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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

१३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

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१३४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

ते देवा अब्रुवन्नेतावद्वा इदग्ँ सर्वं यदन्नं तदात्मन आगासीरनु नोऽस्मिन्नन्न आभजस्वेति ते वै माभिसंविशतेति तथेति तग्ँ समन्तं परिष्व्यविशन्त । तस्माद्यदनेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्त्येवग्ँ ह वा एनग्ँ स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानाग्ँ श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादोऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवंविदग्ँ स्वेषु प्रति प्रतिर्बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य एवैतमनु भवति यो वैतमनु भार्यान्बुभूर्षति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥ १८ ॥

वे देवगण बोले, "यह जो अन्न है वह सब तो इतना ही है; उसे तुमने अपने लिये आगान कर लिया है। अतः अब पीछेसे हमें भी इस अन्नमें भागी बनाओ।" [ प्राणने कहा ] "वे तुमलोग सब ओरसे मुझमें प्रवेश कर जाओ।" तब 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर वे सब ओरसे उसमें प्रवेश कर गये। अतः प्राणके द्वारा पुरुष जो अन्न खाता है उससे ये प्राण भी तृप्त होते हैं। अतः जो इस प्रकार जानता है उसका ज्ञातिजन सब ओरसे आश्रय ग्रहण करते हैं, वह स्वजनोंका भरण करनेवाला, उनमें श्रेष्ठ और उनके आगे चलनेवाला होता है तथा अन्न भक्षण करनेवाला और सबका अधिपति होता है। ज्ञातियोंमेंसे जो भी इस प्रकार जाननेवालेके प्रति प्रतिकूल होना चाहता है वह अपने आश्रितोंका पोषण करनेमें समर्थ नहीं होता और जो भी इसके अनुकूल रहता है—जो भी इसके अनुसार रहकर अपने आश्रितोंका भरण करना चाहता है वह निश्चय ही अपने आश्रितोंके भरणमें समर्थ होता है॥ १८॥

ते वागादयो देवाः, स्वविषय-<br><br>द्योतनाद्देवाः, अब्रुवन्नुक्तवन्तो<br><br>मुख्यं प्राणम् इदमेतावन्नातोऽधि-उन वागादि देवताओंने, जो अपने विषयका द्योतन (प्रकाशन) करनेके कारण देवता हैं, मुख्य प्राणसे कहा—"यह [अन्न] तो इतना ही है, इससे अधिक नहीं

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५

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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५


संस्कृत शाङ्करभाष्यहिन्दी भाष्यार्थ
कमस्ति । वा इति स्मरणार्थः । इदं तत्सर्वमेतावदेव, किम् ? यदन्नं प्राणस्थितिकरमद्यते लोके तत्सर्वमात्मन आत्मार्थमागासीः आगीतवानसि आगानेनात्मसात्कृतमित्यर्थः । वयं चान्न मन्तरेण स्थातुं नोत्सहामहे । अतोऽनु पश्चान्नोऽस्मानस्मिन्नन्ने आत्मार्थे तवान्ने आभजस्व आभाजयस्व । णिचोऽश्रवणं छान्दसम् । अस्मांश्चान्नभागिनः कुरु ।है । इसमें 'वै' यह निपात स्मरणके लिये है । यह वह सब इतना ही है । वह क्या ? लोकमें प्राणकी स्थिति करनेवाला जो भी अन्न भक्षण किया जाता है उस सबका तो तुमने अपने लिये आगान कर लिया; अर्थात् आगानके द्वारा उसे अपने अधीन कर लिया । हम भी अन्नके बिना रहनेमें समर्थ नहीं हैं । अतः अब पीछेसे अपने लिये आगान किये हुए अपने इस अन्नमेंसे हमें भी भाग प्राप्त कराओ, 'आभजस्व' में णिच्का श्रवण न होना छान्दस है । अर्थात् हमें भी अन्नका भागी बनाओ ।"
इतर आह—ते यूयं यद्यन्नार्थिनो वै, मा मामभिसंविशत समन्ततो मामाभिमुख्येन निविशत । इत्येवमुक्तवति प्राणे तथेत्येवमिति, तं प्राणं परिसमन्तं परिसमन्तान्न्यविशन्त निश्चयेनाविशन्त, तं प्राणं परिवेष्टय निविष्टवन्त इत्यर्थः । तथा निविष्टानां प्राणानुज्ञया तेषां प्राणेनैवाद्यमन्नं प्राणस्थितिकरं सदन्नं तृप्तिकरं भवति न स्वातन्त्र्येण ।तब उनसे इतर—मुख्य प्राणने कहा, "वे तुम, यदि अन्नप्राप्तिके इच्छुक हो तो सब ओरसे अभिमुख भावसे मुझमें प्रवेश कर जाओ ।" प्राणके इस प्रकार कहनेपर वे 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर उस प्राणमें निश्चय ही उसे सब ओरसे घेरकर प्रविष्ट हो गये । इस प्रकार प्राणकी आज्ञासे प्रविष्ट हुए उन सबकी, जो प्राणके द्वारा खाया जाता है वह प्राणकी स्थिति करनेवाला अन्न ही तृप्ति करनेवाला होता है । वागादिका स्वतन्त्रतासे अन्नके साथ सम्बन्ध नहीं होता ।

१३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

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१३६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| तस्माद्युक्तमेवावधारणम् अनेनैव तदद्यत इति । तदेव चाह— तस्माद्यस्मात्प्राणाश्रयतयैव प्राणानुज्ञयाभिसंनिविष्टा वागादिदेवताः तस्माद्यदन्नमनेन प्राणेनात्ति लोकस्तेनान्नेनैता वागाद्यास्तृप्यन्ति । | अतः "वह अन्न प्राणके ही द्वारा खाया जाता है" ऐसा निश्चय करना उचित ही है। वही बात श्रुति भी कहती है—अतः क्योंकि प्राणके आश्रित रहकर ही प्राणकी आज्ञासे वागादि देवता उसमें प्रविष्ट हुए हैं इसलिये लोक अन यानी प्राणके द्वारा जो अन्न खाते हैं उसी अन्नसे ये वागादि भी तृप्त होते हैं। | | वागाद्याश्रयं प्राणं यो वेद वागादयश्च पञ्च प्राणाश्रया इति तमप्येवमेवं ह वै स्वा ज्ञातय अभिसंविशन्ति वागादय इव प्राणम् । ज्ञातीनामाश्रयणीयो भवतीत्यभिप्रायः । अभिसंनिविष्टानां च स्वानां प्राणवदेव वागादीनां स्वान्नेन भर्ता भवति । तथा श्रेष्ठः पुरोऽग्रत एता गन्ता भवति वागादीनामिव प्राणः । तथान्नादोऽनामयावीत्यर्थः । अधिपतिरधिष्ठाय च पालयिता स्वतन्त्रः पतिः प्राणवदेव वागा- | वागादिके आश्रयभूत प्राणको जो 'वागादि पाँच प्राणके आश्रित हैं' इस प्रकार जानता है उसको भी इसी प्रकार ज्ञातिजन सब ओरसे आश्रित करते हैं, जैसे प्राणको वागादि। तात्पर्य यह है कि वह अपने ज्ञातियोंका आश्रय होने योग्य हो जाता है। तथा वागादिके भर्ता प्राणके समान वह भी अपने आश्रित ज्ञातिजनोंका अपने अन्नद्वारा भरण करनेवाला होता है; तथा वह उनमें श्रेष्ठ और उनके आगे जानेवाला होता है, जैसे वागादिके आगे प्राण। इसी तरह वह अन्नाद अर्थात् अनामयावी (निरामय—व्याधिशून्य) और अधिपति--वागादिके अधिपति प्राणके समान ही ज्ञातिजनोंका अधिष्ठाता होकर पालन करनेवाला अर्थात् स्वतन्त्र स्वामी होता है |

ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १३७

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ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ१३७

संस्कृतहिन्दी
दीनाम् । य एवं प्राणं वेद तस्यै- <br> तद्यथोक्तं फलं भवति ।जो प्राणको इस प्रकार जानता है <br> उसे उपर्युक्त फल मिलता है।
किञ्च य उ हैवंविदं प्राणविदं <br> प्रति स्वेषु ज्ञातीनां मध्ये प्रतिः <br> प्रतिकूलो बुभूषति प्रतिस्पर्धी <br> भवितुमिच्छति, सोऽसुरा इव <br> प्राणप्रतिस्पर्धिनो न हैवालं न <br> पर्याप्तो भार्येभ्यो भरणीयेभ्यो <br> भवति भर्तुमित्यर्थः। अथ <br> पुनर्य एव ज्ञातीनां मध्ये एत- <br> मेवंविदं वागादय इव प्राणम् <br> अनु अनुगतो भवति, यो वैत- <br> मेवंविद मन्वेवानुवर्तयन्नेव आत्मी- <br> यान्भार्यान् बुभूषति भर्तुमि- <br> च्छति, यथैव वागादयः प्राणा- <br> नुवृत्त्यात्मबुभूषव आसन् । स <br> हैवालं पर्याप्तो भार्येभ्यो भरणी- <br> येभ्यो भवति भर्तुं नेतरः <br> स्वतन्त्रः । सर्वमेतत्प्राणगुण- <br> विज्ञानफलमुक्तम् ॥ १८ ॥इसके सिवा स्वजनों यानी <br> ज्ञातियोंमेंसे जो भी इस प्रकार <br> जाननेवाले इस प्राणवेत्ताके प्रति <br> प्रतिकूल यानी उसका प्रतिस्पर्धी <br> होना चाहता है वह प्राणके प्रति- <br> स्पर्धी असुरोंके समान अपने भर- <br> णीयों (आश्रितों) का भरण करने- <br> में अलम् अर्थात् समर्थ नहीं होता। <br> तथा ज्ञातियोंमेंसे जो भी, प्राणके <br> अनुगामी वागादिके समान, इस <br> प्रकार जाननेवाले इस प्राणवेत्ताका <br> अनु—अनुगत होता है अर्थात् जो <br> भी इस प्राणवेत्ताका अनुवर्तन करते <br> हुए ही अपने आत्मीय यानी भरणी- <br> योंका भरण करनेकी इच्छा करता <br> है, जिस प्रकार कि वागादि प्राणका <br> अनुवर्तन करते हुए अपनेको भरण <br> करनेके इच्छुक थे, वह अपने <br> भरणीयोंके प्रति उनका भरण <br> करनेमें अलम् अर्थात् समर्थ होता <br> है, अन्य जो स्वतन्त्र है वह ऐसा <br> करनेमें समर्थ नहीं होता। यह <br> सब प्राणके गौण विज्ञानका फल <br> कहा गया है ॥ १८ ॥

१३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

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१३८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

प्राणके आङ्गिरसत्वकी उपपत्ति

कार्यकरणानामात्मत्वप्रतिपादनाय प्राणस्याङ्गिरसत्वमुपन्यस्तं सोऽयास्य आङ्गिरस इति । अस्माद्धेतोरयमाङ्गिरस इत्याङ्गिरसत्वे हेतुर्नोक्तः । तद्धेतुसिद्धयर्थमारभ्यते, तद्धेतुसिद्ध्यायत्तं हि कार्यकारणात्मत्वं प्राणस्य । अनन्तरं च वागादीनां प्राणाधीनतोक्ता सा च कथमुपपादनीया ? इत्याह—भूत और इन्द्रियोंका आत्मत्व प्रतिपादन करनेके लिये 'सोऽयास्य आङ्गिरसः' इस वाक्यसे प्राणके आङ्गिरसत्वका उल्लेख किया था। किंतु यह इसलिये आङ्गिरस है—इस प्रकार इसकी आङ्गिरसतामें हेतु नहीं बताया गया था। उस हेतुकी सिद्धिके लिये अब आरम्भ किया जाता है; क्योंकि उसके हेतुकी सिद्धिके अधीन ही प्राणकी कार्यकरणरूपता है। आङ्गिरसत्वके पश्चात् जो वागादिकी प्राणाधीनता बतलायी गयी है उसका उपपादन किस प्रकार किया जा सकता है ? सो बतलाते हैं—

सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानाꣳ हि रसः प्राणो वा अङ्गानां रसः प्राणो हि वा अङ्गानाꣳ रसस्तस्माद्यस्मात्कस्माच्चाङ्गात्प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यत्येष हि वा अङ्गानाꣳ रसः ॥ १६ ॥

वह प्राण अयास्य आङ्गिरस है, क्योंकि वह अङ्गोंका रस (सार) है। प्राण ही अङ्गोंका रस है, निश्चय प्राण ही अङ्गोंका रस है; क्योंकि जिस किसी अङ्गसे प्राण उत्क्रमण कर जाता है, वह उसी जगह सूख जाता है, अतः यही अङ्गोंका रस है ॥ १६ ॥

सोऽयास्य आङ्गिरस इत्यादि ।'सोऽयास्य आङ्गिरसः' इत्यादि

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [१३९

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ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [१३९


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
यथोपन्यस्तमेवोपादीयते उत्तरार्थम् 'प्राणो वा अङ्गानां रसः' इत्येवमन्तं वाक्यं यथाव्याख्यानार्थमेव पुनः स्मारयति ।वाक्यका जिस प्रकार पहले उल्लेख हो चुका है उसीको अब श्रुति उत्तर देनेके लिये ग्रहण करती है । 'प्राणो वा अङ्गानां रसः' यहाँतकके वाक्यका ऊपर की हुई व्याख्याके अनुसार ही श्रुति पुनः स्मरण कराती है ।
कथम् ? 'प्राणो वा अङ्गानां रसः' इति । 'प्राणो हि'—हिशब्दः प्रसिद्धौ—अङ्गानां रसः । प्रसिद्धमेतत्प्राणस्याङ्गरसत्वं न वागादीनाम् । तस्माद्युक्तं प्राणो वा इति स्मारणम् ।किस प्रकार स्मरण कराती है ? प्राण ही अङ्गोंका रस है—इस प्रकार । 'प्राणो हि' इसमें 'हि' शब्द प्रसिद्धिके अर्थमें है । अङ्गोंका रस है । प्राणका ही यह अङ्गरसत्व प्रसिद्ध है, वागादिका नहीं । अतः 'प्राणो वै' इस प्रकार उसका स्मरण करना उचित ही है ।
कथं पुनः प्रसिद्धत्वम् ? इत्यत आह । तस्माच्छब्द उपसंहारार्थ उपरित्त्वेन सम्बध्यते । यस्माद्यतोऽवयवात्कस्मादनुक्तविशेषात्, यस्मात्कस्माद्यतः कुतश्चिच्च अङ्गाच्छरीरावयवादविशेषितात्प्राणकिंतु, उसकी प्रसिद्धि किस प्रकार है ? सो श्रुति अब बतलाती है । 'तस्मात्' शब्द उपसंहारके लिये है; अतः वह उपरित्त्वभावसे [आगेके वाक्यसे] सम्बन्ध रखता है¹ । 'यस्मात्'—जिस अवयवसे और 'कस्मात्' जिसका विशेष बतलाया नहीं गया ऐसे किसी भी अवयवसे । अतः यस्मात्-कस्मात्—जिस-किसी भी अविशेषित अङ्ग यानी शरीरके

१. अर्थात् इस वाक्यका अन्वय इस प्रकार है—'यस्मात्कस्माच्चाङ्गात्प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यति तस्मादेष हि वा अङ्गानां रसः।'

१४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

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१४०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| उत्क्रामत्यपसर्पति तदेव तत्रैव तदङ्गं शुष्यति नीरसं भवति शोषमुपैति । तस्मादेष हि वा अङ्गानां रस इत्युपसंहारः ।<br><br>अतः कार्यकारणनामात्मा प्राण इत्येतत्सिद्धम् । आत्मापाये हि शोषो मरणं स्यात्तस्मात्तेन जीवन्ति प्राणिनः सर्वे । तस्मादपास्य वागादीन्प्राण एवोपास्य इति समुदायार्थः ॥१९॥ | अवयवसे प्राण उत्क्रान्त—अपसर्पित हो जाता है वह अङ्ग वहाँ ही शुष्क—नीरस हो जाता है अर्थात् सूख जाता है। अतः निश्चय यही अङ्गोंका रस है—ऐसा इसका उपसंहार है।<br><br>इससे यह सिद्ध होता है कि प्राण भूत और इन्द्रियोंका आत्मा है। आत्माका वियोग होनेपर ही शोष—मरण होता है; अतः समस्त प्राणी उसीसे जीवित रहते हैं। इसलिये वागादि समस्त प्राणोंको त्यागकर प्राण ही उपासनीय है—यह इसका समुदायार्थ है ॥१९॥ |


प्राणके बृहस्पतित्वकी उपपत्ति

| न केवलं कार्यकारणयोरेवात्मा प्राणो रूपकर्मभूतयोः। किं तर्हि ?<br><br>ऋग्यजुःसाम्नां नामभूतानामात्मेति सर्वात्मकतया प्राणं स्तुवन्महीकरोत्युपास्यत्वाय— | प्राण रूपात्मक पञ्चभूतों और कर्मभूत¹ इन्द्रियोंका ही आत्मा नहीं है तो और किसका है ? वह नाम स्वरूप ऋक्, यजुः और सामका भी आत्मा है। इस प्रकार सर्वात्मकताद्वारा प्राणकी स्तुति करते हुए वेद उसके उपास्यत्वके लिये उसे महिमान्वित करता है। |

एष एव उ बृहस्पतिर्वाग्वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥

यह ही बृहस्पति है। वाक् ही बृहती है; उसका यह पति है; इसलिये यह बृहस्पति है ॥ २० ॥


१. प्रत्यक्ष प्रमाणका विषय होनेके कारण स्थूलशरीर अर्थात् भूत रूपात्मक और ज्ञान तथा क्रियाकी शक्तिवाली होनेसे इन्द्रियाँ कर्म हैं।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४१

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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४१


संस्कृतहिन्दी
एष उ एव प्रकृत आङ्गिरसो बृहस्पतिः। कथं बृहस्पतिः? इत्युच्यते—वाग्वै बृहती बृहतीच्छन्दः षट्त्रिंशदक्षरा। अनुष्टुप् च वाक्। कथम्? "वाग्वा अनुष्टुप्" (नृसिं० पू० १।१) इति श्रुतेः। सा च वागनुष्टुब्बृहत्यां छन्दस्यन्तर्भवति। अतो युक्तं वाग्वै बृहतीति प्रसिद्धवद्वक्तुम्। बृहत्यां च सर्वा ऋचोऽन्तर्भवन्ति प्राणसंस्तुतत्वात्। "प्राणो बृहती प्राण ऋच इत्येव विद्यात्" इति श्रुत्यन्तरात्। वागात्मकत्वाच्चर्चां प्राणेऽन्तर्भावः।<br><br>तत्कथम्? इत्याह—तस्या वाचो बृहत्या ऋच एष प्राणः पतिः। तस्या निर्वर्तकत्वात्। कौष्ठ्याग्निप्रेरितमारुतनिर्वर्त्या हि ऋक्। पालनाद्वा वाचः पतिः। प्राणेनयह प्राण ही प्रकृत आङ्गिरस बृहस्पति है। किस प्रकार बृहस्पति है? सो बतलाया जाता है—वाक् ही बृहती—छत्तीस अक्षरोंवाली बृहती छन्द है। वाक् अनुष्टुप् भी है। किस प्रकार? "वाक् ही अनुष्टुप् है" इस श्रुतिके अनुसार। किंतु वह अनुष्टुप् वाक् बृहती छन्दमें अन्तर्भूत हो जाती है। 'अतः वाक् ही बृहती है' इस प्रकार प्रसिद्धके समान कहना उचित ही है। "प्राण बृहती है, प्राण ऋक् है—इस प्रकार ही जाने" इस अन्य श्रुतिसे प्राणरूपसे बृहतीकी स्तुति की जानेके कारण बृहतीमें भी समस्त ऋचाओंका अन्तर्भाव हो जाता है। समस्त ऋचाएँ वाग्रूपा हैं, इसलिये भी उनका प्राणमें अन्तर्भाव होता है।<br><br>सो किस प्रकार? इसपर श्रुति कहती है—उस वाक्का—बृहतीका यानी ऋक्का यह प्राण पति है, क्योंकि यही उसको ¹अभिव्यक्त करनेवाला है—जठराग्निद्वारा प्रेरित वायुसे ही ऋक् निष्पन्न होती है अथवा वाणीका पालन करनेके कारण यह उसका

१. जठराग्निद्वारा प्रेरित जो शरीरान्तर्गत प्राणवायु है वही ऊपरकी ओर जाकर कण्ठादिसे आहत हो वर्णोंके रूपमें अभिव्यक्त होता है। देवताधिकरणमें वाक्‌को प्राणात्मिका ही निश्चित किया गया है और ऋक् वागात्मिका बतलायी गयी है इसलिये उसका प्राणमें अन्तर्गत होना उचित ही है।

१४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

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१४२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| हि पाल्यते वाक् । अप्राणस्य शब्दोच्चारणसामर्थ्याभावात् । तस्मादु बृहस्पतिर्ऋचां प्राण आत्मेत्यर्थः ॥ २० ॥ | पति है। प्राणसे ही वाणीका पालन होता है, क्योंकि प्राणहीनको शब्दोच्चारणकी शक्ति नहीं होती। अतः यह बृहस्पति यानी ऋचाओंका प्राण अर्थात् आत्मा है ॥२०॥ |


प्राणके ब्रह्मणस्पतित्वकी उपपत्ति

तथा यजुषाम् । कथम् ?इसी प्रकार यह यजुर्मन्त्रोंका भी आत्मा है। किस प्रकार ?

एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः ॥ २१ ॥

यह ही ब्रह्मणस्पति है। वाक् ही ब्रह्म है, उसका यह पति है, इसलिये यह ब्रह्मणस्पति है ॥ २१ ॥

एष उ एव ब्रह्मणस्पतिः । वाग्वै ब्रह्म, ब्रह्म यजुः, तच्च वाग्विषेष एव । तस्या वाचो यजुषो ब्रह्मण एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः पूर्ववत् ।<br><br>कथं पुनरेतदवगम्यते बृहतीब्रह्मणोर्ऋग्यजुष्ट्वं न पुनरन्यार्थत्वम् ? इत्युच्यते—वाचोऽन्ते सामसामानाधिकरण्यनिर्देशात् “वाग्वै साम” (१।३।२२) इति ।यह ही ब्रह्मणस्पति है। वाक् ही ब्रह्म है। ब्रह्म अर्थात् यजुः है, क्योंकि वह भी एक प्रकारकी वाणी ही है। उस वाक्—यजुः यानी ब्रह्मका यह पति है; इसलिये पूर्ववत् यह ब्रह्मणस्पति है।<br><br>किंतु यह कैसे जाना जाता है कि बृहती और ब्रह्म क्रमशः ऋक् और यजुःके ही वाचक हैं, इनका कोई दूसरा अर्थ नहीं है ? इसपर कहा जाता है—अन्तमें [ अर्थात् आगे चलकर ] “वाग्वै साम” इस वाक्यद्वारा वाणीका सामके साथ सामानाधिकरण्य दिखलाया है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे १४३

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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे १४३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तथा च 'वाग्वै बृहती' 'वाग्वै ब्रह्म' इति च वाक्समानाधिकरणयोरृग्यजुष्ट्वं युक्तम् ।उसीके समान 'वाग्वै बृहती' 'वाग्वै ब्रह्म' इन वाक्योंमें जो वाक्के समानाधिकरण [बृहती और ब्रह्म] हैं उसका ऋक् और यजुः होना उचित ही है।
परिशेषाच्च—साम्नि अभिहिते ऋग्यजुषी एव परिशिष्टे । वाग्विशेषत्वाच्च—वाग्विशेषौ हि ऋग्यजुषौ । तस्मात् तयोर्वाचा समानाधिकरणता युक्ता ।यही बात परिशेषसे भी सिद्ध होती है—सामके कह देनेपर ऋक् और यजुः ही परिशिष्ट (शेष) रहते हैं। तथा वाग्विशेष होनेसे भी यही बात मालूम होती है—ऋक् और यजुः ये वाग्विशेष ही हैं। अतः वाणीके साथ उन दोनोंका समानाधिकरण होना उचित ही है।
अविशेषप्रसङ्गाच्च—सामोद्गीथ इति च स्पष्टं विशेषाभिधानत्वम्, तथा बृहतीब्रह्मशब्दयोरपि विशेषाभिधानत्वं युक्तम् । अन्यथा ऽनिर्धारितविशेषयोरानर्थक्यापत्तेश्च विशेषाभिधानस्य वाङ्मात्रत्वे चोभयत्र पौनरुक्त्यात् ।<br><br>ऋग्यजुःसामोद्गीथशब्दानां च श्रुतिष्वेवंक्रमदर्शनात् ॥ २१ ॥इसके सिवा [बृहती और ब्रह्मका रूढ अर्थ लेनेसे] अविशेषका प्रसङ्ग होगा। [आगे] साम और उद्गीथ कहकर स्पष्टतया विशेषका उल्लेख किया है, उसी प्रकार बृहती और ब्रह्म शब्दोंका भी विशेष अर्थ बतलाना आवश्यक है। अन्यथा विशेषका निश्चय न होनेसे उनकी निरर्थकता ही सिद्ध होगी। यदि उनका विशेष वाक् ही बतलाया जाय तो दोनों जगह पुनरुक्तिका प्रसङ्ग होगा। तथा ऋक्, यजुः, साम और उद्गीथ—इन शब्दोंका श्रुतियोंमें ऐसा ही क्रम देखा गया है। [इसलिये बृहती और ब्रह्म शब्द क्रमशः ऋक् और यजुःके ही वाचक हैं] ॥२१॥

१४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

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१४४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

प्राणके सामत्वकी उपपत्ति

एष उ एव साम वाग्वै सामैष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वम्। यद्वेव समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽनेन सर्वेण तस्माद्वेव सामाश्नुते साम्नः सायुज्यँ सलोकतां य एवमेतत्साम वेद ॥ २२ ॥

यह ही साम है। वाक् ही 'सा' है और यह (प्राण) 'अम' है। 'सा' और 'अम' ही साम हैं; यही सामका सामत्व है; क्योंकि यह प्राण मक्खीके समान है, मच्छरके समान है, हाथीके समान है, इस त्रिलोकीके समान है और इस सभीके समान है इसीसे यह साम है। जो इस सामको इस प्रकार जानता है वह सामका सायुज्य और उसकी सलोकता प्राप्त करता है ॥ २२ ॥


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
एष उ एव साम। कथम्? इत्याह-<br><br>वाग्वै सा यत्किञ्चित्स्त्रीशब्दाभिधेयं सा वाक्। सर्वस्त्रीशब्दाभिधेयवस्तुविषयो हि सर्वनाम 'सा' शब्दः। तथा अम एष प्राणः। सर्वपुंशब्दाभिधेयवस्तुविषयोऽमः शब्दः। "केन मे पौंस्नानि नामान्याप्नोषीति, प्राणेनेति ब्रूयात्केन मे स्त्रीनामानीति वाचा" (कौषी०यही साम है। किस प्रकार ?<br>सो बतलाते हैं—वाक् ही 'सा' है। जो कुछ भी स्त्रीशब्दवाच्य है वह वाक् है। 'सा' यह सर्वनाम शब्द समस्त स्त्रीलिङ्ग शब्दोंद्वारा कही जानेवाली वस्तुओंको विषय करता है। तथा 'अम' यह प्राण है। 'अम' शब्द समस्त पुँल्लिङ्ग-शब्दोंद्वारा कही जानेवाली वस्तुओंको विषय करता है। "[यदि कोई पूछे] मेरे पुँल्लिङ्ग नामोंको तू किसके द्वारा प्राप्त करता है ? तो 'प्राणसे' ऐसा कहे और [यदि पूछे कि] स्त्रीलिङ्ग नामोंको किससे प्राप्त करता है तो

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५

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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
उ० १ । ७ इति श्रुत्यन्तरगत् वाक्प्राणाभिधानभूतोऽयं सामशब्दः, तथा प्राणनिर्वर्त्यस्वरादिसमुदायमात्रं गीतिः सामशब्देनाभिधीयते; अतो न प्राणवाग्व्यतिरेकेण सामनामास्ति किञ्चित्, स्वरवर्णादेश्च प्राणनिर्वर्त्यत्वात्प्राणतन्त्रत्वाच्च । एष उ एव प्राणः साम । यस्मात्साम सामेति वाक्प्राणात्मकम्—सा चामश्चेति, तत्तस्मात्साम्नो गीतिरूपस्य स्वरादिसमुदायस्य सामत्वं तत्प्रगीतं भुवि ।‘वाणीसे’ ऐसा कहे” इस अन्य श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है। यह ‘साम’ शब्द वाक् और प्राणका अभिधानभूत है तथा प्राणसे निष्पन्न होनेवाला जो स्वरादिका समुदायमात्र गान है वह भी ‘साम’ शब्दसे कहा जाता है; अतः प्राणरूप वाणीके व्यापारके सिवा ‘साम’ नामकी कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि स्वर और वर्णादि भी प्राणसे निष्पन्न होनेवाले और प्राणके ही अधीन हैं। अतः यह प्राण ही साम है। क्योंकि ‘सा’ और ‘अम’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार ‘साम साम’ इस प्रकार कहा जानेवाला पदार्थ वाक् और प्राणरूप ही है, इसलिये गीतिरूप जो सामसंज्ञक स्वरादिसमुदाय है उसका लोकमें सामत्व विख्यात है।
यद् उ एव समस्तुल्यः सर्वेण वक्ष्यमाणेन प्रकारेण, तस्माद्वा सामेत्यनेन सम्बन्धः । वाशब्दः सामशब्दलाभनिमित्तप्रकारान्तरनिर्देशसामर्थ्यलभ्यः । केन पुनः प्रकारेण प्राणस्य तुल्यत्वम् ?अथवा क्योंकि आगे कहे जानेवाले प्रकारसे यह सबके समान यानी तुल्य है, इसलिये साम है—इस वाक्यके साथ यद्व एव···इत्यादि वाक्यका सम्बन्ध है। ‘वा’ शब्द सामशब्दलाभके निमित्तभूत प्रकारान्तरका निर्देश करनेकी सामर्थ्यसे प्राप्त होनेवाला है। तो फिर किस प्रकारसे प्राणकी तुल्यता है ? यह

बृ० उ० १०—

१४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

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१४६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| इत्युच्यते—समः प्लुषिणा पुत्तिकाशरीरेण, समो मशकेन मशकशरीरेण, समो नागेन हस्तिशरीरेण, सम एभिस्त्रिभिर्लोकैस्त्रैलोक्यशरीरेण प्राजापत्येन, समोऽनेन जगद्रूपेण हैरण्यगर्भेण। पुत्तिकादिशरीरेषु गोत्वादिवत्कार्त्स्न्येन परिसमाप्त इति समत्वं प्राणस्य; न पुनः शरीरमात्रपरिमाणेनेव, अमूर्तत्वात्सर्वगतत्वाच्च। न च घटप्रासादादिप्रदीपवत्संकोचविकासितया शरीरेषु तावन्मात्रं समत्वम्। “त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः” (बृह०उ० १।५।१३) इति श्रुतेः। सर्वगतस्य तु शरीरपरिमाणवृत्तिलाभो न विरुध्यते। | अब बतलाया जाता है--[ यह प्राण ] प्लुषि--पुत्तिका (छोटी मक्खी) के शरीरके समान है, मशक अर्थात् मच्छरके शरीरके समान है, नाग--हाथीके शरीरके समान है, इन तीनों लोकों अर्थात् त्रिलोकीरूप प्रजापतिके शरीरके समान है तथा इस जगद्रूप हिरण्यगर्भके शरीरके समान है। जिस प्रकार गोशरीरमें गोत्वकी पूर्णतया व्याप्ति होती है उसी प्रकार यह पुत्तिकादि शरीरोंमें पूर्णतया व्याप्त है--इसलिये ही प्राण उनके समान है, शरीरमात्रके बराबर होनेके कारण ही नहीं; क्योंकि यह अमूर्त्त और सर्वगत है। घट और महल आदिके दीपकके समान संकुचित और विकसित होनेवाला होनेसे शरीरोंमें उन्हींके बराबर रहनेसे इसका समत्व नहीं है; जैसा कि “वे ये सभी समान हैं और सभी अनन्त हैं” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। सर्वगत प्राणका शरीरके परिमाणानुसार वृत्ति लाभ करनेमें कोई विरोध नहीं है। | | एवं समत्वात्सामाख्यं प्राणं वेद यः श्रुतिप्रकाशितमहत्त्वं तस्यै- | इस प्रकार सम होनेके कारण सामसंज्ञक प्राणको, जिसका महत्त्व श्रुतिने प्रकाशित किया है, जो पुरुष |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७

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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७


तत्फलम्-अश्नुते व्याप्नोति साम्नः प्राणस्य सायुज्यं सयुग्भावं समानदेहेन्द्रियाभिमानत्वम्, सालोक्यं समानलोकतां वा भावनाविशेषतः, य एवमेतद्यथोक्तं साम प्राणं वेद--आ प्राणात्माभिमानाभिव्यक्तेरुपास्ते इत्यर्थः ॥२२॥जानता है उसे यह फल प्राप्त होता है--वह सामसंज्ञक प्राणका सायुज्य-सयुग्भाव अर्थात् उसके साथ एक ही देह और इन्द्रियादिका अभिमान प्राप्त करता है तथा भावनाविशेषसे सालोक्य यानी समानलोकता प्राप्त करता है, जो इस प्रकार इस उपर्युक्त सामरूप प्राणको जानता है अर्थात् प्राणात्मत्वका अभिमान उदय होनेपर्यन्त उसकी उपासना करता है ॥ २२ ॥

प्राणके उद्गीथत्वकी उपपत्ति

एष उ वा उद्गीथः प्राणो वा उत्प्राणेन हीदँ सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्च गीथा चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥

यह ही उद्गीथ है। प्राण ही उत् है, प्राणके द्वारा ही यह सब उत्तब्ध--धारण किया हुआ है। वाक् ही गीथा है। वह उत् है और गीथा भी है; इसलिये उद्गीथ है ॥ २३ ॥


एष उ वा उद्गीथः । उद्गीथो नाम सामावयवो भक्तिविशेषो नोद्गानम्, सामाधिकारात् । कथमुद्गीथः प्राणः ? प्राणो वा उत्प्राणेन हि यस्मादिदं सर्वं जगदुत्तब्धमूर्ध्वं स्तब्धमुत्तम्भितं विधृतमित्यर्थः । उत्तब्धार्थाव-यह ही 'उद्गीथ' है। 'उद्गीथ' शब्दसे सामकी अवयवभूत भक्ति-विशेष अभिप्रेत है, उद्गान नहीं; क्योंकि यहाँ सामका ही अधिकरण है। प्राण उद्गीथ किस प्रकार है ?- प्राण ही 'उत्' है; क्योंकि प्राणसे ही यह सब जगत् उत्तब्ध--ऊपरकी ओर ठहरा हुआ अर्थात् विधृत है। 'उत्तब्ध' अर्थका द्योतन करनेवाला

१४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

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१४८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| द्योतकोऽयमुच्छब्दः प्राणगुणाभि-धायकः, तस्मादुत्प्राणः। वागेव गीथाशब्दविशेषत्वादुद्गीथभक्तेः। गायतेः शब्दार्थत्वात्सा वागेव ! न ह्युद्गीथभक्तेः शब्दव्यतिरेकेण किञ्चिद्रूपमुत्प्रेक्ष्यते । तस्माद्युक्तमवधारणं वागेव गीथेति । उच्च प्राणो गीथा च प्राणतन्त्रा वागित्युभयमेकेन शब्देनाभिधीयते स उद्गीथः ॥ २३ ॥ | यह 'उत्' शब्द प्राणका गुण बतलानेवाला है। अतः प्राण उत् है। वाक् ही गीथा है; क्योंकि उद्गीथभक्ति शब्दविशेष ही है। 'गै' धातुका अर्थ शब्द करना है, अतः गीथा वाक् ही है। उद्गीथ-भक्तिके स्वरूपकी शब्दके सिवा और कोई उत्प्रेक्षा नहीं की जा सकती। अतः वाक् ही गीथा है—ऐसा निश्चय करना उचित ही है। उत् प्राण है और गीथा प्राणतन्त्रा वाक् है, अतः इन दोनोंका एक ही शब्दसे कथन होता है, वह शब्द 'उद्गीथ' है ॥ २२ ॥ |

उक्त अर्थकी पुष्टिके लिये आख्यायिका

तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्यस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदितोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति ॥ २४ ॥

उस [प्राण] के विषयमें यह आख्यायिका भी है--चैकितानेय ब्रह्मदत्तने यज्ञमें सोम भक्षण करते हुए कहा। "यदि अयास्य और आङ्गिरसनामक मुख्य प्राणने वाक्संयुक्त प्राणसे अतिरिक्त देवताद्वारा उद्गान किया हो तो यह सोम मेरा शिर गिरा दे।" अतः उसने प्राण और वाक्‌के ही द्वारा उद्गान किया था—ऐसा निश्चय होता है ॥ २४ ॥

तद्धापि तत्तत्रैतस्मिन्नुक्तेऽर्थे हाप्याख्यायिकापि श्रूयते ह स्म।'तद्धापि'--उस अर्थात् इस उपर्युक्त विषयमें यह आख्यायिका भी सुनी जाती है--ब्रह्मदत्त नाम-

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४९

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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४९


| ब्रह्मदत्तो नामतः चिकितानस्यापत्यं चैकितानस्तदपत्यं युवा चैकितानेयः, राजानं यज्ञे सोमं भक्षयन्नुवाच । किम् ? अयं चमसस्थो मया भक्ष्यमाणो राजा त्यस्य तस्य ममानृतवादिनो मूर्धानं शिरो विपातयताद्विस्पष्टं पातयतु । तोरयं तातङादेशः आशिषि लोट्, विपातयतादिति । यदहमनृतवादी स्यामित्यर्थः ।<br><br>कथं पुनरनृतवादित्वप्राप्तिः ? इत्युच्यते—यद्यदीतोऽस्मात्प्रकृतात् प्राणाद्वाक्संयुक्तात्, अयास्यः-मुख्यप्राणाभिधायकेन | वाला चैकितानेय—चिकितानके पुत्र चैकितानका युवसंज्ञक¹ अपत्य (संतान) यज्ञमें राजा अर्थात् सोमका भक्षण करता हुआ बोला। क्या बोला—"यह मेरेद्वारा भक्षण किया जाता हुआ चमसस्थ सोम 'त्यस्य'—उस मुझ मिथ्यावादीके मस्तकको विपतित—विस्पष्टतया पतित कर दे, अर्थात् यदि मैं मिथ्यावादी होऊँ तो ऐसा हो।" यहाँ [आशिषि लिङ्लोटौ इस सूत्रके नियमानुसार ] आशीर्वाद अर्थमें लोट् लकार है। 'विपातयतु' के 'तु' प्रत्ययको तातङ् आदेश होकर 'विपातयतात्' यह रूप सिद्ध हुआ है।²<br><br>किंतु मुझे मिथ्यावादित्वकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? सो बतलाया जाता है—"यदि इस प्रकृत वाक्संयुक्त प्राणसे अयास्यने, जो मुख्यप्राणके वाचक अयास्याङ्गिरस शब्दद्वारा |


१. व्याकरणशास्त्रीय प्रक्रियामें अपत्य तीन प्रकारके माने गये हैं, १ अनन्तरापत्य, २ गोत्रापत्य और ३ युवापत्य । पुत्रको अनन्तरापत्य कहते हैं, पौत्रसे लेकर जितनी भी होनेवाली पीढ़ियाँ हैं, सभी गोत्रापत्य कहलाती हैं, किंतु जिसके पिता आदिमेंसे कोई भी जीवित हो, वह संतान यदि मूल पुरुषसे नीचेकी चौथी आदि पीढ़ियोंमेंसे है अर्थात् पौत्रका पुत्र आदि है तो उसको युवापत्य कहते हैं।
२. संस्कृतमें आज्ञा अर्थमें 'लोट्' लकार होता है। उसका आशीर्वादके अर्थमें भी प्रयोग होता है। उसके प्रथमपुरुषका एक वचन प्रत्यय 'ति' है, उसीके इकारको उकार आदेश होनेसे 'तु' होता है और फिर उसका 'तातङ्' आदेश होकर 'तात्' रूप बनता है।

१५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

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१५०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| अयास्याङ्गिरसशब्देनाभिधीयते विश्वसृजां पूर्वर्षीणां सत्रे उद्गाता—सोऽन्येन देवतान्तरेण वाक्प्राणव्यतिरिक्तेनोद्गायदुद्गानं कृतवान्, ततोऽहमनृतवादी स्याम्, तस्य मम देवता विपरीतप्रतिपत्तुर्मूर्धानं विपातयतु, इत्येवं शपथं चकारेति विज्ञाने प्रत्ययदाढ्यं-कर्तव्यतां दर्शयति ।<br><br>तमिममार्थ्यायिकानिर्धारितमर्थं स्वेन वचसोपसंहरति श्रुतिः—वाचा च प्राणप्रधानया प्राणेन च स्वस्यात्मभूतेन सोऽयास्य आङ्गिरस उद्गातोद्गायदित्येषोऽर्थो निर्धारितः शपथेन ॥ २४ ॥ | कहा जाता है और जो विश्वकी रचना करनेवाले पूर्ववर्ती ऋषियोंके सत्रमें उद्गाता था, उसने यदि वाक्संयुक्त प्राणसे भिन्न किसी अन्य देवताद्वारा उद्गान किया हो तो मैं मिथ्यावादी ठहरूँगा, अतः देवता मुझ विपरीत ज्ञान रखनेवालेका मस्तक गिरा दे।” इस प्रकार उसने जो शपथ की यह विज्ञानमें प्रत्ययकी दृढ़ता करनी चाहिये—इस बातको प्रकट करती है।<br><br>आख्यायिकाद्वारा निश्चित इस अर्थका श्रुति अपने वचनसे उपसंहार करती है—उस अयास्य आङ्गिरस उद्गाताने प्राणप्रधान वाणीसे और अपने आत्मभूत प्राणसे ही उद्गान किया था—यही अर्थ इस शपथसे निश्चित होता है ॥ २४॥ |

सामके स्वभूत स्वरको सम्पादन करनेकी आवश्यकता

तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं तस्य वै स्वर एव स्वं तस्मादार्त्विज्यं करिष्यन्वाचिस्वरमिच्छेत तया वाचा स्वरसम्पन्नयार्त्विज्यं कुर्यात्तस्माद्यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त एव । अथो यस्य स्वं भवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद ॥ २५ ॥

जो उस इस सामशब्दवाच्य मुख्य प्राणके स्व (धन) को जानता है उसे धन प्राप्त होता है। निश्चय स्वर ही उसका धन है। अतः ऋत्विक्-

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थे [१५१

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ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थे [१५१


कर्म करनेवालेको वाणीमें स्वरकी इच्छा करनी चाहिये। उस स्वर-सम्पन्न वाणीसे ऋत्विक् कर्म करे। इसीसे यज्ञमें स्वरवान् उद्गाताको देखनेकी इच्छा करते ही हैं। लोकमें भी जिसके पास धन होता है [ उसे ही देखना चाहते हैं ]। जो इस प्रकार इस सामके धनको जानता है उसे धन प्राप्त होता है ॥ २५ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तस्येति प्रकृतं प्राणमभि- <br><br> सम्बध्नाति। हैतस्येति मुख्यं <br><br> व्यपदिशत्यभिनयेन। साम्नः <br><br> सामशब्दवाच्यस्य प्राणस्य यः स्वं <br><br> धनं वेद, तस्य ह किं स्यात् ? <br><br> भवति हास्य स्वम्। फलेन प्रलो- <br><br> भ्याभिमुखी कृत्य शुश्रूषवे आह— <br><br> तस्य वै साम्नः स्वर एव स्वम्। <br><br> स्वर इति कण्ठगतं माधुर्यं तदे- <br><br> वास्य स्वं विभूषणम्। तेन हि <br><br> भूषितमृद्धिमल्लक्ष्यत उद्गानम्। <br><br> यस्मादेवं तस्मादार्त्विज्यं <br><br> ऋत्विकर्मोद्गानं करिष्यन्वाचि <br><br> विषये वाचि वागाश्रितं स्वरमि- <br><br> च्छेन्न इच्छेत् साम्नो धनवत्तां <br><br> स्वरेण चिकीर्षुरुद्गाता। इदं तु'तस्य' इस सर्वनामसे श्रुति प्रकृत प्राणका सम्बन्ध दिखाती है। 'ह एतस्य' इन पदोंसे श्रुति मुख्यप्राणको अङ्गुलिनिर्देशद्वारा बतलाती है। साम अर्थात् साम-शब्दवाच्य मुख्यप्राणके स्व यानी धनको जो पुरुष जानता है उसे क्या फल मिलता है?—उसे धनकी प्राप्ति होती है। इस प्रकार फलके द्वारा प्रलोभित कर उसे अपनी ओर अभिमुख करके श्रुति श्रवणके इच्छुकसे कहती है—निश्चय उस सामका स्वर ही धन है। स्वर कण्ठगत मधुरताको कहते हैं, वही इसका धन—विभूषण है। उसके द्वारा भूषित होनेपर ही उद्गान समृद्धिमान् दिखायी देता है। <br><br> क्योंकि ऐसा है, इसलिये आर्त्विज्य यानी उद्गानरूप ऋत्विक्कर्म करते हुए स्वरके द्वारा सामकी समृद्धि सम्पादन करनेकी इच्छावाले उद्गाताको वाणीके विषयमें अर्थात् वाणीके आश्रित स्वरकी इच्छा करनी

| १५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |

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१५२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| प्रासङ्गिकं विधीयते; साम्नः सौस्वर्येण स्वरवत्त्वप्रत्यये कर्तव्ये इच्छामatreण सौस्वर्यं न भवतीति दन्तधावनतैलपानादि सामर्थ्यात्कर्तव्यमित्यर्थः। तयैवं संस्कृतया वाचा स्वरसम्पन्नयाऽऽर्त्विज्यं कुर्यात्।<br><br>तस्माद्यस्मात्साम्नः स्वभूतः स्वरस्तेन स्वेन भूषितं साम अतो यज्ञे स्वरवन्तमुद्गातारं दिदृक्षन्त एव द्रष्टुमिच्छन्त एव धनिनमिव लौकिकाः। प्रसिद्धं हि लोकेऽथो अपि यस्य स्वं धनं भवति तं धनिनं दिदृक्षन्ते इति सिद्धस्य गुणावज्ञानफलसम्बन्धस्य उपसंहारः क्रियते— भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेदेति ॥ २५ ॥ | चाहिये। यह तो प्रासंगिक विधान किया गया है; सामकी सुस्वरता अर्थात् स्वरवत्त्व-प्रतीति कर्तव्य होनेपर इच्छामात्रसे ही उसकी सुस्वरता नहीं हो जाती। इसलिये तात्पर्य यह है कि दन्तधावन और तैलपानादिके बलसे सुस्वरताका सम्पादन करना चाहिये। इस प्रकार संस्कारयुक्त हुई उस स्वरसम्पन्न वाणीसे ऋत्विक्कर्म करे।<br><br>अतः क्योंकि स्वर सामका धन है, इसलिये उसीसे साम विभूषित होता है। इसीसे लौकिक पुरुष जिस प्रकार धनीको देखना चाहते हैं उसी प्रकार यज्ञमें स्वरसम्पन्न उद्गाताको ही देखनेकी इच्छा करते हैं। लोकमें यह प्रसिद्ध ही है कि जिसके पास स्व—धन होता है, उस धनीको लोग देखना चाहते हैं; इस प्रकार सिद्ध हुए गुणविज्ञानरूप फलके सम्बन्धका 'जो इस प्रकार इस सामके धनको जानता है उसे धन प्राप्त होता है' इस वाक्यद्वारा उपसंहार किया जाता है ॥ २५ ॥ |


सामके सुवर्णको जाननेका फल

अथान्यो गुणः सुवर्णवत्त्वलक्षणो विधीयते। असावपि सौस्वर्यमेव। एतावान्विशेषः—अब सुवर्णवत्तारूप दूसरे गुणका विधान किया जाता है। वह भी सुस्वरता ही है। अन्तर इतना ही

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १५३

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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १५३

पूर्वं कण्ठगतमाधुर्यमिदं तु लाक्षणिकं सुवर्णशब्दवाच्यम् ।है कि पहली सुस्वरता कण्ठगत माधुर्य थी और वह सुवर्णशब्दवाच्य माधुर्य लाक्षणिक है ।

तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद भवति हास्य सुवर्णं तस्य वै स्वर एव सुवर्णं भवति हास्य सुवर्णं य एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥

जो उस इस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्ण प्राप्त होता है। उसका स्वर ही सुवर्ण है। जो इस प्रकार इस सामके सुवर्णको जानता है। उसे सुवर्ण मिलता है ॥ २६ ॥

तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद भवति हास्य सुवर्णम् । सुवर्णशब्दसामान्यात्स्वरसुवर्णयोः लौकिकमेव सुवर्णं गुणविज्ञानफलं भवतीत्यर्थः । तस्य वै स्वर एव सुवर्णम् । भवति हास्य सुवर्णं य एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेदेति पूर्ववत्सर्वम् ॥ २६ ॥जो उस इस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्ण प्राप्त होता है। स्वर और सुवर्ण इन दोनोंके लिये सुवर्ण शब्दका प्रयोग समान-रूपसे होता है, इसलिये उस गुणके विज्ञानका फल लौकिक सुवर्ण ही होता है। निश्चय स्वर ही उस (साम) का सुवर्ण है। जो इस प्रकार इस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्ण मिलता है—इस प्रकार सब अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ २६ ॥

सामके प्रतिष्ठागुणको जाननेवालेका फल

तथा प्रतिष्ठागुणं विधित्सन्नाह—इसी प्रकार सामके प्रतिष्ठागुण-का विधान करनेकी इच्छासे श्रुति कहती है—