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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

| ब्राह्मण ११ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२११ |

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ब्राह्मण ११ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२११

| सोऽपि तस्मै तत्र विजिहीते, यथा दुन्दुभेः खं प्रसिद्धम्, तेन स ऊर्ध्व आक्रमते । स लोकं प्रजापतिलोकमागच्छति; किंविशिष्टम् ? अशोकं मानसेन दुःखेन विवर्जितमित्येतत्; अहिमं हिमवर्जितं शारीरदुःखवर्जितमित्यर्थः; तं प्राप्य तस्मिन् वसति शाश्वतीर्नित्याः समाः संवत्सरानित्यर्थः । ब्रह्मणो बहून् कल्पान् वसतीत्येतत् ॥ १ ॥ | वहां वह भी उसके लिये अपने-को छिद्रयुक्त कर देता है, जैसा कि दुन्दुभिका छिद्र प्रसिद्ध है, उसके द्वारा वह ऊपरकी ओर चढ़ता है । वह लोक अर्थात् प्रजापतिलोकमें आ जाता है; कैसे लोकमें ? 'अशोकम्' अर्थात् मानसिक दुःखसे रहित और 'अहिमम्'—हिमवर्जित अर्थात् शारीरिक दुःखसे रहित लोकमें । वहाँ पहुँचकर वह उसमें 'शाश्वतीः समाः'—नित्य अर्थात् अनन्त वर्षोंतक बसता है । तात्पर्य यह कि ब्रह्माके अनेकों कल्पोंतक वहाँ निवास करता है ॥ १ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
दशमं गतिब्राह्मणम् ॥ १० ॥


एकादश ब्राह्मण

व्याधि, श्मशानगमन और अग्निदाहमें परम तपोहृष्टिका विधान

एतद्वै परमं तपो यद् व्याहितस्तप्यते परमँ० हैव लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यँ० हरन्ति परमँ० हैव लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति परम ँ० हैव लोकं जयति य एवं वेद ॥ १ ॥

१२१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

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१२१२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

व्याधियुक्त पुरुषको जो ताप होता है—यह निश्चय ही परम तप है, जो ऐसा जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है। मृत पुरुषको जो वनको ले जाते हैं, यह निश्चय ही परम तप है; जो ( म्रियमाण व्यक्ति ) ऐसा जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है। मरे हुए मनुष्यको सब प्रकार जो अग्निमें रखते हैं, यह निश्चय ही परम तप है; जो ऐसा जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
एतद् वै परमं तपः । किं तत् ? यद् व्याहितो व्याधितो ज्वरादिपरिगृहीतः सन् यत् तप्यते तदेतत् परमं तप इत्येवं चिन्तयेत्; दुःखसामान्यात् । तस्यैवं चिन्तयतो विदुषः कर्मक्षयहेतुस्तदेव तपो भवत्यनिन्दतोऽविषीदतः; स एव च तेन विज्ञानतपसा दग्धकिल्बिषः परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद ।<br><br>तथा मुमूर्षुरादावेव कल्पयति; किम् ? एतद् वै परमं तपो यं प्रेतं मां ग्रामादरण्यं हरन्ति ऋत्विजोऽन्त्यकर्मणे तद् ग्रामादरण्यगमनसामान्यात् परमं मम तत् तपोयह निश्चय परम तप है। वह क्या है ? व्याहित-व्याधित अर्थात् ज्वरादिसे ग्रस्त हुआ पुरुष जो ताप होता है, यह परम तप है—ऐसा चिन्तन करे; क्योंकि ताप और तप इनमें समान ही क्लेश है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले उस विद्वान्‌का, जो कि स्वतः प्राप्त हुए रोगादिकी निन्दा नहीं करता तथा उससे विषादको प्राप्त नहीं होता, वही तप कर्मक्षयका हेतु हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है, वह उस विज्ञानरूप तपके द्वारा पापोंको दग्ध करके परम लोकपर विजय प्राप्त कर लेता है।<br><br>इसी प्रकार मरणासन्न पुरुष आरम्भमें ही कल्पना करता है; क्या कल्पना करता है ? मर जानेपर मुझे ऋत्विगगण अन्त्येष्टिकर्मके लिये जो ग्रामसे वनमें ले जायँगे, यह निश्चय ही परम तप होगा—ग्रामसे वन-गमनमें समानता होनेके कारण वह मेरा परम तप हो जायगा। यह

| ब्राह्मण १२ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२१३ |

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ब्राह्मण १२ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२१३

| भविष्यति । ग्रामादरण्यगमनं परमं तप इति हि प्रसिद्धम् । परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद ।<br><br>तथैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति; अग्निप्रवेशसामान्यात्, परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद ॥ १ ॥ | तो प्रसिद्ध ही है, कि ग्रामसे वनमें जाना परम तप है। जो ऐसा जानता है, वह निश्चय ही परम लोकको जीत लेता है ।<br><br>तथा जिस मृतकको सब ओरसे अग्निमें रखते हैं—यह भी उसके लिये परमतप होता है, क्योंकि अग्निप्रवेशसे इसकी समानता है । जो ऐसा जानता है, वह निश्चय ही परम् लोकको जीत लेता है ॥ १ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये एकादशं तपोब्राह्मणम् ॥ ११ ॥


द्वादश ब्राह्मण

अन्न-प्राणरूप ब्रह्मकी उपासना और तद्विषयक आख्यान

अन्नं ब्रह्मेति—तथैतदुपासनान्तरं विधित्सन्नाह—'अन्नं ब्रह्म'—इस प्रकार इस अन्य उपासनाका विधान करनेकी इच्छासे वेद कहता है—

अन्नं ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा पूयति वा अन्नमृते प्राणात् प्राणो ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नादेते ह त्वेव देवते एकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतस्तद्ध स्माह प्रातृदः पितरं किं स्विदेवैवंविदुषे साधु कुर्यां कमेवास्मा असाधु

१२१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५

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१२१४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ५

कुर्यामिति स ह स्माह पाणिना मा प्रातृद कस्त्वेनयोरे- कधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतीति तस्मा उ हैतदुवाच वीत्यन्नं वै व्यन्ने हीमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि रमिति प्राणो वै रं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते सर्वाणि ह वा अस्मिन् भूतानि विशन्ति सर्वाणि भूतानि रमन्ते य एवं वेद ॥ १ ॥

कोई कहते हैं कि अन्न ब्रह्म है; किंतु ऐसी बात नहीं है; क्योंकि प्राणके बिना अन्न सड़ जाता है। कोई कहते हैं-प्राण ब्रह्म है; किंतु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि अन्नके बिना प्राण सूख जाता है। परंतु ये दोनों देव एकरूपताको प्राप्त होकर परम भावको प्राप्त होते हैं—ऐसा निश्चय कर प्रातृद ऋषिने अपने पितासे कहा था—‘इस प्रकार जाननेवाले-का मैं क्या शुभ करूँ अथवा क्या अशुभ करूँ ? [ क्योंकि कृतकृत्य हो जानेके कारण उसका तो न कोई शुभ किया जा सकता है और न अशुभ ही ।]’ पिताने हाथसे निवारण करते हुए कहा—‘प्रातृद ! ऐसा मत कहो। इन दोनोंकी एकरूपताको प्राप्त होकर कौन परमताको प्राप्त होता है ?’ अतः उससे उस (प्रातृदके पिता) ने ‘वि’ ऐसा कहा। ‘वि’ यही अन्न है। वि-रूप अन्नमें ही ये सब भूत प्रविष्ट हैं। ‘रम्’ यह प्राण है, क्योंकि रं अर्थात् प्राणमें ही ये सब भूत रमण करते हैं। जो ऐसा जानता है, उसमें ये सब भत प्रविष्ट होते हैं और सभी भूत रमण करते हैं ॥ १ ॥

| अन्नं ब्रह्मान्नमद्यते यत् तद् ब्रह्मेत्येक आचार्या आहुस्तन्न तथा ग्रहीतव्यमन्नं ब्रह्मेति । अन्ये चाहुः—प्राणो ब्रह्मेति, तच्च तथा न ग्रहीतव्यम् । | अन्न ब्रह्म है। अन्न जो कि खाया जाता है, वह ब्रह्म है—ऐसा किन्हीं आचार्योंका कथन है; किंतु ‘अन्न ब्रह्म है’ इसे इसी रूपमें नहीं स्वीकार करना चाहिये। दूसरे कहते हैं—प्राण ब्रह्म है; इसे भी इस रूपमें नहीं स्वीकार करना चाहिये। |

| ब्राह्मण १२ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२१५ |

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ब्राह्मण १२ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२१५

| किमर्थं पुनरन्नं ब्रह्मेति न ग्राह्यम्; यस्मात् पूयति क्लियते पूतिभावमापद्यत ऋते प्राणात्, तत् कथं ब्रह्म भवितुमर्हति ? ब्रह्म हि नाम तद् यदविनाशि। | किंतु 'अन्न ब्रह्म है' ऐसा क्यों नहीं समझना चाहिये ? क्योंकि प्राणके बिना यह सड़ता है, इसमें पानी छूटने लगता है अर्थात् यह पूतिभाव—दुर्गन्धको प्राप्त हो जाता है। फिर यह किस प्रकार ब्रह्म हो सकता है ? ब्रह्म तो वही हो सकता है, जो अविनाशी हो। | | अस्तु तर्हि प्राणो ब्रह्म, नैवम्; यस्माच्छुष्यति वै प्राणः शोषमुपैति ऋतेऽन्नात्, अत्ता हि प्राणः; अतोऽन्नेनाद्येन विना न शक्नोत्यात्मानं धारयितुम्; तस्माच्छुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नात् । अत एकैकस्य ब्रह्मता नोपपद्यते यस्मात् तस्मादेते ह त्वेवान्नप्राणदेवते एकधाभूयमेकधाभावं भूत्वा गत्वा परमतां परमत्वं गच्छतो ब्रह्मत्वं प्राप्नुतः। | अच्छा तो प्राण ही ब्रह्म रहे, ऐसा नहीं; क्योंकि अन्नके बिना प्राण सूख जाता है—शुष्कताको प्राप्त हो जाता है। प्राण तो अन्न भक्षण करनेवाला है; अतः अपने भक्ष्य अन्नके बिना वह अपनेको धारण करनेमें समर्थ नहीं है, इसीसे अन्नके बिना प्राण सूख जाता है। अतः इनमेंसे एक-एकका ब्रह्मत्व सम्भव नहीं है, इसलिये ये अन्न और प्राण--दो देवता एकरूप होकर—एकभावको प्राप्त होकर परमता----परमभावको प्राप्त होते अर्थात् ब्रह्मत्वको प्राप्त हो जाते हैं। | | तदेतदेवमध्यवस्य ह स्माह स्म प्रातृदो नाम पितरमात्मनः किंस्वित् स्विदिति वितर्के, यथा मया ब्रह्म परिकॢप्तमेवंविदुषे | इसे इस प्रकार निश्चय कर प्रातृद नामके ऋषिने अपने पितासे कहा—'किंस्वित्' (कौन सा)—इसमें 'स्वित्' यह वितर्कभाव सूचित करनेके लिये है, मैंने जिस प्रकार ब्रह्मकी कल्पना की है, उस प्रकार जाननेवालेका मैं |

१२१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

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१२१६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| किंस्वित् साधु कुर्यां साधु शोभनं पूजां कां त्वस्मै पूजां कुर्या-मित्यभिप्रायः, किमेवास्मै विदुषेऽसाधु कुर्यां कृतकृत्योऽसावित्य-भिप्रायः। अन्नप्राणौ सहभूतौ ब्रह्मेति विद्वानासावसाधुकरणेन खण्डितो भवति, नापि साधु-करणेन महीकृतः। | क्या साधु करूँ ? साधु--शोभन अर्थात् पूजा; तात्पर्य यह है कि उसकी मैं क्या तो पूजा करूँ और क्या ऐसा जाननेवालेका मैं असाधु करूँ ? अभिप्राय यह है कि वह तो कृतकृत्य है। अन्न और प्राण-ये मिलकर ब्रह्म हैं--ऐसा जो जानने-वाला है वह पुरुष अशुभ करनेसे तो खण्डित नहीं होता और शुभ करनेसे महान् नहीं होता। | | तमेवंवादिनं स पिता ह स्माह पाणिना हस्तेन निवारयन् मा प्रातृद मैवं वोचः। कस्त्वेनयो-रन्नप्राणयोरेकधाभूयं भूत्वा परमतां कस्तु गच्छति न कश्चि-दपि विद्वाननेन ब्रह्मदर्शनेन परमतां गच्छति। तस्मान्मैवं वक्तुमर्हसि कृतकृत्योऽसाविति। | इस प्रकार कहनेवाले उस पुत्र-को हाथसे रोकते हुए पिताने कहा, 'प्रातृद ! नहीं, ऐसा मत कहो। इन अन्न और प्राणको एकरूपताको प्राप्त होकर कौन परम-भावको प्राप्त करता है ? इस ब्रह्मदर्शनके द्वारा कोई भी विद्वान् परम-भावको प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिये तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिये कि यह कृत्यकृत्य है।' | | यद्येवं ब्रवीतु भवान् कथं पर-मतां गच्छतीति ? तस्मा उ है-तद् वक्ष्यमाणं वच उवाच। किं तत् ? वीति। किं तद् वीत्युच्यते—अन्नं वै वि। अन्ने हि यस्मादिमानि सर्वाणि भूतानि विष्टान्याश्रितान्यतोऽन्नं वीत्युच्यते। | यदि ऐसी बात है तो आप बतलाइये कि किस प्रकार परम-भाव प्राप्त करता है ? तब उसके प्रति उसके पिताने यह आगे कहा जानेवाला वचन कहा। वह वचन क्या था ? वह था 'वि'। वह 'वि' क्या है सो बतलाते हैं—अन्न ही 'वि' है, क्योंकि अन्नमें ही ये समस्त भूत विष्ट--आश्रित हैं, इसलिये अन्न 'वि' इस प्रकार कहा जाता है। |

ब्राह्मण १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१७

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ब्राह्मण १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१७


| किं च रमिति–रमिति चोक्तवान् पिता। किं पुनस्तद् रम् ? प्राणो वै रम्; कुत इत्याह प्राणे हि यस्माद् बलाश्रये सति सर्वाणि भूतानि रमन्तेऽतो रं प्राणः। सर्वभूताश्रयगुणमन्नं सर्वभूतरतिगुणश्च प्राणः। न हि कश्चिदनायतनो निराश्रयो रमते; नापि सत्यप्यायतनेऽप्राणो दुर्बलो रमते; यदा त्वायतनवान् प्राणी बलवांश्च तदा कृतार्थमात्मानं मन्यमानो रमते लोकः; “युवा स्यात् साधुयुवाऽध्यायकः” (तै० उ० २।८।१) इत्यादिश्रुतेः। | इसके सिवा ‘रम्’ यह कहा—पिताने ‘रम्’ ऐसा भी कहा, सो वह ‘रम्’ क्या है? प्राण ही ‘रम्’ है। क्यों, सो बतलाते हैं—क्योंकि बलके आश्रयभूत प्राणके रहनेपर ही सब भूत रमण करते हैं, इसलिये प्राण ‘रम्’ है। इस प्रकार अन्न समस्त भूतोंके आश्रयरूप गुणवाला है और प्राण समस्त भूतोंके रतिरूप गुणवाला। बिना आयतन अर्थात् बिना आश्रयके भी कोई रमण नहीं कर सकता और आश्रयके होनेपर भी प्राणहीन अर्थात् बलहीन भी रमण नहीं कर सकता। जिस समय प्राणी आश्रयसे युक्त और बलवान् होता है तभी अपनेको कृतार्थ मानता हुआ वह रमण करता है; जैसा कि “युवक हो, अच्छा युवक हो और विद्यावान् हो” इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात होता है। | | इदानीमेवंविदः फलमाह— | अब श्रुति इस प्रकार जाननेवाले उपासकका फल बतलाती है— | | सर्वाणि ह वा अस्मिन् भूतानि विशन्त्यन्नगुणज्ञानात् सर्वाणि भूतानि रमन्ते प्राणगुणज्ञानाद् य एवं वेद ॥ १ ॥ | जो ऐसा जानता है, उसमें अन्नगुणका ज्ञान होनेके कारण समस्त भूत प्रवेश करते हैं तथा प्राणगुणका ज्ञान होनेके कारण समस्त भूत रमण करते हैं ॥ १ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
द्वादशमन्नप्राणब्राह्मणम् ॥ १२ ॥


बृ० उ० ७७—

त्रयोदश ब्राह्मण

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त्रयोदश ब्राह्मण

उक्थदृष्टिसे प्राणोपासना

उक्थं प्राणो वा उक्थं प्राणो हीदँ सर्वमुत्थापयत्युद्धास्मादुक्थविद् वीरस्तिष्ठत्युक्थस्य सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ १ ॥

'उक्थ' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे। प्राण ही उक्थ है, क्योंकि प्राण ही इन सबको उत्थापित करता है। इस उपासकसे उक्थवेत्ता पुत्र उत्पन्न होता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह प्राणके सायुज्य और सालोक्यको प्राप्त करता है ॥ १ ॥

| उक्थं तथोपासनान्तरम् । उक्थं शस्त्रम्; तद्धि प्रधानं महाव्रते क्रतौ । किं पुनस्तदुक्थम् ? प्राणो वा उक्थम्; प्राणश्च प्रधान इन्द्रियाणामुक्थं च शस्त्राणामत उक्थमित्युपासीत ।<br><br>कथं प्राण उक्थम् ? इत्याह— प्राणो हि यस्मादिदं सर्वमुत्थापयति; उत्थापनादुक्थं प्राणः; न ह्यप्राणः कश्चिदुत्तिष्ठति ।<br><br>तदुपासनफलमाह—उद्धास्मादेवंविद उक्थवित् प्राणविद् वीरः | इसी प्रकार उक्थ' एक अन्य उपासना है। उक्थ शस्त्र है, वही महाव्रत क्रतुमें प्रधान होता है। अच्छा तो वह उक्थ क्या है ? प्राण ही उक्थ है; प्राण इन्द्रियोंमें प्रधान है और उक्थ शस्त्रोंमें प्रधान है; इसलिये प्राण उक्थ है—ऐसी उपासना करे।<br><br>प्राण उक्थ किस प्रकार है ? सो श्रुति बतलाती है—क्योंकि प्राण ही इस सबको उठाता है; उठानेके कारण प्राण उक्थ है; क्योंकि कोई भी प्राणहीन उठ नहीं सकता।<br><br>अब श्रुति उसकी उपासनाका फल बतलाती है—इस प्रकार उपासना करनेवालेसे उक्थवित्-प्राणवित् वीर |

ब्राह्मण १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२१९

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ब्राह्मण १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२१९


| पुत्र उत्तिष्ठति ह–दृष्टमेतत् फलम् ।<br><br>अदृष्टं तूक्थस्य सायुज्यं सलोकतां<br><br>जयति य एवं वेद ॥ १ ॥ | यानी पुत्र उत्पन्न होता है—यह इसका प्रत्यक्ष फल है। परोक्ष फल यह है कि जो ऐसा जानता है, वह उक्थके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ १ ॥ |


यजुर्दृष्टिसे प्राणोपासना

यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते युज्यन्ते हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय यजुषः सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ २ ॥

'यजुः' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे। प्राण ही यजु है, क्योंकि प्राणमें ही इन सब भूतोंका योग होता है। सम्पूर्ण भूत इसकी श्रेष्ठताके कारण इससे संयुक्त होते हैं। जो ऐसी उपासना करता है, वह यजुके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ २ ॥


| यजुरिति चोपासीत प्राणम्;<br><br>प्राणो वै यजुः; कथं यजुः प्राणः?<br><br>प्राणे हि यस्मात् सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते। न ह्यसति प्राणे केनचित् कस्यचिद् योगसामर्थ्यम्; अतो युनक्तीति प्राणो यजुः ।<br><br>एवंविदः फलमाह—युज्यन्त उद्यच्छन्त इत्यर्थः। हास्मा एवंविदे सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्यं श्रेष्ठ- | 'यजुः' इस प्रकार भी प्राणकी उपासना करे; प्राण ही यजु है; प्राण यजु किस प्रकार है? क्योंकि प्राणमें ही समस्त प्राणियोंका योग होता है। प्राणके न रहनेपर किसीके साथ किसीका योग होनेका सामर्थ्य नहीं है; अतः योग करता है, इसलिये प्राण यजु है।<br><br>इस प्रकार उपासना करनेवालेका श्रुति फल बतलाती है—इस प्रकार उपासना करनेवालेको सम्पूर्ण भूत |

| १२२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |

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१२२०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| भावस्तस्मै श्रैष्ठ्याय श्रेष्ठभावायायं नः श्रेष्ठो भवेदिति । यजुषः प्राणस्य सायुज्यमित्यादि सर्वं समानम् ॥ २ ॥ | श्रैष्ठ्य-श्रेष्ठभावका नाम श्रेष्ठ्य है, उस श्रैष्ठ्य यानी श्रेष्ठ-भावके लिये—यह हममें श्रेष्ठ हो, इस निमित्तसे युक्त होते अर्थात् उद्यम करते हैं। तथा वह यजुरूप प्राणका सायुज्य प्राप्त करता है—इत्यादि सब अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |

सामदृष्टिसे प्राणोपासना

साम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि सम्यञ्चि हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय कल्पन्ते साम्नः सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ३ ॥

'साम' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे। प्राण ही साम है, क्योंकि प्राणमें ही ये सब भूत सुसंगत होते हैं। समस्त भूत उसके लिये सुसंगत होते हैं तथा उसकी श्रेष्ठताके लिये समर्थ होते हैं। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह सामके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥

| सामेति चोपासीत प्राणम् । प्राणो वै साम । कथं प्राणः साम ? प्राणे हि यस्मात् सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि संगच्छन्ते; संगमनात् साम्यापात्तहेतुत्वात् साम प्राणः। सम्यञ्चि संगच्छन्ते हास्मै सर्वाणि भतानि। न केवलं संगच्छन्त एव, श्रेष्ठ भावाय चास्मै कल्पन्ते समर्थ्यन्ते साम्नः सायुज्यमित्यादि पूर्ववत् ॥ ३ ॥ | 'साम' इस प्रकार भी प्राणकी उपासना करे। प्राण ही साम है। प्राण साम किस प्रकार है ? क्यों-कि प्राणमें ही सब भूत संगत होते हैं; सङ्गमन अर्थात् साम्यप्राप्तिके कारण प्राण साम है। सम्पूर्ण भूत उसके साथ संगत हो जाते हैं; केवल संगत ही नहीं होते, इसके श्रेष्ठभावके लिये भी समर्थ होते हैं। सामके सायुज्यको प्राप्त होता है—इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३ ॥ |

ब्राह्मण १३] शाङ्करभाष्यार्थ १२२१

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ब्राह्मण १३] शाङ्करभाष्यार्थ १२२१

क्षत्रदृष्टिसे प्राणोपासना

क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रं प्राणो हि वै क्षत्रं त्रायते हैनं प्राणः क्षणितोः प्र क्षत्रमत्रमाप्नोति क्षत्रस्य सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ४ ॥

प्राण क्षत्र है—इस प्रकार प्राणकी उपासना करे। प्राण ही क्षत्र है। प्राण ही क्षत्र है—यह प्रसिद्ध है। प्राण इस देहकी शस्त्रादिजनित क्षतसे रक्षा करता है। अत्रम्—अन्य किसोसे त्राण न पानेवाले क्षत्र (प्राण) को प्राप्त होता है। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह क्षत्रके सायुज्य और सलोकताको जीत लेता है ॥ ४ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तं प्राणं क्षत्रमित्युपासीत । प्राणो वै क्षत्रं प्रसिद्धमेतत् प्राणो हि वै क्षत्रम् । कथं प्रसिद्धता ? इत्याह—त्रायते पालयत्येनं पिण्डं देहं प्राणः क्षणितोः शस्त्रादिहिंसितात् पुनर्मांसेनापूरयति यस्मात् तस्मात् क्षतत्राणात् प्रसिद्धं क्षत्रत्वं प्राणस्य ।उस प्राणकी 'क्षत्र' इस प्रकार उपासना करे। प्राण ही क्षत्र है—यह प्रसिद्ध है कि प्राण ही क्षत्र है। यह प्रसिद्ध किस कारण है, सो श्रुति बतलाती है—इस पिण्ड यानी शरीरकी प्राण क्षतसे—शस्त्रादिकी पीडासे रक्षा करता है अर्थात् उसे पुनः मांससे भर देता है, अतः क्षतसे रक्षा करनेके कारण प्राणका क्षत्रत्व प्रसिद्ध है।
विद्वत्फलमाह—प्र क्षत्रमत्रं न त्रायतेऽन्येन केनचिदित्यत्रं क्षत्रं प्राणस्तमत्रं क्षत्रं प्राणं प्राप्नोतीत्यर्थः । शाखान्तरे वा पाठात् क्षत्रमात्रं प्राप्नोति प्राणोअब श्रुति उपासकको मिलनेवाला फल बतलाती है—प्र क्षत्रम् अत्रम्—जिसका किसी दूसरेसे त्राण नहीं किया जाता, वह प्राण 'अत्र-क्षत्र' है, उस अत्र क्षत्ररूप प्राणको प्राप्त होता है। शाखान्तर (माध्यन्दिनी शाखा) में २पाठान्तर होनेके कारण क्षत्रमात्रको प्राप्त होता है अर्थात् प्राण

१. त्राणहीन।
२. वहाँ 'प्र क्षत्रमत्रमाप्नोति' के स्थानमें 'प्र क्षत्रमात्रमाप्नोति' ऐसा पाठान्तर है।

१२२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

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१२२२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| भवतीत्यर्थः। क्षत्रस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ४ ॥ | हो जाता है—ऐसा अर्थ होगा। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह क्षत्रके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये त्रयोदशमुक्थब्राह्मणम् ॥ १३ ॥

चतुर्दश ब्राह्मण

गायत्र्युपासना

| ब्रह्मणे हृदयाद्यनेकोपाधिविशिष्टस्योपासनमुक्तम्। अथेदानीं गायत्र्युपाधिविशिष्टस्योपासनं वक्तव्यम्, इत्यारभ्यते। सर्वच्छन्दसां हि गायत्रीछन्दः प्रधानभूतम्, तत्प्रयोक्तृगयत्राणाद् गायत्रीति वक्ष्यति। न चान्येषां छन्दसां प्रयोक्तृप्राणत्राणसामर्थ्यम्; प्राणात्मभूता च सा सर्वच्छन्दसां चात्मा प्राणः। प्राणश्च क्षतत्राणात् क्षत्रमित्युक्तम्; प्राणश्च गायत्री; तस्मात् तदुपासनमेव विधित्स्यते। | हृदय आदि अनेक उपाधियोंसे विशिष्ट ब्रह्मकी उपासना बतलायी गयी। अब आगे गायत्रीरूप उपाधिसे विशिष्ट ब्रह्मकी उपासना बतलानी है; इसलिये प्रकरणका आरम्भ किया जाता है। सम्पूर्ण छन्दोंमें गायत्री छन्द ही प्रधानभूत है। उसका प्रयोग करनेवालेके गयका त्राण करनेके कारण यह गायत्री है—ऐसा श्रुति बतलावेगी। अन्य छन्दोंमें अपने प्रयोक्ताके प्राणोंकी रक्षा करनेका सामर्थ्य नहीं है। किंतु वह प्राणकी स्वरूपभूता है और प्राण सम्पूर्ण छन्दोंका आत्मा है। तथा क्षतसे त्राण करनेके कारण प्राण क्षत्र है—ऐसा ऊपर कहा जा चुका है। प्राण ही गायत्री है, इसलिये उसीकी उपासनाका विधान करना अभीष्ट है। |

ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२२३

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ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२२३


| द्विजोत्तमजन्महेतुत्वाच्च—<br>“गायत्र्या ब्राह्मणमसृजत त्रिष्टुभा राजन्यं जगत्या वैश्यम्” इति द्विजोत्तमस्य द्वितीयं जन्म गायत्रीनिमित्तम्। तस्मात् प्रधाना गायत्री। ‘ब्राह्मणा व्युत्थाय’ ‘ब्राह्मणा अभिवदन्ति’ ‘स ब्राह्मणो विपापो विरजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवति’ इत्युत्तमपुरुषार्थसम्बन्धं ब्राह्मणस्य दर्शयति। तच्च ब्राह्मणत्वं गायत्रीजन्ममूलमतो वक्तव्यं गायत्र्याः सततत्त्वम्। गायत्र्या हि यः सृष्टो द्विजोत्तमो निरङ्कुश एवोत्तमपुरुषार्थसाधनेऽधिक्रियते, अतस्तन्मूलः परमपुरुषार्थसम्बन्धः। तस्मात्तदुपासनविधानायाह— | इसके सिवा ब्राह्मणोंके जन्मका हेतु होनेसे भी [इसका विधान किया जाता है]। “गायत्रीसे ब्राह्मणकी रचना की, त्रिष्टुप् से क्षत्रियकी और जगतीसे वैश्यकी” इस श्रुतिके अनुसार द्विजोत्तमका द्वितीय जन्म गायत्रीके कारण है। इसलिये गायत्री प्रधान है। ‘ब्राह्मण व्युत्थान करके [भिक्षाचर्या करते हैं]’, ‘ब्राह्मण अभिवादन करते हैं’, ‘वह ब्राह्मण निष्पाप, निर्दोष और निःशङ्क ब्राह्मण होता है’ इत्यादि श्रुतियाँ ब्राह्मणका उत्तम पुरुषार्थसे सम्बन्ध प्रदर्शित करती हैं। और वह ब्राह्मणत्व गायत्रीजन्ममूलक है; इसलिये गायत्रीका तत्त्व बतलाना आवश्यक है। जो गायत्रीद्वारा रचा हुआ निरङ्कुश द्विजश्रेष्ठ है, उसीका उत्तम पुरुषार्थसाधनमें अधिकार है। अतः परमपुरुषार्थका सम्बन्ध गायत्रीमूलक है। इसलिये उसकी उपासनाका विधान करनेके लिये श्रुति कहती है— |

गायत्रीके प्रथम लोकरूप पादकी उपासना

भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरँ ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदेषु त्रिषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥१॥

१२२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५]

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१२२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५]


भूमि, अन्तरिक्ष और द्यौ—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (प्रथम) पाद है। यह (भूमि आदि) ही इस गायत्रीका प्रथम पाद है। इस प्रकार इसके इस पदको जो जानता है, वह इस त्रिलोकीमें जितना कुछ है, उस सबको जीत लेता है॥ १॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्येतान्यष्टावक्षराणि, अष्टाक्षरमष्टावक्षराणि यस्य तदिदमष्टाक्षरम्; ह वै प्रसिद्धावद्योतकौ, एकं प्रथमं गायत्र्यै गायत्र्याः पदम्, यकारेणैवाष्टत्वपूरणम्, एतदु हैवैकदे-वास्या गायत्र्याः पदं पादः प्रथमो भूम्यादिलक्षणस्त्रैलोक्यात्मा; अष्टाक्षरत्वसामान्यात्।<br><br>एवमेतत् त्रैलोक्यात्मकं गायत्र्याः प्रथमं पदं यो वेद तस्यैतत् फलम्—स विद्वान् यावत् किञ्चिदेषु त्रिषु लोकेषु जेतव्यं तावत् सर्वं ह जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १ ॥भूमि, अन्तरिक्ष, द्यौः—इस प्रकार ये आठ अक्षर हैं। गायत्री का एक अर्थात् प्रथम पाद अष्टाक्षर—जिसमें आठ अक्षर हों, ऐसा यह अष्टाक्षर है। ह और वै—ये प्रसिद्धि-के सूचक निपात हैं। 'द्यौः' इसके यकारसे ही आठ संख्याकी पूर्ति होती है; यही इस गायत्रीका भूमि आदि लक्षणोंवाला त्रिलोकरूप प्रथम पाद है, क्योंकि आठ अक्षर होनेमें इनकी समानता है।<br><br>इस प्रकार गायत्रीके इस त्रैलोक्यात्मक प्रथम पादको जो जानता है, उसे यह फल प्राप्त होता है। वह उपासक, जो इस प्रकार इसके इस पादको जानता है, इस त्रिलोकीमें जो कुछ जय करने योग्य है, उस सभीको जीत लेता है ॥१॥

गायत्रीके द्वितीय त्रयीरूप पादकी उपासना

तथा—इसी प्रकार—

ऋचो यजूंषि सामानीत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरँ ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावतीयं त्रयी विद्या तावच्छ जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ २ ॥

ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२२५

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ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२२५


‘ऋचः, यजूंषि, सामानि’ ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (द्वितीय) पाद है। यह (ऋक् आदि) ही इस गायत्रीका द्वितीय पाद है। जो इस प्रकार इसके इस पादको जानता है, वह जितनी यह त्रयीविद्या है [अर्थात् त्रयीविद्याका जितना फल है] उस सभीको जीत लेता है ॥ २ ॥

| ऋचो यजूंषि सामानीति त्रयीविद्यानामक्षराणि, एतान्यप्यष्टावेव; तथैवाष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदं द्वितीयम् एतदु हैवास्या एतद् ऋग्यजुःसामलक्षणमष्टाक्षरत्वसामान्यादेव । स यावतीयं त्रयीविद्या त्रय्या विद्यया यावत् फलजातमाप्यते तावद्ध जयति योऽस्या एतद् गायत्र्यास्त्रैविद्यलक्षणं पदं वेद ॥ २ ॥ | ‘ऋचः, यजूंषि, सामानि’ ये त्रयीविद्याके अक्षर हैं। ये भी आठ ही हैं; इसी प्रकार गायत्रीका एक अर्थात् द्वितीय पद भी आठ अक्षरोंवाला है। अष्टाक्षरत्वमें समानता होनेके कारण ही यह ऋग्यजुःसामरूप गायत्रीका द्वितीय पाद है। जो इस गायत्रीके इस त्रैविद्य (तीनों वेद) रूप पदको जानता है, वह जितनी यह त्रयीविद्या है अर्थात् त्रयीविद्यासे जितना फल प्राप्त किया जाता है, वह सब जीत लेता है ॥ २ ॥ |


गायत्रीके तृतीय प्राणादिपाद और तुरीय दर्शत परोरजापादकी उपासना

तथा—तथा—

प्राणोऽपानो व्यान इत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरँ ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदिदं प्राणि तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेदाथास्य एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति यद् वै चतुर्थं तत् तुरीयं दर्शतं पदमिति ददृश इव ह्येष परोरजा इति

१२२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

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१२२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

सर्वमु ह्येवैष रज उपर्युपरि तपत्येवँहैव श्रिया यशसा तपति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ३ ॥

प्राण, अपान, व्यान—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (तृतीय) पाद है। यह प्राणादि ही इस गायत्रीका 'तृतीय' पाद है। जो गायत्रीके इस पदको इस प्रकार जानता है, वह जितना यह प्राणिसमुदाय है, सबको जीत लेता है। और यह जो तपता (प्रकाशित होता) है वही इसका तुरीय, दर्शत एवं परोरजा पद है। जो चतुर्थ होता है, वही 'तुरीय' कहलाता है। 'दर्शतं पदम्' इसका अर्थ है—मानों [ यह आदित्यमण्डलस्थ पुरुष ] दीखता है, 'परोरजाः' इसका अर्थ है—यह सभी रज [ यानी लोकों ] के ऊपर-ऊपर रहकर प्रकाशित होता है। जो गायत्रीके इस चतुर्थ पदको इस प्रकार जानता है, वह इसी प्रकार शोभा और कीर्तिसे प्रकाशित होता है ॥ ३ ॥

| प्राणोऽपानो व्यान एतान्यपि प्राणाद्यभिधानाक्षराण्यष्टौ। तच्च गायत्र्यास्तृतीयं पदं यावदिदं प्राणिजातं तावद्व जयति योऽस्या एतदेवं गायत्र्यास्तृतीयं पदं वेद। | प्राण, अपान, व्यान—ये प्राणादिके नाम भी आठ ही अक्षर हैं। यह गायत्रीका तृतीय पाद है। जो इस प्रकार गायत्रीके इस तृतीय पदको जानता है, वह यह जितना प्राणिसमूह है, उस सभीको जीत लेता है। | | अथानन्तरं गायत्र्यास्त्रिपदायाः शब्दात्मिकायास्तुरीयं पदमुच्यतेऽभिधेयभूतमस्याः प्रकृताया गायत्र्या एतदेव वक्ष्यमाणं तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति तुरीयमित्यादिवाक्यपदार्थं स्वयमेव व्याचष्टे श्रुतिः— | अब आगे शब्दात्मिका त्रिपदा गायत्रीका अभिधेयभूत चतुर्थ पद बतलाया जाता है। यह जो तपता है, वही इस प्रकृत गायत्रीका आगे बतलाया जानेवाला तुरीय दर्शत परोरजा पद है। 'तुरीयम्' इत्यादि वाक्यके पदोंके अर्थकी श्रुति स्वयं ही व्याख्या करती है। |

| ब्राह्मण १४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२२७ |

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ब्राह्मण १४ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२२७
संस्कृतहिन्दी
यद् वै चतुर्थं प्रसिद्धं लोके तदिदं तुरीयशब्देनाभिधीयते । दर्शतं पदमित्यस्य कोऽर्थः ? इत्युच्यते—ददृश इव दृश्यत इव ह्येष मण्डलान्तर्गतः पुरुषोऽतो दर्शतं पदमुच्यते । परोरजा इत्यस्य पदस्य कोऽर्थः ? इत्युच्यते—सर्वं समस्तमुह्येवैष मण्डलस्थः पुरुषो रजो रजोजातं समस्तं लोकमित्यर्थः, उपर्युपर्याधिपत्यभावेन सर्वं लोकं रजोजातं तपति । उपर्युपरीति वीप्सा सर्वलोकाधिपत्यख्यापनार्था ।<br><br>ननु सर्वशब्देनैव सिद्धत्वाद् वीप्सानर्थिका ।<br><br>नैष दोषः; येषामुपरिष्टात् सविता दृश्यते तद्विषय एव सर्वशब्दः स्यादित्याशङ्कानिवृत्त्यर्था वीप्सा । “ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां च” (छा० उ० १ । ६ । ८) इति श्रुत्यन्तरात् । तस्मात् सर्वावरोधार्था वीप्सा ।लोकमें जो चतुर्थ प्रसिद्ध है, वही यह 'तुरीय' शब्दसे कहा गया है । 'दर्शतं पदम्' इसका क्या अर्थ है, सो बतलाया जाता है—यह मण्डलान्तर्गत पुरुष 'ददृश इव' अर्थात् दीखता-सा है, इसलिये यह 'दर्शत पद' कहा जाता है । 'परोरजाः' इस पदका क्या अर्थ है ? सो बतलाते हैं—यह मण्डलस्थ पुरुष समस्त रजः-रजःसमूह अर्थात् सारे ही लोकको ऊपर-ऊपर आधिपत्य-भावसे सम्पूर्ण लोकरूप रजःसमूहको प्रकाशित करता है । 'उपरि-उपरि' यह द्विरुक्ति उसका समस्त लोकपर आधिपत्य प्रकट करनेके लिये है ।<br><br>**आक्षेप—**किंतु आधिपत्य तो 'सर्व' शब्दसे ही सिद्ध हो जाता है--ऐसी स्थितिमें द्विरुक्ति तो व्यर्थ ही है ।<br><br>**उत्तर—**यह दोष नहीं है, क्योंकि जिनके ऊपर सूर्य दिखायी देता है, सर्वशब्द तो उन्हींके विषयमें होगा--इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये द्विरुक्ति की गयी है । यह बात “जो कि इससे ऊपरके लोक हैं, यह आदित्यमण्डलस्थ पुरुष उनका और देवताओंके अभीष्ट फलोंका भी स्वामी है” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होती है । अतः सभी लोकोंका अवरोध करनेके लिये यह द्विरुक्ति है ।

१२२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

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१२२८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| यथासौ सविता सर्वाधिपत्य-<br>लक्षणया श्रिया यशसा च ख्या-<br>त्या तप्त्येवं हैव श्रिया यशसा<br>च तपति योऽस्या एतदेवं<br>तुरीयं दर्शतं पदं वेद ॥ ३ ॥ | जो गायत्रीके इस चतुर्थ दर्शत पदको इस प्रकार जानता है, वह इसी प्रकार श्री और कीर्तिसे प्रकाशित होता है जैसे कि यह आदित्य सर्वाधिपत्यरूपा श्री और कीर्तिसे तप रहा है ॥ ३ ॥ |


गायत्रीकी परम प्रतिष्ठा प्राण हैं, ‘गायत्री’ शब्दका निर्वचन और वटुको किये गये गायत्र्युपदेशका फल

सैषा गायत्र्येतस्मिँस्तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता तद् वै तत् सत्ये प्रतिष्ठितं चक्षुर्वै सत्यं चक्षुर्हि वै सत्यं तस्माद् यदिदानीं द्वौ विवदमानावियातामहमदर्शमहमश्रौषमिति य एवं ब्रूयादहमदर्शमिति तस्मा एव श्रद्दध्याम तद् वै तत् सत्यं बले प्रतिष्ठितं प्राणो वै बलं तत् प्राणे प्रतिष्ठितं तस्मादाहुर्बलँ सत्यादोगीय इत्येवंवैषा गायत्र्यध्यात्मं प्रतिष्ठिता सा हैषा गयाँस्तत्रे प्राणा वै गयास्तत्प्राणाँस्तत्रे तद् यद् गयाँस्तत्रे तस्माद् गायत्री नाम स यामेवामूँ सावित्रीमन्वाहैवैष सा स यस्मा अन्वाह तस्य प्राणाँस्त्रायते ॥ ४ ॥

वह यह गायत्री इस चतुर्थ दर्शत परोरजा पदमें प्रतिष्ठित है। वह पद सत्यमें प्रतिष्ठित है। चक्षु ही सत्य है, चक्षु ही सत्य है—यह प्रसिद्ध है। इसीसे यदि दो पुरुष 'मैंने देखा है' 'मैंने सुना है' इस प्रकार विवाद करते हुए आवें, तो उनमेंसे जो यह कहता होगा कि 'मैंने देखा है' उसीका हमें

ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १२२९

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ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १२२९


विश्वास होगा। वह तुरीय पादका आश्रयभूत सत्य बलमें प्रतिष्ठित है। प्राण ही बल है, वह सत्य प्राणमें प्रतिष्ठित है। इसीसे कहते हैं कि सत्यकी अपेक्षा बल ओजस्वी है। इस प्रकार यह गायत्री अध्यात्म प्राणमें प्रतिष्ठित है। उस इस गायत्रीने गयोंका त्राण किया था। प्राण ही गय हैं, उन प्राणोंका इसने त्राण किया। इसने गयोंका त्राण किया था, इसीसे इसका 'गायत्री' नाम हुआ। आचार्यने आठ वर्षके वटुके प्रति उपनयनके समय जिस सावित्रीका उपदेश किया था, वह यही है। वह जिस-जिस वटुको इसका उपदेश करता है, यह उसके-उसके प्राणोंकी रक्षा करती है ॥ ४ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
सैषा त्रिपदोक्ता या त्रैलोक्य-त्रैविद्यप्राणलक्षणा गायत्र्येतस्मिंश्चतुर्थे तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता, मूर्त्तामूर्त्तरसत्वादादित्यस्य; रसापाये हि वस्तु नीरसमप्रतिष्ठितं भवति; यथा काष्ठादि दग्धसारं तद्वत्। तथा मूर्त्तामूर्त्तात्मकं जगत् त्रिपदा गायत्र्यादित्ये प्रतिष्ठिता तद्रसत्वात् सह त्रिभिः पादैः।पूर्वोक्त तीन पदोंवाली वह यह त्रैलोक्य, त्रैविद्य और प्राणरूपा गायत्री इस चतुर्थ तुरीय दर्शत परोरजा पदमें प्रतिष्ठित है। [ यह मूर्तामूर्तरूप गायत्री चतुर्थ पदरूप आदित्यमें प्रतिष्ठित है ] क्योंकि आदित्य मूर्तामूर्तरसस्वरूप है। रस न रहनेपर तो वस्तु नीरस और अप्रतिष्ठित हो जाती है; जिस प्रकार जिसका सार दग्ध हो गया है, वह काष्ठादि नीरस हो जाता है, उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिये। इस प्रकार मूर्तामूर्तात्मक जगद्रूपा त्रिपदा गायत्री तीनों पादोंके सहित आदित्यमें प्रतिष्ठित है; क्योंकि आदित्य उस ( जगत् ) का सार है।
तद् वै तुरीयं पदं सत्ये प्रतिष्ठितम्। किं पुनस्तत् सत्यम् ? इत्युच्यते—चक्षुर्वै सत्यम्। कथंवह तुरीय पद सत्यमें प्रतिष्ठित है। वह सत्य क्या है ? सो बतलाया जाता है—चक्षु ही सत्य है। किस

| १२३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |

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| १२३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ | | :--- | :--- |

| चक्षुः सत्यमित्याह—प्रसिद्धमेतच्चक्षुर्हि वै सत्यम्। कथं प्रसिद्धता ? इत्याह—तस्मात् यद् यदीदानीमेव द्वौ विवदमानौ विरुद्धं वदमानावियातामागच्छेयातामहमदर्शं दृष्टवानस्मीत्यन्य आहाहमश्रौषं त्वया दृष्टं न तथा तद्वस्त्विति तयोर्य एवं ब्रूयादहमद्राक्षमिति तस्मै एव श्रद्दध्याम न पुनर्यो यादहमश्रौषमिति। श्रोतुर्मृषा श्रवणमपि संभवति न तु चक्षुषो मृषा दर्शनम्; तस्मान्नाश्रौषमित्युक्तवते श्रद्दध्याम। तस्मात् सत्यप्रतिपत्तिहेतुत्वात् सत्यं चक्षुस्तस्मिन् सत्ये चक्षुषि सह त्रिभिरितरैः पादैस्तुरीयं पदं प्रतिष्ठितमित्यर्थः। उक्तं च "स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति चक्षुषीति" (३।९।२०)। | प्रकार चक्षु सत्य है? सो श्रुति बतलाती है। यह बात प्रसिद्ध है कि चक्षु ही सत्य है। ऐसी प्रसिद्धि क्यों है? सो श्रुति बतलाती है— इसलिये, यदि इसी समय दो विवाद करनेवाले—परस्परविरुद्ध बोलनेवाले आवें; उनमेंसे एक कहता हो, कि 'मैंने ऐसा देखा है' और दूसरा कहे कि 'मैंने सुना है, तूने जैसी देखी है, वह वस्तु वैसी नहीं है' तो उनमेंसे जो यह कहेगा कि 'मैंने उसे देखा है' हम उसीका विश्वास करेंगे, जो ऐसा कहता है कि 'मैंने सुना है' उसका नहीं। सुननेवालेका श्रवण तो मिथ्या भी हो सकता है, किंतु नेत्रोंको मिथ्या दर्शन नहीं हो सकता। इसलिये जो कहता है कि 'मैंने सुना है' उसमें हमारा विश्वास नहीं होता। अतः सत्यज्ञानका हेतु होनेके कारण चक्षु सत्य है। उस सत्यरूप चक्षुमें अन्य तीन पादोंके सहित तुरीय पद प्रतिष्ठित है—ऐसा इसका तात्पर्य है। कहा भी है—"वह आदित्य किसमें प्रतिष्ठित है? चक्षुमें"। | | तद् वै तुरीयपदाश्रयं सत्यं बले प्रतिष्ठितम्। किं पुनस्तद्बलम् ? | वह तुरीय पदका आश्रयभूत सत्य बलमें प्रतिष्ठित है। वह बल क्या |