बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
१०१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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मुमूर्षु की दशाका वर्णन
| इत आरभ्यास्य संसारो वर्ण्यते; यथायमात्मा स्वप्नान्ताद् बुद्धान्तमागतः, एवमयमुस्माद् देहाद् देहान्तरं प्रतिपत्स्यत इत्याहात्र दृष्टान्तम्— | अब यहाँसे आगे संसारका वर्णन किया जाता है; जिस प्रकार यह आत्मा स्वप्नस्थानसे जागरित-स्थानमें आया है, उसी प्रकार यह इस देहसे दूसरे देहको प्राप्त होगा—सो इसमें श्रुति दृष्टान्त बतलाती है— |
तद् यथानः सुसमाहितमुत्सर्जद् यायादेवमेवायं शारीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनान्वारूढ उत्सर्जन्याति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥ ३५ ॥
लोकमें जिस प्रकार बहुत अधिक बोझ लादा हुआ छकड़ा शब्द करता चलता है, उसी प्रकार यह देही आत्मा प्राज्ञात्मासे अधिष्ठित हो शब्द करता हुआ जाता है, जब कि यह ऊर्ध्वोच्छ्वास छोड़नेवाला हो जाता है ॥ ३५ ॥
| तत्तत्र यथा लोकेऽनः शकटं सुसमाहितं सुष्ठु भृशं वा समाहितं भाण्डोपस्करणेन उलूखलमुसलशूर्पपिठरादिनान्नाद्येन च सम्पन्नं सम्भारेण आक्रान्तमित्यर्थः, तथा भाराक्रान्तं सदुत्सर्जञ्छब्दं कुर्वद् यथा यायाद् गच्छेच्छाकटिकेनाधिष्ठितं सत्, एवमेव यथोक्तो दृष्टान्तोऽयं शारीरः शरीरे भवः, | यहाँ जिस प्रकार लोकमें सुसमाहित—सुष्ठु अथवा अत्यन्त समाहित अर्थात् भाण्डादि गृहसामग्री—ऊखल, मूसल, सूप और पिठर^१ आदिसे तथा खाद्यसामग्रीसे सम्पन्न, तात्पर्य यह कि अत्यन्त बोझेसे लदा हुआ छकड़ा उपर्युक्त प्रकारसे बोझेसे दबा होनेके कारण गाड़ीवानके बैठकर हाँकनेपर शब्द करता चलता है, इसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त बताया गया है, यह शारीर अर्थात् शरीरमें |
१. थाली या मथानी।
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१५
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१५
| मूल संस्कृत भाष्यार्थ | हिन्दी अनुवाद |
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| कोऽसौ ? आत्मा लिङ्गोपाधिः, यः स्वप्नबुद्धान्ताविव जन्ममरणाभ्यां पाप्मसंसर्गवियोगलक्षणाभ्यामिहलोकपरलोकावनुसंचरति । यस्योत्क्रमणमनु प्राणाद्युत्क्रमणम्, स प्राज्ञेन परेण आत्मना स्वयंज्योतिःस्वभावेन अन्वारूढोऽधिष्ठितः — अवभास्यमानः, तथा चोक्तम्—'आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते' इति, उत्सर्जन् याति । | रहनेवाला, कौन है वह ? लिङ्गदेहोपाधिक आत्मा, जो कि स्वप्न और जागरितस्थानोंके समान [ देह और इन्द्रियरूप ] पापके संयोग और वियोगरूप जन्म और मरणके द्वारा क्रमशः इस लोक और परलोकमें संचार करता है तथा जिसके उत्क्रमणके साथ-साथ प्राणादिका उत्क्रमण होता है, वह स्वयंज्योतिःस्वरूप प्राज्ञ अर्थात् परात्मासे अन्वारूढ-अधिष्ठित यानी अवभासित हुआ—जैसा कि कहा है कि 'यह आत्मज्योतिसे ही इधर-उधर जाता है'—शब्द करता जाता है । |
| तत्र चैतन्यात्मज्योतिषा भास्ये लिङ्गे प्राणप्रधाने गच्छति तदुपाधिरप्यात्मा गच्छतीव । तथा श्रुत्यन्तरम्—"कस्मिन्वहम्" ( प्र० उ० ६ । ३ ) इत्यादि "ध्यायतीव" ( बृ० उ० ४ । ३ । ७ ) इति च; अत एवोक्तं प्राज्ञेनात्मनान्वारूढ इति । अन्यथा प्राज्ञेनैकीभूतः शकटवत् कथमुत्सर्जन् याति ! तेन लिङ्गोपाधिरात्मा उत्सर्जन् मर्मसु निकृत्यमानेषु दुःखवेदनया आर्तः शब्दं कुर्वन् याति गच्छति । | उस समय चैतन्यात्मज्योतिसे भास्य प्राणप्रधान लिङ्गदेहके जाने-पर उस लिङ्गदेहरूप उपाधिवाला आत्मा भी जाता-सा जान पड़ता है। ऐसी ही "किसके उत्क्रमण करनेपर मैं उत्क्रान्त होता हूँ" तथा "ध्यानसा करता है" इत्यादि अन्य श्रुतियाँ भी हैं; इसीसे 'प्राज्ञात्मासे अधिष्ठित हुआ' ऐसा कहा है; नहीं तो प्राज्ञात्मासे एकीभूत होनेपर यह छकड़ेके समान शब्द करता कैसे जाता ? अतः लिङ्गोपाधिक आत्मा मर्मस्थानोंके छेदन किये जानेपर ( मर्मस्थानोंसे छूटनेपर ) दुःख और वेदनासे व्याकुल हो शब्द करता हुआ जाता है । |
१०१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| १०१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| तत् कस्मिन् काल इति । उच्यते यत्रैतद् भवति । एतदिति क्रियाविशेषणम् । ऊर्ध्वोच्छ्वासी यत्रोर्ध्वोच्छ्वासित्वमस्य भवतीत्यर्थः । दृश्यमानस्याप्यनुवदनं वैराग्यहेतोः—ईदृशः कष्टः खल्वयं संसारः, येनोत्क्रान्तिक काले मर्मसु उत्कृत्त्यमानेषु स्मृतिलोपो दुःखवेदनार्तस्य पुरुषार्थसाधनप्रतिपत्तौ चासामर्थ्यं परवशीकृतचित्तस्य । तस्माद् यावदियमवस्था नागमिष्यति, तावदेव पुरुषार्थसाधनकर्त्तव्यतायाम् अप्रमत्तो भवेदित्याह कारुण्याच्छ्रुतिः ॥ ३५ ॥ | [ यदि कहें । ऐसा किस समय होता है ? तो जिस समय ऐसा होता है, वह बतलाया जाता है । यहाँ 'एतत्' क्रियाविशेषण है । ऊर्ध्वोच्छ्वासी अर्थात् जहां इसका ऊर्ध्वोच्छ्वास हो जाता है । यह अवस्था दिखायी देनेवाली है, तो भी वैराग्यके लिये इसका अनुवाद किया जाता है—निश्चय ही यह संसार ऐसा कष्टप्रद है कि देहत्यागके समय मर्मस्थानोंका छेदन होनेपर दुःख और वेदनासे व्याकुल हुए पुरुषकी स्मृति नष्ट हो जाती है तथा उस परवशचित्त पुरुषका पुरुषार्थके साधनोंकी प्राप्तिमें कोई सामर्थ्य नहीं रहता । अतः जबतक यह अवस्था न आवे तबतक ही पुरुषको पुरुषार्थसाधनोंके करनेमें सावधान रहना चाहिये—ऐसा श्रुति करुणावश कहती है ॥ ३५ ॥ |
ऊर्ध्वोच्छ्वास क्यों और किसलिये होता है ?
| तदस्योर्ध्वोच्छ्वासित्वं कस्मिन् काले किंनिमित्तं कथं किमर्थं वा स्यात् । इत्येतदुच्यते-- | उसका ऊर्ध्वोच्छ्वास किस समय किस कारणसे किस प्रकार और किसलिये होता है। यह बतलाया जाता है— |
स यत्रायमणिमानं न्येति जरया वोपतपता वाणिमानं निगच्छति तद् यथाम्रं वोदुम्बरं वा पिप्पलं वा बन्ध-
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १०१७
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १०१७
नात् प्रमुच्यत एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः सम्प्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति प्राणायैव ॥ ३६ ॥
वह यह देह जिस समय कृशताको प्राप्त होता है, वृद्धावस्था अथवा ज्वरादि रोगके कारण कृश हो जाता है, उस समय जैसे आम, गूलर अथवा पिप्पल-फल बन्धनसे छूट जाता है, वैसे ही यह पुरुष इन अङ्गोंसे छूटकर फिर जिस मार्गसे आया था, उसीसे प्रत्येक योनिमें प्राणकी विशेष अभिव्यक्तिके लिये ही चला जाता है ॥ ३६ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-भाष्यार्थ |
|---|---|
| सोऽयं प्राकृतः शिरःपाण्यादिमान् पिण्डो यत्र यस्मिन् कालेऽप्यणिमानं अणोर्भावमणृत्वं कार्श्यमित्यर्थः, न्येति निगच्छति, किंनिमित्तम् ? जरया वा स्वयमेव कालपक्वफलवज्जीर्णः कार्श्यं गच्छति । उपतपतीत्युपतपञ्ज्वरादिरोगः, तेनोपतपता वा, उपतप्यमानो हि रोगेण विषमाग्नितयान्नं भुक्तं न जरयति, ततोऽन्नरसेनानुपचीयमानः पिण्डः कार्श्यमापद्यते । तदुच्यते उपतपता वेत्यणिमानं निगच्छति ।<br><br>यदा अत्यन्तकार्श्यं प्रतिपन्नो जरादिनिमित्तैः, तदोर्ध्वोच्छ्वा- | वह यह प्राकृत–शिर एवं हाथ-पांव आदि अवयवोंवाला पिण्ड जिस समय अणिमा–अणुभाव–अणुत्व अर्थात् कृशताको 'नेति' प्राप्त हो जाता है। किस कारणसे ? वृद्धावस्थासे–कालद्वारा पकाये हुए फलके समान स्वयं ही जीर्ण-कृश हो जाता है। अथवा उपतपत्से–जो समीप रहकर तपाता है, वह ज्वरादि रोग 'उपतपत्' (उपताप) कहलाता है, उससे; क्योंकि रोगसे उपतप्त हुआ पुरुष विषम अग्नि हो जानेके कारण खाये हुए अन्नको नहीं पचा सकता, अतः अन्नके रससे वृद्धिको प्राप्त न होनेवाला पिण्ड कृशताको प्राप्त हो जाता है। इसीसे यह कहा जाता है कि 'उपतपता वा'–अथवा ज्वरादि रोगसे कृशताको प्राप्त हो जाता है।<br><br>जिस समय वृद्धावस्थादि कारणोंसे शरीर अत्यन्त कृशताको प्राप्त हो जाता है, उस समय जीव ऊर्ध्वोच्छ्वास |
१०१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| सी भवति; यदोर्ध्वोच्छ्वासी, तदा भृशाहितसम्भारशकटवदुत्सर्जन् याति । जराभिभवो रोगादिपीडनं कार्श्यापत्तिश्च शरीरवतोऽवश्यम्भाविन एतेऽनर्था इति वैराग्यायेदमुच्यते । | लेने लगता है; और जिस समय ऊर्ध्वोच्छ्वास लेने लगता है, उस समय वह अत्यन्त भाराक्रान्त छकड़ेके समान शब्द करता हुआ प्रयाण करता है। देहधारीके लिये जरासे अभिभव, रोगादिकी पीड़ा और कृशताकी प्राप्ति—ये अनर्थ अवश्यम्भावी हैं; इसलिये वैराग्यके लिये ऐसा कहा जाता है। |
| यदासावुत्सर्जन् याति तदा कथं शरीरं विमुञ्चति ? इति दृष्टान्त उच्यते—तत्तत्र यथा आम्रं वा फलम्, उदुम्बरं वा पिप्पलं वा फलम्—विषमानेकदृष्टान्तोपादानं मरणस्यानियतनिमित्तत्वख्यापनार्थम्, अनियतानि हि मरणस्य निमित्तान्यसंख्यातानि च । एतदपि वैराग्यार्थमेव; यस्मादयमनेकमरणनिमित्तवांस्तस्मात् सर्वदा मृत्योरास्ये वर्तत इति—बन्धनात्—बध्यते येन वृन्तेन सह स बन्धनकारणो रसो यस्मिन् वा बध्यते इति वृन्तमेवोच्यते बन्धनम्,तस्माद् रसाद् वृन्ताद् वा | जिस समय वह शब्द करता हुआ प्रयाण करता है, उस समय किस प्रकार देहका त्याग करता है? इसमें दृष्टान्त कहा जाता है—सो जिस प्रकार आम्र-फल, उदुम्बर ( गूलर ) अथवा पिप्पलफल—यहाँ कई विषम दृष्टान्त मृत्युके अनियत-निमित्तत्वको सूचित करनेके लिये हैं, क्योंकि मृत्युके कारण अनिश्चित और अगणित हैं। यह कथन भी वैराग्यके लिये ही है; क्योंकि यह देह मरणके अनेकों कारणोंवाला है, इसलिये सर्वदा मृत्युके मुखमें ही पड़ा हुआ है। बन्धनसे—जिसके द्वारा फल वृन्तसे बँधा रहता है, वह बन्धनका कारणभूत रस अथवा जिसमें वह बँधा रहता है, वह वृन्त ही बन्धन कहा गया है, उस रस या वृन्तरूप |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे १०१९
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे १०१९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| बन्धनात् प्रमुच्यते वाताद्यनेकनिमित्तम्; एवमेवायं पुरुषो लिङ्गात्मा लिङ्गोपाधिरेभ्योऽङ्गेभ्यश्चक्षुरादिदेहावयवेभ्यः सम्प्रमुच्य सम्यङ्निर्लेपेन प्रमुच्य, न सुषुप्तगमनकाल इव प्राणेन रक्षन्; किं तर्हि ? सह वायुनोपसंहृत्य, पुनः प्रतिन्यायं पुनः शब्दात् पूर्वमप्ययं देहाद् देहान्तरमसकृद् गतवान् यथा स्वप्नबुद्धान्तौ पुनः पुनर्गच्छति तथा पुनः प्रतिन्यायं प्रतिगमनं यथागतमित्यर्थः । प्रतियोनि योनिं योनिं प्रति कर्मश्रुतादिवशादाद्रवति । | बन्धनसे वायु आदि अनेकों कारणोंवश [फल] छूट जाता है; वैसे ही यह पुरुष-लिङ्गात्मा-लिङ्गोपाधिक जीव इन अङ्गोंसे अर्थात् शरीरके चक्षु आदि अवयवोंसे सम्प्रमुक्त होकर अर्थात् सम्यक्-निर्लेपभावसे छूटकर जिस प्रकार सुषुप्तावस्थामें जानेके समय प्राणके द्वारा इसकी रक्षा करता है, उस प्रकार नहीं; तो किस प्रकार ? प्राणवायुके सहित इन्द्रियोंका उपसंहार करके पुनः प्रतिन्याय—यहाँ 'पुनः' शब्दसे यह आशय है कि जिस प्रकार जीव पुनः-पुनः जागरित और स्वप्न-अवस्थाओंमें जाता है, उसी प्रकार पहले भी यह एक देहसे दूसरे देहमें बारंबार गया था; अतः पुनः प्रतिन्याय—जैसे पहले आया था वैसे ही दूसरे देहमें चला जाता है। प्रतियोनि अर्थात् अपने कर्म और विद्याके अनुसार प्रत्येक योनिमें जाता है। |
| किमर्थम् ? प्राणायैव प्राणव्यूहायैवेत्यर्थः । सप्राण एव हि गच्छति, ततः प्राणायैवेति विशेषणमनर्थकम्; प्राणव्यूहाय हि गमनं देहाद् देहान्तरं प्रति; तेन | इसलिये जाता है ? प्राणके लिये ही अर्थात् प्राणव्यूहके लिये ही। प्राणके सहित तो जाता ही है, ऐसी स्थितिमें 'प्राणायैव' यह विशेषण व्यर्थ होगा; लिङ्गात्माका जो एक देहसे दूसरे देहमें जाना है, वह प्राणके |
| १०२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
| १०२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| ह्यस्य कर्मफलोपभोगायार्थसिद्धिः, न प्राणसत्तामात्रेण। तस्मात्तादर्थ्यार्थं युक्तं विशेषणं प्राणव्यूहायेति ॥ ३६ ॥ | व्यूहकी विशेष अभिव्यक्तिके लिये ही होता है; उसीसे इसके कर्मफलभोगकी सिद्धि होती है, केवल प्राणकी सत्तासे ही नहीं; अतः प्राण भोगका अङ्ग है—यह सिद्ध करनेके लिये 'प्राणव्यूहाय' यह विशेषण देना उचित है ॥ ३६ ॥ |
देहान्तरग्रहणका प्रकार
| तत्रास्येदं शरीरं परित्यज्य गच्छतो नान्यस्य देहान्तरस्योपादाने सामर्थ्यमस्ति, देहेन्द्रियवियोगात्; न चान्येऽस्य भृत्यस्थानीया गृहमिव राज्ञे शरीरान्तरं कृत्वा प्रतीक्षमाणा विद्यन्ते; अथैवं सति कथमस्य शरीरान्तरोपादानमिति ?<br><br>उच्यते---सर्वं ह्यस्य जगत् स्वकर्मफलोपभोगसाधनत्वायोपात्तं स्वकर्मफलोपभोगाय चायं प्रवृत्तो देहाद्देहान्तरं प्रतिपित्सुः; तस्मात् सर्वमेव जगत् स्वकर्मणा प्रयुक्तं तत्कर्मफलोपभोगयोग्यं साधनं | **शङ्का—**मरणकालमें इस शरीरको छोड़कर जानेवाले पुरुषमें दूसरे देहको ग्रहण करनेका सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि उसके देह और इन्द्रियोंका वियोग हो जाता है और राजाके लिये घर बनाकर प्रतीक्षा करनेवाले सेवकोंके समान इसके लिये दूसरा देह बनाकर प्रतीक्षा करनेवाले इन्द्रियादि हैं नहीं; ऐसी स्थितिमें इसका अन्य देह ग्रहण करना कैसे सम्भव हो सकता है ?<br><br>**समाधान—**बतलाते हैं—इस जीवके लिये सारा संसार अपने कर्मफलभोगके साधनरूपसे प्राप्त हुआ है और स्वकर्मफलभोगके लिये ही यह एक देहसे दूसरा देह प्राप्त करनेका इच्छुक होकर प्रवृत्त होता है; अतः स्वकर्मसे प्रेरित सारा ही जगत् उसके कर्मफलभोगके योग्य साधन होनेसे |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२१
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२१
| कृत्वा प्रतीक्षत एव; "कृतं लोकं पुरुषोऽभिजायते" इति श्रुतेः; यथा स्वप्नाज्जागरितं प्रतिपित्सोः; तत् कथम् ? इति लोकप्रसिद्धो दृष्टान्त उच्यते— | उसकी प्रतीक्षा करता ही है; जैसा कि "पुरुष भूतपञ्चकद्वारा रचे हुए शरीरको सर्वतः व्याप्त करके उत्पन्न होता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है, जैसे कि स्वप्नावस्थासे जागरितस्थानको प्राप्त करनेकी इच्छावाले पुरुषका शरीर पहलेहीसे तैयार रहता है; सो कैसे ? इस विषयमें यह लोकप्रसिद्ध दृष्टान्त कहा जाता है— |
तद् यथा राजानमायान्तमुग्राः प्रत्येनसः सूत-ग्रामण्योऽन्नैः पानैरावसथैः प्रतिकल्पन्तेऽयमायात्यय-मागच्छतीत्येवँ॒ हैवंविद्ँ॒ सर्वाणि भूतानि प्रति-कल्पन्त इदं ब्रह्मायातीदमागच्छतीति ॥ ३७ ॥
सो जिस प्रकार आते हुए राजाको उग्रकर्मा एवं पापकर्ममें नियुक्त सूत और गाँवके नेतालोग अन्न, पान और निवासस्थान तैयार रखकर 'ये आये, ये आये' इस प्रकार कहते हुए प्रतीक्षा करते हैं, उसी प्रकार इस कर्मफलवेत्ताकी सम्पूर्ण भूत 'यह ब्रह्म आता है, यह आता है' इस प्रकार कहते हुए प्रतीक्षा करते हैं ॥ ३७ ॥
| तत्तत्र यथा राजानं राज्याभिषिक्तमायान्तं स्वराष्ट्रे, उग्रा जातिविशेषाः क्रूरकर्माणो वा प्रत्येनसः प्रति प्रत्येनांसि पापकर्मणि नियुक्ताः प्रत्येनसस्तस्करादिदण्डनादौ नियुक्ताः सूताश्च ग्रामण्यश्च सूतग्रामण्यः---सूता वर्णसङ्करजातिविशेषा ग्रामण्यो ग्रा- | उसमें दृष्टान्त—जिस प्रकार अपने राष्ट्रमें आते हुए राज्याभिषिक्त राजाकी उग्र-जातिविशेष अथवा क्रूर कर्म करनेवाले एवं प्रत्येना—प्रत्येक एनस् यानी पापकर्ममें नियुक्त अर्थात् चौरादिको दण्ड देने आदि कार्योंमें नियुक्त सूत और ग्रामणी—सूत एक वर्णसंकर जातिविशेष है तथा ग्रामणी ग्रामके नेताओं (मुखिया |
१०२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| मनेतारस्ते पूर्वमेव राज्ञ आग- | लोगों) को कहते हैं–वे पहलेहीसे |
| मनं बुद्ध्वा, अन्नैर्भोज्यभक्ष्या- | राजाके आनेका समाचार जानकर |
| दिप्रकारैः, पानैर्मदिरादिभिः, | भक्ष्यभोज्यादिरूप अन्न और मदिरा |
| आवसथैश्च प्रासादादिभिः प्रति- | आदि पान तथा महल आदि आवसथ (निवासस्थान) के सहित 'प्रतिकल्पन्ते' अर्थात् तैयार किये |
| कल्पन्ते निष्पन्नैरेव प्रतीक्षन्ते | हुए इन अन्न-पानादिके सहित 'यह |
| 'अयं राजा आयात्ययमागच्छ- | राजा आता है, राजा आता है' |
| ति' इत्येवं वदन्तः । | इस प्रकार कहते हुए प्रतीक्षा करते हैं। |
| यथायं दृष्टान्तः, एवं हैवंविदं | जैसा यह दृष्टान्त है, उसी |
| कर्मफलस्य वेदितारं संसारिण- | प्रकार इस ऐसा जाननेवाले अर्थात् |
| मित्यर्थः, कर्मफलं हि प्रस्तुतं | कर्मफलके ज्ञाता संसारीकी–यह |
| तदेवंशब्देन परामृश्यते, सर्वाणि | कर्मफलका ही प्रसङ्ग है, इसलिये 'एवं' शब्दसे उसीका परामर्श |
| भूतानि शरीरकर्तृणि करणानु- | किया गया है—शरीरकी रचना करनेवाले सम्पूर्ण भूत और इन्द्रियों- |
| ग्रहीतृणि चादित्यादीनि, तत्क- | के अनुग्राहक सूर्यादि देवता, उसके |
| र्मप्रयुक्तानि कृतैरेव कर्मफलोप- | कर्मोंसे प्रेरित होकर उसके किये |
| भोगसाधनैः प्रतीक्षन्ते । 'इदं | हुए कर्मफलभोगके साधनोंके सहित प्रतीक्षा करते हैं। वे 'यह ब्रह्म |
| ब्रह्म भोक्तृ कर्तृ चास्माकमायातितथेद्मागच्छति' इत्येवमेव च | अर्थात् कर्ता-भोक्ता जीव हमारे 'पास आ रहा है तथा यह आ रहा है' ऐसा भाव रखकर उसकी |
| कृत्वा प्रतीक्षन्त इत्यर्थः ॥३७॥ | प्रतीक्षा करते हैं–ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ३७ ॥ |
प्राणोंके देहान्तरगमनका प्रकार
| तमेवं जिगमिषुं के सह गच्छन्ति ? ये वा गच्छन्ति ते | इस प्रकार जानेके लिये तैयार हुए उस जीवके साथ कौन जाते हैं? और जो परलोक-शरीरकी रचना |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२३
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२३
| किं तत्क्रियाप्रणुन्ना आहोस्वित् तत्कर्मवशात् स्वयमेव गच्छन्ति परलोकशरीरकर्तृणि च भूतानीति; अत्रोच्यते दृष्टान्तः— | करनेवाले आदित्यादि भूत जाते हैं, वे उसके वागादि व्यापार [ यानी कहने आदि ] से प्रेरित होकर जाते हैं अथवा उसके कर्मवश स्वयं ही जाते हैं—इसमें दृष्टान्त कहा जाता है। |
तद् यथा राजानं प्रयियासन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽभिसमायन्त्येवमेवेममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥३८॥
जिस प्रकार जानेके लिये तैयार हुए राजाके अभिमुख होकर उग्रकर्मा और पापकर्ममें नियुक्त सूत एवं गाँवके नेता लोग जाते हैं, उसी प्रकार जब यह ऊर्ध्वोच्छ्वास लेने लगता है तो अन्तकालमें सारे प्राण इस आत्माके अभिमुख होकर इसके साथ जाते हैं ॥ ३८ ॥
| तद् यथा राजानं प्रयियासन्तं प्रकर्षेण यातुमिच्छन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्यस्तं यथाभिसमायन्त्याभिमुख्येन समायन्त्येकीभावेन तमभिमुखा आयन्त्यनाज्ञप्ता एव राज्ञा केवलं तज्जिगमिषामिज्ञाः, एवमेवेममात्मानं भोक्तारमन्तकाले मरणकाले सर्वे प्राणा वागादयोऽभिसमायन्ति। | वह दृष्टान्त–जिस प्रकार जानेकी तैयारी करनेवाले अर्थात् प्रकर्षसे जानेकी इच्छावाले अर्थात् जानेकी अत्यन्त इच्छा रखनेवाले राजाके अभिमुख होकर उसके उग्रकर्मा और पापकर्ममें नियुक्त सूत एवं गाँवके नेता लोग एक साथ मिलकर सामने आते हैं; राजाकी आज्ञाके बिना ही केवल उसकी जानेकी इच्छा जानकर ही तैयार हो जाते हैं, उसी प्रकार अन्तकाल यानी मरणसमयमें वागादि सम्पूर्ण प्राण भोक्ता आत्माके सम्मुख एकत्रित हो जाते हैं। |
१०२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवतीति व्याख्यातम् ॥ ३८ ॥ | 'यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति' इसकी व्याख्या पहले कर दी गयी है ॥३८॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये तृतीयं ज्योतिर्ब्राह्मणम् ॥ ३ ॥
चतुर्थ ब्राह्मण
मरणोन्मुख जीवकी दशाका वर्णन
| स यत्रायमात्मा---संसारोपवर्णनं प्रस्तुतम् । तत्रायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः सम्प्रमुच्य इत्युक्तम् । तत् सम्प्रमोक्षणं कस्मिन् काले कथं वा ? इति सविस्तरं संसरणं वर्णयितव्यमित्यारभ्यते— | 'स यत्रायमात्मा' यहाँ संसारके उपवर्णनका प्रसङ्ग है । उसमें 'यह आत्मा इन अङ्गोंसे सम्यक् प्रकारसे मुक्त होकर' ऐसा कहा गया है । वह आत्माकी सम्यक् मुक्ति किस समय अथवा किस प्रकार होती है—इसका विस्तारपूर्वक वर्णन करना है—इसीसे आरम्भ किया जाता है— |
स यत्रायमात्माबल्यं न्येत्य सम्मोहमिव न्येत्यथैनमेते प्राणा अभिसमायन्ति स एतास्तेजोमात्राः समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति स यत्रैष चाक्षुषः पुरुषः पराङ् पर्यावर्ततेऽथारूपज्ञो भवति ॥ १ ॥
वह यह आत्मा जिस समय दुर्बलताको प्राप्त हो मानो सम्मोहको प्राप्त हो जाता है, तब ये वागादि प्राण इसके प्रति अभिमुखतासे आते हैं। वह इन [ प्राणोंकी ] तेजोमात्राको सम्यक् प्रकारसे ग्रहण करके हृदयमें ही अनुक्रान्त ( अभिव्यक्त ज्ञानवान् ) होता है। जिस समय यह चाक्षुष पुरुष सर्व ओरसे व्यावृत्त होता है, उस समय मुमूर्षु रूपज्ञानहीन हो जाता है ॥ १ ॥
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| सोऽयमात्मा प्रस्तुतो यत्र यस्मिन् कालेऽबल्यमबलभावं न्येत्य गत्वा, यद् देहस्य दौर्बल्यं तदात्मन एव दौर्बल्यमित्युपचर्यतेऽबल्यं न्येत्येति, न ह्यसौ स्वतोऽमूर्तत्वादबलभावं गच्छति । तथा सम्मोहमिब—सम्मूढता सम्मोहो विवेकाभावः, सम्मूढतामिव न्येति निगच्छति । न चास्य स्वतः सम्मोहोऽसम्मोहो वास्ति, नित्यचैतन्यज्योतिःस्वभावत्वात् । तेनेवशब्दः सम्मोहमिव न्येतीति; उत्क्रान्तिकाले हि करणोपसंहारनिमित्तो व्याकुलीभावः, आत्मन इव लक्ष्यते लौकिकैः; तथा च वक्तारो भवन्ति, सम्मूढः सम्मूढोऽयमिति ।<br><br>अथवा उभयत्र इवशब्दप्रयोगो योज्यः, अबल्यमिव न्येत्य सम्मोहमिव न्येतीति, उभयस्य- | वह यह प्रस्तुत आत्मा जिस समय अबल्य–अबलभावको प्राप्त होकर, यहाँ जो देह की दुर्बलता है, वह आत्माकी ही दुर्बलता है, इस प्रकार उपचारसे कहा जाता है कि अबलभावको प्राप्त होकर, स्वयं अमूर्त होनेके कारण यह अबलभावको प्राप्त नहीं होता । तथा मानो सम्मोहको [ प्राप्त होता है ] सम्मूढताको ही सम्मोह कहते हैं, सम्मोह का अर्थ है विवेकका अभाव, इस प्रकारकी सम्मूढताको मानो प्राप्त होता है। इसे स्वतः सम्मोह अथवा असम्मोह है भी नहीं, क्योंकि यह नित्यचैतन्यज्योतिःस्वरूप है। इसीसे 'सम्मोहमिव न्येति' इसमें 'इव' शब्दका प्रयोग किया गया है; क्योंकि लौकिक पुरुषोंको उत्क्रान्तिके समय इन्द्रियोंके उपसंहारके कारण होनेवाली व्याकुलता आत्माकी-सी जान पड़ती है और ऐसा ही कहनेवाले कहते भी हैं कि यह सम्मूढ–अत्यन्त अचेत हो गया है।<br><br>अथवा 'अबल्यम्' और 'सम्मोहम्' दोनोंहीके साथ 'इव' शब्दका प्रयोग करना चाहिये; अर्थात् मानो अबलताको प्राप्त होकर मानो सम्मूढताको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि दोनों- |
वृ० उ० ६५—
१०२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| परोपाधिनिमित्तत्वाविशेषात्; समानकर्तृकनिर्देशाच्च । | हीका अन्योन्नाविकृत होना समान है, तथा दोनोंहीका एक कर्ता बतलाया गया है। | | अथास्मिन् काले एते प्राणा वागादय एनमात्मानमभिसमायन्ति । तदास्य शरीरस्यात्मनोऽङ्गेभ्यः सम्प्रमोक्षणम् । कथं पुनः सम्प्रमोक्षणम् ? केन वा प्रकारेणात्मानमभिसमायन्ति ? इत्युच्यते— | इस समय ये वागादि प्राण इस आत्माके अभिमुख आते हैं। तब इस देही आत्माका अङ्गोंसे सर्वथा मोक्ष होता है। किंतु वह मोक्ष कैसे होता है और किस प्रकार ये आत्माके अभिमुख आते हैं ? सो बतलाया जाता है— | | स आत्मा एतास्तेजोमात्राः—तेजसो मात्रास्तेजोमात्रास्तेजोऽवयवा रूपादिप्रकाशकत्वाच्चक्षुरादीनि करणानीत्यर्थः, ता एताः समभ्याददानः सम्यङ् निर्लेपेनाभ्याददान आभिमुख्येनाददानः संहरमाणः—तत्स्वप्नापेक्षया विशेषणं समिति, न तु स्वप्ने निर्लेपेन सम्यगादानम्, अस्ति त्वादानमात्रम्, "गृहीता वाग् गृहीतं चक्षुः,' (बृ० उ० २ । १ । १७) "अस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपादाय" (४।३।१६) "शुक्रमादाय" (४।३।११) | वह आत्मा इन तेजोमात्राओंको—तेजकी मात्रा तेजोमात्रा यानी तेजके अवयव अर्थात् रूपादिके प्रकाशक होनेके कारण चक्षु आदि इन्द्रियाँ तेजोमात्रा हैं, उन इन इन्द्रियोंका समभ्यादान—सम्यक् अर्थात् निर्लेपभावसे अभ्यादान—अभिमुखतया आदान अर्थात् उपसंहार कर, हृदय यानी पुण्डरीकाकाशमें ही अनुक्रान्त—अन्वागत होता है अर्थात् बुद्धि आदिके विक्षेपका उपसंहार हो जानेपर हृदयमें ही अभिव्यक्तविज्ञानवान् होता है। 'समभ्याददानः' इस क्रियापदमें 'सम्' यह विशेषण स्वप्नकी अपेक्षासे है, क्योंकि स्वप्नमें निर्लेपभावसे चक्षु आदिका उपसंहार नहीं होता, केवल आदान (उपसंहार) मात्र तो होता |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०२७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०२७
| इत्यादिवाक्येभ्यः—हृदयमेव पुण्डरीकाकाशमन्ववक्रामत्यन्वागच्छति हृदयेऽभिव्यक्तविज्ञानो भवतीत्यर्थः, बुद्ध्यादिविक्षेपोपसंहारे सति । | है, जैसा कि “वाक् गृहीत हो जाती है, चक्षु गृहीत हो जाती है” “इस सर्ववान् लोककी मात्राको ग्रहण कर” “शुक्रको ग्रहण कर” इत्यादि वाक्योंसे सिद्ध होता है। |
| न हि तस्य स्वतश्चलनं विक्षेपोपसंहारादिविक्रिया वा; “ध्यायतीव लेलायतीव” (४।३।७) इत्युक्तत्वात् । बुद्ध्याद्युपाधिद्वारैव हि सर्वविक्रियाह्यारोप्यते तस्मिन् । | आत्माके चलन अथवा विक्षेपोपसंहारादि विकार स्वतः नहीं होते; जैसा कि “ध्यायतीव लेलायतीव” इत्यादि मन्त्रद्वारा कहा गया है। बुद्धि आदि उपाधियोंके द्वारा ही उसमें सब प्रकारके विकारका आरोप किया जाता है । |
| कदा पुनस्तस्य तेजोमात्राभ्यादानम् इत्युच्यते—स यत्रैवं चक्षुषि भवश्चाक्षुषः पुरुष आदित्यांशो भोक्तुः कर्मणा प्रयुक्तो यावद्देहधारणं तावच्चक्षुषोऽनुग्रहं कुर्वन् वर्तते, मरणकाले त्वस्य चक्षुरनुग्रहं परित्यजति, स्वमादित्यात्मानं प्रतिपद्यते। तदेतदुक्तम्—<br>“यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यम्” (३।२।१३) इत्यादि । | किंतु उसकी तेजोमात्राओंका उपसंहार कब होता है ? सो बतलाया जाता है—जिस समय भी वह चक्षुमें रहनेवाला चाक्षुष पुरुष आदित्यांश, जो भोक्ताके कर्मसे प्रेरित होकर जबतक देह धारण किया जाता है, तबतक उसके नेत्रोंका उपकार करता हुआ विद्यमान रहता है, मरणकालमें इसके चक्षुका उपकार करना छोड़ देता है, अर्थात् अपने आदित्यस्वरूपको प्राप्त हो जाता है । इसीसे यह कहा है—<br>“जब इस मृत पुरुषकी वागिन्द्रिय अग्निमें, प्राण वायुमें और नेत्र आदित्यमें लीन हो जाते हैं” इत्यादि । |
१०२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| पुनर्देहग्रहणकाले संश्रयिष्यन्ति, तथा स्वप्स्यतः प्रबुध्यतश्च; तदेतदाह—चाक्षुषः पुरुषो यत्र यस्मिन् काले पराङ् पर्यावर्तते परि समन्तात् पराङ् व्यावर्तत इति, अथात्रास्मिन् कालेऽरूपज्ञो भवति, मुमूर्षू रूपं न जानाति । तदा अयमात्मा चक्षुरादितेजोमात्राः समभ्याददानो भवति स्वप्नकाल इव ॥ १ ॥ | ये देहग्रहणके समय पुनः उसका आश्रय ले लेंगे, ऐसा ही सोने और जागनेवाले पुरुषके विषयमें भी होता है। इसीसे श्रुति कहती है—जिस समय चाक्षुष पुरुष पराङ्-पर्यावर्तन-सब ओरसे अपनी ओर व्यावर्तन कर लेता है, उस समय पुरुष अरूपज्ञ हो जाता है अर्थात् मुमूर्षुको रूपका ज्ञान नहीं होता। उस समय स्वप्नकालके समान यह आत्मा चक्षु आदि तेजोमात्राओंको सब ओरसे सम्यक्-निर्लेपभावसे ग्रहण करनेवाला होता है ॥ १ ॥ |
लिङ्गात्मामें विभिन्न इन्द्रियोंके लय और उसके उत्क्रमणका वर्णन
एकोभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवति न जिघ्रतीत्याहुरेकीभवति न रसयत इत्याहुरेकीभवति न वदतीत्याहुरेकीभवति न शृणोतीत्याहुरेकीभवति न मनुत इत्याहुरेकीभवति न स्पृशतीत्याहुरेकीभवति न विजानातीत्याहुस्तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति चक्षुषो वा मूर्ध्नो वान्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति सविज्ञानो भवति सविज्ञानमेवान्ववक्रामति तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च ॥ २ ॥
[ चक्षु-इन्द्रिय लिङ्गात्मासे ] एकरूप हो जाती है, तो लोग 'नहीं देखता' ऐसा कहते हैं, [ घ्राणेन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है, तो 'नहीं
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२९
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२९
सूँघता' ऐसा कहते हैं, [रसनेन्द्रिय] एक रूप हो जाती है तो 'नहीं चखता' ऐसा कहते हैं, [वागिन्द्रिय] एक रूप हो जाती है तो 'नहीं बोलता' ऐसा कहते हैं, [श्रोत्रेन्द्रिय] एक रूप हो जाती है तो 'नहीं सुनता' ऐसा कहते हैं, [मन] एकरूप हो जाता है तो 'मनन नहीं करता' ऐसा कहते हैं, [त्वगिन्द्रिय] एकरूप हो जाती है तो 'स्पर्श नहीं करता' ऐसा कहते हैं और यदि [बुद्धि लिङ्गात्मासे] एक रूप हो जाती है तो 'नहीं जानता' ऐसा कहते हैं। उस इस हृदयका अग्र (बाहर जानेका मार्ग) अत्यन्त प्रकाशित होने लगता है, उसीसे यह आत्मा नेत्रसे, मूर्द्धासे अथवा शरीरके किसी अन्य भागसे बाहर निकलता है। उसके उत्क्रमण करनेपर उसके साथ ही प्राण उत्क्रमण करता है, प्राणके उत्क्रमण करनेपर सम्पूर्ण प्राण (इन्द्रियवर्ग) उत्क्रमण करते हैं; उस समय यह आत्मा विशेष विज्ञानवान् होता है और विज्ञानयुक्त प्रदेशको ही जाता है; उस समय उसके साथ-साथ ज्ञान, कर्म और पूर्वप्रज्ञा (अनुभूत विषयोंकी वासना) भी जाते हैं॥ २॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एकीभवति करणजातं स्वेन लिङ्गात्मना, तदेनं पार्श्वस्था आहुर्न पश्यतीति । तथा घ्राणदेवतानिवृत्तौ घ्राणमेकीभवति लिङ्गात्मना, तदा न जिघ्रतीत्याहुः । समानमन्यत् । जिह्वायां सोमो वरुणो वा देवता, तन्निवृत्त्यपेक्षया न रसयत इत्याहुः । तथा न वदति न शृणोति न मनुते न स्पृशति न विजानातीत्याहुः । | जब इन्द्रियवर्ग अपने लिङ्गदेहके साथ एकरूप हो जाते हैं, तब आसपास बैठे हुए लोग कहते हैं—'यह नहीं देखता'। इसी प्रकार जब घ्राणदेवताके निवृत्त होनेपर घ्राणेन्द्रिय लिङ्गात्माके साथ एकरूप हो जाती है, तब 'नहीं सूँघता' ऐसा कहते हैं। शेष अर्थ इसीके समान है । जिह्वामें सोम या वरुण देवता है, उसकी निवृत्तिकी अपेक्षासे 'नहीं चखता' ऐसा कहते हैं। इसी तरह 'नहीं बोलता, नहीं सुनता, मनन नहीं करता, स्पर्श नहीं करता, नहीं जानता' ऐसा कहते हैं। |
१०३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| तदोपलक्ष्यते देवतानिर्वृत्तिः करणानां च हृदय एकीभावः । <br><br> तत्र हृदय उपसंहृतेषु करणेषु योऽन्तर्व्यापारः स कथ्यते— तस्य हैतस्य प्रकृतस्य हृदयस्य हृदयच्छिद्रस्येत्येतत्, अग्रं नाडीमुखं निर्गमनद्वारं प्रद्योतते स्वप्नकाल इव स्वेन भासा तेजोमात्रादानकृतेन स्वेनैव ज्योतिषा आत्मनैव च । तेनात्मज्योतिषा प्रद्योतेन हृदयाग्रेणैष आत्मा विज्ञानमयो लिङ्गोपाधिर्निर्गच्छति निष्क्रामति ! तथा आथर्वणे "कस्मिन्नवहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति" (प्र० उ० ६ । ३) "स प्राणमसृजत" (प्र० उ० ६ । ४) इति । <br><br> तत्र चात्मचैतन्यज्योतिः सर्वदाभिव्यक्ततरम् । तदुपाधिद्वारा ह्यात्मनि जन्ममरणगमना- | उस समय इन्द्रियाभिमानी देवताओंकी निवृत्ति और इन्द्रियोंका हृदयमें एकीभाव उपलक्षित होता है। <br><br> उस समय इन्द्रियोंका हृदयमें उपसंहार हो जानेपर जो अन्तर्व्यापार होता है, उसका वर्णन किया जाता है—उस इस प्रकृत हृदयका अर्थात् हृदयच्छिद्रका अग्र नाडीमुख अर्थात् बाहर निकलनेका द्वार प्रद्योतित—अत्यन्त प्रकाशित होने लगता है, जिस प्रकार स्वप्नकालमें आत्मज्योतिसे स्थित रहता है, उसी प्रकार इस समय भी तेजोमात्राओंके ग्रहणके कारण आत्मज्योतिसे तथा स्वयं अपने-आपसे ही प्रकाशित हो जाता है। उस आत्मज्योतिसे प्रकाशित हृदयद्वारसे यह लिङ्गोपाधिक विज्ञानमय आत्मा निकल जाता है। ऐसा ही आथर्वण (प्रश्न) उपनिषद्में भी कहा है—"[उसने सोचा--] मैं किसके उत्क्रमण करनेपर उत्क्रान्त होऊँगा और किसके प्रतिष्ठित होनेपर प्रतिष्ठित हो जाऊँगा" "उसने प्राणकी रचना की" इत्यादि। <br><br> उस लिङ्गात्मामें आत्मचैतन्यज्योति सर्वदा अत्यन्त अभिव्यक्त रहती है। उस उपाधिके द्वारा ही आत्मामें जन्म, मरण, गमन, |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१०३१
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१०३१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| गमनादिसर्वविक्रियालक्षणः संव्यवहारः; तदात्मकं हि द्वादशविधं करणं बुद्ध्यादि । तत् सूत्रं तज्जीवनं सोऽन्तरात्मा जगतस्तस्थुषश्च । तेन प्रद्योतेन हृदयाग्रप्रकाशेन निष्क्रममाणः केन मार्गेण निष्क्रामति ? इत्युच्यते— | आगमन आदि सम्पूर्ण विकाररूप व्यवहार होते हैं और तद्रूप ही बुद्धि आदि बारह इन्द्रियाँ हैं । वह सूत्र है, वह जीवन है और वही स्थावर-जंगमका अन्तरात्मा है । उस प्रद्योतसे अर्थात् हृदयाग्रके प्रकाशसे निकलनेवाला आत्मा किस मार्गसे निकलता है, सो कहा जाता है- |
| चक्षुषो वा आदित्यलोकप्राप्तिनिमित्तं ज्ञानं कर्म वा यदि स्यात् । मूर्ध्नो वा ब्रह्मलोकप्राप्तिनिमित्तं चेत् । अन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः शरीरावयवेभ्यो यथाकर्म यथाश्रुतम् । | यदि उसका ज्ञान या कर्म आदित्यलोककी प्राप्तिका कारण होता है तो वह चक्षुद्वारसे निकलता है । यदि ब्रह्मलोककी प्राप्तिका कारण होता है तो मूर्धदेशसे निकलता है । इसी प्रकार अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार वह शरीरके अन्यान्य देश या अवयवोंसे निकल जाता है । |
| तं विज्ञानात्मानमुत्क्रामन्तं परलोकाय प्रस्थितं परलोकायोद्भूताकूतमित्यर्थः; प्राणः सर्वाधिकारिस्थानीयो राज्ञ इवानूत्क्रामति; तं च प्राणमनूत्क्रामन्तं वागादयः सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति । यथाप्रधानानूवाचिख्यासा इयम्, न तु क्रमेण सार्थवद् गमनमिह विवक्षितम् । | उस विज्ञानात्माके उत्क्रान्त-परलोकके लिये प्रस्थित अर्थात् परलोकगमनके लिये वासनायुक्त होनेपर, राजाके सर्वाधिकारीके समान प्राण उसके साथ-साथ उत्क्रमण करता है और उस प्राणके उत्क्रान्त होनेपर वागादि सारे ही प्राण उसके साथ-साथ उत्क्रमण करते हैं । यहाँ लोगोंके समूहके समान विज्ञानात्मा, प्राण और इन्द्रियोंका एक साथ मिलकर क्रमसे जाना विवक्षित नहीं है, बल्कि उनके प्राधान्यके अनुसार उसका उल्लेख करना अभीष्ट है । |
१०३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
१०३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
| तदैष आत्मा सविज्ञानो भवति स्वप्न इव विशेषविज्ञानवान् भवति कर्मवशान्न स्वतन्त्रः; स्वातन्त्र्येण हि सविज्ञानत्वे सर्वः कृतकृत्यः स्यात्, नैव तु तल्लभ्यते; अत एवाह व्यासः—<br><br>“सदा तद्भावभावितः” (गीता ८।६) इति। कर्मणा तूद्भाव्यमानेनान्तःकरणवृत्तिविशेषाश्रितवासनात्मकविशेषविज्ञानेन सर्वो लोक एतस्मिन् काले सविज्ञानो भवति। सविज्ञानमेव च गन्तव्यमन्ववक्रामत्यनुगच्छति विशेषविज्ञानोद्भासितमेवेत्यर्थः। | उस समय यह आत्मा सविज्ञान होता है अर्थात् स्वप्नके समान अपने कर्मवश विशेष विज्ञानवान् होता है, स्वतन्त्रतासे नहीं; यदि स्वतन्त्रतासे विज्ञानवान् हो सकता तो सभी कृतकृत्य तो हो जाते; किंतु वह कृतकृत्यता तो [सभीको] प्राप्त नहीं होती; इसीसे व्यासदेवने कहा है—‘हृदयमें सदा उसी भावका चिन्तन करते रहनेसे [वह उसीको प्राप्त होता है]”। अतः इस समय सब लोग कर्मद्वारा उद्भूत अन्तःकरणकी वृत्तिविशेषके आश्रित रहनेवाले वासनात्मक विशेष ज्ञानसे सविज्ञान होते हैं। इस प्रकार सविज्ञान अर्थात् विशेष विज्ञानसे उद्भासित होकर ही अपने गन्तव्य स्थानको अनुक्रमण-अनुगमन करता है। | | तस्मात् तत्काले स्वातन्त्र्यार्थं योगधर्मानुसेवनं परिसंख्यानाभ्यासश्च विशिष्टपुण्योपचयश्च श्रद्दधानैः परलोकार्थिभिरप्रमत्तैः कर्तव्य इति। सर्वशास्त्राणां यत्नतो विधेयोऽर्थो दुश्चरिताच्चोपरमणम्। न हि तत्काले शक्यते किञ्चित् सम्पादयितुम्; कर्मणा नीयमा- | अतः परलोककी इच्छा रखनेवाले श्रद्धालु पुरुषोंको उस समय स्वातन्त्र्य प्राप्त करनेके लिये प्रमादहीन होकर निरन्तर योगधर्मोंका सेवन, विवेकका अभ्यास और विशेषरूपसे पुण्यका संचय करना चाहिये। सम्पूर्ण शास्त्रोंके विधेय अर्थका आचरण करना चाहिये तथा दुष्कर्मसे दूर रहना चाहिये। किंतु उस (उत्क्रान्तिके) समय कुछ भी सम्पादन नहीं किया जा सकता, |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३३
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| नस्य स्वातन्त्र्याभावात्; "पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन" (३।२।१३) इत्युक्तम्। एतस्य ह्यनर्थस्योपशमोपायविधानाय सर्वशाखोपनिषदः प्रवृत्ताः। न हि तद्विहितोपायानुसेवनं मुक्त्वा आत्यन्तिकोऽस्यानर्थस्योपशमोपायोऽस्ति; तस्मादत्रैवो पनिषद्विहितोपाये यत्नपरैर्भवितव्यमित्येष प्रकरणार्थः। | क्योंकि कर्मद्वारा ले जाये जाते हुए जीवकी स्वतन्त्रता नहीं रहती; इस विषयमें "पुण्यकर्मसे पुरुष पुण्यवान् होता है और पापकर्मसे पापी" ऐसा ऊपर कहा जा चुका है। इस अनर्थकी निवृत्तिका उपाय बतानेके लिये ही समस्त शाखाओंकी उपनिषदें प्रवृत्त हुई हैं। उनके विधान किये हुए उपायके निरन्तर सेवनके बिना इस अनर्थ को आत्यन्तिक निवृत्तिका कोई और उपाय नहीं है; अतः इस उपनिषद्विहित उपायके अनुष्ठानमें ही प्रयत्न करते रहना चाहिये—यही इस प्रकरणका तात्पर्य है। |
| शकटवत् सम्भृतसम्भार उत्सर्जन् यातीत्युक्तं किं पुनस्तस्य परलोकाय प्रवृत्तस्य पथ्यदनं शाकटिकसम्भारस्थानीयम्, गत्वा वा परलोकं यद् भुङ्क्ते? शरीराद्यारम्भकं च यत् तत् किम्? इत्युच्यते—तं परलोकाय गच्छन्तमात्मानं विद्याकर्मणी, विद्या च कर्म च विद्याकर्मणी विद्या सर्वप्रकारा विहिता प्रतिषिद्धा च, अविहिता | ऊपर यह कहा गया है कि गाड़ीके समान जिसने बोझा धारण किया हुआ है, वह जीव शब्द करता हुआ जाता है; किंतु गाड़ीवानके राहखर्चके समान परलोकके लिये जानेवाले इस जीवकी रास्तेकी भोजनसामग्री क्या है, जिसे यह परलोकमें जाकर खाता है? तथा जो उसके शरीरादिका आरम्भक है, वह भी क्या है? सो बतलाया जाता है—परलोकको जानेवाले उस आत्माके साथ विद्या और कर्म—सब प्रकारकी विहित और प्रतिषिद्ध तथा अविहित और |