BharatKosha
Back to the archive

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

९०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 918Permalink
९०४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| भासकं ज्योतिरन्तरं प्रत्यक्षेण वानुमानेन वोपलभामहे; धीरेव हि चित्स्वरूपावभासकत्वेन स्वाकारा विषयाकारा च; तस्मान्नानुमानतो नापि प्रत्यक्षतो धियोऽवभासकं ज्योतिः शक्यते प्रतिपादयितुं व्यतिरिक्तम् । | तो घटादिके समान प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाणसे भी बुद्धिकी प्रकाशक कोई अन्य ज्योति हमें उपलब्ध नहीं होती; अपि तु चित्स्वरूपसे प्रकाशक होनेके कारण बुद्धि ही बुद्ध्याकार और विषयाकार हो जाती है । अतः बुद्धिकी अवभासक उससे भिन्न कोई अन्य ज्योति न तो अनुमानसे और न प्रत्यक्षसे ही बतलायी जा सकती है। | | यदपि दृष्टान्तरूपमभिहितम्, अवभास्यावभासकयोर्भिन्नयोरेव घटाद्यालोकयोः संयुक्तयोः सादृश्यमिति—तत्राभ्युपगममात्रमस्माभिरुक्तम्; न तत्र घटाद्यवभास्यावभासकौ भिन्नौ; परमार्थतस्तु घटादिरेवावभासात्मकः सालोकः; अन्योऽन्यो हि घटादिरुत्पद्यते; विज्ञानमात्रमेव सालोकघटादिविषयाकारमवभासते; यदैवम्, तदा न बाह्यो दृष्टान्तोऽस्ति, विज्ञानलक्षणमात्रत्वात् सर्वस्य । | इसके सिवा [स्वरूपतः] भिन्न किंतु परस्पर मिले हुए अवभास्य घटादि और अवभासक आलोकका जो दृष्टान्तरूपसे सादृश्य बतलाया गया है, उसे भी हमने एक प्रकारकी मान्यतामात्र कहा है; किंतु वहाँ घटादि अवभास्य और उनका अवभासक भिन्न नहीं हैं; वास्तवमें तो आलोकके सहित घटादि ही अवभासस्वरूप हैं । अन्य-अन्य घटादि उत्पन्न होते रहते हैं, केवल विज्ञान ही आलोकसहित घटादिरूप विषयके आकारमें भासित होता रहता है । जब कि ऐसी बात है, तो वस्तुतः कोई बाह्य दृष्टान्त नहीं है, क्योंकि सब कुछ विज्ञानस्वरूपमात्र ही है।¹ |


१. यहाँतक विज्ञानवादी बौद्धोंका मत कहा गया, इससे आगे इस मतका अनुवाद करते हुए शून्यवादी बौद्धोंका मत बतलाते हैं ।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०५

Page 919Permalink

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०५


| शून्यवादिमतानुवादः एवं तस्यैव विज्ञानस्य ग्राह्यग्राहकाकारतामलं परिकल्प्य, तस्यैव पुनर्विशुद्धिं परिकल्पयन्ति; तद्ग्राह्यग्राहकविनिर्मुक्तं विज्ञानं स्वच्छीभूतं क्षणिकं व्यवतिष्ठत इति केचित् । तस्यापि शान्तिं केचिदिच्छन्ति; तदपि विज्ञानं संवृतं ग्राह्यग्राहकांशविनिर्मुक्तं शून्यमेव घटादिबाह्यवस्तुवदित्यपरे माध्यमिका आचक्षते । | सिद्धान्ती— इस प्रकार उस विज्ञानकी ही ग्राह्य-ग्राहकाकारताकी पूर्णतया कल्पना कर फिर उसीकी अत्यन्त शुद्धिकी कल्पना करते हैं; वह ग्राह्य-ग्राहकभावसे रहित विज्ञान स्वच्छ और क्षणिकरूपसे स्थित है—ऐसा किन्हीं-किन्हींका मत है। कोई तो उस क्षणिक विज्ञानकी भी शान्ति करना चाहते हैं; अविद्यासे आच्छादित वह विज्ञान भी घटादि बाह्य वस्तुओंके समान ग्राह्य-ग्राहकांशसे रहित शून्यमात्र ही है—ऐसा दूसरे माध्यमिक बौद्ध कहते हैं। | | तन्निरासः सर्वा एताः कल्पना बुद्धिविज्ञानावभासकस्य व्यतिरिक्तस्यात्मज्योतिषोऽपह्नवादस्य श्रेयोमार्गस्य प्रतिपक्षभूतावैदिकस्य । तत्र येषां बाह्योऽर्थोऽस्ति, तान् प्रत्युच्यते— | ये सारी कल्पनाएँ बुद्धिरूप विज्ञानके अवभासक एवं उससे व्यतिरिक्त आत्मज्योतिका त्याग करनेवाली होनेसे इस वैदिक कल्याणमार्गकी विघ्नरूपा हैं। अब जिनके मतमें घटादि बाह्य पदार्थकी सत्ता है, उनसे कहा जाता है— | | न तावत् स्वात्मावभासकत्वं घटादेः, तमस्यवस्थितो घटादिस्तावन्न कदाचिदपि स्वात्मनावभास्यते; प्रदीपाद्यालोकसंयोगेन तु नियमेनैवावभास्यमानो दृष्टः सालोको घट इति; संश्लिष्टयोरपि घटालोकयोरन्य- | घटादि स्वयं ही अपने प्रकाशक हों—ऐसी बात तो है नहीं; अँधेरेमें रखे हुए घटादि तो कभी अपने-आप प्रकाशित होते ही नहीं; हाँ, दीपकादिके प्रकाशसे संयोग होनेपर तो 'यह घट प्रकाशयुक्त है' इस प्रकार उसका नियमसे प्रकाशित होना देखा जाता है; मिले हुए घट और प्रकाश भी एक-दूसरे- |

९०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

Page 920Permalink
९०६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४
संस्कृतहिन्दी
त्वमेव; पुनः पुनः संश्लेषे विश्लेषे च विशेषदर्शनाद्रज्जुघटयोरिव । अन्यत्वे च व्यतिरिक्तावभासकत्वम्; न स्वात्मनैव स्वात्मानमवभासयति ।से हैं भिन्न ही; क्योंकि रस्सी और घटके समान उनका पुनः-पुनः संयोग और वियोग होनेपर उनमें विशेषता दिखायी देती है। इस प्रकार यदि उनका भेद है तो प्रकाश्य पदार्थोंका कोई अन्य प्रकाशक है—यह भी सिद्ध हो जाता है; वे स्वयं ही अपनेको प्रकाशित नहीं करते।
(विज्ञानस्य स्वयंप्रकाशत्वे प्रदीपदृष्टान्तोपन्यासः)<br>ननु प्रदीपः स्वात्मानमेवावभासयन् दृष्ट इति न हि घटादिवत् प्रदीपदर्शनाय प्रकाशान्तरमुपाददते लौकिकाः; तस्मात् प्रदीपः स्वात्मानं प्रकाशयति ।**पूर्व०—**किंतु दीपक तो स्वयं ही अपनेको प्रकाशित करता देखा जाता है; क्योंकि लौकिक पुरुष घटादिके समान दीपकको देखनेके लिये कोई अन्य प्रकाश ग्रहण नहीं करते; इसलिये दीपक स्वयं ही अपनेको प्रकाशित करता है।
(तन्निरासनम्)<br>न, अवभास्यत्वाविशेषात्; यद्यपि प्रदीपोऽन्यस्यावभासकः स्वयमवभासात्मकत्वात्, तथापि व्यतिरिक्तचैतन्यावभास्यत्वं न व्यभिचरति, घटादिवदेव यदा चैवम्, तदा व्यतिरिक्तावभास्यत्वं तावदवश्यम्भावि ।**सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है; क्योंकि प्रकाश्यत्वमें दीपककी घटादिसे समानता है, यद्यपि स्वयं प्रकाशस्वरूप होनेके कारण दीपक दूसरोंका प्रकाशक है, तथापि घटादिके समान ही वह अपनेसे भिन्न चैतन्यद्वारा प्रकाशित होनेकी योग्यताका त्याग नहीं करता; जब कि ऐसी बात है, तो अपनेसे भिन्नसे प्रकाशित होना तो अनिवार्य ही है।
ननु यथा घटश्चैतन्यावभास्यत्वेऽपि व्यतिरिक्तमालोकान्त-**पूर्व०—**किंतु जिस प्रकार चैतन्यसे अवभासित होने योग्य होनेपर भी घटको अपनेसे भिन्न दूसरे आलोककी

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९०७

Page 921Permalink

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९०७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
रमपेक्षते, न त्वेवं प्रदीपोऽन्यमालोकान्तरमपेक्षते; तस्मात् प्रदीपोऽन्यावभास्योऽपि सन्नात्मानं घटं चावभासयति ।अपेक्षा होती है, उस प्रकार दीपकको तो किसी अन्य प्रकाशकी अपेक्षा नहीं होती; अतः अन्यसे अवभासित होनेवाला होनेपर भी दीपक अपनेको और घटको प्रकाशित करता है ।
न, स्वतः परतो वा विशेषाभावात्—यथा चैतन्यावभास्यत्वं घटस्य, तथा प्रदीपस्यापि चैतन्यावभास्यत्वमविशिष्टम् ।सिद्धान्ती—नहीं, उसमें स्वतः अथवा परतः कोई भी विशेषता नहीं है; जिस प्रकार घट चैतन्यसे अवभासित होनेवाला है, उसी प्रकार उसके समान ही दीपक भी चैतन्यसे अवभासित होनेवाला है ।
यत्तूच्यते, प्रदीप आत्मानं घटं चावभासयतीति, तदसत्; कस्मात् ? यदा आत्मानं नावभासयति, तदा कीदृशः स्यात् ? न हि तदा प्रदीपस्य स्वतो वा परतो वा विशेषः कश्चिदुपलभ्यते; स ह्यवभास्यो भवति, यस्यावभासकसंनिधावसंनिधौ च विशेष उपलभ्यते; न हि प्रदीपस्य स्वात्मसन्निधिरसन्निधिर्वा शक्यः कल्पयितुम्; असति च कादा-तथा ऐसा जो कहा जाता है कि दीपक अपनेको और घटको भी प्रकाशित करता है; सो यह भी ठीक नहीं है; क्यों नहीं है ? सो बतलाते हैं—जिस समय दीपक अपनेको प्रकाशित नहीं करता, उस समय वह कैसा रहता है ? उस अवस्था में तो दीपकका अपनेसे अथवा अन्यसे कोई भी अन्तर नहीं देखा जाता; अवभास्य तो वही होता है, जिसमें अवभासककी सन्निधि अथवा असन्निधि होनेपर कोई अन्तर देखा जाय । किंतु दीपककी अपनेसे ही सन्निधि अथवा असन्निधि होनेकी कल्पना नहीं की जा सकती; अतः इस प्रकार कभी-कभी [ सन्निधि अथवा असन्निधिके कारण ] होनेवाले अन्तर-

| ९०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |

Page 922Permalink
९०८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| चित्के विशेषे, आत्मानं प्रदीपः प्रकाशयतीति मृषैवोच्यते । | के न होनेपर 'दीपक अपनेको प्रकाशित करता है' ऐसा मिथ्या ही कहा जाता है । | | चैतन्यग्राह्यत्वं तु घटादिभिरविशिष्टं प्रदीपस्य; तस्माद् विज्ञानस्यात्मग्राह्यग्राहकत्वे न प्रदीपो दृष्टान्तः । चैतन्यग्राह्यत्वं च विज्ञानस्य बाह्यविषयैरविशिष्टम् । | दीपकका चैतन्यग्राह्य होना तो घटादिके समान ही है; अतः विज्ञानके अपने ही ग्राह्य और ग्राहक होनेमें दीपक दृष्टान्त नहीं हो सकता । हां, विज्ञानका चैतन्य ग्राह्य होना तो बाह्य विषयोंके समान ही है । | | चैतन्यग्राह्यत्वे च विज्ञानस्य, किं ग्राह्यविज्ञानग्राह्यतैव, किं वा ग्राहकविज्ञानग्राह्यतेति तत्र सन्दिह्यमाने वस्तुनि, योऽन्यत्र दृष्टो न्यायः स कल्पयितुं युक्तो न तु दृष्टविपरीत:; तथा च सति यथा व्यतिरिक्तेनैव ग्राहकेण बाह्यानां प्रदीपानां ग्राह्यत्वं दृष्टम् तथा विज्ञानस्यापि चैतन्यग्राह्यत्वात् प्रकाशकत्वे सत्यपि प्रदीपवद् व्यतिरिक्तचैतन्यग्राह्यत्वं युक्तं कल्पयितुम्, न त्वनन्यग्राह्यत्वम्; यश्चान्यो विज्ञानस्य ग्रहीता, स | विज्ञानकी चैतन्यग्राह्यता सिद्ध होनेपर भी क्या ग्राह्य (विषय-विषयक) विज्ञानकी ग्राह्यता है अथवा ग्राहक (विषयिविषयक) विज्ञानकी ? इस प्रकार वस्तुके विषयमें संदेह होनेपर जो न्याय अन्य पदार्थोंके विषयमें देखा गया है, उसीकी यहाँ भी कल्पना करनी चाहिये, दृष्टन्यायसे विपरीत कल्पना करनी उचित नहीं है; ऐसी स्थितिमें, जिस प्रकार अपनेसे व्यतिरिक्त ग्राहकके द्वारा बाह्य प्रदीपोंकी ग्राह्यता देखी गयी है, उसी प्रकार विज्ञानकी भो चैतन्यग्राह्यता होनेके कारण, प्रकाशक होनेपर भी दीपकके समान अपनेसे भिन्न चैतन्यद्वारा ही ग्राह्यता कल्पना करनी चाहिये, उसकी अनन्यग्राह्यता (विज्ञानग्राह्यता) माननी उचित नहीं है, इस प्रकार जो विज्ञानका ग्रहीता |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९०९

Page 923Permalink

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९०९


संस्कृतहिन्दी
आत्मा ज्योतिरन्तरं विज्ञानात् ।है, वह आत्मा विज्ञानसे भिन्न ज्योति है।
तदानवस्थेति चेन्न, ग्राह्यत्वमात्रं हि तद्ग्राहकस्य वस्त्वन्तरत्वे लिङ्गमुक्तं न्यायतः; न त्वेकान्ततो ग्राहकत्वे तद्ग्राहकान्तरास्तित्वे वा कदाचिदपि लिङ्गं सम्भवति; तस्मान्न तदनवस्थाप्रसङ्गः ।यदि कहो कि तब तो अनवस्था हो जायगी, तो ऐसी बात नहीं है। किसी वस्तुका ग्राह्य होना ही उसके ग्राहकके अन्य पदार्थ होनेमें न्यायतः लिङ्ग कहा गया है; किंतु उस आत्माके अव्यभिचारी ग्राहकत्व और उसके किसी अन्यग्राहकके अस्तित्वमें कभी कोई लिङ्ग होना सम्भव नहीं है, इसलिये उस अनवस्थाका प्रसङ्ग नहीं हो सकता।
विज्ञानस्य व्यतिरिक्तग्राह्यत्वे करणान्तरापेक्षायामनवस्थेति चेन्न, नियमाभावात्—न हि सर्वत्रायं नियमो भवति; यत्र वस्त्वन्तरेण गृह्यते वस्त्वन्तरम्, तत्र ग्राह्यग्राहकव्यतिरिक्तं करणान्तरं स्यादिति नैकान्तेन नियन्तुं शक्यते, वैचित्र्यदर्शनात्;यदि कहो कि विज्ञानको किसी अन्यसे ग्राह्य माननेपर इन्द्रियान्तरकी अपेक्षा होनेके कारण अनवस्था होगी तो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि ऐसा नियम नहीं है—सर्वत्र यही नियम नहीं होता, जहां किसी अन्य वस्तुसे कोई अन्य वस्तु ग्रहण की जाती है, वहां ग्राह्य और ग्राहकसे भिन्न कोई अन्य इन्द्रिय भी होनी चाहिये—ऐसा कोई अनिवार्य नियम नहीं किया जा सकता; क्योंकि इसमें विचित्रता
कथम् ? घटस्तावत् स्वात्मव्यतिरिक्तेनात्मना गृह्यते; तत्र प्रदीपादिरालोको ग्राह्यग्राहकव्यतिरिक्तं करणम्, न हि प्रदीपाद्यालोकोदेखी जाती है; किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] घट अपनेसे भिन्न आत्माके द्वारा गृहीत होता ही है; वहां ग्राह्य और ग्राहकसे भिन्न प्रदीपादि प्रकाश उसका करण है; क्योंकि प्रदीपादिका

९१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 924Permalink
९१०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत मूल / भाष्यहिन्दी अनुवाद
घटांशश्चक्षूरंशो वा; घटवच्चक्षुर्ग्राह्यत्वेऽपि प्रदीपस्य, चक्षुःप्रदीपव्यतिरेकेण न बाह्यालोकस्थानीयं किञ्चित् करणान्तरमपेक्षते। तस्मान्नैव नियन्तुं शक्यते—यत्र यत्र व्यतिरिक्तग्राह्यत्वं तत्र तत्र करणान्तरं स्यादेवेति। तस्माद् विज्ञानस्य व्यतिरिक्तग्राहकग्राह्यत्वे न करणद्वारानवस्था, नापि ग्राहकत्वद्वारा कदाचिदप्युपपादयितुं शक्यते; तस्मात् सिद्धं विज्ञानव्यतिरिक्तमात्मज्योतिरन्तरमिति।आलोक न घटका अंश है और न नेत्रका ही; किंतु दीपक घटके समान नेत्रसे ग्राह्य होनेपर भी नेत्र और दीपकसे व्यतिरिक्त बाह्य प्रकाशस्थानीय किसी अन्य करणकी अपेक्षा नहीं करता। इसलिये ऐसा नियम नहीं किया जा सकता कि जहाँ-जहाँ अपनेसे भिन्न वस्तुद्वारा ग्राह्यता होती है, वहाँ-वहाँ कोई अन्य करण होना ही चाहिये। अतः विज्ञानकी व्यतिरिक्तग्राहकग्राह्यता होनेपर भी न तो करणके कारण और न ग्राहकत्वके द्वारा ही कभी अनवस्था सिद्ध की जा सकती है; अतः विज्ञानसे पृथक् आत्मज्योति दूसरी ही है—यह सिद्ध हुआ।
(विज्ञानातिरिक्तग्राह्यग्राहकस्यासत्त्वोपपादनं तन्निरासश्च)<br><br>ननु नास्त्येव बाह्योऽर्थो घटादिः प्रदीपो वा विज्ञानव्यतिरिक्तः, यद्धि यद्व्यतिरेकेण नोपलभ्यते, तत्तन्मात्रं वस्तु दृष्टम्—यथा स्वप्नविज्ञानग्राह्यं घटपटादिवस्तु स्वप्नविज्ञानव्यतिरेकेणानुपलम्भात् स्वप्नघटप्रदीपादेः स्वप्नविज्ञानमात्रतावगम्यते, तथा जागरितेऽपि घटप्रदीपादेर्जाग्रद्विज्ञानव्यतिरेकेणानुपलम्भाज्जाग्रद्विज्ञानमात्रतैवविज्ञानवादी— किंतु घटादि अथवा दीपक आदि कोई बाह्य पदार्थ विज्ञानसे व्यतिरिक्त तो है ही नहीं, जो वस्तु जिसके बिना उपलब्ध नहीं होती, वह तत्स्वरूप ही देखी गयी है—जिस प्रकार स्वप्नविज्ञानसे गृहीत होनेवाली घट-पटादि वस्तु स्वप्नविज्ञानसे अलग उपलब्ध न होनेके कारण स्वप्नदृष्ट घट-प्रदीपादिकी स्वप्नविज्ञानमात्रता ज्ञात होती है; इसी प्रकार जागरित-अवस्थामें भी घट एवं प्रदीपादिकी जाग्रद्विज्ञानके सिवा उपलब्धि न होनेके कारण जाग्रद्विज्ञान-

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९११

Page 925Permalink

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९११


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
युक्ता भवितुम् । तस्मान्नास्ति बाह्योऽर्थो घटप्रदीपादिः, विज्ञानमात्रमेव तु सर्वम्; तत्र यदुक्तम्—विज्ञानस्य व्यतिरिक्तावभास्यत्वाद् विज्ञानव्यतिरिक्तमस्ति ज्योतिरन्तरं घटादेरिवेति, तन्मिथ्या, सर्वस्य विज्ञानमात्रत्वे दृष्टान्ताभावात् ।मात्रता ही होनी उचित है अतः घट एवं प्रदीपादि बाह्य पदार्थ हैं ही नहीं, सब कुछ विज्ञानमात्र ही है; ऐसी स्थितिमें जो यह कहा गया कि घटादिके समान विज्ञान भी अपनेसे भिन्न साक्षीद्वारा भाष्य है, इसलिये उससे व्यतिरिक्त कोई अन्य ज्योति है, सो यह ठीक नहीं, क्योंकि जब सभी विज्ञानमात्र है, तो [उससे भिन्न कोई अन्य ज्योति है; इसमें] कोई दृष्टान्त नहीं हो सकता।
न, यावत्तावदभ्युपगमात्— <br><br> न तु बाह्योऽर्थो भवता एकान्तेनैव नाभ्युपगम्यते;सिद्धान्ती—ऐसी बात मत कहो, जहांतक तुम बाह्यार्थकी सत्ता स्वीकार करते हो वहाँतक तो है ही। तुम सर्वथा ही बाह्यार्थ न मानते हो—ऐसी बात तो है नहीं।
ननु मया नाभ्युपगम्यत एव ।विज्ञान०—हां, मैं तो नहीं ही मानता।
न, विज्ञानं घटः प्रदीप इति च शब्दार्थपृथक्त्वाद् यावत्, तावदपि बाह्यमर्थान्तरमवश्यमभ्युपगन्तव्यम् । विज्ञानादर्थान्तरं वस्तु न चेदभ्युपगम्यते, विज्ञानं घटः पट इत्येवमादीनां शब्दानामेकार्थत्वे पर्यायशब्दत्वं प्राप्नोति ।सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि 'विज्ञान, घट, प्रदीप' इत्यादि शब्द और इनके अर्थ पृथक् हैं, जबतक ऐसा है, तबतक भी तुम्हें बाह्य अर्थान्तर अवश्य स्वीकार करना होगा । यदि विज्ञानसे भिन्न कोई अन्य पदार्थ नहीं माना जायगा तो विज्ञान, घट, पट इत्यादि शब्दोंका एक (विज्ञान-मात्र) ही अर्थ माननेपर इनका पर्याय शब्द होना सिद्ध होगा।

| ९१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |

Page 926Permalink
९१२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| तथा साधनानां फलस्य चैकत्वे, साध्यसाधनभेदोपदेशशास्त्रानर्थक्यप्रसङ्गः; तत्कर्तुरज्ञानप्रसङ्गो वा। | इस प्रकार साधन और फलकी भी एकता होनेपर तो साध्य-साधनरूप भेदका उपदेश करनेवाले शास्त्रकी व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, तथा उनके रचयिताओंके भी अज्ञानका प्रसङ्ग होगा ! | | किञ्चान्यत्—विज्ञानव्यतिरेकेण वादिप्रतिवादिवाददोषाभ्युपगमात्; न ह्यात्मविज्ञानमात्रमेव वादिप्रतिवादिवादस्तद्दोषो वाभ्युपगम्यते, निराकर्तव्यत्वात् प्रतिवाद्यादीनाम्; न ह्यात्मीयं विज्ञानं निराकर्तव्यमभ्युपगम्यते, स्वयं वा आत्मा कस्यचित्; तथा च सति सर्वसंव्यवहारलोपप्रसङ्गः। | इसके सिवा दूसरी बात यह है कि वादी-प्रतिवादीके वाद और दोष ये विज्ञानसे व्यतिरिक्त ही स्वीकार किये जाते हैं; वादी और प्रतिवादीके वाद अथवा दोष—आत्मविज्ञानमात्र ही नहीं स्वीकार किये जाते; क्योंकि प्रतिवादी आदिके लिये इनका निराकरण करना आवश्यक होता है; किंतु किसीके भी लिये अपना विज्ञान अथवा स्वयं आत्मा ही निराकरणके योग्य नहीं होता, यदि ऐसा हो तब तो सब प्रकारके सम्यक् व्यवहारके लोपका ही प्रसङ्ग उपस्थित हो जाय। | | न च प्रतिवाद्यादयः स्वात्मनैव गृह्यन्त इत्यभ्युपगमः; व्यतिरिक्तग्राह्या हि तेऽभ्युपगम्यन्ते। तस्मात् तद्वत् सर्वमेव व्यतिरिक्तग्राह्यं वस्तु जाग्रद्विषयत्वात्, | प्रतिवादी आदि विज्ञानरूप आत्मासे ही ग्रहण किये जाते हैं—ऐसा विज्ञानवादीको स्वीकार भी नहीं है; वे अपनेसे भिन्न वादी आदिके द्वारा ही ग्रहण किये जाते हैं—ऐसी मान्यता है। अतः उन्हींके समान सब वस्तुएँ अपनेसे भिन्न ग्राहकद्वारा ही ग्राह्य हैं, क्योंकि वे जाग्रत्के विषय हैं, |

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९१३

Page 927Permalink

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९१३

| जाग्रद्वस्तु प्रतिवाद्यादिवदिति सुलभो दृष्टान्तः; सन्तत्यन्तरवद् विज्ञानान्तरवच्चेति । तस्माद् विज्ञानवादिनापि न शक्यं विज्ञानव्यतिरिक्तं ज्योतिरन्तरं निराकर्तुम् । <br><br> स्वप्ने विज्ञानव्यतिरेकाभावाद्युक्तमिति चेन्न, अभावादपि भावस्य वस्त्वन्तरत्वोपपत्तेः भवतैव तावत् स्वप्ने घटादिविज्ञानस्य भावभूतत्वमभ्युपगतम्; तदभ्युपगम्य तद्व्यतिरेकेण घटाद्यभाव उच्यते, स विज्ञानविषयो घटादिर्यद्यभावो यदि वा भावः स्यात्, उभयथापि घटादिविज्ञानस्य भावभूतत्वमभ्युपगतमेव; न तु तन्निवर्तयितुं शक्यते, तन्निवर्तकन्यायाभावात्। | जाग्रत्-कालकी वस्तु प्रतिवादी आदिके समान, इस प्रकार यह [प्रतिज्ञा और हेतुसहित] दृष्टान्त सुलभ है; इसके सिवा दूसरी संतान तथा दूसरे विज्ञानके समान भी वे वस्तुएँ अपनेसे भिन्न ग्राहकद्वारा ग्रहण करने योग्य हैं।¹ अतः विज्ञानवादी भी विज्ञानसे पृथक् अन्य ज्योतिका निराकरण करनेमें समर्थ नहीं है। <br><br> यदि कहो कि स्वप्नमें तो विज्ञानके सिवा दूसरी वस्तुका अभाव है तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि अभावसे भी भावका भिन्न वस्तु होना तो सिद्ध होता ही है—स्वप्नमें घटादि विज्ञानकी भावस्वरूपता तो आप भी स्वीकार करते ही हैं, वैसा मानकर ही उससे भिन्न घटादिका अभाव बतलाया जाता है, उस विज्ञानका विषय घटादि अभाव हो अथवा भाव, दोनों ही प्रकार घटादि विज्ञानकी भावरूपता तो मान ही ली गयी, उसका तो निराकरण किया नहीं जा सकता; क्योंकि उसकी निवृत्ति करनेवाली |


१. जिस प्रकार व्यवहारमें रामकी संतानसे श्यामकी संतानका तथा असर्वज्ञोंके ज्ञानसे सर्वज्ञके ज्ञानका अनुमान होता है, उसी प्रकार नीलादि पदार्थ और उनके विज्ञानके भेदसे विज्ञान और उनके प्रकाशक आत्मज्योतिके भेदका भी अनुमान किया जा सकता है; अतः विज्ञानवादियोंका मत ठीक नहीं है।

बृ० उ० ५८—

९१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 928Permalink
९१४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| एतेन सर्वस्य शून्यता प्रत्युक्ता । | कोई युक्ति नहीं है। इससे सबकी शून्यताका निराकरण हो गया । | | प्रत्यगात्मग्राह्यता चात्मनोऽहमिति मीमांसकपक्षः प्रत्युक्तः । | तथा आत्मा 'अहम्' इस प्रकार प्रत्यगात्माद्वारा ग्राह्य है—ऐसा मीमांसकोंके पक्षका भी खण्डन हो गया ।^१ | | यत्तूक्तम्, सालोकोऽन्यश्चान्यश्च घटो जायत इति, तदसत्, क्षणान्तरेऽपि स एवायं घट इति प्रत्यभिज्ञानात्; सादृश्यात् प्रत्यभिज्ञानं कृत्तोत्थितकेशनखादिष्विवेति चेन्न, तत्रापि क्षणिकत्वस्यासिद्धत्वात्, जात्येकत्वाच्च । | ऐसा जो कहा कि प्रकाशसहित दूसरा-दूसरा घट उत्पन्न होता रहता है, यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि दूसरे क्षणमें भी 'यह वही घट है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है; यदि कहो कि काट देनेपर पुनः बढ़े हुए केश और नखादिके समान उन घटोंमें समानता होनेके कारण ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है तो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि वहाँ भी उनकी क्षणिकता सिद्ध नहीं की जा सकती; इसके सिवा उन केश और नखादिकी एक ही जाति होनेके कारण भी ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है। | | कृतेषु पुनरुत्थितेषु च केशनखादिषु केशनखत्वजातेरेकत्वात् केशनखत्वप्रत्ययस्तन्निमित्तोऽभ्रान्त एव । न हि दृश्यमानलूनोत्थितकेशनखादिषु व्यक्तिनिमित्तः स | काटे हुए और पुनः बढ़े हुए केश और नखादिकी केशत्व और नखत्वरूपसे एक ही जाति होनेके कारण उससे होनेवाली केशत्व और नखत्वकी प्रतीति अभ्रान्त ही है। साक्षात् काटे और बढ़े हुए केश एवं नखादिमें 'यह वही है' ऐसी प्रतीति व्यक्ति- |


१. क्योंकि एक ही आत्माका ग्राह्य और ग्राहक उभयरूप होना सम्भव नहीं है।

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९१५ |

Page 929Permalink
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९१५
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
एवेति प्रत्ययो भवति; कस्यचिद् दीर्घकालव्यवहितदृष्टेषु च तुल्यपरिमाणेषु, तत्कालीनवालादितुल्या इमे केशनखाद्या इतिप्रत्ययो भवति, न तु त एवेति; घटादिषु पुनर्भवति स एवेति प्रत्ययः; तस्मान्न समो दृष्टान्तः।के लिये (एक-एक नख या केशके लिये) नहीं होती। किसी-किसीको दीर्घकालके पश्चात् देखे हुए समान परिमाणवाले केश-नखादिमें तो ये केश और नखादि उस समयके केश-नखादिके समान हैं—ऐसा प्रत्यय होता है, परंतु 'ये वही हैं' ऐसा नहीं होता; किंतु घटादिमें तो 'यह वही है' ऐसा प्रत्यय होता है; इसलिये यह (कटकर बढ़े हुए केश आदिका) दृष्टान्त ठीक नहीं है।
प्रत्यक्षेण हि प्रत्यभिज्ञायमाने वस्तुनि तदेवेति, न चान्यत्वमनुमातुं युक्तम्, प्रत्यक्षविरोधे लिङ्गस्याभासत्वोपपत्तेः; सादृश्यप्रत्ययानुपपत्तेश्च, ज्ञानस्य क्षणिकत्वात्; एकस्य हि वस्तुदर्शिनो वस्त्वन्तरदर्शने सादृश्यप्रत्ययः स्यात्; न तु वस्तुदर्शी एको वस्त्वन्तरदर्शनाय क्षणान्तरमवतिष्ठते; विज्ञानस्य क्षणिकत्वात् सकृद्वस्तुदर्शनेनैव क्षयोपपत्तेः।यदि किसी वस्तुके विषयमें प्रत्यक्षतया ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है कि यह वही है तो उसके अन्य होनेका अनुमान करना उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षसे विरोध होनेपर लिङ्गका आभासत्व सिद्ध होगा; तथा ज्ञान क्षणिक है, इसलिये सदृशताका भान होना भी सम्भव नहीं है। एक ही वस्तुदर्शीको किसी दूसरी वस्तुके देखनेपर सादृश्यप्रत्यय हो सकता है; और [तुम्हारे सिद्धान्तानुसार] एक वस्तुदर्शी दूसरी वस्तुको देखनेके लिये दूसरे क्षणमें रहता नहीं है; क्योंकि विज्ञान क्षणिक होनेके कारण उसका एक बार वस्तु देखनेसे ही क्षय होना सिद्ध हो जाता

९१६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

Page 930Permalink

९१६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४


संस्कृतहिन्दी
तेनेदं सदृशमिति हि सादृश्यप्रत्ययो भवति; तेनेति दृष्टस्मरणम्, इदमिति वर्तमानप्रत्ययः; तेनेति दृष्टं स्मृत्वा, यावदिदमिति वर्तमानक्षणकालमवतिष्ठेत, ततः क्षणिकवादहानिः; अथ तेनेत्येवोपक्षीणः स्मार्तः प्रत्ययः, इदमिति चान्य एव वार्तमानिकः प्रत्ययः क्षीयते, ततः सादृश्यप्रत्ययानुपपत्तिस्तेनेदं सदृशमिति अनेकदर्शिन एकस्याभावात्; <br><br> व्यपदेशानुपपत्तिश्च—द्रष्टव्यदर्शनेनैवोपक्षयाद् विज्ञानस्येदं पश्याम्यदोऽद्राक्षमिति व्यपदेशानुपपत्तिः, दृष्टवतो व्यपदेशक्षणानवस्थानात्; अथावतिष्ठेत, क्षणिकवादहानिः; अथादृष्टवतो व्यपदेशः सादृश्यप्रत्ययश्च, तदानीं जात्यन्धस्येव रूपविशेषव्यपदेश-है, यह उसके समान है' ऐसा सादृश्यप्रत्यय हुआ करता है, 'उसके' यह पहले देखे हुएका स्मरण है और 'यह' इस पदसे वर्तमानकी प्रतीति होती है; यदि 'तेन' इस प्रकार पहले देखे हुएको स्मरण रखकर देखनेवाला 'इदम्' ऐसे अनुभवपर्यन्त वर्तमान क्षणकालतक रहेगा तो क्षणिकवादकी हानि होगी; और यदि 'तेन' इतनेहीसे स्मृतिज्ञान क्षीण हो गया और 'इदम्' ऐसा दूसरा ही वार्तमानिक ज्ञान क्षीण होता है तो ऐसी अवस्थामें सादृश्यज्ञान होना सम्भव नहीं है, 'क्योंकि यह उसके समान है' इस प्रकार [ इस और उस ] अनेक वस्तुओंको देखनेवाला कोई एक नहीं है। <br><br> [ विज्ञानकी क्षणिकता माननेपर ] व्यवहारकी भी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि विज्ञान तो द्रष्टव्यको देखकर ही क्षीण हो जाता है। 'मैं यह देखता हूँ' 'मैंने इसे देखा' ऐसा व्यवहार सम्भव नहीं है, क्योंकि जो देखनेवाला है, वह ऐसा कहनेके क्षणमें नहीं रहता; यदि मानें कि रहता है तो क्षणिकवादकी हानि होती है; यदि वह कथन न देखनेवालेका है और कहो कि उसीको सादृश्यप्रत्यय होता है तो उस अवस्थामें वह जन्मान्धके

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९१७ |

Page 931Permalink

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९१७ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
स्तत्साहश्यप्रत्ययश्च; सर्वमन्धपरम्परेति प्रसज्येत सर्वज्ञशास्त्रप्रणयनादि; न चैतदिष्यते; अकृताभ्यागमकृतविप्रणाशदोषौ तु प्रसिद्धतरौ क्षणवादे ।रूप-विशेषकथन और उसीका सादृश्यज्ञान होगा; तब तो सर्वज्ञ बुद्धके शास्त्रप्रणयनादि सब-के-सब अन्धपरम्परा ही हैं—ऐसा कहनेका प्रसंग होगा और यह बात इष्ट नहीं है; इस क्षणिकवादमें बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएका नाश—ये दो दोष तो अत्यन्त प्रसिद्ध हैं।
दृष्टव्यपदेशहेतुः पूर्वोत्तरसहित एक एव हि शृङ्खलावत् प्रत्ययो जायत इति चेत्, 'तेनेदं सदृशम्' इति च; न वर्तमानातीतयोर्भिन्नकालत्वात्—तत्र वर्तमानप्रत्यय एकः शृङ्खलावयवस्थानीयः, अतीतश्चापरः, तौ प्रत्ययौ भिन्नकालौ; तदुभयप्रत्ययविषयस्पृक् चेच्छृङ्खलाप्रत्ययः, ततः क्षणद्वयव्यापित्वादेकस्य विज्ञानस्य पुनः क्षणवादहानिः; ममतवतादिविशेषानुपपत्तेश्च सर्वसंव्यवहारलोपप्रसङ्गः ।पूर्वदृष्टके निर्देशका हेतु पूर्वोत्तर प्रत्ययसे युक्त शृङ्खलाके समान एक ही ज्ञान होता है तथा 'उसके समान यह है' ऐसा भी प्रत्यय होता है—यदि यह कहो तो ठीक नहीं, क्योंकि वर्तमान और भूत तो भिन्न काल हैं—उनमें शृङ्खलाका अवयवरूप एक वर्तमान प्रत्यय है और दूसरा अतीत प्रत्यय है। वे दोनों प्रत्यय भिन्नकालिक हैं; यदि वह शृङ्खलाके समान प्रत्यय उन दोनों प्रत्ययोंके विषयोंको स्पर्श करनेवाला है तो एक ही विज्ञानके दो क्षणोंमें व्यापक होनेके कारण पुनः क्षणिकवादकी हानि होती है तथा मेरा-तेरा आदि भेदकी उपपत्ति न होनेके कारण सम्पूर्ण व्यवहारके लोपका प्रसङ्ग उपस्थित होता है।
सर्वस्य च स्वसंवेद्यविज्ञानमात्रत्वे, विज्ञानस्य च स्वच्छावबो-सब स्वसंवेद्य विज्ञानमात्र होनेपर तथा विज्ञानको स्वच्छ ज्ञानप्रकाश-

९१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 932Permalink
९१८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| धावभासमात्रस्वाभाव्याभ्युपगमात्, तद्दर्शिनश्चान्यस्याभावे, अनित्यदुःखशून्यानात्मत्वाद्यनेकरूपकल्पनानुपपत्तिः। न च दाडिमादेशिव विरुद्धानेकांशवत्त्वं विज्ञानस्य, स्वच्छावभासस्वाभाव्याद् ज्ञानस्य। अनित्यदुःखादीनां विज्ञानांशत्वे च सति—अनुभूयमानत्वाद् व्यतिरिक्तविषयत्वप्रसङ्गः।<br><br>अथ अनित्यदुःखाद्यात्मकत्वमेव विज्ञानस्य, तदा तद्वियोगाद् विशुद्धिकल्पनानुपपत्तिः; संयोगिमलवियोगाद्धि विशुद्धिर्भवति, यथा आदर्शप्रभृतीनाम्; न तु स्वाभाविकेन धर्मेण कस्यचिद् वियोगो दृष्टः; न ह्यग्नेः स्वाभाविकेन प्रकाशेन औष्ण्येन वा वियोगो | स्वरूप माननेपर यदि उसके साक्षी किसी अन्य पदार्थकी सत्ता नहीं मानी जायगी तो उसमें अनित्यत्व, दुःखत्व, शून्यत्व और अनात्मत्व आदि अनेकों कल्पनाओंकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी। अनार आदिके समान विज्ञान बहुत-से विरुद्ध अंशोंसे युक्त हो—ऐसी बात भी है नहीं, क्योंकि विज्ञान तो स्वच्छ प्रकाशस्वरूप है। यदि अनित्य दुःखादिको विज्ञानका अंश माना जाय तो अनुभूत होनेवाले होनेके कारण उन्हें किसी दूसरेका विषय माननेका प्रसङ्ग होगा।<sup></sup><br><br>और यदि विज्ञानको अनित्य दुःखादिरूप ही माना जाय तो उनकी निवृत्तिद्वारा उसकी विशुद्धिकी कल्पना करनी सम्भव नहीं है, क्योंकि विशुद्धि तो लगे हुए मलको दूर करनेसे ही होती है, जैसे कि दर्पणादिकी; किंतु अपने स्वाभाविक धर्मसे किसीका भी वियोग होता नहीं देखा जाता; अग्निका अपने स्वाभाविक प्रकाश अथवा उष्णतासे वियोग |


१. क्योंकि विज्ञान ही अनुभव करनेवाला और अनित्यत्वादि विज्ञानके अंश ही उसके अनुभवके विषय हों—यह सम्भव नहीं है। कारण प्रमेय और प्रमाणका अंशांशिभाव अथवा धर्म-धर्मिभाव किसी भी प्रकार नहीं हो सकता, वे अवश्य पृथक्-पृथक् ही होने चाहिये।

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ९१९ |

Page 933Permalink
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थे९१९
संस्कृत-मूलम्हिन्दी-अनुवाद
दृष्टः; यदपि पुष्पगुणानां रक्तत्वादीनां द्रव्यान्तरयोगेन वियोजनं दृश्यते, तत्रापि संयोगपूर्वत्वमनुमीयते—बीजभावनया पुष्पफलादीनां गुणान्तरोत्पत्तिदर्शनात्; अतो विज्ञानस्य विशुद्धिकल्पनानुपपत्तिः ।होता कभी नहीं देखा गया; पुष्पके गुण लालिमादिका जो अन्य द्रव्योंके योगसे वियोग होता देखा जाता है, वहाँ भी उनकी संयोगपूर्वताका अनुमान किया जाता है, क्योंकि बीजकी भावनासे (संस्कारसे) पुष्प एवं फलादिमें अन्य गुणोंकी उत्पत्ति होती देखी जाती है; अतः [ अनित्य दुःख आदिको विज्ञानका स्वरूप माननेपर ] विज्ञानके विशुद्ध (दुःखादिरहित) होनेकी कल्पना असम्भव होगी।
विषयविषय्याभासत्वं च यन्मलं परिकल्प्यते विज्ञानस्य, तदप्यन्यसंसर्गाभावानुपपन्नम्; न ह्यविद्यमानेन विद्यमानस्य संसर्गः स्यात्; असति चान्यसंसर्गे यो धर्मो यस्य दृष्टः, स तत्स्वभावत्वान्न तेन वियोगमर्हति—यथाग्नेरौष्ण्यम्, सवितुर्वा प्रभा; तस्मादनित्यसंसर्गेण मलिनत्वं तद्विशु-विज्ञानके विषय और विषयीरूपसे प्रकाशित होनारूप जिस मलकी कल्पना की जाती है, वह भी दूसरेका संसर्ग न होनेपर सम्भव नहीं है; और जो पदार्थ है ही नहीं, उससे किसी विद्यमान वस्तुका संसर्ग हो नहीं सकता;¹ इस प्रकार यदि किसी दूसरेका संसर्ग नहीं है तो जो जिसका धर्म देखा गया है, वह उसका स्वभाव होनेके कारण उससे वियुक्त नहीं हो सकता; जैसे अग्निकी उष्णता और सूर्यकी प्रभा; अतः अनित्य वस्तुओंके संसर्गसे विज्ञानकी

१. विज्ञानवादीके मतमें विज्ञानसे भिन्न किसी अन्य वस्तुकी सत्ता है ही नहीं, इसलिये विद्यमान वस्तु विज्ञानका किसी भी अविद्यमान पदार्थसे संसर्ग होना सर्वथा असम्भव है।

९२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 934Permalink
९२०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| द्विश्च विज्ञानस्येतीयं कल्पना अन्धपरम्परैव प्रमाणशून्येत्यवगम्यते । | मलिनता और [ उनके वियोगसे ] विशुद्धि होती है—यह कल्पना अन्धपरम्परा ही है तथा इसका कोई प्रमाण भी नहीं है—ऐसा ज्ञात होता है। | | यदपि तस्य विज्ञानस्य निर्वाणं पुरुषार्थं कल्पयन्ति, तत्रापि फलाश्रयानुपपत्तिः; कण्टकविद्धस्य हि कण्टकवेधजनितदुःखनिवृत्तिः फलम्; न तु कण्टकविद्धमरणे तद्दुःखनिवृत्तिफलस्याश्रय उपपद्यते; तद्वत् सर्वनिर्वाणे, असति च फलाश्रये, पुरुषार्थकल्पना व्यर्थैव; यस्य हि पुरुषशब्दवाच्यस्य सत्त्वस्य आत्मनो विज्ञानस्य चार्थः परिकल्प्यते, तस्य पुनः पुरुषस्य निर्वाणे; कस्यार्थः पुरुषार्थ इति स्यात् । | इसके सिवा उस विज्ञानका निर्वाण ही पुरुषार्थ है—ऐसी जो वे कल्पना करते हैं, उसमें भी कोई उस फलका आश्रय होना सम्भव नहीं है; जो कांटेसे बिंधा हुआ है, उसीको कण्टकवेधजनित दुःखकी निवृत्तिरूप फल मिल सकता है; यदि कण्टकविद्ध मर जाय तो वह उस दुःखनिवृत्तिरूप फलका आश्रय नहीं हो सकता; इसी प्रकार सबकी निवृत्ति हो जानेपर कोई फलका आश्रय न रहनेके कारण पुरुषार्थकी कल्पना करना व्यर्थ ही है; क्योंकि जिस 'पुरुष' शब्दवाच्य जीव, आत्मा अथवा विज्ञानका अर्थ कल्पना किया जाता है, उस पुरुषका ही निर्वाण हो जानेपर किसके अर्थको 'पुरुषार्थ' ऐसा कहा जायगा । | | यस्य पुनरस्त्यनेकार्थदर्शी विज्ञानव्यतिरिक्त आत्मा, तस्य दृष्टस्मरणदुःखसंयोगवियोगादि | हां, जिसके मतमें अनेकों अर्थोंका साक्षी विज्ञानसे व्यतिरिक्त कोई आत्मा है, उसके सिद्धान्तानुसार देखे हुएका स्मरण, दुःखके संयोग- |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९२१

Page 935Permalink

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९२१


| सर्वमेवोपपन्नम्, अन्यसंयोगनिमित्तं कालुष्यम्, तद्वियोगनिमित्ता च विशुद्धिरिति । शून्यवादिपक्षस्तु सर्वप्रमाणविप्रतिषिद्ध इति तन्निराकरणाय नादरः क्रियते ॥७॥ | वियोगादि, दूसरेके संयोगके कारण होनेवाली मलिनता और उसके वियोगसे होनेवाली शुद्धि—ये सभी हो सकते हैं। किंतु शून्यवादीका पक्ष तो सभी प्रमाणोंसे विरुद्ध है, अतः उसके निराकरणके लिये और प्रयत्न नहीं किया जाता ॥७॥ |


आत्मा जन्म और मरणके साथ देहेन्द्रियरूप पापको ग्रहण और त्याग करता है

| यथैवैहैकस्मिन् देहे स्वप्नो भूत्वा मृत्यो रूपाणि कार्यकारणान्यतिक्रम्य स्वप्ने स्वे आत्मज्योतिष्यास्ते, एवम्— | जिस प्रकार यहां एक देहमें स्वप्न होकर आत्मा मृत्युके रूप देह और इन्द्रियोंका अतिक्रमण कर स्वप्नमें अपने आत्मज्योतिःस्वरूपमें ही स्थित रहता है, उसी प्रकार— |

स वा अयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसम्पद्यमानः पाप्मभिः सँसृज्यते स उत्क्रामन् म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥ ८ ॥

वह यह पुरुष जन्म लेते समय शरीरको आत्मभावसे प्राप्त होता हुआ पापोंसे (देह और इन्द्रियोंसे) संश्लिष्ट हो जाता है तथा मरते समय—उत्क्रमण करते समय पापोंको त्याग देता है ॥ ८ ॥

| स वै प्रकृतः पुरुषोऽयं जायमानः—कथं जायमानः? इत्युच्यते— शरीरं देहेन्द्रियसंघातमभिसम्पद्यमानः, शरीरे आत्मभावमापद्यमान इत्यर्थः, पाप्मभिः पाप्मसमवायिभिर्धर्माधर्माश्रयैः कार्यकारणै- | वह यह प्रकृत पुरुष जन्म लेते समय; किस प्रकार जन्म लेते समय ? सो बतलाया जाता है— शरीर यानी देहेन्द्रियसंघातको प्राप्त होता हुआ अर्थात् शरीरमें आत्मभाव करता हुआ, पापोंसे अर्थात् पापके समवायी कारण धर्म और अधर्मके आश्रयभूत देह |

९२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

Page 936Permalink
९२२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| रित्यर्थः, संसृज्यते संयुज्यते, स एवोत्क्रामञ्छरीरान्तरमूर्ध्वं क्रामन् गच्छन् म्रियमाण इत्येतस्य व्याख्यानमुत्क्रामन्निति। <br><br> तानेव संश्लिष्टान् पाप्मरूपान् कार्यकरणलक्षणान्, विजहाति तैर्वियुज्यते, तान् परित्यजति। | और इन्द्रियोंसे संसृष्ट—संयुक्त हो जाता है। तथा वही उत्क्रमण करते समय—शरीरान्तरप्राप्तिके लिये ऊपरकी ओर जाते समय, श्रुतिमें ‘म्रियमाणः’ (मरते समय) इस पदकी ही व्याख्या ‘उत्क्रामन्’ इस पदसे की गयी है, उन संश्लिष्ट देहेन्द्रियरूप पापरूपोंको त्याग देता है उनसे वियुक्त हो जाता है अर्थात् उन्हें छोड़ देता है। | | यथायं स्वप्नजाग्रद्वृत्त्योर्वर्तमाने एवैकस्मिन् देहे पाप्मरूपकार्यकरणोपादानपरित्यागाभ्यामनवरतं संचरति धिया समानः सन्, तथा सोऽयं पुरुषः उभाविहलोकपरलोकौ जन्ममरणाभ्यां कार्यकरणोपादानपरित्यागौ अनवरतं प्रतिपद्यमानः, आ संसारमोक्षात्संचरति। तस्मात् सिद्धमस्य आत्मज्योतिषोऽन्यत्वं कार्यकरणरूपेभ्यः पाप्मभ्यः, संयोगवियोगाभ्याम्, न हि तद्धर्मत्वे सति, तैरेव संयोगो वियोगो वा युक्तः ॥८॥ | जिस प्रकार यह जीव, इस एक वर्तमान शरीरमें ही बुद्धिकी समानताको प्राप्त होकर स्वप्न और जाग्रत् दोनों वृत्तियोंमें पापरूप देह तथा इन्द्रियोंका ग्रहण और त्याग करता हुआ निरन्तर संचार करता रहता है, उसी प्रकार यह पुरुष जन्म और मरणके द्वारा देहेन्द्रियका निरन्तर ग्रहण और त्याग करता हुआ इहलोक और परलोक दोनोंमें तबतक संचार करता रहता है, जबतक इस संसार-बन्धनसे मुक्त नहीं हो जाता। अतः इन संयोग और वियोगके कारण इस आत्मज्योतिका देहेन्द्रियरूप पापोंसे अन्यत्व सिद्ध होता है; उन्हींका धर्म होनेपर तो इसका उन्हींसे संयोग या वियोग होना बन ही नहीं सकता ॥ ८ ॥ |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९२३

Page 937Permalink

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९२३

आत्माके दो स्थानोंका वर्णन

| ननु न स्तोऽस्योभौ लोकौ, यौ जन्ममरणाभ्यामनुक्रमेण संचरति स्वप्नजागरिते इव, स्वप्नजागरिते तु प्रत्यक्षमवगम्येते, न त्विहलोकपरलोकौ केनचित् प्रमाणेन, तस्मादेते एव स्वप्नजागरिते इहलोकपरलोकौ । इत्युच्यते— | किंतु स्वप्न और जाग्रत्के समान यह पुरुष जन्म और मरणके द्वारा क्रमशः जिनमें संचार करता है, इसके वे दोनों लोक तो हैं नहीं; स्वप्न और जाग्रत् तो प्रत्यक्ष जाने जाते हैं, किंतु इहलोक और परलोकका तो किसी भी प्रमाणसे ज्ञान नहीं होता, अतः ये स्वप्न और जागरित ही इहलोक और परलोक हैं। इसपर कहा जाता है— |

तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्थाने भवत इदं च परलोकस्थानं च संध्यं तृतीयँ स्वप्नस्थानं तस्मिन् संध्ये स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीदं च परलोकस्थानं च। अथ यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति तमाक्रममाक्रम्योभयान् पाप्मन आनन्दाँश्च पश्यति स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वपित्यत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिर्भवति ॥ ९ ॥

उस इस पुरुषके दो ही स्थान हैं—यह लोक और परलोकसम्बन्धी स्थान; तीसरा स्वप्नस्थान संध्यस्थान है। उस संध्यस्थानमें स्थित रहकर यह इस लोकरूप स्थान और परलोकस्थान—इन दोनोंको देखता है। यह पुरुष परलोकस्थानके लिये जैसे साधनसे सम्पन्न होता है, उस साधनका आश्रय लेकर यह पाप (पापका फलरूप दुःख) और आनन्द दोनों-