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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

५२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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५२४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| तथा प्रयोगदर्शनात् । त्यस्य ह्येष रस इति पूर्ववद्विशेषतोऽग्रहणादमूर्तत्वसारत्वे एव हेत्वर्थः ॥ ५ ॥ | है। 'यह त्यत्‌का ही सार है' यह कथन पूर्ववत् विशेषरूपसे ग्रहण न होनेके कारण त्यत् (अमूर्त दोनों भूतों) का दक्षिण नेत्रस्थित पुरुषके अमूर्तत्व और सारत्वमें ही हेतुत्व प्रतिपादन करनेके लिये है ॥५॥ |


इन्द्रियात्मा पुरुषके स्वरूपका वर्णन

| ब्रह्मण उपाधिभूतयोर्मूर्तामूर्तयोः कार्यकारणविभागेन अध्यात्माधिदैवतयोर्विभागो व्याख्यातः सत्यशब्दवाच्ययोः। अथेदानीम्— | 'सत्य' शब्दके वाच्य एवं ब्रह्मके उपाधिभूत अध्यात्म और अधिदैवत मूर्तामूर्तके विभागका कार्यकारणभेदसे विभाग किया गया। अब — |

तस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपम् । यथा महारजनं वासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो यथाग्न्यर्चिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत्तँ सकृद्विद्युत्तेव ह वा अस्य श्रीर्भवति य एवं वेदाथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत्परमस्त्यथ नामधेयँ सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ ६ ॥

उस इस पुरुषका रूप [ऐसा] है जैसा हल्दीमें रँगा हुआ वस्त्र, जैसा सफेद ऊनी वस्त्र, जैसा इन्द्रगोप¹, जैसी अग्निकी ज्वाला, जैसा श्वेत कमल और जैसी बिजलीकी चमक होती है। जो ऐसा जानता है, उसकी श्री बिजलीकी चमकके समान [ सर्वत्र एक साथ फैलनेवाली ] होती है। अब इसके पश्चात् 'नेति नेति' यह ब्रह्मका आदेश है। 'नेति नेति' इससे बढ़कर कोई उत्कृष्ट आदेश नहीं है। 'सत्यका सत्य' यह उसका नाम है। प्राण ही सत्य हैं, उनका यह सत्य है ॥ ६ ॥


१. वर्षा ऋतुमें उत्पन्न होनेवाला एक लाल रंगका कीड़ा।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२५

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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२५


संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्)हिन्दी भाष्यार्थ
तस्य हैतस्य पुरुषस्य करुणात्मनो लिङ्गस्य रूपं वक्ष्यामो वासनामयं मूर्तामूर्तवासनाविज्ञानमयसंयोगजनितं विचित्रं पटभित्तिचित्रवन्मायेन्द्रजालमृगतृष्णिकोपमं सर्वव्यामोहास्पदम्—<br>एतावन्मात्रमेव आत्मेति विज्ञानवादिनो वैनाशिका यत्र भ्रान्ताः, एतदेव वासनारूपं पटरूपवदात्मनो द्रव्यस्य गुण इति नैयायिका वैशेषिकाश्च सम्प्रतिपन्नाः, इदमात्मार्थं त्रिगुणं स्वतन्त्रं प्रधानाश्रयं पुरुषार्थेन हेतुना प्रवर्तत इति साङ्ख्याः।उस इस इन्द्रियात्मा लिङ्गशरीररूप पुरुषके वासनामय, मूर्तामूर्त स्वरूपकी वासना और विज्ञानमयके संयोगसे उत्पन्न हुए वस्त्र या भित्तिपर लिखे हुए चित्रके समान विचित्र तथा माया-इन्द्रजाल एवं मृगतृष्णाके समान सब प्रकारके व्यामोहके आश्रयभूत रूपका वर्णन करते हैं, जिसमें कि विज्ञानवादी वैनाशिकोंको ऐसा भ्रम हो गया है कि बस इतना ही आत्मा है, नैयायिक और वैशेषिक ऐसा मानने लगे हैं कि यह वासनारूप ही पटके रूपके समान 'आत्मा' नामक द्रव्यका गुण है तथा सांख्यवादियोंका मत है कि यह तीन गुणवाला, स्वतन्त्र एवं प्रधानरूप आश्रयवाला [अन्तःकरण] पुरुषार्थके हेतुसे आत्माके लिये प्रवृत्त होता है।
(भर्तृप्रपञ्चमतोपन्यासः)<br>औपनिषद्ममन्या अपि केचित्प्रक्रियां रचयन्ति—<br>मूर्तामूर्तराशिरेकः, परमात्मराशिरुत्तमः ताभ्यामन्योऽयं मध्यमः किल तृतीयः कर्त्रा भोक्त्रा विज्ञानमयेन अजातशत्रुप्रतिबोधितेन सह विद्याकर्मपूर्वप्रज्ञासमुदायः, प्रयोक्ताकोई-कोई अपनेको उपनिषद्-सिद्धान्तावलम्बी माननेवाले भी ऐसी प्रक्रिया रचते हैं—एक तो मूर्तामूर्त-राशि है और दूसरी परमात्मसंज्ञक उत्तम राशि है! तथा अजातशत्रुद्वारा जगाये हुए कर्ता, भोक्ता विज्ञानमयके साथ जो विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञाका समुदाय है, वह पूर्वोक्त दोनोंसे भिन्न तीसरी मध्यम राशि है। [विद्या, पूर्वप्रज्ञा और] कर्मका

| ५२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |

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| ५२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ | | :--- | :--- |


| कर्मराशिः, प्रयोज्यः पूर्वोक्तो मूर्तामूर्तभूतराशिः साधनं चेति । तत्र च तार्किकैः सह सन्धिं कुर्वन्ति । लिङ्गाश्रयश्चैष कर्मराशिरित्युक्त्वा पुनस्ततस्त्रस्यन्तः साङ्ख्यत्वभयात्, सर्वः कर्मराशिः—पुष्पाश्रय इव गन्धः पुष्पवियोगेऽपि पुटतैलाश्रयो भवति तद्वत्—लिङ्गवियोगेऽपि परमात्मैकदेशमाश्रयति, स परमात्मैकदेशः किलान्यत आगतेन गुणेन कर्मणा सगुणो भवति निर्गुणोऽपि सन्, स कर्ता भोक्ता बध्यते मुच्यते च विज्ञानात्मा—इति वैशेषिकचित्तमप्यनुसरन्ति, स च कर्मराशिर्भूतराशेरागन्तुकः, स्वतो निर्गुण एव परमात्मैकदेशत्वात्; स्वत उत्थिता अविद्या अनागन्तुकाप्यूषरवदनात्मधर्मः—इत्यनया | समुदाय प्रयोजक है तथा पूर्वोक्त मूर्त्तामूर्त्तभूतराशि एवं ज्ञान-कर्मके साधन (कार्य-कारणसमूह) प्रयोज्य हैं। इस प्रकार तीन राशिकी कल्पना कर लेनेके पश्चात् वे तार्किकोंके साथ सन्धि कर लेते हैं। और यह कर्मराशि लिङ्गदेहके आश्रित है, ऐसा कहकर फिर उससे सांख्य-सिद्धान्त हो जानेके डरसे डरते हुए ऐसा कहने लगते हैं कि जिस प्रकार पुष्पके आश्रय रहनेवाला गन्ध पुष्पके न रहनेपर भी पुड़िया या तैलके आश्रित रहता है उसी प्रकार सम्पूर्ण कर्मराशि, लिङ्गदेहका वियोग होनेपर भो, परमात्माके एक देशको आश्रय करती है और परमात्माका वह एक देश अन्यसे प्राप्त हुए उस गुणरूप कर्मके द्वारा, निर्गुण होनेपर भी सगुण हो जाता है; तथा वह विज्ञानात्मा कर्ता भोक्ता ही बद्ध या मुक्त होता है—इस प्रकार वे वैशेषिकोंके चित्तका भी अनुसरण करते हैं। भूतराशिसे आनेवाली वह कर्मराशि स्वतः निर्गुण ही है; क्योंकि वह परमात्माका ही एक देश है। स्वयं उत्पन्न हुई अविद्या अनागन्तुका होनेपर भी [ पृथिवीके धर्म ] ऊसरके समान अनात्माका धर्म है। इस प्रकार इस |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५२७ |

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ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ५२७

| कल्पनया साङ्ख्यचित्तमनुवर्तन्ते । <br><br> सर्वमेतत्तार्किकैः सह सामञ्ज- <br><br> तन्निरसनम् स्वकल्पनया रमणीयं <br><br> पश्यन्ति, नोपनिषत्सिद्धान्तं <br><br> सर्वंन्यायविरोधं च पश्यन्ति; <br><br> कथम्? उक्ता एव तावत्सावयवत्वे परमात्मनःसंसारित्वसव्रणत्वकर्मफलदेशसंसरणानुपपत्त्यादया दोषाः; नित्यभेदे च विज्ञानात्मनः परेणैकत्वानुपपत्तिः । <br><br> लिङ्गमेवेति चेत्परमात्मन <br><br> उपचारितदेशत्वेन कल्पितं घट- <br><br> करकभूच्छिद्राकाशादिवत्, तथा <br><br> लिङ्गवियोगेऽपि परमात्मदेशा- <br><br> श्रयणं वासनायाः । अविद्यायाश्च <br><br> स्वत उत्थानम् ऊषरवत्-इत्यादि- | कल्पनासे वे सांख्यमतावलम्बियोंके चित्तका भी अनुसरण करते हैं। <br><br> तार्किकोंके साथ सामञ्जस्यकी कल्पना करके वे इस सारी व्यवस्थाको रमणीय मानते हैं, किंतु औपनिषदसिद्धान्तको तथा सब प्रकारकी युक्तियोंसे आनेवाले विरोधको नहीं देखते। सो किस प्रकार ? परमात्माका सावयवत्व स्वीकार करनेपर उसमें संसारित्व, सच्छिद्रत्व तथा कर्मफलभोगके स्थानमें उत्पन्न होनेकी अनुपपत्ति आदि दोष बतलाये ही गये हैं। और यदि उनमें भेद माना जाय तो विज्ञानात्माका परमात्माके साथ अभेद होना सम्भव नहीं है। <br><br> और यदि यह कहो कि घटाकाश, करकाकाश और भूच्छिद्राकाशादिके समान लिङ्गशरीर ही परमात्माके औपचारिक एक देशरूपसे कल्पित है [अर्थात् लिङ्गरूप उपाधिसे कल्पित जो परमात्माका अंश है, वही जीवात्मा है] तो ऐसी अवस्थामें लिङ्गदेहका वियोग होनेपर भी वासना परमात्माके एक देशको आश्रित कर लेगी<sup></sup> तथा 'ऊसर भूमिके समान अविद्याका स्वयं ही उदय हुआ है' |


१. स्वप्न आदि अवस्थाओंमें लिङ्गदेहका वियोग होनेपर जीवात्मामें वासना नहीं रह सकती; क्योंकि लिङ्गका अभाव हो जानेपर उसके अधीन रहनेवाले जीवका भी अभाव हो जाना सम्भव है। अतः लिङ्गका अभाव होनेपर जीवमें वासना रहती है—यह प्रक्रिया असंगत होगी; इसलिये यह मत ठीक नहीं है।

५२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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५२८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
कल्पनानुपपन्नैव । न च वास्यदेशव्यतिरेकेण वासनाया वस्त्वन्तरसञ्चरणं मनसापि कल्पयितुं शक्यम् ।इत्यादि कल्पना असंगत ही ठहरेगी। इसके सिवा अपने निवासयोग्य स्थानको छोड़कर किसी अन्य वस्तुमें वासनाके सञ्चरित होनेकी तो मनसे भी कल्पना नहीं की जा सकती ।
न च श्रुतयो गच्छन्ति "कामः संकल्पो विचिकित्सा" बृ० उ० १ । ५ । ३) "हृदये ह्येव रूपाणि" (३ । ९ । २०) "ध्यायतीव लेलायतीव" (४ । ३ । ७) "कामा येऽस्य हृदि श्रिताः" (४ । ४ । ७) "तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान्हृदयस्य" (४ । ३ । २२) इत्याद्याः । न चासां श्रुतीनां श्रुतादर्थान्तरकल्पना न्याय्या, आत्मनः परब्रह्मत्वोपपादनार्थपरत्वाद्रासाम्, एतावान्मात्रार्थोपपत्तयत्वाच्च सर्वोपनिषदाम् । तस्माच्छ्रुत्यर्थकल्पनाकुशलाः सर्व एवोपनिषदर्थमन्यथा कुर्वन्ति । तथापि वेदार्थश्चेत्स्यात्कामं भवतु, न मे द्वेषः ।तथा इस विषयमें "काम, संकल्प और संशय," "हृदयमें ही रूप प्रतिष्ठित हैं", "मानो ध्यान करता है, मानो वेगसे चल रहा है" "जो संकल्प इसके हृदयमें स्थित हैं", "उस समय वह हृदयके समस्त शोकोंसे पार हो जाता है" इत्यादि श्रुतियाँ भी सहमत नहीं हैं। इन श्रुतियोंका यथाश्रुत अर्थ छोड़कर किसी दूसरे अर्थकी कल्पना करनी उचित नहीं है; क्योंकि ये आत्माका परब्रह्मत्व प्रतिपादन करनेमें प्रवृत्त हैं तथा इसी अर्थमें समस्त उपनिषदोंका पर्यवसान होता है। अतः श्रुतिके अर्थकी कल्पना करनेमें कुशल ये सभी लोग उपनिषद्के अर्थको उलटा कर देते हैं। तो भी यदि वह वेदका तात्पर्य हो तो भले ही रहे, मेरा उससे कोई द्वेष नहीं है।
न च 'द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे' इति राशित्रयपक्षे समञ्जसम्;किंतु [भर्तृप्रपञ्चके] राशित्रयसिद्धान्तमें ब्रह्मके दो ही रूप हैं' ऐसा कहना उचित नहीं है; जब कि

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५२९ |

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ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ५२९
संस्कृत मूल (भाष्य)हिन्दी भाष्यार्थ
यदा तु मूर्तामूर्ते तज्जनितवासनाश्च मूर्तामूर्ते द्वे रूपे, ब्रह्म च रूपि तृतीयम्, न चान्यच्चतुर्थमन्तराले—तदा एतदनुकूलमवधारणम्, द्वे एव ब्रह्मणो रूपे इति; अन्यथा ब्रह्मैकदेशस्य विज्ञानात्मनो रूपे इति कल्प्यम्, परमात्मनो वा विज्ञानात्मद्वारेणेति। तदा च रूपे एवेति द्विवचनमसमञ्जसम्, रूपाणीति वासनाभिः सह बहुवचनं युक्ततरं स्यात्—द्वे च मूर्तामूर्ते वासनाश्च तृतीयमिति।मूर्तामूर्त और तज्जनित वासनाएँ ये मूर्त और अमूर्त दो रूप हों और उनसे रूपवान् ब्रह्म तीसरा रूप हो तथा इनके बीचमें कोई चौथा रूप न हो, उसी समय ऐसा निश्चय करना ठीक होगा कि ब्रह्मके दो ही रूप हैं; नहीं तो ऐसा मानना होगा कि ये ब्रह्मके एक देश विज्ञानात्माके ही रूप हैं अथवा विज्ञानात्माके द्वारा परमात्माके रूप हैं। उस समय भी 'रूपे' ऐसा द्विवचनान्त प्रयोग उचित नहीं होगा, अपितु वासनाओंके साथ त्रित्व होनेके कारण 'रूपाणि' ऐसा बहुवचनान्त प्रयोग अधिक उचित होगा; अर्थात् दो तो मूर्त और अमूर्त एवं तीसरा रूप वासनाएँ।
अथ मूर्तामूर्ते एव परमात्मनो रूपे, वासनास्तु विज्ञानात्मन इति चेत्—तदा विज्ञानात्मद्वारेण विक्रियमाणस्य परमात्मनः—इतीयं वाचोयुक्तिरनर्थिका स्यात्, वासनाया अपि विज्ञानात्मद्वारत्वस्य अविशिष्टत्वात्; न च वस्तु वस्त्वन्तरद्वारेण विक्रियत इति मुख्यया वृत्त्या शक्यं कल्पयितुम्;यदि कहो कि परमात्माके रूप तो मूर्त और अमूर्त दो ही हैं, वासनाएँ तो विज्ञानात्माकी है तो उस अवस्था में [मूर्तामूर्तके विषयमें] ऐसी वाचोयुक्ति प्रदर्शित करना कि ये विज्ञानात्माके द्वारा विकारको प्राप्त होते हुए परमात्माके रूप हैं, व्यर्थ ही होगा, क्योंकि विज्ञानात्माका द्वारत्व तो वासनाओंके लिये भी ऐसा ही है। इसके सिवा एक वस्तु किसी अन्य वस्तुके द्वारा विकारको प्राप्त होती है—ऐसी मुख्यवृत्तिसे कल्पना

बृ० उ० ३४—

५३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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५३०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| न च विज्ञानात्मा परमात्मनो वस्त्वन्तरम् तथा कल्पनायां सिद्धान्तहानात् । तस्माद् वेदार्थमूढानां स्वचित्तप्रभावा एवमादिकल्पना अक्षरबाह्याः; न ह्यक्षरबाह्यो वेदार्थो वेदार्थोपकारी वा, निरपेक्षत्वाद् वेदस्य प्रामाण्यं प्रति; तस्माद्राशित्रयकल्पना असमञ्जसा । | भी नहीं की जा सकती। और विज्ञानात्मा परमात्मासे कोई भिन्न वस्तु भी नहीं है, क्योंकि ऐसी कल्पना करनेमें तो अद्वैतसिद्धान्तकी ही हानि होती है। अतः वेदार्थसे अनभिज्ञ उन पुरुषोंकी ऐसी मनमानी कल्पना वेदाक्षरोंसे बाह्य है और अक्षरोंको छोड़कर किया हुआ अर्थ वास्तविक वेदार्थ अथवा वेदार्थमें उपयोगी नहीं हो सकता; क्योंकि अपने प्रामाण्यमें वेद किसीकी अपेक्षा नहीं रखता; अतः राशित्रयकी कल्पना ठीक नहीं है। | | ‘योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः’ प्रकृतपरामर्शः इति लिङ्गात्मा प्रस्तुतोऽध्यात्मे, अधिदैवे च ‘य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः’ इति, ‘तस्य’ इति प्रकृतोपादानात्स एवोपादीयते योऽसौ त्यस्यामूर्तस्य रसो न तु विज्ञानमयः । | ‘यह जो दक्षिण नेत्रान्तर्गत पुरुष है’ इस वाक्यद्वारा अध्यात्म-प्रकरणमें लिङ्गात्माका वर्णन आरम्भ किया गया है तथा अधिदैव-प्रकरणमें ‘यह जो इस आदित्यमण्डलमें पुरुष है’ इस प्रकार ‘तस्य’ इस पदसे प्रकृत [ लिङ्गात्मा ] का ग्रहण किये जानेके कारण वही ग्रहण किया गया है जो कि यह अमूर्त त्यत्का रस है, विज्ञानमयका ग्रहण नहीं किया गया। | | ननु विज्ञानमयस्यैवैतानि रूपाणि कस्मान्न भवन्ति ? विज्ञानमयस्यापि प्रकृतत्वात्, ‘तस्य’ इति च प्रकृतोपादानात् । | पूर्व०-यहाँ विज्ञानमयका भी प्रकरण है, इसलिये ये विज्ञानमयके ही रूप क्यों नहीं हैं ? क्योंकि ‘तस्य’ इस पदसे तो प्रकृतका ही ग्रहण किया गया है। |

ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५३१

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ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ५३१

| नैवम्, विज्ञानमयस्यारूपित्वेन विजिज्ञापयिषितत्वात्; यदि हि तस्यैव विज्ञानमयस्यैतानि माहारजनादीनि रूपाणि स्युस्तस्तस्यैव 'नेति नेति' इत्यनाख्येयरूपतयादेशो न स्यात्। | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि विज्ञानमयको अरूपवान्-रूपसे बतलाना अभीष्ट है। यदि ये माहारजनादिरूप उस विज्ञानमयके ही हों तो उसीका 'नेति-नेति' इस प्रकार अनिर्वचनीयरूपसे आदेश नहीं किया जा सकता। | | नन्वन्यस्यैवासावादेशो न तु विज्ञानमयस्येति ? | पूर्व०-किंतु यह आदेश तो किसी औरका ही है, विज्ञानमयका नहीं है? | | न, षष्ठान्ते उपसंहारात्—"विज्ञातारमरे केन विजानीयात्" इति विज्ञानमयं प्रस्तुत्य "स एष नेति नेति" (४।५।१५) इति; "विज्ञापयिष्यामि" इति च प्रतिज्ञाता अर्थवत्त्वात्। यदि च विज्ञानमयस्यैव असंव्यवहार्यमात्मस्वरूपं ज्ञापयितुमिष्टं स्यात्प्रध्वस्तसर्वोपाधिविशेषम्, तत इयं प्रतिज्ञार्थवती स्यात्—येनासौ ज्ञापितो जानात्यात्मानमेवाहं ब्रह्मास्मीति, शास्त्रनिष्ठां प्राप्नोति न बिभेति कुतश्चन। | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि, "अरे मैत्रेयि! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने" इस प्रकार [विज्ञानमयरूप-से] आरम्भ करके छठे अध्यायके अन्तमें "वह यह आत्मा ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है" इस प्रकार उपसंहार किया है तथा ऐसा माननेपर ही "विशेषरूपसे ज्ञान कराऊँगा" यह प्रतिज्ञा भी सार्थक हो सकती है। यहाँ यदि विज्ञानमयके ही सर्वोपाधिविनिर्मुक्त व्यवहारातीत आत्मस्वरूपका ज्ञान कराना अभीष्ट होगा तभी यह प्रतिज्ञा सार्थक हो सकेगी, जिसका ज्ञान कराये जाने-पर यह अपनेहीको 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा जानता और शास्त्रनिष्ठाको प्राप्त करता है तथा किसीसे भी भयको प्राप्त नहीं होता। |


१. अर्थात् उपनिषद्के चौथे अध्यायमें।

५३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

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५३२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
अथ पुनरन्यो विज्ञानमयः, अन्यः 'नेति नेति' इति व्यपदिश्यते—तदान्यददो ब्रह्मान्योऽहमस्मीति विपर्ययो गृहीतः स्यात् न आत्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि' (१।४।९) इति। तस्मात् 'तस्य हैतस्य' इति लिङ्गपुरुषस्यैवैतानि रूपाणि।और यदि विज्ञानमय कोई अन्य हो तथा 'नेति नेति' इस वाक्यसे किसी अन्यका निर्देश किया गया हो तो उस अवस्थामें 'यह ब्रह्म अन्य है तथा मैं अन्य हूँ' ऐसा विपरीत ग्रहण किया जायगा; 'अपनेको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा ग्रहण नहीं होगा। अतः 'तस्य हैतस्य' इत्यादि मन्त्रसे बतलाये हुए ये रूप लिङ्गपुरुषके ही हैं।
(लिङ्गात्मस्वरूप-निरूपणम्)<br> सत्यस्य च सत्ये परमात्म-स्वरूपे वक्तव्ये निरवशेषं सत्यं वक्तव्यम्; सत्यस्य च विशेषरूपाणि वासनाः; तासामिमानि रूपाण्युच्यन्ते, एतस्य पुरुषस्य प्रकृतस्य लिङ्गात्मन एतानि रूपाणि; कानि तानि ? इत्युच्यन्ते—सत्यके सत्य परमात्माका स्वरूप बतलाना है, अतः यहाँ सम्पूर्ण सत्य बतलाना आवश्यक है। सत्यके ही विशेषरूप वासनाएँ हैं, उनके ये रूप बतलाये जाते हैं, ये इस प्रकृत लिङ्गात्मा पुरुषके रूप हैं; वे रूप कौन-से हैं ? सो बतलाये जाते हैं—
यथा लोके, महारजनं हरिद्रा तया रक्तं माहारजनं यथा वासो लोके, एवं स्त्र्यादिविषयसंयोगे तादृशं वासनारूपं रञ्जनाकारमुत्पद्यते चित्तस्य, येनासौ पुरुषो रक्त इत्युच्यते वस्त्रादिवत्।लोकमें जिस प्रकार माहारजन वस्त्र-महारजन हल्दीको कहते हैं, उससे रँगा हुआ जो वस्त्र होता है, वही माहारजन है, उसी प्रकार स्त्री आदि विषयका संयोग होनेपर चित्तका वैसा ही रञ्जनाकार वासनामय रूप उत्पन्न हो जाता है, जिसके कारण यह पुरुष वस्त्रादिके समान रक्त (रँगा हुआ या अनुरक्त) कहा जाता है।

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थं ५३३

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ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थं ५३३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यथा च लोके पाण्ड्वाविकम्, अवेरिदम् आविकम् ऊर्णादि, यथा च तत्पाण्डुरं भवति, तथान्यद्वासनारूपम् । यथा च लोके इन्द्रगोपोऽत्यन्तरक्तो भवति एवमस्य वासनारूपम्। क्वचिद्विषयविशेषापेक्षया रागस्य तारतम्यम्, क्वचित्पुरुषचित्तवृत्त्यपेक्षया।तथा लोकमें जिस प्रकार पाण्डु आविक (सफेद ऊन) होता है, अवि (भेड़) के विकार ऊन आदिको आविक कहते हैं, जिस प्रकार वह पाण्डुर (श्वेतवर्ण) होता है, उसी प्रकार दूसरी वासनाका रूप है। इसी प्रकार लोकमें जैसे इन्द्रगोप कीड़ा अत्यन्त लाल रंगका होता है, वैसा ही इस पुरुषकी वासनाका भी रूप होता है। यहाँ कहीं तो विषयविशेषकी अपेक्षासे रागका तारतम्य है और कहीं पुरुषकी चित्तवृत्तिकी अपेक्षासे है।
यथा च लोकेऽग्न्यर्चिर्भास्वरं भवति, तथा क्वचित्कस्यचिद्वासनारूपं भवति। यथा पुण्डरीकं शुक्लम्, तद्वदपि च वासनारूपं कस्यचिद्भवति। यथा सकृद्विद्युत्तम्, यथा लोके सकृद्विद्योतनं सर्वतः प्रकाशकं भवति, तथा ज्ञानप्रकाशविवृद्ध्यपेक्षया कस्यचिद्वासनारूपमुपजायते। नैषां वासनारूपाणामादिरन्तो मध्यं सङ्ख्या वा, देशः कालो निमित्तं वावधार्यते—असङ्ख्येयत्वाद्वास-तथा लोकमें जिस प्रकार अग्निकी ज्वाला दीप्तिमती होती है, वैसे ही कहीं-कहीं किसीकी वासनाओंका रूप भी होता है। और जिस तरह पुण्डरीक (श्वेत कमल) सफेद रंगका होता है, उस प्रकार भी किसीकी वासनाओंका रूप होता है। जिस प्रकार सकृद्विद्युत्—लोकमें बिजलीका एक बार चमकना सब ओर प्रकाश करनेवाला होता है, वैसे ही ज्ञानरूप प्रकाशकी वृद्धिकी अपेक्षासे किसीकी वासनाका रूप हो जाता है। वासनाके इन रूपोंके आदि, अन्त, मध्य, संख्या अथवा देश, काल या निमित्तका कोई निश्चय नहीं किया जा सकता, क्योंकि वासनाएँ अगणित हैं और

५३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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५३४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| नायाः, वासनाहेतूनां चानन्त्यात् तथा च वक्ष्यति षष्ठे—"इदंमयोऽदोमयः" (४।४।५) इत्यादि।<br><br>तस्मान्न स्वरूपसङ्ख्यावधारणार्था दृष्टान्ताः—'यथा माहारजनं वासः' इत्यादयः, किं तर्हि ? प्रकारप्रदर्शनार्थाः—एवम्प्रकाराणि हि वासनारूपाणीति। यत्तु वासनारूपमभिहितमन्ते—सकृद्विद्योतनमिवेति, तत्किल हिरण्यगर्भस्य अव्याकृतात्प्रादुर्भवतः तडिद्वत्सकृदेव व्यक्तिर्भवतीति; तत्तदीयं वासनारूपं हिरण्यगर्भस्य यो वेद तस्य सकृद्विद्युत्तेव, ह वै इत्यवधारणार्थौ, एवमेवास्य श्रीः ख्यातिर्भवतीत्यर्थः; यथा हिरण्यगर्भस्य—एवमेतद्यथोक्तं वासनारूपमन्त्यं यो वेद। | वासनाओंके हेतुओंका भी कोई अन्त नहीं है; जैसा कि छठे (उपनिषद्के चौथे) अध्यायमें "इदंमयः अदोमयः" आदि श्रुति बतलावेगी।<br><br>अतः 'जिस प्रकार माहारजन वस्त्र होता है' इत्यादि दृष्टान्त स्वरूप-संख्याका निश्चय करनेके लिये नहीं हैं; तो फिर किसलिये हैं? रूपोंका प्रकार प्रदर्शित करनेके लिये हैं अर्थात् वासनाके रूप इस-इस प्रकारके हैं—यह दिखानेके लिये हैं। अन्तमें जो 'एक बार बिजलीके चमकनेके समान' वासनाका रूप दिखाया गया है, वह यह दिखानेके लिये है कि अव्याकृतसे प्रादुर्भूत होते हुए हिरण्यगर्भकी बिजलीके समान एक बार ही अभिव्यक्ति होती है। अतः जो उस हिरण्यगर्भकी वासनाके रूपको जानता है, उसकी सकृद्विद्युत्ता-सी होती है। यहाँ 'ह' और 'वै'—ये दोनों निपात निश्चयार्थक हैं। तात्पर्य यह है कि इस प्रकार जो वासनाके इस अन्तिम रूपको जानता है, उसकी इसी प्रकार श्री यानी ख्याति होती है, जैसी कि हिरण्यगर्भकी। |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५३५ |

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| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५३५ | | :--- | :--- |

[संस्कृत-भाष्यम्][भाष्यार्थ]
एवं निरवशेषं सत्यस्य स्व- <br> <sub>परमात्मस्वरूप-</sub> रूपमभिधाय, यत्त- <br> <sub>निर्देशः</sub> त्सत्यस्य सत्यम- <br> वोचाम तस्यैव स्वरूपावधारणार्थं <br> <sub>ब्रह्मण</sub> इदमारभ्यते—अथा- <br> नन्तरं सत्यस्वरूपनिर्देशानन्तरम्, <br> यत्सत्यस्य सत्यं तदेवावशिष्यते <br> यस्मादतस्तस्मात्सत्यस्य सत्यं <br> स्वरूपं निर्देक्ष्यामः । आदेशो <br> निर्देशो ब्रह्मणः । कः पुनरसौ <br> निर्देशः ? इत्युच्यते--नेति नेती- <br> त्येवं निर्देशः । <br><br> ननु कथमाभ्यां 'नेति नेति' <br> इति शब्दाभ्यां सत्यस्य सत्यं <br> निर्दिदिक्षितम् इत्युच्यते— <br> सर्वोपाधिविशेषापोहेन । यस्मिन्न <br> कश्चिद्विशेषोऽस्ति—नाम वा रूपं <br> वा कर्म वा भेदो वा जातिर्वा <br> गुणो वा; तद्वारेण हि शब्द- <br> प्रवृत्तिर्भवति । न चैषां कश्चिद् <br> विशेषो ब्रह्मण्यस्ति; अतो न <br> निर्देष्टुं शक्यते—इदं तदिति <br> गौरसौ स्पन्दते शुक्लो विषाणीतिइस प्रकार सत्यके अशेष स्वरूपका निरूपण कर, जिसे हमने सत्यका सत्य कहा है, उसी ब्रह्मके स्वरूपका निश्चय करनेके लिये यह आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है-अथ-अनन्तर अर्थात् सत्यके स्वरूपका निरूपण करनेके पश्चात्, क्योंकि जो सत्यका सत्य है वही बच रहता है, अतः-इसलिये हम सत्यके सत्य स्वरूपका निर्देश करेंगे । आदेश अर्थात् ब्रह्मका निर्देश । किंतु वह 'निर्देश' क्या है? सो बताया जाता है—'नेति नेति' इस प्रकार किया हुआ निर्देश । <br><br> किंतु 'नेति नेति' इन दो शब्दोंद्वारा सत्यके सत्यका निरूपण किस प्रकार अभीष्ट है, सो बतलाया जाता है—समस्त उपाधिरूप विशेषके निषेधद्वारा [ उसका निरूपण किया गया है ] जिसमें कि नाम, रूप, कर्म, भेद, जाति अथवा गुणरूप कोई भी विशेषता नहीं है; क्योंकि शब्दकी प्रवृत्ति तो इन्हींके द्वारा होती है । किंतु ब्रह्ममें इनमेंसे कोई भी विशेषता नहीं है, इसलिये 'यह अमुक है' इस प्रकार उसका निर्देश नहीं किया जा सकता । जिस प्रकार लोकमें 'यह बैल चेष्टा करता है, श्वेत है, सींगोंवाला है' ऐसा कहकर

५३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

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५३६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| यथा लोके निर्दिश्यते, तथा; अध्यारोपितनामरूपकर्मद्वारेण ब्रह्म निर्दिश्यते 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (३।९।२७-७) 'विज्ञानघन एव ब्रह्मात्मा' इत्येवमादिशब्दैः। | बैलका निर्देश किया जाता है, उसी प्रकार उसका निर्देश नहीं किया जा सकता। आरोपित नाम, रूप और कर्मके द्वारा 'ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है', 'विज्ञानघन ही ब्रह्मात्मा है' इत्यादि शब्दोंसे ब्रह्मका निरूपण किया जाता है। | | यदा पुनः स्वरूपमेव निर्दिदिक्षितं भवति; निरस्तसर्वोपाधिविशेषम्, तदा न शक्यते केनचिदपि प्रकारेण निर्देष्टुम्; तदा अयमेवाभ्युपायः-यदुत प्राप्तनिर्देशप्रतिषेधद्वारेण 'नेति नेति' इति निर्देशः। | किंतु जिस समय सम्पूर्ण उपाधिरूप विशेषसे रहित स्वरूपका ही निर्देश करना अभीष्ट होता है, तब तो उसका किसी भी प्रकारसे निर्देश नहीं किया जा सकता; तब तो यही एक उपाय रह जाता है कि प्राप्त निर्देशके प्रतिषेधद्वारा ही 'यह नहीं है, यह नहीं है' इस प्रकार उसका निरूपण किया जाय। | | इदं च नकारद्वयं वीप्साव्याप्यर्थम्; यद्यत्प्राप्तं तत्तन्निषिध्यते। तथा च सति अनिर्दिष्टशङ्का ब्रह्मणः परिहृता भवति; अन्यथा हि नकारद्वयेन प्रकृतद्वयप्रतिषेधे, यदन्यत्प्रकृतात्तत्प्रति- | यहाँ 'नेति नेति' इन पदोंमें जो दो नकार हैं वे वीप्सा(द्विरुक्ति) द्वारा [ समस्त विषयोंको ] व्याप्त करनेके लिये हैं। अर्थात् जो कुछ भी विषयरूपसे प्राप्त होता है, इनके द्वारा उसका निषेध कर दिया जाता है। इससे ऐसी आशङ्काका भी परिहार हो जाता है कि [समस्त वस्तुओंका निषेध करनेके कारण इनके द्वारा ] ब्रह्मका भी निर्देश नहीं हुआ। अन्यथा इन दो नकारोंके द्वारा जिन दो प्रकृत वस्तुओंका निषेध किया गया है, उन प्रकृत प्रतिषिद्ध दो पदार्थोंसे भिन्न जो |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ५३७

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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ५३७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
षिद्धद्वयाद्ब्रह्म तन्न निर्दिष्टम्, कीदृशं नु खलु—इत्याशङ्का न निवर्त्तिष्यते; तथा चानर्थकश्च स निर्देशः, पुरुषस्य विविदिषाया अविवर्त्तकत्वात्; 'ब्रह्म ज्ञापयिष्यामि' इति च वाक्यम् अपरिसमाप्तार्थं स्यात् ।ब्रह्म है, उसका निर्देश नहीं हुआ; 'वह कैसा है' इस आशङ्काकी निवृत्ति नहीं होगी; ऐसी स्थितिमें पुरुषकी जिज्ञासाका निवर्त्तक न होनेके कारण वह निर्देश भी निरर्थक होगा; और 'मैं तुझे ब्रह्मका ज्ञान कराऊँगा' इस वाक्यका प्रयोजन भी अपूर्ण रह जायगा।
यदा तु सर्वदिक्कालादिविविदिषा निवर्तिता स्यात् सर्वोपाधिनिराकरणद्वारेण तदा सैन्धवघनवदेकरसं प्रज्ञानघनमनन्तरमबाह्यं सत्यस्य सत्यमहं ब्रह्मास्मीति सर्वतो निवर्त्तते विविदिषा, आत्मन्येवावस्थिता प्रज्ञा भवति । तस्माद्वीप्सार्थं नेति नेतीति नकारद्वयम् ।किंतु जिस समय सम्पूर्ण दिशा और कालादिसम्बन्धिनी जिज्ञासा निवृत्त हो जाती है, उस समय समस्त उपाधियोंके निराकरणद्वारा 'मैं लवणखण्डके समान एक रस, प्रज्ञानघन, अन्तरबाह्यशून्य और सत्यका सत्यरूप ब्रह्म हूँ' ऐसा बोध होता है। अतः सब प्रकारसे जिज्ञासाकी निवृत्ति हो जाती है और आत्मामें ही बुद्धि निश्चल हो जाती है; इसलिये 'नेति नेति' ये दो नकार वीप्साके लिये ही हैं।
ननु महता यत्नेन परिकरबन्धं कृत्वा किं युक्तमेवं निर्देष्टुं ब्रह्म ?पूर्व०-तो क्या बड़े प्रयत्नसे कमर कसकर ब्रह्मका इस प्रकार निरूपण करना उचित है ?
बाढम्;सिद्धान्ती-हाँ।
कस्मात् ?पूर्व०-कैसे ?
न हि–यस्मात्, 'इति न, इतिसिद्धान्ती-'न हि'—क्योंकि 'न' पदसे अर्थात् 'इति न, इति न' इस

५३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २

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५३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २


SanskritHindi
न' इत्येतस्मात्--इतीति व्याप्तव्यप्रकारा नकारद्वयविषया निर्दिश्यन्ते, यथा ग्रामो ग्रामो रमणीय इति, अन्यत्परं निर्देशनं नास्ति; तस्मादयमेव निर्देशो ब्रह्मणः ।<br><br>यदुक्तम्--'तस्योपनिषत्सत्यस्य सत्यम्' इति एवंप्रकारेण सत्यस्य सत्यं तत्परं ब्रह्म; अतो युक्तमुक्तं नामधेयं ब्रह्मणः नामैव नामधेयम्; किं तत् ? सत्यस्य सत्यं प्राणा वै सत्यं तेषामेव सत्यमिति ॥ ६ ॥आदेशके 'इति' शब्दसे व्याप्तव्य नकारद्वयसे सम्बन्ध रखनेवाले समस्त विषयोंके प्रकारोंका निर्देश किया गया है, जिस प्रकार कि 'गाँव-गाँव सुन्दर है' इस वीप्साद्वारा सभी गाँव अभिप्रेत हैं, इससे उत्कृष्ट कोई और निर्देश नहीं है, इसलिये यही ब्रह्मका निर्देश है ।<br><br>और ऐसा जो कहा कि 'सत्यका सत्य' यह उसकी उपनिषद् है, सो इस प्रकारसे वह परब्रह्म सत्यका सत्य है । अतः यह ब्रह्मका उचित ही नामधेय बतलाया गया है । नामहीको नामधेय कहा जाता है । वह क्या है ?—सत्यका सत्य है—प्राण ही सत्य है और यह उनका भी सत्य है ॥ ६ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये तृतीयं मूर्तामूर्तब्राह्मणम् ॥ ३ ॥


चतुर्थ ब्राह्मण

याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद

SanskritHindi
उपक्रमः आत्मैत्येवोपासीत; तदेव तस्मिन्सर्वस्मिन्पदनीयमात्मतत्त्वम्, यस्मात्प्रेयः पुत्रादेः—इत्युपन्यस्तस्य'आत्मा है' इस प्रकार ही उपासना करे; वह आत्मतत्त्व ही इन सबमें प्राप्तव्य है; क्योंकि वह पुत्रादिसे भी बढ़कर प्रिय है, इस प्रकार जिसका उपन्यास किया गया है, उस

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३९

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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३९


संस्कृत मूल (शाङ्करभाष्यम्)हिन्दी अनुवाद
वाक्यस्य व्याख्यानविषये सम्बन्धप्रयोजने अभिहिते—'तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत्सर्वमभवत्' (१ । ४ । १०) इति; एवं प्रत्यगात्मा ब्रह्मविद्याया विषय इत्येतदुपन्यस्तम् ।वाक्यके व्याख्यानविषयक सम्बन्ध और प्रयोजनका 'उसने आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ, इसलिये वह सर्वरूप हो गया' इस वाक्यमें वर्णन किया है। इस प्रकार यह बात दिखायी गयी है कि प्रत्यगात्मा ब्रह्मविद्याका विषय है।
अविद्यायाश्च विषय:--'अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद' (१ । ४ । १०) इत्यारभ्य चातुर्वर्ण्यप्रविभागादिनिमित्तपाङ्क्तकर्मसाध्यसाधनलक्षणो बीजाङ्कुरवद्व्याकृताव्याकृतस्वभावो नामरूपकर्मात्मक: संसार: 'त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म' (१ । ६ । १) इत्युपसंहृतः । शास्त्रीय उत्कर्षलक्षणो ब्रह्मलोकान्तोऽधोभावश्च स्थावरान्तोऽशास्त्रीय: पूर्वमेव प्रदर्शित:--'द्वया ह' (१ । ३ । १) इत्यादिना । एतस्मादविद्याविषयाद्विरक्तस्य प्रत्यगात्मविषयब्रह्मविद्यायामधिकार: कथं नाम स्यादिति—तृतीयेऽध्याये उपसंहृतः समस्तोऽविद्याविषयः ।इसी प्रकार जो चातुर्वर्ण्यादि विभागके निमित्तभूत पाङ्क्तकर्मरूप साध्यसाधनवाला और बीजाङ्कुरके समान व्यक्ताव्यक्तरूप है, उस अविद्याके विषयभूत नाम रूप-कर्ममय संसारका 'यह अन्य है और मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है वह नहीं जानता' यहाँसे आरम्भ करके 'यह नाम, रूप और कर्म त्रयरूप हे' इस प्रकार उपसंहार किया है। इसके सिवा ब्रह्मलोकपर्यन्त उत्कर्षरूप शास्त्रीय भाव और स्थावरपर्यन्त अशास्त्रीय अधोभावका भी 'देव और असुर ये दो प्राजापत्य थे' इस वाक्यद्वारा पहले ही प्रदर्शन कराया गया है। इस अविद्याके विषयसे विरक्त हुए पुरुषका किसी प्रकार प्रत्यगात्मविषयक ब्रह्मविद्यामें अधिकार हो जाय—इसलिये तृतीय [अर्थात् उपनिषद्के पहले] अध्यायमें ही अविद्यासम्बन्धी समस्त विषयका उपसंहार कर दिया गया है।

५४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

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५४०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २
संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्)हिन्दी-अनुवाद
चतुर्थे तु ब्रह्मविद्याविषयं प्रत्यगात्मानम् ‘ब्रह्म ते ब्रवाणि’ (२। १। १) इति ‘ब्रह्म ज्ञापयिष्यामि’ (२। १। १५) इति च प्रस्तुत्य, तद्ब्रह्मैकमद्वयं सर्वविशेषशून्यं क्रियाकारकफलस्वभावसत्यशब्दवाच्याशेषभूतधर्मप्रतिषेधद्वारेण ‘नेति नेति’ इति ज्ञापितम्।चतुर्थ अध्यायमें तो ‘मैं तेरे प्रति ब्रह्मका उपदेश करूँगा’ तथा ‘मैं तुझे ब्रह्मज्ञान कराऊँगा’ इस प्रकार ब्रह्मविद्याके विषयभूत प्रत्यगात्माका आरम्भ कर क्रिया, कारक, फल, स्वभाव और सत्य इन शब्दोंके वाच्य समस्त जीवधर्मोके प्रतिषेधद्वारा ‘नेति-नेति’ इस वाक्यसे उस अशेषविशेषशून्य एक अद्वय-ब्रह्मका ज्ञान कराया गया है।
अस्य ब्रह्मविद्याया अङ्गत्वेन <br> (संन्यासस्य ब्रह्मविद्याङ्गत्वम्) <br> संन्यासो विधित्सितः, जायापुत्रवित्तादिलक्षणं पाङ्क्तं कर्माविद्याविषयं यस्मान्नात्मप्राप्तिसाधनम्; अन्यसाधनं ह्यन्यस्मै फलसाधनाय प्रयुज्यमानं प्रतिकूलं भवति। न हि बुभुक्षापिपासानिवृत्त्यर्थं धावनं गमनं वा साधनम्; मनुष्यलोकपितृलोकदेवलोकसाधनत्वेन हि पुत्रादिसाधनानि श्रुतानि, नात्मप्राप्तिसाधनत्वेन।अब इस ब्रह्मविद्याके अङ्गरूपसे संन्यासका विधान करना है; क्योंकि स्त्री, पुत्र एवं धनादिरूप पाङ्क्तकर्म अविद्याका विषय है, वह आत्मप्राप्तिका साधन नहीं है। किसी अन्य फलकी प्राप्तिके लिये अन्य साधनका प्रयोग करना प्रतिकूल ही होता है। भूख या प्यासकी निवृत्तिके लिये दौड़ना या चलना साधन नहीं हो सकता। पुत्रादि साधन तो मनुष्यलोक, पितृलोक अथवा देवलोककी प्राप्तिके ही साधनरूपसे सुने गये हैं, आत्मप्राप्तिके साधनरूपसे नहीं सुने गये।
विशेषितत्वाच्च; न च ब्रह्मविदो विहितानि, काम्यत्वश्रवणात्—‘एतावान्वै कामः’ इति।[ ‘काम’ शब्दसे ] विशेषित होनेके कारण भी ये ब्रह्मविद्याके साधन नहीं हैं; ‘इतना ही काम है’ इस प्रकार कर्मोंका काम्यत्व सुना

| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५४१ |

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ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ५४१
संस्कृत मूल / भाष्यभाष्यार्थ
ब्रह्मविद्वाप्ताकामत्वादाप्तकामस्य कामानुपपत्तेः । "येषां नोऽय-मात्मायं लोकः" (४।४।२२) इति च श्रुतेः ।जानेके कारण विहित कर्म ब्रह्मवेत्ताके लिये नहीं हैं; क्योंकि ब्रह्मवेत्ता आप्तकाम होता है और आप्तकामको कोई कामना होनी सम्भव नहीं है । इसके सिवा “जिन हमारे लिये यह आत्मलोक ही इष्ट है" इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है।
मतान्तर-निरासः<br>केचित्तु ब्रह्मविदोऽप्येषणा-सम्बन्धं वर्णयन्ति तैर्बृहदारण्यकं न श्रुतम्; पुत्राद्येषणानामविद्वद्विषयत्वम्; विद्याविषये च—'येषां नोऽयमात्मायं लोकः" (४।४।२२) इत्यतः "किं प्रजया करिष्यामः" (४ । ४ । २२) इत्येष विभागस्तैर्न श्रुतः श्रुत्या कृतः; सर्वक्रियाकारकफलोपमर्दस्वरूपायां च विद्यायां सत्याम्, सह कार्येणाविद्याया अनुपपत्तिलक्षणश्च विरोधस्तैर्न विज्ञातः ।कोई-कोई तो ब्रह्मवेत्ताका भी एषणाओंसे सम्बन्ध बतलाने लगते हैं, उन्होंने बृहदारण्यक नहीं सुना। पुत्रादि एषणाओंका सम्बन्ध तो अविद्वान्‌से ही होता है; विद्याके विषयमें उन्होंने श्रुतिका किया हुआ यह विभाग नहीं सुना कि “जिन हमको यह आत्मलोक ही इष्ट है" इसलिये “हम प्रजाको लेकर क्या करेंगे" इत्यादि । तथा उन्हें इस विरोधका भी पता नहीं है कि समस्त क्रिया, कारक और फलकी निषेधरूपा विद्याके होनेपर अपने कार्यके सहित अविद्या नहीं रह सकती ।
व्यासवाक्यं च तैर्न श्रुतम्; कर्मविद्यास्वरूपयोर्विद्याविद्यात्मकयोः प्रतिकूलवर्तनं विरोधः; "यदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च ।तथा उन्होंने व्यासजीका वचन भी नहीं सुना; कर्मका स्वरूप अज्ञानमय और विद्याका स्वरूप ज्ञानमय है, उनमें एक दूसरेके विपरीत होनारूप विरोध है; जैसा कि "वेदके जो ऐसे वचन हैं कि 'कर्म करो' और 'कर्मका त्याग करो' सो

५४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २

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५४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २


| कां गतिं विद्यया यान्ति<br>कां च गच्छन्ति कर्मणा ।<br>एतद्वै श्रोतुमिच्छामि<br>तद्भवान्प्रब्रवीतु मे ।<br>एतावन्योन्यवैरूप्ये<br>वर्तेते प्रतिकूलतः ॥”<br>इत्येवं पृष्टस्य प्रतिवचनेन—<br>“कर्मणा बध्यते जन्तु-<br>र्विद्यया च विमुच्यते ।<br>तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति<br>यतयः पारदर्शिनः ॥”<br>इत्येवमादिविरोधः प्रदर्शितः । | पुरुष ज्ञानके द्वारा किस गतिको प्राप्त होते हैं और कर्मसे किसे प्राप्त करते हैं ? इसे मैं सुनना चाहता हूँ, आप मुझे यह बताइये; क्योंकि कर्म और ज्ञान तो एक दूसरेसे विरुद्ध स्वभाववाले और प्रतिकूलतया विद्यमान हैं” इस तरह पूछे हुए प्रश्नका उत्तर देते हुए—“जीव कर्मसे बँधता है और ज्ञानसे मुक्त हो जाता है; इसलिये पारदर्शी मुनिजन कर्म नहीं करते” इस प्रकार कर्म तथा ज्ञानमें विरोध दिखाया गया है। | | तस्मान्न साधनान्तरसहिता ब्रह्मविद्या पुरुषार्थसाधनम्, सर्वविरोधात्, साधननिरपेक्षैव पुरुषार्थसाधनमिति पारिव्राज्यं सर्वसाधनसंन्यासलक्षणमङ्गत्वेन विधित्स्यते। | इसलिये ब्रह्मविद्या किसी अन्य साधनके साथ मिलकर पुरुषार्थका साधन नहीं होती, अपितु सबसे विरोध रहनेके कारण यह तो समस्त साधनोंसे निरपेक्ष रहकर ही पुरुषार्थका साधन होती है; अतः समस्त साधनोंके त्यागरूप संन्यासका इसके अङ्गरूपसे विधान करना अभीष्ट है । | | एतावदेव अमृतत्वसाधनम् इत्यवधारणात्, षष्ठसमाप्तौ, लिङ्गाच्च—कर्मी सन्याज्ञवल्क्यः प्रवव्राजेति । मैत्रेय्यै च कर्मसाधनरहितायै साधनत्वे- | 'इतना ही अमृतत्वका साधन है' ऐसा निश्चय किये जानेसे, याज्ञवल्क्यने कर्मी होते हुए भी संन्यास लिया—ऐसा छठे अध्यायके अन्तमें लिङ्ग होनेसे तथा कर्मरूप साधनसे रहित मैत्रेयीके प्रति अमृतत्वके |

| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५४३ |

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ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ५४३
संस्कृतहिन्दी
नामृतत्वस्य ब्रह्मविद्योपदेशाद् वित्तनिन्दावचनाच्च। यदि ह्यमृतत्वसाधनं कर्म स्याद् वित्तसाध्यं पाङ्क्तं कर्म, इति तन्निन्दावचनमनिष्टं स्यात्। यदि तु परितित्याजायिषितं कर्म, ततो युक्ता तत्साधननिन्दा।साधन रूपसे ब्रह्मविद्याका उपदेश किये जाने एवं धनकी निन्दा की जानेसे भी यही सिद्ध होता है। यदि कर्म अमृतत्वका साधन होता तो पाङ्क्तकर्म तो धनसे ही निष्पन्न होनेवाला है, अतः धनकी निन्दाका वचन इष्ट नहीं होता। कर्मके साधनभूत धनकी निन्दा तो तभी उचित होगी जब कि कर्मका त्याग कराना अभीष्ट होगा।
कर्माधिकारनिमित्तवर्णाश्रमादिप्रत्ययोपमर्दाच्च — “ब्रह्म तं परादात्” (२।४।६) “क्षत्रं तं परादात्” (२।४।६) इत्यादेः।इसके सिवा “ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है” “क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती है” इत्यादि वाक्यसे कर्माधिकारके निमित्तभूत वर्णाश्रमादि प्रत्ययकी निवृत्ति हो जानेसे भी [यही सिद्ध होता है]।
न हि ब्रह्मक्षत्राद्यात्मप्रत्ययोपमर्दे, ब्राह्मणेनेदं कर्तव्यं क्षत्रियेणेदं कर्तव्यमिति विषयाभावादात्मानं लभते विधिः। यस्यैव पुरुषस्योपमर्दितः प्रत्ययो ब्रह्मक्षत्राद्यात्मविषयः, तस्य तत्प्रत्ययसंन्यासात् तत्कार्याणां कर्मणां कर्मसाधनानां च अर्थप्राप्तश्च संन्यासः। तस्मा-ब्राह्मणत्व और क्षत्रियत्वादि प्रत्ययका निरास हो जानेपर ‘ब्राह्मणको यह करना चाहिये’ ‘क्षत्रियको यह करना चाहिये’ इत्यादि विधिका कोई विषय न रहनेके कारण कोई स्वरूप नहीं रहता। जिस पुरुषका भी यह ब्राह्मणत्व और क्षत्रियत्वरूप प्रत्यय निवृत्त हो गया है, उसे तत्सम्बन्धी प्रत्यय न रहनेके कारण स्वतः ही उसके कार्यभूत कर्म और कर्मके साधनोंका संन्यास प्राप्त हो जाता है। अतः आत्मज्ञान-