बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
१११६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
१११६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
| अपुण्यं कर्म अकरवं कृतवानस्मि, कष्टं खलु मम वृत्तम्, अनेन पापेन कर्मणा अहं नरकं प्रतिपत्स्ये'—इति योऽयं पश्चात् पापं कर्म कृतवतः—परितापः स एनं नेति नेत्यात्मभूतं न तरति । | कारण मैंने पाप—अपुण्य कर्म किया, यह मेरे लिये बड़े ही क्लेशका कारण हुआ, इस पापकर्मके कारण मैं नरकको प्राप्त होऊँगा'—इस प्रकार जिसने पापकर्म किया है, उस पुरुषका जो यह पश्चात्ताप है, वह इस 'नेति-नेति' इस श्रुतिसे वर्णित आत्मस्वरूपको प्राप्त हुए पुरुषको नहीं प्राप्त होता । | | तथा—'अतः कल्याणं फलविषयकामानिमित्ताद् यज्ञदानादिलक्षणं पुण्यं शोभनं कर्म कृतवानस्मि, अतोऽहमस्य फलं सुखमुपभोक्ष्ये देहान्तरे' इत्येषोऽपि हर्षस्तं न तरति । उभे उ ह एव एष ब्रह्मविदेते कर्मणी तरति पुण्यपापलक्षणे । एवं ब्रह्मविदः संन्यासिन उभे अपि कर्मणी क्षीयेते—पूर्वजन्मनि कृते ये ते, इह जन्मनि कृते ये ते च; अपूर्वे च नारभ्येते । | इसी प्रकार [ दूसरी बात यह है— ] 'अतः—इस फलविषयक कामनारूप निमित्तसे मैंने कल्याण-यज्ञ-दानादिरूप पुण्य अर्थात् शुभ कर्म किया है, इसलिये मैं दूसरे शरीरमें इसका फलरूप सुख भोगूँगा'—इस प्रकारका हर्ष भी उसे नहीं प्राप्त होता। यह ब्रह्मवेत्ता इन पाप-पुण्यरूप दोनों ही प्रकारके कर्मोंसे पार हो जाता है। इस प्रकार ब्रह्मवेत्ता संन्यासीके जो पूर्वजन्ममें किये होते हैं, वे और जो इस जन्ममें किये होते हैं वे—दोनों ही प्रकारके कर्म क्षीण हो जाते हैं तथा नये कर्मोंका भी आरम्भ नहीं होता । | | किं च नैनं कृताकृते—कृतं नित्यानुष्ठानम्, अकृतं तस्यैव अक्रिया, ते अपि कृताकृते एनं | इसी प्रकार इसे कृत और अकृत-कृत नित्यानुष्ठानको कहते हैं और अकृत उसे न करनेको—वे कृत |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १११७
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १११७
| न तपतः; अनात्मज्ञं हि कृतं फलदानेन, अकृतं प्रत्यवायोत्पादनेन तपतः । अयं तु ब्रह्मविद् आत्मविद्याग्निना सर्वाणि कर्माणि भस्मीकरोति, "यथैधांसि समिद्धोऽग्निः" ( गीता ४ । ३७) इत्यादिस्मृतेः; शरीरारम्भकयोस्तु उपभोगेनैव क्षयः । अतो ब्रह्मविदकर्मसम्बन्धी ।२२। | और अकृत भी इसे ताप नहीं पहुँचाते। जो अनात्मज्ञ है, उसे ही कृत तो फलप्रदानके द्वारा और अकृत प्रत्यवाय उत्पन्न करके ताप पहुँचाते हैं। यह ब्रह्मवेत्ता तो आत्मज्ञानरूप अग्निसे सम्पूर्ण कर्मोंको भस्म कर देता है, जैसा कि "जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि ईंधनको भस्म कर देता है" इस स्मृतिसे सिद्ध होता है। जो [प्रारब्धरूपसे] नूतन शरीरकी उत्पत्ति करानेवाले पाप-पुण्य कर्म होते हैं, उनका तो उपभोगसे ही क्षय होता है, इसलिये ब्रह्मवेत्ताका कर्मसे सम्बन्ध नहीं है ॥ २२ ॥ |
ब्रह्मवेत्ताकी स्थिति और याज्ञवल्क्यके प्रति जनकका आत्मसमर्पण
तदेतदृचाभ्युक्तम् । एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्धते कर्मणा नो कनीयान् । तस्यैव स्यात् पदवित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेनेति । तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वमात्मानं पश्यति नैनं पाप्मा तरति सर्वं पाप्मानं तरति नैनं पाप्मा तपति सर्वं पाप्मानं तपति विपापो विरजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडेनं प्रापितोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते विदेहान् ददामि मां चापि सह दास्यायेति ॥ २३ ॥
१११८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १११८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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यही बात ऋचाद्वारा कही गयी है—यह ब्रह्मवेत्ताकी नित्य महिमा है, जो कर्मसे न तो बढ़ती है और न घटती ही है। उस महिमाके ही स्वरूपको जाननेवाला होना चाहिये, उसे जानकर पापकर्मसे लिप्त नहीं होता। अतः इस प्रकार जाननेवाला शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु और समाहित होकर आत्मामें ही आत्माको देखता है, सभीको आत्मा देखता है। उसे [पुण्य-पापरूप] पापकी प्राप्ति नहीं होती, यह सम्पूर्ण पापोंको पार कर जाता है। इसे पाप ताप नहीं पहुँचाता, यह सारे पापोंको संतप्त करता है। यह पापरहित, निष्काम, निःसंशय ब्राह्मण हो जाता है। हे सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है, तुम इसे पहुँचा दिये गये हो—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। [तब जनकने कहा—] 'वह मैं श्रीमान्को विदेह देश देता हूँ, साथ ही आपकी दासता (सेवा) करनेके लिये अपने-आपको भी समर्पण करता हूँ' ॥ २३ ॥
| तदेतद् वस्तु ब्राह्मणेनोक्तमृचा मन्त्रेण अभ्युक्तं प्रकाशितम्। एष नेति नेत्यादिलक्षणो नित्यो महिमा, अन्ये तु महिमानः कर्मकृता इत्यनित्याः; अयं तु तद्विलक्षणो महिमा स्वाभाविकत्वान्नित्यो ब्रह्मविदो ब्राह्मणस्य त्यक्तसर्वैषणस्य। <br><br> कुतोऽस्य नित्यत्वमिति हेतुमाह—कर्मणा न वर्धते शुभलक्षणेन कृतेन वृद्धिलक्षणां विक्रियां न प्राप्नोति; अशुभेन कर्मणा नो | ब्राह्मणके द्वारा कही गयी यह बात ऋचा अर्थात् मन्त्रद्वारा भी कही—प्रकाशित की गयी है। यह 'नेति-नेति' इत्यादि श्रुतिके द्वारा लक्षित आत्मा नित्य महिमा है; दूसरी जो महिमाएँ हैं वे तो कर्मद्वारा सम्पन्न हुई हैं इसलिये अनित्य हैं; किंतु ब्राह्मण अर्थात् सम्पूर्ण एषणाओंका त्याग करनेवाले ब्रह्मवेत्ताकी यह उनसे विलक्षण महिमा स्वाभाविक होनेके कारण नित्य है। <br><br> इसकी नित्यता क्यों है—इसमें श्रुति हेतु बतलाती है—यह कर्मसे नहीं बढ़ती अर्थात् किये हुए शुभरूप कर्मसे यह वृद्धिरूप विकारको प्राप्त नहीं होती। तथा अशुभ कर्मसे |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १११९
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १११९
| संस्कृत शाङ्करभाष्य | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| कनीयान् नाप्यपचयलक्षणां विक्रियां प्राप्नोति। उपचयापचयहेतुभूता एव हि सर्वा विक्रिया इति एताभ्यां प्रतिषिध्यन्ते। अतोऽविक्रियात्वान्नित्य एष महिमा। तस्मात् तस्यैव महिम्नः स्याद् भवेत्, पदवित्—पदस्य वेत्ता, पद्यते गम्यते ज्ञायत इति महिम्नः स्वरूपमेव पदम्, तस्य पदस्य वेदिता। | कनीयान्—क्षयरूप विकारको प्राप्त नहीं होती। समस्त विकार वृद्धि या क्षयके ही हेतुभूत हैं, अतः इन दो विकारोंके प्रतिषेधद्वारा उन सभीका प्रतिषेध कर दिया जाता है। इसलिये अविक्रिय होनेके कारण यह नित्य महिमा है। अतः उस महिमाका ही पदवित्--स्वरूपको जाननेवाला होना चाहिये। ['पद्यते इति पदम्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार] जिसकी प्रतिपत्ति—अवगम अर्थात् ज्ञान होता है, वह पद है; अतः यहाँ स्वरूप ही पद है, उस पदका वेत्ता (जाननेवाला) 'पदवित्' कहलाता है। |
| किं तत्पदवेदनेन स्यादित्युच्यते—तं विदित्वा महिमानम्, न लिप्यते न सम्बध्यते कर्मणा पापकेन धर्माधर्मलक्षणेन, उभयमपि पापकमेव विदुषः। | उस पदको जाननेसे क्या होगा, सो बतलाया जाता हे—उस महिमाको जानकर पुरुष पाप—धर्माधर्मरूप कर्मसे लिप्त—सम्बद्ध नहीं होता। ज्ञानीके लिये तो [पाप-पुण्य] दोनों पापके तुल्य ही हैं। |
| यस्मादेवमकर्मसम्बन्धी एष ब्राह्मणस्य महिमा नेति नेत्यादिलक्षणः, तस्माद् एवंवित् शान्तः—बाह्येन्द्रियव्यापारत उपशान्तः, तथा दान्तः—अन्तःकरणतृष्णातो निवृत्तः, उपरतः सर्वैषणाविनि- | क्योंकि इस प्रकार यह 'नेति नेति' इत्यादि लक्षणवाली ब्राह्मणकी महिमा कर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली नहीं है, इसलिये इस प्रकार जाननेवाला शान्त—बाह्य-इन्द्रिय-व्यापारसे उपशान्त, दान्त—अन्तःकरणकी तृष्णासे निवृत्त, उपरत—सम्पूर्ण |
११२० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
११२० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
| मुक्तः संन्यासी, तितिक्षुर्द्वन्द्वसहिष्णुः, समाहितः—इन्द्रियान्तःकरणचलनरूपाद् व्यावृत्य ऐकाग्र्यरूपेण समाहितो भूत्वा; तदेतदुक्तं पुरस्तात्—"बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्य" इति; आत्मन्येव स्वे कार्यकारणसंघाते आत्मानं प्रत्यक्चेतयितारं पश्यति । | एषणाओंसे सर्वथा निवृत्त संन्यासी, तितिक्षु-द्वन्द्व ( सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी आदि ) सहन करनेवाला और समाहित—इन्द्रिय और अन्तःकरणके चलन्यरूपसे व्यावृत होकर ऐकाग्र्यरूपसे समाहित हो—यही बात पहले "बाल्य और पाण्डित्यको पूर्णतया जानकर" इस वाक्यद्वारा कही गयी है – आत्मामें अर्थात् देहेन्द्रियसंघातरूप अपनेमें अन्तर्वर्ती चेतन आत्माको देखता है । |
| तत्र किं तावन्मात्रं परिच्छिन्नम् ? नेत्युच्यते—सर्वं समस्तमात्मानमेव पश्यति, नान्यद् आत्मव्यतिरिक्तं वालाग्रमात्रमप्यस्तीत्येवं पश्यति; मननान्मुनिर्भवति जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ताख्यं स्थानत्रयं हित्वा । | तो क्या उस शरीरमें वह उतने ही परिमाणवाले परिच्छिन्न आत्माको देखता है ? इसपर कहा जाता है 'नहीं,' वह सबको आत्मा ही देखता है । आत्माके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु बालके अग्रभागके बराबर भी नहीं है—इस प्रकार वह देखता है । वह जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति संज्ञक तीनों अवस्थाओंको छोड़कर मनन करनेके कारण मुनि हो जाता है । |
| एवं पश्यन्तं ब्राह्मणं नैनं पाप्मा पुण्यपापलक्षणस्तरति, न प्राप्नोति; अयं तु ब्रह्मवित् सर्वं पाप्मानं तरति—आत्मभावेनैव व्याप्नोति, अतिक्रामति । नैनं पाप्मा कृताकृतलक्षणस्तपति । | इस प्रकार देखनेवाले इस ब्राह्मणको पुण्य-पापरूपी दोष नहीं तरता--नहीं प्राप्त होता । किंतु यह ब्रह्मवेत्ता तो सम्पूर्ण पापको तर जाता है--उसे आत्मभावसे ही व्याप्त--आक्रान्त कर लेता है। इसे कृताकृतरूप पाप |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११२१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११२१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| इष्टफलप्रत्यवायोत्पादनाभ्याम्; सर्वं पाप्मानमयं तपति ब्रह्मवित् सर्वात्मदर्शनवह्निना भस्मीकरोति । | इष्टफलप्रदान और प्रत्यवायोत्पादनके द्वारा ताप नहीं पहुँचाता और यह ब्रह्मवित् सम्पूर्ण पापको तप्त करता यानी सर्वात्मदर्शनरूप अग्निसे भस्म कर देता है । |
| स एष एवंविद् विपापो विगतधर्माधर्मः, विरजो विगतरजः, रजः कामः, विगतकामः, अविचिकित्सः—छिन्नसंशयः, अहमस्मि सर्वात्मा परं ब्रह्मेति निश्चितमतिः, ब्राह्मणो भवति । | वह यह इस प्रकार जाननेवाला विपाप—धर्माधर्महीन, विरज—विगतरज, 'रज' कामको कहते हैं, अतः निष्काम, अविचिकित्स—संशयहीन और 'मैं सर्वात्मा परब्रह्म हूँ' इस प्रकार जिसका निश्चय है वह ब्राह्मण हो जाता है । |
| अयं त्वेवंभूत एतस्यामवस्थायां मुख्यो ब्राह्मणः, प्रागेतस्माद् ब्रह्मस्वरूपावस्थानाद् गौणमस्य ब्राह्मण्यम् । एष ब्रह्मलोकः—ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोको मुख्यो निरुपचरितः सर्वात्मभावलक्षणः, हे सम्राट् ! एनं ब्रह्मलोकं परिप्रापितोऽसि अभयं नेति नेत्यादिलक्षणम्—इति होवाच याज्ञवल्क्यः । | इस अवस्था में ऐसी स्थितिको प्राप्त हुआ यह ब्रह्मवेत्ता ही मुख्य ब्राह्मण है। इस ब्रह्मस्वरूपमें स्थिति होनेसे पूर्व तो इसका ब्राह्मणत्व गौण ही है [मुख्य नहीं]। यह ब्रह्मलोक है—ब्रह्म ही लोक है अर्थात् मुख्य (प्रधान) एवं उपचाररहित सर्वात्मभावरूप ब्रह्मलोक यही है। हे सम्राट् ! इस 'नेति नेति' इत्यादिरूपसे लक्षित अभय ब्रह्मलोकको तुम्हें पहुँचा दिया—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । |
| एवं ब्रह्मभूतो जनको याज्ञवल्क्येन ब्रह्मभावमापादितः प्रत्याह—सोऽहं त्वया ब्रह्मभाव- | इस प्रकार याज्ञवल्क्यद्वारा ब्रह्मभावको प्राप्त कराये हुए ब्रह्मभूत जनकने उत्तर दिया, आपके द्वारा |
बृ० उ० ७१—
११२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
११२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
| मापादितः सन् भगवते तुभ्यं विदेहान् देशान् मम राज्यं समस्तं ददामि, मां च सह विदेहँर्दास्याय दासकर्मणे—ददामीति चशब्दात् सम्बध्यते ।<br><br>परिसमापिता ब्रह्मविद्या सह संन्यासेन साङ्गा सेतिकर्त्तव्यताका; परिसमाप्तः परमपुरुषार्थः, एतावत् पुरुषेण कर्त्तव्यम्, एषा निष्ठा, एषा परा गतिः, एतन्निःश्रेयसम्, एतत् प्राप्य कृतकृत्यो ब्राह्मणो भवति, एतत् सर्व्वेदानुशासनमिति ॥ २३ ॥ | ब्रह्मभावको प्राप्त कराया हुआ मैं आप श्रीमान्को विदेहदेश अर्थात् अपना सारा राज्य देता हूँ तथा विदेहदेशके साथ अपने-आपको भी दास्य—दासकर्मके लिये देता हूँ—इस प्रकार 'च' शब्दसे 'ददामि' (देता हूँ) इस क्रियाका सम्बन्ध लगाया जाता है ।<br><br>संन्यास, अङ्ग और इतिकर्त्तव्यताके सहित ब्रह्मविद्याकी सर्वथा समाप्ति हो गयी। परम पुरुषार्थका पर्यवसान हो गया। पुरुषको इतना ही कर्त्तव्य है, यही निष्ठा है, यही परा गति है और यही निःश्रेयस है। इसे पाकर ब्राह्मण कृतकृत्य हो जाता है और यही सम्पूर्ण वेदका अनुशासन है ॥ २३ ॥ |
आत्मा अन्नाद और वसुदान है—इस प्रकारकी उपासनाका फल
| योऽयं जनकयाज्ञवल्क्याख्यायिकायां व्याख्यात आत्मा— | इस जनक-याज्ञवल्क्य-आख्यायिकामें जिस आत्माकी व्याख्या की गयी है— |
स वा एष महानज आत्मान्नादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद ॥ २४ ॥
वह यह महान् अजन्मा आत्मा अन्न भक्षण करनेवाला और कर्मफल देनेवाला है। जो ऐसा जानता है, उसे सम्पूर्ण कर्मोंका फल प्राप्त होता है ॥ २४ ॥
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११२३
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११२३
| स वै एष महान् अज आत्मा अन्नादः सर्वभूतस्थः सर्वान्नानामत्ता, वसुदानः—वसु धनं सर्वप्राणिकर्मफलम्, तस्य दाता, प्राणिनां यथाकर्म फलेन योजयितेत्यर्थः; तमेतमजमन्नादं वसुदानमात्मानमन्नादवसुदानगुणाभ्यां युक्तं यो वेद, स सर्वभूतेष्वात्मभूतः—अन्नमत्ति, विन्दते च वसु सर्वं कर्मफलजातं लभते सर्वात्मत्वादेव, य एवं यथोक्तं वेद । | वह यह महान् अजन्मा आत्मा अन्नाद—सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित रहकर समस्त अन्नोंका भोक्ता, वसुदान—वसु—धन अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियोंका कर्मफल उसे देनेवाला है; अर्थात् प्राणियोंको उनके कर्मानुसार फलसे संयुक्त करनेवाला है। उस इस अजन्मा, अन्नाद और वसुदान आत्माको जो अन्नाद और वसुदान गुणोंसे युक्त जानता है, वह समस्त भूतोंमें आत्मभूत हुआ अन्न भक्षण करता है; तथा जो ऐसा अर्थात् उपर्युक्त विषयको जानता है, वह सर्वात्मा होनेके कारण ही वसु यानी सम्पूर्ण कर्मोंका फल प्राप्त करता है। |
| अथवा दृष्टफलार्थिभिरप्येवंगुण उपास्यः; तेन अन्नादो वसोश्च लब्धा, दृष्टेनैव फलेन अन्नात्तृत्वेन गोऽश्वादिना चास्य योगो भवतीत्यर्थः ॥ २४ ॥ | अथवा जिन्हें [अन्न और धनरूप] दृष्टफलकी इच्छा है, उनको भी ऐसे गुणोंवाले ब्रह्मकी उपासना करनी चाहिये। इससे वह अन्नाद और धन प्राप्त करनेवाला होता है, अर्थात् प्रत्यक्ष प्राप्त होनेवाले ही अन्नादत्व और गौ, घोड़े आदि फलसे उसका योग होता है ॥ २४ ॥ |
ब्रह्मके स्वरूप और ब्रह्मज्ञकी स्थितिका वर्णन
| इदानीं समस्तस्यैवारण्यकस्य योऽर्थ उक्तः, स समुच्चित्य अस्यां कण्डिकायां निर्दिश्यते, एतावान् समस्तारण्यकार्थ इति— | अब इस सारे ही आरण्यकमें जो बात कही गयी है, वह संगृहीत करके इस कण्डिकामें बतलायी जाती है कि सारे आरण्यकका इतना ही तात्पर्य है— |
११२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ११२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभयँ हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद ॥ २५ ॥
वही यह महान् अजन्मा आत्मा अजर, अमर, अमृत एवं अभय ब्रह्म है। अभय ही ब्रह्म है, जो ऐसा जानता है वह अभय ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २५ ॥
| स वा एष महानज आत्मा अजरो न जीर्यत इति, न विपरिणमत इत्यर्थः, अमरः—यस्माच्च अजरः, तस्माद् अमरः, न म्रियत इत्यमरः; यो हि जायते जीर्यते च, स विनश्यति म्रियते वा; अयं तु अजत्वाद् अजरत्वाच्च अविनाशी यतः, अत एव अमृतः। यस्माद् जनिप्रभृतिभिस्त्रिभिर्भावविकारैर्वर्जितः तस्माद् इतरैरपि भावविकारैस्त्रिभिस्तत्कृतैश्च कामकर्ममोहादिभिर्मृत्युरूपैर्वर्जित इत्येतत् । <br><br> अभयोऽत एव; यस्माच्चैवं पूर्वोक्तविशेषणः, तस्माद् भयवर्जितः, भयं च हि नाम अविद्याकार्यम्, तत्कार्यप्रतिषेधेन भावविकारप्रतिषेधेन चाविद्यायाः प्रतिषेधः सिद्धो वेदितव्यः। अभय आत्मा | वही यह महान् अजन्मा आत्मा जीर्ण नहीं होता, इसलिये अजर है अर्थात् इसका विपरिणाम नहीं होता। 'अमरः'—क्योंकि अजर है, इसलिये अमर है, जो नहीं मरता उसे अमर कहते हैं। जो उत्पन्न होता अथवा जीर्ण होता है, वही विनष्ट होता अथवा मरता है। चूँकि यह अज और अजर होनेके कारण अविनाशी है, इसीलिये अमृत है। क्योंकि यह जन्मादि तीन भावविकारोंसे रहित है, इसलिये अन्य तीन भावविकारोंसे तथा उनसे होनेवाले मृत्युरूप काम, कर्म और मोहादिसे भी रहित है—ऐसा इसका तात्पर्य है। <br><br> इसीसे यह अभय भी है। इस प्रकार चूँकि यह पूर्वोक्त विशेषणोंवाला है, इसलिये भयशून्य है; भय तो अविद्याका ही कार्य है, अविद्याके कार्य और भावविकारोंके प्रतिषेधसे अविद्याका प्रतिषेध भी सिद्ध हुआ समझना चाहिये। इस |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११२५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११२५
| एवंगुणविशिष्टः किमसो ? ब्रह्म परिवृढं निरतिशयं महदित्यर्थः । अभयं वै ब्रह्म, प्रसिद्धमेतद् लोके—अभयं ब्रह्मेति । तस्माद्युक्तमेवंगुणविशिष्ट आत्मा ब्रह्मेति । | प्रकारके गुणोंसे युक्त यह अभय आत्मा क्या है ? ब्रह्म—सब ओरसे बढ़ा हुआ अर्थात् निरतिशय महान् । ब्रह्म अभय ही है; लोकमें यह बात प्रसिद्ध है कि ब्रह्म अभय है, इसलिये ऐसे गुणोंवाला आत्मा ब्रह्म है—यह कहना उचित ही है । | | य एवं यथोक्तमात्मानमभयं ब्रह्म वेद, सोऽभयं हि वै ब्रह्म भवति । एष सर्वस्या उपनिषदः संक्षिप्तोऽर्थ उक्तः । एतस्यैवार्थस्य सम्यक् प्रबोधाय उत्पत्तिस्थितिप्रलयादिकल्पना क्रियाकारकफलाध्यारोपणा चात्मनि कृता, तदपोहेन च नेति नेतीत्यध्यारोपितविशेषापनयद्वारेण पुनस्तत्त्वमावेदितम् । | जो इस प्रकार उपर्युक्त आत्मारूप अभय ब्रह्मको जानता है, वह निश्चय अभय ब्रह्म ही हो जाता है । यह समस्त उपनिषद्का संक्षिप्त अर्थ कहा गया । इसी अर्थका अच्छी तरह ज्ञान करानेके लिये आत्मामें उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलयादिकी कल्पना तथा क्रिया, कारक और फलका अध्यारोप किये गये हैं । तथा उसके अपोहनके द्वारा अर्थात् 'नेति-नेति' इत्यादि रूपसे अध्यारोपित विशेषकी निवृत्तिद्वारा पुनः तत्त्वका ज्ञान कराया गया है । | | यथैकप्रभृत्यापरार्धसंख्यास्वरूपपरिज्ञानाय रेखाध्यारोपणं कृत्वा एकेयं रेखा, दशेयम्, शतेयम्, सहस्रेयम्—इति ग्राह- | जिस प्रकार एकसे लेकर परार्धतककी संख्याके स्वरूपका परिज्ञान करानेके लिये रेखाओंका अध्यारोप करके [ अर्थात् अनेकों रेखाएँ खींचकर ] यह ( पहली ) रेखा एक है, यह ( दूसरी ) रेखा दश है, यह ( तीसरी ) सौ है, यह ( चौथी ) सहस्र है—इस प्रकार ग्रहण कराते हैं |
११२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४]
| ११२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४] |
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| यति, अवगमयति संख्यास्वरूपं केवलम्, न तु संख्याया रेखात्मत्वमेव, यथा च—अकारादीन्यक्षराणि विजिग्राहयिषुः पत्रमषीरेखादिसंयोगोपायमास्थाय वर्णानां सतत्त्वमावेदयति, न पत्रमष्याद्यात्मतामक्षराणां ग्राहयति—तथा चेहोत्पत्त्याद्यनेकोपायमास्थायैकं ब्रह्मतत्त्वमावेदितम्, पुनस्तत्कल्पितोपायजनितविशेषपरिशोधनार्थं नेति नेतीति तत्त्वोपसंहारः कृतः। तदुपसंहृतं पुनः परिशुद्धं केवलमेव सफलं ज्ञानमन्तेऽस्यां कण्डिकायामिति ॥ २५ ॥ | तथा उन रेखाओंके द्वारा केवल संख्याके स्वरूपका ज्ञान कराते हैं, किंतु वास्तवमें संख्या रेखारूप ही नहीं है। तथा जिस प्रकार अकारादि अक्षरोंको ग्रहण करानेकी इच्छावाला पुरुष कागज, स्याही और रेखाओंके संयोगरूप उपायका आश्रय लेकर वर्णोंका स्वरूप समझा देता है, कागज-स्याही आदि ही अक्षरोंके स्वरूप हैं—ऐसा नहीं समझाता, उसी प्रकार यहाँ उत्पत्ति आदि अनेकों उपायोंका अवलम्बन कर एक ब्रह्मतत्त्वका ही बोध कराया गया है। फिर उस कल्पित उपायसे पैदा हुए विशेषका निरास करनेके लिये 'नेति नेति' ऐसा कहकर तत्त्वका उपसंहार किया है। फिर अन्तमें वह उपसंहृत, परिशुद्ध, केवल ज्ञान ही अपने फलके सहित इस कण्डिकामें बतलाया गया है ॥ २५ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये
चतुर्थं शारीरकब्राह्मणम् ॥ ४ ॥
पञ्चम ब्राह्मण
पञ्चम ब्राह्मण
याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद
| आगमप्रधानेन मधुकाण्डेन ब्रह्मतत्त्वं निर्धारितम्। पुनः तस्यैवोपपत्तिप्रधानेन याज्ञवल्कीयेन काण्डेन पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहं कृत्वा विगृह्यवादेन विचारितम्। शिष्याचार्यसम्बन्धेन च षष्ठे प्रश्नप्रतिवचनन्यायेन सविस्तरं विचार्योपसंहृतम्। अथेदानीं निगमनस्थानीयं मैत्रेयीब्राह्मणमारभ्यते। अयं च न्यायो वाक्यकोविदैः परिगृहीतः—<br>‘हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम्’ इति। | [ द्वितीय अध्यायमें ] आगमप्रधान मधुकाण्डद्वारा ब्रह्मतत्वका निश्चय किया गया। फिर [ तीसरे अध्यायमें ] युक्तिप्रधान याज्ञवल्कीय काण्डद्वारा उसीके पक्ष-प्रतिपक्ष लेकर जल्पन्यायद्वारा विचार किया गया और तदनन्तर इस छठे प्रपाठक [ अर्थात् चतुर्थ अध्यायमें ] गुरु-शिष्यसम्बन्धसे प्रश्नोत्तरकी शैलीद्वारा उसका विस्तारपूर्वक विचार करके उपसंहार किया गया। उसके पश्चात् अब निगमनस्थानीय मैत्रेयीब्राह्मण आरम्भ किया जाता है। वाक्यमर्मज्ञोंने इस न्यायको स्वीकार भी किया है यथा—‘हेतुका उल्लेख करके प्रतिज्ञाका पुनः कथन करना निगमन है’ इति। |
| अथवाऽऽगमप्रधानेन मधुकाण्डेन यदमृतत्वसाधनं ससंन्यासमात्मज्ञानमभिहितम्, तदेव तर्केणाप्यमृतत्वसाधनं ससंन्यासमात्मज्ञानमधिगम्यते । तर्कप्रधानं हि याज्ञवल्कीयं काण्डम्; तस्माच्छास्त्रतर्काभ्यां निश्चितमेतत्—यदेतदात्मज्ञानं ससंन्यासममृतत्वसाधनमिति। | अथवा आगमप्रधान मधुकाण्डने जिस संन्यासयुक्त आत्मज्ञानको अमृतत्वका साधन बतलाया है, वही ससंन्यास आत्मज्ञान तर्कसे भी अमृतत्वका साधन जाना जाता है। याज्ञवल्कीय काण्ड तर्कप्रधान ही है; अतः यह जो अमृतत्वका साधन संन्यासयुक्त आत्मज्ञान है, वह शास्त्र और तर्क दोनोंहीसे निश्चित है। |
११२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| तस्माच्छास्त्रश्रद्धावद्भिरमृतत्वप्रतिपित्सुभिरेतत् प्रतिपत्तव्यमिति आगमोपपत्तिभ्यां हि निश्चितोऽर्थः श्रद्धेयो भवति, अव्यभिचारादिति । अक्षराणां तु चतुर्थे यथा व्याख्यातोऽर्थः, तथा प्रतिपत्तव्योऽत्रापि । यान्यक्षराण्यव्याख्यातानि तानि व्याख्यास्यामः। | इसलिये अमृतत्व-प्राप्तिके इच्छुक एवं शास्त्रमें श्रद्धा रखनेवाले पुरुषोंको इसे प्राप्त करना चाहिये, क्योंकि शास्त्र और युक्ति दोनोंहीके द्वारा निश्चय किया हुआ अर्थ अव्यभिचारी होनेके कारण श्रद्धेय होता है। इन अक्षरोंके अर्थकी तो चतुर्थ प्रपाठक [यानी द्वितीय अध्याय] में जिस प्रकार व्याख्या की गयी है, वैसी ही यहाँ भी समझनी चाहिये । वहाँ जिन अक्षरोंकी व्याख्या नहीं की गयी, उनकी व्याख्या हम यहाँ करेंगे। |
याज्ञवल्क्य और उनकी दो स्त्रियाँ
अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे भार्ये बभूवतुर्मैत्रेयी च कात्यायनी च तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि कात्यायन्यथ ह याज्ञवल्क्योऽन्यद्वृत्तमुपाकरिष्यन् ॥ १ ॥
यह प्रसिद्ध है कि याज्ञवल्क्यकी मैत्रेयी और कात्यायनी ये दो भार्याएँ थीं। उनमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी और कात्यायनी तो स्त्रियोंकी-सी बुद्धिवाली ही थी। तब याज्ञवल्क्यने दूसरे प्रकारकी चर्याका आरम्भ करनेकी इच्छासे [कहा--] ॥ १ ॥
| अथेति हेतूपदेशानन्तर्यप्रदर्शनार्थः; हेतुप्रधानानि हि वाक्यान्यतीतानि । तदनन्तरमागमप्रधानेन प्रतिज्ञातोऽर्थो निगम्यते मैत्रेयीब्राह्मणेन । ह-शब्दो वृत्तावद्योतकः । | 'अथ' यह शब्द यह दिखानेके लिये है कि यह सिद्धान्तप्रतिपादक प्रकरण हेतुका उपदेश करनेके बाद आरम्भ किया गया है; क्योंकि इससे पहले हेतुप्रधान वाक्य कहे जा चुके हैं। उनके पश्चात् अब आगमप्रधान मैत्रेयीब्राह्मणद्वारा पहले प्रतिज्ञा किये हुए अर्थका निगमन किया जाता है। 'ह' शब्द पूर्ववृत्तको सूचित करनेवाला है। |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११२९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११२९
| याज्ञवल्क्यस्य ऋषेः किल द्वे भार्ये पत्न्यौ बभूवतुः—आस्ताम्—मैत्रेयी च नामत एका, अपरा कात्यायनी नामतः। तयोर्भार्ययोर्मैत्रेयी ह किल ब्रह्मवादिनी ब्रह्मवदनशीला बभूव आसीत् स्त्रीप्रज्ञा—स्त्रियां या उचिता सा स्त्रीप्रज्ञा—सैव यस्याः प्रज्ञा गृहप्रयोजनान्वेषणलक्षणा, सा स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि तस्मिन् काल आसीत् कात्यायनी। अथैवं सति ह किल याज्ञवल्क्योऽन्यत् पूर्वस्माद् गार्हस्थ्यलक्षणाद् वृत्तात् पारिव्राज्यलक्षणं वृत्तमुपाकरिष्यन्नुपाचिकीर्षुः सन् ॥ १ ॥ | प्रसिद्ध है, याज्ञवल्क्य ऋषिकी दो भार्याएँ--पत्नियां थीं; एक मैत्रेयी नामवाली थी और दूसरी कात्यायनी नामवाली। उन दोनों पत्नियोंमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी--ब्रह्मसम्बन्धी भाषण करनेवाली थी। किंतु कात्यायनी उस समय 'स्त्रीप्रज्ञा'--जो प्रज्ञा स्त्रियोंके योग्य हो, उसे स्त्रीप्रज्ञा कहते हैं, जिसकी वह स्त्रीप्रज्ञा अर्थात् गृहसम्बन्धी प्रयोजनकी ही खोजमें रहनेवाली बुद्धि थी, ऐसी स्त्रीप्रज्ञा ही थी। ऐसी स्थितिमें याज्ञवल्क्यने अन्य अर्थात् गार्हस्थ्यरूप पूर्वचर्यासे भिन्न संन्यासरूप चर्याका आरम्भ करनेके इच्छुक होकर [ कहा-- ] ॥ १ ॥ |
याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद
मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः प्रव्रजिष्यन् वा अरेऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्यान्तं करवाणीति ॥ २ ॥
'अरी मैत्रेयि !' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा—'मैं इस स्थान (गार्हस्थ्य-आश्रम ) से अन्यत्र सब कुछ त्याग कर जानेवाला हूँ, अर्थात् संन्यास लेनेका विचार है। इसलिये [ मैं तेरी अनुमति लेता हूँ और चाहता हूँ ] इस कात्यायनीके साथ तेरा बँटवारा कर दूँ' ॥ २ ॥
| हे मैत्रेयीति ज्येष्ठां भार्यामामन्त्रयामास, आमन्त्र्य चोवाच | 'हे मैत्रेयि !' इस प्रकार याज्ञवल्क्यने बड़ी स्त्रीको लक्ष्य करके सम्बोधन किया और उसे बुलाकर |
११३० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
११३० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
| ह—प्रव्रजिष्यन् पारिव्राज्यं करिष्यन् वै अरे मैत्रेयि । अस्मात् स्थानाद् गार्हस्थ्यादहमस्मि भवामि । मैत्रेयि अनुजानीहि माम्, हन्त इच्छसि यदि, ते अनया कात्यायन्या अन्तं करवाणि—इत्यादि व्याख्यातम् । २। | कहा, 'अरी मैत्रेयि ! मैं इस गार्हस्थ्य-आश्रमसे प्रव्रजन--पारिव्राज्य (संन्यास) स्वीकार करनेवाला हूँ। सो हे मैत्रेयि ! तू मुझे अपनी अनुमति दे, और यदि तेरी इच्छा हो तो इस कात्यायनीके साथ तेरा बँटवारा कर दूँ'--इत्यादि वाक्यकी व्याख्या पहले की जा चुकी है ॥ २ ॥ |
सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् स्यां न्वहं तेनामृताऽहो ३ नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितँ् स्यादमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेनेति ॥ ३ ॥
उस मैत्रेयीने कहा, 'भगवन् ! यदि यह धनसे सम्पन्न सारी पृथिवी मेरी हो जाय तो क्या मैं उससे अमर हो सकती हूँ, अथवा नहीं ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'नहीं, भोग सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्योंका जैसा जीवन होता है, वैसा ही तेरा जीवन हो जायगा, धनसे अमृतत्वकी तो आशा है नहीं' ॥ ३ ॥
मैत्रेयीका अमृतत्व-साधनविषयक प्रश्न
सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥४॥
उस मैत्रेयीने कहा, 'जिससे मैं अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् जो कुछ अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें' ॥ ४ ॥
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३१
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३१
| सा एवमुक्ता उवाच मैत्रेयी— सर्व्वेयं पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्, नु किं स्याम्, किमहं वित्तसाध्येन कर्मणा अमृता, आहो न स्यामिति । नेति होवाच याज्ञवल्क्य इत्यादि समानमन्यत् ॥ | इस प्रकार कहे जानेपर उस मैत्रेयीने कहा, 'यदि यह सारी पृथिवी धनसे पूर्ण हो जाय तो क्या उस धनसाध्य कर्मसे मैं अमर हो जाऊँगी अथवा नहीं ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'नहीं' इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३-४ ॥ |
याज्ञवल्क्यजीका सान्त्वनापूर्वक समाधान
स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया वै खलु नो भवती सती प्रियमवृधद्धन्त तर्हि भवत्येतद् व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ५ ॥
उन याज्ञवल्क्यजीने कहा, 'निश्चय ही तू पहले भी हमारी प्रिया रही है और इस समय भी तूने हमारे प्रिय (प्रसन्नता) को बढ़ाया है। अतः हे देवि ! मैं प्रसन्नतापूर्वक तेरे प्रति इस ( अमृतत्वके साधन ) की व्याख्या करूँगा। तू मेरे व्याख्या किये हुए विषयका चिन्तन करना' ॥ ५ ॥
| स ह उवाच—प्रियैव पूर्वं खलु नः—अस्मभ्यं भवती, भवन्ती सती, प्रियमेव अवृधद् वर्धितवती निर्धारितवती असि; अतस्तुष्टोऽहम्, हन्त इच्छसि चेदमृतत्वसाधनं ज्ञातुम्, हे भवति, ते तुभ्यं तदमृतत्वसाधनं व्याख्यास्यामि ॥ ५ ॥ | उन्होंने कहा, तू निश्चय ही पहले भी हमारी प्रिया रही है, अब भी तूने हमारे प्रियकी ही वृद्धि की है, प्रसन्नताको ही बढ़ाया है—संतोषजनक निश्चय किया है, इसलिये मैं तुझपर प्रसन्न हूँ। अब यदि तू अमृतत्वका साधन जानना चाहती है तो हे भवति--हे देवि ! मैं तेरे प्रति उस अमृतत्वके साधनकी व्याख्या करूँगा ॥ ५ ॥ |
११३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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प्रियतम आत्माके लिये ही सब वस्तुएँ प्रिय होती हैं
स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति । न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति। न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति । न वा अरे पशूनां कामाय पशवः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पशवः प्रिया भवन्ति । न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति । न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति । न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति। न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे वेदानां कामाय वेदाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति । न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदँ सर्वं विदितम् ॥ ६ ॥
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३३
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३३
उन्होंने कहा—'अरी मैत्रेयि ! यह निश्चय है कि पतिके प्रयोजनके लिये पति प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये पति प्रिय होता है; स्त्रीके प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया नहीं होती, अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया होती है; पुत्रोंके प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय होते हैं; धनके प्रयोजनके लिये धन प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये धन प्रिय होता है; पशुओंके प्रयोजनके लिये पशु प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये पशु प्रिय होते हैं, ब्राह्मणके प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय होता है; क्षत्रियके प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय होता है; लोकोंके प्रयोजनके लिये लोक प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये लोक प्रिय होते है; देवोंके प्रयोजनके लिये देव प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये देव प्रिय होते हैं; वेदोंके प्रयोजनके लिये वेद प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये वेद प्रिय होते हैं; भूतोंके प्रयोजनके लिये भूत प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये भूत प्रिय होते हैं; सबके प्रयोजनके लिये सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं, अतः अरी मैत्रेयि ! आत्मा ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और निदिध्यासन ( ध्यान ) करनेयोग्य है । हे मैत्रेयि ! निश्चय ही आत्माका दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान हो जानेपर इन सबका ज्ञान हो जाता है' ॥ ६ ॥
| आत्मनि खलु अरे मैत्रेयि दृष्टे; कथं दृष्ट आत्मनि ? इत्युच्यते—पूर्वमाचार्य्यागमाभ्यां श्रुते, पुनः तर्केणोपपत्त्या मते विचारिते, श्रवणं त्वागममात्रेण, मते उपपत्त्या, पश्चाद् | 'हे मैत्रेयि ! निश्चय ही आत्माका दर्शन हो जानेपर; किस प्रकार आत्माका दर्शन हो जानेपर, सो कहा जाता है—पहले आचार्य और शास्त्रद्वारा श्रवण और फिर तर्क एवं युक्तिसे मनन और विचार करनेपर; शास्त्रमात्रसे तो श्रवण, युक्तिसे मनन और पीछे विशेषरूपसे जान लेनेपर |
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११३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| विज्ञाते—एवमेतन्नान्यथेति<br><br>निर्धारिते; किं भवति ? इत्यु-<br><br>च्यते—इदं विदितं भवति; इदं<br><br>सर्वमिति यदात्मनोऽन्यत्,<br><br>आत्मव्यतिरेकेणाभावात् ॥६॥ | अर्थात् यह ऐसा ही है, अन्य प्रकारका नहीं है—ऐसा निश्चय कर लेनेपर क्या होता है ? सो बतलाया जाता है—यह ज्ञात हो जाता है अर्थात् यह सब जो कि आत्मासे भिन्न है, जान लिया जाता है; क्योंकि आत्मासे भिन्न कुछ है ही नहीं ॥ ६ ॥ |
भेददृष्टिसे हानि दिखाकर ‘सब कुछ आत्मा ही है’ इस तत्त्वका उपदेश—
ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानीदँ सर्वं यदयमात्मा ॥ ७ ॥
ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है, जो ब्राह्मणजातिको आत्मासे भिन्न समझता है। क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती है, जो क्षत्रियजातिको आत्मासे भिन्न जानता है। लोक उसे परास्त कर देते हैं, जो लोकोंको आत्मासे भिन्न जानता है। देवता उसे परास्त कर देते हैं, जो देवताओंको आत्मासे भिन्न समझता है। वेद उसे परास्त कर देते हैं, जो वेदोंको आत्मासे भिन्न जानता है। भूत उसे परास्त कर देते हैं, जो भूतोंको आत्मासे भिन्न समझते हैं। सब उसे परास्त कर देते हैं, जो सबको आत्मासे भिन्न जानता है। यह ब्राह्मणजाति, यह क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देव, ये वेद, ये भूत और ये सब जो कुछ भी हैं, यह सब आत्मा ही है ॥ ७ ॥
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३५
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३५
| तमयथार्थदर्शिनं परादात् पराकुर्यात्, कैवल्यासम्बन्धिनं कुर्यात्—अय्यमनात्मस्वरूपेण मां पश्यतीत्यपराधादिति भावः ।७। | तात्पर्य यह हे कि उस अनात्मदर्शीको 'यह मुझे आत्मासे भिन्नरूपमें देखता है' इस अपराधसे परादात्—पराकृत—परास्त अर्थात् कैवल्यसे सम्बन्धरहित कर देते हैं ॥ ७ ॥ |
सबको 'आत्मा' रूपसे ग्रहण करनेमें दृष्टान्त—
स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥
वह दृष्टान्त ऐसा है कि जिसपर लकड़ी आदिसे आघात किया जाता है, उस दुन्दुभि (नक्कारे) के बाह्य शब्दोंको जिस प्रकार कोई ग्रहण नहीं कर सकता, किंतु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको ग्रहण करनेसे उसका शब्द भी गृहीत हो जाता है ॥ ८ ॥
स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य॑ न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद् ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥
वह [दूसरा] दृष्टान्त ऐसा है कि जैसे मुँहसे फूँके जाते हुए शङ्खके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें कोई समर्थ नहीं होता, किंतु शङ्ख या शङ्खके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥ ९ ॥
स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ १० ॥