बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८६३ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८६३ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| विषयत्वम्, कतम आत्मेतीति-शब्दस्य प्रश्नवाक्यपरिसमाप्त्यर्थत्वम्—व्यवहितसम्बन्धमन्तरेण युक्तमिति कृत्वा, कतम आत्मेतीत्येवमन्तमेव प्रश्नवाक्यम्, योऽयमित्यादि परं सर्वमेव प्रतिवचनमिति निश्चीयते।<br><br>योऽयमित्यात्मनः प्रत्यक्षत्वा-[आत्मनो विज्ञानमयत्वविशेषणे हेतुः]निर्देशः; विज्ञानमयो विज्ञानप्रायो बुद्धिविज्ञानोपाधिसम्पर्कादविवेकाद् विज्ञानमय इत्युच्यते—बुद्धिविज्ञानसम्पृक्त एव हि यस्मादुपलभ्यते, राहुरिव चन्द्रादित्यसम्पृक्तः; बुद्धिर्हि सर्वार्थकरणम्, तमसीव प्रदीपः पुरोऽवस्थितः; 'मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति' इति ह्युक्तम्। बुद्धिविज्ञानालोकविशिष्टमेव हि सर्वं विषयजातमुपलभ्यते, पुरोऽवस्थितप्रदीपालोकविशिष्टमिव तमसि; द्वारमात्राणि त्वन्यानि | रखनेवाला होना तथा 'कतमं आत्मेति' इसमें इति शब्दका प्रश्नवाक्यकी समाप्तिके लिये होना किसी व्यवहित सम्बन्धके बिना ही उचित है—ऐसा समझकर 'कतम आत्मेति' इसके इति शब्दपर्यन्त ही प्रश्नवाक्य है; 'योऽयम्' इत्यादि आगेका सारा वाक्य उत्तर ही है—ऐसा निश्चय होता है।<br><br>आत्मा प्रत्यक्ष है, इसलिये 'योऽयम्' (जो यह) ऐसा निर्देश किया गया है; विज्ञानमय-विज्ञानप्राय, बुद्धि-विज्ञानरूप उपाधिके सम्पर्कका विवेक न होनेके कारण यह विज्ञानमय कहा जाता है; क्योंकि जिस प्रकार राहु चन्द्रमा और सूर्यके सम्पर्कमें आकर ही उपलब्ध होता है, उसी प्रकार यह बुद्धिरूप विज्ञानसे सम्पर्क रखकर ही अनुभवमें आता है; अन्धकारमें सामने रखे हुए दीपकके समान बुद्धि ही सब प्रकारके व्यापारोंका साधन है; 'मनहीसे देखता है, मनहीसे सुनता है' ऐसा कहा भी है। जिस प्रकार अन्धकारमें समस्त पदार्थ सम्मुखस्थ दीपकके प्रकाशसे युक्त होकर ही उपलब्ध होते हैं, उसी प्रकार सारे पदार्थ बुद्धिरूप विज्ञानके आलोकसे विशिष्ट होकर ही उपलब्ध होते हैं। अन्य इन्द्रियां |
८९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| करणानि बुद्धेः; तस्मात्तेनैव विशेष्यते—विज्ञानमय इति । | तो बुद्धिकी द्वारमात्र हैं। इसलिये आत्माको उस (बुद्धि) के द्वारा ही विज्ञानमय इस प्रकार विशेषित किया जाता है। |
| [मयटो विकारार्थस्त्वनिराकरणम्]<br>येषां परमात्मविज्ञप्तिविकार इति व्याख्यानम्, तेषां 'विज्ञानमयः' 'मनोमयः' इत्यादौ विज्ञानमयशब्दस्य अन्यार्थदर्शनादश्रौतार्थतावसीयते; संदिग्धश्च पदार्थोऽन्यत्र निश्चितप्रयोगदर्शनान्निर्धारयितुं शक्यः; वाक्यशेषात्, निश्चितन्यायबलाद् वा; सधीरिति चोत्तरत्र पाठात्, 'हृद्यन्तः' इति वचनाद् युक्तं विज्ञानप्रायत्वमेव । | जिनके मतमें 'विज्ञानमय' शब्दकी व्याख्या 'परमात्माकी विज्ञप्तिका विकार' है, उनका यह अर्थ, 'विज्ञानमयः' 'मनोमयः' इत्यादि तैत्तिरीय श्रुतियोंमें विज्ञानमय शब्दका दूसरा अर्थ देखे जानेके कारण, श्रुतिविरुद्ध सिद्ध होता है।¹ जहाँ किसी पदके अर्थमें संदेह हो वहाँ अन्य स्थानमें निश्चित प्रयोग देखकर उसके अनुसार ही निश्चय किया जाता है; इसके सिवा वाक्यशेषसे अथवा निश्चित न्यायके बलसे भी उसका निश्चय हो सकता है।² तथा आगे 'सधीः' (बुद्धिके सहित) ऐसा पाठ है और 'हृद्यन्तः' ऐसा वचन भी है; इनसे भी उसका विज्ञानप्रायता—विज्ञानाधिक्य ही उचित है। |
| ['प्राणेषु' 'हृदि' इत्यादिप्रयोगानामभिप्रायः]<br>प्राणेष्विति व्यतिरेकप्रदर्शनार्था सप्तमी—यथा वृक्षेषु पाषाण इति | 'प्राणेषु' यह सप्तमी व्यतिरेक प्रदर्शित करनेके लिये है; जैसे 'वृक्षेषु पाषाणः' यहाँ |
१. तात्पर्य यह है कि इन तैत्तिरीय-श्रुतियोंमें मयट् प्रत्यय प्राचुर्य (प्रायः अथवा आधिक्य) अर्थमें ही हो सकता है, विकारार्थक नहीं हो सकता; इसलिये यदि यहाँ इसका अर्थ विकार किया जायगा तो इसका उन श्रुतियोंसे विरोध होगा; इसलिये यहाँ भी इसे प्राचुर्यार्थक ही समझना चाहिये।
२. क्योंकि यदि आत्मा विज्ञानका विकार होगा तो उसे मोक्ष नहीं मिल सकता।
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९५
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९५
| सामीप्यलक्षणा; प्राणेषु हि व्यतिरेकाव्यतिरेकता संदिह्यत आत्मनः; प्राणेषु प्राणेभ्यो व्यतिरिक्त इत्यर्थः; यो हि येषु भवति, स तद्व्यतिरिक्तो भवत्येव—यथा पाषाणेषु वृक्षः । | सामीप्य अर्थको लक्षित करानेवाली सप्तमी है<sup>१</sup> प्राणोंमें ही आत्माकी भिन्नता या अभिन्नताके विषयमें संदेह होता है; अतः 'प्राणेषु' अर्थात् प्राणोंसे भिन्न है, क्योंकि जो जिनमें होता है, वह उनसे भिन्न होता ही है; जैसे पाषाणोंमें होनेवाला वृक्ष [ पाषाणोंसे भिन्न होता है ] । | | हृदि तन्नैतत् स्यात्; प्राणेषु प्राणजातीयैव बुद्धिः स्यादित्यत आह—हृद्यन्तरिति । हृच्छब्देन पुण्डरीकाकारो मांसपिण्डम्, तात्स्थ्याद् बुद्धिर्हृत्, तस्यां हृदि बुद्धौ; अन्तरिति बुद्धिवृत्तिव्यतिरेकप्रदर्शनार्थम्, ज्योतिरवभासात्मकत्वादात्मोच्यते; तेन ह्यवभासकेन आत्मना ज्योतिषा आस्ते पल्ययते कर्म कुरुते, चेतनावानिव ह्ययं कार्यकारणपिण्डः—यथा आदित्यप्रकाशस्थो घटः । | 'हृदि'—हृदयमें, वहां यह रहता है; प्राणोंमें प्राणजातिकी ही बुद्धि रहेगी, इसलिये श्रुति कहती है—'हृद्यन्तः' । यहाँ 'हृत्' शब्दसे पुण्डरीकाकार मांसपिण्ड कहा गया है, उसमें रहनेके कारण बुद्धि हृत् है, उस हृत्में अर्थात् बुद्धिमें; 'अन्तः यह बुद्धिवृत्तिसे उसकी भिन्नता प्रदर्शित करनेके लिये है, प्रकाशस्वरूप होनेके कारण आत्मा 'ज्योतिः' कहा गया है; उस प्रकाशस्वरूप आत्मज्योतिसे चेतनावान्-सा होकर ही यह देहेन्द्रियसंघात सूर्यके प्रकाशमें स्थित घटके समान रहता, इधर उधर जाता और कर्म करता है । | | यथा वा मरकतादिर्मणिः क्षीरादिद्रव्ये प्रक्षिप्तः परीक्षणाय, आत्मच्छायमेव तत् क्षीरादिद्रव्यं | अथवा जिस प्रकार परीक्षाके लिये दुग्धादि द्रव्यमें डाली हुई मरकतादि मणि उस दुग्धादि द्रव्यको अपनी ही |
१ अतः 'वृक्षेषु पाषाणः' का अर्थ होता है—वृक्षके निकट पत्थर है ।
८९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| करोति, तादृगेतदात्मज्योतिर्बुद्धेरपि हृदयात् सूक्ष्मत्वाद् हृदन्तस्थमपि हृदयादिकं कार्यकारणसंघातं चैकीकृत्य आत्मज्योतिश्छायं करोति, पारम्पर्येण सूक्ष्मस्थूलतारतम्यात्, सर्वान्तरतमत्वात्। | कान्तिवाला कर देती है, उसी प्रकार यह आत्मज्योति बुद्धि अर्थात् हृदयसे भी सूक्ष्म होनेके कारण हृत्पिण्डमें स्थित हृदयादिक और देहेन्द्रियसंघातको भी अपनेसे अभिन्न करके आत्मज्योतिकी कान्तिसे युक्त ही कर देता है, क्योंकि परम्परासे सूक्ष्म-स्थूल तारतम्यसे यह सबकी अपेक्षा अन्तरतम है। | | बुद्धिस्तावत् स्वच्छत्वादानन्तर्याच्चात्मचैतन्यज्योतिः प्रतिच्छाया भवति; (अनात्मन्यात्मचैतन्याभाससंक्रान्तेः क्रमः) तेन हि विवेकिनामपि तत्र आत्माभिमानबुद्धिः प्रथमा; ततोऽप्यानन्तर्यान्मनसि चैतन्यावभासता, बुद्धिसम्पर्कात्; तत इन्द्रियेषु, मनःसंयोगात्; ततोऽनन्तरं शरीरे, इन्द्रियसम्पर्कात्। एवं पारम्पर्येण कृत्स्नं कार्यकारणसंघातमात्मा चैतन्यस्वरूपज्योतिषावभासयति। तेन हि सर्वस्य लोकस्य कार्यकारणसंघाते तद्वृत्तिषु चानियतात्माभिमानबुद्धिर्यथाविवेकं जायते। | बुद्धि तो स्वच्छ है और आत्माकी समीपवर्तिनी है, इसलिये वह आत्मचैतन्यकी प्रतिच्छायासे युक्त हो जाती है; इसीसे विवेकियॉको भी पहले उसीमें आत्माभिमानबुद्धि होती है; उसका भी समीपवर्ती होनेसे बुद्धिके सम्पर्कसे मनमें चैतन्यावभासता आती है और मनका [ इन्द्रियोंसे ] सम्पर्क होनेके कारण मनसे इन्द्रियोंमें; फिर इन्द्रियोंका शरीरसे सम्पर्क होनेके कारण उनसे शरीरमें चैतन्यावभासता आ जाती है; इस प्रकार परम्परासे आत्मा सम्पूर्ण देहेन्द्रियसंघातको चैतन्यस्वरूप प्रकाशसे प्रकाशित कर देता है, इसीसे सब लोगोंकी देहेन्द्रियसंघात और उसकी वृत्तियोंमें अपने-अपने विवेकके अनुसार अनियत आत्माभिमानबुद्धि उत्पन्न हो जाती है। | | तथा च भगवतोक्तं गीतासु— | ऐसा ही भगवान्ने भी गीतामें |
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९७
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९७
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| “यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत।।” (१३।३३) “यदादित्यगतं तेजः” (१५।१२) इत्यादि च । “नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानाम्” (२।२।१४) इति च काठके । “तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति” (क० उ० २।२।१६) इति च । “येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः” इति च मन्त्रवर्णः । तेनायं हृद्यन्तर्ज्योतिः। | कहा है—“हे भारत ! जिस प्रकार एक सूर्य इस सम्पूर्ण लोकको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार क्षेत्री [आत्मा] सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता है” “जो आदित्यगत तेज है [वह मेरा ही जानो]” इत्यादि । “जो अनित्योंमें नित्य और चेतनोंमें चेतन है” ऐसा कठोपनिषद्में भी कहा है और ऐसा भी कहा है कि “सब उसीके प्रकाशित होनेसे प्रकाशित होता है तथा यह सब उसीके तेजसे प्रकाशित है।” इनके सिवा “जिसके तेजसे तेजोमय होकर सूर्य तपता है” ऐसा मन्त्रवर्ण भी है। अतः यह आत्मा हृदयान्तर्गत ज्योति है। |
| पुरुषः—आकाशवत् सर्वगतत्वात् पूर्ण इति पुरुषः; निरतिशयं चास्य स्वयंज्योतिष्ट्वम्, सर्वविभासकत्वात् स्वयमन्यानवभास्यत्वाच्च । स एष पुरुषः स्वयमेव ज्योतिःस्वभावः, यं त्वं पृच्छसि—कतम आत्मेति । | ‘पुरुषः’ आकाशके समान सर्वगत होनेके कारण पूर्ण है, इसलिये पुरुष है; सबका प्रकाशक और स्वयं दूसरोंसे अप्रकाश्य होनेके कारण इसकी स्वयंप्रकाशता सबसे बढ़कर है। वह यह पुरुष, जिसके विषयमें तुम पूछते हो कि ‘आत्मा कौन-सा है?’ स्वयं ही ज्योतिःस्वभाव है। |
| (आत्मनः सर्वव्यवहारहेतुत्वम्)<br>बाह्यानां ज्योतिषां सर्वकरणानुग्राहकाणां प्रत्यस्तमयेऽन्तःकरणद्वारेण हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुष आत्मानुग्राहकः करणानामित्युक्तम् । | समस्त इन्द्रियोंकी उपकारक बाह्य ज्योतियोंके अस्त हो जानेपर हृदयके भीतर अन्तर्ज्योतिःस्वरूप पुरुष—पूर्ण आत्मा अन्तःकरणके द्वारा इन्द्रियोंका उपकारक है—ऐसा पहले कहा गया |
बृ० उ० ५७—
८९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| यदापि बाह्यकरणानुग्राहकाणा- <br> मादित्यादिज्योतिषां भावः, तदा- <br> प्यादित्यादिज्योतिषां परार्थत्वात् <br> कार्यकरणसङ्घातस्याचैतन्ये स्वा- <br> र्थानुपपत्तेः स्वार्थज्योतिष <br> आत्मनोऽनुग्रहाभावेऽयं कार्य- <br> करणसङ्घातो न व्यवहाराय <br> कल्पते; आत्मज्योतिरनुग्रहेणैव <br> हि सर्वदा सर्वः संव्यवहारः, <br> “यदेतद् हृदयं मनश्चैतत् संज्ञा- <br> नम्” (ऐ० उ० ३। २) इत्यादि <br> श्रुत्यन्तरात्; साभिमानो हि <br> सर्वप्राणिसंव्यवहारः; अभिमान- <br> हेतुं च मरकतमणिदृष्टान्ते- <br> नावोचाम। <br> यद्यप्येवमेतत्, तथापि जाग्र- <br> द्विषये सर्वकरणागोचरत्वादात्म- <br> ज्योतिषो बुद्ध्यादिबाह्याभ्यन्तर- <br> कार्यकरणव्यवहारसन्निपातव्या- <br> कुलत्वान्न शक्यते तज्ज्योतिरा- <br> त्माख्यं मुञ्जेषीकावन्निष्कृष्य <br> दर्शयितुमित्यतः स्वप्ने दिदर्शयिषुः | है। जिस समय बाह्य इन्द्रियोंकी <br> उपकारक आदित्यादि ज्योतियोंकी <br> भी सत्ता रहती है, उस समय भी <br> आदित्यादि ज्योतियाँ परार्थ होनेके <br> कारण और कार्यकारणसङ्घात <br> अचेतन है, इसलिये उसमें स्वार्थका <br> भाव सम्भव न होनेसे स्वार्थज्योतिः <br> (जिसका प्रकाश अपने ही लिये है <br> उस) आत्माके अनुग्रहके बिना <br> यह देहेन्द्रियसङ्घात व्यवहारमें <br> समर्थ नहीं हो सकता; सारा व्यव- <br> हार सर्वदा आत्मज्योतिके अनुग्रहसे <br> ही होता है, “जो यह हृदय है, वही <br> मन है और वही संज्ञान है” ऐसी <br> एक अन्य श्रुतिसे भी यही सिद्ध <br> होता है। प्राणियोंका सारा व्यव- <br> हार अभिमानपूर्वक ही होता है <br> और अभिमानका हेतु हमने मर- <br> कतमणिके दृष्टान्तसे बतला दिया है। <br> यद्यपि यह बात ऐसी ही है, <br> तथापि जाग्रत्-कालमें आत्मज्योति <br> सारी ही इन्द्रियोंकी अविषय तथा <br> बुद्धि आदि बाह्य और आभ्यन्तर <br> देह एवं इन्द्रिय आदिके व्यवहार- <br> समूहसे चञ्चल रहती है, इसलिये <br> उस आत्मसंज्ञक ज्योतिको मूँजमेंसे <br> सींकके समान निकालकर <br> पृथक्रूपसे नहीं दिखाया जा <br> सकता, अतः उसे स्वप्नमें |
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९९
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९९
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| प्रक्रमते— | दिखानेकी इच्छासे श्रुति आरम्भ करती है। |
| स समानः सन्नुभौ लोकावनुसञ्चरति । यः पुरुषः स्वयमेव ज्योतिरात्मा; स समानः सदृशः सन्—केन ? प्रकृतत्वात् सन्निहितत्वाच्च हृदयेन; ‘हृदि’ इति च हृच्छब्दवाच्या बुद्धिः प्रकृता सन्निहिता च; तस्मात्तयैव सामान्यम् । | वह पुरुष समान रहकर इस लोक और परलोक-दोनोंमें सञ्चार करता है। जो पुरुष स्वयंज्योतिः-स्वरूप आत्मा ही है, वह समान—एक जैसा रहकर; किसके समान रहकर ? प्रकरण-प्राप्त और समीपवर्ती होनेके करण हृदयके; ‘हृदि’ इससे ‘हृत्’ शब्दवाच्य बुद्धि ही प्रकरणप्राप्त है और वही समीपवर्तिनी भी है; अतः उसीसे आत्माकी समानता रहती है। |
| किं पुनः सामान्यम् ? अश्वमहिषवद् विवेकतॊऽनुपलब्धिः; अवभास्या बुद्धिः, अवभासकं तदात्मज्योतिः, आलोकवत्; अवभास्यावभासकयोर्विवेक्तोऽनुपलब्धिः प्रसिद्धा; विशुद्धत्वाद्वद्यालोकोऽवभास्येन सदृशो भवति; यथा रक्तमवभासयन् रक्तसदृशो रक्ताकारो भवति, यथा हरितं नीलं लोहितं च अवभासयन्नालोकः | वह समानता किस प्रकारकी है ? घोड़े और भैंसेके समान उनका अलग-अलग उपलब्ध न होना; बुद्धि प्रकाश्य है और प्रकाशके समान आत्मज्योति प्रकाशक है; प्रकाश्य और प्रकाशकका अलग-अलग उपलब्ध न होना प्रसिद्ध ही है; क्योंकि प्रकाश शुद्ध होनेके कारण प्रकाश्यके समान हो जाता है, जिस प्रकार लाल रंगकी वस्तुको प्रकाशित करते समय वह लालके समान—लाल आकारवाला हो जाता है। एवं हरे, नीले और लोहित पदार्थोंको प्रकाशित करते |
९०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| तत्समानो भवति, तथा बुद्धिमवभासयन् बुद्धिद्वारेण कृत्स्नं क्षेत्रमवभासयति—इत्युक्तं मरकतमणिनिदर्शनेन। तेन सर्वेण समानो बुद्धिसामान्यद्वारेण। | समय वह तद्रूप हो जाता है। इसी प्रकार बुद्धिको प्रकाशित करते समय वह बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करने लगता है; यह बात मरकतमणिके दृष्टान्तसे बतला दी गयी है। इसीसे बुद्धिकी समानताके द्वारा वह सबके समान हो जाता है। | | 'सर्वमयः' इति चात एव वक्ष्यति; तेनासौ कुतश्चित् प्रविभज्य मुञ्जेषीकावत् स्वेन ज्योतिरूपेण दर्शयितुं न शक्यत इति, सर्वव्यापारं तत्राध्यारोप्य नामरूपगतम्, ज्योतिर्धर्मं च नामरूपयोः, नामरूपे चात्मज्योतिषि, सर्वो लोको मोमुह्यते—अयमात्मा नायमात्मा, एवंधर्मा नैवंधर्मा, कर्ताऽकर्ता, शुद्धोऽशुद्धो बद्धो मुक्तः, स्थितो गत आगतः, अस्ति नास्तीत्यादिविकल्पैः। | इसीसे श्रुति उसे 'सर्वमयः' ऐसा कहेगी; अतः यह मूँजसे सींकके समान किसीसे भी अलग करके अपने ज्योतिःस्वरूपसे नहीं दिखाया जा सकता। उसमें नाम-रूपके सारे व्यापारोंका, नाम-रूपमें ज्योतिके धर्मका तथा आत्मज्योतिमें नाम-रूपका आरोप करके सम्पूर्ण लोक 'यह आत्मा है, यह आत्मा नहीं है, आत्मा ऐसे धर्मोंवाला है, ऐसे धर्मोंवाला नहीं है, कर्ता है, अकर्ता है, शुद्ध है, अशुद्ध है, बद्ध है, मुक्त है, स्थित है, गत है, आगत है, सद्रूप है, असद्रूप है' इत्यादि विकल्पोंसे अत्यन्त मोहित हो रहा है। | | अतः समानः सन्नुभौ लोकौ प्रतिपन्नप्रतिपत्तव्यौ इहलोकपरलोकावुपात्तदेहेन्द्रियादिसङ्घातत्यागान्योपादानसन्तानप्रबन्धशतसन्निपातैरनुक्रमेण सञ्चरति। | अतः यह समान रहकर प्राप्त इहलोक और प्राप्त करने योग्य परलोक—इन दोनोंमें प्राप्त देहेन्द्रियसङ्घातके त्याग और अप्राप्त देहेन्द्रिय सङ्घातके ग्रहणकी परम्परासे निरन्तर सैकड़ों सम्बन्धोंके क्रमसे सञ्चार करता रहता है। तात्पर्य यह है कि उसके |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०१
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०१
| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी (भाष्यार्थ) |
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| धीसादृश्यमेवोभयलोकसञ्चरणहेतुर्न स्वत इति । | दोनों लोकोंमें सञ्चारका कारण बुद्धिकी सदृशता ही है, वह स्वयं सञ्चार नहीं करता । |
| तत्र नामरूपोपाधिसादृश्यं भ्रान्तिरेवात्मनः भ्रान्तिनिमित्तं यत्संसरणहेतुः तदेव हेतुर्न स्वतः, इत्येतदुच्यते—यस्मात् स समानः सन्नुभौ लोकावनुक्रमेण सञ्चरति—तदेतत् प्रत्यक्षमित्येतद्दर्शयति—यतो ध्यायतीव ध्यानव्यापारं करोतीव, चिन्तयतीव, ध्यानव्यापारवतीं बुद्धिं स तटस्थेन चित्स्वभावज्योतिरूपेणावभासयन् तत्सदृशस्तत्समानः सन् ध्यायतीव, आलोकवदेव—अतो भवति चिन्तयतीति भ्रान्तिर्लोकस्य; न तु परमार्थतो ध्यायति । | इस सञ्चारमें जो भ्रान्तिजनित नामरूपोपाधिकी सदृशता है, वही हेतु है, वह स्वतः सञ्चार नहीं करता—यही बात अब बतलायी जाती है; क्योंकि वह समान रहकर क्रमशः दोनों लोकोंमें सञ्चार करता है—यह बात प्रत्यक्ष ही है, सो श्रुति दिखलाती है—क्योंकि वह मानो ध्यान करता है—ध्यानव्यापार-सा करता है, चिन्तन-सा करता है । तात्पर्य यह है कि वह प्रकाशके समान ही अपने चित्स्वभाव ज्योतिःस्वरूपसे ध्यानव्यापारवती बुद्धिको तटस्थरूपसे प्रकाशित करता हुआ उसीके समान होकर मानो ध्यान करता है । इसीसे लोकको ऐसी भ्रान्ति होती है कि वह चिन्तन करता है; किंतु वह वस्तुतः ध्यान नहीं करता । |
| तथा लेलायतीव अत्यर्थं चलतीव, तेष्वेव करणेषु बुद्ध्यादिषु वायुषु च चलत्सु तदवभासकत्वात् तत्सदृशं तदिति—लेलायतीव, न तु परमार्थतश्चलनधर्मकं तदात्मज्योतिः । | इसी प्रकार 'लेलायतीव'—मानो अधिक चलता है । उन इन्द्रियोंके अर्थात् बुद्धि आदि वायुओंके चलनेपर उनका अवभासक होनेके कारण वह उनके समान जान पड़ता है; इसीसे मानो अधिक चलता है । वास्तवमें तो वह आत्मज्योति चलनधर्मवाली नहीं है । |
९०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| कथं पुनरेतदवगम्यते, तत्समानत्वभ्रान्तिरेवोभयलोकसञ्चरणादिहेतुर्न स्वतः--इत्यस्यार्थस्य प्रदर्शनाय हेतुरुपदिश्यते—स आत्मा हि यस्मात् स्वप्नो भूत्वा, स यया धिया समानः, सा धीर्यद् यद् भवति तत्तदसावपि भवतीव; तस्माद् यदासौ स्वप्नो भवति स्वापवृत्तिं प्रतिपद्यते धीः, तदा सोऽपि स्वप्नवृत्तिं प्रतिपद्यते; यदा धीर्जिजागरिषति, तदा असावपि।<br><br>अत आह-स्वप्नो भूत्वा स्वप्नवृत्तिमवभासयन् धियः स्वापवृत्त्याकारो भूत्वेमं लोकं जागरितव्यवहारलक्षणं कार्यकारणसङ्घातात्मकं लौकिकशास्त्रीयव्यवहारास्पदम्, अतिक्रामत्यतीत्य क्रामति, विविक्तेन स्वेन आत्मज्योतिषा स्वप्नात्मिकां धीवृत्तिमवभासयन्न- | किंतु यह कैसे जाना जाता है कि उन बुद्धि आदिकी समानताकी भ्रान्ति ही आत्माके दोनों लोकोंमें सञ्चारादि करनेका हेतु है, वह स्वतः सञ्चारादि नहीं करता-इसी अर्थको प्रदर्शित करनेके लिये हेतु बतलाया जाता है-'क्योंकि वह आत्मा ही स्वप्न होकर [ इस लोकका अतिक्रमण करता है ]।' वह जिस बुद्धिके समान होता है, वह बुद्धि जो-जो होती है, वही-वही मानो यह भी हो जाता है; इसलिये जिस समय वह स्वप्न होती है अर्थात् जिस समय बुद्धि स्वप्नवृत्तिको प्राप्त होती है, उस समय यह आत्मा भी स्वप्नवृत्तिको प्राप्त हो जाता है; और जिस समय बुद्धि जागनेकी इच्छा करती है उस समय यह भी जागना चाहता है।<br><br>इसलिये श्रुति कहती है—स्वप्न होकर-बुद्धिकी स्वप्नवृत्तिको प्रकाशित करता हुआ अर्थात् स्वप्नवृत्त्याकार होकर लौकिक एवं शास्त्रीय व्यवहारके योग्य इस देहेन्द्रियसङ्घातमय जागरित व्यवहाररूप लोकका अतिक्रमण कर जाता है अर्थात् इसको पार करके चला जाता है, उस समय चूँकि यह अपने विशुद्ध आत्मतेजसे बुद्धिकी स्वप्नात्मिका वृत्तिको प्रकाशित करता हुआ |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०३
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०३
| संस्कृत शाङ्करभाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| वतिष्ठते यस्मात्—तस्मात् स्वयंज्योतिःस्वभाव एवासौ; विशुद्धः स कर्तृक्रियाकारकफलशून्यः परमार्थतः, धीसादृश्यमेव तु उभयलोकसञ्चारादिसंव्यवहारभ्रान्तिहेतुः। | स्थित रहता है, इसलिये यह स्वयं-ज्योतिःस्वरूप ही है; वह वस्तुतः कर्ता, क्रिया, कारक एवं फलसे रहित शुद्धस्वरूप है, उसके दोनों लोकोंमें सञ्चारादि व्यवहाररूप भ्रान्तिकी हेतु बुद्धिके समान होना ही है। |
| मृत्यो रूपाणि, मृत्युः कर्माविद्यादिः, न तस्यान्यद् रूपं स्वतः, कार्यकारणान्येवास्य रूपाणि; अतस्तानि मृत्यो रूपाण्यतिक्रामति क्रियाफलाश्रयाणि। | मृत्युके रूपोंको—कर्म एवं अविद्यादि ही मृत्यु हैं, इनके सिवा उसका स्वतः कोई रूप नहीं है; देह और इन्द्रियाँ ही उसके रूप हैं; अतः कर्म और फलके आश्रयभूत उन मृत्युके रूपोंको वह पार कर जाता है। |
| ननु नास्त्येव धिया समान-[व्यतिरिक्तात्म-सत्तायामाक्षेपः] मन्यद् धियोऽवभासकमात्मज्योतिः, धीव्यतिरेकेण प्रत्यक्षेण वा अनुमानेन वानुपलम्भात्—यथान्या तत्काल एव द्वितीया धीः। यच्चवभास्यावभासकयोरन्यत्वेऽपि विवेकानुपलम्भात् सादृश्यमिति घटाद्यालोकयोः—तत्र भवत्वन्यत्वे न आलोकस्योपलम्भाद् घटादेः, संश्लिष्टयोः सादृश्यं भिन्नयोरेव; न च तथेह घटादेरिव धियोऽव- | पूर्व०—किंतु बुद्धिके समान बुद्धिको प्रकाशित करनेवाली कोई अन्य आत्मज्योति तो है नहीं, क्योंकि प्रत्यक्ष अथवा अनुमानसे भी बुद्धिसे व्यतिरिक्त उसकी उपलब्धि नहीं होती जिस प्रकार कि उसी कालमें [अर्थात् एक बुद्धिकी उपलब्धिके समय] दूसरी बुद्धिकी उपलब्धि नहीं होती। और ऐसा जो कहा कि अवभास्य घट आदि और अवभासक आलोकका भेद होनेपर भी विवेक न हो सकनेके कारण सादृश्य है, सो वहाँ आलोककी भिन्नरूपसे उपलब्धि होनेके कारण उन दोनोंके भिन्न होनेपर भी घटादिके साथ मिलनेपर सदृशता हो सकती है, किंतु यहाँ |
९०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| भासकं ज्योतिरन्तरं प्रत्यक्षेण वानुमानेन वोपलभामहे; धीरेव हि चित्स्वरूपावभासकत्वेन स्वाकारा विषयाकारा च; तस्मान्नानुमानतो नापि प्रत्यक्षतो धियोऽवभासकं ज्योतिः शक्यते प्रतिपादयितुं व्यतिरिक्तम् । | तो घटादिके समान प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाणसे भी बुद्धिकी प्रकाशक कोई अन्य ज्योति हमें उपलब्ध नहीं होती; अपि तु चित्स्वरूपसे प्रकाशक होनेके कारण बुद्धि ही बुद्ध्याकार और विषयाकार हो जाती है । अतः बुद्धिकी अवभासक उससे भिन्न कोई अन्य ज्योति न तो अनुमानसे और न प्रत्यक्षसे ही बतलायी जा सकती है। | | यदपि दृष्टान्तरूपमभिहितम्, अवभास्यावभासकयोर्भिन्नयोरेव घटाद्यालोकयोः संयुक्तयोः सादृश्यमिति—तत्राभ्युपगममात्रमस्माभिरुक्तम्; न तत्र घटाद्यवभास्यावभासकौ भिन्नौ; परमार्थतस्तु घटादिरेवावभासात्मकः सालोकः; अन्योऽन्यो हि घटादिरुत्पद्यते; विज्ञानमात्रमेव सालोकघटादिविषयाकारमवभासते; यदैवम्, तदा न बाह्यो दृष्टान्तोऽस्ति, विज्ञानलक्षणमात्रत्वात् सर्वस्य । | इसके सिवा [स्वरूपतः] भिन्न किंतु परस्पर मिले हुए अवभास्य घटादि और अवभासक आलोकका जो दृष्टान्तरूपसे सादृश्य बतलाया गया है, उसे भी हमने एक प्रकारकी मान्यतामात्र कहा है; किंतु वहाँ घटादि अवभास्य और उनका अवभासक भिन्न नहीं हैं; वास्तवमें तो आलोकके सहित घटादि ही अवभासस्वरूप हैं । अन्य-अन्य घटादि उत्पन्न होते रहते हैं, केवल विज्ञान ही आलोकसहित घटादिरूप विषयके आकारमें भासित होता रहता है । जब कि ऐसी बात है, तो वस्तुतः कोई बाह्य दृष्टान्त नहीं है, क्योंकि सब कुछ विज्ञानस्वरूपमात्र ही है।¹ |
१. यहाँतक विज्ञानवादी बौद्धोंका मत कहा गया, इससे आगे इस मतका अनुवाद करते हुए शून्यवादी बौद्धोंका मत बतलाते हैं ।
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०५
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०५
| शून्यवादिमतानुवादः एवं तस्यैव विज्ञानस्य ग्राह्यग्राहकाकारतामलं परिकल्प्य, तस्यैव पुनर्विशुद्धिं परिकल्पयन्ति; तद्ग्राह्यग्राहकविनिर्मुक्तं विज्ञानं स्वच्छीभूतं क्षणिकं व्यवतिष्ठत इति केचित् । तस्यापि शान्तिं केचिदिच्छन्ति; तदपि विज्ञानं संवृतं ग्राह्यग्राहकांशविनिर्मुक्तं शून्यमेव घटादिबाह्यवस्तुवदित्यपरे माध्यमिका आचक्षते । | सिद्धान्ती— इस प्रकार उस विज्ञानकी ही ग्राह्य-ग्राहकाकारताकी पूर्णतया कल्पना कर फिर उसीकी अत्यन्त शुद्धिकी कल्पना करते हैं; वह ग्राह्य-ग्राहकभावसे रहित विज्ञान स्वच्छ और क्षणिकरूपसे स्थित है—ऐसा किन्हीं-किन्हींका मत है। कोई तो उस क्षणिक विज्ञानकी भी शान्ति करना चाहते हैं; अविद्यासे आच्छादित वह विज्ञान भी घटादि बाह्य वस्तुओंके समान ग्राह्य-ग्राहकांशसे रहित शून्यमात्र ही है—ऐसा दूसरे माध्यमिक बौद्ध कहते हैं। | | तन्निरासः सर्वा एताः कल्पना बुद्धिविज्ञानावभासकस्य व्यतिरिक्तस्यात्मज्योतिषोऽपह्नवादस्य श्रेयोमार्गस्य प्रतिपक्षभूतावैदिकस्य । तत्र येषां बाह्योऽर्थोऽस्ति, तान् प्रत्युच्यते— | ये सारी कल्पनाएँ बुद्धिरूप विज्ञानके अवभासक एवं उससे व्यतिरिक्त आत्मज्योतिका त्याग करनेवाली होनेसे इस वैदिक कल्याणमार्गकी विघ्नरूपा हैं। अब जिनके मतमें घटादि बाह्य पदार्थकी सत्ता है, उनसे कहा जाता है— | | न तावत् स्वात्मावभासकत्वं घटादेः, तमस्यवस्थितो घटादिस्तावन्न कदाचिदपि स्वात्मनावभास्यते; प्रदीपाद्यालोकसंयोगेन तु नियमेनैवावभास्यमानो दृष्टः सालोको घट इति; संश्लिष्टयोरपि घटालोकयोरन्य- | घटादि स्वयं ही अपने प्रकाशक हों—ऐसी बात तो है नहीं; अँधेरेमें रखे हुए घटादि तो कभी अपने-आप प्रकाशित होते ही नहीं; हाँ, दीपकादिके प्रकाशसे संयोग होनेपर तो 'यह घट प्रकाशयुक्त है' इस प्रकार उसका नियमसे प्रकाशित होना देखा जाता है; मिले हुए घट और प्रकाश भी एक-दूसरे- |
९०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| त्वमेव; पुनः पुनः संश्लेषे विश्लेषे च विशेषदर्शनाद्रज्जुघटयोरिव । अन्यत्वे च व्यतिरिक्तावभासकत्वम्; न स्वात्मनैव स्वात्मानमवभासयति । | से हैं भिन्न ही; क्योंकि रस्सी और घटके समान उनका पुनः-पुनः संयोग और वियोग होनेपर उनमें विशेषता दिखायी देती है। इस प्रकार यदि उनका भेद है तो प्रकाश्य पदार्थोंका कोई अन्य प्रकाशक है—यह भी सिद्ध हो जाता है; वे स्वयं ही अपनेको प्रकाशित नहीं करते। |
| (विज्ञानस्य स्वयंप्रकाशत्वे प्रदीपदृष्टान्तोपन्यासः)<br>ननु प्रदीपः स्वात्मानमेवावभासयन् दृष्ट इति न हि घटादिवत् प्रदीपदर्शनाय प्रकाशान्तरमुपाददते लौकिकाः; तस्मात् प्रदीपः स्वात्मानं प्रकाशयति । | **पूर्व०—**किंतु दीपक तो स्वयं ही अपनेको प्रकाशित करता देखा जाता है; क्योंकि लौकिक पुरुष घटादिके समान दीपकको देखनेके लिये कोई अन्य प्रकाश ग्रहण नहीं करते; इसलिये दीपक स्वयं ही अपनेको प्रकाशित करता है। |
| (तन्निरासनम्)<br>न, अवभास्यत्वाविशेषात्; यद्यपि प्रदीपोऽन्यस्यावभासकः स्वयमवभासात्मकत्वात्, तथापि व्यतिरिक्तचैतन्यावभास्यत्वं न व्यभिचरति, घटादिवदेव यदा चैवम्, तदा व्यतिरिक्तावभास्यत्वं तावदवश्यम्भावि । | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है; क्योंकि प्रकाश्यत्वमें दीपककी घटादिसे समानता है, यद्यपि स्वयं प्रकाशस्वरूप होनेके कारण दीपक दूसरोंका प्रकाशक है, तथापि घटादिके समान ही वह अपनेसे भिन्न चैतन्यद्वारा प्रकाशित होनेकी योग्यताका त्याग नहीं करता; जब कि ऐसी बात है, तो अपनेसे भिन्नसे प्रकाशित होना तो अनिवार्य ही है। |
| ननु यथा घटश्चैतन्यावभास्यत्वेऽपि व्यतिरिक्तमालोकान्त- | **पूर्व०—**किंतु जिस प्रकार चैतन्यसे अवभासित होने योग्य होनेपर भी घटको अपनेसे भिन्न दूसरे आलोककी |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९०७
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९०७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| रमपेक्षते, न त्वेवं प्रदीपोऽन्यमालोकान्तरमपेक्षते; तस्मात् प्रदीपोऽन्यावभास्योऽपि सन्नात्मानं घटं चावभासयति । | अपेक्षा होती है, उस प्रकार दीपकको तो किसी अन्य प्रकाशकी अपेक्षा नहीं होती; अतः अन्यसे अवभासित होनेवाला होनेपर भी दीपक अपनेको और घटको प्रकाशित करता है । |
| न, स्वतः परतो वा विशेषाभावात्—यथा चैतन्यावभास्यत्वं घटस्य, तथा प्रदीपस्यापि चैतन्यावभास्यत्वमविशिष्टम् । | सिद्धान्ती—नहीं, उसमें स्वतः अथवा परतः कोई भी विशेषता नहीं है; जिस प्रकार घट चैतन्यसे अवभासित होनेवाला है, उसी प्रकार उसके समान ही दीपक भी चैतन्यसे अवभासित होनेवाला है । |
| यत्तूच्यते, प्रदीप आत्मानं घटं चावभासयतीति, तदसत्; कस्मात् ? यदा आत्मानं नावभासयति, तदा कीदृशः स्यात् ? न हि तदा प्रदीपस्य स्वतो वा परतो वा विशेषः कश्चिदुपलभ्यते; स ह्यवभास्यो भवति, यस्यावभासकसंनिधावसंनिधौ च विशेष उपलभ्यते; न हि प्रदीपस्य स्वात्मसन्निधिरसन्निधिर्वा शक्यः कल्पयितुम्; असति च कादा- | तथा ऐसा जो कहा जाता है कि दीपक अपनेको और घटको भी प्रकाशित करता है; सो यह भी ठीक नहीं है; क्यों नहीं है ? सो बतलाते हैं—जिस समय दीपक अपनेको प्रकाशित नहीं करता, उस समय वह कैसा रहता है ? उस अवस्था में तो दीपकका अपनेसे अथवा अन्यसे कोई भी अन्तर नहीं देखा जाता; अवभास्य तो वही होता है, जिसमें अवभासककी सन्निधि अथवा असन्निधि होनेपर कोई अन्तर देखा जाय । किंतु दीपककी अपनेसे ही सन्निधि अथवा असन्निधि होनेकी कल्पना नहीं की जा सकती; अतः इस प्रकार कभी-कभी [ सन्निधि अथवा असन्निधिके कारण ] होनेवाले अन्तर- |
| ९०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
| ९०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| चित्के विशेषे, आत्मानं प्रदीपः प्रकाशयतीति मृषैवोच्यते । | के न होनेपर 'दीपक अपनेको प्रकाशित करता है' ऐसा मिथ्या ही कहा जाता है । | | चैतन्यग्राह्यत्वं तु घटादिभिरविशिष्टं प्रदीपस्य; तस्माद् विज्ञानस्यात्मग्राह्यग्राहकत्वे न प्रदीपो दृष्टान्तः । चैतन्यग्राह्यत्वं च विज्ञानस्य बाह्यविषयैरविशिष्टम् । | दीपकका चैतन्यग्राह्य होना तो घटादिके समान ही है; अतः विज्ञानके अपने ही ग्राह्य और ग्राहक होनेमें दीपक दृष्टान्त नहीं हो सकता । हां, विज्ञानका चैतन्य ग्राह्य होना तो बाह्य विषयोंके समान ही है । | | चैतन्यग्राह्यत्वे च विज्ञानस्य, किं ग्राह्यविज्ञानग्राह्यतैव, किं वा ग्राहकविज्ञानग्राह्यतेति तत्र सन्दिह्यमाने वस्तुनि, योऽन्यत्र दृष्टो न्यायः स कल्पयितुं युक्तो न तु दृष्टविपरीत:; तथा च सति यथा व्यतिरिक्तेनैव ग्राहकेण बाह्यानां प्रदीपानां ग्राह्यत्वं दृष्टम् तथा विज्ञानस्यापि चैतन्यग्राह्यत्वात् प्रकाशकत्वे सत्यपि प्रदीपवद् व्यतिरिक्तचैतन्यग्राह्यत्वं युक्तं कल्पयितुम्, न त्वनन्यग्राह्यत्वम्; यश्चान्यो विज्ञानस्य ग्रहीता, स | विज्ञानकी चैतन्यग्राह्यता सिद्ध होनेपर भी क्या ग्राह्य (विषय-विषयक) विज्ञानकी ग्राह्यता है अथवा ग्राहक (विषयिविषयक) विज्ञानकी ? इस प्रकार वस्तुके विषयमें संदेह होनेपर जो न्याय अन्य पदार्थोंके विषयमें देखा गया है, उसीकी यहाँ भी कल्पना करनी चाहिये, दृष्टन्यायसे विपरीत कल्पना करनी उचित नहीं है; ऐसी स्थितिमें, जिस प्रकार अपनेसे व्यतिरिक्त ग्राहकके द्वारा बाह्य प्रदीपोंकी ग्राह्यता देखी गयी है, उसी प्रकार विज्ञानकी भो चैतन्यग्राह्यता होनेके कारण, प्रकाशक होनेपर भी दीपकके समान अपनेसे भिन्न चैतन्यद्वारा ही ग्राह्यता कल्पना करनी चाहिये, उसकी अनन्यग्राह्यता (विज्ञानग्राह्यता) माननी उचित नहीं है, इस प्रकार जो विज्ञानका ग्रहीता |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९०९
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९०९
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| आत्मा ज्योतिरन्तरं विज्ञानात् । | है, वह आत्मा विज्ञानसे भिन्न ज्योति है। |
| तदानवस्थेति चेन्न, ग्राह्यत्वमात्रं हि तद्ग्राहकस्य वस्त्वन्तरत्वे लिङ्गमुक्तं न्यायतः; न त्वेकान्ततो ग्राहकत्वे तद्ग्राहकान्तरास्तित्वे वा कदाचिदपि लिङ्गं सम्भवति; तस्मान्न तदनवस्थाप्रसङ्गः । | यदि कहो कि तब तो अनवस्था हो जायगी, तो ऐसी बात नहीं है। किसी वस्तुका ग्राह्य होना ही उसके ग्राहकके अन्य पदार्थ होनेमें न्यायतः लिङ्ग कहा गया है; किंतु उस आत्माके अव्यभिचारी ग्राहकत्व और उसके किसी अन्यग्राहकके अस्तित्वमें कभी कोई लिङ्ग होना सम्भव नहीं है, इसलिये उस अनवस्थाका प्रसङ्ग नहीं हो सकता। |
| विज्ञानस्य व्यतिरिक्तग्राह्यत्वे करणान्तरापेक्षायामनवस्थेति चेन्न, नियमाभावात्—न हि सर्वत्रायं नियमो भवति; यत्र वस्त्वन्तरेण गृह्यते वस्त्वन्तरम्, तत्र ग्राह्यग्राहकव्यतिरिक्तं करणान्तरं स्यादिति नैकान्तेन नियन्तुं शक्यते, वैचित्र्यदर्शनात्; | यदि कहो कि विज्ञानको किसी अन्यसे ग्राह्य माननेपर इन्द्रियान्तरकी अपेक्षा होनेके कारण अनवस्था होगी तो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि ऐसा नियम नहीं है—सर्वत्र यही नियम नहीं होता, जहां किसी अन्य वस्तुसे कोई अन्य वस्तु ग्रहण की जाती है, वहां ग्राह्य और ग्राहकसे भिन्न कोई अन्य इन्द्रिय भी होनी चाहिये—ऐसा कोई अनिवार्य नियम नहीं किया जा सकता; क्योंकि इसमें विचित्रता |
| कथम् ? घटस्तावत् स्वात्मव्यतिरिक्तेनात्मना गृह्यते; तत्र प्रदीपादिरालोको ग्राह्यग्राहकव्यतिरिक्तं करणम्, न हि प्रदीपाद्यालोको | देखी जाती है; किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] घट अपनेसे भिन्न आत्माके द्वारा गृहीत होता ही है; वहां ग्राह्य और ग्राहकसे भिन्न प्रदीपादि प्रकाश उसका करण है; क्योंकि प्रदीपादिका |
९१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| संस्कृत मूल / भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| घटांशश्चक्षूरंशो वा; घटवच्चक्षुर्ग्राह्यत्वेऽपि प्रदीपस्य, चक्षुःप्रदीपव्यतिरेकेण न बाह्यालोकस्थानीयं किञ्चित् करणान्तरमपेक्षते। तस्मान्नैव नियन्तुं शक्यते—यत्र यत्र व्यतिरिक्तग्राह्यत्वं तत्र तत्र करणान्तरं स्यादेवेति। तस्माद् विज्ञानस्य व्यतिरिक्तग्राहकग्राह्यत्वे न करणद्वारानवस्था, नापि ग्राहकत्वद्वारा कदाचिदप्युपपादयितुं शक्यते; तस्मात् सिद्धं विज्ञानव्यतिरिक्तमात्मज्योतिरन्तरमिति। | आलोक न घटका अंश है और न नेत्रका ही; किंतु दीपक घटके समान नेत्रसे ग्राह्य होनेपर भी नेत्र और दीपकसे व्यतिरिक्त बाह्य प्रकाशस्थानीय किसी अन्य करणकी अपेक्षा नहीं करता। इसलिये ऐसा नियम नहीं किया जा सकता कि जहाँ-जहाँ अपनेसे भिन्न वस्तुद्वारा ग्राह्यता होती है, वहाँ-वहाँ कोई अन्य करण होना ही चाहिये। अतः विज्ञानकी व्यतिरिक्तग्राहकग्राह्यता होनेपर भी न तो करणके कारण और न ग्राहकत्वके द्वारा ही कभी अनवस्था सिद्ध की जा सकती है; अतः विज्ञानसे पृथक् आत्मज्योति दूसरी ही है—यह सिद्ध हुआ। |
| (विज्ञानातिरिक्तग्राह्यग्राहकस्यासत्त्वोपपादनं तन्निरासश्च)<br><br>ननु नास्त्येव बाह्योऽर्थो घटादिः प्रदीपो वा विज्ञानव्यतिरिक्तः, यद्धि यद्व्यतिरेकेण नोपलभ्यते, तत्तन्मात्रं वस्तु दृष्टम्—यथा स्वप्नविज्ञानग्राह्यं घटपटादिवस्तु स्वप्नविज्ञानव्यतिरेकेणानुपलम्भात् स्वप्नघटप्रदीपादेः स्वप्नविज्ञानमात्रतावगम्यते, तथा जागरितेऽपि घटप्रदीपादेर्जाग्रद्विज्ञानव्यतिरेकेणानुपलम्भाज्जाग्रद्विज्ञानमात्रतैव | विज्ञानवादी— किंतु घटादि अथवा दीपक आदि कोई बाह्य पदार्थ विज्ञानसे व्यतिरिक्त तो है ही नहीं, जो वस्तु जिसके बिना उपलब्ध नहीं होती, वह तत्स्वरूप ही देखी गयी है—जिस प्रकार स्वप्नविज्ञानसे गृहीत होनेवाली घट-पटादि वस्तु स्वप्नविज्ञानसे अलग उपलब्ध न होनेके कारण स्वप्नदृष्ट घट-प्रदीपादिकी स्वप्नविज्ञानमात्रता ज्ञात होती है; इसी प्रकार जागरित-अवस्थामें भी घट एवं प्रदीपादिकी जाग्रद्विज्ञानके सिवा उपलब्धि न होनेके कारण जाग्रद्विज्ञान- |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९११
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९११
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| युक्ता भवितुम् । तस्मान्नास्ति बाह्योऽर्थो घटप्रदीपादिः, विज्ञानमात्रमेव तु सर्वम्; तत्र यदुक्तम्—विज्ञानस्य व्यतिरिक्तावभास्यत्वाद् विज्ञानव्यतिरिक्तमस्ति ज्योतिरन्तरं घटादेरिवेति, तन्मिथ्या, सर्वस्य विज्ञानमात्रत्वे दृष्टान्ताभावात् । | मात्रता ही होनी उचित है अतः घट एवं प्रदीपादि बाह्य पदार्थ हैं ही नहीं, सब कुछ विज्ञानमात्र ही है; ऐसी स्थितिमें जो यह कहा गया कि घटादिके समान विज्ञान भी अपनेसे भिन्न साक्षीद्वारा भाष्य है, इसलिये उससे व्यतिरिक्त कोई अन्य ज्योति है, सो यह ठीक नहीं, क्योंकि जब सभी विज्ञानमात्र है, तो [उससे भिन्न कोई अन्य ज्योति है; इसमें] कोई दृष्टान्त नहीं हो सकता। |
| न, यावत्तावदभ्युपगमात्— <br><br> न तु बाह्योऽर्थो भवता एकान्तेनैव नाभ्युपगम्यते; | सिद्धान्ती—ऐसी बात मत कहो, जहांतक तुम बाह्यार्थकी सत्ता स्वीकार करते हो वहाँतक तो है ही। तुम सर्वथा ही बाह्यार्थ न मानते हो—ऐसी बात तो है नहीं। |
| ननु मया नाभ्युपगम्यत एव । | विज्ञान०—हां, मैं तो नहीं ही मानता। |
| न, विज्ञानं घटः प्रदीप इति च शब्दार्थपृथक्त्वाद् यावत्, तावदपि बाह्यमर्थान्तरमवश्यमभ्युपगन्तव्यम् । विज्ञानादर्थान्तरं वस्तु न चेदभ्युपगम्यते, विज्ञानं घटः पट इत्येवमादीनां शब्दानामेकार्थत्वे पर्यायशब्दत्वं प्राप्नोति । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि 'विज्ञान, घट, प्रदीप' इत्यादि शब्द और इनके अर्थ पृथक् हैं, जबतक ऐसा है, तबतक भी तुम्हें बाह्य अर्थान्तर अवश्य स्वीकार करना होगा । यदि विज्ञानसे भिन्न कोई अन्य पदार्थ नहीं माना जायगा तो विज्ञान, घट, पट इत्यादि शब्दोंका एक (विज्ञान-मात्र) ही अर्थ माननेपर इनका पर्याय शब्द होना सिद्ध होगा। |
| ९१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
| ९१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| तथा साधनानां फलस्य चैकत्वे, साध्यसाधनभेदोपदेशशास्त्रानर्थक्यप्रसङ्गः; तत्कर्तुरज्ञानप्रसङ्गो वा। | इस प्रकार साधन और फलकी भी एकता होनेपर तो साध्य-साधनरूप भेदका उपदेश करनेवाले शास्त्रकी व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, तथा उनके रचयिताओंके भी अज्ञानका प्रसङ्ग होगा ! | | किञ्चान्यत्—विज्ञानव्यतिरेकेण वादिप्रतिवादिवाददोषाभ्युपगमात्; न ह्यात्मविज्ञानमात्रमेव वादिप्रतिवादिवादस्तद्दोषो वाभ्युपगम्यते, निराकर्तव्यत्वात् प्रतिवाद्यादीनाम्; न ह्यात्मीयं विज्ञानं निराकर्तव्यमभ्युपगम्यते, स्वयं वा आत्मा कस्यचित्; तथा च सति सर्वसंव्यवहारलोपप्रसङ्गः। | इसके सिवा दूसरी बात यह है कि वादी-प्रतिवादीके वाद और दोष ये विज्ञानसे व्यतिरिक्त ही स्वीकार किये जाते हैं; वादी और प्रतिवादीके वाद अथवा दोष—आत्मविज्ञानमात्र ही नहीं स्वीकार किये जाते; क्योंकि प्रतिवादी आदिके लिये इनका निराकरण करना आवश्यक होता है; किंतु किसीके भी लिये अपना विज्ञान अथवा स्वयं आत्मा ही निराकरणके योग्य नहीं होता, यदि ऐसा हो तब तो सब प्रकारके सम्यक् व्यवहारके लोपका ही प्रसङ्ग उपस्थित हो जाय। | | न च प्रतिवाद्यादयः स्वात्मनैव गृह्यन्त इत्यभ्युपगमः; व्यतिरिक्तग्राह्या हि तेऽभ्युपगम्यन्ते। तस्मात् तद्वत् सर्वमेव व्यतिरिक्तग्राह्यं वस्तु जाग्रद्विषयत्वात्, | प्रतिवादी आदि विज्ञानरूप आत्मासे ही ग्रहण किये जाते हैं—ऐसा विज्ञानवादीको स्वीकार भी नहीं है; वे अपनेसे भिन्न वादी आदिके द्वारा ही ग्रहण किये जाते हैं—ऐसी मान्यता है। अतः उन्हींके समान सब वस्तुएँ अपनेसे भिन्न ग्राहकद्वारा ही ग्राह्य हैं, क्योंकि वे जाग्रत्के विषय हैं, |