BharatKosha
Back to the archive

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

११८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५

Page 1198Permalink

११८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५


| मद्याप्यनुवर्तत एव । यः पूर्वं प्रजापतिर्देवादीननुशशास सोऽद्याप्यनुशास्त्येव दैव्या स्तनयित्नुलक्षणया वाचा । कथम् ? एषा श्रूयते दैवी वाक् । कासौ ? स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमित्येषां वाक्यानामुपलक्षणाय त्रिर्दकार उच्चार्यतेऽनुकृतिर्न तु स्तनयित्नुशब्दस्त्रिरेव संख्यानियमस्य लोकेऽप्रसिद्धत्वात् ।<br><br>यस्मादद्यापि प्रजापतिर्द्दाम्यत दत्त दयध्वमित्यनुशास्त्येव तस्मात् कारणादेतत्त्रयम् । किं तत्त्रयम् ? इत्युच्यते— दमं दानं दयामिति शिक्षेदुपादद्यात् प्रजापतेरनुशासनमस्माभिः कर्तव्यमित्येवं मतिं कुर्यात् । तथा च स्मृतिः—<br>“त्रिविधं नरकस्येदं<br>द्वारं नाशनमात्मनः ।<br>कामः क्रोधस्तथा लोभ-<br>स्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ॥”<br>( गीता १६ । २१ ) इति ।<br>अस्य हि विधेः शेषः पूर्वः । | वृत्ति होती ही है । जिस प्रजापतिने पूर्वकालमें देवादिका अनुशासन किया था, वह आज भी मेघगर्जनरूपी दैवी वाणीसे उनका अनुशासन करता ही है । सो किस प्रकार ? क्योंकि यह दैवी वाक् सुनी जाती है । वह दैवी वाक् क्या है ? 'द द द' ऐसी मेघगर्जना । 'दमन करो, दान दो, दया करो' इन वाक्योंको उपलक्षित करनेके लिये [दान, दया, दमनके आदि अक्षरोंके ] अनुकरणके रूपमें यह तीन बार दकारका उच्चारण हुआ है । क्योंकि मेघगर्जनका शब्द तीन बार ही होता हो—ऐसा संख्याका नियम लोकमें प्रसिद्ध नहीं है ।<br><br>क्योंकि आज भी प्रजापति 'दमन करो, दान दो, दया करो, इस प्रकार अनुशासन करता ही है, इस कारणसे इन तीनको—तीन कौन ? सो बतलाते हैं—दम, दान और दया इन तीनको सीखे--ग्रहण करे अर्थात् हमें प्रजापतिके अनुशासनका पालन करना चाहिये—ऐसी बुद्धि करे ! ऐसी ही यह स्मृति भी है—“काम, क्रोध और लोभ—ये नरकके तीन दरवाजे हैं, ये आत्माका नाश करनेवाले हैं; इसलिये इन तीनोंको त्याग दे ।'<br>इस विधिका ही पूर्वग्रन्थ शेष है । |

| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११८४ |

Page 1199Permalink
ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ११८४

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
तथापि देवादीनुद्दिश्य किमर्थं दकारत्रयमुच्चारितवान् प्रजापतिः पृथगनुशासनार्थिभ्यः । ते वा कथं विवेकेन प्रतिपन्नाः प्रजापतेर्मनोगतं समानेनैव दकारवर्णमात्रेणेति पराभिप्रायज्ञा विकल्पयन्ति ।तो भी अलग-अलग उपदेश-ग्रहणके इच्छुक देवादिके उद्देश्यसे प्रजापतिने तीन दकारोंका उच्चारण क्यों किया और उन्होंने भी एक अक्षर दकारमात्रसे ही प्रजापतिके मनोगत भावको पृथक्-पृथक् कैसे समझ लिया--इस प्रकार दूसरोंके अभिप्रायको समझनेवाले वादीलोग विकल्प करते हैं ।
अत्रैक आहुरदान्तत्वादानत्त्वादयालृत्वैरपराधित्वमात्मनो मन्यमानाः शङ्किता एव प्रजापतावूषुः किं नो वक्ष्यतीति ? तेषां च दकारश्रवणमात्रादेवात्माशङ्कावशेन तदर्थप्रतिपत्तिरभूत् । लोकेऽपि हि प्रसिद्धम्—पुत्राः शिष्याश्चानुशास्याः सन्तो दोषान्निवर्तयितव्या इति । अतो युक्तं प्रजापतेर्दकारमात्रोच्चारणम्, दमादित्रये च दकारान्वयादात्मनो दोषानुरूप्येण देवादीनां विवेकेन प्रति-यहां एक वादीका कथन है—अदान्तता (अजितेन्द्रियता), अदानता (कंजूसी या लोभ) और अदयालुत (निर्दयता) के कारण अपनेको अपराधी मानकर शङ्कित रहते हुए ही उन्होंने यह सोचकर कि, 'देखें ये हमें क्या उपदेश देते हैं' प्रजापतिके यहां ब्रह्मचर्यपूर्वक वास किया था । अतः अपनी आशङ्काके कारण उन्हें दकारके श्रवणमात्रसे ही उस अर्थकी प्रतीति हो गयी । लोकमें भी यह प्रसिद्ध ही है कि पुत्र और शिष्य, जिनका कि अनुशासन करना हो, उन्हें पहले दोषसे ही निवृत्त करना चाहिये । अतः प्रजापतिका दकारमात्र उच्चारण करना उचित ही है । तथा दमादि तीनोंमें दकारका अन्वय होनेसे अपने दोषके अनुसार देवादिका उन्हें अलग-अलग समझ लेना

बृ० उ० ७५—

| ११८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |

Page 1200Permalink
११८६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ५
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पक्तुं चेति। फलं त्वेतदात्मदोषज्ञाने सति दोषान्निवर्तयितुं शक्यतेऽल्पेनाप्युपदेशेन यथा देवादयो दकारमात्रेणेति।भी उचित ही है। इसका फल तो यही है कि अपने दोषका ज्ञान होनेपर थोड़े-से उपदेशसे भी दोषसे निवृत्त किया जा सकता है, जैसे कि दकारमात्रसे देवादिको निवृत्त कर दिया गया था।
नन्वेतत् त्रयाणां देवादीनामनुशासनं देवादिभिरप्येकैकमेवोपादेयमद्यत्वेऽपि न तु त्रयं मनुष्यैः शिक्षितव्यमिति।शङ्का—किंतु यह देवता आदि तीनोंको उपदेश किया गया और उन देवादिकोंके लिये इनमेंसे एक-एक ही उपादेय हुआ; अतः आजकल भी मनुष्योंको उन तीनोंहीके सीखनेकी आवश्यकता नहीं है।
अत्रोच्यते—पूर्वैर्देवादिभिर्विशिष्टैरनुष्ठितमेतत् त्रयं तस्मान्मनुष्यैरेव शिक्षितव्यमिति।समाधान—यहाँ कहना यह है कि पूर्ववर्ती देवता आदि विशिष्ट व्यक्तियोंने इन तीनों साधनोंका अनुष्ठान किया था, अतः मनुष्योंको भी इन्हें सीखना ही चाहिये।
तत्र दयालुत्वस्याननुष्ठेयत्वं स्यात्, कथम्? असुरैरप्रशस्तैरनुष्ठितत्वादिति चेत्।शङ्का—ऐसी स्थितिमें भी दयालुता अनुष्ठानके योग्य नहीं हो सकती; यदि कहो क्यों? तो इसलिये कि इसका नीच असुरोंद्वारा अनुष्ठान किया गया था।
न, तुल्यत्वात् त्रयाणाम्, अतोऽन्योऽत्राभिप्रायः प्रजापतेः पुत्रा देवादयस्त्रयः, पुत्रेभ्यश्च हितमेव पित्रोपदेष्टव्यम्, प्रजापतिश्च हितज्ञो नान्यथोपदिशति, तस्मात्समाधान—नहीं, क्योंकि ये तीनों समान ही हैं; अतः यहाँ इससे दूसरा अभिप्राय है—देवादि तीनों प्रजापतिके पुत्र हैं और पुत्रोंको पिताके द्वारा हितकी बातका ही उपदेश किया जाना चाहिये। प्रजापति भी उनके हितकी बात जाननेवाले हैं, इसलिये उन्हें अहितका उपदेश नहीं करते।

| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११८७ |

Page 1201Permalink
ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ११८७
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पुत्रानुशासनं प्रजापतेः परम-<br>मेतद्धितम्, अतो मनुष्यैरेवैतत्<br>त्रयं शिक्षितव्यमिति ।<br><br>अथवा न देवा असुरा वा<br>अन्ये केचन विद्यन्ते मनुष्येभ्यः,<br>मनुष्याणामेवादान्ता येऽन्यैरुत्तमै-<br>र्गुणैः संपन्नास्ते देवाः, लोभ-<br>प्रधाना मनुष्याः, तथा हिंसापराः<br>क्रूरा असुराः, त एव मनुष्या<br>अदान्तत्वादिदोषत्रयमपेक्ष्य<br>देवादिशब्दभाजो भवन्ति,<br>इतरांश्च गुणान् सत्त्वरजस्तमांस्य-<br>पेक्ष्य । अतो मनुष्यैरेव शिक्षि-<br>तव्यमेतत् त्रयमिति, तदपेक्षयैव<br>प्रजापतिनोपदिष्टत्वात् । तथा<br>हि मनुष्या अदान्ता लुब्धाः<br>क्रूराश्च दृश्यन्ते, तथा च स्मृतिः—<br>“कामः क्रोधस्तथा लोभस्त-<br>स्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ।” (गीता<br>१६ । २१) इति ॥ ३ ॥अतः प्रजापतिको यह पुत्रोंको दिया<br>हुआ उपदेश उनका परम हित है।<br>इसलिये मनुष्योंको भी इन तीनों-<br>हीकी शिक्षा लेनी चाहिये ।<br><br>अथवा यों समझो कि यहां<br>मनुष्योंसे भिन्न कोई देव या असुर<br>नहीं हैं; मनुष्योंमें ही जो दमन-<br>शील नहीं हैं, किंतु अन्य उत्तम<br>गुणोंसे सम्पन्न हैं उन्हें ही देव कहा<br>है, लोभप्रधान व्यक्ति मनुष्य कहे<br>गये हैं तथा हिंसापरायण और क्रूर<br>व्यक्ति असुर हैं। वे मनुष्य ही<br>अदान्तता आदि तीन दोषोंकी<br>अपेक्षासे तथा सत्त्व, रज और तम-<br>इन अन्य गुणोंके अनुसार देवता<br>आदि नाम धारण करते हैं। अतः<br>ये तीनों साधन मनुष्योंको ही<br>सीखने चाहिये; क्योंकि उनके<br>उद्देश्यसे ही प्रजापतिने इनका<br>उपदेश किया है। तथा मनुष्य अ-<br>जितेन्द्रिय, लोभी और क्रूर प्रकृति-<br>के देखे भी जाते ही हैं, ऐसा ही<br>यह स्मृति भी कहती है—"काम,<br>क्रोध और लोभ [ ये तीन नरकके<br>द्वार हैं ] अतः इन तीनोंका त्याग<br>करना चाहिये" ॥ ३ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
द्वितीयं प्राजापत्यब्राह्मणम् ॥ २ ॥

तृतीय ब्राह्मण

Page 1202Permalink

तृतीय ब्राह्मण

हृदय-ब्रह्मकी उपासना

दमादिसाधनत्रयं सर्वोपासनशेषं विहितम्। दान्तोऽलुब्धो दयालुः सन् सर्वोपासनेष्वधिक्रियते। तत्र निरुपाधिकस्य ब्रह्मणो दर्शनमतिक्रान्तम्, अथाधुना सोपाधिकस्य तस्यैवाभ्युदयफलानि वक्तव्यानि, इत्येवमर्थोऽयमारम्भः—समस्त उपासनाओंके अङ्गभूत दमादि तीन साधनोंका विधान किया गया। दमनशील, निर्लोभ और दयालु होनेपर ही पुरुषका सारी उपासनाओंमें अधिकार होता है। वहाँ निरुपाधिक ब्रह्म-ज्ञानका निरूपण तो समाप्त हो चुका, अब सोपाधिक ब्रह्मकी अभ्युदयरूप फलवाली उपासनाएँ बतलानी हैं, इसीके लिये आरम्भ किया जाता है—

एष प्रजापतिर्यद्धृदयमेतद् ब्रह्मैतत् सर्वं तदेतत् त्र्यक्षरꣳ हृदयमिति ह इत्येकमक्षरमभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद यमित्येकमक्षरमेति स्वर्गं लोकं य एवं वेद ॥ १ ॥

जो हृदय है, वह प्रजापति है। यह ब्रह्म है, यह सर्व है, यह हृदय तीन अक्षरवाला नाम है। 'हृ' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता है, उसके प्रति स्वजन और अन्यजन बलि समर्पण करते हैं। 'द' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता है, उसे स्वजन और अन्यजन देते हैं। 'यम्' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता है, वह स्वर्गलोकको जाता है ॥१॥

एष प्रजापतिर्यद्धृदयं प्रजापतिरनुशास्तीत्यनन्तरमेवाभिहितम्। कः पुनरसावनुशास्ता प्रजापतिः ? इत्युच्यते—एष प्रजापतिःजो हृदय है वह प्रजापति है। प्रजापति अनुशासन करता है—यह अभी कहा जा चुका है। किंतु यह अनुशासनकर्ता प्रजापति कौन है ? सो बतलाया जाता है--यह प्रजापति

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११८६ |

Page 1203Permalink
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ११८६
संस्कृतहिन्दी
कोऽसौ ? यद् हृदयं हृदयमिति हृदयस्था बुद्धिरुच्यते । यस्मिञ्छाकल्यब्राह्मणान्ते नामरूपकर्मणामुपसंहार उक्तो दिग्भागद्वारेण, तदेतत् सर्वभूतप्रतिष्ठं सर्वभूतात्मभूतं हृदयं प्रजापतिः प्रजानां स्रष्टा । एतद् ब्रह्म—बृहत्त्वात् सर्वात्मत्वाच्च ब्रह्म; एतत् सर्वम्; उक्तं पञ्चमाध्याये हृदयस्य सर्वत्वम् । तत् सर्वं यस्मात् तस्मादुपास्यं हृदयं ब्रह्म ।<br><br>तत्र हृदयनामाक्षरविषयमेव तावदुपासनमुच्यते । तदेतद् हृदयमिति नाम त्र्यक्षरम्, त्रीण्यक्षराण्‍यस्येति त्र्यक्षरम् । कानि पुनस्तानि त्रीण्यक्षराण्युच्यन्ते ? हृ इत्येकमक्षरम्, अभिहरन्ति हृतेराहृतिकर्मणो हृ इत्येतद् रूपमिति यो वेद यस्माद् हृदयाय ब्रह्मणे स्वाश्चेन्द्रियाण्यन्ये च विषयाः शब्दादयः स्वं स्वंहै । वह कौन है ? जो हृदय है । 'हृदयम्' इस पदके द्वारा हृदयस्था बुद्धि कही जाती है । जिसमें कि शाकल्यब्राह्मणके अन्तमें दिग्भागके द्वारा नाम, रूप और कर्मोंका उपसंहार बतलाया गया है । वह यह सम्पूर्ण भूतोंमें प्रतिष्ठित तथा सबका आत्मस्वरूप हृदय प्रजापति—प्रजाओंका रचयिता है । यह ब्रह्म है—बृहत् तथा सबका आत्मा होनेके कारण यह ब्रह्म है । यह सर्व है । पञ्चम अध्यायमें हृदयके सर्वत्वका वर्णन किया जा चुका है । क्योंकि वह सर्व है, इसलिये वह हृदयरूप ब्रह्म उपास्य है ।<br><br>अब 'हृदय' इस नामके अक्षरोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासना ही बतलायी जाती है । वह यह 'हृदयम्' ऐसा नाम त्र्यक्षर है, इसके तीन ही अक्षर हैं, इसलिये यह त्र्यक्षर है । वे तीन अक्षर कौन-से हैं, सो बतलाये जाते हैं । 'हृ' यह एक अक्षर है । 'अभिहरन्ति'—आहरण जिसका कर्म है, उस 'हृ' धातुका 'हृ' यह रूप है; जो ऐसा जानता है; [उसको मिलनेवाला फल बताते हैं] चूँकि हृदयरूप ब्रह्मके प्रति ही 'स्वाः'—इन्द्रियाँ और शब्दादि दूसरे

११९० | बृहदारण्यकोपनिषद | [अध्याय ५

Page 1204Permalink
११९०बृहदारण्यकोपनिषद[अध्याय ५
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
कार्यमभिहरन्ति हृदयं च भोक्त्रर्थमभिहरति । अतो हृदयनाम्नो हृ इत्येतदक्षरमिति यो वेदास्मै विदुषेऽभिहरन्ति स्वाश्च ज्ञातयोऽन्ये चासंबद्धाः; बलिमिति वाक्यशेषः । विज्ञानानुरूप्येणैतत् फलम् ।विषय अपने-अपने कार्यका अभिहरण करते हैं और हृदय उन्हें भोक्ताके प्रति ले जाता है । अतः 'हृदय' नामका 'हृ' यह एक अक्षर है—ऐसा जो जानता है उस विद्वान्के प्रति 'स्वाः'—उसके सजातीय और 'अन्ये'—दूसरे असम्बद्ध पुरुष बलि अभिहरण करते हैं । 'बलिम्' यह वाक्यशेष है । विज्ञान (उपासना) के अनुरूप ही यह फल है ।
तथा द इत्येतदप्येकाक्षरमेतदपि दानार्थस्य ददातेर्द इत्येतद् रूपं हृदयनामाक्षरत्वेन निबद्धम् । अत्रापि—हृदयाय ब्रह्मणे स्वाश्च करणान्यन्ये च विषयाः स्वं स्वं वीर्यं ददति हृदयं च भोक्त्रे ददाति स्वं वीर्यमतो दकार इत्येवं यो वेदास्मै ददति स्वाश्चान्ये च ।तथा 'द' यह भी एक अक्षर है । यह भी दानार्थक 'दा' धातुका 'द' यह रूप 'हृदय' नामके अक्षररूपसे निबद्ध है । यहाँ भी हृदयरूप ब्रह्मको 'स्वाः'—इन्द्रियाँ और 'अन्ये'- अर्थात् अन्यान्य विषय अपना-अपना वीर्य देते हैं । हृदय भी भोक्ताको अपना वीर्य देता है । अतः जो दकार इस प्रकारसे उसे जानता है, उसे स्वजन और अन्यजन देते हैं ।
तथा यमित्येतदप्येकमक्षरम्, इणो गत्यर्थस्य यमित्येतद् रूपमस्मिन्नाम्नि निबद्धमिति यो वेद स स्वर्गं लोकमेति । एवं नामाक्षरादपीदृशं विशिष्टं फलं प्रा-तथा 'यम्' यह भी एक अक्षर है । गत्यर्थक 'इण्' धातुका 'यम्' यह रूप इस नाममें निबद्ध है—ऐसा जो जानता है, वह स्वर्गलोकको जाता है । इस प्रकार नामके अक्षरमात्रसे जब पुरुष ऐसा विशिष्ट फल

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११९१

Page 1205Permalink

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११९१

प्नोति किमु वक्तव्यं हृदयस्वरूपो-<br><br>पासनादिति हृदयस्तुतये नामा-<br><br>क्षरोपन्यासः ॥ १ ॥प्राप्त कर लेता है तो हृदयस्वरूप ब्रह्मकी उपासनासे जो फल मिलेगा उसके विषयमें तो कहना ही क्या है ? इस प्रकार हृदयकी स्तुतिके लिये उस नामके अक्षरोंका उपन्यास किया गया है ॥ १ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये तृतीयं हृदयब्राह्मणम् ॥ ३ ॥


चतुर्थ ब्राह्मण

सत्य-ब्रह्मकी उपासना

तस्यैव हृदयाख्यस्य ब्रह्मणः सत्यमित्युपासनं विधित्सन्नाह—उस हृदयसंज्ञक ब्रह्मकी ही 'सत्य' ऐसी उपासनाका विधान करनेकी इच्छासे श्रुति कहती है—

तद् वै तदेतदेव तदास सत्यमेव स यो हैतं महद् यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति जयतीमाँल्लोका-ञ्जित इन्न्वसावसद्य एवमेतन्महद् यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति सत्यँ ह्येव ब्रह्म ॥ १ ॥

वही—वह हृदय-ब्रह्म ही वह था जो कि सत्य ही है। जो भी इस महत्, यक्ष (पूज्य) प्रथम उत्पन्न हुएको 'यह सत्य ब्रह्म है' ऐसा जानता है, वह इन लोकोंको जीत लेता है। [उसका शत्रु] उसके अधीन हो जाता है—असत् (अभावभूत) हो जाता है। जो इस प्रकार इस महत्, यक्ष (पूजनीय) प्रथम उत्पन्न हुएको 'सत्य ब्रह्म'—इस प्रकार जानता है [उसे उपर्युक्त फल मिलता है], क्योंकि ब्रह्म सत्य ही है ॥ १ ॥

११९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

Page 1206Permalink
११९२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
तद् वैदिति हृदयं ब्रह्म परामृष्टम्, इति स्मरणार्थम्, तद् यद् हृदयं ब्रह्म स्मर्यत इत्येकस्तच्छब्दः, तदेतदुच्यते प्रकारान्तरेणेति द्वितीयस्तच्छब्दः, किं पुनस्तत् प्रकारान्तरम् ? एतदेव तदित्येतच्छब्देन संबद्धयते तृतीयस्तच्छब्दः। एतदिति वक्ष्यमाणं बुद्धौ सन्निधीकृत्याह—तत्—'तत्' ऐसा कहकर हृदय-ब्रह्मका परामर्श किया गया है। 'वै' यह अव्यय स्मरणके लिये है। तत्--वह अर्थात् जो हृदय-ब्रह्म स्मरणका विषय हो रहा है, वह—इस भावको व्यक्त करनेके लिये प्रथम तत् शब्दका प्रयोग हुआ है। उसीका यह प्रकारान्तरसे वर्णन किया जाता है, इसलिये [ अर्थात् जिसका स्मरण होता है उसीका यह वर्णन है-इस सम्बन्धको व्यक्त करनेके लिये ] दूसरा 'तत्' शब्द दिया है। किंतु वह प्रकारान्तर क्या है ? इसी बातका [ तीसरे ] 'तत्' शब्दसे सम्बन्ध दिखाया गया है, इसीसे तीसरा 'तत्' शब्द प्रयुक्त हुआ है। फिर 'एतत्' इस शब्दसे श्रुति कही जानेवाली बातको बुद्धिमें रखकर कहती है--
आस बभूव। किं पुनरेतदेवास यदुक्तं हृदयं ब्रह्मेति तदिति तृतीयस्तच्छब्दो विनियुक्तः।'आस'--था। किंतु वह कौन था ? यही, जिसका कि हृदय-ब्रह्म ऐसा कहकर वर्णन किया है--यह बतानेके लिये तीसरे 'तत्' शब्दका प्रयोग किया गया है।
किं तदिति विशेषतो निर्दिशति—‘सत्यमेव सच त्यच्च मूर्तं चामूर्तं च सत्यं ब्रह्म पञ्चभूतात्मकमित्येतत्।’ स यः कश्चित् सत्यात्मानमेतं महन्महत्त्वाद् यक्षंवह क्या है? इसपर श्रुति उसका विशेष रूपसे निर्देश करती है--'सत्यमेव'। सत् और त्यत्--मूर्त और अमूर्त सत्य ब्रह्म ही है, अर्थात् पञ्चभूतात्मक है, जो कोई इस सत्यात्मा, महान् होनेके कारण महत्, यक्ष

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ११९३

Page 1207Permalink

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ११९३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
पूज्यं प्रथमजं प्रथमजातं सर्वस्मात् संसारिण एतदेवाग्रे जातं ब्रह्म, अतः प्रथमजम्, वेद विजानाति सत्यं ब्रह्मेति । तस्येदं फलमुच्यते—पूज्य, प्रथमज अर्थात् समस्त संसारियोंसे पहले उत्पन्न हुए—यह ब्रह्म ही सबसे पहले उत्पन्न हुआ था, इसलिये यह प्रथमज है—'यह सत्य ब्रह्म है, इस प्रकार जानता है, उसके लिये यह फल बतलाया जाता है—
यथा सत्येन ब्रह्मणेमे लोका आत्मसात्कृता जिताः, एवं सत्यात्मानं ब्रह्म महद् यक्षं प्रथमजं वेद स जयतीमाँल्लोकान् । किं च जितो वशीकृतः, इन्न्वित्थम्, यथा ब्रह्मणा । असौ शत्रुरिति वाक्यशेषः असञ्च्वासद्- भवेदसौ शत्रुर्जितो भवेदित्यर्थः ।जिस प्रकार सत्य-ब्रह्मके द्वारा ये लोक आत्मसात् किये हुए अर्थात् जीते हुए हैं, इसी प्रकार जो सत्यात्मा प्रथमोत्पन्न, महत्, पूज्य ब्रह्मको जानता है, वह इन लोकोंको जीत लेता है। तथा उसके द्वारा उसका यह शत्रु जित होता—वशीभूत कर लिया जाता है, जिस प्रकार ब्रह्मके द्वारा सब वशीभूत किये हुए हैं। मूलमें 'असौ'के आगे 'शत्रुः' यह वाक्यशेष है। तथा असत् अर्थात् यह शत्रु अभावरूप यानी पराजित हो जाता है।
कस्यैतत् फलमिति पुनर्निगमयति—य एवमेतन्महद् यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति, अतो विद्यानुरूपं फलं युक्तम्, सत्यं ह्येव यस्माद् ब्रह्म ॥ १ ॥यह किसका फल है—यह बतलानेके लिये श्रुति पुनः निगमन करती है--जो इस प्रकार इस महत् पूज्य प्रथमजको 'सत्य-ब्रह्म' ऐसा जानता है। अतः उपासनाके अनुरूप फल मिलना उचित ही है, क्योंकि ब्रह्म भी सत्य ही है ॥१॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये चतुर्थं सत्यब्राह्मणम् ॥ ४ ॥


पञ्चम ब्राह्मण

Page 1208Permalink

पञ्चम ब्राह्मण


प्रथमज सत्य-ब्रह्म और 'सत्य' नामके अक्षरोंकी उपासना

सत्यस्य ब्रह्मणः स्तुत्यर्थमिदमाह, महद् यक्षं प्रथमजमित्युक्तम्, तत् कथं प्रथमजत्वम् ? इत्युच्यते—सत्य-ब्रह्मकी स्तुतिके लिये यह ब्राह्मण उसे 'महत्, यक्ष, प्रथमज' इस प्रकार कहता है, सो पहले बतला दिया। उसका प्रथमजत्व किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है—

आप एवेदमग्र आसुरता आपः सत्यमसृजन्त सत्यं ब्रह्म प्रजापतिं प्रजापतिर्देवाँस्ते देवाः सत्यमेवोपासते तदेतत् त्र्यक्षरँसत्यमिति स इत्येकमक्षरं तीत्येकमक्षरं यमित्येकमक्षरं प्रथमोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्यतोऽनृतं तदेतदनृतमुभयतः सत्येन परिगृहीतँ सत्यभूयमेव भवति नैवं विद्वाँसमनृतँहिनस्ति ॥१॥

यह [ व्यक्त जगत् ] पहले आप (जल) ही था। उस आपने सत्यकी रचना की। अतः सत्य ब्रह्म है। ब्रह्मने प्रजापति (विराट्) को और प्रजापतिने देवताओंको उत्पन्न किया। वे देवगण सत्यकी ही उपासना करते हैं। वह यह 'सत्य' तीन अक्षरवाला नाम है। 'स' यह एक अक्षर है, 'ती' यह एक अक्षर है और 'यम्' यह एक अक्षर है। इनमें प्रथम और अन्तिम अक्षर सत्य है और मध्यका अनृत है। वह यह अनृत दोनों ओरसे सत्यसे परिगृहीत है। इसलिये यह सत्यबहुल ही है। इस प्रकार जाननेवालेको अनृत नहीं मारता ॥ १ ॥

आप एवेदमग्र आसुः । आप इति कर्मसमवायिन्योऽग्निहोत्राद्या-आरम्भमें यह आप (जल) ही था। 'आप' शब्दसे कर्मसम्बन्धी अग्निहोत्र आदिकीआहुतियां कही गयी

ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११९५

Page 1209Permalink
ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ११९५
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
हुतयः, अग्निहोत्राद्याहुतेर्द्रवात्मकत्वादप्त्वम्, ताश्चापोऽग्निहोत्रादिकर्मापवर्गोत्तरकालं केनचिददृष्टेन सूक्ष्मेणात्मना कर्मसमवायित्वमपरित्यजन्त्य इतरभूतसहिता एव न केवलाः। कर्मसमवायित्वात्तु प्राधान्यमपामिति।हैं। अग्निहोत्रादिकी आहुति द्रवरूप होनेके कारण आप (जल) है। अग्निहोत्र-कर्मकी समाप्तिके पश्चात् वह आप किसी अदृष्ट सूक्ष्मरूपसे अपने कर्म-सम्बन्धको न छोड़ते हुए अन्य भूतोंके साथ ही रहता है, अकेला नहीं रहता। कर्मसम्बन्धित्व रहनेके कारण प्रधानता आप (जल) की ही है [इसलिये यहाँ उसे 'आप' शब्दसे ही कहा है।]
सर्वाण्येव भूतानि प्रागुत्पत्तेरव्याकृतावस्थानि कर्तृसहितानि निर्दिश्यन्त आप इति। ता आपो बीजभूता जगतोऽव्याकृतात्मनावस्थितास्ता एवेदं सर्वं नामरूपविकृतं जगदग्र आसुर्नान्यत् किञ्चिद् विकारजातमासीत्।यहाँ 'आप' ऐसा कहकर उत्पत्तिसे पहले अव्याकृत (अव्यक्त) रूपमें स्थित कर्तासहित सभी भूतोंका निर्देश किया जाता है। जगत्का बीजभूत वह आप अव्याकृतरूपसे स्थित था। यह नाम-रूप विकारको प्राप्त हुआ जगत् आरम्भमें वही था, उससे भिन्न कोई और विकारसमुदाय नहीं था।
ताः पुनरापः सत्यमसृजन्त; तस्मात् सत्यं ब्रह्म प्रथमजम्, तदेतद् हिरण्यगर्भस्य सूत्रात्मनो जन्म, यदव्याकृतस्य जगतो व्याकरणम्। तत् सत्यं ब्रह्म, कुतः? महत्त्वात्। कथं महत्त्वम्? इत्याह—यस्मात् सर्वस्य स्रष्टृ। कथम्? यत् सत्यं ब्रह्म तत्फिर उस आपने सत्यकी रचना की। इसीसे सत्य ब्रह्म प्रथमज है। वही यह सूत्रात्मा हिरण्यगर्भकी उत्पत्ति है; जो कि अव्याकृत जगत्का व्यक्त होना है। वह सत्य ब्रह्म है, क्यों ब्रह्म है? महत्ताके कारण। उसकी महत्ता किस प्रकार है? सो श्रुति बतलाती है—क्योंकि वह सबका स्रष्टा है। किस प्रकार? जो सत्य

११९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५

Page 1210Permalink
११९६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ५

| प्रजापतिं प्रजानां पतिं विराजं सूर्यादिकरणमसृजतेत्यनुषङ्गः । प्रजापतिर्देवान् स विराट्प्रजापतिर्देवानसृजत । यस्मात् सर्वमेवं क्रमेण सत्याद् ब्रह्मणो जातं तस्मान्महत् सत्यं ब्रह्म । | ब्रह्म था, उसने प्रजापतिको—सूर्यादि जिसकी इन्द्रियां हैं, उस प्रजाओंके स्वामी विराट्को उत्पन्न किया--ऐसा इसका सम्बन्ध है । 'प्रजापतिर्देवान्'—उस विराट् प्रजापतिने देवताओंको उत्पन्न किया । चूँकि इस क्रमसे सब कुछ सत्य ब्रह्मसे ही उत्पन्न हुआ है, इसलिये सत्य ब्रह्म महत् है । | | कथं पुनर्यक्षम् ? इत्युच्यते—<br><br>त एवं सृष्टा देवाः पितरमपि विराजमतीत्य तदेव सत्यं ब्रह्मोपासते । अत एतत् प्रथमजं महत् यक्षम् । तस्मात् सर्वात्मनोपास्यं तत्, तस्यापि सत्यस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति । | किंतु वह यक्ष (पूज्य) क्यों है, सो बतलाया जाता है—वे इस प्रकार रचे हुए देवगण अपने पिता विराट्का भी अतिक्रमण करके उस सत्य-ब्रह्मकी ही उपासना करते हैं, इसलिये यह प्रथमोत्पन्न सत्य-ब्रह्म महत् यक्ष है । अतः वह सब प्रकार उपासनीय है, उस सत्य-ब्रह्मका भी 'सत्य' यह नाम है । | | तदेतत् त्र्यक्षरम् । कानि तान्यक्षराणि ? इत्याह—स इत्येकमक्षरम्, तीत्येकमक्षरम्—तीतीकारानुबन्धो निर्देशार्थः—यमित्येकमक्षरम्; तत्र तेषां प्रथमोत्तमे अक्षरे सकारयकारौ सत्यम्; मृत्युरूपाभावात् । मध्यतो | वह यह नाम तीन अक्षरोंवाला है । वे अक्षर कौन-से हैं, सो श्रुति बतलाती है--'स' यह एक अक्षर है । 'ती' यह एक अक्षर है—'ती' इसमें ईकारानुबन्ध निर्देश (स्पष्ट उच्चारण) के लिये है--'यम्' यह एक अक्षर है । इनमें सकार और यकार—ये पहले और अन्तिम अक्षर सत्य हैं, क्योंकि उनके मृत्युरूपका अभाव है । मध्यतः |

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११९७ |

Page 1211Permalink
ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ११९७
मध्येऽनृतम्, अनृतं हि मृत्युः; <br><br>मृत्य्वनृतयोस्तकारसामान्यात् । <br><br>तदेतदनृतं तकाराक्षरं मृत्युरूपमुभयतः सत्येन सकारयकारलक्षणेन परिगृहीतं व्याप्तमन्तर्भावितं सत्यरूपाभ्यामतोऽकिञ्चित्करं तत्, सत्यभूयमेव सत्यबाहुल्यमेव भवति । एवं सत्यबाहुल्यं सर्वस्य मृत्योरनृतस्याकिञ्चित्करत्वं च यो विद्वान्, तमेवं विद्वांसमनृतं कदाचित् प्रमादोक्तं न हिनस्ति ॥ १ ॥अर्थात् बीचमें अनृत है, अनृत मृत्यु है; क्योंकि मृत्यु और अनृत इनकी तकारमें समानता है। <br><br>वह यह मृत्युरूप अनृत तकार अक्षर दोनों ओरसे सकार-यकार-रूप सत्यसे परिगृहीत—व्याप्त है, अर्थात् इन सत्यरूप अक्षरोंसे अन्तर्भावित है, अतः वह अकिञ्चित्कर है; इसलिये 'सत्य' यह नाम सत्यभूय—सत्यप्राय ही है। इस प्रकार इस सम्पूर्ण अक्षरके सत्यबाहुल्य और मृत्युरूप अनृतके अकिञ्चित्करत्वको जो जानता है, उस इस प्रकार जाननेवालेको कभी प्रमादसे बोला हुआ अनृत (असत्य) नहीं मारता ॥ १ ॥
<div align="center">---</div>

एक-दूसरेमें प्रतिष्ठित सत्यसंज्ञक आदित्यमण्डलस्थ और चाक्षुष पुरुष

अस्याधुना सत्यस्य ब्रह्मणः संस्थानविशेष उपासनमुच्यते--अब उस सत्य-ब्रह्मकी संस्थान-विशेषमें उपासना बतलायी जाती है-

तद् यत्तत् सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तावेतावन्योन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः प्राणैरयममुष्मिन् स यदोत्क्रमिष्यन् भवति शुद्धमेवैतन्मण्डलं पश्यति नैनमेते रश्मयः प्रत्यायन्ति ॥ २ ॥

वह जो सत्य है, सो यह आदित्य है। जो इस आदित्यमण्डलमें पुरुष है और जो भी यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, वे ये दोनों पुरुष एक-दूसरेमें

११९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

Page 1212Permalink
११९८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

प्रतिष्ठित हैं। आदित्य रश्मियोंके द्वारा चाक्षुष पुरुषमें प्रतिष्ठित है और चाक्षुष पुरुष प्राणोंके द्वारा उसमें प्रतिष्ठित है। जिस समय यह (चाक्षुष पुरुष) उत्क्रमण करने लगता है, उस समय यह इस मण्डलको शुद्ध ही देखता है। फिर ये रश्मियां इसके पास नहीं आतीं ॥ २ ॥

| तद् यत्, किं तत् ? सत्यं ब्रह्म प्रथमजम्, किम् ? असौ सः। कोऽसौ ? आदित्यः, कः पुनरसावादित्यः ? य एषः, क एषः ? य एतस्मिन्नादित्यमण्डले पुरुषोऽभिमानी सोऽसौ सत्यं ब्रह्म; यश्चायमध्यात्मं योऽयं दक्षिणेऽक्षन्नक्षणि पुरुषः; चशब्दात् स च सत्यं ब्रह्मेति संबन्धः। | वह जो, वह कौन ? प्रथम उत्पन्न हुआ सत्य-ब्रह्म, क्या है ? यह वह है। कौन है ? आदित्य; किंतु यह आदित्य कौन है ? जो यह है, यह कौन ? जो इस आदित्यमण्डलमें इसका अभिमानी पुरुष है, वह यह सत्य-ब्रह्म है; जो कि यह अध्यात्म है, अर्थात् जो यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, वह भी ब्रह्म है—ऐसा 'च' शब्दसे सम्बन्ध लगाना चाहिये। | | तावेतावादित्याक्षिस्थौ पुरुषावेकस्य सत्यस्य ब्रह्मणः संस्थानविशेषौ यस्मात् तस्मादन्योन्यस्मिन्नितरेतरस्मिन्नादित्यश्चाक्षुषे चाक्षुषश्चादित्ये प्रतिष्ठितौ; अध्यात्माधिदैवतयोरन्योन्योपकार्योपकारकत्वात्। | क्योंकि वे ये आदित्यस्थ और नेत्रस्थ पुरुष एक सत्य-ब्रह्मके ही संस्थान (आकार) विशेष हैं, इसलिये एक-दूसरेमें अर्थात् आदित्य-पुरुष चाक्षुषमें और चाक्षुष पुरुष आदित्यमें प्रतिष्ठित हैं, क्योंकि अध्यात्म और अधिदैव पुरुष एक-दूसरेके उपकार्य और उपकारक होते हैं। | | कथं प्रतिष्ठितौ ? इत्युच्यते<br><br>रश्मिभिःप्रकाशेनानुग्रहं कुर्वन्नेष आदित्योऽस्मिंश्चाक्षुषेऽध्यात्मे प्रतिष्ठितः। अयं च चाक्षुषः प्राणै- | वे किस प्रकार प्रतिष्ठित हैं, सो बतलाया जाता है-रश्मियों अर्थात् प्रकाशके द्वारा अनुग्रह करता हुआ यह आदित्य-पुरुष इस अध्यात्म चाक्षुष पुरुषमें प्रतिष्ठित हे तथा यह चाक्षुष पुरुष प्राणोंके द्वारा इस |

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११९९ |

Page 1213Permalink
ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ११९९

रादित्यमनुगृह्णन्नमुष्मिन्नादित्येऽधिदैवे प्रतिष्ठितः ।<br><br>सोऽस्मिञ्छरीरे विज्ञानमयो भोक्ता यदा यस्मिन् काल उत्क्रमिष्यन् भवति तदासौ चाक्षुष आदित्यपुरुषो रश्मीनुपसंहृत्य केवलेनौदासीन्येन रूपेण व्यवतिष्ठते । तदायं विज्ञानमयः पश्यति शुद्धमेव केवलं विरश्म्येतन्मण्डलं चन्द्रमण्डलमिव । तदेतदरिष्टदर्शनं प्रासङ्गिकं प्रदर्श्यते । कथं नाम पुरुषः करणीये यत्नवान् स्यादिति ।<br><br>नैनं चाक्षुषं पुरुषमुररीकृत्य तं प्रत्यनुग्रहायेते रश्मयः स्वामिकर्त्तव्यवशात् पूर्वमागच्छन्तोऽपि पुनस्तत्कर्मक्षयमनुरुध्यमाना इव नोपयन्ति न प्रत्यागच्छन्त्येनम्। अतोऽवगम्यते परस्परोपकार्योपकारकभावात् सत्यस्यैकस्यात्मनोंऽशावेताविति ॥ २ ॥आदित्य-पुरुषका उपकार करता हुआ इस अधिदैव आदित्य-पुरुषमें प्रतिष्ठित है।<br><br>इस शरीरमें जो यह विज्ञानमय (जीव) भोक्ता है, यह जिस कालमें उत्क्रमण करने लगता है, उस समय यह चाक्षुष आदित्य-पुरुष रश्मियोंका उपसंहार कर अपने शुद्ध औदासीन्यरूपसे स्थित हो जाता है। तब यह विज्ञानमय इस आदित्यमण्डलको चन्द्रमण्डलके समान शुद्ध—केवल अर्थात् रश्मिरहित देखता है। यहां यह प्रासंगिक अरिष्टदर्शन प्रदर्शित किया जाता है, जिससे कि किसी प्रकार पुरुष अपने कर्त्तव्यमें सयत्न रहे।<br><br>इस चाक्षुष पुरुषको स्वीकार कर उसके प्रति अनुग्रह करनेके लिये ये रश्मियां, जो स्वामीके कर्त्तव्यवश पहले आती थीं, अब उसके कर्मक्षयके पश्चात् अवरुद्ध हुई-सी इसके पास प्रत्यागमन नहीं करतीं—नहीं आतीं। अतः यह ज्ञात होता है कि परस्पर उपकार्य्य-उपकारकभाव रहनेके कारण ये दोनों एक सत्यात्माके ही अंश हैं ॥ २ ॥

१२०० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

Page 1214Permalink

१२०० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

अहःसंज्ञक आदित्यमण्डलस्थ पुरुषके व्याहृतिरूप अवयव

तत्र योऽसौ, कः ?ऐसी स्थितिमें जो यह है, कौन ?

य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकग्ँ शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहरिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ३ ॥

इस मण्डलमें जो यह पुरुष है, उसका 'भूः' यह शिर है; शिर एक है और यह अक्षर भी एक है। 'भुवः' यह भुजा है; भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं; 'स्वः' यह प्रतिष्ठा ( चरण ) है; प्रतिष्ठा ( चरण ) दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं। 'अहर्' यह उसका उपनिषद् ( गूढ़ नाम ) है; जो ऐसा जानता है, वह पापको मारता है और उसे त्याग देता है ॥३॥

य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः सत्यनामा तस्य व्याहृतयोऽवयवाः । कथम् ? भूरिति येयं व्याहृतिः, सा तस्य शिरः, प्राथम्यात् । तत्र सामान्यं स्वयमेवाह श्रुतिः—एकमेकसंख्यायुक्तं शिरस्तथैतदक्षरमेकं भूरिति । भुव इति बाहू द्वित्वसामान्याद् द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे । तथा स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एतेजो कि इस मण्डलमें सत्य नामवाला पुरुष है, उसके अवयव व्याहृतियां हैं। किस प्रकार ? [सो बतलाते हैं—] 'भूः' ऐसी जो यह व्याहृति है, वह प्रथम होनेके कारण उसका शिर है। उनकी समानता श्रुति स्वयं ही बताती है—शिर एक अर्थात् एक संख्यावाला है, इसी प्रकार 'भूः' यह भी एक अक्षर है। दो होनेमें समानता होनेके कारण 'भुवः' यह भुजा है, दो भुजाएँ हैं और दो ही ये अक्षर हैं। तथा 'स्वः' यह प्रतिष्ठा है, दो प्रतिष्ठाएँ हैं

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ १२०१

Page 1215Permalink

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ १२०१


अक्षरे । प्रतिष्ठे पादौ प्रतितिष्ठत्याभ्यामिति ।<br><br>तस्यास्य व्याहृत्यवयवस्य सत्यस्य ब्रह्मण उपनिषद्रहस्यमभिधानम्; येनाभिधानेनाभिधीयमानं तद् ब्रह्माभिमुखीभवति लोकवत् । कासौ ? इत्याह—अहरिति । अहरिति चैतद् रूपं हन्तेर्जहातेश्च । इति यो वेद स हन्ति जहाति च पाप्मानं य एवं वेद ॥ ३ ॥और दो ही ये अक्षर हैं । इन (चरणों) से पुरुष प्रतिष्ठित होता है—इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रतिष्ठा चरणको कहते हैं ।<br><br>उस इस व्याहृतिरूप अवयवोंवाले सत्य-ब्रह्मका उपनिषद्--रहस्य अर्थात् गूढ नाम, जिस नामसे पुकारे जानेपर वह ब्रह्म अन्य लोगोंके समान अभिमुख होता है । वह उपनिषद् क्या है, सो श्रुति बतलाती है—अहर् । 'अहर्' यह 'हन्'¹ और 'हा'² इन धातुओंका रूप है । जो ऐसा जानता है [अर्थात् अहर्संज्ञक ब्रह्मकी उपासना करता है] वह पापको मारता और त्याग देता है ॥ ३ ॥

अहंसंज्ञक चाक्षुष पुरुषके व्याहृतिरूप अवयव

एवम्—इसी प्रकार—

योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकꣳ शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहमिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ४ ॥

जो यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, उसका 'भूः' यह शिर है; शिर एक है और यह अक्षर भी एक है । 'भुवः' यह भुजा है, भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं । स्वः यह प्रतिष्ठा है, प्रतिष्ठा (चरण) दो हैं और ये


१. 'हन् हिंसागत्योः' ('हन्' धातु हिंसा और गमन अर्थमें है) ।
२. 'ओहाक् त्यागे' ('हा' धातु त्याग-अर्थमें है) ।

बृ० उ० ७६—

१२०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५

Page 1216Permalink
१२०२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ५

अक्षर भी दो हैं। 'अहम्' यह उसका उपनिषद् (गूढ नाम) है; जो ऐसा जानता है, वह पापको मारता और त्याग देता है ॥ ४ ॥

| योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तस्य भूरिति शिर इत्यादि सर्वं समानम्, तस्योपनिषदहमिति; प्रत्यगात्मभूतत्वात्। पूर्ववद् हन्तेर्जहातेश्चेति ॥ ४ ॥ | जो यह दक्षिणनेत्रमें पुरुष है, उसका 'भूः' यह शिर है—इत्यादि सब अर्थ पूर्ववत् है। उसका 'अहम्' यह उपनिषद् है; क्योंकि वह प्रत्यगात्मस्वरूप है। पूर्ववत् यानी 'अहर्' के समान 'अहम्' भी 'हन्' और 'हा' इन दोनों धातुओंका रूप है ॥ ४ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये पञ्चमं सत्यब्रह्मसंस्थानब्राह्मणम् ॥ ५ ॥


षष्ठ ब्राह्मण

हृदयस्थ मनोमय पुरुषकी उपासना

| उपाधीनामनेकत्वादनेकविशेषणत्वाच्च तस्यैव प्रकृतस्य ब्रह्मणो मनउपाधिविशिष्टस्योपासनं विधित्सन्नाह— | उपाधियां अनेक हैं और उनके बहुत-से विशेषण हैं, इसलिये उस मनउपाधिविशिष्ट प्रकृत ब्रह्मकी ही उपासनाका विधान करनेकी इच्छा-से श्रुति कहती है— |

मनोमयोऽयं पुरुषो भाःसत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च ॥ १ ॥

ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२०३

Page 1217Permalink

ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२०३


प्रकाश ही जिसका सत्य ( स्वरूप ) है, ऐसा यह पुरुष मनोमय है। वह उस अन्तर्हृदयमें जैसा व्रीहि ( धान ) या यव ( जौ ) होता है, उतने ही परिमाणवाला है। वह यह सबका स्वामी और सबका अधिपति है, तथा यह जो कुछ है, सभीका प्रकर्षतया शासन करता है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
मनोमयो मनःप्रायो मनस्युपलभ्यमानत्वात् । मनसा चोपलभत इति मनोमयोऽयं पुरुषो भाःसत्यो भा एव सत्यं सद्भावः स्वरूपं यस्य सोऽयं भाःसत्यो भास्वर इत्येतत् । मनसः सर्वार्थविभासकत्वान्मनोमयत्वाच्चास्य भास्वरत्वम् ।मनमें उपलब्ध होनेवाला होनेसे यह मनोमय–मनःप्राय है। इसे मनसे उपलब्ध करते हैं, इसलिये यह पुरुष मनोमय है; तथा भाःसत्य है—भा ही सत्य—सद्भाव अर्थात् स्वरूप है जिसका, ऐसा यह पुरुष भाःसत्य अर्थात् भास्वर है। मनके सभी विषयोंका अवभासक तथा मनोमय होनेके कारण ही इसकी भास्वरता है।
तस्मिन्नन्तर्हृदये हृदयस्यान्तस्तस्मिन्नित्येतत्, यथा व्रीहिर्वा यवो वा परिमाणत एवं परिमाणस्तस्मिन्नन्तर्हृदये योगिभिर्दृश्यत इत्यर्थः । स एष सर्वस्येशानः सर्वस्य स्वभेदजातस्येशानः स्वामी । स्वामित्वेऽपि सति कश्चिदमात्यादितन्त्रोऽयं तु न तथा किं तर्ह्यधिपतिरधिष्ठाय पालयिता ।उस अन्तर्हृदयमें अर्थात् हृदय-का जो अन्तर्भाग है उसमें, जैसा कि परिमाणतः व्रीहि या यव होता है, उतने ही परिमाणवाला यह उस अन्तर्हृदयमें योगियोंद्वारा देखा जाता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। वह यह सबका ईशान अर्थात् अपने [औपाधिक] भेदसमुदायका स्वामी है। स्वामी होनेपर भी कोई मन्त्री आदिके अधीन रहता है, किंतु यह ऐसा नहीं है। तो फिर क्या है? यह अधिपति अर्थात् अधिष्ठाता होकर पालन करनेवाला है।