BharatKosha
Back to the archive

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

३३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

Page 344Permalink
३३८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
स्वाराज्यमाधिपत्यं पर्येत्" इति।श्रेष्ठत्व, स्वराज्य और आधिपत्य प्राप्त किया।"
अन्नानामक्षय-त्वोपपादनम्<br><br>कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदेति। यदा पित्रा अन्नानि सृष्ट्वा सप्त पृथक्पृथग्भोक्तृभ्यः प्रदत्तानि, तदाप्रभृत्यैव तैर्भोक्तृभिरद्यमानानि—तन्निमित्तत्वात्तेषां स्थितेः—सर्वदा नैरन्तर्येण; कृतक्षयोपपत्तेश्च युक्तस्तेषां क्षयः। न च तानि क्षीयमाणानि, जगतोऽविभ्रष्टरूपेणैवावस्थानदर्शनात्। भवितव्यं चाक्षयकारणेन; तस्मात्कस्मात्पुनस्तानि न क्षीयन्त इति प्रश्नः।अब 'कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदा' इस श्रुतिका अर्थ किया जाता है। जब पिताके द्वारा रचे जाकर सात अन्न अलग-अलग भोक्ताओंको बाँटे गये थे, तभीसे वे सर्वदा—निरन्तर उन भोक्ताओंद्वारा खाये जा रहे हैं; क्योंकि उन अन्नोंके कारण ही उनकी स्थिति है। कृतक वस्तुका क्षय होना उचित ही है, अतः उनका भी क्षय होना युक्तियुक्त ही है। किंतु वे क्षय होते नहीं जान पड़ते, क्योंकि संसार अक्षयरूपसे ही स्थित दिखायी देता है। उनके इस अक्षयका कोई कारण होना चाहिये; अतः यह प्रश्न होता है कि वे क्षीण क्यों नहीं होते ?
तस्येदं प्रतिवचनम्—'पुरुषो वा अक्षितिः'। यथासौ पूर्वमन्नानां स्रष्टासीत्पिता मेधया जायादिसम्बन्धेन च पाङ्क्तकर्मणा भोक्ता च, तथा येभ्यो दत्तान्यन्नानि तेऽपि तेषामन्नानां भोक्तारोऽपि सन्तः पितर एव, मेधया तपसाइसका उत्तर यह है—'पुरुषो वा अक्षितिः'। जिस प्रकार पहले यह पिता विज्ञान और स्त्री आदिके सम्बन्धसे होनेवाले पाङ्क्तकर्मद्वारा अन्नोंका रचयिता और भोक्ता था, उसी प्रकार जिन्हें वे अन्न दिये गये हैं वे भी उन अन्नोंके भोक्ता होते हुए भी उनके पिता ही हैं; क्योंकि वे भी विज्ञान और कर्मके द्वारा उन अन्नोंको

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३९

Page 345Permalink

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
च यतो जनयन्ति तान्यन्नानि। तदेतदभिधीयते पुरुषो वै योऽन्नानां भोक्ता सोऽक्षिति-रक्षयहेतुः।उत्पन्न करते हैं। इसीसे यह कहा जाता है कि पुरुष, जो अन्नोंका भोक्ता है, वह अक्षिति यानी उनके अक्षयका कारण है।
कथमस्याक्षितित्वम्? इत्युच्यते— स हि यस्मादिदं भुज्यमानं सप्तविधं कार्यकारणलक्षणं क्रियाफलात्मकं पुनः पुनर्भूयो भूयो जनयत उत्पादयति धिया धिया तत्तत्कालभाविन्या तया तया प्रज्ञया, कर्मभिश्च वाङ्मनःकायचेष्टितैः; यद्यदि ह यद्येतत्सप्तविधमन्नमुक्तं क्षणमात्रमपि न कुर्यात्प्रज्ञया कर्मभिश्च, ततो विच्छिद्येत भुज्यमानत्वात्सातत्येन क्षीयेत ह। तस्माद्यथैवायं पुरुषो भोक्ता अन्नानां नैरन्तर्येण, यथाप्रज्ञं यथाकर्म च करोत्यपि। तस्मात्पुरुषोऽक्षितिः सातत्येन कर्तृत्वात्। तस्माद् भुज्यमानान्यप्यन्नानि न क्षीयन्त इत्यर्थः।उसका अक्षितित्व किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है—क्योंकि वह इस खाये जानेवाले कार्य-करण-रूप एवं कर्मफलात्मक सात प्रकारके अन्नको पुनः-पुनः—बार-बार 'धिया धिया'—तत्तत् कालमें होनेवाली तत्तद्बुद्धिसे और कर्मों यानी वाक्, मन और शरीरकी चेष्टाओंसे उत्पन्न कर देता है। यदि वह इस उपर्युक्त सप्तविध अन्नको विज्ञान और कर्मोंके द्वारा एक क्षण भी उत्पन्न न करे, तो निरन्तर खाये जानेके कारण वह विच्छिन्न यानी क्षीण हो जाय। अतः जिस प्रकार वह पुरुष अन्नोंका निरन्तर भोक्ता है, उसी प्रकार अपनी बुद्धि और कर्मके अनुसार उन्हें उत्पन्न भी करता है। अतः निरन्तर कर्त्ता होनेके कारण पुरुष अक्षिति है। इसीसे निरन्तर खाये जानेपर भी वे अन्न क्षीण नहीं होते—ऐसा इसका तात्पर्य है।
अतः प्रज्ञाक्रियालक्षणप्रबन्धारूढः सर्वो लोकः साध्यसाधन-अतः प्रज्ञा और क्रियासे लक्षित परम्परापर आरूढ़ हो साध्य तथा साधनरूपसे वर्तमान एवं कर्मका

३४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

Page 346Permalink
३४०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| लक्षणः क्रियाफलात्मकः संहतानेकप्राणिकर्मवासनासन्तानाविष्टब्धत्वात्क्षणिकोऽशुद्धोऽसारो नदीस्रोतःप्रदीपसन्तानकल्पः कदलीस्तम्भवदसारः फेनमायामरीच्यम्भःस्वप्नादिसमस्तदात्मगतदृष्टीनामविकीर्यमाणो नित्यः सारवानिव लक्ष्यते । <br><br> तदेतद्वैराग्यार्थमुच्यते—धिया धिया जनयते कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयत हेति—विरक्तानां ह्यस्माद्ब्रह्मविद्या आरब्धव्या चतुर्थप्रमुखेनेति । <br><br> यो वैतामक्षितिं वेदेति; <br> [उपासनफलम्] <br> वक्ष्यमाणान्यपि त्रीण्यन्नान्यस्मिन्नवसरे व्याख्यातान्येवेति कृत्वा तेषां याथात्म्यविज्ञानफलमुपसंह्रियते— | फलभूत यह सम्पूर्ण जड-चेतनमय संसार क्षणिक, अशुद्ध, असार, नदीके प्रवाह और दीपककी ज्योतिके समान [अस्थिर], कदलीस्तम्भके समान असार तथा फेन, मृगतृष्णा-जल और स्वप्नादिके समान असत्य होकर भी, जिनकी दृष्टि इसमें आसक्त है, उन बहिर्मुख लोगोंको ही अविकीर्यमाण (स्थिर), नित्य और सारवान्-सा दिखायी देता है; क्योंकि परस्पर मिलकर रहनेवाले नाना प्राणियोंके अनन्त कर्मों एवं उनकी वासनाओंकी परम्परासे आबद्ध हो सुस्थिर जान पड़ता है। <br><br> उससे वैराग्य करानेके लिये ही श्रुति ऐसा कहती है—'धिया धिया जनयते कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयत' इत्यादि। जो इससे विरक्त हैं, उन्हींके लिये [इस उपनिषद्के] चौथे अध्यायसे लेकर ब्रह्मविद्या आरम्भ करनी है। <br><br> 'यो वैतामक्षितिं वेद' इस मन्त्रसे, आगे कहे जानेवाले तीन अन्नोंकी भी इस समय व्याख्या कर दी गयी है—ऐसा मानकर उनके यथार्थ स्वरूपके विज्ञानके फलका उपसंहार |

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३४१

Page 347Permalink

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३४१


यो वा एताम् अक्षितिम् अक्षयहेतुं <br><br> यथोक्तं वेद, पुरुषो वा अक्षितिः <br><br> स हीदमन्नं धिया धिया जनयते <br><br> कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयत हेति।किया जाता है—जो भी इस अक्षिति अर्थात् ऊपर बतलाये हुए अक्षयके हेतुको कि 'पुरुष ही अक्षिति है, वही तत्तद्बुद्धि और कर्मोंसे इस अन्नको उत्पन्न करता है, यदि वह उत्पन्न न करे तो यह निश्चय क्षीण हो जाय' ऐसा जानता है, [ वह प्रतीकके द्वारा अन्न भक्षण करता है ]।
सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेत्यस्यार्थ उच्यते—मुखं मुख्यत्वं प्राधान्यमित्येतत् । प्राधान्येनैवान्नानां पितुः पुरुषस्याक्षितित्वं यो वेद सोऽन्नमत्ति नान्नं प्रति गुणभूतः सन्। यथाज्ञो न तथा विद्वानन्नानामात्मभूतः, भोक्तैव भवति, न भोज्यतामापद्यते । स देवानपिगच्छति स ऊर्जमुपजीवति, देवानपिगच्छति देवात्मभावं प्रतिपद्यते; ऊर्जममृतं चोपजीवतीति यदुक्तं सा प्रशंसा, नापूर्वार्थोऽन्योऽस्ति ॥ २ ॥अब 'सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन' इस श्रुतिका अर्थ कहा जाता है—मुख—मुख्यत्व अर्थात् प्राधान्यको कहते हैं। जो पुरुष अन्नोंके पिता पुरुषका अक्षितित्व जानता है, वह प्रधानतासे ही अन्न भक्षण करता है, अन्नके प्रति गौण होकर नहीं। अज्ञानीकी तरह ज्ञानवान् अन्नोंका आत्मभूत नहीं होता; वह भोक्ता ही रहता है, भोज्यताको प्राप्त नहीं होता। तथा 'स देवानपिगच्छति स ऊर्जमुपजीवति' वह 'देवानपिगच्छति'—देवात्मभावको प्राप्त होता है और ऊर्जं यानी अमृतका उपजीवी होता है—ऐसा जो कहा है वह उसकी प्रशंसा है, इसका कोई दूसरा अपूर्व अर्थ नहीं है ॥ २ ॥

३४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

Page 348Permalink
३४२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

आत्माके लिये तीन अन्न और उनका आध्यात्मिक विवेचन

पाङ्क्तस्य कर्मणः फलभूतानि यानि त्रीण्यन्नान्युपक्षिप्तानि तानि कार्यत्वाद्विस्तीर्णविषयत्वाच्च पूर्वेभ्योऽन्नेभ्यः पृथगुत्कृष्टानि, तेषां व्याख्यानार्थ उत्तरो ग्रन्थ आ ब्राह्मणपरिसमाप्तेः ।पाङ्क्तकर्मके फलभूत जिन तीन अन्नोंका ऊपर उल्लेख किया गया है वे कार्य तथा विस्तीर्ण विषयसे सम्बद्ध होनेके कारण पूर्वोक्त अन्नोंसे अलग और उनकी अपेक्षा उत्कृष्ट हैं। उनकी व्याख्याके लिये इस ब्राह्मणकी समाप्तिपर्यन्त आगेका ग्रन्थ है—

त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुतान्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषमिति मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति । कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो मनसा विजानाति यः कश्च शब्दो वागेव सा । एषा ह्यन्तमायत्तैषा हि न प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानोऽन इत्येतत्सर्वं प्राण एवैतन्मयो वा अयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः ॥ ३ ॥

उसने तीन अन्न अपने लिये किये अर्थात् मन, वाणी और प्राण इन्हें उसने अपने लिये किया। 'मेरा मन अन्यत्र था, इसलिये मैंने नहीं देखा, मेरा मन अन्यत्र था, इसलिये मैंने नहीं सुना' [ ऐसा जो मनुष्य कहता है, इससे निश्चय होता है कि ] वह मनसे ही देखता है और मनसे ही सुनता है। काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति ( धारणशक्ति ), अधृति, लज्जा, बुद्धि, भय—ये सब मन ही हैं। इसीसे पीछेसे स्पर्श किये जानेपर मनुष्य मनसे जान लेता है। जो कुछ भी शब्द है, वह वाक् ही है;

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४३

Page 349Permalink

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४३


क्योंकि यह अभिधेयके पर्यवसानमें अनुगत है, इसलिये प्रकाश्य नहीं है। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान और अन—ये सब प्राण ही हैं। यह आत्मा (शरीर) एतन्मय अर्थात् वाङ्मय, मनोमय और प्राणमय ही है ॥३॥


[मनसोऽस्तित्व-निरूपणम्]
त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति कोऽस्यार्थ इत्युच्यते—मनोवाक्प्राणा एतानि त्रीण्यन्नानि, तानि मनो वाचं प्राणं चात्मने आत्मार्थमकुरुत—कृतवान् सृष्ट्वाऽऽदौ पिता।‘त्रीण्यात्मनेऽकुरुत’ इस मन्त्रका क्या अर्थ है, सो बतलाया जाता है—मन, वाक् और प्राण ये तीन अन्न हैं; उन मन, प्राण और वाक्‌को पिताने प्रथम उत्पन्न कर उन्हें अपने लिये नियत किया।
तेषां मनसोऽस्तित्वं स्वरूपं च प्रति संशय इत्यत आह—अस्ति तावन्मनः श्रोत्रादिबाह्यकरणव्यतिरिक्तम्, यत एवं प्रसिद्धम्--बाह्यकरणविषयात्मसम्बन्धे सत्यप्यभिमुखोभूतं विषयं न गृह्णाति, 'किं दृष्टवानसीदं रूपम् ?' इत्युक्तो वदति—'अन्यत्र मे गतं मन आसीत्सोऽहमन्यत्रमना आसं नादर्शम्'। तथा 'इदं श्रुतवानसि मदीयं वचः?' इत्युक्तः 'अन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषं न श्रुतवानस्मि' इति।उनमें मनके अस्तित्व और स्वरूपके विषयमें सन्देह है, इसलिये श्रुति कहती है—श्रोत्रादि बाह्य इन्द्रियोंसे भिन्न मन भी है; क्योंकि यह बात प्रसिद्ध है कि [कभी-कभी] पुरुष बाह्य इन्द्रिय, विषय और आत्माका सम्बन्ध रहते हुए भी अपने सामनेके विषयको ग्रहण नहीं करता, तथा यह पूछनेपर कि ‘क्या तूने यह रूप देखा है?’ कहता है—‘मेरा मन अन्यत्र चला गया था, अतः मैं अन्यत्रमना था, इसलिये नहीं देखा।’ तथा यह पूछनेपर कि ‘क्या तूने मेरा यह वचन सुना था?’ कहता है—‘मैं अन्यत्रमना था, इसलिये नहीं सुना।’
तस्माद् यस्यासन्निधौ रूपादिग्रहणसमर्थस्यापि सतश्चक्षुरादेःअतः जिसकी सन्निधि न होनेपर, रूपादिके ग्रहणमें समर्थ नेत्र आदिके

३४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

Page 350Permalink

३४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १


संस्कृतहिन्दी
स्वस्वविषयसम्बन्धे रूपशब्दादि-ज्ञानं न भवति, यस्य च भावे भवति, तदन्यदस्ति मनो नामा-न्तःकरणं सर्वकरणविषययोगि इत्यवगम्यते। तस्मात्सर्वो हि लोको मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति, तद्व्यग्रत्वे दर्शनाद्यभा-वात्।होते हुए भी उन्हें अपने-अपने विषय-का सम्बन्ध होनेपर रूप एवं शब्दा-दिका ज्ञान नहीं होता और जिसके रहते हुए वह होता है, वह उन नेत्रादिसे भिन्न समस्त इन्द्रियोंके विषयोंसे सम्बन्ध रखनेवाला मन नामका अन्तःकरण है— ऐसा ज्ञात होता है। अतः सब लोग मनसे ही देखते हैं और मनसे ही सुनते हैं; क्योंकि उसके व्यग्र होनेपर दर्शनादि क्रिया नहीं होती।
मनःस्वरूप-निर्देशः<br>अस्तित्वे सिद्धे मनसः स्वरू-पार्थमिदमुच्यते— कामः स्त्रीव्यति-कराभिलाषादिः, संकल्पः प्रत्यु-पस्थितविषयविकल्पनं शुक्ल-नीलादिभेदेन, विचिकित्सा संशय-ज्ञानम्, श्रद्धा अदृष्टार्थेषु कर्म-स्वास्तिक्यबुद्धिर्देवतादिषु च, अश्रद्धा तद्विपरीता बुद्धिः, धृति-र्धारणं देहाद्यवसादे उत्तम्भनम्, अधृतिस्तद्विपर्ययः, ह्रीर्लज्जा, धीः प्रज्ञा, भीर्भयम्, इत्येतदेव-मादिकं सर्वं मन एव; मनसो ऽन्तःकरणस्य रूपाण्येतानि।इस प्रकार मनका अस्तित्व सिद्ध हो जानेपर उसके स्वरूपके विषयमें यह कहा जाता है—काम-स्त्री-सम्बन्धकी अभिलाषादि, संकल्प-सम्मुखस्थ विषयकी शुक्ल-नीलादि भेदसे विशेष कल्पना करना, विचिकित्सा—संशयज्ञान, श्रद्धा—जिनका फल अदृष्ट है, उन कर्मों और देवतादिमें आस्तिकताका भाव रखना, अश्रद्धा—इससे विपरीत भाव रखना, धृति—धारण अर्थात् देहादिके शिथिल होनेपर उन्हें सँभाले रखना, अधृति—इसके विप-रीत होना, ह्री—लज्जा, धी—बुद्धि और भी—भय—इत्यादि प्रकारके ये सब भाव मन ही हैं; ये सब मन अर्थात् अन्तःकरणके रूप हैं।

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४५

Page 351Permalink

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४५


[संस्कृत मूल/भाष्य][हिन्दी अनुवाद]
(मनसोऽस्तित्वे लिङ्गान्तरनिर्देशः)<br><br>मनोऽस्तित्वं प्रत्यन्यच्च कारणमुच्यते—तस्मान्मनो नामास्त्यन्तःकरणम्, यस्माच्चक्षुषो ह्यगोचरे पृष्ठतोऽप्युपस्पृष्टः केनचिद् हस्तस्यायं स्पर्शो जानोरयमिति विवेकेन प्रतिपद्यते। यदि विवेककृन्मनो नाम नास्ति तर्हि त्वङ्मात्रेण कुतो विवेकप्रतिपत्तिः स्यात् ? यत्तद्विवेकप्रतिपत्तिकारणम्, तन्मनः।मनके अस्तित्वके विषयमें एक दूसरा भी कारण बतलाया जाता है—इससे भी मननामक अन्तःकरणकी सत्ता है, क्योंकि नेत्रके सामने न आकर किसीके द्वारा पीठपर स्पर्श किये जानेपर मनुष्य विवेकद्वारा यह जान लेता है कि 'यह स्पर्श हाथका है या जानुका है।' यदि विवेक करनेवाला मन नहीं है, तो त्वचामात्रसे ऐसा विवेकज्ञान कैसे हो सकता है ? जो उस विवेकज्ञानका कारण है, वही मन है।
अस्ति तावन्मनः, स्वरूपं च तस्याधिगतम्। त्रीण्यन्नानीह फलभूतानि कर्मणां मनोवाक्प्राणाख्यान्यध्यात्ममधिभूतमधिदैवं च व्याचिख्यासितानि। तत्र आध्यात्मिकानां वाङ्मनःप्राणानां मनो व्याख्यातम्। अथेदानीं वाग्वक्तव्येत्यारम्भः—अतः सारांश यह है कि मन है और उसका स्वरूप भी ज्ञात हो गया। यहाँ कर्मोंके फलभूत मन, वाक् और प्राणसंज्ञक अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव तीन अन्नोंकी व्याख्या करनी है। उनमेंसे आध्यात्मिक वाक्, मन और प्राणोंमेंसे मनकी व्याख्या तो कर दी गयी। अब वाक्का वर्णन करना है, इसलिये आरम्भ किया जाता है—
(वाङ्निरूपणम्)<br><br>यः कश्च लोके शब्दो ध्वनिस्ताल्वादिव्यङ्ग्यः प्राणिभिर्वर्णादिलक्षण इतरो वा वादित्रमेघादिनिमित्तः सर्वो ध्वनिर्वागेव सा।लोकमें प्राणियोंद्वारा तालु आदिसे व्यक्त होनेवाला जितना भी वर्णादिरूप शब्द यानी ध्वनि है तथा बाजे या मेघादिके कारण होनेवाला और भी जो कोई शब्द है सब वाक्

३४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

Page 352Permalink
३४६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| इदं तावद्वाचः स्वरूपमुक्तम् ।<br><br>अथ तस्याः कार्यमुच्यते—एषा वाग्घि यस्मादन्तमभिधेयावसानमभिधेयनिर्णयमायत्तानुगता ।<br><br>एषा पुनः स्वयं नाभिधेयवत्प्रकाश्या अभिधेयप्रकाशिकैव, प्रकाशात्मकत्वात् प्रदीपादिवत् । न हि प्रदीपादिप्रकाशः प्रकाशान्तरेण प्रकाश्यते, तद्वद्वाक्प्रकाशिकैव स्वयं न प्रकाश्येत्यनवस्थां श्रुतिः परिहरति—एषा हि न प्रकाश्या । प्रकाशकत्वमेव वाचः कार्यमित्यर्थः ।<br><br>अथ प्राण उच्यते—प्राणो मुखनासिकासञ्चार्या हृदयवृत्तिःप्रणयनात्प्राणः अपनयनान्मूत्रपुरीषादेरपानोऽधोवृत्तिरानाभिस्थानः; व्यानो व्यायमनकर्मा व्यानः<br><br>(पार्श्व-टिप्पणी : प्राणनिरूपणम्) | ही है। यह तो वाक्‌का स्वरूप बतलाया गया। अब उसका कार्य बतलाया जाता है—क्योंकि यह वाक् अन्त—अभिधेयावसान अर्थात् अभिधेय-निर्णयके आयत्त यानी अनुगत है; किंतु यह अभिधेयके समान स्वयं प्रकाश्य नहीं है, यह तो अभिधेयको प्रकाशित करनेवाली ही है; क्योंकि दीपकादिके समान यह प्रकाशस्वरूपा ही है। दीपकादिका प्रकाश किसी अन्य प्रकाशसे प्रकाशित नहीं होता। अतः उसके ही समान वाक् भी प्रकाशिका ही है, वह स्वयं किसीके द्वारा प्रकाश्य नहीं है—इस प्रकार श्रुति अनवस्था दोषकी निवृत्ति करती है, क्योंकि यह वाक् प्रकाश्य नहीं है। तात्पर्य यह है कि प्रकाशकत्व ही वाक्‌का कार्य है।<br><br>अब प्राणका वर्णन किया जाता है—प्राण-मुख और नासिकामें संचार करनेवाली जो [ वायुकी ] हृदयपर्यन्त वृत्ति है, वह प्रणयन (बहिर्गमन) के कारण प्राण कहलाती है, अपान-मल-मूत्रादिको नीचेकी ओर ले जानेके कारण वायुकी जो नाभिस्थानतक रहनेवाली अधोवृत्ति है, वह अपान है, व्यान—व्यायमन |

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४७

Page 353Permalink

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४७


| प्राणापानयोः सन्धिवीर्यवत्कर्महेतुश्च; उदान उत्कर्षोर्ध्वगमनादिहेतुरापादतलमस्तकस्थान ऊर्ध्ववृत्तिः, समानः समं नयनाद् भुक्तस्य पीतस्य च कोष्ठस्थानोऽन्नपक्ता, अन इत्येषां वृत्तिविशेषाणां सामान्यभूता सामान्यदेहचेष्टाभिसम्बन्धिनी वृत्तिः; एवं यथोक्तं प्राणादिवृत्तिजातमेतत्सर्वं प्राण एव । | कर्मा व्यान है, यह प्राण और अपानकी सन्धि है तथा बलकी अपेक्षा रखनेवाले कर्मोंका कारण है, उदान—जो उत्कर्ष (पुष्टि) और ऊर्ध्वगमन (प्राणोत्क्रमण) आदिका हेतु है तथा जिसका पादतलसे लेकर मस्तकपर्यन्त स्थान एवं ऊपरकी ओर गति है वह उदान है, समान—खाये-पीये पदार्थोंका समीकरण करनेके कारण अन्नको पचानेवाला उदरस्थ वायु समान है, अन—यह इन विशेषवृत्तियोंकी सामान्यभूत तथा देहकी सामान्य चेष्टासे सम्बन्ध रखनेवाली वृत्ति है; इस प्रकार यह उपर्युक्त प्राणादि समस्त वृत्तिसमुदाय प्राण ही है। | | प्राण इति वृत्तिमानाध्यात्मिकोऽन उक्तः। कर्म चास्य वृत्तिभेदप्रदर्शनेनैव व्याख्यातम्। व्याख्यातान्याध्यात्मिकानि मनोवाक्प्राणाख्यान्यन्नानि। एतन्मय एतद्विकारः प्राजापत्यैरेतैर्वाङ्मनःप्राणैरारब्धः। कोऽसौ ? अयं कार्यकारणसङ्घात आत्मा पिण्ड आत्म- | 'प्राण' इस शब्दसे वृत्तिमान् आध्यात्मिक अन (वायु) कहा गया है। इसके कर्मकी व्याख्या तो इसके वृत्तिभेदके प्रदर्शनसे ही कर दी गयी। इस प्रकार मन, वाक् और प्राणसंज्ञक आध्यात्मिक अन्नोंकी व्याख्या की गयी। यह एतन्मय—इनका विकार अर्थात् इन प्राजापत्य वाक्, मन और प्राणोंसे आरब्ध है। यह कौन ? यह जो भूत और इन्द्रियोंका संघात आत्मा यानी पिण्ड है, |

३४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

Page 354Permalink
३४८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| स्वरूपत्वेनाभिमतोऽविवेकिभिः। अविशेषेणैतन्मय इत्युक्तस्य विशेषेण वाङ्मयो मनोमयः प्राणमय इति स्फुटीकरणम् ॥ ३ ॥ | जो अविवेकियोंद्वारा आत्मस्वरूपसे माना गया है । सामान्यरूपसे 'एतन्मयः' इस प्रकार कहे हुएको ही 'वाङ्मय, मनोमय एवं प्राणमय' ऐसा कहकर स्पष्ट किया गया है ॥ ३ ॥ |


आत्मार्थ अन्नोंका आधिभौतिक विस्तार

| तेषामेव प्राजापत्यानामन्नानामाधिभौतिको विस्तारोऽभिधीयते- | उन्हीं प्राजापत्य अन्नोंका आधिभौतिक विस्तार कहा जाता है— |

त्रयो लोका एत एव वागेवायं लोको मनोऽन्तरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोकः ॥ ४ ॥

तीनों लोक ये ही हैं । वाक् ही यह लोक है, मन अन्तरिक्षलोक है और प्राण वह ( स्वर्ग ) लोक है ॥ ४ ॥

| त्रयो लोका भूर्भुवः स्वरित्याख्या एत एव वाङ्मनःप्राणाः, तत्र विशेषो वागेवायं लोकः, मनोऽन्तरिक्षलोकः, प्राणोऽसौ लोकः । ४ । | 'भूः, भुवः और स्वः' नामक तीनों लोक ये वाक्, मन और प्राण ही हैं। उनका विशेषरूप इस प्रकार है—वाक् ही यह लोक है, मन अन्तरिक्षलोक है और प्राण वह ( स्वर्ग ) लोक है ॥ ४ ॥ | | तथा— | इसी प्रकार— |

त्रयो वेदा एत एव वागेवर्ग्वेदो मनो यजुर्वेदः प्राणः सामवेदः ॥ ५ ॥ देवाः पितरो मनुष्या एत एव वागेव देवा मनः पितरः प्राणो मनुष्याः ॥ ६ ॥ पिता माता प्रजैत एव मन एव पिता वाङ्माता प्राणः प्रजा ॥ ७ ॥

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३४९

Page 355Permalink

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३४९

तीनों वेद ये ही हैं। वाक् ही ऋग्वेद है, मन यजुर्वेद है और प्राण सामवेद है ॥ ५॥ देवता, पितृगण और मनुष्य ये ही हैं। वाक् ही देवता हैं, मन पितृगण हैं और प्राण मनुष्य हैं ॥ ६॥ पिता, माता और प्रजा ये ही हैं। मन ही पिता है, वाक् माता है और प्राण प्रजा है ॥ ७॥

त्रयो वेदा इत्यादीनि वाक्यानि ऋज्वर्थानि ॥ ५-७ ॥'त्रयो वेदाः' इत्यादि वाक्योंका अर्थ सरल है ॥ ५-७ ॥

विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव यत्किञ्च विज्ञातं वाचस्तद्रूपं वाग्घि विज्ञाता वागेनं तद्भूत्वावति ॥ ८ ॥

विज्ञात, विजिज्ञास्य और अविज्ञात ये ही हैं। जो कुछ विज्ञात है वह वाक्का रूप है, वाक् ही विज्ञाता है, वाक् इस (अपने ज्ञाता) की विज्ञात होकर रक्षा करती है ॥ ८ ॥

विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव। तत्र विशेषः—यत्किञ्च विज्ञातं विस्पष्टं ज्ञातं वाचस्तद्रूपम्। तत्र स्वयमेव हेतुमाह—वाग्घि विज्ञाता प्रकाशात्मकत्वात्। कथमविज्ञाता भवेद् यान्यानपि विज्ञापयति "वाचैव सम्राड्बन्धुः प्रज्ञायते" (४। १। २) इति हि वक्ष्यति। <br><br> वाग्विशेषविद इदं फलमुच्यते—वागेवैनं यथोक्तवाग्विभूति-विज्ञात, विजिज्ञास्य और अविज्ञात ये ही हैं। उनका विशेष रूप इस प्रकार है—जो कुछ विज्ञात—विस्पष्टरूपसे ज्ञात है, वह वाक्का रूप है। उसमें श्रुति स्वयं ही हेतु बतलाती है—प्रकाशस्वरूप होनेके कारण वाक् ही विज्ञाता है। जो दूसरोंको विज्ञापित करती है, वह स्वयं किस प्रकार अविज्ञात हो सकती है। "हे सम्राट् ! वाणीसे ही बन्धुकी पहचान होती है" ऐसा आगे चलकर श्रुति कहेगी भी। <br><br> वाक्की विशेषताको जाननेवालेके लिये यह फल बतलाया जाता है—वाक् ही इसका—उपर्युक्त

३५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

Page 356Permalink
३५०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| विदं तद्विज्ञातं भूत्वा अवति पालयति, विज्ञातरूपेणैवास्यान्नं भोज्यतां प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ ८ ॥ | वाक्‌की विभूतिको जाननेवालेका उसकी विज्ञात होकर अवन यानी पालन करती है, अर्थात् वह विज्ञात-रूपसे ही इसका अन्न होती यानी भोज्यताको प्राप्त होती है ॥ ८ ॥ | | तथा— | तथा— |

यत्किञ्च विजिज्ञास्यं मनसस्तद्रूपं मनो हि विजिज्ञास्यं मन एनं तद्भूत्वावति ॥ ९ ॥

जो कुछ विजिज्ञास्य है, वह मनका रूप है। मन ही विजिज्ञास्य है। मन विजिज्ञास्य होकर इसकी रक्षा करता है ॥ ९ ॥

| यत्किञ्च विजिज्ञास्यम्, विस्पष्टं ज्ञातुमिष्टं विजिज्ञास्यम्, तत्सर्वं मनसो रूपम्; मनो हि यस्मात्सन्दिह्यमानाकारत्वाद्विजिज्ञास्यम्। पूर्ववन्मनोविभूतिविदः फलम्—मन एनं तद्विजिज्ञास्यं भूत्वा अवति विजिज्ञास्यस्वरूपेणैवान्नत्वमापद्यते ॥ ९ ॥ | जो कुछ विजिज्ञास्य यानी विस्पष्ट जाननेके लिये इष्ट है, वह सब मनका रूप है; क्योंकि मन ही सन्देहयोग्य स्वरूपवाला होनेके कारण विजिज्ञास्य है। पहलेहीके समान मनकी विभूतिको जाननेवालेका फल बतलाया जाता है—मन उसका विजिज्ञास्य होकर उसकी रक्षा करता है, अर्थात् वह विजिज्ञास्य-स्वरूपसे ही उसके अन्नत्वको प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ | | तथा— | तथा— |

यत्किञ्चाविज्ञातं प्राणस्य तद्रूपं प्राणो ह्यविज्ञातः प्राण एनं तद्भूत्वावति ॥ १० ॥

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३५१

Page 357Permalink

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३५१


जो कुछ अविज्ञात है, वह प्राणका रूप है। प्राण ही अविज्ञात है। प्राण अविज्ञात होकर इसकी रक्षा करता है ॥ १० ॥

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यत्किञ्चाविज्ञातं विज्ञानागोचरं न च सन्दिह्यमानम्, प्राणस्य तद्रूपम्, प्राणो ह्यविज्ञातोऽविज्ञातरूपो हि यस्मात्प्राणोऽनिरुक्तश्रुतेः । विज्ञातविजिज्ञास्याविज्ञातभेदेन वाङ्मनःप्राणविभागे स्थिते त्रयो लोका इत्यादयो वाचनिका एव । सर्वत्र विज्ञातादिरूपदर्शनाद्वचनादेव नियमः स्मर्त्तव्यः ।<br><br>प्राण एनं तद्भूत्वा अवति—अविज्ञातरूपेणैवास्य प्राणोऽन्नं भवतीत्यर्थः । शिष्यपुत्रादिभिःसन्दिह्यमानावज्ञातोपकारा अप्याचार्यपित्रादयो दृश्यन्ते; तथा मनःप्राणयोरपि सन्दिह्यमानावज्ञातयोरन्नत्वोपपत्तिः ॥ १० ॥जो कुछ अविज्ञात यानी विज्ञानका अविषय है—केवल सन्देहयोग्य ही नहीं है—वह प्राणका रूप है; प्राण ही अविज्ञात है, क्योंकि अनिरुक्त-श्रुतिसे प्राण अविज्ञातरूप ही है। इस प्रकार विज्ञात, विजिज्ञास्य और अविज्ञातभेदसे वाक्, मन और प्राणका विभाग निश्चित हो जानेपर 'त्रयो लोकाः' इत्यादि निर्देश केवल वाचनिक (वचनसे प्राप्त) ही है। सर्वत्र विज्ञातादिका ही रूप देखा जाता है, अतः इनका नियम श्रुतिवचनसे ही माना जाता है।<br><br>प्राण तद्रूप होकर इसकी रक्षा करता है; अर्थात् प्राण अविज्ञातरूपसे ही इसका अन्न होता है। १ जिनके उपकारके विषयमें शिष्य एवं पुत्रादिको सन्देह और अज्ञान रहता है, ऐसे गुरु और पिता आदि [लोकमें] देखे जाते हैं। इसी प्रकार सन्दिह्यमान और अविज्ञात मन एवं प्राणका भी अन्न होना सम्भव है ॥ १० ॥

१. यदि कहो कि अविज्ञात रहते हुए प्राण किस प्रकार उपकारक हो सकता है ? तो इसके लिये आगे लिखी बातपर ध्यान देना चाहिये ।

३५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

Page 358Permalink
३५२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

आत्मार्थ अन्नोंका आधिदैविक विस्तार

व्याख्यातो वाङ्मनःप्राणानामा-<br>धिभौतिको विस्तारः। अथायमा-<br>धिदैविकार्थ आरम्भः—[इस प्रकार] वाक्, मन और प्राणके आधिभौतिक विस्तारकी व्याख्या तो कर दी गयी, अब यहाँसे आधिदैविक विषय आरम्भ किया जाता है—

तस्यै वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतीरूपमयमग्निस्त-<br>द्यावत्येव वाक्तावती पृथिवी तावानयमग्निः ॥ ११ ॥

उस वाक्‌का पृथिवी शरीर है और यह अग्नि ज्योतीरूप है। तहाँ जितनी वाक्‌ है, उतनी ही पृथिवी है और उतना ही यह अग्नि है ॥ ११ ॥

तस्यै तस्याः वाचः प्रजापते-<br>रन्नत्वेन प्रस्तुतायाः पृथिवी शरीरं<br>बाह्य आधारः, ज्योतीरूपं प्रकाशा-<br>त्मकं करणं पृथिव्या आधेयभूत-<br>मयं पार्थिवोऽग्निः। द्विरूपा हि<br>प्रजापतेर्वाक्-कार्यमाधारोऽप्रकाशः<br>करणं चाधेयं प्रकाशः, तदुभयं<br>पृथिव्यग्नी वागेव प्रजापतेः।<br>तत्तत्र यावत्येव यावत्परिमा-<br>णैव अध्यात्माधिभूतभेदभिन्ना<br>सती वाग्भवति, तत्र सर्वत्र<br>आधारत्वेन पृथिवी व्यवस्थिता,<br>तावत्येव भवति कार्यभूता;प्रजापतिके अन्नरूपसे प्रस्तुत हुए उस वाक्‌का पृथिवी शरीर यानी बाह्य आधार है तथा पृथिवी-का आधेयभूत यह पार्थिव अग्नि उसका ज्योतीरूप यानी प्रकाशा-त्मक करण है। प्रजापतिकी वाक्‌ दो प्रकारकी है—(१) कार्य, आधार और अप्रकाशरूप तथा (२) करण, आधेय और प्रकाशरूप; वे दोनों पृथिवी और अग्नि प्रजापतिकी वाक्‌ ही हैं।<br>उनमें जितनी अर्थात् जितने परिमाणवाली अध्यात्म और अधिभूत भेदोंसे भिन्न होनेवाली वाक्‌ है, उसमें सर्वत्र उसके आधाररूपसे व्यवस्थित कार्यभूता पृथिवी भी उतनी ही है;

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५३

Page 359Permalink

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५३


| तावानयमग्निः, आधेयः करणरूपो ज्योतीरूपेण पृथिवीमनुप्रविष्टस्तावतानेव भवति । समानमुत्तरम् ॥ ११ ॥ | तथा उतना ही अग्नि है, अर्थात् ज्योतीरूपसे पृथिवीमें अनुप्रविष्ट आधेय और करणरूप अग्नि भी उतना ही है। आगेके पर्यायोंमें भी ऐसा ही समझना चाहिये ॥ ११ ॥ |


इन्द्ररूप प्राणकी उत्पत्ति और उसकी उपासनाका फल

अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतीरूपमसावादित्यस्तद्यावदेव मनस्तावती द्यौस्तावानसावादित्यस्तौ मिथुन ँ समैतां ततः प्राणोऽजायत स इन्द्रः स एषोऽसपत्नो द्वितीयो वै सपत्नो नास्य सपत्नो भवति य एवं वेद ॥ १२ ॥

तथा इस मनका द्युलोक शरीर है, ज्योतीरूप वह आदित्य है; वहाँ जितना मन है, उतना ही द्युलोक और उतना ही वह आदित्य है। वे (आदित्य और अग्नि) मिथुन (पारस्परिक संसर्ग) को प्राप्त हुए। तब प्राण उत्पन्न हुआ। वह इन्द्र है और वह असपत्न—शत्रुहीन है; दूसरा [अर्थात् प्रतिपक्षी] ही सपत्न होता है। जो ऐसा जानता है, उसका सपत्न नहीं होता ॥ १२ ॥

| अथैतस्य प्राजापत्यान्नोक्तस्यैव मनसो द्यौर्द्युलोकः शरीरं कार्यमाधारः, ज्योतीरूपं करणं योऽसावादित्यः । तत्तत्र यावत्परिमाणमेव अध्यात्ममधिभूतं वा मनस्तावती तावद्विस्तारा तावत्परिमाणा मनसो ज्योतीरूपस्य | तथा प्राजापत्य अन्नरूपसे कहे हुए इस मनका द्यौः—द्यु लोक शरीर—कार्य अर्थात् आधार है और वह आदित्य ज्योतीरूप—करण यानी आधेय है। उनमें जितना परिमाणवाला अध्यात्म और अधिभूत मन है उतना—उतने विस्तारवाला अर्थात् उतने ही परिमाणवाला मनके ज्योती- |

बृ० उ० २३—

३५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

Page 360Permalink
३५४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| करणस्य आधारत्वेन व्यवस्थिता द्यौः, तावानसावादित्यो ज्योतीरूपं करणमाधेयम्। | रूप यानी करणके आधाररूपसे व्यवस्थित द्युलोक है। तथा उतना ही वह ज्योतीरूप-करण यानी आधेय आदित्य है। | | तावग्न्यादित्यो वाङ्मनसे आधिदैविके मातापितरौ, मिथुनं मैथुनमितरेतरसंसर्गं समैतां समगच्छेताम्। 'मनसा आदित्येन प्रसूतं पित्रा, वाचाग्निना मात्रा प्रकाशितं कर्म करिष्यामि' इति, अन्तरा रोदस्योः। ततस्तयोरेव सङ्गमनात्प्राणो वायुरजायत परिस्पन्दाय कर्मणे। | वे अग्नि और आदित्य अर्थात् आधिदैविक वाक् और मन माता-पिता हैं, वे दोनों मिथुन अर्थात् एक-दूसरेके साथ संसर्गको प्राप्त हुए। 'पितृस्थानीय आदित्यरूप मनसे प्रसूत और मातृस्थानीय अग्निरूप वाणीसे प्रकाशित कर्म करूँगा' ऐसे अभिप्रायसे पृथिवी और द्युलोकके बीच उन दोनोंका समागम हुआ। तब उन्हींके समागमसे परिस्पन्द (चेष्टा) रूप कर्मके लिये प्राण यानी वायु हुआ।¹ | | यो जातः स इन्द्रः परमेश्वरः, न केवलमिन्द्र एवासपत्नोऽविद्यमानः सपत्नो यस्य; कः पुनः सपत्नो नाम ? द्वितीयो वै प्रतिपक्षत्वेनोपगतः स द्वितीयः सपत्न | जो उत्पन्न हुआ वह इन्द्र—परमेश्वर था। वह केवल इन्द्र ही नहीं था, असपत्न अर्थात् जिसका कोई सपत्न न हो—ऐसा भी था। किंतु सपत्न किसे कहते हैं ? द्वितीय अर्थात् जो प्रतिपक्षभावको प्राप्त हो वह दूसरा व्यक्ति ही सपत्न कहलाता |


१. ऊपर 'मन यह इसका आत्मा है, वाक् जाया है और प्राण प्रजा है' इस प्रकार अध्यात्मरूपसे तथा 'मन पिता है, वाक् माता है और प्राण प्रजा है' इस प्रकार अधिभूतरूपसे प्राणको मन और वाक्‌की प्रजा बतलाया है। इसी प्रकार यहाँ अधिदैवरूपसे भी उसे उनकी प्रजा बतलानेके लिये यह सब कहा गया है।

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३५५

Page 361Permalink

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३५५


इत्युच्यते। तेन द्वितीयत्वेऽपि सति वाङ्मनसे न सपत्नत्वं भजेते, प्राणं प्रति गुणभावोपगते एव हि ते अध्यात्ममिव।<br><br>तत्र प्रासङ्गिकासपत्नविज्ञानफलमिदम्—नास्य विदुषः सपत्नः प्रतिपक्षो भवति, य एवं यथोक्तं प्राणमसपत्नं वेद ॥ १२ ॥है। अतः वाक् और मन उससे अन्य होनेपर भी उसके सपत्नत्वको प्राप्त नहीं हैं। वे तो अध्यात्म मन और वाक्के समान प्राणके प्रति गौणभावको प्राप्त हैं।<br><br>तहाँ प्रसङ्गप्राप्त असपत्नविज्ञानका फल यह है—जो इस प्रकार उपर्युक्त प्राणको असपत्न जानता है, उस विद्वान्‌का कोई सपत्न यानी प्रतिपक्षी नहीं होता ॥ १२ ॥

आत्मार्थ अन्नोंकी अन्तवान् और अनन्तरूपसे उपासना करनेका फल

अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतीरूपमसौ चन्द्रस्तद्यावानेव प्राणस्तावत्य आपस्तावानसौ चन्द्रस्त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः स यो हैतानन्तवत उपास्तेऽन्तवन्तँ स लोकं जयत्यथ यो हैताननन्तानुपास्तेऽनन्तँ स लोकं जयति ॥ १३ ॥

तथा इस प्राणका जल शरीर है, वह चन्द्रमा ज्योतीरूप है। तहाँ जितना प्राण है, उतना ही जल है और उतना ही वह चन्द्रमा है। वे ये सभी समान हैं और सभी अनन्त हैं। जो कोई इन्हें अन्तवान् समझकर उपासना करता है, वह अन्तवान् लोकपर जय प्राप्त करता है और जो इन्हें अनन्त समझकर उपासना करता है वह अनन्त लोकपर जय प्राप्त करता है ॥ १३ ॥


अथैतस्य प्रकृतस्य प्राजापत्यान्नस्य प्राणस्य, न प्रजोक्तस्यानन्तरनिर्दिष्टस्य, आपः शरीरं कार्यंतथा इस प्रसङ्गप्राप्त प्रजापतिके अन्नरूप प्राणका, अभी प्रजारूपसे बतलाये हुए प्राणका नहीं, जल

३५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

Page 362Permalink
३५६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| करणाधारः, पूर्ववज्ज्योतीरूपमसौ चन्द्रः। तत्र यावानेव प्राणो यावत्परिमाणोऽध्यात्मदिभेदेषु, तावद्व्याप्तिमत्त्य आपः तावत्परिमाणाः, तावानसौ चन्द्रोऽस्वाधेयस्तास्वप्स्वनुप्रविष्टः करणभूतोऽध्यात्ममधिभूतं च तावद्व्याप्तिमानेव। तान्येतानि पित्रा पाङ्क्तेन कर्मणा सृष्टानि त्रीण्यन्नानि वाङ्मनःप्राणाख्यानि। अध्यात्ममधिभूतं च जगत्समस्तमेतैर्व्याप्तम्, नैतेभ्योऽन्यदतिरिक्तं किञ्चिदस्ति कार्यात्मकं करणात्मकं वा। समस्तानि त्वेतानि प्रजापतिः। | शरीर—कार्य अर्थात् करणका आधार है तथा पूर्ववत् वह चन्द्रमा ज्योतीरूप है। वहाँ जितना प्राण है अर्थात् अध्यात्मादि भेदोंमें जितने परिमाणवाला प्राण है, उतनी व्याप्तिवाला अर्थात् उतने ही परिमाणवाला जल है और उतना ही वह जलके आधेय उस जलमें अनुप्रविष्ट उसका करणभूत अध्यात्म और अधिभूत चन्द्रमा है, वह भी उतनी ही व्याप्तिवाला है। ये ही वे पिताके द्वारा पाङ्क्तकर्मसे रचे हुए वाक्, मन और प्राणसंज्ञक तीन अन्न हैं। सारा अध्यात्म और अधिभूत जगत् इनसे व्याप्त है। इनसे भिन्न कार्य और करणरूप कोई भी पदार्थ नहीं है। ये सब [ मिलकर ] ही प्रजापति हैं। | | त एते वाङ्मनःप्राणाः सर्वे एव समास्तुल्या व्याप्तिमन्तो यावत्प्राणिगोचरं साध्यात्माधिभूतं व्याप्य व्यवस्थिताः। अत एवानन्ता यावत्संसारभाविनो हि ते। न हि कार्यकारणप्रत्याख्यानेन संसारोऽवगम्यते। कार्यकारणात्मका हि त इत्युक्तम्। | वे ये वाक्, मन और प्राण सब समान अर्थात् तुल्य व्याप्तिवाले ही हैं। अध्यात्म और अधिभूतके सहित जितना भी प्राणियोंका विषय है, ये उस सबको व्याप्त करके स्थित हैं। अतः ये अनन्त हैं अर्थात् संसारकी स्थितिपर्यन्त रहनेवाले हैं; क्योंकि कार्य और करणको छोड़कर संसार अन्य कुछ नहीं जाना जाता और यह कहा ही जा चुका है कि ये कार्य-करणरूप हैं। |

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५७

Page 363Permalink

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५७


| स यः कश्चिद् हैतान्प्रजापते- <br> रात्मभूतानन्तवतःपरिच्छिन्नान- <br> ध्यात्मरूपेण वा अधिभूतरूपेण <br> वोपास्ते, स च तदुपासनानुरूपमेव <br> फलमन्तवन्तं लोकं जयति, परि- <br> च्छिन्न एव जायते नैतेषामात्म- <br> भूतो भवतीत्यर्थः । अथ पुनर्यो <br> हैताननन्तान्सर्वात्मकान्सर्वप्रा- <br> ण्यात्मभूतानपरिच्छिन्नानुपास्ते <br> सोऽनन्तमेव लोकं जयति ॥१३॥ | जो कोई प्रजापतिके स्वरूपभूत <br> इन सबको अन्तवान्—परिच्छिन्न <br> समझकर अध्यात्म या अधिभूतरूपसे <br> उपासना करता है, वह तो उस <br> उपासनाके अनुरूप फल अन्तवान् <br> लोकको ही जीतता है । अर्थात् वह <br> परिच्छिन्नरूपसे ही उत्पन्न होता है, <br> इनका आत्मभूत नहीं होता । और <br> जो इन्हें अनन्त—सर्वात्मक— <br> समस्त प्राणियोंके आत्मभूत अर्थात् <br> अपरिच्छिन्नरूपसे उपासना करता <br> है, वह अनन्त लोकपर ही विजय <br> प्राप्त करता है ॥ १३ ॥ |


तीन अन्नरूप प्रजापतिका षोडशकल संवत्सररूपसे निर्देश

| पिता पाङ्क्तेन कर्मणा सप्तान्नानि <br> सृष्ट्वा त्रीण्यन्नान्यात्मार्थमकरो- <br> दित्युक्तम् । तान्येतानि । पाङ्क्त- <br> कर्मफलभूतानि व्याख्यातानि । <br> तत्र कथं पुनः पाङ्क्तस्य कर्मणः <br> फलमेतानि ? इति उच्यते— <br> यस्मात्तेष्वपि त्रिष्वन्नेषु पाङ्क्त- <br> तावगम्यते, वित्तकर्मणोरपि तत्र <br> सम्भवात् । तत्र पृथिव्यग्नी माता, | पिताने पाङ्क्तकर्मसे सात अन्नोंको <br> उत्पन्न कर उनमेंसे तीन अपने लिये <br> निश्चित किये—यह ऊपर कहा <br> गया । पाङ्क्तकर्मके फलभूत उन <br> अन्नोंकी व्याख्या कर दी गयी । <br> किंतु वे पाङ्क्तकर्मके फल किस <br> प्रकार हैं ? सो बतलाया जाता <br> है—क्योंकि उन तीन अन्नोंमें भी <br> पाङ्क्तता देखी जाती है [ इसलिये <br> वे पाङ्क्त हैं ]; कारण, वित्त और <br> कर्मकी भी उनमें सम्भावना है । <br> उनमें पृथिवी और अग्नि माता हैं, |