भारतकोश
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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८२३ |

ब्राह्मण ९ ]शाङ्करभाष्यार्थ८२३

| वादी स्यादुत ह्येवंवित् परो भवतीति । सैषा आख्यायिका आचारार्थं सूचिता विद्यास्तुतये चेह ॥ २६ ॥ | चाहिए; क्योंकि ब्रह्मवेत्ता श्रेष्ठ होता है। यह आख्यायिका यहाँ आचारप्रदर्शन और विद्याकी स्तुतिके लिये सूचित की गयी है ॥ २६ ॥ |


याज्ञवल्क्यका सभासदोंको प्रश्न करनेके लिये आमन्त्रण

| यस्य नेति नेतीत्यन्यप्रतिषेधद्वारेण ब्रह्मणो निर्देशः कृतः, तस्य विधिमुखेन कथं निर्देशः कर्तव्यः, इति पुनराख्यायिकामेव आश्रित्याह मूलं च जगतो वक्तव्यमिति । आख्यायिकासम्बन्धस्त्वब्रह्मविदो ब्राह्मणाञ्जित्वा गोधनं हर्तव्यमिति । न्यायं मत्वाऽह— | जिस ब्रह्मका ‘नेति-नेति’ इस प्रकार अन्य पदार्थोंके प्रतिषेधद्वारा निर्देश किया गया है, उसका विधिमुखसे किस प्रकार निर्देश करना चाहिये, अतः इस उद्देश्यसे कि जगत्का मूल बतलाना है, श्रुति पुनः आख्यायिकाका ही आश्रय लेकर कहती है। आख्यायिकाका सम्बन्ध तो यही है कि अब्रह्मज्ञ ब्राह्मणोंको जीतकर गोधन ले जाना उचित है। अतः न्याय समझकर याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— |

अथ होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वः कामयते स मा पृच्छतु सर्वे वा मा पृच्छत यो वः कामयते तं वः पृच्छामि सर्वान् वा वः पृच्छामीति ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः ॥ २७ ॥

फिर याज्ञवल्क्यने कहा, 'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपमेंसे जिसकी इच्छा हो वह मुझसे प्रश्न करे, अथवा आप सभी मुझसे प्रश्न करें, इसी प्रकार आपमेंसे जिसकी इच्छा हो, उससे मैं प्रश्न करता हूँ या आप सभीसे मैं प्रश्न करता हूँ।' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ ॥ २७ ॥

८२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

८२४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| अथ होवाच । अथानन्तरं तूष्णीम्भूतेषु ब्राह्मणेषु होवाच, हे ब्राह्मणा भगवन्त इत्येवं सम्बोध्य–यो वो युष्माकं मध्ये कामयते इच्छति--याज्ञवल्क्यं पृच्छामीति, स मा मामागत्य पृच्छतु; सर्वे वा मा पृच्छत—सर्वे वा यूयं मा मां पृच्छत । यो वः कामयते याज्ञवल्क्यो मां पृच्छत्विति, तं वः पृच्छामि; सर्वान् वा वो युष्मानहं पृच्छामि । ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः-ते ब्राह्मणा एवमुक्ता अपि न प्रगल्भाः संवृत्ताः किञ्चिदपि प्रत्युत्तरं वक्तुम् ॥ २७ ॥ | 'अथ होवाच'—अथ—इसके अनन्तर ब्राह्मणोंके मौन हो जाने-पर याज्ञवल्क्यने 'हे पूज्य ब्राह्मण-गण !' इस प्रकार सम्बोधन करके कहा, 'आपमें जिसकी ऐसी कामना-इच्छा हो कि मैं याज्ञवल्क्यसे प्रश्न करूँ, वह मेरे सामने आकर पूछ सकता है । 'सर्वे वा मा पृच्छत'-अथवा आप सभी मुझसे पूछ सकते हैं। और आपमेंसे जिसकी ऐसी इच्छा हो कि याज्ञवल्क्य मुझसे प्रश्न करे, उससे मैं पूछता हूँ अथवा आप सभीसे मैं पूछता हूँ।' उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ-इस प्रकार कहे जानेपर भी वे ब्राह्मण किसी प्रकारका प्रत्युत्तर देनेकी प्रगल्भता (धृष्टता) न कर सके ॥ २७ ॥ |


याज्ञवल्क्यके प्रश्न

तान् हैतैः श्लोकैः पप्रच्छ—
यथा वृक्षो वनस्पतिस्तथैव पुरुषोऽमृषा ।
तस्य लोमानि पर्णानि त्वगस्योत्पाटिका बहिः ॥ १ ॥

याज्ञवल्क्यने उनसे इन श्लोकोंद्वारा प्रश्न किया—वनस्पति (विशा-लता आदि गुणोंसे युक्त) वृक्ष जैसा (जिस धर्मोंसे युक्त) होता है, पुरुष (जीवका शरीर) भी वैसा ही (उन्हीं धर्मोंसे सम्पन्न) होता है—यह बिल्कुल सत्य है । वृक्षके पत्ते होते हैं और उस पुरुषके शरीरमें पत्तोंकी जगह रोएँ होते हैं; उसके शरीरमें जो त्वचा (चाम) है, उसकी समतामें इस वृक्षके बाहरी भागमें छाल होती है ॥ १ ॥

ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८२५

ब्राह्मण ९ ]शाङ्करभाष्यार्थ८२५

| तेषु अप्रगल्भभूतेषु ब्राह्मणेषु तान् हतैर्वक्ष्यमाणैः श्लोकैः पप्रच्छ पृष्टवान्। यथा लोके वृक्षो वनस्पतिः, वृक्षस्य विशेषणं वनस्पतिरिति, तथैव पुरुषोऽमृषा—अमृषा सत्यमेतत्—तस्य लोमानि; तस्य पुरुषस्य लोमानीतरस्य वनस्पतेः पर्णानि; त्वगस्योत्पाटिका बहिः—त्वगस्य पुरुषस्य इतरस्योत्पाटिका वनस्पतेः ॥ १ ॥ | जब वे ब्राह्मण कुछ बोलनेका साहस न कर सके तो याज्ञवल्क्यने उनसे इन आगे कहे जानेवाले श्लोकोंद्वारा पूछा। जिस प्रकार लोकमें वनस्पति अर्थात् विशालता आदि गुणोंसे युक्त वृक्ष है—वनस्पति यह वृक्षका विशेषण है—उसी प्रकार यानी उस वृक्षके समान धर्मोंसे सम्पन्न पुरुष भी है—यह बिल्कुल सत्य बात है। उसके लोम—उस पुरुषके लोम हैं और उन्हींके समान इतर यानी इस वनस्पतिके पत्ते होते हैं तथा 'त्वगस्योत्पाटिका बहिः' इस पुरुषके शरीरमें जो त्वचा है, उसकी समानता रखनेवाली इतर यानी इस वनस्पति वृक्षके बाहरी भागमें छाल है ॥ १ ॥ |


त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यन्दि त्वच उत्पटः ।
तस्मात्तदातृण्णात् प्रैति रसो वृक्षादिवाहतात् ॥२॥

इस पुरुषकी त्वचासे ही रक्त चूता है और वृक्षकी भी त्वचा (छाल) से ही गोंद निकलता है। वृक्ष और पुरुषकी इस समानताके कारण ही जिस प्रकार आघात लगनेपर वृक्षसे रस निकलता है, उसी प्रकार चोट खाये हुए पुरुष-शरीरसे रक्त प्रवाहित होता है ॥ २ ॥

त्वच एव सकाशादस्य पुरुषस्य रुधिरं प्रस्यन्दि, वनस्पतेस्त्वचइस पुरुषकी त्वचाके ही पाससे रक्त चूकर गिरता हे और वनस्पतिकी

८२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

८२६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| उत्पटः—त्वच एवोत्स्फुटति यस्मात्; एवं सर्वं समानमेव वनस्पतेः पुरुषस्य च; तस्माद् आत्ण्णात् हिंसितात् प्रति तद् रुधिरं निर्गच्छति वृक्षादिव आहताच्छिन्नाद् रसः ॥ २ ॥ | भी त्वचा (छाल) से ही उत्पट अर्थात् गोंद निकलता है; क्योंकि वह (गोंद) वृक्षकी छालसे ही फूटकर बहता है। इस प्रकार वनस्पति और पुरुषकी सभी बातें एक-ही-जैसी हैं। इसीलिये आहत अर्थात् कटे हुए वृक्षसे निकले हुए रसकी भाँति चोट खाये हुए पुरुष-शरीरसे भी वह रुधिर निकलता है ॥ २ ॥ |


मांसान्यस्य शकराणि किनाटँ स्नाव तत् स्थिरम् ।

अस्थीन्यन्तरतो दारूणि मज्जा मज्जोपमा कृता ॥ ३॥

पुरुषके शरीरमें मांस होते हैं और वनस्पतिके शकर (छालका भीतरी अंश), पुरुषके स्नायु—जाल होते हैं और वृक्षमें किनाट (शकरके भी भीतरका अंश-विशेष)। वह किनाट स्नायुकी ही भाँति स्थिर होता है। पुरुषके स्नायु-जालके भीतर जैसे हड्डियां होती हैं, वैसे ही वृक्षमें किनाटके भीतर काष्ठ हैं तथा मज्जा तो दोनोंमें मज्जाके ही समान निश्चित की गयी है ॥ ३ ॥

| एवं मांसान्यस्य पुरुषस्य, वनस्पतेस्तानि शकराणि शकलानीत्यर्थः । किनाटं वृक्षस्य, किनाटं नाम शकलेभ्योऽभ्यन्तरं वल्कलरूपं काष्ठसंलग्नम्, तत् स्नाव पुरुषस्य; तत् स्थिरम्—तच्च किनाटं स्नाववद् | इसी प्रकार इस पुरुषके मांस हैं और वनस्पतिके मांसस्थानीय शकर—शकल (छालके भीतरका अंश) हैं। वृक्षके किनाट होता है, किनाट उसे कहते हैं जो शकलोंसे भीतर काठसे लगी हुई छाल होती है, वह [अर्थात् उसके सदृश] पुरुषकी शिराएँ हैं। वह स्थिर है अर्थात् वह किनाट शिराओंके समान दृढ़ है। पुरुषकी |

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२७

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२७


| दृढं हि तत्; अस्थीनि पुरुषस्य, स्नाव्नो ऽन्तरतोऽस्थीनि भवन्ति; तथा किनाटस्याभ्यन्तरतो दारूणि काष्ठानि; मज्जा, मज्जैव वनस्पतेः पुरुषस्य च मज्जोपमा कृता, मज्जाया उपमा मज्जोपमा, नान्यो विशेषोऽस्तीत्यर्थः; यथा वनस्पतेर्मज्जा तथा पुरुषस्य, यथा पुरुषस्य तथा वनस्पतेः॥३॥ | शिराओंके भीतर अस्थियां होती हैं; इसी प्रकार किनाटके भीतर काष्ठ होता है; मज्जा-वनस्पति तथा पुरुषकी मज्जा ही मज्जाकी उपमा नियत की गयी है, मज्जाकी उपमा ही मज्जोपमा है, अर्थात् उनमें कोई अन्य भेद नहीं है; जिस प्रकार वनस्पतिकी मज्जा होती है, वैसे ही पुरुषकी होती है और जैसे पुरुषकी होती है वैसे ही वनस्पतिको होती है ॥ ३ ॥ |


यद् वृक्षो वृक्णो रोहति मूलान्नवतरः पुनः ।
मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ॥४॥

किंतु यदि वृक्षको काट दिया जाता है तो अपने मूलसे पुनः और भी नवीन होकर अङ्कुरित हो जाता है; इसी प्रकार यदि मनुष्यको मृत्यु काट डाले तो वह किस मूलसे उत्पन्न होगा ? ॥ ४ ॥

| यद् यदि वृक्षो वृक्णश्छिन्नो रोहति पुनः पुनः प्ररोहति प्रादुर्भवति मूलात् पुनर्नवतरः पूर्वस्मादभिनवतरः; यदेतस्माद् विशेषात् प्राग् वनस्पतेः पुरुषस्य च, सर्वं सामान्यमवगतम्; अयं तु वनस्पतौ विशेषो दृश्यते यच्छिन्नस्य प्ररोह- | यदि वृक्षको काट दिया जाय तो वह पुनः-पुनः अपनी जड़से अतिशय नवीन—पहलेकी अपेक्षा नवीनतर होकर अङ्कुरित-प्रादुर्भूत हो जाता है। इस विशेषणसे पूर्व वनस्पति और पुरुषकी सब प्रकार समानता जानी गयी है; किंतु कट जानेपर पुनः अङ्कुरित हो जाना यह वनस्पतिमें विशेषता देखी जाती है; परंतु |

८२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

८२८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| णम्; न तु पुरुषे मृत्युना वृक्णे पुनः प्ररोहणं दृश्यते; भवितव्यं च कुतश्चित्प्ररोहणेन; तस्माद् वः पृच्छामि—मर्त्यो मनुष्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ? मृतस्य पुरुषस्य कुतः प्ररोहणमित्यर्थः ॥ ४ ॥ | मृत्युद्वारा छेदन किये जानेपर पुरुषको पुनः अङ्कुरित होते नहीं देखा जाता; किंतु वह किसीसे अङ्कुरित अवश्य होना चाहिये; इसीसे मैं आपलोगोंसे पूछता हूँ कि यदि मृत्युद्वारा मनुष्यका छेदन कर दिया जाय तो वह किस मूलसे अङ्कुरित होता है ? अर्थात् मरे हुए पुरुषकी उत्पत्ति कहांसे होती है ? ॥ ४ ॥ |

रेतस इति मा वोचत जीवतस्तत् प्रजायते ।
धानारुह इव वै वृक्षोऽञ्जसा प्रेत्य सम्भवः ॥५॥

वह वीर्यसे उत्पन्न होता है—ऐसा तो मत कहो, क्योंकि वीर्य तो जीवित पुरुषसे ही उत्पन्न होता है [ मृत पुरुषसे नहीं ] । वृक्ष भी [केवल तनेसे ही नहीं उत्पन्न होता, ] बीजसे भी उत्पन्न होता है, किंतु बीजसे उत्पन्न होनेवाला वृक्ष भी कट जानेके पश्चात् पुनः अङ्कुरित होकर उत्पन्न होता है, यह प्रत्यक्ष देखा गया है ॥ ५ ॥

| यदि चेदेवं वदथ—रेतसः प्ररोहतीति, मा वोचत मैवं वक्तुमर्हथ; कस्मात् ? यस्माज्जीवतः पुरुषात्तद् रेतः प्रजायते, न मृतात् । अपि च धानारुहः, धाना बीजम्, बीजरुहोऽपि वृक्षो भवति, न केवलं काण्डरुह एव; इवशब्‍दोऽनर्थकः; | यदि तुम ऐसा कहो कि वह वीर्यसे उत्पन्न होता है, तो मत कहो—ऐसा कहना उचित नहीं है; क्यों नहीं है ? क्योंकि वीर्य जीवित पुरुषसे ही उत्पन्न होता है, मरे हुएसे नहीं होता । वृक्ष धानारुह भी है, धाना बीजको कहते हैं, उस बीजसे उत्पन्न होनेवाला भी वृक्ष होता है; वह केवल तनेसे ही उत्पन्न नहीं होता; 'इव' शब्द- |

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८२९

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८२९

| वै वृक्षोऽञ्जसा साक्षात् प्रेत्य<br>मृत्वा सम्भवो धानातोऽपि प्रेत्य<br>सम्भवो भवेदञ्जसा पुनर्वन-<br>स्पतेः ॥ ५ ॥ | का कोई अर्थ नहीं है; यह प्रसिद्ध<br>है कि वृक्ष मरकर भी पुनः साक्षात्<br>उत्पन्न हो जाता है; धाना अर्थात्<br>बीजसे उत्पन्न हुए वनस्पतिका भी<br>कटनेके बाद पुनः प्रादुर्भाव हो<br>जाता है [ किंतु जीवके शरीरका<br>इस प्रकार आविर्भाव नहीं देखा<br>जाता ] ॥ ५ ॥ |


यत् समूलमावृहेयुर्वृक्षं न पुनराभवेत् ।
मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ॥ ६ ॥

यदि वृक्षको मूलसहित उखाड़ दिया जाय तो वह फिर उत्पन्न नहीं होगा; इसी प्रकार यदि मनुष्यका मृत्यु छेदन कर दे तो वह किस मूलसे उत्पन्न होता है ? ॥ ६ ॥

| यद् यदि सह मूलेन धानया<br>वा आवृहेयुरुद्यच्छेयुरुत्पाटयेयु-<br>र्वृक्षम्, न पुनराभवेत् पुनरागत्य<br>न भवेत् । तस्माद् वः पृच्छामि<br>सर्वस्यैव जगतो मूलम्—मर्त्यः<br>स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मू-<br>लात् प्ररोहति ॥ ६ ॥ | यदि वृक्षको मूल अथवा बीजके<br>सहित 'आवृहेयुः'—आकर्षित कर<br>लें-उखाड़ लें तो फिर वह वृक्ष<br>कहींसे आकर उत्पन्न नहीं होगा ।<br>इसलिये मैं तुमलोगोंसे सम्पूर्ण<br>जगत्के मूलके सम्बन्धमें प्रश्न कर<br>रहा हूँ—यदि मृत्यु मनुष्यका छेदन<br>कर दे तो वह किस मूलसे उत्पन्न<br>होता है ? ॥ ६ ॥ |


जात एव न जायते को न्वेनं जनयेत् पुनः ।
विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणं तिष्ठमानस्य
तद्विद इति ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥

८३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

८३०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

[ यदि ऐसा मानो कि ] पुरुष तो उत्पन्न हो ही गया है, अतः फिर उत्पन्न नहीं होता [ तो यह ठीक नहीं; क्योंकि वह मरकर पुनः उत्पन्न होता ही है ] ऐसी दशामें मृत्युके पश्चात् इसे पुनः कौन उत्पन्न करेगा ? [ यह प्रश्न है; ब्राह्मणोंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया, इसलिये श्रुति स्वयं ही उसका निर्देश करती है—] विज्ञान आनन्द ब्रह्म है, वह धनदाता (कर्म करनेवाले यजमान ) की परम गति है और ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ताका भी परम आश्रय है ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥

जात एवेति मन्यध्वं यदि किमत्र प्रष्टव्यमिति—अनिष्यमाणस्य हि सम्भवः प्रष्टव्यः, न जातस्य, अयं तु जात एवातोऽस्मिन् विषये प्रश्न एव नोपपद्यत इति चेत्—न, किं तर्हि ? मृतः पुनरपि जायत एवान्यथाकृताभ्यागमकृतनाशप्रसङ्गात्; अतो वः पृच्छामि—को न्वेनं मृतं पुनर्जनयेत् ?यदि तुम ऐसा मानते हो कि पुरुष तो उत्पन्न हो ही गया है, उसके विषयमें क्या पूछना—क्योंकि जो उत्पन्न होनेवाला होता है, उसीकी उत्पत्तिके विषयमें पूछा जाता है, जो उत्पन्न हो चुका है, उसके विषयमें नहीं पूछा जाता; वह पुरुष तो उत्पन्न हो चुका है, इसलिये इसके विषयमें प्रश्न करना उचित नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; तो क्या बात है ? मरनेपर भी तो यह पुनः उत्पन्न होता ही है, नहीं तो बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएके नाशका प्रसङ्ग आ जायगा; इसीसे मैं तुमलोगोंसे पूछता हूँ कि मरनेपर इसे पुनः कौन उत्पन्न करेगा ?
तन्न बिजज्ञुब्रह्मणाः—यतो मृतः पुनः प्ररोहति जगतो मूलं न विज्ञातं ब्राह्मणैः; अतो ब्रह्मिष्ठत्वादू हृता गावः; याज्ञवल्क्येनब्राह्मणोंको इसका विशेष ज्ञान नहीं था, जहाँसे मरनेपर पुरुष पुनः जन्म लेता है; उस जगत्‌के मूलका ब्राह्मणोंको पता नहीं था। अतः ब्रह्मिष्ठ होनेके कारण याज्ञवल्क्यने गायोंको हरण कर लिया और वे

| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८३१ |

ब्राह्मण ९ ]शाङ्करभाष्यार्थ८३१
संस्कृतहिन्दी
जिता ब्राह्मणाः । समाप्ता आख्यायिका ।ब्राह्मण जीत लिये गये । आख्यायिका समाप्त हुई ।
यज्जगतो मूलम्, येन च शब्देन साक्षाद् व्यपदिश्यते ब्रह्म, यद् याज्ञवल्क्यो ब्राह्मणान् पृष्टवांस्तत् स्वेन रूपेण श्रुतिरस्मभ्यमाह—विज्ञानं विज्ञप्तिविज्ञानम्, तच्च आनन्दम्, न विषयविज्ञानवद् दुःखानुविद्धम्, किं तर्हि ? प्रसन्नं शिवमतुलमानायासं नित्यतृप्तमेकरसमित्यर्थः, किं तद् ब्रह्म उभयविशेषणवद् रातिः—रातेः षष्ठ्यर्थे प्रथमा, धनस्येत्यर्थः, धनस्य दातुः कर्मकृतो यजमानस्य परायणं परा गतिः कर्मफलस्य प्रदातृ ।जो जगत्‌का मूल है, जिस शब्दसे ब्रह्मका साक्षात् निर्देश किया जाता है और जिसके विषयमें याज्ञवल्क्यने ब्राह्मणोंसे पूछा था, उसे श्रुति हमारे लिये स्वयं ही बतलाती है—विज्ञान—विज्ञप्तिका नाम विज्ञान है, वही आनन्द भी है, विषयविज्ञानके समान वह दुःखसे अनुविद्ध नहीं है, तो फिर कैसा है ? प्रसन्न, शिव, अतुल, अनायास नित्यतृप्त और एकरस है—ऐसा इसका तात्पर्य है । जो [विज्ञान और आनन्द इन] दोनों विशेषणोंसे युक्त है वह ब्रह्म क्या है ? रातिः—रातेः (रातिका) अर्थात् धनका इस प्रकार 'रातिः' शब्दमें षष्ठीके अर्थमें प्रथमा विभक्ति है, तात्पर्य यह कि धन देनेवाले अर्थात् कर्म करनेवाले यजमानका परायण—परा गति अर्थात् कर्मफल प्रदान करनेवाला है ।
किञ्च व्युत्थायैषणाभ्यस्तस्मिन्नेव ब्रह्मणि तिष्ठत्यकर्मकृत्, तद् ब्रह्म वेत्तीति तद्विच्च; तस्य—तिष्ठमानस्य च तद्विदः; ब्रह्मविद इत्यर्थः, परायणमितिइसी प्रकार जो एषणाओंसे अलग होकर उस ब्रह्ममें ही परिनिष्ठित है, कर्मकर्ता नहीं है, और उस ब्रह्मको जानता है, इसलिये तद्वित् (ब्रह्मविद्) है, उस ब्रह्मनिष्ठ और तद्विद् यानी ब्रह्मवेत्ताका भी परायण है ।

८३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

८३२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| अत्रे॒दं विचार्यते—आनन्दशब्दो लोके सुखवाची प्रसिद्धः; अत्र च ब्रह्मणो विशेषणत्वेन आनन्दशब्दः श्रूयते—आनन्दं ब्रह्मेति। श्रुत्यन्तरे च—“आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्” (तै० ३।६।१) “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्” (तै० ३।२।४।१) “यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्” (तै० उ० २।८।१।) “यो वै भूमा तत् सुखम्” (छा० उ० ७।२३।१) इति च; “एष परम आनन्दः” (बृ० उ० ४।३।३३) इत्येवमाद्याः। संवेद्ये च सुखे आनन्दशब्दः प्रसिद्धः; ब्रह्मानन्दश्च यदि संवेद्यः स्याद् युक्ता एते ब्रह्मण्यानन्दशब्दाः।<br><br>(पार्श्व-टिप्पणी: ब्रह्मानन्दस्य वेद्यत्वावेद्यत्वं मीमांस्यते)<br><br>ननु च श्रुतिप्रामाण्यात् संवेद्यानन्दस्वरूपमेव ब्रह्म, किं तत्र विचार्यम् ?<br><br>इति न, विरुद्धश्रुतिवाक्यदर्शनात्—सत्यम्, आनन्दशब्दो ब्रह्मणि श्रूयते; | यहाँ यह विचार किया जाता है—लोकमें 'आनन्द' शब्द सुखवाची प्रसिद्ध है; और यहाँ 'आनन्दं ब्रह्म' इस प्रकार 'आनन्द' शब्द ब्रह्मके विशेषणरूपमें श्रुत है; अन्य श्रुतियोंमें भी यह ब्रह्मके विशेषणरूपसे श्रुत हुआ है; जैसे—"आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्"¹ "आनन्दं² ब्रह्मणो विद्वान्" "यदेष³ आकाश आनन्दो न स्यात्" "यो⁴ वै भूमा तत् सुखम्" इत्यादि तथा ऐसी ही "एष⁵ परम आनन्दः" इत्यादि श्रुतियाँ हैं। किंतु 'आनन्द' शब्द संवेद्य (ज्ञेय) सुखके अर्थमें ही प्रसिद्ध है; अतः यदि ब्रह्मानन्द भी संवेद्य (ज्ञेय) हो तभी ब्रह्ममें ये 'आनन्द' शब्द सार्थक हो सकते हैं।<br><br>पूर्व०—किंतु श्रुतिके प्रमाणसे ब्रह्म संवेद्य आनन्दस्वरूप तो है ही, फिर इसमें विचार क्या करना है ?<br><br>सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस विषयमें विरुद्ध श्रुतिवाक्य देखे जाते हैं—यह तो ठीक है कि ब्रह्ममें 'आनन्द' शब्द श्रुत होता है; |


१. आनन्द ब्रह्म है—ऐसा जाना।
२. ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला।
३. यदि यह आकाश आनन्द न होता।
४. जो भी भूमा है, वही सुख है।
५. यह परम आनन्द है।

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३३

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३३


| विज्ञानप्रतिषेधश्चैकत्वे—"यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं विजानीयात्" (बृ० उ० ४।५।१५) "यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा" (छा० उ० ७।२४।१) "प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद" (बृ० उ० ४।३।२१) इत्यादि; विरुद्धश्रुतिवाक्यदर्शनात् तेन कर्तव्यो विचारः; तस्माद् युक्तं वेदवाक्यार्थनिर्णयाय विचारयितुम् । | किंतु साथ ही एक होनेके कारण उसके विज्ञानका प्रतिषेध भी श्रुत होता है। जैसे—"जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, उस अवस्थामें किसके द्वारा किसको देखे और किसके द्वारा किसको जाने?" "जहाँ अन्य कुछ नहीं देखता, अन्य कुछ नहीं सुनता और अन्य कुछ नहीं जानता वह भूमा है" "प्रज्ञानात्मासे आलिङ्गित (अभिन्न) होकर यह बाह्य कुछ भी नहीं जानता" इत्यादि। इस प्रकार उससे विरुद्ध श्रुतिवाक्य देखे जाते हैं, इसलिये विचार करना आवश्यक है; अतः वेदके वचनोंका तात्पर्य निर्णय करनेके लिये विचार करना उचित ही है। | | मोक्षवादिविप्रतिपत्तेश्च—सांख्या वैशेषिकाश्च मोक्षवादिनो नास्ति मोक्षे सुखं संवेद्यमित्येवं विप्रतिपन्नाः; अन्ये निरतिशयं सुखं स्वसंवेद्यमिति; किं तावद् युक्तम् ? | इसके सिवा मोक्षवादियोंमें मतभेद होनेके कारण भी विचार करना आवश्यक है—सांख्य और वैशेषिक मोक्षवादियोंका ऐसा विपरीत विचार है कि मोक्षमें संवेद्य सुख है ही नहीं, किंतु दूसरे मोक्षवादियोंका मत है कि मोक्षमें निरतिशय स्वसंवेद्य सुख है; सो इनमें कौन-सी बात ठीक है? | | आनन्दादिश्रवणात् "जक्षत् क्रीडन् रममाणः" (छा० उ० ८।१२।३) "स यदि पितृलोककामो भवति" (छा० उ० ८।२।१) | पूर्व०—आनन्दादिका श्रवण होनेसे तथा "भक्षण करता हुआ, क्रीडा करता हुआ, रमण करता हुआ" "वह यदि पितृलोककी इच्छावाला |

बृ० उ० ५३—

८३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

८३४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृत मूल / भाष्यहिन्दी अनुवाद
"यः सर्वज्ञः सर्ववित्" (मुण्डक० १ । १ । ९) "सर्वान् कामान् समश्नुते" (तै० उ० २ । ५ । १) इत्यादिश्रुतिभ्यो मोक्षे सुखं संवेद्यमिति ।होता है" "जो सर्वज्ञ और सर्ववेत्ता है" "समस्त कामोंको प्राप्त करता है" इत्यादि श्रुतियोंसे तो मोक्षमें संवेद्य सुख जान पड़ता है।
नन्वेकत्वे कारकविभागाभावाद् विज्ञानानुपपत्तिः, क्रियायाश्चानेककारकसाध्यत्वाद् विज्ञानस्य च क्रियात्वात् ।सिद्धान्ती—किंतु उस समय एकत्व होनेके कारण कारकविभागका अभाव होनेसे विज्ञान होना सम्भव नहीं है, क्योंकि क्रिया अनेक कारकद्वारा साध्य होती है और विज्ञान भी एक क्रिया ही है।
नैष दोषः; शब्दप्रामाण्याद् भवेद् विज्ञानमानन्दविषये; "विज्ञानमानन्दम्" इत्यादीनि आनन्दस्वरूपस्यासंवेद्यत्वेऽनुपपन्नानि वचनानीत्यवोचाम ।पूर्व०—यह दोष नहीं हो सकता; शब्दप्रामाण्य होनेके कारण उस समय आनन्दविषयक विज्ञान रहना ही चाहिये; यदि आनन्दस्वरूप असंवेद्य होगा तो "विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" इत्यादि वाक्य अनुपपन्न हो जायँगे—ऐसा हम पहले कह चुके हैं।
ननु वचनेनाप्यग्नेः शैत्यमुदकस्य चौष्ण्यं न क्रियते एव, ज्ञापकत्वाद् वचनानाम्। न च देशान्तरेऽग्निः शीत इति शक्यते ज्ञापयितुम्; अगम्ये वा देशान्तरे उष्णमुदकमिति ।सिद्धान्ती—किंतु वचनके द्वारा भी अग्निकी शीतलता और जलकी उष्णता नहीं की जा सकती, क्योंकि वचन तो ज्ञापक ही हैं और यह बात बतलायी नहीं जा सकती कि किसी देशान्तरमें अग्नि शीतल है और किसी अगम्य देशान्तरमें जल उष्ण है।
न, प्रत्यगात्मन्यानन्दविज्ञानदर्शनात्; न 'विज्ञानमानन्दम्' इत्येवमादीनां वचनानां शीतो-पूर्व०- ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रत्यगात्मामें तो आनन्दका विज्ञान देखा जाता है। 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' इत्यादि वाक्य 'अग्नि शीत है'-

| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८३५ |

ब्राह्मण ९ ]शाङ्करभाष्यार्थ८३५
संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
ऽग्निरित्यादिवाक्यवत् प्रत्यक्षादिविरुद्धार्थप्रतिपादकत्वम् । अनुभूयते त्वविरुद्धार्थता; सुख्यहमिति सुखात्मकमात्मानं स्वयमेव वेदयते; तस्मात् सुतरां प्रत्यक्षाविरुद्धार्थता; तस्मादानन्दं ब्रह्म विज्ञानात्मकं सत् स्वयमेव वेदयते । तथा आनन्दप्रतिपादिकाः श्रुतयः समजसाः स्युः 'जक्षत् क्रीडन् रममाणः' इत्येवमाद्याः पूर्वोक्ताः ।इत्यादि वाक्योंके समान प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवाले नहीं हैं । इनकी अविरुद्धार्थताका तो अनुभव होता है । 'मैं सुखी हूँ' इस प्रकार सुखस्वरूप आत्माको पुरुष स्वयं ही जानता है, इसलिये इनकी अविरुद्धता तो अत्यन्त प्रत्यक्ष ही है । अतः आनन्द ब्रह्म विज्ञानात्मक होते हुए स्वयं ही जानता है । इसी प्रकार पहले कही हुई 'जक्षत् क्रीडन् रममाणः' इत्यादि आनन्दका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियां सुसंगत हो सकती हैं ।
न, कार्यकारणाभावेऽनुपपत्तेर्विज्ञानस्य — शरीरवियोगो हि मोक्ष आत्यन्तिकः; शरीराभावे च करणानुपपत्तिः, आश्रयाभावात्; ततश्च विज्ञानानुपपत्तिः, अकार्यकरणत्वात्; देहाद्यभावे च विज्ञानोत्पत्तौ सर्वेषां कार्यकारणोपादानानर्थक्यप्रसङ्गः ।सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि देह और इन्द्रियोंका अभाव होनेपर विज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती—शरीरका वियोग हो जाना ही आत्यन्तिक मोक्ष है और शरीर न रहनेपर आश्रयका अभाव हो जानेके कारण इन्द्रियोंका रहना भी असम्भव है; अतः देह और इन्द्रियोंका अभाव हो जानेसे उस समय विज्ञान नहीं हो सकता; यदि देहादिके अभावमें भी विज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाय तो समस्त जीवोंके देह और इन्द्रियोंको ग्रहण करनेकी व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा ।

८३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

८३६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
**एकत्वविरोधाच्च—**परं चेद् ब्रह्म आनन्दात्मकमात्मानं नित्यविज्ञानत्वान्नित्यमेव विजानीयात्, तन्न, संसार्थपि संसारविनिर्मुक्तः स्वाभाव्यं प्रतिपद्येत; जलाशय इवोदकाञ्जलिः क्षिप्तो न पृथक्त्वेन व्यवतिष्ठते आनन्दात्मकब्रह्मविज्ञानाय, तदा मुक्त आनन्दात्मकमात्मानं वेदयते इत्येतदनर्थकं वाक्यम्।इसके सिवा एकत्वसे विरोध होनेके कारण भी विज्ञान होना अनुपपन्न है—यदि ऐसा मानो कि नित्यविज्ञानानन्दस्वरूप होनेके कारण परब्रह्म अपने आनन्दमय स्वरूपको नित्य ही जानता रहता है, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि संसारी जीव भी संसारसे मुक्त होनेपर ब्रह्मस्वरूपताको प्राप्त हो जाता है, जलाशयमें डाली हुई जलकी अञ्जलिके समान वह भी आनन्दस्वरूप ब्रह्मके विज्ञानके लिये पृथक् होकर स्थित नहीं हो सकता; ऐसी स्थितिमें यह कहना कि मुक्त पुरुष आनन्दस्वरूप आत्माको जानता है, निरर्थक ही है।
अथ ब्रह्मानन्दमन्यःसन् मुक्तो वेदयते, प्रत्यगात्मानं च, अहमस्म्यानन्दस्वरूप इति, तदैकत्वविरोधः, तथा च सति सर्वश्रुतिविरोधः, तृतीया च कल्पना नोपपद्यते।और यदि ऐसा कहो कि मुक्त पुरुष ब्रह्मसे अलग रहकर ब्रह्मानन्दको और 'मैं आनन्दस्वरूप हूँ' इस प्रकार प्रत्यगात्माको जानता है तो ऐसी स्थितिमें एकत्वसे विरोध आता है; और ऐसा होनेपर सभी श्रुतियोंसे विरोध होता है। इन दो पक्षोंके¹ सिवा कोई तीसरी कल्पना होनी सम्भव नहीं है।
किञ्चान्यत्, ब्रह्मणश्च निरन्तरात्मानन्दविज्ञाने विज्ञानाविज्ञान-एक बात और भी है, ब्रह्मको आत्मानन्दका निरन्तर विज्ञान माननेपर उसके विज्ञान और अविज्ञानकी

¹ १. मुक्त पुरुषको ब्रह्मसे अभिन्न या भिन्न माननेके सिवा।

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८३७

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८३७


| कल्पनानर्थक्यम्; निरन्तरं चेदात्मानन्दविषयं ब्रह्मणो विज्ञानम्, तदेव तस्य स्वभाव इत्यात्मानन्दं विजानातीति कल्पनानुपपन्ना; अतद्विज्ञानप्रसङ्गे हि कल्पनाया अर्थवत्त्वम्, यथा आत्मानं परं च वेत्तीति, न हीष्वाद्यासक्तमनसो नैरन्तर्येणेषुज्ञानाज्ञानकल्पनाया अर्थवत्त्वम् ।<br><br>अथ विच्छिन्नमात्मानन्दं विजानाति—विज्ञानस्य आत्मविज्ञानच्छिद्रे अन्यविषयत्वप्रसङ्गः; आत्मनश्च विक्रियावत्त्वं ततश्चानित्यत्वप्रसङ्गः; तस्माद् विज्ञानमानन्दमिति स्वरूपान्वाख्यानपरैव श्रुतिः, नात्मानन्दसंवेद्यत्वार्था ।<br><br>'जक्षत् क्रीडन्' इत्यादिश्रुति- | कल्पना भी व्यर्थ हो जाती है; यदि ब्रह्मको आत्मानन्दविषयक विज्ञान निरन्तर रहता है, तो वही उसका स्वभाव समझना चाहिये; अतः वह आत्मानन्दको जानता है—यह कल्पना नहीं बन सकती । इस कल्पनाकी सार्थकता तो उसका विज्ञान न होनेका प्रसङ्ग होनेपर ही हो सकती है; जैसे—वह अपनेको और दूसरेको जानता है; जिसका चित्त निरन्तर बाणमें लगा हुआ है, उसके विषयमें बाणके ज्ञान और अज्ञानकी कल्पना सार्थक नहीं हो सकती ।<br><br>और यदि वह विच्छिन्नरूपसे ही आत्मानन्दको जानता है तो आत्मविज्ञानके छिद्रमें अर्थात् जिस समय आत्मानन्दका ज्ञान नहीं रहता, उस क्षणमें किसी अन्य विषयके विज्ञानके रहनेका प्रसङ्ग होगा; इससे आत्मा विकारी सिद्ध होगा और ऐसा होनेसे उसके अनित्य होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; अतः 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' यह श्रुति ब्रह्मके स्वरूपका निर्देश करनेवाली ही है, आत्मानन्दका संवेद्यत्व बतलानेवाली नहीं है ।<br><br>पूर्व०—किंतु आत्मानन्दका |

८३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

८३८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| विरोधोऽसंवेद्यत्व इति चेत् ! | असंवेद्यत्व माननेपर 'जक्षत् क्रीडन्' इत्यादि श्रुतिसे विरोध होगा। | | न; सर्वात्मैकत्वे यथाप्राप्तानुवादित्वात्—मुक्तस्य सर्वात्मभावे सति यत्र क्वचिद् योगिषु देवेषु वा जक्षणादि प्राप्तम्, तद् यथाप्राप्तमेवानूद्यते—तत्तस्यैव सर्वात्मभावादिति सर्वात्मभावमोक्षस्तुतये । | सिद्धान्ती—नहीं; क्योंकि यह सर्वात्मैकत्वकी अनुभूति होनेपर यथाप्राप्त भक्षणादिका अनुवाद करनेवाली है। मुक्त पुरुषको सर्वात्मैकत्वकी प्राप्ति हो जानेपर जहाँ-कहीं योगियों अथवा देवताओंमें भक्षणादिकी प्राप्ति होती है, उस यथाप्राप्त भक्षणादिका ही इसके द्वारा अनुवाद किया गया है। अर्थात् सर्वात्मभाव होनेके कारण वह भक्षणादि उस मुक्त पुरुषका ही है—इस प्रकार यह कथन मोक्षकी स्तुतिके लिये है। | | यथाप्राप्तानुवादित्वे दुःखित्वमपीति चेत्—योग्यादिषु यथाप्राप्तजक्षणादिवत् स्थावरादिषु यथाप्राप्तदुःखित्वमपीति चेत् ! | पूर्व०—यदि यह श्रुति यथाप्राप्त भक्षणादिका अनुवाद करनेवाली हे तब तो उसका दुःखी होना भी प्राप्त होगा—योगी आदिकोंमें यथाप्राप्त भक्षणादिकी प्राप्तिके समान उसे स्थावरादिमें यथाप्राप्त दुःखित्वकी भी प्राप्ति होगी—ऐसा कहें तो ? | | न, नामरूपकृतकार्यकरणोपाधिसम्पर्कजनितभ्रान्त्यध्यारोपितत्वात् सुखित्वदुःखित्वादिविशेष- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि सुखित्व और दुःखित्व आदि विशेष धर्म नाम-रूपजनित देह और इन्द्रियरूप उपाधिके सम्पर्कसे होनेवाली भ्रान्तिसे आरोपित हैं—इस प्रकार इन सब शङ्काओंका पहले ही |

| ब्राह्मण ९] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८३९ |

ब्राह्मण ९]शाङ्करभाष्यार्थ८३९

| स्येति परिहृतमेतत् सर्वम् । विरुद्धश्रुतीनां च विषयमवोचाम । तस्मात् "एषोऽस्य परम आनन्दः" (बृ० उ० ४ । ३ । ३२) इतिवत् सर्वाण्यानन्दवाक्यानि द्रष्टव्यानि ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥ | परिहार किया जा चुका है। विरुद्धश्रुतियोंका विषय भी हम पहले कह चुके हैं¹। अतः आनन्दप्रतिपादक समस्त वाक्योंको "एषोऽस्य परम आनन्दः" इस वाक्यके समान ही समझना चाहिये ॥ ७ ॥ २८ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये
नवमं शाकल्यब्राह्मणम् ॥ ९ ॥


इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥


१. मधुकाण्डमें जो ब्रह्मका वेद्यत्व है, वह सोपाधिक होनेके कारण है। निरुपाधिक ब्रह्म तो अवेद्य ही है।

चतुर्थ अध्याय

चतुर्थ अध्याय

प्रथम ब्राह्मण

जनक-याज्ञवल्क्य-संवाद


संस्कृतहिन्दी-अनुवाद
जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रे ।<br><br>उपोद्घातः<br>अस्य सम्बन्धः—<br>शारीराद्यष्टौ पुरुषान्निरूह्य, प्रत्युह्य पुनर्हृदये, दिग्भेदेन च पुनः पञ्चधा व्यूह्य, हृदये प्रत्युह्य, हृदयं शरीरं च पुनरन्योन्यप्रतिष्ठं प्राणादिपञ्चवृत्त्यात्मके समानाख्ये जगदात्मनि सूत्र उपसंहृत्य, जगदात्मानं शरीरहृदयसूत्रावस्थमतिक्रान्तवान् य औपनिषदः पुरुषो नेति नेतीति व्यपदिष्टः, स साक्षाच्चोपादानकारणस्वरूपेण च निर्दिष्टः 'विज्ञानमानन्दम्' इति । तस्यैव वागादिदेवताद्वारेण पुनरधिगमः कर्तव्य इत्यधि-‘जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रे’ इसका पहले अध्यायसे इस प्रकार सम्बन्ध है—शारीरादि आठ पुरुषोंका निरूपण करके पुनः उनका हृदयमें उपसंहार कर तथा फिर दिशाओंके भेदसे उन्हें पाँच भागोंमें विभक्त करके पुनः उनका हृदयमें उपसंहार कर तथा एक दूसरेमें प्रतिष्ठित हृदय और शरीरका प्राणादि पाँच वृत्तियोंवाले समानसंज्ञक जगदात्मा सूत्रमें उपसंहार कर जो ‘नेति-नेति’ इस प्रकार बतलाया हुआ औपनिषद पुरुष शरीर, हृदय और सूत्रमें स्थित जगदात्माको अतिक्रमण किये हुए है, उसीका ‘ब्रह्म विज्ञान और आनन्दरूप है’ इस प्रकार साक्षात् और उपादान कारणरूपसे निर्देश किया गया है। उसीका वागादि देवतारूप द्वारसे पुनः बोध कराना है, इसीलिये इन

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जनक-याज्ञवल्क्य-संवाद