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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

जीवोंके उपदेश करनेका फल आरतीका साज

धर्मदास बचन ।

साखी—धर्मदांस विनती करें, कृपा करहु गुरुदेव ।
नवी मुहम्मद जस भये, सो सब कहिये भेव ॥

सत्यकबीर बचन—रमैनी

धर्मदास बूझ्यो भल वानी । सो सब कथा कहूँ सहिदानीं ॥
विगस्यो पुहुप उठी अस वानी । मुक्तामणि सुनिये तुम ज्ञानी ॥
भवमें जाव जीवके काजा । जीवन कष्ट देत यमराजा ॥
मुक्तामणि चले शीश नवाई । तत्छण भवमें पहुँचे आई ॥
तबहीं मिले मुहम्मद पीरा । तिन सब हुकुम कीन तागीरा ॥
तहाँ जाय हम कीन सलामा । मात रहे अलमस्त इलामा ॥
नजर दिदार जो कीन हमारी । मस्त गयन्द केर असवारी ॥
कहु भाई तुम कहाँ भरमाये । कहाँते आय कहाँको जाये ॥
हुये हैरान नजर नहीं आये । किया नसीहत अल्ला फरमाये ॥
कहर छोड मिन्हदिल आये । तव तुम साँचे पीर कहाये ॥
वाहक को नहीं साहब राजी । पढो कुरान पूछो तुम काजी ॥

मुहम्मद बचन ।

साखी—कहाँ से आये पीर, तुम क्यों कर किया पयान ? ।
कौन शक्सका हुकम है, किसका है फरमान ? ॥

रमैनी ।

पीर मुहम्मद सखुन जो खोला । अल्लाः हमसे परदै बोला ॥
हम अहदी अल्लाः फरमाना । बतन लाहूत मोर अस्थाना ॥
उन भजे रूह बारह हजार । उम्झतके हम हैं सरदारा ॥
तिस कारण जो हम चलि आये । सोबत थे सब जीव जगाये ॥
जीव खाबमें परा भलाई । तिसकारन फरमान ले आई ॥
तुम बूझो सों कौन हो भाई । अपनो इस्न कहो समझाई ॥
साखी—दूर की बातें जो करो करते रोजः नमाज ।
सो पहुँचे लाहूतको, छोड़े कुलकी लाज ॥

कबीरबचन ।

कहैं कबीर सुनो हो पीरा । तुम लाहूत करो तागीरा ॥
तुम भूलै सो मरम न पाया । दे फरमान तुम्हे भरमाया ॥

त्रेतायुगका वृत्तान्त

फिर फिर आवे फिर फिर जावे । बद अमली किसने फरमाए ॥
लाहूत मुकाम बीचका भाई । बिब तहूकीक असल ठहराई ॥
तुम ऐसे उनके बहु तेरे । लै फरमान जाव तुम डेरे ॥
साखी—खोजत खोजत खोजियाँ, हुवा सो गौना गोन ।
खोजत खोजत ना मिला, तब हार कहा बेचू न ।
बेचू ना जग राचिया, साई नूर निनार ।
आखिर केरे वक्त में, किसकी करो दीदार ॥

रमैनी ।

तुम लाहूत रचे हो भाई । अगम गम्म तुम कैसे पाई ॥
यह तो एक आदि विसरामा । आगे पाँच आदि निज धामा ॥
तहाँ ते हम फरमाँले आए । सब बदकेलको अमल मिटाए ॥
उन फरमान जो हम को दीना । तिनका नाम बेचून यम लीना ॥
साखी—साहबका घट दूर है, जासु असल फरमान ।
उनको कहो जो पीर तुम, सोइ अमर अस्थान ॥

मुहम्मद वचन—रमैनी ।

कहैं मुहम्मद सुनो कबीरा । तुम कैसे पायो अस्थीरा ॥
लाहूत भेट जो अगम बताई । खुद खुदाय हमहूँ नहिं बाई ॥
हम जानें खुद आपै आही । तुम कुदरत करथा पोताही ॥
हम तो अर्थ हाजिरी आए । तुम तो कुदरतसे ठहराए ॥
तुम्हरे कहिए भरम मोहि आओ । खुद खुदाय तुम दूर बताओ ॥
आप सुनाआ खुदकी बानी । आलम दुनिया कहो बखानी ॥
लाहूत मुकाम हम निजकर जाना । सो तो तुम कुदरत कर ठाना ॥
हलकी मुलकी बासरी भाई । तीन हुकम अल्ला फरमाई ॥
साखा—साई मरशिद पीर, साँचा जिस फरमान ।
हलकी मुलकी बासरी तीन हुकूम फरमान ॥

कबीर वचन—रमैनी

सुनो मुहम्मद कहूँ खुदबानी । खुद खोदायकी कहूँ निशानी ॥
कादिरथे तब कुदरत नाही । कुदरत थी कादिरके माहीं ॥
ख्वार सभीको चीन्हो भाई । असल रूहको देउँ बताई ॥
असल रूहकी दीदार जो पावे । बोवे निज मुसलमान कहावे ॥
जब लग तख्त नजर नहिं आवे । तब लग कुदरत भ्रम ठहरावे ॥

मनुष्योंको मुक्ति प्रदान करना आदि त्रेतामें जगतके मनुष्योंके विचार

चार वेद अक्षर निरमाई । चार अंश जाके सुत भाई ॥
एक अंस चौभाग जो कीन्हा । ताते एक गुप्त करलीना ॥
एक अंसते गुप्त छिपाई । तीन अंस संसार पठाई ॥
अंसहि अंस भेद नहीं बीना । यह अचरज अच्छोने कीना ॥
जो तुम कहा हमारा मानो । तो हम तुमते निर्णय ठाणो ॥
साखी—यह परपञ्च बेचूनका, तुमने कहा न भेव ।
आप सारत होइ बैठा, तु चार करत हो सेव ॥

मुहम्मद वचन ।

कहैं मुहम्मद सुन खुद अहदी । इल्म लज्जमी कइबुनिवाई ॥
जब नहीं पिण्ड ब्रह्मण्ड अस्थूला । तब नहींतौ सृष्टिको मूला ॥
नादनकी कहिए उतपानी । आदि अन्त और मध्य निशानी ॥
साखी—बुज्ररुग हकीकत सब कहो, किस विध भया प्रकाश ।
जब हम जाने आदिको, तो हमहूँ बाँधे आस ॥

कबीरवचन ।

सुनो महम्मद साँचे पीरा । समरथ हुकुम खुदआदि कबीरा ॥
अब हम कहें सुनो चितलाई । आदि अन्तको खबर बताई ॥
प्रथमै समरथ आदि अकेला । उनके संग था नहीं चेला ॥
साखी—वाहिद थे तब आपमें, सकल हत्यौ तिहि माँह ।
ज्यों तरुवरके बीचमें, पुहुप पाय फल छाँह ॥

अब इस स्थानपर कबीर साहब-मुहम्मद-साहबको उत्पत्तिके आदि इत्यादि का सब वृत्तान्त सुनाते हैं और वेदों तथा पुस्तकोंके निर्माणका सब विवरण करते हैं । किंतुनेही प्रश्नोत्तर दोनों महाशंयोंमें हुए और कबीर साहबने लाहूत स्थानसे परमेश्वरका निवासस्थान पृथक् बताया और वेद तथा पुस्तक सबका आदि अक्षर अर्थात् लाहूत स्थानसे प्रगट किया यह बात सुनकर मुहम्मद साहबने अस्वीकार किया ।

मुहम्मद वचन ।

पीर मुहम्मद मुख तब मोरा । कुछ नहीं चले तुम्हारा जोरा ॥
अच्छर हुकुम को मेटन हारा । चार वेद जिन कीन्ह पसारा ॥

कबीरवचन ।

सुनिए सखुन मुहम्मद पीरा । हम खुद अहदी आदि कबीरा ॥
मेटूं अच्छर का विस्तारा । मेटूं निरञ्जन सकल पसारा ॥

मुनीन्द्रजीका रावणके पास जाना

मेटूं अचित केर रजधानी । मेटूं ब्रह्मा वेद निशानी ॥
चौदह यमको बाँध नचावन । मृत अंधा मगहर लेआवन ॥
धर्मरायते झगर पसारा । निरञ्जन बाँध रसातल डारा ॥
वेद कतीबको अमल मिटाऊँ । घर घर सार शब्द फँलाऊँ ॥
पाँचहजार पैंचसौ बरस कलियुग जब जाए । महापुरुष फरमा तब आए ॥
समरथ हुकम चले सब माहीं । व्यापे सत्य असत उठ जाहीं ॥

मुहम्मद वचन ।

पीर मोहम्मद बोले वानी । अगम भेद काहू नहि जानी ॥
सुना कान नहिं आखिन देखा । विन देखे को करे विवेका ॥
जो नहिं देखूं अपने नैना । कैसे मानूं गुरुको बैना ॥
जो तुम खुद अहदी होइ आए । हुकम हुजूर फरमान ले आए ॥
जौ न राहते तुम चलि आओ । तवन राह मोको बतलाओ ॥
साखी—हंसनको सुस्थान देख, तब मानूं फरमान ।
जो समरथको हुकम है, सोमानू फरमाना ॥

कबीरवचन ।

सुनो मुहम्मद कहैं बुझाई । साहब तुमको देउँ बताई ॥
चले सैरको दोनों पीरा । एक मुहम्मद एक कबीरा ॥

अब यहां कबीर साहब मुहम्मद साहबको साथ लेकर संमस्त लोकों की सैर कराते चें और सबका वृत्तान्त बतलाते और सब कुछ दिखलाते चले ।

पन्द्रहवाँ प्रकरण ।

प्रथम नासूत मुकामका वर्णन ।

कबीर साहब मुहम्मदसाहबको पहले नासूतको ले गये, यह मुकाम सुमेरु पर्वतके उत्तर ओर पृथ्वीसे छत्तीस सहस्र योजन ऊँचा है । यहांपर दयाअंश रहते हैं । यह मायाका स्थान है, महामाया इस जगह अपनी ज्योति फँलाती निवास करती है । जब कबीरसाहब और मुहम्मदसाहब उस स्थानपर पहुँचे तब, वहां हजरत दाऊदको बैठे तथा ज़बूरको पढ़ते पाया । वहां पहुँचकर कबीर साहबने अस्सलाम अलैक कहा, तब हजरत दाऊद अलैकुमसलाम कहकर उठ खड़े हुए और उनके हाथोंको चूमकर बड़ी आवाभगतसे उनका स्वागत किया । तब कबीर साहब मुहम्मदसाहबको इस मुकामकी विशेषता और गुणोंको बतलाकर आगे चले ।

मुनीन्द्रजीका अयोध्या जाना०

सोलहवाँ प्रकरण ।

दूसरे मलकूत मुकामका वर्णन ।

दूसरा मुकाम मलकूत है । यह स्थान नासूतसे चौबीस सहस्र योजन उंचाई पर है और पृथ्वीसे साठ सहस्र योजनकी उंचाईपर है । इसी श्रेष्ठ स्थानको दूसरे शब्दोंमें वैकुण्ठ कहते हैं । यह वैकुण्ठ विष्णुका स्थान है । इसी स्थानपर पाप पुण्य का लेखा लगता है । इस विष्णुकी सभामें ब्रह्मा विष्णु शिव इन्द्रादिक समस्त देवतागण उपस्थित रहते हैं । इस विष्णुकाही नाम धर्मराय है । और आपकी आज्ञासे नरक, वैकुण्ठ और आवागमन आदि सब कुछ होता है । इसी स्थानसे विष्णु महाराज समस्त पृथ्वी और आकाशादिमें जाया आया करते हैं । यहाँही चित्रगुप्तजी विष्णुके मंत्रीके रूपमें सबके पाप पुण्यका लेखा रखते हैं जब कबीर साहब मुहम्मद साहबको अपने साथ लेकर इस मलकूत पर पहुँचे तो, वहाँ मूसा को बैठे तौरीत पढ़ता पाया । कबीर साहबने वहाँ पहुँचकर सलाम अलैक किया। तब वह मूसा सलामका उत्तर देकर उठे और उनका हाथ चूमकर बड़ी ताजौम की । तब कबीर साहबने मुहम्मद साहबको इस मुकामके समस्त गुण बतलाये तथा वहाँके वृत्तान्तसे विज्ञ कराकर आगे चले ।

सत्रहवाँ प्रकरण ।

तीसरे जिबरुत मुकामका वर्णन ।

तीसरा स्थान जिबरुत है । इस जिबरुत स्थानको कबीर साहबने आँझरी द्वीप कहा है । यह निर्गुण ब्रह्म अलख निरञ्जनका स्थान है । यही तीनों लोकका कर्ता धर्ता सम्प्राट है, यह स्थान, वैकुण्ठसे अठारह करोड़ योजन ऊपरको ऊँचा है, यह बड़ा सुन्दर स्थान है, यहाँपर चार करोड़ ज्योतिका प्रकाश है । इस मुकाम में चारों फरिश्ते जिबराईल, मेकाईल, इसराफ़ील, इजराईल सदा खड़े रहते हैं । इन्हीं चारोंको ब्रह्मा, विष्णु, शिव और यम-इत्यादिके नामसे पुकारते हैं । समस्त आज्ञाएँ इसी स्थानमें प्रचलित हुआ करती हैं । चारों फरिश्ते इन्हींके आज्ञाकारी हैं । वेद तथा किताबोंके प्रचार कर्ता आपही हैं और सब आपहीके आज्ञाकारी तथा अधीन सब हैं । अध्या तथा निरञ्जन इसी राजधानीमें बैठकर तीनों लोकको राज्य, करते हैं । जब कबीर साहब रसूल अल्लाहको साथ लेकर पहुँचे तो, देखा कि हजरत ईसा वहाँ बैठे हुए इञ्जील पढ़ रहे हैं । वहाँ पहुँचकर कबीर साहबने अस्सलाम अलैक कहा। तब हजरत ईसा सलामको उत्तर देकर उठखड़े हुए और

अनुरागसागरका प्रमाण

उनके हाथको चूम लिया । तब कबीर साहब मुहम्मद साहबका उन स्थानोंके गुणका विवरण करके आगे चले ।

अठारहवाँ प्रकरण ।

चौथे मुकामका वर्णन ।

चौथा मुकाम लाहूत, जिबरूत और लाहूतके बीचमें ग्यारह पालङ्गका अन्तर है । एक पालङ्ग आठ करोड़ योजनका होता है । यह लाहूत स्थान अक्षर अंशका है । वहाँ अक्षर और योगमाया शक्ति रहते हैं । यह बड़ा सुन्दर स्थान है । जब कबीर साहब और मोहम्मद साहब इस स्थानपर पहुँचे, तब कबीर साहबने मोहम्मद साहबसे कहा कि, हे मुहम्मद ! देखो वह आपका स्थान है । यहाँही वह अक्षर पुरुष, जिसको आप बेचूनोचेराका खुदा कहते हैं, रहता है । फिर उस स्थानके गुण दिखलाकर आगेको चले ।

उन्नीसवाँ प्रकरण ।

पाँचवें हाहूत मुकामका वर्णन ।

पाँचवाँ स्थान हाहूत है यह हाहूत स्थान एक असंख्य योजन शून्यके ऊपर है । अर्थात् लाहूत और हाहूतके बीचमें एक असंख्य योजन शून्य अर्थात् खला और अंधकार है । यह हाहूत स्थान अचिन्त्य पुरुषका है । यहाँ अचिन्त्य पुरुष सप्तनीक रहते हैं । यह स्थान बड़ाही मनोहर है । अचिन्त्य पुरुषके सामने तीन सौ अप्सराएँ नृत्य करती रहती हैं । अचिन्त्य पुरुष निःशंक तथा निर्विघ्न रहते हैं । कबीर साहब इस स्थान और इस पुरुषका सब विवरण मुहम्मद साहबसे कहके आगेको चले ।

बीसवाँ प्रकरण ।

छठऐ बाहूतमुकामका वर्णन ।

यह बाहूत छठा स्थान है । बाहूत और हाहूतके बीचमें तीन असंख्य योजन शून्य और अंधेरा है अर्थात् हाहूतसे बाहूत तीन असंख्य योजनकी ऊँचाईपर है यह अत्यंत मनोहर स्थान है । इस स्थानमें सोहंग पुरुष रहते हैं । सोहङ्ग पुरुषकी अर्धाङ्गिनीका नाम अर्धङ्ग है । यह सोहंग पुरुष अपनी शक्ति सहित अर्धगके साथ सिंहासनपर अधिकृत है । उस स्थानमें सदैव सोहंग ओहंगका शब्द सुनाई दिया करता है । जब कबीर साहब मुहम्मद मुस्तफाको लेकर इस स्थानपर पहुँचे तो, वहाँके समस्त वृत्तान्तोंका विवरण उन्होंने उनसे कहा और फिर आगे चले ।

धर्मरायकी चिन्ता विचित्र भाटकी कथा लंकामें

इक्कीसवाँ प्रकरण ।

सातवें साहूतमुकामका वर्णन ।

यह स्थान साहूत, बाहूतसे पाँच असंख्य योजन ऊँचा है। बाहूत और साहूतके बीचमें पाँच असंख्य योजन ख़ला और अत्यंत अंधकार है। यह इच्छापुरुषका स्थान है। इस स्थानकी सुन्दरता तथा यहाँ की सुख-सामग्रीका विशेष विवरण है। इस स्थानको कबीर साहब मुहम्मद साहबको दिखलाकर आगे चले।

बाईसवाँ प्रकरण ।

आठवें राहूत मुकामका वर्णन ।

राहूत स्थान साहूतके चार असंख्य योजन ऊपर है। साहूत तथा राहूतके बीचमें चार असंख्य योजन ख़ला और अत्यंत अंधकार है। इस राहूत स्थानमें अंकुर पुरुष अपनी शक्ति सहित रहते हैं, अत्यंत सुन्दर तथा मनोहर स्थान है, जब कबीर साहब मुहम्मद साहबको लेकर इस स्थानमें पहुँचे तो, उसके सब गुण दिखलाकर आगे चले।

तेईसवाँ प्रकरण ।

नववें आहूत मुकामका वर्णन ।

हाहूत राहूत दो असंख्य योजन ऊपर है बीचमें ख़ला (पोल) तथा अंधकार है, इस स्थानमें सहज पुरुष रहते हैं, सत्यपुरुषके सबसे बड़े पुत्र यह कहलाते हैं। यह नववां स्थान सबसे सुन्दर और आनन्दका कहलाता है। कबीर साहबने मुहम्मद साहबको वह स्थान दिखलाया और उसका विवरण करके फिर आगेको चले।

चौबीसवाँ प्रकरण ।

दशवें जाहूत मुकामका वर्णन ।

आहूत और जाहूतके बीचमें दश असंख्य लाख योजनका अन्तर है अर्थात् स्थान जाहूत आहूतके ऊपर दश असंख्य लाख योजनपर है, यही स्थान सत्यपुरुषका है, इसकी सुन्दरताका वर्णन किया जा नहीं सकता है, इसी स्थानसे कबीर साहब सत्यपुरुषकी आज्ञा लेकर पृथ्वीपर आया करते हैं। आप इसी स्थानके अहदी रसूल पाक हैं।

मुनीन्द्रजीका रावणके पास जाना

पञ्चीसवाँ प्रकरण ।

सत्यलोकका वर्णन ।

सत्य पुरुषके लोकमें जब हंस पहुँचते हैं, तब कालपुरुष उनको नमस्कार करता है । इन हंसोंका आगमन फिर कभी नहीं होता, वहाँ वे सदा सत्यपुरुषकी स्तुति किया करते हैं । वे हंस सत्यपुरुषके रूप हो जाया करते हैं । सत्यलोकके अधीन अट्टासी सहस्र द्वीप हैं, सब द्वीपोंमें सत्यगुरुके हंस आनन्द करते हैं । द्वीप द्वीपोंमें हंस स्वतंत्र फिरा कहते हैं, उन्हें कहीं भी रोकटोक नहीं है ।

इस तयलोकके गुणोंका वर्णन किसी प्रकार भी किया नहीं जा सकता है । जो कोई उस लोकको जावे उसको कालपुरुषके भयसे सदाके लिये छूट जाता है, इस लोकमें स्त्री पुरुषका भेद नहीं और न वहाँ काम क्रोधादिकी झंझट है । सब हंस सत्यपुरुषके स्वरूप हैं । शारीरिक विकार यहाँ तनिक भी नहीं है, सब हंस समस्त बुराइयोंसे पवित्र होकर सत्यपुरुषके साथ सदैव आनन्दमें रहते हैं ।

छठ्ठीसवाँ प्रकरण ।

मुहम्मद साहबको सत्यपुरुषका दर्शन होना ।

कबीर साहब मुहम्मद साहबको अपने साथ लेकर इस स्थानमें पहुँचे और सत्यपुरुषका दर्शन कराये । कबीर साहब और मुहम्मद साहब दोनोंने सत्यपुरुषको दंडवत् किया । मुहम्मद साहब सत्यपुरुषका दर्शन करके अत्यंत प्रसन्न और नम्र हुए । सत्यपुरुषकी दया तथा कृपा मुहम्मद साहबपर हुई तब मुहम्मद साहब कबीर साहबके अत्यंत अनुगृहीत तथा कृतज्ञ हुए । सत्यपुरुषकी ओरसे मुहम्मद साहबको कितनीही शिक्षा मिली, धर्म कर्मकी कुल आज्ञाएँ वहींसे प्रदान हुई । जब सब आज्ञाएँ मिल चुकीं, तब मुहम्मद साहबको कबीर साहबने पुनः मक्काममें पहुँचा दिया ।

सत्ताईसवाँ प्रकरण ।

पाँच कलमाका वर्णन ।

कबीर वचन ।

नबी मुहम्मद बन्दगी कीन्हा । दर्शन पायके भय लौलीना ॥
तहाँते फिर मृतलोक चलि आये । और निज नाम को पान भी पाये ॥
अब आपनो कौल फिर दीजे । पीछे पान जीवके लीजे ॥

साखी—शब्द भरोसे नामके, दिया नबीको पान ।

तब हम साँचे मानि हैं, जब फिर मिलोगे आन ॥

तुम आपनो फ़रमान चलाये । खुदको भेद तुम धरु छिपाये ॥
जो यह भेद तुम परगट करिहौ । तो तुम कौलके बाहर परिहौ ॥
चारो कलमः परगट भाखो । पँचवाँ कलमः गुप्त राखो ॥
पँचवाँ कलमः इल्म फ़कीरी । जाके पस्ने कुफ़ हो दूरी ॥
हम काशीको जात हैं भाई । उबलों अपनो कौल बजाई ॥
तुम पर दाय़ा समरथ केरी । पाँचों कलमः दिलमें फेरी ॥
साखी—हम काशीको जात हैं, तुम मक्के अस्थान ।
हम रामानंद गुरु करें, तुम देव जगत फ़रमान ॥
फ़रमान जग को दीजिये, उलटी अदल चलाय ।
तुम कलमः का हुक्मले, निभंय निसान बजाय ॥

मुहम्मद साहबको कबीर साहबने चार कलमः प्रगट करनेको कहा, और एक कलमः को गुप्त रखनेके लिये कहा । कुल पाँच कलमः मुहम्मद साहबको पढ़ाया जिसमेंसे एक छिपा रखनेके लिये कह दिया, चार कलमः मुसलमानोंको बतानेके लिये कहा । जब मुहम्मद साहब वह कलमः पढ़ा करते थे उस समय किसीको निकट आने नहीं देते थे, उस कलमका भेद मुहम्मद साहबके अतिरिक्त और कोई भी जानता नहीं था । कबीर साहबने मुहम्मद साहबको अपना पान दिया और मुहम्मद तथा मुहम्मदियोंको मुक्ति दिलानेकी आशा दिलाई । सो चार कलमः तो मुसलमानोंको मिले और पाँचवाँ कलमः स्वयम् मुहम्मद साहबके निमित्त था दूसरोंको उसका कुछ भी पता नहीं है ।

अट्टाईसवाँ प्रकरण ।

पाँचवें कलमका वृत्तान्त ।

मशकात बाब क्रैयाम शहर रमजान फ़स्ल औबल ज़ेद बिन साबितकी खायत दोखारी और मुसल्लमसे यों लिखा है कि, हज़रत रसूल अल्लाहने मस्जिद में चटाईकी एक झोपड़ी बनाई थी, और इस झोपड़ीमें अकेले निमाज पढ़ा करते थे । जब लोगोंने यह दशा देखी तो वे लोग आने लगे । तब भी कई रात्रियोंके उपरान्त एक रात्रिको आए बाहर नहीं निकले तब लोग बाहर खड़े खड़े खँखारने लगे, कदाचित् हज़रत आवाज सुनकर बाहर निकल आवें और निमाज़ पढ़ें परन्तु हज़रत न आये बल्कि कह दिया कि, तुम्हारी रुचि सबैव निमाजपर रहे—पर मैं इस कारण निमाजके निमित्त बाहर नहीं आता कि, कहीं खुदा इस निमाजको भी तुम पर फर्ज न करदे । क्योंकि, यदि यह तुम्हारा फर्ज होगया तो तुम उसको पूर्ण

मधुकरकी कथा

न कर सकोगे । इस कारण ए मनुष्यों ! यही उत्तम है कि, इस निमाजको तुम लोग अपने २ घरोंमें पढ़ा करो । यह बात तालीम मुहम्मदीमें लिखी है जो चाहे सो देख ले । यह पुस्तक मौलवी अमाउद्दीन रचित है ।

अब जानना चाहिये कि, यह वही निमाज और कलमः है जिसके विषयमें कबीर साहबने मुहम्मद साहबको मना किया था कि, किसीपर प्रकट न करना । स्वयम् मुहम्मदसाहब भी इसको गुप्तरीति से पढ़ा करते थे । इस कलमेकी खबर किसी मुसलमानको तनिक भी नहीं है ।

इस तेजोमय पुरुषको, जिसने मुहम्मद साहब को सत्पुरुषका दर्शन करवाया और पाँच कलमा पढ़ाकर पुनः मक्केमें पहुँचाया, जो पहचानेगा सो मुक्ति पावेगा । सो मनुष्य उस सत्यगुरुको पहचानता है उसमें फिर किसी प्रकारकी बुराई नहीं रह जाती है । वह कदापि किसी प्रकार किसी जीवको दुःख नहीं पहुँचाता और न किसी प्रकार किसीको कष्ट पहुँचने देता है, वह सबपर दयालु होता है ।

उनतीसवाँ प्रकरण ।

नवा बर प्रगट होकर इबराहीम अधम सुलतानको शिक्षा देने और शिष्य करनेका वृत्तान्त ।

इब्राहीम अधम बादशाह बलखको बोध करनेका वर्णन सुलतान बोध नामक ग्रन्थमें है जो बोधसागरमें श्रीवैकटेश्वर प्रेसमें छप चुका है । यहाँ पर स्वामी परमानन्द ने उसका विस्तारसे वर्णन नहीं दिया है, इसका कारण यह है कि, आगे इसी ग्रन्थके दूसरे भागमें इनका वृत्तान्त विस्तारसे लिखा है । यद्यपि कितने संत महात्माओंका कहना है कि, यहाँपर भी ग्रन्थोंका प्रमाण देना चाहिये किन्तु, जब आगे विस्तारसे कथा आती है तब यहाँ विशेष लिखकर ग्रन्थ बढ़ाना उचित न समझ कर, इतनी सूचना देनाही अलम है । पाठक दूसरे भागमें देख लेवें । वहाँ विस्तारसे कथा है । यों तो बल बोधकी रमैनी, निर्भय ज्ञान आदि ग्रन्थोंमें भी बहुत रोचक और उपदेशप्रद रीतिसे सुलतान इब्राहीमकी कथा लिखी हुई है ।

तीसवाँ प्रकरण ।

दशवीं बेर कबीर साहबका काफिरिया देशमें प्रगट होना और उस देशके काफिरोंको समझाने तथा शिक्षा देनेका वृत्तान्त ।

द्रापरयुगकी कथा

(काफिर बोध दूसरा अभीतक नहीं मिला जो मिला सो यहाँ दे देते हैं।)

काफिर बोध

कौन सो काफिर कौन मुर्दार । दोऊ शब्दका करो विचार ॥
गुस्सा काफिर मनी मुर्दार । दोऊ शब्दका यही विचार ॥
हम नहिं काफिर हम हैं फकीर । जाइ धूँठे सरवर के तीर ॥
चोरी नारी दरोग सो डरें । राह सो लेखा सबका करें ।
नंगे पायन पृथ्वी फिरें । हाट न लूटै वाट न परें ॥
हमतो किसीका कछु न विगारें । दर्दमन्द दिल दया सवारें ॥
दुनिया लोक सो उल्टी करें । सत्यनाम सदा उच्चरे ॥
सिकका देखि न कहिये फकीर । फकीर, न कूटे पुरानी लकीर ॥
काफिर सो कुफराना करे । अल्लाह खुदा सो नाहीं डरे ॥
करें न बन्दगी फिरे दिवाना । गरब वाँधि फिरे गैवाना ॥
बोल कुबोल सेवा बिसरावैं । खून खराफात न द्वार बहावैं ॥
दिलमें चोर कमरमें कत्ती । लोगनके घर भाजे रत्ती ॥
अलहके नामें बाँटे खाना । सो कहिये साँचे मुसलमाना ॥
मुसलमान मुसावे आप । सिदक सबूरी कलमा पाक ॥
खड़ी ना छेडे पड़ी न खाय । सो मुसलमान बिहिश्त को जाय ॥
कलमा पढैं न आवैं बिहिस्त । हिरदे रहे बापकी दिष्टि ॥
हिन्दू मुसलमान खुदाक बन्दे । हमतो योगी न राखे छन्दे ॥
देवी देहरा मसीद मिनार । हमरे तो एक नाम अधार ॥
टाकी ले कौन ऊपर चढै । पाव न दावैं हाथ न बढै ॥
तहाँ न अग्नि पवनका डर । ऐसा अलखपुरुष जिन्दपीर का घर ।
चूरा पथ्थर बनाया दादा आदमकी करनी । हमतो रहें अलेख
पुरुष, जिन्दा पीरकी शरनी ॥ मक्खी जाय बंधनमें परी । छानत

छानत ताही गिरी ॥ काजी मुलना करे विचार । मक्खी किया बटा अहँकार ॥

मक्खी तो गाये भखे, तो सूअर भखे मक्खी तो हला भखे, मक्खी
तो मुर्दार भखे ॥ मक्खी जाय विगारे खाना । तहाँ न चले बादशाह
परवाना । कोरा कलमा बहुतेरा बोलै । खैर मिहरका खीस न खौले ॥
मिहर न बाँटे मुर्दार खोरा । खैर न बाँटे अल्लहका चोरा ॥ अरस परस-
बीच समाना । मोम दिल मोम दिल जाना ॥ सिदके सो परि पहि
चाना । दर्दमन्द दुरवेश बखाना ॥ रहमत है सुरशिद पीरको ॥ जहमत

रानी इन्द्रमतीकी कथा अनुरागसागरका प्रमाण

सूम महसूदको ॥ निश्चय परिचे निमाज गुजारै । श्रवण नेत्रको वैर
निहारौ ॥ मुहम्मद मुहम्मद क्या करे । कुरान कलमा क्या पढै ॥ किधर
किधरकी राह बतावे । विनु गुरु पीर राह ना पावे ॥

साखी—हाजी गाजी गुरु चेला, खोजो दस दरकाजा ।

अलख पुरुष कहूँ माथ नवाओ, इस विधि सरै निमाज ॥

सभै साचे काजी, साँचे साँचे मुलना वेद कुरान ॥

कहै कबीर आबसो सब आलम उपजाना ॥

हिन्दू कहिये कि, कहियै मुसलमाना । राम रहीम बसे एक थाना ॥
मनको जाने सोई मुल्ला जान । दरको जाने सोई दरवेश बखान ॥
हमतो बाबा नेकी बदी सो न्यार । दुनिया मति कोइ लावे दोष हमार ॥
हम तो कहि हैं अकेलेदस्त । ताका साहेब मक्का वस्त ॥
मक्कवन्तका साहेब अकिल मन्द । अकिल मन्द अकिल सो जाना ॥
मनमुरीद दोस्ती दाना ॥ सहर गदाई कौन पार । सिर खुरदती कौन
यार ॥ बन्दी खाने कौन यार । तख्त बादशायी कौन यार ॥ काया
यार सिर खुर्दनी । दिल यार माहीं मर्दनी ॥ जीव यार बन्दी खाने ॥
मन यार निशस्त बादशाही ॥ मन लाल दिल लाल लाल पोतदार ।
रहममाही हम साहसाह पोतदार ॥

इति कबीर साहबका वचन उचार विचार ।

अथ खान मुहम्मद अली बादशाहका प्रबोध ।

कलिक कीमोक लिप्त रसमेकी चशमें । खदयर संयम करदम ।

ओजूद राह चकित करदम ।

औबल—अक्ले पीर है मन मुरीद है । तन शहीद है असल कदाई है ॥
तकबुर दुश्मन है । गुस्सा हराम है । नफस शौतान है । चोरी लानती है । जुवारी
पलीदी है । अदब आदिल है । बे अदब कम असल है । राह पीर है । बैराह
बेपीर है । सांच बिहिश्त है । झूठ दोजख हैं । मोमदिल पाक है । संग दिल
नापाक है । हिर्स है । हैवान है । बेहिर्स वली है ।

लाइलाह हरकत है । अचेतबेगुलाम है । असलजाबेको सलाम है ।
कृतहीन जर्दरू है । दाना जौहरी है । असलकी दोस्ती है दाना शायर है । बूझे
महबूब है । बन्दगी कबूल हैं । अल्लाह नूर है । आलम हद्द है । साहिब बेहद्द
है । यकीन मुसलमान है । शील रोजा है । शर्म सुन्नत है । ईमान मुसलमान

है । बेईमान बेदीन है । दिल दलील है । बाँग बलेल है । फकीरी सबूरी है । नासबूरी मक्कारी है । दरोग दन्द है ॥

इति समझौता ।

अथबन्द ।

प्रथम बोलिये मूल बन्ध दुजे बोलिये बोलिये कमर बन्ध । तीजे बोलिये लंगोट बन्ध पाँचवे बोलिये दानिश बन्ध ॥ छठै बोलिये शस्त्र बन्ध । सातवाँ बोलिये सहस बन्ध ॥ आठवाँ बोलिये अहूठ हाथकी काया । जाका मर्म विरले पाया ॥ मक्के हिंस मदीने छाया । औवल पीर हिन्दू कौवल वीर मुसलमान कहाया । मुसलमानकी काटी चोंचनी हिन्दूके छेदे कान । बोलता ब्रह्म नहीं हिन्दू नहीं मुसलमान ॥ दादा आदमने गाया । बडे बडे पीरनको फरमाया । खुदाने अली बादशाहको चिताया । हिम्मतें बन्दा मददे खुदा । दुआ फकीरा रहम अल्लाह । कदम दवैशाँ रद्द बलाय दादा आदम मामा हौ आ । मक्क मदीनेमें चढा तवा, पहिली रोटी फकीरको खा ॥ ना देवे रोटी तो टूटे कठवता फूटे तवा । बैठी रहो मामा हौवा । कुफ्र वले अपनी रावा । इतनी सवाल रतनहाजीने कह्यो ॥ कहै कबीर वीरको जानी । काफिर बोध सम्पूर्ण बानी ।

इति श्रीकाफिरबोध ।

फिरिस्तोंका ब्यान ।

१ ओवल फिरिस्ता वसर (दृष्टि) है । जैसे खुदाकी सूरत मूरत नहीं है आदि अन्त नहीं है वैसे बसरकाभी कोई रूप रेख नहीं है । खुदाने यह फिरिस्ता सब ीवधारीके संग लगा दिया है जो हर एकको बतलाता है कि, देखकर चलो ठोकर मत खाओ ॥

२ दूसरा फिरिस्ता समग्र (श्रवणेंद्रिय) है उसक द्वारा खुदा उपदेश करता है कि, मकरूह (बुरा) मरगूब (भला) आवाज और दोस्त दुश्मन की बातको सुनो और समझो ।

३ तीसरा फिरिस्ता शाम (घ्राणेंद्रिय) है । यह फिरिस्ता सुगन्धि दुर्गन्धि को बतलाता है ।

४ चौथा फिरिस्ता लमस (स्पशेंद्रिय) है जो बतलाता है कठिन और कोमल को ।

५ पाँचवा फिरिस्ता जायका (रसेन्द्रिय) है जो छः प्रकारके रसोंका ज्ञान बतलाता है ।

६ छठा फिरिस्ता हाथ है जो हाथसे करने योग्य कामोंको सिखाता है ।

७ सातवों फिरिश्ता पोंब है जो चलने फिरनेको बतलाता है ।
८ आठवों फिरिश्ता जबान (जिह्वा) है जो भला और बुरा वचन बोलनेको सिखाता है ।
९ नवों फिरिश्ता आलातनासुल (जननेन्द्रिय) है जो मूत्र त्याग करने और संसारकी वृद्धि करनेका मार्ग बतलाता है ।
१० दशवों फिरिश्ता मेकअद (गुदेन्द्रिय) है जो शरीरके मलोंको बाहर निकालता है ।
११ ग्यारहवों फिरिश्ता दिल (मन) है जो इच्छा उत्पन्न करता है और राग द्वेष करता है । दिल वह नहीं है जिसको राक्षस मांसाहारी लोग कबाब बनाकर खाते हैं ।
१२ बारहवों फिरिश्ता इदराक (चित्त) है जो सर्व पदार्थोंका चिंतन करता है ।
१३ तेरहवों फिरिश्ता अहंकार है जो जीवनकी रक्षा करता है ।
१४ चौदहवों फिरिश्ता अकल (बुद्धि) है जिसे जिबराईल कहते हैं । जो सबके भेदको जानता है और सबको उपयुक्त मार्ग बतलाता है ॥
१५ पन्द्रहवों फिरिश्ता शहवत (काम-रजोगुण) है जिसको ब्रह्मा कहते हैं ।
१६ सोलहों तमीज (विवेक-सत्तोगुण) है जो सत्य असत्यका विचार बतलाता है इसीको विष्णु कहते हैं ।
१७ सत्तरहवों फिरिश्ता गजब (अहंकार-तमोगुण) हैं जो दुखदाई पदार्थोंसे रक्षा करता है इसीको शिव कहते हैं ।

इसी प्रकार पांच तत्त्व और सर्व प्रकृतियाँ आदि संसारके सर्व वस्तु फिरिश्ते हैं और जिस प्रकार शरीरका राजा जीव है, उसी प्रकार सब, जड़ चैतन्यका स्वामी निजस्वरूप साहिब है जिसके शरणमें जानेसे अटल सुख प्राप्त होता है ।

इति काफिरबोध ।

इकतीसवों प्रकरण ।

ग्वारहवों बेर कबीर साहबका प्रगट होना और शंकराचार्य संन्यासीको बोध देने और समझानेका वृत्तान्त ।

स्वामी शंकराचार्य और कबीर साहबकी गोष्ठी कबीर भानुप्रकाशमें विस्तारसे दिया है, वहांसे देखना चाहिये और इस कबीरमन्शूरके दूसरे भागके पहले अध्याय में भी देखो ।

बत्तीसवाँ प्रकरण ।

बारहवीं बेर रामानुज स्वामी वैष्णवको उपदेश करनेका वृत्तान्त ।

तेतीसवाँ प्रकरण ।

तेरहवीं बेर शेख मनशूर आदिको बोध करनेका वृत्तान्त ।

२९ से ३३ तकके चारों प्रकरणोंका पूरा खुलासा इसी कबीर मनशूरके दूसरे भागमें मिलेगा । इसके आगे ।

कबीर साहबका काशीमें चौदहवीं बेर प्रागट्य की उत्थानिका ।

सत्यपुरुषके तेज तथा ज्योतिका सत्यलोकसे पृथ्वीपर उतरकर काशीके लहर तालावमें ठहरना, पृथ्वी तथा आकाशका प्रकाशमय होजाना, समस्त तालावमें प्रकाश तथा जगमगाहटका फैल जाना । अष्टानन्दजीका इस आश्चर्यमयप्रकाशको देखकर आश्चर्यान्वित होना और इस घटनाका समाचार रामानन्द स्वामीको देना । उस प्रकाशका बालकके रूपमें होकर कमलके पुष्पों पर ठहरना । नीरू जोलाहेका अपनी स्त्रीका गवन लिये हुए उस तालाबके समीपसे होकर जाना । जोलाहिनका बालकको तालाबमें देखना और उसको लेकर अपने घरमें ले जाना । कबीर साहब का नीरू जोलाहेके घरमें रहना और भाँति २ के कौतुक दिखलाना । फिर रामानन्द स्वामीका शिष्य होना और समस्त सिद्धोंके साथ शास्त्रार्थ करके सबको वादविवादमें परास्त कर, वैष्णव धर्मकी रक्षा करना । शाह सिकन्दरलोदी का काशीजीमें आना । शेखतक्री बादशाहके पीर, का ब्राह्मणों तथा मुल्लाओं की साटसे कबीर साहबको बावन कसनी देना और कितनेही कौतुक कबीर साहब द्वारा प्रगट होकर कबीर साहबका निष्कलंकित रहना, उन्हें किसी प्रकारका कष्ट न पहुँचना । कबीर साहबका स्वसम्बेदकी आज्ञाएँ प्रगट करना फिर आपका अन्तिमलीला करनेको मगहर जाना और हिन्दू मुसलमान दोनों जातियोंका कबीर साहबकी लाशको न पाना । वहाँ से आपका विलोपित हो जाना और शवकी जगह केवल चादर और कमलोंका फूल मिलना । हिन्दू मुसलमानोंका केवल चादर तथा कमलोंके फूलोंकी समाधि और कबर बनाना । और हिन्दू मुसलमान दोनोंकी एकताका वृत्तान्त । फिर अपना बाँधो गढ़में प्रगट होकर धर्मदास द्वारा सत्यपथ चलाना ।

सत्य पुरुषकी आज्ञा ।

सत्यपुरुषने जानी से कहा कि, ऐ जानीजी ! कालपुरुषने सब जीवोंको

फँसाकर मार लिया, समस्त मनुष्य भटक-२ कर कालकी फौसीमें पड़ गये । कोई जीव मेरे लोकमें नहीं आता है । मैंने सुकृत (धर्मदास) को सत्यपथके प्रचलित करनेके लिये भेजा था सो उसे भी काल निरंजनने लोक वेदके जालमें फँसा लिया और धर्मदास सत्य पुरुषकी भक्ति को छोड़कर कालपुरुषकी भक्ति और मूर्ति पूजामें लग गया । इस कारण आप पृथ्वीपर जाओ और सुकृतजीको अचेत निद्रासे उठाकर मुक्तिपथ प्रगट करो । बयालीस वंश स्थापित करके पृथ्वीपर थाना जमाओ । तब ज्ञानीजी सत्यपुरुषकी आज्ञा पा और दंडवत प्रणाम करके सत्य-लोकसे बिदा हुए ।

चौतीसवाँ प्रकरण ।

सत्यपुरुषके तेजका लहर तालाब में उतरना ।

सत्यपुरुषके तेज और प्रतापका सत्यलोकसे पृथ्वीपर उतरकर काशी नगरीके लहर तालाबमें ठहरना और फिर उस तेजका मनुष्यके बालक सदृश होकर तालाबके कमलपर स्थित होना ।

सम्बत् चौदहसौ पचपन विक्रमी, ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा सोमवारके दिन सत्यपुरुषका तेज काशीके लहर तालाबमें उतरा । उस समय पृथ्वी और आकाश तक प्रकाशित हो गया । उसी समय अष्टानन्दजी वैष्णव उस तालाबपर बैठे थे और वृष्टि होरही थी, बादल आकाशमें घिरे रहनेके कारण अंधकार छाया हुआ था, बिजली चमक रही थी । जिस समय वह नूर उस तालाबमें उतरा, उस समय तालाब जगमग जगमग करने लगा, फिर वह प्रकाश उस तालाबमें ठहर गया । प्रत्येक दिशाएँ जगमगाहटसे परिपूर्ण हो गयीं । इस आश्चर्यमय प्रकाशको देखकर अष्टानन्दजी आश्चर्य चकित हो गये । उस समय उस लहर तालाबमें महाज्योति फँल रही थी. मयूर, चकोर आदि पक्षी बोल रहे थे । चिड़ियाँ चहचहा रही थीं, पनडुब्बियाँ फिर रही थीं, कमल तथा नीलकमलके पुष्प लहलहा रहे थे, भँवरे गूँज रहे थे । ऐसे समय वह तेज आकर उस तालाबमें स्थिर हुआ । अष्टानन्दजीने जो उस तेजको देखा तो जानकर उसका समस्त विवरण रामानन्द स्वामीसे कहा मुझको अत्यंत आश्चर्य हुआ, उस ज्योतिको आकाशसे उतरते और लहर तालाबमें ठहरते देखा । जब वह प्रकाश उस तालाबमें उतरा तब समस्त तालाब ज्योतिर्मय हो गया । यह बात सुनकर स्वामी रामानन्दजीने अष्टानन्दजीने कहा कि, वह प्रकाश जो तुमने देखा था उसका फल शीघ्रही तुम्हारे देखने तथा सुननेमें आवेगा, उसकी धूम मच जावेगी ।

फिर वह तेज मनुष्यके बालकके आकारमें होकर उस जलके ऊपर कमलोंके

पुष्पोंपर बालकोंके सद्गुण हाथ पोंच फँकने लगा । वह बालक अलौकिक शोभा लिये अत्यंत सुंदर दिखलायी देता था । पश्चात् तो जैसा कि, रामानन्द स्वामीने अष्टानन्दजीसे कहा था इसकी धूम समस्त संसारमें मचगयी ।

पैंतीसवाँ प्रकरण ।

नीमा और नीरू ।

मैं इसके पहले पूर्व लिख आया हूँ कि, श्वपच सुदर्शनके जो माता-पिता थे वे दोनों डोमका शरीर छोड़कर ब्राह्मण ब्राह्मणी हुए थे, और चन्दवारे नगरमें रहते थे । उनके पूर्व प्रेमसे कबीर साहब उनके घर गये और उनको मुक्तिमार्ग बतलाने लगे परन्तु, उन्होंने ध्यान नहीं दिया । तब सत्यगुरु उनके गृहसे अन्तर्धान हो गये । इसके उपरान्त वे दोनों ब्राह्मण ब्राह्मणी परलोकगामी होकर काशीमें जुलाहा जुलाही हुए, उनका नाम नीरू और नीमा पड़ा । सुदर्शनजीके माता-पिता जो तीसरे जन्ममें जोलाहा जोलाही हुए थे । इसको मुक्ति प्रदान करनेके निमित्त जैसे पहले कई बार उनके घर गये थे उसी प्रकार इस बार भी उनको चेतानेके लिये उनके घर जानेका विचार किया । इसलिये का ठीके लहर तात्ताबमें प्रगट हुए ।

श्वपचसुदर्शनके माता पिताके तीन जन्मका वृत्तान्त ।

अनुराग सागरसे

कबीर बचन धर्मवास प्रति ।

संत सुदरसन द्वापर भयऊ । तासु कथा तोहि प्रथम सुनयऊ ॥
तेहि लै गयो देस निज जबहीं । बिन्ती बहुत कीन तिन तबहीं ॥
कहे सुपच सतगुरु सुनि लीजे । हमरे मातु पिता गति दीजे ॥
बन्दीछोर करो प्रभु जाई । जमके देस बहुत दुख पाई ॥
मैं बहु भौति पिता समझावा । मातु पिता परतीत न आवा ॥
बालक बद नहि मान सिखावा । भगति करत नहि मोहि डरावा ॥
भगति तुम्हार करन जब लागे । कबहुँ न द्रोह कीन मम आगे ॥
अधिक हरष तिनहि चित होई । ताते विनती करूँ प्रभु सोई ॥
आनहु तिनहि सत सब्द दिढाई । बन्दीछोर जीव मुकताई ॥
बिन्ती बहुत संत जब कीन्हा । ताकर बचन मानि हम लीन्हा ॥
ताकर विनय वहुरि जग आवा । कलिजुग नाम कबीर कहावा ॥
हम इंक बचन निरंजन हारा । वाचा बँध उदधि पगु धारा ॥
और दीप हंसन उपदेसा । जम्मू दीप पुनि कीन परवैसा ॥

संत सुदरसनके पितु माता । लछमी नरहर नाम सुहाता ॥
सुपच देह छोडि तिन भाई । मनुषहि जनम धरे तिन आई ॥

श्वपच सुदर्शनके माता पिताका पहला जन्म ।

संत सुदरसनके परतापा । मानुष जनम विप्रके छापा ॥
दोनो जनम ठाम दोय लीना । पुनि विधि मिलै तिनहि कहैं दीना ॥
कुलपत नाम विप्र कर कहिया । नारि नाम महैसरि रहिया ॥
बहुत अधीन पुत्र हित नारी । करि असनान सूरज व्रत धारी ॥
अंचल लै विनवै कर जोरी । रुदन करे चित सुत कहैं दौरी ॥
ततछन हम अंचलपर आवा । हम कहैं देखि नार हरषावा ॥
बाल रूप धरि भेटो वोही । विप्र नारि ग्रह ले गइ मोही ॥
कहै नारि किरपा प्रभु कीना । सूर व्रत कर फल यह दीना ॥
बहुत दिवस लग तहौं रहाये । नारि पुरुष मिलि सेवा लाये ॥
रहे दरिद्र ते दुखी अपारा । हम मन महैं अस कीन विचारा ॥
प्रथमहिं दरिद्रता इन कर हारों । पुनि भगति मुक्ति कर बचन उचारों ॥
जब हम पलना झटक झकोरे । मिलत सुवरन ताहि इक तोरे ॥
नित प्रति सोन मिले इक तोला । तातै भये वह सुखी अमोला ॥
पुनि हम सत सब्द गोहरावा । बहुत प्रकारते उर्नहि समझावा ॥
तिन हिरदय नहिं सब्द समाया । बालक जानि परतीत न आया ॥
ताही देह चीन्हसि नहिं मोही । भयो गुप्त तहैं तन तजि ओही ॥

श्वपच सुदर्शनके माता पिताका दूसरा जन्म

नारि द्विज दोउ तन त्यागा । दरस परभाव मनुज तन जागा ॥
पुनि दोनो भये अंस मिलाऊ । रहहिं नगर चंदवारे नाऊ ॥
ऊदा नाम नारि कहैं भयऊ । पुरुष नाम चन्दन धरि गयऊ ॥
पुरुषोत्तम ते हम चलि आये । तब चंदवारा जाइ परगटाये ॥
बालक रूप कीन्ह तेहि ठामा । कीनेउ ताल मांहि बिसरामा ॥
कमल पत्र पर आसन लाये । आठ पहर हम तहौं रहाये ॥
पाछे ऊदा असनामहिं आयी । सुन्दर बालक देखि लुभायी ॥
दरस दियो तिहिं सिसु तन धारी । ले गयि बालक निज घर नारी ॥
ले बालक गिरह अपने आयी । चंदन साहु अस कहा सुनायी ॥
कहु प्यारी बालक कहैं पायी । कौनी विधि ते इहवों लायी ॥
कह ऊदा जल माहीं पावा । सुन्दर देखि मोरे मन भावा ॥

कह चंदन तै मूरख नारी । बेगि जाहु दै बालक डारी ॥
जाति कुटुम हरिहैं सब लोगा । हंसत लोगं उठि है तन सोगा ॥
ऊदा तरस पुरुष कर माना । चन्दन साहु जबै रिसियाना ॥
बालक चेरिहि दीन उठायी । ले बालक जल देहु खसायी ॥
चल चेरी बालक कहैं लीना । जल महुँ डारन ताहि चित दीना ॥
चलि भइ मोहि पंवैरन जबहीं । अन्तरधान भये हम तवही ॥
भयो गुपुत तेहि करसे भाई । रुदन करै दोनो विलखाई ॥
विकल होय बन ढूँढत डोले । मुगध ज्ञान कछु मुख नहिं बोले ॥
यहिविधि बहुत दिवस चलिगयऊ । तजि तन जनम बहुरि तिन पयऊ ॥

श्वपचसुदर्शनके माता पिताका तीसरा जन्म

मानुष तन जुलहा कुल दीना । होउ संजोग बहुरि विधि कीना ॥
कासी नगर रहे पुनि सोई । नीरू नाम जुलाहा होई ॥
नीमा नाम नारि कर भाई । नारि पुरुष हो मिल पुनि आई ॥

इति श्वपचसुदर्शनके मातापिताके तीन जन्मकी वार्ता

छत्तीसवाँ प्रकरण ।

नीमा और नीरूका बालक पाना

इसका विवरण इस प्रकार है कि, नीरू जोलाहा काशी नगरीमें रहता था । एक दिवस वह अपना मुकलावा (गवना) लेनेको गया और अपनी स्त्री सहित चला आता था । देवात् वह लहर तालाबके समीपसे होकर निकला । उसकी स्त्री नेमा प्यासी हुई और जल पीनेके निमित्त उस तालाबपर गयी । जब जल पी चुकी तब दृष्टि उठाकर उस तालाबको देखने लगी । देखा तो एक बड़ाही सुंदर बालक कमलके फूलोंपर हाथ पौंव फेंक रहा है । उस बालकको देखकर वह जोलाही तालाबके भीतर घुस गयी, और उस बच्चेको अपनी गोदमें उठा लिया । तालाबसे बाहर निकलकर नीरूके पास गयी । प्रमाण आदि मंगल—

दोहा—“नीरू नाम जुलाहा, गमन लिये घर जाय ।

तासु नारि बड भागिनी, जलमें बालक पाय ॥

तब जोलाहेने पूछा, कि, यह किसका लड़का ले आयी है ? तब नीमाने उत्तर दिया कि, मैंने तालाबमें पाया है नीरूने कहा, यह लड़का जहांसे तू ले आयी है वहांही रख आ । नहीं मालूम यह किसका लड़का है ? तब उस स्त्रीने उत्तर दिया कि, ऐसा सुन्दर बालक तो मैं कदापि नहीं फेकूंगी । नीरूने कहा कि, लोग

मुझको हँसेगे और ठठुएँ उड़ावेंगे कि, गौनेहीमें नीरू अपनी स्त्रीके साथ एक पुत्रभी लेआया है इस कारण तू इस बालकको फँकआ ।

“नीरू देख रिसावई, बालक दे तू डार ।

सब कुटुम्ब हँसी करे, हसि मारे परिवार ॥

इस बातको जब नीमाने नहीं माना; तब वह जोलाहा अपनी स्त्रीको मारने पीटने पर तत्पर हुआ और झिड़कियाँ देने लगा । तब नीमा खड़ी २ अपने चित्तमें चिन्ता करने लगी । इतनेमें वह बालक स्वयम् बोल उठा कि, हे नीमा ! मैं तुम्हारे पूर्व जन्मके प्रेमके कारण तुम्हारे घर आया हूँ । तुम मुझको मत फँको और अपने घर ले चलो । यदि तुम मुझको अपना गुरु करके मेरा कहना मानोगे तो मैं तुम्हे आवागमनके झंझटसे छुड़ाकर मुक्त कर दूंगा और तुम्हारा समस्त दुःख संताप हर लूंगा । तुमको वह शब्द बतलाऊँगा कि, जिससे तुम कभी कालके फन्देमें नहीं पड़ोगे ।

“तब साहब हुँकारिया, ले चल अपने धाम ।

मुक्ति सन्देश सुनाइहौं, मैं आया यहि काम ॥

पूरब जनम तुम ब्राह्मण, सुरति बिसारी मौहि ।

पिछली प्रीतिके कारने, दरसन दीनो तोहि ॥”

जब वह बालक इस प्रकार बोला तो उसकी बात सुनकर नीमा निर्भय हो गयी और अपने पतिसे नहीं डरी । तब नीरूभी फिर कुछ नहीं बोला ।

“कर गहि बेगि उठाइया, लीन्हो कंठ लगाय ।

नारि पुरुष दोउ हरषिया, रंक महा धन पाय ॥

वे दोनों प्रसन्नतापूर्वक उस बालकको लेकर अपने घर गये ।

सैतीसवाँ प्रकरण ।

बालकके नाम धरनेको ब्राह्मणका आना ।

काशीके लोगोंने देखा कि, नीरू तो अपनी स्त्रीके साथ एक पुत्रभी लेता आया है, तो लोग ठठटा और हँसी करने लगे । तब नीरूने लोगोंको समझाया कि, हमने यह बालक लहर तालाबमें पाया है और बालकका कुल विवरण कह सुनाया ।

फिर नीरू ब्राह्मणको बुलाकर पूछने लगा कि, इस बालकका क्या नाम रखना चाहिये ? ब्राह्मण तो पत्रा लिये विचारही रहा था इतनेमें बालक स्वयम् बोल उठा कि, ऐ ब्राह्मण ! मेरा नाम कबीर है । दूसरा नाम रखनेकी चिन्ता