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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

५८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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५८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २


| सर्वाणि च भूतान्यस्य कार्यम्; अतोऽस्य एककारणपूर्वकता। यस्मादेकस्मात्कारणादेतज्जातं तदेवैकं परमार्थतो ब्रह्म, इतरत्कार्यं वाचारम्भणं विकारो नामधेयमात्रमित्येष मधुपर्यायाणां सर्वेषामर्थः सङ्क्षेपतः। <br><br> अयमेव स योऽयं प्रतिज्ञातः "इदं सर्वं यदयमात्मा" (२। ४। ६) इति इदममृतम्; यन्मैत्रेय्या अमृतत्वसाधनमुक्तम्, आत्मविज्ञानमिदं तदमृतम्। इदं ब्रह्म, यत् 'ब्रह्म ते ब्रवाणि, ज्ञपयिष्यामि' इत्यध्यायादौ प्रकृतं यद्विषया च विद्या ब्रह्मविद्येत्युच्यते। इदं सर्वं यस्माद्ब्रह्मणो विज्ञानात्सर्वं भवति ॥ १ ॥ | हैं और समस्त भूत इन चारोंके कार्य हैं; अतः इस जगत्‌की एक कारणपूर्वकता है। जिस एक कारणसे यह उत्पन्न हुआ वही एक तत्त्व परमार्थतः ब्रह्म है, उससे भिन्न उसका कार्य वाणीसे आरम्भ होनेवाला विकार नाममात्र है-इस प्रकार मधुके पर्यायोंका यह संक्षेपतः अर्थ है। <br><br> यही वह है जिसके विषयमें यह प्रतिज्ञा की गयी है कि "यह जो कुछ है सब आत्मा है।" यह अमृत है। मैत्रेयीको जो अमृतत्वका साधन बतलाया गया था वह यह आत्म-विज्ञान अमृत है। यह ब्रह्म है, जिसका 'मैं तुझे ब्रह्मका उपदेश करूँगा; ब्रह्मका ज्ञान कराऊँगा' इस प्रकार इस अध्यायके आरम्भमें प्रकरण है तथा जिससे सम्बन्ध रखनेवाली विद्या ब्रह्मविद्या इस नामसे कही जाती है। यह सर्व है, क्योंकि ब्रह्मका ज्ञान होनेसे सर्वरूप हो जाता है ॥ १ ॥ |


इमा आपः सर्वेषां भूतानां मध्वासामपा ँ सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमास्वप्सु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८५

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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८५


यश्चायमध्यात्मꣳ रैतसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदꣳ सर्वम् ॥ २ ॥

ये जल समस्त भूतोंके मधु हैं और समस्त भूत इन जलोंके मधु हैं। इन जलोंमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म रैतस तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ २ ॥

| तथा आपः। अध्यात्मं रैतस्यपां विशेषतोऽवस्थानम् ॥ २ ॥ | इसी प्रकार जल मधु है। अध्यात्म (शरीरके अन्तर्गत) रेतस् में जलकी विशेषरूपसे स्थिति है ॥ २ ॥ |


अयर्माग्नः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याग्नेः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं वाङ्मयस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो- ऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदꣳ सर्वम् ॥ ३ ॥

यह अग्नि समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस अग्निके मधु हैं। इस अग्निमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म वाङ्मय तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ३ ॥

| तथा अग्निः। वाचि अग्नेर्वि-शेषतोऽवस्थानम् ॥ ३ ॥ | इसी प्रकार अग्नि मधु है। वाणीमें अग्निकी विशेषरूपसे स्थिति है ॥ ३ ॥ |


अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य वायोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्वायौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो

५८६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २

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५८६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २

यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ४ ॥

यह वायु समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस वायुके मधु हैं। इस वायुमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म-प्राणरूप तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ४ ॥

| तथा वायुः । अध्यात्मं प्राणः। भूतानां शरीरारम्भकत्वेनोपकारान्मधुत्वम् । तदन्तर्गतानां तेजोमयादीनां करणत्वेनोपकारान्मधुत्वम् । तथा चोक्तम् "तस्यै वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतीरूपमयमग्निः" (१।५।११) इति ॥ ४ ॥ | इसी प्रकार वायु मधु है। अध्यात्ममधु प्राण है। प्राणियोंके शरीरोंके आरम्भकरूपसे उनका उपकारक होनेके कारण यह मधु है । उसके अन्तर्गत जो तेजोमयादि हैं, उनका मधुत्व उसके करणरूपसे उपकारक होनेके कारण है। ऐसा ही कहा भी है—"उस वाणीका पृथिवी शरीर है और यह अग्नि तेजोरूप है" ॥ ४ ॥ |


अयमादित्यः सर्वेषां भूतानां मध्वस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नादित्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं चाक्षुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ५ ॥

यह आदित्य समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आदित्यके मधु हैं। यह जो इस आदित्यमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म चाक्षुष तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८७

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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८७


आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ५ ॥

तथा आदित्यो मधु । चाक्षुषोऽध्यात्मम् ॥ ५ ॥इसी प्रकार आदित्य मधु है । चाक्षुष पुरुष अध्यात्ममधु है ॥ ५ ॥

इमा दिशः सर्वेषां भूतानां मध्वासामं दिशाँ सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमासु दिक्षु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मँ श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ६ ॥

ये दिशाएँ समस्त भूतोंका मधु हैं तथा समस्त भूत इन दिशाओंके मधु हैं । यह जो इन दिशाओंमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म श्रोत्रसम्बन्धी प्रातिश्रुत्क तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ६ ॥

तथा दिशो मधु । दिशां यद्यपि श्रोत्रमध्यात्मम्, शब्दप्रति- <br><br> श्रवणवेलायां तु विशेषतः संनि- <br><br> हितो भवतीत्यध्यात्मं प्रातिश्रुत्कः- <br><br> प्रतिश्रुत्कायां प्रतिश्रवणवेलायां <br><br> भवः प्रातिश्रुत्कः ॥ ६ ॥इसी प्रकार दिशाएँ मधु हैं । यद्यपि श्रोत्र दिशाओंका अध्यात्म परिणाम है तो भी शब्दश्रवणके समय श्रोत्रपुरुष विशेषतः श्रोत्रोंके समीप रहता है, इसलिये वह अध्यात्म प्रातिश्रुत्क है । जो प्रतिश्रुत्कमें अर्थात् प्रत्येक श्रवणवेलामें रहता है, उसे प्रातिश्रुत्क कहते हैं ॥ ६ ॥

५८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

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५८८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

अयं चन्द्रः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य चन्द्रस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिँश्चन्द्रे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ७ ॥

यह चन्द्रमा समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस चन्द्रमाके मधु हैं। यह जो इस चन्द्रमामें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म मनःसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ७ ॥

तथा चन्द्रः । अध्यात्मं मानसः ॥ ७ ॥इसी प्रकार चन्द्रमा मधु है। यहाँ अध्यात्म मानस पुरुष है ॥ ७ ॥

इयं विद्युत्सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै विद्युतंः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां विद्युति तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं तैजसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ८ ॥

यह विद्युत् समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस विद्युत्‌के मधु हैं। यह जो इस विद्युत्‌में तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म तैजस तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ] यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ८ ॥

तथा विद्युत् । त्वक्तेजसि भवस्तैजसोऽध्यात्मम् ॥ ८ ॥इसी प्रकार विद्युत् मधु है। त्वचाके तेजमें रहनेवाला तैजस पुरुष अध्यात्म है ॥ ८ ॥

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५८९

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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५८९


अयꣳ स्तनयित्नुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य स्तनयित्नोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् स्तनयित्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मꣳ शाब्दः सौवरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदꣳ सर्वम् ॥ ९ ॥

यह मेघ समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस मेघके मधु हैं। यह जो इस मेघमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म शब्द एवं स्वरसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ९ ॥

| तथा स्तनयित्नुः शब्दे भवः शाब्दोऽध्यात्मं यद्यपि, तथापि स्वरे विशेषतो भवतीति सौवरोऽध्यात्मम् ॥ ९ ॥ | इसी प्रकार मेघ मधु है। शब्दमें रहनेवालेको शाब्द कहते हैं; वह यद्यपि अध्यात्म है, तथापि विशेषरूपसे स्वरमें रहता है, इसलिये सौवर ( स्वरसम्बन्धी ) पुरुष अध्यात्म है ॥ ९ ॥ |


अयमाकाशः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याकाशस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मꣳ हृद्याकाशस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदꣳ सर्वम् ॥ १० ॥

यह आकाश समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आकाशके मधु हैं। यह जो इस आकाशमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म हृदयाकाशरूप तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ १० ॥

५९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

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५९०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| तथा आकाशः । अध्यात्मं हृदयाकाशः ॥ १० ॥ | इसी प्रकार आकाश मधु है। अध्यात्मपुरुष हृदयाकाश है ॥ १० ॥ |

| आकाशान्ताः पृथिव्यादयो भूतगणा देवतागणाश्च कार्यकारणसङ्घातात्मान उपकुर्वन्तो मधु भवन्ति प्रति शरीरिणमित्युक्तम् । येन ते प्रयुक्ताः शरीरिभिः सम्बध्यमाना मधुत्वेनोपकुर्वन्ति तद्वक्तव्यमितीदमारभ्यते— | पृथिवीसे लेकर आकाशपर्यन्त भूतगण और देहेन्द्रियसङ्घातरूप देवगण उपकार करनेके कारण प्रत्येक देहधारीके लिये मधु होते हैं—ऐसा कहा गया। अब जिसके द्वारा प्रेरित होते हुए वे देहधारियोंसे सम्बद्ध होकर मधुरूपसे उनका उपकार करते हैं, उसका वर्णन करना है, इसलिये यह आरम्भ किया जाता है— |

अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य धर्मस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् धर्मेतेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धार्मस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ११ ॥

यह धर्म समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस धर्मके मधु हैं। इस धर्ममें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म-धर्मसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ११ ॥

| अयं धर्मः—‘अयम्’ इत्यप्रत्यक्षोऽपि धर्मः कार्येण तत्प्रयुक्तेन प्रत्यक्षेण व्यपदिश्यते—अयं धर्म | यह धर्म मधु है। ‘अयम्’ (यह) इस पदका प्रयोग प्रत्यक्ष वस्तुके लिये होता है, यद्यपि धर्म प्रत्यक्ष नहीं है, तो भी उससे होनेवाले प्रत्यक्ष कार्यके कारण ‘अयं धर्मः’ इस प्रकार प्रत्यक्षवत् व्यव- |

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ५९१

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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ५९१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
इति प्रत्यक्षवत् । धर्मश्च व्याख्यातः श्रुतिस्मृतिलक्षणः, क्षत्रादीनामपि नियन्ता, जगतो वैचित्र्यकृत् पृथिव्यादीनां परिणामहेतुत्वात्, प्राणिभिरनुष्ठीयमानरूपश्च । तेन च 'अयं धर्मः' इति प्रत्यक्षेण व्यपदेशः ।हार किया जाता है। श्रुति-स्मृतिरूप धर्मकी व्याख्या तो की ही जा चुकी है, वह क्षत्रियादिका नियन्ता है, पृथिवी आदिके परिणामका हेतु होनेसे जगत्की विचित्रता करनेवाला है और प्राणियोंद्वारा पालन किया जाना ही इसका स्वरूप है। इस कारण भी 'यह धर्म' इस प्रकार प्रत्यक्षरूपसे उसका उल्लेख किया गया है।
सत्यधर्मयोश्चाभेदेन निर्देशः कृतः शास्त्राचारलक्षणयोः, इह तु भेदेन व्यपदेश एकत्वे सत्यपि, दृष्टादृष्टभेदरूपेण कार्यारम्भकत्वात् । यस्त्वदृष्टोऽपूर्वाख्यो धर्मः, स सामान्यविशेषात्मना अदृष्टेन रूपेण कार्यमारभते, सामान्यरूपेण पृथिव्यादीनां प्रयोक्ता भवति, विशेषरूपेण चाध्यात्मं कार्यकारणसङ्घातस्य । तत्र पृथिव्यादीनां प्रयोक्तरि यश्चायमस्मिन् धर्मे तेजोमयः, तथाध्यात्मं कार्यकारणसङ्घातकर्तरि। धर्मे भवो धार्मः।११।शास्त्र और आचाररूप सत्य और धर्मका अभेदरूपसे निर्देश किया गया है; किंतु एकत्व होनेपर भी यहां उसका भेदरूपसे व्यवहार किया गया है, क्योंकि दृष्ट और अदृष्टरूपसे वह कार्यका आरम्भक है। उनमें जो अपूर्वसंज्ञक अदृष्ट धर्म है, वह अपने सामान्य और विशेषात्मक अदृष्टरूपसे कार्यका आरम्भ करता है; वह सामान्यरूपसे पृथिवी आदिका प्रेरक होता है और विशेषरूपसे अध्यात्म देहेन्द्रियसंघातका। उनमेंसे पृथिवी आदिके प्रेरकके लिये 'यश्चायमस्मिन् धर्मे तेजोमयः' यह वाक्य है और 'अध्यात्मम्' इत्यादि वाक्य देहेन्द्रियसंघातके कर्ताके लिये है। जो धर्ममें रहता है, उसे 'धार्म' कहते हैं ॥ ११ ॥

५९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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५९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २


इदँ सत्यँ सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सत्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् सत्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मँ सात्यस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ १२ ॥

यह सत्य समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस सत्यके मधु हैं। यह जो इस सत्यमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म सत्यसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ १२ ॥

तथा दृष्टेनानुष्ठीयमानेन आचाररूपेण सत्याख्यो भवति स एव धर्मः। सोऽपि द्विप्रकार एव सामान्यविशेषात्मरूपेण। सामान्यरूपः पृथिव्यादिसमवेतः, विशेषरूपः कार्यकारणसङ्घातसमवेतः। तत्र पृथिव्यादिसमवेते वर्तमानक्रियारूपे सत्ये, तथाध्यात्मं कार्यकारणसङ्घातसमवेते सत्ये भवः सात्यः—"सत्येन वायुरावाति" (महाना० २२।१) इति श्रुत्यन्तरात् ॥ १२ ॥इसी प्रकार वही धर्म दृष्ट-अनुष्ठीयमान यानी आचाररूपसे सत्य संज्ञावाला होता है। वह भी सामान्य और विशेषरूपसे दो प्रकारका ही है। सामान्यरूप पृथिवी आदिसे सम्बन्ध रखनेवाला है और विशेषरूप देहेन्द्रियसंधातसे सम्बद्ध है। तहाँ पृथिवी आदिसे सम्बद्ध वर्तमान क्रियारूप सत्यमें तथा अध्यात्म यानी देहेन्द्रियसंधातसे सम्बद्ध सत्यमें जो होनेवाला है, उसे सात्य कहते हैं; यह बात "सत्यसे वायु चलता है" इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होती है ॥ १२ ॥
धर्मसत्याभ्यां प्रयुक्तोऽयं कार्यकारणसङ्घातविशेषः, स येन जातिविशेषेण संयुक्तो भवति, सयह देहेन्द्रियसंधातविशेष धर्म और सत्यद्वारा प्रेरित है, यह जिस जातिविशेषसे संयुक्त होता है, वह

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९३

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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९३


जातिविशेषो मानुषादिः। तत्र मानुषादिजातिविशिष्टा एव सर्वे प्राणिनिकायाः परस्परोपकार्योपकारकभावेन वर्तमाना दृश्यन्ते। अतः—जातिविशेष मनुष्य आदि है। तहाँ सम्पूर्ण जीवसमुदाय मनुष्यादि जातिविशिष्ट होकर ही परस्पर उपकार्योपकारकभावसे विद्यमान दिखायी देते हैं। अतः—

इदं मानुषँ सर्व्वेषां भूतानां मध्वस्य मानुषस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् मानुषे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्व्वम् ॥ १३ ॥

यह मनुष्यजाति समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस मनुष्यजातिके मधु हैं। यह जो इस मनुष्यजातिमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म मानुष तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [इस श्रुतिद्वारा बतलाया गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ १३ ॥

मानुषादिजातिरपि सर्वेषां भूतानां मधु। तत्र मानुषादिजातिरपि बाह्या आध्यात्मिकी चेत्युभयथा निर्देशभाग्भवति। १३।मनुष्यादि जाति भी समस्त भूतोंका मधु है। वह मनुष्यजाति भी बाह्य और आध्यात्मिक भेदसे दो तरहके निर्देशवाली है ॥ १३ ॥

यस्तु कार्यकारणसङ्घातो मानुषादिजातिविशिष्टः सः—जो भी मनुष्यादि जातिविशिष्ट देहेन्द्रियसंधात है वह—

अयमात्मा सर्वेषां भूतानां मध्वस्यात्मनः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः

बृ० उ० ३८—

५९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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५९४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

पुरुषो यश्चायमात्मा तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव
स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ १४ ॥

यह आत्मा(देह) समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आत्माके मधु हैं। यह जो इस आत्मामें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह आत्मा तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [इस वाक्यसे कहा गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ १४ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अयमात्मा सर्वेषां भूतानां मधु।यह आत्मा (देह) समस्त भूतोंका मधु है।
नन्वयं शारीरशब्देन निर्दिष्टः पृथिवीपर्याय एव ।**शङ्का—**किंतु यह तो 'शारीर' शब्दसे बतलाया हुआ पृथिवीका पर्याय ही है।^१
न; पार्थिवांशस्यैव तत्र ग्रहणात्। इह तु सर्वात्मा प्रत्यस्तमिताध्यात्मधिभूताधिदैवादिसर्वविशेषः सर्वभूतदेवतागणविशिष्टः कार्यकरणसङ्घातः सः 'अयमात्मा' इत्युच्यते । तस्मिन्नस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽमूर्तरसः सर्वात्मको निर्दिश्यते ।<br><br>एकदेशेन तु पृथिव्यादिषु निर्दिष्टः, अत्राध्यात्मविशेषाभावात् स न निर्दिश्यते ।**समाधान—**नहीं, क्योंकि वहाँ तो केवल पार्थिव अंशका ही ग्रहण किया गया है; किंतु यहाँ जो सर्वात्मा है, जिसमें अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवादि सब प्रकारके विशेषका अभाव है, जो समस्त भूत और देवगणसे विशिष्ट है तथा भूत और इन्द्रियोंका संघात है, वही यहाँ 'यह आत्मा' ऐसा कहा गया है। उस इस आत्मामें तेजोमय अमृतमय पुरुष सर्वात्मक अमूर्तरस ही बताया गया है। पृथिवी आदिमें तो अध्यात्मपुरुषका एकदेशरूपसे निर्देश किया है, किंतु यहाँ कोई अध्यात्मविशेष न होनेके कारण उसका निर्देश नहीं

१. अतः इसका पुनः उल्लेख करनेसे पुनरुक्ति दोष आता है !

ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५९५

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ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ५९५

| यस्तु परिशिष्टो विज्ञानमयः—<br><br>यदर्थोऽयं देहलिङ्गसङ्घात आत्मा—<br><br>सः ‘यश्चायमात्मा’ इत्युच्यते ॥ १४ ॥ | किया गया। इससे भिन्न जो विज्ञानमय पुरुष रह जाता है, जिसके लिये कि यह देहेन्द्रियसंधात-रूप आत्मा है, वही ‘जो यह आत्मा है’ ऐसा कहकर बतलाया गया है ॥ १४ ॥ |


आत्माका सर्वाधिपतित्व और सर्वाश्रयत्वनिरूपण

स वा अयमात्मा सर्वेषां भूतानामधिपतिः सर्वेषां भूताना ँ राजा तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिता एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्वे देवाः सर्वे लोकाः सर्वे प्राणाः सर्व एत आत्मानः समर्पिताः ॥ १५ ॥

वह यह आत्मा समस्त भूतोंका अधिपति एवं समस्त भूतोंका राजा है। इस विषयमें दृष्टान्त—जिस प्रकार रथकी नाभि और रथकी नेमिमें सारे अरे समर्पित रहते हैं, इसी प्रकार इस आत्मामें समस्त भूत, समस्त देव, समस्त लोक, समस्त प्राण और ये सभी आत्मा समर्पित हैं ॥ १५ ॥

यस्मिन्नात्मनि परिशिष्टो विज्ञा-<br>नमयोऽन्त्ये पर्याये प्रवेशितः,<br>सोऽयमात्मा। तस्मिन्नविद्याकृत-<br>कार्यकरणसङ्घातोपाधिविशिष्टे ब्रह्म-<br>विद्यया परमात्मनि प्रवेशिते,<br>स एवमुक्तोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः<br>प्रज्ञानघनभूतः सर्वेषां भूतानाम-जिसका पहलेके पर्यायोंमें उप-<br>देश नहीं हुआ, उस अवशिष्ट विज्ञान-<br>मयका अन्तिम पर्यायमें जिस<br>आत्मामें प्रवेश कराया गया है,<br>वह यहाँ ‘यह आत्मा’ इस प्रकार<br>कहा गया है। अविद्याकृत देहेन्द्रिय-<br>संघातरूप उपाधिसे युक्त जीवका<br>ब्रह्मविद्याके द्वारा उस परमार्थ<br>आत्मामें प्रवेश कराये जानेपर वह<br>इस प्रकार कहा हुआ आत्मा अर्थात्<br>आत्मभावको प्राप्त हुआ विद्वान्<br>अन्तर-बाह्यशून्य, पूर्ण और प्रज्ञान-<br>घनभूत है; यह समस्त भूतोंका आत्मा

५९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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५९६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| यमात्मा सर्वैरूपास्यः सर्वेषां भूतानामधिपतिः सर्वभूतानां स्वतन्त्रो न कुमारामात्यवत्, किं तर्हि ? सर्वेषां भूतानां राजा । राजत्वविशेषणमधिपतिरिति; भवति कश्चिद्राजोचितवृत्तिमाश्रित्य राजा, न त्वधिपतिः, अतो विशिनष्ट्यधिपतिरिति । एवं सर्वभूतात्मा विद्वान् ब्रह्मविन्मुक्तो भवति । | है, सबके द्वारा उपास्य है, सब भूतोंका अधिपति है और समस्त भूतोंमें स्वतन्त्र है, सो भी कुमार या मन्त्रीके समान नहीं, तो किस प्रकार ? समस्त भूतोंका राजा है। 'अधिपति' यह राजत्वका विशेषण है; कोई पुरुष राजोचितवृत्तिका आश्रय लेकर राजा तो हो जाता है, किंतु अधिपति नहीं होता' इसलिये उसका 'अधिपति' यह विशेषण देते हैं। ऐसा सर्वभूतात्मा ब्रह्मवेत्ता विद्वान् मुक्त हो जाता है । | | यदुक्तं 'ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते किमु तद्ब्रह्मावेद्यस्मात्तत्सर्वमभवत्' (१।४।९) इतीदं तद् व्याख्यातम् । एवमात्मानमेव सर्वात्मत्वेन आचार्यागमाभ्यां श्रुत्वा, मत्वा तर्कतो विज्ञाय साक्षादेवं यथा मधुब्राह्मणे दर्शितं तथा, तस्माद्ब्रह्मविज्ञानादेवंलक्षणात्, पूर्वमपि ब्रह्मैव सदविद्यया अब्रह्मासीत्, सर्वमेव च सदसर्वमासीत्, तां त्वविद्यामस्माद्विज्ञानात्तिरस्कृत्य | [ श्रुतिमें ] पहले जो यह कहा है कि 'ब्रह्मविद्यासे हम सर्वरूप हो जायेंगे-ऐसा मनुष्य मानते हैं, सो उस ब्रह्मने क्या जाना जिससे वह सर्वरूप हो गया' उसीकी यह व्याख्या की गयी है । इस प्रकार गुरु और शास्त्रसे आत्माको ही सर्वात्मभावसे सुनकर, तर्कद्वारा मनन कर तथा जिस प्रकार मधुब्राह्मणमें दिखाया गया है, उस प्रकार उक्त लक्षणवाले उस ब्रह्मविज्ञानसे ही साक्षात् जानकर, जो पहले भी ब्रह्म होते हुए ही अविद्यावश अब्रह्म बना हुआ था, एवं सर्वरूप होते हुए ही असर्व था, अब इस ज्ञानके द्वारा उस अविद्या- |

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ५९७

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ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ५९७


संस्कृतहिन्दी
ब्रह्मविद्ब्रह्मैव सन्ब्रह्माभवत्, सर्वः स सर्वमभवत् ।को नष्ट कर वह ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म होते हुए ही ब्रह्म और सर्वरूप होते हुए ही सर्व हो गया है।
परिसमाप्तः शास्त्रार्थो यदर्थः प्रस्तुततः । तस्मिन्नेतस्मिन् सर्वात्मभूते ब्रह्मविदि सर्वात्मनि सर्वं जगत् समर्पितमित्येतस्मिन्नर्थ दृष्टान्त उपादीयते—तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिता इति प्रसिद्धोऽर्थः, एवमेवास्मिन्नात्मनि परमात्मभूते ब्रह्मविदि सर्वाणि भूतानि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानि, सर्वे देवा अग्न्यादयः, सर्वे लोका भूरादयः, सर्वे प्राणा वागादयः, सर्व एत आत्मानो जलचन्द्रवत् प्रतिशरीरानुप्रवेशिनोऽविद्याकल्पिताः, सर्वं जगदस्मिन् समर्पितम् ।जिसके लिये यह प्रकरण आरम्भ किया गया था वह शास्त्रका तात्पर्य समाप्त हो गया । उस इस सबके आत्मभूत सर्वात्म ब्रह्मवेत्तामें सारा जगत् समर्पित है, इस अर्थमें यह दृष्टान्त दिया जाता है—जिस प्रकार यह बात प्रसिद्ध है कि रथकी नाभि और रथकी नेमिमें सारे अरे समर्पित हैं, उसी प्रकार इस परमात्मभूत ब्रह्मवेत्ता आत्मामें ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त भूत, अग्नि आदि समस्त देव, भूर्लोक आदि समस्त लोक, वाक् आदि समस्त प्राण तथा जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रके समान प्रत्येक शरीरमें प्रवेश करनेवाले ये अविद्याकल्पित समस्त आत्मा समर्पित हैं। अभिप्राय यह है कि सारा जगत् इसीमें समर्पित है।
(ब्रह्मविदः सर्वात्मोपपादनम्)<br>यदुक्तं ब्रह्मविद्वामदेवः प्रतिपेदे—'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' (१।४।१०) इति, स एष सर्वात्मभावो व्याख्यातः। स एष विद्वान् ब्रह्मवित् सर्वोपाधिः सर्वात्मा सर्वोपहले जो श्रुतिने कहा था कि ब्रह्मवेत्ता वामदेवने जाना 'मैं मनु हुआ और सूर्य भी' वहाँ कहे हुए इस सर्वात्मभावकी यह व्याख्या हुई है। वह यह विद्वान् ब्रह्मवेत्ता सर्वोपाधि, सर्वात्मा और सर्वरूप हो जाता है।

५९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

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५९८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| भवति। निरुपाधिर्निरुपाख्यः अनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघनोऽजोऽजरोऽमृतोऽभयोऽचलो नेति नेत्यस्थूलोऽणुरित्येवंविशेषणो भवति। | तथा उपाधिशून्य, संज्ञाशून्य, अन्तर-बाह्यशून्य, पूर्ण, प्रज्ञानघन, अजन्मा, अजर, अमर, अभय, अचल, नेति-नेति तथा अस्थूल और असूक्ष्म इत्यादि विशेषणोंवाला हो जाता है। | | तमेतमर्थमजानन्तस्तार्किकाः केचित् पण्डितम्मन्याश्चागमविदः शास्त्रार्थं विरुद्धं मन्यमाना विकल्पयन्तो मोहमगाधमुपयान्ति। तमेतमर्थमेतौ मन्त्रावनुवदतः— “अनेजदेकं मनसो जवीयः”^१ (ई० उ० ४) “तदेजति तन्नैजति”^२ (ई० उ० ५) इति। तथा च तैत्तिरीयके— “यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चित्” (तै० आर० १०। १०। २०) “एतत्साम गायन्नास्ते” (तै० उ० ३। १०। ५) “अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्” (तै० उ० ३। १०। ६) इत्यादि। तथा च छान्दोग्ये “जक्षत् क्रीडन्रममाणः” (८। १२। ३) “स यदि पितृलोककामः” (८। २। १) “सर्वगन्धः सर्वरसः” (३। | किंतु इस अर्थको न जाननेवाले कुछ तार्किक और अपनेको पण्डित माननेवाले लोग शास्त्रके तात्पर्यको इससे विपरीत मानकर विविध प्रकारकी कल्पना करते हुए अगाध मोहको प्राप्त होते हैं। उस इस अर्थका “अनेजदेकं मनसो जवीयः”^१ तथा “तदेजति तन्नैजति”^२ ये दो मन्त्र अनुवाद करते हैं। तथा तैत्तिरीय-श्रुतिमें भी कहा है— “जिससे पर और अपर कुछ भी नहीं है”, तथा “ब्रह्मवेत्ता यह सामगान करता रहता है—” “मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ—” इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्में कहा है— “हँसता, खेलता और रमण करता हुआ [अपने शरीरकी सुधि न रखते हुए विचरता है]”, “वह यदि पितृलोककी कामना करनेवाला होता है [तो उसके संकल्पसे ही पितर वहाँ उपस्थित हो जाते हैं]”, “सर्वगन्ध, सर्वरस” इत्यादि। आथर्वण |


१. वह आत्मतत्त्व अपने स्वरूपसे विचलित न होनेवाला एक और मनसे भी अधिक वेगवान् है।
२. वह चलता है और नहीं भी चलता।

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९९

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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९९


| १४।२) इत्यादि। आथर्वणे च “सर्वज्ञः सर्ववित्” (मु० उ० १।१।९) “दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च” (मु० उ० ३।१।७)। कठवल्लीष्वपि “अणोरणीयान् महतो महीयान्” (१।२।२०) “कस्तं मदामदं देवम्” (१।२।२१) “तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्” (ई० उ० ४) इति च। तथा गीतासु “अहं क्रतुरहं यज्ञः” (९।१६) “पिताहमस्य जगतः” (९।१७) “नादत्ते कस्यचित् पापम्” (५।१५) “समं सर्वेषु भूतेषु” (१३।२७) “अविभक्तं विभक्तेषु” (१८।२०) “ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च” (१३।१६) इत्येवमाद्यागमार्थं विरुद्धमिव प्रतिभान्तं मन्यमानाः स्वचित्तसामर्थ्यादर्थनिर्णयाय विकल्पयन्तः, अस्त्यात्मा नास्त्यात्मा कर्ताकर्ता मुक्तो बद्धः क्षणिको विज्ञानमात्रं शून्यं चेत्येवं विकल्पयन्तो न पारमधिगच्छन्त्य- | (मुण्डक) उपनिषद्में कहा है—“वह सर्वज्ञ, सर्ववित् है”, “वह दूरसे भी दूर और यहाँ समीपमें भी है।” कठवल्लियोंमें भी कहा है—“वह अणुसे भी अणु और महान्‌से भी महान् आत्मा…”, “उस हर्षसहित और हर्षरहित देवको।” [ईशोपनिषद्में कहा है—] वह स्वयं स्थिर रहकर ही अन्य सब दौड़नेवालोंसे आगे पहुँचा रहता है।” तथा गीतामें भी कहा है—“मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ”, “मैं इस जगत्‌का पिता हूँ”, “वह किसीके पाप [और पुण्य] को ग्रहण नहीं करता” “जो समस्त भूतोंमें परमेश्वरको समभावसे स्थित (देखता है)”, “पृथक्-पृथक् भूतोंमें अखण्ड रूपसे स्थित” “वह सबका संहार करनेवाला तथा सबको उत्पन्न करनेवाला है-ऐसा जानना चाहिये” इत्यादि प्रकारके शास्त्राभिप्रायको विरुद्ध-सा भासनेवाला मानकर अपने चित्तके सामर्थ्यसे अर्थ-निर्णय करनेके लिये तरह-तरहकी कल्पना करते हुए तथा ‘आत्मा है, आत्मा नहीं है, वह कर्ता है, वह अकर्ता है, मुक्त है, बद्ध है, क्षणिक विज्ञानमात्र है, शून्य है’ इत्यादि विकल्प करते हुए अविद्याका पार नहीं पाते; क्योंकि |

६०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

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६००बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| विद्यायाः, विरुद्धधर्मदर्शित्वात् सर्वत्र।<br><br>तस्मात्तत्र य एव श्रुत्याचार्यदर्शितमार्गानुसारिणः, त एवाविद्यायाः पारमधिगच्छन्ति। त एव चास्मान्मोहसमुद्रादगाधादुत्तरिष्यन्ति, नेतरे स्वबुद्धिकौशलानुसारिणः ॥ १५ ॥ | उन्हें सर्वत्र विरुद्ध धर्म ही दिखायी देता है।<br><br>अतः उनमें जो श्रुति और आचार्यके दिखाये हुए मार्गका अनुसरण करनेवाले हैं, वे ही अविद्याका पार पाते हैं और वे ही इस अगाध मोहसमुद्रसे तर जायंगे, दूसरे लोग, जो अपने बुद्धिकौशलका अनुसरण करनेवाले हैं, उसे नहीं तर सकेंगे ॥ १५ ॥ |

दध्यङ्ङाथर्वणद्वारा अश्विनीकुमारोंको मधुविद्याके उपदेशकी आख्यायिका

| [ब्रह्मविद्यास्तुति-लिङ्गानामुपन्यासः]<br>परिसमाप्ता ब्रह्मविद्यामृतत्वसाधनभूता, यां मैत्रेयी पृष्टवती भर्तारम् ‘यदेव भगवानमृतत्वसाधनं वेद तदेव मे ब्रूहि’ इति। एतस्या ब्रह्मविद्यायाः स्तुत्यर्थेयमाख्यायिका आनीता। तस्या आख्यायिकायाः सङ्क्षेपतोऽर्थप्रकाशनाथैवेतौ मन्त्रौ भवतः। एवं हि मन्त्रब्राह्मणाभ्यां स्तुतत्वात् अमृतत्वसर्वप्राप्तिसाधनत्वं ब्रह्मविद्यायाः प्रकटीकृतं राजमार्ग- | जिसके विषयमें मैत्रेयीने अपने पतिसे पूछा था कि ‘श्रीमान् जो भी अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मेरे प्रति कहिये,’ वह अमृतत्वकी साधनभूता ब्रह्मविद्या तो समाप्त हो गयी। इस ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके लिये यह (आगे कही जानेवाली) आख्यायिका प्रस्तुत की जाती है। उस आख्यायिकाके तात्पर्यको संक्षेपसे प्रकाशित करनेके लिये ये दो मन्त्र हैं। इसी प्रकार मन्त्र और ब्राह्मण दोनोंके द्वारा स्तुत होनेके कारण ब्रह्मविद्याका अमृतत्व एवं सर्वप्राप्तिका साधनत्व प्रकट किया गया है तथा उसे राजमार्गको प्राप्त कराया गया |

ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०१

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ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ६०१

| मुपनीतं भवति—यथादित्य उद्यञ्छार्वरं तमोऽपनयतीति तद्वत्। | है। जिस प्रकार उदय होनेवाला सूर्य रात्रिके अन्धकारको दूर कर देता है, उसी प्रकार [ उदय होनेवाली विद्या अविद्याका नाश कर देती है]। | | अपि चैवं स्तुता ब्रह्मविद्या— | इसके सिवा उस ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गयी है | | या इन्द्ररक्षिता सा दुष्प्राप्या देवैरपि; यस्मादश्विभ्यामपि देवभिषग्भ्यामिन्द्ररक्षिता विद्या महतायासेन प्राप्ता। ब्राह्मणस्य शिरश्छित्त्वाऽश्व्यं शिरः प्रतिसन्धाय तस्मिन्निन्द्रेणच्छिन्ने पुनः स्वशिर एव प्रतिसन्धाय तेन ब्राह्मणस्य स्वशिरसवोक्ताशेषा ब्रह्मविद्या श्रुता। तस्मात्ततः परतरं किञ्चित् पुरुषार्थसाधनं न भूतं न भावि वा, कुत एव वर्तमानम्, इति नातः परा स्तुतिरस्ति। | कि जो इन्द्रसे सुरक्षिता थी, वह देवताओंके लिये भी दुष्प्राप्य हो रही थी; क्योंकि वह इन्द्ररक्षिता विद्या देववैद्य अश्विनीकुमारोंको भी बड़ी कठिनतासे प्राप्त हुई थी। उन्होंने ब्राह्मणका शिर काटकर उसपर घोड़ेका शिर लगाया और जब उसे इन्द्रने काट दिया तो पुनः उनका अपना शिर जोड़कर फिर ब्राह्मणके उस अपने शिरसे ही कहे जानेपर समग्र ब्रह्मविद्याका श्रवण किया। अतः उससे बढ़कर कोई अन्य पुरुषार्थका साधन न कभी हुआ है और न होगा ही, फिर वर्तमान तो हो ही कैसे सकता है; अतः इससे बढ़कर उसकी स्तुति नहीं हो सकती है। | | अपि चैवं स्तूयते ब्रह्मविद्या— | इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की जाती है—यह | | सर्वपुरुषार्थानां कर्म हि साधनमिति लोके प्रसिद्धम्। तच्च कर्म वित्तसाध्यम्, तेनाशापि नास्त्यमृत- | लोकमें प्रसिद्ध है कि समस्त पुरुषार्थोंका साधन कर्म ही है। वह कर्म धनसाध्य है, अतः उससे तो अमृतत्वकी आशा भी नहीं है। यह |

६०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

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६०२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
त्वस्य। तदिदममृतत्वं केवलयात्मविद्यया कर्मनिरपेक्षया प्राप्यते; यस्मात् कर्मप्रकरणे वक्तुं प्राप्तापि सती प्रवर्ग्यप्रकरणे, कर्मप्रकरणादुत्तीर्य कर्मणा विरुद्धत्वात् केवलसंन्याससहिता अभिहिता अमृतत्वसाधनाय। तस्मान्नातः परं पुरुषार्थसाधनमस्ति।अमृतत्व तो कर्मकी अपेक्षासे रहित केवल आत्मविद्याके द्वारा ही प्राप्त होता है; क्योंकि प्रवर्ग्यप्रकरणरूप कर्मके प्रकरणमें कहनेके लिये प्राप्त होनेपर भी कर्मसे विरुद्ध होनेके कारण उसे कर्मप्रकरणसे निकाल-कर अमृतत्वसाधनके लिये संन्यास-के साथ वर्णन किया है। अतः इससे बढ़कर कोई और पुरुषार्थका साधन नहीं है।
अपि चैवं स्तुता ब्रह्मविद्या—इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गयी है—
सर्वो हि लोको द्वन्द्वारामः “स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते’ (बृ० उ० १।४।३) इति श्रुतेः। याज्ञवल्क्यो लोकसाधारणोऽपि सन्नात्मज्ञानबलाद्भार्यापुत्रवित्तादिसंसाररतिं परित्यज्य प्रज्ञानतृप्त आत्मरतिर्बभूव।सारा ही लोक द्वन्द्वोंमें रमण करनेवाला है, जैसा कि “वह विराट् पुरुष [अकेला होनेके कारण] रममाण नहीं हुआ, इसीसे अकेला पुरुष रमण नहीं करता” इस श्रुति-से सिद्ध होता है। याज्ञवल्क्य साधारण लोकके समान होते हुए भी आत्मज्ञानके बलसे स्त्री, पुत्र एवं धन आदि संसारकी आसक्तिको छोड़कर ज्ञानतृप्त हो आत्मामें प्रेम करनेवाले हो गये थे।
अपि चैवं स्तुता ब्रह्मविद्या—इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गयी है—
यस्माद्याज्ञवल्क्येन संसारमार्गाद् व्युत्तिष्ठतापि प्रियाय भार्यायैक्योंकि संसार-मार्गसे निवृत्त होते हुए भी याज्ञवल्क्यजीने अपनी प्रेयसी भार्या-

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ६०३

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ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ६०३


प्रीत्यर्थमेवाभिहिता, "प्रियं भाषस एह्यास्स्व" (२।४।४) इति लिङ्गात्।<br><br>तत्रेयं स्तुत्यर्थाख्यायिकेत्यवोचाम। का पुनः सा आख्यायिका? इत्युच्यते—को इसका प्रेमके कारण ही उपदेश किया था, जैसा कि "तू प्रिय भाषण करती है, अतः आ, बैठ जा" इस विशेष कथनरूप प्रमाणसे ज्ञात होता है।<br><br>यहाँतक हमने यह बतलाया कि यह आख्यायिका [ब्रह्मविद्याकी] स्तुतिके लिये है। किंतु वह आख्यायिका है क्या? सो अब बतलाया जाता है—

इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच। तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत्। तद्वां नरा सनये दँस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम्। दध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य शीर्ष्णा प्र यदीमुवाचेति ॥ १६ ॥

उस इस मधुको दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिने अश्विनीकुमारोंसे कहा था। इस मधुको देखते हुए ऋषि (मन्त्र) ने कहा—'मेघ जिस प्रकार वृष्टि करता है, उसी प्रकार हे नराकार अश्विनीकुमारो! मैं लाभके लिये किये हुए तुम दोनोंका वह उग्र दंस कर्म प्रकट किये देता हूँ, जिस मधुका दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिने तुम्हारे प्रति अश्वके शिरसे वर्णन किया था॥ १६॥

इदमित्यनन्तरनिर्दिष्टं व्यपदिशति, बुद्धौ सन्निहितत्वात्।<br><br>वैशब्दः स्मरणार्थः। तदित्याख्यायिकानिर्वृत्तं प्रकरणान्तराभिहितं परोक्षं वैशब्देन स्मारयन्निह व्यपदिशति। यत्तत् प्रवर्ग्यप्रकरणे'इदम्' यह पद पीछे बतलाये हुए विषयका समीपस्थ वस्तुकी भांति निर्देश करता है; क्योंकि वह बुद्धिमें सन्निहित है। 'वै' शब्द स्मरणके लिये है। 'तत्' पदसे आख्यायिका में आनेवाले एवं दूसरे प्रकरणमें कहे हुए परोक्ष मधुका 'वै' शब्दसे स्मरण कराकर यहां निर्देश करते हैं। जिस मधुको प्रवर्ग्यप्रकरणमें सूचित