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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

११५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

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११५२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तथापि हेत्वपहारात् कर्मानुपपत्तेर्विधिनिरोध एव स्यादिति चेत् ।पूर्व०-इस प्रकार भी तो हेतुकी निवृत्तिसे कर्मोंका होना असम्भव होनेके कारण विधिका ही निरोध हुआ।
न, कामप्रतिषेधात् काम्यप्रवृत्तिनिरोधवददोषात् । यथा स्वर्गकामो यजेतेति स्वर्गसाधने यागे प्रवृत्तस्य कामप्रतिषेधविधेः कामे विहते काम्ययागानुष्ठानप्रवृत्तिर्निरुध्यते न चैतावता काम्यविधिर्निरुद्धो भवति ।सिद्धान्ती-नहीं, कामनाके प्रतिषेधसे सकाम प्रवृत्तिके बाधके समान इसमें कोई दोष नहीं है। जिस प्रकार 'स्वर्गकी कामनावाला यजन करे'-इस वचनसे जो पुरुष स्वर्गके साधनभूत यज्ञमें प्रवृत्त है, उसकी कामनाका कामप्रतिषेध-विधिके अनुसार बाध हो जानेपर उसकी सकाम यज्ञके अनुष्ठानकी प्रवृत्ति रुक जाती है; किंतु इतनेहीसे सकाम कर्मोंकी विधिका बाध नहीं हो जाता १।
कामप्रतिषेधविधिना काम्यविधेरनर्थकत्वज्ञानात् प्रवृत्त्यनुपपत्तेर्निरुद्ध एव स्यादिति चेत् ।पूर्व०-कामप्रतिषेधविधिसे सकाम कर्मविधिकी व्यर्थताका बोध हो जानेसे काम्यकर्मोंमें प्रवृत्ति न हो सकनेके कारण उसका निरोध हो ही जायगा—ऐसा कहें तो ?
भवत्वेवं कर्मविधिनिरोधोऽपि ।सिद्धान्ती-इस प्रकार भले ही कर्मविधिका भी निरोध हो जाय ।
यथा कामप्रतिषेधे काम्यविधेरेवं प्रामाण्यानुपपत्तिरितिपूर्व०-जिस प्रकार कामनाका प्रतिषेध होनेपर काम्यविधिका प्रतिषेध हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञानसे कर्मविधिका बाध हो जानेपर उसका प्रामाण्य नहीं हो सकता । कर्म

१. क्योंकि जिनकी कामना निवृत्त नहीं हुई है, उनके लिये तो वह विधि सार्थक रहती ही है ।

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५३

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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५३


संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
चेत् । अननुष्ठेयत्वेऽनुष्ठातुर-<br>भावादनुष्ठानविध्यानर्थक्यादप्रा-<br>माण्यमेव कर्मविधीनामिति<br>चेत् ।अनुष्ठान करनेके योग्य नहीं है, ऐसा सिद्ध होनेपर अनुष्ठानकर्ताका अभाव हो जानेसे जब अनुष्ठान-विधिकी सार्थकता ही नहीं रही तो कर्मविधियोंकी अप्रामाणिकता ही होगी—ऐसा यदि कहें तो ?
न प्रागात्मज्ञानात् प्रवृत्त्युप-<br>पत्तेः। स्वाभाविकस्य क्रियाकारक-<br>फलभेदविज्ञानस्य प्रागात्म-<br>ज्ञानात् कर्महेतुत्वमुपपद्यत एव,<br>यथा कामविषये दोषविज्ञानोत्प-<br>त्तेः प्राक् काम्यकर्मप्रवृत्तिहेतुत्वं<br>स्यादेव स्वर्गादीच्छायाः स्वा-<br>भाविक्यास्तद्वत् ।सिद्धान्ती— यह ठीक नहीं; क्योंकि आत्मज्ञानसे पूर्व कर्ममें प्रवृत्ति हो सकती है। स्वाभाविक क्रिया, कारक और फलरूप भेद-ज्ञानका आत्मज्ञानसे पूर्व कर्ममें हेतु होना सम्भव है ही; जिस प्रकार कि कामनाके विषयमें दोष-बुद्धि होनेसे पूर्व स्वर्ग आदिकी स्वाभाविक इच्छा ही काम्यकर्मोंमें सकाम मनुष्यकी प्रवृत्ति करानेमें कारण हो ही सकती है, वैसे ही यहां समझना चाहिये।
तथा सत्यनर्थार्थो वेद इति<br>चेत् ।पूर्व०— ऐसा माननेपर तो वेद अनर्थका हेतु है—यह सिद्ध होगा।
न, अर्थानर्थयोरभिप्रायतन्त्र-<br>त्वात् । मोक्षमेकं वर्जयित्वान्य-<br>स्याविद्याविषयत्वात्। पुरुषाभिप्राय-<br>तन्त्रौ ह्यर्थानर्थौ, मरणादिकाम्ये-सिद्धान्ती— नहीं; क्योंकि अर्थ और अनर्थ तो उद्देश्यके अधीन हैं। एकमात्र मोक्षको छोड़कर और सब अविद्याके ही विषय हैं। इसलिये अर्थ और अनर्थ तो पुरुषके अभिप्रायके ही अधीन हैं, कारण [महाभारतादिमें महाप्रस्थान-रूप] मरण आदिकी इच्छासे भी इष्टियों (यज्ञों) का विधान

बृ० उ० ७३—

११५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

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११५४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत (भाष्य)हिन्दी-अनुवाद
ष्टदर्शनात् । तस्माद् यावदात्मज्ञानविधेराभिमुख्यं तावदेव कर्मविधयः । तस्मान्नात्मज्ञानसहभावित्वं कर्मणामित्यतः सिद्धमात्मज्ञानमेवामृतत्वसाधनम् ‘एतावदरे खल्वमृतत्वम्’ इति, कर्मनिरपेक्षत्वाज्ज्ञानस्य । अतो विदुषस्तावत् पारिव्राज्यं सिद्धं सम्प्रदानादिकर्मकारकजात्यादिशून्याविक्रियब्रह्मात्मदृढप्रतिपत्तिमात्रेण वचनमन्तरेणाप्युक्तन्यायतः ।देखा जाता है। अतः जबतक पुरुष आत्मज्ञानसम्बन्धी विधिके अभिमुख न हो जाय तभीतक कर्मविधियाँ हैं। इसलिये कर्मोंका आत्मज्ञानके साथ रहना सम्भव नहीं है, अतः 'हे मैत्रेयी ! निश्चय यही अमृतत्व है' इस प्रमाणसे सिद्ध होता है कि आत्मज्ञान ही अमृतत्वका साधन है, क्योंकि ज्ञानको कर्मकी अपेक्षा नहीं है। इसलिये कोई प्रमाणभूत वचन न होनेपर भी उक्त न्यायसे सम्प्रदानादि कर्मोंके कारक एवं जाति आदिसे शून्य अविकारी ब्रह्ममें ही सुदृढ आत्मभावके बोधमात्रसे ही विद्वान्के लिये तो संन्यास सिद्ध हो ही जाता है।
तथा च व्याख्यातमेतत् ‘येषां नोऽयमात्मायं लोकः’ इति हेतुवचनेन पूर्वे विद्वांसः प्रजामकामयमाना व्युत्तिष्ठन्तीति पारिव्राज्यं विदुषामात्मलोकावबोधादेव ।इसी प्रकार 'जिन हमको यह आत्मलोक अभीष्ट है' इस हेतुवाक्यके द्वारा यह भी व्याख्या कर ही दी गयी है कि पूर्ववर्ती विद्वान् प्रजा आदिकी इच्छा न करके गृहत्याग कर देते थे; अतः आत्मलोकके ज्ञानमात्रसे विद्वानोंके लिये पारिव्राज्य (संन्यास) सिद्ध हो जाता है।
तथा च विविदिषोरपि सिद्धं पारिव्राज्यम्, “एतमेवात्मानं लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति” इतिऐसे ही “इस आत्मलोककी ही इच्छा रखनेवाले परिव्राजक (संन्यासी) होते हैं” इस वचनसे जिज्ञासुके लिये भी पारिव्राज्य सिद्ध

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११५५ |

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| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११५५ | | :--- | :--- |

| वचनात् । कर्मणां चाविद्वद्विषयत्वमवोचाम । अविद्याविषये चोत्पत्त्यादिविकारसंस्कारार्थानि कर्माणीत्यत आत्मसंस्कारद्वारेणात्मज्ञानसाधनत्वमपि कर्मणामवोचाम यज्ञादिभिर्विविदिषन्तीति ।<br><br>अथैवं सति अविद्वद्विषयाणामाश्रमकर्मणां बलाबलविचारणायामात्मज्ञानोत्पादनं प्रति यमप्रधानानाममानित्वादीनां मानसानां च ध्यानज्ञानवैराग्यादीनां सन्निपत्योपकारकत्वम्, हिंसारागद्वेषादिबाहुल्याद् बहुक्लिष्टकर्मविमिश्रिता इतरे, इत्यतः पारिव्राज्यं मुमुक्षूणां प्रशंसन्ति—<br>“त्याग एव हि सर्वेषामुक्तानामपि कर्मणाम् ।<br>वैराग्यं पुनरेतस्य मोक्षस्य परमोऽवधिः ॥”<br>“किं ते धनेन किमु बन्धुभिस्ते किं ते दारैर्ब्राह्मण यो मरिष्यसि ।<br>आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टं | होता है । कर्म अज्ञानियोंके लिये हैं—यह भी हम कह चुके हैं । अविद्याके क्षेत्रमें भी उत्पत्ति आदि विकार और संस्काररूप प्रयोजनके लिये कर्म हैं, इसलिये हमने 'यज्ञादिके द्वारा आत्माको जाननेकी इच्छा करते हैं' ऐसा कहकर चित्तके संस्कारद्वारा कर्मोंका आत्मज्ञानमें साधन होना भी बतलाया है ।<br><br>ऐसी स्थितिमें अज्ञानियोंसे सम्बद्ध आश्रमकर्मोंके बलाबलका विचार करनेपर यह सिद्ध होता है कि अमानित्वादि यमप्रधान और ध्यान-ज्ञान-वैराग्यादि मानस कर्म आत्मज्ञानकी उत्पत्तिमें सन्निपत्योपकारक (साक्षात् उपयोगी) हैं । अन्य कर्म हिंसा एवं राग-द्वेष आदिकी बहुलताके कारण बहुत-से क्लिष्ट कर्मोंसे मिले हुए हैं; इसलिये मुमुक्षुके लिये पारिव्राज्य (संन्यास) की ही प्रशंसा करते हैं; यथा—<br>“सम्पूर्ण उक्त कर्मोंका भी त्याग ही करना चाहिये । इस मोक्षकी परम अवधि वैराग्य ही है ।” “हे ब्राह्मण ! जो तू एक दिन मरेगा ही, तो तेरे लिये धनसे, बन्धुओंसे अथवा स्त्रियोंसे क्या प्रयोजन है ? तू अपनी बुद्धिरूपी गुहामें प्रविष्ट आत्माका अनुसंधान |

११५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

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११५६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| पितामहास्ते क्व गताः पिता च ॥" | कर देख, तेरे पिता-पितामह आदि कहाँ चले गये ?" | | एवं सांख्ययोगशास्त्रेषु च संन्यासो ज्ञानं प्रति प्रत्यासन्न उच्यते। कामप्रवृत्त्यभावाच्च। कामप्रवृत्तेर्हि ज्ञानप्रतिकूलता सर्वशास्त्रेषु प्रसिद्धा, तस्माद् विरक्तस्य मुमुक्षोर्विनापि ज्ञानेन ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेदित्याद्युपपन्नम्। | इसी प्रकार सांख्य और योग-शास्त्रोंमें भी संन्यास ज्ञानका समीपवर्ती कहा जाता है। कामनाकी प्रवृत्तिका अभाव होनेके कारण भी वह ज्ञानका अन्तरङ्ग साधन है। सकामप्रवृत्ति ज्ञानके प्रतिकूल है, यह तो सभी शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है; अतः विरक्त मुमुक्षुके लिये ज्ञान न होनेपर भी 'ब्रह्मचर्य-से ही संन्यास ले ले' इत्यादि विधि उचित ही है। | | ननु सावकाशत्वादनधिकृतविषयमेतदित्युक्तम्, यावज्जीवश्रुत्युपरोधात्। | पूर्व०—किंतु हम यह पहले कह चुके हैं कि [ सामग्रीके अभावमें ] 'जीवनभर अग्निहोत्र करे' इस विधिका निरोध हो जानेसे 'ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्' इस श्रुतिको अवकाश मिल जाता है, इसलिये यही मानना उचित है कि संन्यास कर्मके अनधिकारीके लिये ही है। | | नैष दोषः, नितरां सावकाशत्वाद् 'यावज्जीव'श्रुतीनाम् | सिद्धान्ती—यहाँ यह दोष नहीं आ सकता; क्योंकि जीवनभर अग्निहोत्र विधान करनेवाली श्रुतियोंको सदा ही अवकाश है [उनका कभी निरोध नहीं होता]; | | अविद्वत्कामिकर्तव्यतां ह्यवोचाम सर्वकर्मणाम्। न तु निरपेक्षमेव | क्योंकि सम्पूर्ण कर्मोंकी कर्तव्यता अज्ञानी और सकाम पुरुषोंके लिये है, यह हम बता आये हैं। बिना किसी इच्छाके |

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ११५७ |

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ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थे११५७

| जीवननिमित्तमेव कर्तव्यं कर्म, प्रायेण हि पुरुषाः कामबहुलाः, कामश्चानेकविषयोऽनेककर्मसाधनसाध्यश्च, अनेकफलसाधनानि च वैदिकानि कर्माणि दाराग्निसम्बन्धपुरुषकर्तव्यानि पुनः पुनश्चानुष्ठीयमानानि बहुफलानि कृष्यादिवद् वर्षशतसमाप्तीनि च गार्हस्थ्ये वारण्ये वा, अतस्तदपेक्षया 'यावज्जीव' श्रुतयः, “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” इति च मन्त्रवर्णः । तस्मिंश्च पक्षे विश्वजित्सर्वमेधयोः कर्मपरित्यागः । यस्मिंश्च पक्षे यावज्जीवानुष्ठानं तदा श्मशानान्तत्वं भस्मान्तता च शरीरस्य ।<br><br>इतरवर्णापेक्षया वा यावज्जीवश्रुतिः । न हि क्षत्रियवैश्ययोः पारिव्राज्यप्रतिपत्तिरस्ति । तथा “मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः” “एकाश्रम्यं त्वाचार्याः” इत्येवमादीनां | ही केवल जीवनके निमित्त ही कर्म कर्तव्य नहीं है, प्रायः लोग अधिक कामनाएं रखनेवाले होते हैं, कामनाके विषय भी बहुत-से हैं और वे अनेकों कर्म एवं साधनोंसे साध्य हैं; वैदिक कर्म भी अनेक फलोंके साधन हैं और वे स्त्री और अग्निसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरुषके ही कर्तव्य हैं, बारंबार अनुष्ठान किये जानेपर वे कृषि आदिके समान बहुत-से फल देनेवाले हैं तथा गार्हस्थ्य अथवा वानप्रस्थ आश्रममें सौ वर्षोंमें समाप्त होनेवाले हैं; अतः उनकी अपेक्षासे आजीवन अग्निहोत्रका विधान करनेवाली श्रुतियां और “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” यह मन्त्रवर्ण है । उसी पक्षमें विश्वजित् और सर्वमेधमें कर्मका परित्याग भी है और जिस पक्षमें कर्मका जीवनभर अनुष्ठान विहित है, वहीं शरीरका अन्त श्मशान और भस्मके रूपमें होता है ।<br><br>अथवा आजीवन कर्मका विधान करनेवाली श्रुति ब्राह्मणेतर वर्णोंकी अपेक्षासे भी हो सकती है; क्योंकि क्षत्रिय और वैश्यके लिये संन्यासकी प्राप्ति नहीं है तथा “जिसकी विधि मन्त्रोंद्वारा बतलायी गयी है” “आचार्योंने इनको एकाश्रमी बतलाया है” |

११५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

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११५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| क्षत्रियवैशापेक्षत्वम् । तस्मात् पुरुषसामर्थ्यज्ञानवैराग्यकामाद्यपेक्षया व्युत्थानविकल्पक्रमपारिव्राज्यप्रतिपत्तिप्रकारा न विरुध्यन्ते । अनधिकृतानां च पृथग्विधानात् पारिव्राज्यस्य "स्नातको वास्नातको वोत्सन्नाग्निरनग्निको वा" इत्यादिना । तस्मात् सिद्धान्याश्रमान्तराण्यधिकृतानामेव ॥ १५ ॥ | इत्यादि वाक्य क्षत्रिय और वैश्यकी अपेक्षासे हैं । अतः पुरुषके सामर्थ्य, ज्ञान, वैराग्य और कामनादिकी अपेक्षासे व्युत्थानके विकल्प तथा क्रमसे संन्यासग्रहणके प्रकारोंका विरोध नहीं है । स्नातक¹ हो अथवा अस्नातक² हो, उत्सन्नाग्नि³ हो अथवा अनग्नि⁴ हो" इत्यादि वाक्यद्वारा अनधिकारियोंके लिये तो पारिव्राज्यका अलग ही विधान किया है अतः यह सिद्ध हुआ कि आश्रमान्तर अधिकारियोंके लिये ही हैं ॥ १५ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये
पञ्चमं मैत्रेयीब्राह्मणम् ॥ ५ ॥


षष्ठ ब्राह्मण

याज्ञवल्कीय काण्डकी वंश-परम्परा

अथ वंशः पौतिमाष्यो गौपवनाद्
गौपवनः पौतिमाष्यात् पौतिमाष्यो गौपवनाद्
गौपवनः कौशिकात् कौशिकः कौण्डिन्यात्
कौण्डिन्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः कौशिकाच्च


१. जिसने विद्यासमाप्तिके अनन्तर गुरुगृह त्याग किया हो ।
२. जिसने विद्यासमाप्तिसे पूर्व ही गुरुगृह छोड़ दिया हो ।
३. जिसने स्त्रीके रहते हुए ही अग्निको त्याग दिया हो ।
४. जिसने स्त्रीके न रहनेपर अग्निको छोड़ा हो ।

ब्राह्मण ६ ]

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ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५९

गौतमाच्च गौतमः ॥ १ ॥ अग्निवेश्यादाग्निवेश्यो गार्ग्याद् गार्ग्यो गार्ग्याद् गार्ग्यो गौतमाद् गौतमः सैतवात् सैतवः पाराशर्यायणात् पाराशर्यायणो गार्ग्यायणाद् गार्ग्यायण उद्दालकायनादुद्दालकायनो जाबालायना- ज्जाबालायनो माध्यन्दिनायनान्माध्यन्दिनायनः सौकरायणात् सौकरायणः काषायणात् काषायणः सायकायनात् सायकायनः कौशिकायनेः कौशि- कायनिः ॥ २ ॥ घृतकौशिकाद् घृतकौशिकः पारा- शर्यायणात् पाराशर्यायणः पाराशर्यात् पाराशर्यो जातू- कर्ण्याज्जातूकण्यं आसुरायणाच्च यास्काच्चासुरायणस्त्रै- वणेस्त्रैवणिरौपजन्धनेरौपजन्धनिरासुरेरासुरिर्भारद्वा- जाद् भारद्वाज आत्रेयादात्रेयो माण्टेर्माण्टिर्गौतमाद् गौतमो गौतमाद् गौतमो वात्सयाद् वात्स्यः शाण्डि- ल्याच्छाण्डिल्यः कैशोर्यात् काप्यात् कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात् कुमारहारितो गालवाद् गालवो विदर्भीकौण्डिन्याद् विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवाद् वत्सनपाद्बाभ्रवः पथः सौभरात् पन्थाः सौभरोऽयास्यादाङ्गिरसाद्यास्य आङ्गिरस आभूते- स्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात् त्वाष्ट्राद् विश्वरूप- स्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणाद् दध्यङ्- ङाथर्वणोऽथर्वणो दैवादथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वँ- सनान्मृत्युः प्राध्वँसनः प्रध्वँसनात् प्रध्वँसन एकर्षेरेकर्षिर्विप्रचित्तेर्विप्रचित्तिर्व्यष्टेर्व्यष्टिः सनारोः

११६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

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११६०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

सनारुः सनातनात् सनातनः सनगात् सनगः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥

अब [याज्ञवल्कीय काण्डका] वंश बतलाया जाता है—पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने पौतिमाष्यसे, पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने कौशिकसे, कौशिकने कौण्डिन्यसे, कौण्डिन्यने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कौशिकसे और गौतमसे तथा गौतमने ॥ १ ॥ आग्निवेश्यसे, आग्निवेश्यने गार्ग्यसे, गार्ग्यने गार्ग्यसे, गार्ग्यने गौतमसे, गौतमने सैतवसे, सैतवने पाराशर्यायणसे, पाराशर्यायणने गार्ग्यायणसे, गार्ग्यायणने उद्दालकायनसे, उद्दालकायनने जाबालायनसे, जाबालायनने माध्यन्दिनायनसे, माध्यन्दिनायनने सौकरायणसे, सोकरायणने काषायणसे, काषायणने सायकायनसे, सायकायनने कौशिकायनिसे, कौशिकायनिने ॥ २ ॥ घृतकौशिकसे, घृतकौशिकने पाराशर्यायणसे, पाराशर्यायणने पाराशर्यसे, पाराशर्यने जातूकर्ण्यसे, जातूकर्ण्यने आसुरायणसे, और यास्कसे, आसुरायणने त्रैवणिसे, त्रैवणने औपजन्धनिसे, औपजन्धनिने आसुरिसे, आसुरिने भारद्वाजसे, भारद्वाजने आत्रेयसे, आत्रेयने माण्टिसे, माण्टिने गौतमसे, गौतमने गौतमसे, गौतमने वात्स्यसे, वात्स्यने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कैशोर्य काप्यसे, कैशोर्य काप्यने कुमारहारितसे, कुमारहारितने गालवसे, गालवने विदर्भीकौण्डिन्यसे, विदर्भीकौण्डिन्यने वत्सनपाद् बाभ्रवसे, वत्सनपाद् बाभ्रवने पन्था सौभरसे, पन्था सौभरने अयास्य आङ्गिरससे, अयास्य आङ्गिरसने आभूति त्वाष्ट्रसे, आभूति त्वाष्ट्रने विश्वरूप त्वाष्ट्रसे, विश्वरूप त्वाष्ट्रने अश्विनीकुमारोंसे, अश्विनीकुमारोंने दध्यङ्ङाथर्वणसे, दध्यङ्ङाथर्वणने अथर्वा दैवसे, अथर्वा दैवने मृत्यु प्राध्वंसनसे, मृत्यु प्राध्वंसनने प्रध्वंसनसे, प्रध्वंसनने एकर्षिसे, एकर्षिने विप्रचित्तिसे, विप्रचित्तिने व्यष्टिसे, व्यष्टिने सनारुसे, सनारुने सनातनसे, सनातनने सनगसे, सनगने परमेष्ठीसे, परमेष्ठीने ब्रह्मासे [यह विद्या प्राप्त की] । ब्रह्म स्वयम्भू है; ब्रह्मको नमस्कार है ॥ ३ ॥

ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११६१

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ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११६१

अथानन्तरं याज्ञवल्कीयस्य काण्डस्य वंश आरभ्यते यथा मधुकाण्डस्य वंशः । व्याख्यानं तु पूर्ववत् । ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणे नम ओमिति ॥ १-३ ॥अथ-आगे याज्ञवल्कीय काण्डका वंश आरम्भ किया जाता है। जैसा कि मधुकाण्डका वंश था। इसकी व्याख्या तो पूर्ववत् समझनी चाहिये। ब्रह्म स्वयम्भू हे, ब्रह्मको नमस्कार है, ॐ इति ॥ १-३ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये षष्ठं वंशब्राह्मणम्ः॥ ६ ॥


इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ बृहदारण्यकोपनिषद्- भाष्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

पञ्चम अध्याय

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पञ्चम अध्याय

प्रथम ब्राह्मण

पूर्णब्रह्म और उससे उत्पन्न होनेवाला पूर्ण कार्य

पूर्णमद इत्यादि खिलकाण्डमारभ्यते । अध्यायचतुष्टयेन यदेव 'साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरो निरुपाधिकोऽशनायाद्यतीतो नेति नेती'ति व्यपदेश्यो निर्धारितः यद्विज्ञानं केवलममृतत्वसाधनम्, अधुना तस्यैवात्मनः सोपाधिकस्य शब्दार्थादिव्यवहारविषयापन्नस्य पुरस्तादनुक्तान्युपासनानि कर्मभिरविरुद्धानि प्रकृष्टाभ्युदयसाधनानि क्रममुक्तिभाञ्जि च तानि वक्तव्यानि इति परः सन्दर्भः, सर्वोपासनशेषत्वेनोङ्कारो दमं दानं दयामित्येतानि च विधित्सितानि ।अब 'पूर्णमदः' इत्यादि ^१खिल-काण्ड आरम्भ किया जाता है। चार अध्यायोंके द्वारा जिस साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म तथा जिस सर्वान्तर, निरुपाधिक, क्षुधादिसे रहित और 'नेति-नेति' इस प्रकार संकेत किये जाने योग्य आत्माका निश्चय किया गया है तथा जिसका भलीभाँति ज्ञान हो जाना ही एकमात्र अमृतत्वका साधन है, शब्दार्थादि व्यवहारकी विषयताको प्राप्त हुए उसी सोपाधिक आत्माकी उन उपासनाओंका, जिनका कि पहले उल्लेख नहीं हुआ और जो कर्मसे अविरुद्ध, परम उत्तम अभ्युदयकी साधनभूत एवं क्रममुक्तिकी प्राप्ति करानेवाली हैं, अब वर्णन करना है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ है; सम्पूर्ण उपासनाओंके अङ्गरूपसे ओंकार, दम, दान और दया—इनका विधान करना अभीष्ट है।

१. पूर्वकथित विषयसे अवशिष्ट विषयको 'खिल' कहते हैं। अतः खिल-काण्डका अर्थ 'परिशिष्ट प्रकरण' समझना चाहिये।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११६३

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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११६३


ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ १ ॥

वह (परब्रह्म) पूर्ण है और वह (सोपाधिक ब्रह्म भी) पूर्ण है। यह (कार्यात्मक) पूर्ण (कारणात्मक) पूर्णसे ही उत्पन्न होता है। इस पूर्णका पूर्ण (अविद्याकृत अन्यत्वाभास) निकाल लेनेपर पूर्ण ही बच रहता है ॥ १ ॥


भाष्यम्भाष्यार्थ
पूर्णमदः पूर्णं न कुतश्चिद् व्यावृत्तं व्यापीत्येतत् । निष्ठा च कर्तरि द्रष्टव्या । अद इति परोक्षाभिधायि सर्वनाम, तत् परं ब्रह्मेत्यर्थः । तत् सम्पूर्णमाकाशवद् व्यापि निरन्तरं निरुपाधिकं च तदेवेदं सोपाधिकं नामरूपस्थं व्यवहारापन्नं पूर्णं स्वेन रूपेण परमात्मना व्याप्येव नोपाधिपरिच्छिन्नेन विशेषात्मना ।‘पूर्णमदः’—पूर्णम्-जो कहींसे भी व्यावृत्त नहीं है, यानी व्यापक है। पूर्ण शब्दमें जो निष्ठासंज्ञक ‘क्त’ प्रत्यय हुआ है, उसे कर्ता अर्थमें समझना चाहिये। ‘अदः’ यह पद परोक्ष अर्थको बतलानेवाला सर्वनाम है, इसका अर्थ है वह—परब्रह्म। वह सम्पूर्ण है, यानी आकाशके समान व्यापक, अन्तररहित और उपाधिशून्य है। वही यह नाम-रूपमें स्थित व्यवहारदशाको प्राप्त सोपाधिकरूप भी पूर्ण है अर्थात् अपने परमात्मस्वरूपसे व्यापक ही है—उपाधिपरिच्छिन्न (सीमित) विशेषरूपसे व्यापक नहीं है।
तदिदं विशेषापन्नं कार्यात्मकं ब्रह्म पूर्णात् कारणात्मन उदच्यत उद्रिच्यत उद्गच्छतीत्येतत् । यद्यपि कार्यात्मनोद्रिच्यते तथापि यत् स्वरूपं पूर्णत्वं परमात्मभावं तन्न जहाति पूर्णमेवोद्रिच्यते ।वह यह विशेषभावको प्राप्त हुआ कार्यात्मक ब्रह्म पूर्णसे कारणात्मक ब्रह्मसे ‘उदच्यते’—उद्रिक्त होता अर्थात् उद्गत (प्रकट) होता है। यद्यपि यह कार्यरूपसे प्रकट होता है तो भी इसका स्वरूपभूत जो पूर्णत्व अर्थात् परमात्मभाव है, उसे नहीं छोड़ता अर्थात् पूर्ण ही प्रकट होता है।

११६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

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११६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पूर्णस्य कार्यात्मनो ब्रह्मणः पूर्णं पूर्णत्वमादाय गृहीत्वा आत्मस्वरूपैकरसत्वमापद्य, विद्यया अविद्याकृतं भूतमात्रोपाधिसंसर्गजमन्यत्वाभासं तिरस्कृत्य पूर्णमेवानन्तरमबाह्यं प्रज्ञानघनैकरसस्वभावं केवलं ब्रह्मावशिष्यते ।इस पूर्ण यानी कार्यरूप ब्रह्मका सम्पूर्ण पूर्णत्व 'आदाय'—लेकर अर्थात् उसे आत्मस्वरूपके साथ एकरस करके विद्याके द्वारा अविद्याकृत भूतमात्रोपाधिके संसर्गसे होनेवाली भेद-प्रतीतिको मिटा देनेपर पूर्ण ही अर्थात् अन्तरबाह्यशून्य प्रज्ञानघनैकरसस्वरूप शुद्ध ब्रह्म ही शेष रहता है ।
['ब्रह्म वै' इत्यादि-मन्त्रेण समानार्थत्व-प्रदर्शनम्]<br>यदुक्तम् 'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेत् तस्मात्तत् सर्वमभवत्' (१ । ४ । १०) इत्येषोऽस्य मन्त्रस्यार्थः । तत्र ब्रह्मेत्यस्यार्थः पूर्णमद इति । इदं पूर्णमिति ब्रह्म वा इदमग्र आसीदित्यस्यार्थः । तथा च श्रुत्यन्तरम् "यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह" (क० उ० २ । १ । १०) इति । अतोऽदःशब्दवाच्यं पूर्णं ब्रह्म तदेवेदं पूर्णं कार्यस्थं नामरूपोपाधिसंयुक्तमविद्ययोद्रिक्तम् । तस्मादेव परमार्थस्वरूपादन्यदिव प्रत्यवभासमानम् । तद् यदात्मानमेव परं पूर्णं ब्रह्म विदित्वा 'अहमदः पूर्णंपहले जो यह कहा गया था 'ब्रह्म¹ वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेत् तस्मात् तत् सर्वमभवत्' यही इस मन्त्रका भी अर्थ है । इसमें 'ब्रह्म' इस पदका अर्थ है 'पूर्णमदः' और 'इदं पूर्णम्' यह 'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्' इस वाक्यका अर्थ है । ऐसी ही एक दूसरी श्रुति भी है "यदेवेह² तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।" अतः 'अदः' शब्दवाच्य जो पूर्णब्रह्म है वही 'इदं पूर्णम्' अर्थात् कार्यवर्गमें स्थित नाम-रूपात्मक उपाधिसे युक्त अविद्याजनित (कार्यब्रह्म) है । वह उसी परमार्थस्वरूप परब्रह्मसे अन्यके समान प्रतीत होता है । ऐसी स्थितिमें जब अपनेको ही पूर्ण परब्रह्म जानकर 'मैं ही वह पूर्ण ब्रह्म हूँ'

१. आरम्भमें यह एक ब्रह्म ही था, उसने अपनेको जाना, इसलिये वह सर्व हो गया ।
२. जो यहाँ है, वही परलोकमें है और जो परलोकमें है, वही यहाँ (इस देहेन्द्रियरूप उपाधिमें) है ।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११६५

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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११६५


| ब्रह्मास्मि’ इत्येवं पूर्णमादाय तिरस्कृत्यापूर्णस्वरूपतामविद्याकृतां नामरूपोपाधिसम्पर्कजामेतया ब्रह्मविद्यया पूर्णमेव केवलमवशिष्यते । तथा चोक्तम्— ‘तस्मात्तत्सर्वमभवत्’ (१।४।१०) इति ।<br><br>यः सर्वोपनिषदर्थो ब्रह्म स एषोऽनेन मन्त्रेणानूद्यत उत्तरसम्बन्धार्थम् । ब्रह्मविद्यासाधनत्वेन हि वक्ष्यमाणानि साधनान्योङ्कारदमदानदयाख्यानि विधित्सितानि खिलप्रकरणसम्बन्धात् सर्वोपासनाङ्गभूतानि च ।<br><br>अत्रैके वर्णयन्ति पूर्णात् कारणात् पूर्णं कार्यमुद्रिच्यते । उद्रिक्तं कार्यं वर्तमानकालेऽपि पूर्णमेव परमार्थवस्तुभूतं द्वैतरूपेण । पुनः प्रलयकाले पूर्णस्य कार्यस्य पूर्णतामादायात्मनि धित्वा पूर्णमेवावशिष्यते कारणरूपम् । एवमुत्पत्तिस्थितिप्रलयेषु त्रिष्वपि<br>(द्वैताद्वैतवादिमत-प्रदर्शनम्) | इस प्रकार पूर्णत्वको लेकर इस ब्रह्मविद्याके द्वारा अविद्याकृत नामरूपाधिके संसर्गसे उत्पन्न हुई अपूर्णरूपताका तिरस्कार कर दिया जाता है तो केवल पूर्ण हो रह जाता है । यही बात ‘तस्मात्तत्सर्वमभवत्’ इस वाक्यके द्वारा कही गयी है ।<br><br>जो सारे उपनिषद्का अर्थभूत [ब्रह्म] है, उसीका आगेके ग्रन्थसे सम्बन्ध प्रदर्शित करनेके लिये इस मन्त्रके द्वारा अनुवाद किया जाता है तथा जो खिलप्रकरणके सम्बन्धसे सारी उपासनाओंके अङ्गभूत हैं, उन ओङ्कार, दम, दान और दयासंज्ञक साधनोंका भी यहाँ ब्रह्मविद्याके साधनरूपसे विधान करना अभीष्ट है ।<br><br>यहाँ एक पक्षवाले (द्वैताद्वैतवादी ) विद्वान् ऐसा वर्णन करते हैं कि पूर्ण कारणसे पूर्ण कार्य उत्पन्न होता है । वह उत्पन्न हुआ कार्य वर्तमान समयमें भी पूर्ण ही है, अर्थात् द्वैतरूपसे परमार्थ वस्तुभूत ही है । फिर प्रलयकालमें पूर्ण कार्यकी पूर्णताको लेकर उसका आत्मामें ही आधान करनेपर कारणरूप पूर्ण ही रह जाता है । इस प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय—तीनों ही कालोंमें |

| ११६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |

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| ११६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ | | :--- | :--- |

| कालेषु कार्यकारणयोः पूर्णतैव । सा चैकैव पूर्णता कार्यकारणयोर्भेदेन व्यपदिश्यते । एवं च द्वैताद्वैतात्मकमेकं ब्रह्म । | कार्य-कारणकी पूर्णता ही है। यह एक पूर्णता ही कार्य-कारणके भेदसे कही जाती है। इस प्रकार द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म है। | | यथा किल समुद्रो जलतरङ्गफेनबुद्बुदाद्यात्मक एव । यथा च जलं सत्यं तदुद्भवाश्च तरङ्गफेनबुद्बुदायः समुद्रात्मभूता एवाविर्भावतिरोभावधर्मिणः परमार्थसत्या एव । एवं सर्वमिदं द्वैतं परमार्थसत्यमेव जलतरङ्गादिस्थानीयम्, समुद्रजलस्थानीयं तु परं ब्रह्म । | जिस प्रकार समुद्र जल-तरङ्ग-फेन-बुद्बुदादिरूप ही है और उसमें जैसे जल सत्य है, उसी प्रकार उससे होनेवाले आविर्भाव-तिरोभाव-धर्मी तरङ्ग, फेन एवं बुद्बुदादि भी समुद्ररूप और परमार्थ सत्य ही हैं। इस प्रकार यह जलतरङ्गादिस्थानीय सारा द्वैत परमार्थ सत्य ही है और परब्रह्म तो समुद्रके जलस्थानीय ही है। | | एवं च किल द्वैतस्य सत्यत्वे कर्मकाण्डस्य प्रामाण्यम्, यदा पुनर्द्वैतं द्वैतमिवविद्याकृतं मृगतृष्णिकावदनृतम्, अद्वैतमेव परमार्थतः, तदा किल कर्मकाण्डं विषयाभावादप्रमाणं भवति । तथा च विरोध एव स्यात्— वेदैकदेशभूतोपनिषत् प्रमाणम्, परमार्थाद्वैतवस्तुप्रतिपादकत्वात्; अप्रमाणं कर्मकाण्डम्, असद्द्वैतविषयत्वात् । तद्विरोधपरिजिही- | इस प्रकार द्वैतके सत्य होनेपर ही कर्मकाण्डकी प्रामाणिकता हो सकती है। जब द्वैत केवल द्वैत-सा तथा अविद्याकृत और मृगतृष्णाके समान मिथ्या है, परमार्थतः अद्वैत ही सत्य है-ऐसा कहते हैं तब तो अपने विषयका अभाव हो जानेके कारण कर्मकाण्ड अप्रामाणिक ही हो जाता है और ऐसा माननेपर परमार्थ अद्वैत वस्तुका प्रतिपादन करनेवाली होनेके कारण वेदकी एकदेशभूत उपनिषदें तो प्रामाणिक हैं; किंतु असत् द्वैतविषयक होनेसे कर्मकाण्ड अप्रामाणिक है—यह विरोध अनिवार्य होगा, अतः उस विरोधका |

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११६७

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ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११६७


संस्कृत-मूलहिन्दी-अनुवाद
र्थथा श्रुत्यैतदुक्तं कार्यकारणयोः सत्यत्वं समुद्रवत् 'पूर्णमदः' इत्यादिनेति ।परिहार करनेकी इच्छासे ही 'पूर्णमदः' इत्यादि मन्त्रद्वारा श्रुतिने समुद्रके समान यह कार्य-कारणकी सत्यता बतलायी है।
तदसत्, विशिष्टविषयापवादविकल्पयोरसम्भवात् । न हीयं सुविवक्षिता कल्पना, कस्मात् ? यथा क्रियाविषय उत्सर्गप्राप्तस्यैकदेशेऽपवादः क्रियते, यथा "अहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः" (छा० उ० ८।१५।१) इति हिंसा सर्वभूतविषयोत्सर्गेण निवारिता, तीर्थे विशिष्टविषये ज्योतिष्टोमादावनुज्ञायते; न चसिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि [निर्विरोध ब्रह्ममें] विशिष्टके विषयभूत अपवाद और विकल्प सम्भव नहीं हैं। [आपकी] यह कल्पना सुविवक्षित (युक्तियुक्त) नहीं है ! क्यों ?—जिस प्रकार क्रियाके विषयमें उत्सर्गसे (सामान्यतः) प्राप्त किसी क्रियाका किसी एक देशमें [विशेष वचनद्वारा] अपवाद कर दिया जाता है; जैसे "तीर्थों (पुण्यकर्मों) को छोड़कर अन्यत्र सभी प्राणियोंकी हिंसा न करता हुआ" इस वाक्यमें जिस सब प्राणियोंकी हिंसाका सामान्यतः निवारण किया है, उसकी तीर्थ यानी विशिष्ट विषय—ज्योतिष्टोमादि यज्ञोंमें अनुज्ञा दी जाती है ।

* वास्तवमें इस श्रुतिके द्वारा कहीं भी हिंसाका विधान नहीं प्राप्त होता है। इसके द्वारा तो सर्वत्र अहिंसाका ही आदेश किया गया है। छान्दोग्य-उपनिषद्में श्रीशंकराचार्यने 'अन्यत्र तीर्थेभ्यः' की व्याख्या इस प्रकार की है—'भिक्षानिमित्तमटनादिनापि परपीडा स्यादित्यत आह--अन्यत्र तीर्थेभ्यः। तीर्थं नाम शास्त्रानुज्ञाविषयस्ततोऽन्यत्रेत्यर्थः।' इसका भाव इस प्रकार है--भिक्षाके लिये घूमने आदिसे भी तो दूसरोंको पीड़ा पहुँच सकती है, इसके निवारणके लिये कहा—अन्यत्र तीर्थेभ्यः। जो शास्त्राज्ञाका विषय है अर्थात् जिसके लिये शास्त्रकी आज्ञा है, उस कर्मको करते हुए यदि किसीको अनायास कष्ट पहुँच जाय तो उसके लिये कोई दोष नहीं होता; यदि ऐसी बात नहीं होती तो भिक्षाटनका दृष्टान्त नहीं दिया

११६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

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११६८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| तथा वस्तुविषय इहाद्वैतं ब्रह्मोत्सङ्गेन प्रतिपाद्य पुनस्तदेकदेशेऽपवदितुं शक्यते, ब्रह्मणोऽद्वैतत्वादेवैकदेशानुपपत्तेः । | वैसा उस प्रकार वस्तुके विषयमें यहाँ सामान्यतः अद्वैत ब्रह्मका प्रतिपादन कर फिर उसके किसी एक देशमें ब्रह्मका अपवाद (बाध) नहीं किया जा सकता; क्योंकि अद्वैत होनेके कारण ब्रह्मका कोई एक देश नहीं हो सकता । | | तथा विकल्पानुपपत्तेश्च । यथा 'अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति' 'नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति' इति ग्रहणाग्रहणयोः पुरुषाधीनत्वाद् विकल्पो भवति; न त्विह तथा वस्तुविषये 'द्वैतं वा स्यादद्वैतं वा' इति विकल्पः सम्भवति, अपुरुषतन्त्रत्वादात्मवस्तुनः; विरोधाच्च द्वैताद्वैतत्वयोरेकस्य । तस्मान्न सुविवक्षितेयं कल्पना । | इसी प्रकार विकल्प न हो सकनेके कारण भी ऐसा होना असम्भव है । जिस प्रकार 'अतिरात्रयागमें षोडशीका ग्रहण करे' 'अतिरात्रयागमें षोडशीका ग्रहण नहीं करे' इस प्रकार ग्रहण और अग्रहण पुरुषके अधीन होनेके कारण उनमें विकल्प¹ हो सकता है, उस प्रकार यहाँ वस्तुके विषयमें 'वह द्वैत हो अथवा अद्वैत हो' ऐसा विकल्प¹ नहीं हो सकता, क्योंकि आत्मतत्त्व पुरुषके अधीन नहीं है । इसके सिवा एक ही वस्तुका द्वैताद्वैतरूप होना विरुद्ध भी है । इसलिये यह कल्पना सुविवक्षित नहीं है । | | श्रुतिन्यायविरोधाच्च — सैन्धवघनवत् प्रज्ञानैकरसघनं निरन्तरं | श्रुति और युक्तिसे विरुद्ध होनेके कारण भी ऐसा कहना ठीक नहीं है । 'सैन्धवघनके समान प्रज्ञानैक- |


जाता । भिक्षाटनमें किसीकी हिंसा नहीं की जाती; अनजानमें पैरसे दबकर किसी जीवको कष्ट पहुँचनेकी सम्भावनामात्र रहती है ।
१. विकल्प इस प्रकार है; 'क्वचिद् अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति क्वचिद् न गृह्णाति' अर्थात् 'कहीं अतिरात्रमें षोडशीका ग्रहण करे और कहीं न करे ।'

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११६९

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ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११६९


| पूर्वापरबाह्याभ्यन्तरभेदविवर्जितं सबाह्याभ्यन्तरमजं नेति नेत्य-स्थूलमनण्वह्रस्वमजरमभयम-मृतम्—इत्येवमाद्याः श्रुतयो निश्चिताथांः संशयविपर्यासाशङ्कारहिताः सर्वाः समुद्रे प्रक्षिप्ताः स्युरकिञ्चित्करत्वात् । <br><br> तथा न्यायविरोधोऽपि सावयवस्यानेकात्मकस्य क्रियावतो नित्यत्वानुपपत्तेः । नित्यत्वं चात्मनः स्मृत्यादिदर्शनादनुमीयते । तद्विरोधश्च प्राप्नोत्यनित्यत्वे, भवत्कल्पनानर्थक्यं च; स्फुटमेव चास्मिन् पक्षे कर्मकाण्डानर्थक्यम्; अकृताभ्यागमकृतविप्रणाशप्रसङ्गात् । <br><br> ननु ब्रह्मणो द्वैताद्वैतात्मकत्वे समुद्रादिदृष्टान्ता विद्यन्ते, कथमुच्यते भवतैकस्य द्वैताद्वैतत्वं विरुद्धमिति । | रसघनस्वरूप निरवकाश तथा पूर्वापर और बाह्याभ्यन्तर भेदसे रहित है' 'सबाह्याभ्यन्तर अज है' 'नेति नेति' 'अस्थूल, अनणु, अह्रस्व, अजर, अभय और अमृत है' इत्यादि श्रुतियां, जो निश्चितार्थ और संशय-विपर्यय एवं शङ्कासे रहित हैं, सारी ही समुद्रमें डाल देनी होंगी; क्योंकि रहकर भी वे कुछ कर नहीं सकतीं । <br><br> इसी प्रकार युक्तिसे भी विरोध आता है; क्योंकि सावयव, अनेकात्मक और क्रियावान् पदार्थका नित्य होना सम्भव नहीं है। और स्मृति आदि देखनेसे आत्माके नित्यत्वका अनुमान होता है। उसका अनित्यत्व माननेपर उस युक्तिसिद्ध नित्यत्वसे विरोध प्राप्त होता है । [ और यदि आत्माका अनित्यत्व स्वीकार भी किया जाय तो भी ] आपकी कल्पना व्यर्थ हो ठहरती है। इस पक्षमें कर्मकाण्डकी व्यर्थता स्पष्ट ही है, क्योंकि [ आत्माको अनित्य माननेपर ] बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएका नाश होने-का प्रसङ्ग उपस्थित होगा । <br><br> पूर्व०-किंतु ब्रह्मके द्वैताद्वैतरूप होनेमें समुद्रादि दृष्टान्त विद्यमान हैं, फिर आप ऐसा कैसे कहते हैं कि एकका द्वैताद्वैतरूप होना विरुद्ध है ? |

बृ० उ० ७४-

| ११७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |

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११७०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ५
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
न, अन्यविषयत्वात्। नित्यनिरवयववस्तुविषयं हि विरुद्धत्वमवोचाम द्वैताद्वैतत्वस्य, न कार्यविषये सावयवे। तस्माच्छ्रुतिस्मृतिन्यायविरोधादनुपपन्नेयं कल्पना; अस्याः कल्पनाया वरमुपनिषत्परित्याग एव।सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [ हम जो विरोध दिखलाते हैं ] उसका विषय दूसरा है। हमने नित्य और निरवयव वस्तुके विषयमें द्वैताद्वैतका विरोध बतलाया है, सावयव कार्यके विषयमें नहीं। अतः श्रुति-स्मृति और युक्तिसे विरोध होनेके कारण यह कल्पना अनुचित है। इस कल्पनाकी अपेक्षा तो उपनिषद्का परित्याग कर देना ही अच्छा है।
अध्येयत्वाच्च न शास्त्रार्थेयं कल्पना। न हि जननमरणायनर्थशतसहस्रभेदसमाकुलं समुद्रवनादिवत् सावयवमनेकरसं ब्रह्म ध्येयत्वेन विज्ञेयत्वेन वा श्रुत्योपदिश्यते।सावयव ब्रह्मका ध्येयरूपसे उपदेश न होनेके कारण भी यह कल्पना शास्त्रका तात्पर्य नहीं हो सकती। जो जन्म-मरणादि सैकड़ों-सहस्रों अनर्थरूप भेदसे सम्पन्न और समुद्र एवं वनादिके समान सावयव तथा अनेक रस है, ऐसे ब्रह्मका श्रुतिद्वारा ध्येय या ज्ञेयरूपसे उपदेश नहीं किया जाता।
प्रज्ञानघनतां चोपदिशति, “एकधैवानुद्रष्टव्यम्” (बृ०उ० ४।४।२०) इति च अनेकधादर्शनापवादाच्च— “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति” (४।४।१९) इति।इसके सिवा श्रुति उसकी प्रज्ञानघनताका भी उपदेश देती है तथा ऐसा भी कहती है कि “उसे निरन्तर एक प्रकार ही देखना चाहिये।” “जो यहाँ नानावत् देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है”, इस प्रकार अनेकरूप देखनेकी निन्दा की जानेसे भी यही सिद्ध होता है। और

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११७१

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ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११७१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
यच्च श्रुत्या निन्दितं तन्न कर्तव्यम्, यच्च न क्रियते न स शास्त्रार्थः ब्रह्मणोऽनेकरसत्वमनेकधात्वं च द्वैतरूपं निन्दितत्वान्न द्रष्टव्यम्; अतो न शास्त्रार्थः। यत्त्वेकरसत्वं ब्रह्मणः, तद् द्रष्टव्यत्वात् प्रशस्तम्, प्रशस्तत्वाच्च शास्त्रार्थो भवितुमर्हति ।जिसकी श्रुतिने निन्दा की हो वह कर्तव्य नहीं हो सकता तथा जो किया नहीं जाता वह शास्त्रका तात्पर्य नहीं हो सकता । ब्रह्मके द्वैतरूप अनेकरसत्व और नानात्वकी निन्दा की गयी, इसलिये उसे ब्रह्ममें नहीं देखना चाहिये, अतएव वह शास्त्रका तात्पर्य नहीं है । ब्रह्मकी जो एकरसता है, वही द्रष्टव्य होनेके कारण प्रशस्त है और प्रशस्त होनेके कारण वह शास्त्रका तात्पर्य भी हो सकती है ।
यत्तूक्तं वेदैकदेशस्याप्रामाण्यं कर्मविषये द्वैताभावादद्वैते च प्रामाण्यमिति तन्न; यथाप्राप्तोपदेशार्थत्वात् । न हि द्वैतमद्वैतं वा वस्तु जातमात्रमेव पुरुषं ज्ञापयित्वा पश्चात् कर्म वा ब्रह्मविद्यां वोपदिशति शास्त्रम् ।और ऐसा जो कहा कि द्वैतका अभाव होनेके कारण वेदके कर्म-विषयक एक भागकी तो अप्रामाणिकता हो जायगी और अद्वैत-विषयमें प्रामाणिकता होगी, सो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि शास्त्र तो यथाप्राप्त वस्तुका उपदेश करनेके लिये है । जन्म लेते ही किसी पुरुषको द्वैत या अद्वैत-तत्त्वका बोध कराकर फिर उसे कर्म या ब्रह्मविद्याका उपदेश शास्त्र नहीं कर देता ।
न चोपदेशार्हं द्वैतम्; जातमात्रप्राणिबुद्धिगम्यत्वात् । न च द्वैतस्यानृतत्वबुद्धिः प्रथममेवइसके सिवा द्वैत तो उपदेशके योग्य है भी नहीं, क्योंकि वह तो प्रत्येक जन्मधारी जीवकी बुद्धिका विषय है । आरम्भसे ही किसीको द्वैतमें मिथ्यात्वबुद्धि नहीं होती,