BharatKosha
Back to the archive

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

१६४ कथासरित्सागर

Page 189Permalink

१६४ कथासरित्सागर नक्तं च तत्र संयम्य दत्तघासौ हयावुभौ । मन्त्रिद्वितीयो वासार्थमारुरोह महातरुम् ॥४२॥ तस्योरुशाखासविष्टो वित्रस्तहयहर्षिते । प्रबुद्धः सोऽन्तराधस्तादपश्यत् सिंहमागतम् ॥४३॥ दृष्ट्वा त्रातितितीर्षुं तमवतार्ये गोमुखोऽब्रवीत् । अहो देहानपेक्षं संभ्रमेणैव चेष्टसे ॥४४॥ शरीरमूला हि नृपा मन्त्रमूला च राजता । युयुत्ससे तत्तिर्यङ्मर्मखण्डदंष्ट्रायुधैः कथम् ॥४५॥ एतद्रक्षार्थमेवावामिहारूढौ हि सम्प्रति । इति गोमुखवागुढो युवराजः स सल्लम्रम् ॥४६॥ सिंहं तं तुरगं घ्नन्तं दृष्ट्वा छुरिकया द्रुतम् । आजघान नरो पृष्ठोत् क्षिपत्या स निमग्नया ॥४७॥ स तथा तेन विद्धोऽपि तं हत्वैव हयं बली । सिंहो व्यापादयामास द्वितीयमपि वाजिनम् ॥४८॥ ततो वत्सेश्वरसुतः खड्गमादाय गोमुखात् । तेन क्षिप्तेन मध्ये तं सिंहं द्वेधा चकार सः ॥४९॥ अवतीर्य च सगृह्य कृपाणीं सिंहदहृतः । खड्गं चारुह्य सोऽत्रैव वृक्षे रात्रिमथास ताम् ॥५०॥ प्रातस्ततोऽवतीर्णश्च प्रतस्थे गोमुखान्वितः । मरणाहनदत्तांस्तस्तां स कर्पूरिकां प्रति ॥५१॥ अथ पद्भ्यां प्रयान्तं तं सिंहेन हतवाहनम् । दृष्ट्वा विनोदयन्नेवमुवाच पथि गोमुखः ॥५२॥ इन्दीवरसेनानिच्छासेनयोः कथा येव प्रासङ्गिकामेतां कथामान्यामि ते शृणु । अस्तीहैरावती नाम नगरी विजितालका ॥५३॥ तस्यामभूत् परित्यागसेनो नाम महीपतिः । बभूवतुश्च तस्य द्वे देव्यौ प्राणसमे प्रिये ॥५४॥ एका स्वर्मश्रिततया नाम्नोऽधिकसङ्गुमा । नाम्ना तु काव्यालङ्कारा द्वितीया राजलक्षण ॥५५॥

सप्तम लम्बक १६५

Page 190Permalink

सप्तम लम्बक १६५ रात को वहाँ घोड़ों को घास देकर और वृक्ष के नीचे बाँधकर गोमुख के साथ सोने के लिए बड़े पेड़ पर चढ़ा ॥४२॥ उसकी विशाल शाखा पर सोये हुए उसने डरे हुए घोड़ों की हिनहिनाहट से जागकर नीचे आये हुए एक सिंह को देखा ॥४३॥ उसे देखकर घोड़ों की रक्षा के लिए नीचे उतरने को उद्यत युवराज को देखकर गोमुख बोला- शरीर का ध्यान न करके और मुझसे सम्मति भी न करके तुम उतरने की चेष्टा कर रहे हो। राजा का मूल शरीर है और वही राज्य का मूल मन्त्र है। तुम मनुष्य होकर नख और दाँतोंवाले पशुओं से युद्ध करने के लिए क्यों तैयार हो रहे हो? इसी शरीर की रक्षा के लिए हम दोनों इस समय वृक्ष पर चढ़े हुए हैं। गोमुख की इन बातों से युवराज रुक गया ॥४४-४६॥ घोड़े को मारते हुए शेर पर उसने ऊपर से ही छुरी मारी और वह छुरी सिंह के शरीर में धँस गई ॥४७॥ छुरी से मारे जाने पर भी सिंह ने उस घोड़े को मारकर दूसरे घोड़े को भी मार डाला ॥४८॥ तब वत्सेश्वर-पुत्र युवराज ने गोमुख से तलवार लेकर उसे ऊपर से ही फेंककर शेर के दो टुकड़े कर दिये। और नीचे उतरकर सिंह के शरीर से तलवार खींचकर और फिर वृक्ष पर चढ़कर उसने वह रात बिताई ॥४९-५०॥ प्रातःकाल वृक्ष से उतरकर नरवाहनदत्त गोमुख के साथ कर्पूरिका की ओर चल पड़ा ॥५१॥ शेर के द्वारा वाहनों के मारे जाने के कारण पैरों से ही चलते हुए नरवाहनदत्त का मनोरंजन करने के लिए गोमुख ने मार्ग में कहा-॥५२॥ इन्दीवरसेन और अनिश्चयसेन की कथा 'स्वामी ! मैं इस समय के प्रसंग में तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ। उसे सुनो इस पृथ्वी पर अपने सौन्दर्य से अलका (कुबेरनगरी) को जीतनेवाली शरावती नाम की एक नगरी है। उस नगरी में परितोषसेन नाम का राजा था उसकी प्राणों के समान प्यारी दो रानियाँ थीं ॥५३-५४॥ उनमें से एक अधिकप्रभा नाम की राजा के मन्त्री की कन्या थी और दूसरी सांध्यालङ्कारा किसी राजवंश की कुमारी थी ॥५५॥

१६६ कथासरित्सागरः

Page 191Permalink

१६६ कथासरित्सागरः ताभ्यां समं च सोऽपुत्रो राजा पुत्रार्थमम्बिकाम्। आराधयन्निराहारो दर्भशायी व्यधातपः॥५६॥ ततः सा तं तपस्तुष्टा स्वप्ने दत्त्वा फलद्वयम्। दिव्यं समादिशत् साक्षाद् भवानी भक्तवत्सला ॥५७॥ उत्तिष्ठ देहि दारभ्यो मह्यमेतत्फलद्वयम्। ततो राजन् प्रवीरो ते जनिष्येते सुतावुभौ ॥५८॥ इत्युक्त्वान्तर्दधे गौरी प्रबुद्धः स च भूपतिः। ननन्द प्रातरुत्थाय हस्ते पश्यञ्छुभे फले ॥५९॥ स्वप्नेन तेन जानन्त्य वर्मिसेन परिग्रहम्। स्नातो मृडानीमभ्यर्च्य चकार व्रतपारणम् ॥६०॥ नक्तं चोपैत्य तां पूर्वं राज्ञीमधिकसङ्गमाम्। फलमेकं ददौ तस्यै सा च तत् क्षुभुजे ततः॥६१॥ ततस्तन्मन्दिरे तस्यामुवास स नृपो निशि। तत्पितुर्मन्त्रिमुरव्यस्य निजस्य किल गौरवात् ॥६२॥ तच्चात्र निषधे सम्प्रत्यात्मशय्याशिरोऽन्तिके। द्वितीयस्याः कृते देव्याः द्वितीयं कल्पितं फलम् ॥६३॥ सुप्तस्याथ नृपस्याथ राज्ञी साधिकसङ्गमा। उत्थायात्मन एव द्वाविच्छन्ती सदृशौ सुतौ ॥६४॥ धीरौत्साहाद् भक्षयामास द्वितीयमपि तत्फलम्। निसर्गसिद्धा नारीणां सपत्नीषु हि मत्सरः॥६५॥ प्रातःश्चोत्थाय चिन्वान तत्फलं सं महीपतिम्। मयैवं तत्फलं भुक्तं द्वितीयमिति साऽब्रवीत् ॥६६॥ तत श्च राजा विमना निर्गत्यातीत्य वासरम्। मत्वा तस्या द्वितीयस्या देव्या वासगृहं ययौ ॥६७॥ तत्र तत्पृच्छते तां याजमानां च सोऽब्रवीत्। भुजस्व म तन्त्यन्तात् सपत्नी ते छलारिति ॥६८॥ ततः सा तनयोत्पत्तिहेतुमप्राप्य तत्फलम्। बभूव बाष्पसंरुरवा राज्ञी तूष्णीं गुरुश्रिया ॥६९॥ गच्छत्स्वेव दिनेष्वेव राज्ञी गार्भधुरोद्वहा। गर्भाभूसुताव... का... द्वौ युगलौ सुतौ ॥७०॥

सप्तम लम्बक १५७

Page 192Permalink

सप्तम लम्बक १५७ वह राजा उन दोनों रानियों के साथ पुत्र प्राप्ति की कामना से पार्वती अम्बिका की आराधना करता हुआ निराहार रहकर और कुशा पर सोकर तपस्या करने लगा ॥५६॥ उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भक्तवत्सला भवानी ने उसे स्वप्न में स्वयं दर्शन देकर और दो फल देकर आज्ञा दी—'उठो ! अपनी स्त्रियों को ये दो फल खाने के लिए दो। इसके प्रभाव से हे राजन् ! उन दोनों के दो पुत्र उत्पन्न होंगे ॥५७-५८॥ ऐसा कहकर गौरी अन्तर्हित हो गई। राजा उठा और प्रातःकाल दोनों हाथों में दो फल देखकर प्रसन्न हुआ । राजा ने स्वप्न के समाचार से उन दोनों रानियों को आनन्दित किया और स्नान पूजन आदि करके व्रत का पारण किया ॥५९ १/२ ॥ रात को राजा ने अधिकसंगमा रानी के महल में जाकर उसे फल दिया और उसने उसे खा लिया ॥६१॥ राजा के मुख्य मन्त्री की कन्या होने के गौरव के कारण राजा उस रात को उसी रानी के पास रह गया और दूसरी रानी के लिए रखे हुए फल को सिरहाने रख दिया । राजा के सोये रहने पर रानी अधिकसंयमा ने उठकर एक साथ दो समान पुत्रों की इच्छा से उस दूसरे फल को भी ऊपर के भाग के पास से खा लिया। स्त्रियों का सौतों के प्रति द्वेष स्वाभाविक ही होता है ॥६२ १/२॥ सबेरे उठकर उस फल को खोजते हुए राजा से उसने कहा कि 'वह दूसरा फल भी मैंने ही खा लिया' ॥६६॥ तब दुःखित मनवाला राजा उसके महल से निकलकर और राजकार्यों में दिन बिताकर रात को दूसरी रानी के भवन में गया ॥६७॥ वहाँ उस रानी के फल माँगने पर राजा ने कहा कि 'मेरे सोय रहने पर तुम्हारी सौत ने छल से उस फल को भी खा लिया ॥६८॥ तब वह रानी कान्तालंकारा पुत्र की उत्पत्ति के कारणभूत उस फलको न पाकर अत्यन्त दुःखी होकर चुप रही ॥६९॥ कुछ समय व्यतीत होने पर वह रानी अधिकसंगमा गर्भवती हुई और दसवें महीने उसने एक साथ दो बालक उत्पन्न किये ॥७० ॥

१६६ कथासरित्सागर

Page 193Permalink

१६६ कथासरित्सागर ताभ्यां समं च सोऽपुत्रो राजा पुत्रार्थमम्बिकाम्। भाराधयन्निराहारो धर्मशाली व्यषात्तपः ॥५६॥ तत सा च तपस्तुष्टा स्वप्ने दत्त्वा फलद्वयम्। दिव्यं समादिशत् साक्षाद् भवानी भक्तवत्सला ॥५७॥ उत्तिष्ठ देहि दारेभ्यो भक्ष्यमेतत्फलद्वयम्। ततो राजन् प्रवीरो त जनिष्येत सुतावुभौ ॥५८॥ इत्युक्त्वान्तर्दधे गौरी प्रबुद्धः स च भूपतिः। ननन्द प्रातरुत्थाय हस्ते पश्यञ्छुभे फले ॥५९॥ स्वप्नेन तेन चानन्दं वर्णितेन परिग्रहम्। स्नातो मृडानीमभ्यर्च्य चकार व्रतपारणाम् ॥६०॥ नक्तं चोपेत्य तां पूर्वं राज्ञीमधिकसङ्गमाम्। [L13: फलमेकं ददौ तस्यै सा च तद् बुभुजे तदा ॥६१॥ ततस्तन्मन्दिरे तस्यामुवास स नृपो निशि। तत्पितुर्मन्त्रिमुल्यस्य निजस्य किल गौरवात् ॥६२॥ तच्चात्र निदधे सम्प्रत्यात्मशय्याशिरोऽन्तिके। द्वितीयायाः कृते देव्या द्वितीयं कल्पितं फलम् ॥६३॥ सुप्तस्याथ नृपस्याथ राज्ञी साधिकसङ्गमा। उत्थायात्मन एव द्रागिच्छन्ती सदृशौ सुतौ ॥६४॥ धीपन्ताद् भक्षयामास द्वितीयमपि तत्फलम्। निमग्नमिश्रा नारीणां सपत्नीषु हि मत्सरः ॥६५॥ प्रातश्चोत्थाय चिन्वानं तत्फलं तं महीपतिम्। मयैव तत्फलं भुक्तं द्वितीयमिति साऽब्रवीत् ॥६६॥ ततः स राजा विमना निगत्यातीर्य वासरम्। भक्त्या तस्या द्वितीयाया देव्या वासगृहं ययौ ॥६७॥ तत्र तत्फलवार्त्तां तां याचमानां च सोऽब्रवीत्। सृजत्य मे सपत्न्यानात् सपत्नी त छलादिति ॥६८॥ मत मा तनयोत्पत्तिहेतुमप्राप्य तत्फलम्। बभूव बाष्पसम्पूर्णा रात्री तूष्णीं मुदु स्थिता ॥६९॥ [L30: गच्छतात्यल्प निष्पन्न गर्भो मार्जधिवमद्भुता। गर्भाभिमूद्भूताय कान्ते द्वौ युगपत् सुतौ ॥७०॥

सप्तम लम्बक १६७

Page 194Permalink

सप्तम लम्बक १६७ वह राजा उन दोनों रानियों के साथ पुत्र प्राप्ति की कामना से पार्वती अम्बिका की आराधना करता हुआ निराहार रहकर और कुशा पर सोकर तपस्या करने लगा ॥५६॥ उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भक्तवत्सला भवानी ने उसे स्वप्न में स्वयं दर्शन देकर और दो फल देकर आज्ञा दी—'उठो ! अपनी स्त्रियों को ये दो फल खाने के लिए दो। इसके प्रभाव से हे राजन् ! उन दोनों के दो पुत्र उत्पन्न होंगे ॥५७-५८॥ ऐसा कहकर गौरी अन्तर्हित हो गई। राजा उठा और प्रातःकाल दोनों हाथों में दो फल देखकर प्रसन्न हुआ। राजा ने स्वप्न के समाचार से उन दोनों रानियों को आनन्दित किया और स्नान पूजन आदि करके व्रत का पारण किया ॥५९-६०॥ रात को राजा ने अधिकतुंगमा रानी के महल में जाकर उसे फल दिया और उसने उसे खा लिया ॥६१॥ राजा के मुख्य मन्त्री की कन्या होने के गौरव के कारण राजा उस रात को उसी रानी के पास रह गया और दूसरी रानी के लिए रखे हुए फल को सिरहाने रख दिया। राजा के सोये रहने पर रानी अधिकतुंगमा ने उठकर एक साथ दो समान पुत्रों की इच्छा से उस दूसरे फल को भी ऊपर के भाग के पास से खा लिया। स्त्रियों का सौत के प्रति द्वेष स्वाभाविक ही होता है ॥६२ ६५॥ सबेरे उठकर उस फल को खोजते हुए राजा से उसने कहा कि 'वह दूसरा फल भी मैंने ही खा लिया' ॥६६॥ तब दुःखित मनवाला राजा उसके भवन से निकलकर और राजकार्यों में दिन बिताकर रात को दूसरी रानी के भवन में गया ॥६७॥ वहाँ उस रानी के फल माँगने पर राजा ने कहा कि 'मेरे सोये रहने पर तुम्हारी सौत ने छल से उस फल को भी खा लिया' ॥६८॥ तब वह रानी काष्ठालंकारा पुत्र की उत्पत्ति के कारणभूत उस फलको न पाकर अत्यन्त दुःखी होकर चुप रही ॥६९॥ कुछ समय व्यतीत होने पर वह रानी अधिकतुंगमा गर्भवती हुई और दसवें महीने उसने एक साथ दो बालक उत्पन्न किये ॥७०॥

१६८ कथासरित्सागर

Page 195Permalink

१६८ कथासरित्सागर राजापि स तदुत्पत्तिफलितस्वमनोरथः । नन्दति स्म परित्यागसेनः कृतमहोत्सवः ॥७१॥ तयोश्च सुतयोर्ज्येष्ठमिन्दीवरनिभेक्षणम् । नाम्नेन्दीवरसेनं स नृपश्चक्रेऽमृताकृतिम् ॥७२॥ विषमेण कनीयांसमनिच्छासेनमाख्यया । तज्जनन्यै यतो भुक्तं फलं तत्तदनिच्छया ॥७३॥ अथात्र तस्य राज्ञी सा द्वितीया भूमिपस्य तत् । आलोक्य काष्र्ण्यालङ्कारा सामर्षं समचिन्तयत् ॥७४॥ अहो अहं सुतप्राप्तौ सपत्न्या वञ्चितैतया । तत्तस्या मयाऽवश्यं कार्या मन्युप्रतिक्रिया ॥७५॥ विनाश्यौ तनयावेतावेतदीयो स्वयुक्तितः । इति सञ्चिन्त्य सा तस्थौ तदुपायं विचिन्वती ॥७६॥ यथा यथा च तौ तत्र व्यवृधाते नृपात्मजौ । तथा तथास्या ववृधे हृदये वैरपादपः ॥७७॥ क्रमेण यौवनस्थौ च तौ विज्ञापयतः स्म तम् । राजपुत्रौ स्वपितरं जिगीषू भुजशालिनौ ॥७८॥ अस्त्रेषु शिक्षितौ तावद्यावां सम्प्राप्तयौवनौ । सद्भुजान् विफलानेतान् विभ्रतौ कथमस्वाहे ॥७९॥ क्षत्रियस्याजिगीषोस्य धिग्बाहुं धिक् च यौवनम् । अतोऽनुजानीह्यधुना तात दिग्विजय्याय नौ ॥८०॥ इति सून्वोर्वचः श्रुत्वा राजा हृष्टोऽनुमन्य सः । यात्रारम्भं परित्यागसेनो व्यदधे तयोः ॥८१॥ यच्चैतन्महद् जातं युवयोः स्यात्तदम्बिका । स्मर्तव्याऽर्तिहरा देवी तया दत्तौ हि मे युवाम् ॥८२॥ इत्युक्त्वा च स तौ राजा यात्रायै प्राहिणोत्सुतौ । युक्तौ सैन्यै रथामात्यैर्जनन्यै कृतमङ्गलौ ॥८३॥ निजं मन्त्रिप्रधानं च पश्चात्तातस्तयोस्तदा । प्रणामाहार्यं व्यसृजद्धाम्ना प्रथमसङ्गतम् ॥८४॥ अथ तौ राजपुत्रौ द्वौ सबलौ भ्रातरौ व्रजन्न् । गत्वा प्राचीं दिशं पूर्वं जिग्यतुः प्राज्यविक्रमौ ॥८५॥

सप्तम लम्बक १९९

Page 196Permalink

सप्तम लम्बक १९९ राजा भी उनकी उत्पत्ति से सफलमनोरथ होकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने महान् उत्सव किया ॥७१॥ राजा ने उन दोनों में से कमल के समान नेत्रवाले तथा अद्भुत आकृतिवाले बड़े पुत्र का नाम इन्दीवरसेन रखा ॥७२॥ और, दूसरे छोटे पुत्र का नाम अनिच्छासे न रखा क्योंकि उसके लिए उसकी माता ने राजा की इच्छा के विरुद्ध फल खा लिया था ॥७३॥ तदनन्तर राजा की दूसरी रानी काव्यालङ्कारा यह देखकर क्रोध से भरी हुई सोचने लगी—॥७४॥ ओह ! मेरी इस सौत ने मुझे पुत्र-प्राप्ति से वंचित कर दिया है। इसलिए, इस क्रोध का बदला मुझे अवश्य लेना चाहिए ॥७५॥ अपनी युक्ति से इसके दोनो लड़कों का विनाश करना चाहिए। ऐसा सोचकर वह अवसर की प्रतीक्षा में उपाय सोचती हुई चुप बैठी रही ॥७६॥ जैसे-जैसे राजा के वे दोनो बालक बढ़ते गए, वैसे ही वैसे उसका क्रोध-रूपी वृक्ष भी बढ़ता रहा ॥७७॥ क्रमशः यौवन अवस्था में आये हुए बलशाली वे दोनों राजकुमार, दिग्विजय की इच्छा से अपने पिता के पास आकर बोले—॥७८॥ महाराज ! हम लोग अस्त्र-शस्त्र विद्या में शिक्षित हो गये और युवावस्था में प्राप्त हो गये तो हम इन निष्फल भुजाओं को लेकर व्यर्थ क्यों बैठें ? विजय की इच्छा न रखनेवाले क्षत्रिय की भुजाओं को और उनके यौवन को धिक्कार है । इसलिए, पिताजी ! हम दोनों को दिग्विजय-यात्रा के लिए आज्ञा प्रदान करें ॥७९-८०॥ कुमारों की बातों को सुनकर राजा प्रसन्न हुआ उसे स्वीकार किया और उनकी दिग्विजय-यात्रा की तैयारी की और उनसे कहा कि 'तुम्हें जब कभी संकट का सामना करना पड़े तब कष्टहारिणी माता अम्बिका का स्मरण करना। तुम दोनों उसी अम्बिका के दिये हुए हो' ॥८१-८२॥ ऐसा कहकर राजा ने सेना सामन्त आदि के साथ उन दोनो को विजय-यात्रा के लिए भेज दिया। अपने वृद्ध प्रधान मन्त्री और उन कुमारो के मामा प्रथममयस को भी परामर्श आदि देने के लिए साथ भेज दिया। उनकी माता ने प्रस्थान के समय मंगलाचरण किया ॥८३-८४॥ उन दोनों बलवान् भाइयों ने पहले पूर्व दिशा में जाकर दिग्विजय किया ॥८५॥ २२

१७० कथासरित्सागर

Page 197Permalink

१७० कथासरित्सागर ततोऽप्रतिहतौ वीरौ मिलितानेकपाथिवौ । जेतुं सिद्धप्रतापौ तौ जग्मतुर्दक्षिणां दिशम् ॥८६॥ तां च वार्तां तयोः श्रुत्वा पितरौ तौ ननन्दतुः । प्रज्वलापरमाता तु सान्तर्विद्वेषवह्निना ॥८७॥ एताभ्यां भुजदर्पेण पृथ्वीं जित्वा निहत्य माम् । राज्यं मदीयं स्वीकृतुं मत्पुत्राभ्यां विचिन्तितम् ॥८८॥ तद्यद्य मयि भक्ताश्चेदेतावत्र मत्सुतौ । अविचार्यैव युष्माभिनिहन्तव्यावुभावपि ॥८९॥ इति तत्कटकस्थेभ्यः सामन्तेभ्यस्ततः शठा । राजादेशं तथा रात्री तन्नाम्नेवाभिलिख्य सा ॥९०॥ सन्धिविग्रहकायस्थेनाहृतेनार्थसञ्चयैः । उपांशु काष्ठालङ्कारा व्यसृजल्लेखहारकम् ॥९१॥ स च गुप्तं तयोर्गत्वा कटकं राजपुत्रयोः । सामन्तेभ्यो ददौ तेभ्यस्तांल्लेखांल्लेखहारकः ॥९२॥ ते वाचयित्वा तान् सर्वे राजनीतिं सुकर्कशाम् । विचिन्त्य तां प्रभोराज्ञामनुलङ्घयामवेक्ष्य च ॥९३॥ रात्रौ मिलित्वा सम्मन्त्र्य निहन्तुं तौ नृपात्मजौ । विवक्षां निश्चयं चक्रुस्तद्गुणावर्जिता अपि ॥९४॥ तच्च बुद्ध्वैव तन्मध्यादेकस्य सुहृदो मुखात् । तौ स मातामहः मन्त्री राजपुत्रौ सह स्थितः ॥९५॥ बोधयित्वा यथातत्त्वमारोप्य वरवाजिनोः । अपसारितवान् गुप्तं तत्कालं कटकात्ततः ॥९६॥ तेनापसारितौ तौ च व्रजन्तौ निशि तद्रुतौ । विन्ध्याटवीं विविशतुर्मार्गाज्ञानान्नृपात्मजौ ॥९७॥ तत्र रात्रावतीतायां प्रभात् प्रत्यम्यतोस्तयोः । मध्याह्ने वितृषाशान्तौ हयी पञ्चत्वमापतुः ॥९८॥ स च मातामहो वृद्धः शुशुचाणुकवालुकः । व्यपद्यतातपक्लान्तो नान्तयोः पश्यतस्तयोः ॥९९॥ अनागसौ कथं पित्रा गमितौ स्वो दशांमिमाम् । गतामा कुर्वता शौ तौ दुष्टामपरमातरम् ॥१००॥

सप्तम लम्बक १७१

Page 198Permalink

सप्तम लम्बक १७१ तब अप्रतिहत शक्तिवाले दोनों वीर अनेक राजाओं को मिलाकर अपने प्रताप और अधिकार जमाकर दक्षिण दिशा को गये ॥८६॥ उनका विजय-समाचार सुनकर उनके माता-पिता अत्यन्त प्रसन्न हुए किन्तु दूसरी माता काव्यालङ्कारा द्वेषाग्नि की ज्वाला से भीतर-ही-भीतर जल-भुन गई ॥८७॥ 'इन मेरे दोनों लड़कों ने पृथ्वी को जीतकर और मुझे मारकर मेरे राज्य पर अधिकार कर लेने का निश्चय किया है। इसलिए, यदि तुम लोग मेरे सच्चे स्नेही और भक्त हो तो बिना विचारे इन दोनों को मार डालो। -इस प्रकार, सेना-अधिकारियों के नाम राजा का आज्ञापत्र कायस्थ (मुंशी) से (घूस देकर) लिखवा लिया और धन देकर सन्देश ले जानेवाले दूत के हाथ काव्यालंकारा ने गुप्त रूप से सेना के शिविर में भेज दिया। दूत ने शिविर में जाकर पत्र दे दिया ॥८८-९२॥ सेनाधिकारियों ने पत्र लेकर और उसे बाँचकर राजनीति को अत्यन्त कठोर जानकर और राजा की आज्ञा को अनुलंघनीय समझकर दोनों राजकुमारों को मार डालने के लिए रात्रि के समय सम्मति की और विवश होकर मारने का निश्चय किया ॥९३-९४॥ उन अधिकारियों में एक ने जो उन बालकों के नाना बूढ़े प्रधान मन्त्री का मित्र था इस बात की सूचना उसे दी। सूचना पाकर बूढ़े प्रधान मन्त्री उन दोनों नातियों को सावधान करके और अच्छे घोड़ों पर बैठकर उनके साथ रात में ही सेना-शिविर से भाग गया। जंगली मार्ग न जानने के कारण भटकते हुए दोनों राजकुमार और उनका बूढ़ा नाना मध्याह्न की धूप में विन्ध्य पर्वत के जंगल में भूख-प्यास से व्याकुल हो गये। उनके दोनों घोड़े प्यास से मर गये और भूख-प्यास के क्लेश से बूढ़ा उनका नाना मन्त्री भी उनके देखते-देखते ही मर गया ॥९५-९९॥ 'पिता ने दुष्टा दूसरी माता को प्रसन्न करने के लिए निरपराध हम लोगों को वैसी दशा में पहुँचा दिया'—॥१ ॥

१७२ कथासरित्सागर

Page 199Permalink

१७२ कथासरित्सागर इति तौ वन क्षोभन्तौ दुःखितौ भ्रातरौ वत। प्राक् पित्रेवोपदिष्टां तां देवीं बध्यतुरम्बिकाम् ॥१०१॥ तस्या ध्यानप्रभावेण शरण्यायास्तदत्र तौ। विगतक्षुत्क्लमतृषौ बलिनौ च बभूवतुः ॥१०२॥ ततस्तत्प्रत्ययाच्छ्रस्तावविश्वासपथध्मौ । तामेव ययतुर्दृष्टु विन्ध्यकान्तारवासिनीम् ॥१०३॥ तत्र प्राप्तौ तदग्रे च भ्रातरौ तावुभावपि। प्रारभेतां निराहारौ तामाराधयितु तपः ॥१०४॥ अत्रान्तरे च ते तत्र सामन्ताः कटके स्थिताः । सम्भूय यावदायान्ति तयो पाप चिकीर्षवः ॥१०५॥ तावत् क्वचिन्न ददृशुर्विचिन्वन्तोऽपि सर्वतः । सौ समातामहो क्वापि राजपुत्रौ पलायितौ ॥१०६॥ ततश्चाशङ्क्य त मन्त्रभेद सर्वेऽपि ते भयात् । राज्ञस्तस्य परित्यागसेनस्यान्तिकमाययुः ॥१०७॥ प्रदर्श्य तस्मै सेखांश्च यथावृत्त तमब्रुवन्। सोऽत्र बुद्ध्या सद्वृत्तान्त क्रुद्धस्तानेवमब्रवीत् ॥१०८॥ नैत मत्स्रहिता लेखा इन्द्रजाल किमप्यदः । यूय च न किमेतावदपि जानीथ बालिशाः ॥१ ९॥ यदनल्पतपःप्राप्तावह हन्मि कथ सुतौ। युष्माभिस्तौ हतावेव सुहृत्त्वैस्तु रक्षितौ ॥११०॥ मातामहेन च तयोर्लक्षित मन्त्रिणाफलम्। इत्युक्त्वा तान् स सामन्तान् कायस्थ कूटलेखकम् ॥१११॥ तं पलायितमप्याशु स्वशक्त्यानाय्य भूपतिः । सम्यक पृष्ट्वा यथावृत्तं यथावन्निगृहीतवान् ॥११२॥ भार्या च काम्यारूङ्काराम् तादृक् कार्यविधायिनीम्। भूगृहे स निक्षिपेत पापां तां पुत्रघातिनीम् ॥११३॥ अविचार्य तु पर्यन्तमतिङ्गपान्थया धिया। सहसा हि कृतं पापं कथ मा भूद्विपत्तये ॥११४॥ ये च त राजपुत्राभ्यां राह गत्वाभ्युपागताः । सामन्तास्तान्निवार्याग्यांस्त्वत्परं स मृगो व्यधात् ॥११५॥

सप्तम लम्बक १७३

Page 200Permalink

सप्तम लम्बक १७३ ऐसा सोचते हुए उन दोनों दुःखित भाइयों ने पिता के पूर्व उपदेश का स्मरण करके माता अम्बिका का ध्यान किया ॥१ १॥ भक्तों को शरण देनेवाली माता के स्मरण से वे दोनों भूख-प्यास से रहित और बलवान् हो गये ॥१ २॥ इस प्रकार, माता के चमत्कार से कुछ आशा प्राप्त करके मार्ग न जानते हुए भी वे दोनों विन्ध्यवासिनी देवी की ओर चल पड़े ॥१ ३॥ वहाँ पहुँचकर वे दोनों विन्ध्यवासिनी देवी को प्रसन्न करने के लिए उसके सन्मुख निराहार रहकर कठोर तप करने लगे। उधर सेना के अधिकारी जब राजा के आज्ञानुसार राजकुमारों को मारने के लिए एकत्र होकर आये तब उन्होंने बहुत खोजने पर भी उन राजकुमारों को नहीं देखा और समझ गये कि वे दोनों अपने बूढ़े नाना के साथ शिबिर से कहीं भाग गये ॥१ ४-१ ६॥ वे सब गुप्त वार्ता के प्रकट हो जाने के कारण घबराये हुए राजा परित्यागसेन के समीप डरते-डरते आये ॥१ ७॥ और, राजा को उसके लेख दिखाकर सब समाचार सुना दिया। राजा यह सब सुनकर और समझकर क्रोध करके उनसे बोला—'ये लेखपत्र आदि मेरे भेजे हुए नहीं हैं। यह क्या इन्द्रजाल है? मूर्ख तुम क्या यह नहीं जानते थे कि कठोर तपस्या के प्रभाव से प्राप्त किए हुए बच्चों को मैं स्वयं कैसे मारता? तुम लोगों ने तो उन्हें मार ही डाला था। केवल अपने पुण्य से वे बच गये हैं। उनके नाना ने भी मन्त्री होने का फल दिखा दिया। ऐसा कहकर उसने उन सब अधिकारियों तथा आये हुए भी उस मिथ्याचारी लेखक को पकड़वाकर बुलाया और सब को मरवा डाला और ऐसे नीच कार्य करनेवाली पुत्रघातिनी पत्नी काव्यालंकारा को भी गड्ढे में डलवा दिया ॥१ ८-११३॥ अत्यन्त द्वेष के कारण अन्धी बुद्धि से बिना विचारे जो पाप किया जाता है उससे विपत्ति क्यों न आयगी ? ॥११४॥ राजा ने राजकुमारों के साथ गये हुए सभी अधिकारियों और नौकरों को हटाकर उनके स्थान पर दूसरे व्यक्तियों की नियुक्ति की ॥११५॥

१७४ कथासरित्सागर

Page 201Permalink

१७४ कथासरित्सागर

तस्थौ च वार्तामन्विच्छन् सततं पुत्रयोस्तयोः । तन्मात्रा सह दुःखार्त्तो धर्मसक्तोऽम्बिकां स्मरन् ॥११६॥ तावच्च राजपुत्रस्य तपसा सानुजस्य सा। घस्येन्दीवरसेनस्य तुष्टाऽभूद्विन्ध्यवासिनी ॥११७॥ दत्त्वा च खड्गं स्वप्ने सा साक्षादेव समादिशत् । अस्य प्रभावात् खड्गस्य शत्रूञ्जेष्यसि दुर्जयान् ॥११८॥ चिन्तयिष्यसि यत्किञ्चित् तच्च सम्पत्स्यते तव । द्वावप्येतेन च युवामिष्टसिद्धिंमवाप्स्यथः ॥११९॥ इत्युक्त्वान्तर्हितायां च देव्यां तस्यां प्रबुध्य सः। तत्रेन्दीवरसेनस्तं हस्तस्थं खड्गमक्षैक्षत ॥१२० ॥ अथ खड्गेन तत्स्वप्नवर्णनेन च सोऽनुजम् । आश्वास्य चक्रे तद्युक्तं प्रातर्भेनेन पारणम् ॥१२१॥ ततः प्रणम्य देवीं तां रात्प्रसादहृतक्लमः । हृष्टस्तत्सङ्गहस्तश्च समं मात्रा ययौ ततः ॥१२२॥ गत्वा च दूरं स प्राप्वेकं पुरवरं महत् । कुर्वाणं मेरुशिखरभ्रान्तिं हममयेगृहैः ॥१२३॥ तत्र रौद्रं ददर्शैकं प्रतोलीद्वारि राक्षसम्। पप्रच्छ तं च धीरोऽस्य पुरस्यास्यां पतिं च सः ॥१२४॥ इदं धौमपुरं नाम नगरं राक्षसाधिप । अभ्यास्ते यमदंष्ट्राख्यः स्वामी नः शत्रुसूदनः ॥१२५॥ इत्युक्ते रक्षसा तेन यमदंष्ट्रजिघांसया। तत्रेन्दीवरसेनोऽथ स प्रवेष्टुं प्रवृत्तवान् ॥१२६॥ निरुन्धन्तं च तं द्वाःस्थं राक्षसं स महाभुजः । एकखड्गप्रहारेण शिरश्छित्त्वा व्यपातयत् ॥१२७॥ तं हत्वा राजभवनं प्रविश्यान्तर्ददर्श सः। शूरं सिंहासनस्थं तं यमदंष्ट्रं निशाचरम् ॥१२८॥ दृष्ट्वापोरमुगं वामपार्श्वस्थितवराङ्गनम् । आश्रितेतरपार्श्वं च कुमार्थ्या दिव्यस्यया ॥१२९॥ दृष्ट्वा च सोऽम्बिकान्तत्तद्वहहस्तो रणाय तम् । माहूतवान् स धात्तग्यो गद्दगमाङ्ख्य गद्दगः ॥१३०॥

Page 202Permalink

The provided image is completely blank and does not contain any text to transcribe.

१७४ कथासरित्सागर

Page 203Permalink

१७४ कथासरित्सागर तस्थौ च वार्तामन्विष्यन् सततं पुत्रयोस्तयोः । तन्मात्रा सह दुःखार्तो धर्मसक्तोऽम्बिकां स्मरन् ॥११६॥ तावच्च राजपुत्रस्य तपसा सानुजस्य सा । तस्येन्दीवरसेनस्य तुष्टाऽभूद्विन्ध्यवासिनी ॥११७॥ दत्त्वा च खड्गं स्वप्ने सा साक्षादेवं तमादिशत् । अस्य प्रभावात् खड्गस्य शत्रूञ्जय्यसि दुर्जयान् ॥११८॥ चिन्तयिष्यसि यत्किञ्चित् तच्च सम्पत्स्यते तव । द्वावप्येतेन च युवामिष्टसिद्धिमवाप्स्यथः ॥११९॥ इत्युक्त्वाऽन्तर्हितायां च देव्यां तस्यां प्रबुध्य सः । तत्रेन्दीवरसेनस्तं हस्तस्थं खड्गमैक्षत ॥१२०॥ अथ खड्गेन तत्स्वप्नवर्णनेन च सोऽनुजम् । आश्वास्य चक्रे तद्युक्तः प्रातर्वन्येन पारणम् ॥१२१॥ ततः प्रणम्य देवीं तां तत्प्रसादबृहद्बलः । हृष्टस्तत्खड्गहस्तश्च समं भ्रात्रा ययौ ततः ॥१२२॥ गत्वा च दूरं स प्राप्वैकं पुरवरं महत् । कुर्वद्भि र्मेरुशिखरभ्रान्तिं हेममयैर्गृहैः ॥१२३॥ तत्र रौद्रं ददर्शैकं प्रतोलीद्वारि राक्षसम् । पप्रच्छ तं च वीरोऽस्य पुरस्याख्यां पतिं च सः ॥१२४॥ इदं शैलपुरं नाम नगरं राक्षसाधिपः । अध्यास्ते यमदंष्ट्राख्यः स्वामी नः क्षत्रुमर्दनः ॥१२५॥ इत्युक्ते रक्षसा तेन यमदंष्ट्रजिघांसया । तत्रेन्दीवरसेनोऽथ स प्रवेष्टुं प्रवृत्तवान् ॥१२६॥ निक्षिपन्तं च तं ज्ञात्वा राक्षसं स महाभुजः । एकखड्गप्रहारेण शिरश्छित्त्वा न्यपातयत् ॥१२७॥ तं हत्वा राजभवनं प्रविश्यान्तर्ददर्श सः । शूरः सिंहासनस्थं तं यमदंष्ट्रं निशाचरम् ॥१२८॥ वष्ट्राम्भोरुहमंसे वामपार्श्वस्थितवराङ्गनम् । आधितेतरपार्श्वं च कुमार्या दिव्यरूपया ॥१२९॥ दृष्ट्वा च सोऽम्बिकादत्तखड्गहस्तो रणाय तम् । माहूतवान् स चोत्तस्थौ खड्गमाकृष्य राक्षसः ॥१३ ॥

Page 204Permalink

तब दोनों का द्वन्द्व-युद्ध प्रारम्भ होने पर इन्दीवरसेन के द्वारा बार-बार काटा जाता हुआ भी उसका सिर फिर-फिर जुट जाता था ॥१३१॥

उस राक्षस की इस माया को देखकर उसके पास बैठी हुई और राजपुत्र पर आसक्त हुई कुमारी द्वारा इशारे से सूचित किये गये राजकुमार ने उसके सिर को काटकर तुरन्त ही एक खड्ग प्रहार से उसके दो टुकड़े कर डाले ॥१३२-१३३॥

कुमारी के द्वारा ज्ञात राक्षसी माया के नष्ट हो जाने पर उसका सिर फिर नहीं जुटा और वह मर गया ॥१३४॥

उस राक्षस के मरने पर वह सुन्दरी स्त्री और कुमारी दोनों प्रसन्न हो गई। तब छोटे भाई के साथ इन्दीवरसेन ने स्वस्थता से बैठकर पूछा—॥१३५॥

'इस एकमात्र द्वारपाल से रक्षित नगर में यह कैसा राक्षस था और तुम दोनों कौन हो जो उसके मारे जाने पर प्रसन्न हो रही हो ? ॥१३६॥

यह सुनकर उन दोनों में से कुमारी बोली—'इस दीसपुर में वीरभुज नाम का राजा था। यह उस राजा की मदनदंष्ट्रा नामकी पत्नी (रानी) है। इस राक्षस ने नगर में आकर राजा वीरभुज को खा डाला उसके अन्य कुटुम्बियों और सेवकों को भी खा लिया किन्तु यह सुन्दरी है इसलिए इसे नहीं खाया और अपनी पत्नी बना लिया ॥१३७-१३९॥

तब इस निर्जन नगर में सोने के भवन बनाकर बिना नौकर-चाकरों के ही यह इसके साथ आनन्द-विहार करता हुआ रहता था॥१४०॥

और, मैं इस राक्षस की खड्गदंष्ट्रा नाम की छोटी बहन हूँ। मैं तुम्हें देखकर तुमसे प्रेम करने लगी हूँ ॥१४१॥

इसलिए, इसके मरने पर यह और मैं दोनों प्रसन्न हुए। अब तुम मेरे ही मन के द्वारा माँग की गई मुझसे विवाह करो' ॥१४२॥

ऐसा कहती हुई खड्गदंष्ट्रा को इन्दीवरसेन ने गान्धर्व विधि से विवाहित कर लिया ॥१४३॥

और, खड्ग के प्रभाव से इच्छा करते ही अभिलषित भोगों को प्राप्त करता हुआ राजकुमार, अपने छोटे भाई के साथ वहीं रहने लगा ॥१४४॥

एक बार उसने अपने खड्ग के प्रभाव से आकाश-यान का ध्यान किया जिससे विमान बन कर आ गया ॥१४५॥ २१

१७६ कथासरित्सागर

Page 205Permalink

१७६ कथासरित्सागर प्रवृत्ते च तयोर्युद्धे छिन्नश्छिप्तोऽथ राक्षसः। तस्येन्दीवरसेनेन मूर्धा मुहुरजायत ॥१३१॥ तां तस्य मायामालोक्य तत्पार्श्वस्थितया तया। कुमार्या कृतसञ्ज्ञ सन्ददर्शनेनानुरक्तया ॥१३२॥ स राजपुत्रश्छित्त्वैव रक्षसस्तस्य तच्छिरः। भूयः खड्गप्रहारेण खड्गहस्तो द्विधाकरोत् ॥१३३॥ तयास्य नष्टमायस्य रक्षसः प्रतिमायया। नाजायत पुनर्मूर्धा तेन रक्षो व्यपादि तत् ॥१३४॥ हत तस्मिन् प्रहृष्टे ते तद्वरस्त्रीकुमारिके। सानुजो राजपुत्रोऽसावुपविश्याथ पृष्टवान् ॥१३५॥ आसीत् किमीदृशेऽमुष्मिन् पुरे त्रास्यन्नरक्षितः। राक्षसोऽस्य युवां के च हतऽस्मिन् किं च हृष्यथः ॥१३६॥ एतच्छ्रुत्वा तयोर्मध्यात् कुमारी सा जगाद तम्। अस्मिञ्छैलपुरे वीरभुजो नामाभवन्नृपः ॥१३७॥ एषा मदनदंष्ट्रेति भार्या तस्य स चामुना। मायया राक्षसेनेत्य यमदंष्ट्रेण भक्षितः ॥१३८॥ ग्रस्तः परिच्छदश्चास्य सुरूपेति न भक्षिता। एका मदनदंष्ट्रैषा भार्या च विहितात्मनः ॥१३९॥ ततो विविक्षत रम्येऽस्मिन्पुरे निर्माणकाञ्चनान्। गृहानेषोऽनया क्रीडन्नास्तापास्तपरिच्छदः ॥१४०॥ अहं च खड्गदंष्ट्राख्या कनीयस्यस्य रक्षसः। भगिनी कन्यका दृष्टे त्वयि सद्योऽनुरागिणी ॥१४१॥ अतो हतेऽस्मिन्हृष्टेयमस्मिं च तविहाधुना। उपयच्छस्व मामार्यपुत्र प्रेमसमर्पिताम् ॥१४२॥ एवमुक्तवतीं खड्गदंष्ट्रां स परिणीतवान्। तामिन्दीवरसेनोऽथ गान्धर्वविधिना तदा ॥१४३॥ तस्थौ चान्नेन नगरे देवी खड्गप्रभावतः। चिन्तितोपनमद्भोगः कृतदारोऽनुजान्वितः ॥१४४॥ एकदा च कनीयांसं भ्रातरं व्योमगामिनि। स्वखड्गचिन्तारत्नस्य प्रभावाद्याननिर्मितः ॥१४५॥

सप्तम लम्बक १७९

Page 206Permalink

सप्तम लम्बक १७९ तब उसपर छोटे भाई अनिच्छासेन को बिठाकर उसने अपना समाचार माता-पिता को कहने के लिए पिता घर के भेज दिया ॥१४६॥ वह अनिच्छासेन उस विमान के द्वारा आकाश मार्ग से इरावती नगरी में पिता के समीप जा पहुँचा ॥१४७॥ वहाँ जाकर उसने अत्यन्त उस कष्ट से व्याकुल माता-पिता को अपने दर्शन से ऐसा प्रसन्न किया जैसे चन्द्रमा चकवा-चकई को प्रसन्न करता है ॥१४८॥ आते ही माता और पिता को प्रणाम करके उनके द्वारा गले लगाये गये अनिच्छासेन ने अपने बड़े भाई की कुशल-वार्ता सुनाकर उनकी शंका दूर कर दी ॥१४९॥ और, अपना तथा बड़े भाई का प्रारम्भ के कष्ट से लेकर अन्त में गुण की प्राप्ति तक का सारा समाचार सुना दिया ॥१५०॥ और, यहाँ पर दुष्ट विमाता के द्वारा किये गये सारे पापकर्म की सारी कथा भी उसने सुनी जो विमाता ने उनके नाश के लिए की थी ॥१५१॥ तदनन्तर, अत्यन्त प्रसन्नता और उत्सव मानते हुए माता-पिता और अमला से प्रशंसित अनिच्छासेन वहीं रहने लगा ॥१५२॥ कुछ दिनों के बीतने पर बुरे सपने के कारण भाई के अनिष्ट की आशंका से दुःखित अनिच्छासेन ने भाई से मिलने की उत्कण्ठा अपने पिता से प्रकट की ॥१५३॥ और, कहा—'आपके मिलने की उत्कण्ठा बताकर मैं आर्य इन्दीवरसेन को यहाँ लाता हूँ। अतः पिताजी आप मुझे उसके पास जाने की आज्ञा दें ॥१५४॥ यह सुनकर बड़े पुत्र को देखने के लिए उत्सुक पिता और माता से आज्ञा प्राप्त कर अनिच्छासेन उसी विमानपर चढ़कर शीघ्र ही मीनपुर नगर जा राजा की आज्ञा पाकर ही अपने भाई के घर प्रविष्ट हुआ ॥१५५-१५६॥ उसने भीतर जाते ही बेहोश और भूमि पर गिरे हुए अपने बड़े भाई को देखा और उसके समीप ही यमदंष्ट्रा और मदनदंष्ट्रा—दोनों ही रो रही थीं ॥१५७॥ उसके पूछने पर कि यह क्या हुआ? नीचे मुँह किये हुई और लज्जाभिनय सी करती हुई यमदंष्ट्रा बोली—॥१५८॥ 'तुम्हारी अनुपस्थिति में एक बार मेरे स्नान के लिए चले जाने पर तुम्हारा भाई इस मदनदंष्ट्रा के साथ एकान्त में रमण कर रहा था। मैंने तुरन्त स्नान करके आने पर उसे इसके साथ देखा और वचनों से फटकारा ॥१५९-१६०॥

१७८ कथासरित्सागर

Page 207Permalink

१७८ कथासरित्सागर विमाने वीरमारोप्य सोऽनिच्छासेनमग्रभाक्। प्रहिणोदन्तिकं पित्रोः स्वोदन्तावेदनाय तम् ॥१४६॥ सोऽपि गत्वा विमानेन तन क्षिप्राद्विहायसा। पुरीमनिच्छासेनस्तां पितुः प्रापदैरावतीम् ॥१४७॥ तत्र तौ नन्दयामास पितरौ दर्शनेन स। तीव्रोत्तातपक्लान्तौ चकोराविव चन्द्रमाः ॥१४८॥ उपेत्य चाङ्घ्रिपतितः पर्यायालिङ्गितस्तयोः। निरास पृच्छतोः शङ्कां भ्रातृकल्याणवार्तया ॥१४९॥ शशंस स च वृत्तान्तमेतयोः पुरतोऽखिलम्। आपातदुस्तं सोऽप्यन्तं मातुरानन एव च ॥१५०॥ शुश्राव चात्र विहितं तादृशं पापया तया। द्वेषेणापरमात्रा सदारमनाशाय कैतवम् ॥१५१॥ ततः पित्रोत्सववता युक्तो मात्रा च निर्वृतः। तस्थावनिच्छासेनोऽत्र पूज्यमानो जनेन सः ॥१५२॥ याते कतिपयाहे च दृष्ट दुःस्वप्नशङ्कितः। भ्रातरं प्रति सोत्कण्ठः पितरं स व्यजिज्ञपत् ॥१५३॥ गच्छामि युष्मदुत्कण्ठामभिधायानयाम्यहम्। आर्यन्वीरसेनं तमनुजानीहि तात माम् ॥१५४॥ तच्छ्रुत्वानुमतस्तेन पित्रा पुत्रोत्सुकेन सः। जनन्या च विमानं स्वं तदेवारुह्य सत्वरः ॥१५५॥ प्रायादनिच्छासेनस्तद्व्योम्ना शैलपुरं पुरम्। प्राप्यश्च तत्र प्राविक्षत्स्वभ्रातुस्तस्य मन्दिरम् ॥१५६॥ ददर्श तत्र निस्संज्ञं पतितस्थितमग्रजम्। रुदत्योरन्तिके खड्गदंष्ट्रामदनदंष्ट्रयोः ॥१५७॥ किमेतदिति सम्भ्रान्तं पृच्छन्तं तमधोमुखी। जगाद खड्गदंष्ट्रा सा निन्दितापरया तया ॥१५८॥ स्वय्यस्थिरे मयि स्नातुं गतायामेकदाऽनया। त्वद्भात्राय महारस्तं रहो मदनदंष्ट्रया ॥१५९॥ क्षणात्स्नात्वागता चाहं साक्षादेनं तथा स्थितम्। एतया मुक्तमद्राक्षं वाचा च निरभर्त्सयम् ॥१६०॥

सप्तम लम्बक १७९

Page 208Permalink

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

सप्तम लम्बक १७९ तब उसपर छोटे भाई अनिच्छसेन को बिठाकर उसने अपना समाचार माता-पिता को कहने के लिए बिना श्रम के भेज दिया ॥१४६॥ वह अनिच्छासेन उस विमान के द्वारा आकाश मार्ग से इरावती नगरी में पिता के समीप जा पहुँचा ॥१४७॥ वहाँ आकर उसने अत्यन्त उग्र कष्ट से व्याकुल माता-पिता को अपने दर्शन से ऐसा प्रसन्न किया जैसे चन्द्रमा चक्रवा-चकई को प्रसन्न करता है ॥१४८॥ जाते ही माता और पिता को प्रणाम करके उनके द्वारा गले लगाये गये अनिच्छासेन ने अपने बड़े भाई की कुशल-वार्ता सुनाकर उनकी शंका दूर कर दी ॥१४९॥ और, अपना तथा बड़े भाई का प्रारम्भ के कष्ट से लेकर अन्त में सुख की प्राप्ति तक का सारा समाचार सुना दिया ॥१५०॥ और, यहाँ पर दुष्ट विमाता के द्वारा किये गये सारे पापकर्म की सारी कथा भी उसने सुनी जो विमाता ने उनके नाश के लिए की थी ॥१५१॥ तदनन्तर, अत्यन्त प्रसन्नता और उत्सव मानते हुए माता-पिता और जनता से प्रशंसित अनिच्छासेन वहीं रहने लगा ॥१५२॥ कुछ दिनों के बीतने पर बुरे सपने के कारण भाई के अनिष्ट की आशंका से दुःखित अनिच्छासेन ने भाई से मिलने की उत्कण्ठा अपने पिता से प्रकट की ॥१५३॥ और, कहा—आपके मिलने की उत्कण्ठा बताकर मैं आर्य इन्दीवरसेन को यहाँ लाता हूँ। अतः पिताजी आप मुझे उसके पास जाने की आज्ञा दें ॥१५४॥ यह सुनकर बड़े पुत्र को देखने के लिए उत्सुक पिता और माता से आज्ञा प्राप्त कर अनिच्छासेन उसी विमानपर चढ़कर शीघ्र ही धीरपुर नगर को आया और प्रातःकाल ही अपने भाई के घर प्रविष्ट हुआ ॥१५५-१५६॥ उसने भीतर जाते ही बेहोश और भूमि पर गिरे हुए अपने बड़े भाई को देखा और उसके समीप ही मलयदंष्ट्रा और मदनमंजूषा—दोनों ही रो रही थीं ॥१५७॥ उनसे पूछने पर कि यह क्या हुआ? नीचे मुंह किये हुई और मदनमंजूषा से निन्दा की जाती हुई मलयदंष्ट्रा बोली—॥१५८॥ 'तुम्हारी अनुपस्थिति में एक बार मेरे स्नान के लिए चले जाने पर तुम्हारा भाई इस मदनमंजूषा के साथ एकान्त में रमण कर रहा था। मैंने तुरन्त स्नान करके आने पर उसे इसके साथ देखा और वचनों से फटकारा ॥१५९-१६०॥