BharatKosha
Back to the archive

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

९७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 988Permalink
९७४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| किमन्यस्माद् वस्त्वन्तरान्न प्रविभज्यते ? आहोस्विदात्मैव तद् वस्त्वन्तरम् ? अत आह—नान्यदस्त्यात्मनः, कथम् ? यत आत्मकामम्—आत्मैव कामा यस्मिन् रूपे, अन्यत्र प्रविभक्ता इवान्यत्वेन काम्यमाना यथा जाग्रत्स्वप्नयोः, तस्यात्मैव अन्यत्वप्रत्युपस्थापकहेतोरविद्याया<sup></sup> अभावात्—आत्मकामम्; अत एवाकाममेतद्रूपं काम्यविषयाभावात्; शोकान्तरं शोकच्छिद्रं शोकशून्यमित्येतत्, शोकमध्यमिति वा, सर्वथाप्यशोकमेतद् रूपं शोकवर्जितमित्यर्थः ॥२१॥ | क्या यह (आत्माका ज्योतिर्मय रूप) किसी अन्य वस्तुसे विभिन्न नहीं है? अथवा आत्मा ही वह वस्त्वन्तर है ? इसपर श्रुति कहती है—आत्मासे भिन्न कोई दूसरी वस्तु ही नहीं है—कैसे नहीं है ? क्योंकि वह रूप आत्मकाम है; जिस प्रकार स्वप्न और जागरित-अवस्थाओंमें आत्मासे अन्यत्र विभक्तके समान तथा अन्य रूपसे कामना किये जानेवाले काम होते हैं, उस प्रकार सुषुप्तिमें अन्यत्वको प्रस्तुत करनेवाले अविद्यारूप हेतुका<sup></sup> अभाव होनेके कारण आत्मा ही उसके काम हैं, इसलिये वह रूप आत्मकाम है। इसीसे काम्य विषयोंका अभाव होनेके कारण यह रूप अकाम है; तथा शोकान्तर—शोकच्छिद्र अर्थात् शोकशन्य है अथवा यह शोकमध्य है; तात्पर्य यह कि यह रूप सर्वथा ही अशोक अर्थात् शोकरहित है ॥ २१ ॥ |

सुषुप्तिस्थ आत्माकी निःसङ्ग और निःशोक स्थितिका वर्णन

प्रकृतः स्वयंज्योतिरात्मा-विद्याकामकर्मविनिर्मुक्त इत्यु-जिसका प्रकरण चल रहा है, वह स्वयंज्योति आत्मा अविद्या, काम और कर्मसे रहित है—ऐसा कहा जा

१. यहाँ अविद्याका तात्पर्य सांसारिक राग-द्वेष, सुख-दुःख आदिसे है, उसका अभाव हो जानेका अर्थ है, उसका भान न होना। सुषुप्तिमें जैसा कि पहले बता आये हैं, अव्याकृत मायासे सम्पर्क तो बना ही रहता है। भान तो इसलिये नहीं होता है कि चित्त लीन रहता है; अन्यथा अविद्याका अत्यन्ताभाव मान लेनेपर तो मुक्त और सुषुप्तमें अन्तर ही नहीं रह जायगा।

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९७५ |

Page 989Permalink
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९७५
संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी भाष्यार्थ
क्तम्, असङ्गत्वादात्मनः, आगन्तुकत्वाच्च तेषाम्। तत्रैवमाशङ्का जायते; चैतन्यस्वभावत्वे सत्यप्येकीभावान्न जानाति स्त्रीपुंसयोरिव सम्परिष्वक्तयोरित्युक्तम्, तत्र प्रासङ्गिकमेतदुक्तम्—कामकर्मादिवत् स्वयंज्योतिष्ट्वमप्यस्यात्मनो न स्वभावः, यस्मात् सम्प्रसादे नोपलभ्यते—इत्याशङ्कायां प्राप्तायां तन्निराकरणाय स्त्रीपुंसयोः दृष्टान्तोपादानेन विद्यमानस्यैव स्वयंज्योतिष्ट्वस्य सुषुप्तेऽग्रहणमेकीभावाद्धेतोः, न तु कामकर्मादिवदागन्तुकम्।चुका है, क्योंकि आत्मा असङ्ग है और वे (अविद्यादि) आगन्तुक हैं। इससे यह आशङ्का होती है—ऊपर यह कहा गया है कि चैतन्यस्वभाव होनेपर भी परस्पर आलिङ्गित स्त्री और पुरुषोंके समान एकीभाव होनेके कारण आत्मा नहीं-जानता; वहाँ प्रसङ्गानुसार यह-कहा गया था कि काम और-कर्मादिके समान स्वयं-ज्योतिष्ट्व भी इस आत्माका स्वभाव नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिमें इसकी उपलब्धि नहीं होती, इस आशङ्काके प्राप्त होनेपर उसका निराकरण करनेके लिये 'स्त्री पुरुष' का दृष्टान्त देकर [ यह बतलाया गया था कि ]-एकी-भावरूप हेतुके कारण सुषुप्तिमें विद्यमान स्वयंज्योतिष्ट्वका ही ग्रहण नहीं होता, वह काम-कर्मादिके समान आगन्तुक नहीं है।
इत्येतत् प्रासङ्गिकमभिधाय यत् प्रकृतं तदेवानुप्रवर्तयति। अत्र चैतत् प्रकृतम्—अविद्याकामकर्मविनिर्मुक्तमेव तद् रूपम्, यत् सुषुप्तं आत्मनो गृह्यते प्रत्यक्षतइस प्रकार इस प्रासङ्गिक स्वयं ज्योतिष्ट्वका निरूपण कर जो प्रकृत है, उसका ही श्रुति उल्लेख करती है। यहाँ प्रकरण यह है कि सुषुप्तिमें आत्माके जिस रूपका प्रत्यक्षतया ग्रहण किया जाता है, वह अविद्या, काम और कर्मसे रहित ही है।^२

१. इस एकीभाव या एकत्वका तात्पर्य पहले टिप्पणी (पृष्ठ ६७१) में बताया जा चुका है।
२. इस प्रसङ्गको समझनेके लिये पृष्ठ ६४५ और ६७२ की टिप्पणी देखिये।

९७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

Page 990Permalink
९७६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

इति। तदेतद् यथाभूतमेवाभिहितम्—सर्वसम्बन्धातीतमेतद् रूपमिति; यस्मादत्रैतस्मिन् सुषुप्तस्थाने अतिच्छन्दापहतपाप्माभयमेतद् रूपम्, तस्मात्—अतः यह बात ठीक ही कही गयी है कि यह रूप सब प्रकारके-सम्बन्धोंसे परे है; चूँकि यहाँ इस सुषुप्त-स्थानमें यह रूप कामरहित, धर्माधर्म रहित और अभय होता है, इसलिये—

अत्र पितापिता भवति मातामाता लोका अलोका देवा अदेवा वेदा अवेदाः । अत्र स्तेनोऽस्तेनो भवति भ्रूणहाभ्रूणहा चाण्डालोऽचाण्डालः पौल्कसोऽपौल्कसः श्रमणोऽश्रमणस्तापसोऽतापसोऽनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान् हृदयस्य भवति ॥ २२ ॥

इस सुषुप्तावस्थामें पिता अपिता हो जाता है, माता अमाता हो जाती है, लोक अलोक हो जाते हैं, देव अदेव हो जाते हैं और वेद अवेद हो जाते हैं। यहाँ चोर अचोर हो जाता है, भ्रूणहत्या करनेवाला अभ्रूणहा हो जाता है, तथा चाण्डाल अचाण्डाल, पौल्कस अपौल्कस, श्रमण अश्रमण और तापस अतापस हो जाते हैं। उस समय यह पुरुष पुण्यसे असम्बद्ध तथा पापसे भी असम्बद्ध होता है और हृदयके सम्पूर्ण शोकोंको पार कर लेता है ॥ २२ ॥

**अत्र पिता जनकः—**तस्य च जनयितृत्वाद् यत् पितृत्वं पुत्रं प्रति, तत् कर्मनिमित्तम्, तेन च कर्मणायमसम्बद्धोऽस्मिन् काले । तस्मात् पितापुत्रसम्बन्धनिमित्तात् कर्मणो विनिर्मुक्तत्वात् पिताप्यपिता भवति; तथा पुत्रोऽपि पितुःपुत्रोयहाँ पिता अर्थात् जनक—जन्म देनेके कारण जो उसका पुत्रके प्रति पिताका भाव होता है, वह 'कर्म' रूप निमित्तसे है, उस कर्मसे इस कालमें ( सुषुप्तिमें ) यह असम्बद्ध रहता है। अतः पिता-पुत्र-सम्बन्धके हेतुभूत कर्मसे रहित होनेके कारण इस अवस्थामें पिता भी अपिता हो जाता है; इसी प्रकार पुत्र भी पिताका अपुत्र हो जाता है—ऐसा

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९७७ |

Page 991Permalink
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९७७
भवतीति सामर्थ्याद् गम्यते; उभयोर्हि सम्बन्धनिमित्तं कर्म, तदयमतिक्रान्तो वर्तते; 'अपहतपाप्म' इति ( ४ । ३ । २१ ) ह्युक्तम् ।वाक्यके सामर्थ्यसे जाना जाता है; क्योंकि दोनोंहीके सम्बन्धका कारण कर्म है, उसका यह अतिक्रमण कर जाता है; क्योंकि इसके स्वरूपको 'अपहतपाप्म' ( पापरहित ) ऐसा कहा गया है ।
तथा मातामाता, लोकाः कर्मणा जेतव्या जिताश्च--तत्कर्मसम्बन्धाभावाल्लोका अलोकाः। तथा देवाः कर्माङ्गभूताः--तत्कर्मसम्बन्धात्ययाद् देवा अदेवाः । तथा वेदाः साध्यसाधनसम्बन्धाभिधायकाः, मन्त्रलक्षणाश्चाभिधायकत्वेन कर्माङ्गभूताः, अधीता अध्येतव्याश्च—कर्मनिमित्तमेव सम्बध्यन्ते पुरुषेण; तत्कर्मातिक्रमणादेतस्मिन् काले वेदा अप्यवेदाः सम्पद्यन्ते ।इसी प्रकार माता अमाता हो जाती है। कर्मसे जीते जानेवाले तथा जीते हुए लोक, उस कर्मसम्बन्धके न रहनेके कारण अलोक हो जाते हैं। और कर्मके अङ्गभूत देवता, उस कर्मसम्बन्धका अतिक्रमण हो जानेके कारण देव अदेव हो जाते हैं। तथा साध्यसाधनसम्बन्धका वर्णन करनेवाले और अभिधायकरूपसे कर्मके अङ्गभूत मन्त्रात्मक वेद, वे अध्ययन किये हुए हों अथवा अध्ययन किये जानेवाले हों, कर्मके कारण ही पुरुषसे सम्बद्ध हैं; उस कर्मका अतिक्रमण करनेके कारण इस अवस्थामें वेद भी अवेद हो जाते हैं।
न केवलं शुभकर्मसम्बन्धातीतः, किं तर्हि ? अशुभैरप्यत्यन्तघोरैः कर्मभिरसम्बद्ध एवायं वर्तत इत्येतमर्थमाह—अत्र स्तेनो[ उस अवस्थामें ] यह केवल शुभ कर्मके सम्बन्धसे ही परे नहीं होता, तो क्या बात है ? यह अशुभ अर्थात् अत्यन्त घोर कर्मोंसे भी असम्बद्ध ही रहता है—यही बात श्रुति बतलाती है—यहाँ चोर अर्थात्

बृ० उ० ६२—

९७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

Page 992Permalink
९७८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| ब्राह्मणसुवर्णहर्ता, भ्रूणघ्ना सह पाठादवगम्यते—स तेन घोरेण कर्मणैतस्मिन् काले विनिर्मुक्तो भवति, येनायं कर्मणा महापातकी स्तेन उच्यते । | ब्राह्मणका सुवर्ण चुरानेवाला, यह, बात स्तेन शब्दका भ्रूणहाके साथ पाठ होनेसे जानी जाती है,¹ वह इस कालमें उस घोर कर्मसे मुक्त हो जाता है, जिस कर्मके कारण कि यह महापापी स्तेन ( चोर ) कहा जाता है । | | तथा भ्रूणहाऽभ्रूणहा; तथा चाण्डालो न केवलं प्रत्युत्पन्नेनैव कर्मणा विनिर्मुक्तः, किं तर्हि ? सहजेनाप्यत्यन्त निकृष्टजातिप्रापकेणापि विनिर्मुक्त एवायम्, चाण्डालो नाम शूद्रेण ब्राह्मण्यामुत्पन्नश्चण्डाल एव चाण्डालः, स जातिनिमित्तेन कर्मणाऽसम्बद्धत्वादचाण्डालो भवति । पौल्कसः, पुल्कस एव पौल्कसः, शूद्रेणैव क्षत्रियायामुत्पन्नः, सोऽप्यपौल्कसो भवति । | इसी प्रकार भ्रूणहत्या ( श्रेष्ठ ब्राह्मणकी हत्या ) करनेवाला अभ्रूणहा हो जाता है; तथा चाण्डाल केवल आगन्तुक कर्मसे ही मुक्त नहीं होता, तो फिर क्या-क्या होता है ? वह अत्यन्त निकृष्ट जातिकी प्राप्ति करानेवाले अपने स्वाभाविक कर्मसे भी मुक्त हो जाता है; चाण्डाल--शूद्रसे ब्राह्मणीमें उत्पन्न हुए चण्डालको कहते हैं, वह चण्डाल ही चाण्डाल है । वह अपने जाति सम्बन्धी कर्मसे असम्बद्ध होनेके कारण अचाण्डाल हो जाता है । पौल्कस – शूद्रसे क्षत्राणीमें उत्पन्न हुआ पुल्कस ही पौल्कस कहलाता है; वह भी अपौल्कस हो जाता है । | | तथा आश्रमलक्षणैश्च कर्मभिरसम्बद्धो भवतीत्युच्यते, श्रमणः | इसी प्रकार पुरुष आश्रमसम्बन्धी कर्मोंसे भी असम्बद्ध हो जाता है, सो बतलाते हैं-श्रमण अर्थात् जिस |


१. 'भ्रूणहा' श्रेष्ठ ब्राह्मणकी हत्या करनेवालेको कहते हैं, इसलिये 'स्तेन' शब्दसे भी साधारण चोर न समझकर ब्राह्मणका सुवर्ण चुरानेवाला समझना चाहिये ।

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्याथ | ९७९ |

Page 993Permalink
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्याथ९७९

| परिव्राट्—यत्कर्मनिमित्तो भवति, स तेन विनिर्मुक्तत्वादश्रमणः; तथा तापसो वानप्रस्थोऽतापसः। सर्वेषां वर्णाश्रमादीनाम् उपलक्षणार्थमुभयोर्ग्रहणम् । | कर्मके कारण पुरुष परिव्राट् होता है, उससे मुक्त होनेके कारण वह अश्रमण हो जाता है तथा तापस यानी वानप्रस्थ अतापस हो जाता है। इन दोनोंका ग्रहण सम्पूर्ण वर्ण और आश्रमोंके उपलक्षके लिये है। | | किं बहुना ? अनन्वागतम्—नान्वागतमनन्वगतम् असम्बद्धमित्येतत्, पुण्येन शास्त्रविहितेन कर्मणा, तथा पापेन विहिताकरणप्रतिषिद्धक्रियालक्षणेन; रूपपरत्वान्नपुंसकलिङ्गम्; 'अभयं रूपम्' इति ह्यनुवर्तते । | अधिक क्या, वह पुण्य अर्थात् शास्त्रविहित कर्मसे अनन्वागत—असम्बद्ध रहता है तथा विहितका न करना और अविहितका - करनारूप पापसे भी असम्बद्ध रहता है; रूपपरक होनेके कारण अनन्वागतम् ऐसा नपुंसकलिंग प्रयोग किया गया है; क्योंकि 'अभयं रूपम्' इसकी यहां अनुवृत्ति की जाती है। | | किं पुनरसम्बद्धत्वे कारणम् ? इति तद्धेतुरुच्यते—तीर्णोऽतिक्रान्तः, हि यस्मात् एवंरूपः, तदा तस्मिन् काले सर्वाञ्छोकान्—शोकाः कामाः, इष्टविषयप्रार्थना हि तद्विषयवियोगे शोकत्वमापद्यते। इष्टं हि विषयमप्राप्तं वियुक्तं चोद्दिश्य चिन्तयानस्तद्गुणान् संतप्यते पुरुषः, अतः शोकोऽरतिः काम इति पर्यायाः । | किंतु उसको असम्बद्धतामें कारण क्या है ? सो उसका हेतु बतलाया जाता है—चूँकि उस समय इस प्रकारका यह पुरुष सम्पूर्ण शोकोंको पार कर जाता है; शोक अर्थात् काम, क्योंकि इष्ट विषयकी प्रार्थना ही उस विषयका वियोग होनेपर शोकरूप हो जाती है। अप्राप्त अथवा वियुक्त हुए इष्टविषयके उद्देश्यसे उसके गुणोंका चिन्तन करनेवाला पुरुष संतप्त होता है, इसलिये शोक, अरति, काम-ये पर्याय शब्द हैं। |

९८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 994Permalink
९८०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
यस्मात् सर्वकामातीतो ह्यत्रायं भवति, 'न कञ्चन कामं कामयते' 'अतिच्छन्दा' इति ह्युक्तम्, तत्प्रक्रियापतितोऽयं शोकशब्दः कामवचन एव भवितुमर्हति । कामश्च कर्महेतुः, वक्ष्यति हि— स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते' इति । अतः सर्वकामातितीर्णत्वाद् युक्तमुक्तम्—'अनन्वागतं पुण्‍येन' इत्यादि ।क्योंकि इस अवस्थामें पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंसे पार हो जाता है, कारण, 'वह किसी कामको कामना नहीं करता', अतिच्छन्दा है' ऐसा उसके विषयमें कहा गया है, इसलिये उस प्रकरणमें आया हुआ यह 'शोक' शब्द कामका ही वाचक होना चाहिये । काम ही कर्मका कारण है; श्रुति ऐसा कहेगी भी कि 'वह जैसी कामनावाला होता है, वैसे संकल्पवाला होता है, और जैसे संकल्पवाला होता है वैसा कर्म करता है।' अतः समस्त कर्मोंसे अतिक्रान्त होनेके कारण 'वह पुण्यसे असम्बद्ध है' इत्यादि कथन ठीक ही है ।
हृदयस्य-हृदयमिति पुण्डरीकाकारो मांसपिण्डः, तत्स्थमन्तःकरणं बुद्धिर्हृदयमित्युच्यते; तात्स्थ्यात्, मञ्चक्रोशनवत् । हृदयस्य बुद्धेर्ये शोकाः बुद्धिसंश्रया हि ते, "कामः संकल्पो विचिकित्‍सेत्यादि सर्वं मन एव" (१ । ५ । ३)'हृदयस्य'—हृदय कमलके आकारवाले मांसपिण्डको कहते हैं, उसमें स्थित अन्तःकरण अर्थात् बुद्धि हृदयस्थ होनेके कारण मञ्चके चिल्लानेके^१ समान 'हृदय' कही जाती है । हृदयके अर्थात् बुद्धिके जो शोक हैं; वे बुद्धिके ही आश्रित होते हैं; क्योंकि "काम, संकल्प, विचिकित्सा—ये सब

१. जिस प्रकार 'मञ्चाः क्रोशन्ति' ( मञ्च चिल्लाते हैं ) इस वाक्यके 'मञ्च' शब्दसे मञ्चस्थ पुरुष ग्रहण किये जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ 'हृदय' शब्दसे हृदयस्थ बुद्धि ग्रहण करनी चाहिये ।

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९८१

Page 995Permalink

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९८१


इत्युक्तत्वात् । वक्ष्यति च-- "कामा येऽस्य हृदि श्रिताः" (४।४।७) इति ।मन ही है" ऐसा कहा गया है। तथा "जो काम इसके हृदयमें आश्रित हैं" ऐसा श्रुति कहेगी भी।
आत्मसंश्रयभ्रान्त्यपनोदाय हीदं वचनम्, हृदि श्रिता हृदयस्य शोका इति च हृदयकरणसम्बन्धातीतश्चायमस्मिन् काले "अतिक्रामति मृत्यो रूपाणि" (४।३।७) इति ह्युक्तम् । हृदयकरणसम्बन्धातीतत्वात्, तत्संश्रयकामसम्बन्धातीतो भवतीति युक्ततरं वचनम् ।'हृदि श्रिताः' 'हृदयस्य शोकाः' ये वचन शोकादिके आत्माश्रयत्वकी भ्रान्तिका निराकरण करनेके लिये हैं। इस सुषुप्तावस्थामें यह पुरुष हृदयरूप इन्द्रियके सम्बन्धसे परे हो जाता है, जैसा कि "यह मृत्युके रूपोंको पार कर जाता है" इस वाक्यद्वारा कहा गया है, अतः हृदयेन्द्रियके सम्बन्धसे अतीत होनेके कारण यह हृदयाश्रित कामके सम्बन्धसे परे हो जाता है—यह कथन उचित ही है।
(सविशेषात्मवाद-निराकरणम्)<br>ये तु वादिनो हृदि श्रिताः कामा वासनाश्च हृदयसम्बन्धिनमात्मानमुपसृप्योपश्लिष्यन्ति, हृदयवियोगेऽपि च आत्मन्यवतिष्ठन्ते पुटतैलस्थ इव पुष्पादि गन्ध इत्याचक्षते, तेषां "कामः संकल्पः" (१।५।३) "हृदये ह्येव रूपाणि" (३।९।२०) "हृदयस्य शोकाः" इत्यादीनां वचनानामानर्थक्यमेव ।किंतु जो [भर्तृप्रपञ्चादि] मतवादी ऐसा कहते हैं कि हृदयमें स्थित काम और वासनाएँ हृदयसम्बन्धी आत्माके पास जाकर उसका आलिङ्गन करती हैं तथा हृदयका वियोग हो जानेपर भी पुटतैलमें स्थित पुष्पादिके गन्धके समान वे आत्मामें विद्यमान रहती हैं, उनके लिये तो "कामः संकल्पः" "हृदये ह्येव रूपाणि" "हृदयस्य शोकाः" इत्यादि वाक्योंकी व्यर्थता ही है।
हृदयकरणोत्पाद्यत्वादिति चेद्, न, 'हृदि श्रिताः' इतियदि कहो कि कामादि हृदयरूप करणसे उत्पाद्य होनेके कारण [हृदयसे सम्बद्ध हैं] तो यह ठीक नहीं, क्योंकि 'हृदि श्रिताः' (हृदयमें स्थित)

९८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 996Permalink
९८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
विशेषणात् । न हि हृदयस्य करणमात्रत्वे ‘हृदि श्रिताः’ इति वचनं समञ्जसम्, ‘हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि’ इति च । आत्मविशुद्धेश्च विवक्षितत्वाद्धृच्छ्रयणवचनं यथार्थमेव युक्तम्; ‘ध्यायतीव लेलायतीव’ इति च श्रुतेरन्यथाऽसम्भवात् ।ऐसा विशेषण दिया गया है । यदि हृदय उनकी उत्पत्तिका करणमात्र ही हो तो ‘हृदि श्रिताः’ तथा ‘हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि’ ये वचन यथार्थ नहीं हो सकते; किंतु यहाँ आत्माकी विशुद्धि विवक्षित होनेके कारण उनका हृदयाश्रयत्व बतलाना यथार्थ एवं उचित ही है, क्योंकि ‘ध्यायतीव लेलायतीव’ इस श्रुतिका कोई दूसरा अर्थ होना सम्भव नहीं है ।
‘कामा येऽस्य हृदि श्रिताः’ इति विशेषणादात्माश्रया अपि सन्तीति चेन्न, अनाश्रितापेक्षत्वात् — नात्र आश्रयान्तरमपेक्ष्य ये हृदीति विशेषणम्, किं तर्हि ? ये हृद्यनाश्रिताः कामास्तानपेक्ष्य विशेषणम् । ये त्वप्ररूढा भविष्या भूताश्च प्रतिपक्षतो निवृत्तास्ते नैव हृदि श्रिताः । सम्भाव्यन्तेयदि कहो ‘जो काम इसके हृदयमें स्थित हैं’ ऐसा विशेषण देनेसे ज्ञात होता है कि कुछ काम आत्माके आश्रित भी हैं, तो यह कथन ठीक नहीं; क्योंकि यह हृदयमें अनाश्रित कामोंकी अपेक्षासे है— यहाँ ‘ये हृदि’ ऐसा विशेषण कामोंके किसी अन्य आश्रयकी अपेक्षासे नहीं है, तो किस कारणसे है ? जो काम हृदयके आश्रित नहीं हैं, उनकी अपेक्षासे यह विशेषण है। भविष्यमें होनेवाले जो काम हृदयमें आरूढ नहीं हैं, तथा जो भूतकालमें होकर विरोधके कारण निवृत्त हो गये हैं, वे हृदयमें स्थित नहीं हैं । उनकी भी सम्भावना

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९८३

Page 997Permalink

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९८३


| च ते, अतो युक्तं तानपेक्ष्य विशेषणम्—ये प्ररूढा वर्तमाना विषये ते सर्वे प्रमुच्यन्त इति । | हो सकती थी, इसलिये उनकी अपेक्षासे ऐसा विशेषण देना कि 'जो आरूढ अर्थात् विषयमें विद्यमान हैं वे सब ही मुक्त हो जाते हैं,' उचित हो है । | | तथापि विशेषणानर्थक्यमिति चेन्न, तेषु यत्नाधिक्याद् हेयार्थत्वात् । इतरथा अश्रुतमनिष्टं च कल्पितं स्यादात्माश्रयत्वं कामानाम् । | यदि कहो ऐसा माननेपर भी यह विशेषण निरर्थक है तो ठीक नहीं, क्योंकि हृदयारूढ़ काम ही हेय हैं, कारण कि उन्हींकी निवृत्तिके लिये अधिक यत्नकी आवश्यकता होती है। यदि यह विशेषण न दिया गया होता तो 'कामनाएँ आत्माके आश्रित हैं' ऐसी कल्पना होती, जिसका न तो श्रुतिमें ही प्रतिपादन हुआ है और न उसको मानना इष्ट ही है। | | 'न कञ्चन कामं कामयते' इति प्राप्तप्रतिषेधादात्माश्रयत्वं कामानां श्रुतमेवेति चेन्न, 'सधीः स्वप्नो भूत्वा' इति परनिमित्तत्वात् कामाश्नयत्वप्राप्तेः । असङ्गवचनाच्च; न हि कामाश्नयत्वेऽसङ्गवचनमुपपद्यते, सङ्गश्च काम इत्यवोचाम । | प्रतिषेध प्राप्त वस्तु का ही होता है, अतः 'किसी कामकी कामना नहीं करता' ऐसा प्रतिषेध होनेके कारण कामोंका आत्माश्रयत्व तो श्रुतिसम्मत ही है—ऐसा यदि कहो तो ठीक नहीं, क्योंकि 'बुद्धिके सहित स्वप्न होकर' इस वाक्यके अनुसार आत्माको कामाश्नयत्वकी प्राप्ति अन्य (बुद्धि) के कारण है। आत्माको असङ्ग बतलानेसे भी यही सिद्ध होता है; कामका आश्रयभूत होनेपर तो आत्माको असङ्ग कहना उचित नहीं हो सकता, सङ्ग ही काम है—ऐसा हम कह चुके हैं। |

९८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 998Permalink
९८४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| 'आत्मकामः' इति श्रुतेरात्मविषयोऽस्य कामो भवतीति चेन्न, व्यतिरिक्तकामाभावार्थत्वात्तस्याः। वैशेषिकादितन्त्रन्यायोपपन्नमात्मनः कामाद्याश्रयत्वमिति चेन्न, 'हृदि श्रिताः' इत्यादिविशेषश्रुतिविरोधादनपेक्ष्यास्ता वैशेषिकादितन्त्रोपपत्तयः; श्रुतिविरोधे न्यायाभासत्वोपगमात् । <br><br> स्वयंज्योतिष्ट्वबाधनाच्च; कामादीनां च स्वप्ने केवलदृशिमात्रविषयत्वात् स्वयंज्योतिष्ट्वं सिद्धं स्थितं च बाध्यते; आत्मसमवायित्वे दृश्यत्वानुपपत्तेः, चक्षुर्गतविशेषवत् । द्रष्टुर्हि दृश्यमर्थान्तरभूतमिति द्रष्टुः स्वयंज्योतिष्ट्वं | यदि कहो 'आत्मकामः' ऐसी श्रुति होनेके कारण इसे आत्म-सम्बन्धी कामना तो होती ही है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि यह श्रुति आत्मभिन्न कामका अभाव बतलानेके लिये है; यदि कहो कि आत्माका कामाद्याश्रयत्व वैशेषिकादि शास्त्रोंकी युक्तिसे सिद्ध होता है तो ऐसा कहना भी उचित नहीं है; क्योंकि 'हृदि श्रिताः' इत्यादि विशेष श्रुतियोंसे विरुद्ध होनेके कारण वे वैशेषिकादि शास्त्रोंकी उपपत्तियाँ उपेक्षाके योग्य हैं; कारण, श्रुतिसे विरुद्ध होनेपर उनको न्यायाभास माना गया है। <br><br> इसके सिवा ऐसा माननेसे आत्माका स्वयंज्योतिष्ट्व भी बाधित हो जाता है; स्वप्नमें कामादि केवल साक्षीमात्रके विषय हैं, इससे जो उसका सिद्ध एवं विद्यमान स्वयं-ज्योतिष्ट्व है वह बाधित हो जायगा; क्योंकि उनका आत्मासे समवाय-सम्बन्ध होनेपर वे आत्माका दृश्य नहीं हो सकेंगे, जैसे नेत्रगत शुक्लत्व-कृष्णत्व आदि विशेष नेत्रके दृश्य नहीं होते। द्रष्टा-का दृश्य उससे भिन्न पदार्थ होता है, इसीसे द्रष्टाका स्वयंप्रकाशत्व |

ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९८५

Page 999Permalink
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९८५

| सिद्धम्। तद् बाधितं स्याद् यदि कामाद्याश्रयत्वं परिकल्प्येत । <br><br> सर्वशास्त्रार्थविप्रतिषेधाच्च । <br><br> परस्यैकदेशकल्पनायां कामाद्याश्रयत्वे च सर्वशास्त्रार्थजातं कुप्येत । एतच्च विस्तरेण चतुर्थेऽवोचाम । महता हि प्रयत्नेन कामाद्याश्रयत्वकल्पनाः प्रतिषेद्धव्याः, आत्मनः परेणैकत्वशास्त्रार्थसिद्धये। तत्कल्पनायां पुनः क्रियमाणायां शास्त्रार्थ एव बाधितः स्यात् । यथेच्छादीनामात्मधर्मत्वं कल्पयन्तो वैशेषिका नैयायिकाश्च उपनिषच्छास्त्रार्थेन न सङ्गच्छन्ते, तथेयमपि कल्पनोपनिषच्छास्त्रार्थबाधनान्नादरणीया ॥ २२ ॥ | सिद्ध होता है। अतः यदि आत्मामें कामादिके आश्रयत्वकी कल्पना की जायगी तो वह बाधित हो जायगा। <br><br> सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्पर्यसे विरोध होनेके कारण भी [ यह सिद्धान्त अग्राह्य है ]। जीव परमात्माका एक देश है तथा आत्मा कामादिका आश्रय है—ऐसा माननेसे तो सम्पूर्ण शास्त्रके तात्पर्याेंका व्याकोप हो जायगा। यह बात हमने ¹चतुर्थ अध्यायमें विस्तारसे कही है; अतः आत्माका परमात्मासे एकत्व है—इस शास्त्र-तात्पर्यकी सिद्धिके लिये 'आत्मा कामादिका आश्रय है' इस कल्पनाका पूरा प्रयत्न करके विरोध करना चाहिये। पुनः इस कल्पनाके करनेपर तो शास्त्रका तात्पर्य ही बाधित हो जायगा। जिस प्रकार इच्छादिको आत्माका धर्म कल्पना करनेवाले वैशेषिक और न्यायमतावलम्बियोंकी औपनिषद शास्त्रतात्पर्यसे सङ्गति नहीं होती, उसी प्रकार औपनिषद शास्त्रार्थकी बाधिका होनेके कारण यह कल्पना भी आदरणीय नहीं है ॥ २२ ॥ |


सुषुप्तिमें स्वयंज्योति आत्माकी दृष्टि आदिका अनुभव न होनेमें हेतु

स्त्रीपुंसयोरिवैकत्वान्न पश्यति-शङ्का—स्त्री और पुरुषके समान

१. उपनिषद्के द्वितीय अध्यायमें।

९८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

Page 1000Permalink
९८६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४
त्युक्तम्, स्वयंज्योतिरिति च । स्वयंज्योतिष्ट्वं नाम चैतन्यात्मस्वभावता । यदि ही अग्‍न्युष्णत्वादिवच्चैतन्यात्मस्वभाव आत्मा स कथमेकत्वेऽपि हि स्वभावं जह्यात्, न जानीयात् ? अथ न जहाति, कथमिह सुषुप्ते न पश्यति ? विप्रतिषिद्धमेतत्—चैतन्यमात्मस्वभावो न जानाति चेति ।सुषुप्तिमें जीव और परमात्माकी एकता हो जानेके कारण वह नहीं देखता तथा आत्मा स्वयंज्योति है—यह कहा गया; स्वयंज्योतिष्ट्वका अर्थ है चैतन्यात्मस्वरूपता । यदि अग्निके उष्णत्वादिके समान आत्मा चैतन्यस्वरूप है तो परमात्माके साथ एकत्व होनेपर भी वह अपने स्वभावको कैसे छोड़ देता है, जिससे कि वह नहीं जानता ? और यदि वह स्वभावको नहीं छोड़ता तो यहाँ सुषुप्तिमें देखता क्यों नहीं है ? वह चैतन्यस्वरूप है और दूसरेको नहीं जानता—यह कथन तो सर्वथा विरुद्ध है ।
न विप्रतिषिद्धम्, उभयमप्येतदुपपद्यत एव । कथम्—समाधान— यह विरुद्ध नहीं है, ये दोनों बातें भी सम्भव हो हैं । किस प्रकार—

यद् वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् । न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यत् पश्येत् ॥ २३ ॥

वह जो नहीं देखता सो देखता हुआ ही नहीं देखता; द्रष्टाकी दृष्टिका कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है । उस समय उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसे देखे ॥ २३ ॥

यद् वै सुषुप्ते तन्न पश्यति पश्यन् वै तत्, तत्र पश्यन्नेव न पश्यति । यत् तत्र सुषुप्ते नवह जो सुषुप्तिमें नहीं देखता सो निश्चय उस अवस्थामें देखता हुआ ही नहीं देखता । तुम जो ऐसा जानते हो कि वह सुषुप्तिमें नहीं

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९८७ |

Page 1001Permalink

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९८७ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
पश्यतीति जानीषे तन्न तथा गृह्णीयाः; कस्मात् ? पश्यन् वै भवति तत्र ।देखता सो वैसा मत समझो; क्यों ? क्योंकि वहां भी वह देखता ही रहता है।
नन्वेवं न पश्यतीति सुषुप्ते जानीमो यतो न चक्षुर्वा मनो वा दर्शने करणं व्यापृतमस्ति । व्यापृतेषु हि दर्शनश्रवणादिषु पश्यतीति व्यवहारो भवति शृणोतीति वा । न च व्यापृतानि करणानि पश्यामः; तस्मान्न पश्यत्येवायम् ।शङ्का—किंतु वह सुषुप्तिमें इस प्रकार नहीं देखता—ऐसा हम जानते हैं; क्योंकि वहां चक्षु या मन कोई भी इन्द्रिय दर्शनमें व्यापार करनेवाली नहीं होती । दर्शन और श्रवणादि इन्द्रियोंके व्यापार करनेपर ही 'देखता है' अथवा 'सुनता है' ऐसा व्यवहार होता है। और वहाँ हम इन्द्रियोंको व्यापारयुक्त नहीं देखते; इसलिये यह नहीं ही देखता है।
न हि; किं तर्हि ? पश्यन्नेव भवति, कथम् ? न हि यस्माद् द्रष्टुर्दर्शनकर्तुर्या दृष्टिस्तस्या दृष्टेर्विपरिलोपो विनाशः, स न विद्यते । यथाग्नेरौष्ण्यं यावदग्निभावि, तथाऽयं चात्मा द्रष्टाऽविनाशी, अतोऽविनाशित्वादात्मनो दृष्टिरप्यविनाशिनी, यावद्द्रष्टृभाविनी हि सा ।समाधान--नहीं; तो फिर क्या बात है ?—यह देखता ही है, किस प्रकार ? क्योंकि द्रष्टा-दर्शनक्रियाके कर्ताकी जो दृष्टि है, उस दृष्टिका जो विपरिलोप-विनाश है, वह नहीं होता। जिस प्रकार अग्निकी उष्णता अग्निकी सत्तातक रहनेवाली है, उस प्रकार यह द्रष्टा आत्मा तो अविनाशी है, अतः आत्माके अविनाशी होनेके कारण आत्माकी दृष्टि भी अविनाशिनी है—वह द्रष्टाकी स्थितितक रहनेवाली ही है।

९८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

Page 1002Permalink

९८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

| ननु विप्रतिषिद्धमिदमभिधीयते द्रष्टुः सा दृष्टिर्न विपरिलुप्यत इति च। दृष्टिश्च द्रष्ट्रा क्रियते; दृष्टिकर्तृत्वाद्धि द्रष्टेत्युच्यते; क्रियमाणा च द्रष्ट्रा दृष्टिर्न विपरिलुप्यत इति चाशक्यं वक्तुम्। ननु न विपरिलुप्यत इति वचनादविनाशिनी स्यात्; न, वचनस्य ज्ञापकत्वात्। न हि न्यायप्राप्तो विनाशः कृतकस्य वचनशतेनापि वारयितुं शक्यते; वचनस्य यथाप्राप्तार्थज्ञापकत्वात्।<br><br>नैष दोषः; आदित्यादिप्रकाशकत्ववद् दर्शनोपपत्तेः; यथा आदित्यादयो नित्यप्रकाशस्वभावा एव सन्तः स्वाभाविके न नित्येनैव प्रकाशेन प्रकाशयन्ति, न ह्यप्रकाशात्मानः सन्तः प्रकाशं कुर्वन्तः प्रकाशयन्तीत्युच्यन्ते; किं | शङ्का- किंतु द्रष्टाकी वह दृष्टि है और उसका लोप नहीं होता—यह कथन तो परस्परविरुद्ध है। दृष्टि तो द्रष्टाद्वारा ही की जाती है; दृष्टिकर्ता होनेके कारण ही वह द्रष्टा कहा जाता है; द्रष्टाके द्वारा दृष्टि की जानेवाली है और उसका लोप नहीं होता--यह तो कहा ही नहीं जा सकता। यदि कहो कि 'न विपरिलुप्यते' इस वचनके अनुसार वह अविनाशिनी होनी ही चाहिये तो यह ठीक नहीं; क्योंकि वचन तो केवल ज्ञापक है कृतक वस्तुका विनाश न्यायप्राप्त है, अतः उसका सैकड़ों वचनोंसे भी निवारण नहीं किया जा सकता; क्योंकि वचन तो जो वस्तु जैसी प्राप्त हुई है, उसे वैसी ही सूचित कर देनेवाला है।<br><br>समाधान— यह दोष नहीं है; क्योंकि आदित्यादिके प्रकाशकत्वके समान इसका देखना भी उपपन्न ही है। जिस प्रकार आदित्यादि नित्यप्रकाशस्वभाव होते हुए ही अपने नित्यस्वाभाविक प्रकाशसे प्रकाश करते हैं, वे स्वयं अप्रकाशस्वरूप होकर उससे अपनेसे भिन्न प्रकाश उत्पन्न करके प्रकाशित करते हैं--ऐसा उनके विषयमें नहीं कहा जाता तो, |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९८९ |

Page 1003Permalink
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९८९
संस्कृत मूल (भाष्य)हिन्दी भाष्यार्थ
तर्हि ? स्वभावेनैव नित्येन प्रकाशेन । तथायामप्यात्मा अविपरिलुप्तस्वभावया दृष्ट्या नित्यया द्रष्टेत्युच्यते ।फिर क्या बात है ? वे अपने स्वभावरूप नित्यप्रकाशसे प्रकाशित करते हैं । इसी प्रकार यह आत्मा भी अपनी अविनाशस्वरूपा नित्यदृष्टिके कारण 'द्रष्टा' ऐसा कहा जाता है ।
गौणं तर्हि द्रष्टृत्वम् ।**शङ्का—**तब तो इसका द्रष्टृत्व गौण है ।
न, एवमेव मुख्यत्वोपपत्तेः; यदि ह्यन्यथाप्यात्मनो द्रष्टृत्वं दृष्टम्, तदास्य द्रष्टृत्वस्य गौणत्वम्, न त्वात्मनोऽन्यो दर्शनप्रकारोऽस्ति; तदेवमेव मुख्यं द्रष्टृत्वमुपपद्यते नान्यथा—यथा आदित्यादीनां प्रकाशयितृत्वं नित्येनैव स्वाभाविकेनाक्रियमाणेन प्रकाशेन, तदेव च प्रकाशयितृत्वं मुख्यं प्रकाशयितृत्वान्तरानुपपत्तेः; तस्मान्न 'द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलुप्यते' इति न विप्रतिषेधगन्धोऽप्यस्ति ।**समाधान—**नहीं, इसी प्रकार तो इसका मुख्यत्व सिद्ध हो सकता है; यदि आत्माका द्रष्टृत्व किसी दूसरे भी प्रकारसे देखा गया होता तो इसके द्रष्टृत्वकी गौणता हो सकती थी, किंतु आत्माके दर्शनका कोई अन्य प्रकार तो है नहीं; अतः इसी प्रकार आत्माका मुख्य द्रष्टृत्व उपपन्न हो सकता है, किसी अन्य प्रकारसे नहीं; जिस प्रकार कि आदित्यादिका प्रकाशकत्व अपने स्वरूपभूत, नित्य एवं अकृत्रिम प्रकाशके कारण है, और यही प्रकाशकत्व मुख्य भी है; क्योंकि उसका कोई अन्य प्रकाशक होना सम्भव नहीं है, अतः 'द्रष्टाकी दृष्टिका सर्वथा लोप नहीं होता' इस उक्तिमें विरोधका लेश भी नहीं है ।
ननु—अनित्यक्रियाकर्तृविषय एव तृच्प्रत्ययान्तस्य शब्दस्य प्रयोगो दृष्टः, यथा छेत्ता भेत्ता**शङ्का—**किंतु तृच्प्रत्ययान्त शब्दका प्रयोग तो अनित्य क्रियाके कर्ताके विषयमें ही देखा गया है, जैसे छेत्ता, भेत्ता, गन्ता इत्यादि, उन्हींके

९९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 1004Permalink
९९०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
गन्तेति, तथा द्रष्टेत्यत्रापीति चेत् ?समान द्रष्टा पदमें भी समझना चाहिये—ऐसा कहें तो ?
न, प्रकाशयितेति दृष्टत्वात् ।समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [ नित्यप्रकाशस्वरूप आदित्यादिके विषयमें ] 'प्रकाशयिता' ऐसा प्रयोग देखा जाता है।
भवतु प्रकाशकेष्वन्यथासम्भवात्, न स्वात्मनीति चेत् ?शङ्का—प्रकाशकोंमें कोई अन्य प्रकार न हो सकनेके कारण वहाँ भले ही ऐसा प्रयोग हो जाय, परंतु आत्माके विषयमें तो ऐसा नहीं हो सकता।
न, दृष्ट्यविपरिलोपश्रुतेः ।समाधान--नहीं, क्योंकि यहां भी आत्मदृष्टिके लोप न होनेका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति है।
पश्यामि न पश्यामीत्यनुभवदर्शनान्नेति चेत् ?शङ्का—मैं देखता हूँ, मैं नहीं देखता—ऐसा विपरीत अनुभव देखा जानेके कारण आत्माकी दृष्टि नित्य नहीं हो सकती—ऐसा कहें तो ?
न, करणव्यापारविशेषापेक्षत्वात्; उद्धृतचक्षुषां च स्वप्ने आत्मदृष्टेरविपरिलोपदर्शनात् ।समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह अनुभव तो [ चक्षु ] इन्द्रियके विशेष व्यापारकी अपेक्षासे है; इसके सिवा जिनकी आँखें नष्ट हो गयी हैं, उनकी भी स्वप्नमें आत्म-दृष्टिका अविपरिलोप ( सद्भाव ) देखा जाता है। अतः आत्माकी दृष्टि
तस्मादविपरिलुप्तस्वभावैवात्मनो दृष्टिः, अतस्तयाविपरिलुप्तयातो अविपरिलुप्तस्वभावा ही है, इसलिये यह पुरुष उस अविनाशिनी

१. कभी नष्ट न होनेवाली ।

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९९१ |

Page 1005Permalink
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९९१
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
दृष्ट्या स्वयंज्योतिःस्वभावया पश्यन्नेव भवति सुषुप्ते ।<br>कथं तर्हि न पश्यतीति ?स्वयंज्योतिःस्वरूपा दृष्टिसे स्वप्नमें देखता ही रहता है ।<br>शङ्का—तो फिर 'नहीं देखता' ऐसा क्यों कहा जाता है ?
उच्यते—न तु तदस्ति । किं तत् ? द्वितीयं विषयभूतम् । किं विशिष्टम् ? ततो द्रष्टुरन्यदन्यत्वेन विभक्तं यत् पश्येद् यदुपलभेत । यद्धि तद्विशेषदर्शनकारणमन्तःकरणं चक्षूरूपं च, तदविद्ययान्यत्वेन प्रत्युपस्थापितमासीत् । तदेतस्मिन् काल एकीभूतम्, आत्मनः परेण परिष्वङ्गात् । द्रष्टुर्हि परिच्छिन्नस्य विशेषदर्शनाय करणमन्यत्वेन व्यवतिष्ठते । अयं तु स्वेन सर्वात्मना सम्परिष्वक्तः स्वेन परेण प्राज्ञेनात्मना प्रिययेव पुरुषः; तेन न पृथक्त्वेन व्यवस्थितानि करणानि विषयाश्च । तदभावाद् विशेषदर्शनं नास्ति, करणादिकृतं हि तन्नात्मकृतम्;समाधान—बतलाते हैं—यहां तो वह वस्तु ही नहीं है । वह कौन ? दूसरी विषयभूत वस्तु । किस विशेषणसे युक्त ? उस द्रष्टासे अन्य अर्थात् अन्यरूपसे विभक्त, जिसे कि वह देखे-उपलब्ध करे। क्योंकि जो उस विशेष दर्शनका कारण चक्षुरूप अन्तःकरण था, वह अविद्याके द्वारा अन्यरूपसे प्रस्तुत किया हुआ था । इस समय प्रत्यगात्माका परमात्माके साथ आलिङ्गन होनेके कारण वह एकरूप हो गया है । परिच्छिन्न द्रष्टाके विशेष दर्शनके लिये ही इन्द्रियाँ अन्य रूपसे स्थित होती हैं । किंतु इस समय, जैसे पुरुष अपनी प्रियासे आलिङ्गित हाता है, उसी प्रकार यह स्वयं सर्वात्मभावसे अपने परमरूप प्राज्ञात्मासे आलिङ्गित रहता है; इसलिये उस अवस्थामें इन्द्रिय और विषय पृथक्रूपसे विद्यमान नहीं रहते और उनका अभाव होनेके कारण विशेषदर्शन भी नहीं होता, क्योंकि वह तो इन्द्रियादिका किया हुआ ही होता है, आत्माका किया

९९२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४

Page 1006Permalink

९९२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४


| आत्मकृतामिव प्रत्यवभासते; <br><br> तस्मात् तत्कृतेयं भ्रान्तिरात्मनो <br><br> दृष्टिः परिलुप्यत इति ॥२३॥ | हुआ नहीं होता; आत्माका किया हुआ-सा तो भासता ही है, अतः उसीके कारण ऐसी भ्रान्ति होती है कि आत्माकी दृष्टिका लोप होता है ॥ २३ ॥ |


यद् वै तन्न जिघ्रति जिघ्रन् वै तन्न जिघ्रति न हि घ्रातुर्घ्रातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यज्जिघ्रेत् ॥ २४ ॥

यद् वै तन्न रसयते रसयन् वै तन्न रसयते न हि रसयितू रसयतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यद् रसयेत् ॥२५॥

यद् वै तन्न वदति वदन् वै तन्न वदति न हि वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यद् वदेत् ॥ २६॥

यद् वै तन्न शृणोति शृण्वन् वै तन्न शृणोति न हि श्रोतुः श्रुतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यच्छृणुयात् ॥ २७ ॥

यद् वै तन्न मनुते मन्वानो वै तन्न मनुते न हि मन्तुर्मतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यन्मन्वीत ॥२८॥

यद् वै तन्न स्पृशति स्पृशन् वै तन्न स्पृशति न हि स्प्रष्टुः स्पृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यत् स्पृशेत् ॥ २६ ॥ यद् वै तन्न

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९३

Page 1007Permalink

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९३

विजानाति विजानन् वै तन्न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यद् विजानीयात् ॥३०॥

वह जो नहीं सूँघता सो सूँघता हुआ ही नहीं सूँघता। सूँघनेवालेकी गन्धग्रहणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसे सूँघे ॥ २४ ॥ वह जो रसास्वाद नहीं करता सो रसास्वाद करता हुआ ही नहीं करता। रसास्वाद करनेवालेकी रसग्रहणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ है ही नहीं, जिसका रस ग्रहण करे ॥ २५ ॥ वह जो नहीं बोलता सो बोलता हुआ ही नहीं बोलता। वक्ताकी वचन-शक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न दूसरा कुछ है ही नहीं, जिसके विषयमें वह बोले ॥ २६ ॥ वह जो नहीं सुनता सो सुनता हुआ ही नहीं सुनता। श्रोताकी श्रवणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं, जिसके विषयमें वह सुने ॥ २७ ॥ वह जो मनन नहीं करता सो मनन करता हुआ ही मनन नहीं करता। मनन करनेवालेकी मननशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसके विषयमें वह मनन करे ॥ २८ ॥ वह जो स्पर्श नहीं करता सो स्पर्श करता हुआ ही स्पर्श नहीं करता। स्पर्श करनेवालेकी स्पर्शशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ है ही नहीं, जिसे वह स्पर्श करे ॥ २६ ॥ वह जो नहीं जानता सो नहीं जानता हुआ ही नहीं जानता। विज्ञाताकी विज्ञाति (विज्ञानशक्ति) का सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ ही नहीं होता, जिसे वह विशेषरूपसे जाने ॥ ३० ॥

बृ० उ० ६३—