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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

८० कथासरित्सागर

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८० कथासरित्सागर लौहतुलावैश्यपुत्रयोः कथा एव भवत्युपायेन कार्यमन्यच्च मे शृणु। आसीत्कोऽपि तुलालक्ष पित्र्यार्थान्त्राप्तुमिप्सुतः ॥२३७॥ अयःपद्महस्रेण घटितां तां तुलां च सः। कस्यापि वणिजो हस्ते न्यस्य देशान्तरं ययौ ॥२३८॥ आगतश्च ततो यावत्तामृगयते तुलाम्। आखुभिर्भक्षिता सेति तावत्त सोऽब्रवीद्वणिक ॥२३९॥ सत्यं सुस्वादु तत्स्नेह सेन जग्ध सवाखुभिः। इति सोऽपि तमाह स्म वणिक्पुत्रो हसन्हृदि ॥२४०॥ प्रार्थयामास च ततो वणिजोऽस्मात्स भोजनम्। सोऽपि सन्तुष्य तत्तस्मै प्रदातुं प्रत्यपद्यत ॥२४१॥ ततः स सह कृत्वान्यं वणिजः पुत्रमर्भकम्। स्नातुं वणिक्सुत प्रायात्तामलकमात्रकम् ॥२४२॥ स्नात्वार्भकं से निक्षिप्य गुप्तं क्वापि सुहृद्गृहे। एक एवाययौ तस्य स धीमान्वणिजो गृहम् ॥२४३॥ अर्भकः क्व स इत्येव पृच्छन्तं वणिजं च तम्। श्येनेन सोऽर्भको नीत साभिप्रयत्युवाच सः ॥२४४॥ प्लावितो मे त्वया पुत्र इति क्रुद्धेन तेन च। नीत स वणिजा राजकुलेऽप्याह स्म तत्त्तथा ॥२४५॥ असम्भाव्यमिदं श्येनो नयेत् कथमिवारर्भकम्। इति सभ्यैश्च तत्रोक्ते वणिक्पुत्रो जगाद सः ॥२४६॥ मूषकैर्भक्ष्यते लोही देशे यत्र महातुला। तत्र द्विपमपि श्येनो नयेत्किं पुनरर्भकम् ॥२४७॥ तच्छ्रुत्वा कौतुकात् पृष्टवृत्तान्तेस्तस्य वादिना। सभ्यैस्तुला सा तेनापि स आनीयार्पितोऽर्भकः ॥२४८॥ इत्युपायेन घटयन्त्यभीष्टं बुद्धिशालिनः। त्वया तु साहसेनेव सन्देहे प्रापितं प्रभुः ॥२४९॥ एतत्करटकाच्छ्रुत्वाऽवादीद्दमनको ह्यनू। नैवं किमक्षयुद्धेऽस्ति सिंहस्य जयसंशयः ॥२५०॥ मत्तेभवक्षनाघातघनव्रणविभूषणः। क्व केसरी क्व चान्तश्च प्रतोदक्षतविग्रहः ॥२५१॥

लोहे का तराजू और वैश्यपुत्र की कथा

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द्वन्द्व सम्वाद ८१ लोहे का तराजू और वैश्यपुत्र की कथा इस प्रकार उपाय से काम निकाले जाते हैं। और भी मुझसे सुनो। प्राचीन काल में किसी वैश्य के पास पिता की सम्पत्ति में से केवल एक लोहे का तराजू बच गया था ॥२४०॥ चार सौ तोल लोहे से बने उस तराजू को किसी बनिये के पास अमानत (धरोहर) रखकर वह वैश्य दूसरे देश को चला गया ॥२४१॥ उसने लौटकर उस बनिये से जब अपना तराजू माँगा तब उस बनिये ने कहा—'उस को चूहे खा गये' ॥२४१॥ सचमुच वह लोहा बहुत मीठा था इसी से उसे चूहे खा गये।—यह सुनकर मन-ही- मन हँसते हुए वैश्यपुत्र ने उस बनिये से कहा ॥२४ ॥ और उसने भोजन की प्रार्थना की। उसने भी सन्तुष्ट होकर उसे भोजन देना स्वीकार कर लिया' ॥२४१॥ तब वह वैश्यपुत्र उस बनिये के छोटे पुत्र का एक आँवला देकर स्नान के लिए उसे साथ लेकर चला गया। स्नान के बाद वह बनिया उस वैश्यपुत्र को किसी मित्र के यहाँ छिपाकर रख आया और अकेला ही बनिये के घर भोजन के लिए आ गया ॥२४२ २४५॥ बच्चा कहाँ गया?—इस प्रकार पूछते हुए बनिये ने वणिकपुत्र ने कहा—'उस बालक को आकाश से नीचे आकर एक बाज उठा ले गया' ॥ २४४॥ उस बनिया द्वारा उसे न्यायालय में ले जाने पर भी उस वैश्यपुत्र ने वही कहा ॥२४५॥ 'यह असम्भव है। बाज बच्चे को उठाकर कैसे ले जा सकता है? सभा में उपस्थित व्यक्तियों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वैश्यपुत्र बोला—जिस देश में लोहे का भारी तराजू चूहों से खाया जाता है वहाँ तो बाज हाथी को भी ले जा सकता है। बच्चे की तो बात ही क्या' ॥२४६-२४७॥ यह सुनकर कौतुक से सब समाचार पूछकर न्यायाधिकारियों ने उसे तराजू दिला दिया और वैश्यपुत्र ने भी बच्चे को लाकर बनिये को दे दिया ॥२४८॥ इस प्रकार बुद्धिमान् व्यक्ति उपाय से अपना काम बनाते हैं। तूने तो साहस करके स्वामी को संशय (खतरे) में डाल दिया है ॥ ४ ॥ करटक से यह सुनकर हँसता हुआ दमनक उससे बोला—तेरा डर व्यर्थ है। बैल के साथ युद्ध करने से सिंह की विजय के सिवा ही क्या हो सकती है ॥२५ ॥ मदोन्मत्त हाथी के दाँतों के अग्र कशा (पाशा) से अङ्कित सिंह कहाँ ! और चाबुक की मार से क्षत शरीरवाला गधा जैसा होनेवाला बैल कहाँ ! ॥ ५१॥ ११

८२ कथासरित्सागर

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८२ कथासरित्सागर इत्यादि जल्पतो यावज्जम्बुकौ तौ परस्परम्। तावत्सञ्जीवकवृषं युद्धे पिङ्गलकोऽवधीत् ॥२५२॥ तस्मिन् हते स किल पिङ्गलकस्य तस्य पार्श्वे समं करटकेन मृगाधिपस्य। तस्थौ ततो दमनको मुदितश्चिराय मन्त्रित्वमप्रतिहतं समवाप्य भूयः ॥२५३॥ इति नरवाहनदत्तो नीतिमतो बुद्धिविभवसम्पन्नाम्। मन्त्रिवराद्गोमुखात् श्रुत्वा चित्रां कथां जहर्ष भृशम् ॥२५४॥ इति महाकवि श्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे शक्तियशोलम्बके चतुर्थस्तरङ्गः। पञ्चमस्तरङ्ग ततः क्षितियशःसोत्कं गोमुखः स विनोदयन्। नरवाहनदत्तं तं मन्त्री पुनरभाषत ॥१॥ अगुरुदाहीवणिजःकथा श्रुता प्राज्ञकथा देव त्वया मुग्धकथां शृणु। मुग्धबुद्धिरभूत्कश्चिदाढ्यस्य वणिजः सुतः ॥२॥ जगाम स वणिज्यायै कटाहद्वीपमेकदा। भाण्डमध्ये च तस्याभून्महानगुरू सञ्चयः ॥३॥ विक्रीता परमाब्दस्य न तस्यागुरु तत्र तत्। कश्चिन्नजग्राह तद्वासी जनो वेत्ति न तन्न तत् ॥४॥ काष्ठिकेभ्यस्ततोऽङ्गारान् दृष्ट्वापि क्रीणतो जनान्। स कालागुरु दग्ध्वा तदङ्गारानकरोज्जडः ॥५॥ विक्रीयाङ्गारमूल्येन तच्छनागरय सतो गृहम्। तदेव कौशलं शंसन् ययौ लोकहास्यताम् ॥६॥ तिलकाणिककथा कपितोऽप्युत्सहाथैय श्रूयतां तिलकाणिकः। बभूव कश्चिद्ग्रामीणो भूतग्रामः कृषीबलः ॥७॥

दशम लम्बक ८३

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दशम लम्बक ८३ जब दोनों सियार इस प्रकार की बातें कर ही रहे थे कि पिंगलक सिंह ने युद्ध में संजीवक बैल को मार डाला ॥२५२॥ उस संजीवक बैल के मारे जाने पर, करटक के साथ दमनक मृगराज सिंह का फिर से स्वतन्त्र मन्त्रित्व पाकर प्रसन्नतापूर्वक रहने लगा ॥२५३॥ नरवाहनदत्त भी विप्र मन्त्री गोमुख से बुद्धि के चमत्कारों से भरी हुई इस विचित्र कथा को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥२५४॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियशो लम्बक का चतुर्थ तरंग समाप्त पञ्चम तरंग तदनन्तर, शक्तियशा के लिए उत्कंठित नरवाहनदत्त का विनोद करता हुआ गोमुख मन्त्री बोला ॥१॥ अगर जलानेवाले वैश्य की कथा तुमने बुद्धिमानों की कथाएँ सुनीं अब मूर्खो की कथा सुनो। किसी धनी बनिये का मूखबुद्धि नाम का एक बालक था ॥२॥ वह वैश्यपुत्र व्यापार के लिए एक बार कटाह द्वीप में गया। उसके व्यापारिक सामान म अगर की लकड़ी सबसे अधिक थी ॥३॥ अन्य माल को बेचकर धन कमाये हुए उस वैश्यपुत्र के अगर को वहाँ किसी ने नहीं खरीदा क्योंकि वहाँ के लोग अगर के महत्त्व को जानते ही न थे ॥४॥ तब उस वैश्यपुत्र ने लकड़हारों से कोयला खरीदते हुए वहाँ के निवासियों को देखकर सारी अगर की लकड़ी जलाकर उसका कोयला बना डाला। और, उसे कोयले के भाव म बेचकर घर आकर मित्रों म अपनी डींग हाँकने लगा तो सुनकर लोग उसकी हँसी करने लगे ॥५-६॥ तिल धोनेवाले मूर्ख कृषक की कथा अंगुरदाही की कथा तुमने सुनी अब तिलप्रक्षालक की कथा सुनो। एक स्थान पर भूत के समान एक मूर्ख किसान था ॥७॥

७४ कथासरित्सागर

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७४ कथासरित्सागर स कश्चिद्भ्रिष्टतिलान् भृष्ट्वा भुक्त्वा स्वादूनवेत्य तान्। भृष्टानवापयद् भूरींस्तादृशोत्पत्तिवाञ्छया ॥८॥ जलेऽग्निक्षेपककथा भृष्टेषु तदजातेषु नष्टार्थं तं जनोऽहसत् । तिलवापिक उक्तोऽसौ जलऽग्निक्षेपकं शृणु ॥९॥ मन्दबुद्धिरभूत्कश्चित् पुमान्निशि स चैकदा। प्रभाते देवतापूजां करिष्यन्नित्यचिन्तयत् ॥१०॥ उपयुक्तौ मम स्नानधूपार्थ्य जलानलौ। स्थापयामि तदेकत्र्यौ तौ शीघ्रं प्राप्नुयां यथा ॥११॥ इत्यालोच्याम्बुकुम्भान्त क्षिप्त्वाग्नि संविवेश स । प्रातश्च वीक्षते यावद् गतोऽग्निर्नष्टमम्बु च ॥१२॥ अङ्गारमलिने तोये दृष्टे तस्याभवन्मुखम्। सावगण्डं सहास्यस्य लोकस्यासीत् पुन स्मितम् ॥१३॥ नासिकारोपणकथा श्रुतस्त्वयाग्निकुम्भाख्यो नासिकारोपणं शृणु। बभूव कश्चित्पुरुषो मूर्खो मूढमतिः क्वचित् ॥१४॥ स भार्यां चिपिटघ्राणां गुरुं चोत्तुङ्गनासिकम्। दृष्ट्वा तस्य प्रसुप्तस्य नासां छित्वाप्रहीद् गुरोः ॥१५॥ गत्वा च नासिकां छित्वा भार्यायास्तामरोपयत् । गुरुर्नासा मुखे तस्या न च तत्राऽरुरोह सा ॥१६॥ एवं भार्यागुरू तेन च्छिन्ननासौ कृतावुभौ। मूर्खपशुपालस्य कथा अधुना वनवासी च पशुपालो निशम्यताम् ॥१७॥ पशुपालो महामुग्ध कोऽप्यासीद्गहनारन्ये । तस्य धूर्ता समाश्रित्य मित्रत्वे बहवोऽमिलन् ॥१८॥ ते च जगदुराढ्यस्य सुता नगरवासिनः । त्वत्कृते याचितास्माभि सा च पित्रा प्रतिश्रुता ॥१९॥

द्वादश लम्बक ८५

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द्वादश लम्बक ८५ उसने एक बार तिलों को भूनकर खाया और उन्हें स्वादिष्ट जानकर उन भुने हुए तिलों को ही वैसा ही मीठा तेल पैदा करने की दृष्टि से खेतों में बो दिया। भुने हुए उन तिलों के न उगने से अपने माल को नष्ट करनेवाले उस किसान की सभी लोग हँसी करने लगे ॥८॥ पानी में आग फेंकनेवाले की कथा तिलखादिक की कथा सुनी। अब पानी में आग फेंकनेवाले की कथा सुनो ॥९॥ एक मूर्ख मनुष्य था। उसने प्रातःकाल देवता की पूजा करने की इच्छा से सोचा कि कल मुझे स्नान धूप आदि के लिए जल और अग्नि की आवश्यकता पड़ेगी। अतः, उन्हें एक साथ ही रख देता हूँ जिससे प्रातः उठते ही दोनों एक ही स्थान में मिल जायें ॥१०-११॥ ऐसा सोचकर वह पानी के घड़े में आग डालकर सो गया। प्रातःकाल जब उसने उठकर देखा तो आग समाप्त हो गई थी और पानी भी मैला होकर नष्ट हो गया था ॥१२॥ कोयले से पानी के काले हो जाने के कारण उससे मुँह धोने पर उसका मुँह भी वैसा ही (काला) हो गया। उसे देखकर सभी लोग मुस्कराते भये ॥१३॥ नासिकारोपण की कथा अग्निहुम्भ की कथा तुमने सुनी अब नासिकारोपण की कथा सुनो। कहीं कोई जड़बुद्धि पुरुष रहता था ॥१४॥ उसने अपनी स्त्री को चिपटी नाकवाली और गुरु को उठी हुई लम्बी नाकवाला देखकर सोये हुए गुरु की नाक काटकर स्त्री के नाक में लगा देने की सोची। तदनन्तर, उसने स्त्री की नाक काटकर उसके स्थान पर गुरु की नाक काटकर रोप दी। किन्तु, गुरु की नाक उस पर जमी नहीं। इस प्रकार उसने गुरु और स्त्री दोनों को नकटा कर दिया। फलस्वरूप जनता से तिरस्कार और हँसी उसने प्राप्त की ॥१५-१६॥ मूर्ख षडुरिये की कथा अब एक पशुपारक (बड़ुरिये) की कथा सुनो। एक जगह में महामूर्ख किन्तु धनी एक बड़ुरिया रहता था। अनेक धूर्त मित्रता करके उससे मिल गये ॥१७-१८॥ और, वे उससे बोले कि हमलोगों ने नगरनिवासी धनी की एक कन्या तुम्हारे लिए माँगी है, उसके पिता ने उसे देना स्वीकार भी कर लिया है ॥१९॥

८६ कथासरित्सागर

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८६ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा स ददौ तुष्टस्तेभ्योऽर्थं स च ते पुनः। विवाहस्तव सम्पन्न इत्यूचुर्दिवसगते ॥२०॥ ततः स सुतरां तुष्टस्तेभ्यो भूरि धनं ददौ। दिनेष्वथ च वदन्ति स्म पुत्रो जातस्तवेति ते ॥२१॥ ननन्द तेन सर्वं च मूढस्तेभ्यः समर्प्य सः। पुत्रं प्रत्युत्सुकोऽस्मीति प्रारोदीच्चापरेऽहनि ॥२२॥ श्वश्रूशावन्न शोकस्य हासं धूर्तेः स वञ्चितः। पशुभ्य इव सङ्क्रान्तजडिमा पशुपालकः ॥२३॥ मत्तकूरत्नस्तम्बककथा पशुपालः श्रुतो देव शृण्वस्तूरत्नस्तम्बकम्। ग्राम्यः कश्चित्तमं मूर्ध्नि प्रापास्तूरजं महत् ॥२४॥ रात्रौ राजकुलाभ्यन्तरैर्नीत्वा तत्र निवेशितम्। यद्गृहीत्वा स तत्रैव भार्यां तेन व्यभूषयत् ॥२५॥ बबन्ध मेखलां मूर्ध्नि हारं च जघनस्थले। नूपुरौ करयोस्तस्याः कर्णयोरपि कङ्कणौ ॥२६॥ हसद्भिः स्थापितं लोकैर्बुद्ध्वा राजा जहार तत्। तस्मात् स्वाभरणं तं तु पशुप्रायं मुमोच सः ॥२७॥ तूलविक्रयिणः कथा उक्तोऽस्तूरणो देव शृणु वक्ष्यमथ तूलिकम्। मूर्खः कश्चित् पुमांस्तूलविक्रमायापणं ययौ ॥२८॥ अशुद्धमिति तत्तस्य न जग्राहात्र कश्चन। तावद्ददर्श तत्राग्नौ हेम निष्टप्तशोधितम् ॥२९॥ स्वर्णकारेण विक्रीतं गृहीतं ग्राहकेण च। तद्दृष्ट्वाऽपि स तत्तूलमिच्छञ्छोधयितुं जडः ॥३०॥ अग्नौ क्षिप्त्व दग्धे च तस्मिँल्लोको जहास्तम्। खर्जूरीच्छेदककथा श्रुतोऽप्य तूलिको देव खर्जूरीच्छेदकं शृणु ॥३१॥

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८८ कथासरित्सागर

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८८ कथासरित्सागर केचिन्मूर्खाः समाहूय न्ययोज्यन्ताधिकारिभिः । ग्राम्या राजकुलाविष्ट खर्जूरानयनं प्रति ॥३२॥ ते दृष्ट्वर्का सुखग्राह्यां खर्जूरपतितां स्वतः । खर्जूरीं तत्र खर्जूरीः सर्वा ग्रामे स्वकेऽच्छिदन् ॥३३॥ पतितास्ताश्च कलितास्तेषखर्जूरसञ्चयाः । उत्पाप्यारोपयामासुर्न चैषां सिद्ध्यति स्म तत् ॥३४॥ ततश्चानीतखर्जूरा बादृतारोपणेन ते । खर्जूरीच्छेदनं बुद्ध्वा राज्ञा प्रत्युत दण्डिताः ॥३५॥ मूर्खमन्त्रि कथा उक्तं खर्जूरघासोऽथ निष्फालोकनमुच्यते । निधानदर्शी केनापि कोष्याज्ञाहे महीभुजा ॥३६॥ मा गात्क्वापि पलाय्यापि राजकुर्मत्रिणा । नेत्रे तस्योदपाट्येतां निधानस्थानदर्शिनः ॥३७॥ भूरूक्ष्णाम्धपदस्मस्त गतावप्यगतौ समम् । अन्ध दृष्ट्वा च तं मन्त्री स जडो जहसे जनैः ॥३८॥ लवणभक्षकस्य मूर्खस्य कथा निधानालोकनं श्रुत्वा श्रूयतां लवणाशनम् । बभूव गह्वरो ग्रामवासी कोऽपि जडः पुमान् ॥३९॥ स मित्रेण गृहं जातु नीतो नगरवासिना । भोजिता लवणस्वादूत्यन्नानि व्यञ्जनानि च ॥४०॥ केनेय स्वादुतान्नानेरित्यपृच्छत्स गह्वरः । प्राधान्याल्लवणेनेति तेनोचे सुहृदा तदा ॥४१॥ तदेव सहि भोक्तव्यमित्युक्त्वा लवणस्य सः । पिष्टस्य मुष्टिमादाय प्रक्षिप्यामक्षयन्मुखे ॥४२॥ तच्छूनं तस्य दुर्बुद्धेरोष्ठौ द्मश्रूणि घालिपत् । हसतस्तु जनस्यात्र मुखं धवरतां ययौ ॥४३॥ मूर्खगोदोहककथा लवणाशी ध्रुतो येव त्वया मोदोहकः शृणु । ग्राम्यः कश्चिदभून्मुग्धो गोरेका तस्य चाभवत् ॥४४॥

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पञ्चम सम्वाद ८०९ राजा के आज्ञानुसार उसके कुछ अधिकारियों ने कुछ गँवारों को बुलाकर खजूर तोड़ लाने के लिए नियुक्त किया ॥१२॥ उन लोगों ने खजूर के एक पेड़ को गिरा देखकर और उससे खजूरों को बिना कष्ट के पाने के योग्य समझकर, अपने गाँव के सभी खजूर के पेड़ काटकर गिरा दिये ॥१३॥ उन गिरे हुए वृक्षों के सारे खजूर एकत्र कर लेने पर वे उन वृक्षों को उठाकर फिर से रोपने लगे किन्तु ऐसा न कर सके । तब राजा के पास खजूर लाने पर उनकी मूर्खता को सुनकर राजा ने सभी को दंड दिया ॥१४-१५॥ मूर्ख मन्त्री की कथा खजूर खानेवालों का हास्य सुना । अब भूमि में गड़े धन को देखनेवाले की कथा सुनो। किसी राजा ने गड़ा हुआ धन बताने के लिए किसी ज्ञानी को कहीं से बुलवाया। किन्तु, राजा के मूर्ख मन्त्री ने सोचा कि यह कहीं भाग न जाय इसलिए उसकी दोनों आँखें निकलवा लीं ॥१६-१७॥ तब वह ज्ञानी भूमि के लक्षण देखने और चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गया। उसे अन्धा देखकर सभी लोग हँसी करने लगे ॥१८॥ नमक खानेवाले की कथा अब एक नमक खानेवाले की कथा सुनो। किसी गाँव का रहनेवाला मङ्गर नाम का एक वज्रमूर्ख पुरुष था। उसको किसी नागरिक मित्र ने अपने घर लेजाकर खूब स्वादिष्ट भोजन कराया ॥३९-४०॥ उस मङ्गर ने अपने मित्र से पूछा कि 'भोजन में इतना स्वाद किस कारण हुआ ? तब उसने कहा—'इसमें प्रधानता नमक की है' ॥४१॥ तब उस गँवार ने सोचा कि जब अल्प से ही इतना स्वाद है, तो क्यों न केवल नमक ही खाया जाय। ऐसा सोचकर उसने मुट्ठी-भर नमक का चूर्ण मुँह में डाक लिया और खाने लगा ॥४२॥ उस नमक के चूर्ण से उस मूर्ख के ओठ दाढ़ी और मूंछ सब मर गये और उसका श्वेत मुँह का देखकर लोगों के मुँह भी हँसी से श्वेत हो गये ॥४३॥ गाय दुहनेवाले की कथा हे प्रभो सस्याघाती की कथा तुमने सुनी। अब गौ दुहनेवाले की कथा सुनो। एक गँवार ग्वाला था। उसके पास एक गाय थी ॥४४॥ १ २

४१२ कथासरित्सागर

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४१२ कथासरित्सागर काककूर्ममृगाखूनां कथा¹ अभूत्क्वापि वनोद्देशे महाञ्छाल्मलिपादपः । उवास लघुपतीति काकस्तत्र कृतालयः ॥५८॥ स कदाचित् स्वनीडस्थो ददर्शाङ्घ्रि तरोरधः । जालगृहस्तं सलगुडं रौद्रं पुरुषमागतम् ॥५९॥ ततः स धीसखे यावत्काकस्तावद् वितत्य सः । जालं भुवि विकीर्यात्र व्रीहीञ्छन्नोऽभवत्पुमान् ॥६० ॥ तावच्च चित्रग्रीवाख्यः पारावतपतिर्भ्रमन् । तत्राजगाम नभसा पारावतशतैर्वृतः ॥६१॥ स व्रीहिप्रकरं दृष्ट्वा जालेऽत्राहारलिप्सया । पतितः पाशनिकरैर्बद्धोऽभूत्सपरिच्छदः ॥६२॥ तद्दृष्ट्वा सानुगान् सर्वांश्चित्रग्रीवो जगाद सः । गृहीत्वा चञ्चुभिर्जालं समुत्पतत वेगतः ॥६३॥ ततस्तथेति ते जालमादायोत्पत्य वेगतः । कपोता नभसा गन्तुं भीताः प्रारेभिरेऽखिलाः ॥६४॥ सोऽप्युत्थायाध्वंनुखिन्नो लुब्धकः सन्यवर्त्तत । निर्भयोऽथ जगादैतांश्चित्रग्रीवोऽनुयायिनः ॥६५॥ मममित्रस्य हिरण्यस्य मूषकस्यान्तिकं द्रुतम् । व्रजामः स इमान्पाशांश्छित्त्वाऽस्मान् मोचयिष्यति ॥६६॥ इत्युक्त्वा सोऽनुगैः साकं गत्वा तैर्जालकर्षिभिः । मूषकस्य बिलद्वारं प्राप्याकाशादवातरत् ॥६७॥ भो भो हिरण्य निर्याहि चित्रग्रीवोऽहमागतः । इत्याजुहाव तं तत्र मूषकं स कपोतराट् ॥६८॥ स श्रुत्वा द्वारमार्गेण दृष्ट्वा तं सागतं तथा । सुहृदं निर्ययावाशुस्तस्माच्छतमुखाद् बिलात् ॥६९॥


१ पञ्चतन्त्रस्य मित्रसम्प्राप्तिप्रकरणस्य मूलकथा। यथा— असाधना वित्तहीना बुद्धिमन्तः सुहृत्तमाः। साधयन्त्याशु कार्याणि काककूर्ममृगाखुवत् ॥ इत्येषा कथात्र वर्णिता॥

दशम लम्बक ८१५

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दशम लम्बक ८१५ कौआ कछुआ मृग और चूहे की कथा¹ किसी वन में एक ओर विशाल सेमल का वृक्ष था। उसमें लघुपाती नाम का एक कौआ घोंसला बनाकर रहता था ॥५८॥ किसी समय अपने घोंसले में बैठ हुए उसने वृक्ष के नीचे हाथ में जाल और लाठी लिये हुए एक भयानक पुरुष (बहेलिये) को आते देखा ॥५९॥ जबतक वह देख ही रहा था कि इतने में वह बहेलिया जाल बिछाकर और वहाँ दाने छीट कर वहीं छिप गया ॥६०॥ इतने में ही चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का सरदार, सैंकड़ों कबूतरों के साथ आकाश में भ्रमण करता हुआ उधर आ निकला ॥६१॥ जाल में फैले हुए पर्याप्त अन्न-बीजों को देखकर वह अपने साथियों के सहित उस जाल पर उतर आया और अपने साथियों के साथ ही उसमें फँस गया ॥६२॥ सब कबूतरों को फँसा हुआ देखकर उनका राजा चित्रग्रीव उनसे बोला—'तुम लोग अपनी-अपनी चोंचों से जाल को पकड़कर वेग से आकाश में उड़ चलो' ॥६३॥ उसकी आज्ञा को स्वीकार करके सभी कबूतर जाल को लेकर कुछ डरते हुए आकाश में उड़ने लगे ॥६४॥ यह देखकर घबराया हुआ वह बहेलिया ऊपर की ओर आँखें किया हुआ उठा और वहाँ से निराश लौट गया ॥६५॥ तब निर्भय होकर चित्रग्रीव ने अपने साथी कबूतरों से कहा—'चलो अपने मित्र हिरण्यक चूहे के पास चलें। वह हमारे इन जालों को काटकर हमें मुक्त कर देगा ॥६६॥ ऐसा कहकर और जाल को लेकर उड़ते हुए वे चित्रग्रीव के मित्र चूहे के बिल के पास पहुँचकर आकाश से उतरे ॥६७॥ 'ऐ हिरण्यक निकल आओ। मैं चित्रग्रीव आया हूँ। ऐसा कहकर कपोतराज ने उस चूहे को आवाज दी ॥६८॥ चूहा यह सुनकर और द्वार के मार्ग से अपने मित्र को आया हुआ देखकर, सौ मुँहवाले अपने उस बिल से बाहर निकल आया ॥६९॥

१ यहाँ से पंचतन्त्र का मित्रलाभ-प्रकरण प्रारम्भ होता है जिसका प्रारम्भ श्लोक इस प्रकार है— असाधना वित्तहीना बुद्धिमन्त सुहृत्तमाः। साधयन्त्याशु कार्याणि काककूर्ममृगाखुवत् ॥ २ पंचतन्त्र और हितोपदेश में इसका नाम लघुपतनक है।

८१० कथासरित्सागर

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८१० कथासरित्सागर सा च तस्यान्वहं धेनुं पयःपलशतं ददौ। कदाचिच्छ्वाश्रवस्तस्य प्रत्यासन्नं विलोक्यकः ॥४५॥ एकवारं ग्रहीष्यामि पयोऽस्याः प्राज्यमुत्सवे। इति मूढः स नैवैतां मासमात्रं दुदोह गाम् ॥४६॥ प्राप्तोत्सवश्च यावत्तां दोग्धि तावत्पयोऽनिशम्। स्तत्तस्याच्छिन्नमच्छिन्नं लोकस्य हसितं त्वभूत् ॥४७॥

मूर्खखल्वाटकथा

श्रुतो गोदोहको मूर्खः श्रूयतामपरापिभो। खलतिस्ताम्रकुम्भाभशिराः कश्चित्पुमानभूत् ॥४८॥ वृक्षमूलोपविष्टं तं सतृणं कश्चिदक्षत्। आगताञ्च कपित्थानि गृहीत्वा क्षुधितः पथा ॥४९॥ स कपित्थेन तत्तस्य क्रीडयाताडयच्छिरः। खलतिः सोऽपि तत्सेहे न तस्योवाच किञ्चन ॥५०॥ ततोऽन्यैः क्रमशः सर्वैः स कपित्थैरताडयत्। शिरस्तस्य स चातिष्ठत्तूष्णीं रक्ते स्रवत्यपि ॥५१॥ स च निष्पन्नतारुण्यकृतक्रीडाविचूर्णितैः। विना कपित्थैः क्षुत्क्लान्तो ययौ मूर्खयुवा ततः ॥५२॥ कपित्थैः स्वादुभिः किं न सहे घातानिति ब्रुवन्। स खल्वाटो गलद्रक्तधिरो मूर्खो ययौ गृहम् ॥५३॥ मूर्खसाम्राज्यबण्डेन पट्टेनेव भृतं शिरः। रक्तेन तस्य तद्दृष्ट्वा हसति स्म न तत्र कः ॥५४॥ एवं देवोपहास्यत्वं लोके गच्छन्त्यबुद्धयः। लभन्ते कार्यसिद्धिं च पूज्यन्ते तु सुबुद्धयः ॥५५॥ इति गोमुखतः श्रुत्वा मूर्खहासकथा इमाः। नरवाहनदत्तः समुत्थाय व्यधितार्थिकम् ॥५६॥ निशागमे पुनस्तेन नियुक्तस्त्वथोत्सुकं सः। गोमुखः कथयामास प्रज्ञानिष्ठामिमां कथाम् ॥५७॥

दशम लम्बक ८१३

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दशम लम्बक ८१३ कौआ कछुआ मृग और चूहे की कथा¹ किसी वन में एक ओर विशाल सेमर का वृक्ष था। उसमें 'लघुपती'² नाम का एक कौआ घोंसला बनाकर रहता था ॥५८॥ किसी समय अपने घोंसले में बैठ हुए उसने वृक्ष के नीचे हाथ में बास और कानी लिये हुए एक भयानक पुरुष (बहेलिये) को आते देखा ॥५९॥ जबतक वह बच ही रहा था कि इतने में वह बहेलिया जाल बिछाकर और वहाँ दाने छीट कर वहीं छिप गया ॥६०॥ इतने में ही चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का सरदार, सैकड़ों कबूतरों के साथ आकाश में भ्रमण करता हुआ उधर आ निकला ॥६१॥ जाल में फैले हुए पर्याप्त अन्न-बीजों को देखकर वह अपने साथियों के सहित उस जाल पर उतर आया और अपने साथियों के साथ ही उसमें फँस गया ॥६२॥ जब कबूतरों को फँसा हुआ देखकर उनका राजा चित्रग्रीव उनसे बोला—'तुम लोग अपनी-अपनी चोंचों से जाल को पकड़कर वेग से आकाश में उड़ चलो' ॥६३॥ उसकी आज्ञा को स्वीकार करके सभी कबूतर जाल को लेकर कुछ डरते हुए आकाश में उड़ने लगे ॥६४॥ यह देखकर घबराया हुआ वह बहेलिया ऊपर की ओर आँखें किया हुआ उठा और वहाँ से निराश लौट गया ॥६५॥ तब निर्भय होकर चित्रग्रीव ने अपने साथी कबूतरों से कहा—'चलो अपने मित्र हिरण्यक चूहे के पास चलें। वह हमारे इन जालों को काटकर हमें मुक्त कर देगा ॥६६॥ ऐसा कहकर और जाल को लेकर उड़ते हुए वे चित्रग्रीव के मित्र चूहे के बिल के पास पहुँचकर आकाश से उतरे ॥६७॥ 'ऐ हिरण्यक निकल आओ। मैं चित्रग्रीव आया हूँ। ऐसा कहकर कपोतराज ने उस चूहे को आवाज दी ॥६८॥ चूहा यह सुनकर और द्वार के मार्ग से अपने मित्र को आया हुआ देखकर, सौ मुँहवाले अपने उस बिल से बाहर निकल आया ॥६९॥ १ यहाँ से पंचतन्त्र का मित्रलाभ प्रकरण प्रारम्भ होता है जिसका प्रारम्भ श्लोक इस प्रकार है— असाधना वित्तहीना बुद्धिमन्तः सुहृत्तमाः । साधयन्त्याशु कार्याणि काककूर्ममृगाखुवत् ॥ २ पंचतन्त्र और हितोपदेश में इसका नाम लघुपतनक है।

८१२ कथासरित्सागर

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८१२ कथासरित्सागर काककूर्ममृगाखूनां कथा¹ अभूत्क्वापि वनोद्देशे महाञ्छाल्मलिपादपः । उवास लघुपातीति काकस्तत्र कृतालयः ॥५८॥ स कदाचित् स्वनीडस्थो ददर्शान्ते तरोरधः । जालहस्तं समागच्छन् रौद्रं लुब्धकमागतम् ॥५९॥ ततः स वीक्षते यावत्काकस्तावद्वितत्य सः । जालं भुवि विकीर्यात्र व्रीहींश्छन्नोऽभवत्पुमान् ॥६०॥ तावच्च चित्रग्रीवास्यः पारावतपतिर्भ्रमन् । तत्राजगाम नभसा पारावतशतैर्वृतः ॥६१॥ स व्रीहिप्रकरं दृष्ट्वा जालेऽप्याहारलिप्सया । पतितः पाशनिकरैर्बद्धोऽभूत्सपरिच्छदः ॥६२॥ तद्दृष्ट्वा चानुगान् सर्वांश्चित्रग्रीवो जगाद सः । गृहीत्वा चञ्चुभिर्जालं समुत्पतत वेगतः ॥६३॥ ततस्तथेति ते जालमादायोत्पत्य वेगतः । कपोता नभसा गन्तुं भीताः प्रारेभिरेऽखिलाः ॥६४॥ सोऽप्युत्थायोर्ध्वदृग्विघ्नो लुब्धकः समवर्तत । निर्भयोऽथ जगादैतांश्चित्रग्रीवोऽनुयायिनः ॥६५॥ मममित्रस्य हिरण्यस्य मूषकस्यान्तिकं द्रुतम् । व्रजामः स इमांश्पाशांश्छित्त्वाऽस्मान् मोचयिष्यति ॥६६॥ इत्युक्त्वा सोऽनुगैः सार्धं गत्वा तैर्जालकर्षिभिः । मूषकस्य बिलद्वारं प्राप्याकाशादवातरत् ॥६७॥ भो भो हिरण्य निर्याहि चित्रग्रीवोऽहमागतः । इत्याजुहाव तं तत्र मूषकं स कपोतराट् ॥६८॥ स श्रुत्वा द्वारमार्गेण दृष्ट्वा तं चागतं सखा । सुहृत् निर्ययावाशुस्तस्माच्छतमुखाद् बिलात् ॥६९॥ १ पञ्चतन्त्रस्य मित्रसंप्राप्तिप्रकरणस्य मूलकथा । यथा— असाधना वित्तहीना बुद्धिमन्तः सुहृत्तमाः । साधयन्त्याशु कार्याणि काककूर्ममृगाखुवत् ॥ इत्येषा कथात्र वर्णिता ॥

दशम लम्बक ८१५

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दशम लम्बक ८१५ उनके पास आकर सब वृत्तान्त पूछकर उस सहृदय चूहे ने चित्रग्रीव और उसके साथियों के जाल काट दिये ॥७० ॥ जाल कट जाने पर, अपने स्नेहपूर्ण मीठे शब्दों से चित्रग्रीव ने उस चूहे को धन्यवाद दिया और अपने अनुचरों के साथ आकाश में उड़ गया ॥७१॥ जाल में फंसे कबूतरों के पीछे आया हुआ लघुपती नाम का कौआ यह सब देख रहा था। वह बिल में गये हुए चूहे के पास आकर कहने लगा—'मैं लघुपती नाम का कौआ हूँ। तुम्हें मित्रस्नेही देखकर, विपत्ति से मित्रों का उद्धार करनेवाले तुमसे मित्रता करना चाहता हूँ ॥७२-७३॥ यह सुनकर बिल के अन्दर से ही कौए को देखकर चूहा बोला—'जा। तू मेरा भक्षक है और मैं तेरा भक्ष्य हूँ। मेरी-तेरी मित्रता कैसी? ॥७४॥ तब वह कौआ बोला—'ऐसा न कहो। तुम्हें खा लेने पर तो क्षण भर की तृप्ति होगी और तुम्हारी मित्रता में सदा के लिए रक्षा होगी ॥७५॥ इस प्रकार की बातें कहकर और शपथपूर्वक विश्वास दिलाकर कहा गया वह चूहा बिल से बाहर निकला और उस कौए ने उसके साथ मित्रता कर ली ॥७६॥ तब वह चूहा उसके लिए मांस के टुकड़े लाया और चावल के दाने भी। तब दोनों ने मिलकर वही भोजन किया और सुखपूर्वक बैठकर वार्तालाप किया ॥७७॥ एक बार वह कौआ मित्र चूहे से बोला—'मित्र, यहाँ समीप ही वन के मध्य में एक नदी है। उस नदी में मेरा मित्र मन्थर नाम का कछुआ है। उसके लिए मैं वहाँ जा रहा हूँ। वहाँ मेरे लिए आमिष-भोजन सुलभ है ॥७८-७९॥ यहाँ रहने से मांस का आहार पाकर भी मुझे बहेलियों का भय सदा ही बना रहता है। ऐसा कहते हुए कौए से चूहा बोला ॥८० ॥ 'यदि ऐसा है, तो हम लोग साथ ही रहेंगे। मुझे भी यहाँ से कुछ वैराग्य हो गया है। इसका कारण वहीं चलकर कहूँगा ॥८१॥ वह लघुपती कौआ इस प्रकार कहते हुए हिरण्यक को अपनी चोंच में लेकर आकाश में उड़ गया और उसे उस वन-नदी के तीर पर ले गया ॥८२॥ वहाँ अपने मित्र मन्थर से मिलकर, और उसका आतिथ्य स्वीकार करके चूहे के साथ वह वहीं रहने लगा ॥८३॥ बातचीत के प्रसंग में कौए ने अपने आने का कारण उसे बताया और हिरण्यक चूहे की मित्रता के कारण भी उस कछुए से कहा ॥८४॥

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उपेत्य पृष्ट्वा वृत्तान्तं सम्भ्रमात् सोऽपि मूषकः। पारावतपतेः पाशान् सानुगस्याच्छिनत् सुहृद् ॥७०॥ छिन्नपाशस्तमामन्त्र्य मूषकं वचनेः प्रियैः। चित्रग्रीवः समुत्पत्य ययौ सोऽनुचरैः सह ॥७१॥ अन्वागतः स काकोऽत्र लघुपाती विलोक्य तत्। बिलप्रविष्टं तद्द्वारमागत्योवाच मूषकम् ॥७२॥ लघुपातीति काकोऽहं दृष्ट्वा त्वां मित्रवत्सलम्। मित्रत्वाय वृणोमीदृग्विषदुद्धरणक्षमम् ॥७३॥ तच्छ्रुत्वाऽभ्यन्तराद्दृष्ट्वा मूषकस्तं स वायसम्। जगाद गच्छ का मैत्री भक्ष्यभक्षकयोरिति ॥७४॥ तत स वायसोऽप्यावीच्छान्तं भुक्ते मम त्वयि। तृप्तिः क्षण स्यान्मित्रं तु शश्वज्जीवितरक्षणम् ॥७५॥ इत्याद्युक्त्वा सशपथं कृत्वादश्वासं च तेन सः। निर्गतेनाकरोत्सख्यमाशुना सह वायसः ॥७६॥ स मांसपक्षीरान्नेपीदास क्षालिकजानपि। एकत्र सह भुञ्जातौ तस्थातुस्तावूभी सुखम् ॥७७॥ एकदा स च काकस्तं मित्रं मूषकमब्रवीत्। इतोऽविदूरे मित्रास्ति वनमध्यगता नदी ॥७८॥ तस्यां मन्थरको नाम कूर्माऽस्ति सुहृन्मम। तदहं यामि तत्स्थानं सुप्रापामिषभाजनम् ॥७९॥ कृच्छ्रात्प्राप्य इहाहारो नित्यं व्याधभयं च मे। इत्युक्तवन्तं तं काकं मूषकोऽपि जगाद सः ॥८०॥ : सहव तर्हि वह्स्यामो नय तत्रैव मामपि। ममाप्यस्तीह निर्वेदो यस्य सत्रव तं च ते ॥८१॥ इति वादिनमादाय चञ्च्वा तं स हिरण्यकम्। सप्रभा लघुपाती तद्ययौ वननदीतटम् ॥८२॥ मिलित्वा सह कूर्मेण तेन मन्थरेण च। कृतातिथ्येन मित्रण स तस्थौ मूषकन्वितः ॥८३॥ शशंस च कूर्माय तस्मै स्वागमकारणम्। हिरण्यकप्रवृत्तान्तप्रयुक्तं वायः शशंस च ॥८४॥

दशम लम्बक ८१७

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दशम लम्बक ८१७ तब मन्थर ने भी कौए से प्रशंसित चूहे से मित्रता करके उससे अपने स्थान से वैराग्य होने का कारण पूछा ॥८५॥ तब उन दोनों के सुनते रहने पर हिरण्यक चूहे ने अपना वृत्तान्त इस प्रकार उनसे कहा ॥८६॥ हिरण्यक चूहा और संन्यासी की कथा एक बार मैं नगर के समीप बड़े बिल में रहता था। वहाँ रहता हुआ मैं राजा के भवन से एक हार ले आया और उसे अपने बिल में रख दिया ॥८७॥ उस हार को देख-देखकर बड़े हुए बलवाले मुझे अन्न लाने में समर्थ जानकर दूसरे चूहों ने घेर लिया ॥८८॥ इसी बीच मेरे बिल के पास एक संन्यासी मठ बनाकर रहने लगा। वह विभिन्न प्रकार के भोजन भिक्षा करके लाता था ॥८९॥ वह भिक्षु, भोजन से बचे हुए अन्न को प्रात:काल खाने के लिए एक झोली में डालकर एक खूँटी में लटका देता था ॥९०॥ उसके सोये रहने पर मैं बिल के मार्ग से उसके अन्दर घुसकर और ऊँचे उछल-उछल कर प्रत्येक रात में उसका भोजन समाप्त कर देता था ॥९१॥ एक दिन उसके यहाँ उसका एक मित्र संन्यासी आ गया। वह संन्यासी अपने मित्र से बातचीत करने लगा ॥९२॥ तब तक अन्न खाने के लिए मेरे वहाँ पहुँचने पर वह संन्यासी फटे हुए बाँस का एक टुकड़ा लेकर और कान लगाकर उस भिक्षा के पात्र को वह बार-बार बजाने लगा ॥९३॥ बीच में बात को काटकर 'यह तुम क्या करते हो' इस प्रकार आये हुए मित्र द्वारा पूछे जाने पर वह संन्यासी उससे बोला—॥९४॥ 'यहाँ एक चूहा मेरा शत्रु हो गया है जो दूर ऊपर लटकाये हुए अन्न को भी उछल उछलकर यहाँ से ले जाता है ॥९५॥ इस फटे बाँस से अन्न के बरतन को बार-बार बजाकर मैं उसे डराता हूँ। इस प्रकार, कहते हुए उस साधु से दूसरा साधु बोला—'लोभ प्राणियों के लिए महान् हानिकारक है। इस विषय में कथा सुनो। मैं एक बार तीर्थों का भ्रमण करता हुआ एक नगर में गया ॥९६-९७॥ १ ३

८१६ कथासरित्सागर

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८१६ कथासरित्सागर ततः स कूर्मस्तं कृत्वा मित्रं वायससंस्तुतम्। दत्तनिर्वासनैर्वेदहेतुं पप्रच्छ मूषकम्॥८५॥ ततो हिरण्यः स तयोरुभयोः काककूर्मयोः। शृण्वतोर्निजवृत्तान्तकथामृतामवर्णयत् ॥८६॥ मस्करीमूषकयोः कथा अहम् महाबिले तत्र नगरासन्नवर्तिनि। वस राजकुलाद्भारमानीयास्थापयं निधिम्॥८७॥ दृश्यमानेन हारेण तेन जातोर्जस च माम्। समर्थमन्नाहरणे मूषकाः पर्यवारयन्॥८८॥ अत्रान्तरे च तत्रासीत्कश्चिद्वस्मठिकान्तिके। परिव्राण्मठिकां कृत्वा नानाभिक्षान्नवृत्तिकः॥८९॥ स भुक्तशेषं भिक्षान्नं नक्तं स्थापयति स्म तत्। भिक्षाभाण्डस्थमुल्लम्ब्य शङ्कौ² प्रातर्जिघत्सया ॥९०॥ सुप्तस्यात्र च तस्याहं बिलेनान्तः प्रविश्य तत्। दत्तोर्ध्वंक्रम्यो¹ निशीथमनद्य प्रतियामिनि॥९१॥ कदाचित्सम तस्यागारमुहूर्त् प्रव्राजकोऽपरः। मुक्तोत्तरं समं तेन कथां रात्रौ स चाकरोत्॥९२॥ तावन्नेतुं प्रवृत्तश्च मयि जर्जरकण सः। प्रप्राड्व्वादयहस्तकंस्तद्भाण्डं मुहू॥९३॥ कथाभान्तिश्च किमिदं करोषीति स तेन च। आगन्तुना परिव्राजा पृष्टः प्रवाद तमब्रवीत्॥९४॥ इह मे मूषकः शत्रुरुपद्रोऽद्य सदब यः। अपि दूरस्थमुत्प्लुत्य नयत्यन्नमितो मम॥९५॥ तं त्रासयामि यस्त्यञ्जर्जरेणाश्मभाजनम्। इत्युक्तवन्तं प्रव्राजं परिव्राट सोऽभ्रगोऽब्रवीत्॥९६॥ लोभो नामैष जन्तूनां दोषायात्र कथां शृणु। तीर्थान्यहं भ्रमन् प्रापमेकं नगरमेकदा॥९७॥ १ लोहरीमके सम्बन्धित्वा । २ प्रातःखादितुमिच्छया । ३ कर्दभं कृत्वा ।

षष्ठम लम्बक ८१९

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षष्ठम लम्बक ८१९ वहाँ निवास के लिए एक ब्राह्मण के घर पहुँचा। मेरे बैठने पर वह ब्राह्मण अपनी पत्नी से बोला-॥१९८॥ 'आज पर्व का दिन है इसलिए ब्राह्मण के लिए खिचड़ी पकाओ। तब उसकी पत्नी ने कहा 'तुम दरिद्र के यहाँ यह कहाँ ? यह सुनने पर उस ब्राह्मण ने पत्नी से फिर कहा- 'प्रिये संग्रह करने पर भी अत्यन्त संग्रह करने की बुद्धि नहीं करनी चाहिए। इस विषय में कथा सुनो' ॥१९-१ ॥ कहीं जंगल में एक बहेलिया शिकार करके मांस लिये हुए धनुष-बाण चढ़ाकर एक सूअर की ओर झपट पड़ा ॥१ १॥ और, बाण से आहत सूअर के डाढ़ के आघात से वह स्वयं भी मर गया। दूर से एक सियार यह सब देख रहा था ॥१ २॥ वह वहाँ आया और भूखा होने पर भी भोजन का संग्रह करने की दृष्टि से उसने सूअर, बहेलिया आदि के प्रचुर परिमाणवाले मांसों को उसने नहीं चखा। उसने पहले धनुष में लगी चमड़े की डोरी को ही खाना प्रारम्भ किया। उसी समय धनुष के हिलने से उससे छूटे हुए बाण से वह स्वयं बिंधकर मर गया। इसलिए, अति संग्रह न करना चाहिए। ब्राह्मण ने इस प्रकार कहने पर, उसकी पत्नी ने तिलों को सूखने के लिए धूप में रख दिया। तब उसके घर के भीतर चले जाने पर कुत्ते ने उसमें मुँह डालकर उन तिलों को भ्रष्ट कर दिया। तब उन तिलों को मूल्य देकर भी किसी ने नहीं खरीदा ॥१ ३-१ ६॥ 'इसलिए, लोभ से मोह नहीं किया जा सकता। वह तो केवल कष्ट देने के लिए ही होता है। ऐसा कहकर आये हुए साधु ने उस साधु से कहा- 'तुम्हारे पास कुदाल हो तो मुझे दो। मैं आज ही तुम्हारे चूहे के इस उपद्रव को दूर करता हूँ'। यह सुनकर मठ-निवासी साधु ने उसे कुदाल लाकर दी और छिपा हुआ मैं अपने बिल में घुस गया ॥१ ७ -१ ९॥ तब उस कुदाल को लेकर उस दुष्ट आगन्तुक साधु ने मेरे आने-जाने के बिल को खोदना प्रारम्भ किया। मेरे भाग जाने पर उस दुष्ट ने क्रमशः जहाँतक खोद डाला जहाँतक वह हार और अन्य धन-संग्रह उसे मिला। 'देखो मित्र इसी धन के तेज से इस चूहे को इतना बल था कि उछलकर वह तुम्हारा भोजन खाता था। ऐसा उसने मठवासी साधु से कहा और मैं सुन रहा था ॥११०-११२॥