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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

११३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

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११३८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १३ ॥

उसमें [ छठा ] दृष्टान्त इस प्रकार है—जिस प्रकार नमकका डला अन्तर और बाह्यसे रहित सम्पूर्ण रसघन ही है, हे मैत्रेयि ! उसी प्रकार यह आत्मा अन्तर-बाह्य-भेदसे शून्य सम्पूर्ण प्रज्ञानघन ही है । यह इन भूतोंसे [ विशेषरूपसे ] उत्थित होकर उन्हींके साथ नष्ट हो जाता है । इस प्रकार मर जानेपर इसकी संज्ञा नहीं रहती । हे मैत्रेयि ! इस प्रकार मैं कहता हूँ—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ॥ १३ ॥

| सर्वकार्यप्रलयेऽविद्यानिमित्ते सैन्धवघनवदनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एक आत्मावतिष्ठते पूर्वं तु भूतमात्रासंसर्गविशेषाल्लब्धविशेषविज्ञानः सन्, तस्मिन् प्रविलापिते विद्यया विशेषविज्ञाने तन्निमित्ते च भूतसंसर्गे न प्रेत्य संज्ञा अस्ति—इत्येवं याज्ञवल्क्येनोक्ता ॥ १३ ॥ | अविद्याजनित सम्पूर्ण कार्यका सर्वथा लय हो जानेपर लवणखण्डके समान अन्तर और बाह्यसे रहित परिपूर्ण, प्रज्ञानघन एक आत्मा ही स्थित रहता है । पहले तो वह भूतमात्राके संसर्गविशेषसे विशेष विज्ञानको प्राप्त रहता है, फिर विद्याके द्वारा उस विशेष विज्ञान और उससे होनेवाले भूतमात्रके संसर्गके सर्वथा लीन कर दिये जानेपर मरणके पश्चात् उसकी संज्ञा नहीं रहती—ऐसा याज्ञवल्क्यने मैत्रेयीके प्रति कहा ॥ १३ ॥ |

निर्विशेष आत्माके विषयमें मैत्रेयीकी शङ्का और याज्ञवल्क्यका समाधान

सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवान् मोहान्तमापीपिपन्न वा अहममं विजानामीति स होवाच न वा

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११३९

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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११३९

अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा ॥ १४ ॥

वह मैत्रेयी बोली, 'यहीं श्रीमान्‌ने मुझे मोहको प्राप्त करा दिया है। मैं इसे विशेषरूपसे नहीं समझती।' उन्होंने कहा, 'अरी मैत्रेयी! मैं मोहकी बात नहीं कह रहा हूँ। अरी! यह आत्मा निश्चय ही अविनाशी और अनुच्छेदरूप धर्मवाला है' ॥ १४ ॥

| सा होवाचात्रैव मा भगवान् तस्मिन्नेव वस्तुनि प्रज्ञानघन एव न प्रेत्य संज्ञा अस्ति, इति मोहान्तं मोहमध्यमापीपिपत्—आपीपदद् अवगमितवानसि संमोहितवानसीत्यर्थः। अतो न वा अहमिममात्मानमुक्तलक्षणं विजानामि विवेकत इति ।<br><br>स होवाच नाहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्मा। यतो विनष्टुं शीलमस्येति विनाशी न विनाश्यविनाशी, विनाशशब्देन विक्रिया, अविनाशीत्यविक्रिय आत्मेत्यर्थः। अरे मैत्रेय्ययमात्मा प्रकृतोऽनुच्छित्तिधर्मा—उच्छित्तिरुच्छेदः, उच्छेदोऽन्तो विनाशः, उच्छित्तिधर्मोऽस्येत्यु- | वह बोली—यहीं इस प्रज्ञानघनके विषयमें ही, 'मरनेपर इसकी संज्ञा नहीं रहती' ऐसा कहकर श्रीमान्‌ने मुझे मोहमें—मोहके बीचमें 'आपीपिपत्' प्राप्त करा दिया है, अर्थात् मुझे संमोहित कर दिया है। अतः इस उपर्युक्त लक्षणवाले आत्माको मैं विवेकपूर्वक नहीं समझती।<br><br>उन्होंने कहा—मैं मोहकी बात नहीं कहता, क्योंकि हे मैत्रेयि! यह आत्मा अविनाशी है। जिसका विनष्ट होनेका स्वभाव हो उसे विनाशी कहते हैं, जो विनाशी न हो वह अविनाशी कहलाता है, विनाश शब्दसे विकार सूचित होता है, अतः आत्मा अविनाशी अर्थात् अविकारी है। अरी मैत्रेयि! यह आत्मा, जिसका प्रकरण है, अनुच्छित्तिधर्मा है—उच्छित्ति उच्छेदको कहते हैं, उच्छेद—अन्त अर्थात् विनाश, उच्छित्ति जिसका धर्म हो उसे |

११४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

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११४०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
च्छित्तिधर्मा, नोच्छित्तिधर्मा अनुच्छित्तिधर्मा। नापि विक्रियालक्षणो नाप्युच्छेदलक्षणो विनाशोऽस्य विद्यत इत्यर्थः ॥ १४ ॥उच्छित्तिधर्मा कहते हैं, जो उच्छित्तिधर्मा नहीं है वही अनुच्छित्तिधर्मा कहा गया है। तात्पर्य यह है कि इसका न तो विकाररूप विनाश होता है और न उच्छेद रूप ही ॥ १४ ॥

उपदेशका उपसंहार और याज्ञवल्क्यका संन्यास

चतुर्ष्वपि प्रपाठकेष्वेक आत्मा तुल्यो निर्धारितः, परं ब्रह्म। उपायविशेषस्तु तस्याधिगमेऽन्यश्चान्यश्च, उपेयस्तु स एवात्मा यश्चतुर्थे 'अथात आदेशो नेति नेति' इति निर्दिष्टः। स एव पञ्चमे प्राणपणोपन्यासेन शाकल्ययाज्ञवल्क्यसंवादे निर्धारितः, पुनः पञ्चमसमाप्तौ, पुनर्जनकयाज्ञवल्क्यसंवादे, पुनरिहोपनिषत्समाप्तौ। चतुर्णामपि प्रपाठकानामेतदात्मनिष्ठता, नान्योऽन्तराले कश्चिदपि विवक्षितोऽर्थः—इत्येतत्प्रदर्शनायान्त उपसंहारः— स एष नेति नेत्यादिः।चारों ही प्रपाठकोंमें एक ही समान आत्माका निश्चय किया गया है; वह परब्रह्म है। किंतु उसके बोधके लिये उपायविशेष भिन्न-भिन्न है, उपेय तो वह आत्मा ही है, जिसका चतुर्थ प्रपाठक [अर्थात् द्वितीय अध्याय] में 'अथात आदेशो नेति नेति' इस प्रकार निर्देश किया है। उसीका पञ्चम प्रपाठक (तृतीय अध्याय) में प्राणरूप पणके उल्लेखद्वारा शाकल्य-याज्ञवल्क्यसंवादमें निश्चय किया गया है; फिर पञ्चम प्रपाठककी समाप्तिमें, तत्पश्चात् जनक-याज्ञवल्क्य-संवादमें और फिर यहाँ उपनिषद्की समाप्तिमें भी उसीका निर्णय किया गया है। इन चारों ही प्रपाठकोंका तात्पर्य इस आत्मामें ही है; इनके बीचमें कोई और अर्थ विवक्षित नहीं है—यह दिखानेके लिये अन्तमें 'स एष नेति नेति' इत्यादि उपसंहार किया गया है।

ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११४१

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ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ११४१

| यस्मात् प्रकारशतेनापि निरूप्यमाणे तत्त्वे नेति नेत्यात्मैव निष्ठा नान्येोपलभ्यते तर्केण वागमेन वा, तस्मादेतदेवामृतत्वसाधनं यदेतन्नेति नेत्यात्मपरिज्ञानं सर्वसंन्यासश्चेत्येतमर्थमुपसंजिहीर्षन्नाह— | चूँकि तत्त्वका सैकड़ों प्रकारसे निरूपण होनेपर भी उसका पर्यवसान 'नेति नेति' इस प्रकारसे निरूपण किये गये आत्मामें ही है, युक्ति अथवा शास्त्रसे कहीं अन्यत्र उसका तात्पर्य नहीं देखा जाता, अतः यह जो 'नेति नेति' इस प्रकार आत्माका परिज्ञान होना तथा सम्पूर्ण कर्मोंका संन्यास करना है, वही अमृतत्वका साधन है—इस प्रकार इस अर्थका उपसंहार करनेकी इच्छासे याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— |

यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरँ रसयते तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरँ शृणोति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरँ स्पृशति तदितर इतरं विजानाति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् तत्केन कं जिघ्रेत् तत् केन कँ रसयेत् तत् केन कमभिवदेत् तत् केन कँ शृणुयात् तत् केन कं मन्वीत तत् केन कँ स्पृशेत् तत् केन कं विजानीयाद् येनेदँ सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात् स एष नेति नेत्यात्मागृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यति विज्ञातारमरे केन विजानीयादित्युक्तानुशासनासि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यो विजहार ॥ १५ ॥

११४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

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११४२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

जहाँ [अविद्यावस्थामें] द्वैत-सा होता है, वहीं अन्य अन्यको देखता है, अन्य अन्यको सूँघता है, अन्य अन्यका रसास्वादन करता है, अन्य अन्यका अभिवादन करता है, अन्य अन्यको सुनता है, अन्य अन्यका मनन करता है, अन्य अन्यका स्पर्श करता है और अन्य अन्यको विशेषरूपसे जानता है। किंतु जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके द्वारा किसे देखे, किसके द्वारा किसे सूँघे, किसके द्वारा किसका रसास्वादन करे, किसके द्वारा किसका अभिवादन करे, किसके द्वारा किसे सुने, किसके द्वारा किसका मनन करे, किसके द्वारा किसका स्पर्श करे और किसके द्वारा किसे जाने ? जिसके द्वारा पुरुष इस सबको जानता है, उसे किस साधनसे जाने ? वह यह 'नेति-नेति' इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है—उसका ग्रहण नहीं किया जाता, अशीर्य है—उसका विनाश नहीं होता, असङ्ग है—आसक्त नहीं होता, अबद्ध है—वह व्यथित और क्षीण नहीं होता। हे मैत्रेयि ! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने ? इस प्रकार तुझे उपदेश कर दिया गया। अरी मैत्रेयि ! निश्चय जान, इतना ही अमृतत्व है, ऐसा कहकर याज्ञवल्क्यजी परिव्राजक (संन्यासी) हो गये ॥ १५ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
एतावदेतावन्मात्रं यदेतन्नेति नेत्यद्वैतात्मदर्शनमिदं चान्यसहकारिकारणनिरपेक्षमेवारे मैत्रेय्यमृतत्वसाधनम् । यत् पृष्टवत्यसि 'यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूह्यमृतत्वसाधनम्' इति, तदेतावदेवेति विज्ञेयं त्वयेति हैवं किलामृतत्वसाधनमात्मज्ञानं प्रियायै भार्यायै उक्त्वा याज्ञवल्क्यः किं कृतवान् ? यत् पूर्वं प्रतिज्ञातंहे मैत्रेयि ! 'एतावत्'—बस, इतना ही जो कि यह 'नेति नेति' इस प्रकार अद्वैत आत्माका साक्षात्कार करना है, वही किसी दूसरे सहकारी कारणकी अपेक्षासे रहित अमृतत्वका साधन है। तूने जो पूछा था कि श्रीमान् जो अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें,' सो वह साधन इतना ही है—ऐसा तुझे जानना चाहिये। इस प्रकार अपनी प्रिया भार्याको यह अमृतत्वका साधनरूप आत्मज्ञान बतलाकर याज्ञवल्क्यने क्या किया ? जिसकी उन्होंने पहले प्रतिज्ञा

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११४३ |

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ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ११४३

संस्कृत मूल (शाङ्करभाष्य)हिन्दी अनुवाद
प्रव्रजिष्यन्नस्मीति तच्चकार विजहार प्रव्रजितवानित्यर्थः ।की थी कि मैं परिव्राजक (संन्यासी) होनेवाला हूँ वही किया अर्थात् परिव्राजक हो गये ।
परिसमाप्ता ब्रह्मविद्या संन्यासपर्यवसाना । एतावानुपदेशः, एतद् वेदानुशासनम्, एषा परमनिष्ठा, एष पुरुषार्थकर्तव्यतान्त इति ।इस प्रकार जिसका संन्यासमें पर्यवसान हुआ है, वह ब्रह्मविद्या समाप्त हुई । इतना ही उपदेश है, यही वेदकी आज्ञा है, यही परमनिष्ठा है और यही पुरुषार्थ अर्थात् कर्तव्यताका अन्त है ।
इदानीं विचार्यते शास्त्रार्थशास्त्रार्थपरामर्शो विवेकप्रतिपत्तये । मिथोविरुद्धवच- यत आकुलानि हि नोपन्यासश्च वाक्यानि दृश्यन्ते—<br>“यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहुयात्”<br>“यावज्जीवं दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत” “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः” (ईश० २) “एतद् वै जरामर्यं सत्रं यदग्निहोत्रम्” (महानारा० २५ । १) इत्यादीन्येकाश्रम्यज्ञापकानि, अन्यानि चाश्रमान्तरप्रतिपादकानि वाक्यानि—<br>“विदित्वा व्युत्थाय प्रव्रजन्ति”<br>“ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद् गृहाद् वनी भूत्वा प्रव्रजेत्” (जाबालोप० ४) “यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा”अब शास्त्रके तात्पर्यका विवेकज्ञान होनेके लिये विचार किया जाता है, क्योंकि परस्परविरोधी वाक्य देखे जाते हैं— “जीवनपर्यन्त अग्निहोत्र करे”, “जीवनपर्यन्त दर्शपूर्ण-मासद्वारा यजन करे”, “इस लोकमें कर्म करते हुए ही सौ वर्षतक जीवित रहनेकी इच्छा करे”, “यह जो अग्निहोत्र है, जरामरणपर्यन्त होनेवाला सत्र है” इत्यादि वाक्य गार्हस्थ्यरूप एक ही आश्रमके ज्ञापक हैं और इनके सिवा दूसरे वाक्य अन्य आश्रमके प्रतिपादक हैं— “ज्ञान होनेपर गृहस्थाश्रमसे ऊँचे उठकर परिव्राजक हो जाते हैं”, “ब्रह्मचर्य समाप्त करके गृहस्थाश्रमी बने और गृहस्थसे वानप्रस्थ होकर परिव्राजक हो जाय”, “अथवा इसके विपरीत ब्रह्मचर्यसे, गृहसे या वनसे ही परिव्राजक

१६४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

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१६४४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| (जाबालोप० ४) इति "द्वावेव पन्थानावतुनिष्क्रान्ततरौ भवतः क्रियापथश्चैव पुरस्तात् संन्यासश्च तयोः संन्यास एवातिरेचयति" इति "न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः" (महानारा० १०।५) इत्यादीनि। <br><br> तथा स्मृतयश्च—"ब्रह्मचर्यवान् प्रव्रजति", अविशीर्णब्रह्मचर्यो यमिच्छेत् तमावसेत्" तस्याश्रमविकल्पमेके ब्रुवते" <br><br> तथा—"वेदानधीत्य ब्रह्मचर्येण पुत्रपौत्रानिच्छेत् पावनार्थं पितॄणाम्। अग्नीनाधाय विधिवच्चेष्टयज्ञो वनं प्रविश्याथ मुनिर्बुभूषेत् ॥" "प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम्। आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात् ॥" इत्याद्याः। | हो जाय," ये "दो ही मार्ग अभ्युदय और निःश्रेयसके प्रधान साधन हैं, पहले कर्ममार्ग और फिर संन्यास, उनमें संन्यासहीको श्रुति अधिक ठहराती है", "कर्मसे, प्रजासे अथवा धनसे नहीं, किन्हीं-किन्हींने एकमात्र त्यागसे ही अमृतत्व प्राप्त किया है" इत्यादि। <br><br> इसी प्रकार "ब्रह्मचर्यवान् पुरुष परिव्राजक होता है", "जिसका ब्रह्मचर्य खण्डित नहीं हुआ है, वह जिस आश्रममें चाहे उसीमें निवास करे" "कोई-कोई उसके लिये आश्रमका विकल्प बतलाते हैं"¹ तथा "ब्रह्मचर्यके द्वारा वेदाध्ययन कर फिर पितृगणका उद्धार करनेके लिये पुत्र-पौत्रोंकी इच्छा करे और विधिवत् अग्न्याधान कर यज्ञानुष्ठान करनेके अनन्तर वनमें प्रवेश कर [अर्थात् वानप्रस्थ होकर] मुनि (संन्यासी) होनेकी इच्छा करे।।" "जिसमें सर्वस्व दक्षिणामें दे दिया जाता है, ऐसी प्राजापत्य-इष्टि (यज्ञ) करके अग्नियोंको आत्मामें स्थापित कर ब्राह्मणको घरसे निकल [कर संन्यासी हो] जाना चाहिये" इत्यादि स्मृतियाँ भी हैं। |


१. अर्थात् वह क्रमशः एक आश्रमसे दूसरेमें जाय अथवा बिना क्रमके ब्रह्मचर्यसे ही संन्यासी हो जाय। ये तीनों स्मृतिवाक्य आश्रमका विकल्प बतलानेवाले हैं। आगेके वाक्य क्रम सूचित करते हैं; इस प्रकार इनमें परस्परविरोध है।

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११४५

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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११४५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
एवं व्युत्थानविकल्पक्रमयथेष्टाश्रमप्रतिपत्तिप्रतिपादकानि हि श्रुतिस्मृतिवाक्यानि शतश उपलभ्यन्त इतरेतरविरुद्धानि। आचारश्च तद्विदाम्, विप्रतिपत्तिश्च शास्त्रार्थप्रतिपत्तॄणां बहुविदामपि। अतो न शक्यते शास्त्रार्थो मन्दबुद्धिभिर्विवेकेन प्रतिपत्तुम्। परिनिष्ठितशास्त्रन्यायबुद्धिभिरेव ह्येषां वाक्यानां विषयविभागः शक्यतेऽवधारयितुम्। तस्मादेषां विषयविभागज्ञापनाय यथाबुद्धिसामर्थ्यं विचारयिष्यामः।इस प्रकार व्युत्थानके विकल्प, क्रम और यथेष्ट आश्रमोंमें प्रवेश करनेका प्रतिपादन करनेवाले एक-दूसरेसे विरुद्ध सैकड़ों श्रुति-वचन और स्मृति-वाक्य देखे जाते हैं। श्रुति-स्मृतियोंके ज्ञाताओंके आचार भी विभिन्न हैं तथा [जैमिनिप्रभृति] शास्त्रमर्मज्ञोंमें बहुज्ञ होनेपर भी मतभेद देखा जाता है। अतः मन्द-बुद्धि पुरुषोंके लिये विवेकपूर्वक शास्त्रका मर्म समझना असम्भव है। जिनकी बुद्धि शास्त्र और युक्तिमें सब प्रकार निष्णात है, वे ही इन वाक्योंके विषयविभागका निर्णय कर सकते हैं। अतः इनके विषय-विभागको सूचित करनेके लिये हम अपनी बुद्धि और सामर्थ्यके अनुसार विचार करेंगे।
[पूर्वपक्षोत्थापनम्]<br>'यावज्जीव' श्रुत्यादिवाक्यानामन्यार्थासम्भवात् क्रियावसान एव वेदार्थः। "तं यज्ञपात्रैर्दहन्ति" इत्यन्त्यकर्मश्रवणाज्जरामर्यश्रवणाच्च लिङ्गाच्च "भस्मान्तँ शरीरम्" (बृ० उ० ५। १५। १) इतिपूर्व०—'यावज्जीवन अग्निहोत्र करे' इत्यादि वाक्योंका कोई दूसरा अर्थ न हो सकनेके कारण वेदका तात्पर्य कर्ममें ही समाप्त होनेवाला है। यह बात "उस (अग्निहोत्री) को यज्ञपात्रोंके सहित भस्म करते हैं" इस प्रकार अग्निहोत्रीके अन्त्येष्टि-कर्ममें यज्ञपात्रकी आवश्यकताका श्रवण होनेसे, जरा-मरणपर्यन्त अग्निहोत्रका विधान होनेसे तथा "शरीर भस्मान्त है" ऐसा गार्हस्थ्यसूचक लिङ्ग होनेसे भी ज्ञात

११४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४

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११४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४


न हि पारिव्राज्यपक्षे भस्मान्तता शरीरस्य स्यात्। स्मृतिश्च—<br>“निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः। तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिञ्ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित्॥” इति। समन्त्रकं हि यत् कर्म वेदेनेह विधीयते तस्य श्मशानान्ततां दर्शयति स्मृतिः। अधिकाराभावप्रदर्शनाच्चात्यन्तमेव श्रुत्यधिकाराभावोऽकर्मिणो गम्यते। अग्न्युद्वासनापवादाच्च “वीरहा वा एष देवानां योऽग्निमुद्वासयते” इति।होती है। संन्यास-पक्षमें तो शरीर-की भस्मान्तता हो ही नहीं सकती*। इसके सिवा “जिसके गर्भाधानसे लेकर श्मशानपर्यन्त सभी संस्कारोंका विधान मन्त्रों-द्वारा बताया गया है, उसीका इस शास्त्रमें अधिकार समझना चाहिये, किसी दूसरेका नहीं” ऐसी स्मृति भी है। यहाँ वेदने जिस कर्मका मन्त्रपूर्वक विधान किया है, वह कर्म श्मशानपर्यन्त होता है, ऐसा स्मृति प्रदर्शित कर रही है। अधिकारका अभाव प्रदर्शित करने-से तो कर्म न करनेवालेका श्रुतिमें सर्वथा ही अधिकार नहीं है—ऐसा जाना जाता है। इसके सिवा “जो अग्निका उच्छेद करता है, वह देवताओंका वीरहा है” इस प्रकार अग्न्युच्छेदकी निन्दा करनेसे भी यही सिद्ध होता है।
[तत्राक्षेपः] ननु व्युत्थानादिविधानाद्वैकल्पिकं क्रियावसानत्वं वेदार्थस्य।सिद्धान्ती—[किंतु हमारे विचार-में तो] व्युत्थानादिका विधान होनेके कारण वेदार्थका क्रियामें समाप्त होना वैकल्पिक है।
[व्युत्थानादिश्रुतीनाम-न्यार्थत्वप्रतिपादनम्] न, अन्यार्थत्वाद् व्युत्थानादिश्रुतीनाम्। “यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति” “यावज्जीवं दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत”, इत्येवमादीनां**पूर्व०—**नहीं, क्योंकि व्युत्था-नादि श्रुतियोंका तात्पर्य दूसरा ही है। [उसीको विशद करते हैं—] क्योंकि “जीवनपर्यन्त अग्निहोत्र करे” “जीवन-पर्यन्त दर्श-पूर्णमासद्वारा यजन करे” इत्यादि श्रुतियाँ जीवनमात्र-

* क्योंकि संन्यासीके शरीरका दाहसंस्कार नहीं होता।

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११४७

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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११४७


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
श्रुतीनां जीवनमात्रनिमित्तत्वाद् यदा न शक्यतेऽन्यार्थता कल्पयितुं तदा व्युत्थानादिवाक्यानां कर्मानधिकृतविषयत्वसंभवात् ।निमित्तवाली होनेके कारण, जब कोई अन्य तात्पर्य होनेकी कल्पना ही नहीं की जा सकती, तो व्युत्थानादि वाक्योंका कर्मके अनधिकारियोंके विषयमें होना सम्भव है।
“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः” (ईशा० २) इति च मन्त्रवर्णात् “जरया वा ह्येवास्मान्मुच्यते मृत्युना वा” इति च जरामृत्युभ्यामन्यत्र कर्मवियोगच्छिद्रासंभवात् कर्मिणां श्मशानान्तत्वं न वैकल्पिकम् । काणकुब्जादयोऽपि कर्मण्यनधिकृता अनुग्राह्या एव श्रुत्येति व्युत्थानाद्याश्रमान्तरविधानं नानुपपन्नम् ।“कर्म करते हुए ही सो वर्ष जीनेकी इच्छा करे” इस मन्त्रवर्णसे भी यही सिद्ध होता है; तथा “इससे वृद्धावस्थाके कारण मुक्त होता है अथवा मृत्युसे” इस प्रकार जरा और मृत्युके सिवा अन्यत्र कर्मका त्याग अथवा अवकाश सम्भव न होनेसे कर्मियोंका श्मशानान्त होना वैकल्पिक नहीं है। कर्मके अनधिकारी काने और कूबड़े लोगोंपर भी श्रुतिको अनुग्रह करना ही है, इसलिये उनके लिये व्युत्थानादि अन्य आश्रमोंका विधान करना अयुक्त नहीं है।
पारिव्राज्यक्रमविधानस्यानवकाशत्वमिति चेत् ।सिद्धान्ती—तो फिर [ ब्रह्मचर्यसे लेकर ] पारिव्राज्य (संन्यास) तकके आश्रमोंका क्रमविधान निरवकाश¹ होगा !
न; विश्वजित्सर्वमेधयोर्वि-पूर्व०—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि विश्वजित् और सर्वमेध यज्ञोंमें जीवन-

१. अर्थात् उस विधिके पालनका अवसर न मिलनेसे श्रुतिमें उसका विधान व्यर्थ होगा।

११४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

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११४८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| पारिव्राज्यक्रमविधानस्यानवकाशत्ववारणम्<br><br>—जीवविध्यपवादत्वात् । यावज्जीवाग्निहोत्रादिविधेर्विश्वजित्सर्वमेधयोरेवापवादः, तत्र च क्रमप्रतिपत्तिसम्भवः 'ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद् गृहाद् वनी भूत्वा प्रव्रजेत्' इति । | भर अग्निहोत्र करनेकी विधिका यह क्रमविधायक वचन अपवाद (बाधक) है [ अतः व्यर्थ नहीं है ] । यावज्जीवन अग्निहोत्रादिकी जो विधि है, उसका विश्वजित् और सर्वमेध यज्ञमें ही अपवाद है¹ इसलिये वहाँ 'ब्रह्मचर्य समाप्त करके गृहस्थ बने और गृहस्थसे वनवासी होकर परिव्राजक हो' ऐसी आश्रमोंकी क्रमशः प्रतिपत्ति सम्भव है । | | विरोधानुपपत्तेः— न ह्येवंविषयत्वे पारिव्राज्यक्रमविधानवाक्यस्य कश्चिद् विरोधः क्रमप्रतिपत्तेः । अन्यविषयपरिकल्पनायां तु यावज्जीवविधानश्रुतिः स्वविषयात् संकोचिता स्यात् । क्रमप्रतिपत्तेस्तु विश्वजित्सर्वमेधविषयत्वान्न कश्चिद् बाधः । | इस प्रकार उन वाक्योंमें कोई विरोध नहीं आ सकता—पारिव्राज्यके क्रमका विधान करनेवाले वाक्यका ऐसा विषय मान लेनेपर क्रमप्रतिपत्तिका कोई विरोध नहीं रहता । उसका कोई अन्य विषय कल्पना करनेपर तो यावज्जीवन कर्मका विधान करनेवाली श्रुतिका अपने विषयसे संकोच कर देना होगा । क्रमप्रतिपत्तिका विषय तो विश्वजित् और सर्वमेध यज्ञ हैं, इसलिये उसका कोई बाध नहीं होता । | | परमतनिराकरणपूर्वकं स्वमतस्थापनम्<br><br>न, आत्मज्ञानस्यामृतत्वहेतुत्वाभ्युपगमात् । यत् तावत् 'आत्मेत्येवो- | **सिद्धान्ती—**ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि आत्मज्ञानको अमृतत्वका हेतु माना गया है । 'आत्मेत्येवोपासीत' |


१. क्योंकि विश्वजित् और सर्वमेध—इन दो यज्ञोंमें सर्वस्व दान कर दिया जाता है, इसलिये फिर अग्निहोत्रादि कर्मकी सामग्री न रहनेसे उनका होना असम्भव हो जाता है। अतः उन यज्ञोंमेंसे किसीका अनुष्ठान करनेवालेके लिये ही अन्याश्रममें जानेकी विधि है—ऐसा इसका तात्पर्य है।

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११४९ |

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ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ११४९
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पासीत' इत्यारभ्य 'स एष नेति नेति' एतदन्तेन ग्रन्थेन यदुपसंहृतमात्मज्ञानं तदमृतत्वसाधनम्—इत्यभ्युपगतं भवता ।यहाँसे लेकर 'स एष नेति नेति' यहाँतकके ग्रन्थसे जिस आत्मज्ञानका उपसंहार किया गया है, वह अमृतत्वका साधन है—ऐसा आपने स्वीकार किया है।
तत्र 'एतावदेवामृतत्वसाधनम्, अन्यनिरपेक्षम्' इत्येतन्न मृष्यते ।पूर्व०—किंतु वहाँ अन्य किसी (कर्म आदि) की अपेक्षासे रहित केवल ज्ञान ही अमृतत्वका साधन है—यह कथन हम नहीं सह सकते !
तत्र भवन्तं पृच्छामि किमर्थमात्मज्ञानं मर्षयति भवानिति ?सिद्धान्ती—तो मैं श्रीमान्‌से पूछता हूँ कि आप आत्मज्ञानको किसलिये सहन करते हैं ?
शृणु तत्र कारणम्—यथा स्वर्गकामस्य स्वर्गप्राप्त्युपायमजानतोऽग्निहोत्रादि स्वर्गप्राप्तिसाधनं ज्ञापयति, तथेहाप्यमृतत्वप्रतिपित्सोरमृतत्वप्राप्त्युपायमजानतः "यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहि" इत्येवमाकाङ्क्षितममृतत्वसाधनम् "एतावदरे" इत्येवमादौ वेदेन ज्ञाप्यत इति ।पूर्व०—इसमें जो कारण है वह सुनिये—जिस प्रकार स्वर्गप्राप्तिका उपाय न जाननेवाले स्वर्गकामी पुरुषको श्रुति अग्निहोत्रादि स्वर्गप्राप्तिके साधन बतलाती है, उसी प्रकार यहाँ भी अमृतत्वप्राप्तिका साधन न जाननेवाले अमृतत्वप्राप्तिके अभिलाषीको वेदके द्वारा "एतावदरे खल्वमृतत्वम्" इत्यादि मन्त्रोंमें "यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहि" इत्यादि प्रकारसे इच्छा किये हुए अमृतत्वके साधनका बोध कराया जाता है।
एवं तर्हि यथा ज्ञापितमग्निहोत्रादि स्वर्गसाधनमभ्युपगम्यतेसिद्धान्ती—इस प्रकार तो, जैसे श्रुतिके द्वारा ज्ञात कराये हुए अग्निहोत्रादि स्वर्गके साधन माने जाते हैं,

११५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

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११५०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| तथेहाप्यात्मज्ञानम्; यथा ज्ञाप्यते तथाभूतमेवामृतत्वसाधनमात्मज्ञानमभ्युपगन्तुं युक्तम्; तुल्यप्रामाण्यादुभयत्र । <br><br> यद्येवं किं स्यात् ? <br><br> सर्वकर्महेतूपमर्दकत्वादात्मज्ञानस्य विद्योद्भवे कर्मनिवृत्तिः स्यात् । दाराग्निसम्बद्धानां तावदग्निहोत्रादिकर्मणां भेदबुद्धिविषयसम्प्रदानकारकसाध्यत्वम् । अन्यबुद्धिपरिच्छेद्यां ह्यग्न्यादिदेवतां सम्प्रदानकारकभूतामन्तरेण न हि तत् कर्म निर्वर्त्यते । यया हि सम्प्रदानकारकबुद्ध्या सम्प्रदानकारकं कर्मसाधनत्वेनोपदिश्यते, सेह विद्यया निवर्त्यते— “अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स 'वेद'” ( बृ० उ० १ । ४ । १०) “देवास्तं परादुर्येऽन्यत्रात्मनो देवान् | उसी प्रकार यहाँ आत्मज्ञान भी समझना चाहिये। जिस प्रकार ज्ञान कराया गया है, उसी प्रकार आत्मज्ञानको अमृतत्वका साधन मानना उचित है; क्योंकि श्रुतिका प्रामाण्य दोनों जगह समान है। <br><br> पूर्व०-यदि ऐसा माना जाय तो इससे क्या सिद्ध होगा ? <br><br> सिद्धान्ती—आत्मज्ञान कर्मके सम्पूर्ण हेतुओंका निवर्तक है, इसलिये ज्ञानोदय होनेपर कर्मकी निवृत्ति हो जायगी। पत्नी और अग्निसे सम्बद्ध जो अग्निहोत्रादि कर्म हैं, वे भेदबुद्धिके विषय ¹सम्प्रदानकारकद्वारा साध्य हैं। अन्य बुद्धिसे परिच्छेद्य एवं सम्प्रदानकारकभूता अग्नि आदि देवताके बिना वह कर्म निष्पन्न नहीं हो सकता और जिस सम्प्रदान-कारक बुद्धिसे सम्प्रदानकारक कर्मके साधनरूपसे उपदेश किया जाता है, वह इस ज्ञानावस्थामें ज्ञानसे निवृत्त हो जाती है; जैसा कि “वह अन्य है मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है, वह नहीं जानता”, “जो देवताओंको अपनेसे भिन्न समझता है, देवता उसे परास्त कर देते हैं, |


१. जिसके उद्देश्यसे कुछ दिया जाता है; उसे सम्प्रदानकारक कहते हैं। अग्निसाध्य कर्मोंमें अग्निके उद्देश्यसे आहुति दी जाती है, इसलिये अग्निमें सम्प्रदान-कारकत्व है; अतः वह कर्म सम्प्रदानकारकसाध्य कहा जाता है।

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ११५१ |

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ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थे११५१

| वेद” (४।५।७) “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति” (४।४।१९) “एकधैवानुद्रष्टव्यम्” (४।४।२०) “सर्वमात्मानं पश्यति” (४।४।२३) इत्यादिश्रुतिभ्यः। | “जो यहाँ नाना देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है”, “निरन्तर एकरूप ही देखना चाहिये”, “सबको आत्मरूप देखता है” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। | | न च देशकालनिमित्ताद्यपेक्षत्वम् व्यवस्थितात्मवस्तुविषयत्वादात्मज्ञानस्य। क्रियायास्तु पुरुषतन्त्रत्वात् स्याद् देशकालनिमित्ताद्यपेक्षत्वम्। ज्ञानं तु वस्तुतन्त्रत्वान्न देशकालनिमित्ताद्यपेक्षते। यथाग्निरुष्ण आकाशोऽमूर्त इति तथात्मविज्ञानमपि। | आत्मज्ञानका विषय कूटस्थ-नित्य आत्म-वस्तु है, इसलिये उसे देश, काल एवं निमित्त आदिकी अपेक्षा नहीं है। कर्म तो पुरुषके अधीन है, इसलिये उसे देश, काल एवं निमित्तादिकी अपेक्षा है। किंतु ज्ञान वस्तुतन्त्र होनेके कारण देश, काल, निमित्त आदिकी अपेक्षा नहीं रखता। जिस प्रकार अग्नि उष्ण है और आकाश अमूर्त है—इन ज्ञानोंको देशादिकी अपेक्षा नहीं है, उसी प्रकार आत्मज्ञानको भी नहीं है। | | नन्वेवं सति प्रमाणभूतस्य कर्मविधेर्निरोधः स्यात्। न च तुल्यप्रमाणयोरितरेतरनिरोधो युक्तः। | पूर्व०—किंतु ऐसा माननेपर तो प्रमाणभूत कर्मविधिका बाध हो जायगा और समान प्रमाणोंमेंसे एक-दूसरेका बाध होना उचित नहीं है। | | न, स्वाभाविकभेदबुद्धिमात्रनिरोधकत्वात्, न हि विध्यन्तरनिरोधकमात्मज्ञानं स्वाभाविकभेदबुद्धिमात्रं निरुणद्धि। | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि आत्मज्ञान तो स्वाभाविक भेदबुद्धिमात्रका बाधक है, वह अन्य विधिका बाधक नहीं है, वह तो केवल स्वाभाविक भेदबुद्धिका ही बाध करता है। |

११५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

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११५२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तथापि हेत्वपहारात् कर्मानुपपत्तेर्विधिनिरोध एव स्यादिति चेत् ।पूर्व०-इस प्रकार भी तो हेतुकी निवृत्तिसे कर्मोंका होना असम्भव होनेके कारण विधिका ही निरोध हुआ।
न, कामप्रतिषेधात् काम्यप्रवृत्तिनिरोधवददोषात् । यथा स्वर्गकामो यजेतेति स्वर्गसाधने यागे प्रवृत्तस्य कामप्रतिषेधविधेः कामे विहते काम्ययागानुष्ठानप्रवृत्तिर्निरुध्यते न चैतावता काम्यविधिर्निरुद्धो भवति ।सिद्धान्ती-नहीं, कामनाके प्रतिषेधसे सकाम प्रवृत्तिके बाधके समान इसमें कोई दोष नहीं है। जिस प्रकार 'स्वर्गकी कामनावाला यजन करे'-इस वचनसे जो पुरुष स्वर्गके साधनभूत यज्ञमें प्रवृत्त है, उसकी कामनाका कामप्रतिषेध-विधिके अनुसार बाध हो जानेपर उसकी सकाम यज्ञके अनुष्ठानकी प्रवृत्ति रुक जाती है; किंतु इतनेहीसे सकाम कर्मोंकी विधिका बाध नहीं हो जाता १।
कामप्रतिषेधविधिना काम्यविधेरनर्थकत्वज्ञानात् प्रवृत्त्यनुपपत्तेर्निरुद्ध एव स्यादिति चेत् ।पूर्व०-कामप्रतिषेधविधिसे सकाम कर्मविधिकी व्यर्थताका बोध हो जानेसे काम्यकर्मोंमें प्रवृत्ति न हो सकनेके कारण उसका निरोध हो ही जायगा—ऐसा कहें तो ?
भवत्वेवं कर्मविधिनिरोधोऽपि ।सिद्धान्ती-इस प्रकार भले ही कर्मविधिका भी निरोध हो जाय ।
यथा कामप्रतिषेधे काम्यविधेरेवं प्रामाण्यानुपपत्तिरितिपूर्व०-जिस प्रकार कामनाका प्रतिषेध होनेपर काम्यविधिका प्रतिषेध हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञानसे कर्मविधिका बाध हो जानेपर उसका प्रामाण्य नहीं हो सकता । कर्म

१. क्योंकि जिनकी कामना निवृत्त नहीं हुई है, उनके लिये तो वह विधि सार्थक रहती ही है ।

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५३

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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५३


संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
चेत् । अननुष्ठेयत्वेऽनुष्ठातुर-<br>भावादनुष्ठानविध्यानर्थक्यादप्रा-<br>माण्यमेव कर्मविधीनामिति<br>चेत् ।अनुष्ठान करनेके योग्य नहीं है, ऐसा सिद्ध होनेपर अनुष्ठानकर्ताका अभाव हो जानेसे जब अनुष्ठान-विधिकी सार्थकता ही नहीं रही तो कर्मविधियोंकी अप्रामाणिकता ही होगी—ऐसा यदि कहें तो ?
न प्रागात्मज्ञानात् प्रवृत्त्युप-<br>पत्तेः। स्वाभाविकस्य क्रियाकारक-<br>फलभेदविज्ञानस्य प्रागात्म-<br>ज्ञानात् कर्महेतुत्वमुपपद्यत एव,<br>यथा कामविषये दोषविज्ञानोत्प-<br>त्तेः प्राक् काम्यकर्मप्रवृत्तिहेतुत्वं<br>स्यादेव स्वर्गादीच्छायाः स्वा-<br>भाविक्यास्तद्वत् ।सिद्धान्ती— यह ठीक नहीं; क्योंकि आत्मज्ञानसे पूर्व कर्ममें प्रवृत्ति हो सकती है। स्वाभाविक क्रिया, कारक और फलरूप भेद-ज्ञानका आत्मज्ञानसे पूर्व कर्ममें हेतु होना सम्भव है ही; जिस प्रकार कि कामनाके विषयमें दोष-बुद्धि होनेसे पूर्व स्वर्ग आदिकी स्वाभाविक इच्छा ही काम्यकर्मोंमें सकाम मनुष्यकी प्रवृत्ति करानेमें कारण हो ही सकती है, वैसे ही यहां समझना चाहिये।
तथा सत्यनर्थार्थो वेद इति<br>चेत् ।पूर्व०— ऐसा माननेपर तो वेद अनर्थका हेतु है—यह सिद्ध होगा।
न, अर्थानर्थयोरभिप्रायतन्त्र-<br>त्वात् । मोक्षमेकं वर्जयित्वान्य-<br>स्याविद्याविषयत्वात्। पुरुषाभिप्राय-<br>तन्त्रौ ह्यर्थानर्थौ, मरणादिकाम्ये-सिद्धान्ती— नहीं; क्योंकि अर्थ और अनर्थ तो उद्देश्यके अधीन हैं। एकमात्र मोक्षको छोड़कर और सब अविद्याके ही विषय हैं। इसलिये अर्थ और अनर्थ तो पुरुषके अभिप्रायके ही अधीन हैं, कारण [महाभारतादिमें महाप्रस्थान-रूप] मरण आदिकी इच्छासे भी इष्टियों (यज्ञों) का विधान

बृ० उ० ७३—

११५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

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११५४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत (भाष्य)हिन्दी-अनुवाद
ष्टदर्शनात् । तस्माद् यावदात्मज्ञानविधेराभिमुख्यं तावदेव कर्मविधयः । तस्मान्नात्मज्ञानसहभावित्वं कर्मणामित्यतः सिद्धमात्मज्ञानमेवामृतत्वसाधनम् ‘एतावदरे खल्वमृतत्वम्’ इति, कर्मनिरपेक्षत्वाज्ज्ञानस्य । अतो विदुषस्तावत् पारिव्राज्यं सिद्धं सम्प्रदानादिकर्मकारकजात्यादिशून्याविक्रियब्रह्मात्मदृढप्रतिपत्तिमात्रेण वचनमन्तरेणाप्युक्तन्यायतः ।देखा जाता है। अतः जबतक पुरुष आत्मज्ञानसम्बन्धी विधिके अभिमुख न हो जाय तभीतक कर्मविधियाँ हैं। इसलिये कर्मोंका आत्मज्ञानके साथ रहना सम्भव नहीं है, अतः 'हे मैत्रेयी ! निश्चय यही अमृतत्व है' इस प्रमाणसे सिद्ध होता है कि आत्मज्ञान ही अमृतत्वका साधन है, क्योंकि ज्ञानको कर्मकी अपेक्षा नहीं है। इसलिये कोई प्रमाणभूत वचन न होनेपर भी उक्त न्यायसे सम्प्रदानादि कर्मोंके कारक एवं जाति आदिसे शून्य अविकारी ब्रह्ममें ही सुदृढ आत्मभावके बोधमात्रसे ही विद्वान्के लिये तो संन्यास सिद्ध हो ही जाता है।
तथा च व्याख्यातमेतत् ‘येषां नोऽयमात्मायं लोकः’ इति हेतुवचनेन पूर्वे विद्वांसः प्रजामकामयमाना व्युत्तिष्ठन्तीति पारिव्राज्यं विदुषामात्मलोकावबोधादेव ।इसी प्रकार 'जिन हमको यह आत्मलोक अभीष्ट है' इस हेतुवाक्यके द्वारा यह भी व्याख्या कर ही दी गयी है कि पूर्ववर्ती विद्वान् प्रजा आदिकी इच्छा न करके गृहत्याग कर देते थे; अतः आत्मलोकके ज्ञानमात्रसे विद्वानोंके लिये पारिव्राज्य (संन्यास) सिद्ध हो जाता है।
तथा च विविदिषोरपि सिद्धं पारिव्राज्यम्, “एतमेवात्मानं लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति” इतिऐसे ही “इस आत्मलोककी ही इच्छा रखनेवाले परिव्राजक (संन्यासी) होते हैं” इस वचनसे जिज्ञासुके लिये भी पारिव्राज्य सिद्ध

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११५५ |

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| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११५५ | | :--- | :--- |

| वचनात् । कर्मणां चाविद्वद्विषयत्वमवोचाम । अविद्याविषये चोत्पत्त्यादिविकारसंस्कारार्थानि कर्माणीत्यत आत्मसंस्कारद्वारेणात्मज्ञानसाधनत्वमपि कर्मणामवोचाम यज्ञादिभिर्विविदिषन्तीति ।<br><br>अथैवं सति अविद्वद्विषयाणामाश्रमकर्मणां बलाबलविचारणायामात्मज्ञानोत्पादनं प्रति यमप्रधानानाममानित्वादीनां मानसानां च ध्यानज्ञानवैराग्यादीनां सन्निपत्योपकारकत्वम्, हिंसारागद्वेषादिबाहुल्याद् बहुक्लिष्टकर्मविमिश्रिता इतरे, इत्यतः पारिव्राज्यं मुमुक्षूणां प्रशंसन्ति—<br>“त्याग एव हि सर्वेषामुक्तानामपि कर्मणाम् ।<br>वैराग्यं पुनरेतस्य मोक्षस्य परमोऽवधिः ॥”<br>“किं ते धनेन किमु बन्धुभिस्ते किं ते दारैर्ब्राह्मण यो मरिष्यसि ।<br>आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टं | होता है । कर्म अज्ञानियोंके लिये हैं—यह भी हम कह चुके हैं । अविद्याके क्षेत्रमें भी उत्पत्ति आदि विकार और संस्काररूप प्रयोजनके लिये कर्म हैं, इसलिये हमने 'यज्ञादिके द्वारा आत्माको जाननेकी इच्छा करते हैं' ऐसा कहकर चित्तके संस्कारद्वारा कर्मोंका आत्मज्ञानमें साधन होना भी बतलाया है ।<br><br>ऐसी स्थितिमें अज्ञानियोंसे सम्बद्ध आश्रमकर्मोंके बलाबलका विचार करनेपर यह सिद्ध होता है कि अमानित्वादि यमप्रधान और ध्यान-ज्ञान-वैराग्यादि मानस कर्म आत्मज्ञानकी उत्पत्तिमें सन्निपत्योपकारक (साक्षात् उपयोगी) हैं । अन्य कर्म हिंसा एवं राग-द्वेष आदिकी बहुलताके कारण बहुत-से क्लिष्ट कर्मोंसे मिले हुए हैं; इसलिये मुमुक्षुके लिये पारिव्राज्य (संन्यास) की ही प्रशंसा करते हैं; यथा—<br>“सम्पूर्ण उक्त कर्मोंका भी त्याग ही करना चाहिये । इस मोक्षकी परम अवधि वैराग्य ही है ।” “हे ब्राह्मण ! जो तू एक दिन मरेगा ही, तो तेरे लिये धनसे, बन्धुओंसे अथवा स्त्रियोंसे क्या प्रयोजन है ? तू अपनी बुद्धिरूपी गुहामें प्रविष्ट आत्माका अनुसंधान |

११५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

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११५६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| पितामहास्ते क्व गताः पिता च ॥" | कर देख, तेरे पिता-पितामह आदि कहाँ चले गये ?" | | एवं सांख्ययोगशास्त्रेषु च संन्यासो ज्ञानं प्रति प्रत्यासन्न उच्यते। कामप्रवृत्त्यभावाच्च। कामप्रवृत्तेर्हि ज्ञानप्रतिकूलता सर्वशास्त्रेषु प्रसिद्धा, तस्माद् विरक्तस्य मुमुक्षोर्विनापि ज्ञानेन ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेदित्याद्युपपन्नम्। | इसी प्रकार सांख्य और योग-शास्त्रोंमें भी संन्यास ज्ञानका समीपवर्ती कहा जाता है। कामनाकी प्रवृत्तिका अभाव होनेके कारण भी वह ज्ञानका अन्तरङ्ग साधन है। सकामप्रवृत्ति ज्ञानके प्रतिकूल है, यह तो सभी शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है; अतः विरक्त मुमुक्षुके लिये ज्ञान न होनेपर भी 'ब्रह्मचर्य-से ही संन्यास ले ले' इत्यादि विधि उचित ही है। | | ननु सावकाशत्वादनधिकृतविषयमेतदित्युक्तम्, यावज्जीवश्रुत्युपरोधात्। | पूर्व०—किंतु हम यह पहले कह चुके हैं कि [ सामग्रीके अभावमें ] 'जीवनभर अग्निहोत्र करे' इस विधिका निरोध हो जानेसे 'ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्' इस श्रुतिको अवकाश मिल जाता है, इसलिये यही मानना उचित है कि संन्यास कर्मके अनधिकारीके लिये ही है। | | नैष दोषः, नितरां सावकाशत्वाद् 'यावज्जीव'श्रुतीनाम् | सिद्धान्ती—यहाँ यह दोष नहीं आ सकता; क्योंकि जीवनभर अग्निहोत्र विधान करनेवाली श्रुतियोंको सदा ही अवकाश है [उनका कभी निरोध नहीं होता]; | | अविद्वत्कामिकर्तव्यतां ह्यवोचाम सर्वकर्मणाम्। न तु निरपेक्षमेव | क्योंकि सम्पूर्ण कर्मोंकी कर्तव्यता अज्ञानी और सकाम पुरुषोंके लिये है, यह हम बता आये हैं। बिना किसी इच्छाके |

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ११५७ |

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ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थे११५७

| जीवननिमित्तमेव कर्तव्यं कर्म, प्रायेण हि पुरुषाः कामबहुलाः, कामश्चानेकविषयोऽनेककर्मसाधनसाध्यश्च, अनेकफलसाधनानि च वैदिकानि कर्माणि दाराग्निसम्बन्धपुरुषकर्तव्यानि पुनः पुनश्चानुष्ठीयमानानि बहुफलानि कृष्यादिवद् वर्षशतसमाप्तीनि च गार्हस्थ्ये वारण्ये वा, अतस्तदपेक्षया 'यावज्जीव' श्रुतयः, “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” इति च मन्त्रवर्णः । तस्मिंश्च पक्षे विश्वजित्सर्वमेधयोः कर्मपरित्यागः । यस्मिंश्च पक्षे यावज्जीवानुष्ठानं तदा श्मशानान्तत्वं भस्मान्तता च शरीरस्य ।<br><br>इतरवर्णापेक्षया वा यावज्जीवश्रुतिः । न हि क्षत्रियवैश्ययोः पारिव्राज्यप्रतिपत्तिरस्ति । तथा “मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः” “एकाश्रम्यं त्वाचार्याः” इत्येवमादीनां | ही केवल जीवनके निमित्त ही कर्म कर्तव्य नहीं है, प्रायः लोग अधिक कामनाएं रखनेवाले होते हैं, कामनाके विषय भी बहुत-से हैं और वे अनेकों कर्म एवं साधनोंसे साध्य हैं; वैदिक कर्म भी अनेक फलोंके साधन हैं और वे स्त्री और अग्निसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरुषके ही कर्तव्य हैं, बारंबार अनुष्ठान किये जानेपर वे कृषि आदिके समान बहुत-से फल देनेवाले हैं तथा गार्हस्थ्य अथवा वानप्रस्थ आश्रममें सौ वर्षोंमें समाप्त होनेवाले हैं; अतः उनकी अपेक्षासे आजीवन अग्निहोत्रका विधान करनेवाली श्रुतियां और “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” यह मन्त्रवर्ण है । उसी पक्षमें विश्वजित् और सर्वमेधमें कर्मका परित्याग भी है और जिस पक्षमें कर्मका जीवनभर अनुष्ठान विहित है, वहीं शरीरका अन्त श्मशान और भस्मके रूपमें होता है ।<br><br>अथवा आजीवन कर्मका विधान करनेवाली श्रुति ब्राह्मणेतर वर्णोंकी अपेक्षासे भी हो सकती है; क्योंकि क्षत्रिय और वैश्यके लिये संन्यासकी प्राप्ति नहीं है तथा “जिसकी विधि मन्त्रोंद्वारा बतलायी गयी है” “आचार्योंने इनको एकाश्रमी बतलाया है” |