बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे २७३
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे २७३
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| विघ्नं कुर्युर्देवाः—यन्नात्मत्वमेव देवानां ब्रह्मविदः। | प्राप्त हो जाता है तो देवगण किसके द्वारा किसे विघ्न करेंगे ? |
| तदेतदाह—आत्मा स्वरूपं ध्येयं यत्तत्सर्वशास्त्रैर्विज्ञेयं ब्रह्म, हि यस्मात्, एषां देवानाम्, स ब्रह्मविद्भवति। ब्रह्मविद्यासमकालमेवाविद्यामात्रव्यवधानापगमाच्छुक्तिकाया इव रजताभासायाः शुक्तिकात्वमित्यवोचाम। अतो नात्मनः प्रतिकूलत्वे देवानां प्रयत्नः सम्भवति। यस्य ह्यनात्मभूतं फलं देशकालनिमित्तान्तरितम्, तत्रानात्मविषये सफलः प्रयत्नो विघ्नाचरणाय देवानाम्। न त्विह विद्यासमकाल आत्मभूते देशकालनिमित्तानन्तरिते, अवसरानुपपत्तेः। | यही बात श्रुति कहती है—क्योंकि वह ब्रह्मवेत्ता इन देवताओंका आत्मा—ध्येयस्वरूप अर्थात् जो सम्पूर्ण शास्त्रोंसे विज्ञेय ब्रह्म है वही हो जाता है, क्योंकि हम कह चुके हैं कि रजतरूपसे भासनेवाली शुक्तिके शुक्तिकात्वका ज्ञान होते ही जैसे भ्रान्तिजनित रजतत्वकी निवृत्ति हो जाती है वैसे ही ब्रह्मज्ञान होनेके समय ही अविद्यामात्र व्यवधानकी निवृत्ति हो जाती है। अतः आत्माकी प्रतिकूलतामें देवताओंका प्रयत्न होना सम्भव नहीं है। जहाँ देश, काल और निमित्तसे व्यवहित अनात्मभूत फल होता है वहाँ अनात्मविषयमें ही विघ्न करनेके लिये देवताओंका प्रयत्न सफल हो सकता है। यहाँ देश, काल और निमित्तसे अव्यवहित और ज्ञानोदयकालमें ही देवताओंके आत्मत्वको प्राप्त हो जानेवाले ब्रह्मवेत्ताके प्रति विघ्न करनेमें उनका प्रयत्न सफल नहीं होता, क्योंकि इसके लिये उन्हें अवसर मिलना ही सम्भव नहीं है। |
बृ० उ० १८—
२७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| अविद्यानिवृत्तौ विद्यावृत्तेः सामर्थ्य-विवेचनम् | |
|---|---|
| एवं तर्हि विद्याप्रत्ययसन्तत्याभावाद् विपरीतप्रत्ययतत्कार्ययोश्च दर्शनाद् अन्त्य एवात्मप्रत्ययोऽविद्यानिवर्तको न तु पूर्व इति । | **पूर्व०—**यदि ऐसी बात है तो बोधवृत्तिके प्रवाहका अभाव होनेके कारण तथा विपरीत वृत्ति और उसका कार्य देखा जानेसे यह निश्चय होता है कि अन्तिम आत्माकारवृत्ति ही अविद्याकी निवृत्ति करनेवाली हो सकती है, पहली नहीं। |
| न; प्रथमेनानैकान्तिकत्वात् । | **सिद्धान्ती—**ऐसा मत कहो, क्योंकि प्रथम आत्मप्रत्ययकी तरह अन्तिम प्रत्यय भी व्यभिचारी हो सकता है। |
| यदि हि प्रथम आत्मविषयः प्रत्ययोऽविद्यां न निवर्तयति, तथान्त्योऽपि, तुल्यविषयत्वात् । | यदि आत्मविषयक प्रथम प्रत्यय अविद्याकी निवृत्ति नहीं करता तो उसी तरह अन्तिम प्रत्यय भी नहीं करेगा, क्योंकि दोनोंका विषय समान ही है। |
| एवं तर्हि सन्ततोऽविद्यानिवर्तको न विच्छिन्न इति । | **पूर्व०—**यदि ऐसी बात है तो संतत (अविच्छिन्न) आत्मप्रत्यय ही अविद्याका निवर्तक हो सकता है, विच्छिन्न नहीं। |
| न, जीवनादौ सति सन्तत्यनुपपत्तेः । | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जीवनादिके रहते हुए आत्माकारवृत्तिकी सन्तति (अविच्छिन्नता) सम्भव नहीं है। |
| न हि जीवनादिहेतुके प्रत्यये सति विद्याप्रत्ययसन्ततिरूपपद्यते, विरोधात् । | जीवनादिकी हेतुभूता वृत्तिके रहते हुए बोधवृत्तिकी अविच्छिन्नता सम्भव नहीं है, क्योंकि उनमें विरोध है। |
| अथ जीवनादिप्रत्ययतिरस्करणेनैव आ मरणा- | यदि कहो, जीवनादिकी हेतुभूता वृत्तियोंका तिरस्कार करके ही मरण- |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| न्ताद्विद्यासन्ततिरिति चेन्न, प्रत्ययेयत्तासन्तानानवधारणाच्छास्त्रार्थानवधारणदोषात् । इयतां प्रत्ययानां सन्ततिरविद्याया निवर्तिकेत्यनवधारणाच्छास्त्रार्थो नावध्रियेत, तच्चानिष्टम् । | पर्यन्त बोधवृत्तिका प्रवाह रहेगा तो यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि बोधवृत्तियोंकी इयत्ताके प्रवाहका निश्चय न होनेके कारण शास्त्राभिप्रायके अनिश्चयका दोष आवेगा । अर्थात् इतनी वृत्तियोंका प्रवाह अविद्याकी निवृत्ति करनेवाला है—ऐसा निश्चय न होनेके कारण शास्त्रका तात्पर्य निश्चित नहीं होगा और यह इष्ट नहीं है । |
| सन्ततिमात्रत्वेऽवधारित एवेति चेत् ? | पूर्व०—यदि ऐसा मानें कि बोधवृत्तिकी संततिमात्र होनेमें तो शास्त्रका तात्पर्य निश्चित ही है, तो ? |
| न, आद्यन्तयोरविशेषात् । | सिद्धान्ती—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसी अवस्थामें भी आद्य प्रवाह और अन्तिम प्रवाहमें कोई अन्तर नहीं है । |
| प्रथमा विद्याप्रत्ययसन्ततिर्मरणकालान्ता वेति विशेषाभावात्, आद्यन्तयोः प्रत्ययोः पूर्वोक्तौ दोषौ प्रसज्येयाताम् । | बोधवृत्तिका प्रथम प्रवाह हो अथवा मरणकालमें समाप्त होनेवाला हो—इन आद्य और अन्तिम प्रत्ययोंमें कोई अन्तर न होनेके कारण पूर्वोक्त दोनों दोषोंका प्रसंग होगा । |
| एवं तर्ह्यनिवर्तक एवेति चेत् ? | पूर्व०—तब तो आत्माकारवृत्ति अज्ञानकी निवृत्ति करनेवाली है ही नहीं !—ऐसा कहें तो ? |
| न, “तस्मात्तत्सर्वमभवत्” (बृ० उ० १।४।१०) इति श्रुतेः । “भिद्यते हृदयग्रन्थिः” | सिद्धान्ती—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि “अतः वह सर्व हो गया” इस श्रुतिसे तथा “हृदयकी ग्रन्थि |
२७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| (मु० उ० २।२।८)। “तत्र को मोहः” (ईशा० ७) इत्यादि श्रुतिभ्यश्च। | टूट जाती है,” “उस अवस्था में क्या मोह है” इत्यादि श्रुतियोंसे [ज्ञान-द्वारा अज्ञानकी निवृत्ति] सिद्ध होती है। | | अर्थवाद इति चेत् ? | पूर्व०—वे श्रुतियाँ अर्थवाद हों तो ? | | न, सर्वशाखोपनिषदामर्थवादत्वप्रसङ्गात्। एतावन्मात्रार्थत्वोपपत्तीणा हि सर्वशाखोपनिषदः। | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि इस प्रकार तो समस्त शाखाओंकी उपनिषदोंके अर्थवाद होनेका प्रसंग उपस्थित होगा; क्योंकि समस्त शाखाओंकी उपनिषदोंका पर्यवसान केवल इतने ही अर्थमें है। | | प्रत्यक्षप्रमितात्मविषयत्वादस्त्येवेति चेत् ? | पूर्व०—यदि कहें, प्रत्यक्ष प्रमाणसे ज्ञात होनेवाले आत्मासे सम्बद्ध होनेके कारण उनका अर्थवादत्व है ही, तो ? | | न, उक्तपरिहारत्वात्। अविद्याशोकमोहभयादिदोषनिवृत्तेः प्रत्यक्षत्वादिति चोक्तः परिहारः। तस्मादाद्योऽन्त्यः सन्ततोऽसन्ततश्चेत्यचोद्यमेतत्। अविद्यादिदोषनिवृत्तिफलावसानत्वाद्धिद्यायाः। य एवाविद्यादिदोषनिवृत्तिफलकृत्प्रत्यय आद्योऽन्त्यः सन्ततोऽसन्ततो वा स एव विद्येत्यभ्युप- | सिद्धान्ती—नहीं, इसका परिहार पहले किया जा चुका है। इसके सिवा आत्मज्ञानसे अविद्या, शोक, मोह एवं भय आदि दोषोंकी निवृत्तिका प्रत्यक्ष अनुभव होनेसे भी इस शङ्काका परिहार किया जा चुका है। अतः आद्य हो, अन्त्य हो, अविच्छिन्न हो, विच्छिन्न हो, उसके विषयमें शङ्का नहीं की जा सकती, क्योंकि ज्ञान तो अविद्यादि दोषोंकी निवृत्तिरूप फलमें ही पर्यवसित होनेवाला है। जो भी प्रत्यय अविद्यादि दोषोंकी निवृत्तिरूप फल प्रदान करनेवाला हो वह आद्य, अन्त्य, अविच्छिन्न, विच्छिन्न कैसा ही हो, वही ज्ञान माना जाता है; |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २७७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २७७
| गमान्न चोद्यावतारगन्धोऽप्यस्ति । | इसलिये इसमें शङ्का उठनेका तो अवकाश ही नहीं है। |
|---|---|
| यत्तूक्तं विपरीतप्रत्ययतत्कार्ययोश्च दर्शनादिति, न; तच्छेषस्थितिहेतुत्वात् । येन कर्मणा शरीरमारब्धं तद्विपरीतप्रत्ययदोषनिमित्तत्वात्तस्य तथाभूतस्यैव विपरीतप्रत्ययदोषसंयुक्तस्य फलदाने सामर्थ्यमिति, यावच्छरीरपातः तावत्फलोपभोगाङ्गतया विपरीतप्रत्ययं रागादिदोषं च तावन्मात्रमाक्षिपत्येव, मुक्तेषुवत्प्रवृत्तफलत्वात्तद्धेतुकस्य कर्मणः। तेन न तस्य निवर्तिका विद्या, अविरोधात् । किं तर्हि स्वाश्रयादेव स्वात्मविरोध्यविद्याकार्यं यदु- | और यह जो कहा कि [ 'मैं ब्रह्म नहीं हूँ' ऐसा ] विपरीत प्रत्यय और उसका कार्य देखे जानेसे आत्मज्ञान अविद्याका निवर्तक नहीं है, सो ठीक नहीं; क्योंकि वह तो प्रारब्धशेषकी स्थितिके कारण है। जिस कर्मसे विद्वान्के शरीरका आरम्भ हुआ है, वह विपरीत प्रत्यय और रागादि दोषजनित होनेके कारण उसका तद्रूपसे यानी विपरीत प्रत्यय और रागादि दोषोंसे संयुक्त रहकर ही फलप्रदानमें सामर्थ्य है, अतः जबतक शरीरपात नहीं होता तबतक वह फलोपभोगके अङ्गरूपसे उतना-सा विपरीत प्रत्यय और रागादि दोष उपस्थित कर ही देता है, क्योंकि वह शरीरारम्भक कर्म छोड़े हुए बाणके समान फलप्रदानमें प्रवृत्त हो चुका है। अतः ज्ञान उसकी निवृत्ति करनेवाला नहीं है, क्योंकि उससे उसका विरोध नहीं है। तो फिर वह किसकी निवृत्ति करता है?—स्वाश्रित होनेके कारण जो अपना विरोधी अविद्याका कार्य |
२७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| तिप्सु तन्निरुणद्धि, अनागतत्वात् । अतीतं हीतरत् ।<br><br>किञ्च, न च विपरीतप्रत्ययो विद्यावत उत्पद्यते, निर्विषयत्वात् । अनवधृतविषयविशेषस्यरूपं हि सामान्यमात्रमाश्रित्य विपरीतप्रत्यय उत्पद्यमान उत्पद्यते, यथा शुक्तिकायां रजतमिति । स च विषयविशेषावधारणवतोऽशेषविपरीतप्रत्ययाश्रयस्योपमर्दितत्वान्न पूर्ववत्सम्भवति, शुक्तिकादौ सम्यक्प्रत्ययोत्पत्तौ पुनरदर्शनात् ।<br><br>क्वचित्तु विद्यायाः पूर्वोत्पन्नविपरीतप्रत्ययजनितसंस्कारेभ्यो विपरीतप्रत्ययावभासाः स्मृतयो जायमाना विपरीतप्रत्ययभ्रान्तिमकस्मात्कुर्वन्ति; यथा विज्ञातदिग्विभागस्याप्यकस्माद्दिग्विपर्ययविभ्रमः । सम्यग्ज्ञानवतोऽपि चेत्पूर्ववद्विपरीतप्रत्यय उत्पद्यते, | उत्पन्न होनेवाला होता है, उसे ही वह रोकता है; क्योंकि वह अनागत है और प्रारब्ध तो अतीत है ।<br><br>इसके सिवा, विद्वान्को विपरीत प्रत्यय उत्पन्न हो भी नहीं सकता, क्योंकि उसके लिये कोई विषय नहीं रहता । विषयके विशेष स्वरूपका निश्चय न होनेपर उसके सामान्य स्वरूपको आश्रित करके उत्पन्न होनेवाला ही विपरीत प्रत्यय उत्पन्न होता है; जैसे शुक्तिमें रजत । किंतु जिसे विषयके विशेष रूपका निश्चय हो गया है, उसकी दृष्टिमें सब प्रकारके विपरीत प्रत्ययके आश्रयका बाध हो जानेके कारण उसका पूर्ववत् उत्पन्न होना सम्भव नहीं है; जैसे कि शुक्तिकादिमें, उनका सम्यग्ज्ञान हो जानेपर फिर रजतादिका भ्रम होता नहीं देखा जाता ।<br><br>परंतु कभी-कभी ज्ञानोदयसे पूर्व उत्पन्न हुए विपरीत प्रत्ययजनित संस्कारोंसे विपरीत प्रत्ययके समान भासनेवाली स्मृतियाँ उत्पन्न होकर अकस्मात् विपरीत प्रत्ययकी भ्रान्ति पैदा कर देती हैं, जिस प्रकार दिशाओंके विभागको अच्छी तरह जाननेवाले पुरुषको भी अकस्मात् दिग्भ्रम पैदा हो जाता है । यदि सम्यग्ज्ञानवान्को भी पूर्ववत् विपरीत |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे २७९
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे २७९
| सम्यग्ज्ञानेऽप्यविस्रम्भाच्छास्त्रार्थविज्ञानादौ प्रवृत्तिरसञ्जसा स्यात्सर्वं च प्रमाणमप्रमाणं सम्पद्येत प्रमाणाप्रमाणयोर्विशेषाद्यनुपपत्तेः। | प्रत्यय उत्पन्न हो जाय तो सम्यग्ज्ञानमें भी अविश्वास हो जानेसे शास्त्रके तात्पर्य और विज्ञानादिमें प्रवृत्ति होनी कठिन हो जाय और फिर सारा प्रमाण अप्रमाण हो जाय, क्योंकि उस अवस्थामें प्रमाण और अप्रमाणमें कोई अन्तर ही न रहेगा। |
|---|---|
| एतेन 'सम्यग्ज्ञानानन्तरमेव शरीरपाताभावः कस्मात्?' इत्येतत् परिहृतम्। ज्ञानोत्पत्तेः प्रागूर्ध्वं तत्कालजन्मान्तरसञ्चितानां च कर्मणामप्रवृत्तफलानां विनाशः सिद्धो भवति फलप्राप्तिविघ्ननिषेधश्रुतेरेव। "क्षीयन्ते चास्य कर्माणि" (मु० उ० २।२।८)। "तस्य तावदेव चिरम्" (छा० उ० ६।१४।२)। "सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते" (छा० उ० ५।२४।३)। "तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेन" (बृ० उ० ४।४।२३)। "एतमु हैवैते न तरतः" (४।४।२२)। "नैनं कृताकृते तपतः" (४।४।२२)। "एतं ह वाव न तपति" (तै० उ० २।९।१)। "न बिभेति कुतश्चन" (तै०उ०२।९।१) इत्यादि श्रुतिभ्यश्च। "ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते" (गीता | इस (छोड़े हुए बाणके) न्यायसे इस शङ्काका परिहार किया गया कि सम्यग्ज्ञानके पश्चात् तुरंत ही देहपात क्यों नहीं होता ? ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व, उसके पीछे और उसकी उत्पत्तिके समय होनेवाले तथा जन्मान्तरके सञ्चित अप्रवृत्तफल कर्मोंका विनाश तो "तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशते" इस ज्ञानफलकी प्राप्तिके विघ्नका निषेध करनेवाली श्रुतिसे ही सिद्ध होता है। तथा "इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं", "उसके मोक्षमें तभीतक देरी है", "उसके सब पाप भस्म हो जाते हैं", "उसे जानकर पापकर्मसे लिप्त नहीं होता", "ये पाप-पुण्य इस (आत्मज्ञानी) का अतिक्रमण नहीं कर सकते", "इसे पाप-पुण्य संतप्त नहीं करते", "उसीको ताप नहीं देता", "किसीसे नहीं डरता" इत्यादि श्रुतियों और "ज्ञानाग्नि समस्त कर्मोंको भस्म कर |
२८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| ४ । ३७) इत्यादिस्मृतिभ्यश्च। | देती है" इत्यादि स्मृतियोंसे भी यही सिद्ध होता है। |
| [कर्मणामविद्याविषयत्वम्]<br>यत्तु ऋणैः प्रतिबध्यत इति, तन्न, अविद्यावद्विषयत्वात्। अविद्यावान्हि ऋणी, तस्य कर्तृत्वादुपपत्तेः। "यत्र वा अन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्" (४। ३। ३१) इति हि वक्ष्यति। अनन्यत्सद्वस्त्वात्माख्यं यत्राविद्यायां सत्यामन्यदिव स्यात्तिमिरकृतद्वितीयचन्द्रवत्, तत्राविद्याकृतानेककारकापेक्षं दर्शनादिकर्म तत्कृतं फलं च दर्शयति, "तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्" इत्यादिना। | और यह जो कहा गया कि यह ऋणोंसे बँधा हुआ है, सो ठीक नहीं, क्योंकि ऋणोंका सम्बन्ध तो अविद्वान्से ही है। अज्ञानी पुरुष ही ऋणी है; क्योंकि उसीमें कर्तृत्वादि रहने सम्भव हैं। "जहाँ अन्यके समान होता है वहीं अन्य अन्यको देख सकता है" ऐसा श्रुति कहेगी भी। तात्पर्य यह है कि आत्मा-संज्ञक सद्वस्तु अनन्य है, वह जहाँ अविद्यावस्थामें तिमिर रोगकृत द्वितीयचन्द्रके समान अन्यके समान होती है, वहींपर श्रुति "वहाँ अन्य अन्यको देखेगा" इस वाक्यसे अनेक कारकोंकी अपेक्षावाला अविद्याकृत दर्शनादि कर्म और उससे होनेवाला फल भी दिखाती है। |
| यत्र पुनर्विद्यायां सत्यामविद्याकृतानेकत्वभ्रमप्रहाणम्, "तत्केन कं पश्येत्" (४। ५। १५) इतिकर्मासम्भवं दर्शयति। तस्मादविद्यावद्विषय एव ऋणित्वम्, कर्मसम्भवात्; नेतरत्र। एतच्चोत्तरत्र | किंतु जहाँ ज्ञानका उदय होने-पर अज्ञानजनित अनेकत्वभ्रमका नाश हो जाता है, वहाँ "तब किसके द्वारा किसे देखे" यह श्रुति कर्मकी असम्भवता दिखलाती है। अतः ऋणित्वका अविद्वान्से ही सम्बन्ध है, क्योंकि उसीके द्वारा कर्म होना सम्भव है, अन्य (ज्ञानवान्) से नहीं। यही बात आगे, जिन वाक्यों- |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २८१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २८१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| व्याचिख्यासिष्यमाणैरेव वाक्यैर्विस्तरेण प्रदर्शयिष्यामः । | की व्याख्या करनेकी हमारी इच्छा है, उनसे विस्तारपूर्वक दिखायेंगे। |
| तद्यथैव तावत्—अथ यः कश्चिदब्रह्मविद् अन्यामात्मनो व्यतिरिक्तां यां काञ्चिद्देवताम्, उपास्ते स्तुतिनमस्कारयागबल्युपहारप्रणिधानध्यानादिना उप आस्ते तस्या गुणभावमुपगम्य आस्ते—अन्योऽसावनात्मा मत्तः पृथक्, अन्योऽहमस्म्यधिकृतः, मयास्मै ऋणिवत्प्रतिकर्तव्यम्—इत्येवम्प्रत्ययः सन्नुपास्ते; न स इत्थम्प्रत्ययो वेद विजानाति तत्त्वम् । | वह बात [ ऐसी है ] जैसी कि यहाँ ( इस मन्त्रमें ) भी कही गयी है और जो कोई अब्रह्मज्ञ अन्य—अपनेसे भिन्न जिस किसी भी देवताकी उपासना करता है—स्तुति, नमस्कार, यज्ञ, बलि, उपहार, प्रणिधान ( सर्वकर्मार्पण ) और ध्यानादिद्वारा उसके समीप उपस्थित होता है अर्थात् उसके गुणभाव ( शेषत्व ) को प्राप्त होकर रहता है और [ मनमें यह भाव रखता है कि ] वह देवता अन्य—अनात्मा यानी मुझसे पृथक् है तथा मैं उपासनाका अधिकारी इससे भिन्न हूँ, मुझे ऋणीके समान इसके उपकारका बदला चुकाना चाहिये—ऐसे भावसे युक्त होकर उसको उपासना करता है, वह इस प्रकारके भाववाला पुरुष तत्त्वको नहीं जानता। |
| न स केवलमेवंभूतोऽविद्वानविद्यादोषवानेव, किं तर्हि? यथा पशुर्गवादिर्वाहनदोहनाद्युपकारैरुपभुज्यते, एवं स इज्याद्यनेकोपकारैरुपभोक्तव्यत्वादेकैकैन | वह ऐसा अज्ञानी केवल अविद्यारूप दोषसे ही युक्त नहीं है, तो फिर कैसा है ? जिस प्रकार गौ-बैल आदि पशु दोहन और वाहनादि उपकारोंसे उपभोगमें लाया जाता है, उसी प्रकार वह यज्ञादि अनेकों उपकारोंके कारण एक-एक देवादिका उपभोग्य होनेसे [ उनका पशु ही है ] । |
२८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| देवादीनाम्, अतः पशुखिव सर्वार्थेषु कर्मस्वधिकृत इत्यर्थः ।<br><br>एतस्य ह्यविदुषो वर्णाश्रमादिप्रविभागवतोऽधिकृतस्य कर्मणो विद्यासहितस्य केवलस्य च शास्त्रोक्तस्य कार्यं मनुष्यत्वादिको ब्रह्मान्त उत्कर्षः । शास्त्रोक्तविपरीतस्य च स्वाभाविकस्य कार्यं मनुष्यत्वादिक एव स्थावरान्तोऽपकर्षः । यथा चैतत्तथा “अथ त्रयो वाव लोकाः” ( १ । ५ । १६ ) इत्यादिना वक्ष्यामः कृत्स्नेनैवाध्यायशेषेण ।<br><br>विद्यायाश्च कार्यं सर्वात्मभावापत्तिरित्येतत्सङ्क्षेपतो दर्शितम् । सर्वाहीयमुपनिषद् विद्याविद्याविभागप्रदर्शनेनैवोपक्षीणा । यथा चैषोऽर्थः कृत्स्नस्य शास्त्रस्य तथा प्रदर्शयिष्यामः ।<br><br>यस्मादेवम्, तस्मादविद्यावन्तं पुरुषं प्रति देवा ईशत एव विघ्नं कर्तुमनुग्रहं चेत्येतद्दर्शयति—<br>(टिप्पणी: अविद्वांसं प्रत्येव देवानां निग्रहानुग्रहसामर्थ्यम्) | अतः तात्पर्य यह है कि वह पशुके समान सब प्रकारके फल देनेवाले कर्मोंका अधिकारी है ।<br><br>इस वर्णाश्रमादि विभागवान् कर्माधिकारी अविद्वान्के ज्ञानसहित तथा केवल शास्त्रोक्त कर्मोंका कार्य मनुष्यत्वसे लेकर ब्रह्मत्वपर्यन्त उत्कर्ष होना है तथा शास्त्रोक्तसे विरुद्ध जो स्वाभाविक कर्म है, उसका कार्य मनुष्यत्वसे लेकर स्थावर योनियोंतक अधोगति होना है । यह जिस प्रकार है, उस सबका हम इस अध्यायके अन्तमें “अथ त्रयो वाव लोकाः” इत्यादि वाक्यसे सम्यक् प्रकारसे वर्णन करेंगे ।<br><br>तथा ज्ञानका कार्य सर्वात्मभावकी प्राप्ति है, यह बात संक्षेपतः दिखलायी गयी है । यह सारी ही उपनिषद् ज्ञान और अज्ञानका विभाग प्रदर्शित करनेमें ही समाप्त हुई है । सम्पूर्ण शास्त्रोंका यही अभिप्राय जिस प्रकार है, सो हम आगे दिखलावेंगे ।<br><br>क्योंकि ऐसा है, इसलिये अब श्रुति यह दिखलाती है कि देवगण अविद्वान् पुरुषके प्रति ही विघ्न या अनुग्रह करनेमें समर्थ होते हैं । जिस |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २८३
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २८३
| यथा ह वै लोके बहवो गोअश्वादयः पशवो मनुष्यं स्वामिनमात्मनोऽधिष्ठातारं भुञ्ज्युः पालयैयुरेवं बहुपशुस्थानीय एकैकोऽविद्वान्पुरुषो देवान्—देवानिति पित्राद्युपलक्षणार्थम्—भुनक्ति पालयतीति। इम इन्द्रादयोऽन्ये मत्तो ममेशितारो भृत्य इवाहमेषां स्तुतिनमस्कारेज्यादिनाराधनं कृत्वाभ्युदयं निःश्रेयसं च तत्प्रत्तं फलं प्राप्स्यामीत्येवमभिसन्धिः। | प्रकार लोकमें गौ-घोड़े आदि बहुत-से पशु अपने स्वामी-अधिष्ठाता मनुष्यका भरण-पालन करते हैं, उसी प्रकार अनेक पशुस्थानीय एक-एक अज्ञानी पुरुष देवताओंका भरण-पालन करता है। 'देवान्' यह पद पितृगणादिका भी उपलक्षण कराता है। 'मुझसे भिन्न ये इन्द्रादि मेरे शासक हैं, मैं सेवकके समान स्तुति, नमस्कार एवं यज्ञादिसे इनकी आराधना करके इनके दिये हुए भोग और मोक्ष सब फल प्राप्त करूँगा' इस प्रकार अज्ञानीका संकल्प होता है। | | तत्र लोके बहुपशुमतो यथैकस्मिन्नेव पशावादीयमाने व्याघ्रादिनापह्रियमाणे महदप्रियं भवति, तथा बहुपशुस्थानीय एकस्मिन्पुरुषे पशुभावाद् व्युत्तिष्ठत्यप्रियं भवतीति, किं चित्रं देवानां बहुपश्वपहरण इव कुटुम्बिनः। तस्मादेषां देवानां तन्न प्रियम्, किं तत् ? यदेतद्ब्रह्मात्मतत्त्वं कथञ्चन मनुष्या विद्युुर्विजानीयुः तथा च स्मरणमनुगीतासु भगवतो व्यासस्य— | ऐसी अवस्था में, जिस प्रकार लोकमें किसी बहुत-से पशुओंवाले पुरुषके एक पशुके भी चले जानेपर—व्याघ्रादि द्वारा हरण कर लिये जानेपर उसे बहुत बुरा मालूम होता है, उसी प्रकार किसी कुटुम्बीके बहुत-से पशु चुरा लिये जानेके समान अनेक पशुस्थानीय एक पुरुषके भी पशुभावसे उठ जानेपर यदि देवताओंको अच्छा नहीं लगता तो इसमें आश्चर्य क्या है ? अतः इन देवताओंको यह प्रिय नहीं है; क्या ? यही कि ये मनुष्य इस ब्रह्मात्मतत्त्वको किसी प्रकार भी जानें। ऐसी ही अनुगीतामें भगवान् |
२८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| “क्रियावद्भिर्हि कौन्तेय<br>देवलोकः समावृतः ।<br>न चैतदिष्टं देवानां<br>मर्त्यैरुपारि वर्तनम् ॥”<br>अतो देवाः पशूनिव व्याघ्रादिभ्यो ब्रह्मविज्ञानाद्विघ्नमाचिकीर्षन्ति; अस्मदुपभोग्यत्वान्मा व्युत्तिष्ठेरुरिति । यं तु मुमोचयिषन्ति तं श्रद्धादिभिर्योक्ष्यन्ति विपरीतमश्रद्धादिभिः । तस्मान्मुमुक्षुर्देवाराधनपरः श्रद्धाभक्तिपरः प्रगेयोऽप्रमादी स्याद्विद्याप्राप्तिं प्रति विद्यां प्रतीति वा काक्वैकतत्प्रदर्शितं भवति देवाप्रियवाक्येन ॥ १० ॥ | व्यासकी स्मृति भी है—“हे कौन्तेय ! देवलोक कर्मपरायण पुरुषोंसे भरा हुआ है। देवताओंको यह इष्ट नहीं है कि मनुष्य उनसे ऊपर (ब्रह्मलोकादिमें) रहें।”<br>अतः देवगण, यह सोचकर कि हमारे उपभोग्य होनेके कारण मनुष्य हमसे ऊपर न उठने पावें, पशुओंको व्याघ्रादिसे दूर रखनेके समान मनुष्योंको ब्रह्मविज्ञानसे दूर रखनेके लिये विघ्न उपस्थित करते हैं। वे जिसे मुक्त करना चाहते हैं उसे श्रद्धादि साधनोंसे सम्पन्न कर देते हैं और जिसे मुक्त नहीं करना चाहते उसे अश्रद्धादियुक्त कर देते हैं। अतः मोक्षकामी पुरुषको देवाराधनतत्पर, श्रद्धाभक्तिपरायण, देवताओंका प्रिय तथा ज्ञानप्राप्तिके साधन श्रवणादि अथवा उनके फलभूत ज्ञानके प्रति अप्रमादयुक्त होना चाहिये—यह भाव देवताओंका अप्रियत्व बतलानेवाले वाक्यसे काकूक्तिद्वारा¹ प्रदर्शित होता है॥ १०॥ |
१. शोक या भय आदिके कारण पुरुषके स्वरमें जो एक प्रकारका कम्प उत्पन्न होता है उसे ‘काकु’ कहते हैं। श्रुतिमें ‘देवताओंको यह प्रिय नहीं है’ ऐसा कहकर काकूक्तिसे यह बतलाया है कि मोक्षकामीको ज्ञानप्राप्तिके साधनोंमें तथा उपासनादिके द्वारा देवताओंकी प्रसन्नता सम्पादन करनेमें सावधान रहना चाहिये।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २८५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २८५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| सूत्रितः शास्त्रार्थः ‘आत्मत्येवोपासीत’ इति । तस्य च व्याचिख्यासितस्य सार्थवादेन “तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया” इत्यादिना सम्बन्धप्रयोजने अभिहिते । अविद्यायाश्च संसाराधिकारकारणत्वमुक्तम् “अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते” इत्यादिना । तत्राविद्वानृणी पशुवद्देवादि कर्मकर्तव्यतया परतन्त्र इत्युक्तम् ।<br><br>किं पुनर्दैवादिकर्मकर्तव्यत्वे निमित्तम् ? वर्णा आश्रमाश्च । तत्र के वर्णाः ? इत्यत इदमारभ्यते। यन्निमित्तसम्बद्धेषु कर्मस्वयं परतन्त्र एवाधिकृतः संसारीति ।<br><br>एतस्यैवार्थस्य प्रदर्शनायाग्निसर्गानन्तरमिन्द्रादिसर्गो नोक्तः। अग्नेस्तु सर्गः प्रजापतेः सृष्टिपरिपूरणाय प्रदर्शितः। अयं च इन्द्रादिसर्गस्तत्रैव द्रष्टव्यस्तच्छेष- | ‘आत्मत्येवोपासीत’ इस वाक्यसे शास्त्रके तात्पर्यका सूत्ररूपमें संक्षेपसे वर्णन किया गया । फिर “तद्यो यो देवानां प्रत्यबुद्ध्यत” इत्यादि अर्थवादके सहित “तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया” इत्यादि मन्त्रवाक्यद्वारा व्याख्या करनेके लिये अभीष्ट उस शास्त्रार्थके सम्बन्ध और प्रयोजन बतलाये गये, तथा “अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते” इत्यादि वाक्यसे अविद्याको संसारोत्पत्तिमें कारण बताया । वहाँ यह कहा गया है कि अज्ञानी ऋणी होता है; अर्थात् पशुके समान देवकर्मादिकी कर्तव्यतासे युक्त होनेके कारण परतन्त्र होता है ।<br><br>किंतु देवादि कर्मोंकी कर्तव्यतामें कारण क्या है ? वर्ण और आश्रम । उनमें, जिस वर्णरूप निमित्तसे सम्बद्ध कर्मोंमें इस परतन्त्र संसारी जीवका ही अधिकार है, वे वर्ण कौन-से हैं?— ऐसा प्रश्न होनेपर यहाँसे आरम्भ किया जाता है। इस अर्थको प्रदर्शित करनेके प्रयोजनसे ही अग्निसर्गके पश्चात् इन्द्रादि सर्गका वर्णन नहीं किया। अग्निसर्गको तो प्रजापतिकी सृष्टिकी सब प्रकार पूर्ति करनेके लिये प्रदर्शित किया था। प्रजापति सर्गका शेषभूत होनेके कारण इस इन्द्रसर्गको वहीं (उसीके अन्तर्गत) समझना |
२८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| त्वात् । इह तु स एवाभिधीयते—<br>ऽविदुषः कर्माधिकारहेतुप्रदर्शनाय— | चाहिये । यहाँ अविद्वान्के कर्मा-<br>धिकारमें हेतु दिखानेके लिये उसीका<br>वर्णन किया जाता है— |
क्षत्रियसर्ग तथा ब्राह्मणजातिके साथ उसके सम्बन्धका वर्णन
ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव तदेकꣳ सन्न व्यभवत् । तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत क्षत्रं यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशान इति । तस्मात्क्षत्रात्परं नास्ति तस्माद्ब्राह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये क्षत्र एव तद्यशो दधाति सैषा क्षत्रस्य योनिर्यद्ब्रह्म । तस्माद्यद्यपि राजा परमतां गच्छति ब्रह्मैवान्तत उपनिश्रयति स्वां योनिं य उ एनꣳ हिनस्ति स्वाꣳ स योनिमृच्छति स पापीयान्भवति यथा श्रेयाꣳसꣳ हिꣳसित्वा ॥ ११ ॥
आरम्भमें यह एक ब्रह्म ही था । अकेले होनेके कारण वह विभूति-युक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ । उसने अतिशयतासे क्षत्र इस प्रशस्त रूपकी रचना की । अर्थात् देवताओंमें क्षत्रिय जो ये इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, मेघ, यम, मृत्यु और ईशानादि हैं, उन्हें उत्पन्न किया । अतः क्षत्रियसे उत्कृष्ट कोई नहीं है । इसीसे राजसूययज्ञमें ब्राह्मण नीचे बैठकर क्षत्रियकी उपासना करता है, वह क्षत्रियमें ही अपने यशको स्थापित करता है । यह जो ब्रह्म है, क्षत्रियकी योनि है । इसलिये यद्यपि राजा उत्कृष्टताको प्राप्त होता है तो भी [ राजसूयके ] अन्तमें वह ब्राह्मणका ही आश्रय लेता है । अतः जो क्षत्रिय इस ( ब्राह्मण ) की हिंसा करता है, वह अपनी योनिका ही नाश करता है । जिस प्रकार श्रेष्ठकी हिंसा करनेसे पुरुष पापी होता है, उसी प्रकार वह पापी होता है ॥ ११ ॥
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८७
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| ब्रह्म वा इदमग्र आसीद्यदग्निं सृष्ट्वा अग्निरूपापन्नं ब्रह्म। ब्राह्मणजात्यभिमानाद् ब्रह्मेत्यभिधीयते। वै इदं क्षत्रादिजातं ब्रह्मैवाभिन्नमासीदेकमेव। नासीत्क्षत्रादिभेदः। तद्ब्रह्मैकं क्षत्रादिपरिपालयित्रादिशून्यं सद् न व्यभवत्—न विभूतवत्, कर्मणे नालमासीदित्यर्थः। | आरम्भमें यह ब्रह्म ही था अर्थात् अग्निको रचकर जो अग्निरूपको प्राप्त हुआ, वह ब्रह्म ही था। ब्राह्मणजातिका अभिमान होनेके कारण वह ब्रह्म कहा जाता है। उस समय यह क्षत्रियादि समुदाय भी ब्रह्मसे अभिन्न अर्थात् एकरूप ही था। अर्थात् पहले क्षत्रियादि भेद नहीं था। वह ब्रह्म एक (अकेला)—क्षत्रियादि पालनकर्तासे शून्य होनेके कारण विभूतियुक्त कर्म करनेको समर्थ नहीं हुआ। |
| ततस्तद्ब्रह्म 'ब्राह्मणोऽस्मि ममेत्थं कर्तव्यम्' इति ब्राह्मणजातिनिमित्तं कर्म चिकीर्षु-आत्मनः कर्मकर्तृत्वविभूतये श्रेयो रूपं प्रशस्तरूपम् अत्यसृजत-अतिशयेनासृजत—सृष्टवत्। किं पुनस्तद्यत्सृष्टम्? क्षत्रं क्षत्रियजातिः, तद्व्यक्तिभेदेन प्रदर्शयति—यान्येतानि प्रसिद्धानि लोके देवत्रा देवेषु क्षत्राणीति। | तब उस ब्रह्मने 'मैं ब्राह्मण हूँ, मेरा यह कर्तव्य है' इस विचारसे ब्राह्मणजातिनिमित्तिक कर्म करनेकी इच्छा करके कर्मकर्तृत्वरूप विभूतिके लिये 'श्रेयो रूपमत्यसृजत' अर्थात् प्रशस्त रूपकी रचना की। जिसकी रचना की गयी था वह रूप कौन-सा था ? क्षत्र अर्थात् क्षत्रियजाति। उन्हींको 'यान्येतानि' इत्यादि वाक्यसे श्रुति व्यक्तिभेदसे दिखाती है। अर्थात् लोकमें देवताओंमें जो क्षत्रियरूपसे प्रसिद्ध हैं। जातिवाचक² शब्दोंमें |
१. इस अध्यायके आरम्भमें अग्निरूप प्रजापतिकी उत्पत्ति दिखलायी है और अग्नि ब्राह्मणजातिका उपकारक देव है। इसलिये उसे ब्राह्मणजातिका अभिमान होना स्वाभाविक है।
२. 'जात्याख्यायामेकस्मिन् बहुवचनमन्यतरस्याम्' (पा० सू० १।२।५८)
२८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| जात्याख्यायां पक्षे बहुवचनस्मरणाद् व्यक्तिबहुत्वाद्वा भेदोपचारेण बहुवचनम्। | विकल्पसे बहुवचन होता है—ऐसी स्मृति होनेसे अथवा भेदोपचारसे इन्द्रादि व्यक्तियोंके अनेक होनेके कारण यहाँ 'क्षत्राणि' इस पदमें बहुवचन है। | | कानि पुनस्तानि? इत्याह—तत्राभिषिक्ता एव विशेषतो निर्दिश्यन्ते—इन्द्रो देवानां राजा, वरुणो यादसाम्, सोमो ब्राह्मणानाम्, रुद्रः पशूनाम्, पर्जन्यो विद्युदादीनाम्, यमः पितॄणाम्, मृत्युरोगादीनाम्, ईशानो भासाम्—इत्येवमादीनि देवेषुक्षत्राणि। तदनु, इन्द्रादिक्षत्रदेवताधिष्ठितानि मनुष्यक्षत्राणि सोमसूर्यवंश्यानि पुरूरवःप्रभृतीनि सृष्टान्येव द्रष्टव्यानि। तदर्थ एव हि देवक्षत्रसर्गः प्रस्तुततः। | वे कौन हैं? सो श्रुति बतलाती है। यहाँ विशेषरूपसे उनमेंसे [भिन्न-भिन्न वर्गोंके अधिपतिरूपसे] अभिषिक्त देवताओंका ही उल्लेख किया जाता है—देवताओंका राजा इन्द्र, जलचरोंका अधिपति वरुण, ब्राह्मणोंका राजा सोम, पशुपति रुद्र, विद्युदादिका नायक मेघ, पितरोंका राजा यम, रोग आदिका स्वामी मृत्यु और प्रकाशोंका स्वामी ईशान इत्यादि जो देवताओंमें क्षत्रिय हैं [उन्हें उत्पन्न किया]। उनके पीछे इन्द्रादि क्षत्रिय देवताओंसे अधिष्ठित पुरूरवा आदि चन्द्र और सूर्यवंशी मानवक्षत्रिय रचे गये—ऐसा समझना चाहिये। उन्हींके लिये देवक्षत्रसृष्टिका आरम्भ किया गया है। | | यस्माद्ब्रह्मणातिशयेन सृष्टं क्षात्रं तस्मात्क्षत्रात्परं नास्ति ब्राह्मणाजातेरपि नियन्तृ। तस्माद्ब्राह्मणः कारणभूतोऽपि क्षत्रियस्य क्षत्रियमधस्ताद्भूम्यवस्थितः सन्नुपरिस्थितमुपास्ते। क्व? राजसूये। | क्योंकि ब्रह्माने क्षत्रियोंको अतिशयरूपसे रचा है, इसलिये क्षत्रियसे उत्कृष्ट ब्राह्मणजातिका भी नियमन करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। इसीसे क्षत्रियजातिका कारणभूत होकर भी ब्राह्मण नीचे बैठकर ऊँचे बैठे हुए क्षत्रियकी उपासना करता है। कहाँ? राजसूययज्ञमें। उस समय वह |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २८१
| क्षत्र एव तदात्मीयं यशः ख्याति-रूपं ब्रह्मेति दधाति स्थापयति । राजसूयाभिषिक्तेनासन्द्यां स्थितेन राज्ञा आमन्त्रितो ब्रह्मन्निति ऋत्विक्पुनस्तं प्रत्याह—'त्वं राजन्ब्रह्मासि' इति । तदेतदभिधीयते—'क्षत्र एव तद्यशो दधाति' इति । | क्षत्रियमें ही अपने 'ब्रह्म' इस नाम-रूप यशको स्थापित करता है । राजसूययज्ञमें अभिषिक्त मञ्चस्थ राजाके द्वारा 'ब्रह्मन् !' इस प्रकार पुकारे जानेपर ऋत्विक् उत्तरमें उससे कहता है, 'राजन् ! तुम ब्रह्म हो' इसीसे यह कहा जाता है कि वह क्षत्रियमें ही अपना [ 'ब्राह्मण' नाम-रूपी ] यश स्थापित करता है । | | सैषा प्रकृता क्षत्रस्य योनिरैव यद्ब्रह्म । तस्माद्यद्यपि राजा परमतां राजसूयाभिषेकगुणं गच्छत्याप्नोति ब्रह्मैव ब्राह्मणजातिमेव, अन्ततोऽन्ते कर्मपरिसमाप्तावुपनिश्रयत्याश्रयति स्वां योनिम्, पुरोहितं पुरो निधत्त इत्यर्थः । | यह जो ब्रह्म (ब्राह्मण) है, वह क्षत्रियकी प्रकृत योनि ही है । इसलिये यद्यपि राजा परमताको—राजसूयाभिषेकरूप गुणको प्राप्त हो जाता है तो भी अन्तमें कर्मकी समाप्ति होनेपर अपनी योनि ब्राह्मण-जातिका ही आश्रय लेता है अर्थात् उसे पुरोहित करता यानी आगे स्थापित करता है । | | यस्तु पुनर्बलाभिमानात्स्वां योनिं ब्राह्मणजातिं ब्राह्मणं य उ एनं हिनस्ति हिंसति न्यग्भावेन पश्यति, स्वामात्मीयामेव स योनिमृच्छति—स्वं प्रभवं विच्छिनत्ति विनाशयति । स एतत्कृत्वा पापीयान्पापतरो भवति । पूर्वमपि क्षत्रियः पाप एव क्रूरत्वादात्मप्र- | और जो बलके अभिमानसे अपनी योनि ब्राह्मण-जातिकी हिंसा करता है अर्थात् उसे नीची दृष्टिसे देखता है, वह अपनी ही योनिका नाश करता है अर्थात् अपने ही प्रसवका विच्छेद यानी विनाश करता है । ऐसा करके वह पापीयान्—बड़ा पापी होता है । क्रूर होनेके कारण क्षत्रिय पापी तो पहले भी था, अब अपने प्रसवकी |
बृ० उ० १६—
२९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| स्वहिंसया सुतराम् । यथा लोके श्रेयांसं प्रशस्ततरं हिंसित्वा परिभूय पापतरो भवति तद्वत् ॥११॥ | हिंसा करनेसे और भी अधिक पापी होता है। जिस प्रकार लोकमें श्रेष्ठ अर्थात् अधिक प्रशंसनीयकी हिंसा—पराभव करके पुरुष बड़ा पापी होता है उसी प्रकार उसे भी बड़ा भारी पाप लगता है ॥ ११ ॥ |
वैश्यजातिकी उत्पत्ति
| क्षत्रे सृष्टेऽपि— | क्षत्रियोंकी रचना हो जानेपर भी— |
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स नैव व्यभवत्स विशमसृजत यान्येतानि देवजातानि गणश आख्यायन्ते वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति ॥ १२ ॥
वह (ब्रह्म) विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने वैश्यजातिकी रचना की। जो ये वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव और मरुत् इत्यादि देवगण गणशः कहे जाते हैं [उन्हें उत्पन्न किया] ॥ १२ ॥
| स नैव व्यभवत्, कर्मणे ब्रह्म तथा न व्यभवत्, वित्तोपार्जयितुरभावात् । स विशमसृजत कर्मसाधनवित्तोपार्जनाय । कः पुनरसौ विट्? यान्येतानि देवजातानि—स्वार्थे निष्ठा, य एते देवजातिभेदा इत्यर्थः; गणशो गणं गणम्, आख्यायन्ते कथ्यन्ते । गणप्राया हि विशः, प्रायेण | वह (ब्रह्म) धनोपार्जन करनेवालेका अभाव होनेके कारण कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने कर्मके साधनभूत धनका उपार्जन करनेके लिये वैश्यजातिको रचा। वे वैश्यलोग कौन थे ? ये जो देवजात हैं। 'देवजातानि' इस पदके 'जात' शब्दमें जो 'त' यह निष्ठाप्रत्यय है वह स्वार्थमें है। तात्पर्य यह है कि ये जो देवजातिके भेद हैं, जो गणशः अर्थात् एक-एक गण करके कहे जाते हैं; क्योंकि वैश्यलोग गणप्राय होते हैं, वे प्रायः अनेक |
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २९१
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २९१
| संहता हि वित्तोपार्जने समर्थाः न त्वेकैकशः। वसवः अष्टसङ्ख्यो गणः, तथैकादश रुद्राः, द्वादशादित्याः, विश्वेदेवास्त्रयोदश विश्वाया अपत्यानि, सर्वे वा देवाः, मरुतः सप्त सप्त गणाः ॥ १२ ॥ | मिलकर ही धनोपार्जनमें समर्थ होते हैं, एक-एक करके नहीं। वसु आठ संख्याका गण है, रुद्र ग्यारह तथा आदित्य बारह हैं। विश्वेदेव तेरह हैं—ये सभी विश्वाके पुत्र हैं। अथवा 'विश्वे देवाः' का अर्थ है—सम्पूर्ण देवगण। इसी प्रकार उन्चास मरुद्गण हैं ॥ १२ ॥ |
शूद्रवर्णकी उत्पत्ति
स नैव व्यभवत्स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणमियं वै पूषेयं हीदꣳ सर्वं पुष्यति यदिदं किञ्च ॥ १३ ॥
[ फिर भी ] वह विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने शूद्रवर्णकी रचना की। पूषा शूद्रवर्ण है। यह पृथिवी ही पूषा है; क्योंकि यह जो कुछ है, यही इसका पोषण करती है ॥ १३ ॥
| स परिचारकाभावात्पुनरपि नैव व्यभवत्, स शौद्रं वर्णमसृजत—शूद्र एव शौद्रः, स्वार्थेऽण् वृद्धिः। <br><br> कः पुनरसौ शौद्रो वर्णो यः सृष्टः ? पूषणम्—पुष्यतीति पूषा कः पुनरसौ पूषा ? इति विशेषतस्तन्निर्दिशति—इयं पृथिवी पूषा। स्वयमेव निर्वचनमाह—इयं हीदं | सेवकका अभाव होनेके कारण फिर भी वह विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने शौद्रवर्णकी सृष्टि की। शूद्र ही 'शौद्र' है। यहाँ स्वार्थमें 'अण्' प्रत्यय होनेपर आदि स्वरकी वृद्धि हुई है। <br><br> किंतु यह जो उत्पन्न किया गया था वह शूद्रवर्ण कौन था ? पूषण—जो पोषण करता है, इसलिये पूषा कहलाता है। किंतु यह पूषा कौन है ? उसे श्रुति विशेषरूपसे निर्देश करती है—यह पृथिवी पूषा है। फिर उसका स्वयं ही निर्वचन करके कहती है—क्योंकि |
२९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| सर्वं पुष्यति यदिदं किञ्च ॥ १३ ॥ | यह जो कुछ है, उस सबका यही पोषण करती है ॥ १३ ॥ |
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धर्मकी उत्पत्ति और उसके प्रभाव एवं स्वरूपका वर्णन
स नैव व्यभवत्तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत धर्मं तदेतत्क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मस्तस्माद्धर्मात्परं नास्त्यथो अबलीयान्बलीयाँ२ समाशँ२सते धर्मेण यथा राज्ञैवं यो वै स धर्मः सत्यं वै तत्तस्मात्सत्यं वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति धर्मं वा वदन्तँ२ सत्यं वदतीत्येतद्ध्येवैतदुभयं भवति ॥ १४॥
तब भी वह विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने श्रेयोरूप (कल्याणस्वरूप) धर्मकी अतिसृष्टि की। यह जो धर्म है, क्षत्रियका भी नियन्ता है। अतः धर्मसे उत्कृष्ट कुछ नहीं है। इसलिये जिस प्रकार राजाकी सहायतासे [प्रबल शत्रुको भी जीतनेकी शक्ति आ जाती है] उसी प्रकार धर्मके द्वारा निर्बल पुरुष भी बलवान्को जीतनेकी इच्छा करने लगता है। वह जो धर्म है, निश्चय सत्य ही है। इसीसे सत्य बोलनेवालोंको कहते हैं कि ‘यह धर्ममय वचन बोलता है’ तथा धर्ममय वचन बोलनेवालेसे कहते हैं कि ‘यह सत्य बोलता है’, क्योंकि ये दोनों धर्म ही हैं ॥ १४॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| स चतुरः सृष्ट्वापि वर्णान्नैव व्यभवत्, उग्रत्वात्क्षत्रस्यानियताशङ्कया। तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत, किं तत् ? धर्मम्; तदेतच्छ्रेयोरूपं सृष्टं क्षत्रस्य क्षत्रं क्षत्रस्यापि नियन्तृ, | वह (ब्रह्म) चारों वर्णोंको रचकर भी—क्षत्रियजाति उग्र होती है, इसलिये वह नियन्त्रणमें नहीं रह सकती—इस आशङ्कासे विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। तब उसने अतिशयतासे श्रेयोरूप उत्पन्न किया। वह श्रेयोरूप कौन है? धर्म; वह यह रचा हुआ श्रेयोरूप धर्म क्षत्रका भी क्षत्र यानी क्षत्रियका भी नियन्ता है |