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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

१५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

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१५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| त्वाच्च यथापठित एव स्वरः प्रयोक्तव्यो न मान्त्रः। याजमानं जपकर्म। <br><br> एतानि तानि यजूंषि—‘असतो मा सद्गमय’ ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ ‘मृत्योर्मामृतं गमय’ इति। मन्त्राणामर्थस्तिरोहितो भवतीति स्वयमेव व्याचष्टे ब्राह्मणं मन्त्रार्थम्—स मन्त्रो यदाह यदुक्तवान्कोऽसावर्थः? इत्युच्यते— <br><br> ‘असतो मा सद्गमय’ इति मृत्युर्वा असत्—स्वाभाविककर्मविज्ञाने मृत्युरित्युच्येते, असद् अत्यन्ताधोभावहेतुत्वात्। सदमृतम्—सच्छास्त्रीयकर्मविज्ञाने-ऽमरणहेतुत्वादमृतम्। तस्मादसतो असत्कर्मणोऽज्ञानाच्च मा मां सच्छास्त्रीयकर्मविज्ञाने गमय देवभावसाधनात्मभावमापादयेत्यर्थः। | ब्राह्मणभागजनित होनेके कारण इनमें इनके पाठके अनुसार ही स्वरका प्रयोग करना चाहिये, मान्त्रस्वरका नहीं १। यह जपकर्म यजमानका है। <br><br> वे यजुर्मन्त्र ये हैं—‘असतो मा सद्गमय’, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’, ‘मृत्योर्मामृतं गमय’। मन्त्रोंका अर्थ गूढ़ होता है, इसलिये ब्राह्मण स्वयं ही इन मन्त्रोंके अर्थकी व्याख्या करता है। जिसे वह मन्त्र कहता है, वह अर्थ क्या है ? सो बतलाया जाता है—‘असतो मा सद्गमय’ इस मन्त्रमें मृत्यु ही असत् है, स्वाभाविक कर्म और विज्ञानको मृत्यु कहते हैं। वह अत्यन्त अधोगतिका हेतु होनेके कारण असत् है। सत् अमृत है, सत् शास्त्रीय कर्म और विज्ञानका नाम है, वह अमरताका हेतु होनेके कारण अमृत है। अतः असत्—असत्कर्म अर्थात् अज्ञानसे मुझे सत्—शास्त्रीय कर्म और विज्ञानको प्राप्त कराओ। अर्थात् देवभावके साधनभूत आत्मभावकी प्राप्ति कराओ। यहाँ श्रुति वाक्यका |


१. जहाँ मान्त्रस्वर विवक्षित होता है वह तृतीयासे निर्देश किया जाता है; जैसे—"उच्चैर्ऋचा क्रियते" "उच्चैःसाम्ना" "उपांशु यजुषा" इत्यादि वाक्योंमें कहा गया है। परंतु यहाँ 'एतानि' ऐसा द्वितीया विभक्तिका निर्देश है। इसलिये इस सनमें जपकर्मकी ही प्रतीति होती है, मान्त्रस्वरकी प्रतीति नहीं होती।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १५९

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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १५९


संस्कृतहिन्दी
तत्र वाक्यार्थमाह—अमृतं मा कुर्वित्येवैतदाहेति ।फलित अर्थ बतलाती है—'मुझे अमर करो' यही कहता है।
तथा तमसो मा ज्योतिर्गमयेति । मृत्युर्वै तमः सर्वमज्ञानमावरणात्मकत्वात्तमः तदेव च मरणहेतुत्वान्मृत्युः। ज्योतिरमृतं पूर्वोक्तविपरीतं दैवं स्वरूपम् । प्रकाशात्मकत्वाज्ज्ञानं ज्योतिः, तदेवामृतमविनाशात्मकत्वात्। तस्मात्तमसो मा ज्योतिर्गमयेति पूर्ववन्मृत्योर्मामृतं गमयेत्यादि । अमृतं मा कुर्वित्येवैतदाह—दैवं प्राजापत्यं फलभावमापादयेत्यर्थः ।तथा 'तमसो मा ज्योतिर्गमय'—इस मन्त्रमें मृत्यु ही तम है; आवरणात्मक होनेके कारण सारा ही अज्ञान तम है और वही मरणका हेतु होनेके कारण मृत्यु है। अमृत ज्योति है; वह पहले बतलाये हुए मृत्युसे विपरीत दैव-देवतासम्बन्धी स्वरूप है। प्रकाशस्वरूप होनेके कारण ज्ञान ही ज्योति है; वही अविनाशात्मक होनेके कारण अमृत है। अतः 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' इसका अर्थ पूर्ववत् 'मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ' इत्यादि है [उक्त वाक्यद्वारा जप करनेवाला] यही कहता है कि मुझे अमर करो अर्थात् मुझे देवता और प्रजापतिसम्बन्धी फल प्राप्त कराओ।
पूर्वो मन्त्रोऽसाधनस्वभावात् साधनभावमापादयेति । द्वितीयस्तु साधनभावादपि अज्ञानरूपात् साध्यभावमापादयेति । मृत्योर्मामृतं गमयेति पूर्वयोरेव मन्त्रयोः समुच्चितोऽर्थस्तृतीयेनइनमें पहला मन्त्र 'मुझे असाधनस्वभावसे साधनस्वभावको प्राप्त करो' ऐसा कहता है। दूसरा मन्त्र 'मुझे अज्ञानरूप साधनभावसे भी साध्य भावको प्राप्त करो' ऐसा कहता है। तथा 'मृत्योर्मामृतं गमय' इस तृतीय मन्त्रद्वारा पहले दोनों मन्त्रोंका ही समुच्चित अर्थ कहा गया है।

१६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

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१६०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
संस्कृतहिन्दी
मन्त्रेणोच्यत इति प्रसिद्धार्थतैव । नात्र तृतीये मन्त्रे तिरोहितमन्तर्हितमिवार्थरूपं पूर्वयोरिव मन्त्रयोरस्ति, यथाश्रुत एवार्थः ।इसलिये इसका अर्थ तो प्रसिद्ध ही है । पूर्व दोनों मन्त्रोंके समान इस तृतीय मन्त्रमें कोई छिपा हुआ-सा अर्थका रूप नहीं है । इसका अर्थ यथाश्रुत (प्रसिद्धिके अनुसार) ही है ।
याजमानमुद्गानं कृत्वा पवमानेषु त्रिषु, अथानन्तरं यानीतराणि शिष्टानि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत् प्राणविदुद्गाता प्राणभूतः प्राणवदेव । यस्मात्स एव उद्गातैवं प्राणं यथोक्तं वेत्ति, अतः प्राणवदेव तं कामं साधयितुं समर्थः । तस्माद्यजमानस्तेषु स्तोत्रेषु प्रयुज्यमानेषु वरं वृणीत, यं कामं कामयेत तं कामं वरं वृणीत प्रार्थयेत । यस्मात्स एष एवंविदुद्गातेति तस्माच्छब्दात्प्रागेव सम्बध्यते । आत्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते इच्छत्युद्गाता तमागायत्यागानेन साधयति ।तीन पवमान स्तोत्रोंमें यजमान-सम्बन्धी उद्गान कर इसके पश्चात् जो अवशिष्ट स्तोत्र हैं उनमें प्राणोपासक उद्गाता प्राणभूत होकर प्राणके ही समान अपने लिये अन्नाद्यका आगान करे; क्योंकि वह उद्गाता इस प्रकार उपर्युक्त प्राणको जानता है, इसलिये प्राणके समान ही वह उस कामनाको सिद्ध करनेमें समर्थ है । अतः उन स्तोत्रोंका प्रयोग किये जानेपर यजमानको वर माँगना चाहिये । उसे जिस भोगकी इच्छा हो उसी भोगका वर माँगे; क्योंकि वह यह इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता अपने या यजमानके लिये जिस भोगकी इच्छा करता है उसीका आगान कर सकता है अर्थात् आगानद्वारा उसे सिद्ध कर लेता है—इस वाक्यका [ 'तस्मादु तेषु वरं वृणीत' इस वाक्यके ] तस्मादु शब्दके पहले अन्वय होगा ।
एवं तावज्ज्ञानकर्मभ्यां प्राणात्मापत्तिरित्युक्तम् । तत्र नास्त्या-इस प्रकार यहाँतक यह बतलाया गया कि ज्ञान और कर्म दोनोंके समुच्चयद्वारा प्राणात्मत्वकी प्राप्ति होती है । उसमें किसी आशङ्काकी

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १६१

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ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १६१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
शङ्कासम्भवः। अतः कर्मापाये प्राणापत्तिर्भवति वा न वा? इत्याशङ्क्यते। तदाशङ्कानिवृत्त्यर्थमाह—तद्धैतल्लोकजिदेवेति। तद्ध तदेतत्प्राणदर्शनं कर्मवियुक्तं केवलमपि, लोकजिदेवेति लोकसाधनमेव। न ह एवालोक्यतायै अलोकार्कत्वाय आशा आशंसनं प्रार्थनं नैवास्ति ह। न हि प्राणात्मनि उत्पन्नात्माभिमानस्य तत्प्राप्त्याशंसनं सम्भवति। न हि ग्रामस्थः कदा ग्रामं प्राप्नुयामित्यरण्यस्थ इवाशास्ते। असन्निकृष्टविषये ह्यनात्मन्याशंसनम्, न तत्स्वात्मनि सम्भवति। तस्मान्नाशास्ति कदाचित्प्राणात्मभावं न प्रपद्येयमिति।सम्भावना नहीं है। अतः अब यह शङ्का होती है कि कर्मके अभावमें [ केवल प्राणविज्ञानद्वारा ] प्राणात्मभावकी प्राप्ति होती है या नहीं? इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये श्रुति कहती है—‘तद्धैतल्लोकजिदेव’ अर्थात् वह यह प्राणविज्ञान कर्मसे रहित अकेला होनेपर भी लोकजित्—लोकप्राप्तिका साधन ही है। अलोक्यता अर्थात् लोकप्राप्तिकी अयोग्यताके लिये तो आशा—आशंसन अर्थात् प्रार्थना होती ही नहीं है। जिसे प्राणात्मामें आत्मत्वका अभिमान उत्पन्न हो गया है उसे उसकी प्राप्तिकी आशा होना सम्भव नहीं है; क्योंकि जो पुरुष गाँवमें मौजूद है वह वनस्थ पुरुषके समान ‘मैं कब गाँवमें पहुँचूँगा’—ऐसी आशा नहीं करता। अपनेसे दूर रहनेवाली अनात्मवस्तुके लिये ही ऐसी आशा हो सकती है, अपने आत्माके लिये उसका होना सम्भव नहीं है। अतः वह ‘कदाचित् मैं प्राणात्मभावको प्राप्त न होऊँ’ ऐसी आशंका नहीं करता।
कस्यैतत्? य एवमेतत्साम प्राणं यथोक्तं निर्धारितमहिमानंयह फल किसे प्राप्त होता है? जो इस प्रकार इस सामको अर्थात् ऊपर निश्चित हुई महिमावाले यथोक्त प्राणको

बृ० उ० ११—

१६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

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१६२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| वेद—अहमस्मि प्राण इन्द्रियविषयासङ्गैरसुरैः पाप्मभिरधर्षणीयो विशुद्धः, वागादिपञ्चकं च मदाश्रयत्वादग्न्याद्यात्मरूपं स्वाभाविकविज्ञानोत्थेन्द्रियविषयासङ्गजनितासुरपाप्मदोषवियुक्तं सर्वभूतेषु च मदाश्रयान्नाद्योपयोगबन्धनम्, आत्मा चाहं सर्वभूतानामाङ्गिरसत्वात्, ऋग्यजुःसामोद्गीथभूतायाश्च वाच आत्मा तद्व्याप्तेस्तन्निर्वर्तकत्वाच्च, मम साम्नो गीतिभावमापद्यमानस्य बाह्यं धनं भूषणं सौस्वर्यं ततोऽप्यन्तरं सौवर्णं लाक्षणिकं सौस्वर्यम्, गीतिभावमापद्यमानस्य मम कण्ठादिस्थानानि प्रतिष्ठा। एवं-गुणोऽहं पुत्तिकादिशरीरेषु कात्स्न्र्येन परिसमाप्तोऽमूर्तत्वात्सर्वगतत्वाच्च—इति आ एवमभिमानाभिव्यक्तेर्वेदोपास्त इत्यर्थः॥ २८ ॥ | जानता है। 'मैं इन्द्रियोंके विषयोंकी आसक्तिरूप आसुर पापोंसे अधर्षणीय विशुद्ध प्राण हूँ। वागादि पाँच प्राण मेरे आश्रित होनेके कारण स्वाभाविक विज्ञानजनित इन्द्रिय-विषयासक्तिसे होनेवाले आसुर पापरूप दोषसे रहित अग्न्यादि देवतास्वरूप और समस्त भूतोंमें मेरे आश्रयसे अन्नाद्यके उपयोगके हेतु हैं। आङ्गिरस होनेके कारण मैं समस्त भूतोंका आत्मा हूँ। ऋक्, यजुः, साम और उद्गीथरूपा वाणीका, उसमें व्याप्त और उसका निर्वर्तक होनेके कारण मैं आत्मा हूँ। गीतिभावको प्राप्त हुए मुझ सामका सुस्वरता बाह्य धन यानी भूषण है और लाक्षणिक सुस्वरतारूप सुवर्णता उसकी अपेक्षा आन्तर धन है। गीतिभावको प्राप्त हुए मेरी कण्ठादि स्थान प्रतिष्ठा हैं। ऐसे गुणोंवाला मैं अमूर्त्त और सर्वगत होनेके कारण पुत्तिकादि शरीरोंमें पूर्णतया व्याप्त हूँ'—इस प्रकारका अभिमान उत्पन्न होनेतक जो प्राणको जानता अर्थात् उसकी उपासना करता है [ उसे उपर्युक्त फल मिलता है ]॥ २८ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये
तृतीयमुद्गीथब्राह्मणम् ॥ ३ ॥

चतुर्थ ब्राह्मण

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चतुर्थ ब्राह्मण

ग्रन्थ-सम्बन्ध

| ज्ञानकर्मभ्यां समुच्चिताभ्यां प्रजापतित्वप्राप्तिर्व्याख्याता केवलप्राणदर्शनेन च 'तद्वैतल्लोकजिदेव' इत्यादिना। प्रजापतेः फलभूतस्य सृष्टिस्थितिसंहारेषु जगतः स्वातन्त्र्यादिविभूत्युपवर्णनेन ज्ञानकर्मणोर्वैदिकयोः फलोत्कर्षो वर्णयितव्य इत्येवमर्थमारभ्यते। तेन च कर्मकाण्डविहितज्ञानकर्मस्तुतिः कृता भवेत्सामर्थ्यात्। <br><br> विवक्षितं त्वेतत्—सर्वमप्येतज्ज्ञानकर्मफलं संसार एव, भयारत्यादियुक्तत्वश्रवणात्, कार्यकारणलक्षणत्वाच्च स्थूलव्यक्तानित्यविषयत्वाच्चेति। ब्रह्मविद्यायाः केवलाया वक्ष्यमाणाया मोक्षहेतु- | [तृतीय ब्राह्मणमें] समुच्चित ज्ञान और कर्मसे तथा 'तद्वैतल्लोकजिदेव' इत्यादि वाक्यद्वारा केवल प्राणविज्ञानसे भी प्रजापतित्वकी प्राप्तिका व्याख्यान किया गया। अब उनके फलभूत प्रजापतिकी, जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारमें, स्वतन्त्रतारूप विभूतिका वर्णन करके वैदिक ज्ञान और कर्मके फलोत्कर्षका वर्णन करना है, इसीलिये इस ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है। उस (फलोत्कर्षके वर्णन) से ही उसकी सामर्थ्यके कारण, कर्मकाण्डविहित ज्ञान और कर्मकी स्तुति हो जायगी। <br><br> कहना तो यह है कि यह ज्ञान और कर्मका सभी फल संसार ही है, क्योंकि इसका भय और अरति आदिसे युक्त होना सुना गया है, इसके अतिरिक्त यह कार्य-करणरूप है तथा स्थूल, व्यक्त और अनित्य-को विषय करनेवाला है। तथा अब कही जानेवाली केवल ब्रह्मविद्या मोक्षकी हेतु है—इस आगामी |

१६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

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१६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| त्वमित्युत्तरार्थं चेति । न हि संसारविषयात्साध्यसाधनादिभेदलक्षणाद् अविरक्तस्य आत्मैकत्वज्ञानविषयेऽधिकारः, अतृषितस्येव पाने । तस्माज्ज्ञानकर्मफलोत्कर्षवर्णनमुत्तरार्थम् । तथा च वक्ष्यति—"तदेतत्पदनीयमस्य" (बृ० उ० १ । ४ । ७) "तदेतत्प्रेयः पुत्रात्" (बृ० उ० १ । ४ । ८) इत्यादि । | विषयका प्रदर्शन करनेके लिये भी यह कथन है। जिस प्रकार तृषाहीनकी जल पीनेमें प्रवृत्ति नहीं होती उसी प्रकार जो साध्यसाधनादि भेदरूप सांसारिक विषयसे विरक्त नहीं है उसका आत्माके एकत्वज्ञानरूप विषयमें अधिकार नहीं है। अतः ज्ञान और कर्मके फलोत्कर्षका वर्णन आगेके विषय (ब्रह्मविद्या) के लिये है। ऐसा ही श्रुति कहेगी भी— "यह इसका प्राप्तव्य है", "यह पुत्रसे अधिक प्रिय है" इत्यादि। |

प्रजापतिके अहंनामा होनेका कारण और उसकी इस प्रकार उपासना करनेका फल

आत्मैवेदमग्र आसीत्पुरुषविधः सोऽनुवीक्ष्य नान्यदात्मनोऽपश्यत्सोऽहमस्मीत्यग्रे व्याहरत्ततोऽहंनामाभवत्तस्मादप्येतर्ह्यामन्त्रितोऽहमयमित्येवाग्र उक्त्वाथान्यन्नाम प्रब्रूते यदस्य भवति स यत्पूर्वोऽस्मात्सर्वस्मात्सर्वान्पाप्मन औषत्तस्मात्पुरुष ओषति ह वै स तं योऽस्मात्पूर्वो बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥

पहले यह पुरुषाकार आत्मा ही था। उसने आलोचना करनेपर अपनेसे भिन्न और कोई न देखा। उसने आरम्भमें 'अहमस्मि'¹ ऐसा कहा, इसलिये वह 'अहम्' नामवाला हुआ। इसीसे अब भी पुकारे जानेपर पहले 'अयमहम्'² ऐसा ही कहकर उसके पश्चात् अपना जो दूसरा नाम


१. मैं हूँ। २. यह मैं हूँ।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६५

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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६५


होता है वह बतलाता है; क्योंकि इस सबसे पूर्ववर्ती उस [ आत्मासंज्ञक प्रजापति ] ने समस्त पापोंको उषित—दग्ध कर दिया था इसलिये यह पुरुष हुआ। जो ऐसी उपासना करता है वह उसे दग्ध कर देता है जो उससे पहले प्रजापति होना चाहता है ॥ १ ॥

आत्मैवात्मेति प्रजापतिः प्रथमोऽण्डजः शरीर्यभिधीयते। वैदिकज्ञानकर्मफलभूतः स एव। किम् ? इदं शरीरभेदजातं तेन प्रजापतिशरीरेणाविभक्तम्। आत्मैवासीदग्रे प्राक्शरीरान्तरोत्पत्तेः। स च पुरुषविधः पुरुषप्रकारः शिरःपाण्यादिलक्षणो विराट्।'आत्मैव'—यहाँ 'आत्मा' इस शब्दसे अण्डेसे उत्पन्न हुआ प्रथम शरीरी प्रजापति ही कहा जाता है। वही वैदिक ज्ञान और कर्मका फलभूत है। ऐसा क्यों है ? क्योंकि यह शरीरादि भेदसमुदाय उस प्रजापतिके शरीरसे अभिन्न है। कारण, शरीरान्तरकी उत्पत्तिसे पूर्व आत्मा ही था। वह पुरुषविध—पुरुषकी तरह शिर एवं हाथ-पैर आदि लक्षणवाला विराट् पुरुष था।
स एव प्रथमः सम्भूतोऽनुवीक्ष्यान्वालोचनं कृत्वा, कोऽहं किंलक्षणो वास्मीति, नान्यद्वस्त्वन्तरम् आत्मनः प्राणपिण्डात्मकार्यकरणरूपान्न अपश्यन्न ददर्श। केवलं त्वात्मानमेव सर्वात्मानमपश्यत्। तथा पूर्वजन्मश्रौतविज्ञानसंस्कृतः, सोऽहं प्रजापतिः सर्वात्माहमस्मीत्यग्रे व्याहरद्व्याहृतवान्। ततस्तस्माद्यतः पूर्वज्ञानसंस्काराद् आत्मानमेवाहमित्यभ्यधादग्रेप्रथम उत्पन्न हुए उस प्रजापतिने अन्वीक्ष्य—अन्वालोचन कर 'मैं कौन हूँ और कैसे लक्षणोंवाला हूँ' इत्यादि रूपसे विचारकर अपने प्राणसमुदायरूप देहेन्द्रियसंघातसे भिन्न कोई और पदार्थ नहीं देखा। केवल अपनेको ही सर्वात्मरूपसे देखा तथा पूर्वजन्मके 'वह मैं सर्वात्मा प्रजापति हूँ' इस श्रौतविज्ञानजनित संस्कारसे युक्त होनेके कारण सबसे पहले “अहमस्मि” ऐसा कहा। इसीसे, क्योंकि पूर्वज्ञानके संस्कारसे उसने आरम्भमें अपनेको 'अहम्' ऐसा

| १६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |

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१६६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| तस्मादहंनामाभवत् । तस्योपनिषदहमिति श्रुतिप्रदर्शितमेव नाम वक्ष्यति । | कहा था, इसलिये वह अहंनामवाला हुआ। उसका श्रुतिप्रदर्शित ही 'अहम्' यह नाम उपनिषद् आगे बतावेगी। | | तस्माद्यस्मात्कारणे प्रजापतावेवं वृत्तं तस्मात्, तत्कार्यभूतेषु प्राणिषु एतर्ह्येतस्मिन्नपि काले आमन्त्रितः कस्त्वमित्युक्तः सन्नहमयमित्येवाग्र उक्त्वा कारणात्माभिधानेन आत्मानमभिधायाग्रे पुनर्विशेषनामजिज्ञासवेऽथानन्तरं विशेषपिण्डाभिधानं देवदत्तो यज्ञदत्तो वेति प्रब्रूते कथयति यन्नामास्य विशेषपिण्डस्य मातापितृकृतं भवति तत्कथयति । | इसीसे, क्योंकि कारणरूप प्रजापतिमें यह वृत्तान्त घटित हुआ इसीलिये एतर्हि—इस समय भी उसके कार्यभूत जीवोंमें जब किसीको 'तू कौन है' ऐसा कहकर पुकारा जाता है तो पहले 'यह मैं हूँ' इस प्रकार अपनेको कारणरूप नामसे बतलाकर फिर जो विशेष नामको जानना चाहता है उसे अपने विशेष शरीरका 'देवदत्त' या 'यज्ञदत्त' ऐसा कोई नाम बतलाता है अर्थात् जो नाम इसके विशेष पिण्डके माता-पिताका रखा हुआ होता है, उसे बतलाता है। | | स च प्रजापतिरतिक्रान्तजन्मनि सम्यक्कर्मज्ञानभावनानुष्ठानैः साधकावस्थायां यद्यस्मात्कर्मज्ञानभावनानुष्ठानैः प्रजापतित्वं प्रतिपित्सूनां पूर्वः प्रथमः सन् अस्मात्प्रजापतित्वप्रतिपित्सुसमुदायात्सर्वस्माद् आदौ औषद्- | उस प्रजापतिने अपने पूर्वजन्ममें साधकावस्थामें सम्यक् कर्म और ज्ञानकी भावनाके अनुष्ठानोंद्वारा, इस कर्म और ज्ञानकी भावनाके अनुष्ठानोंसे प्रजापतित्वकी प्राप्तिकी इच्छावालोंसे पूर्ववर्ती अर्थात् पहला होनेके कारण, इस प्रजापतित्वप्राप्तिकी इच्छावाले सम्पूर्ण समुदायसे पूर्व |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १६७

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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १६७


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-भाष्यार्थ
दहत् ! किम् ? आसङ्गाज्ञानलक्षणान्सर्वान्पाप्मनः प्रजापतित्वप्रतिबन्धकारणभूतान् । यस्मादेवं तस्मात्पुरुषः, पूर्वमौषदिति पुरुषः ।उषन—दग्ध कर दिया था; किसे?—प्रजापतित्वके प्रतिबन्धक कारणरूप अभिनिवेश और अज्ञानादि सम्पूर्ण पापोंको। क्योंकि ऐसा हुआ, इसलिये यह 'पुरुष' हुआ। पूर्वमें ओषण किया, इसलिये 'पुरुष' कहलाया।
यथायं प्रजापतिरोषित्वा प्रतिबन्धकान्पाप्मनः सर्वान्पुरुषः प्रजापतिरभवत्, एवमन्योऽपि ज्ञानकर्मभावनानुष्ठानवह्निना केवलं ज्ञानबलाद्वौषति भस्मीकरोति ह वै स तम्; कम् ? योऽस्माद्विदुषः पूर्वः प्रथमः प्रजापतिर्बुभूषति भवितुमिच्छति तमित्यर्थः । तं दर्शयति य एवं वेदेति । सामर्थ्याज्ज्ञानभावनाप्रकर्षवान् ।जिस प्रकार यह प्रजापति सम्पूर्ण प्रतिबन्धक पापोंका ओषण करके पुरुषरूप प्रजापति हुआ उसी प्रकार दूसरा भी ज्ञान और कर्मकी भावनाके अनुष्ठानरूप अग्निसे अथवा केवल ज्ञानबलसे उसका ओषण करता है—उसे भस्म कर देता है, किसे ? जो इस विद्वान्से पहले प्रजापति होना चाहता है उसको—ऐसा इसका तात्पर्य है। उस (विद्वान्) को श्रुति दिखलाती है—जो इस प्रकार जानता (उपासना करता) है। उसकी सामर्थ्यसे जाना जाता है कि वह ज्ञानभावनामें बढ़ा-चढ़ा होता है।
नन्वनर्थाय प्राजापत्यप्रतिपित्सा, एवंविदा चेद्दह्यते ।शङ्का—यदि वह इस प्रकार उपासना करनेवालेसे दग्ध करदिया जाता है तब तो प्रजापतित्वप्राप्तिकी इच्छा अनर्थकी ही हेतु है।
नैष दोषः, ज्ञानभावनोत्कर्षाभावात्प्रथमं प्रजापतित्वप्रतिपत्त्यभावमात्रत्वाद्दाहस्य । उत्कृष्ट-समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि ज्ञानभावनाके उत्कर्षका अभाव होनेके कारण पहले प्रजापतित्व प्राप्त न कर सकना ही उसका

| १६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |

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१६८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| साधनः प्रथमं प्रजापतित्वं प्राप्नुवन् न्यूनसाधनो न प्राप्नोतीति, स तं दहतीत्युच्यते । न पुनः प्रत्यक्षमुत्कृष्टसाधनेन इतरो दह्यते । यथा लोके आजिसृतां यः प्रथममाजिमुपसर्पति तेनेतरे दग्धा इवापहृतसामर्थ्या भवन्ति तद्वत् ॥ १ ॥ | दाह है। तात्पर्य यह है कि जो उत्कृष्ट साधनवाला होता है वह पहले प्रजापतित्व प्राप्त करता है और न्यून साधनवाला प्राप्त नहीं करता; अतः वह उसे भस्म कर देता है—ऐसा कहा गया है। उत्कृष्ट साधनवाला अपनेसे भिन्न—न्यून साधनवालेको साक्षात् जला ही डालता हो—ऐसी बात नहीं है। जिस प्रकार लोकमें किसी मर्यादातक दौड़कर जानेवालोंमें जो पहले मर्यादापर पहुँचता है उसके द्वारा दूसरे लोग दग्ध-से होकर अपहृतसामर्थ्य—हतोत्साह हो जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये ॥ १ ॥ |


प्रजापतिका भय और विचारद्वारा उसकी निवृत्ति

यदिदं तुष्टूषितं कर्मकाण्डविहितज्ञानकर्मफलं प्राजापत्यलक्षणं नैव तत्संसारविषयमत्यक्रामदितीयमर्थं प्रदर्शयिष्यन्नाह—यहाँ जिस प्रजापतित्वरूप कर्मकाण्डविहित ज्ञान और कर्मके फलकी स्तुति करनी अभीष्ट है वह सांसारिक विषयसे बाहर नहीं है—इस बातको दिखानेके लिये श्रुति कहती है—

सोऽबिभेत्तस्मादेकाकी बिभेति स हायमीक्षां चक्रे यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेमीति तत एवास्य भयं वीयाय कस्माद्ध्यभेष्यद् द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥२॥

वह भयभीत हो गया। इसीसे अकेला पुरुष भय मानता है। उसने यह विचार किया 'यदि मेरे सिवा कोई दूसरा नहीं है तो मैं किससे डरता

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६९

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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६९


हूँ?' तभी उसका भय निवृत्त हो गया। किंतु उसे भय क्यों हुआ ? क्योंकि भय तो दूसरेसे ही होता है ॥ २ ॥

संस्कृत-भाष्यभाष्यार्थ
सोऽबिभेत्स प्रजापतिर्योऽयं प्रथमः शरीरी पुरुषविधो व्याख्यातः । सोऽबिभेद्भीतवानस्मदादिवदेवेत्याह । यस्मादयं पुरुषविधः शरीरकरणवान् आत्मनाशविपरीतदर्शनवत्त्वाद् अबिभेत्, तस्मात्तत्सामान्यादद्यत्वेऽप्येकाकी बिभेति । किञ्चास्मदादिवदेव भयहेतुविपरीतदर्शनापनोदकारणं यथाभूतात्मदर्शनम् । सोऽयं प्रजापतीरीक्षामीक्षणं चक्रे कृतवान्ह । कथम् ? इत्याह — यद्यस्मान्मत्तोऽन्यदात्मव्यतिरेकेण वस्त्वन्तरं प्रतिद्वन्द्वीभूतं नास्ति, तस्मिन्नात्मविनाशहेत्वभावे कस्मान्नु बिभेमीति । तत एव यथाभूतात्मदर्शनादस्य प्रजापतेर्भयं वीयाय विस्पष्टमपगतवत् ।वह भयभीत हो गया । अर्थात् वह प्रजापति, जिसकी पुरुषाकार प्रथम शरीरके रूपमें व्याख्या की गयी है, हमारे समान ही भयभीत हो गया—ऐसा श्रुति कहती है । क्योंकि यह पुरुषविध शरीरेन्द्रियवान् प्रजापति आत्मनाशरूप विपरीत ज्ञानवाला होनेके कारण डर गया था, इसलिये उससे समानता होनेके कारण आज भी अकेला होनेपर पुरुष डरता है । इसके सिवा हमारे समान ही प्रजापतिके भी भयके हेतुभूत विपरीत ज्ञानकी निवृत्तिका कारण यथार्थ आत्मज्ञान ही हुआ । उस इस प्रजापतिने ईक्षा—ईक्षण (विचार) किया । किस प्रकार विचार किया ? सो श्रुति बतलाती है—यदि इस मेरेसे भिन्न अर्थात् आत्माके सिवा इसका प्रतिद्वन्द्वी कोई और पदार्थ नहीं है, तो उस आत्मनाशके कारणके अभावमें मैं किससे डरता हूँ ? उसीसे यानी उस यथार्थ आत्मदर्शनसे ही इस प्रजापतिका भय विगत—विस्पष्टतया निवृत्त हो गया ।

१७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

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१७०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| तस्य प्रजापतेर्यद्भयं तत्केवलाविद्यानिमित्तमेव परमार्थदर्शनेऽनुपपन्नमित्याह—कस्माद्ध्यभेष्यत किमित्यसौ भीतवान्परमार्थनिरूपणायां भयमनुपपन्नमेवेत्यभिप्रायः। यस्माद् द्वितीयाद्वस्त्वन्तराद्वै भयं भवति। द्वितीयं च वस्त्वन्तरमविद्याप्रत्युपस्थापितमेव; न ह्यदृश्यमानं द्वितीयं भयजन्मनो हेतुः “तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” (ईशा० ७) इति मन्त्रवर्णात्। यच्चैकत्वदर्शनेन भयमपनुनोद तद्युक्तम्। कस्मात्? द्वितीयाद्वस्त्वन्तराद्वै भयं भवति, तदेकत्वदर्शनेन द्वितीयदर्शनमपनीतमिति नास्ति यतः। | उस प्रजापतिको जो भय था वह केवल अविद्याके ही कारण था, परमार्थज्ञान होनेपर उसका होना असम्भव था, यही बात श्रुति कहती है—'वह क्यों डरा?'—इसका क्या कारण है कि उसे भय हुआ ? तात्पर्य यह है कि परमार्थतः विचार किया जाय तो उसे भय होना अयुक्त ही है; क्योंकि भय तो दूसरे-से ही होता है। और [ आत्मासे भिन्न ] दूसरी वस्तु तो अविद्या-द्वारा प्रस्तुत की हुई ही है; क्योंकि न दीखनेवाली कोई दूसरी वस्तु भयकी उत्पत्तिका कारण नहीं हो सकती; जैसा कि "उस अवस्थामें निरन्तर एकत्वदर्शन करनेवाले पुरुषको क्या मोह और क्या शोक हो सकता है?” इस मन्त्रसे सिद्ध होता है।¹ प्रजापतिने जो एकत्व-दर्शनके द्वारा अपने भयको निवृत्त किया सो उचित ही है। क्यों उचित है? क्योंकि द्वितीय यानी अन्य वस्तुसे ही भय होता है। वह द्वितीयदर्शन आत्माके एकत्वदर्शन-से निवृत्त हो गया; क्योंकि वास्तव-में द्वितीय है नहीं। |


१. यदि कोई कहे कि प्रजापतिका भय विराट् पुरुषके साथ एकत्वज्ञानसे ही निवृत्त हुआ था, अद्वैतदृष्टिके कारण नहीं—तो इसका उत्तर श्रुति आगेके वाक्यसे देती है।

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७१

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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७१

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अत्र चोदयन्ति—कुतः प्रजापतेरेकत्वदर्शनं जातम् ? को वास्मै उपदिदेश ? अथानुपदिष्टमेव प्रादुरभूत्, अस्मदादेरपि तथा प्रसङ्गः । अथ जन्मान्तरकृतसंस्कारहेतुकम्, एकत्वदर्शनानर्थक्यप्रसङ्गः । यथा प्रजापतेरतिक्रान्तजन्मावस्थस्य एकत्वदर्शनं विद्यमानमप्यविद्याबन्धकारणं नापनिन्थे, यतः अविद्यासंयुक्त एवायं जातोऽबिभेत्, एवं सर्वेषामेकत्वदर्शनानर्थक्यं प्राप्नोति । अन्त्यमेव निवर्तकमिति चेन्न, पूर्ववत्पुनः प्रसङ्गेनानैकान्त्यात् । तस्मादनर्थकमेवैकत्वदर्शनमिति ।यहाँ यह शङ्का करते हैं कि प्रजापतिको किससे एकत्वज्ञान हुआ ? उसे किसने उपदेश किया था ? अथवा बिना उपदेशके ही उसका प्रादुर्भाव हो गया, तब तो हमारे लिये भी वैसा ही प्रसङ्ग हो सकता है। यदि उसे जन्मान्तरकृत संस्कारसे होनेवाला माना जाय तो एकत्वदर्शनकी व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होता है। अर्थात् जिस प्रकार अपने पूर्वजन्ममें स्थित प्रजापतिके एकत्वदर्शनने विद्यमान रहनेपर भी अविद्यारूप बन्धनके कारणकी निवृत्ति नहीं की—क्योंकि अविद्यासंयुक्त उत्पन्न होनेके कारण ही उसे भय हुआ था—इसी प्रकार सभीके एकत्वदर्शनकी व्यर्थता प्राप्त होती है। यदि कहो कि सबके अन्तमें होनेवाला एकत्वज्ञान ही अविद्याकी निवृत्ति करनेवाला होता है तो यह ठीक नहीं, क्योंकि पूर्ववत् पुनः प्रसङ्ग उपस्थित होनेपर उसका अव्यभिचारित्व नहीं रह सकेगा अतः एकत्वदर्शन व्यर्थ ही है।
नैष दोषः, उत्कृष्टहेतूद्भवत्वाल्लोकवत् । यथा पुण्यकर्मो-समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि व्यवहारमें अन्य लोगोंके समान प्रजापतिका जन्म उत्कृष्ट हेतुसे हुआ है। जिस प्रकार पुण्य-

१७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

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१७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| द्भवैर्विविक्तैः कार्यकारणैः संयुक्ते जन्मनि सति प्रज्ञामेधास्मृतिवैशारद्यं दृष्टम्, तथा प्रजापतेः धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यविपरीतहेतुसर्वपाप्मदाहात् विशुद्धैः कार्यकारणैः संयुक्तमुत्कृष्टं जन्म, तदुद्भवं चानुपदिष्टमेव युक्तमेकत्वदर्शनं प्रजापतेः। तथा च स्मृतिः—"ज्ञानमप्रतिघं यस्य वैराग्यं च जगतपतेः। ऐश्वर्यं चैव धर्मश्च सहसिद्धं चतुष्टयम्॥" इति। | कर्मोंसे प्राप्त हुए पवित्र देह और इन्द्रियोंसे युक्त जन्म होनेपर बुद्धि, मेधाशक्ति और स्मृतिकी विशदता देखी जाती है उसी प्रकार धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यके विपरीत अधर्मादिके कारण होनेवाले समस्त पापोंका दाह हो जानेसे प्रजापतिका विशुद्ध देह और इन्द्रियोंसे युक्त उत्कृष्ट जन्म है, उससे होनेवाला प्रजापतिका एकत्वदर्शन भी बिना उपदेश किया हुआ ही है ऐसा मानना युक्तिसङ्गत ही है। ऐसा ही यह स्मृति भी कहती है—"जिस जगत्पतिका निरंकुश ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य और धर्म—ये चारों सहसिद्ध (जन्मसिद्ध) हैं" इत्यादि। | | सहसिद्धत्वे भयानुपपत्तिरिति चेत्। न ह्यादित्येन सह तम उदेति। | शङ्का— किंतु इनके सहसिद्ध होनेपर उसे भय होना अनुपपन्न है, सूर्यके साथ अन्धकारका उदय नहीं हो सकता। | | न, अन्यानुपदिष्टार्थत्वात्सहसिद्धवाक्यस्य। | समाधान— ऐसा मत कहो; क्योंकि इस सहसिद्धवाक्यका तात्पर्य उसके ज्ञानको इसके द्वारा अनुपदिष्ट बतलानेमें है। | | श्रद्धातात्पर्यप्रणिपातादीनामहेतुत्वमिति चेत् स्यान्मतम् 'श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः | शङ्का— यदि ऐसा माना जायगा तो श्रद्धा, तत्परता एवं प्रणिपातादिकी ज्ञानोत्पत्तिमें अहेतुता प्राप्त होगी। अर्थात्—यदि प्रजापतिके समान |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७३

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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
संयतेन्द्रियः” (गीता ४।३९) “तद्विद्धि प्रणिपातेन” (गीता ४।३४) इत्येवमादीनां श्रुतिस्मृतिविहितानां ज्ञानहेतूनामहेतुत्वम्, प्रजापतिरिव जन्मान्तरकृतधर्महेतुत्वे ज्ञानस्येति चेत् ?जन्मान्तरकृत धर्म ही ज्ञानका हेतु होगा तो “जितेन्द्रिय एवं तत्पर श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानलाभ करता है” “उस ज्ञानको प्रणिपात करके जानो” इत्यादि प्रकारके श्रुति-स्मृतिवाक्योंद्वारा विहित ज्ञानके हेतुओंकी अहेतुता प्राप्त होगी।
न; निमित्तविकल्पसमुच्चयगुणवदगुणवत्त्वभेदोपपत्तेः। लोके हि नैमित्तिकानां कार्याणां निमित्तभेदोऽनेकधा विकल्प्यते। तथा निमित्तसमुच्चयः। तेषां च विकल्पितानां समुच्चितानां पुनर्गुणवदगुणवत्त्वकृतो भेदो भवति। तद्यथा-रूपज्ञान एव तावन्नैमित्तिके कार्ये-तमसि विनालोकेन चक्षूरूपसन्निकर्षो नक्तञ्चराणां रूपज्ञाने निमित्तं भवति। मन एव केवलं रूपज्ञाननिमित्तं योगिनाम्। अस्माकं तु सन्निकर्षालोकाभ्यां सह तथादित्यचन्द्राद्यालोकभेदैः समुच्चिता निमित्तभेदा भवन्ति।समाधान—ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि निमित्तोंके विकल्प, समुच्चय, गुणवत्त्व, अगुणवत्त्व—ऐसे भेद हो सकते हैं। लोकमें निमित्तसे होनेवाले कार्योंके निमित्तका भेद अनेक प्रकारसे विकल्पित किया जाता है। इसी प्रकार निमित्तका समुच्चय भी अनेक प्रकारसे होता है। उन विकल्पित और समुच्चित हेतुओंका भी गुणवत्त्व और अगुणवत्त्वके कारण भेद होता है। सो इस प्रकार है—पहले नैमित्तिक कार्यभूत रूपज्ञानमें ही [ निमित्त-भेद यों है— ] निशाचरोंको बिना प्रकाशके अन्धकारमें ही होनेवाला नेत्र और रूपका संनिकर्ष रूपज्ञानमें कारण होता है, योगियोंका मन ही रूपज्ञानमें हेतु है तथा हमें चक्षुःसंनिकर्ष और प्रकाश दोनोंके होनेपर रूपज्ञान होता है। इसी प्रकार सूर्य और चन्द्र आदि प्रकाशोंके भेदसे भिन्न-भिन्न

१७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

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१७४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| तथा आलोकविशेषगुणवदगुणवत्त्वेन भेदाः स्युः। | निमित्तोंका समुच्चय होता है तथा प्रकाशविशेषोंके गुणवान् या गुणहीन होनेसे भी निमित्तोंके भेद हो जाते हैं। | | एवमेव आत्मैकत्वज्ञानेऽपि क्वचिज्जन्मान्तरकृतं कर्म निमित्तं भवति, यथा प्रजापतेः। क्वचित्तपो निमित्तम्, “तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व” (तै० उ० ३।२।१) इति श्रुतेः। क्वचित् “आचार्यवान्पुरुषो वेद” (छा० उ० ६।१४।२) “श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्” (गीता ४।३९) “तद्विद्धि प्रणिपातेन” (गीता ४।३४) “आचार्याद्वैव” (छा० उ० ४।९।३) “द्रष्टव्यः श्रोतव्यः” (बृ० उ० २।४।५) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्य एकान्तज्ञानलाभनिमित्तत्वं श्रद्धाप्रभृतीनाम् अधर्मादिनिमित्तवियोगहेतुत्वात्। वेदान्तश्रवणमनननिदिध्यासनानां च साक्षाज्ज्ञेयविषयत्वात्। पापादिप्रतिबन्धक्षये चात्ममनसोर्भूतार्थज्ञाननिमित्तस्वाभाव्यात्। तस्मादहेतुत्वं न जातु ज्ञानस्य श्रद्धाप्रणिपातादीनामिति ॥ २॥ | इसी प्रकार आत्मैकत्वज्ञानमें भी कहीं जन्मान्तरकृत कर्म निमित्त होता है, जैसा कि प्रजापतिका; कहीं तप निमित्त है, जैसा कि “तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा करो” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है और कहीं “आचार्यवान् पुरुषको ज्ञान होता है”, “श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानलाभ करता है”, “उसे प्रणिपात करके जानो”, “आचार्यके द्वारा ही [विद्या स्थिरताको प्राप्त होती है]” एवं “यह आत्मा द्रष्टव्य है, श्रोतव्य है” इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंके अनुसार श्रद्धाप्रभृति, अधर्मादिके हेतुओंकी निवृत्तिके कारण होनेसे ज्ञानलाभके नियत निमित्त हैं। वेदान्तके श्रवण, मनन और निदिध्यासन तो साक्षात् ज्ञेय वस्तु (ब्रह्म) को ही विषय करनेवाले हैं तथा पापादि प्रतिबन्धका क्षय होनेपर आत्मा और मनका भी परमार्थज्ञानमें निमित्त होना स्वाभाविक है; इसलिये श्रद्धा और प्रणिपातादिका ज्ञानकी उत्पत्तिमें अहेतुत्व कभी नहीं हो सकता ॥२॥ |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७५

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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७५


प्रजापतिसे मिथुनकी उत्पत्ति

इतश्च संसारविषय एव प्रजापतित्वम्, यतः।प्रजापतित्व इसलिये भी संसारका ही विषय है, क्योंकि—

स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत्। स हैतावानास यथा स्त्रीपुमाँसौ सम्परिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वेधापातयत्ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यस्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव ताँ समभवत्ततो मनुष्या अजायन्त ॥ ३ ॥

वह रममाण नहीं हुआ। इसीसे एकाकी पुरुष रममाण नहीं होता। उसने दूसरेकी इच्छा की। वह जिस प्रकार परस्पर आलिङ्गित स्त्री और पुरुष होते हैं वैसे ही परिमाणवाला हो गया। उसने इस अपने देहको ही दो भागोंमें विभक्त कर डाला। उससे पति और पत्नी हुए। इसलिये यह शरीर अर्द्धबृगल (द्विदल अन्नके एक दल) के समान है—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। इसलिये यह [पुरुषाद्धं] आकाश स्त्रीसे पूर्ण होता है। वह उस (स्त्री) से संयुक्त हुआ; उसीसे मनुष्य उत्पन्न हुए हैं ॥ ३ ॥

स प्रजापतिर्वै नैव रेमे रतिं नान्वभवत्, अरत्याविष्टोऽभूदित्यर्थः, अस्मदादिवदेव यतः, इदानीमपि तस्मादेकाकित्वादिधर्मवत्त्वादेकाकी न रमते रतिं नानुभवति। रतिर्नामेष्टार्थसंयोगजावह प्रजापति रममाण नहीं हुआ—उसने रतिका अनुभव नहीं किया अर्थात् वह हमारे ही समान अरतिसे भर गया। क्योंकि ऐसा हुआ इसलिये इस समय भी एकाकित्वादि धर्मवान् होनेसे पुरुष अकेलेमें नहीं रमता—रतिका अनुभव नहीं करता। इष्टविषयके संयोगसे

| १७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |

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१७६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
क्रीडा, तत्प्रसङ्गिन इष्टवियोगा-<br>न्मनस्याकुलीभावोऽरतिरित्युच्यते।होनेवाली क्रीडाका नाम रति है, उसमें आसक्त पुरुषके मनसे इष्ट वस्तुका वियोग होनेपर जो व्याकुलता होती है उसे अरति कहते हैं।
स तस्या अरतेरपनोदाय द्विती-<br>यम् अरत्यपघातसमर्थं स्त्रीवस्त्वै-<br>च्छद्गृद्धिमकरोत्। तस्य चैवं<br>स्त्रीविषयं गृध्यतः स्त्रिया परि-<br>ष्वक्तस्येवात्मनो भावो बभूव।<br>स तेन सत्येप्सुत्वाद् एतावानेत-<br>त्परिमाण आस बभूव ह।उस अरतिकी निवृत्तिके लिये उसने अरतिका नाश करनेमें समर्थ दूसरी वस्तु—स्त्रीकी इच्छा यानी अभिलाषा की। इस प्रकार स्त्री-विषयक इच्छा करनेपर उसे अपने देहका स्त्रीसे आलिङ्गित हुएके समान भाव हो गया। सत्यसंकल्प होनेके कारण वह उस भावसे इतना अर्थात् ऐसे ही परिमाणवाला हो गया।
किंपरिमाणः ? इत्याह—यथा<br>लोके स्त्रीपुमांसौ अरत्यपनोदाय<br>सम्परिष्वक्तौ यत्परिमाणौ स्यातां<br>तथा तत्परिमाणौ बभूवेत्यर्थः।किस परिमाणवाला हो गया ?<br>सो श्रुति बतलाती है—जिस प्रकार लोकमें स्त्री और पुरुष अरतिकी निवृत्तिके लिये परस्पर आलिङ्गित होते हैं, वे जिस परिमाणवाले होते हैं उसी परिमाणवाला वह हो गया—ऐसा इसका तात्पर्य है।
स तथा तत्परिमाणमेव इममात्मानं<br>द्वेधा द्विप्रकारमपातयत्पातितवान्<br>इममेवेत्यवधारणं मूलकारणाद्वि-<br>राजो विशेषणार्थम्। न क्षीरस्य<br>सर्वोपमर्देन दधिभावापत्तिवद्विराट्<br>सर्वोपमर्देनैतावानास; किंउसने वैसे—उस परिमाणवाले अपने इस देहको ही द्वेधा-दो प्रकारसे पतित किया। 'इमम् एव' (इस देहको ही) इस प्रकार निश्चय करना मूल कारणसे विराट्की विशेषता बतलानेके लिये है। दूधके सारे स्वरूपका नाश करके होनेवाली दधिभावकी प्राप्तिके समान विराट् अपने पूर्ववर्ती सारे स्वरूपका

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१७७

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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१७७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तर्हि ? आत्मना व्यवस्थितस्यैव विराजः सत्यसंकल्पत्वादात्मव्यतिरिक्तं स्त्रीपुंसपरिष्वक्तपरिमाणं शरीरान्तरं बभूव । स एव च विराट् तथाभूतः स हैतावानासेति सामानाधिकरण्यात् ।तिरोभाव करके ऐसा नहीं हुआ ? तो फिर किस प्रकार हुआ। अपने स्वरूपमें स्थित रहते हुए ही विराट्-के सत्यसंकल्प होनेके कारण उसके उस शरीरसे भिन्न परस्पर आलिङ्गित हुए स्त्री-पुरुषोंके परिमाणवाला एक देहान्तर हो गया; क्योंकि वही पूर्वरूपमें स्थित विराट् था और वही ऐसा हो गया—इस प्रकार यहाँ [ विराट्‌के वाचक ] ‘स’ का ‘एतावान्’ से सामानाधिकरण्य है।
ततस्तस्मात्पातनात्पतिश्च पत्नी चाभवतामिति दम्पत्योर्निर्वचनं लौकिकयोः । अत एव तस्मात्, यस्मादात्मन एवार्धः पृथग्भूतो येयं स्त्री, तस्मादिदं शरीरमात्मनोऽर्धवृगलमर्धं च तद् वृगलं विदलं च तदर्धवृगलम् अर्धविदल-मिवेत्यर्थः । प्राक्स्त्र्युद्वहनात्कस्यार्धवृगलम् ? इत्युच्यते—स्व आत्मन इति । एवमाह स्मोक्तवान्किल याज्ञवल्क्यः, यज्ञस्य वल्को वक्ता यज्ञवल्कस्तस्यापत्यं याज्ञवल्क्यो दैवरातिरित्यर्थः । ब्रह्मणो वापत्यम् ।उससे—उस द्विधा पातनसे पति और पत्नी हुए—यह लौकिक पति-पत्नियों [ के पति-पत्नी नाम ] का निर्वचन किया गया है। इसीसे, क्योंकि यह जो स्त्री है शरीरका ही पृथग्भूत अर्धभाग है, इसलिये यह शरीर आत्माका अर्धबृगल है। जो अर्ध ( आधा ) हो और बृगल—विदल हो उसे अर्धबृगल (दो दलोंमेंसे एक दल) कहते हैं अर्थात्—अर्धविदल-सा है। किंतु स्त्रीसे विवाह करनेसे पूर्व यह किसका अर्धबृगल होता है, सो श्रुति बतलाती है—स्व अर्थात् अपना ही—ऐसा निश्चय ही याज्ञवल्क्यने कहा है। यज्ञका वल्क—वक्ता यज्ञवल्क कहलाता है, उसका पुत्र याज्ञवल्क्य अर्थात् दैवराति अथवा ब्रह्माका पुत्र याज्ञवल्क्य।

बृ० उ० १२—