बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
१३५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| मर्थः पुंगवस्तदीयं मांसम् ।<br><br>ऋषभस्ततोऽप्यधिकवयास्तदीय-<br><br>मार्षभं मांसम् ॥ १८ ॥ | उसीका गूदा यहां अभीष्ट है। पूर्वोक्त सांडसे भी अधिक अवस्था वाले बैलको ऋषभ कहते हैं, उसके समान शक्तिशाली ओषधिशेषका नाम भी ऋषभ※ है। उसीके गूदे- को यहाँ 'आर्षभ' समझना चाहिये ॥ १ ॥ |
ओषधिका पर्याय माना गया है—'ऋषभ ओषधौ च'। प्रसिद्ध अंग्रेज विद्वान् सर मोनियर विलियम्सने अपने बृहत् संस्कृत-अंग्रेजीकोषमें इसे 'सोम' नामक पौधेका पर्याय माना है।
※ 'ऋषभ' नामक ओषधिका आयुर्वेदके अत्यन्त प्राचीन एवं प्रामाणिक ग्रन्थ 'सुश्रुत-संहिता' के 'सूत्रस्थान' नामक प्रथम खण्डके ३८ वें अध्यायमें (जो द्रव्यसंग्रहणीयाध्याय भी कहलाता है) सैंतीस द्रव्यगणोंके अन्तर्गत उल्लेख हुआ है। 'भावप्रकाश' नामक प्रसिद्ध संग्रह ग्रन्थमें उसका वर्णन इस रूपमें आया है—
जीवकर्षभकौ ज्ञेयौ हिमाद्रिशिखरोद्भवौ ।
रसोतकन्दवत् कन्दौ निःसारौ सूक्ष्मपत्रकौ ॥
................... ऋषभो वृषशृङ्गवत् ।
.............................................॥
ऋषभो वृषभो वीरो विषाणी ब्राह्म इत्यपि ।
जीवकर्षभकौ बल्यौ शीतौ शुक्रकफप्रदौ ।
मधुरौ पित्तदाहघ्नौ काशवातक्षयावहौ ॥
जीवक और ऋषभक, (ऋषभ) नामकी ओषधियाँ हिमालयके शिखरपर उत्पन्न होती हैं। उनकी जड़ लहसुनके सदृश होती है। दोनोंमें ही गूदा नहीं होता, केवल त्वचा होती है; दोनोंमें छोटी-छोटी पत्तियाँ होती हैं। इनमेंसे ऋषभ बैलके सींगकी आकृतिका होता है। इसके दूसरे नाम हैं—वृषभ, वीर, विषाणी, ब्राह्म आदि। जीवक और ऋषभ दोनों ही बलकारक, शीत, वीर्य और कफ बढ़ानेवाले, मधुर, पित्त और दाहका शमन करनेवाले तथा खाँसी एवं वातरोगका नाश करनेवाले हैं।
ऋषभकी प्रसिद्ध अष्टवर्ग नामक ओषधियोंमें गणना है। भावप्रकाशकार लिखते हैं—
जीवकर्षभकौ मेदे काकोल्यौ ऋद्धिवृद्धिके ।
अष्टवर्गोऽष्टभिर्द्रव्यैः कथितश्चरकादिभिः ॥
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५५
अथाभिप्रतरेव स्थालीपाकावृताज्यं चेष्टित्वा स्थालीपाकस्योपघातं जुहोत्यग्नये स्वाहानुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नाति प्राश्येतरस्याः प्रयच्छति प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रि॑रभ्युक्षत्युत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सहेति ॥ १६ ॥
तदनन्तर चौथे दिन प्रातःकाल ही [ संध्या आदिका अनुष्ठान करके ] पत्नीके कूटे हुए चावलोंको लेकर स्थालीपाककी विधिसे घीका संस्कार करके चरु पकाकर उसका भी संस्कार करके स्थालीपाकके अन्नमें से थोड़ा-थोड़ा लेकर प्रधान आहुतियां दे, उनके मन्त्र इस प्रकार हैं—'अग्नये स्वाहा, अनुमतये स्वाहा, देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहा'। इस प्रकार आहुति देकर 'स्विष्टकृत्' होम करके स्थालीमें बचे हुए चरुको एक पात्रमें निकालकर उसमें घी मिलाकर पहले पति उस अन्नको खाता है। खाकर उसी उच्छिष्ट अन्नको अपनी पत्नीके लिये देता है। तत्पश्चात् हाथ-पैर धोकर शुद्ध आचमन करके जलपात्रको भरकर उसी जलसे अपनी पत्नीका तीन बार अभिषेक करे। अभिषेकका मन्त्र इस प्रकार है—'उत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सह' ॥१६॥
| अथाभिप्रतरेव कालेऽवघातनिर्वृत्तांस्तण्डुलानादाय स्थालीपाकावृता स्थालीपाकविधिनाज्यं चेष्टित्वाज्यसंस्कारं कृत्वा चरुं श्रपयित्वा स्थालीपाकस्याहुतीर्जुहोत्युपघातमुपहृत्योपहृत्याग्नये स्वाहेत्याद्याः। गा०ः सर्वो विधिर्द्रष्टव्योऽत्र । | तदनन्तर प्रातःकाल ही कूटनेसे तैयार हुए चावलोंको लेकर स्थालीपाककी विधिसे घीका संस्कार करके चरुको पकाकर स्थालीपाककी आहुति दे। स्थालीपाकमेंसे थोड़ा-थोड़ा अन्न लेकर 'अग्नये स्वाहा' इत्यादि मन्त्रोंसे तीन आहुतियां दे। यहां सारी विधि अपने-अपने गृह्यसूत्रके अनुसार समझनी चाहिये। |
१३५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६
१३५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६
| हुत्वोद्धृत्य चरुशेषं प्राश्नाति स्वयं प्राश्येतरस्याः पत्न्यै प्रयच्छत्युच्छिष्टम्। प्रक्षाल्य पाणी आचम्योदपात्रं पूरयित्वा तेनोदकेनैनां त्रिरभ्युक्षत्यनेन मन्त्रेणोत्तिष्ठात इति सकृन्मन्त्रोच्चारणम् ॥ १९ ॥ | हवन करके शेष चरुको एक पात्रमें निकालकर पति स्वयं भोजन करे। भोजन करके उच्छिष्ट भाग पत्नीको अर्पण करे। तत्पश्चात् हाथ पैर धोकर शुद्ध आचमन करके जलपात्र भरकर उसी जलसे पत्नीका तीन बार 'उत्तिष्ठात' इत्यादि मन्त्रके द्वारा अभिषेक करे। मन्त्रका पाठ एक ही बार करना चाहिये ॥ १९ ॥ |
अथैनामभिपद्यतेऽमोऽहमस्मि सा त्वँ॒ सा त्वमस्य- मोऽहं सामाहमस्मि ऋक् त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वं तावेहि सँ॒रभावहै सह रेतो दधावहै पुँ॒से पुत्राय वित्तय इति ॥ २० ॥
तदनन्तर पति अपनी कामनाके अनुसार पत्नीको खीर आदि भोजन करानेके पश्चात् शयनकालमें 'अमोऽहमस्मि' इत्यादि मन्त्र पढ़कर उसका आलिङ्गन करे। [उस मन्त्रका भाव इस प्रकार है—] 'देवि! मैं प्राण हूँ, तुम वाक् हो; तुम वाक् हो, मैं प्राण हूँ; मैं साम हूँ, तुम ऋत हो; मैं आकाश हूँ, तुम पृथिवी हो; अतः आओ, हम दोनों दम्पति एक दूसरेका आलिङ्गन करें, एक साथ रेतस् धारण करें, जिससे हमें पुरुषत्वविशिष्ट पुत्रका लाभ हो ॥ २० ॥
| अथैनामभिमन्त्र्य क्षीरौदनादि यथापत्यकामं भुक्त्वेति क्रमो द्रष्टव्यः। संवेशनकालेऽमोऽहमस्मीत्यादिमन्त्रेणाभिपद्यते। २०। | तदनन्तर इस पत्नीको अभिमन्त्रित करके जैसी संतानकी इच्छा हो, उसके अनुसार खीर आदि भोजन करनेके पश्चात् उसके साथ शयन करे। यह क्रम समझना चाहिये। शयन-कालमें 'अमोऽहमस्मि' इत्यादि मन्त्रसे पत्नीका आलिङ्गन करे ॥ २० ॥ |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५७
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५७
अथास्या ऊरू विहापयति विजिहीथां द्यावा-पृथिवी इति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखँ संधाय त्रिरेनामनुलोमामनुमार्ष्टि विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिँशतु । आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते । गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि पृथुष्टुके । गर्भं ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥ २१॥
तत्पश्चात् पत्नीके ऊरुद्वय (दोनों जांघों) को एक दूसरेसे विलग करे । [उस समय यह मन्त्र पढ़ना चाहिये—] 'विजिहीथां द्यावापृथिवी इति' (हे ऊरुस्वरूप आकाश और पृथिवी ! तुम दोनों विलग होओ) इसके बाद पत्नीकी योनिमें अपनी जननेन्द्रिय स्थापित करके उसके मुँहसे मुँह मिलाकर अनुलोम-क्रमसे पत्नीके [केशादि पादान्त] सम्पूर्ण शरीरका तीन बार मार्जन करे [मार्जन-कालमें 'विष्णुर्योनिं कल्पयतु' इत्यादि मन्त्रका पाठ करे, जिसका भाव इस प्रकार है--] 'प्रिये ! सर्वव्यापी भगवान् विष्णु तेरी जननेन्द्रियको पुत्रकी उत्पत्तिमें समर्थ बनावें। भगवान् सूर्य तेरे [तथा उत्पन्न होनेवाले बालकके] अङ्गोंको विभाग-पूर्वक पुष्ट एवं दर्शनीय बनावें। विराट् पुरुष भगवान् प्रजापति मुझसे अभिन्नरूपमें स्थित हो तुझमें वीर्यका आधान करें। भगवान् धाता मुझसे अभिन्न भावसे स्थित हो तेरे गर्भका धारण एवं पोषण करें। देवि ! जिसकी भूरि-भूरि स्तुति की जाती है, वह सिनीवाली (जिसमें चन्द्रमाकी एक कला शेष रहती है, वह अमावास्या) तुम हो, तुम यह गर्भ धारण करो, धारण करो। देव अश्विनीकुमार (सूर्य और चन्द्रमा) अपनी किरणरूपी कमलोंकी माला धारण करके मुझसे अभिन्नरूपमें स्थित हो तुझमें गर्भका आधान करें ॥ २१ ॥
| अथास्या ऊरू विहापयति<br>विजिहीथां द्यावापृथिवी इत्यनेन।<br>तस्यामर्थमित्यादिपूर्ववत् । त्रिरेनां | तदनन्तर 'विजिहीथां द्यावापृथिवी इस मन्त्रसे पत्नीके ऊरुद्वयको एक दूसरेसे अलग करे । 'तस्यामर्थं' इत्यादि मन्त्रभागका अर्थ पूर्ववत् है । |
१३५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १३५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| शिरःप्रभृत्यनुलोममनुमार्ष्टि विष्णुर्योनिमित्यादि प्रतिमन्त्रम् ॥ २१ ॥ | ‘विष्णुर्योनिं’ इत्यादि मन्त्रोंमेंसे प्रत्येकको पढ़कर पत्नीके मस्तकसे लेकर पैरतकके अङ्गोंको तीन-तीन बार मार्जन (स्पर्श) करे ॥ २१ ॥ |
हिरण्मयी अरणी याभ्यां निर्मन्थतामश्विनौ, तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतये । यथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी । वायुर्दिशां तथा गर्भ एवं गर्भं दधामि तेऽसाविति ॥२२॥
प्राचीन कालमें ज्योतिर्मयी अरणियां थीं, जिनसे अश्विनीकुमारोंने मन्थन किया। उस मन्थनसे अमृतरूप गर्भ प्रकट हुआ। उसी अमृतरूप गर्भको हम तेरी कुक्षिमें स्थापित करते हैं। इसलिये कि तू इसे दशवें महीनेमें उत्पन्न कर सके। जैसे पृथ्वीका गर्भ अग्नि है, जैसे स्वर्गीय भूमि इन्द्रसे गर्भवती है, जैसे दिशाओंका गर्भ वायु है, उसी प्रकार मैं तुझमें पुत्ररूप गर्भ स्थापित करता हूँ, अमुक देवि ! ॥ २२ ॥
| अन्ते नाम गृह्णात्यसाविति तस्याः ॥ २२ ॥ | ‘असौ’ पदके द्वारा यह सूचित किया गया है कि अन्तमें पत्नीका नामोच्चारण करना चाहिये ॥ २२ ॥ |
सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति । यथा वायुः पुष्करिणीँ समिङ्गयति सर्वतः । एवा ते गर्भ एजतु सहावैतु जरायुणा । इन्द्रस्यायं व्रजः कृतः सार्गलः सपरिश्रयः । तमिन्द्र निर्जहि गर्भेण सावराँसहेति ॥ २३ ॥
प्रसवकालमें प्रसव करनेवाली स्त्रीके ऊपर ‘यथा वायुः............’ इत्यादि मन्त्र पढ़कर जल छिड़के। [ मन्त्रार्थ इस प्रकार है—] ‘जैसे
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५९
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५९
वायु पोखरीके जलको सब ओरसे चञ्चल कर देती है, उसी प्रकार तेरा गर्भ अपने स्थानसे चले और जरायुके साथ बाहर निकले। इन्द्र (प्रसूति वायुके) लिये यह योनिरूप मार्ग निर्मित हुआ है; जो अर्गला--गर्भवेष्टन (जरायु) के साथ है। इन्द्र! (प्रसव-वायो!) उस मार्गपर पहुँचकर तुम गर्भ एवं मांसपेशीके साथ बाहर निकलो ॥ २३ ॥
| सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति प्रसवकाले सुखप्रसवनार्थमनेन मन्त्रेण । यथा वायुः पुष्करिणीं समिङ्गयति सर्वतः । एवा ते गर्भ एजत्विति ॥ २३ ॥ | प्रसवकालमें सुखपूर्वक बच्चा पैदा करनेके लिये 'यथा वायुः पुष्करिणीं समिङ्गयति सर्वतः । एवा ते गर्भ एजतु' इत्यादि मन्त्र पढ़कर प्रसव करनेवाली स्त्रीको जलसे सींचे ॥ २३ ॥ |
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| अथ जातकर्म— | अब जातकर्मका वर्णन करते हैं— |
जातेऽग्निमुपसमाधायाङ्क आधाय कँसे पृषदाज्यँ संनीय पृषदाज्यस्योपघातं जुहोत्यस्मिन् सहस्रं पुष्यासमेधमानः स्वे गृहे । अस्योपसन्त्यां मा च्छैत्सीत् प्रजया च पशुभिश्च स्वाहा । मयि प्राणाँस्त्वयि मनसा जुहोमि स्वाहा । यत् कर्मणा त्यरीरिचं यद् वा न्यूनमिहाकरम् । अग्निष्टत्स्विष्टकृद् विद्वान् स्विष्टँ सुहुतं करोतु नः स्वाहेति ॥ २४ ॥
पुत्र उत्पन्न होनेपर पिता उसे अपनी गोदमें लेकर अग्निकी स्थापना करके काँसके कटोरेमें दधिमिश्रित घी रखकर उसका थोड़ा-थोड़ा-सा अंश लेकर "अस्मिन् सहस्रम्" इत्यादि मन्त्रोंद्वारा अग्निमें आहुति दे। [मन्त्रार्थ इस प्रकार है] अपने इस घरमें पुत्ररूपसे वृद्धिको प्राप्त हुआ मैं सहस्रों मनुष्योंका एकमात्र पोषण करनेवाला होऊँ। मेरे इस पुत्रकी संततिमें प्रजा तथा पशुओंके साथ सम्पत्तिका कभी उच्छेद न हो—स्वाहा। मुझ पितामें जो प्राण हैं, उन प्राणोंका तुझ पुत्रमें मैं मन-ही-मन होम करता हूँ, स्वाहा। मैंने प्रधान कर्म करनेके साथ-साथ जो कुछ अधिक कार्य कर डाला हो
१३६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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अथवा आवश्यक कर्ममें भी जो न्यूनता (त्रुटि) कर दी हो, हमारे उस कर्मको विद्वान् अग्निदेव स्विष्टकृत् (अभीष्टसाधक) होकर स्विष्ट और सुहुत (न्यूनातिरिक्त दोषसे रहित) कर दें—स्वाहा ॥ २४ ॥
| जातेऽग्निमुपसमाधायाङ्क<br>आधाय पुत्रं कंसे पृषदाज्यं संनीय<br>संयोज्य दधि घृते पृषदाज्यस्योप-<br>घातं जुहोत्यस्मिन् सहस्रमित्या-<br>द्यावापस्थाने ॥ २४ ॥ | पुत्र जन्म होनेपर अग्निस्थापन करके पुत्रको गोदमें लेकर और काँसके कटोरेमें दधिमिश्रित घृत रखकर दहीको घीमें मिलाकर उसका थोड़ा-थोड़ा-सा अंश लेकर 'अस्मिन् सहस्रम्' इत्यादि मन्त्रसे अग्निके आवाप स्थानमें आहुति दे ॥ २४ ॥ |
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अथास्य दक्षिणं कर्णमभिनिधाय वाग् वागिति त्रिरथ दधि मधु घृतँ संनीयानन्तर्हितेन जातरूपेण प्राशयति। भूस्ते दधामि भुवस्ते दधामि स्वस्ते दधामि भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामीति ॥ २५ ॥
स्विष्टकृत् होमके अनन्तर पिता शिशुके दाहिने कानको अपने मुखके पास ले आकर 'वाक् वाक् वाक्' इस प्रकार तीन बार कहे¹। तत्पश्चात् दही, मधु और घी एकमें मिलाकर उसे दूसरे धातुओंके मेलसे रहित विशुद्ध सोनेकी चम्मचसे बालकको चटावे [ उस समय इन चार मन्त्रोंका पाठ करे ] 'भूस्ते दधामि' 'भुवस्ते दधामि' 'स्वस्ते दधामि' 'भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामि'² ॥ २५ ॥
| अथास्य दक्षिणं कर्णम-<br>भिनिधाय स्वं ' मुखं<br>वाग् वागिति त्रिजपेत् । | तदनन्तर इस बालकके दाहिने<br>कानको अपने मुखके पास ले जाकर<br>'वाक् वाक्' यह तीन बार जपे । |
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१. तीन बार कहनेका तात्पर्य यह है कि तेरी बुद्धिमें वेदत्रयीरूप वाणी प्रवेश करे।
२. मैं तुझमें भूर्लोककी स्थापना करता हूँ, भुवर्लोककी स्थापना करता हूँ, स्वर्लोककी स्थापना करता हूँ तथा भूर्भुवः स्वः सब लोकोंकी स्थापना करता हूँ।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३६१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३६१
| अथ दधि मधु घृतं संनीयानन्त-<br><br>र्हितेनाव्यवहितेन जातरूपेण<br><br>हिरण्येन प्राशयत्येतैर्मन्त्रैः<br><br>प्रत्येकम् ॥ २५ ॥ | तत्पश्चात् काँसके कटोरेमें दही, मधु और घी लेकर किसी दूसरे द्रव्यके व्यवधानसे रहित विशुद्ध सोनेकी चम्मचद्वारा 'भूस्ते' इत्यादि मन्त्र पढ़कर बालकको प्रत्येक वस्तु चटावे ॥ २५ ॥ |
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नाम-कर्म
अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति तदस्य तद्गुह्यमेव नाम भवति ॥ २६ ॥
इसके बाद बालकका नामकरण करे। 'तुम वेद हो।' अतः वेद यह उस बालकका गुप्त नाम ही होता है ॥ २६ ॥
| अथास्य नामधेयं करोति वेदोऽसीति । तदस्य तद् गुह्यं नाम भवति वेद इति ॥ २६ ॥ | इसके बाद इस बालकका नामकरण करे 'तुम वेद हो' अतः वेद उस बालकका गोपनीय नाम होता है ॥ २६ ॥ |
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अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः । येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति ॥ २७ ॥
तदनन्तर इस बालकको माताकी गोदमें देकर 'यस्ते स्तनः' इत्यादि मन्त्र पढ़ते हुए स्तन पिलावे [मन्त्रका भाव इस प्रकार है-] 'हे सरस्वति ! तुम्हारा जो स्तन दूधका अक्षयभण्डार तथा पोषणका आधार है, जो रत्नोंकी खान है तथा सम्पूर्ण धन-राशिका ज्ञाता और उदार दानी है तथा जिसके द्वारा तुम समस्त वरणीय पदार्थोंका पोषण करती हो, इस सत्पुत्रके जीवनधारणार्थ उस स्तनको तुम मेरी पत्नीके शरीरमें प्रविष्ट होकर इस शिशुके मुखमें दे दो ॥ २७ ॥
बृ० उ० ८६—
१३६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १३६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| अथैनं मात्रे प्रदाय स्वाङ्कस्थं स्तनं प्रयच्छति यस्ते स्तन इत्यादिमन्त्रेण ॥ २७ ॥ | तदनन्तर अपने अङ्कमें बैठे हुए इस शिशुको माताकी गोदमें देकर ‘यस्ते स्तनः’ इत्यादि मन्त्रके द्वारा उसका स्तन बालकके मुँहमें दे ॥ २७ ॥ |
अथास्य मातरमभिमन्त्रयते । इलासि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनत् । सा त्वं वीरवती भव यास्मान् वीरवतोऽकरदिति । तं वा एतमाहुरतिपितां बताभूरतिपितामहो बताभूः परमां बत काष्ठां प्रापच्छ्रिया यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवंविदो ब्राह्मणस्य पुत्रो जायत इति ॥ २८ ॥
इसके बाद बालककी माताको इस प्रकार ‘इलासि’ इत्यादि मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित करे [ मन्त्रका भाव इस प्रकार है ] ‘हे देवि ! तू ही स्तुतिके योग्य मैत्रावरुणी (अरुन्धती) है। वीरे ! तूने वीर पुत्रको जन्म देकर हमें वीरवान्—वीर पुत्रका पिता बनाया है, अतः तू वीरवती हो। इस बालकको देखकर दूसरे लोग कहें—‘तू सचमुच अपने पितासे भी आगे बढ़ गया, तू निःसंदेह अपने पितामहसे भी श्रेष्ठ निकला, तू लक्ष्मी, कीर्ति तथा ब्रह्मतेजके द्वारा उन्नतिकी चरम सीमाको पहुँच गया।’ इस प्रकार विशिष्टज्ञानसम्पन्न जिस ब्राह्मणके ऐसा पुत्र उत्पन्न होता है, वह पिता भी इसी प्रकार स्तुत्य होता है ॥ २८ ॥
| अथास्य मातरमभिमन्त्रयत इलासीत्यनेन। तं वा एतमाहुरित्यनेन विधिना जातः पुत्रः पितरं पितामहं चातिशेत इति श्रिया यशसा ब्रह्मवर्चसेन परमां | इसके बाद ‘इलासि’ इत्यादि मन्त्रद्वारा इस बालककी माताको अभिमन्त्रित करे। ‘तं वा एतमाहुः’ इस वाक्यद्वारा यह बताया गया है कि शास्त्रीय विधिसे उत्पन्न किया हुआ पुत्र अपने पिता और पितामहसे भी आगे बढ़ जाता है तथा ‘तू लक्ष्मी, कीर्ति तथा ब्रह्मचर्यके द्वारा उन्नतिकी परा- |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३६३
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३६३
| निष्ठां प्रापादित्येवं स्तुत्यो भवतीत्यर्थः। यस्य चैवंविदो ब्राह्मणस्य पुत्रो जायते स चैवं स्तुत्यो भवतीत्यध्याहार्यम् ॥ २८ ॥ | काष्ठाको पहुँच गया' इस प्रकार कहकर लोग उसकी स्तुति करते हैं। ऐसे विशिष्टज्ञानसे सम्पन्न जिस ब्राह्मणके ऐसा पुत्र होता है, वह पिता भी उस पुत्रकी भाँति ही स्तुतिका पात्र हो जाता है ॥ २८ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये चतुर्थब्राह्मणम् ॥ ४ ॥
पञ्चम ब्राह्मण
समस्त प्रवचनका वंश
अथ वँशः । पौतिमाषीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात् कात्यायनीपुत्रो गौतमीपुत्राद् गौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्राद् भारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्र औपस्वस्तीपुत्रादौपस्वस्तीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात् कात्यायनीपुत्रः कौशिकीपुत्रात् कौशिकीपुत्र आलम्बीपुत्राच्च वैयाघ्रपदीपुत्राच्च वैयाघ्रपदीपुत्रः काण्वीपुत्राच्च कापीपुत्राच्च कापीपुत्रः ॥ १ ॥ आत्रेयीपुत्रादात्रेयीपुत्रो गौतमीपुत्राद् गौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्राद् भारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रो वात्सीपुत्राद् वात्सीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रो वार्कारुणीपुत्राद् वार्कारुणीपुत्रो वार्कारुणीपुत्राद् वार्कारुणीपुत्र आर्तभागीपुत्रादार्तभागीपुत्रः शौङ्गीपुत्राच्छौङ्गीपुत्रः सांकृतीपुत्रात् सांकृतीपुत्र आलम्बायनीपुत्रादालम्बायनीपुत्र आलम्बीपुत्रादालम्बीपुत्रो जायन्तीपुत्राज्जायन्तीपुत्रो
१३६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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माण्डूकायनीपुत्रान्माण्डूकायनीपुत्रो माण्डूकीपुत्रान्मा-
ण्डूकीपुत्रः शाण्डिलीपुत्राच्छाण्डिलीपुत्रो राथीतरी-
पुत्राद् राथीतरीपुत्रो भालुकीपुत्राद् भालुकीपुत्रः
क्रौञ्चिकीपुत्राभ्यां क्रौञ्चिकीपुत्रौ वैदभृतीपुत्राद् वैद-
भृतीपुत्रः कार्शकेयीपुत्रात् कार्शकेयीपुत्रः प्राचीनयोगी-
पुत्रात् प्राचीनयोगीपुत्रः साञ्जीवीपुत्रात् साञ्जीवीपुत्रः
प्राश्नीपुत्रादासुरिवासिनः प्राश्नीपुत्र आसुरायणादास्रु-
रायण आसुरेरासुरिः ॥ २ ॥ याज्ञवल्क्याद् याज्ञव-
ल्क्य उद्दालकादुद्दालकोऽरुणादरुण उपवेशेरुपवेशिः
कुश्रोः कुश्रिर्वाजश्रवसो वाजश्रवा जिह्वावतो बाध्यो-
गाज्जिह्वावान् बाध्योगोऽसिताद् वार्षगणादसितो
वार्षगणो हरितात् कश्यपाद्धरितः कश्यपः शिल्पात्
कश्यपाच्छिल्पः कश्यपः कश्यपान्नैध्रुवेः कश्यपो
नैध्रुविर्वाचो वागम्भिण्या अम्भिण्यादित्यादित्या-
नीमानि शुक्लानि यजूंषि वाजसनेयेन याज्ञवल्क्ये-
नाख्यायन्ते ॥ ३ ॥ समानमा सांजीवीपुत्रात् सांजी-
वीपुत्रो माण्डूकायनेर्माण्डूकायनिर्मांण्डव्यान्माण्डव्यः
कौत्सात् कौत्सो माहित्थेर्माहित्थिर्वामकक्षायणाद्
वामकक्षायणः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यो वात्स्याद्
वात्स्यः कुश्रोः कुश्रिर्यज्ञवचसो राजस्तम्बायनाद् यज्ञ-
वचा राजस्तम्बायनस्तुरात् कावषेयात् तुरः कावषेयः
प्रजापतेः प्रजापतिर्ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयम्भु ब्रह्मणे
नमः ॥ ४ ॥
अब वंशका वर्णन किया जाता है—पौतिमाषीपुत्रने कात्यायनीपुत्रसे,
कात्यायनीपुत्रने, गौतमीपुत्रसे गौतमीपुत्रने भारद्वाजीपुत्रसे, भारद्वाजीपुत्रने
पाराशरीपुत्रसे, पाराशरीपुत्रने औपस्वस्तीपुत्रसे, औपस्वस्तीपुत्रने पाराशरी-
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३६५
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३६५
पुत्रसे, पाराशरीपुत्रने कात्यायनीपुत्रसे, कात्यायनीपुत्रने कौशिकीपुत्रसे, कौशिकीपुत्रने आलम्बीपुत्रसे और वैयाघ्रपदीपुत्रसे, वैयाघ्रपदीपुत्रने काण्वीपुत्रसे तथा कापीपुत्रसे, कापीपुत्रने ॥ १ ॥ आत्रेयीपुत्रसे, आत्रेयीपुत्रने गौतमीपुत्रसे, गौतमीपुत्रने भारद्वाजीपुत्रसे, भारद्वाजीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरीपुत्रने वात्सीपुत्रसे, वात्सीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरीपुत्रने वार्कारुणीपुत्रसे, वार्कारुणीपुत्रने वार्कारुणीपुत्रसे; वार्कारुणीपुत्रने आर्तभागीपुत्रसे, आर्तभागीपुत्रने शौङ्गीपुत्रसे, शौङ्गीपुत्रने साङ्कृतीपुत्रसे, साङ्कृतीपुत्रने आलम्बायनीपुत्रसे, आलम्बायनीपुत्रने आलम्बीपुत्रसे आलम्बीपुत्रने जायन्तीपुत्रसे, जायन्तीपुत्रने माण्डूकायनीपुत्रसे, माण्डूकायनीपुत्रने माण्डूकीपुत्रसे, माण्डूकीपुत्रने शाण्डिलीपुत्रसे, शाण्डिलीपुत्रने राथीतरीपुत्रसे, राथीतरीपुत्रने भालुकीपुत्रसे, भालुकीपुत्रने दो क्रौञ्चिकीपुत्रोंसे, दोनों क्रौञ्चिकीपुत्रोंने वैदभृतीपुत्रसे, वैदभृतीपुत्रने कार्शकेयीपुत्रसे, कार्शकेयीपुत्रने प्राचीनयोगीपुत्रसे, प्राचीनयोगीपुत्रने साञ्जीवीपुत्रसे, साञ्जीवीपुत्रने आसुरिवासी प्राश्नीपुत्रसे, प्राश्नीपुत्रने आसुरायणसे, आसुरायणने आसुरिसे, आसुरिने ॥ २ ॥ याज्ञवल्क्यसे, याज्ञवल्क्यने उद्दालकसे, उद्दालकने अरुणसे, अरुणने उपवेशिसे, उपवेशिने कुश्रिसे, कुश्रिने, वाजश्रवससे, वाजश्रवाने जिह्वावान् बाध्योगसे, जिह्वावान् बाध्योगने असित वार्षगणसे, असित वार्षगणने हरित कश्यपसे, हरित कश्यपने शिल्प कश्यपसे, शिल्पकश्यपने कश्यप नैध्रुविसे, कश्यप नैध्रुविने वाक्से, वाक्ने अम्भिणीसे, अम्भिणीने आदित्यसे, आदित्यसे प्राप्त हुई ये शुक्ल-यजुःश्रुतियाँ वाजसनेय याज्ञवल्क्यद्वारा प्रसिद्ध की गयी हैं ॥ ३ ॥ साञ्जीवीपुत्रपर्यन्त यह एक ही वंश है। साञ्जीवीपुत्रने माण्डूकायनिसे, माण्डूकायनिने माण्डव्यसे, माण्डव्यने कौत्ससे, कौत्सने माहित्थिने, माहित्थिने वामकक्षायणसे, वामकक्षायणने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने वात्स्यसे, वात्स्यने कुश्रिसे, कुश्रिने यज्ञवचा राजस्तम्बायनसे, यज्ञवचा राजस्तम्बायनने तुर कावषेयसे, तुर कावषेयने प्रजापतिसे और प्रजापतिने ब्रह्मसे। ब्रह्म स्वयम्भू है, स्वयम्भू ब्रह्मको नमस्कार है ॥ ४ ॥
| अथेदानीं समस्तप्रवचनवंशः। | इसके अनन्तर अब समस्त प्रवचनका वंश बतलाया जाता है। |
|---|---|
| स्त्रीप्राधान्याद् गुणवान् पुत्रो | स्त्रीकी प्रधानता होनेसे गुणवान् पुत्र |
| १३६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
| १३६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| भवतीति प्रस्तुतम् । अतः स्त्रीविशेषणेनैव पुत्रविशेषणादाचार्यपरम्परा कीर्त्यते । तानीमानि शुक्लानीत्यव्यामिश्राणि ब्राह्मणेन। अथवा यानीमानि यजूंषि तानि शुक्लानि शुद्धानीत्येतत् ।<br><br>प्रजापतिमारभ्य यावत्पौतिमाषीपुत्रस्तावदधोमुखो नियताचार्यपूर्वक्रमो वंशः समानमा साञ्जीवीपुत्रात् । ब्रह्मणः प्रवचनाख्यस्य; तच्चैतद् ब्रह्म प्रजापतिप्रबन्धपरम्परयागत्यास्मास्वनेकधा विप्रसृतम् । अनाद्यनन्तं स्वयंभु ब्रह्म नित्यं तस्मै ब्रह्मणे नमः; नमस्तदनुवर्त्तिभ्यो गुरुभ्यः ॥ १–४ ॥ | होता है—ऐसा प्रसङ्ग है । अतः स्त्रीविशेषणसे ही पुत्रका विशेषण देकर आचार्यपरम्पराका उल्लेख जाता है । वे ये यजुःश्रुतियाँ शुक्ल अर्थात् ब्राह्मणसे अव्यामिश्र (बिना मिली हुई) हैं ।¹ अथवा ये जो यजुःश्रुतियाँ हैं वे शुद्ध हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है ।<br><br>प्रजापतिसे लेकर पौतिमाषीपुत्रतक तो यह अधोमुखवंश नियत आचार्यपरम्पराके अनुसार है, इसमें साञ्जीवीपुत्रतक सब आचार्य समान (एक वाजसनेयिशाखामें ही) हैं । ब्रह्म अर्थात् प्रवचनात्मक ब्रह्मके सम्बन्धसे । वह यह ब्रह्म प्रजापतिसे लेकर परम्परासे आकर हम सबमें अनेक प्रकारसे फैला हुआ है । वह अनादि अनन्त स्वयम्भू ब्रह्म नित्य है, उस ब्रह्मको नमस्कार है और उसके अनुवर्ती गुरुओंको भी नमस्कार है ॥ १-४॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये
पञ्चमं वंशब्राह्मणम् ॥ ५ ॥
❖
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये
षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
•••
बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्यं सम्पूर्णम्
॥ ॐ तत्सत् ॥
❖
</div>१. अर्थात् इनमें पौरुषेयत्वका दोष नहीं है ।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं
पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय
पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ श्रीहरिः ॥
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा ... | ६ | ३ | ३ | १३२४ |
| अत्र पितापिता भवति ... | ४ | ३ | २२ | ६७६ |
| अथ कर्मणामात्मेत्येतदेषा० ... | १ | ६ | ३ | ३६६ |
| अथ चक्षुरत्यवहत्तद्यदा ... | १ | ३ | १४ | १३० |
| अथ त्रयो वाव लोका ... | १ | ५ | १६ | ३६५ |
| अथ प्राणमत्यवहत्स यदा ... | १ | ३ | १३ | १२६ |
| अथ मनोऽत्यवहत्तद्यदा ... | १ | ३ | १६ | १३० |
| अथ य इच्छेत्पुत्रो मे कपिलः पिङ्गलो ... | ६ | ४ | १५ | १३५१ |
| अथ य इच्छेत्पुत्रो मे पण्डितो ... | ६ | ४ | १८ | १३५२ |
| अथ य इच्छेत्पुत्रो मे श्यामो ... | ६ | ४ | १६ | १३५२ |
| अथ य इच्छेद्दुहिता मे पण्डिता ... | ६ | ४ | १७ | १३५२ |
| अथ यदा सुषुप्तो भवति ... | २ | १ | १६ | ४४८ |
| अथ यद्युदक आत्मानं ... | ६ | ४ | ६ | १३४२ |
| अथ यस्य जायामार्तवं ... | ६ | ४ | १३ | १३४६ |
| अथ यस्य जायायै ... | ६ | ४ | १२ | १३४७ |
| अथ यामिच्छेद्दधीतेति ... | ६ | ४ | ११ | १३४६ |
| अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति ... | ६ | ४ | १० | १३४५ |
| अथ ये यज्ञेन दानेन ... | ६ | २ | १६ | १३११ |
| अथ रूपाणां चक्षु० ... | १ | ६ | २ | ३६५ |
| अथ वं॒शः। पौतिमाषी० ... | ६ | ५ | १ | १३६३ |
| अथ वं॒शः। पौतिमाष्यो ... | २ | ६ | १ | ६१५ |
| अथ वं॒शः पौतिमाष्यो ... | ४ | ६ | १ | ११५८ |
| अथ श्रोत्रमत्यवहत्तद्यदा ... | १ | ३ | १५ | १३० |
| अथ ह चक्षुरूचुः ... | १ | ३ | ४ | ११२ |
| अथ ह प्राणं उत्क्रमि० ... | ६ | १ | १३ | १२६० |
| अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न ... | १ | ३ | ३ | १११ |
| अथ ह मन ऊचुः ... | १ | ३ | ६ | ११३ |
| अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे ... | ४ | ५ | १ | ११२८ |
| अथ ह वाचक्नव्युवाच ... | ३ | ८ | १ | ७५८ |
( १३६६ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| अथ ह श्रोत्रमूचुः | १ | ३ | ५ | ११२ |
| अथ हेममासन्यं प्राण० | १ | ३ | ७ | ११५ |
| अथ हैनमसुर्रा ऊचुः | ५ | २ | ३ | ११८३ |
| अथ हैनमुद्दालक आ० | ३ | ७ | १ | ७४१ |
| अथ हैनमुषस्तश्चाक्रा० | ३ | ४ | १ | ६६८ |
| अथ हैनं कहोलः कौ० | ३ | ५ | १ | ७०६ |
| अथ हैनं गार्गी वाच० | ३ | ६ | १ | ७३६ |
| अथ हैनं जारत्कारव | ३ | २ | १ | ६५२ |
| अथ हैनं भुज्युर्लाह्या० | ३ | ३ | १ | ६६० |
| अथ हैनं मनुष्या ऊचुः | ५ | २ | २ | ११८२ |
| अथ हैनं विदग्धः शा० | ३ | ९ | १ | ७८५ |
| अथ होवाच ब्राह्मणा | ३ | ९ | २७ | ८२३ |
| अथातः पवमानानामे० | १ | ३ | २८ | १५५ |
| अथातः सम्प्रत्तिर्यदा | १ | ५ | १७ | ३६६ |
| अथातो व्रतमीमाँसा | १ | ५ | २१ | ३८१ |
| अथात्मनेऽन्नाद्यमागा० | १ | ३ | १७ | १३१ |
| अथाधिदैवतं ज्वलिष्या० | १ | ५ | २२ | ३८६ |
| अथाध्यात्ममिदमेवं मूर्तं | २ | ३ | ४ | ५२१ |
| अथाभिप्रायरेव स्थाली० | ६ | ४ | १६ | १३५५ |
| अथामूर्तं प्राणश्च यश्चा० | २ | ३ | ५ | ५२३ |
| अथामूर्तं वायुश्चान्तरिक्षं | २ | ३ | ३ | ५१७ |
| अथास्य दक्षिणं कर्णम० | ६ | ४ | २५ | १३६० |
| अथास्य नाम करोति | ६ | ४ | २६ | १३६१ |
| अथास्य मातरमभिम० | ६ | ४ | २८ | १३६२ |
| अथास्या ऊरू विहाय० | ६ | ४ | २१ | १३५७ |
| अथेत्यभ्यमन्थत्स मुखाच्च | १ | ४ | ६ | १८१ |
| अथैतद्वामेऽक्षणि | ४ | २ | ३ | ८६१ |
| अथैतस्य प्राणस्यापः | १ | ५ | १३ | ३५५ |
| अथैतस्य मनसो द्यौः | १ | ५ | १२ | ३५३ |
| अथैनमग्नये | ६ | २ | १४ | १३०१ |
| अथैनमभिमृशति | ६ | ३ | ४ | १३२६ |
| अथैनमाचामति | ६ | ३ | ६ | १३२७ |
| अथैनमुद्यच्छत्यामँ ० | ६ | ३ | ५ | १३२७ |
| अथैनं मात्रे प्रदाय | ६ | ४ | २७ | १३६१ |
( १३७० )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| अथैनं वसत्योपमन्त्रया० | ६ | २ | ३ | १२७६ |
| अथैनामभिपद्यते | ६ | ४ | २० | १३५६ |
| अथैष श्लोको भवति | १ | ५ | २३ | ३८८ |
| अथो अयं वा आत्मा | १ | ४ | १६ | ३०५ |
| अद्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च | १ | ५ | २० | ३७७ |
| अनन्दा नाम ते लोका | ४ | ४ | ११ | १०७८ |
| अन्धं तमः प्रविशन्ति | ४ | ४ | १० | १०७७ |
| अन्नं ब्रह्मेत्येक आहु० | ५ | १२ | १ | १२१३ |
| अयमग्निः सर्वेषां भूतानां | २ | ५ | ३ | ५८५ |
| अयमग्निवैश्वानरो | ५ | ९ | १ | १२०७ |
| अयमाकाशः सर्वेषां | २ | ५ | १० | ५८६ |
| अयमात्मा सर्वेषां भूतानां | २ | ५ | १४ | ५६३ |
| अयमादित्यः सर्वेषां | २ | ५ | ५ | ५८६ |
| अयं चन्द्रः सर्वेषां | २ | ५ | ७ | ५८८ |
| अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां | २ | ५ | ११ | ५६० |
| अयं वायुः सर्वेषां | २ | ५ | ४ | ५८५ |
| अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम | ६ | २ | ११ | १२६६ |
| अयँ स्तनयित्नुः सर्वेषां | २ | ५ | ६ | ५८६ |
| असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम | ६ | २ | ९ | १२८८ |
| अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किंज्योति० | ४ | ३ | ३ | ८७५ |
| अस्तमित आदित्ये... चन्द्रमस्यस्तमिते किंज्योतिरेवा० | ४ | ३ | ४ | ८७५ |
| अस्तमित आदित्ये शान्तेऽग्नौ | ४ | ३ | ५ | ८७६ |
| अस्तमित आदित्ये... शान्तायां वाचि | ४ | ३ | ६ | ८७८ |
| अहर्वा अश्वं पुरस्तात् | १ | १ | २ | ४५ |
| अहल्लिकेति होवाच | ३ | ९ | २५ | ८१६ |
| आकाश एक यस्याय० | ३ | ९ | १३ | ७६६ |
| आग्निवेश्यादाग्निवेश्य० | २ | ६ | २ | ६१५ |
| आग्निवेश्यादाग्निवेश्यो | ४ | ६ | २ | ११५६ |
| आत्मानं चेद्विजानीयाद० | ४ | ४ | १२ | १०७८ |
| आत्मैवेदमग्र आसीत्पु० | १ | ४ | १ | १६४ |
| आत्मैवेदमग्र आसीदेक | १ | ४ | १७ | ३११ |
| आत्रेयीपुत्रादात्रेयीपुत्रो | ६ | ५ | २ | १३६३ |
| आप एव यस्यायतनँ | ३ | ९ | १६ | ८०२ |
( १३७१ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| आप एवेदमग्र आसु० ... | ५ | ५ | १ | ११६४ |
| आपो वा अर्कस्तद्यदपाँ ... | १ | २ | २ | ६७ |
| आराममस्य पश्यन्ति | ४ | ३ | १४ | ६३८ |
| इदं मानुषँ सर्वेषां ... | २ | ५ | १३ | ५६३ |
| इदं वै तन्मधु...पश्यन्नवोचत् । आथर्व० | २ | ५ | १७ | ६०७ |
| इदं वै तन्मधु...पश्यन्नवोचत् । तद्वां | २ | ५ | १६ | ६०३ |
| इदं वै तन्मधु...पश्यन्नवोचत् । पुरश्चक्रे | २ | ५ | १८ | ६१० |
| इदं वै तन्मधु...पश्यन्नवोचत् । रूपँ ... | २ | ५ | १९ | ६१२ |
| इदं सत्यँ सर्वेषां ... | २ | ५ | १२ | ५६२ |
| इन्धो ह वै नामैष ... | ४ | २ | २ | ८६० |
| इमा आपः सर्वेषां ... | २ | ५ | २ | ५८४ |
| इमा दिशः सर्वेषां ... | २ | ५ | ६ | ५८७ |
| इमावेव गौतमभरद्वाजा० ... | २ | २ | ४ | ५१० |
| इयं पृथिवी सर्वेषां ... | २ | ५ | १ | ५८२ |
| इयं विद्युत्सर्वेषां भूतानां ... | २ | ५ | ८ | ५८८ |
| इहैव सन्तोऽथ विद्म० ... | ४ | ४ | १४ | १०८२ |
| उक्थं प्राणो वा उक्थं ... | ५ | १३ | १ | १२१८ |
| उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य ... | १ | १ | १ | ३६ |
| ऋचो यजूंषि ... | ५ | १४ | २ | १२२४ |
| एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्र० ... | ४ | ४ | २० | १०८८ |
| एकीभवति न पश्यती० ... | ४ | ४ | २ | १०२८ |
| एतद्व वै तज्जनको ... | ५ | १४ | ८ | १२३६ |
| एतद्ध स्म वै तद्विद्वानु० ... | ६ | ४ | ४ | १३३६ |
| एतद्वै परमं तपो ... | ५ | ११ | १ | १२११ |
| एतमु हैव चूलो ... | ६ | ३ | १० | १३३१ |
| एतमु हैव जानकिराय० ... | ६ | ३ | ११ | १३३१ |
| एतमु हैव मधुकः ... | ६ | ३ | ९ | १३३१ |
| एतमु हैव वाजसनेयो ... | ६ | ३ | ८ | १३३० |
| एतमु हैव सत्यकामो ... | ६ | ३ | १२ | १३३१ |
| एतस्य वा अक्षरस्य ... | ३ | ८ | ८ | ७६६ |
| एष उ एव बृहस्पति० ... | १ | ३ | २० | १४० |
| एष उ एव ब्रह्मणस्पति० ... | १ | ३ | २१ | १४२ |
| एष उ एव साम वाग्वै ... | १ | ३ | २२ | १४४ |
| एष उ वा उद्गीथः ... | १ | ३ | २३ | १४७ |
( १३७२ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | सं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| एष प्रजापतिर्यद् | ५ | ३ | १ | ११८८ |
| एषां वै भूतानां पृथिवी | ६ | ४ | १ | १३३५ |
| कतम आत्मेति योऽयं | ४ | ३ | ७ | ८६१ |
| कतम आदित्या इति | ३ | ९ | ५ | ७६० |
| कतम इन्द्रः कतमः | ३ | ९ | ६ | ७६० |
| कतमे ते त्रयो देवा | ३ | ९ | ८ | ७६२ |
| कतमे रुद्रा इति | ३ | ९ | ४ | ७५८ |
| कतमे वसव इत्यग्निश्च | ३ | ९ | ३ | ७५८ |
| कतमे षडित्यग्निश्च | ३ | ९ | ७ | ७६१ |
| कस्मिन्नु त्वं चात्मा | ३ | ९ | २६ | ८१७ |
| काम एव यस्यायतनं | ३ | ९ | ११ | ७६७ |
| किंदेवतोऽस्यामुदीच्यां | ३ | ९ | २३ | ८१३ |
| किंदेवतोऽस्यां दक्षिणायां | ३ | ९ | २१ | ८०६ |
| किंदेवतोऽस्यां ध्रुवायां | ३ | ९ | २४ | ८१५ |
| किंदेवतोऽस्यां प्रतीच्यां | ३ | ९ | २२ | ८११ |
| किंदेवतोऽस्यां प्राच्यां | ३ | ९ | २० | ८०६ |
| क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रं प्राणो | ५ | १३ | ४ | १२२१ |
| खं ब्रह्म । खं पुराणं | ५ | १ | १ | ११७५ |
| घृतकौशिकाद्घृतकौशिकः | २ | ६ | ३ | ६१६ |
| घृतकौशिकाद्घृतकौशिकः | ४ | ६ | ३ | ११५६ |
| चक्षुर्वै ग्रहः | ३ | २ | ५ | ६५६ |
| चक्षुर्होच्चक्राम | ६ | १ | ८ | १२५७ |
| चतुरौदुम्बरो भवत्यौदु० | ६ | ३ | १३ | १३३३ |
| जनको ह वैदेह आ० | ४ | १ | १ | ८४१ |
| जनको ह वैदेहः कूर्चा० | ४ | २ | १ | ८५७ |
| जनको ह वैदेहो बहु० | ३ | १ | १ | ६२० |
| जनकं ह वैदेहं याज्ञ० | ४ | ३ | १ | ८७० |
| जात एव न जायते | ३ | ९ | ७-२८ | ८२६ |
| जातेऽग्निमुपसमाधायाङ्क | ६ | ४ | २४ | १३५६ |
| जिह्वा वै ग्रहः | ३ | २ | ४ | ६५६ |
| ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय | ६ | ३ | २ | १३२४ |
| तदभिमृशेदग्नु वा | ६ | ४ | ५ | १३४१ |
| तदाहुर्यदयमेक इवैव | ३ | ९ | ६ | ७६३ |
| तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया | १ | ४ | ९ | २४० |
( १३७३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो ... | १ | ४ | ८ | २३६ |
| तदेतदृचाभ्युक्तम् । एष ... | ४ | ४ | २३ | १११७ |
| तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट्० ... | १ | ४ | १५ | २६४ |
| तदेतन्मूर्तं यदन्यत् ... | २ | ३ | २ | ५१५ |
| तदेतेश्लोकाभवन्ति।अणुःपन्था विततः | ४ | ४ | ८ | १०७० |
| तदेते···स्वप्नेन ... | ४ | ३ | ११ | ६३५ |
| तदेष श्लोको भवति । अर्वाग्बिलश्चमस | २ | ३ | ३ | ५०८ |
| तदेष···तदेव सक्तः सह ... | ४ | ४ | ६ | १०४८ |
| तदेष···यदा सर्वे ... | ४ | ४ | ७ | १०६५ |
| तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकिता० ... | १ | ३ | २४ | १४८ |
| तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् ... | १ | ४ | ७ | १६१ |
| तद् यत्तत्सत्यमसौ ... | ५ | ५ | २ | ११६७ |
| तद् यथा तृणजलायुका ... | ४ | ४ | ३ | १०३७ |
| तद् यथानः सुसमाहित० ... | ४ | ३ | ३५ | १०१४ |
| तद् यथा पेशस्कारी पेश० ... | ४ | ४ | ४ | १०३६ |
| तद् यथा महामत्स्य उभे ... | ४ | ३ | १८ | ६५६ |
| तद् यथा राजानमायान्त० ... | ४ | ३ | ३७ | १०२१ |
| तद् यथा राजानं प्रयि० ... | ४ | ३ | ३८ | १०२३ |
| तद् यथास्मिन्नाकाशे ... | ४ | ३ | १९ | ६५६ |
| तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा ... | ४ | ३ | २१ | ६६८ |
| तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं ... | ३ | ८ | ११ | ७७८ |
| तद्वै तदेतदेव ... | ५ | ४ | १ | ११६१ |
| तम एव यस्यायतनं ... | ३ | ९ | १४ | ८०० |
| तमेताः समाक्षितय ... | २ | २ | २ | ५०६ |
| तमेव धीरो विज्ञाय ... | ४ | ४ | २१ | १०६१ |
| तस्मिञ्छुक्लमुत नीलमाहुः ... | ४ | ४ | ९ | १०७३ |
| तस्य प्राची दिक्प्राञ्चः ... | ४ | २ | ४ | ८६५ |
| तस्य वा एतस्य पुरुषस्य ... | ४ | ३ | ९ | ६२३ |
| तस्य हैतस्य पुरुषस्य ... | २ | ३ | ६ | ५२४ |
| तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद | १ | ३ | २७ | १५४ |
| तस्य ॰॰सुवर्णं वेद . ... | १ | ३ | २६ | १५३ |
| तस्य···स्वं वेद ... | १ | ३ | २५ | १५० |
| तस्या उपस्थानं गायत्र्य० ... | ५ | १४ | ७ | १२३६ |
| तस्या वेदिरुपस्थो ... | ६ | ४ | ३ | १३३८ |