BharatKosha
Back to the archive

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

१०३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 1050Permalink
१०३६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| आहोस्विच्छरीरस्थस्य संकुचितानि करणानि मृतस्य भिन्नघटप्रदीपप्रकाशवत् सर्वतो व्याप्य पुनर्देहान्तरारम्भे संकोचमुपगच्छन्ति? किञ्च मनोमात्रं वैशेषिकसमय इव देहान्तरारम्भदेशं प्रति गच्छति? किं वा कल्पनान्तरमेव वेदान्तसमय इति। | हो जाती है? अथवा शरीरस्थ जीवकी संकुचित इन्द्रियाँ मरनेपर, फूटे हुए घड़ेके प्रकाशके समान सर्वत्र व्याप्त होकर, देहान्तरका आरम्भ होनेपर पुनः संकोचको प्राप्त हो जाती हैं? अथवा वैशेषिक सिद्धान्तवालोंके मतानुसार केवल मन ही देहान्तरके देशमें जाता है? किंवा वेदान्तसिद्धान्तके अनुसार कल्पनान्तर ही देहान्तरकी प्राप्ति है? | | उच्यते—"त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः" (बृ० उ० १।५।१३) इति श्रुतेः—सर्वात्मकानि तावत् करणानि, सर्वात्मकप्राणसंश्रयाच्च; तेषामाध्यात्मिकाधिभौतिकपरिच्छेदः प्राणिकर्मज्ञानभावनानिमित्तः। अतस्तद्वशात् स्वभावतः सर्वगतानामनन्तानामपि प्राणानां कर्मज्ञानवासनानुरूपेणैव देहान्तरारम्भवशात् प्राणानां वृत्तिः संकुचति विकसति च। तथा चोक्तम्—"समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽनेन सर्वेण" (बृ० उ० १। | समाधान-बतलाते हैं—"वे ये सभी समान और सभी अनन्त हैं" इस श्रुतिके अनुसार तथा सर्वात्मक प्राणके आश्रित होनेसे इन्द्रियाँ तो सर्वात्मक ही हैं; उनका आध्यात्मिक और आधिभौतिक परिच्छेद प्राणियोंके कर्म, ज्ञान और भावनाके कारण है। अतः उनके अधीन होनेके कारण, स्वभावतः सर्वगत और अनन्त होनेपर भी भोक्ता प्राणोंके कर्म, ज्ञान और वासनाके अनुसार ही देहान्तरके आरम्भवश प्राणोंकी वृत्तिका संकोच या विकास होता है। ऐसा ही कहा भी है "यह प्राण चींटीके प्रमाणका है, मच्छरके समान है, हाथीके बराबर है, इन तीनों लोकोंके समान है और इस सबके |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३७

Page 1051Permalink

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३७


३।२२) इति। तथा चेदं वचनमनुकूलम्—“स यो हैताननन्तानुपास्ते” (बृ० उ० १।५। १६) इत्यादि “तं यथा यथोपासते” इति च।<br><br>तत्र वासना पूर्वप्रज्ञाख्या विद्याकर्मतन्त्रा जलूकावत्संततैव स्वप्नकाल इव कर्मकृतं देहाद्देहान्तरमारभते हृदयस्थैव। पुनर्देहान्तरारम्भे देहान्तरं पूर्वाश्रयं विमुञ्चति—इत्येतस्मिन्नर्थे दृष्टान्त उपादीयते—समान है”। इसी प्रकार “जो भी इन अनन्तोंकी उपासना करता है” तथा “उसकी जो जिस प्रकार उपासना करते हैं” इत्यादि वचन भी अनुकूल हो सकते हैं।<br><br>इनमें कर्म और ज्ञानके अधीन जो पूर्वप्रज्ञा नामकी वासना है, वह जोंकके समान सर्वत्र व्याप्त रहते हुए ही हृदयस्थित रहकर जैसे स्वप्नावस्थाके शरीरकी रचना करती है, उसी प्रकार इस देहसे भिन्न दूसरे कर्मजनित देहको रच लेती है। फिर देहान्तरका आरम्भ हो जानेपर अपने पूर्वाश्रित देहको त्याग देती है—इस विषयमें यह दृष्टान्त बतलाया जाता है—

देहान्तरगमनमें जोंकका दृष्टान्त

तद् यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वान्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरत्येवमेवायमात्मेदꣳ शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वान्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरति ॥ ३ ॥

वह दृष्टान्त—जिस प्रकार जोंक एक तृणके अन्तमें पहुँचकर दूसरे तृणरूप आश्रयको पकड़कर अपनेको सकोड़ लेती है, इसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको मारकर—अविद्या (अचेतनावस्था) को प्राप्त कराकर दूसरे आधारका आश्रय ले अपना उपसंहार कर लेता है ॥ ३ ॥

तत्तत्र देहान्तरसंचार इदं निदर्शनम्—यथा येन प्रकारेण तृणजलायुका तृणजलूका तृण-उस देहान्तरसंचारमें यह उदाहरण है—यथा जिस प्रकार तृण-जलूका (घासपर चलनेवाली जोंक)

१०३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 1052Permalink
१०३८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| स्यान्तमवसानं गत्वा प्राप्य अन्यं तृणान्तरमाक्रमम्, आक्रम्यत इत्याक्रमस्तमाक्रममाक्रम्याश्रित्य, आत्मानम् आत्मनः पूर्वावयवम् उपसंहरत्यन्त्यावयवस्थाने; एवमेव अयमात्मा यः प्रकृतः संसारीदं शरीरं पूर्वोपात्तं निहत्य स्वप्नं प्रतिपित्सुरिव पातयित्वा अविद्यां गमयित्वा अचेतनं कृत्वा स्वात्मोपसंहारेण, अन्यमाक्रमं तृणान्तरमिव तृणजलूका शरीरान्तरं गृहीत्वा प्रसारिता वास नया आत्मानमुपसंहरति, तत्रात्मभावमारभते; यथा स्वप्ने देहान्तरमारभते स्वप्नदेहान्तरस्थ इव शरीरारम्भदेश आरभ्यमाणे देहे जङ्गमे स्थावरे वा। | तृणके अन्त-अन्तिम भागपर पहुँचकर दूसरे तृणरूप आक्रमका—जो आक्रान्त किया जाय उसे आक्रम कहते हैं, उस आक्रम यानी आधारका आश्रय ले अपनेको अर्थात् अपने पूर्वावयवको पिछले अवयवके स्थानमें सकोड़ लेती है; इसी प्रकार यह संसारी आत्मा, जिसका यहाँ प्रकरण है, इस अपने पूर्वप्राप्त शरीरको मारकर—स्वप्नप्राप्तिकी इच्छावालेके समान गिराकर, इसे अविद्याको प्राप्त कराकर अर्थात् अपने आत्माके उपसंहारद्वारा अचेतन कर, तृणजलूकाके एक तृणसे दूसरे तृणपर जानेके समान दूसरे आक्रम यानी शरीरान्तरको अपनी फैली हुई वासनासे ग्रहणकर अपना उपसंहार कर लेता है, अर्थात् उसीमें आत्मभाव करने लगता है; जिस प्रकार यह स्वप्नमें देहान्तरका आरम्भ करता है उसी प्रकार स्वप्नदेहान्तरस्थ जीवके समान यह शरीरारम्भदेशमें अर्थात् आरम्भ किये हुए जङ्गम या स्थावर देहमें आत्मभाव कर लेता है! | | तत्र च कर्मवशात् करणानि लब्धवृत्तीनि संहन्यन्ते; बाह्यं च कुशमृत्तिकास्थानीयं शरीरमारभ्यते। तत्र च करणव्यूहमपेक्ष्य | वहीं कर्मवश इन्द्रियाँ भी वृत्तियुक्त होकर संगठित हो जाती हैं और कुश मृत्तिकास्थानीय बाह्य शरीरका भी आरम्भ हो जाता है। फिर उसीमें इन्द्रियव्यूहकी अपेक्षासे |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३९

Page 1053Permalink

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३९


वागाद्यनुग्रहायाग्न्यादिदेवताः संश्रयन्ते । एष देहान्तरारम्भविधिः ॥ ३ ॥वागादि इन्द्रियोंका उपकार करनेके लिये अग्नि आदि देवता आश्रय ले लेते हैं। यही देहान्तरके आरम्भकी विधि है ॥ ३ ॥

आत्माके देहान्तरनिर्माणमें सुवर्णकारका दृष्टान्त

तत्र देहान्तरारम्भे नित्योपात्तमेवोपादानमुपमृद्योपमृद्य देहान्तरमारभते, आहोस्विदपूर्वमेव पुनः पुनरादत्त इति ? अत्रोच्यते दृष्टान्तः—उस देहान्तरके आरम्भमें जीव नित्य ग्रहण किये हुए उपादानको ही बिगाड़ बिगाड़कर उसीसे देहान्तरका आरम्भ करता है अथवा पुनः पुनः नवीन उपादान ग्रहण करता है। इसमें दृष्टान्त बतलाया जाता है—

तद् यथा पेशस्कारी पेशसो मात्रामुपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुत एवमेवायमात्मेदꣳ शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वान्यन्नवतरं कल्याणतरꣳ रूपं कुरुते पित्र्यं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वान्येषां वा भूतानाम् ॥ ४ ॥

उसमें दृष्टान्त—जिस प्रकार सोनार सुवर्णका भाग लेकर दूसरे नवीन और कल्याणतर (अधिक सुन्दर) रूपकी रचना करता है, उसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको नष्ट कर—अचेतनावस्थाको प्राप्तकर दूसरे पितर, गन्धर्व, देव, प्रजापति, ब्रह्मा अथवा अन्यभूतोंके नवीन और कल्याणतर रूपकी रचना करता है ॥ ४ ॥

तत्तत्रैतस्मिन्नर्थे—यथा पेशस्कारी पेशः सुवर्णं तत् करोतीति पेशस्कारी सुवर्णकारः, पेशसःउस इस विषयमें यह दृष्टान्त है-जिस प्रकार पेशस्कारी-पेशस् सुवर्णको कहते हैं, उसे जो बनावे वह पेशस्कारी-सोनार, पेशस् अर्थात्

१०४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 1054Permalink

१०४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४


सुवर्णस्य मात्रामपादायापच्छिद्य गृहीत्वा अन्यत् पूर्वस्माद् रचनाविशेषान्नवतरमभिनवतरं कल्याणात् कल्याणतरं रूपं तनुते निर्मिनोति । एवमेवायमात्मेत्यादि पूर्ववत् ।<br><br>नित्योपात्तान्येव पृथिव्यादीन्याकाशान्तानि पञ्च भूतानि यानि 'द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे' इति चतुर्थे व्याख्यातानि पेशःस्थानीयानि, तान्येवोपमृद्योपमृद्य, अन्यदन्यच्च देहान्तरं नवतरं कल्याणतरं रूपं संस्थानविशेषं देहान्तरमित्यर्थः, कुरुते । पित्र्यं वा पितृभ्यो हितं पितृलोकोपभोगयोग्यमित्यर्थः, गान्धर्वं गन्धर्वाणामुपभोगयोग्यम्, तथा देवानां दैवम्, प्रजापतेः प्राजापत्यम्, ब्रह्मण इदं ब्राह्मं वा; यथाकर्म यथाश्रुतमन्येषां वा भूतानां सम्बन्धि शरीरान्तरं कुरुत इत्यभिसम्बध्यते ॥ ४ ॥सुवर्णकी मात्राका अपादान-अपच्छेदन अर्थात् ग्रहण कर; पूर्वरचनाविशेषसे भिन्न दूसरा नवीनतर और कल्याणसे भी कल्याणतर रूप बनाता है, उसी प्रकार यह आत्मा--इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है।<br><br>आत्माके नित्यगृहीत जो पृथ्वीसे लेकर आकाशपर्यन्त सुवर्णस्थानीय पाँच भूत हैं, जिनकी 'द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे' इस वाक्यसे चतुर्थ प्रपाठकमें व्याख्या की गयी है, उन्हींको बिगाड़-बिगाड़कर दूसरे-दूसरे देहान्तरको अर्थात् पूर्वापेक्षा नवीन और कल्याणतर रूप—संस्थानविशेष यानी देहान्तरको रच लेता है। पित्र्य—जो पितरोंके लिये उपयोगी हो अर्थात् पितृलोकके उपभोगके योग्य हो, गान्धर्व—जो गन्धर्वोंके उपभोगयोग्य हो, इसी प्रकार देवताओंके लिये उपयोगी—दैव, प्रजापतिके लिये उपयोगी—प्राजापत्य और जो ब्रह्माका है, उस ब्राह्म शरीरकी तथा इसी प्रकार कर्म और ज्ञानके अनुसार वह अन्य भूतोंसे सम्बद्ध शरीरान्तरकी रचना कर लेता है—इस प्रकार इसका सम्बन्ध है ॥ ४ ॥

१. उपनिषदके द्वितीय अध्यायमें।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०४१

Page 1055Permalink

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०४१

सर्वमय आत्माकी कर्मानुसार विभिन्न गतियोंका निरूपण

येऽस्य बन्धनसंज्ञका उपाधिभूताः, यैः संयुक्तस्तन्मयोऽयमिति विभाव्यते, ते पदार्थाः पुञ्जीकृत्यैहकत्र प्रतिनिर्दिश्यन्ते--इस आत्माके जो बन्धनसंज्ञक उपाधिभूत पदार्थ हैं और जिनसे संयुक्त होकर यह तद्रूप है-ऐसा समझा जाता है, उन पदार्थोंका यहाँ एक जगह एकत्रित करके निर्देश किया जाता है—

स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय आपोमयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाममयः क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयः सर्वमयस्तद्यदेतदिदम्मयोऽदोमय इति यथाकारी यथाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन । अथो खल्वाहुः—काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते ॥ ५ ॥

वह यह आत्मा ब्रह्म है। वह विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, चक्षुर्मय, श्रोत्रमय, पृथिवीमय, जलमय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतेजोमय, काममय, अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय, धर्ममय, अधर्ममय और सर्वमय है। जो कुछ इदंमय ( प्रत्यक्ष ) और अदोमय ( परोक्ष ) है, वह वही है। वह जैसा करनेवाला और जैसे आचरणवाला होता है, वैसा ही हो जाता है। शुभ कर्म करनेवाला शुभ होता है और पापकर्मा पापी होता है। पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यात्मा होता है और पापकर्मसे पापी होता है। कोई-कोई कहते हैं कि यह पुरुष काममय ही है, वह जैसी कामनावाला होता है

बृ० उ० ६६—

१०४२ | वृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 1056Permalink
१०४२वृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

वैसा ही संकल्प करता है, जैसे संकल्पवाला होता है वैसा ही कर्म करता है और जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है ॥५॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
स वा अयम्, य एवं संसरत्यात्मा, ब्रह्मैव पर एव, योऽशनायाद्यतीतः। विज्ञानमयो विज्ञानं बुद्धिस्तेनोपलक्ष्यमाणस्तन्मयः। 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु' (४।३।७) इति ह्युक्तम्। विज्ञानमयो विज्ञानप्रायः, यस्मात्तद्धर्मत्वमस्य विभाव्यते “ध्यायतीव लेलायतीव” (४।३।७) इति।जो आत्मा इस प्रकार संसरित होता (इहलोक-परलोकमें गमनागमन करता) है, वह यह परब्रह्म ही है, जो कि क्षुधा-पिपासादि धर्मोंसे परे है। वह विज्ञानमय-विज्ञान बुद्धि को कहते हैं, उससे उपलक्षित होनेवाला अर्थात् तन्मय है। उसके विषयमें “यह आत्मा कौन है ? जो यह प्राणोंमें विज्ञानमय है” ऐसा कहा जा चुका है। विज्ञानमय अर्थात् विज्ञानप्राय; क्योंकि 'ध्यायतीव लेलायतीव” इत्यादि वाक्यसे इसका विज्ञानधर्मत्व प्रतीत होता है।
तथा मनोमयो मनःसंनिकर्षान्मनोमयः। तथा प्राणमयः प्राणः पञ्चवृत्तिस्तन्मयः, येन चेतनश्चलतीव लक्ष्यते। तथा चक्षुर्मयो रूपदर्शनकाले। एवं श्रोत्रमयः शब्दश्रवणकाले। एवं तस्य तस्येन्द्रियस्य व्यापारोद्भवे तत्तन्मयो भवति।इसी प्रकार वह मनोमय है—मनकी संनिधिके कारण वह मनोमय है तथा प्राणमय है—प्राण पाँच वृत्तियोंवाला है, तन्मय वह है, जिससे कि वह चेतन चलता हुआ-सा देखा जाता है तथा रूपदर्शनके समय वह चक्षुर्मय है। एवं शब्द सुननेके समय वह श्रोत्रमय है। इसी प्रकार उस-उस इन्द्रियके व्यापारका प्रादुर्भाव होनेपर वह तत्तद्रूप हो जाता है !
एवं बुद्धिप्राणद्वारेण चक्षुरादिकरणमयः सञ्शरीरारम्भक-इस प्रकार बुद्धि और प्राणके द्वारा वह चक्षु आदि इन्द्रियमय होकर शरीरा-

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०४३

Page 1057Permalink

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०४३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
पृथिव्यादिभूतमयो भवति । तत्र पार्थिवशरीरारम्भे पृथिवीमयो भवति । तथा वरुणादिलोकेषु आप्यशरीरारम्भे आपोमयो भवति । तथा वायव्यशरीरारम्भे वायुमयो भवति । तथा आकाशशरीरारम्भे आकाशमयो भवति ।रम्भक पृथिवी आदि भूतमय हो जाता है। उस समय वह पार्थिव शरीरका आरम्भ होनेपर पृथिवीमय हो जाता है तथा वरुणादि लोकोंमें जलीय शरीरका आरम्भ होनेपर जलमय होता है एवं वायव्य शरीरका आरम्भ होनेपर वायुमय होता है और आकाशशरीरका आरम्भ होनेपर आकाशमय हो जाता है।
एवमेतानि तैजसानि देवशरीराणि तेष्वारभ्यमाणेषु तन्मयस्तेजोमयो भवति । अतो व्यतिरिक्तानि पश्चादिशरीराणि नरकप्रेतादिशरीराणि चातेजोमयानि । तान्यपेक्ष्याह—अतेजोमय इति ।इसी प्रकार ये देवशरीर तैजस हैं, इनका आरम्भ होनेपर वह तद्रूप अर्थात् तेजोमय हो जाता है। इनसे भिन्न पशु आदिके शरीर और नारकीय जीवोंके तथा प्रेतादिके शरीर अतेजोमय हैं। उनकी अपेक्षासे श्रुति कहती है—‘अतेजोमय’।
एवं कार्यकारणसङ्घातमयः सन्नात्मा प्राप्तव्यं वस्त्वन्तरं पश्यन्निदं मया प्राप्तमदो मया प्राप्तव्यमित्येवं विपरीतप्रत्ययस्तदभिलाषः काममयो भवति । तस्मिन् कामे दोषं पश्यतस्तद्विषयाभिलाषप्रशमे चित्तं प्रसन्नमकलुषं शान्तं भवति, तन्मयोऽकाममयः ।इस प्रकार यह आत्मा देहेन्द्रियसङ्घातमय होकर, अन्य प्राप्तव्य वस्तुको देखता हुआ, ‘यह मैंने प्राप्त कर ली है और वह मुझे प्राप्त करनी है’ इस प्रकार विपरीत ज्ञानयुक्त होकर उसकी अभिलाषावाला अर्थात् काममय होता है और उस कामनामें दोष देखनेपर जब तत्सम्बन्धी अभिलाषा निवृत्त हो जाती है, तब चित्त प्रसन्न—निष्कलुष अर्थात् शान्त हो जाता है, इसलिये तन्मय अर्थात् अकाममय होता है।

१०४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 1058Permalink

१०४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४


संस्कृतहिन्दी
एवं तस्मिन् विहते कामे केनचित् स कामः क्रोधत्वेन परिणमते, तेन तन्मयो भवन् क्रोधमयः। स क्रोधः केनचिदुपायेन निवर्तितो यदा भवति तदा प्रसन्नमनाकुलं चित्तं सदक्रोध उच्यते, तेन तन्मयः। एवं कामक्रोधाभ्याम् अकामाक्रोधाभ्यां च तन्मयो भूत्वा धर्ममयोऽधर्ममयश्च भवति । न हि कामक्रोधादिभिर्विना धर्मादिप्रवृत्तिरुपपद्यते। "यद्यद्धि कुरुते कर्म तत्तत् कामस्य चेष्टितम्" इति स्मरणात् ।<br><br>धर्ममयोऽधर्ममयश्च भूत्वा सर्वमयो भवति। समस्तं धर्माधर्मयोः कार्यं यावत्किञ्चिद् व्याकृतम्, तत् सर्वं धर्माधर्मयोः फलं तत् प्रतिपद्यमानस्तन्मयो भवति। किं बहुना, तदेतत् सिद्धमस्य यदयमिदम्मयो गृह्यमाणविषयादिमयः, तस्मादय-इसी प्रकार किसीके द्वारा उस कामनाका विघात होनेपर वह काम क्रोधरूपमें परिणत हो जाता है, इसलिये तद्रूप होकर वह क्रोधमय हो जाता है। वह क्रोध जब किसी उपायसे निवृत्त हो जाता है, तब चित्त प्रसन्न और अनाकुल होनेपर अक्रोध कहा जाता है, उसके कारण वह अक्रोधमय हो जाता है। इस प्रकार काम-क्रोध और अकाम-अक्रोधके कारण तन्मय होकर वह धर्ममय और अधर्ममय भी हो जाता है, क्योंकि काम-क्रोधादिके बिना धर्मादिकी प्रवृत्ति होनी भी सम्भव नहीं है। "जीव जो-जो भी कर्म करता है, वह-वह कामकी ही चेष्टा है" इस स्मृतिसे भी यही सिद्ध होता है।<br><br>धर्ममय और अधर्ममय होकर वह सर्वमय हो जाता है। जितना कुछ व्याकृत है वह सब धर्म और अधर्मका ही कार्य है, वह सब धर्म और अधर्मका ही फल है, उसे प्राप्त करनेवाला भी तन्मय हो जाता है। अधिक क्या ? इसके विषयमें यह बात सिद्ध ही हे कि यह इदंमय—गृह्यमाण विषयादिमय है, इसलिये

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १०४६

Page 1059Permalink

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १०४६

शाङ्करभाष्यम्भाषार्थ
मदोमयः। अद इति परोक्षं कार्येण गृह्यमाणेन निर्दिश्यते। अनन्ता ह्यन्तःकरणे भावनाविशेषाः, नैव ते विशेषतो निर्देष्टुं शक्यन्ते। तस्मिंस्तस्मिन् क्षणे कार्यतोऽवगम्यन्ते, इदमस्य हृदि वर्ततेऽदोऽस्येति। तेन गृह्यमाणकार्येणेदंमयतया निर्दिश्यते, परोक्षोऽन्तःस्थो व्यवहारोऽयमिदानीमदोमय इति।अदोमय भी है। 'अदः' इस पदसे गृह्यमाण कार्यसे भिन्न परोक्ष वस्तुका निर्देश होता है। अन्तःकरणमें अनन्त भावनाविशेष हैं, उसका विशेषरूपसे निर्देश नहीं किया जा सकता। समय-समयपर उनके कार्यसे ही यह पता चलता है कि इसके हृदयमें यह भावना है और उसके हृदयमें यह। उस गृह्यमाण कार्यसे उनका इदंमयरूपसे निर्देश किया जाता है और जो अन्तःकरणमें स्थित परोक्ष व्यवहार है, वह इस समय अदोमय है।
संक्षेपतस्तु यथा कर्तुं यथा वा चरितुं शीलमस्य सोऽयं यथाकारी यथाचारी, स तथा भवति। करणं नाम नियता क्रिया विधिप्रतिषेधादिगम्या, चरणं नामानियतमिति विशेषः।संक्षेपतः तो, जिसका जैसा करने या आचरणमें लानेका स्वभाव है, वह यथाकारी और यथाचारी होता है, जो यथाकारी (जैसा करनेवाला) है वह वैसा ही हो जाता है। विधि और प्रतिषेधसे ज्ञात होनेवाली जो नियत क्रिया है, उसका नाम 'करना' है और अनियत आचरणका नाम 'आचरणमें लाना' है, यह इन दोनोंका भेद है।
साधुकारी साधुर्भवतीति यथाकारित्यस्य विशेषणम्, पापकारी पापो भवतीति च यथाचारीत्यस्य।साधु करनेवाला साधु होता है—यह 'यथाकारी' इस पदका विशेषण है और पाप करनेवाला पापी होता है—यह 'यथाचारी' इस पदका विशेषण है।
ताच्छील्यप्रत्ययोपादानाद्'यथाकारी और यथाचारी' इन पदोंमें

१०४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

Page 1060Permalink

१०४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४


अत्यन्ततात्पर्यतैव तन्मयत्वम्, न तु तत्कर्ममात्रेणेत्याशङ्क्याह—'णिनि' इस ताच्छील्य प्रत्ययको ग्रहण किया गया है, इसलिये कर्ममें अत्यन्त परायण होनेका स्वभाव ही तन्मयता है, केवल उस कर्म-मात्रसे तन्मयता नहीं होती—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है—
पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ।पुण्यकर्मसे पुरुष पुण्यवान् हो जाता है और पापकर्मसे पापी हो जाता है
पुण्यपापकर्ममात्रेणैव तन्मयता स्यान्न तु ताच्छील्यमपेक्षते । ताच्छील्ये तु तन्मयत्वातिशय इत्ययं विशेषः ।अर्थात् पुण्य-पापरूप कर्मसे ही पुरुषको तन्मयता प्राप्त हो जाती है, उसे वैसे स्वभाव होनेकी अपेक्षा नहीं रहती। ताच्छील्य (वैसा स्वभाव) होनेपर तो तन्मयताकी अधिकता होती है—इतना ही अन्तर है।
तत्र कामक्रोधादिपूर्वकपुण्यापुण्यकारिता सर्वमयत्वे हेतुः, संसारस्य कारणम्, देहाद्देहान्तरसंचारस्य च । एतत्प्रयुक्तो ह्यन्यदन्यद् देहान्तरमुपादत्ते । तस्मात् पुण्यापुण्ये संसारस्य कारणम् । एतद्विषयौ हि विधिप्रतिषेधौ । अत्र शास्त्रस्य साफल्यमिति ।ऐसी स्थितिमें कामक्रोधादिपूर्वक पुण्य या अपुण्यका आचरण करना ही जीवके सर्वमयत्वका हेतु, उसके संसारका कारण तथा एक देहसे दूसरे देहमें जानेका हेतु सिद्ध होता है। इससे प्रेरित होकर ही जीव दूसरे-दूसरे देहको ग्रहण करता है। अतः पुण्य और पाप संसारके कारण हैं। इन्हींके विषयमें विधि और प्रतिषेध होते हैं और यहीं शास्त्रकी सफलता है।

१. वह इसका स्वभाव है—इस अर्थमें होनेवाले प्रत्ययको ताच्छील्य-प्रत्यय कहते हैं। यहाँ 'सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये' (३।२।७८) इस पाणिनि-सूत्रके अनुसार 'णिनि' प्रत्यय हुआ है।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १०४७

Page 1061Permalink

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १०४७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अथो अप्यन्ये बन्धमोक्षकुशलाः खल्वाहुः—सत्यं कामादिपूर्वकं पुण्यापुण्ये शरीरग्रहणकारणम्, तथापि कामप्रयुक्तो हि पुरुषः पुण्यापुण्ये कर्मणी उपचिनोति । कामप्रहाणे तु कर्म विद्यमानमपि पुण्यापुण्योपचयकरं न भवति । उपचिते अपि पुण्यापुण्ये कर्मणी कामशून्ये फलारम्भके न भवतः । तस्मात् काम एव संसारस्य मूलम् । तथा चोक्तमाथर्वणे—“कामान् यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र” (मु० उ० ३ । २ । २ ) इति । तस्मात् काममय एवायं पुरुषो यदन्यमयत्वं तदकारणं विद्यमानमपीत्यतोऽवधारयति काममय एवेति ।यहाँ दूसरे बन्धमोक्षकुशल पुरुष कहते हैं—यह ठीक है कि कामादिपूर्वक पुण्य और पाप ही शरीर-ग्रहणके कारण हैं तो भी कामनासे प्रेरित हुआ पुरुष ही पुण्य-पापरूप कर्मोंका संग्रह करता है। कामनाका नाश होनेपर तो विद्यमान कर्म भी पुण्य-पापकी वृद्धि करनेवाला नहीं होता तथा कामनारहित होनेपर संग्रह किये हुए पुण्य-पाप कर्म भी फलके आरम्भक नहीं होते। अतः कामना ही संसारका मूल है। ऐसा ही आथर्वणश्रुतिमें भी कहा है—"जो पुत्र-पशु आदि कामनाओंको ही सर्वश्रेष्ठ मानता हुआ उनकी इच्छा करता है, वह उन कामनाओंके कारण उन-उन स्थानोंमें जन्म लेता है।" अतः यह पुरुष काममय ही है; इसका जो अन्यमयत्व है, वह विद्यमान रहते हुए भी [इसके सर्वमयत्वका] कारण नहीं है, इसीसे श्रुति निश्चय करती है कि यह काममय ही है।
यस्मात् स च काममयः सन् यादृशेन कामेन यथाकामो भवति, तत्क्रतुर्भवति । स काम ईषदभिलाषमात्रेणाभिव्यक्तो यस्मिन् विषये भवति, सोऽविहन्यमानः स्फुटी-क्योंकि वह काममय होकर जैसी कामनासे युक्त अर्थात् 'यथाकाम' होता है 'तत्क्रतु' होता है। थोड़ी-सी अभिलाषामात्रसे अभिव्यक्त हुई वह कामना जिस विषयमें होती है, वह उससे आहत न होकर स्फुट

१०४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

Page 1062Permalink
१०४८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| भवन् क्रतुत्वमापद्यते। क्रतुर्नामाध्यवसायो निश्चयो यदनन्तरा क्रिया प्रवर्तते। <br><br> यत्क्रतुर्भवति यादृक्कामकार्येण क्रतुना यथारूपः क्रतुरस्य सोऽयं यत्क्रतुर्भवति, तत् कर्म कुरुते, यद्विषयः क्रतुस्तत्फलनिर्वृत्तये यद् योग्यं कर्म, तत् कुरुते निर्वर्तयति, यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते, तदीयं फलमभिसम्पद्यते। तस्मात् सर्वमयत्वेऽस्य संसारित्वे च काम एव हेतुरिति ॥ ५ ॥ | होनेपर क्रतुरूप हो जाती है। 'क्रतु' अध्यवसाय अर्थात् निश्चयको कहते हैं, जिसके पीछे क्रियाकी प्रवृत्ति होती है। <br><br> यह 'यत्क्रतु' होता है अर्थात् कामनाके कार्यरूप जिस प्रकारके क्रतुसे यह युक्त होता है, इस प्रकार यह जैसे क्रतुवाला होता है, वही कर्म करता है। इसका जिस विषयको लेकर क्रतु होता है, उसका फल सिद्ध करनेके लिये जो योग्य कर्म होता है, उसीको करता है और जैसा कर्म करता है, वही अभिसम्पन्न होता अर्थात् उसीका फल प्राप्त करता है। अतः इसके सर्वमयत्व और सांसारित्वमें कामना ही कारण है ॥ ५ ॥ |

कामनाके अनुसार शुभाशुभ गति तथा निष्काम ब्रह्मज्ञके मोक्षका निरूपण

तदेष श्लोको भवति। तदेव सक्तः सह कर्मणैति लिङ्गं मनो यत्र निषक्तमस्य। प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किञ्चेह करोत्ययम्। तस्माल्लोकात् पुनरैत्यस्मै लोकाय कर्मण इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति ॥ ६॥

उस विषयमें यह मन्त्र है—इसका लिङ्ग अर्थात् मन जिसमें अत्यन्त आसक्त होता है, उसी फलको यह साभिलाष होकर कर्मके सहित प्राप्त

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०४९

Page 1063Permalink

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०४९

करता है। इस लोकमें यह जो कुछ करता है, उस कर्मका फल प्राप्तकर उस लोकसे कर्म करनेके लिये पुनः इस लोकमें आ जाता है; अवश्य ही कामना करनेवाला पुरुष ही ऐसा करता है। अब जो कामना न करनेवाला पुरुष है [उसके विषयमें कहते हैं] जो अकाम, निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम होता है, उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता; वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
तत्तस्मिन्नर्थे एष श्लोको मन्त्रोऽपि भवति । तदेवैति तदेव गच्छति, सक्त आसक्तस्तत्रोद्भूताभिलाषः सन्नित्यर्थः, कथमिति ? सह कर्मणा यत् कर्म फलासक्तः सन्नकरोत्तेन कर्मणा सहैव तदेति तत् फलमेति । किं तत् ? लिङ्गं मनः—मनःप्रधानत्वाल्लिङ्गस्य मनो लिङ्गमित्युच्यते । <br><br> अथ वा लिङ्ग्यतेऽवगम्यतेऽवगच्छति येन तल्लिङ्गं तन्मनो यत्र यस्मिन्निषक्तं निश्चयेन सक्तमुद्भूताभिलाषमस्य संसारिणः, तदभिलाषो हि तत् कर्म कृतवान्, तस्मात्तन्मनोऽभिषङ्गवशा-तत्—उस विषयमें यह श्लोक अर्थात् मन्त्र भी है। तदेवैति–उसीको जाता है, सक्त-आसक्त होकर अर्थात् उसमें अपनी अभिलाषा प्रकट कर, किस प्रकार जाता है ? कर्मके सहित अर्थात् जिस कर्मको उसने फलासक्त होकर किया था, उस कर्मके सहित ही वह उसके फलके प्रति जाता है। वह (जानेवाला) कौन है ? लिङ्ग–मन, लिङ्गदेह मनःप्रधान है, इसलिये मनको 'लिङ्ग' ऐसा कहा जाता है। <br><br> अथवा जिसके द्वारा लिङ्गन — अवगम होता है अर्थात् जिससे साक्षी जानता है, उसे लिङ्ग कहते हैं, इस संसारीका वह मन जिसमें निष्क्त-निश्चयपूर्वक सक्त अर्थात् उद्भूताभिलाष होता है यानी अपनी अभिलाषा प्रकट करता है; उस अभिलाषासे युक्त होकर ही उसने वह कर्म किया था, इससे अर्थात् उस चित्तकी आसक्तिके कारण ही

१०५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

Page 1064Permalink
१०५०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| देवांस्य तेन कर्मणा तत्फल-प्राप्तिः। तेनैतत् सिद्धं भवति, कामो मूलं संसारस्येति। अत उच्छिन्नकामस्य विद्यमानान्यपि कर्माणि ब्रह्मविदो वन्ध्याप्रसवानि भवन्ति; "पर्याप्तकामस्य कृतात्मनश्च इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः" (मु० उ० ३। २। २) इति श्रुतेः। | इसे उस कर्मसे उस फलकी प्राप्ति हो जाती है। इससे यह सिद्ध होता है कि काम ही संसारका मूल है। अतः जिसकी कामना निवृत्त हो गयी है, उस ब्रह्मवेत्ताके विद्यमान कर्म भी वन्ध्याकी संतति हो जाते हैं; जैसा कि "आप्तकाम और शुद्धचित्त पुरुषकी सारी कामनाएँ यहीं लीन हो जाती हैं" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। | | किञ्च प्राप्यान्तं कर्मणः—प्राप्य भुक्त्वा अन्तमवसानं यावत् कर्मणः फलपरिसमाप्तिं कृत्वेत्यर्थः; कस्य कर्मणोऽन्तं प्राप्येत्युच्यते—तस्य यत्किञ्च कर्मेहास्मिँल्लोके करोति निर्वर्तयत्ययम्, तस्य कर्मणः फलं भुक्त्वा अन्त प्राप्य तस्माल्लोकात् पुन-रत्यागच्छत्यस्मै लोकाय कर्मणे। अयं हि लोकः कर्मप्रधानः, तेनाह—'कर्मणे' इति, पुनः कर्म-करणाय। पुनः कर्म कृत्वा फलासङ्गवशात् पुनरमुं लोकं यातीत्येवम्। इति नु एवं नु कामय- | तथा कर्मके अन्तको प्राप्तकर अर्थात् जहाँतक कर्मका अन्त यानी अवसान हो वहाँतक उसे पाकर—भोगकर यानी कर्मफलकी परिसमाप्ति करके; किस कर्मका अन्त पाकर ? सो बतलाया जाता है—इस लोकमें यह जो कुछ कर्म करता है उसका अर्थात् उस कर्मका फल भोगकर—उसका अन्त पाकर उस लोकसे, कर्म करनेके लिये, पुनः इस लोकमें आ जाता हैं। यह लोक ही कर्मप्रधान है, इसीसे श्रुति कहती है—'कर्मणे' अर्थात् पुनः कर्म करनेके लिये। इसी प्रकार पुनः कर्म करके फलासक्तिके कारण पुनः परलोकमें जाता है। इस प्रकार जो कामना |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०५१

Page 1065Permalink

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०५१

शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
मानः संसरति। यस्मात् काम-करनेवाला है वह संसार-बन्धनको
यमान एवैवं संसरत्यथ तस्मा-प्राप्त होता है। चूँकि कामना करने-
दकामयमानो न क्वचित् संसरति।वाला ही इस प्रकार संसरित होता
है, इसलिये जो कामना करनेवाला
नहीं है, वह कभी संसार-बन्धनमें
नहीं पड़ता।
फलासक्तस्य हि गतिरुक्ता।फलासक्तकी गति तो बतला दी
अकामस्य हि क्रियानुपपत्तेरका-गयी; किंतु जो निष्काम है, उसकी
मयमानो मुच्यत एव। कथंक्रिया सम्भव न होनेके कारण
पुनरकामयमानो भवति ? यो-कामना न करनेवाला पुरुष तो मुक्त
ऽकामो भवत्यसावकामयमानः।ही हो जाता है, किंतु जीव कामना
कथमकामतत्युच्यते-यो निष्का-न करनेवाला कैसे होता है ? जो
मो यस्मान्निर्गताः कामाः सो-अकाम होता है, वही कामना न
ऽयं निष्कामः। कथं कामा निग-करनेवाला है। अकामता कैसे होती
च्छन्ति ? य आप्तकामो भव-है? सो बतलाया जाता है—जो
त्याप्ताः कामा येन स आप्तकामः।निष्काम है अर्थात् जिससे कामनाएँ
निकल गयी हैं, वह पुरुष निष्काम
कहलाता है। कामनाएँ किस प्रकार
निकल जाती हैं ? जो आप्तकाम होता
है अर्थात् जिसने सब कामनाओंको
प्राप्त कर लिया है, वह आप्तकाम है
[उसकी कामनाएँ नहीं रहतीं]।
कथमाप्यन्ते कामाः ? आत्म-कामनाओंकी प्राप्ति कैसे होती
कामत्वेन। यस्यात्मैव नान्यःहै? आत्मकाम होनेसे। जिसकी
कामयितव्यो वस्त्वन्तरभूतःकामनाका विषय आत्मा ही होता
पदार्थो भवति। आत्मैवानन्तरो-है, कोई अन्य वस्तुरूप पदार्थ नहीं
ऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एक-होता। आत्मा ही अन्तर-बाह्यरहित,
पूर्ण प्रज्ञानघन और एकरस है;

१०५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

Page 1066Permalink
१०५२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| रसः, नोर्ध्वं न तिर्यङ् नाध आत्मनोऽन्यत्कामयितव्यं वस्त्वन्तरम् । यस्य सर्वात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येच्छृणुयान्मन्वीत विजानीयाद्वा, एवं विजानन् कं कामयेत । ज्ञायमानो ह्यन्यत्वेन पदार्थः कामयितव्यो भवति, न चासावन्यो ब्रह्मविद आप्तकामस्यास्ति । य एवात्मकामतया आप्तकामः स निष्कामोऽकामोऽकामयमानश्चेति मुच्यते । न हि यस्य आत्मैव सर्वं भवति, तस्यानात्मा कामयितव्योऽस्ति । अनात्मा चान्यः कामयितव्यः सर्वं चात्मैवाभूदिति विप्रतिषिद्धम् । सर्वात्मदर्शिनः कामयितव्याभावात् कर्मानुपपत्तिः । <br><br> ये तु प्रत्यवायपरिहारार्थं कर्म कल्पयन्ति ब्रह्मविदोऽपि, तेषां नात्मैव सर्वं भवति; प्रत्यवायस्य जिहासितव्यस्य आत्मनोऽन्यस्य | आत्मासे भिन्न कामनाके योग्य कोई अन्य वस्तु न ऊपर है, न इधर-उधर है और न नीचे है । जिसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वह किसके द्वारा किसे देखे, सुने, मनन करे अथवा जाने ? इस प्रकार जाननेवाला किसकी कामना करे । जो पदार्थ अन्यरूपसे जाना जाता है, वही कामनाके योग्य होता है और यह अन्य पदार्थ आप्तकाम ब्रह्मवेत्ताकी दृष्टिमें है नहीं । अतः जो भी आत्मकाम होनेके कारण आप्तकाम होता है, वही निष्काम, अकाम और कामना न करनेवाला भी है; इसलिये मुक्त हो जाता है । जिसके लिये सब कुछ आत्मा ही हो जाता है उसके लिये कामनाके योग्य कोई अनात्मा नहीं रहता । कोई दूसरा कामनाके योग्य अनात्मा भी रहे और सब कुछ आत्मा भी हो गया—ऐसा कथन तो विपरीत ही है । अतः सर्वात्मदर्शीके लिये कामनाके योग्य वस्तुका अभाव हो जानेके कारण कर्म सम्भव नहीं है । <br><br> जो लोग प्रत्यवायकी निवृत्तिके लिये ब्रह्मवेत्ताके भी कर्मकी कल्पना करते हैं, उनके लिये सब आत्मा ही नहीं होता, क्योंकि प्रत्यवाय तो आत्मासे भिन्न कोई अन्य त्यागने |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०५३

Page 1067Permalink

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०५३

संस्कृत (मूल/भाष्य)हिन्दी भाष्यार्थ
अभिप्रेतत्वात्। येन चाशनायाद्यतीतो नित्यं प्रत्यवायासम्वद्धो विदित आत्मा, तं वयं ब्रह्मविदं ब्रूमः। नित्यमेव अशनायाद्यतीतमात्मानं पश्यति। यस्माच्च जिहासितव्यमन्यदुपादेयं वा यो न पश्यति, तस्य कर्म न शक्यत एव सम्बन्धुम्, यस्त्वब्रह्मवित्तस्य भवत्येव प्रत्यवायपरिहारार्थं कर्मेति न विरोधः। अतः कामाभावादकामयमानो न जायते, मुच्यत एव।<br><br>तस्यैवमकामयमानस्य कर्माभावे गमनकारणाभावात् प्राणा वागादयः, नोत्क्रामन्ति नोर्ध्वं क्रामन्ति देहात्। स च विद्वानाप्तकाम आत्मकामतयैहैव ब्रह्मभूतः। सर्वात्मनो हि ब्रह्मणो दृष्टान्तत्वेन प्रदर्शितमेतद्रूपम्—"तद्वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामं रूपम्" (बृ० उ० ४।३।२१) इति।योग्य पदार्थ ही माना गया है। ब्रह्मवेत्ता तो हम उसे कहते हैं, जिसने आत्माको क्षुधादिसे अतीत और प्रत्यवायसे असम्बद्ध जाना है। वह सर्वदा क्षुधादिसे अतीत आत्माको ही देखता है; क्योंकि जो आत्मासे भिन्न किसी हेय या उपादेय वस्तुको नहीं देखता उससे कर्मका सम्बन्ध होना सम्भव ही नहीं है; जो ब्रह्मवेत्ता नहीं है, उसीको प्रत्यवायकी निवृत्तिके लिये कर्मकी आवश्यकता है, इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है। अतः कामनाका अभाव होनेके कारण कामना न करनेवाला पुरुष जन्म नहीं लेता, वह मुक्त ही हो जाता है।<br><br>इस प्रकार कामना न करनेवाले उस पुरुषके कर्मोंका अभाव हो जानेके कारण गमनका कोई कारण न रहनेसे उसके वागादि प्राण उत्क्रमण नहीं करते—देहसे ऊपरकी ओर नहीं जाते। और आत्मकामताके कारण आप्तकाम हुआ वह विद्वान् यहीं ब्रह्मभूत हो जाता है। "वह यह निश्चय ही इसका आप्तकाम, आत्मकाम और अकामरूप है" इस प्रकार यह दृष्टान्तरूपसे उस ब्रह्मका ही रूप दिखाया गया है। 'अथा-

१०५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 1068Permalink
१०५४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
तस्य हि दार्ष्टान्तिकभूतोऽयमर्थ उपसंह्रियतेऽथाकामयमान इत्यादिना ।कामयमानः' इत्यादि वाक्यसे यह उसीके दार्ष्टान्तिकभूत अर्थका उपसंहार किया गया है ।
स कथमेवम्भूतो मुच्यत इत्युच्यते—यो हि सुषुप्तावस्थमिव निर्विशेषमद्वैतमलुप्तचिद्रूपज्योतिःस्वभावमात्मानं पश्यति, तस्यैवाकामयमानस्य कर्माभावे गमनकारणाभावात् प्राणा वागादयो नोत्क्रामन्ति । किंतु विद्वान् स इहैव ब्रह्म, यद्यपि देहवानिव लक्ष्यते, स ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति । यस्मान्न हि तस्याब्रह्मत्वपरिच्छेदहेतवः कामाः सन्ति, तस्मादिहैव ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति न शरीरपातोत्तरकालम् ।वह इस प्रकारका साधक किस प्रकार मुक्त होता है ? सो कहा जाता है—जो सुषुप्ति-अवस्था में स्थितकी भाँति निर्विशेष, अद्वैत, अलुप्तचिद्रूप ज्योतिःस्वरूप आत्माको देखता है, उस कामना न करनेवाले पुरुषके कर्मोंका अभाव हो जानेके कारण गमनका कोई कारण न रहनेसे उसके वागादि प्राण उत्क्रमण नहीं करते; किंतु वह विद्वान् यहीं ब्रह्मरूप हो जाता है, यद्यपि वह देहवान्-सा दिखायी देता है, किंतु वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त होता है; क्योंकि उसके अब्रह्मत्वके परिच्छेदकी हेतुभूता कामनाएँ नहीं रहतीं, इसलिये वह यहीं ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, शरीरपातके पश्चात् नहीं ।
(मोक्षस्य भावान्तरत्वप्रतिषेधः)<br>न हि विदुषो मृतस्य भावान्तरापत्तिर्जीवतोऽन्यो भावो देहान्तरप्रतिसन्धानाभावमात्रेणैव तु ब्रह्माप्येतीत्युच्यते । भावान्तरापत्तौ हि मोक्षस्य सर्वोपनिषद्विवक्षितोऽर्थ आत्मैकत्वाख्यः समरे हुए विद्वान्‌को भावान्तरकी प्राप्ति नहीं होती अर्थात् उसका जीवितावस्थासे भिन्न भाव नहीं होता, देहान्तरका संयोग न होनेसे ही ‘वह ब्रह्मको प्राप्त होता है' ऐसा कहा जाता है। यदि मोक्ष कोई भावान्तरप्राप्ति मानी जाय तो सम्पूर्ण उपनिषद्‌का विवक्षित जो आत्मैक्यरूप

| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०५५ |

Page 1069Permalink
ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ१०५५
संस्कृत (भाष्य)हिन्दी अनुवाद
बाधितो भवेत्, कर्महेतुकश्च मोक्षः प्राप्नोति, न ज्ञाननिमित्त इति । स चानिष्टः, अनित्यत्वं च मोक्षस्य प्राप्नोति, न हि क्रियानिर्वृत्तोऽर्थो नित्यो दृष्टः । नित्यश्च मोक्षोऽभ्युपगम्यते, "एष नित्यो महिमा" (बृ० उ० ४ । ४ । २३) इति मन्त्रवर्णात् ।सिद्धान्त है, वह बाधित हो जायगा तथा मोक्ष कर्मनिमित्तक हो जायगा, ज्ञाननिमित्तक नहीं रहेगा और यह इष्ट नहीं है, क्योंकि इससे मोक्षकी अनित्यता भी प्राप्त होती है, कर्मसे निष्पन्न होनेवाला पदार्थ नित्य नहीं देखा गया और मोक्ष तो नित्य ही माना गया है, जैसा कि यह "ब्राह्मणकी नित्य महिमा है" इस मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है ।
न च स्वाभाविकात् स्वभावाद- न्यन्नित्यं कल्पयितुं शक्यम् । स्वाभाविकश्चेदग्न्युष्णवदात्मनः स्वभावः, स न शक्यते पुरुषव्या- पारानुभावीति वक्तुम् । न ह्यग्नेरौष्ण्यं प्रकाशो वाग्निव्या- पारानन्तरानुभावी । अग्निव्या- पारानुभावी स्वाभाविकश्चेति विप्रतिषिद्धम् ।इसके सिवा स्वाभाविक (अकृ- त्रिम) स्वरूपसे भिन्न कोई अन्य पदार्थ नित्य है—ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती । यदि अग्निके उष्णत्वके समान मोक्ष आत्माका स्वाभाविक स्वरूप है तो उसके विषयमें यह नहीं कहा जा सकता कि वह पुरुषके व्यापारद्वारा पीछे- से होनेवाला है । अग्निका उष्णत्व या प्रकाश भी अग्निके व्यापारके पीछे होनेवाला नहीं है । वह अग्निके व्यापारके पीछे होनेवाला है और स्वाभाविक भी है—ऐसा कहना तो विरुद्ध है ।
ज्वलनव्यापारानुभावित्वम् उष्णप्रकाशयोरिति चेन्न, अन्यो- पलब्धिव्यवधानापगमाभिव्य- क्त्यपेक्षत्वात् । ज्वलनादिपूर्वक-यदि कहो कि अग्निके उष्णत्व और प्रकाशका ज्वलन व्यापारके पीछे होना तो सिद्ध होता ही है—तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि वह तो दूसरेकी उपलब्धिके व्यवधानकी निवृत्तिकी अभिव्यक्तिकी अपेक्षासे है ।* ज्वलनादि व्यापारपूर्वक जो

* आगे इसी वाक्यकी व्याख्या की जाती है ।