तके लिये ऐसी बात<br>है ? जिसके उद्देश्यसे इस प्रकार<br>उपस्थान करता है, उसके<br>लिये । अथवा इस देवदत्तके<br>अभीष्ट अर्थको मैं प्राप्त कर लूँ-<br>इस उद्देश्यसे उपस्थान करता है।<br>'असौ' 'अदः' 'मा प्रापत्' इन